Tuesday, 3 March 2026

ईरान भी हिटलर जैसी भूल कर बैठा


इजराइली और अमेरिकी हमले के बाद जो पलटवार ईरान की ओर से हुआ उसने लड़ाई को प. एशिया के बड़े हिस्से में फैला दिया। वैसे ईरान की दुश्मनी इजराइल और अमेरिका से है किंतु उसने उन मुस्लिम देशों पर भी मिसाइलें छोड़ दीं जिनमें या तो अमेरिका के सैनिक अड्डे हैं या फिर वे उसके समर्थक हैं। दुबई जैसे व्यावसायिक केंद्र पर ड्रोन और मिसाइल से किए हमले का औचित्य किसी को समझ नहीं आया।  संभवतः ईरान के रणनीतिकारों को ये लगा कि दुबई में अमेरिकी कंपनियों और धनकुबेरों ने काफी निवेश कर रखा है। ऐसे में वहां धमाके करने से पश्चिमी देशों के निवेशक  इस जगह से दूर भागने लगेंगे। इस हमले के जरिए ईरान ने कतर और ओमान जैसे देशों को ये संदेश दिया कि वे अमेरिकी अड्डे रखने से परहेज करें। गत दिवस ईरान ने सऊदी अरब में स्थित दुनिया के सबसे प्रमुख तेल शोधक कारखाने को भी निशाना बनाया। ये कहना गलत नहीं होगा कि ईरान  ने हमलों का पूरी ताकत से जवाब दिया है। अमेरिका से बात करने से इंकार कर वह जताना  चाह रहा  है कि भारी नुकसान के बावजूद वह लड़ाई जारी रखने में सक्षम है ।संभवतः इसीलिए डोनाल्ड ट्रम्प को कहना पड़ा कि युद्ध लंबा खिंच सकता है। इसी के बाद दुनिया भर के शेयर बाजारों में हड़कम्प मच गया। सोना ,चांदी और कच्चा तेल  महंगा होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था डगमगाने लगी। दरअसल ईरान जोश में होश खो बैठा वरना वह लड़ाई को इजराइल और अमेरिका के विरुद्ध ही सीमित रखता। इसमें दो मत नहीं है कि प. एशियाई देशों में ईरान ही इजराइल से टकराने की सामर्थ्य रखता है। उसके पास मिसाइलों का विशाल भंडार है। चीन और रूस से प्राप्त सैन्य उपकरणों के बल पर ही वह अमेरिकी दबाव के सामने झुकने से इंकार करता रहा। हमास और हिजबुल्ला जैसे आतंकवादी संगठन उसी के संरक्षण में इजराइल पर हमले करते रहे। लेकिन उसके शासक भूल गये कि इजराइल की पीठ पर अमेरिका का  हाथ है। उसने भले ही अत्याधुनिक युद्ध तकनीक विकसित कर ली हो किंतु बिना अमेरिका के वह अपना अस्तित्व कायम नहीं रख पाता। अमेरिका के कारण ही ब्रिटेन , जर्मनी और फ्रांस से भी इजराइल को समर्थन और सहायता मिलती रही है। हालांकि बीते एक - दो दशकों में परिदृश्य काफी बदला है। अनेक मुस्लिम देशों ने इजराइल से दुश्मनी त्यागकर तटस्थता अपना ली है। हालांकि वे फिलीस्तीन को सैद्धांतिक समर्थन देते रहते हैं। हमास के साथ जंग में भी ईरान और लेबनान ही इजराइल के विरुद्ध खड़े हुए। मौजूदा युद्ध के पहले ओमान , कतर और सऊदी अरब कोशिश करते रहे कि अमेरिका ईरान पर हमला न करे किंतु ईरान ने उनको ही निशाना बनाकर अपने प्रति सुहानुभूति रखने वाले समाप्त कर दिये।  चार दिन बाद भी भले ही वह डटे  रहने की दृढ़ता दिखा रहा है और तेहरान  में तत्काल सत्ता परिवर्तन की संभावना भी नजर नहीं आ रही । लेकिन  इजराइली और  अमेरिकी हमलों से ईरान धीरे - धीरे गाजा वाली स्थिति की ओर बढ़ रहा है जिसमें समूचा देश  मलबे में बदल जाएगा। हालांकि ईरान भौगोलिक दृष्टि से बड़ा देश है जिसके आबादी 9 करोड़ है किंतु इस संकट में उसे जिस बाहरी सहायता की जरूरत है उससे वह वंचित है। अमेरिका तो खुलकर मैदान में है और ट्रम्प लड़ाई को और भयावह बनाने की धमकी दे रहे हैं किंतु न तो रूस के राष्ट्रपति पुतिन और न ही चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग खुलकर ईरान के पक्ष में नजर आ रहे हैं। ये देखते हुए लगता है इजराइल  और अमेरिका ने ईरान को अलग - थलग करने में सफलता अर्जित कर आधी जंग जीत ली है जिसके लिए ईरान खुद जिम्मेदार है। इतनी बड़ी लड़ाई के अंतिम परिणाम का अंदाज मात्र चार दिनों में लगा पाना संभव नहीं है किन्तु ये कहना गलत नहीं होगा कि एक साथ दर्जन भर मोर्चे खोलकर ईरान के हुक्मरानों ने वैसी ही भयंकर भूल कर दी जो हिटलर ने दूसरे महायुद्ध में की थी। आज ईरान किसी प्रमुख मुस्लिम देश से सहायता मांगने की स्थिति में नहीं रहा। हमास , हिजबुल्ला और हूती जैसे आतंकवादी संगठनों के बल पर इजराइल को झुका लेने की सोच ने उसको बर्बादी के कगार पर ला खड़ा किया। हिटलर भी अपनी महत्वाकांक्षाओं को सीमित रखता तब वह वह शर्मनाक मौत से बच सकता था। खामेनेई की मौत के बाद ईरान के रणनीतिकारों को ये एहसास हो  जाना चाहिए था कि आजकल का युद्ध तलवारों से नहीं बल्कि तकनीक से लड़ा जाता है जिसमें बहादुरी से ज्यादा होशियारी की जरूरत होती है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 2 March 2026

ईरान की मूर्खता से मुस्लिम देश भी उसके दुश्मन बन बैठे



ईरान पर इजराइल और अमेरिका द्वारा किए गए हमले से प. एशिया में एक बार फिर युद्ध की आग भड़क उठी है। ईरान के सर्वोच्च शासक अली खामेनेई के साथ ही सेनाध्यक्ष और रक्षा मंत्री इजराइली मिसाइल की मार से मौत के शिकार हो गए। उनके अलावा भी उच्च पदों पर बैठी अनेक हस्तियां भी जान गंवा बैठीं। ईरान के सैन्य ठिकानों विशेष रूप से मिसाइलों के भंडार और परमाणु संस्थान इजराइल और अमेरिका के निशाने पर हैं। जैसी कि ईरान धमकी दे चुका था उसने भी पलटवार करते हुए इजराइल पर एक साथ सैकड़ों मिसाइलें दाग दीं। लेकिन इस जंग में सबसे बड़ा मोड़ ये आ गया कि इस्लामिक देशों की कथित एकता के परखच्चे उड़ गए। इस्लामिक देशों के संगठन के अलावा इस्लामिक नाटो नामक नई सैन्य संधि जैसी बातें  अप्रासंगिक होकर रह गईं। इसका कारण ईरान के नेताओं की मूर्खता ही है जिन्होंने इजरायल पर हमले के साथ-साथ सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, बहरीन, ओमान को भी निशाना बना दिया। इस कदम से मुस्लिम जगत दो फाड़ हो गया । उक्त देश अमेरिका के सहयोगी देश हैं। जिनके बारे में ईरान को आशंका है कि उनमें स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों का इस्तेमाल उस पर हमले के लिए हो सकता है। यद्यपि शुरुआत में मुस्लिम देशों ने ईरान पर इजराइली हमले की आलोचना की थी।  लेकिन ईरान द्वारा उन पर ही मिसाइलें छोड़ दीं तब मजबूरन वे उसके विरुद्ध खड़े दिखने लगे।   उक्त  देशों में से कुछ ने  इस युद्ध को रोकने हेतु अमेरिका से संपर्क भी किया था किंतु उसी दौरान ईरान ने उन्हीं के यहाँ धमाके कर दिए । ईरान के पक्ष में केवल लेबनान में जमे हिजबुल्ला नामक इस्लामिक आतंकवादी संगठन ने ही इजराइल पर हमले किए हैं। गाजा युद्ध में पिटने के बाद हमास की कमर पहले ही टूटी है जबकि ईरान की तरफदारी करने वाले तीसरे आतंकवादी संगठन हूती में भी इतना दम नहीं है जो इज़राइल को झुका सके। ऐसे में अच्छी छवि वाला एक भी इस्लामिक देश या संगठन ईरान के बचाव में नजर नहीं आ रहा। परमाणु शक्ति संपन्न एकमात्र मुस्लिम देश पाकिस्तान ईरान का निकटस्थ पड़ोसी होने के बावजूद अमेरिका के गुलाम जैसा है। यही वजह है कि ईरान को न तो बाहरी सैन्य सहायता मिल रही है और न ही कूटनीतिक संरक्षण। रूस जहां यूक्रेन युद्ध रूपी समस्या में फंसा है वहीं जिन चीनी मिसाइलों और रक्षा प्रणाली के बल पर ईरान अमेरिका से भिड़ने का दुस्साहस कर बैठा वे एक बार फिर धोखा दे गईं। स्मरणीय है ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी पाकिस्तान की चीन निर्मित रक्षा प्रणाली बुरी तरह विफल रही । दूसरी तरफ पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइलों को भारत ने हवा में ही नष्ट कर दिया था। लगातार दो युद्धों में चीन निर्मित युद्ध सामग्री के घटिया साबित होने से विश्व शक्ति के रूप में उसके रुतबे में जबरदस्त गिरावट आई है। कुल मिलाकर ये स्पष्ट हो गया है कि ईरान गीदड़ भभकी कितनी भी देता रहे लेकिन उसके पास उस स्तर की आक्रमण या रक्षा क्षमता नहीं है जो इजराइल जैसे छोटे देश ने विकसित कर ली। इसके विपरीत ईरानी हुक्मरान अमेरिका को धमकाकर ही खुश रहे। उन्हें डोनाल्ड ट्रम्प की रणनीति को समझकर समय रहते कूटनीतिक मोर्चा खोलना चाहिए था। सऊदी अरब , कतर और सं. अरब अमीरात को भरोसे में लेकर अमेरिका को हमलावर होने से रोका जा सकता था किंतु ख़ामेनेई अपने बनाए संसार में ही सिमटे रहे। युद्ध का अंतिम परिणाम क्या होगा ये कहना मुश्किल है लेकिन अमेरिका ने खामेनेई को मारकर एक लक्ष्य तो हासिल कर ही लिया। अब वह इजराइल के साथ मिलकर उसकी बची - खुची सैन्य क्षमता को नष्ट कर उसे झुकने मजबूर करेगा। ईरान की असली ताकत उसके तेल भंडार हैं लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते वह उनका समुचित उपयोग नहीं कर पा रहा। इस लड़ाई के बाद उसकी परमाणु बम बनाने की योजना भी अधर में फंसकर रह जाएगी। ईरान के नए शासकों के सामने सबसे बड़ी समस्या ये है कि अभी तक तो प. एशिया में इजराइल ही  घोषित तौर पर उसका शत्रु था लेकिन अब वे  मुस्लिम देश भी उसके दुश्मन बन गए जिन पर उसने मिसाइलों और ड्रोन से हमला करने की बेवकूफी कर दी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी