Tuesday, 12 May 2026

विपक्षी एकता झमेले में: तीसरे मोर्चे के पुनर्जन्म की अटकलें


तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी नाटकीयता का अनुभव होने लगा है। अभिनेता  विजय,  कांग्रेस और वामपंथियों सहित एक - दो अन्य विधायकों का समर्थन मिलने से  बहुमत की देहलीज तो पार कर गए लेकिन  खतरे खत्म नहीं हुआ।  कांग्रेस द्वारा   विजय को समर्थन देने से द्रमुक की नाराजगी खुलकर सामने आ गई जब पार्टी ने संसद में अपने सांसदों को कांग्रेस से अलग बिठाने का पत्र भेज दिया। दरअसल  समर्थन देने से पहले राहुल गांधी या पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने द्रमुक या इंडिया गठबंधन से बातचीत नहीं की। साथ ही दोनों विजय के शपथ ग्रहण में भी शामिल हुए। उल्लेखनीय है चुनाव प्रचार के दौरान श्री गांधी का ये बयान काफी चर्चित हुआ था कि राजनीतिक नेताओं में केवल स्टालिन ( पूर्व मुख्यमंत्री) ही हैं जिन्हें वे भाई कहते हैं। शायद इसलिए शपथ के बाद अपने भाषण में विजय ने राहुल को भाई कहकर संबोधित किया। बहरहाल विजय को समर्थन देकर कांग्रेस ने तमिलनाडु में नए समीकरण बनाने का जो दांव चला उसे श्री गांधी के राजनीतिक चातुर्य और सफलता के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है। लेकिन गहराई से देखें तो 22 लोकसभा और 10 राज्यसभा सांसदों वाले द्रमुक को छोड़कर विजय की नई नवेली पार्टी से गठबन्धन कौन सी बुद्धिमत्ता है इसका उत्तर नहीं मिल रहा। स्मरणीय है पिछले लोकसभा चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन पूरी तरह सुप्तावस्था में चला गया। उसके बाद हुए विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में उसके घटक दल एक दूसरे के विरुद्ध मैदान में उतरे। हरियाणा से शुरू हुआ सिलसिला हालिया चुनावी मुकाबलों में भी दिखा। प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस और वामपंथी अलग - अलग लड़े। इसी तरह केरल में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और वामपंथियों के बीच ही रहा। प. बंगाल के बारे में श्री गांधी का वह बयान काफी चर्चित हुआ कि ममता बैनर्जी के कुशासन के कारण ही भाजपा को इस राज्य में पांव जमाने का मौका मिला। लेकिन उनके पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है कि तृणमूल सरकार की गलत नीतियों का लाभ कांग्रेस क्यों नहीं उठा सकी? चुनाव के बाद सुश्री बैनर्जी ने 100 सीटें उनसे छीने जाने का जो आरोप चुनाव आयोग पर लगाया उसके समर्थन में तो श्री गांधी कूद पड़े किंतु उन्हें ये तथ्य भी स्वीकार करना चाहिए कि भाजपा विरोधी मतों में बंटवारा करने के लिए कांग्रेस और वामपंथी भी बराबर के दोषी हैं। करारी हार के बाद ममता ने     विपक्षी एकता की मजबूती के लिए काम करने की प्रतिबद्धता दर्शाई किंतु ये कहना भी गलत नहीं होगा कि इंडिया गठबंधन की मिट्टी पलीत करने के लिए वे भी कम दोषी नहीं हैं। इस गठबंधन में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की बड़ी भूमिका थी।। लेकिन जब उनको संयोजक बनाने का प्रस्ताव आया तब सुश्री बैनर्जी ने पुरजोर विरोध किया। परिणामस्वरूप नीतीश ने भाजपा के साथ गठजोड़ कर लिया। यदि ममता ने वह अड़ियलपन न दिखाया होता तो बड़ी बात नहीं केंद्र में गैर भाजपाई सरकार बनी होती। प. बंगाल में भी उन्होंने गठबंधन के अन्य दलों के लिए लोकसभा सीट छोड़ने से इंकार कर दिया।  उसके बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के समर्थन भी प्रचार करने सांसद शत्रुघ्न सिन्हा को भेजा। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी अरविंद केजरीवाल के पक्ष में सभाएं लीं। लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा ने जबरदस्त वापसी करते हुए हरियाणा , महाराष्ट्र  , बिहार, असम , और पुडुचेरी में जहां अपनी सत्ता बचाकर रखी वहीं विपक्ष के मजबूत स्तम्भ माने जा रहे अरविंद केजरीवाल और ममता बैनर्जी का वर्चस्व तोड़कर क्रमशः दिल्ली और प. बंगाल में सरकार बना ली और वह भी भारी बहुमत के साथ। हालांकि कांग्रेस ने केरल जीतकर एक उपलब्धि अपने खाते में भी दर्ज कर ली लेकिन वह भी इंडिया गठबंधन के घटक वामपंथियों को हराकर। आज तमिलनाडु में हुए बड़े उलटफेर में अन्ना द्रमुक के लगभग 30 विधायकों ने विजय सरकार को समर्थन देने का ऐलान कर कांग्रेस को चौंका दिया क्योंकि इसके बाद विजय सरकार के पास सुविधाजनक बहुमत होने से कांग्रेस का दबाव खत्म हो गया। कुल मिलाकर विपक्ष की एकता दूर की कौड़ी बनी हुई है। उ.प्र के चुनाव में अखिलेश आम आदमी पार्टी से नजदीकियाँ बढ़ा रहे हैं। वहीं चुनाव हारने के बाद कोलकाता जाकर सुश्री बैनर्जी से मिलकर अपनी सहानुभूति व्यक्त कर आए। स्मरणीय है श्री केजरीवाल और श्री यादव ने कांग्रेस को ठेंगा दिखाते हुए तृणमूल कांग्रेस का प्रचार किया था। ये सब देखते हुए निकट भविष्य में होने वाले चुनावी मुकाबलों में भी विपक्षी एकता की संभावनाएं नगण्य ही हैं। पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस में सांप और नेवले जैसा बैर है। गुजरात में भी यही स्थिति है। उ.प्र में अखिलेश भी इस बार कांग्रेस से दूरी बनाकर चलना चाह रहे हैं क्योंकि वह अपनी ताकत से ज्यादा मांग करती है। सही बात ये है कि लोकसभा चुनाव में 99 सीटें जीतकर राहुल गांधी की वजनदारी राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ने लगी थी किंतु उसके बाद भी चुनावों में उनका प्रदर्शन बहुत ही दयनीय रहा। केरल की जीत भी स्थानीय कारणों से हुई। इसीलिए ये कहना गलत नहीं होगा कि विपक्षी एकता में कांग्रेस सबसे बड़ी बाधक है क्योंकि एक तो गांधी परिवार श्रेष्ठता के भाव से बाहर निकलने तैयार नहीं है वहीं ज्यादातर विपक्षी दल राहुल गांधी के नेतृत्व में काम करने से कतराते हैं। इसका परिणाम तीसरे मोर्चे के पुनर्जन्म के रूप में हो तो आश्चर्य नहीं होगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 11 May 2026

सोमनाथ का अमृत महोत्सव: हिन्दू नव जागरण का प्रतीक


आजादी के बाद जब महमूद गजनवी द्वारा  तोड़े गए सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की बात उठी तब  पं. जवाहरलाल नेहरू ने उस पर सरकारी खर्च करने का विरोध किया। हालांकि सरदार पटेल जिन्होंने उसके निर्माण का आदेश दिया था वे टस से मस नहीं हुए और जनता से 25 लाख चंदा एकत्र कर काम शुरू किया। उनकी मृत्यु के बाद नेहरू सरकार में मंत्री, प्रख्यात शिक्षाविद् कन्हैयालाल माणिकलाल  मुंशी की देखरेख में मंदिर को दोबारा भव्य स्वरूप प्रदान किया गया। लेकिन 11 मई 1951को उसमें शिवलिंग की स्थापना समारोह में जाने से पं. नेहरू ने ये कहते हुए इंकार कर दिया कि उन्हें  मंदिर का पुनर्निर्माण पसंद नहीं क्योंकि यह हिन्दू पुनरुत्थानवाद है। यही नहीं उन्होंने राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भी सोमनाथ मंदिर जाने से रोका किंतु वे नहीं माने और उस समारोह में शामिल हुए। उस आयोजन के आज 75 वर्ष पूर्ण होने पर भव्य अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  इस ऐतिहासिक अवसर के साक्ष्य बने। बड़ी बात नहीं धर्म निरपेक्षता के झंडा बरदारों की आंखों में यह अमृत महोत्सव  उसी तरह खटके जैसे अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण उन्हें आज तक बर्दाश्त नहीं हुआ। जनेऊधारी ब्राह्मण और शिवभक्त होने का दावा करने वाले राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अभी तक अयोध्या के राम मंदिर जाने की जरूरत नहीं समझी क्योंकि मुस्लिम मतदाताओं की नाराजगी का डर उन्हें नींद में भी सताता है। लेकिन सोमनाथ जैसे मंदिर क्या केवल सनातन धर्म की धरोहर हैं ? महमूद गजनवी ने उस मंदिर को ध्वस्त कर केवल किसी एक धर्म को नहीं बल्कि भारत की अस्मिता को चोट पहुंचाई थी। सरदार पटेल ने जब उसके पुनरुद्धार की पहल की तब पं. नेहरू ने  उसका जो विरोध किया वह धर्म निरपेक्षता नहीं अपितु मुस्लिम तुष्टीकरण था। इस  तरह देश का विभाजन जिस मानसिकता ने किया उसे ही प्रश्रय देने की गलती उन्होंने दोहराई। दुर्भाग्य से उनके वैचारिक उत्तराधिकारी भी उसी परिपाटी पर चलते हुए धर्म निरपेक्षता का अर्थ मुस्लिम परस्ती लगा बैठे। मुसलमानों के मत इकतरफा बटोरने के इस फॉर्मूले ने कई दशकों तक अनेक दलों को राजनीतिक लाभ पहुंचाया किंतु समय बीतने के साथ इसकी प्रतिक्रिया हिंदू समाज में भी होने लगी जो असम और प. बंगाल के  हालिया चुनाव में  साफ नजर आई। इसे लेकर सेकुलर जमात चिंतित है किंतु  बहुत पुरानी बात नहीं जब कांग्रेस को ये लगा कि भाजपा से निपटने के लिए उसे भी हिन्दू जनमानस में अपनी जगह बनानी चाहिए। इसके बाद पार्टी के एक प्रवक्ता ने राहुल गांधी को ब्राह्मण साबित करते हुए उनका गोत्र तक बता दिया। उसके बाद  श्री गांधी मंदिरों और मठों में परम्परागत परिधान धारण कर पूजा - अर्चना करते देखे गए। उनकी अनुजा प्रियंका वाड्रा भी हिन्दू मंदिरों में मत्था टेकने लगीं। लेकिन मतदाताओं पर समुचित प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि उनका उद्देश्य विशुद्ध राजनीतिक था। हालांकि ये भी कहा जा सकता है कि भाजपा भी तो चुनाव जीतने के लिए हिंदुत्व का ढोल बजाती है किंतु  नरेंद्र मोदी और राहुल गाँधी के मंदिर जाने में जमीन - आसमान का अंतर है। और जिस दिन कांग्रेस सहित सेकुलर कहलाने वाले  राजनीतिक दल इस अंतर को समझ जाएंगे उस दिन हिन्दू समाज के बीच उनकी छवि सुधर जाएगी। हालिया चुनावी मुकाबलों में असम और प.बंगाल में हुए हिन्दू ध्रुवीकरण को खतरा बताकर छाती पीटने वाले  तब मौन रहते थे जब जाति और धर्म आधारित एम - वाय (मुस्लिम - यादव) को जीत की गारंटी मानकर प्रचारित किया जाता था। प. बंगाल में मुस्लिम मतदाताओं का भाजपा के विरोध में गोलबंद होना दीवार पर लिखी इबारत थी। उसकी प्रतिक्रिया हिन्दू गोलबंदी के रूप में इसी चुनाव में क्यों देखने मिली उसका सीधा - सीधा उत्तर ये है कि  वहां तुष्टीकरण  चरमोत्कर्ष पर जा पहुंचा। तृणमूल सांसद और प. बंगाल की सबसे चर्चित चुनाव प्रचारक सायोनी घोष ने कहा कि अभी उनकी पार्टी के इतने बुरे दिन नहीं आए जो जय श्री राम जैसे  राजनीतिक नारे का सहारा ले किंतु चुनावी मंचों पर वे हमारे दिल में काबा, लबों पे मदीना गाकर मुस्लिम तुष्टीकरण में जुटी रहीं। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि उनके उस गायन ने हिन्दू जनमानस को एकजुट होकर मतदान करने उद्वेलित किया। पता नहीं इस देश के सेकुलर वादियों को ये अक्ल कब आएगी कि सोमनाथ और अयोध्या के मंदिर केवल सनातन  की आस्था के ही नहीं अपितु राष्ट्रीय स्वाभिमान के जीवंत प्रतीक हैं। दुर्भाग्य से आजादी के बाद हमारे देश की समृद्ध संस्कृति और गौरवशाली आध्यात्मिक विरासत के प्रति जो उपेक्षा भाव रखा गया उसके विरुद्ध पनपा असंतोष  अब मुखर हो चला है। इसे हिन्दू पुनरुत्थान कहें या नव जागरण किंतु सदियों बाद ये दौर लौट रहा है। सोमनाथ मंदिर का अमृत महोत्सव उसी का प्रतीक है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 9 May 2026

बंगाल आज जो सोचता है वही कल पूरा देश सोचेगा


प. बंगाल के लिए आज का दिन वाकई ऐतिहासिक है। भाजपा के वैचारिक पूर्वज  जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के गृह प्रदेश में  इस राष्ट्रवादी विचारधारा का हाशिए पर रहना चौंकाता था। पहले कांग्रेस और उसके बाद वामपंथियों ने यहां लंबे समय तक शासन किया। उसके बाद 2011 में ममता बैनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस नामक पार्टी ने वामपंथियों के किले को ध्वस्त करते हुए  नई शुरुआत की। कांग्रेस से राजनीति  शुरू करने वाली ममता ने जब देखा कि उनकी पार्टी वामपंथियों से लड़ने में अनिच्छुक है तब उन्होंने बगावत की और  आखिरकार उस राइटर्स बिल्डिंग पर अपना परचम लहरा दिया जहां से उन्हें अपमानित कर निकाल दिया गया था। उम्मीद थी कि वे बंगाल को उस अराजक स्थिति से निकालकर भद्र लोक के दौर में वापस ले जायेंगी। उल्लेखनीय है बंगाल में ही नक्सलवाद जैसे आतंक का जन्म हुआ था। इसके अलावा वामपंथियों ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए बांग्लादेश से आए घुसपैठियों को  मतदाता बनवाकर जनसंख्या असंतुलन उत्पन्न कर दिया। वामपंथियों के शासन में पार्टी कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी चरम पर थी। कांग्रेस उसका मुकाबला करने की बजाय आत्मसमर्पण कर चुकी थी। ऐसे में जब ममता का उदय हुआ तब लगा वे उस दुरावस्था को दूर करेंगी किंतु जल्द ही वे भी उसी संस्कृति में ढल गईं। स्मरणीय है जो गुंडातंत्र वामपंथियों की मैदानी ताकत हुआ करता था उसी के विरोध में बंगाल की जनता ने सुश्री बैनर्जी को सत्ता सौंपी थी किंतु जल्दी ही वही गुंडे तृणमूल कांग्रेस के हिस्से बन गए और उसके बाद जो हुआ वह वामपंथी सरकार के दौर से भी बुरा अनुभव रहा। लेकिन जिस तरह वामपंथियों से लड़ने में कांग्रेस असमर्थ साबित हुई ठीक उसी तरह उसने ममता सरकार के विरुद्ध भी अपनी लाचारी दिखाई। धीरे - धीरे मार्क्सवादी भी हाशिए पर चले गए। इस शून्य को भरने के लिए कमर कसी भाजपा ने। लेकिन वामपंथी सरकार के समय राष्ट्रवादी विचारधारा पर जो दमनचक्र चला उसने ममता राज में और भी वीभत्स रूप ले लिया। बतौर मुख्यमंत्री उन्होंने जिस तरह वामपंथियों और कांग्रेस को मुख्यधारा से बाहर फेंका उससे उन्हें ये गुमान हो चला कि अब वे पूरी तरह चुनौती विहीन हो चली हैं। साधारण सूती साड़ी और हवाई चप्पल उनकी पहचान थी किंतु धीरे - धीरे वे उन सभी विकृतियों से घिरती चली गईं जिनके कारण बड़े - बड़े सत्ताधीश जनता की नजरों से गिरकर इतिहास की गहरी खाई में समा गए। प.बंगाल में हुआ राजनीतिक परिवर्तन किसी तात्कालिक घटना की प्रतिक्रिया नहीं अपितु एक लंबे वैचारिक संघर्ष की सफल परिणिति है। देशवासियों को ये बात भूलनी नहीं चाहिए कि देश के विभाजन की नींव इसी बंगाल से पड़ी थी। विभाजन के उस दौर में पूरे राज्य में मुस्लिम गुंडों ने जो अत्याचार किया उस पर कांग्रेस और वामपंथियों ने पर्दा डाल रखा था। ममता भी उसी राह पर चलीं। लेकिन समय चक्र हमेशा एक समान नहीं रहता। आखिर जनता के मन में ये बात बैठने लगी कि भाषा , संस्कृति और खाना - पान जैसे सतही विषयों में उसे उलझाकर सत्ता में बैठे तत्व देश की सुरक्षा और अखंडता का सौदा कर रहे हैं। 4 मई को ईवीएम से निकला जनादेश वह आक्रोश था जो मन में होने पर भी  भयवश व्यक्त नहीं हो पा रहा था। भाजपा ने बीते 10 वर्षों में प. बंगाल के मतदाताओं को इस बात के प्रति आश्वस्त किया कि वह  न केवल उनकी बल्कि शत्रु देशों से सटी सीमाओं की सुरक्षा भी करेगी। प. बंगाल को बदहाली से निकालकर सोनार बांग्ला की स्थिति में ले जाने का जो वायदा नरेंद्र मोदी ने किया और उनके दाहिने हाथ अमित शाह ने लोगों को भयमुक्त होकर बदलाव के अभियान में शामिल होने के लिए प्रेरित किया उसके कारण आज वहां हिन्दू राष्ट्रवाद का उद्घोष संभव हो सका। ये चुनाव केवल सत्ता बदलने तक सीमित न रहे ये देखना उन लोगों का दायित्व है जो इस वैचारिक क्रान्ति के आधारस्तम्भ हैं। सुवेंदु अधिकारी को प. बंगाल की जनता के विश्वास की रक्षा का जो दायित्व आज मिला है उसे उन्हें प्राण - प्रण से निभाना होगा। प. बंगाल की भौगोलिक स्थिति राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। आर्थिक स्थिति भी दयनीय है और कानून व्यवस्था अराजकता का पर्याय है। ऐसे में प. बंगाल की सत्ता भाजपा और सुवेंदु दोनों के लिए कठिन चुनौती है। इस बदलाव का राष्ट्रीय राजनीति पर दूरगामी असर पड़े बिना नहीं रहेगा। योगी और हिमंता के बाद सुवेंदु देश में हिंदूवादी राजनीति के नए चेहरे होंगे। जिन लोगों को इस चुनाव में हुआ हिन्दू ध्रुवीकरण हजम नहीं हो रहा उन्हें ये सोचना चाहिए कि देश का बहुसंख्यक वर्ग अब तुष्टीकरण के नाम पर चल रहे वोटों के व्यापार को रोकने स्वप्रेरणा से लामबंद हो रहा है। इसे रोकने के लिए जितने भी प्रपंच रचे जाएंगे उनका अपनी मौत मरना सुनिश्चित है। एक जमाने में कहा जाता था कि बंगाल आज जो सोचता है वही कल पूरा देश सोचेगा। आध्यात्मिक, बौद्धिक और राजनीतिक क्रांति की इस भूमि पर जो राजनीतिक परिवर्तन आज साकार हुआ उसे भविष्य का संकेत कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 8 May 2026

तमिलनाडु में राजनीतिक अस्थिरता का खतरा


4 मई को चुनाव परिणाम के बाद तमिलनाडु की राजनीति बुरी तरह उलझ गई है। सत्तारूढ़ पार्टी द्रमुक और मुख्य विपक्षी अन्ना द्रमुक को पीछे छोड़ते हुए तमिल अभिनेता जेम्स विजय की  पार्टी टीवीके 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ा दल बन गई। शुरुआत में लगा कि बहुमत के लिए जरूरी 10 सीटें उसे आसानी से मिल जाएंगी। कांग्रेस ने अपने 5 विधायकों के समर्थन का पत्र सौंपकर उसकी संभावनाएं बढ़ा दीं। लेकिन राज्यपाल ने सरकार बनाने के उनके दावे को ठुकराते हुए  118 विधायकों के समर्थन के प्रमाण मांगकर अड़ंगा लगा दिया। मुख्यमंत्री स्टालिन खुद भी विधानसभा चुनाव हार गए इसलिए उनकी  पार्टी द्रमुक द्वारा विजय का साथ देना अस्वाभाविक ही था। लेकिन उनको बड़ा धक्का तब लगा जब  साथ में चुनाव  लड़ी कांग्रेस ने  पूछे बिना ही विजय को समर्थन दे दिया। उधर भाजपा का साथ नहीं लेने की उनकी घोषणा के कारण अन्ना द्रमुक का समर्थन मुश्किल है जिसका भाजपा से गठबंधन है। उसी के बाद  आशंका व्यक्त की जाने लगी कि द्रमुक और अन्ना द्रमुक के कुछ विधायक तोड़कर विजय बहुमत की व्यवस्था कर लेंगे। कुछ छोटे दलों से समर्थन मिलने की चर्चा भी सुनाई दी किन्तु इन पंक्तियों के लिखे जाने तक  पेच फंसा हुआ है। राज्यपाल दो बार विजय से  कह चुके हैं कि  118 विधायकों के समर्थन के बगैर वे उन्हें सरकार बनाने के लिए नहीं बुलाएंगे। इस उहापोह के बीच एक असम्भव सी लगने वाली बात राजनीतिक गलियारों में फैली जिसके अनुसार विजय का रास्ता रोकने के लिए द्रमुक और अन्ना द्रमुक दशकों पुरानी शत्रुता को भूलकर एक साथ आएंगे।  ऐसा होने  पर दोनों के क्रमशः 73 और 53 विधायक मिलकर 126 हो जाएंगे जो बहुमत से 8 ज्यादा हैं। ये भी कहा जा रहा है कि राज्यपाल द्वारा विजय को मुख्यमंत्री नहीं बनने देने के पीछे भाजपा का दबाव है। दरअसल पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व प. बंगाल और असम में सरकार बन जाने के बाद ही तमिलनाडु की गुत्थी सुलझाना चाह रहा है। स्टालिन और अन्ना द्रमुक के शीर्ष नेता के बीच लंबी चर्चा के दावे भी किए जा रहे हैं। यद्यपि दोनों पार्टियां इस बारे में बोलने से कतरा रही हैं।  कुल मिलाकर अब तक गतिरोध बना हुआ है। ऐसी स्थितियों में राज्यपाल के अधिकार और भूमिका को लेकर भी विमर्श शुरू हो गया है। विजय का दावा है  सबसे बड़ा दल होने के कारण राज्यपाल को उन्हें सरकार बनाने का अवसर देते हुए सदन में बहुमत साबित करने का निर्देश देना चाहिए।  यद्यपि संविधान में बहुमत शब्द का ही उल्लेख है। उस दृष्टि से राज्यपाल अपनी जगह सही हैं। दूसरी तरफ  ये भी  देखने में आया है कि स्पष्ट बहुमत नहीं होने पर भी सबसे बड़ी पार्टी के नेता को राज्यपाल सदन में बहुमत साबित करने की शर्त पर मुख्यमंत्री नियुक्त कर देते हैं। इस संबंध में कर्नाटक का उदाहरण दिया जा रहा है जहां कुछ वर्ष पूर्व  भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी किंतु उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। बावजूद उसके राज्यपाल ने उसके नेता येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री बना दिया किंतु सदन में बहुमत साबित नहीं कर पाने के कारण उन्हें गद्दी छोड़नी पड़ी। उ.प्र में भी कई दशक पहले राज्यपाल रोमेश भंडारी ने बिना बहुमत के जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बना दिया किंतु वे भी बहुमत साबित न कर पाए । उक्त दोनों मामलों में राज्यपाल की भूमिका आलोचना का पात्र बनी। हो सकता है तमिलनाडु के राज्यपाल भी अल्पमत  सरकार बनवाने के आरोप से बचना चाह रहे हों। ये बात सही है कि यदि वे स्पष्ट बहुमत के बिना विजय को मुख्यमंत्री बना देते हैं तब जोड़ - तोड़ और खरीद फरोख्त से इंकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस के अलावा वामपंथी और कुछ छोटी पार्टियों के इक्का - दुक्का विधायकों को द्रमुक और अन्ना द्रमुक गठबंधन से तोड़ने के बाद भी उनकी सरकार पर खतरे की तलवार लटकती रहेगी। ऐसे में पहले ही स्पष्ट बहुमत हासिल करना राजनीतिक स्थिरता के लिए बेहतर विकल्प है।    देखना ये है कि विजय सत्ता की देहलीज पर आकर भी बाहर ही खड़े रह जाएंगे और  द्रविड़ आंदोलन से निकली द्रमुक और अन्ना द्रमुक पुरानी दुश्मनी भूलकर विजय के सपनों पर पानी फेर देंगी। रोचक बात ये है कि दोनों राष्ट्रीय पार्टियां भाजपा और कांग्रेस अपने दम पर इस गुत्थी को सुलझाने में असमर्थ हैं क्योंकि उनके पास अंगुलियों पर गिनने लायक विधायक हैं। इधर विजय धमकी दे रहे हैं कि द्रमुक और अन्नाद्रमुक की सरकार बनी तो उनके 108 विधायक त्यागपत्र दे देंगे। हालांकि ये बहुत ही अव्यवहारिक कदम होगा और क्या पता सभी विधायक इसके लिए तैयार न हों और पार्टी ही टूट जाए। कुल मिलाकर तमिलनाडु का जनादेश बहुत ही पेचीदा है। आखिरकार सरकार किसी न किसी की तो बनेगी किन्तु उसका स्थायित्व हमेशा खतरे में रहेगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 6 May 2026

करारी हार के बाद भी त्यागपत्र न देना दिमागी दिवालियापन


कोई अनुभवहीन व्यक्ति  कहे तो समझ में आता है लेकिन कई बार केंद्र में मंत्री  और 15 सालों तक प. बंगाल जैसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री रह चुकीं ममता बैनर्जी द्वारा चुनावों में मिली करारी हार के बाद भी त्यागपत्र नहीं देने की घोषणा को दिमागी दिवालियापन ही कहा जाएगा। इस चुनाव में सुश्री बैनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस बहुमत से काफी पीछे रह गईं। वे स्वयं भी भवानीपुर की अपनी सीट पर 15 हजार  से हार गईं। सामान्य तौर  प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री अपनी पार्टी को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में शालीनता के साथ जनादेश को स्वीकार करते हुए राष्ट्रपति या राज्यपाल के पास जाकर अपना त्यागपत्र सौंप देता है। लेकिन उसे नई सरकार के बनने तक काम चलाऊ तौर पर पद पर  रहने कहा जाता है। अतीत में जब भी किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की पार्टी जनादेश हासिल करने में विफल रही तब उन्होंने त्यागपत्र देने में संकोच नहीं किया। दरअसल ये किसी कानून से अधिक लोकतांत्रिक मर्यादा और नैतिकता से प्रेरित आचरण है। गत दिवस  सुश्री बैनर्जी ने जो आरोप चुनाव आयोग, भाजपा और केंद्र सरकार पर लगाए वे अपनी जगह हैं। चुनाव में हुई गड़बड़ी की शिकायत याचिकाओं के जरिए न्यायालय में की जा सकती है। लेकिन चुनाव हारने के बावजूद पद नहीं छोड़ने की जिद का कोई औचित्य नहीं है। इसीलिए अन्य विपक्षी दलों और नेताओं तक ने उनकी हेकड़ी का समर्थन नहीं किया। उल्टे अनेक भाजपा विरोधी यू ट्यूबर पत्रकार भी उनके इस गैर जिम्मेदाराना फैसले की आलोचना करते सुने गए। जहां तक बात संवैधानिक प्रावधानों की है तो चुनाव आयोग द्वारा नई विधानसभा के लिए चुने  सदस्यों की सूची राज्यपाल को भेजे जाने के बाद उसके गठन की  अधिसूचना राजपत्र के जरिए जारी होते ही पुरानी विधानसभा अस्तित्वहीन हो जाती है। इसी के साथ ही राज्यपाल बहुमत प्राप्त दल के निर्वाचित नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त  कर शपथ हेतु आमंत्रित करते हैं।  ममता बैनर्जी इतना तो जानती ही होंगी कि निवर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 7 मई तक ही है। ऐसे में वे त्यागपत्र न दें तब  भी राज्यपाल नए मुख्यमंत्री की नियुक्ति कर  शपथ दिलवा सकते हैं। तब तक सुश्री बैनर्जी सहानुभूति बटोरने का कितना भी प्रयास करें किंतु उन्हें सफलता नहीं मिलेगी। बेहतर होता वे  जनादेश को गरिमा के साथ स्वीकार करते हुए राज्यपाल से मिलकर पद से हटने की पेशकश करतीं किंतु जिद्दी स्वभाव के लिए प्रसिद्ध सुश्री बैनर्जी ने हार की खीज में त्यागपत्र नहीं देने की घोषणा कर खुद को हँसी और आलोचना  का पात्र बना लिया। उन्होंने विपक्षी एकता के लिए काम करने की बात भी कही है । लेकिन वे भूल गईं कि इंडिया गठबंधन जिस दुर्दशा का शिकार है उसके लिए वे  भी जिम्मेदार हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस और वामपंथी दलों को मात्र 2 सीटें देने का प्रस्ताव दिया। बाद में कांग्रेस और वामपंथियों ने गठबंधन किया। उसके पहले गोवा विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी खड़े कर कांग्रेस का नुकसान भी वे करवा चुकी थीं। दिल्ली में उन्होंने कांग्रेस की बजाय आम आदमी पार्टी को समर्थन दिया। इस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच लगभग 5 फीसदी का अंतर है। लेकिन कांग्रेस , वामपंथी और अन्य मिलकर 12- 13 प्रतिशत मत बटोर ले गए। यदि  वे सबको एकजुट कर भाजपा विरोधी मोर्चा बनातीं तब चुनाव परिणाम कुछ और हो सकता था । सुश्री बैनर्जी के पास अपनी बात रखने के लिए कानून सम्मत अनेक विकल्प हैं। लेकिन लगता है सत्ता के सान्निध्य में रहने से अब उनमें संघर्ष की हिम्मत नहीं रही। और फिर उनके अस्थिर स्वभाव के कारण अन्य दलों के नेतागण भी उनसे छिटकते हैं। सच  तो ये  है कि उनकी  पराजय से कांग्रेस और वामपंथियों के अलावा अन्य दलों में भी प्रसन्नता है क्योंकि विपक्षी एकता में वे बड़ा रोड़ा थीं। दरअसल राष्ट्रीय नेता बनने की महत्वाकांक्षा होने से वे किसी और को बर्दाश्त नहीं करना चाहतीं। राहुल गांधी की नेतृत्वक्षमता पर भी वे कई बार उंगली उठा चुकी हैं। विपक्षी गठबंधन का नेता बनने के लिए समानान्तर रूप से वे तमाम विपक्षी नेताओं से भी मिलीं किंतु कामयाब नहीं हुईं। अब जबकि उनका बनाया  ढांचा बुरी तरह ढह चुका है और अपने ही राज्य में उनकी राजनीतिक हैसियत शिखर से लुढ़कर जमीन पर आ गई है तब उन्हें अकड़ छोड़कर सौजन्यता और समझदारी दिखानी चाहिए थी किंतु वे अपने उस स्वभाव को बदलने राजी नहीं हैं जिसने उन्हें सत्ता के सिंहासन से उतारकर सड़क पर ला खड़ा किया।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 5 May 2026

चुनाव परिणामों का संदेश मुफ्त उपहार ही नहीं अच्छी सरकार भी चाहिए


पांच राज्यों के चुनावों में जो पार्टी जीती वह सरकार बनाने में जुट गई वहीं जिनके हाथ पराजय आई वे भविष्य की तैयारी में लग जाएंगे।  निकट भविष्य में जहां चुनाव होने वाले हैं उन राज्यों के लिए रणनीति और मोर्चेबंदी का काम भी जल्द शुरू हो जाएगा।  2027 में गोवा , मणिपुर, उ प्र, उत्तराखंड , पंजाब, हिमाचल और गुजरात में विधानसभा चुनाव होंगे। मणिपुर में शायद अशांति के चलते चुनाव प्रक्रिया निलंबित रहे किंतु बाकी में निर्धारित समय पर मतदान होगा। असम और प. बंगाल में शानदार सफलता के कारण भाजपा का हौसला निश्चित रूप से ऊंचाई पर होगा। हालांकि दक्षिण में उसे पुडुचेरी से ही संतोष करना पड़ा।  केरल में तो वह  तीन सीटें जीत भी गई किंतु तमिलनाडु में शून्य उसका पीछा नहीं छोड़ रहा। आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों में मणिपुर को छोड़ भी दें तो गोवा , उत्तराखंड, उ.प्र और गुजरात में अपनी सरकार की वापसी के लिए वह हरसम्भव प्रयास करेगी। इसी के साथ  हिमाचल की सत्ता कांग्रेस से छीनने के अलावा पंजाब में अपने दम पर पैर जमाने की रणनीति बनाएगी। हाल ही में आम आदमी पार्टी के कुछ सांसदों को तोड़कर उसने अपने इरादे जता दिए हैं। वहीं कांग्रेस, समाजवादी पार्टी , आम आदमी पार्टी और अकाली दल भी अपने ढंग से व्यूह रचना करेंगे।   लेकिन गत दिवस आए परिणामों से सभी दलों को ये सबक लेना चाहिए कि मुफ्त उपहार बांटकर चुनाव तो जीता जा सकता है किंतु सत्ता में बने रहने के लिए जरूरी है सरकार का प्रदर्शन हर मोर्चे पर जन अपेक्षाओं के अनुरूप हो। कल सम्पन्न चुनावों वाली सभी राज्य सरकारों ने मतदाताओं को लुभाने के लिए कोई न कोई  योजना चला रखी थी । केरल में विजयन और तमिलनाडु की स्टालिन सरकार ने सीधे खाते में नगदी के अलावा जनकल्याण की अनेक योजनाएं संचालित करते हुए सत्ता में बने रहने की जमीन तैयार की। ऐसा ही देखने मिला प. बंगाल में जहां ममता बैनर्जी ने महिलाओं और युवाओं को लुभाने के लिए तरह - तरह के मुफ्त उपहार बांटे। असम में भी चुनाव के पहले मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने महिलाओं के खाते में हजारों रुपए जमा करवा दिए। वैसे तो सभी राज्यों में जन कल्याण के नाम पर सरकारें  खजाना लुटा रही हैं। चुनाव जीतने के लिए भी मौजूदा खैरातों से ज्यादा का वायदा भी आम  है। प. बंगाल में महिलाओं को तृणमूल सरकार 1500 रु. प्रतिमाह देती थी। उसका  तोड़ निकालते हुए भाजपा ने 3 हजार का वायदा कर दिया। आम तौर पर देखने मिला है कि मतदाता  जो मिल रहा है उस पर ही भरोसा जताता है। म. प्र, महाराष्ट्र,झारखंड, बिहार और असम में ये साबित भी हुआ। लेकिन छत्तीसगढ़। और राजस्थान की पिछली कांग्रेस सरकारों ने  दिल खोलकर खजाना लुटाया लेकिन मतदाताओं ने उन्हें उखाड़ फेंका। कल आए नतीजों में असम में हिमंता सरकार तो मुफ्त खैरात बांटकर सत्ता में वापस आ गई जबकि प. बंगाल में ममता बैनर्जी, तमिलनाडु में स्टालिन और केरलम में विजयन की सरकार को खैरात भी बचा नहीं सकी। सुश्री बैनर्जी और स्टालिन तो खुद भी हार गए।  मोटे तौर पर कह सकते हैं कि प्रतिद्वंदी पार्टी के अधिक लुभावने वायदों के लालच में मतदाताओं ने मौजूदा सरकार के उपकारों को भुला दिया किंतु ये सच्चाई से आँखें चुराने जैसा है।  सही बात ये है कि  साधारण समझ वाला मतदाता भी  समझने लगा है कि इन मुफ्त उपहारों की आड़ में सत्ता में बैठे लोग किस तरह अपना घर भर रहे हैं। इसके अलावा शासन चलाने के तौर - तरीके भी जनता के संज्ञान में आने लगे हैं। ममता बैनर्जी, स्टालिन और विजयन मजबूत नेता माने जाते थे। लेकिन कानून व्यवस्था, महिला सुरक्षा और भ्रष्टाचार के अलावा देश की एकता - अखंडता जैसे मुद्दों की अनदेखी उन्हें महंगी पड़ी। प. बंगाल में घुसपैठियों के प्रति ममता सरकार के लचीले रवैये ने लोगों का गुस्सा बढ़ाया। वहीं जरूरत से ज्यादा मुस्लिम तुष्टीकरण की सहज प्रतिक्रिया हिन्दू ध्रुवीकरण के रूप में देखने मिली। महिलाओं पर अत्याचार के प्रति गैर जिम्मेदाराना बयानबाजी और तृणमूल के गुंडों का आतंक मुफ्त योजनाओं पर भारी पड़ा। तमिलनाडु तो खैरातों का मुख्यालय है। अभिनेता विजय ने 8 ग्राम सोना देने का वायदा कर स्टालिन सरकार की योजनाओं की चमक फीकी करने का दांव चला किंतु उनकी जीत के पीछे द्रमुक सरकार का खराब प्रदर्शन, मुख्यमंत्री के बेटे की सनातन के विरुद्ध स्तरहीन बयानबाजी जैसी गलतियों ने इस सरकार की जड़ें खोखली कर दीं। इसी तरह केरलम में विजयन सरकार अपने राजनीतिक विरोधियों के दमन के लिए बदनाम हो चली थी।।राज्य में आई प्राकृतिक आपदा के समय भी उसका प्रदर्शन बहुत खराब रहा। वामपंथी सरकारें सुशासन के लिए जानी जाती रहीं किंतु विजयन सरकार इस मामले में भी बदनाम हो गई। कुल मिलाकर निष्कर्ष ये है कि केवल खैरात बांटकर ताउम्र सत्ता में बने रहने की गलतफहमी राजनीतिक दलों और नेताओं को दूर करना चाहिए। हिमंता ने घुसपैठियों के मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाकर मतदाताओं पर छाप छोड़ी जबकि कांग्रेस मुस्लिम तुष्टीकरण के लालच में बहुसंख्यक हिंदुओं का समर्थन खो बैठी। उसके 19 विधायकों में से 18।मुस्लिम और एक ईसाई है जिसका निहितार्थ आसानी से निकाला जा सकता है। ममता बैनर्जी भी भ्रष्टाचार, महिला उत्पीड़न, गुंडागर्दी और घुसपैठियों की समस्या से मुंह मोड़कर बैठ गईं। नतीजा सामने है। ये देखते हुए जिन्हें जीत मिली उन्हें ये एहसास होना चाहिए कि मुफ्त उपहार सत्ता में ला तो सकते हैं लेकिन उसमें बने रहने के लिए सुशासन जरूरी है। वरना न खैरातें काम आएगी और न ही जातिवाद।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 4 May 2026

प. बंगाल में भाजपा ने इतिहास रचा तो तमिलनाडु में विजय धुरंधर



पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम आने शुरू हो गए हैं। दोपहर एक बजे तक की स्थिति  यथावत रही तब ये नतीजे तमिलनाडु रूपी केवल एक अपवाद छोड़कर उम्मीद के मुताबिक ही हैं। इस मिनी आम चुनाव में प. बंगाल सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा। ममता बैनर्जी जैसी मजबूत जनाधार वाली  नेत्री को सत्ता से हटाने की संभावना पर राजनीति के अच्छे - अच्छे जानकार कुछ कहने से बच रहे थे । मैदान में घूमने वाले टीवी पत्रकार भी ये तो मान रहे थे कि  भाजपा ने इस बार अभूतपूर्व मोर्चेबंदी की है किंतु वे ये कहने से भी नहीं चूकते थे कि सुश्री बैनर्जी द्वारा महिलाओं को प्रति  माह दी जा रही 1500 रु. की राशि का करिश्मा काम करेगा जैसा झारखंड में हेमंत सोरेन की जीत से दिख गया था। 30 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं का पुख्ता समर्थन भी तृणमूल  की बड़ी पूंजी मानी जा रही थी। राज्य में ममता दीदी की टक्कर का कोई नेता भाजपा के पास नहीं होने के नाम पर भी 2021 जैसे नतीजे दोहराए जाने का दावा भी किया जा रहा था। लोकसभा चुनाव में भाजपा को लगे झटके के बाद तृणमूल  का उत्साह और बढ़ गया । लेकिन आज आए परिणाम ने साबित कर दिया कि माँ, मानुष और माटी जैसे भावनात्मक नारे के नाम पर सत्ता में आईं ममता बैनर्जी ने जिस अराजकता को बढ़ावा दिया उसके विरुद्ध प. बंगाल की जनता ने मौन क्रांति कर दी। जिस तरह से मतदाता कैमरे के सामने बोलने से कतराते थे उसने 1977 के लोकसभा चुनाव की याद दिला दी जब इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल की दहशत में आम जनता कुछ बोलने से तो डरती थी किंतु चुनाव में उसने उनकी सत्ता को उखाड़ फेंका। प. बंगाल का चुनाव परिणाम भी ठीक वैसा ही है जिसने नजदीकी मुकाबले के अनुमानों को बंगाल की खाड़ी में डुबोकर भाजपा को ऐतिहासिक बहुमत प्रदान कर दिया। बड़ी बात नहीं वह 200 का आंकड़ा भी पार कर जाए। ये जीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सटीक रणनीति और व्यूहरचना का सुपरिणाम होने के साथ ही मुस्लिम तुष्टीकरण के विरुद्ध जनादेश है। प. बंगाल में भाजपा की प्रचंड जीत ने बिहार के बाद एक बार फिर उस मिथक को तोड़ दिया कि मुस्लिम मतों का थोक समर्थन जीत की गारंटी है। इस परिणाम का असर उ.प्र के आगामी विधानसभा चुनाव पर पड़े बिना नहीं रहेगा जहां अखिलेश यादव मुस्लिम मतों के बल पर सत्ता में वापसी के ख्वाब देख रहे हैं। प. बंगाल के पड़ोसी असम में भाजपा की धमाकेदार तीसरी जीत से किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि हिमंता बिस्वा सरमा भी योगी आदित्यनाथ की तरह ही हिंदुत्व के महानायक के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। इसी तरह केरलम में वामपंथी सरकार का पतन तो सुनिश्चित था। लेकिन इस राज्य में कोई अन्य विकल्प नहीं होने से कांग्रेस की अगुआई वाले यूडीएफ को आशा से अधिक सीटें मिल गईं। हालांकि एनडीए ने तीसरी शक्ति बनने के लिए काफी मशक्कत की लेकिन उसे इस रूप में सफ़लता मिली कि वामपंथी मतों को खींचकर उसने अपने सबसे बड़े वैचारिक विरोधी की जड़ें उखाड़कर अपना भविष्य उज्ज्वल बना लिया। केरलम में यूडीएफ की बड़ी जीत कांग्रेस के लिए बेशक उत्साहवर्धक है। राहुल गांधी ने यहां काफी जोर भी लगाया था किंतु इस राज्य का राष्ट्रीय राजनीति में ज्यादा महत्व नहीं है। यही हाल पुडुचेरी का भी है जहां एनडीए की सत्ता में वापसी से दक्षिण भारत तक के समीकरण प्रभावित नहीं होते। लेकिन द्रविड़ राजनीति के गढ़ तमिलनाडु ने इस बार जो किया वह बीते 60 सालों का  सबसे बड़ा चुनावी उलटफेर है। विजय नामक लोकप्रिय तमिल अभिनेता की नवोदित पार्टी टीवीके बहुमत की देहलीज पर आ पहुंची। इस प्रकार विजय तमिलनाडु में धुरंधर की तरह समूचे परिदृश्य पर छा गए। यद्यपि एम. जी. रामचन्द्रन और जयललिता भी फिल्मी दुनिया से थे । उनके बाद रजनीकांत और कमला हासन ने भी सियासत में हाथ आजमाए किंतु असफल रहे। ये देखते हुए विजय ने नया इतिहास रचते हुए द्रविड़ आंदोलन से पैदा हुई दोनों पार्टियों द्रमुक और अन्ना द्रमुक को पीछे छोड़ दिया। हालांकि उनके पास बहुमत के लिए कुछ सीटें कम हैं इसलिए उन्हें बाहर से समर्थन लेना होगा। खबर है कांग्रेस ने उनकी तरफ सहयोग का हाथ बढ़ाया भी है किंतु अभी तमिलनाडु का खेल खुला हुआ है।  वैसे  द्रमुक और अन्ना द्रमुक दुश्मनी भूलकर एक हो जाएं तो अभी भी सत्ता उनके पास बनी रह सकती है । इस चुनाव ने मुख्यमंत्री स्टालिन की ऐंठ भी खत्म कर दी जो तीसरे स्थान पर आ गए। उनके बेटे द्वारा किया ग़या सनातन का विरोध भी उनकी दुर्गति का कारण बना। आज शाम तक अंतिम परिणाम घोषित हो जाएंगे जिसके बाद बिंदुवार विश्लेषण किया जा सकेगा। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के लिए आज का दिन बड़ी खुशी लेकर आया है। लोकसभा चुनाव में लगे झटके से उबरकर हरियाणा,महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार के बाद प. बंगाल जीतकर उसने ये साबित कर दिया कि उसके अच्छे दिन जारी हैं। जो लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध दिन - रात दुष्प्रचार किया करते हैं प. बंगाल में  भाजपा की जबर्दस्त जीत उनके मुंह पर भी झन्नाटेदार तमाचा है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 2 May 2026

पेट्रोल - डीजल के दाम बाजार से जोड़ने के साथ ही उन्हें जीएसटी के दायरे में लाएं


ईरान संकट के कारण उत्पन्न हालातों में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ना स्वाभाविक है। पूरी दुनिया इससे प्रभावित हो तब भारत का  अछूता रहना नामुमकिन है जो अपनी ज़रूरत का 85 फीसदी आयात करता है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के कारण केंद्र सरकार ने पेट्रोल , डीजल और रसोई गैस के दाम नहीं बढ़ाए किंतु जैसे ही मतदान पूरा हुआ वैसे ही पहला झटका दिया कमर्शियल गैस सिलेंडर की मूल्य वृद्धि के रूप में और वह भी लगभग 1 हजार प्रति सिलेंडर। आम जनता की नाराजगी से बचने फिलहाल घरेलू रसोई गैस सिलेंडर के दाम नहीं बढ़े और डीजल - पेट्रोल की मूल्यवृद्धि भी रोककर रखी गई है। लेकिन  कमर्शियल गैस के बढ़े दाम का असर भी अप्रत्यक्ष रूप से जनता पर पड़े बिना नहीं रहेगा। हालांकि सरकार की ओर से घुमा - फिराकर कहा जा रहा है कि ईरान  संकट से पेट्रोलियम कंपनियों को काफी घाटा हो रहा है किंतु इस मामले में वह अपराध बोध से ग्रस्त है। क्योंकि बीते कुछ सालों में रूस से मिले सस्ते कच्चे तेल के कारण पेट्रोलियम कंपनियों ने भरपूर मुनाफा बटोरा।  अंतर्राष्ट्रीय मूल्य निचले स्तर पर रहने से भी सरकारी तेल कंपनियों का खजाना खूब भरा। चूंकि उसका लाभ उपभोक्ताओं को देने से परहेज किया गया इसलिए जब ईरान युद्ध के चलते  कच्चे तेल और गैस की कीमतें चढ़ीं तब सरकार के पास दाम बढ़ाने का कोई औचित्य या यूं कहें कि नैतिक आधार नहीं है। लेकिन तमाम वित्तीय संस्थान ये संभावना जता रहे हैं कि यदि खाड़ी में संकट जारी रहा और होर्मुज में चल रही नाकेबंदी जारी रही तब चाहे - अनचाहे पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस महंगी करनी ही होगी। जनता भी परिस्थितियों का तकाजा समझ रही है। लेकिन इस बारे में दो बातें हैं जिन पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। पहली ये कि वाजपेयी सरकार के समय पेट्रोल - डीजल की कीमतों को बाजार के उतार - चढ़ाव से जोड़ने की जो व्यवस्था हुई उसे दोबारा प्रारम्भ किया जाए। हालांकि उसी सरकार ने चुनाव आते ही मतदाताओं की नाराजगी से बचने उस पर रोक लगाकर दाम स्थिर रखे। मौजूदा केंद्र सरकार ने प्रारंभ में उस प्रथा को दोबारा लागू करने का साहस दिखाया। उसके अंतर्गत जैसे ही मूल्य घटते या बढ़ते उसी के अनुसार उपभोक्ता को भी उनकी खरीदी करनी पड़ती। आम तौर पर ये घटा - बढ़ी 1 रुपए के भीतर होने से असहनीय नहीं लगती थी किंतु अज्ञात कारणों से उस व्यवस्था को फिर निलंबित कर दिया गया। जिसके कारण कीमतें तो स्थिर रखी गईं किंतु जब वैश्विक स्तर पर कच्चा तेल सस्ता हुआ तब उसका लाभ उपभोक्ता को देने से बचा गया। कुछ समय तक तो पिछले घाटे की पूर्ति का बहाना समझ में आता  है लेकिन उसकी भरपाई के बाद भी पेट्रोलियम कंपनियों द्वारा पूरा मुनाफा हड़पने की नीति समझ से परे है। दूसरी बात जीएसटी से अभी तक पेट्रोलियम पदार्थों को बाहर रखना है। यदि अन्य उपभोक्ता वस्तुओं जैसी जीएसटी की दर डीजल - पेट्रोल और रसोई गैस पर निश्चित कर दी जाए तब इनके दाम काफी नीचे आ जाएंगे। शुरुआत में तो उससे सरकार के राजस्व में कमी परिलक्षित होगी किंतु जिस तरह गत वर्ष किए गए बदलाव के बावजूद सरकार को हर माह मिलने वाली जीएसटी वसूली में खास फर्क नहीं आया वैसे ही पेट्रोल - डीजल आदि को जीएसटी के दायरे में लाने पर आम जनता को होने वाली बचत अंततः बाजार में ही आएगी जिससे जीएसटी वसूली का संतुलन बना रहेगा। कमर्शियल गैस सिलेंडर के दाम तकरीबन 1 हजार रुपए बढ़ा देने के बाद ये आशंका बढ़ चली है कि 4 मई के बाद पेट्रोल - डीजल और घरेलू रसोई गैस की कीमतों में भी वृद्धि होगी। विपक्षी दल तो काफी पहले से कहते आ रहे हैं कि ईरान संकट के बावजूद दाम नहीं बढ़ाकर सरकार कोई मेहरबानी नहीं कर रही अपितु वह पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान जनता के गुस्से से बचना चाह रही है। ये सब देखते हुए उचित तो यही होगा कि पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस को बाजार के उतार - चढ़ाव से जोड़कर उनकी कीमतों में पारदर्शिता लाने के साथ ही उन्हें जीएसटी के अंतर्गत लाकर अनाप - शनाप करों के बोझ को कम करने की ईमानदारी दिखाई जाए। ये बात सही है आर्थिक अनुशासन को लागू करने में चुनावी नफा - नुकसान आड़े आते हैं किंतु  देश को वाकई आर्थिक महाशक्ति बनाना है तब ऐसे निर्णय लेने ही होंगे जिनमें कड़ाई और व्यवहारिकता का समन्वय हो। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 1 May 2026

4 मई के बाद राष्ट्रीय राजनीति में बनेंगे नए समीकरण


पांच राज्यों के  चुनाव परिणाम आने में अभी दो दिन बाकी हैं। सभी पार्टियां बढ़ - चढ़कर दावे कर रही हैं।  इन परिणामों का राष्ट्रीय राजनीति पर क्या प्रभाव होगा इसे लेकर राजनीति के पंडितों में विमर्श प्रारंभ हो गया है। इसके दो संकेत गत दिवस मिले जब त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को समर्थन दिए जाने के सवाल पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने तो समय आने पर विचार करने की बात कही वहीं सीपीआई के एक प्रवक्ता ने टीवी चैनल पर इस संभावना को पूरी तरह नकार दिया। इसी तरह की परिस्थिति तमिलनाडु में भी उत्पन्न हो सकती है जहां अभिनेता विजय की पार्टी टी.वी.के को अप्रत्याशित सफलता मिलने का अनुमान लगाकर एक्सिस माय इंडिया नामक  एजेंसी ने सनसनी फैला दी। उसके बाद ही तमिलनाडु में राजनीति के खिलाड़ी ये गुणा - भाग करने में व्यस्त हो गए कि  किसी को बहुमत नहीं मिला और विजय की पार्टी सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी तब क्या स्टालिन उनको सत्ता पर बिठाएंगे या अन्न द्रमुक गठबंधन उनकी ताजपोशी करवाएगा? केरलम  में त्रिशंकु की हल्की ही सही किंतु कुछ उम्मीद अभी भी वामपंथी खेमे के मन में है किंतु प्रश्न ये भी उठता है कि उस स्थिति में समर्थन कौन देगा क्योंकि एन.डी.ए का समर्थन न तो एल.डी.एफ को रास आयेगा और न ही कांग्रेस वाला यू.डी.एफ उसे हजम कर पाएगा। इस चुनाव में तमिलनाडु में सत्ताधारी द्रमुक के साथ कांग्रेस और वामपंथी दलों के  अलावा मुस्लिम लीग सहित छोटे - छोटे क्षेत्रीय दल हैं। उस दृष्टि से इसे इंडिया गठबंधन का रूप कहा जा सकता है। लेकिन प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के विरुद्ध वामपंथी तो मोर्चा खोलकर बैठे ही कांग्रेस भी एकला चलो की नीति के साथ लड़ी। राहुल गांधी ने तो ममता बैनर्जी पर आरोप तक लगा दिया कि उनके कुशासन के चलते ही राज्य में भाजपा का सितारा चमका। वहीं केरल में वामपंथी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए कांग्रेस ने कोई कसर नहीं छोड़ी।  हालांकि लोकसभा चुनाव के बाद ही इंडिया गठबंधन बिखरा - बिखरा सा है और विपक्षी एकता स्थानीय मुद्दों एवं समीकरणों के आधार पर निर्भर हो गई। मसलन हरियाणा में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को जरा भी भाव नहीं दिया। उसके बाद दिल्ली में दोनों के बीच तलवारें खिंचीं। लेकिन रोचक बात ये रही कि ममता बैनर्जी ने तृणमूल की तरफ से शत्रुघ्न सिन्हा को आम आदमी पार्टी के प्रचार के लिए भेजा जबकि सपा अध्यक्ष अखिलेश  यादव ने खुद अरविंद केजरीवाल के पक्ष में सभाएं लीं। बिहार में भी कांग्रेस और तेजस्वी यादव के महागठबंधन ने विपक्ष की अन्य पार्टियों को भाव नहीं दिया। प. बंगाल में तृणमूल, वामपंथी और कांग्रेस के अलग - अलग लड़ने से विपक्षी एकता का गुब्बारा पूरी तरह फूट गया। रही - सही कसर पूरी कर दी तेजस्वी, केजरीवाल और अखिलेश द्वारा तृणमूल कांग्रेस के समर्थन में सभाएं लेकर। जो संकेत हैं उनके अनुसार यदि सुश्री बैनर्जी के हाथ से सत्ता खिसक जाती है तब वे वामपंथियों के साथ ही कांग्रेस को भी गरियाएंगी। इसी तरह केरलम की सत्ता गंवाने के बाद वामपंथी कांग्रेस पर गुस्सा उतारेंगे। इन चुनावों के बाद  विपक्ष का चेहरा कौन बनेगा इस पर भी खींचतान होना तय है क्योंकि यदि ममता बैनर्जी ने सत्ता बचा ली तब  उनकी वजनदारी स्वाभाविक रूप से बढ़ेगी और तमाम छोटे - छोटे दल राहुल गांधी को किनारे कर उनके पीछे खड़े हो जाएंगे। वहीं केरलम में जीत मिलने के बाद कांग्रेस राहुल गांधी को एक बार फिर महिमामंडित करने में जुट जाएगी। हालांकि सुश्री बैनर्जी सरकार नहीं बना सकीं तब भी वे श्री गांधी के नेतृत्व को स्वीकार कर सकेंगी ये संदिग्ध है। और उस स्थिति में भाजपा और कांग्रेस दोनों के विरोध में तीसरे मोर्चे की वापसी तो हो सकती है। यद्यपि वामपंथी उसमें शामिल होंगे इसमें संदेह है क्योंकि उनकी ममता से कुढ़न जगजाहिर है। स्टालिन भी कांग्रेस को नहीं छोड़ सकते। केरलम की हार के बाद वामपंथी भी राहुल के नेतृत्व को कितना स्वीकार करेंगे ये कह पाना मुश्किल है । कुल मिलाकर 4 मई के बाद देश में विपक्षी राजनीति में नए समीकरण देखने मिलेंगे। यदि भाजपा  प. बंगाल पर झण्डा गाड़ने में कामयाब हो गई तब अन्य दलों से नेता आकर उसके साथ जुड़ेंगे। जिसकी बानगी राघव चड्ढा सहित आम आदमी पार्टी के 6 सांसद दे चुके हैं। खबर तो ये भी है कि ममता सरकार हटी तो तृणमूल में भी भगदड़ मचेगी।  कल रात आए एक एग्जिट पोल के बाद इसकी आशंका और बढ़ गई है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 30 April 2026

पूर्वानुमानों से काफी मिलते - जुलते हैं एग्जिट पोल



गत दिवस प. बंगाल में दूसरे चरण का मतदान संपन्न होते ही पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो गई। उसके बाद से ही एग्जिट पोल आने लगे जो कि काफी कुछ अपेक्षित ही हैं। मसलन प. बंगाल में ज्यादातर एजेंसियों ने भाजपा सरकार बनने की संभावना जताई है। इक्का - दुक्का अभी भी ममता बैनर्जी द्वारा चौका लगाए जाने की भविष्यवाणी कर रहे हैं। एक्सिस माय इंडिया ने पहले चरण वाली 152 सीटों का जो एग्जिट पोल जारी किया उसके अनुसार 2021 की स्थिति उलट रही है। अर्थात भाजपा 100 के करीब और तृणमूल कांग्रेस 50 के इर्द - गिर्द रहेगी। कल हुए 142 सीटों के मतदान का एग्जिट पोल सम्भवतः आज जारी होगा। लोकसभा चुनाव में एग्जिट पोल  गलत निकलने के कारण उक्त एजेंसी के संचालक प्रवीण गुप्ता को काफी आलोचना झेलनी पड़ी। उसके बाद के सभी चुनावों में उन्होंने  पर्याप्त समय लिया। बिहार में भी उनका एग्जिट पोल एक दिन बाद ही जारी हुआ था। आज एक्सिस माय इंडिया का बचा हुआ एग्जिट पोल भी यदि भाजपा को बहुमत मिलने की बात कहता है तब फिर सुश्री बैनर्जी के लिए ये बहुत बड़ा धक्का होगा। असम के बारे में तो किसी को संदेह था ही नहीं कि  हिमंता बिस्वा सर्मा की सरकार बड़े बहुमत के साथ लौटेगी। सभी एग्जिट पोल एक स्वर से उसकी पुष्टि कर रहे हैं। केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में भाजपा के गठबंधन वाली एनडीए की सरकार  दोबारा बनने की संभावना भी आश्चर्यचकित नहीं कर रही। इसी तरह केरल में वाम मोर्चे की सरकार को हटाकर 10 साल बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ की वापसी भी सुनिश्चित मानी जा रही थी। लेकिन पड़ोसी राज्य तमिलनाडु में तमिल फिल्मों के लोकप्रिय अभिनेता विजय द्वारा बनाई गई पार्टी ने मैदान में उतरकर अनिश्चितता पैदा कर दी। हालांकि ज्यादातर एग्जिट पोल सत्तारूढ़ द्रमुक के नेतृत्व वाली स्टालिन सरकार के लौटने की भविष्यवाणी कर रहे हैं लेकिन एक्सिस माय इंडिया ने विजय की पार्टी के सबसे बड़े दल के तौर पर उभरने की भविष्यवाणी कर सनसनी मचा दी है । इस पोल के अनुसार तमिलनाडु में त्रिशंकु विधानसभा बनने जा रही है। यदि वाकई ऐसा हुआ तब विजय , द्रमुक को साथ लेंगे या अन्ना द्रमुक - भाजपा गठबंधन के साथ गठजोड़ करेंगे,  ये सवाल राजनीतिक विश्लेषकों को परेशान कर रहा है। विजय की नई - नवेली पार्टी यदि सत्ता में आ गई तब 6 दशक बाद तमिलनाडु में उस द्रविड़ राजनीति का वर्चस्व समाप्त होगा जो पेरियार रामास्वामी से अन्ना दौरई, करुणानिधि, एम. जी रामचंद्रन और जयललिता से होते हुए स्टालिन तक निर्बाध चली आ रही है। द्रमुक के विभाजन के बाद  अन्ना द्रमुक बनी किंतु प्रदेश की राजनीति पर इन दोनों का ही कब्जा बना रहा। यदि विजय ने इसे तोड़ा तो वह इस राज्य की राजनीति की दिशा बदल सकता है क्योंकि वैसा होने पर भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां अपना जनाधार बढ़ाने में सक्षम होंगी जो उक्त दोनों दलों की पिछलग्गू बनने के लिए मजबूर हैं। हालांकि विजय के हाथ में सत्ता जाने की बात गले नहीं उतर रही किंतु तमिलनाडु की जनता द्रमुक और अन्ना द्रमुक से ऊबकर किसी नए विकल्प का चयन कर ले तो ये इस राज्य के लिए शुभ संकेत होगा। लौटकर प. बंगाल की चर्चा करें तो ये बात तो हर कोई मान रहा है कि पहले तो भाजपा ने ममता बैनर्जी को बुरी तरह घेरकर मुकाबले के इकतरफा होने की आशंका को नष्ट किया और फिर  आक्रामक रणनीति के सहारे तृणमूल के चुनाव प्रबंधन की जड़ों को कमजोर  किया।  सुश्री बैनर्जी ने मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण को मुद्दा बनाकर लड़ाई कोलकाता बनाम केंद्र करने की भरसक कोशिश की किंतु जिस तरह बिहार में लालू प्रसाद यादव के जंगल राज की खौफनाक यादें ताजा कर  भाजपा ने तेजस्वी यादव को पटकनी दे दी ठीक वही रणनीति अपनाकर  प.बंगाल में महिला सुरक्षा और तृणमूल की गुंडागर्दी के मुद्दे को गर्माकर बदलाव की भावना को लोगों के दिल में बिठाया। रही - सही कसर पूरी हो गई केंद्रीय बलों की तैनाती से जिसके कारण मतदाताओं को आतंकित कर मतदान करने से रोकने जैसी हरकतों पर नियंत्रण लग सका। बहरहाल अब तो मतदान हो चुका और 4 मई की सुबह तक अनुमानों के घोड़े दौड़ते रहेंगे किंतु जैसा कि ज्यादातर एग्जिट पोल बता रहे हैं यदि प. बंगाल में ममता सरकार को हटाकर भाजपा अपना झंडा फहराने में कामयाब हुई तब राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी और उनके मुख्य रणनीतिकार अमित शाह का कद और ऊंचा हो जाएगा। जिसका प्रभाव अगले वर्ष होने वाले उ.प्र, पंजाब और गुजरात विधानसभा के चुनाव पर पड़ना तय है। तृणमूल के हाथ से सत्ता खिसकने से अखिलेश यादव का हौसला भी पस्त होगा। वहीं कांग्रेस के हाथ केरल की सत्ता आने से वह इंडिया गठबंधन से बाहर निकलकर एकला चलो की नीति अपनाएगी। वैसे भी अब इस गठबंधन में कोई दम नहीं बची है। एक लिहाज से अच्छा ही होगा यदि क्षेत्रीय पार्टियों के चंगुल से कांग्रेस मुक्त हो क्योंकि उन्हीं के चलते उसकी दुर्दशा हुई है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 29 April 2026

गुजरात भाजपा का अभेद्य दुर्ग बन चुका है


गत दिवस गुजरात में स्थानीय निकायों के जो चुनाव परिणाम घोषित हुए उनमें सत्तारूढ़ भाजपा ने जबरदस्त सफलता हासिल करते हुए सभी नगर निगमों पर अपना आधिपत्य बनाए रखा, वहीं नगर पालिकाओं और जिला‑तालुका पंचायतों में भी उसे भारी बहुमत मिला। पार्टी ने 84 में से 78 नगर पालिकाएं जीत लीं जबकि कांग्रेस को 6 में ही सफलता मिली। जिला पंचायत स्तर पर भी भाजपा ने दमदार प्रदर्शन करते  हुए 34 में से 33 जिला पंचायतें कब्जा लीं। साथ ही तालुका पंचायतों में उसे कुल 260 में से 253 पर विजय मिली जबकि शेष सीटें कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के खाते में गईं। एकमात्र जिला पंचायत नर्मदा ही भाजपा के हाथ से फिसली जहां आम आदमी पार्टी ने 22 में से 15 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया। आम तौर  पर किसी राज्य में विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद होने वाले स्थानीय निकायों के चुनाव परिणाम सत्ताधारी दल के पक्ष में ही जाते हैं। लेकिन गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव ऐसे समय हुए जब भाजपा की राज्य सरकार का लगभग तीन चौथाई कार्यकाल पूर्ण हो चुका है और सभी पार्टियां 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव की रणनीति बनाने में जुटी हुई हैं।  बावजूद  इसके भाजपा ने अपना दबदबा  बरकरार रखा जिससे सरकार के साथ ही पार्टी संगठन की भी मजबूत पकड़ साबित होती है। स्मरणीय है 2022 में संपन्न विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 182 सीटों में 156 जीतकर कीर्तिमान स्थापित किया  वहीं कांग्रेस अपने सबसे खराब प्रदर्शन के चलते मात्र 17 सीटों पर ही सिमट गई जबकि तीसरी ताकत बनकर मैदान में उतरी अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के मुफ्त बिजली जैसे वायदे भी भाजपा की सुनामी के सामने टिक नहीं सके। हालांकि 5 सीटें जीतकर उसने अपना खाता जरूर खोल दिया।  कांग्रेस के दयनीय प्रदर्शन का एक कारण आम आदमी की मौजूदगी भी थी जिसने भाजपा विरोधी मतों में बंटवारा करते हुए कांग्रेस की लुटिया डुबो दी। उस प्रदर्शन से उत्साहित आम आदमी पार्टी ने  अपनी सक्रियता काफी बढ़ाई। खुद श्री केजरीवाल भी गुजरात पर काफी ध्यान देते रहे। पार्टी का मानना है कि कांग्रेस के कमजोर होते जाने से गुजरात में जो शून्य उत्पन्न हो गया है उसे भरकर वह बतौर विकल्प स्थापित हो सकती है।  इसीलिए आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर इन स्थानीय निकाय चुनावों को सेमी फाइनल मुकाबला माना जा रहा था।  विपक्षी दल चाहते तो भाजपा के समक्ष कड़ी चुनौती पेश कर सकते थे किंतु चुनाव परिणामों ने भाजपा को अजेय सिद्ध कर दिया । जहां तक बात कांग्रेस की है तो स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक पार्टी की दिशा और दशा दोनों ही चिंताजनक हैं। लेकिन राष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर धूमकेतु की तरह से उभरी आम आदमी पार्टी ने गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव में जैसा लचर प्रदर्शन किया उससे लगता है दिल्ली विधानसभा चुनाव में पराजित होने के बाद पार्टी का हौसला टूटने लगा है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि मतदान के पहले ही पार्टी के 7 राज्यसभा सदस्यों के भाजपा में चले जाने से गुजरात का कैडर तो निराश हुआ ही ,  आम जनता को भी लगा कि वह डूबता जहाज है, लिहाजा उसे समर्थन देना अपना मत बेकार करना है। इन चुनाव परिणामों से भाजपा के उत्साह में वृद्धि स्वाभाविक है। ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह अपने गृह राज्य की बजाय प. बंगाल के महासमर में व्यस्त रहे तब भाजपा ने स्थानीय नेतृत्व के बलबूते जो सफलता हासिल की वह प्रशंसनीय है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने स्थानीय निकाय चुनावों में अपने प्रदर्शन से अपने समर्थकों को तो निराश किया ही गुजरात में वैकल्पिक राजनीति की संभावनाओं पर भी विराम लगा दिया। आम आदमी पार्टी के लिए जमीनी स्तर पर अपना कैडर स्थापित करने के लिए ये स्थानीय चुनाव सुनहरा मौका था जिसमें वह चूक गई। रही बात कांग्रेस की तो ऐसा लगता है वह हारने की आदी हो चली है। इन चुनावों की चौंकाने वाली बात है भुज में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के  कुछ पार्षदों का जीतना जो इस बात का संकेत है कि मुस्लिम मतदाताओं का मन भी कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों से उचटने लगा है। गुजरात में आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा जहां दोगुने उत्साह से उतरेगी वहीं कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के सामने अपने अस्तित्व को बचाए रखने की चुनौती होगी।

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- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 28 April 2026

ईरान के पास होर्मुज खोलने के अलावा और कोई रास्ता नहीं


ऐसा लगता है ईरान अपने बनाए चक्रव्यूह में खुद ही उलझ गया है।  होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर वह सोच रहा था कि पूरी दुनिया उसके सामने नतमस्तक हो जाएगी किंतु अमेरिका ने जवाबी नाकेबंदी करते हुए उसकी अकड़ निकाल दी। इसकी वजह से दूसरे देशों के जहाजों की आवाजाही तो रुकी ही किंतु ईरान के अपने तेल की बिक्री भी ठप हो गई। इसके कारण उसकी भंडारण क्षमता जवाब देने लगी। यदि वह उत्पादन रोकता है तो तेल के कुओं में समुद्री जल भरने का खतरा है वहीं उत्पादन जारी रखने के बाद भी चूंकि  उस तेल का विक्रय नहीं हो पा रहा इसलिए उसे सुरक्षित रखना मुश्किल है।  होर्मुज के रास्ते से निकलने वाले जहाजों से टोल वसूलने की उसकी योजना भी अमेरिका द्वारा की गई नाकेबंदी से टांय - टांय फुस्स होकर रह गई।  डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा युद्धविराम को आगे बढ़ाए जाने पर ईरान को लगा कि अमेरिका लड़ाई जारी रखने से डर रहा है। लेकिन ट्रम्प ने इधर ईरान को बातचीत में उलझाकर रखा और उधर होर्मुज को घेरकर ईरान की आर्थिक रीढ़ पर प्रहार कर दिया। इस्लामाबाद में पहले दौर की बातचीत बेनतीजा खत्म होने के बाद ऐसा लगा था कि जंग दोबारा शुरू हो जाएगी किंतु अमेरिका ने बजाय सीधे लड़ने के दूसरे तरह का मोर्चा खोलकर ईरान को फंसा दिया। अगले दौर की शांति वार्ता में जिस तरह से रुकावटें आईं उनसे ईरान का राष्ट्रीय नेतृत्व भी परेशान है। उसके द्वारा रखी जाने वाली शर्तें अमेरिका द्वारा सिरे से खारिज की जा रही हैं। इस लड़ाई में बाकी अरब देशों पर हमले कर ईरान ने पड़ोस में रिश्ते इस कदर खराब कर लिए कि कोई उसकी मदद को सामने नहीं आ रहा। गत दिवस उसके विदेश मंत्री भागे - भागे रूस जाकर राष्ट्रपति पुतिन से मिले  और लौटकर बयान दे दिया कि अमेरिका उसे परमाणु कार्यक्रम जारी रखने की अनुमति दे तो वह होर्मुज खोलने राजी है। लेकिन ट्रम्प समझ गए कि ईरान की नस दबी हुई है इसीलिए उन्होंने न सिर्फ उसके प्रस्ताव को ठुकरा दिया बल्कि जल्द ही उसकी तेल लाइनों पर हमले की धमकी दे डाली। इस सबसे एक बात तो स्पष्ट है कि ईरान के पास अब सौदेबाजी के लिए केवल होर्मुज बच रहा है। यदि अमेरिका ने उसकी अन्य शर्तों को नहीं माना तब उसके पास इस समुद्री मार्ग को खोलने के सिवाय दूसरा कोई रास्ता नहीं बचेगा । दरअसल अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के बाद चीन ही ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीददार रहा है। उसके बदले वह ईरान को हथियारों की  आपूर्ति करता रहा है। इसमें दो राय नहीं है कि अमेरिका और इजराइल ने जिस इरादे से ईरान पर हमले किए थे वे इस हद तक ही पूरे हुए कि वह लंबी लड़ाई लड़ने लायक नहीं बचा। पूरे देश में जो बर्बादी हुई उससे उबरने में भी बहुत लंबा समय और संसाधन लगेंगे। लेकिन तेहरान में सत्ता पलट की जो उम्मीद ट्रम्प और इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने लगा रखी थी उसके पूरे होने के आसार भी नजर नहीं आ रहे। वहीं ये भी सच है कि ईरान ने चीन और रूस के बहकावे में आकर पलटवार करने का दुस्साहस तो कर दिया किन्तु वे दोनों दूर से तमाशा देखते रहे और ईरान पिटता रहा। आज की स्थिति में यदि अमेरिका और इजराइल  दोबारा जंग शुरू करने से बचना चाह रहे हैं तो ईरान भी आगे लड़ पाने में सक्षम नहीं है। इसीलिए वह रोजाना नए  - नए शांति प्रस्ताव देकर बचाव का रास्ता खोज रहा है। गत दिवस ईरानी विदेश मंत्री और पुतिन की मुलाकात के बाद ईरान ने परमाणु कार्यक्रम जारी रखे जाने के एवज में होर्मुज खोलने का प्रस्ताव रखा जिसे अमेरिका ने ठुकरा दिया। शांति वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर ईरान भी अब सतर्क हो गया है। उसके एक नेता ने पाकिस्तान की ईमानदारी पर संदेह भी जताया है। आज की स्थिति में ईरान के लिए यही श्रेयस्कर होगा कि वह मामूली शर्तों के साथ होर्मुज खोल दे। इससे उसकी अर्थव्यवस्था को भी सहारा मिलेगा वहीं उसे अन्य देशों की सहानुभूति भी प्राप्त हो सकेगी। उसे ये समझ लेना चाहिए कि वह न तो आर्थिक तौर पर पहले जैसा संपन्न है और न ही उसकी सैन्य क्षमता बड़ा मुकाबला करने लायक बची है। परिस्थितियों का तकाजा है कि वह इस संकट को किसी तरह टल जाने दे। उसे किसी रणनीतिकार की ये सलाह स्मरण रखनी चाहिए कि बहादुरी का सबसे बेहतर तरीका होशियारी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 27 April 2026

दिन ब दिन हिंसक हो रहा अमेरिकी समाज



अमेरिका में गत दिवस राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा वाशिंगटन के एक सुप्रसिद्ध होटल में पत्रकारों के लिए आयोजित रात्रि भोज में उस समय अफरातफरी मच गई जब आयोजन आयोजन कक्ष के बाहर हथियारबंद एक व्यक्ति ने कई गोलियां चलाकर दहशत फैला दी। सुरक्षा कर्मियों ने तत्काल सभी विशिष्टजनों को सुरक्षित निकाला और उस व्यक्ति को दबोच लिया। उसकी गोली एक सुरक्षा कर्मी को भी लगी किन्तु वह लाइफ जैकेट पहने हुए था इसलिए बच गया। हालांकि कोई बड़ी अनहोनी नहीं हुई। अब तक जो कुछ भी सामने आया उसके अनुसार पेशे से इंजीनियर हमलावर ट्रम्प सरकार से असंतुष्ट था। इस घटना के पीछे किसी बड़े षड़यंत्र की आशंका का पता नहीं चल सका।  ट्रम्प ने स्वयं भी कहा कि ईरान युद्ध से इसका कोई संबंध नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार से नाराज कोई व्यक्ति इस तरह का कदम क्यों उठाएगा जिसमें अव्वल तो खुद उसकी जान जाने का खतरा था और बच जाने पर पूरी जिंदगी जेल में सड़ना तय है। इसके साथ ही ये बात भी विचारणीय है कि एक साधारण  नागरिक महंगे स्वचालित हथियार आखिर क्यों रखेगा? लेकिन इस प्रश्न का उत्तर अमेरिका में इसलिए अप्रासंगिक है क्योंकि अपने लोकतंत्र पर इतराने और दुनिया के सबसे सम्पन्न और शक्तिशाली राष्ट्र होने के घमंड में चूर इस देश में आम आदमी  किसी भी तरह की पिस्तौल , रिवाल्वर, रायफल यहां तक कि ए.के 47 जैसी स्वचालित गन भी बिना लायसेंस के खरीदकर रख सकता है। इसका एक आशय ये भी है कि वहां प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सुरक्षा का प्रबंध खुद करना पड़ता है। साथ ही सरकार अपने नागरिकों को इतना समझदार समझती है कि वे इन हथियारों का उपयोग गलत उद्देश्य से नहीं करेंगे। लेकिन इसी अमेरिका के दो राष्ट्रपति अब्राहम  लिंकन और जॉन एफ.कैनेडी के  अलावा रॉबर्ट कैनेडी और मार्टिन लूथर किंग जैसे अनेक दिग्गज नेता इसी हथियार स्वतंत्रता के शिकार हो चुके हैं। इसके बाद वहां इस व्यवस्था को नियंत्रित करने पर काफी बहस चली। कुछ राज्यों ने प्रतिबंधात्मक नियम भी बनाए। लाइसेंस प्राप्त विक्रेता से ही शस्त्र खरीदने के साथ ही खरीददार की पृष्ठभूमि जांचने जैसी अनिवार्यता भी रखी गई और न्यूनतम आयु का निर्धारण भी किया गया। बावजूद इसके अमेरिका में गन कल्चर का बोलबाला रोका नहीं जा सका। दुनिया भर को उपदेश देने वाले अमेरिका की कानून व्यवस्था में भी तमाम विसंगतियां हैं। अनेक महानगर तो अपराधिक गतिविधियों के लिए कुख्यात हैं। इनमें रात्रि  के समय किसी सुनसान इलाके में जाना जान जोखिम में डालने जैसा है। लूटमार करने वाले  मांग पूरी नहीं होने पर बेरहमी से गोली मारकर भाग जाते हैं।  ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि अमेरिका में पिस्तौल और बंदूक जैसी खतरनाक चीज आसानी से उपलब्ध होने से उसके उपयोग के प्रति भी गंभीरता का नितान्त अभाव है। बीते कुछ सालों में सभ्यता के ठेकदार इस देश में किशोरावस्था के अनेक बच्चों ने बंदूक चलाकर अपने विद्यालय के सहपाठियों की हत्या कर डाली जिसका कारण मामूली आपसी विवाद निकला। समाजशास्त्रियों ने  ऐसी घटनाओं के बारे में निष्कर्ष निकाला कि माता - पिता के झगड़े संतानों को भी तनावग्रस्त बना रहे हैं। परिवार नामक संस्था के टूटते जाने का जो मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभाव बच्चों पर पड़ता है उसके कारण सामाजिक विघटन की स्थिति उत्पन्न हो चुकी है। आर्थिक समृद्धि और सामाजिक सुरक्षा के बावजूद आम अमेरिकी तनाव में जी रहा है। यद्यपि इस सबका गत दिवस वॉशिंगटन के होटल में हुए गोलीकांड से सीधा संबंध नहीं है जहां राष्ट्रपति ट्रम्प की पार्टी चल रही थी। लेकिन इस घटना से अमेरिका में हथियारों की आसान उपलब्धता के औचित्य पर तो प्रश्नचिन्ह लगा ही। इतने सम्पन्न देश में तो कानून व्यवस्था इतनी अच्छी होनी चाहिए कि आम नागरिक को पिस्तौल और बंदूक जैसी चीज़ें खरीदने की जरूरत ही न पड़े। मनोवैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं कि उत्तेजना की स्थिति में किसी व्यक्ति के पास हथियार होना उसके लिए आत्मघाती होने के साथ ही किसी अन्य की जान के लिए भी खतरा बन सकता है। हमारे देश में भी अपने खुद के हथियार से आत्महत्या करने के प्रकरण आए दिन सामने आते हैं। ऐसे में अमेरिका जैसे देश में जहां परिवार टूटने के साथ ही सामाजिक ढांचे की दरार चौड़ी होती जा  रही हो, हथियार रखने की आजादी खून की होली खेलने का अवसर प्रदान करती है। यद्यपि ये उसका आंतरिक मामला है किंतु भारतीय मूल के लाखों लोग अमेरिका में बसे होने से वहां खेल - खेल में गोलियां चल जाने की हर खबर उनकी कुशलता के प्रति चिंता उत्पन्न कर देती है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 25 April 2026

अन्ना हजारे का श्राप केजरीवाल का पीछा नहीं छोड़ रहा


जिस दिन आम आदमी पार्टी ने राघव चड्ढा को राज्यसभा में उपनेता पद से हटाया उसी दिन से उनके भाजपा में जाने की अटकलें लगाई जा रही थीं। लेकिन वैसा होने पर वे राज्यसभा सदस्यता से हाथ धो बैठते वहीं त्यागपत्र देने पर उनकी राजनीतिक वजन दारी खत्म हो सकती थी। इसीलिए राघव ने न सिर्फ अपनी सदस्यता बचाते हुए भाजपा का दामन थामा बल्कि अपने साथ 6 अन्य  सांसदों को भी बटोरकर  पार्टी के 10 सदस्यीय संसदीय दल में विभाजन करवा दिया। दो तिहाई सांसदों की बगावत होने से सभी दलबदल कानून के डंडे से बच गए। जहां तक बात श्री चड्ढा के भाजपा की गोद में बैठने की ही है तो इससे किसी को आश्चर्य नहीं हुआ किंतु वे 6 और सांसदों को तोड़कर  ले आयेंगे इसकी भनक किसी को भी नहीं थी। जैसी कि परम्परा है उन्होंने पार्टी पर अपने उद्देश्यों से भटकने का आरोप लगा दिया। हालांकि जिस भाजपा को वे हमेशा गरियाते रहे वह उन्हें अचानक  क्यों प्रिय लगने लगी ये उन्होंने नहीं बताया।  जिन अशोक मित्तल को उनकी जगह राज्यसभा में पार्टी का उपनेता नियुक्त किया गया उनके यहां हाल  ही में ई.डी ने छापा मारा था। इसलिए जब वे भी श्री चड्ढा के साथ भाजपा में आए तब ये सवाल  उठ खड़ा हुआ कि क्या वे छापे से  भयभीत होकर भाजपाई बने? हालांकि अन्य जिन पांच सांसदों ने पार्टी छोड़ी उन पर ऐसा कोई आरोप नहीं है और शैक्षणिक और पेशेवर दृष्टि से भी वे काफी योग्य हैं ,सिवाय सुप्रसिद्ध क्रिकेटर हरभजन सिंह के। सब कुछ इतना अचानक हुआ कि बड़े - बड़े खबरखोजी भी हतप्रभ रह गए। वैसे राघव का विद्रोह तो समझ में आने लायक था और श्री मित्तल के पाला बदलने की वजह भी स्पष्ट है किंतु बाकी 5 सांसद किस वजह से भाजपा में आए ये रहस्यों के घेरे में है। बहरहाल इस सबके  पीछे पंजाब विधानसभा का  अगला चुनाव है। हालांकि इन सांसदों में कोई भी ऐसा नहीं है जो पंजाब में बड़ा दखल रखता हो। लेकिन 7 सांसदों के पार्टी छोड़ने से आम आदमी पार्टी को  आघात तो लगा ही है। पंजाब में सरकार बनाने में राघव की भी भूमिका रही थी। इसीलिए वे वहां  से राज्यसभा भेजे गए। लेकिन बाद में  उनसे पंजाब का प्रभार छीन लिया गया। शराब घोटाले से दिल्ली विधानसभा चुनाव तक राघव पार्टी से दूर बने रहे। राज्यसभा में भी वे पार्टी लाइन से अलग हटकर मुद्दे उठाते रहे । लेकिन गत दिवस जो धमाका उन्होंने किया उसके बाद ये चर्चा जोरों पर है कि पंजाब में  आम आदमी पार्टी के 50 विधायक भी पाला बदलने वाले हैं। इसके पीछे आलाकमान के साथ ही मुख्यमंत्री भगवंत मान का रूखा व्यवहार बताया जाता है।  7 सांसदों के दलबदल से बौखलाई आम आदमी पार्टी अपना गुस्सा भाजपा पर उतार रही है लेकिन श्री केजरीवाल ये भूल जाते हैं कि आज जिसे वे गद्दारी कह रहे हैं ये तो उन्हीं के द्वारा शुरू की गई थी जब उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु अन्ना हजारे को  अपमानित कर हाशिए पर धकेल दिया। उसके बाद पार्टी के संस्थापकों में से प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, डॉ . धर्मवीर, कुमार विश्वास , कपिल मिश्र, शाजिया इल्मी, आशुतोष आदि भी पार्टी छोड़ने मजबूर हुए। कुछ को तो धक्के मारकर बाहर किया गया। इस प्रकार आंदोलन की कोख से निकली यह पार्टी जितनी जल्दी ऊपर उठी उतनी ही जल्दी उसका ग्राफ भी नीचे जा रहा है। समाज के विभिन्न क्षेत्रों की जो प्रतिभाएं अपना काम,- धंधा छोड़कर नई राजनीति के इस अभियान से जुड़ीं उनमें से ज्यादातर हताश होकर लौट गए।  राज्यसभा की सीटों की जो बंदरबांट की उसने भी पार्टी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया। हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि पार्टी इस बगावत से खत्म हो जाएगी। लेकिन श्री केजरीवाल की राष्ट्रीय स्तर पर बतौर विकल्प उभरने की महत्वाकांक्षा पर जरूर तुषारापात हो गया। रही बात भाजपा की तो उसके पास आम आदमी पार्टी सांसदों को शामिल करना पंजाब में अपने पैर जमाने की योजना से जुड़ा है। यद्यपि इससे उसे किसी बड़े लाभ की उम्मीद तो नहीं रखनी चाहिए। वैसे भी भाजपा के नेता ही नहीं आम कार्यकर्ता भी अन्य पार्टियों से आने वाली भीड़ से चिढ़ने लगे हैं क्योंकि इसके आने से उनके अवसर छिन जाते हैं। ऐसे में राघव भले ही भाजपा में अपनी जगह बनाने में कामयाब हो जाएं लेकिन बाकी 6 सांसदों को विशेष महत्व नहीं मिल पाएगा। इस झटके के बाद श्री केजरीवाल और उनकी चौकड़ी अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करती है या नहीं ये फिलहाल कहना कठिन है। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि अपनी अलग पहचान बनाने वाली आम आदमी पार्टी चुनावी राजनीति के चक्रव्यूह में फंसकर  एक आम पार्टी बनकर रह गई है। ऐसा लगता है अन्ना हजारे का श्राप केजरीवाल एंड कंपनी का पीछा नहीं छोड़ रहा।



- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 24 April 2026

प. बंगाल में कांग्रेस ने बिना लड़े ही हथियार डाल दिए



गत दिवस प. बंगाल में पहले चरण और तमिलनाडु में सभी सीटों पर मतदान संपन्न हो गया। दोनों राज्यों में भारी मतदान से चुनाव विश्लेषक हैरानी में हैं। वैसे उक्त दोनों ही राज्य राजनीतिक दृष्टि से बेहद जागरूक माने जाते हैं। दोनों में एक साम्यता ये भी है कि तमिलनाडु में जहां कांग्रेस 1967 में सत्ता से बाहर होने के बाद वापिस नहीं आई वहीं प. बंगाल में 1977 में वामपंथियों ने कांग्रेस से राज्य की सत्ता छीनी। उनके बाद 2011 से वहां ममता बैनर्जी मुख्यमंत्री हैं। इस प्रकार तमिलनाडु में 60 और प. बंगाल में 50 वर्षों से कांग्रेस सरकार नहीं बना सकी। तमिलनाडु में तो वह कभी द्रमुक तो कभी अन्ना द्रमुक के साथ गठबंधन करने से सत्ता के साथ जुड़े रहने में सफल रही । वहीं प. बंगाल में वह वामपंथियों के शासन में तो मुख्य विपक्षी दल रही लेकिन ममता बैनर्जी द्वारा तृणमूल कांग्रेस स्थापित करने के बाद कांग्रेस की दशा दिन ब दिन दयनीय होती गई। 2021 में तो उसे विधानसभा में एक भी सीट नहीं मिली। यही हाल एक जमाने में सबसे बड़ी ताकत रही वामपंथी पार्टियों की भी हो गई। इस खालीपन को आश्चर्यजनक तौर पर भरा भाजपा ने जो 2016 में 3 सीटें जीतने के बाद 2021 में सीधे 77 पर पहुंचकर प्रमुख विपक्षी पार्टी बन गई। इसलिए इस चुनाव में उसे ही सुश्री बैनर्जी के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। ये आश्चर्य का विषय है कि इतने दशकों के बाद भी कांग्रेस ने न तो तमिलनाडु में द्रमुक और अन्ना द्रमुक की चौधराहट खत्म करने की हिम्मत दिखाई और न ही प. बंगाल में सत्ता हासिल करने के लिए किसी भी प्रकार का उत्साह दिखाया। उस दृष्टि से भाजपा इन राज्यों में शून्य से अपना सफर शुरू कर मुख्यधारा में आने में सफल होती दिखाई दे रही है। तमिलनाडु में वह अकेले लड़ने का दुस्साहस करने के बाद इस बार अन्ना द्रमुक के साथ गठबंधन में भागीदार है। हालांकि उसकी रुचि अपना मत प्रतिशत बढ़ाने में ज्यादा है किंतु जिस तरह केरल में उसने उत्तर भारतीय पार्टी की छवि से हटकर अपनी पहिचान बना ली ठीक वैसे ही तमिलनाडु में भी अपनी जड़ें मजबूत करने की दीर्घकालीन योजना पर तेजी से काम कर रही है जबकि कांग्रेस यहां अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने के प्रति पूरी तरह उदासीन है। वर्तमान में वह उस द्रमुक की सहयोगी है जिसके दामन पर पर कभी राजीव गांधी की हत्या के छींटे पड़े थे। मुख्यमंत्री स्टालिन के बेटे ने तो सनातन धर्म की तुलना डेंगू और कोरोना से करते हुए उसी नष्ट करने जैसी डींग हांक दी। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे ने भी सनातन धर्म विरोधी उस बयान का समर्थन कर दिया। यही हाल प. बंगाल में भी है। स्मरणीय है ममता बैनर्जी ने कांग्रेस को वामपंथियों की बी टीम बताते हुए तृणमूल कांग्रेस बनाई थी। उनका आरोप सही साबित हुआ जब पिछले चुनावों में कांग्रेस ने ममता सरकार के विरोध में वामपंथियों से गठबंधन किया। हालांकि उससे हुए नुकसान के बाद इस चुनाव में वह अकेले मैदान में उतरी तो है लेकिन प्रथम चरण के मतदान तक कोई ये कहने वाला नहीं है कि वह कहीं भी मुकाबले में है। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर बने इंडिया नामक विपक्षी गठबंधन में तृणमूल भी शामिल है किंतु ममता चूंकि राहुल गांधी के नेतृत्व में काम नहीं करना चाहतीं इसलिए वे प. बंगाल में कांग्रेस को जरा भी भाव नहीं देतीं। वर्तमान चुनाव में जब श्री गांधी की पहल पर कांग्रेस ने वामपंथियों से अलग होकर एकला चलो रे का फैसला किया तब ये लगा था कि शायद पार्टी खुद को पुनर्स्थापित करने का प्रयास करेगी। पड़ोसी राज्य असम में उसने ऐसा किया भी। शुरुआत में श्री गांधी ने भी ममता सरकार को सिंडीकेट द्वारा संचालित बताकर ये संकेत दिया कि पार्टी इस बार आक्रामक होकर लड़ेगी। लेकिन असम का चुनाव संपन्न होने के बाद न तो राहुल और न ही प्रियंका ने प. बंगाल में वैसा डेरा जमाया जैसा अमित शाह ने कर दिखाया । जबकि केरल में भी मतदान हो चुका था और तमिलनाडु में कांग्रेस सीमित सीटों पर लड़ रही है और वह भी द्रमुक के भरोसे। प. बंगाल में गत दिवस हुए भारी मतदान के बाद चुनाव विशेषज्ञ भी पशोपेश में हैं किंतु एक बात पर सभी एकमत हैं कि या तो तृणमूल की सरकार बनेगी या भाजपा की। लेकिन कोई भी ये नहीं बता पा रहा कि कांग्रेस का क्या होगा? यहां तक कि उसके सबसे बड़े नेता अधीर रंजन चौधरी की जीत भी संदेह के घेरे में है। प. बंगाल पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार है । भाजपा ने त्रिपुरा , अरुणाचल और असम में पांव जमाने के बाद अब प. बंगाल में भी खुद को बतौर विकल्प स्थापित कर लिया है। यदि 4 मई को उसकी सरकार बन गई तब उसके लिए भविष्य की चुनौतियां आसान हो जाएंगी लेकिन कांग्रेस के लिए स्थितियां और चिंताजनक होने से उसमें बिखराव आ सकता है।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 23 April 2026

भारी मतदान लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत



जीत - हार का फैसला तो 4 मई की दोपहर तक ही हो सकेगा किंतु प. बंगाल की 152 और तमिलनाडु की सभी विधानसभा सीटों के लिए दोपहर 12 बजे तक मतदान का प्रतिशत लगभग 50 फीसदी तक पहुंचना लोकतन्त्र और चुनाव आयोग के प्रति जनता के विश्वास का  प्रमाण है। इसके पहले असम और केरलम में हुए मतदान ने भी पिछले कीर्तिमान ध्वस्त कर उन आलोचकों का मुंह बंद कर दिया था जो चुनाव आयोग पर आरोपों की बौछार करते आ रहे थे। विशेष रूप से प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण  के काम में जैसे अड़ंगे लगाए उसके बाद  कई बार ऐसा लगा कि वहां राष्ट्रपति शासन न लगाना पड़ जाए किंतु अंततः मतदाता सूचियों से 91 लाख नाम कट जाने के बाद भी स्थिति नियंत्रण में रही। ममता बैनर्जी ने अपना पूरा प्रचार मतदाता सूचियों में किए गए सुधारों पर ही लगा दिया। उनका आरोप यह था कि केंद्र सरकार के इशारे पर चुनाव आयोग तृणमूल  समर्थक मतदाताओं का नाम हटा रहा है। और बांग्लादेशी घुसपैठियों की आड़ में मुस्लिम समुदाय को विशेष निशाना बनाया गया। हालांकि जनता के बीच ये मुद्दा ज्यादा नहीं गर्माया क्योंकि चुनाव आयोग ने सभी मतदाताओं को नाम जुड़वाने का समुचित अवसर दिया और वह भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त न्यायाधीशों की उपस्थिति में। प. बंगाल  का चुनावी इतिहास  आतंक और हिंसा से भरा रहा है । इस चुनाव में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती से मतदाताओं के मन में व्याप्त डर को काफी हद तक दूर करने में सहायता मिली है। दोपहर तक कुछ घटनाओं को छोड़कर जिस प्रकार मतदाताओं में उत्साह दिखा उसके अनुसार शाम तक मतदान का आंकड़ा 80- 90 को छू जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। इसका अर्थ ये भी लगाया जा सकता है कि तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में मुस्लिम गोलबंदी की प्रतिक्रियास्वरूप हिन्दू मतदाता भी ध्रुवीकृत हुआ है।  तमाम सियासी विशेषज्ञ भी मान रहे हैं कि 30 फीसदी मुस्लिम बैंक की एकजुटता के जवाब में यदि 70 प्रतिशत हिन्दू मतदाताओं ने एकता दिखा दी तब सुश्री बैनर्जी का किला धसक सकता है। स्मरणीय है 2021 में तृणमूल का चुनाव प्रबंधन देख रहे प्रशांत किशोर ने दावा किया था कि भाजपा 100 सीटों से ज्यादा नहीं जीतेगी। उनकी भविष्यवाणी सही साबित हुई और भाजपा 77 पर अटक गई। हालांकि तृणमूल के प्रवक्ता इस बार भी इसी तरह के दावे कर रहे हैं किंतु चुनावी पंडित खुलकर स्वीकार कर रहे हैं कि भाजपा ने बहुत जबर्दस्त मोर्चेबंदी की है जिसके अंतर्गत यदि वह अपने मतदाताओं को मतदान केंद्र तक लाने में सफल हो गई तब प. बंगाल में बदलाव की संभावना बढ़ जाएगी। दूसरे जिस राज्य में आज मतदान हो रहा है वह है तमिलनाडु जहां एक ही चरण में चुनाव हो जाएगा। मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण यहां भी हुआ लेकिन स्टालिन सरकार ने उसे मुद्दा बनाने के बजाय अपने परम्परागत प्रतिद्वंद्वी अन्ना द्रमुक के साथ भाजपा के गठबंधन के मद्देनजर केंद्र सरकार , उत्तर भारत और हिन्दी के विरोध पर अपने प्रचार को केंद्रित रखा । वहीं विपक्षी गठबंधन ने  भ्रष्टाचार ओर विकास में कमी के लिए स्टालिन सरकार को घेरा।  भाजपा इस राज्य में अभी भी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए प्रयासरत है। शुरुआत में ऐसा लग रहा था कि अन्ना द्रमुक और भाजपा का गठबंधन सत्तारूढ़ द्रमुक और कांग्रेस के गठजोड़ पर भारी पड़ेगा। जो चुनाव पूर्व सर्वेक्षण आए उनमें भी मिलते - जुलते संकेत दिए गए परंतु संसद में लाए गए परिसीमन विधेयकों के बाद स्टालिन ने राज्य की लोकसभा सीटें घटने की आशंका को तूल देकर तमिल भावना को उभारने का जो दांव चला उसके कारण राज्य में बदलाव की संभावना संदिग्ध हो चली है। हालांकि तमिलनाडु में भी प. बंगाल जैसा भारी मतदान होने से नतीजों को लेकर कुछ कहना जल्दबाजी होगी लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि चुनाव किसी के भी पक्ष में इकतरफा नहीं रहेगा। ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि राज्य में दोनों प्रमुख प्रतिद्वंदी दलों का संगठन जमीनी स्तर पर है। उनकी विचारधारा भी मूलतः एक जैसी ही है। इसलिए मुकाबला चेहरों पर होता है। कुछ लोगों का मानना है कि इस लिहाज से स्टालिन भारी हैं। लेकिन लोकप्रिय तमिल अभिनेता जे. विजय की नवगठित पार्टी के कूदने से चुनाव में अनिश्चितता बढ़ गई है क्योंकि अभी तक ये आकलन कोई नहीं कर पाया कि विजय के उम्मीदवारों को मिलने वाले मत किस गठबंधन को नुकसान पहुंचाएंगे? बहरहाल भारी मतदान झटका है उन लोगों के लिए जो चुनाव प्रक्रिया को बेवजह कठघरे में खड़ा करते रहते हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 22 April 2026

होर्मुज अमेरिका और ईरान के गले की फांस बन गया


जैसी कि उम्मीद थी वही हुआ। अमेरिका और ईरान के बीच आज होने वाली दूसरे दौर की शांति वार्ता की टेबिल खाली पड़ी रह गई। इस्लामाबाद में अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस और उनकी टीम के आगमन का इंतजार होता रहा। उधर ईरान ने ये शर्त रख दी कि जब तक होर्मुज से अमेरिकी नाकेबंदी नहीं हटेगी वह बातचीत नहीं करेगा। इस पर डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने चिर - परिचित अंदाज में धमकी दी कि बातचीत नहीं होने पर युद्धविराम की अवधि खत्म होते ही ईरान पर जबरदस्त हमला करते हुए उसके बिजली संयंत्र और पुल वगैरह तबाह कर दिए जाएंगे। हालांकि ताजा जानकारी के अनुसार उन्होंने युद्धविराम बढ़ाने की घोषणा भी कर दी किन्तु  इस बार उसकी कोई अवधि नहीं बताई। अपितु ये कह दिया कि ईरान की ओर से ठोस प्रस्ताव आने तक उसे जारी रखा जाएगा। साथ ही वे बातचीत पूरी होने तक प्रतीक्षा करेंगे चाहे उसका अंजाम कुछ भी हो। ट्रम्प के इस ऐलान से ये तो स्पष्ट हो गया कि ईरान की तरह से ही अमेरिका भी होर्मुज़ को हथियार बनाकर अपना हाथ ऊपर रखना चाह रहा है। ये बात सही है कि इस समुद्री रास्ते के अवरुद्ध रहने से ईरान को भारी नुकसान हो रहा है। तेल उत्पादक अन्य खाड़ी देशों के लिए भी होर्मुज का बंद रहना समस्या पैदा करने वाला है। वहीं यूरोप सहित दुनिया के तमाम देश इस  जलडमरूमध्य को तत्काल खोलने का दबाव बना रहे हैं क्योंकि नाकेबंदी से उनको मिलने वाली कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति रुकी हुई है। शुरू  में ईरान ने होर्मुज़ बंद करने का दांव चलकर पूरी दुनिया को परेशान किया और अब अमेरिकी नौसेना द्वारा रास्ता रोके जाने से विश्व भर में ऊर्जा संकट बढ़ता जा रहा है। हालांकि इसके लिए ज्यादा दोषी ईरान को ही कहा जाएगा जिसने पहले होर्मुज से तेल टैंकरों की आवाजाही रोकी और फिर टोल वसूली के जरिए पैसा कमाने की तरकीब सोची। लेकिन उसका मंसूबा पूरा नहीं हो सका क्योंकि ट्रम्प इस बात को भांप गए कि होर्मुज से आवागमन जारी रहने से ईरान की अर्थव्यवस्था को संबल मिल जाएगा। इसीलिए 15 दिन के युद्धविराम की घोषणा होते ही अमेरिका ने अपना जहाजी बेड़ा अड़ाकर ईरान की मुसीबत बढ़ा दी। ईरान ने इसीलिए बातचीत जारी रखने के लिए नाकेबंदी हटाए जाने की शर्त तो रख दी परंतु अमेरिका द्वारा परमाणु ईंधन सौंपे जाने जैसे प्रस्ताव पर चुप्पी साधे हुए है। दरअसल जब दोनों पक्ष एक दूसरे पर ऐसी शर्तें थोप रहे हों जिन्हें मान लेने का आशय झुक जाना होगा तब बातचीत कैसे आगे बढ़ेगी ये बड़ा सवाल है। जहां तक बात पाकिस्तान की है तो ये स्पष्ट हो गया है कि इस बातचीत में वह केवल अमेरिका का संदेशवाहक है। पहले दौर की बातचीत से ही स्पष्ट हो गया कि न तो वह अमेरिका को कुछ समझाने की हैसियत रखता है और न ही ईरान उसकी बात मानने राजी है। इसलिए होर्मुज को लेकर उसने एक शब्द न ईरान से कहा और न ही अमेरिका से। दरअसल ट्रम्प ने शांति वार्ता के लिए इस्लामाबाद का चयन इसलिए किया क्योंकि ईरान का प्रतिनिधिमंडल दूर किसी देश में जाने के लिए सम्भवतः राजी नहीं होता। आज की वार्ता को ग्रहण लग जाने के बाद ट्रम्प द्वारा युद्धविराम को बढ़ाया जाना उनकी मजबूरी है। वहीं ईरान द्वारा बातचीत से कन्नी काटने के पीछे का कारण ये है कि वह आमने - सामने बैठकर अपनी शर्त मनवाने की स्थिति में नहीं रह गया है। इससे अलग हटकर देखें तो दोनों पक्ष एक दूसरे की कमजोरी जान गए हैं। ईरान समझ गया है कि अमेरिका ले - देकर इस जंग से निकलना चाह रहा है। वहीं ट्रम्प भी भांप चुके हैं कि युद्ध जारी रखने पर भी कुछ हासिल होने वाला नहीं है। दुनिया के तमाम बड़े देश भी उनके गैर जिम्मेदाराना रवैए से नाराज हैं जिनमें अमेरिका के पुराने दोस्त भी हैं। यही वजह है कि दोनों पक्ष धमकियां तो बढ़ - चढ़कर दे रहे हैं किंतु लड़ाई से बचना भी चाह रहे हैं। ये स्थिति कब तक जारी रहेगी ये कहना मुश्किल है क्योंकि जहां डोनाल्ड ट्रम्प पूरी तरह से अविश्वसनीय हैं वहीं ईरान का नेतृत्व भी पुख्ता निर्णय लेने में असमर्थ दिख रहा है। ये देखते हुए किसी अप्रत्याशित घटनाक्रम की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि होर्मुज दोनों पक्षों के लिए प्रतिष्ठा के प्रश्न से अधिक गले की फांस बन गया है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 21 April 2026

सीमावर्ती इलाके की रिफाइनरी में आग लगना चिंताजनक


देश में प्रधानमंत्री सबसे अधिक सुरक्षा प्राप्त व्यक्ति हैं। उनके दौरे के पहले संबंधित स्थान के बारे में सुरक्षा एजेंसियां सघन जाँच करती हैं। किसी भी आकस्मिक दुर्घटना के होने पर उन्हें सुरक्षित रखने के पुख्ता प्रबंध भी किए जाते हैं। 1984 में श्रीमती इंदिरा गांधी की उनके निवास पर ही अंगरक्षकों द्वारा की गई हत्या के बाद वीआईपी सुरक्षा के प्रति काफी ध्यान दिया जाने लगा। उस दृष्टि से गत दिवस राजस्थान के  बाड़मेर जिले स्थित पचपदरा रिफाइनरी में अचानक आग लगना बेहद गंभीर एवं चिंताजनक घटना है। करीब 9 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष क्षमता वाली यह परियोजना देश के सबसे बड़े ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स में से एक है। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसका उद्घाटन करने वाले थे। उद्घाटन से ठीक एक दिन पहले उसमें  आग  लगने से सुरक्षा एजेंसियों के चेहरों की हवाइयां उड़ी हुई हैं क्योंकि रिफाइनरी उस स्थान से एक किलोमीटर से  भी कम की दूरी पर स्थित है जहां उद्घाटन समारोह होने वाला था। और फिर यह घटना उस समय हुई, जब प्रदेश के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा उद्घाटन की तैयारियों का जायजा लेने के लिए वहां पहुंचने वाले थे। हालांकि किसी बड़े नुकसान  की जानकारी नहीं है, लेकिन आग लगने के सही कारणों का अभी पता नहीं चल सका। इस रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स को भारत की ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक विकास के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा था।  हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड और राज्य सरकार के संयुक्त उद्यम के रूप में विकसित की गई इस परियोजना में 79,450 करोड़ रुपए से अधिक का निवेश किया गया है। साथ ही ये देश के सबसे बड़े ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स में से एक है। यद्यपि आग समय रहते बुझा ली गई परंतु इतने संवेदनशील संयंत्र में हुए अग्निकांड को साधारण मानकर भुलाना खतरनाक होगा। यदि प्रधानमंत्री इसका उद्घाटन न कर रहे होते तब भी यह अग्निकांड औद्योगिक संयंत्रों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाने के साथ ही निर्माण कार्य में हुई तकनीकी गलती की ओर इशारा करता है। यदि उद्घाटन समारोह की तैयारियां देखने  मुख्यमंत्री आग लगने वाले समय संयंत्र के भीतर रहे होते तब उनके साथ न जाने कितने लोग दुर्घटना का शिकार होते। और कहीं आज प्रधानमंत्री के वहां होते हुए आग भड़क उठती तब जो होता उसकी कल्पना भी दहला देती है । उक्त घटना के बाद आज होने वाला उदघाटन समारोह स्थगित कर दिया गया है। आग लगने के कारणों की सूक्ष्म जांच के बाद सही स्थिति सामने आएगी किन्तु बाड़मेर की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए यह अग्निकांड अनेक आशंकाओं को जन्म दे रहा है। उल्लेखनीय है बाड़मेर जिले की लगभग 250 कि.मी सीमा पाकिस्तान से सटी होने से विदेशी षड़यंत्र  की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। हालांकि तत्काल किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी किंतु रिफाइनरी जैसे संयंत्र में उद्घाटन के एक दिन पहले हुई अग्नि दुर्घटना के पीछे देश विरोधी ताकतों की साज़िश होने को पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता। विशेष रूप से तब जब प्रधानमंत्री इसका शुभारम्भ करने आज वहां उपस्थित रहने वाले थे। जांच एजेंसियों के साथ ही रिफाइनरी के निर्माण से जुड़े तकनीकी विशेषज्ञ भी घटना की तह में जाएंगे । लेकिन सीमावर्ती जिले में स्थित इस महत्वाकांक्षी परियोजना के शुभारम्भ के एक दिन पूर्व हुए अग्निकांड की जांच में सेना से जुड़ी जांच एजेंसियों को भी शामिल किया जाना उचित होगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 20 April 2026

अंततः ईरान को समर्पण करना ही पड़ेगा


मध्यपूर्व का मसला उलझता ही जा रहा है। ज्यादातर लोगों का मानना है कि ईरान के जबरदस्त प्रतिरोध के कारण अमेरिका बुरी तरह फंस गया है और किसी तरह इज्जत बचाकर निकलने का रास्ता तलाश रहा है । इसीलिए जब 15 दिन का युद्धविराम हुआ तब यही प्रचारित हुआ कि अमेरिका और इजराइल दोनों ईरान को घुटनाटेक करवाने में नाकामयाब रहने के कारण ही लड़ाई रोकने बाध्य हुए। अयातुल्ला ख़ामेनेई सहित अनेक बड़े नेताओं और सैन्य अधिकारियों की हत्या के बाद ईरान में सत्ता परिवर्तन और शाह पहलवी वंश के उत्तराधिकारी को तेहरान बुलवाकर उसकी ताजपोशी की जो योजना डोनाल्ड ट्रम्प ने बनाई थी उसके मूर्तरूप लेने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही। जिन नेताओं के हाथ फिलहाल ईरान की कमान है वे भी अमेरिकी दबाव के सामने झुकने से इंकार कर रहे हैं। इसी कारण से इस्लामाबाद में हुई पहले दौर की शांति वार्ता बेनतीजा खत्म हो गई। और कल होने वाला दूसरा दौर भी खटाई में पड़ता दिख रहा है क्योंकि ईरान ने अपने प्रतिनिधिमंडल को नहीं भेजने का ऐलान कर दिया है। युद्धविराम के शुरू होते ही इजराइल द्वारा लेबनान पर किए गए ताबड़तोड़ हमलों से भी ईरान नाराज हो उठा। लेकिन सबसे बड़ा पेच है होर्मुज जलडमरूमध्य जो न सिर्फ ईरान बल्कि तेल उत्पादक खाड़ी देशों की जीवन रेखा बन गया है। दुनिया में 20 प्रतिशत  कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति चूंकि ईरान के कब्जे वाले इसी समुद्री रास्ते से होती है इसीलिए उसने इसे भी हथियार के रूप में इस्तेमाल कर अभूतपूर्व वैश्विक ऊर्जा संकट उत्पन्न कर दिया। इसके अलावा वहां से गुजरने वाले जहाजों पर टोल टैक्स के तौर पर भारी - भरकम राशि चुकाने की बंदिश लगा दी। हालांकि भारत, ईराक , चीन, पाकिस्तान और रूस के जहाजों को होर्मुज से बेरोकटोक आने - जाने की छूट  दी गई किंतु ज्यों ही अमेरिका को लगा कि ईरान इस जलडमरूमध्य में आवागमन पर नियंत्रण लगाकर अपने आर्थिक और सामरिक उद्देश्य पूरे कर रहा है त्यों ही उसने भी जवाबी नाकेबंदी करते हुए उन जहाजों को रोकना शुरू  कर दिया जो ईरान को टोल चुकाकर होर्मुज़ से बाहर निकले।  ईरान का रवैया भी होर्मुज़ को लेकर बेहद अनिश्चित या यूं कहें कि गैर जिम्मेदाराना है। युद्धविराम के बाद से वह अनेक बार इस रास्ते को खोलने के बाद बंद कर चुका है। कई बार तो एक दिन में ही सुबह उसने होर्मुज खोला और शाम को पुनः बंद कर दिया। इस ऊहापोह से उसकी विश्वसनीयता पर तो आंच आई ही साथ ही ये भी साफ हो गया कि  अमेरिका को शिकस्त देने के उसके दावे हवा - हवाई ही हैं। ट्रम्प  द्वारा लगातार ये दबाव बनाया जा रहा है कि ईरान होर्मुज को अंतर्राष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र मानकर मुक्त आवागमन के लिए उपलब्ध करवाए। साथ ही परमाणु बम बनाने के लिए जो परिष्कृत ईंधन है उसे भी अमेरिका को सौंपने के अलावा अपनी सैन्य शक्ति विशेष रूप से मिसाइलों के उत्पादन में कमी लाए। इसके अलावा भी अनेक ऐसी शर्तें हैं जो ईरान के नेतृत्व को नागवार गुजर रही हैं। इससे नाराज ट्रम्प  ईरान के तमाम बिजली घर और पुलों को नष्ट करने की धमकी दे रहे हैं। कल होने वाली शांति वार्ता यदि हुई भी तो उसके सफल होने की आशा करना व्यर्थ है। अब तक की स्थिति में अमेरिका और इजराइल भले ही लड़ाई को परिणाम तक पहुंचाने में असफल रहे हों किंतु रूस और चीन जैसी महाशक्तियों के प्रत्यक्ष समर्थन के बाद भी ईरान अपनी बर्बादी को नहीं रोक सका। जल्द ही कोई रास्ता नहीं निकला तब उसके शीर्ष नेतृत्व में मतभेद  उभरना तय है। सबसे बड़ी चिंता खामेनेई द्वारा  बनाए गए आईआरजीसी (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर) द्वारा समानांतर सत्ता चलाने की है। गत दिवस होर्मुज से गुजर रहे भारत के जहाजों पर हुई गोलीबारी इसका प्रमाण है। खबर है आईआरजीसी होर्मुज को अपनी मिल्कियत बनाकर आय का स्रोत बनाना चाह रहा है। ईरान सरकार के कुछ नेता भी इस योजना के पीछे हैं। कुल मिलाकर ईरान अब नेतृत्व शून्यता की स्थिति में आ गया है। अमेरिका भी इसी का इंतजार कर रहा है। बड़ी बात नहीं युद्धविराम की अवधि पूरी होते ही ये इलाका एक बार फिर से जंग की आग में जल उठे। लेकिन इस बार अमेरिका भारी पड़ेगा क्योंकि उसने पहले चरण की गलतियों से सीख लेने के बाद ईरान की पुख्ता घेराबंदी करते हुए उसकी कमजोरियों को भांप लिया है। बावजूद इसके तेहरान में बैठे नेता आसानी से समर्पण नहीं करेंगे किंतु देर - सवेर उन्हें ऐसा करना ही पड़ेगा क्योंकि उनके पास लंबी लड़ाई लड़ने की शक्ति बची नहीं है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 18 April 2026

परिसीमन विधेयक गिरने के बाद भी महिला आरक्षण राष्ट्रीय एजेंडा बना


1999 में कर्नाटक की वेल्लारी लोकसभा सीट पर कांग्रेस  नेत्री सोनिया गांधी और भाजपा उम्मीदवार स्व. सुषमा स्वराज के बीच हुआ मुकाबला देश के चुनावी इतिहास में प्रमुखता से दर्ज है। हालांकि कड़ी टक्कर  के बावजूद सुषमा जी 50 हजार मतों से परास्त हो गईं थीं। लेकिन हारने के बाद अपनी प्रतिक्रिया में उन्होंने कहा था कि कुछ हार , जीत से भी ज्यादा गौरवशाली होती हैं।  दरअसल वे जानती थीं कि कर्नाटक में जो उस समय तक कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था, श्रीमती गांधी को पराजित करना असंभव था। लेकिन पार्टी की सुनियोजित रणनीति के अंतर्गत उन्होंने वह चुनौती  न सिर्फ स्वीकार की अपितु कुछ ही दिनों में कन्नड़ में भाषण देना सीखकर मतदाताओं पर गहरी छाप भी छोड़ी। गत दिवस लोकसभा में महिला आरक्षण लागू करने के लिए सरकार द्वारा प्रस्तुत परिसीमन  संबंधी संविधान संशोधन विधेयक दो तिहाई बहुमत के अभाव में गिर गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की अपील और आश्वासन विपक्ष को प्रभावित नहीं कर सके। विधेयक के पारित नहीं होने को विपक्ष अपनी बड़ी जीत मानकर उत्साहित भी है और आनंदित भी। कहा जा रहा है कि विपक्ष में सेंध लगाने में भाजपा विफल रही। लेकिन किसी भी कोण से ये लगा ही नहीं कि सरकार की तरफ से विपक्ष में तोड़फोड़ का प्रयास हुआ हो। सत्र के पहले दिन ही कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे सहित लगभग सभी विपक्षी दलों ने  विधेयकों का विरोध करने की घोषणा कर दी थी। ऐसे  में आवश्यक संख्याबल नहीं होने पर सत्ता पक्ष में जो चिंता  दिखाई देनी थी  उसका कोई लक्षण नजर नहीं आया। उल्टे प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और सरकार की ओर से मोर्चा संभालने वाले सभी वक्ता पूरे आत्मविश्वास में दिखे । सही बात ये है कि सरकार विधेयकों का हश्र जानती थी , फिर भी विशेष सत्र बुलाकर उसने महिला आरक्षण को देश का मुख्य राजनीतिक एजेंडा बनाने का जो दांव चला वह कारगर साबित हुआ। विपक्ष से बार - बार ये आवाजें आती रहीं कि वह महिला आरक्षण के नहीं बल्कि परिसीमन के विरोध में है। इसीलिए जब संशोधन विधेयक गिर गया तब भाजपा ने बिना देर किए विपक्ष को महिला विरोधी बताते हुए कठघरे में खड़ा करने का अभियान छेड़ दिया। यद्यपि विपक्ष ने 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं के लिए बढ़ाई जा रही सीटों के प्रस्ताव को तो रुकवा दिया किंतु आम महिला मतदाता को परिसीमन जैसा तकनीकी शब्द समझ नहीं आएगा। उसके दिमाग में यदि ये बात बैठ गई कि मोदी सरकार महिलाओं के लिए लोकसभा में सीटें बढ़ाना चाहती थी किंतु विपक्ष ने अड़ंगा लगा दिया तो भाजपा इसका लाभ उठा सकती है। मसलन प. बंगाल और तमिलनाडु में सुशिक्षित महिलाओं को भाजपा अपनी बात समझाने में सफल हो गई और 5 फीसदी मत उसने अतिरिक्त खींच लिए तो  बड़ा उलटफेर हो सकता है। विपक्ष का ये कहना शत - प्रतिशत सही है कि सरकार द्वारा संसद का विशेष सत्र उक्त दोनों राज्यों में मतदान के कुछ दिन पहले बुलाने का कारण विशुद्ध राजनीतिक था। लेकिन सभी राजनीतिक दल अवसर का लाभ उठाने के लिए ऐसी कोशिश करते रहे हैं। अब ये तो चुनाव परिणाम ही बताएंगे कि सरकार अपनी रणनीति में सफल रही या विपक्ष की मोर्चेबंदी कामयाब क्योंकि  कुछ दिनों के भीतर किसी भी दल के लिए भी मतदाताओं को परिसीमन के समर्थन या विरोध में गोलबंद करना आसान नहीं है। इसीलिए कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का ये सोचना सही है कि दरअसल भाजपा ने उ.प्र, पंजाब और गुजरात विधानसभा के आगामी चुनाव के  मद्देनजर महिला आरक्षण को लागू करने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाकर खुद। को महिला हितैषी साबित करने का प्रयास किया। विपक्ष की दिक्कत ये है कि संसद में प्रदर्शित एकता के बावजूद मैदानी स्तर पर वह विभाजित है। केरल में कांग्रेस और वामपंथियों के बीच सांप और नेवले जैसी दुश्मनी है। इसी तरह प. बंगाल में ममता बैनर्जी के विरुद्ध कांग्रेस , वामपंथी और ओवैसी सभी ताल ठोक रहे हैं। ये देखते हुए पांच राज्यों के चुनावों के बाद भाजपा बड़े पैमाने पर महिला आरक्षण का मुद्दा उठाएगी और तब विपक्ष के लिए उ.प्र, गुजरात और पंजाब के मतदाताओं को ये समझाना मुश्किल होगा कि उनमें लोकसभा की सीटें बढ़ाने के प्रस्ताव को  क्यों रोका गया। अखिलेश यादव ने तो मुस्लिम महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग उठाकर अपने ही गोल में गेंद डाल दी। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री ने उन्हें अपना मित्र बता दिया जिसका खंडन करने के बजाय श्री यादव मुस्कुराते रहे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 17 April 2026

महिला आरक्षण को लेकर कोई भी दल ईमानदार नहीं


संसद में विपक्ष का रवैया देखकर सरकार ने 2023 में पारित महिला आरक्षण अधिनियम को कल की तारीख से ही लागू कर दिया।  हालांकि इसे लेकर अभी भी भ्रम है कि ये आरक्षण 2029 के लोकसभा चुनाव से प्रभावशील होगा या जनगणना के उपरांत नये सिरे से परिसीमन के उपरांत 2034 से? विपक्ष ने इस अधिनियम को तत्काल लागू करने के औचित्य पर सवाल उठाए। सरकार की मंशा इसके पीछे स्पष्ट नजर आ रही है। दरअसल वह विपक्ष को महिला आरक्षण का विरोधी साबित करने का प्रयास कर रही है। हालांकि उसकी कोशिश कितनी कामयाब होती है ये फिलहाल कहना मुश्किल है । लेकिन कल कांग्रेस सांसद प्रियंका वाड्रा ने सुझाव दिया था कि लोकसभा की वर्तमान सदस्य संख्या पर ही एक तिहाई महिला आरक्षण लागू किया जाए। लगता है सरकार ने भी ऐसा ही कुछ करने का मन बनाया होगा। अन्यथा संसद के विशेष अधिवेशन के बीच अचानक  महिला आरक्षण विधेयक को कानून की शक्ल देने का और कोई कारण समझ नहीं आता। बेहतर हो भाजपा संसद में एक तिहाई टिकिटें महिलाओं को देने की घोषणा करते हुए विपक्ष पर दबाव बना दे।  इस बारे में ये कहना गलत नहीं होगा कि कांग्रेस संगठन की वर्तमान स्थिति देखते हुए वह स्वयं श्रीमती वाड्रा के सुझाव को लागू करने का साहस नहीं दिखा सकेगी। क्षेत्रीय  पार्टियों की स्थिति तो और भी खराब है क्योंकि उनके यहां मुख्य रूप से पुरुषों का ही वर्चस्व है। कल सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लोकसभा में जब मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण देने की मांग की तब गृहमंत्री अमित शाह ने पलटवार करते हुए कहा था कि समाजवादी पार्टी अपनी सभी टिकटें मुस्लिम महिलाओं को दे दे तो उन्हें कोई ऐतराज नहीं होगा। इस पर श्री यादव चुप होकर बैठे रह गए। लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाकर महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने के विचार पर समाज के भीतर भी तरह - तरह की चर्चाएं चल रही हैं जिनमें ये भी कहा जा रहा है कि सांसदों की संख्या बढ़ाने से जो आर्थिक बोझ बढ़ेगा वह अंततः जनता को ही वहन करना पड़ेगा। सबसे बड़ी बात ये है कि महिला आरक्षण का विधेयक 2023 में पारित होने के बाद किसी भी पार्टी ने उसे लागू करने की मांग नहीं की जो उनकी ईमानदारी पर संदेह उत्पन्न करती है। जहां तक प्रश्न जनगणना और उसमें भी जातीय जनगणना का है तो गृहमंत्री ने स्पष्ट कर दिया कि उसकी प्रक्रिया शुरू  हो चुकी है। लेकिन जिसकी जितनी भागीदारी उसकी उतनी हिस्सेदारी का नारा लगाने वाले राहुल गांधी क्या ये वायदा सार्वजनिक तौर पर कर सकते हैं कि कांग्रेस टिकिट वितरण करते समय उक्त नारे पर अमल करेगी? इसी तरह पिछड़ों की राजनीति करने वाली सपा और राजद जैसी पार्टियां पूरी तरह ओबीसी अन्य आरक्षित जातियों के लोगों को ही उम्मीदवार बनाएंगी? स्मरणीय है दलितों की मसीहा होने का दावा करने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती ने ब्राह्मण जाति के सतीश चंद्र मिश्र को पार्टी का महासचिव बनाने के साथ ही राज्यसभा में भी भेजा। सही  बात ये है कि महिला आरक्षण का सैद्धांतिक आधार पर समर्थन करने में तो सभी पार्टियां आगे - आगे नजर आती हैं किंतु उसे व्यवहार में उतारने के बारे में आगे - पीछे हो जाती हैं। कांग्रेस में सोनिया गांधी लंबे समय तक अध्यक्ष रहीं किंतु उन्होंने  उत्तराधिकारी के तौर पर अपने पुत्र को आगे बढ़ाया और साथ ही बेटी को महामंत्री बनाकर स्थापित कर दिया। आज पार्टी में और किसी महिला नेत्री का नाम सुनाई नहीं देता। यही हाल सपा का है जो अखिलेश के परिवार की निजी कंपनी है। तृणमूल कांग्रेस में अनेक महिला सांसद होने के बाद भी ममता बैनर्जी का राजनीतिक वारिस उनका भतीजा अभिषेक ही है। भाजपा भी पुरुष प्रधान पार्टी ही है। संसद में उसकी अनेक महिला सांसद होने के बाद भी स्व. सुषमा स्वराज जैसी प्रथम पंक्ति की नेत्री एक भी नहीं बची। दिखाने को दिल्ली की मुख्यमंत्री का चेहरा बतौर महिला मुख्यमंत्री आगे किया जा सकता है लेकिन निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी कितनी है ये सभी जानते हैं। इसमें दो मत नहीं हैं कि महिलाओं की शासन और प्रशासन में भागीदारी बढ़नी चाहिए। लेकिन इसके पहले उन्हें हर दृष्टि से सक्षम और आत्मनिर्भर बनाने पर भी ध्यान दिया जाना जरूरी है। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक संसद और विधानसभाओं में उनकी संख्या बढ़ने से उनकी सामाजिक स्थिति में सुधार होना असंभव है। पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं को मिले आरक्षण के बाद की स्थितियां किसी से छिपी नहीं हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 16 April 2026

मुस्लिम महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग देश के दूसरे विभाजन का षड़यंत्र


लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित किए जाने के लिए सदन  की मौजूदा सदस्य संख्या बढ़ाने एवं उसके लिए परिसीमन करने के उद्देश्य से आज लोकसभा में सरकार की ओर से तीन संशोधन विधेयक प्रस्तुत कर दिए गए। जैसा कि अपेक्षित था विपक्ष ने इसका जोरदार विरोध शुरू कर दिया जिसका उद्देश्य भाजपा को इसका राजनीतिक लाभ लेने से रोकने के साथ ही आरक्षण के भीतर आरक्षण रूपी पुराना पेच फंसाकर पूरी प्रक्रिया को बाधित करना  है। बरसों  पहले महिलाओं को आरक्षण के प्रस्ताव  का संसद में स्व. शरद यादव , स्व. मुलायम सिंह यादव के अलावा भाजपा नेत्री उमाश्री भारती ने भी ये कहते हुए विरोध किया था कि इसमें ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से कोटा रखा जाए। । आज बहस के दौरान ये संकेत मिल जाएगा कि विपक्ष का अंतिम फैसला क्या होगा क्योंकि प. बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होना शेष है। इसीलिए सभी राजनीतिक दल  अपना दृष्टिकोण सोच - समझकर ही तय करेंगे। ये तो स्पष्ट है कि यदि ये विधेयक संसद में पारित हो गए तो प. बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव में भाजपा महिला मतदाताओं के बीच खुद को उनका हितचिंतक साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। और कहीं विपक्ष इन विधेयकों पर फैसला टलवाने में कामयाब हो गया तब भाजपा का प्रचारतंत्र उसे महिला विरोधी ठहराकर कठघरे में खड़ा करने में जुट जाएगा। लेकिन इससे अलग हटकर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने  मुस्लिम महिलाओं के लिए भी आरक्षण जैसी खतरनाक मांग उठाते हुए पूछा कि आखिर मुस्लिम महिलाएं कहां जाएंगी? इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने तंज कसा कि आप अपनी पार्टी की सभी टिकटें मुस्लिम महिलाओं को ही दे देना। बहस में अन्य दलों के विचार भी सुनने मिलेंगे। लेकिन अखिलेश द्वारा मुस्लिम महिलाओं के लिए भी आरक्षण की मांग उठाकर जो दांव चला उससे वे अगले वर्ष होने वाले उ.प्र विधानसभा के चुनाव में  मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने में भले सफल हो जाएं किंतु उनकी यह मांग देश हित के सर्वथा विरुद्ध है। मुसलमानों को सेना में आरक्षण देने का मुद्दा उनके स्वर्गीय पिता मुलायम सिंह ने भी छेड़ा था। उनकी मुस्लिम परस्ती के कारण ही उन्हें मुल्ला मुलायम सिंह कहा जाने लगा था। हालांकि उस मांग को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल सका किंतु आज उनके पुत्र अखिलेश ने  मुस्लिम महिलाओं  के लिए अलग से आरक्षण जैसी मांग छेड़कर मुस्लिम तुष्टीकरण वाली  पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ाने का काम कर दिया। हालांकि अखिलेश सहित पूरी समाजवादी पार्टी उ.प्र में मुस्लिम समुदाय का चरण चुंबन करने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करती किंतु इस मांग से उस दौर की याद ताजा हो उठी जब मुस्लिमों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र बनाकर अंग्रेजी सत्ता ने भारत के दो टुकड़े करने की शुरुआत कर दी थी। मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण यदि कर दिया जाए तो  कल को मुस्लिम पुरुषों के लिए भी अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग जोर पकड़ेगी जो देश की अखंडता के लिए बड़ा खतरा होगी। अखिलेश यादव विदेश में पढ़कर आए हैं। ऐसे में उनसे ये अपेक्षा करना गलत नहीं होता कि वे  आधुनिक सोच का परिचय दें। लेकिन ऐसा लगता है वोट बैंक की वासना में  समाज को जातियों में बांटने के बाद वे और उनकी पार्टी अब देश का नया बंटवारा करने की जमीन तैयार कर रहे हैं। महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें बढ़ाए जाने का उद्देश्य आधी आबादी को राष्ट्रनिर्माण में भागीदार बनाना है। लेकिन इसमें धर्म के नाम पर आरक्षण जैसी खतरनाक मांग उठाकर अखिलेश ने एक बार दिखा दिया कि उन्हें देश की एकता और अखंडता की कोई चिंता नहीं है। महिला आरक्षण के लिए आज प्रस्तुत विधेयक पारित हों या न हों किंतु संसद में अखिलेश ने मुस्लिम महिलाओं के लिए आरक्षण की जो बात छेड़ी उसके लिए उनके विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए। क्योंकि ये मांग उस शपथ का उल्लंघन करती है जिसमें उन्होंने बतौर सांसद देश की अखंडता को अक्षुण्ण रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त की थी। ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि  इस देश विरोधी मांग पर मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस चुप रही। गृह मंत्री श्री शाह ने तो अखिलेश की मांग को असंवैधानिक बताकर सही किया परन्तु अब इस बात का इंतजार रहेगा कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी बहस में भाग लेते हुए अखिलेश द्वारा मुस्लिम महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण संबंधी मांग का विरोध करते हैं या नहीं? 


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 15 April 2026

सांसद - विधायक बनने वाली महिलाओं में निर्णय क्षमता जरूरी



लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण प्रदान करने का प्रस्ताव संसद द्वारा 2023 में ही पारित किया जा चुका है। लेकिन इसे लागू करते हुए एक तिहाई सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए संसद का दो दिवसीय अधिवेशन आमंत्रित किया गया है । इसमें परिसीमन सम्बन्धी विधेयक पारित किया जाना है जिसके बाद लोकसभा में 850 सीटें हो जाएंगी। परिसीमन का आधार 2011 की जनगणना को बनाया जाएगा। दक्षिण के राज्यों को चिंता है कि उ.प्र और बिहार की जनसंख्या ज़्यादा होने से महिला आरक्षण में सबसे ज्यादा लाभ उन्हें मिल जाएगा। हालांकि सरकार की ओर से ये आश्वासन दिया जा रहा है कि किसी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा ।  विपक्षी दलों की ओर से जो संकेत आ रहे हैं उन्हें देखते हुए इस अधिवेशन में सरकार द्वारा लाए जाने वाले प्रस्ताव का पारित होना आसान नहीं है क्योंकि सत्ता पक्ष के पास दोनों सदनों में संविधान संशोधन लायक दो तिहाई बहुमत का अभाव है। हालांकि महिलाओं  को लोकसभा और विधानसभा में एक तिहाई आरक्षण प्रदान करने के लिए सीटों की संख्या में वृद्धि के  लिए सैद्धांतिक रूप से सभी दल सहमत हैं किंतु असली विवाद श्रेय लूटने का है। कांग्रेस नेत्री सोनिया गांधी ने संसद के अधिवेशन की तारीखों को लेकर जो सवाल उठाया उसका कारण भी राजनीतिक ही है। दरअसल  विपक्ष को  शक है कि प. बंगाल और तमिलनाडु  विधानसभा चुनाव  के मतदान के हफ्ते भर पहले महिलाओं की एक तिहाई सीटें बढ़ाने जैसे बेहद महत्वपूर्ण प्रस्ताव को पारित करवाने का पूरा श्रेय लूटकर भाजपा उक्त दोनों राज्यों में महिला मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए इसका उपयोग करेगी ।  लेकिन सरकार का कहना है कि यदि 2029 के लोकसभा चुनाव में सीटें बढ़ाना है तब इस बारे में संसद को जल्द फैसला करना चाहिए। अन्यथा फिर बात 2034 तक टल जाएगी। उस दृष्टि से सरकार की तत्परता औचित्यपूर्ण है। रही बात उसके राजनीतिक लाभ की तो यदि इस तरह के प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित होते हैं तब कोई एक दल  उसका श्रेय नहीं लूट पाता। इसीलिए प्रधानमंत्री ने सभी दलों से अपील की है कि वे इस प्रस्ताव को समर्थन देकर  महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने को संवैधानिक रूप देने में सहायक बनें। ये प्रस्ताव संसद में पारित हो पाता है या नहीं ये तो दो दिन बाद ही पता चलेगा किंतु नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर जिस प्रकार केंद्र सरकार  प्रचार कर रही है उसे देखते हुए विपक्ष का भयभीत होना स्वाभाविक है। राजनीति के जानकार इस बात से भली - भांति अवगत हैं कि प्रधानमंत्री किसी भी फैसले के पहले गहन मंथन करते हुए उसके दूरगामी फायदे और नुकसान का आकलन करते हैं। 2029 से  लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं की सीटें बढ़ाने का निर्णय भी उन्होंने काफी सोच - समझकर लिया होगा। यदि विपक्षी दल इस प्रस्ताव का विरोध करते हैं तब  भाजपा इसे मुद्दा बनाकर उनको महिला विरोधी साबित करने में जुट जाएगी। विपक्ष भी इस दांव को समझ रहा है। लेकिन इस सबसे हटकर जो बात जनसामान्य के मन में उठ रही है वह है सांसद - विधायक बनने वाली महिलाओं का शैक्षणिक स्तर और उससे भी बढ़कर सार्वजनिक जीवन में कार्य करने का अनुभव। ये इसलिए जरूरी है क्योंकि देश भर में पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए किए गए आरक्षण के परिणामस्वरुप उनका प्रतिनिधित्व तो बेशक बढ़ा किंतु गुणवत्ता नहीं होने से महिला सशक्तीकरण का जो उद्देश्य इसके पीछे था वह पूरा नहीं हो सका। इसलिए संसद और विधानसभाओं में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित करने के साथ ही राजनीतिक दलों को ये देखना होगा कि जिन महिलाओं को वे चुनाव मैदान में उतारें उनमें बतौर जनप्रतिनिधि अपने दायित्व के प्रति जागरूकता हो । साथ ही निर्णय लेने के लिए पुरुषों पर पूर्णतः निर्भरता से भी वे मुक्त हों। हालांकि आरक्षित सीटों से ऐसे अनेक पुरुष सांसद और विधायक भी चुनकर आते हैं जिन्हें मिट्टी के माधो कहा जा सकता है। लेकिन आजादी के आठ दशक बाद महिलाओं को जब देश चलाने में हिस्सेदारी मिल रही है तब इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि शुरुआत में ही ऐसे मापदण्ड बना दिए जाएं जिससे इस ऐतिहासिक फैसले के औचित्य पर सवाल न उठ सकें। आज जब महिलाएं सभी क्षेत्रों में अपनी क्षमता को सफलता पूर्वक प्रमाणित कर रही हैं तब संसद और विधानसभाओं में भी उनकी एक तिहाई भागीदारी समय की मांग और देशहित में है। ऐसे में इस विधेयक के पारित होने के बाद  राजनीतिक दलों को इस दिशा में भी सोचना चाहिए कि सदन में आने वाली नारी अबला नहीं अपितु सबला हो।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 14 April 2026

होर्मुज़ रोककर पूरी दुनिया से दुश्मनी ले बैठा ईरान


मध्यपूर्व में भले ही युद्धविराम हो गया हो किंतु ईरान और अमेरिका के  बीच शांति वार्ता के बेनतीजा खत्म होने के बाद दोनों पक्षों से जिस प्रकार की बयानबाजी सुनाई दे रही है वह इस बात का संकेत है कि जंग की चिंगारी कभी भी भड़क सकती है । इसका पहला कारण तो इजराइल और लेबनान के बीच लड़ाई का जारी रहना और दूसरा है ईरान द्वारा होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर कब्जा जताकर आवाजाही पर रोक लगाना। इसके जवाब में अमेरिका ने भी होर्मुज की नाकाबंदी का ऐलान करते हुए धमकी दे डाली कि यदि कोई जहाज ईरान को टोल चुकाकर होर्मुज से निकलेगा तो उसे रोका जाएगा। हालांकि इसके बाद भारत और चीन के जलपोत उक्त समुद्री मार्ग से सुरक्षित निकलकर आ गए। भारत ने भी अपने जहाजों की हिफाजत के लिए नौसेना का बेड़ा तैनात कर रखा है। ईरान द्वारा होर्मुज़ पर अपना पूर्ण अधिकार होने का दावा करने से पूरी दुनिया परेशान है क्योंकि इस युद्ध के पहले तक ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी तथा सभी देशों के जहाज बेरोकटोक इस समुद्री मार्ग का उपयोग किया करते थे। स्मरणीय है सऊदी अरब , बहरीन, कतर ,यू.ए.ई और ओमान आदि से गैस और कच्चे तेल का निर्यात होर्मुज से ही होता है। इस युद्ध के पहले इस समुद्री मार्ग का नाम शायद ही कभी इतना चर्चा में आया हो। लेकिन ईरान ने जिस तरह से इसे अपना हथियार बनाया उसकी वजह से पूरी दुनिया के सामने नया संकट उत्पन्न हो गया है। ऊपर से अमेरिका के बड़बोले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा नित नई धमकियां दिए जाने से शांति की संभावनाएं शून्य होती जा रही हैं। सवाल ये है कि ईरान होर्मुज़ को कितने दिनों तक बंद रख सकेगा? और ये भी कि अमेरिका किस अधिकार से उसे खुलवाने के लिए चौधरी बनकर खड़ा है। ऐसा लगता है ईरान और अमेरिका दोनों महीने भर की लड़ाई से थक कर चूर हैं। ईरान को तो विनाशलीला का प्रत्यक्ष दर्शन करने के अलावा सैन्य क्षमता का भी भारी नुकसान झेलना पड़ा। तेल से होने वाली कमाई भी अवरुद्ध है। उधर अमेरिका भी लड़ाई के उम्मीद से ज़्यादा खिंच जाने से परेशान है। सैन्य साजो - सामान के अलावा उस पर आर्थिक बोझ भी बढ़ गया है। सबसे बड़ी बात उसके सर्वशक्तिमान होने का दंभ चकनाचूर हो गया। खाड़ी देशों में स्थित उसके सैनिक अड्डों पर ईरान ने जिस तरह खुलकर हमले किए उससे अमेरिका की धाक मिट्टी में मिल गई। ये कहना गलत नहीं होगा कि सऊदी अरब , कतर , बहरीन, ओमान और यू.ए.ई को अपने यहां अमेरिकी सैन्य अड्डे रखने की सजा भुगतनी पड़ी। ईरान ने इज़राइल की तरह से ही इन देशों पर  भी ताबड़तोड़ हमले किए। विशेष तौर पर तेल उत्पादक इकाइयों को निशाना बनाकर उनकी अर्थव्यवस्था चौपट करने में लेश मात्र भी संकोच नहीं किया। इजराइल की अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था भी सवालिया निशानों के घेरे में आ गई। सवाल उठ रहा है कि इस्लामाबाद वार्ता असफल हो जाने के बाद ईरान , अमेरिका और इजराइल का अगला कदम क्या होगा क्योंकि एक महीने से ज़्यादा तक लड़ने के बाद भी दोनों पक्षों के हाथ खाली हैं। मसलन न तो ईरान अमेरिका और इजराइल को घुटने टेकने बाध्य कर सका और न ही डोनाल्ड ट्रम्प का ईरान में सत्ता पलट का मंसूबा पूरा हो सका। बर्बादी के मुहाने पर होने के बावजूद ईरान  परमाणु कार्यक्रम बंद करने राजी नहीं है ओर न ही होर्मुज पर  किसी भी प्रकार की रियायत देने तैयार हुआ। ऐसे में इस बात की आशंका  है कि अमेरिका खिसियाहट में ऐसा कुछ करेगा जिससे ईरान हार मान ले। वहीं जवाब में ईरान भी कोई ऐसा कदम उठा सकता है जिसके कारण तेल उत्पादक देशों में तबाही आ जाए। इजराइल भी जिस प्रकार लेबनान की जमीन पर कब्जा करने में जुटा है वह भी इस जंग के जारी रहने का संकेत है। ऐसा लगता है ईरान , अमेरिका और इज़राइल युद्धविराम के बहाने मिले समय का उपयोग अपनी अगली रणनीति बनाने के लिए कर रहे हैं। इस्लामाबाद में इसीलिए न ईरान झुकने तैयार हुआ और न अमेरिका ने लचीलापन दिखाया। उधर इज़राइल ने युद्धविराम को ठेंगा दिखाते हुए जिस प्रकार लेबनान पर आग बरसाना जारी रखा उससे स्पष्ट हो गया कि वह  लड़ने पर उतारू है। अमेरिका का असली निशाना दरअसल चीन है। इसीलिए ट्रम्प ने  धमकी दे डाली कि ईरान को हथियार दिए तो  चीन पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया जाएगा। इस लिहाज से आने वाले कुछ दिन उत्सुकता भरे होंगे। देखना ये है कि ईरान होर्मुज को बंद रखने में कब तक सफल होता है क्योंकि उसके पास अब यही ब्रह्मास्त्र बचा है। लेकिन उससे आवागमन रोककर वह पूरी दुनिया से दुश्मनी लेने की गलती कर बैठा है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 13 April 2026

आशा भोसले के साथ एक युग विदा हो गया



कलाकार किसी समाज के सांस्कृतिक स्तर के प्रतीक होते हैं। हमारे देश में कला की सभी विधाओं को समुचित सम्मान मिलता रहा और कलाकार भी लोकप्रियता हासिल करते आए हैं। लेकिन उनमें से कुछ विरले होते हैं जिन्हें कला की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की विशेष कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है। ऐसी ही एक विलक्षण कला साधिका सुप्रसिद्ध पार्श्व गायिका आशा भोसले का गत दिवस 92 वर्ष की आयु में देहावसान हो गया। उनकी प्रारंभिक पहचान भारत कोकिला स्व. लता मंगेशकर की छोटी बहिन के तौर पर बनी किंतु जल्द ही उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर दीदी से अलग अपनी छवि बना ली।  कहा जाता है  दोनों के बीच अघोषित प्रतिस्पर्धा  थी किंतु लता जी की दिव्यता के बावजूद आशा जी ने अपनी विशिष्ट शैली से अपने लिए अलग जगह बनाई। जिस युग में फिल्म उद्योग के सभी दिग्गज संगीतकार और निर्माता लता मंगेशकर को अपरिहार्य मान बैठे थे और  प्रसिद्ध अभिनेत्रियां लता जी की आवाज के लिए ही आग्रह करती थीं तब ओ. पी. नैयर जैसे संगीतकार ने केवल आशा भोसले की आवाज का इस्तेमाल करने का दुस्साहस किया। नैयर साहब ने लता जी से मतभेद को लेकर  स्पष्ट किया था कि उनकी धुनों पर उनकी आवाज फिट नहीं बैठती। लता मंगेशकर के दबदबे वाले उस दौर  में किसी संगीतकार का वह बयान मामूली बात नहीं थी। लेकिन नैयर और आशा की जोड़ी ने  दर्जनों ऐसे गीत दिए जो दशकों बाद भी संगीत प्रेमियों को गुदगुदाते  हैं। उनके अलावा सचिनदेव बर्मन और जयदेव जैसे प्रयोग धर्मी  संगीत निर्देशकों ने भी आशा जी की आवाज में अनेक ऐसे गीतों का सृजन किया जो उनकी गायकी के उच्च स्तर का जीवंत प्रमाण बन गए। पेशेवर जिंदगी में दोनों बहिनों को स्थापित होने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। अनेक  संगीतकारों ने लता जी की आवाज को  बारीक बताकर उपेक्षित किया । वहीं स्व. दिलीप कुमार ने उनकी गायकी में मराठी लहजा होने की टिप्पणी की। इसी तरह आशा भोसले को रेकॉर्डिंग शुरू होने के बाद बीच में रोककर कह दिया गया कि वे पार्श्व गायन के लायक नहीं हैं। लेकिन कालान्तर में दोनों ने  आलोचकों को राय बदलने मजबूर करते हुए इतिहास रच दिया। लता जी ने तो घर नहीं बसाया किंतु आशा जी ने विवाह किया जो कि कड़वा अनुभव रहा। अपने तीन बच्चों के साथ पति से अलग होकर उन्होंने अपने परिवार और पेशे दोनों को संभाला और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। चढ़ती उम्र में उन्होंने राहुल देव बर्मन से भी विवाह रचाया किंतु उनकी भी जल्दी ही मृत्यु हो गई। बावजूद उसके उन्होंने आशा नहीं छोड़ी और नए - नए कीर्तिमान रच डाले। 12 हजार गीत गाने वाली आशा भोसले को पद्म भूषण के अलावा अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए किंतु लगभग सात दशकों तक संगीत प्रेमी श्रोताओं से उन्हें जो लोकप्रियता मिलती रही वह सबसे बड़ा सम्मान है। किसी कलाकार के लिए जीते जी किंवदंती बन जाना  असाधारणता का प्रमाण होता है। संयोग से लता और आशा नामक स्व. दीनानाथ मंगेशकर की दोनों बेटियों ने अपने जीवनकाल में ही भूतो न भविष्यति की उक्ति को सही साबित कर दिया। लता जी के बारे में तो ये बात हर कोई मान चुका था कि उन जैसा दूसरा पैदा नहीं होगा किंतु अब जबकि आशा भोसले स्मृतियों का हिस्सा बन चुकी हैं, ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि लता और आशा अपने आप में एक युग थीं जिसकी पुनरावृत्ति असंभव है। अपनी चुलबुली और खनकती आवाज के लिए विशिष्ट शैली के गीतों में एकाधिकार रखने वाली आशा जी के लिए उनकी दीदी ने भी माना था कि वैसे गीत गाना आशा के लिए ही संभव था। लेकिन उमराव जान फिल्म में संगीतकार खैयाम के निर्देशन में विशुद्ध शास्त्रीय संगीत में ढली ग़ज़लें गाकर आशा जी ने दिखा दिया कि उनकी कला को किसी सीमा में बांधा नहीं जा सकता । उसी के बाद ये कहा जाने लगा कि संगीतकारों ने लता जी के आकर्षण के चलते आशा जी का सही मूल्यांकन नहीं किया । नैयर साहब ने उनकी आवाज की खनक को गीतों में ढाला वहीं सचिन दा, जयदेव,राहुल देव और खैयाम ने आशा जी की छिपी प्रतिभा का लोकार्पण किया जो अन्यथा अछूती रह जाती। लता जी के अवसान के उपरांत आशा जी की उपस्थिति मंगेशकर युग का एहसास कराती थी किंतु अब वह भी नहीं रहा। लता जी की आवाज में जहां सागर जैसी अनंत गहराई थी वहीं आशा जी उसकी लहरों की चंचलता का प्रतीक थीं।
    उनका भौतिक शरीर भले ही भस्मीभूत हो गया किंतु जब तक गीत - संगीत रहेंगे तब तक आशा जी की दिव्य आवाज जीवंत रहेगी।
विनम्र श्रद्धांजलि।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 11 April 2026

शांति वार्ता नई अशांति का कारण बन सकती है



मध्यपूर्व में उत्पन्न संकट का समाधान ढूंढने अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे.डी वेंस और ईरान की संसद के अध्यक्ष सहित विदेश मंत्री पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में जमा  हैं। अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हमले के बाद ईरान ने जो पलटवार किया उसमें उन दोनों के अलावा  पड़ोसी देशों को भी लपेट लिया जिनमें अमेरिकी सैन्य अड्डे थे। एक माह से अधिक चली जंग के कारण पूरे विश्व में पेट्रोल - डीजल और गैस की किल्लत हो गई। मिसाइलों के जरिए तेल उत्पादक देशों में रिफाइनरीज को हुए नुकसान के कारण जहां उत्पादन घट गया वहीं ईरान द्वारा होर्मुज नामक समुद्री मार्ग को अपना हथियार बनाते हुए वहां से तेल लाने वाले मालवाहक जहाजों का आवागमन रोक दिया गया। इसकी वजह से खाड़ी देशों में सैकड़ों जहाज फंसकर रह गए। अमेरिका और इज़राइल सोच रहे थे कि ईरान ज्यादा से ज्यादा एक सप्ताह तक टिक सकेगा किंतु उनका आकलन गलत निकला। ईरान ने अपनी सैन्य क्षमता के बल पर अकेले ही अमेरिका और इज़राइल ही नहीं बल्कि सऊदी अरब , बहरीन , ओमान , कतर और यू.ए.ई आदि पर हमले कर डाले। हालांकि इस युद्ध में उसके राजनीतिक और सैन्य क्षेत्र के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े दर्जनों लोग मारे गए। साथ ही हजारों नागरिकों की मौत के अलावा पूरे देश का मूलभूत ढांचा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ। वहीं रक्षा उत्पादन इकाइयां और बिजली संयंत्र  भी नष्ट हुए। इसमें दो राय नहीं कि धीरे - धीरे उसकी लड़ने की क्षमता जवाब देती जा रही थी किंतु होर्मुज बंद होने के कारण विश्व जनमत का दबाव युद्ध रोकने के लिए बढ़ने लगा और अंततः दोनों पक्ष एक पखवाड़े के लिए युद्धविराम हेतु सहमत हो गए। प्रचारित किया गया कि ये सब पाकिस्तान की पहल पर हुआ किंतु जल्द ही स्पष्ट हो गया कि ये सब अमेरिका के इशारे पर हुआ जिसमें पर्दे के पीछे चीन की भी भूमिका रही। खैर, युद्धविराम तो हो गया किंतु उसकी शर्तों को लेकर दोनों पक्षों की ओर से किए जा रहे दावे विरोधाभासी हैं। इसका पहला उदाहरण इज़राइल द्वारा लेबनान पर हमले जारी रखने से मिला। जब ईरान ने इसे युद्धविराम का उल्लंघन बताया तब इजराइल और अमेरिका ने साफ कहा कि लेबनान इस युद्धविराम के दायरे से बाहर है। इस पर ईरान ने पाकिस्तान पर झूठ बोलने का आरोप लगाते हुए धमकी दे डाली कि वह इस्लामाबाद में प्रस्तावित शांति वार्ता में भाग नहीं लेगा। इसके साथ ही उसने होर्मुज को दोबारा बंद कर दिया। हालांकि आखिरकार उसका प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद पहुंच तो गया किंतु इजराइल द्वारा लेबनान पर आज भी हमले किए जाने से शांति वार्ता में व्यवधान की आशंका बनी हुई है। इसके अलावा अपने परमाणु कार्यक्रम को बंद करने जैसी शर्त भी उसे शायद ही मान्य होगी। होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क वसूलने की उसकी योजना भी गतिरोध की वजह बन सकती है । इस वार्ता के पहले पाकिस्तान के रक्षा मंत्री द्वारा इजराइल को लेकर की गई टिप्पणी से विवाद उत्पन्न हो गया था। इस्लामाबाद आने के पहले ही अमेरिका और ईरान के बीच जिस तरह से धमकियों का आदान - प्रदान होता रहा उसे देखते हुए बातचीत के दौरान वातावरण तनावपूर्ण रहने की पूरी - पूरी संभावना है। दोनों पक्ष युद्धविराम टूटते ही पहले से ज्यादा तेजी से हमले की धमकी दे रहे हैं। इस लड़ाई का मुख्य पक्ष सही मायनों में इजराइल है। उसको शांति वार्ता से दूर रखे जाने से युद्धविराम का भविष्य खतरे में है। मध्यपूर्व की असली समस्या इजराइल के अस्तित्व को मान्यता देने से जुड़ी हुई है। ईरान तो उसको नष्ट करने की बात खुलकर कहता है । और इसके लिए उसने हमास , हिजबुल्ला और हूती जैसे इस्लामी आतंकवादी संगठनों को पाल - पोस कर खड़ा कर दिया। हालांकि अरबी देशों में ज्यादातर ने इज़राइल से रिश्ते सुधार लिए हैं परन्तु ईरान , लेबनान और यमन आज भी उसके अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते। यदि किसी मजबूरी में अमेरिका और ईरान युद्धविराम को स्थायी रूप प्रदान करते हुए शांति स्थापित करने पर सहमत हो भी जाएं तब क्या इज़राइल अपनी सुरक्षा की गारंटी के बिना शान्त बैठेगा? ईरान लगातार कहता आया है कि उसे युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा चाहिए। लेकिन सवाल ये है कि नुकसान तो उन सभी का हुआ जो युद्ध में शामिल थे। और भी मुद्दे हैं जिन पर कोई सकारात्मक निर्णय होना संभव नहीं है। सबसे बड़ी बात ये है कि अमेरिका और ईरान दोनों को एक दूसरे पर विश्वास नहीं है। इसी तरह पाकिस्तान की अपनी विश्वसनीयता भी दो कौड़ी की है। इस बातचीत की पृष्ठभूमि तैयार करने वाले चीन के भी निहित स्वार्थ हैं। ये सब देखते हुए इस बातचीत से ज्यादा उम्मीदें करना बेकार है। बड़ी बात नहीं शांति वार्ता का अंत नए सिरे से अशांति उत्पन्न करने के तौर पर सामने आए।