Friday, 14 August 2026

भ्रष्टाचार के रहते खाद्य वस्तुओं में शुद्धता की उम्मीद करना बेकार


कुछ दिनों से  नकली पनीर और घटिया किस्म का घी पकड़े जाने की खबरें लगातार मिल रही हैं। चिंता तब  और बढ़ जाती है जब डी मार्ट जैसे नामी - गिरामी रिटेल स्टोर्स में गुणवत्ता विहीन खाद्य सामग्री बेची जा रही हो। पनीर के कुछ ब्रांड प्रतिबंधित भी हो रहे हैं। आजकल देश में क्विक डिलीवरी का व्यवसाय भी खूब चल पड़ा है जिसमें ब्लिंकिट नामक कंपनी काफी चर्चा में है जो ग्राहक द्वारा ऑर्डर की गई वस्तु चंद  मिनिटों में  ही उसके ठिकाने पर पहुंचा देती है , और किसी भी समय। इस कंपनी के अनेक भंडारों पर मारे गए छापों के बाद जो चित्र सार्वजनिक हुए वे डराने वाले हैं क्योंकि वहाँ भरपूर गंदगी के साथ कीड़े - मकोड़े घूमते मिले। अनेक खाद्य वस्तुओं की पैकिंग खुली पाई गई। सब्जी और फलों का रख - रखाव भी बेहद खराब तरीके का मिला। गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को सख़्त लहजे में चेतावनी दी कि देश में  खाद्य वस्तुओं के पैकेट पर सामने की तरफ चीनी, नमक और सैचुरेटेड फेट की मात्रा अंकित की जाए जिससे उपभोक्ता अंधेरे में न रहे। हालांकि अभी भी पैकेटबंद खाद्य वस्तुओं में उपयोग की जाने वाली सामग्री के नाम और मात्रा लिखने का नियम है किंतु बेहद बारीक अक्षरों में होने से उसे पढ़ना कठिन होता है। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को 15 दिनों की मोहलत देते हुए कहा है कि उसके बाद वह स्वयं आदेश पारित कर देगा।  इसलिए सरकारी मशीनरी हरकत में आयेगी ।  लेकिन सवाल ये है कि खाद्य वस्तुएँ बनाने वाली कंपनियों द्वारा पैकेट के ऊपर जो जानकारी दी जाएगी उसकी सत्यता की जांच कौन करेगा? ये बात इसलिए उठती है क्योंकि जिस सरकारी विभाग के पास इसका  जिम्मा है यदि वह ईमानदार होता तब खाद्य वस्तुओं में मिलावट और गुणवत्ता का अभाव जैसी समस्या ही उत्पन्न नहीं होती। जिन जांच लैब में खाद्य वस्तुओं के सैम्पल जाँच हेतु भेजे जाते हैं उनकी प्रामाणिकता भी संदेह के घेरे में है। इसीलिये अनेक बड़े नाम वाले ब्रांड की खाद्य वस्तुएँ गुणवत्ता के मानक पर खरी नहीं उतरने के बावजूद भी उनका बाल भी बांका नहीं होता। लेकिन छोटी हैसियत वाले  उत्पादक पर शिकंजा कसने की मुस्तैदी दिखाई देती है। विशेष रूप से त्यौहारों के अवसरों पर खाद्य विभाग का अमला शिकार पर निकलता है । दो - चार दिन छापेमारी होती है, सैंपल जांच हेतु भेजे जाते हैं, जिस स्थान पर खाद्य वस्तुओं का उत्पादन होता है वहाँ की गंदगी के चित्र प्रसारित करवाये जाते हैं , दूषित सामग्री की जप्ती कर उसे नष्ट किया जाता है, जुर्माना भी वसूला जाता है। लेकिन ये तमाशा ज्यादा दिन नहीं चल पाता। बदलती जीवनशैली, आर्थिक स्थिति में सुधार और  हैसियत के दिखावे के लिए आजकल पैकेट बंद खाद्य वस्तुओं का उपभोग बढ़ता जा रहा है। बिस्किट के साथ पैकेट बंद मिठाई, नमकीन का चलन भी जोरों पर । और अब तो  रोटी, पराठे, रेडी टु ईट सब्जियां आदि भी बाजार में उपलब्ध हैं। जूस, सॉस, जैम, जेली, अचार, आइसक्रीम, शेक, सॉफ्ट ड्रिंक्स , बेकरी उत्पाद जैसी दर्जनों चीजें बड़े पैमाने पर बन और बिक रही हैं। खाद्य तेलों का कारोबार भी फैलता जा रहा है। अर्थव्यवस्था की दृष्टि से देखें तो ये बेहद शुभ संकेत है। सरकार को टैक्स के साथ लोगों को रोजगार  भी मिलता है। लेकिन खाने - पीने की चीजों में होने वाली मिलावट और गुणवत्ता की कमी से उपभोक्ता का आर्थिक शोषण होने के साथ ही उसके स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर होता है। इसकी तुलना नकली या घटिया दवा बनाने और बेचने से करना गलत नहीं होगा। ये सवाल भी  उठ खड़ा होता है घटिया खाद्य सामग्री के उत्पादन को प्रारंभिक स्तर पर रोकने का प्रबंध क्यों नहीं होता? खाद्य विभाग मिठाई की गुणवत्ता की जाँच तो करता है किंतु उसमें उपयोग होने वाले वाले मावे या दूध की जाँच प्रारंभिक स्तर पर करने की कोई व्यवस्था नहीं है। ये सब देखते हुए कहा जा सकता है कि छापे मारकर  पनीर, घी , मिठाई आदि की जप्ती भी  कुछ दिन का तमाशा है। रही बात सर्वोच्च अदालत द्वारा दी गई हिदायत की तो वह भी सुनने में तो भले अच्छी लगे किंतु जब तक सरकारी तंत्र ईमानदार और संवेदनशील नहीं होगा तब तक किसी सुधार की उम्मीद करना व्यर्थ है। सही बात तो ये है कि भ्रष्टाचार और पैसे की असीमित भूख ने मानवीय संवेदनाओं को गहराई तक दफना दिया है। जिस देश में दवा के नाम पर ज़हर बिकता हो वहाँ खाद्य वस्तुओं की शुद्धता के दावे शपथपत्र देकर झूठ बोलने जैसा है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 13 August 2026

संसद के नहीं चलने से विपक्ष नुकसान में रहा



संसद अनिश्चित्काल के लिए स्थगित हो गई। दो - तीन विधेयक जरूर पारित हो गए किंतु जिन मुख्य विधेयकों को सरकार पारित करवाने के लिए प्रयासरत थी , वे लटक गए। विदेशी अनुदान  विधेयक तो सरकार ने जेपीसी को भेजने को फैसला कर लिया। रही बात परिसीमन विधेयक की तो अंदरूनी बात ये है कि विधेयक पारित करवाने के लिये कुछ सांसदों की कमी पड़ रही थी। इसके साथ ही द्रमुक का रवैया भी पूरी तरह आश्वस्त करने वाला नहीं था। एनडीए को समर्थन दे रही पार्टियों के भी कुछ सांसदों ने विदेशी अनुदान विधेयक को लेकर ऐतराज जताकर सत्ता पक्ष के कान खड़े कर दिये। इसीलिये सरकार ने चतुराई दिखाते हुए विधेयक को जेपीसी के हवाले कर सुरक्षित रास्ता चुना। जहाँ तक इस सत्र से राजनीतिक नफे - नुकसान की बात है तो इसमें दो राय नहीं हैं कि पहले दिन से ही सरकार दबाव में आ गई। कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले संसद भवन घेरने जा रहे आंदोलनकारियों पर पुलिस द्वारा किये गए बल प्रयोग को लेकर बनी परिस्थितियों में धर्मेंद्र प्रधान के  त्यागपत्र के अलावा आंदोलनकारियों की बाकी मांगें भी सरकार को माननी पडीं। इसका संदेश ये गया कि 12 सालों में पहली बार प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी को झुकना पड़ा। हालांकि भूमि अधिगृहण और कृषि कानून जैसे मुद्दों पर भी श्री मोदी ने अपने कदम पीछे खींचे थे। लेकिन जंतर मंतर के आंदोलन को जेन जी से जोड़कर भविष्य की राजनीति का प्रतीक चिन्ह  बताये जाने से समूचा राजनीतिक विमर्श नया रूप ले बैठा। लेकिन सरकार ने इसमें भी एक चाल ये चली कि उसने विपक्ष द्वारा नीट परीक्षा पेपर लीक के बाद से उठाई जा रही मांगों को मानने के बजाय कॉकरोच जनता पार्टी के साथ समझौता किया। राहुल गाँधी की खीझ का कारण भी यही था क्योंकि वे पहले से ही इस मुद्दे पर सरकार को घेर रहे थे ।  लेकिन अपनी आदतानुसार लम्बी विदेश यात्रा पर चले गए और उसी दौरान कॉकरोच जनता पार्टी मैदान में कूदकर पूरा श्रेय बटोर ले गई। उसी के बाद संसद को न चलने देने का दाँव चला गया। और छात्रों पर हुए बल प्रयोग को बहाना बनाकर गृह मंत्री अमित शाह को निशाना बनाया जाने लगा। लेकिन श्री शाह भी इस खेल को भांप गए जिसके कारण श्री गाँधी हवा में लट्ठ चलाते रहे। लोकसभा में छात्रों पर हुए बल प्रयोग को लेकर चर्चा यदि होती तब श्री शाह को नेता प्रतिपक्ष सहित बाकी विपक्षी नेता घेर सकते थे किंतु श्री गाँधी ने पैलेट गन के उपयोग का आदेश किसने दिया जैसे सवाल के नाम पर सदन नहीं चलने दिया। श्री शाह की सदन में अनुपस्थिति को उनके डर का प्रतीक बताकर उनका उपहास भी किया गया। लेकिन  सत्ता पक्ष ने विपक्ष के सामने शर्त रख दी कि गृह मंत्री सभी सवालों का जवाब सदन में देंगे बशर्ते उन्हें सुना जाए। श्री शाह ने तो अध्यक्ष को पत्र लिखकर चर्चा का समय तय करने का आग्रह तक कर डाला किंतु श्री गाँधी ने सत्ता पक्ष के प्रस्ताव को ये कहकर ठुकरा दिया कि उन्हें श्री शाह का भाषण नहीं सुनना। लंबे समय से लोकसभा में रहने के बाद भी श्री गाँधी इतनी सी बात नहीं समझ सके कि संसद का सत्र चलते समय किसी मंत्री से पूछे गए प्रश्न का उत्तर सदन में ही दिया जाता है। यदि लोकसभा में चर्चा होती तब बतौर नेता प्रतिपक्ष श्री गाँधी के पास श्री शाह को घेरने का समुचित अवसर होता। पूरा देश उस चर्चा को देखता और सुनता। लेकिन हमेशा की तरह अपनी बचकानी जिद के चलते उन्होंने खुद तो मौका गंवाया ही अन्य विपक्षी दलों को भी अपनी बात रखने से वंचित कर दिया। उदाहरण के लिए समाजवादी पार्टी राम मन्दिर चंदे की चोरी पर चर्चा चाह रही थी किंतु राहुल ने सदन चलने नहीं दिया। अब चूंकि सत्रावसान हो चुका है तब ये विश्लेषण करें कि क्या खोया क्या पाया तो सत्ता पक्ष निश्चित रूप से दबाव में रहा लेकिन संसद के मंच का फ़ायदा उठाना तो विपक्ष की प्राथमिकता होनी चाहिए। सही बात ये है कि कांग्रेस लगभग हर सत्र में कोई न कोई नया मुद्दा पकड़कर सत्र का समय तो बर्बाद करती ही है, अपने विचार रखने का मौका भी गँवा देती है। आज यदि श्री गाँधी से पूछा जाए कि इस सत्र के दौरान सदन में उनकी क्या गतिविधि रही तब उनके पास बताने के लिए क्या है ? उनके इस रवैये से उनकी पार्टी को भी नुकसान हो रहा है क्योंकि सदन बाधित रहने से उसके सांसद भी अपने मुद्दे नहीं उठा पाए। उधर सरकार को ये कहने का अवसर मिल गया कि विदेशी अनुदान संशोधन विधेयक से घबराकर काँग्रेस ने सदन नहीं चलने दिया और बाकी विपक्षी पार्टियाँ उसके चक्कर में फंसी रह गईं। दिल्ली में छात्रों पर हुए पुलिसिया बल प्रयोग पर हाय -  तौबा मचाने वाले नेता प्रतिपक्ष रांची के छात्रों की पुलिस द्वारा की गई पिटाई के बाद उनके आँसू पोंछने क्यों नहीं गए इसका  जवाब भी उन्हें देना चाहिए। वैसे अब वे किसी नये मुद्दे की तलाश करेंगे जैसा अब तक करते आये हैं। और बड़ी बात नहीं इसके लिए उन्हें फिर गोपनीय विदेश यात्रा पर जाना पड़े ? 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 12 August 2026

जनता संसद में दिए अच्छे भाषण ही याद रखती है, हंगामे नहीं



संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को समाप्त हो जाएगा। सरकार इसमें एफ.सी.आर ए और परिसीमन  विधेयक पारित करवाना चाहती थी किंतु विपक्ष द्वारा उत्पन्न गतिरोध  के कारण  दोनों सदनों में कामकाज नहीं हो पाने से  लग रहा है कि  उनका पारित होना तभी संभव है जब सरकार हंगामे के बीच ही उन्हें पेश करे और फिर बिना बहस के संसद की मुहर लगवा ले। ये चर्चा भी है कि इस सत्र में उक्त विधेयक पारित नहीं हो सके तो संसद का विशेष सत्र   बुलाकर सरकार इन्हें पारित करवाने का प्रयास करेगी। लेकिन इस सबसे अलग हटकर चिंता का सबसे बड़ा कारण संसद में कामकाज का न होना है जिसकी वजह से लोकतंत्र के इस मन्दिर के प्रति जनमानस की श्रृद्धा लगातार कम हो रही है। इस सत्र की शुरुआत वाले दिन ही  संसद भवन घेरने निकले छात्रों पर पुलिस के बल प्रयोग को मुद्दा बनाकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने सरकार पर हमला शुरू कर दिया। हालांकि धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र के बाद जंतर मंतर आंदोलन  तो खत्म हो गया किंतु राहुल गृह मंत्री अमित शाह की घेराबंदी में जुट गए। उनके वक्तव्य की मांग को लेकर सरकार और विपक्ष में जो रस्साकशी शुरू हुई वह लगातार जारी है। रोजाना सदन की बैठक शुरू होते ही विपक्ष द्वारा  हंगामा किये जाने पर सदन दोपहर तक स्थगित हो जाता है और दोपहर बाद फिर वही कहानी दोहरा दी जाती है। उल्लेखनीय है अनेक सांसद सदन के भीतर होहल्ला कर कार्यवाही बाधित करने के बाद बाहर भी नारेबाजी करते हैं जिससे समाचार माध्यमों में उनके नाम और तस्वीर आ जाए। गौरतलब है कि सदन के संचालन पर प्रति मिनिट ढाई लाख रुपये खर्च होते हैं। उस लिहाज से इस सत्र  पर अब तक 110 करोड़ रु. खर्च हो चुके हैं। किसी सांसद के सदन में प्रवेश करते ही उसका दैनिक भत्ता पक्का हो जाता है , चाहे वह तुरंत बाहर आ जाए। ऐसे दर्जनों सांसद हैं जो इसी सुविधा का लाभ लेते हैं। हालांकि सरकार ने शोर - शराबे के बावजूद दो - तीन विधेयक पारित करवा लिए लेकिन एफ.सी.आर ए और परिसीमन जैसे बेहद महत्वपूर्ण विधेयक लंबित ही हैं। अब सवाल ये है कि संसद को ठप रखने के लिए कौन जिम्मेदार है? विपक्ष लगभग हर सत्र में किसी एक मुद्दे को पकड़कर सदन  की कार्यवाही नहीं चलने देता। दूसरी तरफ सरकार भी उसके आगे झुकने को अपनी शान के विरुद्ध मानती है। इस खींचातानी में छोटी पार्टियों की आवाज तो अनसुनी रहती ही है, बड़ी पार्टियों के सांसद भी अपने क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर बोलने से वंचित रह जाते हैं। सांसदों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर तैयार करने पर भी काफी समय एवं धन खर्च होता है। सदन नहीं चलने पर उनके जो जवाब तैयार किये जाते हैं वे दस्तावेजों तक ही सीमित रह जाते हैं। यदि प्रश्नकाल ठीक से चले तब प्रश्नकर्ता सदस्य  पूरक प्रश्न भी पूछ सकता है। संसद में होने वाली चर्चा का सीधा प्रसारण होने से देश -  विदेश  में उसे देखा सुना जाता है। लेकिन सदन नहीं चलने से सांसदों के जरिये संसद और जनता के बीच का  सम्वाद अवरुद्ध हो जाता है। हालांकि ये समस्या हमारी संसदीय प्रणाली का स्थायी हिस्सा बन चुकी है। विपक्ष कहता है कि सदन चलाना सरकार की जिम्मेदारी है किंतु उसे भी इस प्रश्न का जवाब देना चाहिये कि किसी एक मुद्दे पर अड़कर पूरे सत्र को बर्बाद करने में कौन सी बुद्धिमत्ता और बहादुरी है ? ऐसा लगता है नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी के सलाहकार उन्हें अच्छी सलाह से वंचित रखते हैं। वरना उन्हें बताया जाता कि जनता विपक्ष के नेता द्वारा सदन में दिये गए भाषण याद रखती है न कि सदन में हुए हँगामों को । भाजपा और कांग्रेस के अलावा अन्य  नेताओं द्वारा दशकों पूर्व संसद में दिये कुछ भाषण यू ट्यूब आज भी इसलिए सुने जाते हैं क्योंकि उनमें उनका दृष्टिकोण और  लोकतंत्र के प्रति  दायित्व बोध प्रकट होता है। इसी तरह सत्ता पक्ष की भी ये जिम्मेदारी है कि वह विवाद को एक सीमा के आगे न बढ़ने दे। जिस तरह धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र होते ही जंतर मंतर आंदोलन की हवा निकल गई वैसे ही थोड़ा सा लचीलापन गतिरोध को दूर कर सकता है। सत्ता और विपक्ष में मतभेद कोई अनोखी बात नहीं है। संसदीय लोकतंत्र इससे मजबूत ही होता है। लेकिन वर्तमान माहौल देखकर लगता है कि मतभेद दुश्मनी में बदल चुके हैं। हो सकता है इसके चलते कुछ नेताओं का अहं संतुष्ट होता हो किंतु जनता और देश का नुकसान हो रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 11 August 2026

वरना आंदोलन का अर्थ संसद और विधानसभा में घुसना ही हो जाएगा




कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा दिल्ली के जंतर मंतर पर  तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग को लेकर किये गए आंदोलन ने उस समय गंभीर मोड़ ले लिया जब 20 जुलाई को आंदोलनकारियों ने संसद भवन को घेरने की कोशिश की। जब भीड़ अनियंत्रित होकर पुलिस पर  हमला करने के साथ ही सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ पर उतारू हो गई तब  लाठी चार्ज, पानी की बौछारें और अश्रु गैस का उपयोग कर उन्हें रोका गया।  अंततः श्री प्रधान के त्यागपत्र के साथ ही , आत्महत्या किये छात्रों के परिजनों को मुआवजा तथा आंदोलनकारियों पर दर्ज सभी अपराधिक प्रकरण वापस लेने का समझौता सरकार और कॉकरोच जनता पार्टी के बीच हुआ। उसके बाद आंदोलन तो समाप्त हो गया किंतु पहली बार किसी आंदोलन में गंदी गालियाँ और अश्लील  नारेबाजी सुनाई दी। जो पोस्टर लहराए गए उन्हें देखकर पूरा देश शर्मिंदा हुआ सिवाय उनके जिन्हें उनमें युवा आक्रोश दिखा। कुछ लेखकों और पत्रकारों को उन अश्लील गालियों, नारेबाजी और पोस्टरों में क्रांति के दर्शन भी होने लगे। लेकिन इसी बीच पंजाब और कर्नाटक से पेपर लीक होने की खबरें आने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी नेताओं से वहाँ जाकर आंदोलन करने के बारे में पूछा गया तो वे कन्नी काट गए। इसी तरह जंतर मंतर आंदोलन की अघोषित प्रायोजक आम आदमी पार्टी ने पंजाब पर चुप्पी साधे रखी तो दिल्ली में छात्रों पर हुए बल प्रयोग को मुद्दा बनाकर संसद को नहीं चलने दे रहे राहुल गाँधी ने कर्नाटक के पेपर लीक को सिरे से उपेक्षित कर दिया। लेकिन तभी झारखंड की राजधानी रांची में छात्रों का आंदोलन शुरू हो गया। उसके पीछे भी शिक्षा से जुड़े अनेक मुद्दे थे। लेकिन वह आंदोलन पूरी तरह शांत और व्यवस्थित चल रहा था। न कोई अश्लील नारेबाजी और न गाली -  गलौच। आंदोलन स्थल पर अनुशासन और शालीनता बनाये रखी गई। दिल्ली से भेजे गए जे.एन.यू के ढपली बाजों ने माहौल में गंदगी फैलाने का षडयंत्र रचा तो उन्हें उल्टे पाँव लौटा दिया गया। लेकिन जंतर मंतर आंदोलन के समर्थन में आगे आकर कूदने वालों को रांची के छात्रों में जेन जी नहीं दिखे । जब झारखंड की कांग्रेस समर्थित सरकार ने छात्रों की मांगों को पूरा नहीं किया तब गत दिवस उन्होंने विधानसभा घेरने का ऐलान किया। जिसके बाद विधानसभा का बचाव करने लाठीचार्ज, पानी की बौछार, अश्रु गैस आदि का सहारा पुलिस ने लिया।  दर्जनों आंदोलनकारी  घायल होकर अस्पताल पहुँच गए। तोड़फोड़ और पत्थरबाजी छात्रों की तरफ से भी हुई। संक्षेप में कहें तो दिल्ली के घटनाक्रम की पुनरावृत्ति ही हुई। जैसे ही ये खबर फैली राजनीतिक बिरादरी के उस हिस्से में सन्नाटा छा गया जो दिल्ली की घटना पर आसमान सिर पर उठाये घूम रहा था। राहुल गाँधी ने सोशल मीडिया पर  बल प्रयोग की निंदा करते हुए छात्रों से बात करने की समझाईश तो दे डाली किंतु झारखंड सरकार के विरुद्ध एक शब्द नहीं कहा। उल्लेखनीय है वहाँ शिक्षा विभाग का जिम्मा खुद मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन के पास है और उनकी सरकार कांग्रेस के समर्थन पर टिकी हुई है। कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को युवा क्रांति का सूत्रपात मानने वाले बुद्धिजीवी, चरण चुंबन करने वाले यू ट्यूबर् और ढपली बाज जे.एन.यू वाले भी दाएं - बाएं हो रहे हैं क्योंकि रांची में पिटने वाले हालांकि  जेन जी ही थे किंतु पीटने वाली सरकार  कांग्रेसी बैसाखी पर टिकी है ।  लिहाजा उससे इस्तीफा मांगने की औपचारिकता तक नहीं निभाई गई। यही दोमुँहापन तमाम समस्याओं की जड़ है। धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र पर दुनिया झुकती है झुकाने वाला चाहिए जैसी डींग हांकने वाले काक्रोचियों के नेता कहां दुबके हैं किसी को नहीं पता। लेकिन इससे हटकर देखें तो जंतर मंतर पर एकत्र युवाओं की बेहूदा हरकतों और आपत्तिजनक आचरण को युवा आक्रोश के नाम पर औचित्य पूर्ण ठहराया जाना गलत परिपाटी को जन्म दे गया। गत रात्रि पुण्य प्रसून वाजपेयी बड़े खुश होकर कह रहे थे कि जेन जी का डर खत्म हो गया है। यदि वे संसद और विधानसभा में घुस गए तब सरकारों का क्या होगा? योगेंद्र यादव तो मुद्दों का हल संसद की बजाय सड़कों पर होने जैसी शेखी बघारते सुने जा चुके हैं। सवाल ये है कि जंतर मंतर के जेन जी सही थे तब रांची वालों को गलत नहीं ठहराया जा सकता। और जब दोनों को सही मानना राजनेताओं की मजबूरी है तब देश में आंदोलन का अर्थ संसद और विधानसभा में घुसकर उत्पात मचाना ही रह जाएगा और इस तथाकथित निडरता का शिकार सभी पार्टियाँ और उनके नेता होंगे क्योंकि विभिन्न राज्यों में अन्य दलों की सत्ता है। ऐसे में जेन जी की आड़ में अराजकता को प्रोत्साहित करने का गंदा खेल बन्द होना चाहिए वरना जो होगा उसकी कल्पना ही डरा देती है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 10 August 2026

पूरे जेन जी को गोलबंद करना संभव नहीं



हाल ही में हुए जंतर मंतर आंदोलन के बाद ये अवधारणा तेजी से प्रचारित करवाई जा रही है कि निकट भविष्य में होने वाले चुनावों में जेन जी मतदाता नतीजों को प्रभावित करेंगे। अनेक विश्लेषकों के अनुसार युवा मतदाताओं का थोड़ा सा झुकाव भी उलटफेर करने वाला होगा। इसके साथ ही ये बात भी फैलाई जा रही है कि जेन जी धर्म और जाति जैसे मुद्दों से प्रभावित हुए बिना अपना निर्णय करेंगे। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि  युवाओं का एक वर्ग अब राजनीति के स्थापित तौर - तरीकों से प्रभावित नहीं होता। इसीलिये परिवार के वरिष्ट सदस्यों और युवाओं की  सोच में भिन्नता बढ़ रही है। किसी दल के प्रति लगाव  रखने वाले युवा भी पार्टी की रीति - नीति पसंद न आने पर आलोचनात्मक टिप्पणी करने में भी  नहीं हिचकते। ये बात भी सही है कि 2014 के लोकसभा चुनाव से ही युवा वर्ग नरेंद्र मोदी के प्रति आकर्षित रहा है। आयु में 20 वर्ष छोटे होने पर भी राहुल गाँधी युवाओं के बीच उतनी पैठ नहीं बना सके जो उन्हें सत्ता तक  पहुंचा सके। इसीलिये वे इस वर्ग को लुभाने के लिए भरसक प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। बीते सप्ताह प्रयागराज में भी उन्होंने सार्वजनिक रूप से युवाओं से संवाद किया। उसके पहले भी वे अन्य शहरों में ऐसे आयोजन कर चुके थे। लेकिन जंतर मंतर पर जेन जी आंदोलन का नेतृत्व पूरी तरह नये चेहरों के पास होने से दिल्ली में होते हुए भी वे उससे अलग - थलग पड़ गए। और प्रधानमंत्री निवास पर नाटकीय तरीके से धरना देकर सुर्खियों में आये। गौर करने वाली बात ये है कि उस आंदोलन की संयोजक कॉकरोच जनता पार्टी ने भी श्री गाँधी को कोई महत्व नहीं दिया। उस आंदोलन पर जेएनयू के वामपंथी छात्र संगठनों ने अतिक्रमण कर लिया जिससे उसकी कोई  दिशा तय नहीं हो सकी। कॉकरोच जनता पार्टी के कर्ता धर्ता भी इस घालमेल को समझ गए और राजनीतिक पार्टी बनाने के बजाय दबाव समूह के तौर पर काम करने का ऐलान कर दिया। लेकिन उनके द्वारा रास्वसंघ और भाजपा के विरुद्ध ज़हर उगलने से ये साबित हो गया कि वे पूर्वाग्रहों से ग्रसित है जिसके इरादे अभी भी गोपनीय हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो अभिजित दिपके दिल्ली से उठकर रांची  में झारखंड सरकार के विरुद्ध आंदोलन कर रहे छात्रों के साथ खड़े होते किंतु दूर से ही जुबानी समर्थन के बाद घर बैठ गए। युवाओं के सबसे बड़े हितैषी बने राहुल ने भी रांची जाने से परहेज किया क्योंकि झारखंड सरकार को इंडिया गठबंधन का समर्थन है। वामपंथी छात्र संगठनों के कुछ नेता जरूर पहुंचे किंतु रांची आंदोलन से जुड़े छात्रों ने उनकी देश विरोधी नारेबाजी के कारण उनको उल्टे पाँव लौटा दिया। इससे एक बात स्पष्ट हो गई कि जेन जी को एक सांचे में ढालने वाले मुगालते में हैं। इसका दूसरा उदाहरण मिला प्रयागराज में जहाँ का मंच चूंकि श्री गाँधी ने सजाया इसलिए उ.प्र. के सत्ता संघर्ष में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही समाजवादी पार्टी ने उससे दूरी बनाई। इन सबसे एक बात सिद्ध हो रही है कि जेन जी को किसी एक खूंटे से बांधने के प्रयास सफल नहीं होंगे और विविधता भरे इस देश में उनकी पसंद - नापसंद का अंदाज तात्कालिक मुद्दों के आधार पर नहीं लगाया जा सकता। कल को अखिलेश यादव भी लखनऊ या अन्य किसी शहर में युवाओं का जमावड़ा करें तब क्या ये मान लिया जाएगा कि सारे जेन जी उनके पक्ष में जुड़ गए। कुल मिलाकर युवा असन्तोष को कोई एक स्वरूप देना बेहद कठिन है । एक दो आंदोलनों से पूरे देश की युवाशक्ति का मिजाज भांपकर निष्कर्ष निकालना भी जंतर मंतर और प्रयागराज आंदोलन की तरह प्रायोजित ही कहा जाएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि जंतर मंतर पर मनुवाद और ब्राह्मणवाद विरोधी जो नारेबाजी हुई उससे युवाओं के एक वर्ग में नाराजगी  है। कोई कुछ भी कहे किंतु हमारे देश में चुनावी रणनीति जातीय समीकरणों से ही प्रभावित होती है। अखिलेश यादव  पीडीए  (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक ) का दामन नहीं छोड़ सकते तो अन्य जातीय जेन जी उनका समर्थन क्यों करेंगे? इसी तरह श्री गाँधी भी जातीय मुद्दे में उलझने के कारण सभी युवाओं को एकजुट नहीं कर पा रहे। जिस तरह हिन्दू हित की बात करने वाली भाजपा  को पूरे हिन्दू समाज का समर्थन नहीं मिलता वैसे ही पूरे जेन जी को राजनीतिक रूप से गोलबंद करने की बात सोचना युवाओं की वैचारिक स्वतंत्रता पर संदेह करने जैसा है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 8 August 2026

दलित सिखों में बढ़ते ईसाईकरण से पंजाब की राजनीति में नये समीकरण बनेंगे



पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। इसके दो संकेत बीते दिनों दिल्ली में देखने मिले। पहला किसानों द्वारा पाँच साल पहले दिल्ली में दिये धरने की पुनरावृत्ति और दूसरा जंतर मंतर पर हुआ आंदोलन। पहली मुहिम को तो सरकार ने समझा - बुझाकर ठण्डा कर दिया लेकिन जंतर मंतर आंदोलन लम्बा खिंचा जिसकी राष्ट्रव्यापी चर्चा भी हुई। ये सवाल उठना लाजमी है कि उक्त दोनों का पंजाब चुनाव से क्या संबंध है तो इसका जवाब है किसानों के दिल्ली में जमावड़े के पीछे भी पंजाब लॉबी थी और इसी तरह जंतर मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी के धरने में आम आदमी पार्टी द्वारा सामने आकर सक्रियता दिखाने के पीछे भी पंजाब चुनाव ही है । असल में दिल्ली की सत्ता गँवाने के बाद अरविंद केजरीवाल भी एक बार सुर्खियों में आने के लिए प्रयासरत थे। शुरू में कॉकरोच जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी की जुगलबंदी लोगों को अटपटी लगी परंतु जल्दी ही ये सच्चाई  उजागर हो गई कि दोनों का डी. एन.एक ही है। कॉकरोच जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं द्वारा आम आदमी पार्टी से पुराने जुड़ाव को भी स्वीकार किया गया । जिस तरह से केजरीवाल, मनीष सिसौदिया, संजय सिंह और आतिशी ने जंतर मंतर पर नियमित उपस्थिति दर्ज करवाई उसके बाद रहा - सहा संदेह भी मिट गया। और जब आंदोलन समाप्त होने पर कॉकरोच जनता पार्टी के एक प्रमुख नेता से पूछा गया कि पेपर तो पंजाब में भी लीक हुआ तो क्या जंतर मंतर जैसा आंदोलन भगवंत सिंह मान सरकार के विरुद्ध भी किया जाएगा, तब वे उसका जबाब देने से बचे जिससे जाहिर हो गया कि इस पार्टी और आम आदमी पार्टी के बीच रणनीतिक भागीदारी है। इसी ने  राहुल गाँधी को जंतर मंतर पर आने से रोका और जिससे हुए राजनीतिक नुकसान की भरपाई के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री निवास पर धरने का आयोजन किया। गत दिवस कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी ये स्वीकार किया कि  छात्रों की समस्या को कांग्रेस और राहुल ने पहले ही उठाया था किंतु उसे अपेक्षित जनसमर्थन क्यों नहीं मिला इसके लिए पार्टी को जनता की नब्ज समझने की जरूरत है। कांग्रेस भी पंजाब के आगामी चुनाव के लिए कमर कस रही है लेकिन कुछ साल पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू की लड़ाई ने जिस प्रकार उसका भट्टा बिठाया वही इस बार पूर्व मुख्यमंत्री  चरणजीत सिंह चन्नी द्वारा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग के नेतृत्व को अस्वीकार करने की घोषणा से दोहराई जा रही है। आम आदमी पार्टी की प्रदेश सरकार वैसे तो काफी अलोकप्रिय हो चुकी है लेकिन सक्षम विकल्प सामने नहीं आने से उसे मैदान खाली नजर आने लगा। कांग्रेस की दुविधा ये है कि पंजाब में उसके भीतरी संग्राम के कारण बचा -  खुचा जनाधार भी खिसकने का खतरा है। और फिर वह किसी अन्य पार्टी से गठजोड़ करने की स्थिति में भी नहीं है। संयोग से यही विडंबना भाजपा के साथ भी है। सिखों के बीच वह आज भी समुचित पैठ नहीं बना सकी। हालांकि राज्य में 39 फीसदी हिंदू भी हैं किंतु वे मुख्य रूप से शहरों में ही हैं और उनका एक हिस्सा कांग्रेस के साथ भी है। भाजपा ने पहले कोशिश की कि अन्य राज्यों जैसे ही पंजाब में भी हिंदुओं का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में कर ले। खालिस्तानी आंतक में वृद्धि से इसकी संभावना बढ़ी भी लेकिन पार्टी के पास ऐसा कोई दमदार नेता नहीं है जो हिंदुओं को गोलबंद कर सके। हालांकि आम आदमी पार्टी से आये आधा दर्जन सांसद  उसके  मददगार हैं किंतु वे प. बंगाल जैसा उलटफेर करने का माद्दा नहीं रखते। इसीलिये पार्टी ने अपने पुराने साथी शिरोमणि अकाली दल की तरफ हाथ बढ़ा दिया जिसका प्रमाण सुखबीर सिंह बादल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात से मिल गया। इन दोनों का गठबंधन  अतीत में राज्य की सत्ता भी चला चुका है किंतु 3 कृषि कानूनों को लेकर दोनों दूर हुए और 2022 में अलग - अलग लड़कर नुकसान उठाया। शायद दोनों समझ चुके  हैं कि एक बार फिर एक साथ आने से वे पंजाब की राजनीतिक मुख्यधारा में लौट सकेंगे। हालांकि प्रकाश सिंह बादल की मृत्यु के बाद अकाली दल की वह ताकत नहीं रही और सिख नेतृत्व भी खेमों में बंट चुका है। बढ़ती नशाखोरी और   सीमावर्ती ग्रामीण जिलों में दलित सिखों के तेजी से हो रहा ईसाईकरण भी नये समीकरणों को जन्म दे रहा है। ऐसे में अकाली - भाजपा गठजोड यदि मजबूती से उतरा और दोनों के बीच पुराना भरोसा कायम हुआ तब वे आम आदमी पार्टी के लिए चुनौती बन सकते हैं। फ़िलहाल तो पंजाब के बारे में सियासी भविष्यवाणी  करना जल्दबाजी होगी। 


Friday, 7 August 2026

आरक्षण सामाजिक उत्थान का आधार बने न कि जातिगत विद्वेष का



रास्वसंघ के सरसंघचालक डाॅ. मोहन भागवत अपने पूर्ववर्ती संघ प्रमुखों की तुलना में ज्यादा मुखर हैं। इसका एक कारण ये भी है कि एक सदी की सफल यात्रा कर चुका संघ सामाजिक  जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करवा चुका है। इसीलिये उसका आकर्षण और असर दोनों में वृद्धि हो रही है। देश के प्रत्येक भाग में संघ कार्य  संचालित है। कुछ लोग इसका कारण  देश के बड़े हिस्से में भाजपा का शासन होना भी मानते हैं किंतु इसका दूसरा पहलू ये भी है कि जहाँ संघ कार्य का विस्तार हुआ वहीं भाजपा भी मजबूत हुई। खैर, ये अलग विषय है। ताजा प्रसंग है डाॅ. भागवत द्वारा गत दिवस जेन जी से किया गया संवाद। उस दौरान उन्होंने विभिन्न समकालीन विषयों पर खुलकर अपने विचार प्रस्तुत किये । जेन जी की प्रशंसा करने के साथ ही उनके गुस्से को जायज मानते हुए उन्होंने एक बार फिर दोहराया कि हम इस उम्र में बड़ों की बात बिना विरोध किये मान लेते थे किंतु आज का युवा सवाल पूछता है और हमें उसका जवाब देना चाहिए। संघ  , चूंकि समाज के बीच कार्य करता है लिहाजा पीढी़गत परिवर्तनों पर उसकी नजर रहती है। इसीलिये संघ प्रमुख समय - समय पर उनके बारे में सार्वजनिक तौर पर अपनी बात रखते हैं जिसे संघ का अधिकृत दृष्टिकोण माना जाता है। उनके अनेक बयान विवादास्पद भी हुए। मसलन 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान आरक्षण की समीक्षा संबंधी उनकी टिप्पणी को लालू प्रसाद यादव ने चुनावी मुद्दा बना दिया जिसका असर भाजपा की पराजय के रूप में सामने आया। उसके बाद डाॅ.भागवत इस संवेदनशील विषय पर बोलते हुए सावधानी बरतने लगे । गत दिवस भी उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि जब तक भेदभाव है आरक्षण जारी रहेगा। लेकिन उसी के साथ ये भी जोड़ दिया कि जो लोग आरक्षण से लाभान्वित हो चुके हों उन्हें खुद होकर इस सुविधा को छोड़ देना चाहिये। दूसरे शब्दों में कहें तो उनका संकेत उसी क्रीमी लेयर की ओर था जिसके विरोध में आरक्षित वर्ग के भीतर से ही आवाज उठने लगी है। हालांकि ओबीसी श्रेणी में संपन्न वर्ग आरक्षण की परिधि से बाहर है किंतु अनु. जाति और जनजाति पर क्रीमी लेयर जैसी कोई बंदिश नहीं होने से उनमें आरक्षण का लाभ पीढी़ दर पीढी़ चला आ रहा है। संयोग से गत दिवस ही सर्वोच्च न्यायालय में क्रीमी लेयर को आरक्षण से वंचित करने संबंधी याचिका पर अपने जवाब में  केंद्र सरकार ने दो टूक कह दिया कि अनु. जाति और जनजाति पर क्रीमी लेयर की व्यवस्था लागू नहीं की जा सकती क्योंकि उसका अधिकार केवल संसद को ही है। स्मरणीय है कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय के कुछ न्यायाधीशों ने ही ये सवाल उठाया था कि पति - पत्नी दोनों आई.ए.एस हों तो  उनके बच्चों को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए ? उनका ये भी कहना था कि शिक्षा और आर्थिक प्रगति से सामाजिक स्थिति बेहतर होने के बाद अगली पीढी़ को आरक्षण देने की आवश्यकता पर विचार हो। लेकिन शायद ही कोई होगा जिसने स्वप्रेरित होकर ये कहते हुए आरक्षण छोड़ा हो कि उसके बच्चों को इसकी जरूरत नहीं। रही बात संघ प्रमुख द्वारा की गई अपेक्षा की तो ये तभी संभव है जब संघ परिवार से ही इसकी शुरुवात हो। आरक्षण का प्रावधान संविधान में रखते हुए डाॅ. अंबेडकर ने भी जाति विहीन समाज की बात की थी। उनका कहना था कि  जब तक समाज में छुआछूत और असमानता खत्म नहीं होती, तब तक पिछड़ों और शोषितों को सुरक्षा और प्रतिनिधित्व  मिलना चाहिए। संघ प्रमुख ने भी विषमता रहने तक इसकी आवश्यकता जताई। ऐसे में  क्रीमी लेयर अर्थात आरक्षण की मदद से शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से ऊपर उठ चुके लोगों द्वारा स्वेच्छा से आरक्षण छोड़ने जैसी मुहिम यदि संघ परिवार से जुड़े संगठनों के सदस्यों से शुरू हो तो वह भी किसी सामाजिक क्रांति से कम नहीं होगी। डाॅ. अंबेडकर ने भी आरक्षण को बैसाखी मानने से बचने की बात कहते हुए शिक्षित होने की बात कही थी। दलित  विमर्श में भी ये बात सुनने मिलती है कि आरक्षण दर्द की दवा मात्र है, बीमारी का इलाज नहीं। ये बात इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि जो दलित बच्चा विद्यालय ही नहीं जायेगा उसे भविष्य में आरक्षण का लाभ कहाँ से मिलेगा? ये देखते हुए भागवत जी ने बात छेड़ ही दी है तो  अब इसे आगे भी बढ़ाना चाहिए जिससे आरक्षण सामाजिक उत्थान का आधार बने न कि जातिगत विद्वेष का। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 6 August 2026

कॉकरोच जनता पार्टी लंबी रेस का घोड़ा नहीं



कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने गत दिवस कहा कि वे राजनीतिक दल नहीं बनाएंगे    क्योंकि राजनीतिक दल से अधिक जरूरत दबाव समूह की है जो जनहित के मुद्दों को उठा सके। महाराष्ट्र के संभाजीनगर में  पार्टी के कोर ग्रुप की बैठक के अवसर पर उन्होंने उक्त ऐलान किया।  इसके पीछे की सोच उजागर करते हुए उन्होंने कहा कि कॉकरोच जनता पार्टी चूंकि भावी आंदोलनों में अन्य दलों तथा संगठनों का सहयोग चाहती है लिहाजा उसने खुद राजनीतिक दल बनने से परहेज किया। उल्लेखनीय है जंतर - मंतर पर किये गए आंदोलन में कॉकरोच जनता पार्टी  को आम आदमी पार्टी ने खुलकर समर्थन दिया वहीं जेएनयू  के अनेक वामपंथी संगठनों ने भी सक्रिय हिस्सा लिया। इसके बाद अभिजीत और उनके प्रमुख सहयोगियों के आम आदमी पार्टी से पुराने संबंध होने की बात सामने आने लगी। कहा तो यहाँ तक गया कि ये पार्टी दरअसल अरविंद केजरीवाल ने ही बनवाई है जिसके जरिये  सरकार के विरुद्ध माहौल बनाया जा सके। केजरीवाल का सोचना ये था कि उनके बैनर तले बाकी पार्टियां आने में संकोच करेंगी। उनकी योजना उस लिहाज से सफल कही जाएगी क्योंकि जंतर मंतर पर हुए आंदोलन में राजनीतिक दलों के अलावा गैर राजनीतिक तबका भी शामिल हुआ। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी को राजनीतिक दल में नहीं बदलने के फैसले के पीछे केवल यही कारण नहीं है। सही बात तो ये है कि जंतर मंतर वाला आंदोलन जितना विख्यात हुआ उतना ही कुख्यात भी।  आखिरी दौर में तो अभिजीत और उनकी कोर टीम के हाथ से उसका नियंत्रण निकल चुका था जिससे वह गम्भीरता खोने लगा। उनकी समझ में एक बात और आ गई कि केजरीवाल के पीछे अन्ना हजारे के आंदोलन की पुण्याई थी जबकि कॉकरोच जनता पार्टी इस मामले में खाली हाथ है। और ये भी कि केजरीवाल आम आदमी पार्टी बनाने के पहले से ही अपने एन .जी.ओ के कारण दिल्ली में समाज के निचले स्तर में पैठ बना चुके थे। उनके साथ सिविल सोसाइटी की अनेक विख्यात हस्तियां जुड़ी होने से  पहिचान का संकट नहीं था। इसके विपरीत अभिजीत और उनके दाएं - बाएं हाथ कहे जाने वाले कतिपय लोगों की आम जनता में न कोई छवि है और न ही साख। उल्टे जंतर मंतर पर हुई गाली - गलौच के कारण उनका दामन दागदार हो गया। ऊपर से आंदोलन की समाप्ति पर आलीशान होटल में जश्न मनाते हुए पार्टी  नेताओं के वीडियो सार्वजनिक होने के बाद बजाय शर्मिंदगी महसूस करने के जेन जी के नाम पर उसका बचाव करने से भी समाज के बड़े वर्ग में उनके बारे में नकारात्मक अवधारणा स्थापित हो गई। धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र होते ही जिस जल्दबाजी में अभिजीत एंड कंपनी ने अपना बोरिया - बिस्तर समेटा उससे उनकी ईमानदारी और लंबी लड़ाई लड़ने की क्षमता पर भी संदेह पैदा होने लगा। सरकार द्वारा  जो लिखित आश्वासन दिये जाने थे वे न मिलने पर देशव्यापी आंदोलन की धमकी भी फुस्स साबित हुई। जो जानकारी आ रही है उसके मुताबिक दिल्ली पुलिस ने अनेक ऐसे लोगों पर शिकंजा कस दिया है जिन्होंने  आंदोलन के दौरान पुलिस पर घातक हमले किये और सरकारी वाहनों को नुकसान पहुंचाया। अनेक के पास हथियार होने का मामला भी जाँच में है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपराधिक तत्वों पर कार्रवाई की छूट दे दी। आंदोलन के बाद कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं से जब पंजाब और कर्नाटक में हुए पेपर लीक पर वहाँ के शिक्षा मंत्री को हटाये जाने की मांग करने और आंदोलन करने के बारे में पूछा गया तो वे बगलें झांकने लगे। झारखंड में चल रहे छात्रों के आंदोलन को जुबानी समर्थन देने से आगे पार्टी नहीं बढ़ पा रही है।  ये देखते हुए उन आशंकाओं को बल मिल रहा है कि सोशल मीडिया पर पैदा हुई कॉकरोच जनता पार्टी लंबी रेस का घोड़ा नहीं है। हालांकि राजनीति में न जाने की बात अन्ना आंदोलन के बाद अरविंद केजरीवाल ने भी कही थी किंतु वह दौर अलग था। इसीलिये कॉकरोच जनता पार्टी को किसी भी पार्टी ने भाव नहीं दिया। जंतर मंतर आंदोलन की आधी - अधूरी सफलता के बाद अब उसके सामने कोई स्पष्ट लक्ष्य नजर नहीं आ रहा। सही बात ये है कि खुद केजरीवाल ही अभिजीत की महत्वाकांक्षाओं के मार्ग में सबसे बड़े रोड़ा हैं। रही बात दबाव समूह बनने की तो अभिजीत और उनके साथी ये भूल रहे हैं कि काठ की हांडी बार - बार आग पर नहीं चढ़ती। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 5 August 2026

ताकि दतिया और बाँकीपुर जैसी शर्मिंदगी आगे न झेलना पड़े



म.प्र की दतिया विधानसभा सीट पर भाजपा की पराजय का मुख्य कारण पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्र की टिकिट कटना माना जा रहा है। 2023 में वे यहाँ से पराजित हो गए थे। लेकिन जीते हुए कांग्रेस विधायक का चुनाव निरस्त हो जाने के बाद जब उपचुनाव की स्थिति बनी तब श्री मिश्रा जोर - शोर से   सक्रिय हो गए क्योंकि उन्हें पूरी उम्मीद थी कि पार्टी उन्हीं को उम्मीवारी सौंपेगी । लेकिन सबको चौंकाते हुए पार्टी नेतृत्व ने उनकी जगह किसी अन्य को प्रत्याशी बना दिया। और वह भी ये कहते हुए कि ऐसा आंतरिक सर्वे के आधार पर किया गया। इस फैसले से नाराज नरोत्तम समर्थकों ने दतिया में खूब उपद्रव मचाया। हालाँकि मान - मनौव्वल के बाद ऊपरी तौर पर तो सब शांत हो गया और श्री मिश्रा अपने गुट के साथ चुनाव प्रचार में दिखने लगे लेकिन जो नुकसान होना था वह तो हो ही चुका था। रही - सही कसर पूरी कर दी आजाद समाज पार्टी के दामोदर यादव ने जो 22 हजार वोट ले गए। इनमें यादव समाज के भी हजारों मत माने जा रहे हैं  जिनके बारे में भाजपा आश्वस्त थी कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के प्रभाव के चलते उनके सजातीय मत उसके खाते में ही जाएंगे। चुनाव प्रचार में भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी। सत्ता और संगठन दोनों मोर्चे पर डटे रहे किंतु निराशा हाथ लगी। उसके बाद गत दिवस पार्टी ने अनुशासन का चाबुक चलाया। जिला संगठन की समस्त इकाइयों को भंग कर दिया गया। कैडर आधारित पार्टी में इस तरह की कार्रवाई नई बात नहीं है किंतु भाजपा में इस बात पर मंथन होना चाहिए कि क्या वह पहले जैसी प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं वाली पार्टी ही है जो गुटबाजी से मुक्त थी। कुशाभाऊ ठाकरे, प्यारेलाल खंडेलवाल, नारायण प्रसाद गुप्ता (सभी दिवंगत) और उन जैसे समर्पित अनेक संगठनकर्ता अब नहीं दिखाई देते । एक जमाना था जब संगठन मंत्री की कार्यप्रणाली केवल पार्टी के हित में होती थी। साधारण कार्यकर्ताओं और बड़े नेताओं के बीच संपर्क और संवाद निरंतर बना रहता था। लेकिन आज वह गुजरे जमाने की बात हो चुकी है। जो संगठन मंत्री पार्टी में गुटबाजी दूर करने नियुक्त होते थे वे खुद भी गुटीय राजनीति में लिप्त हैं। उन पर वे सभी आरोप लगने लगे हैं जिनके लिए राजनीतिक नेता बदनाम होते हैं। नब्बे के दशक में लालकृष्ण आडवाणी ने भाजपा को पार्टी विथ डिफरेंस (औरों से  भिन्न)  बताकर एक बड़े वर्ग में उसके लिए आकर्षण उत्पन्न किया था। लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि भले ही भाजपा ने चुनावी सफलता के कीर्तिमान स्थापित करते हुए केंद्र और तमाम राज्यों की सत्ता हासिल कर ली किंतु  इस आपाधापी में उसकी संगठनात्मक कसावट कुछ कमजोर हुई है। यही वजह है कि उसमें ऐसे लोग आते जा रहे हैं जिनका उद्देश्य सत्ता से जुड़े लाभ हासिल करना मात्र है। दतिया ही क्यों बिहार की बाँकीपुर सीट से आ रही जानकारी से भी इसी बात की पुष्टि हो रही है कि पार्टी को हरवाने में उसी के लोग आगे रहे। जब भी ऐसा होता है अनुशासन का डण्डा घूमता है। लेकिन अगला चुनाव आते तक सारे निलम्बन और बर्खास्तगी रद्द हो जाती है। यही वजह है कि अपने अहं की संतुष्टि के लिए पार्टी के विरुद्ध काम करने वालों के मन में कोई खौफ नहीं बचा। जहाँ तक बात पार्टी के ग्राफ की है तो ये निःसंकोच स्वीकार करना पड़ेगा कि आज वह सफलता के उच्चतम शिखर पर है। लगातार तीसरी बार केंद्र में सत्ता पर कब्जा करना साधारण बात नहीं है। देश के अनेक प्रमुख राज्यों में उसकी  सरकारें हैं। किसी जमाने में उत्तर भारत और सवर्णों की पार्टी के तौर पर जानी जाने वाली भाजपा अब हर दृष्टि से राष्ट्रीय पार्टी की हैसियत में है। उसकी मारक क्षमता में हुई वृद्धि आश्चर्यचकित करती है। नीतिगत मोर्चे पर उसने अपने समर्थक वर्ग को काफी हद तक संतुष्ट भी किया है। पूर्वोत्तर जैसे अछूते इलाकों में भी वह मुख्य धारा की पार्टी बन गई है। लेकिन इस विस्तार के लिए जो समझौते और गठबंधन उसे करना पड़े वे उन लोगों को पसंद नहीं आ रहे जो पार्टी की जड़ों से जुड़े हैं। हालांकि ये भी मानना पड़ेगा कि आज की स्थिति में फिलहाल भाजपा का कोई विकल्प राष्ट्रीय स्तर पर नजर नहीं आ रहा। इसलिए ये जरूरी है कि वह अपने भीतर घुस आई  उन बुराइयों को प्राथमिकता के आधार पर दूर करे जिनके चलते समय - समय पर दतिया और बाँकीपुर जैसी शर्मिंदगी उसे झेलनी पड़ जाती है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 4 August 2026

भाजपा के लिए चेतावनी भी और चुनौती भी



कल दोपहर से राजनीति में रुचि रखने वालों  का ध्यान तीन राज्यों में हुए विधानसभा उपचुनावों के परिणामों ओर केंद्रित हो गया। हालांकि गुजरात के  नतीजे को ज्यादा महत्व नहीं मिला जबकि भाजपा ने बड़े अंतर से उस सीट पर कब्जा बनाये रखा। लेकिन बिहार की बाँकीपुर और म.प्र की दतिया सीट के परिणामों ने सुबह से ही राजनीतिक नेताओं  के अलावा समाचार माध्यमों को भी व्यस्त कर दिया। इसका कारण दोनों जगहों पर भाजपा को पराजय मिलना बना। चूंकि  तीनों राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं इसलिये नतीजों का विश्लेषण उसी के इर्द - गिर्द घूम रहा है।  बीते कुछ महीनों से देश में भाजपा विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध में  मुहिम चलाई जा रही है इसीलिये  गुजरात में कांग्रेस की हार को चर्चा योग्य नहीं माना गया जबकि दतिया तथा बाँकीपुर में भाजपा की पराजय  सुर्खियां बटोर ले गई। ये स्वाभाविक भी था क्योंकि भले ही दतिया की सीट 2023 में भी कांग्रेस ने जीती थी किंतु  प्रदेश में बहुमत वाली सरकार और सभी  लोकसभा सीटों पर कब्जे के बाद भी दतिया में बड़ी हार भाजपा के लिए विचारणीय भी है और चिंतनीय भी। हालांकि शिवराज सिंह चौहान की सरकार के समय दमोह के  विधानसभा उपचुनाव में  भाजपा को इससे भी बड़ी हार देखने मिली थी। हुआ यूँ कि कांग्रेस विधायक ने भाजपा में आने पर त्यागपत्र दिया तब उपचुनाव में पार्टी ने उनको मैदान में उतार दिया। इससे दमोह के कद्दावर नेता जयंत मलैया नाराज हो गए और फिर वही सब हुआ जिसकी पुनरावृत्ति दतिया में देखने मिली। यद्यपि उसके बाद  2023 में भाजपा ने शिवराज के नेतृत्व में धमाकेदार जीत अर्जित कर सरकार बनाई और लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया। कहने का आशय ये है कि दतिया में भाजपा की हार को कांग्रेस सत्ता में वापसी मानकर आश्वस्त हो जाए तो वह मुगालते में रहेगी क्योंकि इस नतीजे के पीछे  नरोत्तम मिश्रा को टिकिट नहीं मिलने से उत्पन्न आंतरिक कलह भी कारण बनी और दूसरा भाजपा में हार की समीक्षा कर भविष्य के लिए सावधान रहने की जो क्षमता है वह कांग्रेस की खुशी को स्थायी रहने देगी इसमें संदेह है। हालांकि प्रदेश कांग्रेस  की कमान जिन युवाओं के हाथ है उनके लिए जरूर ये जश्न मनाने का अवसर है क्योंकि  ये साबित हो गया कि पार्टी बिना कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के भी चलाई जा सकती है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और मुख्यमंत्री मोहन यादव के लिए इस हार से संगठन और सरकार को उबारना बड़ी चुनौती होगी क्योंकि नरोत्तम की पीढ़ी के जो नेता अपने भविष्य के प्रति चिन्तित हो उठे थे उन्हें  संजीवनी मिल गई है। लेकिन कल आये तीन परिणामों में बिहार की बाँकीपुर सीट अचानक राष्ट्रीय राजनीति में चर्चित हो उठी क्योंकि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन वहाँ से पाँच बार विधायक रहे।  राज्यसभा के लिए चुने जाने पर उन्होंने उससे इस्तीफा दे दिया। उनके पिता भी वहीं से विधायक बनते रहे। इसलिये भाजपा वहाँ  अति आत्मविश्वास से भरी हुई थी। लेकिन पहले तो उसने जिसे टिकिट दी वह पीछे हट गया और दूसरा प्रत्याशी उतारे जाने पर जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने मैदान में उतरकर सबको चौंका दिया। विधानसभा चुनाव में जनसुराज की दुर्गति  के आधार पर भाजपा और तेजस्वी यादव की आरजेडी प्रशांत को हलके में लेने की गलती कर बैठे। नीतीश कुमार को हटाकर सम्राट चौधरी की ताजपोशी करवाकर भाजपा ने बिहार की गद्दी तो हासिल कर ली किंतु नीतीश समर्थक उस निर्णय को पचा नहीं  सके थे। और फिर एक ब्राह्मण युवक का एनकाउंटर भाजपा के प्रतिबद्ध सवर्ण मतदाताओं की नाराजगी की वजह बन गया। यही वजह रही कि राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट पर भी पार्टी संगठन अपने मतदाताओं को मतदान केंद्र तक नहीं ला सका। लेकिन उसका लाभ बजाय तेजस्वी के प्रत्याशी को मिलने के प्रशांत को मिलने से ये बात उजागर हो गई कि बिहार में लालू की राजनीतिक विरासत खत्म होने को है। हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि प्रशांत किशोर वहाँ वैकल्पिक राजनीति के ध्वजवाहक बन जायेंगे किंतु  उनका उदय लालू ब्रांड राजनीति को हाशिये में धकेलने का कारण तो बन ही सकता है। कुछ लोग इन परिणामों को जेन जी आंदोलन से जोड़ रहे हैं जो निरर्थक है क्योंकि उपचुनाव सदैव स्थानीय मुद्दों से प्रभावित होते हैं। वरना गुजरात में भी भाजपा को हार का सामना करना पड़ता। बावजूद इसके म.प्र  और बिहार में मिली पराजय भाजपा के लिए चेतावनी भी है और चुनौती भी क्योंकि इससे उसके विरोधियों का उत्साहवर्धन तो हुआ ही है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 3 August 2026

मानसून की चेतावनी को गंभीरता से लिया जाए



अगस्त महीने की शुरुआत तक म.प्र में मानसून की आधी बारिश हो जाती थी। लेकिन इस साल एक चौथाई से भी कम बरसात होने से न केवल किसान अपितु व्यापारी और सामान्य जन भी परेशान हैं। सरकार के माथे पर भी पसीना छलछलाने लगा है। कई जिलों में धान की बोनी बरसात के अभाव में बेकार चली गई। भूजल स्तर नीचे जाने से सिंचाई हेतु लगाए गए पंप आदि भी जवाब देने लगे हैं। गर्मियों में पीने के पानी की जो किल्लत हुई वह बरसात के मौसम में भी जारी रहने से आगामी गर्मियों में क्या होगा इसकी चिंता स्थानीय निकायों को सताने लगी है। अच्छे मानसून से हमारे देश में व्यापार भी फलता - फूलता है जिस पर आर्थिक विकास की इमारत  खड़ी होती है। बढ़ते शहरीकरण के बाद भी भारतीय बाजारों में रौनक ग्रामीण भारत के बल पर ही आती है। चिंता का सबसे बड़ा कारण ये है कि वर्षा कम होने से खरीफ फसल तो खराब होगी ही जमीन सूखी होने से अगली रबी फसल पर भी इसका असर पड़े बिना नहीं रहेगा। फसलें खराब होने से खाद्यान्न का अभाव होगा जिसका परिणाम महंगाई के रूप में देखने मिलेगा। हालांकि ज्योतिष शास्त्र के जानकारों का कहना है कि सनातनी मान्यताओं के अनुसार इस वर्ष अधिक मास ( पुरुषोत्तम मास) होने से सावन की शुरुआत भी देर से हुई लिहाजा मानसून का दौर भी देर तक चलेगा। यदि ऐसा होता है तब भी गनीमत है किंतु उस स्थिति में भी धान सहित इस मौसम की फसलें खराब होने से किसानों को भारी नुकसान होना तय है। लेकिन सावन और भादों में भी मानसून रूठा रहा तब पीने के पानी के साथ ही बिजली का संकट भी उत्पन्न हुए बिना नहीं रहेगा क्योंकि प्रदेश के जितने भी बड़े बांध हैं उनमें जलभराव की स्थिति बेहद चिंताजनक है। बांध खाली रहने से पनबिजली उत्पादन तो घटेगा ही, नहरों से होने वाली सिंचाई में भी कमी आयेगी। लंबे अरसे बाद ये हालात उत्पन्न हुए हैं जब म.प्र का बड़ा हिस्सा कमजोर मानसून का शिकार हो रहा है। वरना बरसात का आंकड़ा कुछ जिलों में कम तो कुछ में ज्यादा होने से औसत बराबर हो जाया करता था। लेकिन इस साल अब तक जो स्थिति देखने मिल रही है उसके मुताबिक प्रदेश का बड़ा हिस्सा मानसून की बेरुखी झेलने मजबूर है। नदियों का मायका कहे जाने वाले इस राज्य में अनेक बड़े बांध भी हैं। उनमें होने वाले जल भंडारण से म.प्र ही नहीं बल्कि गुजरात और महाराष्ट्र के हित भी जुड़े हुए  है। इसलिये शासन - प्रशासन को अभी से आपदा प्रबंधन की योजना बना लेनी चाहिए। इस स्थिति में वर्षा जल संचयन ( वाटर हार्वेस्टिंग) अभियान की उपेक्षा भी उभरकर आ रही है। घरों सहित सरकारी भवनों की छतों पर वर्षा जल को बेकार नालियों में बहने देने के बजाय निकटवर्ती नलकूप से जोड़ देने से उसका भूजल स्तर गर्मियों में भी बना रहता है। इसके अलावा छतों से आने वाले बरसाती पानी को एक गड्ढे ( सोक पिट) के जरिये जमीन के नीचे भेज देने से भी आस  - पास का भूजल स्तर बरकरार रहने से अल्प वृष्टि के समय जल संकट से निपटना आसान हो जाता है। वर्षा जल संचयन बेहद महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है जिसे पूरा करने की जिम्मेदारी मूलतः स्थानीय निकायों की है। कम से कम नये बनने वाले भवनों में तो इसे अनिवार्य किया ही जा सकता है। नये भवनों का नक्शा स्वीकृत करने में भी वर्षा जल संचयन की व्यवस्था अनिवार्य रूप से किये जाने के निर्देश होते हैं। लेकिन इस बारे में  ध्यान  नहीं दिये जाने से ये योजना केवल कागजों और आंकड़ों तक ही सीमित है। उम्मीद की जानी चाहिए कि देर से ही सही किंतु अंततोगत्वा इंद्र देव प्रसन्न होकर पर्याप्त वर्षा करवा देंगे जिससे प्रदेश को जल संकट से राहत मिलने के साथ ही किसानों की चिंता दूर हो सकेगी। लेकिन ऐसे अवसरों पर आपदा प्रबंधन के साथ ही आपदा को अवसर बनाने  की सूझबूझ भी दिखानी चाहिए। इसके लिए जरूरी है मानसून के भरोसे हाथ पर हाथ रखकर बैठने के बजाय भविष्य में आने वाले संकट से निपटने के पुख्ता इंतजाम समय रहते किये जाएं। पानी की बरबादी रोकने के अलावा उसके संचयन की प्रणाली को जन अभियान बनाकर लागू किया जाना चाहिए। मानसून ने इस वर्ष जो चेतावनी दी है उससे सावधान होकर भविष्य में आने वाले संकट के लिए प्रदेश को तैयार रहना चाहिए। शासन और प्रशासन के साथ ही जनता को भी ये याद रखना चाहिए कि जल ही जीवन है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 1 August 2026

सनातन धर्म के अपमान का विरोध जरूरी वरना तनाव बढ़ेगा



कांग्रेस सांसद प्रियंका वाड्रा ने लोकसभा में पेपर लीक रोकने सम्बन्धी विधेयक पर चर्चा करते हुए व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि सरकार की बनाई नई कमेटी में एक्स- आई.बी चीफ, आई. टी कंपनी के मालिक और गोमूत्र के विशेषज्ञ हैं। गोमूत्र विशेषज्ञ को शिक्षा के बारे में क्या पता होगा? उनके इतना कहते ही कांग्रेस सांसदों ने ठहाके लगाकर सरकार का उपहास किया। लेकिन प्रियंका का कटाक्ष  उन्हीं के गले पड़ गया। गोमूत्र विशेषज्ञ के रूप में जिस व्यक्ति पर श्रीमती वाड्रा ने तंज कसा उनका नाम वी. कामकोटि है जो वर्तमान में आई.आई.टी ,  मद्रास में निदेशक हैं। दरअसल 2025 में उनके एक वीडियो में  दावा किया गया था कि गोमूत्र के एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुण से अनेक बीमारियां ठीक होती हैं। उनके दावे का आधार विभिन्न साइंस जर्नल में प्रकाशित शोध पत्र थे। उल्लेखनीय है श्री कामकोटि कंप्यूटर साइंस में डॉक्टरेट हैं और इसी विषय के विशेषज्ञ भी। उन पर किये गए कटाक्ष पर देश के 215 शिक्षाविदों ने श्रीमती वाड्रा को पत्र लिखकर कहा कि किसी शिक्षाविद् पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी करते वक्त तथ्य और उस व्यक्ति की गरिमा का ध्यान रखा जाना चाहिए। मतभेद हो सकते हैं, लेकिन किसी का मजाक उड़ाना सही नहीं। हमें उस बयान पर निराशा है, जिसमें आपने प्रोफे. कामकोटि को गोमूत्र विशेषज्ञ कहा। यह टिप्पणी चाहे व्यंग्य के रूप में की हो, राजनीतिक बयानबाजी के तहत, गलत है। विवाद और बढ़े उसके पूर्व ही कांग्रेस के वरिष्ट नेता रहे स्व. ऑस्कर फर्नांडीज द्वारा राज्यसभा में दिये पुराने भाषण का वीडियो प्रसारित होने लगा जिसमें उन्होंने  मेरठ के पास एक आश्रम के ड्राइवर का संस्मरण साझा करते हुए बताया था कि गोमूत्र के सेवन से उसका गंभीर कैंसर ठीक हो गया था। इसके अलावा स्व.फर्नांडीज ने यह भी बताया कि घुटनों के गंभीर दर्द के बावजूद, डॉक्टरों की सर्जरी सलाह को ठुकराकर उन्होंने वज्रासन और योग अपनाए, जिससे उन्हें पूरा लाभ मिला। शिक्षाविदों के पत्र और सोनिया गाँधी के निकटस्थ रहे स्व. फर्नांडीज के उल्लिखित भाषण के बाद अब श्रीमती वाड्रा सवालों के घेरे में आ गईं हैं। उन्होंने प्रोफ़े.कामकोटि को गोमूत्र विशेषज्ञ कहकर उनका मजाक उड़ाते हुए सवाल उठाया कि उन्हें शिक्षा के बारे में क्या पता? उनकी ये टिप्पणी साबित कर गई कि उनमें गंभीरता का अभाव है। हालांकि उनके बारे में ये अवधारणा बनने लगी थी कि अपने भाई राहुल गाँधी की तुलना में वे ज्यादा परिपक्व हैं। लोकसभा में उनके भाषण श्री गाँधी से बेहतर माने गए। उसी कारण  कतिपय विश्लेषक उनमें कांग्रेस का भविष्य देखने लगे थे। लेकिन प्रोफ़े. कामकोटि की  शैक्षणिक पृष्ठभूमि और पेशेवर दक्षता जाने बिना उन्हें  गोमूत्र विशेषज्ञ बताकर उनकी हंसी उड़ाकर उन्होंने उन संभावनाओं को धूमिल कर दिया। अब तक उन्होंने स्व. फर्नांडीज का संदर्भित भाषण पढ़ लिया होगा। तो क्या वे उनके उस भाषण का भी ऐसा ही मजाक उड़ाएंगी? उससे भी बड़ा प्रश्न ये है कि सनातन धर्म से जुड़ी बातों का ही मजाक उड़ाया जाता है। चाहे प्रियंका हों या कोई और वे सभी हिंदुओं की परंपराओं और प्रतीकों के बारे में जिस दबंगी से बोल जाते हैं यदि ऐसा ही वे किसी अन्य धर्म के बारे में बोलने का दुस्साहस करें तब उनकी क्या फजीहत होगी ये बताने की आवश्यकता नहीं है। योग, आयुर्वेद , ज्योतिष आदि को दकियानूसी बताकर उनका मजाक उड़ाना फैशन बन गया है। गोमूत्र और गोबर को लेकर भी स्तरहीन बातें की जाती हैं। आश्चर्य ये है कि ऐसा सब कहने वाले अपने को प्रगतिशील बताते नहीं थकते। लेकिन वे भूल जाते हैं कि इन्हीं सब विषयों पर उन देशों में शोध हो रहे हैं जो विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी माने जाते हैं। हाल ही में राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने मनु स्मृति को लेकर आधारहीन और अनर्गल प्रलाप किया। ऐसा लगता है सनातन धर्म में जो सहनशीलता है उसका बेजा फ़ायदा उठाने का दुस्साहस बढ़ता जा रहा है। महज राजनीतिक स्वार्थ के लिए देश के बहुसंख्यक समाज की भावनाओं का अपमान करने के इस चलन का विरोध होना जरूरी है वरना देश का साम्प्रदायिक सद्भाव खतरे में पड़ जाएगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी




Friday, 31 July 2026

आज के जमाने में मनु स्मृति का जिक्र औचित्यहीन



मल्लिकार्जुन खरगे देश के वरिष्ट राजनेताओं में से हैं।  कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के साथ ही वे राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष भी हैं। । मूलतः कर्नाटक के  खरगे जी दलित समुदाय से आते हैं। अपने गृह राज्य के मुख्यमंत्री बनने के लिए उन्होंने काफी हाथ - पैर मारे किंतु पार्टी हायकमान ने उन्हें उपकृत न करते हुए उनके  पुत्र प्रियांक को राज्य में मंत्री बनवा दिया जिन्होंने तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री स्टालिन के बेटे उदयनिधि द्वारा सनातन की तुलना डेंगू और मलेरिया से करते हुए उसे समाप्त करने जैसी बात का खुलकर समर्थन किया था। समय - समय पर मल्लिकार्जुन जी भी अपने दलित होने का एहसास करवाना नहीं भूलते। ताजा प्रमाण राज्यसभा में उनके द्वारा मनु स्मृति का उल्लेख करते हुए लगाये गए आरोप हैं। जब सत्ता पक्ष के साथ ही सदन के सभापति ने उनसे आरोपों को प्रमाणित करने कहा तब वे शांत हो गए। दरअसल मनु स्मृति और मनुवाद ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें लेकर दलित समुदाय के मन में सवर्णों के प्रति विद्वेष भरा जाता है। मायावती और चंद्रशेखर आजाद जैसे नेता भी इन्हें बतौर औजार उपयोग करते रहते हैं। इनके अलावा जे.एन.यू की ढपलीबाज टुकड़े - टुकड़े गैंग भी मनुवाद से आजादी के नारे लगाया करती है। दिल्ली के जंतर मंतर  पर संपन्न काॅकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में भी मनुवाद के साथ ही ब्राह्मण वाद के विरोध में नारेबाजी सुनाई दी। पार्टी के जन्मदाता अभिजीत दिपके भी अपने दलित होने का उल्लेख करते हुए डाॅ. अंबेडकर का पोस्टर लहराते देखे गए। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि आरक्षण की श्रेणी में आने वाले राजनेताओं द्वारा अपने समुदाय का भयादोहन करने के लिए मनु स्मृति और मनुवाद के विरोध का ढोल पीटा जाता है। जबकि 21 वीं सदी के भारतीय समाज में 10 फीसदी सवर्ण हिंदुओं को भी मनु स्मृति के बारे में लेशमात्र जानकारी नहीं होगी। यदि  दलित नेता और दलित समुदाय से जुड़े साहित्यकार  मनु स्मृति का जिक्र न करें तब कुछ वर्षों बाद शायद यह लोगों की स्मृति से ही वह विलुप्त हो जाएगी। और फिर जिस मनु स्मृति  के आधार पर दलित राजनीति के पुरोधा ब्राह्मण वाद को कोसते हैं उसका जो अनुवाद वर्तमान में प्रचलित है उसकी प्रामाणिकता ही संदिग्ध है। सवर्ण वर्ग कभी भी अपने बचाव हेतु मनु स्मृति का उपयोग नहीं करता । भारत की सामाजिक व्यवस्था संबंधी किसी भी कानूनी विवाद में मनु स्मृति को आधार अथवा संदर्भ ग्रंथ नहीं माना जाता। ऐसे में खरगे जी और उन जैसे अन्य दलित नेता अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए मनु स्मृति के बहाने जो जातिगत विद्वेष फैलाते हैं उससे दलितों का कोई लाभ नहीं होता। दलितों के कल्याण के प्रति उनकी चिंता वाजिब है लेकिन मनु स्मृति के बहाने गैर दलित जातियों के बारे में अनावश्यक प्रलाप करने वाले कांग्रेस अध्यक्ष उस समय क्यों शांत रहे जब कांग्रेस के सबसे ताकतवर नेता राहुल गाँधी ने सवर्ण समुदाय को कांग्रेस के पक्ष में लाने के लिए खुद को जनेऊ धारी सारस्वत ब्राह्मण  प्रचारित करवाया। इसके बाद वे अनेक मंदिर और मठों में कर्मकांड करते दिखाये गए। मानसरोवर की यात्रा कर शिव भक्त होने का दावा भी किया। यद्यपि उसका कोई राजनीतिक लाभ नहीं होने के बाद श्री गाँधी को ब्राह्मण साबित करने की मुहिम ठंडी पड़ गई और बीते कुछ सालों से वे जातिगत जन गणना और जिसकी जितनी भागीदारी उसकी उतनी हिस्सेदारी का मुद्दा पकड़कर बैठ गए। खरगे जी ने मनु स्मृति के नाम पर दलितों को शिक्षा से रोके जाने का जो  आरोप लगाया उसका कोई प्रमाण वे नहीं दे सके। सही बात ये है कि आज  आरक्षण के विरोध में जो आवाजें उठ रही हैं उनका कारण श्री खरगे और उन जैसे कुछ दलित नेता ही हैं जिनकी अनावश्यक और अप्रासंगिक टिप्पणियों से सामाजिक समरसता को क्षति पहुंचती है। आजादी के आठ दशक बाद भी  यदि दलित समुदाय आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्तर पर दौड़ में पीछे है तो फिर आरक्षण की उपयोगिता और सार्थकता पर दलितों के बीच ही विमर्श होना चाहिए। सवाल ये भी है कि दलित नेताओं की संतानें तो आगे बढ़ जाती हैं तो आम दलित क्यों नहींं? कर्नाटक में कांग्रेस के और भी दलित विधायक होंगे किंतु मंत्री पद पर खरगे जी के बेटे को ही बिठाया गया। सरकारी नौकरियों और राजनीति में जितने भी दलित नेता हैं उनके परिजन हर तरह से सुविधाजनक स्थिति में हैं। ऐसे में इन नेताओं द्वारा मनु स्मृति की आड़ लेकर जो रोना - धोना किया जाता है वह पूरी तरह पाखंड है और  उसी का प्रदर्शन श्री खरगे द्वारा किया गया। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 30 July 2026

कोचिंग माफिया पर भी शिकंजा कसा जाए



लोक परीक्षा संशोधन विधेयक गत दिवस लोकसभा में पारित होने के बाद आज राज्यसभा में विचारार्थ रखा जा रहा है। सत्ता पक्ष के संख्या बल को देखते हुए वहाँ भी इसके स्वीकृत होने की पूरी संभावना है जिसके बाद राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षरित होकर इसे कानून की शक्ल मिल जायेगी। नीट परीक्षा के प्रश्न पत्र लीक हो जाने के बाद देश भर में सरकार द्वारा ली जाने वाली परीक्षाओं के प्रश्न पत्रों की गोपनीयता भंग होने को लेकर छात्रों के साथ ही उनके अभिभावकों के मन में भी व्यवस्था को लेकर जबरदस्त गुस्सा देखने मिला। कुछ परीक्षार्थियों द्वारा आत्महत्या करने के कारण शिक्षा मंत्रालय की अक्षमता का मुद्दा उठ खड़ा हुआ। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के अध्यक्ष से लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान निशाने में आने लगे। इस चिंगारी को नई -  नवेली कॉकरोच जनता पार्टी ने हवा देकर दिल्ली के जंतर मंतर पर आंदोलन खड़ा कर दिया जिसकी परिणिति श्री प्रधान के त्यागपत्र से हुई। हालांकि शिक्षा मंत्रालय से जुड़े अनेक अधिकारियों पर भी गाज गिरी किंतु परीक्षा संचालित करवाने वाली नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के शीर्ष पदाधिकारी को आश्चर्यजनक ढंग से अभय दान दे दिया गया। चौतरफा दबाव के बाद सरकार ने प्रश्न पत्र लीक होने से रोकने के लिए विशेषज्ञों की एक उच्च स्तरीय समिति भी गठित कर दी और उसी के साथ प्रश्न पत्र लीक करने वालों को कड़ा दंड देने वाला कानून बनाने की पहल संदर्भित विधेयक के माध्यम से कर दी।  नीट परीक्षा के प्रश्न पत्र लीक होने के मामले में कई लोग गिरफ़्त में आ चुके हैं। मामले के त्वरित निपटारे हेतु फास्ट ट्रैक कोर्ट भी गठित किया गया है। सीबीआई इस प्रकरण में जाँच एजेंसी है। इस बारे में  जिन लोगों पर अपराधिक मामले दर्ज हुए उनमें कुछ कोचिंग संचालकों के अलावा प्रश्न पत्र तैयार करने वाले शिक्षक, और दलाल किस्म के लोग हैं। देर - सवेर कुछ और लोगों का पर्दाफ़ाश होना तय है। लेकिन सबसे बड़ी जरूरत है शिक्षा जैसे पवित्र पेशे में आई इस बुराई की जड़ों में मठा डालने की। और इसके लिए शिक्षा का व्यवसायीकरण रोकना पहली आवश्यकता है। आजकल अखबारी पन्नों के अलावा होर्डिंग्स और डिजिटल मीडिया पर कोचिंग संस्थानों के बड़े - बड़े विज्ञापन इस बात का प्रमाण हैं कि शिक्षा अब पूरी तरह एक उद्योग बन चुकी है जिसमें पूँजी का खेल होने से मुनाफाखोरी चरम पर है। कोचिंग व्यवसाय को माफिया कहा जाना बेशक अटपटा लगता है ।  लेकिन बिहार की राजधानी पटना में दो कोचिंग संचालकों के  विवाद में गोली चलने तक की नौबत आ आ गई जिसके चलते एक संचालक को जेल जाना पड़ा। राजस्थान का कोटा शहर तो कोचिंग की राजधानी कहलाता है। ये बात भी धीरे - धीरे सामने आती जा रही है कि प्रश्न पत्र लीक होने में कोचिंग संचालकों की भी भूमिका रहती है। इनकी अनाप - शनाप कमाई का अंदाज इनके द्वारा प्रचार पर किया जाने वाला खर्च है। अखबार के प्रथम पृष्ठ कोचिंग संस्थानों के विज्ञापनों से भरे रहते हैं। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि बिल्डर और ऑटोमोबाइल उद्योग की  टक्कर के विज्ञापनदाता इन दिनों कोचिंग संस्थान हैं।  चूंकि इनका व्यवसाय इनके संस्थान से सफल होकर निकलने वाले छात्रों पर ही टिका होता है इसीलिये ये परीक्षा परिणाम आते ही करोड़ों के विज्ञापनों की झड़ी लगा देते हैं। यही सब देखते हुए प्रश्न पत्र लीक मामले में कतिपय कोचिंग संचालक शक के दायरे में है। जैसी कि चर्चा है उसके अनुसार इस बार की नीट परीक्षा के अलावा अतीत में संघ लोकसेवा आयोग सहित राज्यों की प्रवेश और चयन परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक होने में शिक्षा माफिया की सक्रिय हिस्सेदारी है। इसीलिये सरकार को चाहिए कोचिंग संस्थानों पर शिकंजा कसने के लिए सख्त इंतजाम करे क्योंकि इनके कारण हमारे देश में शाला स्तर की शिक्षा की गुणवत्ता का सत्यानाश हो रहा है। हाल ही में एक सर्वे ने ध्यान खींचा जिसके अनुसार आई.आई.टी जैसे विश्वस्तरीय संस्थान के प्राध्यापक से अधिक वेतन और भत्ते कोटा के कुछ कोचिंग संस्थान देते हैं। भले ही इसकी पुष्टि न की जा सके किंतु प्रश्न पत्र लीक होने के मामलों में कोचिंग माफिया की गर्दन में फँदा डालना बेहद जरूरी है। वरना कितने भी कानून बना लिए बजाएं पैसे की ताकत के आगे व्यवस्था लाचार नजर आयेगी। इसके साथ ही नेशनल टेस्टिंग एजेंसी और संघ लोक सेवा आयोग में होने वाली नियुक्तियों में राजनीतिक प्रतिबद्धता को परे रखते हुए योग्यता और प्रामणिकता का ध्यान रखा जाए। वरना आगे पाट पीछे सपाट की स्थिति बनी रहेगी। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 29 July 2026

पाक अधिकृत कश्मीर में हो रही बगावत से भारत को सतर्क रहना होगा



पाक अधिकृत कश्मीर के हालात भी बलूचिस्तान की तरह ही बेहद तनावपूर्ण हैं।  पाकिस्तान के हुक्मरानों के अलावा सेना के जनरल चाहे जब जम्मू - कश्मीर को भारत से छीनने की डींगें हाँकते रहते हैं। आजादी के फौरन बाद उसने कबायलियों की शक्ल में बाकायदा सेना भेजकर  कश्मीर के एक हिस्से पर कब्जा जमा लिया। भारतीय सेना ने जब हमलावरों को पीछे धकेलना शुरू किया तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लॉर्ड माउंटबेटन और शेख अब्दुल्ला के बहकावे में आकर सं.रा संघ में शिकायत कर दी। उसके बाद युद्ध तो रुक गया किंतु पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर का हिस्सा आज तक उसके अधीन ही बना हुआ है। दूसरी समस्या नेहरू जी पैदा कर गए जम्मू - कश्मीर को धारा 370 के अंतर्गत विशेष दर्जा देकर। इसके चलते मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी में अलगाववाद बढ़ते - बढ़ते आतंकवाद का रूप ले बैठा जिसके पीछे पाकिस्तान का खुला हाथ था। इसी के तहत घाटी से हिंदुओं को पलायन करने बाध्य किया गया। वहाँ पाकिस्तान का झंडा लहराना और भारत विरोधी नारेबाजी आम बात थी। सेना की टुकड़ियों पर पत्थरबाजी व्यवसाय बन गई थी । इस स्थिति को समाप्त करने के लिए वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार ने धारा 370 समाप्त करने जैसा साहसिक कदम उठाते हुए जम्मू - कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा विलोपित कर दिया। इसके बाद घाटी में अलगाववाद पूरी तरह समाप्त हो गया हो ये मान लेना तो गलत होगा लेकिन वह लगातार कमजोर होता जा रहा है। आतंकवादियों की गतिविधियां भी पहले से काफी घट गई हैं। हालांकि अपना घर छोड़ने मजबूर किये कश्मीरी हिंदुओं की वापसी अब तक संभव नहीं हो सकी किंतु पहलगाम हत्याकांड के बाद उत्पन्न चिंता और भय अब नहीं दिखाई देता। जिसका प्रमाण वहाँ पर्यटकों की रिकार्ड संख्या है। धारा 370 हटने के बाद राज्य में चुनाव भी सफलतापूर्वक संपन्न हो सके। लेकिन इसे संयोग कहें या कुछ और कि इधर जम्मू - कश्मीर में शांति स्थापित हो रही है उधर पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान के प्रति असंतोष बढ़ते - बढ़ते बगावत की सीमा तक आ पहुंचा है। पाकिस्तानी सेना वहाँ वैसा ही दमन कर रही है जैसा 1971में उसने बांग्लादेश में  किया था। गत दिवस ही सेना की गोली से 30 आंदोलनकारियों के मारे जाने की खबर वहाँ की गंभीर स्थिति का प्रमाण है। जो खबरें आ रही हैं उनके मुताबिक पाकिस्तान इस समय उसी समस्या में फंसा हुआ है जो उसने जम्मू - काश्मीर सहित भारत के अनेक हिस्सों में पैदा करने का कुचक्र रचा था। पाक अधिकृत कश्मीर उससे अलग होकर भारत से जुड़ने के संकेत दे रहा है। बलूचिस्तान अपने को अलग देश घोषित कर चुका है। पश्चिमी सीमांत पर खैबर पख्तून और तालिबानी इस्लामाबाद की नींद उड़ाए हुए हैं। सिंध में भी अलगाववाद की दबी हुई चिंगारी फिर भड़कती दिख रही है। कुल मिलाकर मुल्क के अंदरूनी हालात बेहद संगीन हैं। भारत का विभाजन कर अस्तित्व में आया ये देश आज खुद खंडित होने के कगार पर है। भारत के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर है क्योंकि उसका गिलगित वाला हिस्सा पाकिस्तान ने चीन को सौंप दिया। स्मरणीय है चीन इस क्षेत्र से वन बेल्ट वन रोड जैसे प्रकल्प पर तेजी से काम कर रहा है जिससे उसे प. एशिया और यूरोप तक अपना व्यापार विस्तारित करने में मदद मिलेगी । लेकिन बलूचिस्तान के अलावा पाक अधिकृत कश्मीर में चीन का बढ़ता विरोध पाकिस्तान के दुर्भाग्य की पटकथा लिख रहा है। पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर भारत में शामिल होने जा रहा है इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि पाकिस्तान के साथ ही चीन भी आसानी से ऐसा नहीं होने देगा। लेकिन उस पार के कश्मीर में पाकिस्तान का नियंत्रण  लगातार कमजोर होता जा रहा है जो भारत के हित  में है क्योंकि अपनी आंतरिक अशांति से जूझने के कारण  आतँकवाद का निर्यात करने की उसकी क्षमता कमजोर होगी। लेकिन  एक  बात गौरतलब है कि भारत का वह वर्ग जो जम्मू -  कश्मीर में अलगाववादियों के प्रति सहानुभूति दर्शाते हुए भारतीय सेना को अत्याचारी ठहराने में तनिक भी शर्म नहीं करता था वह पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तानी सेना द्वारा चलाये जा रहे दमन चक्र पर मुँह में दही जमाये बैठा है। धारा 370 के हटाये जाने पर छाती पीटने वाली रुदालियों की टोली पाक अधिकृत कश्मीर में मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ती देखकर भी शांत है। दरअसल उसे इस बात की चिंता सताये जा रही है कि कश्मीर के उस हिस्से पर पाकिस्तान की पकड़ कमजोर पड़ने से कहीं वह जम्मू कश्मीर के साथ वापस न जुड़ जाए। भारत को इस स्थिति पर पैनी नजर रखनी होगी क्योंकि पाकिस्तान और चीन मिलकर भारत के लिए कोई परेशानी खड़ी कर सकते हैं। और फिर हमारे यहाँ आस्तीन के सांप भी कम नहीं हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 28 July 2026

छात्रों की मौत पर हुए आंदोलन के बाद जश्न का क्या औचित्य



काॅकरोच जनता पार्टी ने आज से अपना आंदोलन फिर शुरू करने की धमकी दी है। उसका आरोप है कि जंतर मंतर आंदोलन समाप्त करने के लिए सरकार के साथ जो बातचीत हुई उसमें धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र और नीट पेपर लीक पर आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवार को एक करोड़ रु. की क्षतिपूर्ति के साथ ही इस आंदोलन के सिलसिले में दिल्ली के अलावा देश के किसी भी हिस्से में छात्रों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने के बात तय थी। श्री प्रधान ने तो त्यागपत्र दे दिया और पीड़ित परिवारों को आर्थिक क्षतिपूर्ति की प्रक्रिया भी प्रारंभ हो रही है किंतु छात्रों पर अपराधिक प्रकरण दर्ज होने और गिरफ्तारी की खबरें समझौते का उल्लंघन है। इसके बाद बिहार सरकार ने 26 तारीख तक छात्रों के विरुद्ध दायर सभी प्रकरण वापस लेने का फैसला कर लिया। लेकिन पार्टी के जन्मदाता अभिजीत दिपके का आरोप है कि दिल्ली और मुंबई में आंदोलन में शामिल  अनेक छात्रों को  पूछताछ के नाम पर जबरन थाने में बिठाकर रखा गया है जिससे उनके मन में भय व्याप्त है। उन्होंने एक वीडियो संदेश में स्पष्ट तौर पर कहा कि यदि उक्त कारवाई जारी रही तो पार्टी दोबारा आंदोलन शुरू कर देगी। इस सबके बीच आंदोलन के नेताओं ने वरिष्ट अधिवक्ता कपिल सिब्बल से संपर्क साधा जिन्होंने ऐसे मामलों में कानूनी सहायता का आश्वासन भी दे दिया। इस बारे विचारणीय बात  ये  है कि  आंदोलन खत्म करते समय जो समझौता हुआ था उसमें छात्रों का उल्लेख था। लेकिन जो कारवाई हो रही है वह उन आपराधिक तत्वों के विरुद्ध है जिन्होंने पुलिस पर हमला किया, सरकारी वाहन तोड़े और पत्थरबाजी की। उल्लेखनीय है कि काॅकरोच जनता पार्टी पर जब ये आरोप लगा कि उसके आंदोलन में हिंसक तत्व घुस आये जिन्होंने पुलिस कर्मियों पर हमले किये तब उनका जबाब था कि भाजपा और रास्वसंघ ने अपने गुंडे आंदोलन में भेजकर हिंसा फैलाई। अब जब पुलिस वीडियो और सी.सी कैमरों की रिकार्डिंग के जरिये आंदोलन को हिंसक रूप देने वालों की  धरपकड़ कर रही है तब काॅकरोच जनता पार्टी को  अपनी असलियत सामने आने का डर सता रहा है। जिस समझौते के उल्लंघन का रोना पार्टी नेता रो रहे हैं उसमें भी अपराधी तत्वों को अभयदान का कोई जिक्र नहीं था।  सर्वोच्च न्यायालय ने भी आंदोलन को लोकतांत्रिक अधिकार मानते हुए पुलिस की बर्बरता पर जहाँ ऐतराज जताया वहीं उस पर होने वाले हमलों पर भी चिंता जताई। काॅकरोच जनता पार्टी की मांग है कि दिल्ली पुलिस अपनी कारवाई के लिए माफी मांगे लेकिन दूसरी तरफ वह उपद्रवी तत्वों द्वारा पुलिस पर हमले और सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ के जिम्मेदार लोगों को बचाने में लगी है। इस दोहरे रवैये के कारण वह आलोचनाओं का शिकार हो रही है। आंदोलन के प्रति गंभीरता पर सवालिया निशान भी उसने स्वयं खड़े कर दिये जब सोशल मीडिया पर काॅकरोच जनता पार्टी के नेताओं के वे वीडियो जारी हुए जिसमें वे लड़के - लड़कियों के साथ किसी आलीशान होटल में नाचते हुए जश्न मनाते दिखे। जब इसे लेकर उनकी फजीहत शुरू हुई तब बजाय शर्मिंदगी व्यक्त करने के कहा गया कि जेन जी का यही तरीका है। यदि ये नाच - गाना आंदोलन खत्म करने वाली रात जंतर मंतर पर हुआ होता तब ये नेता वहाँ मौजूद भीड़ पर उसकी जिम्मेदारी डालकर बच निकलते ।  लेकिन अपना घर छोड़कर  आंदोलन स्थल पर दिन - रात मौजूद रहे कथित जेन जी  को घर वापसी का रास्ता पकड़ने का निर्देश देकर गिने - चुने दरबारियों के साथ नाच - गाने की महफ़िल सजाना उन हजारों युवक - युवतियों के साथ छलावा है जिनके बल पर तीन - चार पेशेवर लोगों ने पूरे देश को अशांत करने की कोशिश की।  बहरहाल , आंदोलन की समाप्ति के बाद  होटल में जश्न मनाते हुए इस पार्टी के नेताओं के वीडियो उन जेन जी लड़के - लड़कियों  के लिए आँखें खोल देने वाले हैं जो उनके बहकावे में आकर कई हफ्ते धूप में पसीना बहाते रहे। और अब तो कपिल सिब्बल ने इस पार्टी को 1 करोड़ रु.देने की घोषणा भी कर दी। इसके बाद  बड़ी बात नहीं यदि बड़ी बात नहीं अगला आंदोलन भी किसी  होटल या रिसार्ट में आयोजित हो क्योंकि हर बात पर ये सफाई दी जाती है कि जेन जी कुछ अलग  हटकर सोचने और करने में यकीन रखते हैं। आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारजन इन नाचते हुए जेन जी नेताओं को देखकर क्या सोच रहे होंगे इसकी कल्पना भी विचलित कर देती है। आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारजन इन नाचते हुए जेन जी नेताओं को देखकर क्या सोच रहे होंगे इसकी कल्पना भी विचलित कर देती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 27 July 2026

दूसरा जंतर मंतर तैयार : आरक्षण हटाओ आंदोलन से जुड़ गए 35 लाख



जंतर मंतर आंदोलन धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र से समाप्त हो गया। उसकी आयोजक  काॅकरोच जनता पार्टी ने स्पष्ट नहीं किया कि वह राजनीतिक दल बनेगी या दबाव समूह के रूप में समय - समय पर उभरती रहेगी। इस पार्टी ने जंतर मंतर का आंदोलन जिस तरह संचालित किया उससे स्पष्ट हो गया कि यदि प्रधान न्यायाधीश काॅकरोच वाली टिप्पणी नहीं करते तब भी किसी और नाम से ये प्रयोग होता ।  इस पार्टी ने उस वर्ग को आकर्षित किया जिसकी चिंता न अतीत है और न ही वर्तमान। उसके लिए उसका भविष्य ही एकमात्र लक्ष्य है। पहले यूजीसी और फिर नीट पेपर लीक ने इस वर्ग को चिंता में डाल दिया जिसे इसने लपक लिया। कोशिश तो देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी ने भी की थी लेकिन उसके नेता मुद्दे को बीच में छोड़कर विदेश यात्रा पर चले गए। आम आदमी पार्टी ने भी प्रयास किया परंतु युवाओं में उसकी विश्वसनीयता नहीं बची। इसीलिए उसने अपने पुराने साथियों को इस पार्टी के रूप में आगे कर युवा असंतोष की चिंगारी को भड़काने का तानाबना बुना। लेकिन अपने तमाम प्रयासों के बाद भी आंदोलन की सफलता का सेहरा अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, आतिशी और संजय सिंह अपने सिर पर नहीं बांध सके। दूसरी बात ये हुई कि आंदोलन के सबसे बड़े चेहरे अभिजीत दिपसे ने खुद को दलित बताकर अपनी पहचान स्पष्ट कर दी। इसीलिए भीम आर्मी के चंद्रशेखर रावण ने भी आंदोलन में घुसपैठ बढ़ाई।जंतर मंतर पर ब्राह्मण वाद विरोधी नारे भी इसीलिए लगे। जेएनयू की टुकड़े - टुकड़े गैंग  ने भी जंतर मंतर पर अपनी ढपली पीटकर अश्लीलता का हरसंभव परिचय दिया। सरकार द्वारा मांगे मान लेने के बाद आंदोलन तो खत्म हो गया किंतु नये आंदोलन के बीज बिखेर गया। युवा शक्ति की जीत का ढिंढोरा पीटते हुए डाॅ. अंबेडकर का चित्र  लहराने वाले अभिजीत दिपके और उनके सिपहसालारों ने जिस डिजिटल क्रांति का आगाज किया वह अब उन्हीं के गले पड़ने जा रही है। कॉकरोच जनता पार्टी की तर्ज पर आरक्षण के विरोध में एक पेज इंस्टाग्राम पर बनाये जाते ही उसके साथ 35 लाख लोग जुड़ गए। स्मरण रहे यूजीसी विवाद के समय भी सवर्ण जातियों के युवाओं का गुस्सा सामने आया था। नीट पेपर लीक के चलते वह ठण्डा होता दिखा किंतु काॅकरोच जनता पार्टी ने राख के नीचे दबी चिंगारी को हवा दे दी। इसीलिए जंतर मंतर  से उसका डेरा उठते ही इंस्टाग्राम परआरक्षण हटाओ आंदोलन का शोला भड़क उठा। इसका नारा है सभी जातियाँ एक समान,मेरा बस ये देश महान। सामान्य और कुछ ओबीसी श्रेणी के युवाओं ने इस  डिजिटल अभियान को हवा दी है। इसके एडमिन की मांग है कि जाति के आधार पर मिलने वाले आरक्षण को पूरी तरह खत्म कर सरकारी नौकरियों और कॉलेज में प्रवेश प्रतिभा, अंक और योग्यता के आधार पर हों।आर्थिक आधार पर मदद की जाए जिससे  कमजोर आर्थिक और सामाजिक हैसियत  वाले युवाओं के सपने साकार हो सकें। इस पेज पर आरक्षण भेदभाव है जैसे नारे लगाए गए हैं। पेज के एडमिन और समर्थकों ने घोषणा की है कि वे इसे काॅकरोच जनता पार्टी  की तरह ही एक बड़े आंदोलन में बदलेंगे। इसी तरह  E20 जनता पार्टी नामक डिजिटल अभियान भी शुरू हो गया जो एक तरह का डिजिटल कैंपेन  उन लोगों द्वारा शुरू किया गया है, जो मानते हैं कि देशभर में E20 पेट्रोल को बढ़ावा देने के साथ-साथ ग्राहकों के पास 100% शुद्ध पेट्रोल खरीदने का विकल्प भी होना चाहिए। उनका कहना है कि सरकार  बिना एथेनॉल वाला पेट्रोल भी पंपों पर मिलना चाहिए ताकि फैसला ग्राहक खुद कर सकें। इस कैंपेन से भी लोग तेजी से जुड़ रहे हैं। हालांकि ये अभियान उतना सड़क पर नहीं उतर सकता किंतु आरक्षण हटाओ आंदोलन से कुछ ही दिनों में करोड़ों लोग जुड़ गए तब और एक नया जंतर मंतर खड़ा होकर सरकार को चुनौती देने मैदान में उतर आया तब क्या दिपके, केजरीवाल, राहुल, और सोनम वांगचुक इस जेन जी के पक्ष में भी खड़े होने का साहस दिखाएंगे? काॅकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में ब्राह्मणवाद को गालियाँ दी गईं तो जेन जी के प्रशंसक इसे अभिव्यक्ति की आजादी का नया दौर बताते हुए इतरा रहे थे किंतु अब सवाल ये है कि आरक्षण हटाओ आंदोलन में शामिल जेन जी आंबेडकरवाद के विरुद्ध नारेबाजी करे तब क्या दिपके और चंद्रशेखर रावण उसका समर्थन करेंगे? जंतर मंतर आंदोलन की सफलता से आत्ममुग्ध तबके को ये जा लेना चाहिए कि नीट परीक्षा में सफल हुए लाखों छात्र  ऐसे भी हैं जिन्हें ज्यादा अंक मिलने के बाद भी उन्हें इसलिए प्रवेश नहीं मिल सका क्योंकि आरक्षण  प्राप्त कम अंकों वाले छात्र को उपकृत किया गया। डिजिटल आंदोलन का ये सिलसिला कहाँ जाकर रुकेगा ये कहना कठिन है क्योंकि जेन जी नामक जो जिन्न बोतल से बाहर आ गया है उसे दोबारा बंद करना बहुत बड़ी समस्या है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 25 July 2026

सरकार का जवाब तय करेगा आगे की राजनीति



दिल्ली में चल रहे आंदोलन की जड़ में नीट परीक्षा के प्रश्न पत्र लीक होने से छात्रों में उपजा गुस्सा था। हालांकि दोबारा परीक्षा होने के बाद परिणाम भी आ गए लेकिन शिक्षा प्रणाली में व्याप्त वि संगतियों के लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग उठ खड़ी हुई। इसकी शुरुआत कांग्रेस द्वारा की गई और उसकी छात्र इकाई द्वारा अनेक शहरों में धरना - प्रदर्शन भी किये गए किंतु तभी राहुल गाँधी अपनी निजी यात्रा पर विदेश चले गए। वे कहाँ और क्यों गए इसे हमेशा की तरह गोपनीय रखा गया।लेकिन इसी बीच देश के प्रधान न्यायाधीश द्वारा अपनी एक टिप्पणी में कॉकरोच शब्द का उपयोग किया गया जिसका संदर्भ कुछ और था किंतु अमेरिका में बैठे एक युवक अभिजीत दिपके ने उससे नाराज होकर जब काॅकरोच जनता पार्टी का गठन सोशल मीडिया पर किया तब रातों - रात उससे करोड़ों लोग जुड़ गए। इससे उत्साहित होकर उसने भारत आने का ऐलान कर दिया। विपक्षी दलों से निराश सरकार विरोधी तबके को अभिजीत में क्रांतिदूत नजर आया । दिल्ली आकर उसने एक औपचारिक आयोजन में श्री प्रधान के इस्तीफे की मांग हेतु सरकार के सामने समय सीमा रखी और पूरी न होने पर संसद का सत्र शुरू होने वाले दिन जंतर मंतर से चलो संसद का आह्वान किया। उसके चलते हजारों लोग संसद भवन की ओर बढ़ने लगे जिन्हें रोकने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया और अश्रुगैस छोड़ी। उस दौरान क्या - क्या हुआ उसे दोहराने की जरूरत नहीं है। इधर जंतर मंतर पर अनशन कर रहे सोनम वांगचुक को पुलिस ने उठाकर सरकारी  अस्पताल में भर्ती कर दिया किंतु उनका अनशन जारी रहा । बाद में उन्हें मेदांता अस्पताल पहुंचा दिया गया और दो दिन पहले उन्होंने केंद्रीय मंत्रियों के हाथ से जूस पीकर भूख हड़ताल तोड़ दी। साथ ही शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र की मांग से भी पीछे हट गए। गुरुवार की आधी रात जब वांगचुक जूस ग्रहण कर रहे थे उसी समय प्रधानमंत्री का वीडियो संदेश प्रसारित हुआ जिसमें पेपर लीक  के दोषियों को कड़ा दंड देने हेतु कानून बनाने की घोषणा की गई। इसके बाद काॅकरोच जनता पार्टी और सरकार के बीच संवाद कायम हुआ और गत दिवस एक बैठक भी हुई। केंद्रीय मंत्री द्वय जगत प्रकाश नड्डा और डॉ. जितेंद्र सिंह के साथ बातचीत में शामिल पार्टी प्रवक्ताओं ने बाद में बताया कि सरकार पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवार को 1 करोड़ रु देने के अलावा 20 जुलाई के संसद मार्च में हुए उपद्रव के आरोपियों पर दर्ज आपराधिक प्रकरण वापस लेने सहमत है किंतु श्री प्रधान के त्यागपत्र की मांग पर 24 घंटे बाद अर्थात आज 2 बजे तक जवाब। देगी। पार्टी ने इस माँग से पीछे न हटने की बात दोहराते हुए धमकी भी दी कि आंदोलन को पूरे देश में फैला दिया जाएगा। उसके बाद गत रात्रि प्रधानमंत्री नये वीडियो संदेश के साथ आये और युवाओं की मिजाजपुर्सी का भरपूर प्रयास किया। आज सुबह से ही इस बात को लेकर उत्सुकता है कि सरकार शिक्षा मंत्री को हटाने के लिए राजी होती है या नहीं ? हालांकि श्री प्रधान को मंत्री पद से हटाया जाना कोई बड़ी समस्या नहीं है। प्रधानमंत्री चाहें तो शिक्षा मंत्री क्या किसी अन्य मंत्री को भी एक क्षण में हटा सकते हैं। लेकिन इतने दबाव और आलोचना के बाद भी उनको मंत्री बनाये रखने के बाद एक नई नवेली पार्टी की जिद पर यदि ऐसा किया जाता है तब उससे प्रधानमंत्री की वजनदारी पर सवाल उठेंगे। उल्लेखनीय है जंतर मंतर से इतर संसद में भी विपक्ष , शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर अड़ा रहकर कार्यवाही नहीं चलने दे रहा। सोमवार को सरकार पेपर लीक रोकने एक कड़े कानून का प्रस्ताव लेकर भी आ रही है। लेकिन उसकी सबसे बड़ी  चिंता परिसीमन और विदेशी अनुदान संबंधी  विधेयक को लेकर  है जिन पर भाजपा की भावी व्यूहरचना निर्भर है। प्रधानमंत्री अतीत में भी भूमि अधिगृहण और कृषि सुधार जैसे कानून वापस ले चुके हैं जिसके बाद उनके 56 इंची सीने के दावे का मखौल भी उड़ा किंतु उसके उपरांत मिली चुनावी सफलताओं ने उनकी नेतृत्व क्षमता का दबदबा बनाये रखा। लेकिन यहाँ सवाल ये है कि स्थापित दलों के सामने अड़े रहने के बाद यदि वे एक नवोदित पार्टी के सामने जिसका कोई विधिवत ढांचा नहीं है, झुक जाते हैं तब क्या उनकी मजबूत छवि पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा? लेकिन राजनीति की समझ रखने वाले जानते हैं कि बड़ी लड़ाई जीतने के लिए कभी - कभी रणनीति के तहत कदम पीछे भी खींचना पड़ते हैं। आज दोपहर के बाद स्पष्ट हो जाएगा कि सरकार का अगला कदम क्या होगा और  आंदोलन की दिशा भी। 

नोट:- उक्त आलेख शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के पहले प्रकाशित हुआ था। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 24 July 2026

संसदीय गरिमा का पुनर्स्थापन सरकार और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी



म.प्र विधानसभा का मानसून सत्र समय से पहले ही समाप्त होने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। सरकार द्वारा प्रस्तुत तमाम विधेयक होहल्ले के बीच पारित हो गए जिनमें समान नागरिक संहिता जैसा महत्वपूर्ण विधेयक भी था। बीते कुछ सालों से देखने मिल रहा है कि विधानसभा और संसद के सत्रों का ज्यादातर समय हंगामे की बलि चढ़ जाता है। विपक्ष अपनी कुछ मांगों को लेकर अड़ता है जिन्हें सत्ता पक्ष द्वारा नहीं माने जाने पर गतिरोध बना रहता है। अक्सर विपक्ष और आसंदी के बीच कहासुनी होने पर भी सदन स्थगित करने की नौबत आ जाती है। आम तौर पर सत्ता और मुख्य विपक्ष में टकराव से सदन की कारवाई बाधित होती है जिससे छोटे - छोटे दलों के सांसदों को अपने क्षेत्र के मुद्दे उठाने का अवसर नहीं मिल पाता। म.प्र विधानसभा को ही लें तो पिछली बार कोई भी सत्र पूरी अवधि तक कब चला, ये शायद ही कोई बता पायेगा। संसद के भी अनेक सत्र  बिना कोई विधायी कामकाज किये ही पूरे हो गये और मौजूदा सत्र भी उसी ओर बढ़ता दिख रहा है। इस स्थिति के लिए दोनों पक्ष एक दूसरे को कसूरवार ठहराते हैं लेकिन सही बात ये है कि संसदीय प्रणाली के महत्व को कम करने में दोनों पक्षों का बराबर दोष है। सत्ता पक्ष को लगता है सदन जितना कम चले उतना उसके लिए हितकर है क्योंकि  सदन स्थगित रहने से वह संवेदनशील मुद्दों पर जवाबदेही से बचने में सफल हो जाता है। हंगामे के माहौल में प्रश्नकाल तक स्थगित होता है जबकि इसके जरिये बहुत सी ऐसी जानकारियां उजागर होती हैं जो अन्यथा लोगों तक नहीं पहुँच पातीं। प्रश्नकाल में मंत्री द्वारा दिये उत्तर पर प्रश्नकर्ता सांसद पूरक प्रश्न भी पूछ सकता है। इस अवसर के छिन जाने से सांसदों के अधिकारों का हनन होने के साथ ही प्रश्नों के उत्तर तैयार करने में लगने वाले समय और  संसाधन व्यर्थ चले जाते हैं। ये देखते हुए विपक्ष को ये सावधानी रखनी चाहिए कि प्रश्नकाल को स्थगित होने से बचाये। हालांकि  वह ये कहकर बचना चाहता है कि सदन चलाना सरकार की जिम्मेदारी है किंतु ऐसा कहने मात्र से वह अपनी भूमिका के निर्वहन से नहीं भाग  नहीं सकता। मसलन सत्र शुरू होते ही किसी   मुद्दे पर तत्काल चर्चा की जिद सत्ता पक्ष द्वारा स्वीकार नहीं किये जाने पर सदन को नहीं चलने देने की गलती विपक्ष के लिए नुकसान दायक होती है। संसद के वर्तमान सत्र में भी यही देखने मिल रहा है। सत्र शुरू होने के पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सर्वदलीय बैठक बुलाकर सत्र के सुचारु रूप से संचालन पर आम सहमति बनाते हैं। लेकिन सत्र शुरू होने पर ऐसा लगता ही नहीं कि ये लोग दो दिन पहले बैठकर सदन चलाने के लिए मीठी - मीठी बातें कर रहे थे। सदन की कार्य सूची पहले से तैयार होती है। आकस्मिक घटनाओं और मुद्दों पर ध्यानाकर्षण और स्थगन प्रस्ताव लाये जा सकते हैं। लेकिन सब काम छोड़कर तुरंत चर्चा कराये जाने की मांग पूरी नहीं होने पर सदन को न चलने देने पर सरकार से ज्यादा हानि विपक्ष की होती है क्योंकि सत्ता पक्ष के पास तो अपनी बात रखने  के तमाम साधन हैं जबकि विपक्ष के लिए संसद और विधानसभा ही  हैं जहाँ से वे अपनी बात  जनता तक पहुंचा सकते हैं। ये देखते हुए रणनीतिक तौर पर बेहतर होगा कि विपक्ष सदन को बाधित करने की गलती से बचे। वैसे भी व्यवधान के दौरान  सरकार अपनी जरूरत के विधेयकों को पारित करवा ही लेती है किंतु विपक्ष उन पर अपनी राय रखने से वंचित रह जाता है। संसदीय प्रणाली की खूबसूरती सदन में होने वाली बहस में से ही उभरकर सामने आती है। देश की छवि भी इस बात से बनती है कि देश और जनता से जुड़े मुद्दों पर सत्ता और विपक्ष की सोच क्या है?  वर्तमान परिदृश्य इस लिहाज से निराश करने वाला है क्योंकि संसद और विधानसभाओं में ऐसे प्रभावशाली सदस्य कम ही हैं जिनका भाषण उनके विरोधी भी ध्यान से सुना करते थे। आज देश में  विश्वास का जो संकट है उसके लिए संसदीय प्रणाली की गिरती छवि भी बड़ा कारण है। भारत में भी बांग्लादेश और नेपाल जैसी अराजकता की आशंका के पीछे संसद के भीतर होने वाले हंगामे भी हैं। जनता के मन में ये बात बैठती जा रही है कि  जनप्रतिनिधि केवल अपना और अपनों का ही भला सोचते हैं। इस अवधारणा को और प्रबल होने से रोकने के लिए संसदीय प्रणाली की पुरानी गरिमा की पुनर्स्थापना जरूरी है जिसका दायित्व किसी एक दल या नेता का न होकर सभी का है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 23 July 2026

जंतर मंतर आंदोलन पूरी तरह पेशेवर आंदोलनजीवियों के कब्जे में


 
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन का अब छात्रों से कोई लेना - देना नहीं रहा। इसे शांतिपूर्ण कहना भी हास्यास्पद है। जिस तरह शालीन बाग में धरने के पीछे अलगाववादी ताकतें सक्रिय रहीं उसी तरह किसानों के साल भर चले धरने में धीरे - धीरे खालिस्तानी अलगाववादी घुस आये जिसकी परिणिति लाल किले पर खालिस्तानी झंडा फहराने के तौर पर हुई।  यही स्थिति इस आंदोलन की है जिसमें असली छात्र कितने हैं ये जाँच का विषय है। ये बात इसलिए उठी क्योंकि प्रश्न पत्र लीक होने पर दोबारा हुई नीट परीक्षा के परिणाम घोषित होने के बाद  सफल हुए छात्र भविष्य की तैयारी में लग गए । नया शैक्षणिक सत्र प्रारंभ होने से भी अन्य छात्र प्रवेश आदि में व्यस्त  हैं। किसी राजनीतिक दल के छात्र संगठन ने भी जंतर मंतर आंदोलन से जुड़ने में रुचि नहीं दिखाई। आम आदमी पार्टी को छोड़ अन्य कोई राजनीतिक दल भी सक्रिय रूप से सामने नहीं आया। धरना स्थल पर आकर अपनी मौजूदगी की औपचारिकता जरूर अनेक नेताओं ने दिखाई किंतु 20 जुलाई को संसद भवन की तरफ बढ़ती भीड़ पूरी तरह नेतृत्वविहीन होने से अराजक हो उठी। इस तरह के आंदोलन जब भी हुए उनका नेतृत्व करने वाले आगे - आगे रहते थे। लेकिन 20 जुलाई को जंतर मंतर पर मंच लूटने वाले कथित छात्र हितैषी छू मंतर हो गए। भीड़ को संसद भवन में घुसने के लिए उकसाकर कॉकरोच जनता पार्टी के नामचीन चेहरे कहाँ रहे इसका जवाब उन्हें देना चाहिए। एक को तो बर्गर खाने के अपराध में प्रवक्ता पद से हटा दिया किंतु कुछ युवाओं ने ही पकड़कर उसके वीडियो बना लिए वरना उसे भी न हटाया जाता। कहा जा रहा है दो नेताओं को जगत प्रकाश नड्डा ने अपने निवास पर रोके रखा लेकिन पार्टी के सबसे बड़े चेहरे अभिजीत संसद जाने वाले जत्थों के अग्रिम भाग में क्यों नहीं दिखे  ? हर आंदोलन में बेगानी शादी में अब्दुल्ला बनकर कूदने वाले योगेंद्र यादव एक कोने में खड़े अपना वीडियो बनवाते रहे। मुंबई से अभिनेता नसीरुद्दीन शाह भी अपने दो बेटों को जंतर मंतर लेकर आये किंतु जब लाठीचार्ज हुआ तब वे कहां थे कोई नहीं जानता। नीले झंडों के साथ जय भीम का नारा लगाने वाली भीड़ भीम आर्मी के नेता सांसद चंद्रशेखर रावण लेकर आये थे किंतु पुलिस की कारवाई से बचने वे भी भीड़ से दूर रहे। अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसौदिया, आतिशी भी आग में पेट्रोल डालकर दूर बैठ गए। कुल मिलाकर आंदोलन को अराजक तत्वों के हाथ सौंपकर तमाम नेता पीछे रह गए। यही वजह है कि वे पिटने से भी बचे और उनके विरुद्ध कोई प्रकरण भी दर्ज नहीं हुआ।  उस घटनाक्रम के बाद जो राजनीति हो रही है उसमें न तो शिक्षा प्रणाली में सुधार की चिंता है और न ही छात्रों के हित की क्योंकि आंदोलन की कमान  पेशेवर आंदोलनजीवियों के हाथ में है जिन्हें छात्र राजनीति का धेले भर अनुभव नहीं है। कॉकरोच जनता पार्टी अभी तक आम आदमी पार्टी को छोड़कर अधिकांश दलों के लिए अछूत बनी हुई है। राहुल गाँधी द्वारा प्रधानमंत्री आवास पर दिये धरने को आप सांसद संजय सिंह और आतिशी ने जिस तरह कांग्रेस और सरकार की जुगलबंदी करार दिया उससे स्पष्ट हो गया कि विपक्ष की राजनीति आपदा में अवसर तलाशने पर केंद्रित है। गत दिवस लोकसभा में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस सांसदों के बीच हुई कहा सुनी के पीछे भी श्रेय लूटने की प्रतिस्पर्धा ही थी। यद्यपि सरकार के सामने भी संकट कम नहीं हैं। विपक्ष की रणनीति उन महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित नहीं होने देने की है जिन पर भाजपा की आगामी व्यूह रचना निर्भर है। बीते काफी समय से अन्य पार्टियों में तोड़फोड़ मचाकर भाजपा दो तिहाई बहुमत का प्रबंध करने में जुटी थी। हालांकि धर्मेंद्र प्रधान को अभी तक नहीं हटाया जाना  इस बात का संकेत है कि मोदी - शाह का आत्मविश्वास कायम है। लेकिन अंदरखाने की राजनीति का अंदाजा लगाना मुश्किल है। बात इतनी आगे बढ़ चुकी है कि किसी भी पक्ष के लिए पीछे लौटना आत्मघाती होगा। रही बात आंदोलनकारियों  की तो वे खुद भ्रमित हैं। शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र की मांग तो पूरी हुई नहीं और वे प्रधानमंत्री को हटाने की मांग कर बैठे। सोनम वांगचुक भी अनिर्णय में फंसे हुए हैं। चूंकि सरकार के विरोध में खड़ी ताकतों में समन्वय और आपसी विश्वास नहीं है इसीलिए आंदोलन गैर जिम्मेदाराना तरीके से संचालित है। रोज शाम को जंतर मंतर पर दिखाई देने वाली अराजकता इसका प्रमाण है। चीन के साम्यवादी नेता माओ त्से तुंग ने कहा था क्रांति कोई चाय पार्टी नहीं है। लेकिन जंतर मंतर पर सुबह से रात तक पार्टियां देखी जा सकती हैं। वहाँ से जो वीडियो लगातार आ रहे हैं उनसे अनेक चेहरों के नकाब उतर चुके हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 22 July 2026

छात्र हित छोड़ आंदोलन पर राजनीतिक स्वार्थ हावी



दिल्ली में नीट परीक्षा प्रश्न पत्र लीक होने के विरोध में चल रहा आंदोलन दो टुकड़ों में बट चुका है। उल्लेखनीय है नवगठित कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग को लेकर राजधानी के जंतर मंतर पर काफी दिनों से धरना दिया जा रहा है। बाद में इसमें लद्दाख़ के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने भी उसी मांग को लेकर अनशन शुरू कर दिया तो आंदोलन की चर्चा सर्वत्र फैलने लगी। विभिन्न पार्टियों के नेता उनसे मिलने आये और समर्थन दिया। लेकिन श्री वांगचुक के आग्रह पर भी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी धरना स्थल पर नहीं आये और पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा को भेजकर रस्म अदायगी कर दी। अन्य विपक्षी दलों के नेताओं ने भी जंतर मंतर से एक सुरक्षित दूरी बनाए रखी। लेकिन आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल सहित तमाम नेता धरना स्थल पर उपस्थिति दर्ज करवाने  में सबसे आगे दिखे। इस वजह से पहले से चल रही इस चर्चा को बल मिला कि सोशल मीडिया से जन्मी कॉकरोच जनता पार्टी भी आम आदमी पार्टी की मानस पुत्री ही है। वामपंथी छात्र संगठनों ने भी इस आंदोलन में खुलकर हिस्सेदारी दिखाई। राहुल गाँधी के धरनास्थल पर आकर सोनम वांगचुक से न मिलने का कारण जल्द स्पष्ट हो गया। दरअसल कांग्रेस  इस बात को भांप गई कि  जनता पार्टी की आड़ में अरविंद केजरीवाल खुद को पुनर्स्थापित करना चाह रहे हैं ताकि निकट भविष्य में होने जा रहे विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी मजबूती से खड़ी हो सके। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है पंजाब जहाँ आम आदमी पार्टी ही सत्ता में है। लेकिन उसकी लोकप्रियता लगातार गिरने से कांग्रेस के हौसले बुलंद हैं। दूसरी ओर भाजपा भी प. बंगाल जैसा उलटफेर करने की तैयारी कर रही है। हिमाचल प्रदेश में भी आम आदमी पार्टी , कांग्रेस के मतों में सेंध लागाएगी । दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल दिल्ली की सत्ता हाथ से निकल जाने के लिए राहुल को जिम्मेदार मानते हैं जिन्होंने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारकर भाजपा की राह आसान बना दी।  उसके बाद से ही दोनों में छत्तीस का आंकड़ा चला आ रहा था। इसीलिए कांग्रेस जो पहले से ही नीट परीक्षा मामले में मुखर थी, जंतर मंतर के धरने से कटी - कटी रही। 20 जुलाई को जब  संसद भवन की ओर बढ़ रही भीड़ पर लाठीचार्ज हुआ और पूरे देश में उसकी चर्चा हुई तब कांग्रेस को लगा कि अब भी वह इस आंदोलन से दूर रही तो फिर मुद्दा उसके हाथ से पूरी तरह फिसल चुका होगा और वह युवा विरोधी कहलायेगी। इसीलिए गत दिवस राहुल गाँधी ने सबको चौंकाते हुए प्रधानमंत्री निवास पर डेरा जमाया और केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह की समझाइश पर भी नहीं उठे तब पुलिस ने उन्हें और प्रियंका वाड्रा को हिरासत में लेकर कुछ देर बाद रिहा कर दिया। राजनीतिक तौर पर ये सामान्य घटना थी किंतु  इसके जरिये काँग्रेस ने आंदोलन की लगाम अपने हाथ में लेने का दांव चल दिया। इसका असर भी फौरन दिखा जब आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह और दिल्ली की पूर्व मुख्यमन्त्री आतिशी मार्लेना ने सोशल मीडिया पर इसे जंतर मंतर का आंदोलन कमजोर करने के लिए कांग्रेस और भाजपा की जुगलबंदी बता दिया। स्मरणीय है कांग्रेस द्वारा आम आदमी पार्टी को भाजपा की बी टीम कहा जाता रहा है। इसके बाद कॉकरोच जनता पार्टी के लोगों ने देर रात कनाट प्लेस में उपद्रव मचाकर अपनी खीझ निकाली। लेकिन कल के घटनाक्रम से ये स्पष्ट हो गया कि छात्रों के नाम पर राजनीतिक पार्टियां अपना स्वार्थ सिद्ध करने में जुटी हैं। न जंतर मंतर पर नीट पीड़ित छात्र नजर आ रहे हैं और न ही राहुल के साथ दिखे। संसद जाते हुए लाठी खाने वालों में भी छात्र कम आंदोलनजीवी ज्यादा थे। भले ही दोनों पक्ष अपने - अपने मतलब के लिए आंदोलन को आगे  खींचते रहें किंतु उसकी गंभीरता और वजनदारी रोज घटती जा रही है। संसद का सत्र चलने के कारण  जो सरगर्मी है वह भी जल्द खत्म होना तय है। विडंबना ये है कि इस आंदोलन का चेहरा बने लोगों का छात्रों से कोई सम्बन्ध नहीं है। ऐसे में पहले दिन से दिशाहीन नजर आ रही ये मुहिम पूरी तरह भटकते हुए राजनेताओं के शिकंजे में आ चुकी है।  रही बात कॉकरोच जनता पार्टी की तो उसका वही हश्र होना तय है जो कॉकरोच का होता है। वैसे भी उसका नियंत्रण विदेश में बैठी उन अदृश्य शक्तियों के हाथ  में है जो भारत में अराजकता फैलाना चाह रही हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी





Tuesday, 21 July 2026

दिल्ली में किसानों का जमावड़ा जंतर मंतर पर भारी पड़ सकता है



दिल्ली के जंतर मंतर पर चल रहे कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में गत दिवस संसद भवन तक छात्रों का मार्च आयोजित किया गया था। पुलिस के रोकने पर भी हज़ारों  लोग उस ओर बढ़े। संसद का सत्र भी चूंकि कल से है शुरू हुआ था लिहाजा सुरक्षा व्यवस्था काफी कड़ी थी। जब प्रदर्शनकारी अनियंत्रित होने लगे तब पुलिस द्वारा लाठी चार्ज और अश्रु गैस जैसे परंपरागत तरीके अपनाकर भीड़ को तितर - बितर किया गया। दोनों पक्षों द्वारा एक दूसरे पर आरोप लगाए जा रहे हैं। पुलिस का कहना है भीड़ द्वारा पथराव एवं सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ के बाद स्थिति बिगड़ी वहीं आंदोलन के कर्ताधर्ताओं की मानें तो पुलिस द्वारा लाठी चार्ज और अश्रु गैस छोड़े जाने से भीड़ भड़क उठी। विभिन्न वीडियो देखने पर पता चलता है कि दोनों तरफ के आरोप काफी हद तक सही हैं। भीड़ द्वारा पत्थर फेंके जाने के साथ पुलिस के वाहनों को क्षति पहुंचाए जाने के दृश्य साफ नजर आये वहीं पुलिस को भी डंडे बरसाते हुए देखा गया। ये बात पूरी तरह सच है कि सुरक्षा बल सख्ती न दिखाते  तो प्रदर्शनकारी संसद परिसर में घुसकर अकल्पनीय स्थिति उत्पन्न कर सकते थे। ये आशंका इसलिए पैदा हुई क्योंकि छात्रों के नाम पर उपद्रवी तत्व भी प्रदर्शन में शामिल थे जिनका उद्देश्य अराजकता फैलाना था। दरअसल  इस आंदोलन को गैर राजनीतिक बनाये रखने के दावे झूठे निकले जब आम आदमी पार्टी के अलावा भीम आर्मी सांसद दलित नेता चंद्रशेखर आजाद ने पहले तो धरना स्थल पर मंच साझा किया और फिर प्रदर्शन में भी मौजूद रहे। सपा सांसद डिंपल यादव ने भी उपस्थिति दर्ज कराई। योगेंद्र यादव,शबाना आज़मी अरुंधति रॉय, प्रकाश राज और स्वरा भास्कर जैसी घोषित मोदी विरोधी हस्तियां भी नजर आईं। जेएनयू से जुड़े  सरकार विरोधी संगठनों  ने तो धरना स्थल पर पहले दिन से ही कब्जा जमा लिया था। इस आयोजन के पीछे नीट परीक्षा के पर्चे लीक होने से परीक्षार्थियों में उपजी नाराजगी थी जिसके बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग जोर पकड़ती गई। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी का इस आंदोलन से जुड़ना आज तक रहस्य बना हुआ है क्योंकि उसका प्रादुर्भाव देश के मुख्य न्यायाधीश द्वारा किये एक कटाक्ष की प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ था। इसके अलावा सोनम वांगचुक का लद्दाख़ से आकर इस आंदोलन से जुड़ना भी चौंकाने वाला रहा। धीरे - धीरे यह मुहिम छात्रों के हाथ से निकालकर पेशेवर आंदोलनजीवियों के नियन्त्रण में आ गई। इसी के चलते वहाँ वही नारे गूंजने लगे जो जेएनयू परिसर की पहचान बन चुके हैं। हिंदू देवी - देवताओं का उपहास, मनुवाद को कोसते हुए जय भीम के नारे और क्रांति के नाम पर अल्लाह की तारीफ जैसी भड़काऊ बातें सुनाई दीं। देश विरोधी शर्जील इमाम और खालिद उमर को महान बताने की जुर्रत के साथ ही धारा 370 की वापसी का दंभ भरा गया। कल जो प्रदर्शन हुआ उसमें भीम आर्मी की जुटाई भीड़ छात्रों पर भारी पड़ी। इन्हीं सब कारणों से आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटक गया। सोनम वांगचुक तक सांसदों से मिलकर अनशन तोड़ने के लिए राजी हो गए। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक माइग्रेन नामक बीमारी की आड़ लेकर भूख हड़ताल से पीछे हट गए। सरकार के बुलावे पर पार्टी के दो प्रतिनिधि केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा से मिलने जा पहुंचे लेकिन रात में दोबारा जंतर मंतर पर तम्बू तानकर आंदोलन जारी रखने की डींग हाँकी गई। लेकिन अब तक ये समझ से परे है कि इस आयोजन का असली सूत्रधार कौन है? अभिजीत दीपके के भारत लौटते ही उसकी आम आदमी पार्टी से निकटता स्पष्ट हो गई थी। इसीलिए इस आंदोलन में उस पार्टी का पूरा शीर्ष नेतृत्व मौजूद रहा। यही वजह थी की कांग्रेस ने कल के प्रदर्शन से दूरी बनाये रखी। राहुल गाँधी का बयान प्रधानमंत्री के  विरुद्ध तो आया किंतु कॉकरोच जनता पार्टी की तरफदारी से वे बचे और तो और सोनम वांगचुक की मिजाजपुर्सी की जरूरत भी नहीं समझी। स्मरणीय है किसी आंदोलन की सफलता के लिए किसी या कुछ राजनीतिक पार्टियों की हिस्सेदारी जरूरी होती है जिसका इस अभियान में अभाव है। हालांकि आम आदमी पार्टी पर्दे के पीछे है, लेकिन दीपके एण्ड कम्पनी का कोई ढांचा नहीं है। ऐसे में कुछ दिन के होहल्ले के बाद इसकी वजनदारी कम होती जायेगी। सबसे खास बात ये है कि भारत - अमेरिका के बीच होने वाली व्यापार संधि  के विरोध में दिल्ली के सिंधु बॉर्डर पर किसान जमा होने लगे हैं। ऐसे में अब आंदोलन का केन्द्र जंतर मंतर से खिसक कर किसानों के धरने पर पहुँच जाए तो आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि राजनीतिक दलों और मीडिया को भी किसानों में ज्यादा रुचि होगी विशेष रूप से पंजाब विधानसभा के आगामी चुनाव को देखते हुए।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 20 July 2026

समान नागरिक संहिता विधेयक : म.प्र सरकार का साहसिक निर्णय


मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता में गत दिवस संपन्न म.प्र मंत्रीपरिषद की बैठक में यूसीसी ( समान नागरिक संहिता) विधेयक को स्वीकृति दिये जाने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि यह भाजपा के मूलभूत मुद्दों में रहा है। पार्टी द्वारा शासित अनेक राज्यों में ये पहले ही पारित किया जा चुका है। आज से प्रारंभ हुए विधानसभा के मानसून सत्र में इसे  पेश भी कर दिया गया। हालांकि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 342 और  366 (खंड 25) के तहत आने वाली भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया अनु जनजातियों पर लागू नहीं होगा। बैठक के बाद मुख्यमंत्री श्री यादव ने विधेयक पर चर्चा करते हुए कहा कि किसी भी धर्म और समुदाय के लोगों के लिए प्रदेश में सिर्फ एक ही शादी की अनुमति है। विवाह  के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं की 18 वर्ष ही रहेगी। मौखिक तलाक को पूरी तरह गैर-कानूनी माना जाएगा। शादी और तलाक का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किये जाने के साथ ही विधेयक में  हलाला जैसी प्रथा को दंडनीय अपराध माना गया है। यूसीसी में बेटों और बेटियों को संपत्ति के उत्तराधिकार में समान अधिकार दिए गए हैं। इसके अलावा मृतक बच्चे की संपत्ति में उसके परिवार के साथ ही माता-पिता भी बराबर हिस्से के अधिकारी होंगे। लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए भी अनेक शर्तें और कानूनी आवश्यकताएं पूरी करनी होंगी। जिनके उल्लंघन पर सजा और अर्थडण्ड भोगना होगा। ऐसे जोड़ों द्वारा उत्पन्न संतान अवैध नहीं कहलाएगी  , साथ ही सम्बन्ध विच्छेद पर महिला गुजारा भत्ते की अधिकारी होगी। मुख्यमंत्री श्री यादव के अनुसार  समान नागरिक संहिता को लेकर  सभी राजनीतिक दलों से सुझाव मांगे गए किंतु कांग्रेस पार्टी के प्रतिनिधि उसमें नहीं आए। उन्होंने दावा किया कि आम जनता से सुझाव मांगे जाने पर 80% मुस्लिम महिलाओं ने इसके पक्ष में अपनी राय दी। इस विधेयक को मुस्लिम विरोधी प्रचारित किये जाने के उत्तर में श्री यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से  म.प्र  में  ऐसा यूसीसी कानून लागू किया जाएगा  जिसमें  सभी धर्मावलंबियों को समान अधिकार और न्याय मिले। इस दावे के बावजूद प्रदेश विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस इस विधेयक का विरोध ही करेगी क्योंकि उसके मुताबिक  समान नागरिक संहिता की बात मुस्लिम विरोधी है। मुस्लिम धर्मगुरु भी इसे अपने पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप मानकर इसकी मुखालफत करते आये हैं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीन तलाक़ को गैर कानूनी बताये जाने के बाद इस समुदाय की महिलाओं द्वारा भी तीन तलाक़ और हलाला के विरुद्ध आवाजें उठाई जाने लगीं । लिव इन रिलेशनशिप से जुड़ी विकृतियाँ भी समस्या बड़ी सामाजिक समस्या बनती जा रही है। सबसे बड़ी बात ये है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के कारण बहुसंख्यक हिन्दू समाज में ये भावना तेजी से बढ़ती गई कि धर्मनिरपेक्ष होने की सारी जिम्मेदारी उसी के कन्धों पर है। सामाजिक कुरीतियों को मिटाने के लिए पंडित नेहरू की सरकार ने हिंदुओं में प्रचलित विवाह और उत्तराधिकार संबंधी परंपराओं को संशोधित करने के लिए तो कानून बना दिया किंतु मुस्लिम पर्सनल लॉ को छेड़ने की हिम्मत नहीं दिखा सके।  उसी भेदभाव के कारण  गंगा - जमुनी संस्कृति की अवधारणा धीरे - धीरे कमजोर पड़ती गई और बजाय अल्पसंख्यक के मुस्लिम समुदाय खुद को विशेषाधिकार संपन्न मानकर राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करने के साथ ही दबाव समूह बनने लगा। देश में जिस हिंदूवादी राजनीति का प्रादुर्भाव हुआ उसके पीछे मुस्लिम पर्सनल लॉ के नाम पर हुआ तुष्टीकरण ही प्रमुख कारण माना जाना चाहिए। हालांकि ईसाइयों के प्रति भी नरम रुख रखा गया किंतु जितनी छूट मुसलमानों को मज़हबी मामलों में मिली वह अनावश्यक ही नहीं आपत्तिजनक भी थी जिसके कारण देश में अलगाववाद को बढ़ावा मिला। स्व. राजीव गाँधी की  सरकार द्वारा शाह बानो संबंधी सर्वोच्च न्यायालय का फैसला उलटकर उसे और बढ़ावा दिया। भाजपा ने केंद्रीय सत्ता में आने के बाद से ही इस विसंगति को रोकने की दिशा में प्रयास किये तथा अपने शासन वाले अनेक प्रदेशों में समान नागरिक संहिता लागू करवाई। उसी क्रम में म.प्र सरकार ने भी जो साहस दिखाया उसके लिए वह प्रशंसा की हकदार है। विपक्ष को चाहिए इस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित करवाकर समाज को अच्छा संदेश देने में सहायक बने। 

 नागरिक संहिता विधेयक : म.प्र सरकार का साहसिक निर्णय

मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता में गत दिवस संपन्न म.प्र मंत्रीपरिषद की बैठक में यूसीसी ( समान नागरिक संहिता) विधेयक को स्वीकृति दिये जाने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि यह भाजपा के मूलभूत मुद्दों में रहा है। पार्टी द्वारा शासित अनेक राज्यों में ये पहले ही पारित किया जा चुका है। आज से प्रारंभ हुए विधानसभा के मानसून सत्र में इसे  पेश भी कर दिया गया। हालांकि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 342 और  366 (खंड 25) के तहत आने वाली भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया अनु जनजातियों पर लागू नहीं होगा। बैठक के बाद मुख्यमंत्री श्री यादव ने विधेयक पर चर्चा करते हुए कहा कि किसी भी धर्म और समुदाय के लोगों के लिए प्रदेश में सिर्फ एक ही शादी की अनुमति है। विवाह  के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं की 18 वर्ष ही रहेगी। मौखिक तलाक को पूरी तरह गैर-कानूनी माना जाएगा। शादी और तलाक का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किये जाने के साथ ही विधेयक में  हलाला जैसी प्रथा को दंडनीय अपराध माना गया है। यूसीसी में बेटों और बेटियों को संपत्ति के उत्तराधिकार में समान अधिकार दिए गए हैं। इसके अलावा मृतक बच्चे की संपत्ति में उसके परिवार के साथ ही माता-पिता भी बराबर हिस्से के अधिकारी होंगे। लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए भी अनेक शर्तें और कानूनी आवश्यकताएं पूरी करनी होंगी। जिनके उल्लंघन पर सजा और अर्थडण्ड भोगना होगा। ऐसे जोड़ों द्वारा उत्पन्न संतान अवैध नहीं कहलाएगी  , साथ ही सम्बन्ध विच्छेद पर महिला गुजारा भत्ते की अधिकारी होगी। मुख्यमंत्री श्री यादव के अनुसार  समान नागरिक संहिता को लेकर  सभी राजनीतिक दलों से सुझाव मांगे गए किंतु कांग्रेस पार्टी के प्रतिनिधि उसमें नहीं आए। उन्होंने दावा किया कि आम जनता से सुझाव मांगे जाने पर 80% मुस्लिम महिलाओं ने इसके पक्ष में अपनी राय दी। इस विधेयक को मुस्लिम विरोधी प्रचारित किये जाने के उत्तर में श्री यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से  म.प्र  में  ऐसा यूसीसी कानून लागू किया जाएगा  जिसमें  सभी धर्मावलंबियों को समान अधिकार और न्याय मिले। इस दावे के बावजूद प्रदेश विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस इस विधेयक का विरोध ही करेगी क्योंकि उसके मुताबिक  समान नागरिक संहिता की बात मुस्लिम विरोधी है। मुस्लिम धर्मगुरु भी इसे अपने पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप मानकर इसकी मुखालफत करते आये हैं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीन तलाक़ को गैर कानूनी बताये जाने के बाद इस समुदाय की महिलाओं द्वारा भी तीन तलाक़ और हलाला के विरुद्ध आवाजें उठाई जाने लगीं । लिव इन रिलेशनशिप से जुड़ी विकृतियाँ भी समस्या बड़ी सामाजिक समस्या बनती जा रही है। सबसे बड़ी बात ये है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के कारण बहुसंख्यक हिन्दू समाज में ये भावना तेजी से बढ़ती गई कि धर्मनिरपेक्ष होने की सारी जिम्मेदारी उसी के कन्धों पर है। सामाजिक कुरीतियों को मिटाने के लिए पंडित नेहरू की सरकार ने हिंदुओं में प्रचलित विवाह और उत्तराधिकार संबंधी परंपराओं को संशोधित करने के लिए तो कानून बना दिया किंतु मुस्लिम पर्सनल लॉ को छेड़ने की हिम्मत नहीं दिखा सके।  उसी भेदभाव के कारण  गंगा - जमुनी संस्कृति की अवधारणा धीरे - धीरे कमजोर पड़ती गई और बजाय अल्पसंख्यक के मुस्लिम समुदाय खुद को विशेषाधिकार संपन्न मानकर राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करने के साथ ही दबाव समूह बनने लगा। देश में जिस हिंदूवादी राजनीति का प्रादुर्भाव हुआ उसके पीछे मुस्लिम पर्सनल लॉ के नाम पर हुआ तुष्टीकरण ही प्रमुख कारण माना जाना चाहिए। हालांकि ईसाइयों के प्रति भी नरम रुख रखा गया किंतु जितनी छूट मुसलमानों को मज़हबी मामलों में मिली वह अनावश्यक ही नहीं आपत्तिजनक भी थी जिसके कारण देश में अलगाववाद को बढ़ावा मिला। स्व. राजीव गाँधी की  सरकार द्वारा शाह बानो संबंधी सर्वोच्च न्यायालय का फैसला उलटकर उसे और बढ़ावा दिया। भाजपा ने केंद्रीय सत्ता में आने के बाद से ही इस विसंगति को रोकने की दिशा में प्रयास किये तथा अपने शासन वाले अनेक प्रदेशों में समान नागरिक संहिता लागू करवाई। उसी क्रम में म.प्र सरकार ने भी जो साहस दिखाया उसके लिए वह प्रशंसा की हकदार है। विपक्ष को चाहिए इस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित करवाकर समाज को अच्छा संदेश देने में सहायक बने। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 18 July 2026

वांगचुक को बलि का बकरा बनाया काॅकरोच जनता पार्टी ने



इसका संकेत तो गुरुवार को ही मिल गया था जिस दिन दिल्ली उच्च न्यायालय ने सरकार को निर्देशित किया था कि वह  दिल्ली के जंतर मंतर पर अनशनरत लद्दाख़ की चर्चित शख्सियत सोनम वांगचुक का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण करवाए और जरूरत होने पर उनकी चिकित्सा का प्रबंध भी करे। उल्लेखनीय है नीट परीक्षा के पर्चे लीक होने के बाद सोशल मीडिया पर धूमकेतु की तरह उभरी काॅकरोच जनता पार्टी द्वारा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग को लेकर लगातार किये जा रहे आंदोलन का जब कोई प्रभाव नहीं पड़ा तब राजधानी दिल्ली में जंतर मंतर पर श्री वांगचुक को अनशन पर बिठा दिया गया। लद्दाख़ को पूर्ण राज्य बनाये जाने की मांग को लेकर वे आंदोलन का नेतृत्व करते रहे हैं और कुछ महीनों तक जेल में भी रहे। लेकिन ये बात संदेहों को जन्म देती है कि अमेरिका में बैठे अभिजीत दीपके नामक व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर काॅकरोच जनता पार्टी नामक एक संगठन की घोषणा की और देखते - देखते ही उसके साथ लाखों अनुयायी जुड़ते चले गए। उसके बाद जब वह भारत लौटा तब एक वर्ग विशेष ने उसे मसीहा बनाना चाहा किंतु दिल्ली आने के कुछ घंटों बाद ही जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन  ने काॅकरोच जनता पार्टी के ढोल की पोल खोल दी। अभिजीत को लगा था कि देश का युवा उन्हें हाथों - हाथ लेगा। लेकिन दिल्ली के अलावा भी वे जहाँ - जहाँ गए उनके आयोजन फ्लॉप शो साबित हुए। अंततः दिल्ली में अनशन का फैसला लिया गया और बजाय खुद मैदान संभालने के श्री वांगचुक को अनशन पर बिठा दिया। अभिजीत समझ चुके थे कि उनके नाम में वह आकर्षण नहीं है लिहाजा वांगचुक के कंधे पर बन्दूक रखकर निशाना लगाना चाहा। लेकिन ये दाँव भी कारगर नहीं रहा। जेएनयू और  कुछ ढपलीबाज   वामपंथी छात्रों को छोड़कर न तो वे युवा आये जिनके लिए वांगचुक को भूखा रखा गया और न आम जनता। राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने अनशन स्थल पर आकर मगरमच्छी आँसू तो खूब बहाये लेकिन मैदानी समर्थन नहीं दिया। यही वजह रही कि आंदोलन न गति पकड़ सका और न ही उसकी कोई दिशा ही स्पष्ट हुई। शिक्षा मंत्री का त्यागपत्र मांगने से हटकर जंतर मंतर में टुकड़े - टुकड़े  गैंग के देश विरोधी नारे गूंजने लगे। असल में इस आंदोलन को फुस्स करवाने में सभी प्रमुख विपक्षी दलों की भूमिका रही। अरविंद केजरीवाल भले ही श्री वांगचुक को शिक्षा मंत्री बनाये जाते जाने की मांग कर अपने को उनका हितैषी साबित करना चाह रहे हों लेकिन। उनकी पार्टी भी नहीं चाहती कि काॅकरोच जनता पार्टी उसका विकल्प बन जाए। आज पुलिस ने श्री वांगचुक को उठाकर अस्पताल भेज दिया जिसके बाद अब अभिजीत दीपके ने अनशन करने का ऐलान कर दिया। लेकिन नीट परीक्षा का परिणाम घोषित होने से इस आंदोलन की धार पहले ही कमजोर पड़ चुकी है। सोमवार से संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है। विपक्षी पार्टियां  उसमें सरकार को घेरकर राजनीतिक फ़ायदा उठाना चाहेंगी। इसीलिए उन्होंने इस आंदोलन को दिखावटी समर्थन तो दिया किंतु  जंतर मंतर की सीमा से बाहर नहीं आने दिया। सरकार पर अनशन की उपेक्षा का जो आरोप है उसमें दम इसलिये नहीं है क्योंकि काॅकरोच जनता पार्टी अभी तक संगठित स्वरूप नहीं ले सकी। और श्री वांगचुक का इस आंदोलन से जुड़ना भी अप्रासंगिक था। उनकी छवि  आंदोलनजीवी की बन जाने से वे मीडिया की सुर्खियों में सिमटकर रह गये। रही - सही कसर पूरी कर दी जेएनयू के छात्र - छात्राओं ने जो बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बनकर समूचे आंदोलन पर अतिक्रमण कर बैठे। हिंदू देवी - देवताओं का अपमान करने वाले एक स्टैंड अप कामेडियन ने भी आंदोलन को पलीता लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सच कहें तो काॅकरोच जनता पार्टी ने एक अच्छे भले मुद्दे का कचरा कर दिया। स्मरणीय है किसान आंदोलन अपने साथ देश भर के किसानों को नहीं जोड़ पाने के कारण अपनी मौत मर गया था, वहीं शाहीन बाग का धरना भी अंततः फुस्स होकर रह गया। ठीक वैसे ही ये आंदोलन भी अधोगति को प्राप्त हो रहा है  ये कहना गलत नहीं होगा कि काॅकरोच जनता पार्टी ने सोनम वांगचुक की जान खतरे में डालकर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने की जो चाल चली थी वह उल्टी पड़ गई और अभिजीत दीपके का नौ नौसिखियापन भी उजागर हो गया। 

-रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 17 July 2026

बांग्लादेश के साथ जैसे को तैसा की नीति अपनानी चाहिए



बांग्लादेश से रिश्ते सुधरने की उम्मीदें धीरे - धीरे खत्म होती जा रही हैं।  चीन को मोंगला बंदरगाह के समीप इकौनोमिक ज़ोन के  विकास का काम सौंपने के बाद  गत दिवस उसने भारतीय सीमा से बेहद नजदीक स्थित तीस्ता परियोजना भी उसको सौंप दी जो इसके लिए उसे 7 हजार डॉलर का ऋण देगा। भारत ने इसके लिए 9 हजार करोड़ का प्रस्ताव दिया था। ऐसा ही मोंगला परियोजना को लेकर हुआ था। उल्लेखनीय है शेख हसीना के शासनकाल में भारत और बांग्लादेश के रिश्ते काफी सुधर गए थे। यद्यपि कट्टरपंथी मुस्लिम वहाँ रह रही हिन्दु आबादी पर अत्याचार करने से बाज नहीं आते थे। मंदिरों सहित हिंदुओं के धर्मस्थलों पर हमले आम बात थी। बावजूद इसके सरकारी स्तर पर संवाद बना रहा और अनेक लंबित विवाद भी सुलझे । लेकिन हसीना  का तख्ता उलटने के बाद स्थितियाँ पूरी तरह बिगड़ गईं। दरअसल उनको भारत में। पनाह दिये जाने से बांग्ला देश की अंतरिम सरकार के मुखिया मो. युनुस को बहाना मिल गया। हालांकि उनका झुकाव पहले से ही चीन की तरफ था। लेकिन चुनाव के बाद जब तारिक रहमान भारी बहुमत से प्रधानमंत्री बने तब शुरुआत में ये लगा था कि संभवतः बांग्लादेश दोबारा भारत के साथ सम्बन्ध सुधारेगा। लेकिन शेख हसीना का भारत में बने रहना आड़े आ गया। उनकी गैर मौजूदगी में ही उन्हें मृत्युदंड सुनाया जा चुका है। बांग्लादेश सरकार लगातार उनकी वापसी के लिए दबाव बनाती रही है जिसे भारत ने नजरंदाज कर दिया। जाहिर है इससे उसकी नाराजगी बढ़ी होगी। हालांकि अपने जन्म के कुछ बरस बाद शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या होने के बाद से बांग्लादेश में बैठे सभी शासक भारत से दुश्मनी की राह पर चले। हसीना के कार्यकाल को जरूर अपवाद कहा जा सकता है। लेकिन उसके बाद से ये देश भारत विरोधी ताकतों से जुड़ने लगा। बांग्लादेश के नये शासक  तारिक रहमान लंबे समय तक विदेश में रहे हैं। इसीलिए उनसे उम्मीद रही कि वे कट्टरता को त्यागकर भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के साथ संबंध कायम करने आगे आयेंगे। लेकिन चीन के साथ किये ताजा  समझौतों से ये साफ हो चला है कि वे भी अपने मरहूम  पिता और माँ की तरह से ही भारत विरोध की मानसिकता के वशीभूत हैं। यद्यपि हाल ही में शेख हसीना ने ये कहते हुए सबको चौंका दिया था कि वे आगामी दिसम्बर माह में ढाका लौटकर अदालत के समक्ष आत्म समर्पण करते हुए फांसी की सजा रद्द करने की अपील करेंगी। उसके बाद ऐसा लगा था कि दोनों देशों के रिश्तों में चली आ रही तल्खी दूर होने लगी है। लेकिन तारिक रहमान द्वारा चीन की यात्रा और फिर दो महत्वपूर्ण परियोजनाओं के विकास हेतु भारत के प्रस्तावों को ठुकराते हुए चीन की गोद में बैठ जाने के बाद इस बात में कोई शंका नहीं रह गई है कि हमारा ये पड़ोसी भी हमारे दुश्मनों के साथ मिल गया है। तीस्ता परियोजना भारत की सीमा से महज 20 - 22 कि.मी दूर होने से हमारी सुरक्षा के लिए खतरा है। सिलिगुड़ी कारीडोर वैसे भी बेहद संवेदनशील माना जाता है। प. बंगाल में भाजपा सरकार बन जाने के बाद बांग्लादेश सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने के अभियान में तेजी के अलावा घुसपैठियों को वापस भेजने जैसी कारवाई से बांग्लादेश भन्नाया हुआ है। असम की भाजपा सरकार भी अवैध घुसपैठ को रोकने के लिए बेहद आक्रामक है। चीन के साथ तारिक रहमान सरकार रक्षा समझौते भी कर रही है। निश्चित रूप से उसके ताजा कदम विशुद्ध रूप से भारत विरोधी मोर्चेबंदी ही है। आश्चर्य तो तब होता है जब बांग्लादेश उस पाकिस्तान के साथ गलबहियाँ करने में भी नहीं हिचकता जिसने उसकी जनता पर अमानुषिक अत्याचार किये थे। पाकिस्तान के कब्जे से से उसे मुक्त करने में भारत ने जो सैन्य कारवाई की और करोड़ों बांग्लादेशियों को शरण दी उसके प्रति कृतज्ञता की बजाय बांग्लादेश भारत के साथ हर वह हरकत करने पर आमादा है जो किसी शत्रु देश के साथ की जाती है। ऐसे में भारत को उसके साथ किसी भी प्रकार की सहानुभूति रखने से बचते हुए कड़ाई से पेश आना चाहिए क्योंकि चीन का वहाँ बैठना हमारी सुरक्षा के लिए चिंता पैदा करने वाला है। सबसे बड़ा कदम उन घुसपैठियों की वापसी का उठाया जाए जो हमारी अर्थव्यवस्था पर बोझ के साथ ही आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बने हुए हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी