Saturday, 20 June 2026

राम मंदिर घोटाले से दुनिया भर के हिंदुओं के उत्साह को धक्का पहुंचा


अयोध्या का राम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं अपितु दुनिया भर में फैले करोड़ों सनातन धर्म के अनुयायियों की आस्था का सर्वोच्च केंद्र है। सैकड़ों वर्षों के संघर्ष एवं अनेकानेक बलिदानों के बाद इस मंदिर का निर्माण संभव हो सका। इसके लिए बड़े - बड़े धनकुबेरों से लेकर साधारण आर्थिक स्थिति वाले हिंदुओं ने भी यथाशक्ति सहयोग प्रदान किया। मंदिर निर्माण के साथ ही अयोध्या नगरी को उसकी प्राचीन भव्यता के अनुरूप विकसित कर वहाँ समस्त आधुनिक  सुविधाएं उपलब्ध करवाई गईं। इसके कारण श्रद्धालुओं का तांता लगने लगा। देखते ही देखते अयोध्या ने वेटिकन सिटी तक का रिकार्ड तोड़ दिया। हिंदुओं के मंदिरों में दान चढ़ावे की परंपरा का निर्वहन करते हुए श्रद्धालुओं ने न सिर्फ नगद राशि बल्कि सोना - चांदी जैसी बहुमूल्य धातुओं का भी दान किया। तिरुपति बालाजी की तरह ही अयोध्या का राम मंदिर भी दानदाताओं के सहयोग से काफी समृद्ध होने लगा। जो भी यहाँ के दर्शनों हेतु आया मंदिर में उपलब्ध सुविधाओं और व्यवस्थाओं  की प्रशंसा किये बिना नहीं रह सका। लेकिन हाल ही में मंदिर की व्यवस्था से जुड़े कुछ कर्मचारियों और पदाधिकारियों पर ये आरोप लगा कि उन्होंने चढ़ावे और दान की राशि में हेराफेरी की। जाँच और छापेमारी में कुछ लोगों के यहाँ से करोड़ों रुपये और सोना - चांदी वगै़रह मिले। जाँच हेतु गठित एस. आई. टी पूछताछ करने के उपरांत एक - दो दिन में अपनी रिपोर्ट उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंप देगी। उल्लेखनीय है गत दिवस अयोध्या पहुंचकर राम मंदिर के दर्शन करने के बाद योगी जी ने दूध का दूध, पानी का पानी करने के साथ ही दोषियों को कठोरतम दंड देने का आश्वासन दिया। लेकिन इस कांड में  दान और चढ़ावे के गबन के साथ जिन ट्रस्टियों का नाम जुड़ा हुआ है वे सब प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर रास्वसंघ और भाजपा से जुड़े हैं। नृपेन मिश्र जैसे पूर्व नौकरशाह भी केंद्र सरकार के विश्वासपात्र हैं जिन्हें मंदिर निर्माण समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। गत दिवस उनका एक साक्षात्कार टीवी पर प्रसारित हुआ जिसमें उन्होंने ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को निर्दोष बताने के साथ ही स्वीकार किया कि विश्वासपात्र लोगों को दायित्व देने के बाद निगरानी में कमी से ये घोटाला संभव हुआ। जिन लोगों पर संदेह है वे किसी न किसी ट्रस्टी से जुड़े होने से संदेह की सुई उन पर भी जाकर टिक रही है। दान में प्राप्त बहुत सी बहुमूल्य वस्तुओं का रिकार्ड न मिलना जाँच में सामने आया है। अनेक दान दाताओं ने इस आशय की शिकायत भी की है। बहरहाल जाँच पूरी हो जाने पर ही घोटाले का आकार और घोटालेबाजों के चेहरे सामने आएंगे। हो सकता है सीबीआई को भी जाँच की जिम्मेदारी दी जाए। लेकिन इस कांड से राम मंदिर के निर्माण से जुड़े तमाम लोगों की पुण्यायी मिट्टी में मिल गई फिर चाहे वे संघ, भाजपा या विहिप के हों या अन्य किसी क्षेत्र के ।  धार्मिक स्थलों की दान पेटियों में होने वाले घपले नई बात नहीं हैं। धार्मिक ट्रस्टों   की संपत्ति पर अवैध कब्जे भी  आम है। ये बुराई केवल हिंदुओं तक ही सीमित नहीं है। वक़्फ़ और ईसाई समुदाय की संपतियों पर भी उसी के प्रभावशाली लोगों ने कब्जे कर रखे हैं। लेकिन राम मंदिर को सामान्य धार्मिक स्थल नहीं माना जा सकता। भगवान राम के मंदिर तो पूरी दुनिया में है किंतु अयोध्या में बना ये मंदिर हर दृष्टि से विशेष है। इसके साथ आस्था भी जुड़ी है और राष्ट्रीयता की भावना भी। ये कहने में भी कोई गलती नहीं है कि इसके निर्माण से राष्ट्रीय स्वाभिमान और गौरव की वैसी ही पुनर्स्थापना हुई जैसी सोमनाथ के मंदिर के पुनरुद्धार से हुई थी। इसके निर्माण के बाद पूरी दुनिया में जो उत्साह उत्पन्न हुआ उसे इस घोटाले से धक्का पहुंचा है। मुख्यमंत्री योगी को चाहिए वे  अपने आश्वासन के अनुरूप दोषियों को इतना कठोर दंड दिलवाएं जिससे आइंदा किसी में ऐसा करने का दुस्साहस न हो। इसी के साथ संघ और विहिप को भी अपने लोगों की प्रमाणिकता के प्रति सतर्क रहना होगा क्योंकि   इन संगठनों के बारे में हिन्दू समाज के बड़े हिस्से में विश्वास का भाव है। 



- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 19 June 2026

ईरान के बंधन मुक्त हो जाने से प. एशिया के समीकरण बदले

 

अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते  की खबर से दुनिया ने राहत की सांस ली है। 19 जून को यह समझौता विधिवत लागू होगा। हालांकि  होर्मुज से तेल और गैस टैंकरों वाले जहाजों का निकलना शुरू हो जाने से लगभग चार माह से चले आ रहे तेल और गैस संकट में कुछ कमी आयेगी । लेकिन हालात पूरे तौर पर सामान्य होने में कई महीने लग सकते हैं क्योंकि ईरान ने इस समुद्री क्षेत्र में जो बारूदी सुरंगें बिछा रखी हैं उन्हें हटाने में समय लगेगा। दूसरा पेच ये भी है कि 6 माह बाद ईरान द्वारा ओमान के साथ मिलकर इस जल मार्ग का उपयोग करने वाले जहाजों से टोल वसूलने की तैयारी की जा रही है जो  विवाद का नया कारण बन सकती है।  इसी तरह ईरान को दी जाने वाली क्षति पूर्ति की राशि को लेकर अमेरिका द्वारा हाथ खींच लिए जाने के बाद सऊदी अरब, दुबई  , ओमान, कतर आदि परेशान हैं क्योंकि अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस इन देशों पर दबाव बना रहे है कि वे ईरान को हुए नुकसान की भरपाई करें जबकि ईरान की मिसाइलों ने इन तेल उत्पादक देशों की इकाइयों को जो नुकसान पहुंचाया उससे उबरने में उन्हें कम से कम एक साल लगेगा। इससे अलग हटकर देखें तो प. एशिया में स्थायी शांति तब तक नहीं आ सकती जब तक इजराइल के अस्तित्व को ईरान सहित अरब जगत के सभी मुस्लिम देश मान्य नहीं करते। यद्यपि जोर्डन, मिस्र, ओमान, सं. अरब अमीरात आदि इजराइल से रिश्ते कायम कर चुके हैं किंतु ईरान के अलावा , तुर्किये और पाकिस्तान जैसे कुछ मुस्लिम देश इजराइल के  अस्तित्व को मंजूर नहीं करते। और फिर जिस समझौते को लेकर पूरा विश्व प्रसन्न है उससे दूरी बनाकर  इजराइल ने लेबनान पर हमले जारी रखते हुए संकेत दे दिया कि वह अपने रास्ते खुद तय करेगा। यद्यपि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस ने इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू और समझौते का विरोध कर रहे उनके मंत्रियों को काफी भला - बुरा कहा किंतु इजराइल ने अपनी सैन्य कारवाई को रोकने से इंकार कर दिया जिसके कारण समझौते के पहले आज होने वाली बैठक रद्द हो गई। ईरान लगातार दोहरा रहा है कि लेबनान पर हमले नहीं रुके तब वह शांत नहीं बैठेगा। इस सबसे लगता है कि अमेरिका तो अपना पिंड छुड़ाकर निकला जा रहा है किंतु प. एशिया में अशांति के बीज अभी भी मिट्टी में दबे हैं जो जरा सी नमी मिलते ही पनप सकते हैं। एक बात और जो दुनिया भर की चिंता का कारण बन गई वह है ईरान का छुट्टा हो जाना। अमेरिका ने उसे तेल बेचने की छूट के अलावा उसकी जप्त दौलत मुक्त करने की अनुमति देकर प.एशिया में एक ताकतवर शक्ति केंद्र की जड़ें जमा दीं। ईरान ने इस यद्ध में अपनी मारक क्षमता से अमेरिका जैसी महाशक्ति तक का मुकाबला किया। इजराइल के अभेद्य समझे जाने वाले आयरन डोम भी उसकी मिसाइलों को न रोक सके। शुरुआत में  लड़ाई में एक पक्ष अमेरिका और इजराइल थे वहीं मुकाबले में था ईरान। अपने सर्वोच्च शासक खामेनेई की हत्या के बाद उसका हौसला थोड़ा तो हिला किंतु उसने चतुराई पूर्वक अन्य खाड़ी देशों को निशाना बनाकर युद्ध क्षेत्र का विस्तार कर दिया जिससे अमेरिका पर दबाव बढ़ने लगा। कुल मिलाकर डोनाल्ड ट्रंप की मूर्खता से प्रतिबंधों से जकड़े ईरान को नई आजादी मिल गई और वह भी ताकत के बल पर। इसीलिए जो लोग सोचते हैं कि इस समझौते से युद्ध बंद हो जाएगा और प. एशिया में सामान्य स्थितियां लौटेंगी वे ज्यादा दूर तक देखने में सक्षम नहीं हैं। सच्चाई ये है कि अमेरिका ने अपने आप को भले इस युद्ध से अलग कर लिया किंतु इजराइल, होर्मुज और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर प. एशिया में तलवारें म्यान से बाहर आती रहेंगी। अमेरिका की मजबूरी ये भी है कि इस क्षेत्र में उसके आर्थिक और सामरिक हित भी हैं। यदि उसने पूरी तरह दूरी बनाई तब चीन और रूस बिना देर गंवाये ईरान के जरिये अपना वर्चस्व इस तेल संपन्न इलाके में बढ़ाएंगे । भारत को इस घटनाक्रम पर पैनी नजर रखनी चाहिए क्योंकि चीन की उपस्थिति पाकिस्तान के लिए हितकारी होगी। ऐसे में हमें नये सिरे से कूटनीतिक बिसात बिछानी पड़ेगी। वैसे सं. अरब अमीरात, ओमान, कतर, जोर्डन, सऊदी अरब आदि से हमारे रिश्ते मजबूत हैं। और इजराइल समर्थक होने पर भी ईरान से हमारे संबंध यथावत हैं। लेकिन कूटनीति में कब कौन बदल जाए कहना मुश्किल है। यदि अमेरिका ने अपने दत्तक पुत्र इजराइल को ठेंगा दिया तब कुछ भी संभव है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 18 June 2026

ट्रंप के आश्वासन भरासे लायक नहीं



फ्रांस में चल रहे जी 7 सम्मेलन  में  सभी विषयों पर अमेरिका - ईरान युद्ध हावी रहा क्योंकि बीते कुछ महीनों से उसके चलते पूरी दुनिया का ध्यान बाकी समस्याओं से हट सा गया था। हालांकि रूस और यूक्रेन युद्ध ने भी वैश्विक व्यवस्था पर काफी असर डाला किंतु ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमले के बाद उत्पन्न परिस्थितियों ने पेट्रोल, डीजल और गैस आदि की आपूर्ति बाधित कर दी। परिणाम स्वरूप  कीमत  बढ़ जाने से सभी देशों की अर्थव्यवस्था पर विपरीत असर पड़ने लगा। तेल संयंत्रों को हुए नुकसान के कारण लंबे समय तक उत्पादन में कमी रहने की आशंका बढ़ती जा रही है।  युद्ध रोकने के लिए चल रही शांति प्रक्रिया में आ रही बाधाएं भी विचलित कर रही थीं। हालांकि आज अमेरिका और ईरान दोनों ने युद्ध रुकने की पुष्टि कर समूचे विश्व को राहत प्रदान की। युद्ध विराम कितना कारगर होगा ये तो भविष्य ही बताएगा क्योंकि  इजराइल में इस समझौते का जिस तरह विरोध हो रहा है उसे देखते हुए स्थायी शांति  की उम्मीद संदेह के घेरे में ही रहेगी। इसी बीच  डोनाल्ड ट्रंप द्वारा जी 7 सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ में जो बातें कहीं उनमें कुछ भी नयापन नहीं है। पूर्व में भी वे श्री मोदी को अपना दोस्त बताते हुए ऐसी ही टिप्पणियां करते रहे हैं। लेकिन उसी के साथ ही भारत पर टैरिफ बढ़ाने के अलावा मनमाने प्रतिबंध लगाने से भी बाज नहीं आये। डोनाल्ड ट्रंप के  बेसिर पैर वाले दावों की शुरुआत ऑपरेशन सिंदूर के समय से हुई जब उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम करवाने का श्रेय खुद को देकर शांति के नोबल पुरस्कार के लिए दावा कर दिया। हद तो तब हो गई जब पाकिस्तान ने उनके नाम की सिफारिश भी कर दी। ईरान पर हमले के बाद की गई उनकी घोषणाओं को देखें तो साफ हो जाता है कि वे अपनी बात से पलट जाने वाले इंसान हैं जिन्हें  पद की गरिमा की रत्ती भर भी परवाह नहीं रहती। इसीलिए अमेरिका जैसी महाशक्ति के राष्ट्राध्यक्ष होने के बाद भी ट्रंप की छवि एक मसखरे की बन चुकी है। गत दिवस उन्होंने श्री मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक में ये कहकर सनसनी फैला दी कि उनके राष्ट्रपति रहते हुए यदि भारत पर कोई हमला होता है, तो अमेरिका बिना किसी औपचारिक लिखित समझौते के भी भारत की मदद करेगा। साथ ही उन्होंने श्री मोदी को सख्त रणनीतिकार बताते हुए माना कि उनके नेतृत्व में भारत दुनिया के लिए बहुत अहम भूमिका निभा रहा है। ट्रंप का यह बदला हुआ रुख श्री मोदी द्वारा होर्मुज में व्यापारिक जहाजों पर हुए  अमेरिकी हमलों में भारतीय नाविकों की जान जाने का मुद्दा उठाये जाने के बाद सामने आया। समुद्री सुरक्षा और गैर सैनिक जहाजों को निशाना बनाये जाने पर भारत के विरोध को जी 7 सम्मेलन में अच्छा समर्थन मिलने और अनेक राष्ट्राध्यक्षों द्वारा श्री मोदी को दिये जा रहे सम्मान को देखकर  अमेरिकी राष्ट्रपति लचीला रुख अपनाने बाध्य हुए ।  और फिर द्विपक्षीय बातचीत के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री की तारीफ के पुल बांधते हुए बिना मांगे ही हमले के समय मदद का आश्वासन भी दे डाला। ये वही ट्रंप हैं जो ऑपरेशन सिंदूर  के बाद से पाकिस्तान को गोद में बिठाकर भारत को उपेक्षित करते रहे। और तो और  उसके सेनाध्यक्ष आसिफ मुनीर को साथ में  भोजन करवाने की तस्वीरें प्रचारित करने में भी शर्म नहीं की जबकि कूटनीतिक शिष्टाचार के लिहाज से मुनीर उनकी हैसियत से बहुत नीचे हैं।  ईरान युद्ध रूकवाने के लिए मध्यस्थता के लिए भी ट्रंप ने पाकिस्तान को आगे किया। वे सोचते रहे कि भारत इससे डर जायेगा और उनकी खुशामद करेगा। लेकिन न तो टैरिफ विवाद पर भारत झुका और न ही व्यापार डील में अपने हितों की सौदेबाजी की। रूस से कच्चे तेल की खरीदी में भी अमेरिकी दबाव को उपेक्षित करते हुए भारत ने यूरोपीय यूनियन सहित अनेक देशों से मुक्त व्यापार संधि हस्ताक्षरित कर ट्रंप को ठेंगा दिखा दिया । इसीलिए जी 7 सम्मेलन में उनको श्री मोदी और भारत के प्रति अपने झुकाव का प्रदर्शन करना पड़ा। लेकिन  दूसरे कार्यकाल में अब तक उनका जो आचरण रहा उसे देखते हुए  भारत को उन पर लेश मात्र विश्वास नहीं किया जा सकता। वैसे भी ईरान पर बेतहाशा बारूद बरसाने के बावजूद उसके साथ समझौते के लिए मजबूर ट्रंप के आश्वासन अब भरोसे लायक नहीं बचे। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 17 June 2026

उद्धव के पास न सत्ता बची न संगठन


प.बंगाल में ममता बैनर्जी की सरकार के धराशायी होते ही तृणमूल कांग्रेस दो फाड़ हो गई। पहले विधायक टूटे और फिर सांसदों ने भी  किनारा करते हुए अलग गुट बना लिया। चुनाव में लगे झटके से से वे उबर भी नहीं पाईं थीं कि पार्टी में आये बिखराव ने उनके राजनीतिक भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया। चुनाव परिणाम के बाद इंडिया गठबंधन को मजबूत कर राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का नेतृत्व करने की उनकी महत्वाकांक्षा भी  हवा में उड़ गई क्योंकि  विधानसभा और संसद दोनों ही में तृणमूल काँग्रेस की सदस्य संख्या अंगुलियों पर गिनने लायक ही बच रही है। बड़ी बात नहीं यदि आने वाले दिनों में ये बचे - खुचे भी  ममता का साथ छोड़कर चलते बनें। इसी बीच ये खबरें भी आने लगीं कि उद्धव ठाकरे के पास बची शिवसेना (यूबीटी) के 9 में से 6 सांसद भी एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ जुड़ने जा रहे हैं। इसे लेकर मुंबई से दिल्ली तक राजनीतिक हलचलें तेज हैं। उद्धव को ये समझ आ गया है कि पहले से ही ढह चुके उनके दुर्ग की बची - खुची दीवारें भी गिरने के कगार पर हैं। इसीलिए उन्होंने हताशा भरे स्वर में कहा कि जिसे जाना हो वह चला जाए। हालांकि उनके बड़बोले प्रवक्ता संजय राउत ने आदतानुसार आरोप लगा दिया कि पार्टी छोड़ रहे सांसदों को 50 - 50 करोड़ रु. का लालच दिया गया जिसमें 15 करोड़ दिये जा चुके हैं। हालांकि इसका कोई प्रमाण उन्होंने नहीं दिया। लेकिन इससे अलग हटकर देखें तो ये स्पष्ट हो जाएगा कि उद्धव के पास अपनी पार्टी को सहेजकर रखने का कोई आधार नहीं बचा। उनके स्वर्गीय पिता बाल ठाकरे राजनीति में हिंदुत्व के सबसे बड़े प्रतीक थे जिन्होंने कभी भी मुस्लिम तुष्टीकरण का सहारा नहीं लिया। लेकिन उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी उद्धव ने उस कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिला लिया जो अपनी मुस्लिम परस्ती के लिए कुख्यात हैं। और तो और वे  सत्ता के लालच में उस इंडिया गठबंधन में शामिल होने में भी नहीं सकुचाये जिसमें अखिलेश और तेजस्वी यादव के अलावा ममता बैनर्जी जैसे हिंदुत्व नाम से चिढ़ने वाले नेताओं के अलावा  वामपंथी और द्रमुक जैसी पार्टियां भी  हैं जिन्हें धर्म की अवधारणा से ही चिढ़ है। यही कारण रहा कि स्व. बाल ठाकरे के प्रखर हिंदुत्व से प्रभावित होकर शिवसेना से जुड़े तमाम लोग उद्धव द्वारा सत्ता की खातिर मुस्लिम परस्त पार्टियों के सामने झुकने से नाराज होकर  अलग हो गए । चूंकि भाजपा ही मौजूदा  दौर में हिंदुत्व की सबसे प्रखर और मुखर प्रवक्ता है लिहाजा एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में विधायकों की बगावत से उद्धव सत्ता से बाहर हुए और फिर पार्टी और चुनाव चिन्ह भी हाथ से निकल गए। 2024 के लोकसभा चुनाव  में महाराष्ट्र में इंडिया गठबंधन को जबरदस्त सफलता मिली तो उद्धव सहित कांग्रेस और एनसीपी जोश से भर उठीं। यद्यपि शरद पवार की पार्टी भी उसके पूर्व ही दो फाड़ हो चुकी थी। उनके भतीजे अजीत पवार ने बगावत कर चाचा से पार्टी छीन ली और भाजपा के साथ सत्ता में हिस्सेदारी कर ली। लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजों से मिली वह खुशी कुछ महीनों बाद ही मातम में बदल गई जब विधानसभा चुनाव में भाजपा , एकनाथ शिंदे और अजीत पवार के महायुति नामक  गठजोड़ ने प्रचंड जीत हासिल कर कांग्रेस, शरद पवार और उद्धव ठाकरे को चारों खाने चित्त कर दिया। यही कहानी स्थानीय निकाय चुनावों में भी दोहराई गई । लेकिन उद्धव ठाकरे को सबसे बड़ा धक्का लगा मुंबई में जब बीएमसी ( मुंबई महानगर पालिका) पर ठाकरे परिवार का दशकों पुराना कब्जा भी भाजपा ने समाप्त कर दिया। स्मरणीय है बीएमसी  अविभाजित शिवसेना का अभेद्य दुर्ग होने के साथ उसके लिए कुबेर का खजाना था। उसका बजट अनेक राज्यों से भी ज्यादा होने से ठाकरे परिवार इसके जरिये फलता - फूलता गया। लेकिन सत्ता और संगठन के साथ सैद्धांतिक पूंजी भी गंवाने के बाद उद्धव पूरी तरह प्रभाव शून्य हो चले हैं।  आधा दर्जन  सांसद और टूटे तो उनकी राजनीतिक जमीन पूरी तरह खिसक जाएगी। यद्यपि इस स्थिति के लिए ममता बैनर्जी की तरह वे भी भाजपा को दोषी ठहराएँगे। लेकिन वे अपने पिता स्व. बाल ठाकरे के कट्टर अनुयायियों को  अपने साथ जोड़कर नहीं रख पा रहे तो यह उनकी कमजोरी है ।  इसलिए पार्टी के सत्यानाश का कसूरवार भी वही हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 16 June 2026

शांति समझौते का भविष्य इसराइल के रुख पर निर्भर

मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस : संपादकीय
- रवीन्द्र वाजपेयी

शांति समझौते का भविष्य इसराइल के रुख पर निर्भर

अब ये मानकर चला जा सकता है कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता हस्ताक्षरित होने जा रहा है। उसके प्रारूप पर दोनों देशों की ओर से हस्ताक्षर किये जाने के बाद  रविवार को स्विटजरलैंड के जिनेवा शहर में उसे अंतिम रूप दिया जाएगा।  रोचक बात है कि  इस समझौते के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ के साथ ही चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ आसिफ मुनीर ने  काफी दौड़ भाग की। इस्लामाबाद में दोनों पक्षों के बीच वार्ताएं भी हुईं किंतु जब समझौते को अंतिम रूप देने का अवसर आया तब  पाकिस्तान की राजधानी को ठेंगा दिखाते हुए अमेरिका और ईरान ने जिनेवा  पसंद किया। इससे लगता है कि पाकिस्तान की भूमिका संदेश वाहक तक ही सीमित रही। बहरहाल अब समझौते को अंतिम रूप दिया जा चुका है तब इस बात का विश्लेषण होने लगा है कि किसने क्या खोया क्या पाया? जो विवरण  आया है उसके मुताबिक जो मुख्य बातें हैं उनमें ईरान द्वारा होर्मुज जलमार्ग को खोलना और अमेरिका द्वारा ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी खत्म करना है। इसके अलावा ईरान के पुनर्निर्माण हेतु अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान को 300 अरब डॉलर देंगे।  ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगने के बारे अन्तिम फैसले हेतु 60 दिन की समय सीमा निर्धारित किये जाने से लगता है अमेरिका और ईरान दोनों इस बेनतीजा जंग से ऊब चुके हैं और किसी तरह से अपना पिंड छुड़ाना चाहते हैं। लेकिन इस युद्ध के लिए अमेरिका को मनाने वाले इसराइल का रुख दूध में नींबू निचोड़ने वाला है। उसने साफ - साफ कह दिया है कि वह इस समझौते से पूरी तरह दूर रहेगा और लेबनान पर उसके हमले नहीं रुकेंगे। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की धौंस भी बेअसर साबित हुई। पहले तो ईरान भी इस बात पर अड़ा हुआ था कि लेबनान पर इसराइल की सैन्य कारवाई रुके बिना समझौते की गाड़ी आगे नहीं बढ़ेगी। लेकिन ऐसा लगता है तीन महीने से चली आ रही जंग ने उसके हौसले भी कमजोर कर दिये। हालांकि ऊपरी तौर पर वह अपने को बेहद मजबूत दिखाता है लेकिन अमेरिका और इसराइल की मिसाइलों से समूचा देश खंडहर में तब्दील हो चुका है। जनता भी बेतहाशा महंगाई और दैनिक उपयोग की वस्तुओं के अभाव से आक्रोशित है। मूलभूत ढांचा बुरी तरह चरमरा जाने से सर्वत्र अव्यवस्था है। ऐसे में ईरान के नेतृत्व को ये डर लगने लगा कि अवसर का लाभ उठाकर अमेरिका कहीं सत्ता परिवर्तन न करवा दे जो इस युद्ध के सबसे प्रमुख उद्देश्यों में था। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि अमेरिका और ईरान  पर उनके समर्थक देशों का दबाव भी युद्धविराम के लिए बढ़ता जा रहा था। तेल उत्पादक देशों की बिक्री रुक जाने से उनकी अर्थव्यवस्था का भी कचूमर निकलने लगा था। ये देश अमेरिका पर जंग रुकवाकर हालात सामान्य करने का आग्रह कर रहे थे वहीं चीन जैसे ईरान के संरक्षक भी उसे सलाह दे रहे थे कि जैसे भी हो युद्ध रोकने का रास्ता निकाला जाए क्योंकि उनको भी तेल संकट की चिंता सताने लगी थी। इस प्रकार एक दूसरे को बर्बाद करने पर आमादा अमेरिका और ईरान ने न चाहते हुए भी ऐसे समझौते को स्वीकार करने का मन बना लिया जिसकी सफलता को लेकर वे खुद भी आश्वस्त नहीं हैं। इसराइल द्वारा अमेरिका की बात न मानना निश्चित रूप से चौंकाता है किंतु एक संभावना ये भी है कि ऐसा करने के लिए उसे डोनाल्ड ट्रम्प ने ही उकसाया हो 2। प. एशिया में इसराइल और अमेरिका की जुगलबंदी से इस तरह के कूटनीतिक दाँव - पेच नये नहीं हैं।  इस  प्रकार इस समझौते की सफलता इसराइल के रुख पर निर्भर करेगी क्योंकि उसने लेबनान पर हमले नहीं रोके तब ईरान भी उसके बचाव में कूदे बिना नहीं रहेगा। और ऐसा होने पर युद्ध ईरान विरुद्ध इसराइल की शक्ल ले लेगा जिसमें अमेरिका किसके साथ रहेगा ये बताने की जरूरत नहीं है। पूरी दुनिया इस समझौते के बाद तेल संकट के हल होने की जो उम्मीद लगा रही है वह आसानी से पूरी होने में संदेह ही है क्योंकि ईरान इतनी आसानी से चीजें अपने हाथ से निकलने नहीं देगा। यही बात इसराइल पर भी लागू होती है क्योंकि वह उस ईरान को कभी भी चैन से नहीं रहने देना चाहेगा जो उसे मिटाने पर आमादा हो। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 15 June 2026

अमेरिका और ईरान में समझौते के बाद भी शांति की गारंटी नहीं


अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते को लेकर  दावा किया जा रहा है कि आगामी 19 जून को दोनों उस पर हस्ताक्षर कर देंगे। हालांकि  इस तरह की घोषणाएं कई मर्तबा  सुनने में आईं लेकिन कभी अमेरिका को ईरान की शर्तें मंजूर नहीं हुईं तो कभी ईरान ने अमेरिकी प्रस्तावों पर  असहमति जाहिर करते हुए टांग अड़ा दी। इस विलंब के लिये इसराइल भी कम जिम्मेदार नहीं है जो ईरान के जबरदस्त विरोध के बावजूद लेबनान पर हमले रोकने तैयार नहीं है। हद तो तब हो गई जब उसके प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा की गई डाँट - डपट की परवाह तक नहीं की। अब जबकि ऐसा लग रहा है कि समझौता अंतिम चरण में पहुँच चुका है तब इसराइल ने ये कहकर सनसनी फैला दी कि वह इसका हिस्सा नहीं है। उल्लेखनीय है नेतन्याहू ही नहीं सऊदी अरब सहित अनेक अरब देश भी ट्रम्प से अनुरोध कर चुके हैं कि ईरान को पूरी तरह घुटनाटेक करवाये बिना लड़ाई रोकना भारी भूल होगी क्योंकि आगे भी वह पड़ोसी देशों के विरुद्ध आक्रामक रवैया अख्तियार करने से बाज नहीं आयेगा। दरअसल अमेरिका किसी भी तरह इस युद्ध से निकलना चाह रहा है क्योंकि उसे ये समझ में आ गया है कि बिना थल सेना उतारे ईरान को परास्त करना असंभव होगा। हालांकि वह ऐसा करने में सक्षम है किंतु वियतनाम और अफगानिस्तान के कड़वे अनुभवों को याद करने पर ट्रम्प उस दिशा में आगे बढ़ने से रुक गये। ईरान के विरुद्ध इस कारवाई का घोषित मकसद तो उसे परमाणु हथियार बनाने से रोकना था लेकिन असली बात है तेल का खेल।   रूस और ईरान द्वारा सस्ता तेल बेचे जाने से अमेरिका परेशान था क्योंकि उसका भरपूर लाभ भारत और चीन जैसे देश उठा रहे थे जिससे अमेरिका के पेट में मरोड़ होता आया है। और फ़िर ब्रिक्स नामक जिस संगठन ने डॉलर के दबदबे को समाप्त करने की पहल की उसमें भारत, चीन और ब्राज़ील के साथ ही ईरान भी शामिल हो गया। जहाँ तक प्रश्न  इसराइल का है तो उसकी और ईरान की दुश्मनी का कारण हमास , हिजबुल्ला और हूती जैसे इस्लामिक आतंकवादी संगठन हैं जिनकी पीठ पर ईरान का खुला हाथ है। इस जंग की जड़ में भी हमास द्वारा इसराइल पर किया गया हमला था जिसके बाद प. एशिया में युद्ध की आग भड़क उठी। इसराइल और ईरान के बीच सीधी लड़ाई भी उसी दौरान शुरू हुई थी जिसमें अमेरिका ने भी हिस्सा लिया और ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया। हालांकि  युद्धविराम तो हो गया लेकिन ईरान का आक्रामक रुक जारी रहने से इसराइल ने अमेरिका को इस बात के लिए राजी  कर लिया कि  उसकी कमर पूरी तरह तोड़ दी जाए। चूंकि ऐसा करने में अमेरिका के भी दूरगामी  स्वार्थ सिद्ध होते थे लिहाजा ट्रम्प भी तैयार हो गए। लेकिन वे ईरान द्वारा किये गए पलटवार का पूर्वानुमान लगाने में चूक गए। यही वजह रही कि जंग लंबी खिंचने के साथ ही अनेक देशों में फैल गई। बहरहाल समझौते के करीब पहुँचने के बाद भी ये आशंका बनी हुई है कि अंतिम क्षणों में भी ऐसा कुछ होगा जिससे कि शांति की उम्मीदें धरी रह जाएं। ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को अमेरिका की इच्छानुसार स्थगित कर देगा क्योंकि उसके पास यही तो सौदेबाजी का सबसे बड़ा हथियार है। उसने यूक्रेन के हश्र को भी देखा जो परमाणु शक्ति विहीन होने के दुष्परिणाम भोग रहा है। इसी तरह होर्मुज पर पूरी तरह नियंत्रण खत्म करने पर भी ईरान राजी हो जाएगा ये भी मुश्किल है।  एक बात और भी काबिले गौर है कि ईरान के भीतर भी इस संभावित समझौते के विरोध में सत्ता से जुड़ा एक तबका आवाज उठा  रहा है। उसका कहना है कि युद्ध रोकने की ज्यादा जरूरत ट्रम्प को है ऐसे में ईरान को अपनी शर्तों पर अड़े रहना चाहिए। अमेरिका द्वारा समझौते के जिन बिंदुओं की जानकारी दी जा रही है उसके अनुसार तो ईरान दबाव में आ गया लगता है। यद्यपि  जप्त संपत्ति लौटाने और युद्ध में हुई क्षति के मुआवजे जैसे प्रावधान उसे राहत देने वाले हैं किंतु बाकी सब अमेरिका की जीत का इशारा कर रहे हैं। ऐसे में फिलहाल ये विश्वास कर लेना जल्दबाजी होगी कि 19 तारीख पूरी दुनिया के लिए राहत लेकर आयेगी। बड़ी बात नहीं जिस तरह अमेरिका और इसराइल के बीच शांति समझौते को लेकर मतभेद उभरे वैसा ही कुछ ईरान में भी हो जाए जिसके चलते वहाँ  नेतृत्व के दोफ़ाड़ होने से आखिरी क्षणों में गतिरोध उत्पन्न हो।  उस दृष्टि से अगले कुछ दिन बेहद उत्सुकता और उत्तेजना से भरे रहेंगे। देखने वाली बात ये भी है कि ट्रम्प की विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म होने के कारण समझौते के बावजूद प. एशिया में शांति कायम होने पर  संदेह बना रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 13 June 2026

कब , कहां और कितना बोलना है इस कला में पारंगत हैं जयशंकर


विदेश मंत्री एस. जयशंकर द्वारा हाल ही में की गई टिप्पणियां हमारी विदेश नीति की दृढ़ता का प्रमाण हैं। कुछ दिन पहले उन्होंने यूरोपीय देशों को लताड़ते हुए कहा था कि उन्हें इस मानसिकता से निकलना चाहिए कि यूरोप की समस्याएं दुनिया की समस्याएं हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं यूरोप की समस्याएं नहीं हैं। इसी तरह जब पश्चिमी देशों ने रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और रूस से कच्चे तेल की खरीद पर सवाल उठाए तो उन्होंने ने उन्हें कड़ा जवाब देते हुए याद दिलाया कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और आम जनता के हितों को ध्यान में रखकर निर्णय लेता है। सुरक्षा और नैतिकता के  सवाल पर यूरोप द्वारा भारत को उपदेश देने पर पलटवार करते हुए उन्होंने कहा था कि कोई भी यूरोपीय देश भारतीय हथियारों से कभी खतरे में नहीं पड़ा, लेकिन यूरोपीय हथियारों ने दशकों तक भारत के खिलाफ काम किया है। उनका इशारा पाकिस्तान को दिए जाने वाले हथियारों की ओर था। दरअसल श्री जयशंकर की उक्त स्पष्टोक्तियां यूरोपीय देशों के उस उलाहने के बाद आईं जिसमें ये कहा गया था कि भारत ने रूस के साथ निकटता के चलते यूरोपीय हितों को नजरंदाज किया। रूस से तेल खरीदने के प्रश्न पर उन्होंने दो टूक कहा कि यूक्रेन युद्ध के शुरू होने के बाद जब यूरोपीय देशों ने अरब के तेल उत्पादक देशों से तेल की खरीदी बढ़ाई तब अमेरिका ने ही भारत से अनुरोध किया था कि रूस से कच्चा तेल खरीदे जिससे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतें स्थिर रहें। उन्होंने ये कहने में भी संकोच नहीं किया कि उसके बाद अमेरिका ने भारत पर टैरिफ बढ़ाने जैसी हरकत की। हालांकि इसके पूर्व भी भारत सरकार कई मर्तबा ये कह चुकी है कि वह अपने व्यावसायिक हितों के अनुरूप निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है और जहां से सस्ता मिलेगा वहां से वह खरीदी करने में संकोच नहीं करेगी। दरअसल अमेरिका और यूरोपीय देश आज भी गोरी चमड़ी वाले श्रेष्ठता के भाव से ग्रसित हैं। भले ही उपनिवेशों का दौर इतिहास बन चुका हो किंतु यूरोप अभी तक यही मानकर चलता है कि उनके अधीन रहे एशियाई और अफ्रीकी देश उनको पूर्ववत सम्मान देते रहें और जैसा वे चाहें वैसा ही करें। चूंकि पाकिस्तान जैसे देश आज भी इन देशों के सामने दुम हिलाते घूमते रहते हैं इसलिए भारत से भी वे वैसी ही अपेक्षा करते हैं और पूरी नहीं होने पर अनुचित दबाव बनाने से नहीं चूकते। कूटनीति में चूंकि प्रतिवाद भी सही समय पर और नपे - तुले शब्दों में किया जाता है इसीलिये अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प हों या कोई और , भारत की ओर से उनकी कटाक्षपूर्ण टिप्पणियों का जल्दबाजी में जवाब नहीं दिया जाता। विपक्ष इसे लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने में जुटा रहता है लेकिन विदेश नीति के अनुभवी लोग जानते हैं कि इस क्षेत्र में जल्दबाजी नुकसानदेह होती है। इसराइल - हमास, रूस - यूक्रेन और अब अमेरिका - ईरान जंग के बारे में भारत सरकार की प्रतिक्रियाओं में जो संयम और संतुलन दिखा वह हमारी विदेश नीति की परिपक्वता का प्रमाण है। ये बात सही है कि स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की तरह श्री मोदी के पास विदेश नीति का समुचित अनुभव भले न हो किंतु उनमें योग्य व्यक्ति का चयन करने की जबर्दस्त क्षमता है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में अजीत डोभाल और विदेश मंत्री के लिये श्री जयशंकर का चयन प्रधानमंत्री की पैनी नजर का सबूत है। यद्यपि स्व. सुषमा स्वराज ने भी विदेश मंत्री रहते हुए मोदी सरकार के दबदबे को वैश्विक मंचों पर बखूबी स्थापित किया था जिसे उनके उत्तराधिकारी श्री जयशंकर ने और भी ऊंचाई प्रदान कर दी। हालांकि जिस तरह श्री डोभाल के पास गुप्तचर सेवा का व्यापक अनुभव था ठीक वैसे ही श्री जयशंकर को भी विदेश सेवा में रहते हुए चीन और अमेरिका में राजदूत रहने के बाद विदेश सचिव बनने से कूटनीतिक क्षेत्र का व्यापक तजुर्बा है। इसीलिए वे दुनिया के बड़े से बड़े नेता से मिलते समय या किसी भी वैश्विक मंच पर  आत्मविश्वास से भरे नजर आते हैं। कब , कहां और कितना बोलना है इस कला में पारंगत विदेश मंत्री ने हाल ही में एक विदेशी पत्रकार द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान युद्धविराम करवाने में अमेरिका की भूमिका पर जो जवाब दिया वह उन लोगों के लिए आँखें खोलने वाला है जो अभी भी ये राग अलापते रहते हैं कि भारत ने अमेरिका के दबाव में युद्ध रोक दिया। प. एशिया में चल रहे वर्तमान तनाव के दौरान भी हमारी विदेश नीति ने संजीदगी का परिचय देते हुए युद्ध में शामिल सभी पक्षों से संवाद कायम रखकर जिस तरह राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा की वह प्रशंसनीय है। प्रधानमंत्री श्री मोदी द्वारा हाल ही में की गई 5 देशों की यात्रा भी उसी दिशा में बढ़ाया गया कदम था। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 12 June 2026

सं.रा.संघ का होना न होना बराबर


दूसरे विश्व युद्ध के बाद अस्तित्व में आए सं.रा.संघ का मुख्य कार्य दुनिया भर में शांति सहअस्तित्व और आपसी सहयोग की भावना विकसित करना है। उपनिवेशों का दौर धीरे - धीरे कमजोर पड़ने से छोटे - छोटे अनेक सर्वप्रभुता संपन्न देशों का उदय हुआ जिन्हें सं.रा.संघ की सदस्यता प्रदान कर बड़े देशों के साथ बराबरी से बैठने का अधिकार मिला। हालांकि सं.रा.संघ की सुरक्षा परिषद में पाँच स्थायी सदस्यों को मिले वीटो अधिकार की वजह से सामंती व्यवस्था के अवशेष कायम हैं किंतु दुनिया भर में मानवीयता की सेवा और साधनहीन देशों को संरक्षण प्रदान करने में इस विश्व संस्था ने प्रभावी भूमिका का निर्वहन भी किया। वहीं तनाव के अनेक अवसरों पर   मध्यस्थ बनकर दुनिया को जंग से बचाया। उसके द्वारा पोषण , स्वास्थ्य, शिक्षा और सेवा के अनेक प्रकल्प भी संचालित हो रहे हैं। यूनीसेफ और यूनेस्को जैसे नाम पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। सं.रा.संघ की महासभा के महासचिव का चुनाव सभी सदस्यों के मतदान से होता है। सुरक्षा परिषद में भी बारी - बारी से सामान्य सदस्य निर्वाचित होते हैं लेकिन पांच स्थायी सदस्यों को प्राप्त वीटो नामक अधिकार के कारण उनका होना न होना बराबर है क्योंकि इनमें से एक भी किसी फैसले को रोक सकता है। यही कारण है कि यह विश्व संस्था इन पांच सदस्य देशों के हाथ की कठपुतली बनकर रह गई है। ताजा उदाहरण इज़राइल - हमास, रूस - यूक्रेन और अमेरिका - इसराइल की ईरान के साथ चल रही जंग में सं.रा.संघ की उदासीन भूमिका है। युद्ध में विस्थापित हुए लोगों की सहायता करने में जरूर उसकी सक्रियता दिखाई दी लेकिन युद्धरत देशों के बीच सुलह करवाकर शांति स्थापना के अपने दायित्व के निर्वहन में वह पूरी तरह असफल रहा है। सबसे बड़ी विडंबना ये है कि उसने इस दिशा में समुचित प्रयास किए हों ऐसा भी नहीं लगता। इसके पीछे जाहिर तौर पर सुरक्षा परिषद के वीटो शक्ति सम्पन्न देशों का ही दबाव है जो अपने स्वार्थ के लिए पूरी दुनिया को आग में झोंकने में संकोच नहीं करते। इसराइल और हमास के बीच छिड़ी जंग में अमेरिका और उसके साथी पश्चिमी देश जहां इसराइल के साथ खड़े रहे वहीं रूस और चीन ने भले ही प्रत्यक्ष रूप से हमास का समर्थन न किया हो किंतु उनके द्वारा इजराइल का विरोध भी एक तरह से हमास के प्रति उनका झुकाव दर्शाता है। रूस और यूक्रेन की लड़ाई में अमेरिका , ब्रिटेन और फ्रांस मिलकर भी रूस को झुका नहीं सके क्योंकि सुरक्षा परिषद में वीटो नामक हथियार होने से वह अकेला ही सब पर भारी है। हालांकि चीन भी उसके पीछे ही खड़ा हुआ है। वर्तमान  में ईरान की अमेरिका और इसराइल के साथ हो रही जंग ने पूरी दुनिया को हलाकान कर रखा है। तेल उत्पादक देशों के इसमें शामिल हो जाने के कारण पूरे विश्व में पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और उर्वरक का संकट उत्पन्न हो गया है। कोरोना संकट से किसी तरह उबरी दुनिया उक्त तीन युद्धों के कारण अभूतपूर्व मुसीबत में फंसी हुई है। शांति के प्रस्ताव फटे हुए कागज के टुकड़ों की तरह उड़ते देखे जा सकते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प मोहल्ले के गुंडे की तरह व्यवहार करने पर आमादा हैं। लेकिन कोई उन्हें रोकने - टोकने वाला नहीं है। वे एक पल युद्ध समाप्त होने की बात करते और दूसरे ही पल ज़ोरदार हमले की धमकी देते हैं। कहने को ये लड़ाई कुछ देशों तक सीमित है लेकिन इसके कारण पैदा हुए ऊर्जा संकट ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है। इसीलिए ये अपेक्षा की जाती है कि सं.रा.संघ आगे आकर इसे रुकवाने और स्थायी शांति के लिए अपने प्रभाव का उपयोग करेगा किंतु शांति के लिए जो प्रयास चल रहे हैं उनमें उसकी कोई भूमिका नहीं होने से युद्ध की आग बुझने का नाम नहीं ले रही। उल्लेखनीय है ट्रम्प ने सत्ता में लौटते ही सं.रा.संघ की उपयोगिता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। केवल वे ही नहीं रूस के राष्ट्रपति पुतिन और चीन के  जिनपिंग भी अपनी स्वेच्छाचारिता के लिए कुख्यात हैं किंतु सं.रा.संघ में उन्हें रोकने तो क्या उनसे बात करने तक साहस नहीं बचा। एक समय था जब इस विश्व संस्था के महासचिव को पूरी दुनिया जानती थी किंतु अब तो वे खबरों से ही गायब होते जा रहे हैं। सं.रा.संघ के इसी निकम्मेपन के कारण दुनिया विनाश के कगार पर आ खड़ी हुई है। ऐसे में ट्रम्प की देखा सीखी अन्य देशों के नेता भी इसकी निरर्थकता का रोना रोने लग जाएं तो आश्चर्य होगा। कभी - कभी तो लगता है कि सं.रा.संघ जीते जी ही इतिहास बनने के कगार पर है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 11 June 2026

कांग्रेस को चाहिए ममता को उन्हीं के हाल पर छोड़ दे



 चुनाव में जीत - हार  चलती रहती है। कभी कोई पार्टी बड़ी जीत हासिल करती है तो कभी मतदाता उसे चारों खाने चित्त कर देते हैं। जीत के जश्न में तो वे भी शामिल हो जाते हैं जिनका उसमें कोई योगदान नहीं रहा । लेकिन हार के समय वे भी साथ छोड़ देते हैं जो कल तक आगे - पीछे मंडराया करते थे। प. बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी की  पार्टी तृणमूल कांग्रेस में विधानसभा चुनाव हारने के बाद जिस तेजी से टूटन हो रही है उससे एक बात स्पष्ट हो गई कि बिना किसी सैद्धांतिक और वैचारिक आधार वाली पार्टियों का ढांचा विपरीत परिस्थितियों में इसी प्रकार ढह जाता है। 1984 में भाजपा को मात्र  2 लोकसभा सीटें मिलीं। अटल बिहारी वाजपेयी तक हार गए किन्तु अपनी नीतिगत दृढ़ता और मजबूत सैद्धांतिक आधार के कारण मात्र 5 साल बाद ही उसने शानदार वापसी की और आज केंद्र के साथ देश के बड़े हिस्से पर उसका शासन है । कांग्रेस भी 2014 एवं 2019 के लोकसभा चुनाव में मान्यता प्राप्त विपक्ष तक नहीं बन सकी। लेकिन उसमें भी ऐसी भगदड़ नहीं हुई जैसी तृणमूल कांग्रेस में देखने मिल रही है। अन्य दलों को भी समय - समय पर ऐसी ही विपरीत परिस्थितियों से गुजरना पड़ा । ममता बैनर्जी के अलावा तमिलनाडु में स्टालिन और केरलम में विजयन को भी सरकार गँवाना पड़ी किंतु उनकी पार्टी में ऐसी स्थिति देखने नहीं मिली। अन्ना द्रमुक के कुछ विधायकों ने जरूर मुख्यमंत्री विजय को समर्थन देकर उनके बहुमत की समस्या दूर कर दी किन्तु जयललिता के न रहने के बाद वह पार्टी बिना राजा की फौज होकर रह गई इसलिए उसके विधायकों द्वारा पाला बदलने से ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ। लेकिन 15 वर्षों से प. बंगाल की एकछत्र नेत्री बनी रहीं सुश्री बैनर्जी का प्रभुत्व एक ही चुनावी हार के बाद जिस तेजी से बिखरता जा रहा है उसे देखते हुए  कहा जा सकता है कि दो दशक बाद भी तृणमूल कांग्रेस अपना सैद्धांतिक या वैचारिक आधार तैयार नहीं कर सकी। ममता बैनर्जी ने सबसे पहले कांग्रेस की रीढ़ तोड़ी और फिर वामपंथी गुंडों को शामिल कर अपने पैर जमाए। लेकिन सत्ता की चाहत में उन्होंने तुष्टीकरण का जो रास्ता चुना उसके कारण उन्हें सत्ता का सुख तो मिलता रहा लेकिन पार्टी का कोई वैचारिक आधार नहीं बन सका। इसीलिये वे भीड़ की नेता बनकर रह गईं। लगातार तीन चुनाव जीतने के कारण वे खुद को अपराजेय समझ बैठीं और यही गलती उनके लिए आत्मघाती साबित हुई। मात्र एक महीने के भीतर ही तृणमूल तिनके की तरह बिखरने लगी तो उसका मुख्य कारण यही है कि ममता के इर्द - गिर्द जिन लोगों का जमावड़ा रहा उनके निहित स्वार्थ थे। वरना जिन लोगों को उन्होंने सड़क से उठाकर संसद पहुंचा दिया वे इस तरह छोड़ - छोड़कर नहीं भागते। तृणमूल का आरोप है कि सीबीआई और ईडी का डर दिखाकर भाजपा ये सब करवा रही है। लेकिन 60 विधायकों के साथ 20 सांसदों के बागी हो जाने के बाद उक्त आरोप बेमानी लगता है। सही बात ये है कि ये सभी घोर अवसरवादी और सत्ता लोलुप लोग हैं। ऐसे ही तमाम लोग 2021 के चुनाव के बाद भाजपा छोड़ तृणमूल में शामिल हुए थे। इस सामूहिक विद्रोह के बाद ममता का सारा घमंड मिट्टी में मिल गया। जिस कांग्रेस की जड़ें खोदकर उन्होंने प. बंगाल में अपने पाँव जमाये आज उसी के आगे वे नतमस्तक नजर आ रही हैं। कल तक राहुल उन्हें फूटी आँखों नहीं सुहाते थे किंतु आज उनके साथ काम करने वे गांधी परिवार के चक्कर काट रही हैं। खबर तो तृणमूल के कांग्रेस में विलय की भी उड़ रही है। कुल मिलाकर  वर्तमान स्थिति के लिए वे स्वयं जिम्मेदार हैं जिन्होंने चुनावी जीत के लिए राजनीतिक रिश्ते तो खराब किए ही सारे सिद्धांत ताक पर रख दिए। बांग्लादेशी घुसपैठियों को जिस प्रकार वहां बसाया गया वह देश हित के सर्वथा विरुद्ध था। इसीलिये प. बंगाल की जनता ने तृणमूल की जड़ें खोद डालीं। आने वाले दिनों में ममता का क्या भविष्य होगा इस पर सभी की निगाहें लगी रहेंगी किन्तु तृणमूल कांग्रेस का इतिहास बनना सुनिश्चित हैं। वैसे कांग्रेस के लिये यही बेहतर रहेगा कि वह ममता को उनके हाल पर छोड़ दे क्योंकि उन्होंने प. बंगाल की सत्ता हासिल करने की लालच में कांग्रेस के लिए जो गड्ढा खोदा उसकी सजा उन्हें मिलना ही चाहिए वरना वे कांग्रेस का वही हाल करेंगी जो बांग्लादेशी घुसपैठियों ने प. बंगाल का किया था।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 10 June 2026

देश के आत्मविश्वास में वृद्धि मोदी की सबसे बड़ी सफलता


भाजपा इस बात का जश्न मना रही है कि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद पर सर्वाधिक समय तक रहने का स्व.पं. जवाहरलाल नेहरू का कीर्तिमान तोड़ दिया। हालांकि वे  स्व. इंदिरा गांधी के  मुकाबले काफी पीछे हैं। लेकिन किसी गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री का 12 वर्ष से पद पर बने रहना कल्पनातीत था। यद्यपि स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने उस भ्रांति को ध्वस्त किया था कि विपक्ष में सरकार चलाने की योग्यता नहीं है। उन्होंने 1999 से 2004 तक लगातार गठबंधन सरकार चलाकर  राजनीतिक कौशल का परिचय तो दिया ही ये बात भी साबित कर दी कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा ही कांग्रेस का विकल्प है। इसीलिये दस साल बाद जब डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के विरुद्ध सत्ता विरोधी लहर उत्पन्न हुई तब जनता ने नरेंद्र मोदी को स्पष्ट बहुमत प्रदान किया । उल्लेखनीय है श्री वाजपेयी  और श्री मोदी  कभी कांग्रेस में नहीं रहे।  भाजपा को मुख्यधारा की पार्टी बनाने में अटल जी और लालकृष्ण आडवाणी की जोड़ी का योगदान अविस्मरणीय है। लेकिन  उसका विस्तार राष्ट्रीय स्तर पर करने का श्रेय श्री मोदी को ही दिया जाना चाहिए। हालांकि इसमें गृहमंत्री अमित शाह की भूमिका को स्वीकार नहीं करना उनके साथ अन्याय होगा परंतु आज भाजपा जिस शिखर पर है उसके मुख्य शिल्पकार तो प्रधानमंत्री मोदी ही हैं। आज बीते 12 वर्षों की उनकी उपलब्धियों  के साथ गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होंने जो  कर दिखाया उसका भी उल्लेख होना चाहिए जिससे प्रभावित हो जनता ने उन्हें  देश की बागडोर सौंप दी। अपने पहले कार्यकाल में ही उन्होंने अपनी क्षमता का प्रमाण दे दिया था। इसीलिए 2019 में और बड़ी सफलता के साथ सत्ता में लौटे। हालांकि 2024 के परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे किन्तु उनकी स्वीकार्यता कायम रही और बीते दो सालों में कभी भी ऐसा नहीं लगा कि उनकी सरकार बैसाखियों पर टिकी होने से अस्थिर है। हालांकि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी  दावे करते रहे कि ये सरकार गिरने वाली है। लेकिन हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली , बिहार, असम, प. बंगाल और पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव जीतकर श्री मोदी ने उन दावों की हवा निकाल दी। ऐसा नहीं है कि उनके कार्यकाल में रामराज आ गया है और देश एक आदर्श स्थिति में पहुंच गया। लेकिन सबसे बड़ी उपलब्धि  ये है कि उन्होंने देश के आत्मविश्वास को उस ऊंचाई तक पहुंच गया जहां से वह लंबी छलांग लगाने का साहस कर सकता है। आज की दुनिया में भारत की जो मजबूत और सम्मानजनक स्थिति है उसमें प्रधानमंत्री की कूटनीतिक सक्रियता और ठोस निर्णय लेने की क्षमता का योगदान उल्लेखनीय है। आंकड़ों और सरकारी दावों से पूरी तरह अलग वास्तविकता के धरातल पर उतरकर देखें तो  जनसामान्य में ये भरोसा तो उत्पन्न हुआ ही है कि श्री मोदी विपरीत हालातों के बाद भी देश को आगे ले जाने में सफल होंगे। उनकी सरकार द्वारा संचालित जनहित के कार्यों एवं योजनाओं का प्रचार तो सरकार एवं भाजपा करती रहती है इसलिए उनका बखान करने की जरूरत नहीं है। लेकिन  ये कहना सही होगा कि डॉ. मनमोहन सिंह की तुलना में मोदी सरकार का प्रदर्शन इसलिए बेहतर है क्योंकि इसने लोगों में ये विश्वास जगाया है कि देश आर्थिक और सैन्य क्षेत्र में एक बड़ी ताकत है जिसकी उपेक्षा करना किसी के लिए भी संभव नहीं रहा।  पं. नेहरू ने जब सत्ता संभाली तब उनके सामने देश के पुनर्निर्माण की चुनौती तो थी किंतु राजनीतिक दृष्टि से वे चुनौती विहीन रहे। उनके विपरीत सत्ता में आते ही चाहे गांधीनगर हो या नई दिल्ली,श्री मोदी को हर कदम पर चुनौतियों से जूझना पड़ा। और इसीलिए उनके कार्यकाल के 12 वर्ष हर दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। इस दौरान देश हर मोर्चे पर आगे बढ़ा है। दुनिया में श्री मोदी के प्रति आदर और आकर्षण दोनों बढ़े जिसका लाभ भारत की छवि को भी मिल रहा है। चुनौतियों और श्री मोदी का पिछले जन्म का साथ लगता है। लेकिन बजाय डरने के वे उन पर विजय प्राप्त करने के लिए कमर कसकर तैयार रहते हैं। उनका उत्साह और परिश्रम वृति युवाओं के लिए भी प्रेरणा स्रोत है। ये कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि वे  राष्ट्रीय राजनीति में सबसे लोकप्रिय व्यक्तित्व हैं और यही उनकी शक्ति है। हालांकि उनके विरोधी भी कम नहीं हैं किंतु लाख कोशिशों के बावजूद वे उन्हें घेरने में कामयाब नहीं हो पा रहे । राजनीति में उतार - चढ़ाव आते रहते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति या पार्टी के भविष्य के बारे में स्थायी अवधारणा बना लेना सही नहीं होता। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में उनके कद और काबलियत के बराबर कोई शख्सियत नजर नहीं आ रही। रही बात उनके शत्रुओं में वृद्धि की तो चाणक्य नीति का ये उद्धरण इसका जवाब है कि जिसकी शक्ति बढ़ती है, उसी के शत्रु भी बढ़ते हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 9 June 2026

इंडिया गठबंधन की बैठक उत्साह पैदा करने में सफल नहीं रही


दो साल बाद हुई इंडिया गठबंधन की बैठक से ज्यादा उत्सुकता तो  दिल्ली में हुए कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के बारे में देखी गई । वहीं इंडिया गठबंधन को लेकर घटक दलों में ही निराशा व्याप्त रही। 2023 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहल पर यह  बना था। इसका नाम राहुल गांधी ने सुझाया था जो दरअसल इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस है। हिंदी में इसे भारतीय राष्ट्रीय विकासशील समावेशी गठबंधन कहा जाता है। इसका उद्देश्य नरेंद्र मोदी को रोकना था। लेकिन शुरू में ही अपशकुन हो गया जब नीतीश कुमार  भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में वापस आ गए। चन्द्रबाबू नायडू ने भी  भाजपा से हाथ मिला लिया। हालांकि  भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला किंतु नीतीश और नायडू के समर्थन से मोदी प्रधानमंत्री बन ही गए। उस चुनाव में कांग्रेस 99 सीटों के साथ  मुख्य विपक्षी दल बन गई ओर राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष। लेकिन इसके बाद उसमें घमंड आ गया। गठबंधन के अन्य नेताओं के साथ श्री गांधी के व्यवहार में भी रूखापन आया। जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव में उनकी  कार्यशैली पर तो उमर अब्दुल्ला ने भी सार्वजनिक  टिप्पणी कर डाली। हरियाणा में गठबंधन में खुलकर टूटन दिखाई आई और अरविंद केजरीवाल ने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारकर कांग्रेस के लिए गड्ढा खोद दिया। महाराष्ट्र  में यद्यपि गठजोड़ कायम रहा लेकिन भाजपा नीत महायुति ने ऐतिहासिक बहुमत हासिल कर लोकसभा की हार का बदला ले लिया। दिल्ली में कांग्रेस  हरियाणा का बदला लेते हुए सभी सीटों पर लड़ी ।  लेकिन सपा और तृणमूल ने  कांग्रेस को धता बताते हुए आम आदमी पार्टी का साथ दिया। उधर गठबंधन के भीतर से ही  आवाजें उठने लगीं कि वह केवल लोकसभा चुनाव तक ही था।  प. बंगाल ताजा उदाहरण है जहाँ तृणमूल , वामपंथी और कांग्रेस अलग - अलग लड़े। केरल में कांग्रेस और वामपंथी एक दूसरे के दुश्मन बने रहे। तमिलनाडु में कांग्रेस ने द्रमुक के साथ ही चुनाव लड़ा लेकिन जब सत्ता स्टालिन के हाथ से खिसक गई तब पाला बदलकर अभिनेता विजय की सरकार में हिस्सेदारी हासिल कर ली। इससे नाराज द्रमुक ने इंडिया गठबंधन को छोड़ने की घोषणा कर दी। आम आदमी पार्टी ने भी दूरी बना ली क्योंकि पंजाब में कांग्रेस के साथ उसका मुकाबला है और गुजरात में भी वह उसको नुकसान पहुंचाने में जुटी है। इन सब कारणों से इंडिया गठबंधन लोकसभा चुनाव के बाद  निष्क्रिय हो चला था। कांग्रेस अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटी रही तो क्षेत्रीय पार्टियां अपना गढ़ सुरक्षित रखने में व्यस्त रहीं। लेकिन लगातार हारने के बाद सबके होश ठिकाने आ गए । इसीलिए किसी अन्य दल को सुई की नोंक के बराबर जमीन न देने  वाली सुश्री बैनर्जी सत्ता गंवाने के बाद उस इंडिया गठबंधन को मजबूत करने के लिए उछलने लगीं जिसका कबाड़ा करने में उनका योगदान भी कम नहीं है। लेकिन गठबंधन की बैठक के पहले फिर अपशकुन हो गया । तृणमूल के 58 विधायक टूटने  के बाद  पार्टी के 20 सांसद भी एनडीए के साथ चले गए। आम आदमी पार्टी और द्रमुक के खुले बहिष्कार के अलावा उद्धव ठाकरे तथा झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी केवल आभासी माध्यम से हाजिरी दर्ज की । खबर है हेमंत भी भाजपा के संपर्क में हैं। कुल मिलाकर बैठक तो हो गई लेकिन वह उत्साह नजर नहीं आया जो अपेक्षित भी था और आवश्यक भी। एस.आई.आर के विरोध में देश के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखने जैसा निर्णय निहायत बचकाना है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय उसे पूरी तरह सही ठहरा चुका है। बाकी बातें वही हैं जो रोज  सुनाई देती हैं। इसीलिये भाजपा विरोधी राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार भी कल की बैठक के बाद निराश नजर आए। होना तो चाहिए था कि गठबंधन अपने नेता और साझा कार्यक्रम के बारे में फैसला करता क्योंकि नेतृत्व और नीतिगत अस्पष्टता इसकी सबसे बड़ी कमी है। वहीं एनडीए में श्री मोदी को एकमुश्त समर्थन है। उल्लेखनीय है गठबंधन के संयोजक पद को लेकर ममता के विरोध के कारण ही नीतीश ने एनडीए का दामन थामा था। लगता है गठबंधन में शामिल नेता पिछली गलतियों से सबक लेने को तैयार नहीं हैं। द्रमुक और आम आदमी पार्टी के गठबंधन छोड़ने और तृणमूल में खुले विद्रोह से वैसे ही यह जमावड़ा  कमजोर हो  गया है। 2024 के बाद केरल को छोड़ कांग्रेस के कंधों पर भी पराजय का बोझ बढ़ता गया। और फिर आपसी विश्वास की भी कमी है। शरद पवार शारीरिक तौर पर अशक्त हो चले हैं और सोनिया गांधी भी मैदानी राजनीति से दूर हैं। ममता राजनीतिक तौर पर निरीह अवस्था में आ चुकी हैं। बचे अखिलेश तो उ.प्र से आ रहे संकेत योगी बाबा की वापसी पुख्ता कर रहे हैं। इसीलिये भाजपा विरोधी समीक्षकों को भी 2029 में विपक्ष के लिए कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 8 June 2026

कॉकरोच जनता पार्टी की नीति और नीयत दोनों अस्पष्ट और रहस्यमय


युवाओं के आक्रोश को अभिव्यक्त करने के लिये राजनीतिक क्षितिज पर धूमकेतु की तरह उभरी कॉकरोच जनता पार्टी के पहले प्रदर्शन को भले ही फ्लॉप शो न कहा जाए किंतु प्रभावशाली भी नहीं कह सकते। सवाल ये नहीं है कि 6 जून को दिल्ली के जंतर मंतर पर कितनी भीड़ जुटी बल्कि ये कि उसमें वे युवा कितने थे जिनकी समस्या के विरोध में सोशल मीडिया पर अवतरित इस नवजात पार्टी के अध्यक्ष अमेरिका से लंबी यात्रा करने के बाद दिल्ली पहुंचे। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग पर केंद्रित उक्त प्रदर्शन के लिये पुलिस की अनुमति मिलने पर असमंजस था । उसके अध्यक्ष अभिजीत दीपके तो अपनी गिरफ्तारी के प्रति भी आशंकित थे। देश में जेन जी आंदोलन को भड़काकर सत्ता परिवर्तन करवाने के मंसूबे पालने वाला तबका भी चाह रहा था कि कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन पर रोक लग जाए और अभिजीत गिरफ्तार हो जाएं। यदि  ऐसा हो जाता तो फिर युवाओं को भड़काने में उन्हें कामयाबी मिल जाती लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और अभिजीत अपने प्रवक्ताओं के साथ जंतर मंतर पहुंच गए। लेकिन वहां शुरुआत में तो प्रदर्शनकारी कम पत्रकार और दर्शक ज्यादा थे। बाद में भी जो जनता जमा हुई उसमें कॉकरोच जनता पार्टी के कैडर जैसा तो कुछ था नहीं। हां, जेएनयू की ढपली गैंग जरूर अपने एजेंडे के साथ मौजूद थी। उमर खालिद के पक्षधर और हमें चाहिए आजादी के नारे लगाने वाले वामपंथी और कश्मीर के अलगाववादियों के समर्थक भी उस आयोजन में घुसपैठ करने में सफल हो गए। और जब मंच से भी रास्वसंघ का विरोध सुनाई दिया तब पूरा मामला साफ हो गया। प्रदर्शन था तो श्री प्रधान के त्यागपत्र के लिए किंतु उसमें समलैंगिकता का प्रचार करने वाले बेहूदे लोग भी अपना राग अलापते दिखे।  वहीं स्त्री वेशभूषा धारण किए वे युवक भी जो अक्सर जेएनयू परिसर में देखे जा सकते हैं। कुल मिलाकर आयोजन पूरी तरह असंगठित और अव्यवस्थित रहा। अमेरिका की ठण्डक से लौटकर दिल्ली की भीषण गर्मी को सहन न करने पर अभिजीत की तबियत बिगड़ गई। उनके मंचीय साथी भी तापमान बर्दाश्त नहीं सके और उनकी हिम्मत जवाब दे गई। हालांकि इसका असर प्रदर्शन की सफलता पर पड़ा ये कहना गलत होगा क्योंकि वह पहले घंटे में ही विफलता का उदाहरण बन चुका था। सोशल मीडिया पर देखते - देखते लाखों फालोवर होने से अभिभूत अभिजीत जंतर मंतर पर 10 हजार ढंग के लोग भी नहीं जमा कर सके जबकि इससे ज्यादा लोग तो उस इलाक़े में चाय की दुकानों पर खड़े दिख जाते हैं। हालांकि दिल्ली के बाहर से भी कुछ लोग प्रदर्शन में शामिल हुए। कॉकरोच का मुखौटा लगाए सैकड़ों लोग यदि न होते तब ये पता ही न चलता कि वह आयोजन है किसका? बहरहाल जोर - शोर से शुरू हुई ये मुहिम पहले ही इम्तिहान में फुस्स साबित हो गई। इस पार्टी के प्रति अन्य स्थापित दलों की प्रतिक्रिया भी उपेक्षापूर्ण रही। दिल्ली में बैठे राजनीतिक पर्यवेक्षक और पत्रकारों ने भी कॉकरोच जनता पार्टी के इस पहले सार्वजनिक आयोजन को पूरी तरह भटका हुआ और असरहीन निरूपित कर ये जता दिया कि इसका प्रारंभ भले ही धूम - धड़ाके के साथ हुआ हो लेकिन इसे लंबी रेस का घोड़ा नहीं माना जा सकता। अभिजीत ने भारत आने से पूर्व जय भीम का उल्लेख अपने संदेश में किया था और यहां आने के बाद भी वे डॉ. आंबेडकर की पुस्तक हाथ में लिए रहे। उनके इस कृत्य ने वहां उपस्थित उन छात्रों को चौकन्ना कर दिया जो यू.पी.एस.सी के परिपत्र को लेकर पहले से ही नाराज थे। इस प्रकार युवाओं के महानायक बनने के उद्देश्य से भारत लौटे अभिजीत दलित नेता बनने की तैयारी करते दिखे। सही बात ये है कि उनकी नीति और नीयत दोनों अस्पष्ट या यूं कहें कि रहस्यमय हैं। ये संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि उनकी पीठ पर उन विदेशी ताकतों का हाथ है जो राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न करने के लिए नौजवानों को भड़काकर देश को अराजकता में धकेलना चाहते हैं। हालांकि फिलहाल कोई पुख्ता आकलन करना उचित नहीं है लेकिन अरविंद केजरीवाल की शैली में जनांदोलन की शक्ल में राजनीतिक महत्वकांक्षाओं को पूरा करने का प्रयास अब दोबारा सफल नहीं होगा क्योंकि काठ की हांडी बार - बार नहीं चढ़ती। अभिजीत दीपके सोशल मीडिया पर मिले समर्थन की खुशी में उछलते हुए अमेरिका से भारत तो आ गए लेकिन आभासी माध्यम से जनता के दिल में उतरना आसान नहीं होता। भारत की तासीर कुछ अलग हटकर है जिसे समझना उतना आसान नहीं जितना कॉकरोच जनता पार्टी के कर्णधार समझ बैठे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 6 June 2026

व्यवसायीकरण के बाद अपराधीकरण की ओर बढ़ रहा कोचिंग उद्योग


बिहार सरकार की भर्ती परीक्षा में 19000 पदों के लिए नतीजे निकले। पटना के दो कोचिंग संस्थानों में से एक ने अपने  12000 और दूसरे ने 10000 छात्रों का चयन होने का दावा किया। लेकिन इस बात का जवाब दोनों के पास नहीं है कि 19000 पदों के लिए 22000 उम्मीदवारों का चयन कैसे हो गया और क्या सभी चयनित उम्मीदवार इन्हीं कोचिंग के छात्र हैं? किसी बात पर दोनों में विवाद बढ़ा और बात गोली चलने तक जा पहुंची। एक कोचिंग संचालक जेल चले गए और दूसरे भी जाने की तैयारी में हैं। हत्या के प्रयास का आरोप लग रहा है । दूसरे पक्ष के विरुद्ध गोली चलाने की झूठी रिपोर्ट कर उसे सीखचों के पीछे भिजवाकर अपने को विजेता समझ बैठे एक नामी गिरामी कोचिंग संचालक भी खुद  उसी आरोप में जेल जाने वाले हैं। शिक्षा जैसे पवित्र विषय में पैसे और प्रतिस्पर्धा का यह घिनौना रूप देखकर दुख होता है। उक्त कोचिंग संस्थानों के छात्रों द्वारा एक दूसरे के विरुद्ध किया जा रहा प्रदर्शन भी चिंता का कारण है। शिक्षक जैसे सम्मानित  व्यक्ति को  बंदूकधारी अंगरक्षक रखने पड़ें तो आश्चर्य होता है। शिक्षा का कोचिंगकरण उसकी पवित्रता के साथ ही गुणवत्ता को भी प्रभावित कर रहा है। ऐसे में जरूरी  है  सरकार कोई नियामक संस्था बनाए जिससे कुकुरमुत्तों की तरह उग आये कोचिंग संस्थानों की असलियत उजागर हो। प्रतिस्पर्धा में सफल हुए अपने विद्यार्थियों  का फोटो बड़े - बड़े विज्ञापनों में छपवाने वाले इन संस्थानों के संचालकों से ये भी पूछा जाना चाहिए कि उनके संस्थान के कितने छात्र परीक्षा में बैठे और उनमें से कितने असफल रहे? पटना के एक कोचिंग संचालक और एक महिला टी.वी एंकर के बीच तीखी टिप्पणियों के आदान - प्रदान से शुरू हुए विवाद ने नया मोड़ ले लिया जब पटना के दो कोचिंग संस्थान संचालकों के बीच व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा गोली चलने की सीमा तक जा पहुंची और पूरे देश में लोकप्रियता और सम्मान अर्जित कर चुके शिक्षक अब पुलिस थाना और जेल के मकड़जाल में उलझ गए। सबसे दुखद पहलू ये है कि उन्होंने अपने संस्थानों के छात्रों को औजार बनाकर सड़कों पर उतार दिया। इस विवाद का अंत  तो अब कानून तय करेगा किंतु इससे कोचिंग संचालकों की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गई। शिक्षा संस्थानों में छात्रों के बीच उग्र विवाद होते रहते हैं। दिल्ली का जे.एन.यू तो वामपंथियों और संघ परिवार से जुड़े छात्र संगठन की युद्धभूमि बना हुआ है। लेकिन कोचिंग संस्थानों के माहौल में अपेक्षाकृत गंभीरता रहती है। इसके पहले उक्त दोनों कोचिंग संस्थानो को लेकर भी कोई आपत्तिजनक बात सुनने में नहीं आई। लेकिन बीते कुछ दिनों में उनके  विवाद के बाद अब समूचा कोचिंग उद्योग निशाने पर आ गया। इसकी उपयोगिता और प्रामाणिकता पर सवाल उठने लगे हैं। आरोप लग रहे हैं कि ये नोट  छापने की मशीन बन गए  हैं। कुछ कोचिंग संस्थान तो विशुद्ध कॉरपोरेट शैली में अन्य शहरों में भी शाखाएं खोल रहे हैं जिनसे किसी उपभोक्ता वस्तु की डीलरशिप का एहसास होता है। लुभावने विज्ञापनों के जरिए मोटी फीस वसूली जाती है। इस कार्य में भी दलाली का धंधा होता है। यद्यपि कुछ कोचिंग संस्थान अभी भी ईमानदारी से छात्रों का मार्गदर्शन कर उनके बेहतर भविष्य के लिए सार्थक प्रयास करते हैं लेकिन ज्यादातर शिक्षा की दुकानें और शो रूम का रूप ग्रहण कर चुके हैं। इसी  वजह से कोचिंग संस्थानों पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठ रही है। ये कितनी व्यावहारिक है ये निःसंदेह विमर्श का विषय है लेकिन नौजवानों का भविष्य संवारने के लिए यदि कोचिंग ही जरूरी है तब  विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों की उपयोगिता पर भी प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है। ये विवाद और बढ़े तथा कोचिंग संचालकों की व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा    आपराधिक स्वरूप ग्रहण करे उसके पूर्व ही इसे रोकने के कदम उठाए जाने चाहिए क्योंकि इनके साथ लाखों छात्रों का भविष्य और  अभिभावकों की उम्मीदें जुड़ी हुई हैं। इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि हाल ही में नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने के मामले में भी कतिपय कोचिंग संस्थानों की भूमिका का पर्दाफाश हुआ था। केंद्र सरकार को चाहिए इस  बारे में ठोस कदम उठाए वरना शिक्षा के पवित्र क्षेत्र का व्यवसायीकरण होने के बाद उसका माफियाकरण होते देर नहीं लगेगी। पटना में हुए विवाद के बाद बड़ी बात नहीं कोचिंग संचालक गुंडों को भी भागीदार बनाने लगें क्योंकि पैसा कमाने की हवस में इंसान  किसी भी हद तक गिर सकता है। और गुरु से सर बन चुके लोग भी इंसान ही हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 4 June 2026

दिल्ली अग्निकांड: होटल वाले के साथ निगम अधिकारियों को भी दंड मिले


देश की राजधानी दिल्ली के एक होटल में लगी आग से 21 लोग मारे गए जिनमें विदेशी भी थे। 6 कमरों की स्वीकृति वाले इस होटल में 25 कमरे बने थे। आग बुझाने की कोई व्यवस्था भी नहीं थी। उक्त होटल के आसपास बने दर्जनों गेस्टहाउस नुमा होटलों के पास भी फायर एन. ओ. सी नहीं है। साथ ही ज्यादातर में अवैध निर्माण भी है। कुछ साल पहले भी दिल्ली के राजेंद्र नगर इलाके के बेसमेंट में संचालित कोचिंग सेंटर में लगी आग में कुछ छात्रों की मौत के बाद दिल्ली के स्थानीय निकाय नींद से जागे। दिखावटी कार्रवाई में तोड़फोड़, जुर्माना लगाने और लायसेंस रद्द करने जैसे कदम उठाए गए। मरने वालों के परिवारों को मुआवजा बांटकर सरकार ने भी अपना चिरपरिचित कर्मकांड पूरा कर दिया परन्तु समस्या यथावत रही क्योंकि जो सबसे  ज्यादा जरूरी था वह छोड़कर बाकी सब किया गया। ये स्थिति देश के सभी हिस्सों में हैं। कुछ दिनों पूर्व  दिल्ली से सटे गाजियाबाद की एक बहुमंजिला रिहायशी इमारत में आग लगी तब ये बात उजागर हुई कि वहां अग्निशमन विभाग के पास ऊंची सीढ़ियों का अभाव है। सोचने वाली बात ये है कि जब राष्ट्रीय राजधानी में अग्निकांड से बचने के लिए पर्याप्त साधन नहीं हैं तब देश के सुदूर हिस्सों का तो ईश्वर ही मालिक है। चूंकि अग्निशमन व्यवस्था स्थानीय निकाय द्वारा संचालित होती है इसलिए उंगलियां उसी पर उठना स्वाभाविक है। लेकिन उससे भी बड़ी बात ये है कि आग लगने पर उसे जल्द बुझाना तभी संभव होता है जब भवन का निर्माण  नियमानुसार हुआ हो। साथ ही घनी बसाहट वाले क्षेत्रों में अग्निशामक वाहन पहुंच सकें इसकी चिंता भी की जानी चाहिए। लेकिन स्थानीय निकायों का भ्रष्ट तंत्र समय रहते इस बारे में कभी नहीं सोचता क्योंकि उसे लोगों के जान - माल से ज्यादा फिक्र अपनी जेब भरने की रहती हैं। दिल्ली में गत दिवस हुए हादसे ने एक बार फिर साबित कर दिया कि देश भर के अधिकांश स्थानीय निकाय अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में विफल हैं। 6 कमरों की स्वीकृति वाले होटल में 25 कमरे बन गए और नगर निगम के जिम्मेदार लोगों को उसकी जानकारी नहीं लगी ये बात  गले नहीं उतरती । निकतवर्ती तमाम गेस्टहाउसों में भी यही अनियमितता है। जाहिर है अब सबकी जांच होगी और इन अवैध निर्माणों की अनदेखी करने वाला सरकारी अमला ही उनको तोड़ने की मर्दानगी दिखाएगा। जिस होटल मालिक के अवैध निर्माण के  कारण 21 लोगों को ज़िंदा जलने जैसी त्रासदी झेलनी पड़ी उसकी गिरफ्तारी के बाद जो सजा कानून तय करे वह तो उसे मिले ही साथ में मृतकों के परिवार को अतिरिक्त मुआवजा भी उससे वसूला जाए। उस क्षेत्र में तैनात स्थानीय निकाय के अधिकारियों पर भी गैर इरादतन हत्या का मुकदमा चलाया जाए। तीन दशक पहले दिल्ली के ही उपहार सिनेमा घर में लगी आग में भी अनेक लोग जलकर जान गंवा बैठे थे। वह कांड भी बेहद चर्चित हुआ था । उक्त  सिनेमा घर के मालिकों को सात साल की सजा के साथ ही करोड़ों रु. का अर्थदंड भी दिया गया। लेकिन 1997 में हुए अग्निकांड की कानूनी प्रक्रिया निचली अदालत से होते - होते 2022 में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद जाकर पूरी हुई। 25 बरस तक चलने वाली उबाऊ न्यायिक प्रक्रिया से ऐसे हादसों पर विस्मृति की धूल पड़ जाती है। यदि पैसा कमाने के लिए गैर कानूनी कार्य करने वालों को जल्दी दंड मिलने लगे तब तो लोग कानून से डरेंगे भी अन्यथा अग्निकांड होते रहेंगे और निरपराध लोग मारे जाते रहेंगे। दिल्ली में गत दिवस हुए अग्निकांड में चूंकि दर्जन भर विदेशी नागरिकों की जान भी चली गई इसलिए विदेशी समाचार माध्यमों में इस घटना को आधार बनाकर भारत के होटलों में सुरक्षा प्रबंधों के अभाव का बखान किया जा रहा है। इसका दुष्प्रभाव विदेशी पर्यटकों में कमी के रूप में देखने मिल सकता है। किसी भी जिम्मेदार व्यवस्था में गलतियों से सबक लेकर उनकी पुनरावृत्ति रोकने के पुख्ता प्रयास किये जाते हैं लेकिन हमारे देश में चूंकि गलतियों को भुला देने की प्रवृत्ति हावी है इसलिए दुर्घटनाओं को रोकने की फुर्सत ही किसी को नहीं है। अवैध निर्माण और अग्निशमन की जरूरी व्यवस्थाएं न होने के बाद भी व्यावसायिक गतिविधियों का संचालन स्थानीय निकाय की जानकारी के बिना सम्भव ही नहीं। इसीलिए दिल्ली नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों को भी दोषी होटल मालिक के  बराबर कड़ा दंड दिया जाना चाहिए। न्यायपालिका की भी यह जिम्मेदारी है कि ऐसे मामलों में त्वरित सुनवाई कर दोषियों को उनके किए की सजा प्रदान करे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 3 June 2026

तृणमूल जैसे बनी वैसे ही टूट रही है


विधानसभा चुनाव में करारी पराजय के बाद भी ममता बैनर्जी की मुश्किलें कम होने के बजाय और बढ़ती जा रही हैं। पूरे राज्य में तृणमूल कांग्रेस से इस्तीफों की झड़ी लगी है। हालांकि जब भी किसी भी पार्टी को ऐसी हार का सामना करना पड़ता है उसमें इस तरह की स्थिति बनना नई बात नहीं है। लेकिन तृणमूल कांग्रेस के विधायकों और सांसदों की बगावत के जो संकेत मिल रहे हैं वे ममता के राजनीतिक आधार को बुरी तरह धवस्त कर सकते हैं। इसका पहला संकेत तब मिला जब अभिषेक बैनर्जी के साथ हुई मारपीट के बाद ममता द्वारा बुलाई गई बैठक में केवल 20 विधायक पहुंचे। उसके बाद दो विधायकों को पार्टी से निकाले जाने की खबरें आ गईं और वे खुलकर ममता के विरुद्ध बोलने लगे। उसी के बाद पार्टी में विभाजन की अटकलें लगने लगीं। गत दिवस ममता द्वारा आयोजित धरना - प्रदर्शन में पार्टी के अधिकांश सांसदों और विधायकों के अनुपस्थित रहने से बगावत की आशंका और बलवती हो गई। आज पार्टी से निकाले गए 2 विधायक विधानसभा अध्यक्ष से मिलकर असली तृणमूल कांग्रेस होने के नाते पार्टी चुनाव चिन्ह के साथ ही नेता प्रतिपक्ष पद मांगने के साथ दावा कर रहे हैं कि उनके पास 59 विधायक हैं  जो दो तिहाई से ज्यादा होने से दलबदल कानून से मुक्त हैं। हालांकि अभी इस बात की पुष्टि नहीं हो सकी कि बागी विधायकों के पास पार्टी तोड़ने लायक संख्याबल है या नहीं। और ये भी कि सांसदों में से कितने ममता का साथ छोड़ने का साहस दिखाएंगे?  ये भी साफ नहीं हैं कि बागी विधायक और सांसद भाजपा में शामिल होंगे या फ़िर अलग गुट बनाकर विपक्ष में बैठेंगे । लेकिन इतना तो पक्का है कि पार्टी में टूटन शुरू हो चुकी है। इसके पीछे किसी वैचारिक मतभेद की बात सोचना तो निरर्थक है क्योंकि तृणमूल कांग्रेस केवल ममता बैनर्जी की निजी महत्वाकांक्षाओं के इर्द - गिर्द सिमटी पार्टी थी जिसका न कोई सिद्धांत है और न ही आदर्श। रही - सही कसर पूरी हो गई ममता द्वारा अपने भतीजे अभिषेक को अघोषित उत्तराधिकारी बनाकर जिनके तेवर किसी बिगड़ैल नवाबजादे से कम नहीं थे। ममता मूलतः सड़क से उठी जुझारू नेत्री थीं जिन्होंने वामपंथी सत्ता से लड़ने में कांग्रेस की असमर्थता से असंतुष्ट होकर  तृणमूल कांग्रेस का गठन किया और आखिरकार वामपंथी सत्ता को उखाड़ फेंका।  लेकिन कोई विचारधारा नहीं होने से पार्टी सत्ता से चिपके रहने का साधन बन गई । और इसीलिये उसमें वामपंथी सरकार के दौर में अराजकता फैलाने वाले असामाजिक तत्वों ने आराम से घुसपैठ कर ली। सत्ता की चकाचौंध में  ममता ने इस बुराई से आँखें मूंदते हुए केवल चुनाव जीतने को ही अपना लक्ष्य बनाते हुए मुस्लिम तुष्टीकरण के रिकॉर्ड तोड़ दिए। चूंकि वामपंथी और कांग्रेस धीरे - धीरे कमजोर होते गए इसलिए ममता को लगा वे अपराजेय हो चुकी हैं। और इसीलिये उन्होंने जनता की तकलीफों को जानने के बजाय उनकी उपेक्षा शुरू कर दी।  अभिषेक ने अघोषित युवराज की तरह जिस समानान्तर शासन व्यवस्था को जन्म दिया वह अराजकता का पर्याय होने से जनता की नाराजगी का कारण बनी जो बीती 4 मई को चुनावी परिणाम के रूप में सामने आई। लेकिन ममता की अकड़ कम नहीं हुई और उन्होंने इस्तीफा देने से इंकार कर दिया जो कि संसदीय शिष्टाचार का अभिन्न हिस्सा है। बहरहाल तृणमूल कांग्रेस टूटे या एकजुट रहे ये उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना ये कि निजी जागीर बनी हुई क्षेत्रीय पार्टियों ने  जिस सिद्धांतविहीनता और अवसरवाद को बढ़ावा दिया उसकी वजह से से समूचा राजनीतिक माहौल प्रदूषित होकर रह गया। तृणमूल के जो विधायक, सांसद और अन्य नेता ममता से किनारा कर रहे हैं उसकी एकमात्र वजह है उनके हाथ से सत्ता खिसक जाना। चूंकि वे सब ममता के करिश्मे के आकर्षण में तृणमूल से जुड़े थे इसलिए ज्योंही वह खत्म हुआ त्योंही दीदी असहनीय लगने लगीं। ममता ने वामपंथी सत्ता को हटाकर जो उम्मीदें जगाई थीं उन्हें पूरी करने जनता ने उनको 15 साल दिए जो कम नहीं थे। इससे कम समय में नरेंद्र मोदी ने गुजरात को विकास का प्रतीकचिन्ह बनाकर खुद को प्रधानमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार बना लिया और बीते 12 वर्षों से देश की बागडोर संभाले हुए हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में आशाजनक नतीजे नहीं मिलने के बावजूद वे निराश नहीं हुए और राज्य दर राज्य भाजपा की विजय के आधार बने हुए हैं तो इसका कारण उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि है। ममता की पार्टी सत्ता से हटते ही महज एक महीने के भीतर यदि बिखराव के कगार पर है तो उसकी वजह  विचारशून्यता ही है। दरअसल तृणमूल कांग्रेस सत्ता के लिये एकत्र लोगों का जमावड़ा है जिनके बीच न कोई सैद्धांतिक साम्यता है और न ही जनसेवा की भावना। इसीलिये चुनावी पराजय के बाद ही पार्टी खंडित होने आ गई। महाराष्ट्र में जो हाल उद्धव ठाकरे का हुआ वही प. बंगाल में ममता बैनर्जी का होने जा रहा है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 2 June 2026

ईरान और इसराइल दोनों नहीं मान रहे ट्रम्प की बात


हालांकि ये मान लेना तो जल्दबाजी होगी कि इसराइल  अमेरिका के नियंत्रण से निकल रहा है। लेकिन ईरान के साथ जंग में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का ढुलमुल रवैया उसके लिए मुसीबत  बन गया है । दरअसल इस लड़ाई का मूल कारण तो यही यहूदी राष्ट्र है जिसे बनाने  में अमेरिका का प्रमुख योगदान रहा हैं। भले ही आज इजराइल विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में विकसित देशों के समकक्ष और सैन्य दृष्टि से भी आत्मनिर्भर हो चुका हो लेकिन  बिना अमेरिकी संरक्षण के उसके अस्तित्व पर खतरे के बादल  मंडराते रहेंगे। मौजूदा जंग में जब अमेरिका और ईरान युद्धविराम करने और बातचीत के जरिए स्थायी तौर पर शांति कायम रखने की दिशा में आगे बढ़े तब इसराइल को उक्त वार्ता में शामिल नहीं करने से उसके प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने अपना गुस्सा व्यक्त किया और शांति वार्ता के दौरान ही लेबनान पर हमले जारी रखे जिससे ईरान भड़क उठा। उसके  अनुसार युद्धविराम के दायरे में इसराइल और लेबनान की लड़ाई भी शामिल थी। लेकिन नेतन्याहू ने  न सिर्फ हमले जारी रखे बल्कि लेबनान के इलाकों को कब्जे में लेने का सिलसिला भी जारी रखा। अमेरिका ने जब भी ईरान के साथ समझौते के लिए कदम बढ़ाए, इसराइल ने उसे चेताते हुए कहा कि ईरान को अधमरा करके छोड़ने से भविष्य में नई समस्या पैदा होना तय है। उधर शांति वार्ता के बीच भी ईरान द्वारा इसराइल का अस्तित्व मिटाने की धमकी दी जाती रही। सच है कि  ट्रम्प इस लड़ाई से ऊब चुके हैं। तीन महीने बाद भी अमेरिका इस जंग से वह सब हासिल नहीं कर सका जिसके लिए उसने अरबों - खरबों डॉलर फूंक दिए। न तो वह ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह तबाह कर सका और न ही उसके तेल व्यापार पर कब्जा करने का  उसका मंसूबा ही पूरा हो सका। होर्मुज से यातायात शुरू होने में अभी भी रुकावटें हैं। यद्यपि लड़ाई को पूरी तरह से रोकने के लिये दोनों पक्षों के बीच संवाद तो बना हुआ है किंतु इसराइल के अलावा अमेरिका समर्थक अन्य तेल उत्पादक देशों को भी ये बात पच नहीं रही कि अमेरिका उन्हें ईरान के आतंक के सामने छोड़कर चलता बने।  शांति प्रस्ताव का ये हिस्सा तो इसराइल , सऊदी अरब, कतर, यूएई और ओमान  को शायद ही स्वीकार होगा कि युद्ध में हुई बर्बादी के मुआवजे स्वरूप ईरान को अरबों डॉलर की आर्थिक मदद दी जाए।  इसराइल को ये पता है कि प.एशिया में अमेरिका की प्रभावशाली उपस्थिति उसके सहयोग के बिना सम्भव ही नहीं होगी। नेतन्याहू ने इसीलिये  लेबनान पर हमले बंद करने की जगह और तेज कर दिए। बीच में  उन्होंने वाशिंगटन जाकर भी ट्रम्प को ये समझाने की कोशिश की थी कि लड़ाई को अंतिम परिणाम तक ले जाए बिना रोक देना आत्मघाती होगा क्योंकि उसके बाद ईरान घायल शेर की तरह और खूंखार हो जाएगा और वह अपने इरादे छिपा भी नहीं रहा। बीते कुछ दिनों में ट्रम्प ने कई बार  शांति समझौते के अंतिम रूप लेने की घोषणा की किंतु कुछ देर बाद ही ईरान ने उनकी बात काटते हुए कड़ी शर्तें रख दीं। अब खबर ये है कि उसने अमेरिका को दो टूक बता दिया कि जब तक इसराइल द्वारा लेबनान पर हमले नहीं रोके जाते वह बातचीत नहीं करेगा। इसी के साथ ये भी पता भी चला है कि ट्रम्प  ने इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू पर नाराज होकर लेबनान पर हमले रोकने कहा किंतु नेतन्याहू  उनकी  मानेंगे ये फिलहाल स्पष्ट नहीं है। इसी बीच ये दावा भी सुनने आया है कि लेबनान में सक्रिय आतंकवादी संगठन हिजबुल्ला को अमेरिका ने लड़ाई रोकने राजी कर लिया है। लेकिन यदि इसराइल ने ट्रम्प की बात नहीं मानी तब प. एशिया में बारूदी धमाके रोकने की उम्मीद हवा - हवाई होकर रह जाएगी। दरअसल ईरान समझ चुका है कि उसके पास खोने को अब कुछ भी नहीं बचा। इसलिए वह सिर पर कफ़न बांधकर खड़ा हुआ है।  ईरानी रणनीतिकार ये बात भी समझ चुके हैं कि डोनाल्ड ट्रम्प  इस लड़ाई से निकलने के लिए छटपटा रहे हैं। इसीलिये वे ईरान को इतिहास बनाने वाली डींगें हांकने के बजाय उसके पुनर्निर्माण में सहायता जैसी बातें कर रहे हैं। लेकिन इस समूचे विवाद में ये बात सदैव याद रखनी होगी कि जब तक ईरान ही नहीं सभी अरबी मुस्लिम देश इसराइल के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते और ईरान उसे नेस्तनाबूत करने की जिद नहीं छोड़ेगा तब तक स्थायी शांति की बात सोचना भी निरर्थक है। आज के हालात में ट्रम्प  बुरी तरह फंस गए हैं। ईरान पर अपनी शर्तें वे थोप नहीं पा रहे और इसराइल भी उनकी बात नहीं मान रहा। ऐसे में प. एशिया में शांति प्रक्रिया की स्थिति एक कदम आगे दो कदम पीछे जैसी हो गई है ।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 1 June 2026

हिंसा गलत किंतु अभिषेक के प्रति किसी को सहानुभूति नहीं



प. बंगाल में  चुनाव प्रचार के दौरान तृणमूल सांसद और  ममता बैनर्जी के भतीजे अभिषेक बैनर्जी ने गृहमंत्री अमित शाह को चुनौती दी थी कि हिम्मत है तो 4 मई को कोलकाता आकर दिखाएं, तब देख लेंगे। कुछ  साल पहले भाजपा के पूर्व अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा पर प. बंगाल में हुए हमले पर उन्होंने कहा था कि वह जनता के आक्रोश का परिणाम था। इसी तरह उन्होंने चुनाव बाद एक भाजपा उम्मीदवार को गर्दन पकड़कर मछली बाजार ले जाकर उनसे मछली बिकवाने जैसी धमकी दी थी। अभिषेक को  लेकर चर्चा  थी कि सुश्री बैनर्जी  विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री का चेहरा बनकर केंद्रीय राजनीति में चली  जाएंगी और प. बंगाल की सत्ता पर वे आसीन होंगे। यही वजह थी कि तृणमूल के ज्यादातर सांसद और विधायक ही नहीं बल्कि पार्टी कार्यकर्ता भी उनके करीबी बने रहने का प्रयास करते  थे।लेकिन चुनाव परिणाम आते ही सब उलट - पुलट हो गया। सुश्री बैनर्जी भवानीपुर नामक अपनी सीट पर खुद ही हार गईं। संयोगवश 2021 में नंदीग्राम और इस बार भवानीपुर से उन्हें हराने वाले सुवेंदु अधिकारी ही रहे जो वर्तमान मुख्यमंत्री हैं। उनके सत्ता संभालते ही राज्य में राजनीतिक माहौल के  अलावा सामाजिक वातावरण में भी बड़ा परिवर्तन देखा जा रहा हैं। बांग्लादेशी घुसपैठियों के वापस जाने की खबरों के अलावा सरकारी जमीनों पर बने उनके मकान और दूकानें हटने लगे। रेलवे स्टेशन के बाहर फैले अतिक्रमण भी देखते - देखते समेट लिए गए। अवैध टोल नाकों का कारोबार खत्म हो गया। तृणमूल कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी और अवैध वसूली (कट मनी) पर अपने आप रोक लग गई। तृणमूल सरकार के विरुद्ध जनाक्रोश चुनाव परिणाम में तो प्रकट हुआ ही किन्तु उसके बाद पार्टी के अनेक दफ्तरों में भी तोड़फोड़ की गई। यद्यपि केंद्रीय बलों की मौजूदगी की वजह से इस बार हिंसा और हत्याओं की वारदातें नगण्य हैं। हालांकि इसकी शुरुआत तो शुबेंदु अधिकारी के निजी सचिव की हत्या से हुई परंतु दो दिन पहले अभिषेक बैनर्जी  और फिर तृणमूल सांसद कल्याण बैनर्जी के साथ हुई मारपीट को ज्यादा उछाला जा रहा है। तृणमूल इस पर सहानुभूति बटोरने का प्रयास कर  रही है। लेकिन पार्टी के भीतर  जिस तरह का ठंडापन देखने मिला वह बहुत कुछ कह गया।  वैसे इस प्रकार की घटनाएं लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं हैं। लेकिन ममता और अभिषेक दोनों के लिये ये आत्मावलोकन का अवसर है। उन्हें बीते 15 साल में  हुईं  राजनीतिक हिंसा की याद करनी चाहिए जिनमें मारे गए सैकड़ों लोगों में भाजपा के अलावा वामपंथी और कांग्रेस के लोग भी थे। हजारों नागरिक भी तृणमूल के गुंडों के अत्याचार के शिकार हुए। अनगिनत महिलाओं के साथ बलात्कार की खबरें तो राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आईं जिनका संज्ञान महिला एवं मानवाधिकार आयोग ने भी लिया। आज तृणमूल  अपने दफ्तरों और नेताओं पर हमले की चंद घटनाओं पर हायतौबा मचा रही है किंतु ये कहना गलत नहीं होगा कि प. बंगाल में जिस खूनी संस्कृति की शुरुआत वामपंथी शासनकाल में हुई थी उसे तृणमूल कांग्रेस ने और बढ़ावा दिया।  लेकिन भाजपा को उन तत्वों की घुसपैठ रोकना होगी जिन्होंने पहले वामपंथी सरकार के रहते आतंक फैलाया और फिर ममता राज में तृणमूल के दफ्तर में डेरा जमाकर बैठ गए। प. बंगाल की राजनीति में विशेष रूप से चुनाव के दौरान हिंसा का इतिहास काफी पुराना है। लेकिन इस बार  केंद्रीय बलों की तैनाती के चलते हिंसा की वारदातों में जबरदस्त कमी आई। ऐसा ही चुनाव के बाद भी देखने मिल रहा है। इस संबंध में  याद रखना जरूरी है कि जब बांग्लादेश और नेपाल में युवाओं ने सत्ता परिवर्तन किया और सरकार के उच्च पदों पर बैठे नेताओं के साथ मारपीट की है तब हमारे देश के कतिपय विपक्षी नेता और सोशल मीडिया पर मोदी विरोधी अभियान चलाने वाले कुछ पत्रकारों ने  युवाओं को भड़काने का कुचक्र रचते हुए  भारत में भी जेन जी क्रांति का शिगूफा छोड़ा। अब प. बंगाल में तृणमूल नेताओं के साथ जो हो रहा है वह उसी जेन जी क्रांति का नमूना है। बेहतर हो ममता बैनर्जी और उनके बड़बोले भतीजे अभिषेक अपने पापों का प्रायश्चित करने जनता से माफ़ी माँगें। लोकतंत्र में चुनावी हार एक सामान्य प्रक्रिया है किंतु जो नेता उसे विनम्रता से शिरोधार्य करते हैं उनका सम्मान बचा रहता है। लेकिन ममता ने चुनाव हारने के बाद भी पद से इस्तीफा नहीं देने की हेकड़ी दिखाकर जनादेश का जो अपमान किया उससे तृणमूल के प्रति नफरत और बढ़ गई।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 30 May 2026

जमानत अर्जी पर त्वरित फैसले जैसी व्यवस्था अन्य मामलों में भी हो


सर्वोच्च न्यायालय ने  जमानत आवेदनों और विचाराधीन कैदियों संबंधी फैसला सुनाते हुए निर्देशित  किया है कि देश की सभी अदालतों को जमानत आवेदनों पर आदर्श रूप से उसी दिन या अधिकतम अगले दिन तक निर्णय लेना अनिवार्य है। शीर्ष अदालत के  अनुसार जमानत नियम है जबकि कारावास अपवाद है। उक्त फैसले में विचाराधीन कैदियों की रिहाई को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा  मौलिक अधिकार  बताते हुए कहा कि यू.ए.पी.ए जैसे कठोर कानूनों में भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है । इसलिए अदालतों को जमानत का आदेश उसी दिन या अगले दिन या फैसला सुरक्षित रखने की स्थिति में  3 महीने के भीतर सुनाना होगा। साथ ही जमानत मिल जाने पर उसकी जानकारी तुरंत जेल प्रशासन को भेजी जाना चाहिए ताकि आरोपी उसी दिन या अगले दिन रिहा हो सके। मानवाधिकारों और सभ्य समाज की दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय का उक्त आदेश बेहद महत्वपूर्ण है। अदालत ने ये निर्देश भी दिया कि अग्रिम जमानत के  लिए किसी व्यक्ति को आत्मसमर्पण हेतु बाध्य नहीं किया जा सकता। कुछ दिनों पहले आतंकवाद से जुड़े कुछ लोगों को अनेक वर्षों से जेल में रखे जाने पर भी सर्वोच्च  न्यायालय ने टीका - टिप्पणी की थी। चूंकि गैर कानूनी गतिविधियों में जेल में बन्द लोगों की स्वतंत्रता को भी अदालत ने आवश्यक मान लिया ऐसे में देश भर की जेलों में बंद सैकड़ों विचाराधीन कैदियों की रिहाई का रास्ता खुल गया है जिनके विरुद्ध या  तो आरोप पत्र  पेश नहीं हुआ या फिर उस पर सुनवाई टलती आ रही है। उल्लेखनीय है फरवरी 2020 में हुए दिल्ली दंगों के आरोपी के तौर पर यू.ए.पी.ए में गिरफ्तार शर्जील इमाम और उमर खालिद को लंबे समय से जेल में बंद रखे जाने पर भी सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी जमानत और त्वरित सुनवाई के अधिकार पर पर विचार करते हुए मामला बड़ी पीठ को भेज दिया। 6 साल से जेल की हवा खा रहे उक्त दोनों की जमानत अर्जियां निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक कई मर्तबा इस आधार पर रद्द कर दिया कि प्रथम दृष्टया आरोप संगीन है। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले में  उन लोगों के लिए तो राहत की खबर है जो जमानत अर्जी की सुनवाई न होने से या तो जेल में हैं या फरार रहने बाध्य हो गए हैं। न्यायिक हिरासत के कारण जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों में बड़ी संख्या उन लोगों की भी है जो जमानत के लिए वकील का खर्च उठाने में असमर्थ हैं। गौरतलब है एक अर्जी नामंजूर हो जाने के बाद व्यक्ति ऊंची अदालत में आवेदन करे तो फ़िर मोटी फीस वकील साहब को देनी होती है। किसी आपराधिक प्रकरण में गिरफ्तारी के भय से अग्रिम जमानत हेतु आवेदन लगाना भी बेहद खर्चीला है। जिसके रद्द होने पर व्यक्ति छिपा फिरता है। कुल मिलाकर जमानत का पूरा मामला बेहद पेचीदा है और साधारण आर्थिक हैसियत वाले के लिए तो आसमान से तारे तोड़ने जैसा। उस दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय का संदर्भित फैसला स्वागतयोग्य है।  लेकिन सर्वोच्च न्यायालय का ये कहना कुछ मामलों में समस्या भी खड़ी कर सकता है कि आतंकवाद जैसे खतरनाक अपराधों में बंद आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी सर्वोपरि है। प्रश्न ये है कि शर्जील इमाम और उमर खालिद जैसे लोगों को जमानत मिलना क्या कानून - व्यवस्था के लिए खतरा नहीं होगा? यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय ऐसे लोगों के बारे में उदारता दिखाते समय देश की एकता ओर अखंडता की रक्षा के प्रति लापरवाह नहीं हो सकता किन्तु इस फैसले से निचले स्तर की अदालतों पर जमानत अर्जी  मंजूर करने में जल्दबाजी का दबाव आने का खतरा पैदा हो गया है। सर्वोच्च न्यायालय अतीत में जमानत देने में आनाकानी के लिए निचली अदालतों की आलोचना कर चुका है। ये फैसला उसी से प्रभावित है जिसमें फायदे और नुकसान दोनों ही हैं क्योंकि न्यायाधीश भी मनुष्य होते हैं और सभी की सोच और योग्यता एक समान हो ये जरूरी नहीं है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय की ये बात सही है कि जमानत जैसे गंभीर विषय में सुनवाई के बाद फैसला सुनाने के लिए निश्चित समय सीमा होनी चाहिए। साथ ही ये भी कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार भी हर किसी को है। लेकिन इस फैसले के परिप्रेक्ष्य में ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि केवल जमानत अर्जी पर ही त्वरित फैसले करने की बंदिश लगाने वाला सर्वोच्च न्यायालय  सामान्य न्याय प्रक्रिया में होने वाले विलम्ब को खत्म करने के बारे में ऐसा ही निर्देश कब देगा ? शीर्ष अदालत में विराजमान माननीय न्यायमूर्तियों को ये बताने की जरूरत नहीं है कि लम्बी और मंहगी न्यायिक प्रक्रिया के कारण आम नागरिक के मन में न्यायपालिका के प्रति विश्वास और सम्मान लगातार घटता जा रहा है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 29 May 2026

नक्सलियों के सफाए के बाद अब घुसपैठियों पर अमित शाह की नजर


केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने  कहा है कि  ममता बनर्जी  के शासन में रोजाना घुसपैठ होती थी, लेकिन अब डर के मारे घुसपैठिए खुद वापस लौटने लगे हैं।  गृहमंत्री ने चेतावनी देते हुए कहा ,वे खुद  चले जाते हैं, तो  सरकार उन पर कोई केस नहीं करेगी और लौटने में  पूरी मदद भी करेगी। उन्होंने आशा व्यक्त की  कि घुसपैठियों की पहचान का अभियान शुरू होने से पहले ही वे  लौट जाएंगे। उनकी अपील ऐसे समय आई जब प. बंगाल ही नहीं देश के अन्य हिस्सों में बसे बांग्लादेशी घुसपैठिए वापस लौटने के लिए प. बंगाल आकर सीमा पर जमा हो रहे हैं। शुभेंदु सरकार ने डिटेक्ट , डिटेन ,और डिपोर्ट  जैसी घोषणा कर जो आक्रामक रवैया अपनाया उससे घुसपैठियों में दहशत फैलने लगी।  वस्तुतः ममता बैनर्जी की सरकार ने न तो घुसपैठियों को आने से रोकने के लिए कोई योजना बनाई और न ही उन्हें वापस भेजने का साहस दिखाया।  उससे भी बड़ी चिंता का कारण ये है कि उनके राशन और आधार कार्ड बनने के अलावा मतदाता सूचियों में नाम भी दर्ज हो गए। इसीलिये विधानसभा चुनाव के पहले चुनाव आयोग ने एस.आई.आर की प्रक्रिया प्रारंभ की तब ममता बैनर्जी ने अड़ंगे लगाने का हरसंभव प्रयास किया किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। लाखों नाम मतदाता सूचियों से इसलिए अलग हुए क्योंकि  वे  जरूरी दस्तावेज नहीं दे सके। तृणमूल कांग्रेस को जीत का जो आत्मविश्वास था उसका कारण मुस्लिम मतदाताओं के साथ ही  घुसपैठिये भी रहे।  मतदाता सूची से बाहर होने वाले घुसपैठियों को उम्मीद थी कि ममता सरकार ही लौटकर आएगी इसलिए  वे निश्चिंत बैठे रहे। लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया । भाजपा ने सत्ता में आते ही जो तेवर दिखाये उनसे उनको ये महसूस होने लगा कि डिटेंशन (हिरासत) में आने के बजाय बेहतर होगा वापस अपने मुल्क लौटा जाए। चौंकाने वाली बात ये है कि न सिर्फ़ प. बंगाल वरन दक्षिणी राज्यों में कार्यरत घुसपैठिए भी बांग्लादेश लौटने के लिए आने लगे। हाल ही में मुख्यमंत्री श्री अधिकारी ने ये कहकर हलचल मचा दी कि ममता सरकार जिन करोड़ों महिलाओं को प्रतिमाह 1500 रुपए दे रही थी उनमें 30 लाख बांग्लादेशी महिलाएं भी हैं। इसीलिए राज्य सरकार ने महिलाओं को 3 हजार रुपए हर महीने देने संबंधी  वायदे को पूरा करने के पहले  लाभार्थियों की नई सूची तैयार करने का फैसला किया। इसके अलावा भी मुफ्त राशन एवं अन्य  सुविधाओं का लाभ घुसपैठियों को पिछली सरकार दे रही होगी। सवाल ये है कि ममता बैनर्जी जैसी वरिष्ट नेत्री को इन घुसपैठियों को संरक्षण देने की क्या जरूरत पड़ गई? स्मरणीय है बांग्लादेश से घुसपैठियों का  आना वामपंथी सरकार के कार्यकाल में भी जारी रहा। प. बंगाल की जनता ने उस सरकार से नाराज होकर ही ममता बैनर्जी को सत्ता सौंपी थी किंतु उनके राज में तो प. बंगाल घुसपैठियों का स्वर्ग बन गया। यहां की राजनीति में मुस्लिम वर्चस्व का कारण ये घुसपैठिए ही रहे। चूंकि भाजपा ने घुसपैठ को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया इसीलिए हिन्दू मतों का ध्रुवीकरण उसके पक्ष में हुआ। दरअसल ममता राज में घुसपैठियों के आतंक से हिंदुओं में भय व्याप्त था। चूंकि कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां भी तुष्टीकरण करती रहीं इसलिए जब भाजपा ने घुसपैठियों के विरुद्ध कार्रवाई का वायदा किया तो जनता ने  उसको जबरदस्त समर्थन देकर सत्ता सौंप दी। मुख्यमंत्री श्री अधिकारी की प्रशंसा की जानी चाहिए जिन्होंने बिना देर लगाए घुसपैठियों को वापस भेजने के लिए ठोस कदम उठाए जिनका असर दिखने भी लगा है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर में सीमा पर कंटीले तार की बाड़ लगाने हेतु केंद्र सरकार द्वारा मांगी जमीन देने का फैसला भी घुसपैठ रोकने की दिशा में बड़ा कदम है। ममता सरकार बरसों से इस मामले को दबाकर बैठी थी। प. बंगाल में घुसपैठियों के विरुद्ध चल रही कार्रवाई राष्ट्रीय स्तर पर की जानी चाहिए क्योंकि बांग्लादेशी और रोहिंग्या दोनों ही घुसपैठिए मुस्लिम कट्टरपंथियों के साथ मिलकर आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन गए हैं। बीते कुछ वर्षों में हुईं अनेक आतंकवादी वारदातों के तार बांग्लादेश से जुड़े पाये जाने से इसकी पुष्टि हो चुकी है। गृह मंत्री अमित शाह  नक्सलवादियों के आतंक का खात्मा कर अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय दे चुके हैं । उनकी ताजा चेतावनी के बाद ये उम्मीद की जा सकती है कि देश इन घुसपैठियों द्वारा उत्पन्न समस्या से भी मुक्त हो जाएगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 28 May 2026

सर्वोच्च न्यायालय ने वोट चोरी नामक गुब्बारे की हवा निकाल दी


अन्ततः सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एस. आई.आर ) को विधि सम्मत मानते हुए स्पष्ट कर  दिया कि चुनाव आयोग के पास प्रक्रिया का पालन करते हुए मतदाता सूची में संशोधन करने का अधिकार है, अतः यह पूरी तरह से संवैधानिक और वैध है। गत दिवस दिए फैसले में उसने स्वीकार किया कि जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट को अपडेट और संशोधित करने की शक्ति प्राप्त है। एस.आई.आर विरोधी याचिकाओं को रद्द करते हुए न्यायालय ने स्पष्ट  किया कि उसमें कोई खामी नहीं है।  फैसले में कहा गया है कि आयोग मतदाता सूची में शामिल होने की पात्रता के  साथ ही शर्तों के साथ नागरिकता की जांच भी कर सकता है। इस फैसले से उन लोगों को निराशा हुई होगी जो ये प्रचार करने में जुटे रहे कि मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की आड़ में केंद्र सरकार के इशारे पर उन मतदाताओं के नाम योजनाबद्ध तरीके से काटे गए जिन्हें भाजपा विरोधी समझा जाता था। उधर चुनाव आयोग बाकायदा घोषणा करता रहा कि नाम काटे गए मतदाता आवश्यक दस्तावेजों के साथ दोबारा आवेदन कर सकते हैं। बिहार में ऐसा हुआ भी । इसी के साथ ही 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले नए मतदाताओं को नाम जोड़ने के लिए भी पर्याप्त अवसर दिया गया। बिहार और प. बंगाल में एस. आई. आर का सबसे ज्यादा विरोध हुआ। प. बंगाल में तो सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायाधीशों तक को उसकी प्रक्रिया संपन्न करने में लगाया जिससे पारदर्शिता बनी रहे। जिन पांच राज्यों में पिछले महीने विधानसभा चुनाव हुए वहां भारी मतदान से एक बात तो साबित हो गयी कि मतदाताओं का चुनाव प्रक्रिया में पूरा विश्वास है।  आयोग द्वारा की गई व्यवस्था को भी खुलकर सराहा गया। एस. आई. आर के विरोध में विपक्ष ने ये सोचकर हल्ला मचाया कि जनता भी उसके साथ सड़कों पर उतरेगी किन्तु बिहार में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की यात्रा और प. बंगाल में ममता बैनर्जी द्वारा सड़क से सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ने के बावजूद उन्हें न जन समर्थन मिला और न अदालत ने प्रक्रिया रोकी। अब जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने एस. आई.आर को कानून सम्मत बताते हुए उसे चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में मान लिया और आधार कार्ड को नागरिकता का प्रमाण मानने से भी मना कर दिया तब विपक्ष और उसके पीछे खड़े मोदी विरोधियों को भी ये समझ जाना चाहिए कि ये मुद्दा बेअसर हो चुका है। वोट चोरी को लेकर राहुल गांधी ने  मुख्य चुनाव आयुक्त को घेरने के लिए धरती - आसमान एक कर दिये वहीं ममता बैनर्जी तो धरने तक पर बैठ गईं। लेकिन उनकी बात न जनता के गले उतरी और न ही सर्वोच्च न्यायालय ने ही उसे महत्व दिया। बिहार, और प. बंगाल में भाजपा को मिली सफलता से ये साबित हो गया कि एस. आई. आर के विरोध को जनता ने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया।  सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट फैसले के बाद वोट चोरी का गुब्बारा पूरी तरह फूट चुका है। बिहार और प. बंगाल में शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न होने का कारण मतदाता सूचियों में किया गया संशोधन ही है। अवैध बांग्लादेशियों के अलावा मृत हो चुके लोगों के नाम बड़े पैमाने पर कटने से मतदाता सूचियाँ शुद्ध हो गईं जिससे फर्जी मतदान रोका जा सका। सर्वोच्च न्यायालय ने भविष्य में होने वाले चुनावों के पहले छूटे हुए सभी मतदाताओं के नाम जोड़ने का निर्देश देकर चुनाव आयोग को एस. आई. आर जारी रखने की छूट दे दी। सवाल ये है कि क्या विपक्ष अपना विरोध जारी रखेगा या आयोग के साथ समन्वय स्थापित कर मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने में सहयोग करेगा जिसमें उसका भी हित है। लेकिन इसके लिए उनको अपने संगठन में कसावट लानी होगी। राहुल गांधी जैसे नेताओं को भी ये बात समझनी चाहिए कि जितना समय , श्रम और संसाधन उन्होंने बिहार में चुनाव आयोग को गाली देने में खर्च किया उतना अपनी पार्टी को मजबूत करने में लगाते तब कांग्रेस की इतनी दुर्गति नहीं होती।  प. बंगाल में उन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी तो सब सीटों पर उतार दिए किंतु प्रचार से दूरी बनाकर उनकी फजीहत करवा दी। यहां तक कि पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा माने जाने वाले अधीर रंजन चौधरी लोकसभा में हारने के बाद विधानसभा चुनाव में भी तीसरे स्थान पर रहे।  बिहार और प. बंगाल में  औंधे मुंह गिरने के बाद ममता सहित अन्य विपक्षी नेता एकजुट होकर भाजपा से निपटने की बातें कर रहे हैं किंतु उनके पास इस बात का कोई उत्तर नहीं है कि इन चुनावों में एकता से परहेज क्यों किया गया और आगे उसकी क्या गारंटी है? बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय ने बिना लाग - लपेट के एस. आई. आर को चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में मानते हुए  चुनाव प्रक्रिया का आवश्यक भाग बताते हुए विपक्ष द्वारा फैलाए गए झूठ की कलई खोल दी है। ये फैसला विपक्ष के लिए सबक भी है कि वह हवा - हवाई मुद्दों से दूर रहते हुए जनहित से जुड़े विषयों पर आवाज उठाये। लेकिन पिछले अनुभव बताते हैं कि विपक्ष में आत्मावलोकन की प्रवृत्ति और जनता की अपेक्षाओं को महसूस करने की क्षमता खत्म हो चुकी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 27 May 2026

घुसपैठिये आस्तीन में छिपे साँप


देश के सीमावर्ती इलाकों सहित कुछ अन्य क्षेत्रों में डेमोग्राफिक चेंज ( आबादी में असंतुलित बदलाव) लम्बे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिंता का विषय रहा है।  प. बंगाल के  हालिया विधानसभा चुनाव में डेमोग्राफिक चेंज और बांग्लादेशियों की घुसपैठ ममता  सरकार के विरुद्ध बड़ा मुद्दा  था । भाजपा को  सत्ता तक लाने में इसका प्रमुख योगदान रहा। नए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने घुसपैठियों को उनके देश वापस भेजने की घोषणा कर इसे जीवित रखने का संकेत दे दिया था। इसकी पुष्टि गत दिवस हो गयी जब केंद्रीय  गृह मंत्री अमित शाह ने डेमोग्राफिक चेंज पर एक  उच्चस्तरीय समिति के गठन की घोषणा करते हुए कहा कि  घुसपैठ और अन्य कारणों से अप्राकृतिक डेमोग्राफिक चेंज किसी भी देश के वर्तमान व भविष्य के लिए गंभीर चुनौती है। जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता में बनाई गई इस समिति में जनगणना आयुक्त के साथ दुर्गा शंकर मिश्रा (से . नि.आईएएस), बालाजी श्रीवास्तव (से.नि .आईपीएस) और डॉ. शमिका रवि समिति के सदस्य रहेंगे वहीं संयुक्त सचिव (फॉरेनर्स-I), गृह मंत्रालय सदस्य सचिव बनाए गए हैं। वैसे तो घुसपैठियों की समस्या 1947 के बाद से ही चली आ रही है। जम्मू कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर राज्यों में  पड़ोसी देशों से  आकर बसे घुसपैठियों ने  सामाजिक वातावरण को बिगाड़ने के साथ ही जमीन कब्जाने जैसे कारनामे किए जिससे उनका मूल निवासियों से टकराव भी हुआ। 1971 में बांग्लादेश बनने के पहले जो 1 करोड़ से ज्यादा शरणार्थी भारत  में घुसे उनको वापस भेजना तो दूर उल्टे वह सिलसिला बेरोकटोक जारी रहा। धीरे - धीरे ये घुसपैठिये देश के भीतरी हिस्सों तक फैलते गए और मुस्लिम वोट बैंक के सौदागरों ने इन्हें नागरिकता दिलवाने में भरपूर सहायता और संरक्षण प्रदान किया। इसके बाद म्यांमार से खदेड़े गए रोहिंग्या मुस्लिमों ने भी पूर्वोत्तर राज्यों में अपने ठिकाने बना लिए। उ.प्र और बिहार के जो क्षेत्र नेपाल की तराई में हैं वहां अचानक मदरसों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि भी चौंकाने वाली रही। बिहार में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के विधायक इसी इलाके से जीते भी। असम भी  जनसंख्या संतुलन बिगड़ने की समस्या से जूझता आ रहा है। इसीलिए मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने पिछले कार्यकाल में ही मदरसे बंद करवा दिए थे । देवभूमि कहलाने वाले हिन्दू बहुल उत्तराखंड राज्य में भी मुस्लिम आबादी रहस्यमय तरीके से बढ़ी जिससे सुरक्षा एजेंसियां चिंता में पड़ गईं। ये बात पूरे देश में अनुभव की जा रही है कि डेमोग्राफिक चेंज हमारी संप्रभुता के साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून व्यवस्था, सामाजिक संरचना में गंभीर बदलाव और जनजातीय समाज के संरक्षण से जुड़ी गंभीर समस्या है। गत दिवस गठित समिति अवैध प्रवास और अन्य असामान्य कारणों से पूरे देश में हो रहे जनसांख्यिकी बदलाव का व्यापक मूल्यांकन करते हुए धार्मिक एवं सामाजिक समुदायों के स्तर पर इसके पैटर्न का विश्लेषण कर सुनियोजित और समयबद्ध समाधान प्रस्तुत करेगी।  बड़ी बात नहीं इस समिति का विरोध भी वे राजनीतिक दल करने लगें जो आबादी के असंतुलन में अपनी चुनावी संभावनाएं देखते हैं। प. बंगाल में जब भी बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालने की बात उठी ममता बैनर्जी उनके बचाव में खुलकर सामने आईं। सीएए और मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का विरोध करने में भी उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके घुसपैठिया प्रेम का सबसे बड़ा उदाहरण ये था कि उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा कई बार लिखित अनुरोध किए जाने पर भी बांग्लादेश सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने के लिए जमीन देने में कोई रुचि नहीं दिखाई। वहीं सत्ता बदलते  ही मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी ने  केंद्र सरकार द्वारा मांगी गई भूमि सौंप दी। गौरतलब है घुसपैठिये केवल आबादी ही नहीं बढ़ाते अपितु हमारे संसाधनों का उपयोग करते हुए जिंदगी बसर करते हैं।  चूंकि इनमें बड़ी संख्या मुस्लिमों की होती है लिहाज़ा ये जिस क्षेत्र में बसते हैं वह मुख्य धारा से कट जाने के कारण राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का केंद्र बने नहीं रहता। उ.प्र, बिहार, असम और प. बंगाल में अनेक ऐसे निर्वाचन क्षेत्र हैं जिनमें केवल मुसलमान ही जीत सकता है। यहां घुसपैठियों के कारण भारत विरोधी माहौल खुले आम देखा जा सकता है। इस समिति की आवश्यकता काफी पहले से महसूस की जा रही थी। केंद्र सरकार ने इसका गठन कर बहुत ही सामयिक और साहसिक कदम उठाया है। ये घुसपैठिए आस्तीन में छिपे साँप से कम नहीं  हैं जिनका फ़न कुचलना देश की अखंडता और सुरक्षित भविष्य के लिए अत्यावश्यक है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 26 May 2026

ट्रम्प की हालत सांप - छछूंदर जैसी हो गई


दुनिया को अपनी उंगली पर नचाने वाले अमेरिका की स्थिति बेहद हास्यास्पद हो गई है। ईरान के साथ युद्ध में तीन महीने बाद भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ये तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे युद्ध की समाप्ति किस प्रकार करें क्योंकि न तो वे ईरान को पूरी तरह पराजित करने में सफल हुए और न ही उसके परमाणु कार्यक्रम को रुकवाने में उन्हें सफलता मिली। ईरान के तेल को बेचकर पैसा कमाने और होर्मुज समुद्री मार्ग का चौधरी बनकर उसके तेल व्यापार को नियंत्रित करने का उनका मंसूबा भी पूरा होता नहीं दिख रहा। अपने दुमछल्ले पाकिस्तान को मोहरा बनाकर कूटनीतिक पहल करने का अमेरिकी दांव भी अब तक तो कारगर साबित नहीं हो सका क्योंकि वार्ता की टेबिल सजने के बाद भी ईरान ने ट्रम्प की शर्तें मान लेने से इंकार कर दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति आये दिन ये शिगूफा छोड़ते रहते हैं कि ईरान उनकी शर्तों को मान गया है । लेकिन कुछ देर बाद ही वे उसे धमकी देने लग जाते हैं। उनके हर दावे का ईरान ने मजाक ही उड़ाया और हमले की धमकियों का जवाब भी उसी भाषा में देने में संकोच नहीं किया। गत सप्ताह ऐसा लगा था कि दोनों के बीच सहमति बन गई है। इसके कारण गत दिवस दुनिया के शेयर बजारों में उछाल भी देखा गया किंतु  पीछे - पीछे ये खबर भी आ गई कि अमेरिकी सैन्य दस्तों ने होर्मुज में ईरानी नौसैनिक नावों आदि पर हमले किये। ट्रम्प की ये डींग भी हवा - हवाई होकर रह गई कि ईरान अगले 20 साल तक परमाणु अस्त्र नहीं बनाने राजी हो गया है। कुल मिलाकर प. एशिया में चल रहे युद्ध के समाप्त होने सम्बन्धी कूटनीतिक बातचीत एक कदम आगे , दो कदम पीछे वाली स्थिति में है। इस लड़ाई की जड़ है इसराइल जिसे अमेरिका का सबसे चहेता माना जाता है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के अनुरोध पर ही ट्रम्प ने  हजारों कि.मी दूर आकर ईरान से पंगा लेने जैसा निर्णय लिया जबकि अफगानिस्तान में 20। साल डटे रहने के बावजूद तालिबानी कट्टरपंथियों से समझौता करने का दर्द अभी भी वाशिंगटन भूला नहीं है। उल्लेखनीय है गाजा  पट्टी नामक फिलीस्तीन के हिस्से पर ईरान द्वारा पालित - पोषित हमास नामक इस्लामिक आतंकवादी संगठन का शासन था। उसने अचानक बेवजह इसराइल पर हमले कर उसके सैकड़ों नागरिकों को बंधक बना लिया। उसके जवाब में नेतन्याहू ने वही किया जो इसराइल का स्वाभाव है। हमास की तबाही का बीड़ा उठाकर नेतान्याहू ने समूचे गाजा को मलबे के ढेर में बदल दिया। ईरान के साथ चल रही मौजूदा जंग की पृष्ठभूमि में इसराइल और हमास के बीच हुई लड़ाई ही है।नेतन्याहू  अमेरिका को ये समझाने में तो सफल हो गए कि ईरान ही प. एशिया में अमेरिका के प्रभुत्व को चुनौती देने वाला है। यदि उसे ठिकाने लगा दिया जाए तो अधिकांश अरब जगत पर उनका दबदबा कायम होने से कोई नहीं रोक सकेगा। अमेरिका तो बीते अनेक दशकों से ईरान में अपनी समर्थित सत्ता कायम करने के प्रयास कर रहा था लेकिन तमाम  प्रतिबंधों और दबावों के बाद भी उसके मंशा पूर्ण न हो सकी। दरअसल इसराइल को ये डर सताता रहा है कि ईरान ने परमाणु अस्त्र बना लिए तो उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। गाजा में हुए युद्ध के दौरान भी इसीलिए अमेरिका ने ईरान के आण्विक केंद्रों पर भीषण बमबारी की थी। लेकिन जैसी कि जानकारी मिली उसके अनुसार ईरान ने परमाणु अस्त्र बनाने के लिए संगृहीत परिष्कृत यूरेनियम पहले ही दूसरे सुरक्षित स्थानों छिपा दिया था। इस बार की लड़ाई में भी अमेरिका ने ईरान को परमाणु शक्ति बनने से रोकने के लिये हरसम्भव प्रयास किये किंतु अब तक तो वह ऐसा नहीं कर सका। ईरान ने न तो परमाणु कार्यक्रम रद्द करने का आश्वासन दिया और न ही परिष्कृत यूरेनियम भंडार उसे सौंपने पर सहमत हुआ। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिये अचूक कार्ययोजना बनाने के फेर में ट्रम्प और नेतन्याहू ये भूल गए कि ईरान ने मिसाइलों के क्षेत्र में भी अकल्पनीय उपलब्धि हासिल कर ली है। बीते तीन महीनों में अमेरिका और इसराइल के जबरदस्त हमलों के जवाब में ईरान ने जिस बड़ी मात्रा में इसराइल ही नहीं बल्कि अमेरिका के समर्थक सऊदी अरब , ओमान , कतर और यू.ए.ई आदि पर मिसाइलें बरसाईं वह अप्रत्याशित था। युद्धविराम के दौरान भी ये जानकारी आई कि ईरान के पास अभी भी हजारों मिसाइलाें का जखीरा है। अमेरिका और  इसराइल के सैकड़ों हवाई हमले भी इन्हें नष्ट नहीं कर सके क्योंकि ये जखीरा भूमि के नीचे है । यही वजह है कि डोनाल्ड ट्रम्प लगभग रोजाना ईरान को मिटा देने की धमकी देने के कुछ देर बाद ही शांति समझौते की कहानी लेकर बैठ जाते हैं। सही बात ये है कि ईरान भी अमेरिका की कमजोरी भांप चुका है। इतने तनावपूर्ण माहौल में ट्रम्प की चीन यात्रा भी उनकी दयनीयता को दर्शाती है। उन्हें लगता था वे चीन के राष्ट्रपति के जरिए ईरान को समझौते के लिए बाध्य कर ले जाएंगे किंतु बीजिंग में उनकी किरकिरी ही हुई। आज के हालात में ट्रम्प की स्थिति सांप - छछूंदर जैसी हो गई है और वे  अमेरिका के सबसे कमजोर और घटिया राष्ट्रपति के रूप में कुख्यात हो चले हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 25 May 2026

पेट्रोल - डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने का सही अवसर




अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद से ही अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि  होने से ज्यादातर देशों में तो पेट्रोल , डीजल और गैस महंगे हुए किंतु भारत में दाम नहीं बढ़े। भले ही इसका कारण पर्याप्त भंडार बताया गया किंतु सच्चाई ये है कि केंद्र सरकार पांच राज्यों के चुनाव परिणामों का इंतजार कर रही थी। ये  साबित भी हो गया जब चुनाव के कुछ  दिनों बाद ही पेट्रोल डीजल के दामों में वृद्धि की गई। उल्लेखनीय है मूल्य वृद्धि करने से पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  लोगों से पेट्रोल - डीजल की फिजूलखर्ची रोकने के साथ ही एक वर्ष तक विदेश यात्रा और सोने की खरीदी से परहेज करने की अपील की थी जिसका उद्देश्य बहुमूल्य विदेशी मुद्दा बचाना था। उक्त चीजों का आयात  अमेरिकी डॉलर में होने से उसकी मांग बढ़ती है जिसका परिणाम रुपये की  गिरती कीमत के रूप में सामने है। प्रधानमंत्री की उक्त अपील में ही मूल्य वृद्धि का संकेत निहित था। सोने पर आयात शुल्क में वृद्धि और चांदी के आयात में कानूनी रोक लगाना इसका प्रमाण है। अंत में पेट्रोल - डीजल का क्रम आया और बीते 15 दिनों  में ही चार किश्तों में लगभग 10 रु. प्रति लिटर की वृद्धि की जा चुकी है। जाहिर है हाल - फिलहाल कोई चुनाव नहीं हाेने की वजह से केंद्र सरकार को राजनीतिक खतरा नजर नहीं आ रहा। यद्यपि जनता भी इस बात को समझ रही है कि पेट्रोल - डीजल का 85 फीसदी विदेशों से आता है जिसकी कीमतें खाड़ी युद्ध के कारण तेजी से न सिर्फ बढ़ीं अपितु ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य नामक समुद्री मार्ग से आवाजाही रोककर उनकी आपूर्ति भी बाधित कर दी गई।  तेल और गैस  संयंत्रों पर हुए हमलों के कारण उत्पादन भी घट गया। ऐसे में इन हालातों से भारत का अछूता रहना असंभव था। युद्ध प्रारंभ होने के दो माह  बाद केंद्र सरकार ने दाम बढ़ाने का सिलसिला शुरू किया जिसकी चौथी किश्त आज से लागू हो गई। अभी ये कहना कठिन है कि ये वृद्धि कहां जाकर रुकेगी क्योंकि खाड़ी देशों से आने वाला कच्चा तेल  परिवहन लागत कम होने से  सस्ता पड़ता है जबकि अमेरिका, कैनेडा और वेनेजुएला से आयात में ज्यादा समय और खर्च  लगता हैं। ऐसे में कीमतें बढ़ाने के वाजिब कारण तो हैं किंतु इसी  के साथ ये सवाल उठता है कि जब रूस और ईरान से सस्ता तेल खरीदा गया तब उस उसका लाभ आम जनता को क्यों नहीं दिया गया?  मौजूदा हालात में पेट्रोल - डीजल महंगा होना बेहद स्वाभाविक है। यहां तक कि ईरान और अमेरिका के बीच समझौते के बाद युद्धविराम होने पर भी  मूल्य वृद्धि भले थम जाए लेकिन बढ़ी हुई कीमतें  कम होने में कितना समय लगेगा ये कोई नहीं बता सकता क्योंकि कच्चे तेल का उत्पादन और आपूर्ति युद्ध पूर्व जैसी स्थिति में आने में लंबा समय लगेगा। और ये भी कि तेल उत्पादक देश युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई के लिए कीमतें गिरने नहीं देंगे। ऐसे में पेट्रोलियम पदार्थों के दाम और बढ़ें तो आश्चर्य नहीं होगा। लेकिन सरकार चाहे  तो वैश्विक बदलावों के अनुरूप पेट्रोल - डीजल  की मूल्य वृद्धि करते हुए भी उन पर लगने वाले टेक्सों को स्थिर रखकर कुछ राहत तो दे ही सकती है। मसलन आज जो कीमतें बढ़ाई गईं उनमें राज्यों का टैक्स जोड़ने पर वह और अधिक हो गई। अतीत में कई बार ऐसा हुआ जब केंद्र और राज्य सरकारों ने अपने - अपने हिस्से के टैक्स में कमी कर मूल्य वृद्धि के बोझ से आम उपभोक्ता को राहत दी। सरकार भी जानती है कि पेट्रोल - डीजल की मूल्य वृद्धि से परिवहन महंगा होने पर महंगाई बढ़ती है। ये देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि वे पेट्रोल - डीजल के दाम बढ़ने के बावजूद अपने टैक्स को यथावत रहने दें। यदि इस फॉर्मूले को अपनाया जाए तो जनता के कंधों पर मूल्य वृद्धि का बोझ अपेक्षाकृत कम पड़ेगा । वैसे होना तो ये चाहिए कि पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस को जीएसटी के दायरे में लाया जाए। वर्तमान में ज्यादातर राज्यों में भाजपा और उसके समर्थक दलों वाली राज्य सरकारें होने से जीएसटी काउंसिल में उक्त प्रस्ताव पारित करवाने में कोई रुकावट नहीं आएगी। वन नेशन वन टैक्स की व्यवस्था लागू करने और आपदा में अवसर तलाशने का यह उपयुक्त समय है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 22 May 2026

कोरोना से भी बड़े संकट में फंस गई दुनिया


प. एशिया में चल रही जंग अब दिशाहीन होती जा रही है। अमेरिका और इसराइल की ये सोच पूरी तरह गलत साबित हुई कि वे ईरान को कुछ ही दिनों में घुटनाटेक करवा लेंगे। शुरुआत में ही उसके सर्वोच्च नेता खामेनेई को मारने में कामयाब होने से उनका हौसला काफी बुलंद हुआ था। लेकिन ईरान के जवाबी हमलों ने सारे समीकरण उलट दिए। सबसे बड़ी बात ये हुई कि उसने अमेरिकी युद्धपोतों और लड़ाकू विमानों के अलावा इज़राइल को ही निशाना नहीं बनाया अपितु सऊदी अरब, ओमान, कतर और यू.ए.ई पर भी मिसाइलें दाग दीं क्योंकि इनमें अमेरिकी सैन्य अड्डों के अलावा पश्चिमी देशों का काफी पूंजी निवेश हैं। इसी के साथ ही ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य नामक समुद्री मार्ग को बंद कर दिया। परिणामस्वरूप युद्ध का क्षेत्र तो फैला ही पूरी दुनिया में कच्चे तेल और गैस की किल्लत होने लगी। इसीलिए इस लड़ाई को दूर से देख रहे देशों के हित भी इससे जुड़ गए। ईरान भी समझ गया कि इस लड़ाई में पूरी तरह जीतना तो संभव नहीं है अतः उसने होर्मुज को बतौर ट्रम्प कार्ड उपयोग करते हुए पूरे युद्ध को नया मोड़ दे दिया। इसका असर ये हुआ कि उसके परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने के बजाय अमेरिका की चिंता होर्मुज पर आकर अटक गई। ईरान ने उससे गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलने का फैसला करने के साथ कुछ चुनिन्दा देशों को ही उसकी अनुमति दी। इससे अमेरिका भन्ना गया और उसने वहां अपने युद्धपोत तैनात कर ये संकेत दिया कि वह इस समुद्री मार्ग पर ईरान का आधिपत्य खत्म कर देगा। साथ ही टोल चुकाकर आने वाले जलपोतों पर कार्रवाई की धमकी दे डाली। पाकिस्तान की मध्यस्थता में आयोजित ईरान - अमेरिका की शान्ति वार्ता भी विफल हो गई। हालांकि कहने को तो युद्धविराम चल रहा है लेकिन एक तरफ जहां इसराइल ने लेबनान पर हमले जारी रखे हैं वहीं दूसरी तरफ ईरान भी कभी ओमान तो कभी यू.ए.ई पर बारूदी वर्षा करने बाज नहीं आ रहा। इसी के साथ खाड़ी के ज्यादातर देशों ने हथियारों की खरीददारी बढ़ाकर युद्ध के लंबा खिंचने की आशंका को बढ़ावा दिया है। एक बात और भी उल्लेखनीय है कि सऊदी अरब ने पाकिस्तान के हजारों सैनिक किराए पर लेने के साथ ही लड़ाकू विमान भी अपने यहां तैनात करवाए हैं। दरअसल सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच ये संधि हुई है कि किसी एक पर हमला दोनों पर माना जाएगा। मौजूदा जंग में ईरानी मिसाइलों ने सऊदी अरब को काफी नुकसान पहुंचाया है। उस दृष्टि से तो पाकिस्तानी  सेना और लड़ाकू विमानों की सऊदी अरब में तैनाती स्वाभाविक है। लेकिन इसमें एक विरोधाभास ये भी है कि एक तरफ तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख ईरान और अमेरिका के बीच समझौता करवाने के लिए हाथ - पांव मारते हुए दोनों ओर के शांति प्रस्तावों को इधर से उधर पहुंचाने की मशक्कत में जुटे हुए हैं और दूसरी तरफ वह सऊदी अरब को अपने सैनिकों और लड़ाकू विमानों की सेवाएं देकर ईरान के विरोधी पाले में खड़ा हो गए। हालांकि शांति वार्ता का मंच सजाकर खुद को कूटनीति का उस्ताद समझने वाले पाकिस्तान को ईरान और अमेरिका दोनों फटकार लगाते रहते हैं। मौजूदा स्थिति में ईरान और अमेरिका दोनों के बीच समझौते की गाड़ी कहां तक पहुंची ये कोई नहीं बता सकता किंतु इस उहापोह के कारण पूरी दुनिया हलाकान है। पेट्रोल - डीजल और गैस के बिना आज के जीवन की कल्पना असंभव है। युद्ध की शुरुआत में सभी को लगा कि हफ्ते दो हफ्ते में ये जंग रुक जाएगी लेकिन तीन महीने  के बाद भी इस मसले का कोई हल दूरदराज तक नजर नहीं आ रहा।  हालांकि सही बात ये भी है कि ईरान और अमेरिका दोनों को ये समझ नहीं आ रहा कि सम्मानजनक तरीके से कैसे अपनी गर्दन निकालें। डोनाल्ड ट्रम्प थोड़ा ठण्डे पड़ते हैं तो सऊदी अरब सहित खाड़ी के अन्य देश उन पर दबाव डालते हैं कि ईरान को घायल छोड़कर न जाएं। ताजा खबर ये है कि इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू और ट्रम्प के बीच भी तनातनी हो गई है। आज किसी की समझ में ये नहीं आ रहा कि इस जंग को खत्म कैसे करें क्योंकि दोनों पक्ष अपने को पराजित मानने के लिए तैयार नहीं हैं। साथ ये भी अनुभव हो रहा है कि जंग की शुरुआत जिस भी उद्देश्य से हुई हो किंतु अब वह उद्देश्यविहीन होकर रह गई है। अमेरिका और इसराइल यदि ईरान को झुकाने में सफल नहीं हुए तो ईरान भी अपनी बर्बादी को रोकने में नाकामयाब हुआ। दुर्भाग्य से संरासंघ पूरी तरह नकारा हो गया है। भले ही इसे विश्व युद्ध न कहा जाए लेकिन इसके कारण पूरा विश्व परेशान हो उठा है। आज की स्थिति में ये युद्ध कहां जाकर रुकेगा कहना मुश्किल है किंतु कोरोना महामारी से किसी तरह उबर रही दुनिया उससे भी बड़े संकट में फंस गई है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 21 May 2026

राहुल की विदेश यात्राओं का ब्यौरा भी सार्वजनिक हो


लोकतंत्र में विपक्ष द्वारा सत्ता पक्ष की आलोचना अस्वाभाविक नहीं होती। सरकार की गलतियों को उजागर करना उसका कर्तव्य माना जाता है। सत्ता पक्ष को  जहां मतदाता देश चलाने की जिम्मेदारी सौंपते हैं वहीं विपक्ष से अपेक्षा की जाती है कि वह जनता की तकलीफों को सत्ता पक्ष की जानकारी में लाते हुए उन्हें दूर करने के लिए सुझाव दे। भारत में  ये परम्परा शुरुआत से ही कायम रही। जब कांग्रेस के पास विशाल बहुमत होता था , तब भी संसद में मुट्ठी भर विपक्षी सांसद नेहरू सरकार को जमकर घेर लेते थे। इंदिरा जी के शासन में भी कम संख्याबल के बावजूद विपक्ष ने हमलावर रवैया जारी रखा। उनकी  हत्या के पश्चात राजीव गांधी को ऐतिहासिक बहुमत तो मिल गया किंतु विपक्षी घेराबंदी के चलते वे महज पांच साल बाद अलोकप्रिय होकर सत्ता से हाथ गंवा बैठे और 1991 में आज ही के दिन तमिलनाडु में  श्रीलंका के आतंकवादी संगठन लिट्टे ने उनकी हत्या करवा दी। धीरे - धीरे विपक्ष संसद में ताकतवर होता गया और मिली - जुली सरकारों का दौर आया जो 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर रुका। यद्यपि 2024 में बहुमत से पीछे रहने के बाद श्री मोदी को भी मिली - जुली सरकार चलानी पड़ रही है किंतु उनकी शख्सियत इतनी बड़ी  है कि सहयोगी दल भी दबाव डालने से बचते हैं। और फिर लोकसभा के बाद हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा और एनडीए के शानदार प्रदर्शन से केंद्र सरकार के स्थायित्व को लेकर व्यक्त की जाने वाली आशंकाएं अपनी मौत मरती गईं ।  विशेष रूप से महाराष्ट्र, बिहार और प. बंगाल में भाजपा ने जिस धमाकेदार अंदाज में वापसी की उसके कारण विपक्ष की दशा और दिशा दोनों बिगड़ चुकी हैं। प्रधानमंत्री की हालिया विदेश यात्रा को लेकर जिस तरह के तंज कसे जा रहे हैं उनसे इसकी पुष्टि हो जाती है। सबसे पहले कहा गया कि जनता को पेट्रोल - डीजल का खर्च घटाने और एक वर्ष तक  विदेशों में सैर - सपाटा टालने की नसीहत देने के बाद वे खुद कई देशों की यात्रा पर निकल गए। उसके बाद नॉर्वे की एक महिला पत्रकार के सवाल का जवाब नहीं देने पर प्रधानमंत्री के चिरपरिचित विरोधी उनको घेरते हुए भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर खतरे का ढोल  पीटा जाने लगा। और फिर इटली की प्रधानमंत्री को  टॉफी देने वाले चित्र पर हल्ला मचा। ध्यान देने योग्य बात ये है कि प्रधानमंत्री के विदेश दौरे आनन - फानन में तय नहीं होते। महीनों पूर्व अधिकारी स्तर पर इसकी तैयारी होती है जिसमें बातचीत के मुद्दे और समझौतों का प्रारूप तैयार किया जाता है। उस दृष्टि से देखें तो यूएई से प्रारंभ और इटली में संपन्न अपनी यात्रा के दौरान श्री मोदी ने जो समझौते हस्ताक्षरित किये यदि वे देश हित के विरुद्ध हों तब विपक्ष को आलोचना करने का पूरा अधिकार है। लेकिन इस मामले में वह खाली हाथ है। जहां तक बात नॉर्वे की महिला पत्रकार के सवाल का जवाब नहीं देने की तो न सिर्फ विपक्ष अपितु मोदी विरोधी गैंग के रूप में कुख्यात हो चुके यू ट्यूबर इस मुद्दे पर बिना सच्चाई जाने प्रधानमंत्री पर हमलावर हो गए। लेकिन जल्द ही उन्हें शर्मसार होना पड़ा जब उक्त महिला पत्रकार की बेहूदगी का पर्दाफाश हो गया। जिस अवसर पर उसने श्री मोदी से सवाल पूछा उसमें पत्रकारों से चर्चा का कार्यक्रम नहीं था। बाद में भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने पत्रकार वार्ता में उस महिला पत्रकार को प्रश्न पूछने का अवसर देते हुए उसका उत्तर देने की पेशकश की तब वह उठकर चली गई। अब उसके अपने देश में हुई उसकी जमकर किरकिरी हो रही है और भारत में प्रधानमंत्री को मीडिया विरोधी और प्रेस की आजादी को खतरे में बताने वाले मुंह छिपाते फिर रहे हैं। यही स्थिति इटली की प्रधानमंत्री के साथ उनके चित्र के बारे में है। जिसे लेकर अनर्गल टिप्पणियां की जा रही हैं। गत दिवस लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने तो प्रधानमंत्री के प्रति गद्दार शब्द का प्रयोग कर एक बार साबित कर दिया कि आयु की आधी शताब्दी पार करने के बाद भी वे परिपक्वता के कोसों दूर हैं। कांग्रेस की वर्तमान दुरावस्था के लिए उनका यही गैर जिम्मेदाराना आचरण जिम्मेदार है। यदि उनमें तनिक भी साहस है तो वे अपनी गोपनीय विदेश यात्राओं का ब्यौरा देश के सामने रखें। प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा का तो पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध रहता है किंतु कैबिनेट मंत्री का दर्जा और उच्च स्तरीय सुरक्षा प्राप्त श्री गांधी की चंद विदेश यात्राओं को छोड़कर ज्यादातर पूरी तरह गोपनीय क्यों रहती हैं इसका खुलासा भी उन्हें करना चाहिए।  लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि उससे बहुत सारी वे बातें सामने आ जाएंगी जिन पर पर्दा पड़ा हुआ है। ऐसा लगता है प. बंगाल में भाजपा की जीत विपक्ष और माेदी विरोधी गिरोह को बर्दाश्त नहीं हो रही। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 20 May 2026

ट्रम्प को चिढ़ाने और डराने वाली है पुतिन की चीन यात्रा

ट्रम्प को चिढ़ाने और डराने वाली है पुतिन की चीन यात्रा 


कूटनीति कभी न रुकने वाली प्रक्रिया है। दुनिया में चाहे युद्ध हो रहा हो या शांति सबके मूल में कूटनीति ही होती है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया दो वैचारिक गुटों में बंट गई थी जिनमें पूंजीवाद समर्थक देश अमेरिका और साम्यवादी शासन व्यवस्था वाले सोवियत संघ के नेतृत्व में एकजुट हो गए। हालांकि एक तीसरा धड़ा भी बना जिसे गुट निरपेक्ष आंदोलन कहा गया जिसकी शुरुआत भारत, इंडोनेशिया , घाना , युगोस्लाविया और मिस्र ने की और कालान्तर में 100 से ज्यादा देश इसमें शामिल हो गए। इस धड़े ने अपने को अमेरिका और सोवियत संघ के बीच चले शीतयुद्ध से  दूर रखा। यद्यपि इसमें शामिल देशों को दोनों महाशक्तियों से संबंध रखने की छूट थी किंतु आश्चर्य की बात है कि युगोस्लाविया साम्यवादी देश होने के बावजूद उसके नेता मार्शल टीटो सोवियत संघ से दूरी बनाए रखते थे जबकि भारत और अमेरिका के रिश्ते सदैव अविश्वास में उलझे रहे। 1949 में चीन में भी साम्यवादी क्रान्ति होने के बाद माओ त्से तुंग वैश्विक परिदृश्य पर क्रांति के प्रतीक बनकर उभरे। लेकिन उन्होंने भी सोवियत संघ के आधिपत्य को स्वीकार करने के बजाय अपना अलग रास्ता चुना। 1972 तक चीन दुनिया से अलग - थलग माओ द्वारा बनाए गए लौह आवरण में सिमटा रहा। उसे संरासंघ की सदस्यता से भी वंचित रखा गया किंतु 1972 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन चीन की यात्रा पर जा पहुंचे और अनेक समझौते करते हुए व्यापार के अलावा सांस्कृतिक और शैक्षणिक आदान - प्रदान के दरवाजे खोल दिए। स्मरणीय है 1971 में साम्यवादी चीन को संरासंघ की सदस्यता के साथ ही सुरक्षा परिषद में वीटो का अधिकार भी मिल चुका था जो उसके पहले तक ताईवान के पास रहा। उसके बाद से चीन वैश्विक राजनीति और व्यापार की मुख्यधारा में शामिल होने लगा और देखते ही देखते वह अमेरिका के बाद सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने के साथ ही सैन्य क्षमता और  तकनीकी ज्ञान में दुनिया से आगे निकलने लगा। साम्यवादी विचारधारा उसकी एकदलीय शासन प्रणाली में तो परिलक्षित होती है किंतु शी जिनपिंग का चीन , माओ त्से तुंग और चाऊ एन लाई के दौर से बहुत आगे आकर पूंजी आधारित आर्थिक विकास की प्रतिस्पर्धा में आगे निकलता दिखता है। दुनिया भर में उसने निवेश कर रखा है। अमेरिका जैसे संपन्न देश में भी चीनी पूंजी का दबदबा है। यही वजह है कि कभी अफीमचियों के लिए बदनाम चीन आज विकास का जीवंत प्रतीक बन चुका है। हालांकि विस्तारवाद और कुटिलता जैसे अपने मूल स्वभाव को उसने नहीं छोड़ा और इसलिए ज्यादातर पड़ोसी देश उसके प्रति सदैव सशंकित रहते हैं। बावजूद इसके चीन  वैश्विक राजनीति और व्यापार के क्षेत्र में बड़े खिलाड़ी के तौर पर उभरा है। इसका ताजा प्रमाण है अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गत सप्ताह चीन की यात्रा की। यद्यपि ट्रम्प जो सोचकर गए थे वैसा कुछ भी नहीं हुआ। न तो चीन ने उनके व्यापार प्रस्तावों को भाव दिया और न ही ईरान युद्ध रुकवाने में सहायता का आश्वासन । उलटे ताईवान पर कब्जा करने की अपनी मंशा व्यक्त करते हुए ट्रम्प को आगाह कर दिया कि वे इस मसले से दूर ही रहें। पूरी दुनिया में ये बात फैल चुकी है कि जिनपिंग ने ट्रम्प को खाली हाथ लौटने मजबूर कर विश्व राजनीति में चीन के दबदबे को कायम रखा। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। ट्रम्प के बीजिंग से जाने के कुछ दिन बाद ही रूस के राष्ट्रपति पुतिन चीन जा पहुंचे। हालांकि उसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच हुई सहयोग और संधि की रजत जयंती का आयोजन है । लेकिन सच्चाई ये है कि पुतिन की यह बीजिंग यात्रा दरअसल अमेरिका के विरुद्ध मोर्चेबंदी को मजबूत करने के लिए हो रही है। उल्लेखनीय है यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद अमेरिका के नेतृत्व में उसके समर्थक देशों ने रूस पर प्रतिबंध थोप दिए तब चीन और भारत ने तटस्थ रहकर पुतिन का हौसला बढ़ाया। और बड़ी  मात्रा में कच्चा तेल खरीदकर रूस की अर्थव्यवस्था को टेका लगाए रखा। प . एशिया में चल रहे युद्ध में चीन और रूस खुलकर ईरान के साथ हैं। वहीं भारत ने भी अपने हितों के अनुरूप संतुलित नीति अपना रखी है। अब जबकि ट्रम्प इस युद्ध में बुरी तरह उलझ चुके हैं तब चीन और रूस का एक साथ आना किसी बड़ी कूटनीतिक पहल का संकेत है। गौरतलब है कि ये दोनों ब्रिक्स नामक संगठन के संस्थापक सदस्य हैं जिसकी अध्यक्षता इस साल भारत के पास है। सितम्बर में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन के लिए पुतिन भारत आने वाले हैं। इस प्रकार ट्रम्प के बीजिंग से लौटते ही पुतिन का वहां पहुंचना महज औपचारिक उपस्थिति न होकर बड़ा कूटनीतिक दांव है जिसका उद्देश्य ट्रम्प को चिढ़ाने के साथ ही डराना भी है। उल्लेखनीय है भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अनेक देशों की ताबड़तोड़ यात्रा करके अमेरिका को संकेत दे दिया है कि दुनिया अब उसके इशारों पर चलने वाली नहीं है।

- रवीन्द्र वाजपेयी