तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी नाटकीयता का अनुभव होने लगा है। अभिनेता विजय, कांग्रेस और वामपंथियों सहित एक - दो अन्य विधायकों का समर्थन मिलने से बहुमत की देहलीज तो पार कर गए लेकिन खतरे खत्म नहीं हुआ। कांग्रेस द्वारा विजय को समर्थन देने से द्रमुक की नाराजगी खुलकर सामने आ गई जब पार्टी ने संसद में अपने सांसदों को कांग्रेस से अलग बिठाने का पत्र भेज दिया। दरअसल समर्थन देने से पहले राहुल गांधी या पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने द्रमुक या इंडिया गठबंधन से बातचीत नहीं की। साथ ही दोनों विजय के शपथ ग्रहण में भी शामिल हुए। उल्लेखनीय है चुनाव प्रचार के दौरान श्री गांधी का ये बयान काफी चर्चित हुआ था कि राजनीतिक नेताओं में केवल स्टालिन ( पूर्व मुख्यमंत्री) ही हैं जिन्हें वे भाई कहते हैं। शायद इसलिए शपथ के बाद अपने भाषण में विजय ने राहुल को भाई कहकर संबोधित किया। बहरहाल विजय को समर्थन देकर कांग्रेस ने तमिलनाडु में नए समीकरण बनाने का जो दांव चला उसे श्री गांधी के राजनीतिक चातुर्य और सफलता के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है। लेकिन गहराई से देखें तो 22 लोकसभा और 10 राज्यसभा सांसदों वाले द्रमुक को छोड़कर विजय की नई नवेली पार्टी से गठबन्धन कौन सी बुद्धिमत्ता है इसका उत्तर नहीं मिल रहा। स्मरणीय है पिछले लोकसभा चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन पूरी तरह सुप्तावस्था में चला गया। उसके बाद हुए विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में उसके घटक दल एक दूसरे के विरुद्ध मैदान में उतरे। हरियाणा से शुरू हुआ सिलसिला हालिया चुनावी मुकाबलों में भी दिखा। प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस और वामपंथी अलग - अलग लड़े। इसी तरह केरल में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और वामपंथियों के बीच ही रहा। प. बंगाल के बारे में श्री गांधी का वह बयान काफी चर्चित हुआ कि ममता बैनर्जी के कुशासन के कारण ही भाजपा को इस राज्य में पांव जमाने का मौका मिला। लेकिन उनके पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है कि तृणमूल सरकार की गलत नीतियों का लाभ कांग्रेस क्यों नहीं उठा सकी? चुनाव के बाद सुश्री बैनर्जी ने 100 सीटें उनसे छीने जाने का जो आरोप चुनाव आयोग पर लगाया उसके समर्थन में तो श्री गांधी कूद पड़े किंतु उन्हें ये तथ्य भी स्वीकार करना चाहिए कि भाजपा विरोधी मतों में बंटवारा करने के लिए कांग्रेस और वामपंथी भी बराबर के दोषी हैं। करारी हार के बाद ममता ने विपक्षी एकता की मजबूती के लिए काम करने की प्रतिबद्धता दर्शाई किंतु ये कहना भी गलत नहीं होगा कि इंडिया गठबंधन की मिट्टी पलीत करने के लिए वे भी कम दोषी नहीं हैं। इस गठबंधन में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की बड़ी भूमिका थी।। लेकिन जब उनको संयोजक बनाने का प्रस्ताव आया तब सुश्री बैनर्जी ने पुरजोर विरोध किया। परिणामस्वरूप नीतीश ने भाजपा के साथ गठजोड़ कर लिया। यदि ममता ने वह अड़ियलपन न दिखाया होता तो बड़ी बात नहीं केंद्र में गैर भाजपाई सरकार बनी होती। प. बंगाल में भी उन्होंने गठबंधन के अन्य दलों के लिए लोकसभा सीट छोड़ने से इंकार कर दिया। उसके बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के समर्थन भी प्रचार करने सांसद शत्रुघ्न सिन्हा को भेजा। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी अरविंद केजरीवाल के पक्ष में सभाएं लीं। लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा ने जबरदस्त वापसी करते हुए हरियाणा , महाराष्ट्र , बिहार, असम , और पुडुचेरी में जहां अपनी सत्ता बचाकर रखी वहीं विपक्ष के मजबूत स्तम्भ माने जा रहे अरविंद केजरीवाल और ममता बैनर्जी का वर्चस्व तोड़कर क्रमशः दिल्ली और प. बंगाल में सरकार बना ली और वह भी भारी बहुमत के साथ। हालांकि कांग्रेस ने केरल जीतकर एक उपलब्धि अपने खाते में भी दर्ज कर ली लेकिन वह भी इंडिया गठबंधन के घटक वामपंथियों को हराकर। आज तमिलनाडु में हुए बड़े उलटफेर में अन्ना द्रमुक के लगभग 30 विधायकों ने विजय सरकार को समर्थन देने का ऐलान कर कांग्रेस को चौंका दिया क्योंकि इसके बाद विजय सरकार के पास सुविधाजनक बहुमत होने से कांग्रेस का दबाव खत्म हो गया। कुल मिलाकर विपक्ष की एकता दूर की कौड़ी बनी हुई है। उ.प्र के चुनाव में अखिलेश आम आदमी पार्टी से नजदीकियाँ बढ़ा रहे हैं। वहीं चुनाव हारने के बाद कोलकाता जाकर सुश्री बैनर्जी से मिलकर अपनी सहानुभूति व्यक्त कर आए। स्मरणीय है श्री केजरीवाल और श्री यादव ने कांग्रेस को ठेंगा दिखाते हुए तृणमूल कांग्रेस का प्रचार किया था। ये सब देखते हुए निकट भविष्य में होने वाले चुनावी मुकाबलों में भी विपक्षी एकता की संभावनाएं नगण्य ही हैं। पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस में सांप और नेवले जैसा बैर है। गुजरात में भी यही स्थिति है। उ.प्र में अखिलेश भी इस बार कांग्रेस से दूरी बनाकर चलना चाह रहे हैं क्योंकि वह अपनी ताकत से ज्यादा मांग करती है। सही बात ये है कि लोकसभा चुनाव में 99 सीटें जीतकर राहुल गांधी की वजनदारी राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ने लगी थी किंतु उसके बाद भी चुनावों में उनका प्रदर्शन बहुत ही दयनीय रहा। केरल की जीत भी स्थानीय कारणों से हुई। इसीलिए ये कहना गलत नहीं होगा कि विपक्षी एकता में कांग्रेस सबसे बड़ी बाधक है क्योंकि एक तो गांधी परिवार श्रेष्ठता के भाव से बाहर निकलने तैयार नहीं है वहीं ज्यादातर विपक्षी दल राहुल गांधी के नेतृत्व में काम करने से कतराते हैं। इसका परिणाम तीसरे मोर्चे के पुनर्जन्म के रूप में हो तो आश्चर्य नहीं होगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी