Saturday, 9 May 2026

बंगाल आज जो सोचता है वही कल पूरा देश सोचेगा


प. बंगाल के लिए आज का दिन वाकई ऐतिहासिक है। भाजपा के वैचारिक पूर्वज  जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के गृह प्रदेश में  इस राष्ट्रवादी विचारधारा का हाशिए पर रहना चौंकाता था। पहले कांग्रेस और उसके बाद वामपंथियों ने यहां लंबे समय तक शासन किया। उसके बाद 2011 में ममता बैनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस नामक पार्टी ने वामपंथियों के किले को ध्वस्त करते हुए  नई शुरुआत की। कांग्रेस से राजनीति  शुरू करने वाली ममता ने जब देखा कि उनकी पार्टी वामपंथियों से लड़ने में अनिच्छुक है तब उन्होंने बगावत की और  आखिरकार उस राइटर्स बिल्डिंग पर अपना परचम लहरा दिया जहां से उन्हें अपमानित कर निकाल दिया गया था। उम्मीद थी कि वे बंगाल को उस अराजक स्थिति से निकालकर भद्र लोक के दौर में वापस ले जायेंगी। उल्लेखनीय है बंगाल में ही नक्सलवाद जैसे आतंक का जन्म हुआ था। इसके अलावा वामपंथियों ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए बांग्लादेश से आए घुसपैठियों को  मतदाता बनवाकर जनसंख्या असंतुलन उत्पन्न कर दिया। वामपंथियों के शासन में पार्टी कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी चरम पर थी। कांग्रेस उसका मुकाबला करने की बजाय आत्मसमर्पण कर चुकी थी। ऐसे में जब ममता का उदय हुआ तब लगा वे उस दुरावस्था को दूर करेंगी किंतु जल्द ही वे भी उसी संस्कृति में ढल गईं। स्मरणीय है जो गुंडातंत्र वामपंथियों की मैदानी ताकत हुआ करता था उसी के विरोध में बंगाल की जनता ने सुश्री बैनर्जी को सत्ता सौंपी थी किंतु जल्दी ही वही गुंडे तृणमूल कांग्रेस के हिस्से बन गए और उसके बाद जो हुआ वह वामपंथी सरकार के दौर से भी बुरा अनुभव रहा। लेकिन जिस तरह वामपंथियों से लड़ने में कांग्रेस असमर्थ साबित हुई ठीक उसी तरह उसने ममता सरकार के विरुद्ध भी अपनी लाचारी दिखाई। धीरे - धीरे मार्क्सवादी भी हाशिए पर चले गए। इस शून्य को भरने के लिए कमर कसी भाजपा ने। लेकिन वामपंथी सरकार के समय राष्ट्रवादी विचारधारा पर जो दमनचक्र चला उसने ममता राज में और भी वीभत्स रूप ले लिया। बतौर मुख्यमंत्री उन्होंने जिस तरह वामपंथियों और कांग्रेस को मुख्यधारा से बाहर फेंका उससे उन्हें ये गुमान हो चला कि अब वे पूरी तरह चुनौती विहीन हो चली हैं। साधारण सूती साड़ी और हवाई चप्पल उनकी पहचान थी किंतु धीरे - धीरे वे उन सभी विकृतियों से घिरती चली गईं जिनके कारण बड़े - बड़े सत्ताधीश जनता की नजरों से गिरकर इतिहास की गहरी खाई में समा गए। प.बंगाल में हुआ राजनीतिक परिवर्तन किसी तात्कालिक घटना की प्रतिक्रिया नहीं अपितु एक लंबे वैचारिक संघर्ष की सफल परिणिति है। देशवासियों को ये बात भूलनी नहीं चाहिए कि देश के विभाजन की नींव इसी बंगाल से पड़ी थी। विभाजन के उस दौर में पूरे राज्य में मुस्लिम गुंडों ने जो अत्याचार किया उस पर कांग्रेस और वामपंथियों ने पर्दा डाल रखा था। ममता भी उसी राह पर चलीं। लेकिन समय चक्र हमेशा एक समान नहीं रहता। आखिर जनता के मन में ये बात बैठने लगी कि भाषा , संस्कृति और खाना - पान जैसे सतही विषयों में उसे उलझाकर सत्ता में बैठे तत्व देश की सुरक्षा और अखंडता का सौदा कर रहे हैं। 4 मई को ईवीएम से निकला जनादेश वह आक्रोश था जो मन में होने पर भी  भयवश व्यक्त नहीं हो पा रहा था। भाजपा ने बीते 10 वर्षों में प. बंगाल के मतदाताओं को इस बात के प्रति आश्वस्त किया कि वह  न केवल उनकी बल्कि शत्रु देशों से सटी सीमाओं की सुरक्षा भी करेगी। प. बंगाल को बदहाली से निकालकर सोनार बांग्ला की स्थिति में ले जाने का जो वायदा नरेंद्र मोदी ने किया और उनके दाहिने हाथ अमित शाह ने लोगों को भयमुक्त होकर बदलाव के अभियान में शामिल होने के लिए प्रेरित किया उसके कारण आज वहां हिन्दू राष्ट्रवाद का उद्घोष संभव हो सका। ये चुनाव केवल सत्ता बदलने तक सीमित न रहे ये देखना उन लोगों का दायित्व है जो इस वैचारिक क्रान्ति के आधारस्तम्भ हैं। सुवेंदु अधिकारी को प. बंगाल की जनता के विश्वास की रक्षा का जो दायित्व आज मिला है उसे उन्हें प्राण - प्रण से निभाना होगा। प. बंगाल की भौगोलिक स्थिति राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। आर्थिक स्थिति भी दयनीय है और कानून व्यवस्था अराजकता का पर्याय है। ऐसे में प. बंगाल की सत्ता भाजपा और सुवेंदु दोनों के लिए कठिन चुनौती है। इस बदलाव का राष्ट्रीय राजनीति पर दूरगामी असर पड़े बिना नहीं रहेगा। योगी और हिमंता के बाद सुवेंदु देश में हिंदूवादी राजनीति के नए चेहरे होंगे। जिन लोगों को इस चुनाव में हुआ हिन्दू ध्रुवीकरण हजम नहीं हो रहा उन्हें ये सोचना चाहिए कि देश का बहुसंख्यक वर्ग अब तुष्टीकरण के नाम पर चल रहे वोटों के व्यापार को रोकने स्वप्रेरणा से लामबंद हो रहा है। इसे रोकने के लिए जितने भी प्रपंच रचे जाएंगे उनका अपनी मौत मरना सुनिश्चित है। एक जमाने में कहा जाता था कि बंगाल आज जो सोचता है वही कल पूरा देश सोचेगा। आध्यात्मिक, बौद्धिक और राजनीतिक क्रांति की इस भूमि पर जो राजनीतिक परिवर्तन आज साकार हुआ उसे भविष्य का संकेत कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी


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