Saturday, 30 May 2026

जमानत अर्जी पर त्वरित फैसले जैसी व्यवस्था अन्य मामलों में भी हो


सर्वोच्च न्यायालय ने  जमानत आवेदनों और विचाराधीन कैदियों संबंधी फैसला सुनाते हुए निर्देशित  किया है कि देश की सभी अदालतों को जमानत आवेदनों पर आदर्श रूप से उसी दिन या अधिकतम अगले दिन तक निर्णय लेना अनिवार्य है। शीर्ष अदालत के  अनुसार जमानत नियम है जबकि कारावास अपवाद है। उक्त फैसले में विचाराधीन कैदियों की रिहाई को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा  मौलिक अधिकार  बताते हुए कहा कि यू.ए.पी.ए जैसे कठोर कानूनों में भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है । इसलिए अदालतों को जमानत का आदेश उसी दिन या अगले दिन या फैसला सुरक्षित रखने की स्थिति में  3 महीने के भीतर सुनाना होगा। साथ ही जमानत मिल जाने पर उसकी जानकारी तुरंत जेल प्रशासन को भेजी जाना चाहिए ताकि आरोपी उसी दिन या अगले दिन रिहा हो सके। मानवाधिकारों और सभ्य समाज की दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय का उक्त आदेश बेहद महत्वपूर्ण है। अदालत ने ये निर्देश भी दिया कि अग्रिम जमानत के  लिए किसी व्यक्ति को आत्मसमर्पण हेतु बाध्य नहीं किया जा सकता। कुछ दिनों पहले आतंकवाद से जुड़े कुछ लोगों को अनेक वर्षों से जेल में रखे जाने पर भी सर्वोच्च  न्यायालय ने टीका - टिप्पणी की थी। चूंकि गैर कानूनी गतिविधियों में जेल में बन्द लोगों की स्वतंत्रता को भी अदालत ने आवश्यक मान लिया ऐसे में देश भर की जेलों में बंद सैकड़ों विचाराधीन कैदियों की रिहाई का रास्ता खुल गया है जिनके विरुद्ध या  तो आरोप पत्र  पेश नहीं हुआ या फिर उस पर सुनवाई टलती आ रही है। उल्लेखनीय है फरवरी 2020 में हुए दिल्ली दंगों के आरोपी के तौर पर यू.ए.पी.ए में गिरफ्तार शर्जील इमाम और उमर खालिद को लंबे समय से जेल में बंद रखे जाने पर भी सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी जमानत और त्वरित सुनवाई के अधिकार पर पर विचार करते हुए मामला बड़ी पीठ को भेज दिया। 6 साल से जेल की हवा खा रहे उक्त दोनों की जमानत अर्जियां निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक कई मर्तबा इस आधार पर रद्द कर दिया कि प्रथम दृष्टया आरोप संगीन है। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले में  उन लोगों के लिए तो राहत की खबर है जो जमानत अर्जी की सुनवाई न होने से या तो जेल में हैं या फरार रहने बाध्य हो गए हैं। न्यायिक हिरासत के कारण जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों में बड़ी संख्या उन लोगों की भी है जो जमानत के लिए वकील का खर्च उठाने में असमर्थ हैं। गौरतलब है एक अर्जी नामंजूर हो जाने के बाद व्यक्ति ऊंची अदालत में आवेदन करे तो फ़िर मोटी फीस वकील साहब को देनी होती है। किसी आपराधिक प्रकरण में गिरफ्तारी के भय से अग्रिम जमानत हेतु आवेदन लगाना भी बेहद खर्चीला है। जिसके रद्द होने पर व्यक्ति छिपा फिरता है। कुल मिलाकर जमानत का पूरा मामला बेहद पेचीदा है और साधारण आर्थिक हैसियत वाले के लिए तो आसमान से तारे तोड़ने जैसा। उस दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय का संदर्भित फैसला स्वागतयोग्य है।  लेकिन सर्वोच्च न्यायालय का ये कहना कुछ मामलों में समस्या भी खड़ी कर सकता है कि आतंकवाद जैसे खतरनाक अपराधों में बंद आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी सर्वोपरि है। प्रश्न ये है कि शर्जील इमाम और उमर खालिद जैसे लोगों को जमानत मिलना क्या कानून - व्यवस्था के लिए खतरा नहीं होगा? यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय ऐसे लोगों के बारे में उदारता दिखाते समय देश की एकता ओर अखंडता की रक्षा के प्रति लापरवाह नहीं हो सकता किन्तु इस फैसले से निचले स्तर की अदालतों पर जमानत अर्जी  मंजूर करने में जल्दबाजी का दबाव आने का खतरा पैदा हो गया है। सर्वोच्च न्यायालय अतीत में जमानत देने में आनाकानी के लिए निचली अदालतों की आलोचना कर चुका है। ये फैसला उसी से प्रभावित है जिसमें फायदे और नुकसान दोनों ही हैं क्योंकि न्यायाधीश भी मनुष्य होते हैं और सभी की सोच और योग्यता एक समान हो ये जरूरी नहीं है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय की ये बात सही है कि जमानत जैसे गंभीर विषय में सुनवाई के बाद फैसला सुनाने के लिए निश्चित समय सीमा होनी चाहिए। साथ ही ये भी कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार भी हर किसी को है। लेकिन इस फैसले के परिप्रेक्ष्य में ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि केवल जमानत अर्जी पर ही त्वरित फैसले करने की बंदिश लगाने वाला सर्वोच्च न्यायालय  सामान्य न्याय प्रक्रिया में होने वाले विलम्ब को खत्म करने के बारे में ऐसा ही निर्देश कब देगा ? शीर्ष अदालत में विराजमान माननीय न्यायमूर्तियों को ये बताने की जरूरत नहीं है कि लम्बी और मंहगी न्यायिक प्रक्रिया के कारण आम नागरिक के मन में न्यायपालिका के प्रति विश्वास और सम्मान लगातार घटता जा रहा है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 29 May 2026

नक्सलियों के सफाए के बाद अब घुसपैठियों पर अमित शाह की नजर


केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने  कहा है कि  ममता बनर्जी  के शासन में रोजाना घुसपैठ होती थी, लेकिन अब डर के मारे घुसपैठिए खुद वापस लौटने लगे हैं।  गृहमंत्री ने चेतावनी देते हुए कहा ,वे खुद  चले जाते हैं, तो  सरकार उन पर कोई केस नहीं करेगी और लौटने में  पूरी मदद भी करेगी। उन्होंने आशा व्यक्त की  कि घुसपैठियों की पहचान का अभियान शुरू होने से पहले ही वे  लौट जाएंगे। उनकी अपील ऐसे समय आई जब प. बंगाल ही नहीं देश के अन्य हिस्सों में बसे बांग्लादेशी घुसपैठिए वापस लौटने के लिए प. बंगाल आकर सीमा पर जमा हो रहे हैं। शुभेंदु सरकार ने डिटेक्ट , डिटेन ,और डिपोर्ट  जैसी घोषणा कर जो आक्रामक रवैया अपनाया उससे घुसपैठियों में दहशत फैलने लगी।  वस्तुतः ममता बैनर्जी की सरकार ने न तो घुसपैठियों को आने से रोकने के लिए कोई योजना बनाई और न ही उन्हें वापस भेजने का साहस दिखाया।  उससे भी बड़ी चिंता का कारण ये है कि उनके राशन और आधार कार्ड बनने के अलावा मतदाता सूचियों में नाम भी दर्ज हो गए। इसीलिये विधानसभा चुनाव के पहले चुनाव आयोग ने एस.आई.आर की प्रक्रिया प्रारंभ की तब ममता बैनर्जी ने अड़ंगे लगाने का हरसंभव प्रयास किया किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। लाखों नाम मतदाता सूचियों से इसलिए अलग हुए क्योंकि  वे  जरूरी दस्तावेज नहीं दे सके। तृणमूल कांग्रेस को जीत का जो आत्मविश्वास था उसका कारण मुस्लिम मतदाताओं के साथ ही  घुसपैठिये भी रहे।  मतदाता सूची से बाहर होने वाले घुसपैठियों को उम्मीद थी कि ममता सरकार ही लौटकर आएगी इसलिए  वे निश्चिंत बैठे रहे। लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया । भाजपा ने सत्ता में आते ही जो तेवर दिखाये उनसे उनको ये महसूस होने लगा कि डिटेंशन (हिरासत) में आने के बजाय बेहतर होगा वापस अपने मुल्क लौटा जाए। चौंकाने वाली बात ये है कि न सिर्फ़ प. बंगाल वरन दक्षिणी राज्यों में कार्यरत घुसपैठिए भी बांग्लादेश लौटने के लिए आने लगे। हाल ही में मुख्यमंत्री श्री अधिकारी ने ये कहकर हलचल मचा दी कि ममता सरकार जिन करोड़ों महिलाओं को प्रतिमाह 1500 रुपए दे रही थी उनमें 30 लाख बांग्लादेशी महिलाएं भी हैं। इसीलिए राज्य सरकार ने महिलाओं को 3 हजार रुपए हर महीने देने संबंधी  वायदे को पूरा करने के पहले  लाभार्थियों की नई सूची तैयार करने का फैसला किया। इसके अलावा भी मुफ्त राशन एवं अन्य  सुविधाओं का लाभ घुसपैठियों को पिछली सरकार दे रही होगी। सवाल ये है कि ममता बैनर्जी जैसी वरिष्ट नेत्री को इन घुसपैठियों को संरक्षण देने की क्या जरूरत पड़ गई? स्मरणीय है बांग्लादेश से घुसपैठियों का  आना वामपंथी सरकार के कार्यकाल में भी जारी रहा। प. बंगाल की जनता ने उस सरकार से नाराज होकर ही ममता बैनर्जी को सत्ता सौंपी थी किंतु उनके राज में तो प. बंगाल घुसपैठियों का स्वर्ग बन गया। यहां की राजनीति में मुस्लिम वर्चस्व का कारण ये घुसपैठिए ही रहे। चूंकि भाजपा ने घुसपैठ को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया इसीलिए हिन्दू मतों का ध्रुवीकरण उसके पक्ष में हुआ। दरअसल ममता राज में घुसपैठियों के आतंक से हिंदुओं में भय व्याप्त था। चूंकि कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां भी तुष्टीकरण करती रहीं इसलिए जब भाजपा ने घुसपैठियों के विरुद्ध कार्रवाई का वायदा किया तो जनता ने  उसको जबरदस्त समर्थन देकर सत्ता सौंप दी। मुख्यमंत्री श्री अधिकारी की प्रशंसा की जानी चाहिए जिन्होंने बिना देर लगाए घुसपैठियों को वापस भेजने के लिए ठोस कदम उठाए जिनका असर दिखने भी लगा है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर में सीमा पर कंटीले तार की बाड़ लगाने हेतु केंद्र सरकार द्वारा मांगी जमीन देने का फैसला भी घुसपैठ रोकने की दिशा में बड़ा कदम है। ममता सरकार बरसों से इस मामले को दबाकर बैठी थी। प. बंगाल में घुसपैठियों के विरुद्ध चल रही कार्रवाई राष्ट्रीय स्तर पर की जानी चाहिए क्योंकि बांग्लादेशी और रोहिंग्या दोनों ही घुसपैठिए मुस्लिम कट्टरपंथियों के साथ मिलकर आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन गए हैं। बीते कुछ वर्षों में हुईं अनेक आतंकवादी वारदातों के तार बांग्लादेश से जुड़े पाये जाने से इसकी पुष्टि हो चुकी है। गृह मंत्री अमित शाह  नक्सलवादियों के आतंक का खात्मा कर अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय दे चुके हैं । उनकी ताजा चेतावनी के बाद ये उम्मीद की जा सकती है कि देश इन घुसपैठियों द्वारा उत्पन्न समस्या से भी मुक्त हो जाएगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 28 May 2026

सर्वोच्च न्यायालय ने वोट चोरी नामक गुब्बारे की हवा निकाल दी


अन्ततः सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एस. आई.आर ) को विधि सम्मत मानते हुए स्पष्ट कर  दिया कि चुनाव आयोग के पास प्रक्रिया का पालन करते हुए मतदाता सूची में संशोधन करने का अधिकार है, अतः यह पूरी तरह से संवैधानिक और वैध है। गत दिवस दिए फैसले में उसने स्वीकार किया कि जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट को अपडेट और संशोधित करने की शक्ति प्राप्त है। एस.आई.आर विरोधी याचिकाओं को रद्द करते हुए न्यायालय ने स्पष्ट  किया कि उसमें कोई खामी नहीं है।  फैसले में कहा गया है कि आयोग मतदाता सूची में शामिल होने की पात्रता के  साथ ही शर्तों के साथ नागरिकता की जांच भी कर सकता है। इस फैसले से उन लोगों को निराशा हुई होगी जो ये प्रचार करने में जुटे रहे कि मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की आड़ में केंद्र सरकार के इशारे पर उन मतदाताओं के नाम योजनाबद्ध तरीके से काटे गए जिन्हें भाजपा विरोधी समझा जाता था। उधर चुनाव आयोग बाकायदा घोषणा करता रहा कि नाम काटे गए मतदाता आवश्यक दस्तावेजों के साथ दोबारा आवेदन कर सकते हैं। बिहार में ऐसा हुआ भी । इसी के साथ ही 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले नए मतदाताओं को नाम जोड़ने के लिए भी पर्याप्त अवसर दिया गया। बिहार और प. बंगाल में एस. आई. आर का सबसे ज्यादा विरोध हुआ। प. बंगाल में तो सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायाधीशों तक को उसकी प्रक्रिया संपन्न करने में लगाया जिससे पारदर्शिता बनी रहे। जिन पांच राज्यों में पिछले महीने विधानसभा चुनाव हुए वहां भारी मतदान से एक बात तो साबित हो गयी कि मतदाताओं का चुनाव प्रक्रिया में पूरा विश्वास है।  आयोग द्वारा की गई व्यवस्था को भी खुलकर सराहा गया। एस. आई. आर के विरोध में विपक्ष ने ये सोचकर हल्ला मचाया कि जनता भी उसके साथ सड़कों पर उतरेगी किन्तु बिहार में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की यात्रा और प. बंगाल में ममता बैनर्जी द्वारा सड़क से सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ने के बावजूद उन्हें न जन समर्थन मिला और न अदालत ने प्रक्रिया रोकी। अब जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने एस. आई.आर को कानून सम्मत बताते हुए उसे चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में मान लिया और आधार कार्ड को नागरिकता का प्रमाण मानने से भी मना कर दिया तब विपक्ष और उसके पीछे खड़े मोदी विरोधियों को भी ये समझ जाना चाहिए कि ये मुद्दा बेअसर हो चुका है। वोट चोरी को लेकर राहुल गांधी ने  मुख्य चुनाव आयुक्त को घेरने के लिए धरती - आसमान एक कर दिये वहीं ममता बैनर्जी तो धरने तक पर बैठ गईं। लेकिन उनकी बात न जनता के गले उतरी और न ही सर्वोच्च न्यायालय ने ही उसे महत्व दिया। बिहार, और प. बंगाल में भाजपा को मिली सफलता से ये साबित हो गया कि एस. आई. आर के विरोध को जनता ने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया।  सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट फैसले के बाद वोट चोरी का गुब्बारा पूरी तरह फूट चुका है। बिहार और प. बंगाल में शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न होने का कारण मतदाता सूचियों में किया गया संशोधन ही है। अवैध बांग्लादेशियों के अलावा मृत हो चुके लोगों के नाम बड़े पैमाने पर कटने से मतदाता सूचियाँ शुद्ध हो गईं जिससे फर्जी मतदान रोका जा सका। सर्वोच्च न्यायालय ने भविष्य में होने वाले चुनावों के पहले छूटे हुए सभी मतदाताओं के नाम जोड़ने का निर्देश देकर चुनाव आयोग को एस. आई. आर जारी रखने की छूट दे दी। सवाल ये है कि क्या विपक्ष अपना विरोध जारी रखेगा या आयोग के साथ समन्वय स्थापित कर मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने में सहयोग करेगा जिसमें उसका भी हित है। लेकिन इसके लिए उनको अपने संगठन में कसावट लानी होगी। राहुल गांधी जैसे नेताओं को भी ये बात समझनी चाहिए कि जितना समय , श्रम और संसाधन उन्होंने बिहार में चुनाव आयोग को गाली देने में खर्च किया उतना अपनी पार्टी को मजबूत करने में लगाते तब कांग्रेस की इतनी दुर्गति नहीं होती।  प. बंगाल में उन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी तो सब सीटों पर उतार दिए किंतु प्रचार से दूरी बनाकर उनकी फजीहत करवा दी। यहां तक कि पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा माने जाने वाले अधीर रंजन चौधरी लोकसभा में हारने के बाद विधानसभा चुनाव में भी तीसरे स्थान पर रहे।  बिहार और प. बंगाल में  औंधे मुंह गिरने के बाद ममता सहित अन्य विपक्षी नेता एकजुट होकर भाजपा से निपटने की बातें कर रहे हैं किंतु उनके पास इस बात का कोई उत्तर नहीं है कि इन चुनावों में एकता से परहेज क्यों किया गया और आगे उसकी क्या गारंटी है? बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय ने बिना लाग - लपेट के एस. आई. आर को चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में मानते हुए  चुनाव प्रक्रिया का आवश्यक भाग बताते हुए विपक्ष द्वारा फैलाए गए झूठ की कलई खोल दी है। ये फैसला विपक्ष के लिए सबक भी है कि वह हवा - हवाई मुद्दों से दूर रहते हुए जनहित से जुड़े विषयों पर आवाज उठाये। लेकिन पिछले अनुभव बताते हैं कि विपक्ष में आत्मावलोकन की प्रवृत्ति और जनता की अपेक्षाओं को महसूस करने की क्षमता खत्म हो चुकी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 27 May 2026

घुसपैठिये आस्तीन में छिपे साँप


देश के सीमावर्ती इलाकों सहित कुछ अन्य क्षेत्रों में डेमोग्राफिक चेंज ( आबादी में असंतुलित बदलाव) लम्बे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिंता का विषय रहा है।  प. बंगाल के  हालिया विधानसभा चुनाव में डेमोग्राफिक चेंज और बांग्लादेशियों की घुसपैठ ममता  सरकार के विरुद्ध बड़ा मुद्दा  था । भाजपा को  सत्ता तक लाने में इसका प्रमुख योगदान रहा। नए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने घुसपैठियों को उनके देश वापस भेजने की घोषणा कर इसे जीवित रखने का संकेत दे दिया था। इसकी पुष्टि गत दिवस हो गयी जब केंद्रीय  गृह मंत्री अमित शाह ने डेमोग्राफिक चेंज पर एक  उच्चस्तरीय समिति के गठन की घोषणा करते हुए कहा कि  घुसपैठ और अन्य कारणों से अप्राकृतिक डेमोग्राफिक चेंज किसी भी देश के वर्तमान व भविष्य के लिए गंभीर चुनौती है। जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता में बनाई गई इस समिति में जनगणना आयुक्त के साथ दुर्गा शंकर मिश्रा (से . नि.आईएएस), बालाजी श्रीवास्तव (से.नि .आईपीएस) और डॉ. शमिका रवि समिति के सदस्य रहेंगे वहीं संयुक्त सचिव (फॉरेनर्स-I), गृह मंत्रालय सदस्य सचिव बनाए गए हैं। वैसे तो घुसपैठियों की समस्या 1947 के बाद से ही चली आ रही है। जम्मू कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर राज्यों में  पड़ोसी देशों से  आकर बसे घुसपैठियों ने  सामाजिक वातावरण को बिगाड़ने के साथ ही जमीन कब्जाने जैसे कारनामे किए जिससे उनका मूल निवासियों से टकराव भी हुआ। 1971 में बांग्लादेश बनने के पहले जो 1 करोड़ से ज्यादा शरणार्थी भारत  में घुसे उनको वापस भेजना तो दूर उल्टे वह सिलसिला बेरोकटोक जारी रहा। धीरे - धीरे ये घुसपैठिये देश के भीतरी हिस्सों तक फैलते गए और मुस्लिम वोट बैंक के सौदागरों ने इन्हें नागरिकता दिलवाने में भरपूर सहायता और संरक्षण प्रदान किया। इसके बाद म्यांमार से खदेड़े गए रोहिंग्या मुस्लिमों ने भी पूर्वोत्तर राज्यों में अपने ठिकाने बना लिए। उ.प्र और बिहार के जो क्षेत्र नेपाल की तराई में हैं वहां अचानक मदरसों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि भी चौंकाने वाली रही। बिहार में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के विधायक इसी इलाके से जीते भी। असम भी  जनसंख्या संतुलन बिगड़ने की समस्या से जूझता आ रहा है। इसीलिए मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने पिछले कार्यकाल में ही मदरसे बंद करवा दिए थे । देवभूमि कहलाने वाले हिन्दू बहुल उत्तराखंड राज्य में भी मुस्लिम आबादी रहस्यमय तरीके से बढ़ी जिससे सुरक्षा एजेंसियां चिंता में पड़ गईं। ये बात पूरे देश में अनुभव की जा रही है कि डेमोग्राफिक चेंज हमारी संप्रभुता के साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून व्यवस्था, सामाजिक संरचना में गंभीर बदलाव और जनजातीय समाज के संरक्षण से जुड़ी गंभीर समस्या है। गत दिवस गठित समिति अवैध प्रवास और अन्य असामान्य कारणों से पूरे देश में हो रहे जनसांख्यिकी बदलाव का व्यापक मूल्यांकन करते हुए धार्मिक एवं सामाजिक समुदायों के स्तर पर इसके पैटर्न का विश्लेषण कर सुनियोजित और समयबद्ध समाधान प्रस्तुत करेगी।  बड़ी बात नहीं इस समिति का विरोध भी वे राजनीतिक दल करने लगें जो आबादी के असंतुलन में अपनी चुनावी संभावनाएं देखते हैं। प. बंगाल में जब भी बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालने की बात उठी ममता बैनर्जी उनके बचाव में खुलकर सामने आईं। सीएए और मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का विरोध करने में भी उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके घुसपैठिया प्रेम का सबसे बड़ा उदाहरण ये था कि उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा कई बार लिखित अनुरोध किए जाने पर भी बांग्लादेश सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने के लिए जमीन देने में कोई रुचि नहीं दिखाई। वहीं सत्ता बदलते  ही मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी ने  केंद्र सरकार द्वारा मांगी गई भूमि सौंप दी। गौरतलब है घुसपैठिये केवल आबादी ही नहीं बढ़ाते अपितु हमारे संसाधनों का उपयोग करते हुए जिंदगी बसर करते हैं।  चूंकि इनमें बड़ी संख्या मुस्लिमों की होती है लिहाज़ा ये जिस क्षेत्र में बसते हैं वह मुख्य धारा से कट जाने के कारण राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का केंद्र बने नहीं रहता। उ.प्र, बिहार, असम और प. बंगाल में अनेक ऐसे निर्वाचन क्षेत्र हैं जिनमें केवल मुसलमान ही जीत सकता है। यहां घुसपैठियों के कारण भारत विरोधी माहौल खुले आम देखा जा सकता है। इस समिति की आवश्यकता काफी पहले से महसूस की जा रही थी। केंद्र सरकार ने इसका गठन कर बहुत ही सामयिक और साहसिक कदम उठाया है। ये घुसपैठिए आस्तीन में छिपे साँप से कम नहीं  हैं जिनका फ़न कुचलना देश की अखंडता और सुरक्षित भविष्य के लिए अत्यावश्यक है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 26 May 2026

ट्रम्प की हालत सांप - छछूंदर जैसी हो गई


दुनिया को अपनी उंगली पर नचाने वाले अमेरिका की स्थिति बेहद हास्यास्पद हो गई है। ईरान के साथ युद्ध में तीन महीने बाद भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ये तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे युद्ध की समाप्ति किस प्रकार करें क्योंकि न तो वे ईरान को पूरी तरह पराजित करने में सफल हुए और न ही उसके परमाणु कार्यक्रम को रुकवाने में उन्हें सफलता मिली। ईरान के तेल को बेचकर पैसा कमाने और होर्मुज समुद्री मार्ग का चौधरी बनकर उसके तेल व्यापार को नियंत्रित करने का उनका मंसूबा भी पूरा होता नहीं दिख रहा। अपने दुमछल्ले पाकिस्तान को मोहरा बनाकर कूटनीतिक पहल करने का अमेरिकी दांव भी अब तक तो कारगर साबित नहीं हो सका क्योंकि वार्ता की टेबिल सजने के बाद भी ईरान ने ट्रम्प की शर्तें मान लेने से इंकार कर दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति आये दिन ये शिगूफा छोड़ते रहते हैं कि ईरान उनकी शर्तों को मान गया है । लेकिन कुछ देर बाद ही वे उसे धमकी देने लग जाते हैं। उनके हर दावे का ईरान ने मजाक ही उड़ाया और हमले की धमकियों का जवाब भी उसी भाषा में देने में संकोच नहीं किया। गत सप्ताह ऐसा लगा था कि दोनों के बीच सहमति बन गई है। इसके कारण गत दिवस दुनिया के शेयर बजारों में उछाल भी देखा गया किंतु  पीछे - पीछे ये खबर भी आ गई कि अमेरिकी सैन्य दस्तों ने होर्मुज में ईरानी नौसैनिक नावों आदि पर हमले किये। ट्रम्प की ये डींग भी हवा - हवाई होकर रह गई कि ईरान अगले 20 साल तक परमाणु अस्त्र नहीं बनाने राजी हो गया है। कुल मिलाकर प. एशिया में चल रहे युद्ध के समाप्त होने सम्बन्धी कूटनीतिक बातचीत एक कदम आगे , दो कदम पीछे वाली स्थिति में है। इस लड़ाई की जड़ है इसराइल जिसे अमेरिका का सबसे चहेता माना जाता है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के अनुरोध पर ही ट्रम्प ने  हजारों कि.मी दूर आकर ईरान से पंगा लेने जैसा निर्णय लिया जबकि अफगानिस्तान में 20। साल डटे रहने के बावजूद तालिबानी कट्टरपंथियों से समझौता करने का दर्द अभी भी वाशिंगटन भूला नहीं है। उल्लेखनीय है गाजा  पट्टी नामक फिलीस्तीन के हिस्से पर ईरान द्वारा पालित - पोषित हमास नामक इस्लामिक आतंकवादी संगठन का शासन था। उसने अचानक बेवजह इसराइल पर हमले कर उसके सैकड़ों नागरिकों को बंधक बना लिया। उसके जवाब में नेतन्याहू ने वही किया जो इसराइल का स्वाभाव है। हमास की तबाही का बीड़ा उठाकर नेतान्याहू ने समूचे गाजा को मलबे के ढेर में बदल दिया। ईरान के साथ चल रही मौजूदा जंग की पृष्ठभूमि में इसराइल और हमास के बीच हुई लड़ाई ही है।नेतन्याहू  अमेरिका को ये समझाने में तो सफल हो गए कि ईरान ही प. एशिया में अमेरिका के प्रभुत्व को चुनौती देने वाला है। यदि उसे ठिकाने लगा दिया जाए तो अधिकांश अरब जगत पर उनका दबदबा कायम होने से कोई नहीं रोक सकेगा। अमेरिका तो बीते अनेक दशकों से ईरान में अपनी समर्थित सत्ता कायम करने के प्रयास कर रहा था लेकिन तमाम  प्रतिबंधों और दबावों के बाद भी उसके मंशा पूर्ण न हो सकी। दरअसल इसराइल को ये डर सताता रहा है कि ईरान ने परमाणु अस्त्र बना लिए तो उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। गाजा में हुए युद्ध के दौरान भी इसीलिए अमेरिका ने ईरान के आण्विक केंद्रों पर भीषण बमबारी की थी। लेकिन जैसी कि जानकारी मिली उसके अनुसार ईरान ने परमाणु अस्त्र बनाने के लिए संगृहीत परिष्कृत यूरेनियम पहले ही दूसरे सुरक्षित स्थानों छिपा दिया था। इस बार की लड़ाई में भी अमेरिका ने ईरान को परमाणु शक्ति बनने से रोकने के लिये हरसम्भव प्रयास किये किंतु अब तक तो वह ऐसा नहीं कर सका। ईरान ने न तो परमाणु कार्यक्रम रद्द करने का आश्वासन दिया और न ही परिष्कृत यूरेनियम भंडार उसे सौंपने पर सहमत हुआ। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिये अचूक कार्ययोजना बनाने के फेर में ट्रम्प और नेतन्याहू ये भूल गए कि ईरान ने मिसाइलों के क्षेत्र में भी अकल्पनीय उपलब्धि हासिल कर ली है। बीते तीन महीनों में अमेरिका और इसराइल के जबरदस्त हमलों के जवाब में ईरान ने जिस बड़ी मात्रा में इसराइल ही नहीं बल्कि अमेरिका के समर्थक सऊदी अरब , ओमान , कतर और यू.ए.ई आदि पर मिसाइलें बरसाईं वह अप्रत्याशित था। युद्धविराम के दौरान भी ये जानकारी आई कि ईरान के पास अभी भी हजारों मिसाइलाें का जखीरा है। अमेरिका और  इसराइल के सैकड़ों हवाई हमले भी इन्हें नष्ट नहीं कर सके क्योंकि ये जखीरा भूमि के नीचे है । यही वजह है कि डोनाल्ड ट्रम्प लगभग रोजाना ईरान को मिटा देने की धमकी देने के कुछ देर बाद ही शांति समझौते की कहानी लेकर बैठ जाते हैं। सही बात ये है कि ईरान भी अमेरिका की कमजोरी भांप चुका है। इतने तनावपूर्ण माहौल में ट्रम्प की चीन यात्रा भी उनकी दयनीयता को दर्शाती है। उन्हें लगता था वे चीन के राष्ट्रपति के जरिए ईरान को समझौते के लिए बाध्य कर ले जाएंगे किंतु बीजिंग में उनकी किरकिरी ही हुई। आज के हालात में ट्रम्प की स्थिति सांप - छछूंदर जैसी हो गई है और वे  अमेरिका के सबसे कमजोर और घटिया राष्ट्रपति के रूप में कुख्यात हो चले हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 25 May 2026

पेट्रोल - डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने का सही अवसर




अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद से ही अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि  होने से ज्यादातर देशों में तो पेट्रोल , डीजल और गैस महंगे हुए किंतु भारत में दाम नहीं बढ़े। भले ही इसका कारण पर्याप्त भंडार बताया गया किंतु सच्चाई ये है कि केंद्र सरकार पांच राज्यों के चुनाव परिणामों का इंतजार कर रही थी। ये  साबित भी हो गया जब चुनाव के कुछ  दिनों बाद ही पेट्रोल डीजल के दामों में वृद्धि की गई। उल्लेखनीय है मूल्य वृद्धि करने से पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  लोगों से पेट्रोल - डीजल की फिजूलखर्ची रोकने के साथ ही एक वर्ष तक विदेश यात्रा और सोने की खरीदी से परहेज करने की अपील की थी जिसका उद्देश्य बहुमूल्य विदेशी मुद्दा बचाना था। उक्त चीजों का आयात  अमेरिकी डॉलर में होने से उसकी मांग बढ़ती है जिसका परिणाम रुपये की  गिरती कीमत के रूप में सामने है। प्रधानमंत्री की उक्त अपील में ही मूल्य वृद्धि का संकेत निहित था। सोने पर आयात शुल्क में वृद्धि और चांदी के आयात में कानूनी रोक लगाना इसका प्रमाण है। अंत में पेट्रोल - डीजल का क्रम आया और बीते 15 दिनों  में ही चार किश्तों में लगभग 10 रु. प्रति लिटर की वृद्धि की जा चुकी है। जाहिर है हाल - फिलहाल कोई चुनाव नहीं हाेने की वजह से केंद्र सरकार को राजनीतिक खतरा नजर नहीं आ रहा। यद्यपि जनता भी इस बात को समझ रही है कि पेट्रोल - डीजल का 85 फीसदी विदेशों से आता है जिसकी कीमतें खाड़ी युद्ध के कारण तेजी से न सिर्फ बढ़ीं अपितु ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य नामक समुद्री मार्ग से आवाजाही रोककर उनकी आपूर्ति भी बाधित कर दी गई।  तेल और गैस  संयंत्रों पर हुए हमलों के कारण उत्पादन भी घट गया। ऐसे में इन हालातों से भारत का अछूता रहना असंभव था। युद्ध प्रारंभ होने के दो माह  बाद केंद्र सरकार ने दाम बढ़ाने का सिलसिला शुरू किया जिसकी चौथी किश्त आज से लागू हो गई। अभी ये कहना कठिन है कि ये वृद्धि कहां जाकर रुकेगी क्योंकि खाड़ी देशों से आने वाला कच्चा तेल  परिवहन लागत कम होने से  सस्ता पड़ता है जबकि अमेरिका, कैनेडा और वेनेजुएला से आयात में ज्यादा समय और खर्च  लगता हैं। ऐसे में कीमतें बढ़ाने के वाजिब कारण तो हैं किंतु इसी  के साथ ये सवाल उठता है कि जब रूस और ईरान से सस्ता तेल खरीदा गया तब उस उसका लाभ आम जनता को क्यों नहीं दिया गया?  मौजूदा हालात में पेट्रोल - डीजल महंगा होना बेहद स्वाभाविक है। यहां तक कि ईरान और अमेरिका के बीच समझौते के बाद युद्धविराम होने पर भी  मूल्य वृद्धि भले थम जाए लेकिन बढ़ी हुई कीमतें  कम होने में कितना समय लगेगा ये कोई नहीं बता सकता क्योंकि कच्चे तेल का उत्पादन और आपूर्ति युद्ध पूर्व जैसी स्थिति में आने में लंबा समय लगेगा। और ये भी कि तेल उत्पादक देश युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई के लिए कीमतें गिरने नहीं देंगे। ऐसे में पेट्रोलियम पदार्थों के दाम और बढ़ें तो आश्चर्य नहीं होगा। लेकिन सरकार चाहे  तो वैश्विक बदलावों के अनुरूप पेट्रोल - डीजल  की मूल्य वृद्धि करते हुए भी उन पर लगने वाले टेक्सों को स्थिर रखकर कुछ राहत तो दे ही सकती है। मसलन आज जो कीमतें बढ़ाई गईं उनमें राज्यों का टैक्स जोड़ने पर वह और अधिक हो गई। अतीत में कई बार ऐसा हुआ जब केंद्र और राज्य सरकारों ने अपने - अपने हिस्से के टैक्स में कमी कर मूल्य वृद्धि के बोझ से आम उपभोक्ता को राहत दी। सरकार भी जानती है कि पेट्रोल - डीजल की मूल्य वृद्धि से परिवहन महंगा होने पर महंगाई बढ़ती है। ये देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि वे पेट्रोल - डीजल के दाम बढ़ने के बावजूद अपने टैक्स को यथावत रहने दें। यदि इस फॉर्मूले को अपनाया जाए तो जनता के कंधों पर मूल्य वृद्धि का बोझ अपेक्षाकृत कम पड़ेगा । वैसे होना तो ये चाहिए कि पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस को जीएसटी के दायरे में लाया जाए। वर्तमान में ज्यादातर राज्यों में भाजपा और उसके समर्थक दलों वाली राज्य सरकारें होने से जीएसटी काउंसिल में उक्त प्रस्ताव पारित करवाने में कोई रुकावट नहीं आएगी। वन नेशन वन टैक्स की व्यवस्था लागू करने और आपदा में अवसर तलाशने का यह उपयुक्त समय है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 22 May 2026

कोरोना से भी बड़े संकट में फंस गई दुनिया


प. एशिया में चल रही जंग अब दिशाहीन होती जा रही है। अमेरिका और इसराइल की ये सोच पूरी तरह गलत साबित हुई कि वे ईरान को कुछ ही दिनों में घुटनाटेक करवा लेंगे। शुरुआत में ही उसके सर्वोच्च नेता खामेनेई को मारने में कामयाब होने से उनका हौसला काफी बुलंद हुआ था। लेकिन ईरान के जवाबी हमलों ने सारे समीकरण उलट दिए। सबसे बड़ी बात ये हुई कि उसने अमेरिकी युद्धपोतों और लड़ाकू विमानों के अलावा इज़राइल को ही निशाना नहीं बनाया अपितु सऊदी अरब, ओमान, कतर और यू.ए.ई पर भी मिसाइलें दाग दीं क्योंकि इनमें अमेरिकी सैन्य अड्डों के अलावा पश्चिमी देशों का काफी पूंजी निवेश हैं। इसी के साथ ही ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य नामक समुद्री मार्ग को बंद कर दिया। परिणामस्वरूप युद्ध का क्षेत्र तो फैला ही पूरी दुनिया में कच्चे तेल और गैस की किल्लत होने लगी। इसीलिए इस लड़ाई को दूर से देख रहे देशों के हित भी इससे जुड़ गए। ईरान भी समझ गया कि इस लड़ाई में पूरी तरह जीतना तो संभव नहीं है अतः उसने होर्मुज को बतौर ट्रम्प कार्ड उपयोग करते हुए पूरे युद्ध को नया मोड़ दे दिया। इसका असर ये हुआ कि उसके परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने के बजाय अमेरिका की चिंता होर्मुज पर आकर अटक गई। ईरान ने उससे गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलने का फैसला करने के साथ कुछ चुनिन्दा देशों को ही उसकी अनुमति दी। इससे अमेरिका भन्ना गया और उसने वहां अपने युद्धपोत तैनात कर ये संकेत दिया कि वह इस समुद्री मार्ग पर ईरान का आधिपत्य खत्म कर देगा। साथ ही टोल चुकाकर आने वाले जलपोतों पर कार्रवाई की धमकी दे डाली। पाकिस्तान की मध्यस्थता में आयोजित ईरान - अमेरिका की शान्ति वार्ता भी विफल हो गई। हालांकि कहने को तो युद्धविराम चल रहा है लेकिन एक तरफ जहां इसराइल ने लेबनान पर हमले जारी रखे हैं वहीं दूसरी तरफ ईरान भी कभी ओमान तो कभी यू.ए.ई पर बारूदी वर्षा करने बाज नहीं आ रहा। इसी के साथ खाड़ी के ज्यादातर देशों ने हथियारों की खरीददारी बढ़ाकर युद्ध के लंबा खिंचने की आशंका को बढ़ावा दिया है। एक बात और भी उल्लेखनीय है कि सऊदी अरब ने पाकिस्तान के हजारों सैनिक किराए पर लेने के साथ ही लड़ाकू विमान भी अपने यहां तैनात करवाए हैं। दरअसल सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच ये संधि हुई है कि किसी एक पर हमला दोनों पर माना जाएगा। मौजूदा जंग में ईरानी मिसाइलों ने सऊदी अरब को काफी नुकसान पहुंचाया है। उस दृष्टि से तो पाकिस्तानी  सेना और लड़ाकू विमानों की सऊदी अरब में तैनाती स्वाभाविक है। लेकिन इसमें एक विरोधाभास ये भी है कि एक तरफ तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख ईरान और अमेरिका के बीच समझौता करवाने के लिए हाथ - पांव मारते हुए दोनों ओर के शांति प्रस्तावों को इधर से उधर पहुंचाने की मशक्कत में जुटे हुए हैं और दूसरी तरफ वह सऊदी अरब को अपने सैनिकों और लड़ाकू विमानों की सेवाएं देकर ईरान के विरोधी पाले में खड़ा हो गए। हालांकि शांति वार्ता का मंच सजाकर खुद को कूटनीति का उस्ताद समझने वाले पाकिस्तान को ईरान और अमेरिका दोनों फटकार लगाते रहते हैं। मौजूदा स्थिति में ईरान और अमेरिका दोनों के बीच समझौते की गाड़ी कहां तक पहुंची ये कोई नहीं बता सकता किंतु इस उहापोह के कारण पूरी दुनिया हलाकान है। पेट्रोल - डीजल और गैस के बिना आज के जीवन की कल्पना असंभव है। युद्ध की शुरुआत में सभी को लगा कि हफ्ते दो हफ्ते में ये जंग रुक जाएगी लेकिन तीन महीने  के बाद भी इस मसले का कोई हल दूरदराज तक नजर नहीं आ रहा।  हालांकि सही बात ये भी है कि ईरान और अमेरिका दोनों को ये समझ नहीं आ रहा कि सम्मानजनक तरीके से कैसे अपनी गर्दन निकालें। डोनाल्ड ट्रम्प थोड़ा ठण्डे पड़ते हैं तो सऊदी अरब सहित खाड़ी के अन्य देश उन पर दबाव डालते हैं कि ईरान को घायल छोड़कर न जाएं। ताजा खबर ये है कि इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू और ट्रम्प के बीच भी तनातनी हो गई है। आज किसी की समझ में ये नहीं आ रहा कि इस जंग को खत्म कैसे करें क्योंकि दोनों पक्ष अपने को पराजित मानने के लिए तैयार नहीं हैं। साथ ये भी अनुभव हो रहा है कि जंग की शुरुआत जिस भी उद्देश्य से हुई हो किंतु अब वह उद्देश्यविहीन होकर रह गई है। अमेरिका और इसराइल यदि ईरान को झुकाने में सफल नहीं हुए तो ईरान भी अपनी बर्बादी को रोकने में नाकामयाब हुआ। दुर्भाग्य से संरासंघ पूरी तरह नकारा हो गया है। भले ही इसे विश्व युद्ध न कहा जाए लेकिन इसके कारण पूरा विश्व परेशान हो उठा है। आज की स्थिति में ये युद्ध कहां जाकर रुकेगा कहना मुश्किल है किंतु कोरोना महामारी से किसी तरह उबर रही दुनिया उससे भी बड़े संकट में फंस गई है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 21 May 2026

राहुल की विदेश यात्राओं का ब्यौरा भी सार्वजनिक हो


लोकतंत्र में विपक्ष द्वारा सत्ता पक्ष की आलोचना अस्वाभाविक नहीं होती। सरकार की गलतियों को उजागर करना उसका कर्तव्य माना जाता है। सत्ता पक्ष को  जहां मतदाता देश चलाने की जिम्मेदारी सौंपते हैं वहीं विपक्ष से अपेक्षा की जाती है कि वह जनता की तकलीफों को सत्ता पक्ष की जानकारी में लाते हुए उन्हें दूर करने के लिए सुझाव दे। भारत में  ये परम्परा शुरुआत से ही कायम रही। जब कांग्रेस के पास विशाल बहुमत होता था , तब भी संसद में मुट्ठी भर विपक्षी सांसद नेहरू सरकार को जमकर घेर लेते थे। इंदिरा जी के शासन में भी कम संख्याबल के बावजूद विपक्ष ने हमलावर रवैया जारी रखा। उनकी  हत्या के पश्चात राजीव गांधी को ऐतिहासिक बहुमत तो मिल गया किंतु विपक्षी घेराबंदी के चलते वे महज पांच साल बाद अलोकप्रिय होकर सत्ता से हाथ गंवा बैठे और 1991 में आज ही के दिन तमिलनाडु में  श्रीलंका के आतंकवादी संगठन लिट्टे ने उनकी हत्या करवा दी। धीरे - धीरे विपक्ष संसद में ताकतवर होता गया और मिली - जुली सरकारों का दौर आया जो 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर रुका। यद्यपि 2024 में बहुमत से पीछे रहने के बाद श्री मोदी को भी मिली - जुली सरकार चलानी पड़ रही है किंतु उनकी शख्सियत इतनी बड़ी  है कि सहयोगी दल भी दबाव डालने से बचते हैं। और फिर लोकसभा के बाद हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा और एनडीए के शानदार प्रदर्शन से केंद्र सरकार के स्थायित्व को लेकर व्यक्त की जाने वाली आशंकाएं अपनी मौत मरती गईं ।  विशेष रूप से महाराष्ट्र, बिहार और प. बंगाल में भाजपा ने जिस धमाकेदार अंदाज में वापसी की उसके कारण विपक्ष की दशा और दिशा दोनों बिगड़ चुकी हैं। प्रधानमंत्री की हालिया विदेश यात्रा को लेकर जिस तरह के तंज कसे जा रहे हैं उनसे इसकी पुष्टि हो जाती है। सबसे पहले कहा गया कि जनता को पेट्रोल - डीजल का खर्च घटाने और एक वर्ष तक  विदेशों में सैर - सपाटा टालने की नसीहत देने के बाद वे खुद कई देशों की यात्रा पर निकल गए। उसके बाद नॉर्वे की एक महिला पत्रकार के सवाल का जवाब नहीं देने पर प्रधानमंत्री के चिरपरिचित विरोधी उनको घेरते हुए भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर खतरे का ढोल  पीटा जाने लगा। और फिर इटली की प्रधानमंत्री को  टॉफी देने वाले चित्र पर हल्ला मचा। ध्यान देने योग्य बात ये है कि प्रधानमंत्री के विदेश दौरे आनन - फानन में तय नहीं होते। महीनों पूर्व अधिकारी स्तर पर इसकी तैयारी होती है जिसमें बातचीत के मुद्दे और समझौतों का प्रारूप तैयार किया जाता है। उस दृष्टि से देखें तो यूएई से प्रारंभ और इटली में संपन्न अपनी यात्रा के दौरान श्री मोदी ने जो समझौते हस्ताक्षरित किये यदि वे देश हित के विरुद्ध हों तब विपक्ष को आलोचना करने का पूरा अधिकार है। लेकिन इस मामले में वह खाली हाथ है। जहां तक बात नॉर्वे की महिला पत्रकार के सवाल का जवाब नहीं देने की तो न सिर्फ विपक्ष अपितु मोदी विरोधी गैंग के रूप में कुख्यात हो चुके यू ट्यूबर इस मुद्दे पर बिना सच्चाई जाने प्रधानमंत्री पर हमलावर हो गए। लेकिन जल्द ही उन्हें शर्मसार होना पड़ा जब उक्त महिला पत्रकार की बेहूदगी का पर्दाफाश हो गया। जिस अवसर पर उसने श्री मोदी से सवाल पूछा उसमें पत्रकारों से चर्चा का कार्यक्रम नहीं था। बाद में भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने पत्रकार वार्ता में उस महिला पत्रकार को प्रश्न पूछने का अवसर देते हुए उसका उत्तर देने की पेशकश की तब वह उठकर चली गई। अब उसके अपने देश में हुई उसकी जमकर किरकिरी हो रही है और भारत में प्रधानमंत्री को मीडिया विरोधी और प्रेस की आजादी को खतरे में बताने वाले मुंह छिपाते फिर रहे हैं। यही स्थिति इटली की प्रधानमंत्री के साथ उनके चित्र के बारे में है। जिसे लेकर अनर्गल टिप्पणियां की जा रही हैं। गत दिवस लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने तो प्रधानमंत्री के प्रति गद्दार शब्द का प्रयोग कर एक बार साबित कर दिया कि आयु की आधी शताब्दी पार करने के बाद भी वे परिपक्वता के कोसों दूर हैं। कांग्रेस की वर्तमान दुरावस्था के लिए उनका यही गैर जिम्मेदाराना आचरण जिम्मेदार है। यदि उनमें तनिक भी साहस है तो वे अपनी गोपनीय विदेश यात्राओं का ब्यौरा देश के सामने रखें। प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा का तो पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध रहता है किंतु कैबिनेट मंत्री का दर्जा और उच्च स्तरीय सुरक्षा प्राप्त श्री गांधी की चंद विदेश यात्राओं को छोड़कर ज्यादातर पूरी तरह गोपनीय क्यों रहती हैं इसका खुलासा भी उन्हें करना चाहिए।  लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि उससे बहुत सारी वे बातें सामने आ जाएंगी जिन पर पर्दा पड़ा हुआ है। ऐसा लगता है प. बंगाल में भाजपा की जीत विपक्ष और माेदी विरोधी गिरोह को बर्दाश्त नहीं हो रही। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 20 May 2026

ट्रम्प को चिढ़ाने और डराने वाली है पुतिन की चीन यात्रा

ट्रम्प को चिढ़ाने और डराने वाली है पुतिन की चीन यात्रा 


कूटनीति कभी न रुकने वाली प्रक्रिया है। दुनिया में चाहे युद्ध हो रहा हो या शांति सबके मूल में कूटनीति ही होती है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया दो वैचारिक गुटों में बंट गई थी जिनमें पूंजीवाद समर्थक देश अमेरिका और साम्यवादी शासन व्यवस्था वाले सोवियत संघ के नेतृत्व में एकजुट हो गए। हालांकि एक तीसरा धड़ा भी बना जिसे गुट निरपेक्ष आंदोलन कहा गया जिसकी शुरुआत भारत, इंडोनेशिया , घाना , युगोस्लाविया और मिस्र ने की और कालान्तर में 100 से ज्यादा देश इसमें शामिल हो गए। इस धड़े ने अपने को अमेरिका और सोवियत संघ के बीच चले शीतयुद्ध से  दूर रखा। यद्यपि इसमें शामिल देशों को दोनों महाशक्तियों से संबंध रखने की छूट थी किंतु आश्चर्य की बात है कि युगोस्लाविया साम्यवादी देश होने के बावजूद उसके नेता मार्शल टीटो सोवियत संघ से दूरी बनाए रखते थे जबकि भारत और अमेरिका के रिश्ते सदैव अविश्वास में उलझे रहे। 1949 में चीन में भी साम्यवादी क्रान्ति होने के बाद माओ त्से तुंग वैश्विक परिदृश्य पर क्रांति के प्रतीक बनकर उभरे। लेकिन उन्होंने भी सोवियत संघ के आधिपत्य को स्वीकार करने के बजाय अपना अलग रास्ता चुना। 1972 तक चीन दुनिया से अलग - थलग माओ द्वारा बनाए गए लौह आवरण में सिमटा रहा। उसे संरासंघ की सदस्यता से भी वंचित रखा गया किंतु 1972 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन चीन की यात्रा पर जा पहुंचे और अनेक समझौते करते हुए व्यापार के अलावा सांस्कृतिक और शैक्षणिक आदान - प्रदान के दरवाजे खोल दिए। स्मरणीय है 1971 में साम्यवादी चीन को संरासंघ की सदस्यता के साथ ही सुरक्षा परिषद में वीटो का अधिकार भी मिल चुका था जो उसके पहले तक ताईवान के पास रहा। उसके बाद से चीन वैश्विक राजनीति और व्यापार की मुख्यधारा में शामिल होने लगा और देखते ही देखते वह अमेरिका के बाद सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने के साथ ही सैन्य क्षमता और  तकनीकी ज्ञान में दुनिया से आगे निकलने लगा। साम्यवादी विचारधारा उसकी एकदलीय शासन प्रणाली में तो परिलक्षित होती है किंतु शी जिनपिंग का चीन , माओ त्से तुंग और चाऊ एन लाई के दौर से बहुत आगे आकर पूंजी आधारित आर्थिक विकास की प्रतिस्पर्धा में आगे निकलता दिखता है। दुनिया भर में उसने निवेश कर रखा है। अमेरिका जैसे संपन्न देश में भी चीनी पूंजी का दबदबा है। यही वजह है कि कभी अफीमचियों के लिए बदनाम चीन आज विकास का जीवंत प्रतीक बन चुका है। हालांकि विस्तारवाद और कुटिलता जैसे अपने मूल स्वभाव को उसने नहीं छोड़ा और इसलिए ज्यादातर पड़ोसी देश उसके प्रति सदैव सशंकित रहते हैं। बावजूद इसके चीन  वैश्विक राजनीति और व्यापार के क्षेत्र में बड़े खिलाड़ी के तौर पर उभरा है। इसका ताजा प्रमाण है अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गत सप्ताह चीन की यात्रा की। यद्यपि ट्रम्प जो सोचकर गए थे वैसा कुछ भी नहीं हुआ। न तो चीन ने उनके व्यापार प्रस्तावों को भाव दिया और न ही ईरान युद्ध रुकवाने में सहायता का आश्वासन । उलटे ताईवान पर कब्जा करने की अपनी मंशा व्यक्त करते हुए ट्रम्प को आगाह कर दिया कि वे इस मसले से दूर ही रहें। पूरी दुनिया में ये बात फैल चुकी है कि जिनपिंग ने ट्रम्प को खाली हाथ लौटने मजबूर कर विश्व राजनीति में चीन के दबदबे को कायम रखा। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। ट्रम्प के बीजिंग से जाने के कुछ दिन बाद ही रूस के राष्ट्रपति पुतिन चीन जा पहुंचे। हालांकि उसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच हुई सहयोग और संधि की रजत जयंती का आयोजन है । लेकिन सच्चाई ये है कि पुतिन की यह बीजिंग यात्रा दरअसल अमेरिका के विरुद्ध मोर्चेबंदी को मजबूत करने के लिए हो रही है। उल्लेखनीय है यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद अमेरिका के नेतृत्व में उसके समर्थक देशों ने रूस पर प्रतिबंध थोप दिए तब चीन और भारत ने तटस्थ रहकर पुतिन का हौसला बढ़ाया। और बड़ी  मात्रा में कच्चा तेल खरीदकर रूस की अर्थव्यवस्था को टेका लगाए रखा। प . एशिया में चल रहे युद्ध में चीन और रूस खुलकर ईरान के साथ हैं। वहीं भारत ने भी अपने हितों के अनुरूप संतुलित नीति अपना रखी है। अब जबकि ट्रम्प इस युद्ध में बुरी तरह उलझ चुके हैं तब चीन और रूस का एक साथ आना किसी बड़ी कूटनीतिक पहल का संकेत है। गौरतलब है कि ये दोनों ब्रिक्स नामक संगठन के संस्थापक सदस्य हैं जिसकी अध्यक्षता इस साल भारत के पास है। सितम्बर में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन के लिए पुतिन भारत आने वाले हैं। इस प्रकार ट्रम्प के बीजिंग से लौटते ही पुतिन का वहां पहुंचना महज औपचारिक उपस्थिति न होकर बड़ा कूटनीतिक दांव है जिसका उद्देश्य ट्रम्प को चिढ़ाने के साथ ही डराना भी है। उल्लेखनीय है भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अनेक देशों की ताबड़तोड़ यात्रा करके अमेरिका को संकेत दे दिया है कि दुनिया अब उसके इशारों पर चलने वाली नहीं है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 19 May 2026

मुसलमानों की राजनीतिक उपयोगिता ढलान पर


सड़क पर नमाज पढ़ने को लेकर प. बंगाल और उ.प्र में हुए विवाद  के बीच ये मुद्दा एक बार गरमाने लगा है। प. बंगाल में हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव के बाद जो सरकार बनी वह भी उ.प्र की योगी सरकार की तरह तुष्टीकरण से परहेज करने की राह पर चल पड़ी है। कोलकाता सहित अन्य शहरों में जो अवैध निर्माण और दुकानें हटाई जा रही हैं उनके बारे में कहा जा रहा है कि वे  बांग्लादेशी घुसपैठियों के अलावा रोहिंग्या मुस्लिमों के थे। हावड़ा और सियालदाह रेलवे स्टेशन पर तो इन तत्वों का कब्जा ही था। हावड़ा ब्रिज के निचले हिस्से में भी यही स्थिति थी। सुवेंदु अधिकारी ने सत्ता संभालते ही  अतिक्रमण और अवैध निर्माणों को हटाने की मुहिम छेड़ दी। इसी के साथ ही मुस्लिम समुदाय द्वारा सड़कों पर नमाज पढ़े जाने पर रोक लगाई तो उपस्थित मुसलमानों की भीड़ ने पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया जिसके जवाब में पुलिस ने भी बलप्रयोग करने में संकोच नहीं किया। ऐसा लगता है प. बंगाल का मुस्लिम समुदाय इसी मुगालते में है कि ममता  सरकार के जमाने में उसे कुछ भी करना की जो छूट मिली हुई थी वह जारी रहेगी। स्मरणीय है चुनाव प्रचार के दौरान श्री अधिकारी ने स्पष्ट कर दिया था कि वे बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति सख्ती के अलावा मुस्लिम समुदाय की उस स्वेच्छाचारिता पर लगाम लगाएंगे जो तृणमूल सरकार के दौर में देखने मिलती रही। दूसरी तरफ उ.प्र में भी सड़कों पर नमाज पढ़ने की मुसलमानों की जिद पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कड़ा रुख दिखाते हुए कहा कि इसकी अनुमति नहीं दी जाएगी। मस्जिदों में स्थानाभाव होने के तर्क पर उन्होंने कहा कि बजाय एक साथ पढ़ने  के वे बारी - बारी से नमाज पढ़ें। साथ ही घरों में जगह कम पड़ती है तो जनसंख्या नियंत्रण पर ध्यान दें। उल्लेखनीय है उ. प्र में आगामी वर्ष विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। यहां भी 20 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं के थोक समर्थन के बल पर  अखिलेश यादव सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाए हुए हैं। लेकिन वे भूल रहे हैं कि बिहार में तेजस्वी यादव का मुस्लिम - यादव समीकरण फुस्स हो गया जहां 18 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं के बावजूद राजद  और कांग्रेस के महागठबंधन का सफाया हो गया। प .बंगाल में तो 30 फीसदी मुस्लिम मतदाता होने पर भी ममता बैनर्जी बुरी तरह पराजित हुईं । असम में भी मुस्लिम मतदाताओं का तिलिस्म टूट गया। ये इसलिए हो सका क्योंकि हिन्दू मतदाताओं के मन में ये बात बैठ गई कि उनकी फूट के चलते मुस्लिम परस्त सरकारें  बन जाती हैं। असम और प. बंगाल में जो राजनीतिक हवा चली उसका असर आगामी सभी चुनावों में पड़े बिना नहीं रहेगा। सुवेंदु अधिकारी और योगी आदित्यनाथ ने सड़कों पर नमाज पढ़ने वालों के विरुद्ध जो सख्ती दिखाई उसको नियम - कानून के पालन से जोड़ने पर महसूस होगा कि वे सही हैं। ये कहना कि अन्य धर्मावलंबी भी सड़कों पर अपने आयोजन करते हैं तो यदि उनसे भी अव्यवस्था फैलती है तब प्रशासन का फ़र्ज़ है वह उन्हें भी रोके। स्मरणीय है मुंबई में सड़कों पर नमाज पढ़े जाने के बाद ही शिवसेना ने महाआरती शुरू की। हालांकि मुस्लिम समुदाय पर मुल्ला - मौलवियों का मनोवैज्ञानिक दबाव रहता है परन्तु सोशल मीडिया पर अनेक मुस्लिम मौलवी एवं प्रवक्ता खुलकर उन पार्टियों की आलोचना कर रहे हैं जिन्होंने मुसलमानों के गैर कानूनी कार्यों की अनदेखी की।  दरअसल लालू प्रसाद यादव, स्व .मुलायम सिंह यादव और ममता बैनर्जी ने चुनाव जीतने के लिए मुसलमानों को भाजपा का भय दिखाकर अपने पक्ष में गोलबंद किया और उसके बदले उन्हें सड़क पर  नमाज पढ़ने , अवैध कारोबार और निर्माण आदि की छूट दे दी । ऐसा करने से ये समुदाय मुख्य धारा से अलग होता गया। सोशल मीडिया पर एक मौलवी की रील जमकर चल रही है जिसमें वे सेकुलर पार्टियों की धज्जियां उड़ाते हुए पूछ रहे हैं कि मुसलमानों को दिल्ली के शाहीन बाग में धरने पर बैठने के लिए उकसाने के बाद न अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव ने वहां आने की जरूरत समझी और न ही राहुल गांधी ने। जबकि इन्हीं के भरोसे मुस्लिम समुदाय खुलकर भाजपा के विरोध में खड़ा हुआ। उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सुनने प. बंगाल चुनाव में जो जनसैलाब उमड़ा वह स्वस्फूर्त था। मुस्लिम समाज को इन संकेतों को समझना चाहिए। धार्मिक आधार पर एकता बुरी बात नहीं है लेकिन इसके लिए भाजपा को गालियां देने से उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ उल्टे हिन्दू मतदाता अपने मतभेद भूलकर राजनीतिक दृष्टि से एकजुट होने लगे। सही बात ये है कि मुसलमानों का उपयोग कर उन्हें अनाथ छोड़ने वाले कथित सेकुलर दल ही उनके सबसे बड़े शत्रु हैं। इस सच्चाई को मुसलमान अभी भी नहीं समझे तब उनकी रही  - सही राजनीतिक उपयोगिता भी घटती जाएगी। असम और प. बंगाल के नतीजे इसका प्रमाण हैं और बड़ी बात नहीं उ.प्र में भी ऐसा ही दिखाई दे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 18 May 2026

ट्रम्प की खिसियाहट दुनिया भर में युद्ध की आग भड़का सकती है


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प  चीन यात्रा से खाली हाथ लौट आए। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई बातचीत के कोई ठोस परिणाम नहीं निकले। खाड़ी युद्ध से उत्पन्न परिस्थितियों में चीन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि ईरान की पीठ पर उसी का हाथ है। यद्यपि रूस भी ईरान के साथ खड़ा है किंतु यूक्रेन के साथ  लंबी लड़ाई में उलझने की वजह से वह चाहकर भी समुचित सहायता ईरान को नहीं दे पा रहा। दूसरी तरफ चीन ने इस बात को समझ लिया है कि वेनेजुएला के बाद यदि ईरान का तेल व्यापार भी अमेरिका के नियंत्रण में आ गया तो वह ऊर्जा संकट में फंस जाएगा क्योंकि अमेरिका समर्थक तेल उत्पादक देश चीन को पेट्रोल - डीजल देने से इंकार कर सकते हैं। जिनपिंग ने इसीलिए ईरान को हरसंभव सहायता दी जिसके बलबूते वह अमेरिका के सामने झुकने भी तैयार नहीं हो रहा। ट्रम्प को उम्मीद थी कि व्यापार समझौतों का लॉलीपॉप दिखाकर वे चीन को इस बात के लिए मना लेंगे कि वह होर्मुज से जहाजों की आवाजाही खोलने के लिए ईरान पर दबाव डाले। लेकिन जिनपिंग ने  ईरान संबंधी कोई आश्वासन तो दिया नहीं उल्टे ये धमकी दे डाली कि अमेरिका ताईवान के मामले में टांग अड़ाने से बाज आए। उल्लेखनीय है जिनपिंग वन चाइना नीति के अंतर्गत ताईवान को चीन में मिलाने के लिए प्रयासरत हैं । लेकिन अमेरिका के खुले संरक्षण के अलावा जापान , ऑस्ट्रेलिया सहित दक्षिण एशिया के अनेक देश इसके विरोध में हैं। इसीलिए चीन सैन्य कार्रवाई से तो परहेज करता आ रहा है परन्तु रूस द्वारा यूक्रेन और अमेरिका द्वारा वेनेजुएला हड़पने के साथ ही ग्रीनलैंड पर दावा ठोकने के बाद ईरान पर हमला कर देने से उसका हौसला मजबूत हुआ है। इसमें दो राय नहीं कि ताईवान है तो चीन का ही हिस्सा। 1949 में साम्यवादी क्रान्ति के बाद वहां के शासक चांग काई शेक भागकर फ़ार्मोसा नामक द्वीप पर चले गए। यही ताईवान कहलाया जिसे संरासंघ में चीन के तौर पर मान्यता मिलने के साथ ही वीटो का अधिकार भी मिला। कालांतर में अमेरिका ने साम्यवादी चीन से ताल्लुकात बढ़ाकर उसे चीन के तौर पर मान्यता देते हुए संरासंघ की सदस्यता के साथ ही सुरक्षा परिषद में वीटो भी दिलवा दिया। यद्यपि ताईवान के स्वतंत्र अस्तित्व को बनाए रखने के लिए उसने उसे आर्थिक और सैन्य संरक्षण देने की नीति जारी रखी। लेकिन चीन की यात्रा से लौटकर ट्रम्प का ये बयान अमेरिका के यूटर्न का प्रमाण है कि ताईवान की आजादी के लिए अमेरिका 15 हजार कि.मी लड़ने नहीं आयेगा। समझने वाली बात ये है कि क्या ट्रम्प ने जिनपिंग को खुश करने ऐसा बयान दिया या फिर ईरान युद्ध के कड़वे अनुभवों ने उनको ऐसा कहने मजबूर किया? कूटनीतिक मामलों में असलियत पर पर्दे पड़े होने से सच्चाई का पता चलना कठिन होता है किंतु उसी के साथ एक तरफ ट्रम्प ने ईरान द्वारा होर्मुज समुद्री मार्ग नहीं खोलने पर दोबारा हमले की धमकी दे डाली। लेकिन सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात है ट्रम्प द्वारा क्यूबा पर भी वेनेजुएला जैसी कार्रवाई करने की धमकी। उल्लेखनीय है दक्षिण अमेरिका में केवल क्यूबा ही वह देश है जिस पर अमेरिका अपनी मर्जी का शासक नहीं बिठा सका। फ़िडेल कास्ट्रो को हटाने या मारने की उसकी कोशिशें बेकार गईं। एक बार तो क्यूबा को लेकर अमेरिका और रूस आमने - सामने आ गए थे। कास्ट्रो के न रहने के बाद अमेरिका अपनी चिर संचित इच्छा पूरी करना चाह रहा है। वेनेजुएला में बिना रोक - टोक  सफल होने के बाद उसे लग रहा है क्यूबा में भी वैसी ही कार्रवाई कर वह अपना रुतबा बढ़ा लेगा। रूस अपनी झंझटों और चीन दूरी के चलते शायद इसमें हस्तक्षेप न करे किंतु ईरान युद्ध के समाप्त होने के पहले यदि ट्रम्प क्यूबा का मोर्चा भी खोलते हैं तब ये लघु विश्व युद्ध का रूप ले सकता है क्योंकि युद्ध क्षेत्र का विस्तार कई महाद्वीपों में हो जाएगा।ऐसे में सवाल ये है कि क्या विश्व जनमत ट्रम्प को क्यूबा हड़पने की छूट देगा? ये  भी हो सकता है अमेरिका ने ताईवान पर चीन की संभावित कार्रवाई के विरुद्ध मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए ये पैंतरा चला हो। हकीकत जो भी हो किंतु ट्रम्प की चीन यात्रा बेनतीजा खत्म होने से प. एशिया के साथ ही दुनिया भर में चल रहे संघर्षों के खत्म होने की उम्मीद धूमिल हो चली है। ट्रम्प के बाद रूसी राष्ट्रपति पुतिन भी चीन जा रहे हैं। जाहिर है अमेरिका विरोधी दोनों दिग्गजों के  बीच होर्मुज में यातायात शुरू करवाने के अलावा क्यूबा संबंधी बात भी हो। फिलहाल तो भारी अनिश्चितता है। हालांकि एक बात जरूर स्पष्ट है कि ट्रम्प अब खिसियाहट की स्थिति में आ चुके हैं और ऐसे में वे कोई ऐसी मूर्खता कर बैठें तो आश्चर्य नहीं होगा जिसके कारण पूरे विश्व में युद्ध की आग फैल जाए।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 16 May 2026

भोजशाला के बाद ज्ञानवापी और श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर फैसले की प्रतीक्षा


म.प्र के धार नगर में स्थित भोजशाला के बारे में उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने गत दिवस ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए कहा कि भोजशाला , वाग्देवी ( सरस्वती) का मंदिर है जिसमें केवल हिंदुओं को बेरोकटोक पूजा - अर्चना का अधिकार है। हालांकि भोजशाला का रखरखाव ए .एस.आई ( भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ) के नियंत्रण में रहेगा किंतु न्यायालय ने 2003 के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें मुस्लिमों को शुक्रवार को तय समय के लिए नमाज की अनुमति दी गई थी। हिंदुओं को भी मंगलवार को ही वहां पूजा की सुविधा थी। 1903 से भोजशाला का संरक्षण पुरातत्व सर्वेक्षण के ही पास है। हिन्दू जहां इसे देवी सरस्वती का मंदिर मानते रहे वहीं मुस्लिमों  की नजर में  वह कमाल मौला परिसर था। उच्च न्यायालय की खंडपीठ के दोनों न्यायाधीशों द्वारा फैसला देने के पूर्व  स्थल का निरीक्षण भी किया गया। पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा भोजशाला में की गई खुदाई और सफाई  में 1,700 से अधिक पुरातात्विक अवशेष और भगवान गणेश, नरसिंह, हनुमान सहित अन्य देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां मिलीं। साथ ही दीवारों और खंभों पर उकेरे संस्कृत श्लोक  और श्री सरस्वत्यै नमः जैसे उल्लेख  मिले। सर्वेक्षण के अनुसार भोजशाला का ढांचा  हिंदू मंदिरों के स्तंभों और नक्काशीदार पत्थरों से निर्मित था। जिसे 11वीं सदी में परमार राजा भोज ने  संस्कृत अध्ययन और देवी वाग्देवी (सरस्वती) की आराधना  केंद्र के रूप में बनवाया था। उच्च न्यायालय ने उक्त प्रमाणों को स्वीकार करते हुए भोजशाला को देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर मानते कहा कि मुसलमान चाहें तो मस्जिद के लिए राज्य सरकार से कहीं अलग भूमि मांग सकते हैं। यद्यपि फैसले से असंतुष्ट मुस्लिम पक्ष सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने के संकेत दे रहा है। इसीलिए हिन्दू पक्ष ने वहां कैविएट दर्ज करवा दिया है । उल्लेखनीय है ऐसे ही प्रमाणों के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या स्थित बाबरी ढांचे वाली भूमि को प्रभु श्री राम की जन्मस्थली मानकर उस पर राम मंदिर बनाने हेतु सौंपते हुए  मुसलमानों को अयोध्या में अन्यत्र मस्जिद निर्माण के लिए भूखंड आवंटन का आदेश दिया था। यद्यपि  मस्जिद के लिए जमीन दिए जाने का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि बाबरी ढांचा हिन्दू मंदिर को ध्वस्त कर ही बनाया गया था। और ठीक वैसी ही स्थिति भोजशाला की है जिस पर मुस्लिम समुदाय का दावा किसी भी दृष्टि से मान्य नहीं हो सकता। इसीलिए भोजशाला को हिन्दू धर्मस्थल स्वीकार करने के बाद  मस्जिद के लिए जमीन देना तो अवैध कब्जे जैसे अपराध पर पुरस्कार प्रदान करने जैसा है। भोजशाला के हिन्दू धर्मस्थल प्रमाणित होने के बाद अब सभी की निगाहें वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर से सटी ज्ञानवापी मस्जिद विवाद पर लग गईं हैं जो न्यायालय में चल रहा है। न्यायालय के आदेश पर हुई खुदाई में ज्ञानवापी के हिन्दू मंदिर होने के सैकड़ों प्रमाण मिल चुके हैं। इसी तरह मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि की दीवार से लगकर बनी शाही मस्जिद को लेकर भी हिन्दू पक्ष का दावा है कि वह  जन्मभूमि का हिस्सा ही है। पूरे देश में ऐसे सैकड़ों हिन्दू धर्मस्थल हैं जिनको मुगलिया दौर में ध्वस्त किया गया या फिर कब्जा कर मस्जिद बना दी गई। होना तो ये चाहिए था कि आजादी के बाद ऐसे सभी स्थलों पर से मुस्लिम आधिपत्य खत्म कर उन्हें हिंदुओं को सौंप दिया जाता परंतु वोट बैंक के लालच में मुस्लिम तुष्टीकरण की जो हवा बही उसमें हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को लगातार ठेस पहुंचाई जाती रही। ये संतोष का विषय है कि अदालतों द्वारा ऐसे विवादित स्थलों के बारे में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को प्रमाण प्रस्तुत करने का दायित्व दिया जा रहा है। अयोध्या के बाद  भोजशाला का फैसला ये दर्शाता है कि मुस्लिम शासकों द्वारा हिंदुओं के आस्था स्थलों पर अवैध कब्जा किया गया था। जिसके प्रमाण खुदाई में मिले अवशेषों से मिल रहे हैं। ये देखते हुए मुस्लिम समुदाय के हित में है कि वह स्वेच्छा से ऐसे सभी विवादित धर्मस्थल हिंदुओं को सौंप दे जिनके बारे में उसे भी पता है कि वे मूलतः हिंदुओं के ही हैं। ऐसा करने से वह बहुसंख्यक समुदाय का सद्भाव अर्जित कर सकेगा, वरना अदालत द्वारा बेदखल किए जाने के बाद उसे पराजय बोध का सामना करना पड़ेगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 15 May 2026

पटाखा फैक्टरी में विस्फोट के लिए पुलिस और प्रशासन भी बराबरी के जिम्मेदार


म.प्र के जबलपुर शहर के समीप  बरगी बांध में एक पखवाड़े पहले हुई क्रूज डूबने की घटना की जांच हेतु आयोग गठित कर दिया गया । जो जानकारी आई है उसके अनुसार क्रूज को काट दिए जाने के कारण दुर्घटना के असली कारणों का पता लगा पाना सम्भव नहीं रहा। लेकिन सतही तौर पर जो प्रतीत हुआ उसके अनुसार प्रशासनिक लापरवाही के कारण अनेक जिंदगियां असमय खत्म हो गईं। प्रदेश भर में क्रूज़ और नावों का संचालन रोकने के बाद संबंधित महकमे ने चुप्पी साध ली। बरगी क्रूज दुर्घटना के घाव अभी हरे ही थे कि गत दिवस प्रदेश के देवास नगर में एक पटाखा फैक्टरी में हुए विस्फोट में 5 श्रमिकों के चीथड़े उड़ गए वहीं घायलों में एक दर्जन की हालत गंभीर है।  पटाखा फैक्टरी में बारूद का होना स्वाभाविक है किंतु जो जानकारी मिली उसके अनुसार फैक्टरी में कई टन बारूद जमा की गई थी जबकि उसे मात्र 15 किलो विस्फोटक रखने का लाइसेंस जारी हुआ था। चूंकि बरसात के पहले फैक्टरी संचालक को किसी बड़े ऑर्डर की आपूर्ति करनी थी इसलिए उसने  नियम विरुद्ध जाने का दुस्साहस किया और स्वीकृत मात्रा से कई गुना अधिक विस्फोटक एकत्र कर फटाफट पटाखे बनाने शुरू कर दिए। छह माह पूर्व प्रारंभ उक्त फैक्टरी का निर्माण भी पूरी तरह नहीं हुआ है। हालांकि दुर्घटना का कारण फिलहाल स्पष्ट नहीं है किंतु भीषण गर्मी में अधूरे निर्माण के बावजूद बारूद जैसी ज्वलनशील चीज का जंगी स्टॉक और बिना समुचित सुरक्षा प्रबंधों के 600 श्रमिकों को काम पर लगाने से ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि फैक्टरी मालिक को नियम - कानून की रत्ती भर परवाह नहीं थी । इसी प्रकार 15 किलो विस्फोटक रखने का लाइसेंस होने पर भी उक्त फैक्टरी को कई टन विस्फोटक की आपूर्ति करने वाले भी खुद को कानून से ऊपर समझते हैं वरना वे इतनी बड़ी हिमाकत नहीं करते। लेकिन ऐसी दुर्घटना के लिए शासन और प्रशासन की जिम्मेदारी को उपेक्षित नहीं किया जा सकता। ये सवाल स्वाभाविक रूप से उठ खड़ा होता है कि पटाखा बनाने वाली उक्त फैक्टरी में अनुमति से बहुत ज्यादा विस्फोटक आता रहा तो प्रशासन को इसकी जानकारी क्यों नहीं लगी? और यदि सरकारी अमला इस बारे में जानता था तब तो उसे भी निरपराध श्रमिकों की मौत के लिए बराबरी से दोषी माना जाना चाहिए। इस दुर्घटना ने एक और आशंका पैदा कर दी कि किसी शहर में विस्फोटकों का जखीरा आ जाने पर भी पुलिस और प्रशासन को उसकी भनक नहीं लगती। इसे दूसरे कोण से देखने पर ये भी कहा जा सकता है कि इस आपराधिक कृत्य को भ्रष्ट तंत्र का संरक्षण था जो अपनी जेब गर्म करने के फेर में जनता की जान को खतरे में डालने से लेशमात्र भी परहेज नहीं करता। कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं होगा कि चाहे बरगी बांध में क्रूज डूबने की घटना हो या फ़िर देवास की पटाखा फैक्टरी में हुआ विस्फोट, इनकी जड़ में प्रशासनिक उदासीनता या अनदेखी ही मूल कारण होता है।  यदि बरगी में क्रूज का रखरखाव सही तरीके से हुआ होता ,यात्रियों को समय पर लाइफ जैकेट पहनने की अनिवार्यता होती और क्रूज डूबने की शुरुआत होते ही बचाव कार्य प्रारंभ हो जाता तब अनेक लोगों की जान बच सकती थी। इसी तरह देवास की पटाखा फैक्टरी के निर्माण और सुरक्षा प्रबंधों की समय रहते समुचित जांच की गई होती तब गत दिवस हुआ हादसा टाला जा सकता था। और फिर 15 किलो की जगह कई टन विस्फोटक का फैक्टरी में जमा होना हे ये साबित करने के लिए काफी है कि फैक्टरी मालिक की पहुंच और पकड़ स्थानीय प्रशासन तक थी। कुछ समाचारों में बताया गया है कि उसकी भाजपा  सांसद से काफी निकटता रही है। यदि ये सही है तब विस्फोटकों के अवैध भंडार के पीछे राजनीतिक दबाव की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। हकीकत जो भी हो लेकिन फैक्टरी मालिक द्वारा किए जा रहे गैर कानूनी कार्यों पर रोक - टोक नहीं होना ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि उसने प्रशासनिक व्यवस्था को या तो खरीद लिया था या किसी अन्य कारण से सरकारी अमला उस पर मेहरबान बने रहते हुए आँखें मूंदें बैठा रहा। इसलिए जांच के दायरे में उक्त पटाखा फैक्टरी के अलावा पुलिस और प्रशासन की नाकामी भी आनी चाहिए क्योंकि अप्रत्यक्ष तौर पर ही सही इस दुर्घटना में उनकी जिम्मेदारी भी कम नहीं है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 14 May 2026

राष्ट्रीय संकट में निजी और राजनीतिक हित महत्वहीन


इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एक वर्ष तक सोना नहीं खरीदने के साथ पेट्रोल , डीजल , रसायनिक उर्वरक और खाद्य तेलों का उपयोग कम करने की अपील पूरे देश में चर्चा का विषय है। दरअसल भारत उक्त सभी चीजों का काफी आयात करता है जिसका भुगतान विदेशी मुद्रा में  होता है। ईरान युद्ध की वजह से कच्चे तेल और गैस के दाम बढ़ने के कारण रुपए की कीमत भी गिर रही है। भारत को खाद्य तेल भी आयात करने पड़ते हैं। हालांकि उक्त चीजों का आयात पूरी तरह से रोकना असंभव होगा किंतु सोना ऐसी चीज है जो दैनंदिन जीवन के लिए अनिवार्य न होने के बावजूद भारत उसका सबसे बड़ा आयातक है। सदियों से हमारे यहां सोने को सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता रहा है। यद्यपि दाम बढ़ते जाने से  आम आदमी की सोना खरीदने की क्षमता घटती जा रही है ,  फिर भी भारत सोने की खरीदी में अग्रणी देश है। कहा जाता है अमेरिकी सरकार के पास जितना स्वर्ण भण्डार है उससे ज्यादा भारत की जनता के पास घरों में रखा है। प्रधानमंत्री की अपील के बाद तरह - तरह की अफवाहें उड़ने लगीं। उनकी बातों का मजाक भी उड़ाया जाने लगा। उल्लेखनीय है श्री मोदी ने एक वर्ष तक सैर - सपाटे के लिए विदेश यात्रा न करने का अनुरोध भी लोगों से किया। सोने और चांदी का आयात घटाने के लिए उन पर आयात शुल्क भी बढ़ा दिया गया जिसके बाद उनकी कीमतें भी बढ़ने लगीं। बहरहाल समझने वाली बात ये है कि प्रधानमंत्री ने उक्त चीजों का उपयोग घटाने के साथ ही कुछ समय तक उनकी खरीदी से बचने की जो बात कही उसका सम्बन्ध मौजूदा तनाव  के चलते विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखना है। ईरान युद्ध शुरू हुए ढाई महीने से अधिक हो गए। दुनिया के तमाम देशों में पेट्रोल, डीजल और गैस की राशनिंग लागू हो गई। पड़ोसी देशों में उनके दाम 50 फीसदी तक बढ़ चुके हैं। लेकिन भारत में रसोई गैस की किल्लत कुछ दिनों तक चलने के बाद स्थिति काफी हद तक सामान्य हो गई जबकि पेट्रोल - डीजल की आपूर्ति निर्बाध जारी होने के अलावा कीमतें भी नहीं बढ़ाई गईं। यद्यपि इसका कारण पांच राज्यों के चुनाव ही थे। इसीलिए संभावना है कि किसी भी समय मूल्यवृद्धि का ऐलान हो सकता है और वह भी अच्छा - खासा। प्रधानमंत्री की अपील का भाजपा शासित राज्यों में तो असर दिखाई देने लगा है। खुद श्री मोदी भी गत दिवस दो वाहनों के साथ निकले। अनेक मुख्यमंत्री और मंत्रियों ने भी अपने काफिले छोटे कर लिए। जबलपुर में उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश महोदय साइकिल से अदालत पहुंचे। हालांकि ये  कब तक जारी रहेगा कहना मुश्किल है क्योंकि स्थिति सामान्य होते ही सब कुछ पहले जैसा होना तय है। लेकिन प्रधानमंत्री की अपील के निहितार्थ को समझना जरूरी है। मौजूदा संकट वैश्विक स्तर का है। इसके जल्द सुलझने की उम्मीद भी नजर नहीं आ रही। ऐसे में  वित्तीय अनुशासन तभी संभव होगा जब जनता के स्तर पर भी उसे आत्मसात किया जाए। उक्त अपील को अर्थव्यवस्था में गिरावट  मान लेना जल्दबाजी है। बुद्धिमत्ता यही है कि सूझबूझ से  भावी चुनौतियों के लिए तैयार रहा जाए। श्री मोदी ने आम जनता से केवल अपील की है जिसे पाबंदी नहीं कहा जा सकता। ये वैसा ही है जब खाद्यान्न संकट से निपटने के लिए 1965 में स्व. लालबहादुर शास्त्री ने जनता से सोमवार का सायंकालीन भोजन त्यागने की अपील की थी।  उस अपील का बड़ी संख्या में लोगों ने स्वेच्छा से पालन किया। श्री मोदी की अपील भी वर्तमान परिस्थितियों से लड़ने का सुझाव है जिसे मानना या न मानना लोगों पर निर्भर करता है । दुनिया के अनेक देशों में संकट के समय सरकार जनता से इसी तरह का सहयोग मांगती हैं। चीन जैसे देशों में तो ऐसी अपील का अर्थ ही हुक्मनामा होता है। लेकिन भारत में लोकतंत्र होने से सरकार लोगों से हालात के अनुरूप आचरण की अपेक्षा करती है।  अतीत में भी अनेक बार सरकार ने जनता से सहयोग मांगा और लोगों ने खुलकर  दिया भी। 1962 में चीनी हमले के समय  बनाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कोष में साधारण नागरिकों तक ने सोना दान किया था । महिलाओं ने भी अपने आभूषण सहर्ष प्रदान किए जिससे सेना के लिए हथियार आयात किए जा सकें। उसके बाद आए किसी भी राष्ट्रीय संकट में जनता सरकार के साथ खड़ी रही। वर्तमान परिस्थिति बेहद पेचीदा है। जिसमें भारत ही नहीं समूचा विश्व उलझ गया है। आने वाले दिनों में क्या होने वाला है उसका पक्का अंदाज कोई नहीं लगा पा रहा। ऐसे में उचित यही होगा कि हम अभी से मानसिक और आर्थिक तौर पर मुकाबले के लिए तैयार रहें। प्रधानमंत्री ने जो कुछ कहा उस पर राष्ट्रहित को दृष्टिगत रखकर सोचना ही उचित होगा क्योंकि जब देश पर संकट आता है तब निजी और राजनीतिक हित महत्वहीन हो जाते हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 13 May 2026

नीट परीक्षा : मंत्री और आला अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय हो


नीट नामक परीक्षा के पेपर लीक हो जाने की  आशंका के चलते विगत 3 मई  को हुई परीक्षा को रद्द कर दिया गया। अब जल्द ही इसकी अगली तारीख घोषित की जाएगी। नीट का  पूरा नाम नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट है। हिंदी में इसे राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा कहा जाता है। यह परीक्षा एन.टी.ए (नेशनल टेस्टिंग एजेसी) द्वारा आयोजित होती है। भारतीय चिकित्सा परिषद (मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया) और भारतीय दन्त परिषद (डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया) की मंजूरी से देश भर में चल रहे मेडिकल और डेंटल कॉलेजों (सरकारी या निजी) के एमबीबीएस , बीडीएस , आयुष , पशु वेटनरी  पाठ्यक्रमों में प्रवेश इसी परीक्षा के परिणाम के आधार पर होता है। वर्ष 2024 में भी परीक्षा के चलते हुए ही पेपर लीक होने की शिकायत मिलने पर उसे रद्द किया गया था।  इस साल  परीक्षा हो जाने के 10 दिन बाद उसे रद्द किया गया।  मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई है। सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएं भी लगी हैं जिनमें मांग है कि आगे से ये परीक्षा न्यायालय की  निगरानी में आयोजित की जावे क्योंकि परीक्षार्थियों का एन. टी. ए से भरोसा उठ गया है। परीक्षा का रद्द होना सरकार और संबंधित विभाग के लिए भले ही सामान्य बात हो लेकिन उन लाखों बच्चों के लिए ये बहुत बड़ा धक्का होता है जो अथक परिश्रम करते हुए परीक्षा की तैयारी करते हैं। साथ ही उनके अभिभावकों के लिए भी परीक्षा का रद्द हो जाना दर्दनाक अनुभव है जो  गाढ़ी कमाई अपने नौनिहालों का भविष्य संवारने के लिए कोचिंग आदि पर व्यय करते हैं। पेपर लीक करने वालों ने इस बार गैस पेपर का सहारा लिया। बहरहाल जांच एजेंसियों द्वारा गिरफ्तारियों का दौर शुरू हो चुका है। इस कांड के तार कहां - कहां और किस - किससे जुड़े हुए हैं इसका कुछ - कुछ पर्दाफाश तो हो चुका है। सीबीआई की जांच के बाद ही स्पष्ट  हो सकेगा कि पेपर लीक होने के पीछे कौन - कौन लोग हैं ? लेकिन बिना जांच के भी ये कहा  जा सकता है कि परीक्षा से प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर जुड़े  सरकारी विभाग या संस्थान इस घोटाले के लिए कसूरवार हैं क्योंकि ऐसी परीक्षाओं के प्रश्न पत्रों की गोपनीयता बनाए रखने के लिए पुख्ता व्यवस्था की जाती है। ऐसे में शक की सुई प्रथम दृष्टया तो विभागीय अमले की ओर ही घूमती है। ये बात भी शत - प्रतिशत सत्य हैं कि ऐसे कांडों में मोटा आर्थिक लेनदेन होता है । सूचना क्रांति के इस दौर में किसी दस्तावेज की एक प्रति को पलक झपकते ही पूरी दुनियां में प्रेषित किया जा सकता है। सवाल ये है कि सर्वोच्च न्यायालय उन याचिकाओं पर क्या फैसला करता है जिनमें  एन. टी.ए पर अविश्वास जताते  आग्रह किया गया है कि वह इस परीक्षा को अपनी निगरानी में आयोजित करे। हालांकि ऐसा होना व्यवहारिक नहीं होने से संभव नहीं है किंतु केंद्र सरकार की तमाम उपलब्धियों पर नीट परीक्षा के  प्रश्नपत्र लीक हो जाने से सवालिया चिन्ह लग गए हैं। एक बार जब ये हादसा हो चुका हो तब प्रश्नपत्र की गोपनीयता बनाए रखने के अचूक इंतजाम क्यों नहीं किए गए इसका उत्तर मिलना चाहिए। और यदि किए गए तब चूक कहां और कैसे हुई इसका खुलासा जल्द हो। रद्द हुई परीक्षा को जल्द आयोजित किए जाने के आश्वासन के साथ ये गारंटी भी मिलनी चहिए कि पेपर लीक होने की घटना दोहराई नहीं जा सकेगी। जिन अपराधियों और लालची विभागीय लोगों ने लाखों बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करने का पाप किया उन्हें इतनी कड़ी सजा दी जाए जिससे भविष्य में अन्य कोई भी ऐसा दुस्साहस न करे। हालांकि अपराधी तो अदालत से दंडित हो जाएंगे किंतु जिस विभाग द्वारा उक्त परीक्षा का संचालन होता है उसके मंत्री और दिग्गज प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी  तय होना भी जरूरी है। ऊंचे ओहदे पर विराजमान यह वर्ग किसी भी अच्छे काम का श्रेय लूटने में तो आगे - आगे दिखाई देता है लेकिन घपले और घोटाले की जिम्मेदारी दूसरों पर थोपकर दाएं - बाएं हो लेता है।। पिछली बार जब नीट का प्रश्न पत्र लीक हुआ था तभी से उसकी पुनरावृत्ति रोकने के बारे में गंभीरता बरती जाती तब ये दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति पैदा नहीं होती। होना तो ये चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  खुद होकर संबंधित मंत्री और आला अधिकारियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई  करें। अन्यथा न जाने कितने युवाओं के सपने इस भ्रष्ट और निकम्मी व्यवस्था के चलते मिट्टी में मिलते रहेंगे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 12 May 2026

विपक्षी एकता झमेले में: तीसरे मोर्चे के पुनर्जन्म की अटकलें


तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी नाटकीयता का अनुभव होने लगा है। अभिनेता  विजय,  कांग्रेस और वामपंथियों सहित एक - दो अन्य विधायकों का समर्थन मिलने से  बहुमत की देहलीज तो पार कर गए लेकिन  खतरे खत्म नहीं हुआ।  कांग्रेस द्वारा   विजय को समर्थन देने से द्रमुक की नाराजगी खुलकर सामने आ गई जब पार्टी ने संसद में अपने सांसदों को कांग्रेस से अलग बिठाने का पत्र भेज दिया। दरअसल  समर्थन देने से पहले राहुल गांधी या पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने द्रमुक या इंडिया गठबंधन से बातचीत नहीं की। साथ ही दोनों विजय के शपथ ग्रहण में भी शामिल हुए। उल्लेखनीय है चुनाव प्रचार के दौरान श्री गांधी का ये बयान काफी चर्चित हुआ था कि राजनीतिक नेताओं में केवल स्टालिन ( पूर्व मुख्यमंत्री) ही हैं जिन्हें वे भाई कहते हैं। शायद इसलिए शपथ के बाद अपने भाषण में विजय ने राहुल को भाई कहकर संबोधित किया। बहरहाल विजय को समर्थन देकर कांग्रेस ने तमिलनाडु में नए समीकरण बनाने का जो दांव चला उसे श्री गांधी के राजनीतिक चातुर्य और सफलता के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है। लेकिन गहराई से देखें तो 22 लोकसभा और 10 राज्यसभा सांसदों वाले द्रमुक को छोड़कर विजय की नई नवेली पार्टी से गठबन्धन कौन सी बुद्धिमत्ता है इसका उत्तर नहीं मिल रहा। स्मरणीय है पिछले लोकसभा चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन पूरी तरह सुप्तावस्था में चला गया। उसके बाद हुए विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में उसके घटक दल एक दूसरे के विरुद्ध मैदान में उतरे। हरियाणा से शुरू हुआ सिलसिला हालिया चुनावी मुकाबलों में भी दिखा। प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस और वामपंथी अलग - अलग लड़े। इसी तरह केरल में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और वामपंथियों के बीच ही रहा। प. बंगाल के बारे में श्री गांधी का वह बयान काफी चर्चित हुआ कि ममता बैनर्जी के कुशासन के कारण ही भाजपा को इस राज्य में पांव जमाने का मौका मिला। लेकिन उनके पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है कि तृणमूल सरकार की गलत नीतियों का लाभ कांग्रेस क्यों नहीं उठा सकी? चुनाव के बाद सुश्री बैनर्जी ने 100 सीटें उनसे छीने जाने का जो आरोप चुनाव आयोग पर लगाया उसके समर्थन में तो श्री गांधी कूद पड़े किंतु उन्हें ये तथ्य भी स्वीकार करना चाहिए कि भाजपा विरोधी मतों में बंटवारा करने के लिए कांग्रेस और वामपंथी भी बराबर के दोषी हैं। करारी हार के बाद ममता ने     विपक्षी एकता की मजबूती के लिए काम करने की प्रतिबद्धता दर्शाई किंतु ये कहना भी गलत नहीं होगा कि इंडिया गठबंधन की मिट्टी पलीत करने के लिए वे भी कम दोषी नहीं हैं। इस गठबंधन में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की बड़ी भूमिका थी।। लेकिन जब उनको संयोजक बनाने का प्रस्ताव आया तब सुश्री बैनर्जी ने पुरजोर विरोध किया। परिणामस्वरूप नीतीश ने भाजपा के साथ गठजोड़ कर लिया। यदि ममता ने वह अड़ियलपन न दिखाया होता तो बड़ी बात नहीं केंद्र में गैर भाजपाई सरकार बनी होती। प. बंगाल में भी उन्होंने गठबंधन के अन्य दलों के लिए लोकसभा सीट छोड़ने से इंकार कर दिया।  उसके बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के समर्थन भी प्रचार करने सांसद शत्रुघ्न सिन्हा को भेजा। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी अरविंद केजरीवाल के पक्ष में सभाएं लीं। लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा ने जबरदस्त वापसी करते हुए हरियाणा , महाराष्ट्र  , बिहार, असम , और पुडुचेरी में जहां अपनी सत्ता बचाकर रखी वहीं विपक्ष के मजबूत स्तम्भ माने जा रहे अरविंद केजरीवाल और ममता बैनर्जी का वर्चस्व तोड़कर क्रमशः दिल्ली और प. बंगाल में सरकार बना ली और वह भी भारी बहुमत के साथ। हालांकि कांग्रेस ने केरल जीतकर एक उपलब्धि अपने खाते में भी दर्ज कर ली लेकिन वह भी इंडिया गठबंधन के घटक वामपंथियों को हराकर। आज तमिलनाडु में हुए बड़े उलटफेर में अन्ना द्रमुक के लगभग 30 विधायकों ने विजय सरकार को समर्थन देने का ऐलान कर कांग्रेस को चौंका दिया क्योंकि इसके बाद विजय सरकार के पास सुविधाजनक बहुमत होने से कांग्रेस का दबाव खत्म हो गया। कुल मिलाकर विपक्ष की एकता दूर की कौड़ी बनी हुई है। उ.प्र के चुनाव में अखिलेश आम आदमी पार्टी से नजदीकियाँ बढ़ा रहे हैं। वहीं चुनाव हारने के बाद कोलकाता जाकर सुश्री बैनर्जी से मिलकर अपनी सहानुभूति व्यक्त कर आए। स्मरणीय है श्री केजरीवाल और श्री यादव ने कांग्रेस को ठेंगा दिखाते हुए तृणमूल कांग्रेस का प्रचार किया था। ये सब देखते हुए निकट भविष्य में होने वाले चुनावी मुकाबलों में भी विपक्षी एकता की संभावनाएं नगण्य ही हैं। पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस में सांप और नेवले जैसा बैर है। गुजरात में भी यही स्थिति है। उ.प्र में अखिलेश भी इस बार कांग्रेस से दूरी बनाकर चलना चाह रहे हैं क्योंकि वह अपनी ताकत से ज्यादा मांग करती है। सही बात ये है कि लोकसभा चुनाव में 99 सीटें जीतकर राहुल गांधी की वजनदारी राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ने लगी थी किंतु उसके बाद भी चुनावों में उनका प्रदर्शन बहुत ही दयनीय रहा। केरल की जीत भी स्थानीय कारणों से हुई। इसीलिए ये कहना गलत नहीं होगा कि विपक्षी एकता में कांग्रेस सबसे बड़ी बाधक है क्योंकि एक तो गांधी परिवार श्रेष्ठता के भाव से बाहर निकलने तैयार नहीं है वहीं ज्यादातर विपक्षी दल राहुल गांधी के नेतृत्व में काम करने से कतराते हैं। इसका परिणाम तीसरे मोर्चे के पुनर्जन्म के रूप में हो तो आश्चर्य नहीं होगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 11 May 2026

सोमनाथ का अमृत महोत्सव: हिन्दू नव जागरण का प्रतीक


आजादी के बाद जब महमूद गजनवी द्वारा  तोड़े गए सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की बात उठी तब  पं. जवाहरलाल नेहरू ने उस पर सरकारी खर्च करने का विरोध किया। हालांकि सरदार पटेल जिन्होंने उसके निर्माण का आदेश दिया था वे टस से मस नहीं हुए और जनता से 25 लाख चंदा एकत्र कर काम शुरू किया। उनकी मृत्यु के बाद नेहरू सरकार में मंत्री, प्रख्यात शिक्षाविद् कन्हैयालाल माणिकलाल  मुंशी की देखरेख में मंदिर को दोबारा भव्य स्वरूप प्रदान किया गया। लेकिन 11 मई 1951को उसमें शिवलिंग की स्थापना समारोह में जाने से पं. नेहरू ने ये कहते हुए इंकार कर दिया कि उन्हें  मंदिर का पुनर्निर्माण पसंद नहीं क्योंकि यह हिन्दू पुनरुत्थानवाद है। यही नहीं उन्होंने राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भी सोमनाथ मंदिर जाने से रोका किंतु वे नहीं माने और उस समारोह में शामिल हुए। उस आयोजन के आज 75 वर्ष पूर्ण होने पर भव्य अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  इस ऐतिहासिक अवसर के साक्ष्य बने। बड़ी बात नहीं धर्म निरपेक्षता के झंडा बरदारों की आंखों में यह अमृत महोत्सव  उसी तरह खटके जैसे अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण उन्हें आज तक बर्दाश्त नहीं हुआ। जनेऊधारी ब्राह्मण और शिवभक्त होने का दावा करने वाले राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अभी तक अयोध्या के राम मंदिर जाने की जरूरत नहीं समझी क्योंकि मुस्लिम मतदाताओं की नाराजगी का डर उन्हें नींद में भी सताता है। लेकिन सोमनाथ जैसे मंदिर क्या केवल सनातन धर्म की धरोहर हैं ? महमूद गजनवी ने उस मंदिर को ध्वस्त कर केवल किसी एक धर्म को नहीं बल्कि भारत की अस्मिता को चोट पहुंचाई थी। सरदार पटेल ने जब उसके पुनरुद्धार की पहल की तब पं. नेहरू ने  उसका जो विरोध किया वह धर्म निरपेक्षता नहीं अपितु मुस्लिम तुष्टीकरण था। इस  तरह देश का विभाजन जिस मानसिकता ने किया उसे ही प्रश्रय देने की गलती उन्होंने दोहराई। दुर्भाग्य से उनके वैचारिक उत्तराधिकारी भी उसी परिपाटी पर चलते हुए धर्म निरपेक्षता का अर्थ मुस्लिम परस्ती लगा बैठे। मुसलमानों के मत इकतरफा बटोरने के इस फॉर्मूले ने कई दशकों तक अनेक दलों को राजनीतिक लाभ पहुंचाया किंतु समय बीतने के साथ इसकी प्रतिक्रिया हिंदू समाज में भी होने लगी जो असम और प. बंगाल के  हालिया चुनाव में  साफ नजर आई। इसे लेकर सेकुलर जमात चिंतित है किंतु  बहुत पुरानी बात नहीं जब कांग्रेस को ये लगा कि भाजपा से निपटने के लिए उसे भी हिन्दू जनमानस में अपनी जगह बनानी चाहिए। इसके बाद पार्टी के एक प्रवक्ता ने राहुल गांधी को ब्राह्मण साबित करते हुए उनका गोत्र तक बता दिया। उसके बाद  श्री गांधी मंदिरों और मठों में परम्परागत परिधान धारण कर पूजा - अर्चना करते देखे गए। उनकी अनुजा प्रियंका वाड्रा भी हिन्दू मंदिरों में मत्था टेकने लगीं। लेकिन मतदाताओं पर समुचित प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि उनका उद्देश्य विशुद्ध राजनीतिक था। हालांकि ये भी कहा जा सकता है कि भाजपा भी तो चुनाव जीतने के लिए हिंदुत्व का ढोल बजाती है किंतु  नरेंद्र मोदी और राहुल गाँधी के मंदिर जाने में जमीन - आसमान का अंतर है। और जिस दिन कांग्रेस सहित सेकुलर कहलाने वाले  राजनीतिक दल इस अंतर को समझ जाएंगे उस दिन हिन्दू समाज के बीच उनकी छवि सुधर जाएगी। हालिया चुनावी मुकाबलों में असम और प.बंगाल में हुए हिन्दू ध्रुवीकरण को खतरा बताकर छाती पीटने वाले  तब मौन रहते थे जब जाति और धर्म आधारित एम - वाय (मुस्लिम - यादव) को जीत की गारंटी मानकर प्रचारित किया जाता था। प. बंगाल में मुस्लिम मतदाताओं का भाजपा के विरोध में गोलबंद होना दीवार पर लिखी इबारत थी। उसकी प्रतिक्रिया हिन्दू गोलबंदी के रूप में इसी चुनाव में क्यों देखने मिली उसका सीधा - सीधा उत्तर ये है कि  वहां तुष्टीकरण  चरमोत्कर्ष पर जा पहुंचा। तृणमूल सांसद और प. बंगाल की सबसे चर्चित चुनाव प्रचारक सायोनी घोष ने कहा कि अभी उनकी पार्टी के इतने बुरे दिन नहीं आए जो जय श्री राम जैसे  राजनीतिक नारे का सहारा ले किंतु चुनावी मंचों पर वे हमारे दिल में काबा, लबों पे मदीना गाकर मुस्लिम तुष्टीकरण में जुटी रहीं। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि उनके उस गायन ने हिन्दू जनमानस को एकजुट होकर मतदान करने उद्वेलित किया। पता नहीं इस देश के सेकुलर वादियों को ये अक्ल कब आएगी कि सोमनाथ और अयोध्या के मंदिर केवल सनातन  की आस्था के ही नहीं अपितु राष्ट्रीय स्वाभिमान के जीवंत प्रतीक हैं। दुर्भाग्य से आजादी के बाद हमारे देश की समृद्ध संस्कृति और गौरवशाली आध्यात्मिक विरासत के प्रति जो उपेक्षा भाव रखा गया उसके विरुद्ध पनपा असंतोष  अब मुखर हो चला है। इसे हिन्दू पुनरुत्थान कहें या नव जागरण किंतु सदियों बाद ये दौर लौट रहा है। सोमनाथ मंदिर का अमृत महोत्सव उसी का प्रतीक है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 9 May 2026

बंगाल आज जो सोचता है वही कल पूरा देश सोचेगा


प. बंगाल के लिए आज का दिन वाकई ऐतिहासिक है। भाजपा के वैचारिक पूर्वज  जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के गृह प्रदेश में  इस राष्ट्रवादी विचारधारा का हाशिए पर रहना चौंकाता था। पहले कांग्रेस और उसके बाद वामपंथियों ने यहां लंबे समय तक शासन किया। उसके बाद 2011 में ममता बैनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस नामक पार्टी ने वामपंथियों के किले को ध्वस्त करते हुए  नई शुरुआत की। कांग्रेस से राजनीति  शुरू करने वाली ममता ने जब देखा कि उनकी पार्टी वामपंथियों से लड़ने में अनिच्छुक है तब उन्होंने बगावत की और  आखिरकार उस राइटर्स बिल्डिंग पर अपना परचम लहरा दिया जहां से उन्हें अपमानित कर निकाल दिया गया था। उम्मीद थी कि वे बंगाल को उस अराजक स्थिति से निकालकर भद्र लोक के दौर में वापस ले जायेंगी। उल्लेखनीय है बंगाल में ही नक्सलवाद जैसे आतंक का जन्म हुआ था। इसके अलावा वामपंथियों ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए बांग्लादेश से आए घुसपैठियों को  मतदाता बनवाकर जनसंख्या असंतुलन उत्पन्न कर दिया। वामपंथियों के शासन में पार्टी कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी चरम पर थी। कांग्रेस उसका मुकाबला करने की बजाय आत्मसमर्पण कर चुकी थी। ऐसे में जब ममता का उदय हुआ तब लगा वे उस दुरावस्था को दूर करेंगी किंतु जल्द ही वे भी उसी संस्कृति में ढल गईं। स्मरणीय है जो गुंडातंत्र वामपंथियों की मैदानी ताकत हुआ करता था उसी के विरोध में बंगाल की जनता ने सुश्री बैनर्जी को सत्ता सौंपी थी किंतु जल्दी ही वही गुंडे तृणमूल कांग्रेस के हिस्से बन गए और उसके बाद जो हुआ वह वामपंथी सरकार के दौर से भी बुरा अनुभव रहा। लेकिन जिस तरह वामपंथियों से लड़ने में कांग्रेस असमर्थ साबित हुई ठीक उसी तरह उसने ममता सरकार के विरुद्ध भी अपनी लाचारी दिखाई। धीरे - धीरे मार्क्सवादी भी हाशिए पर चले गए। इस शून्य को भरने के लिए कमर कसी भाजपा ने। लेकिन वामपंथी सरकार के समय राष्ट्रवादी विचारधारा पर जो दमनचक्र चला उसने ममता राज में और भी वीभत्स रूप ले लिया। बतौर मुख्यमंत्री उन्होंने जिस तरह वामपंथियों और कांग्रेस को मुख्यधारा से बाहर फेंका उससे उन्हें ये गुमान हो चला कि अब वे पूरी तरह चुनौती विहीन हो चली हैं। साधारण सूती साड़ी और हवाई चप्पल उनकी पहचान थी किंतु धीरे - धीरे वे उन सभी विकृतियों से घिरती चली गईं जिनके कारण बड़े - बड़े सत्ताधीश जनता की नजरों से गिरकर इतिहास की गहरी खाई में समा गए। प.बंगाल में हुआ राजनीतिक परिवर्तन किसी तात्कालिक घटना की प्रतिक्रिया नहीं अपितु एक लंबे वैचारिक संघर्ष की सफल परिणिति है। देशवासियों को ये बात भूलनी नहीं चाहिए कि देश के विभाजन की नींव इसी बंगाल से पड़ी थी। विभाजन के उस दौर में पूरे राज्य में मुस्लिम गुंडों ने जो अत्याचार किया उस पर कांग्रेस और वामपंथियों ने पर्दा डाल रखा था। ममता भी उसी राह पर चलीं। लेकिन समय चक्र हमेशा एक समान नहीं रहता। आखिर जनता के मन में ये बात बैठने लगी कि भाषा , संस्कृति और खाना - पान जैसे सतही विषयों में उसे उलझाकर सत्ता में बैठे तत्व देश की सुरक्षा और अखंडता का सौदा कर रहे हैं। 4 मई को ईवीएम से निकला जनादेश वह आक्रोश था जो मन में होने पर भी  भयवश व्यक्त नहीं हो पा रहा था। भाजपा ने बीते 10 वर्षों में प. बंगाल के मतदाताओं को इस बात के प्रति आश्वस्त किया कि वह  न केवल उनकी बल्कि शत्रु देशों से सटी सीमाओं की सुरक्षा भी करेगी। प. बंगाल को बदहाली से निकालकर सोनार बांग्ला की स्थिति में ले जाने का जो वायदा नरेंद्र मोदी ने किया और उनके दाहिने हाथ अमित शाह ने लोगों को भयमुक्त होकर बदलाव के अभियान में शामिल होने के लिए प्रेरित किया उसके कारण आज वहां हिन्दू राष्ट्रवाद का उद्घोष संभव हो सका। ये चुनाव केवल सत्ता बदलने तक सीमित न रहे ये देखना उन लोगों का दायित्व है जो इस वैचारिक क्रान्ति के आधारस्तम्भ हैं। सुवेंदु अधिकारी को प. बंगाल की जनता के विश्वास की रक्षा का जो दायित्व आज मिला है उसे उन्हें प्राण - प्रण से निभाना होगा। प. बंगाल की भौगोलिक स्थिति राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। आर्थिक स्थिति भी दयनीय है और कानून व्यवस्था अराजकता का पर्याय है। ऐसे में प. बंगाल की सत्ता भाजपा और सुवेंदु दोनों के लिए कठिन चुनौती है। इस बदलाव का राष्ट्रीय राजनीति पर दूरगामी असर पड़े बिना नहीं रहेगा। योगी और हिमंता के बाद सुवेंदु देश में हिंदूवादी राजनीति के नए चेहरे होंगे। जिन लोगों को इस चुनाव में हुआ हिन्दू ध्रुवीकरण हजम नहीं हो रहा उन्हें ये सोचना चाहिए कि देश का बहुसंख्यक वर्ग अब तुष्टीकरण के नाम पर चल रहे वोटों के व्यापार को रोकने स्वप्रेरणा से लामबंद हो रहा है। इसे रोकने के लिए जितने भी प्रपंच रचे जाएंगे उनका अपनी मौत मरना सुनिश्चित है। एक जमाने में कहा जाता था कि बंगाल आज जो सोचता है वही कल पूरा देश सोचेगा। आध्यात्मिक, बौद्धिक और राजनीतिक क्रांति की इस भूमि पर जो राजनीतिक परिवर्तन आज साकार हुआ उसे भविष्य का संकेत कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 8 May 2026

तमिलनाडु में राजनीतिक अस्थिरता का खतरा


4 मई को चुनाव परिणाम के बाद तमिलनाडु की राजनीति बुरी तरह उलझ गई है। सत्तारूढ़ पार्टी द्रमुक और मुख्य विपक्षी अन्ना द्रमुक को पीछे छोड़ते हुए तमिल अभिनेता जेम्स विजय की  पार्टी टीवीके 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ा दल बन गई। शुरुआत में लगा कि बहुमत के लिए जरूरी 10 सीटें उसे आसानी से मिल जाएंगी। कांग्रेस ने अपने 5 विधायकों के समर्थन का पत्र सौंपकर उसकी संभावनाएं बढ़ा दीं। लेकिन राज्यपाल ने सरकार बनाने के उनके दावे को ठुकराते हुए  118 विधायकों के समर्थन के प्रमाण मांगकर अड़ंगा लगा दिया। मुख्यमंत्री स्टालिन खुद भी विधानसभा चुनाव हार गए इसलिए उनकी  पार्टी द्रमुक द्वारा विजय का साथ देना अस्वाभाविक ही था। लेकिन उनको बड़ा धक्का तब लगा जब  साथ में चुनाव  लड़ी कांग्रेस ने  पूछे बिना ही विजय को समर्थन दे दिया। उधर भाजपा का साथ नहीं लेने की उनकी घोषणा के कारण अन्ना द्रमुक का समर्थन मुश्किल है जिसका भाजपा से गठबंधन है। उसी के बाद  आशंका व्यक्त की जाने लगी कि द्रमुक और अन्ना द्रमुक के कुछ विधायक तोड़कर विजय बहुमत की व्यवस्था कर लेंगे। कुछ छोटे दलों से समर्थन मिलने की चर्चा भी सुनाई दी किन्तु इन पंक्तियों के लिखे जाने तक  पेच फंसा हुआ है। राज्यपाल दो बार विजय से  कह चुके हैं कि  118 विधायकों के समर्थन के बगैर वे उन्हें सरकार बनाने के लिए नहीं बुलाएंगे। इस उहापोह के बीच एक असम्भव सी लगने वाली बात राजनीतिक गलियारों में फैली जिसके अनुसार विजय का रास्ता रोकने के लिए द्रमुक और अन्ना द्रमुक दशकों पुरानी शत्रुता को भूलकर एक साथ आएंगे।  ऐसा होने  पर दोनों के क्रमशः 73 और 53 विधायक मिलकर 126 हो जाएंगे जो बहुमत से 8 ज्यादा हैं। ये भी कहा जा रहा है कि राज्यपाल द्वारा विजय को मुख्यमंत्री नहीं बनने देने के पीछे भाजपा का दबाव है। दरअसल पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व प. बंगाल और असम में सरकार बन जाने के बाद ही तमिलनाडु की गुत्थी सुलझाना चाह रहा है। स्टालिन और अन्ना द्रमुक के शीर्ष नेता के बीच लंबी चर्चा के दावे भी किए जा रहे हैं। यद्यपि दोनों पार्टियां इस बारे में बोलने से कतरा रही हैं।  कुल मिलाकर अब तक गतिरोध बना हुआ है। ऐसी स्थितियों में राज्यपाल के अधिकार और भूमिका को लेकर भी विमर्श शुरू हो गया है। विजय का दावा है  सबसे बड़ा दल होने के कारण राज्यपाल को उन्हें सरकार बनाने का अवसर देते हुए सदन में बहुमत साबित करने का निर्देश देना चाहिए।  यद्यपि संविधान में बहुमत शब्द का ही उल्लेख है। उस दृष्टि से राज्यपाल अपनी जगह सही हैं। दूसरी तरफ  ये भी  देखने में आया है कि स्पष्ट बहुमत नहीं होने पर भी सबसे बड़ी पार्टी के नेता को राज्यपाल सदन में बहुमत साबित करने की शर्त पर मुख्यमंत्री नियुक्त कर देते हैं। इस संबंध में कर्नाटक का उदाहरण दिया जा रहा है जहां कुछ वर्ष पूर्व  भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी किंतु उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। बावजूद उसके राज्यपाल ने उसके नेता येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री बना दिया किंतु सदन में बहुमत साबित नहीं कर पाने के कारण उन्हें गद्दी छोड़नी पड़ी। उ.प्र में भी कई दशक पहले राज्यपाल रोमेश भंडारी ने बिना बहुमत के जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बना दिया किंतु वे भी बहुमत साबित न कर पाए । उक्त दोनों मामलों में राज्यपाल की भूमिका आलोचना का पात्र बनी। हो सकता है तमिलनाडु के राज्यपाल भी अल्पमत  सरकार बनवाने के आरोप से बचना चाह रहे हों। ये बात सही है कि यदि वे स्पष्ट बहुमत के बिना विजय को मुख्यमंत्री बना देते हैं तब जोड़ - तोड़ और खरीद फरोख्त से इंकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस के अलावा वामपंथी और कुछ छोटी पार्टियों के इक्का - दुक्का विधायकों को द्रमुक और अन्ना द्रमुक गठबंधन से तोड़ने के बाद भी उनकी सरकार पर खतरे की तलवार लटकती रहेगी। ऐसे में पहले ही स्पष्ट बहुमत हासिल करना राजनीतिक स्थिरता के लिए बेहतर विकल्प है।    देखना ये है कि विजय सत्ता की देहलीज पर आकर भी बाहर ही खड़े रह जाएंगे और  द्रविड़ आंदोलन से निकली द्रमुक और अन्ना द्रमुक पुरानी दुश्मनी भूलकर विजय के सपनों पर पानी फेर देंगी। रोचक बात ये है कि दोनों राष्ट्रीय पार्टियां भाजपा और कांग्रेस अपने दम पर इस गुत्थी को सुलझाने में असमर्थ हैं क्योंकि उनके पास अंगुलियों पर गिनने लायक विधायक हैं। इधर विजय धमकी दे रहे हैं कि द्रमुक और अन्नाद्रमुक की सरकार बनी तो उनके 108 विधायक त्यागपत्र दे देंगे। हालांकि ये बहुत ही अव्यवहारिक कदम होगा और क्या पता सभी विधायक इसके लिए तैयार न हों और पार्टी ही टूट जाए। कुल मिलाकर तमिलनाडु का जनादेश बहुत ही पेचीदा है। आखिरकार सरकार किसी न किसी की तो बनेगी किन्तु उसका स्थायित्व हमेशा खतरे में रहेगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 6 May 2026

करारी हार के बाद भी त्यागपत्र न देना दिमागी दिवालियापन


कोई अनुभवहीन व्यक्ति  कहे तो समझ में आता है लेकिन कई बार केंद्र में मंत्री  और 15 सालों तक प. बंगाल जैसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री रह चुकीं ममता बैनर्जी द्वारा चुनावों में मिली करारी हार के बाद भी त्यागपत्र नहीं देने की घोषणा को दिमागी दिवालियापन ही कहा जाएगा। इस चुनाव में सुश्री बैनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस बहुमत से काफी पीछे रह गईं। वे स्वयं भी भवानीपुर की अपनी सीट पर 15 हजार  से हार गईं। सामान्य तौर  प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री अपनी पार्टी को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में शालीनता के साथ जनादेश को स्वीकार करते हुए राष्ट्रपति या राज्यपाल के पास जाकर अपना त्यागपत्र सौंप देता है। लेकिन उसे नई सरकार के बनने तक काम चलाऊ तौर पर पद पर  रहने कहा जाता है। अतीत में जब भी किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की पार्टी जनादेश हासिल करने में विफल रही तब उन्होंने त्यागपत्र देने में संकोच नहीं किया। दरअसल ये किसी कानून से अधिक लोकतांत्रिक मर्यादा और नैतिकता से प्रेरित आचरण है। गत दिवस  सुश्री बैनर्जी ने जो आरोप चुनाव आयोग, भाजपा और केंद्र सरकार पर लगाए वे अपनी जगह हैं। चुनाव में हुई गड़बड़ी की शिकायत याचिकाओं के जरिए न्यायालय में की जा सकती है। लेकिन चुनाव हारने के बावजूद पद नहीं छोड़ने की जिद का कोई औचित्य नहीं है। इसीलिए अन्य विपक्षी दलों और नेताओं तक ने उनकी हेकड़ी का समर्थन नहीं किया। उल्टे अनेक भाजपा विरोधी यू ट्यूबर पत्रकार भी उनके इस गैर जिम्मेदाराना फैसले की आलोचना करते सुने गए। जहां तक बात संवैधानिक प्रावधानों की है तो चुनाव आयोग द्वारा नई विधानसभा के लिए चुने  सदस्यों की सूची राज्यपाल को भेजे जाने के बाद उसके गठन की  अधिसूचना राजपत्र के जरिए जारी होते ही पुरानी विधानसभा अस्तित्वहीन हो जाती है। इसी के साथ ही राज्यपाल बहुमत प्राप्त दल के निर्वाचित नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त  कर शपथ हेतु आमंत्रित करते हैं।  ममता बैनर्जी इतना तो जानती ही होंगी कि निवर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 7 मई तक ही है। ऐसे में वे त्यागपत्र न दें तब  भी राज्यपाल नए मुख्यमंत्री की नियुक्ति कर  शपथ दिलवा सकते हैं। तब तक सुश्री बैनर्जी सहानुभूति बटोरने का कितना भी प्रयास करें किंतु उन्हें सफलता नहीं मिलेगी। बेहतर होता वे  जनादेश को गरिमा के साथ स्वीकार करते हुए राज्यपाल से मिलकर पद से हटने की पेशकश करतीं किंतु जिद्दी स्वभाव के लिए प्रसिद्ध सुश्री बैनर्जी ने हार की खीज में त्यागपत्र नहीं देने की घोषणा कर खुद को हँसी और आलोचना  का पात्र बना लिया। उन्होंने विपक्षी एकता के लिए काम करने की बात भी कही है । लेकिन वे भूल गईं कि इंडिया गठबंधन जिस दुर्दशा का शिकार है उसके लिए वे  भी जिम्मेदार हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस और वामपंथी दलों को मात्र 2 सीटें देने का प्रस्ताव दिया। बाद में कांग्रेस और वामपंथियों ने गठबंधन किया। उसके पहले गोवा विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी खड़े कर कांग्रेस का नुकसान भी वे करवा चुकी थीं। दिल्ली में उन्होंने कांग्रेस की बजाय आम आदमी पार्टी को समर्थन दिया। इस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच लगभग 5 फीसदी का अंतर है। लेकिन कांग्रेस , वामपंथी और अन्य मिलकर 12- 13 प्रतिशत मत बटोर ले गए। यदि  वे सबको एकजुट कर भाजपा विरोधी मोर्चा बनातीं तब चुनाव परिणाम कुछ और हो सकता था । सुश्री बैनर्जी के पास अपनी बात रखने के लिए कानून सम्मत अनेक विकल्प हैं। लेकिन लगता है सत्ता के सान्निध्य में रहने से अब उनमें संघर्ष की हिम्मत नहीं रही। और फिर उनके अस्थिर स्वभाव के कारण अन्य दलों के नेतागण भी उनसे छिटकते हैं। सच  तो ये  है कि उनकी  पराजय से कांग्रेस और वामपंथियों के अलावा अन्य दलों में भी प्रसन्नता है क्योंकि विपक्षी एकता में वे बड़ा रोड़ा थीं। दरअसल राष्ट्रीय नेता बनने की महत्वाकांक्षा होने से वे किसी और को बर्दाश्त नहीं करना चाहतीं। राहुल गांधी की नेतृत्वक्षमता पर भी वे कई बार उंगली उठा चुकी हैं। विपक्षी गठबंधन का नेता बनने के लिए समानान्तर रूप से वे तमाम विपक्षी नेताओं से भी मिलीं किंतु कामयाब नहीं हुईं। अब जबकि उनका बनाया  ढांचा बुरी तरह ढह चुका है और अपने ही राज्य में उनकी राजनीतिक हैसियत शिखर से लुढ़कर जमीन पर आ गई है तब उन्हें अकड़ छोड़कर सौजन्यता और समझदारी दिखानी चाहिए थी किंतु वे अपने उस स्वभाव को बदलने राजी नहीं हैं जिसने उन्हें सत्ता के सिंहासन से उतारकर सड़क पर ला खड़ा किया।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 5 May 2026

चुनाव परिणामों का संदेश मुफ्त उपहार ही नहीं अच्छी सरकार भी चाहिए


पांच राज्यों के चुनावों में जो पार्टी जीती वह सरकार बनाने में जुट गई वहीं जिनके हाथ पराजय आई वे भविष्य की तैयारी में लग जाएंगे।  निकट भविष्य में जहां चुनाव होने वाले हैं उन राज्यों के लिए रणनीति और मोर्चेबंदी का काम भी जल्द शुरू हो जाएगा।  2027 में गोवा , मणिपुर, उ प्र, उत्तराखंड , पंजाब, हिमाचल और गुजरात में विधानसभा चुनाव होंगे। मणिपुर में शायद अशांति के चलते चुनाव प्रक्रिया निलंबित रहे किंतु बाकी में निर्धारित समय पर मतदान होगा। असम और प. बंगाल में शानदार सफलता के कारण भाजपा का हौसला निश्चित रूप से ऊंचाई पर होगा। हालांकि दक्षिण में उसे पुडुचेरी से ही संतोष करना पड़ा।  केरल में तो वह  तीन सीटें जीत भी गई किंतु तमिलनाडु में शून्य उसका पीछा नहीं छोड़ रहा। आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों में मणिपुर को छोड़ भी दें तो गोवा , उत्तराखंड, उ.प्र और गुजरात में अपनी सरकार की वापसी के लिए वह हरसम्भव प्रयास करेगी। इसी के साथ  हिमाचल की सत्ता कांग्रेस से छीनने के अलावा पंजाब में अपने दम पर पैर जमाने की रणनीति बनाएगी। हाल ही में आम आदमी पार्टी के कुछ सांसदों को तोड़कर उसने अपने इरादे जता दिए हैं। वहीं कांग्रेस, समाजवादी पार्टी , आम आदमी पार्टी और अकाली दल भी अपने ढंग से व्यूह रचना करेंगे।   लेकिन गत दिवस आए परिणामों से सभी दलों को ये सबक लेना चाहिए कि मुफ्त उपहार बांटकर चुनाव तो जीता जा सकता है किंतु सत्ता में बने रहने के लिए जरूरी है सरकार का प्रदर्शन हर मोर्चे पर जन अपेक्षाओं के अनुरूप हो। कल सम्पन्न चुनावों वाली सभी राज्य सरकारों ने मतदाताओं को लुभाने के लिए कोई न कोई  योजना चला रखी थी । केरल में विजयन और तमिलनाडु की स्टालिन सरकार ने सीधे खाते में नगदी के अलावा जनकल्याण की अनेक योजनाएं संचालित करते हुए सत्ता में बने रहने की जमीन तैयार की। ऐसा ही देखने मिला प. बंगाल में जहां ममता बैनर्जी ने महिलाओं और युवाओं को लुभाने के लिए तरह - तरह के मुफ्त उपहार बांटे। असम में भी चुनाव के पहले मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने महिलाओं के खाते में हजारों रुपए जमा करवा दिए। वैसे तो सभी राज्यों में जन कल्याण के नाम पर सरकारें  खजाना लुटा रही हैं। चुनाव जीतने के लिए भी मौजूदा खैरातों से ज्यादा का वायदा भी आम  है। प. बंगाल में महिलाओं को तृणमूल सरकार 1500 रु. प्रतिमाह देती थी। उसका  तोड़ निकालते हुए भाजपा ने 3 हजार का वायदा कर दिया। आम तौर पर देखने मिला है कि मतदाता  जो मिल रहा है उस पर ही भरोसा जताता है। म. प्र, महाराष्ट्र,झारखंड, बिहार और असम में ये साबित भी हुआ। लेकिन छत्तीसगढ़। और राजस्थान की पिछली कांग्रेस सरकारों ने  दिल खोलकर खजाना लुटाया लेकिन मतदाताओं ने उन्हें उखाड़ फेंका। कल आए नतीजों में असम में हिमंता सरकार तो मुफ्त खैरात बांटकर सत्ता में वापस आ गई जबकि प. बंगाल में ममता बैनर्जी, तमिलनाडु में स्टालिन और केरलम में विजयन की सरकार को खैरात भी बचा नहीं सकी। सुश्री बैनर्जी और स्टालिन तो खुद भी हार गए।  मोटे तौर पर कह सकते हैं कि प्रतिद्वंदी पार्टी के अधिक लुभावने वायदों के लालच में मतदाताओं ने मौजूदा सरकार के उपकारों को भुला दिया किंतु ये सच्चाई से आँखें चुराने जैसा है।  सही बात ये है कि  साधारण समझ वाला मतदाता भी  समझने लगा है कि इन मुफ्त उपहारों की आड़ में सत्ता में बैठे लोग किस तरह अपना घर भर रहे हैं। इसके अलावा शासन चलाने के तौर - तरीके भी जनता के संज्ञान में आने लगे हैं। ममता बैनर्जी, स्टालिन और विजयन मजबूत नेता माने जाते थे। लेकिन कानून व्यवस्था, महिला सुरक्षा और भ्रष्टाचार के अलावा देश की एकता - अखंडता जैसे मुद्दों की अनदेखी उन्हें महंगी पड़ी। प. बंगाल में घुसपैठियों के प्रति ममता सरकार के लचीले रवैये ने लोगों का गुस्सा बढ़ाया। वहीं जरूरत से ज्यादा मुस्लिम तुष्टीकरण की सहज प्रतिक्रिया हिन्दू ध्रुवीकरण के रूप में देखने मिली। महिलाओं पर अत्याचार के प्रति गैर जिम्मेदाराना बयानबाजी और तृणमूल के गुंडों का आतंक मुफ्त योजनाओं पर भारी पड़ा। तमिलनाडु तो खैरातों का मुख्यालय है। अभिनेता विजय ने 8 ग्राम सोना देने का वायदा कर स्टालिन सरकार की योजनाओं की चमक फीकी करने का दांव चला किंतु उनकी जीत के पीछे द्रमुक सरकार का खराब प्रदर्शन, मुख्यमंत्री के बेटे की सनातन के विरुद्ध स्तरहीन बयानबाजी जैसी गलतियों ने इस सरकार की जड़ें खोखली कर दीं। इसी तरह केरलम में विजयन सरकार अपने राजनीतिक विरोधियों के दमन के लिए बदनाम हो चली थी।।राज्य में आई प्राकृतिक आपदा के समय भी उसका प्रदर्शन बहुत खराब रहा। वामपंथी सरकारें सुशासन के लिए जानी जाती रहीं किंतु विजयन सरकार इस मामले में भी बदनाम हो गई। कुल मिलाकर निष्कर्ष ये है कि केवल खैरात बांटकर ताउम्र सत्ता में बने रहने की गलतफहमी राजनीतिक दलों और नेताओं को दूर करना चाहिए। हिमंता ने घुसपैठियों के मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाकर मतदाताओं पर छाप छोड़ी जबकि कांग्रेस मुस्लिम तुष्टीकरण के लालच में बहुसंख्यक हिंदुओं का समर्थन खो बैठी। उसके 19 विधायकों में से 18।मुस्लिम और एक ईसाई है जिसका निहितार्थ आसानी से निकाला जा सकता है। ममता बैनर्जी भी भ्रष्टाचार, महिला उत्पीड़न, गुंडागर्दी और घुसपैठियों की समस्या से मुंह मोड़कर बैठ गईं। नतीजा सामने है। ये देखते हुए जिन्हें जीत मिली उन्हें ये एहसास होना चाहिए कि मुफ्त उपहार सत्ता में ला तो सकते हैं लेकिन उसमें बने रहने के लिए सुशासन जरूरी है। वरना न खैरातें काम आएगी और न ही जातिवाद।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 4 May 2026

प. बंगाल में भाजपा ने इतिहास रचा तो तमिलनाडु में विजय धुरंधर



पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम आने शुरू हो गए हैं। दोपहर एक बजे तक की स्थिति  यथावत रही तब ये नतीजे तमिलनाडु रूपी केवल एक अपवाद छोड़कर उम्मीद के मुताबिक ही हैं। इस मिनी आम चुनाव में प. बंगाल सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा। ममता बैनर्जी जैसी मजबूत जनाधार वाली  नेत्री को सत्ता से हटाने की संभावना पर राजनीति के अच्छे - अच्छे जानकार कुछ कहने से बच रहे थे । मैदान में घूमने वाले टीवी पत्रकार भी ये तो मान रहे थे कि  भाजपा ने इस बार अभूतपूर्व मोर्चेबंदी की है किंतु वे ये कहने से भी नहीं चूकते थे कि सुश्री बैनर्जी द्वारा महिलाओं को प्रति  माह दी जा रही 1500 रु. की राशि का करिश्मा काम करेगा जैसा झारखंड में हेमंत सोरेन की जीत से दिख गया था। 30 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं का पुख्ता समर्थन भी तृणमूल  की बड़ी पूंजी मानी जा रही थी। राज्य में ममता दीदी की टक्कर का कोई नेता भाजपा के पास नहीं होने के नाम पर भी 2021 जैसे नतीजे दोहराए जाने का दावा भी किया जा रहा था। लोकसभा चुनाव में भाजपा को लगे झटके के बाद तृणमूल  का उत्साह और बढ़ गया । लेकिन आज आए परिणाम ने साबित कर दिया कि माँ, मानुष और माटी जैसे भावनात्मक नारे के नाम पर सत्ता में आईं ममता बैनर्जी ने जिस अराजकता को बढ़ावा दिया उसके विरुद्ध प. बंगाल की जनता ने मौन क्रांति कर दी। जिस तरह से मतदाता कैमरे के सामने बोलने से कतराते थे उसने 1977 के लोकसभा चुनाव की याद दिला दी जब इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल की दहशत में आम जनता कुछ बोलने से तो डरती थी किंतु चुनाव में उसने उनकी सत्ता को उखाड़ फेंका। प. बंगाल का चुनाव परिणाम भी ठीक वैसा ही है जिसने नजदीकी मुकाबले के अनुमानों को बंगाल की खाड़ी में डुबोकर भाजपा को ऐतिहासिक बहुमत प्रदान कर दिया। बड़ी बात नहीं वह 200 का आंकड़ा भी पार कर जाए। ये जीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सटीक रणनीति और व्यूहरचना का सुपरिणाम होने के साथ ही मुस्लिम तुष्टीकरण के विरुद्ध जनादेश है। प. बंगाल में भाजपा की प्रचंड जीत ने बिहार के बाद एक बार फिर उस मिथक को तोड़ दिया कि मुस्लिम मतों का थोक समर्थन जीत की गारंटी है। इस परिणाम का असर उ.प्र के आगामी विधानसभा चुनाव पर पड़े बिना नहीं रहेगा जहां अखिलेश यादव मुस्लिम मतों के बल पर सत्ता में वापसी के ख्वाब देख रहे हैं। प. बंगाल के पड़ोसी असम में भाजपा की धमाकेदार तीसरी जीत से किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि हिमंता बिस्वा सरमा भी योगी आदित्यनाथ की तरह ही हिंदुत्व के महानायक के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। इसी तरह केरलम में वामपंथी सरकार का पतन तो सुनिश्चित था। लेकिन इस राज्य में कोई अन्य विकल्प नहीं होने से कांग्रेस की अगुआई वाले यूडीएफ को आशा से अधिक सीटें मिल गईं। हालांकि एनडीए ने तीसरी शक्ति बनने के लिए काफी मशक्कत की लेकिन उसे इस रूप में सफ़लता मिली कि वामपंथी मतों को खींचकर उसने अपने सबसे बड़े वैचारिक विरोधी की जड़ें उखाड़कर अपना भविष्य उज्ज्वल बना लिया। केरलम में यूडीएफ की बड़ी जीत कांग्रेस के लिए बेशक उत्साहवर्धक है। राहुल गांधी ने यहां काफी जोर भी लगाया था किंतु इस राज्य का राष्ट्रीय राजनीति में ज्यादा महत्व नहीं है। यही हाल पुडुचेरी का भी है जहां एनडीए की सत्ता में वापसी से दक्षिण भारत तक के समीकरण प्रभावित नहीं होते। लेकिन द्रविड़ राजनीति के गढ़ तमिलनाडु ने इस बार जो किया वह बीते 60 सालों का  सबसे बड़ा चुनावी उलटफेर है। विजय नामक लोकप्रिय तमिल अभिनेता की नवोदित पार्टी टीवीके बहुमत की देहलीज पर आ पहुंची। इस प्रकार विजय तमिलनाडु में धुरंधर की तरह समूचे परिदृश्य पर छा गए। यद्यपि एम. जी. रामचन्द्रन और जयललिता भी फिल्मी दुनिया से थे । उनके बाद रजनीकांत और कमला हासन ने भी सियासत में हाथ आजमाए किंतु असफल रहे। ये देखते हुए विजय ने नया इतिहास रचते हुए द्रविड़ आंदोलन से पैदा हुई दोनों पार्टियों द्रमुक और अन्ना द्रमुक को पीछे छोड़ दिया। हालांकि उनके पास बहुमत के लिए कुछ सीटें कम हैं इसलिए उन्हें बाहर से समर्थन लेना होगा। खबर है कांग्रेस ने उनकी तरफ सहयोग का हाथ बढ़ाया भी है किंतु अभी तमिलनाडु का खेल खुला हुआ है।  वैसे  द्रमुक और अन्ना द्रमुक दुश्मनी भूलकर एक हो जाएं तो अभी भी सत्ता उनके पास बनी रह सकती है । इस चुनाव ने मुख्यमंत्री स्टालिन की ऐंठ भी खत्म कर दी जो तीसरे स्थान पर आ गए। उनके बेटे द्वारा किया ग़या सनातन का विरोध भी उनकी दुर्गति का कारण बना। आज शाम तक अंतिम परिणाम घोषित हो जाएंगे जिसके बाद बिंदुवार विश्लेषण किया जा सकेगा। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के लिए आज का दिन बड़ी खुशी लेकर आया है। लोकसभा चुनाव में लगे झटके से उबरकर हरियाणा,महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार के बाद प. बंगाल जीतकर उसने ये साबित कर दिया कि उसके अच्छे दिन जारी हैं। जो लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध दिन - रात दुष्प्रचार किया करते हैं प. बंगाल में  भाजपा की जबर्दस्त जीत उनके मुंह पर भी झन्नाटेदार तमाचा है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 2 May 2026

पेट्रोल - डीजल के दाम बाजार से जोड़ने के साथ ही उन्हें जीएसटी के दायरे में लाएं


ईरान संकट के कारण उत्पन्न हालातों में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ना स्वाभाविक है। पूरी दुनिया इससे प्रभावित हो तब भारत का  अछूता रहना नामुमकिन है जो अपनी ज़रूरत का 85 फीसदी आयात करता है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के कारण केंद्र सरकार ने पेट्रोल , डीजल और रसोई गैस के दाम नहीं बढ़ाए किंतु जैसे ही मतदान पूरा हुआ वैसे ही पहला झटका दिया कमर्शियल गैस सिलेंडर की मूल्य वृद्धि के रूप में और वह भी लगभग 1 हजार प्रति सिलेंडर। आम जनता की नाराजगी से बचने फिलहाल घरेलू रसोई गैस सिलेंडर के दाम नहीं बढ़े और डीजल - पेट्रोल की मूल्यवृद्धि भी रोककर रखी गई है। लेकिन  कमर्शियल गैस के बढ़े दाम का असर भी अप्रत्यक्ष रूप से जनता पर पड़े बिना नहीं रहेगा। हालांकि सरकार की ओर से घुमा - फिराकर कहा जा रहा है कि ईरान  संकट से पेट्रोलियम कंपनियों को काफी घाटा हो रहा है किंतु इस मामले में वह अपराध बोध से ग्रस्त है। क्योंकि बीते कुछ सालों में रूस से मिले सस्ते कच्चे तेल के कारण पेट्रोलियम कंपनियों ने भरपूर मुनाफा बटोरा।  अंतर्राष्ट्रीय मूल्य निचले स्तर पर रहने से भी सरकारी तेल कंपनियों का खजाना खूब भरा। चूंकि उसका लाभ उपभोक्ताओं को देने से परहेज किया गया इसलिए जब ईरान युद्ध के चलते  कच्चे तेल और गैस की कीमतें चढ़ीं तब सरकार के पास दाम बढ़ाने का कोई औचित्य या यूं कहें कि नैतिक आधार नहीं है। लेकिन तमाम वित्तीय संस्थान ये संभावना जता रहे हैं कि यदि खाड़ी में संकट जारी रहा और होर्मुज में चल रही नाकेबंदी जारी रही तब चाहे - अनचाहे पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस महंगी करनी ही होगी। जनता भी परिस्थितियों का तकाजा समझ रही है। लेकिन इस बारे में दो बातें हैं जिन पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। पहली ये कि वाजपेयी सरकार के समय पेट्रोल - डीजल की कीमतों को बाजार के उतार - चढ़ाव से जोड़ने की जो व्यवस्था हुई उसे दोबारा प्रारम्भ किया जाए। हालांकि उसी सरकार ने चुनाव आते ही मतदाताओं की नाराजगी से बचने उस पर रोक लगाकर दाम स्थिर रखे। मौजूदा केंद्र सरकार ने प्रारंभ में उस प्रथा को दोबारा लागू करने का साहस दिखाया। उसके अंतर्गत जैसे ही मूल्य घटते या बढ़ते उसी के अनुसार उपभोक्ता को भी उनकी खरीदी करनी पड़ती। आम तौर पर ये घटा - बढ़ी 1 रुपए के भीतर होने से असहनीय नहीं लगती थी किंतु अज्ञात कारणों से उस व्यवस्था को फिर निलंबित कर दिया गया। जिसके कारण कीमतें तो स्थिर रखी गईं किंतु जब वैश्विक स्तर पर कच्चा तेल सस्ता हुआ तब उसका लाभ उपभोक्ता को देने से बचा गया। कुछ समय तक तो पिछले घाटे की पूर्ति का बहाना समझ में आता  है लेकिन उसकी भरपाई के बाद भी पेट्रोलियम कंपनियों द्वारा पूरा मुनाफा हड़पने की नीति समझ से परे है। दूसरी बात जीएसटी से अभी तक पेट्रोलियम पदार्थों को बाहर रखना है। यदि अन्य उपभोक्ता वस्तुओं जैसी जीएसटी की दर डीजल - पेट्रोल और रसोई गैस पर निश्चित कर दी जाए तब इनके दाम काफी नीचे आ जाएंगे। शुरुआत में तो उससे सरकार के राजस्व में कमी परिलक्षित होगी किंतु जिस तरह गत वर्ष किए गए बदलाव के बावजूद सरकार को हर माह मिलने वाली जीएसटी वसूली में खास फर्क नहीं आया वैसे ही पेट्रोल - डीजल आदि को जीएसटी के दायरे में लाने पर आम जनता को होने वाली बचत अंततः बाजार में ही आएगी जिससे जीएसटी वसूली का संतुलन बना रहेगा। कमर्शियल गैस सिलेंडर के दाम तकरीबन 1 हजार रुपए बढ़ा देने के बाद ये आशंका बढ़ चली है कि 4 मई के बाद पेट्रोल - डीजल और घरेलू रसोई गैस की कीमतों में भी वृद्धि होगी। विपक्षी दल तो काफी पहले से कहते आ रहे हैं कि ईरान संकट के बावजूद दाम नहीं बढ़ाकर सरकार कोई मेहरबानी नहीं कर रही अपितु वह पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान जनता के गुस्से से बचना चाह रही है। ये सब देखते हुए उचित तो यही होगा कि पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस को बाजार के उतार - चढ़ाव से जोड़कर उनकी कीमतों में पारदर्शिता लाने के साथ ही उन्हें जीएसटी के अंतर्गत लाकर अनाप - शनाप करों के बोझ को कम करने की ईमानदारी दिखाई जाए। ये बात सही है आर्थिक अनुशासन को लागू करने में चुनावी नफा - नुकसान आड़े आते हैं किंतु  देश को वाकई आर्थिक महाशक्ति बनाना है तब ऐसे निर्णय लेने ही होंगे जिनमें कड़ाई और व्यवहारिकता का समन्वय हो। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 1 May 2026

4 मई के बाद राष्ट्रीय राजनीति में बनेंगे नए समीकरण


पांच राज्यों के  चुनाव परिणाम आने में अभी दो दिन बाकी हैं। सभी पार्टियां बढ़ - चढ़कर दावे कर रही हैं।  इन परिणामों का राष्ट्रीय राजनीति पर क्या प्रभाव होगा इसे लेकर राजनीति के पंडितों में विमर्श प्रारंभ हो गया है। इसके दो संकेत गत दिवस मिले जब त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को समर्थन दिए जाने के सवाल पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने तो समय आने पर विचार करने की बात कही वहीं सीपीआई के एक प्रवक्ता ने टीवी चैनल पर इस संभावना को पूरी तरह नकार दिया। इसी तरह की परिस्थिति तमिलनाडु में भी उत्पन्न हो सकती है जहां अभिनेता विजय की पार्टी टी.वी.के को अप्रत्याशित सफलता मिलने का अनुमान लगाकर एक्सिस माय इंडिया नामक  एजेंसी ने सनसनी फैला दी। उसके बाद ही तमिलनाडु में राजनीति के खिलाड़ी ये गुणा - भाग करने में व्यस्त हो गए कि  किसी को बहुमत नहीं मिला और विजय की पार्टी सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी तब क्या स्टालिन उनको सत्ता पर बिठाएंगे या अन्न द्रमुक गठबंधन उनकी ताजपोशी करवाएगा? केरलम  में त्रिशंकु की हल्की ही सही किंतु कुछ उम्मीद अभी भी वामपंथी खेमे के मन में है किंतु प्रश्न ये भी उठता है कि उस स्थिति में समर्थन कौन देगा क्योंकि एन.डी.ए का समर्थन न तो एल.डी.एफ को रास आयेगा और न ही कांग्रेस वाला यू.डी.एफ उसे हजम कर पाएगा। इस चुनाव में तमिलनाडु में सत्ताधारी द्रमुक के साथ कांग्रेस और वामपंथी दलों के  अलावा मुस्लिम लीग सहित छोटे - छोटे क्षेत्रीय दल हैं। उस दृष्टि से इसे इंडिया गठबंधन का रूप कहा जा सकता है। लेकिन प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के विरुद्ध वामपंथी तो मोर्चा खोलकर बैठे ही कांग्रेस भी एकला चलो की नीति के साथ लड़ी। राहुल गांधी ने तो ममता बैनर्जी पर आरोप तक लगा दिया कि उनके कुशासन के चलते ही राज्य में भाजपा का सितारा चमका। वहीं केरल में वामपंथी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए कांग्रेस ने कोई कसर नहीं छोड़ी।  हालांकि लोकसभा चुनाव के बाद ही इंडिया गठबंधन बिखरा - बिखरा सा है और विपक्षी एकता स्थानीय मुद्दों एवं समीकरणों के आधार पर निर्भर हो गई। मसलन हरियाणा में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को जरा भी भाव नहीं दिया। उसके बाद दिल्ली में दोनों के बीच तलवारें खिंचीं। लेकिन रोचक बात ये रही कि ममता बैनर्जी ने तृणमूल की तरफ से शत्रुघ्न सिन्हा को आम आदमी पार्टी के प्रचार के लिए भेजा जबकि सपा अध्यक्ष अखिलेश  यादव ने खुद अरविंद केजरीवाल के पक्ष में सभाएं लीं। बिहार में भी कांग्रेस और तेजस्वी यादव के महागठबंधन ने विपक्ष की अन्य पार्टियों को भाव नहीं दिया। प. बंगाल में तृणमूल, वामपंथी और कांग्रेस के अलग - अलग लड़ने से विपक्षी एकता का गुब्बारा पूरी तरह फूट गया। रही - सही कसर पूरी कर दी तेजस्वी, केजरीवाल और अखिलेश द्वारा तृणमूल कांग्रेस के समर्थन में सभाएं लेकर। जो संकेत हैं उनके अनुसार यदि सुश्री बैनर्जी के हाथ से सत्ता खिसक जाती है तब वे वामपंथियों के साथ ही कांग्रेस को भी गरियाएंगी। इसी तरह केरलम की सत्ता गंवाने के बाद वामपंथी कांग्रेस पर गुस्सा उतारेंगे। इन चुनावों के बाद  विपक्ष का चेहरा कौन बनेगा इस पर भी खींचतान होना तय है क्योंकि यदि ममता बैनर्जी ने सत्ता बचा ली तब  उनकी वजनदारी स्वाभाविक रूप से बढ़ेगी और तमाम छोटे - छोटे दल राहुल गांधी को किनारे कर उनके पीछे खड़े हो जाएंगे। वहीं केरलम में जीत मिलने के बाद कांग्रेस राहुल गांधी को एक बार फिर महिमामंडित करने में जुट जाएगी। हालांकि सुश्री बैनर्जी सरकार नहीं बना सकीं तब भी वे श्री गांधी के नेतृत्व को स्वीकार कर सकेंगी ये संदिग्ध है। और उस स्थिति में भाजपा और कांग्रेस दोनों के विरोध में तीसरे मोर्चे की वापसी तो हो सकती है। यद्यपि वामपंथी उसमें शामिल होंगे इसमें संदेह है क्योंकि उनकी ममता से कुढ़न जगजाहिर है। स्टालिन भी कांग्रेस को नहीं छोड़ सकते। केरलम की हार के बाद वामपंथी भी राहुल के नेतृत्व को कितना स्वीकार करेंगे ये कह पाना मुश्किल है । कुल मिलाकर 4 मई के बाद देश में विपक्षी राजनीति में नए समीकरण देखने मिलेंगे। यदि भाजपा  प. बंगाल पर झण्डा गाड़ने में कामयाब हो गई तब अन्य दलों से नेता आकर उसके साथ जुड़ेंगे। जिसकी बानगी राघव चड्ढा सहित आम आदमी पार्टी के 6 सांसद दे चुके हैं। खबर तो ये भी है कि ममता सरकार हटी तो तृणमूल में भी भगदड़ मचेगी।  कल रात आए एक एग्जिट पोल के बाद इसकी आशंका और बढ़ गई है।


- रवीन्द्र वाजपेयी