सड़क पर नमाज पढ़ने को लेकर प. बंगाल और उ.प्र में हुए विवाद के बीच ये मुद्दा एक बार गरमाने लगा है। प. बंगाल में हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव के बाद जो सरकार बनी वह भी उ.प्र की योगी सरकार की तरह तुष्टीकरण से परहेज करने की राह पर चल पड़ी है। कोलकाता सहित अन्य शहरों में जो अवैध निर्माण और दुकानें हटाई जा रही हैं उनके बारे में कहा जा रहा है कि वे बांग्लादेशी घुसपैठियों के अलावा रोहिंग्या मुस्लिमों के थे। हावड़ा और सियालदाह रेलवे स्टेशन पर तो इन तत्वों का कब्जा ही था। हावड़ा ब्रिज के निचले हिस्से में भी यही स्थिति थी। सुवेंदु अधिकारी ने सत्ता संभालते ही अतिक्रमण और अवैध निर्माणों को हटाने की मुहिम छेड़ दी। इसी के साथ ही मुस्लिम समुदाय द्वारा सड़कों पर नमाज पढ़े जाने पर रोक लगाई तो उपस्थित मुसलमानों की भीड़ ने पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया जिसके जवाब में पुलिस ने भी बलप्रयोग करने में संकोच नहीं किया। ऐसा लगता है प. बंगाल का मुस्लिम समुदाय इसी मुगालते में है कि ममता सरकार के जमाने में उसे कुछ भी करना की जो छूट मिली हुई थी वह जारी रहेगी। स्मरणीय है चुनाव प्रचार के दौरान श्री अधिकारी ने स्पष्ट कर दिया था कि वे बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति सख्ती के अलावा मुस्लिम समुदाय की उस स्वेच्छाचारिता पर लगाम लगाएंगे जो तृणमूल सरकार के दौर में देखने मिलती रही। दूसरी तरफ उ.प्र में भी सड़कों पर नमाज पढ़ने की मुसलमानों की जिद पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कड़ा रुख दिखाते हुए कहा कि इसकी अनुमति नहीं दी जाएगी। मस्जिदों में स्थानाभाव होने के तर्क पर उन्होंने कहा कि बजाय एक साथ पढ़ने के वे बारी - बारी से नमाज पढ़ें। साथ ही घरों में जगह कम पड़ती है तो जनसंख्या नियंत्रण पर ध्यान दें। उल्लेखनीय है उ. प्र में आगामी वर्ष विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। यहां भी 20 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं के थोक समर्थन के बल पर अखिलेश यादव सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाए हुए हैं। लेकिन वे भूल रहे हैं कि बिहार में तेजस्वी यादव का मुस्लिम - यादव समीकरण फुस्स हो गया जहां 18 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं के बावजूद राजद और कांग्रेस के महागठबंधन का सफाया हो गया। प .बंगाल में तो 30 फीसदी मुस्लिम मतदाता होने पर भी ममता बैनर्जी बुरी तरह पराजित हुईं । असम में भी मुस्लिम मतदाताओं का तिलिस्म टूट गया। ये इसलिए हो सका क्योंकि हिन्दू मतदाताओं के मन में ये बात बैठ गई कि उनकी फूट के चलते मुस्लिम परस्त सरकारें बन जाती हैं। असम और प. बंगाल में जो राजनीतिक हवा चली उसका असर आगामी सभी चुनावों में पड़े बिना नहीं रहेगा। सुवेंदु अधिकारी और योगी आदित्यनाथ ने सड़कों पर नमाज पढ़ने वालों के विरुद्ध जो सख्ती दिखाई उसको नियम - कानून के पालन से जोड़ने पर महसूस होगा कि वे सही हैं। ये कहना कि अन्य धर्मावलंबी भी सड़कों पर अपने आयोजन करते हैं तो यदि उनसे भी अव्यवस्था फैलती है तब प्रशासन का फ़र्ज़ है वह उन्हें भी रोके। स्मरणीय है मुंबई में सड़कों पर नमाज पढ़े जाने के बाद ही शिवसेना ने महाआरती शुरू की। हालांकि मुस्लिम समुदाय पर मुल्ला - मौलवियों का मनोवैज्ञानिक दबाव रहता है परन्तु सोशल मीडिया पर अनेक मुस्लिम मौलवी एवं प्रवक्ता खुलकर उन पार्टियों की आलोचना कर रहे हैं जिन्होंने मुसलमानों के गैर कानूनी कार्यों की अनदेखी की। दरअसल लालू प्रसाद यादव, स्व .मुलायम सिंह यादव और ममता बैनर्जी ने चुनाव जीतने के लिए मुसलमानों को भाजपा का भय दिखाकर अपने पक्ष में गोलबंद किया और उसके बदले उन्हें सड़क पर नमाज पढ़ने , अवैध कारोबार और निर्माण आदि की छूट दे दी । ऐसा करने से ये समुदाय मुख्य धारा से अलग होता गया। सोशल मीडिया पर एक मौलवी की रील जमकर चल रही है जिसमें वे सेकुलर पार्टियों की धज्जियां उड़ाते हुए पूछ रहे हैं कि मुसलमानों को दिल्ली के शाहीन बाग में धरने पर बैठने के लिए उकसाने के बाद न अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव ने वहां आने की जरूरत समझी और न ही राहुल गांधी ने। जबकि इन्हीं के भरोसे मुस्लिम समुदाय खुलकर भाजपा के विरोध में खड़ा हुआ। उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सुनने प. बंगाल चुनाव में जो जनसैलाब उमड़ा वह स्वस्फूर्त था। मुस्लिम समाज को इन संकेतों को समझना चाहिए। धार्मिक आधार पर एकता बुरी बात नहीं है लेकिन इसके लिए भाजपा को गालियां देने से उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ उल्टे हिन्दू मतदाता अपने मतभेद भूलकर राजनीतिक दृष्टि से एकजुट होने लगे। सही बात ये है कि मुसलमानों का उपयोग कर उन्हें अनाथ छोड़ने वाले कथित सेकुलर दल ही उनके सबसे बड़े शत्रु हैं। इस सच्चाई को मुसलमान अभी भी नहीं समझे तब उनकी रही - सही राजनीतिक उपयोगिता भी घटती जाएगी। असम और प. बंगाल के नतीजे इसका प्रमाण हैं और बड़ी बात नहीं उ.प्र में भी ऐसा ही दिखाई दे।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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