Monday, 11 May 2026

सोमनाथ का अमृत महोत्सव: हिन्दू नव जागरण का प्रतीक


आजादी के बाद जब महमूद गजनवी द्वारा  तोड़े गए सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की बात उठी तब  पं. जवाहरलाल नेहरू ने उस पर सरकारी खर्च करने का विरोध किया। हालांकि सरदार पटेल जिन्होंने उसके निर्माण का आदेश दिया था वे टस से मस नहीं हुए और जनता से 25 लाख चंदा एकत्र कर काम शुरू किया। उनकी मृत्यु के बाद नेहरू सरकार में मंत्री, प्रख्यात शिक्षाविद् कन्हैयालाल माणिकलाल  मुंशी की देखरेख में मंदिर को दोबारा भव्य स्वरूप प्रदान किया गया। लेकिन 11 मई 1951को उसमें शिवलिंग की स्थापना समारोह में जाने से पं. नेहरू ने ये कहते हुए इंकार कर दिया कि उन्हें  मंदिर का पुनर्निर्माण पसंद नहीं क्योंकि यह हिन्दू पुनरुत्थानवाद है। यही नहीं उन्होंने राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भी सोमनाथ मंदिर जाने से रोका किंतु वे नहीं माने और उस समारोह में शामिल हुए। उस आयोजन के आज 75 वर्ष पूर्ण होने पर भव्य अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  इस ऐतिहासिक अवसर के साक्ष्य बने। बड़ी बात नहीं धर्म निरपेक्षता के झंडा बरदारों की आंखों में यह अमृत महोत्सव  उसी तरह खटके जैसे अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण उन्हें आज तक बर्दाश्त नहीं हुआ। जनेऊधारी ब्राह्मण और शिवभक्त होने का दावा करने वाले राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अभी तक अयोध्या के राम मंदिर जाने की जरूरत नहीं समझी क्योंकि मुस्लिम मतदाताओं की नाराजगी का डर उन्हें नींद में भी सताता है। लेकिन सोमनाथ जैसे मंदिर क्या केवल सनातन धर्म की धरोहर हैं ? महमूद गजनवी ने उस मंदिर को ध्वस्त कर केवल किसी एक धर्म को नहीं बल्कि भारत की अस्मिता को चोट पहुंचाई थी। सरदार पटेल ने जब उसके पुनरुद्धार की पहल की तब पं. नेहरू ने  उसका जो विरोध किया वह धर्म निरपेक्षता नहीं अपितु मुस्लिम तुष्टीकरण था। इस  तरह देश का विभाजन जिस मानसिकता ने किया उसे ही प्रश्रय देने की गलती उन्होंने दोहराई। दुर्भाग्य से उनके वैचारिक उत्तराधिकारी भी उसी परिपाटी पर चलते हुए धर्म निरपेक्षता का अर्थ मुस्लिम परस्ती लगा बैठे। मुसलमानों के मत इकतरफा बटोरने के इस फॉर्मूले ने कई दशकों तक अनेक दलों को राजनीतिक लाभ पहुंचाया किंतु समय बीतने के साथ इसकी प्रतिक्रिया हिंदू समाज में भी होने लगी जो असम और प. बंगाल के  हालिया चुनाव में  साफ नजर आई। इसे लेकर सेकुलर जमात चिंतित है किंतु  बहुत पुरानी बात नहीं जब कांग्रेस को ये लगा कि भाजपा से निपटने के लिए उसे भी हिन्दू जनमानस में अपनी जगह बनानी चाहिए। इसके बाद पार्टी के एक प्रवक्ता ने राहुल गांधी को ब्राह्मण साबित करते हुए उनका गोत्र तक बता दिया। उसके बाद  श्री गांधी मंदिरों और मठों में परम्परागत परिधान धारण कर पूजा - अर्चना करते देखे गए। उनकी अनुजा प्रियंका वाड्रा भी हिन्दू मंदिरों में मत्था टेकने लगीं। लेकिन मतदाताओं पर समुचित प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि उनका उद्देश्य विशुद्ध राजनीतिक था। हालांकि ये भी कहा जा सकता है कि भाजपा भी तो चुनाव जीतने के लिए हिंदुत्व का ढोल बजाती है किंतु  नरेंद्र मोदी और राहुल गाँधी के मंदिर जाने में जमीन - आसमान का अंतर है। और जिस दिन कांग्रेस सहित सेकुलर कहलाने वाले  राजनीतिक दल इस अंतर को समझ जाएंगे उस दिन हिन्दू समाज के बीच उनकी छवि सुधर जाएगी। हालिया चुनावी मुकाबलों में असम और प.बंगाल में हुए हिन्दू ध्रुवीकरण को खतरा बताकर छाती पीटने वाले  तब मौन रहते थे जब जाति और धर्म आधारित एम - वाय (मुस्लिम - यादव) को जीत की गारंटी मानकर प्रचारित किया जाता था। प. बंगाल में मुस्लिम मतदाताओं का भाजपा के विरोध में गोलबंद होना दीवार पर लिखी इबारत थी। उसकी प्रतिक्रिया हिन्दू गोलबंदी के रूप में इसी चुनाव में क्यों देखने मिली उसका सीधा - सीधा उत्तर ये है कि  वहां तुष्टीकरण  चरमोत्कर्ष पर जा पहुंचा। तृणमूल सांसद और प. बंगाल की सबसे चर्चित चुनाव प्रचारक सायोनी घोष ने कहा कि अभी उनकी पार्टी के इतने बुरे दिन नहीं आए जो जय श्री राम जैसे  राजनीतिक नारे का सहारा ले किंतु चुनावी मंचों पर वे हमारे दिल में काबा, लबों पे मदीना गाकर मुस्लिम तुष्टीकरण में जुटी रहीं। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि उनके उस गायन ने हिन्दू जनमानस को एकजुट होकर मतदान करने उद्वेलित किया। पता नहीं इस देश के सेकुलर वादियों को ये अक्ल कब आएगी कि सोमनाथ और अयोध्या के मंदिर केवल सनातन  की आस्था के ही नहीं अपितु राष्ट्रीय स्वाभिमान के जीवंत प्रतीक हैं। दुर्भाग्य से आजादी के बाद हमारे देश की समृद्ध संस्कृति और गौरवशाली आध्यात्मिक विरासत के प्रति जो उपेक्षा भाव रखा गया उसके विरुद्ध पनपा असंतोष  अब मुखर हो चला है। इसे हिन्दू पुनरुत्थान कहें या नव जागरण किंतु सदियों बाद ये दौर लौट रहा है। सोमनाथ मंदिर का अमृत महोत्सव उसी का प्रतीक है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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