Friday, 1 May 2026

4 मई के बाद राष्ट्रीय राजनीति में बनेंगे नए समीकरण


पांच राज्यों के  चुनाव परिणाम आने में अभी दो दिन बाकी हैं। सभी पार्टियां बढ़ - चढ़कर दावे कर रही हैं।  इन परिणामों का राष्ट्रीय राजनीति पर क्या प्रभाव होगा इसे लेकर राजनीति के पंडितों में विमर्श प्रारंभ हो गया है। इसके दो संकेत गत दिवस मिले जब त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को समर्थन दिए जाने के सवाल पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने तो समय आने पर विचार करने की बात कही वहीं सीपीआई के एक प्रवक्ता ने टीवी चैनल पर इस संभावना को पूरी तरह नकार दिया। इसी तरह की परिस्थिति तमिलनाडु में भी उत्पन्न हो सकती है जहां अभिनेता विजय की पार्टी टी.वी.के को अप्रत्याशित सफलता मिलने का अनुमान लगाकर एक्सिस माय इंडिया नामक  एजेंसी ने सनसनी फैला दी। उसके बाद ही तमिलनाडु में राजनीति के खिलाड़ी ये गुणा - भाग करने में व्यस्त हो गए कि  किसी को बहुमत नहीं मिला और विजय की पार्टी सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी तब क्या स्टालिन उनको सत्ता पर बिठाएंगे या अन्न द्रमुक गठबंधन उनकी ताजपोशी करवाएगा? केरलम  में त्रिशंकु की हल्की ही सही किंतु कुछ उम्मीद अभी भी वामपंथी खेमे के मन में है किंतु प्रश्न ये भी उठता है कि उस स्थिति में समर्थन कौन देगा क्योंकि एन.डी.ए का समर्थन न तो एल.डी.एफ को रास आयेगा और न ही कांग्रेस वाला यू.डी.एफ उसे हजम कर पाएगा। इस चुनाव में तमिलनाडु में सत्ताधारी द्रमुक के साथ कांग्रेस और वामपंथी दलों के  अलावा मुस्लिम लीग सहित छोटे - छोटे क्षेत्रीय दल हैं। उस दृष्टि से इसे इंडिया गठबंधन का रूप कहा जा सकता है। लेकिन प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के विरुद्ध वामपंथी तो मोर्चा खोलकर बैठे ही कांग्रेस भी एकला चलो की नीति के साथ लड़ी। राहुल गांधी ने तो ममता बैनर्जी पर आरोप तक लगा दिया कि उनके कुशासन के चलते ही राज्य में भाजपा का सितारा चमका। वहीं केरल में वामपंथी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए कांग्रेस ने कोई कसर नहीं छोड़ी।  हालांकि लोकसभा चुनाव के बाद ही इंडिया गठबंधन बिखरा - बिखरा सा है और विपक्षी एकता स्थानीय मुद्दों एवं समीकरणों के आधार पर निर्भर हो गई। मसलन हरियाणा में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को जरा भी भाव नहीं दिया। उसके बाद दिल्ली में दोनों के बीच तलवारें खिंचीं। लेकिन रोचक बात ये रही कि ममता बैनर्जी ने तृणमूल की तरफ से शत्रुघ्न सिन्हा को आम आदमी पार्टी के प्रचार के लिए भेजा जबकि सपा अध्यक्ष अखिलेश  यादव ने खुद अरविंद केजरीवाल के पक्ष में सभाएं लीं। बिहार में भी कांग्रेस और तेजस्वी यादव के महागठबंधन ने विपक्ष की अन्य पार्टियों को भाव नहीं दिया। प. बंगाल में तृणमूल, वामपंथी और कांग्रेस के अलग - अलग लड़ने से विपक्षी एकता का गुब्बारा पूरी तरह फूट गया। रही - सही कसर पूरी कर दी तेजस्वी, केजरीवाल और अखिलेश द्वारा तृणमूल कांग्रेस के समर्थन में सभाएं लेकर। जो संकेत हैं उनके अनुसार यदि सुश्री बैनर्जी के हाथ से सत्ता खिसक जाती है तब वे वामपंथियों के साथ ही कांग्रेस को भी गरियाएंगी। इसी तरह केरलम की सत्ता गंवाने के बाद वामपंथी कांग्रेस पर गुस्सा उतारेंगे। इन चुनावों के बाद  विपक्ष का चेहरा कौन बनेगा इस पर भी खींचतान होना तय है क्योंकि यदि ममता बैनर्जी ने सत्ता बचा ली तब  उनकी वजनदारी स्वाभाविक रूप से बढ़ेगी और तमाम छोटे - छोटे दल राहुल गांधी को किनारे कर उनके पीछे खड़े हो जाएंगे। वहीं केरलम में जीत मिलने के बाद कांग्रेस राहुल गांधी को एक बार फिर महिमामंडित करने में जुट जाएगी। हालांकि सुश्री बैनर्जी सरकार नहीं बना सकीं तब भी वे श्री गांधी के नेतृत्व को स्वीकार कर सकेंगी ये संदिग्ध है। और उस स्थिति में भाजपा और कांग्रेस दोनों के विरोध में तीसरे मोर्चे की वापसी तो हो सकती है। यद्यपि वामपंथी उसमें शामिल होंगे इसमें संदेह है क्योंकि उनकी ममता से कुढ़न जगजाहिर है। स्टालिन भी कांग्रेस को नहीं छोड़ सकते। केरलम की हार के बाद वामपंथी भी राहुल के नेतृत्व को कितना स्वीकार करेंगे ये कह पाना मुश्किल है । कुल मिलाकर 4 मई के बाद देश में विपक्षी राजनीति में नए समीकरण देखने मिलेंगे। यदि भाजपा  प. बंगाल पर झण्डा गाड़ने में कामयाब हो गई तब अन्य दलों से नेता आकर उसके साथ जुड़ेंगे। जिसकी बानगी राघव चड्ढा सहित आम आदमी पार्टी के 6 सांसद दे चुके हैं। खबर तो ये भी है कि ममता सरकार हटी तो तृणमूल में भी भगदड़ मचेगी।  कल रात आए एक एग्जिट पोल के बाद इसकी आशंका और बढ़ गई है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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