विदेश मंत्री एस. जयशंकर द्वारा हाल ही में की गई टिप्पणियां हमारी विदेश नीति की दृढ़ता का प्रमाण हैं। कुछ दिन पहले उन्होंने यूरोपीय देशों को लताड़ते हुए कहा था कि उन्हें इस मानसिकता से निकलना चाहिए कि यूरोप की समस्याएं दुनिया की समस्याएं हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं यूरोप की समस्याएं नहीं हैं। इसी तरह जब पश्चिमी देशों ने रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और रूस से कच्चे तेल की खरीद पर सवाल उठाए तो उन्होंने ने उन्हें कड़ा जवाब देते हुए याद दिलाया कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और आम जनता के हितों को ध्यान में रखकर निर्णय लेता है। सुरक्षा और नैतिकता के सवाल पर यूरोप द्वारा भारत को उपदेश देने पर पलटवार करते हुए उन्होंने कहा था कि कोई भी यूरोपीय देश भारतीय हथियारों से कभी खतरे में नहीं पड़ा, लेकिन यूरोपीय हथियारों ने दशकों तक भारत के खिलाफ काम किया है। उनका इशारा पाकिस्तान को दिए जाने वाले हथियारों की ओर था। दरअसल श्री जयशंकर की उक्त स्पष्टोक्तियां यूरोपीय देशों के उस उलाहने के बाद आईं जिसमें ये कहा गया था कि भारत ने रूस के साथ निकटता के चलते यूरोपीय हितों को नजरंदाज किया। रूस से तेल खरीदने के प्रश्न पर उन्होंने दो टूक कहा कि यूक्रेन युद्ध के शुरू होने के बाद जब यूरोपीय देशों ने अरब के तेल उत्पादक देशों से तेल की खरीदी बढ़ाई तब अमेरिका ने ही भारत से अनुरोध किया था कि रूस से कच्चा तेल खरीदे जिससे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतें स्थिर रहें। उन्होंने ये कहने में भी संकोच नहीं किया कि उसके बाद अमेरिका ने भारत पर टैरिफ बढ़ाने जैसी हरकत की। हालांकि इसके पूर्व भी भारत सरकार कई मर्तबा ये कह चुकी है कि वह अपने व्यावसायिक हितों के अनुरूप निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है और जहां से सस्ता मिलेगा वहां से वह खरीदी करने में संकोच नहीं करेगी। दरअसल अमेरिका और यूरोपीय देश आज भी गोरी चमड़ी वाले श्रेष्ठता के भाव से ग्रसित हैं। भले ही उपनिवेशों का दौर इतिहास बन चुका हो किंतु यूरोप अभी तक यही मानकर चलता है कि उनके अधीन रहे एशियाई और अफ्रीकी देश उनको पूर्ववत सम्मान देते रहें और जैसा वे चाहें वैसा ही करें। चूंकि पाकिस्तान जैसे देश आज भी इन देशों के सामने दुम हिलाते घूमते रहते हैं इसलिए भारत से भी वे वैसी ही अपेक्षा करते हैं और पूरी नहीं होने पर अनुचित दबाव बनाने से नहीं चूकते। कूटनीति में चूंकि प्रतिवाद भी सही समय पर और नपे - तुले शब्दों में किया जाता है इसीलिये अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प हों या कोई और , भारत की ओर से उनकी कटाक्षपूर्ण टिप्पणियों का जल्दबाजी में जवाब नहीं दिया जाता। विपक्ष इसे लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने में जुटा रहता है लेकिन विदेश नीति के अनुभवी लोग जानते हैं कि इस क्षेत्र में जल्दबाजी नुकसानदेह होती है। इसराइल - हमास, रूस - यूक्रेन और अब अमेरिका - ईरान जंग के बारे में भारत सरकार की प्रतिक्रियाओं में जो संयम और संतुलन दिखा वह हमारी विदेश नीति की परिपक्वता का प्रमाण है। ये बात सही है कि स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की तरह श्री मोदी के पास विदेश नीति का समुचित अनुभव भले न हो किंतु उनमें योग्य व्यक्ति का चयन करने की जबर्दस्त क्षमता है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में अजीत डोभाल और विदेश मंत्री के लिये श्री जयशंकर का चयन प्रधानमंत्री की पैनी नजर का सबूत है। यद्यपि स्व. सुषमा स्वराज ने भी विदेश मंत्री रहते हुए मोदी सरकार के दबदबे को वैश्विक मंचों पर बखूबी स्थापित किया था जिसे उनके उत्तराधिकारी श्री जयशंकर ने और भी ऊंचाई प्रदान कर दी। हालांकि जिस तरह श्री डोभाल के पास गुप्तचर सेवा का व्यापक अनुभव था ठीक वैसे ही श्री जयशंकर को भी विदेश सेवा में रहते हुए चीन और अमेरिका में राजदूत रहने के बाद विदेश सचिव बनने से कूटनीतिक क्षेत्र का व्यापक तजुर्बा है। इसीलिए वे दुनिया के बड़े से बड़े नेता से मिलते समय या किसी भी वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास से भरे नजर आते हैं। कब , कहां और कितना बोलना है इस कला में पारंगत विदेश मंत्री ने हाल ही में एक विदेशी पत्रकार द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान युद्धविराम करवाने में अमेरिका की भूमिका पर जो जवाब दिया वह उन लोगों के लिए आँखें खोलने वाला है जो अभी भी ये राग अलापते रहते हैं कि भारत ने अमेरिका के दबाव में युद्ध रोक दिया। प. एशिया में चल रहे वर्तमान तनाव के दौरान भी हमारी विदेश नीति ने संजीदगी का परिचय देते हुए युद्ध में शामिल सभी पक्षों से संवाद कायम रखकर जिस तरह राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा की वह प्रशंसनीय है। प्रधानमंत्री श्री मोदी द्वारा हाल ही में की गई 5 देशों की यात्रा भी उसी दिशा में बढ़ाया गया कदम था।
- रवीन्द्र वाजपेयी