Friday, 27 March 2026

भारत की विदेश नीति कसौटी पर खरी साबित हुई


मध्यपूर्व में युद्ध के कारण उत्पन्न तेल और गैस संकट के लिए भारत की विदेश नीति पर उंगलियां उठाने वालों के लिए ये खबर निराशा उत्पन्न करने वाली होगी कि ईरान ने होर्मुज़ समुद्री मार्ग से पांच देशों के जल पोतों को आने - जाने की सुविधा प्रधान कर दी है। ईरान के विदेश मंत्री के अनुसार भारत, रूस , चीन , पाकिस्तान और ईराक चूंकि मित्र देश हैं इसलिए इनके लिए होर्मुज खुला रहेगा। इसके पहले भी भारत के अनेक जल पोत तेल और गैस लेकर उक्त समुद्री मार्ग से सुरक्षित स्वदेश लौट चुके हैं। युद्ध की शुरुआत में विपक्ष  के अलावा सरकार विरोधी लॉबी आरोप लगाती रही थी कि युद्ध के ऐन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजराइल यात्रा के दौरान उन्हें  इसकी जानकारी मिल गई थी। ईरानी  नेता खामेनेई के मारे जाने पर राष्ट्रीय शोक नहीं मनाने के फैसले पर भी सवाल उठे। हालांकि  विदेश सचिव ने ईरान के दूतावास जाकर शोक पुस्तिका में श्रद्धांजलि देकर कूटनीतिक संतुलन बनाए रखा। कुछ दिनों बाद भारत में नौसैनिक अभ्यास से लौट रहे ईरानी युद्धपोत को श्रीलंका के पास अमेरिकी पनडुब्बी ने डुबो दिया तब भी केंद्र सरकार की आलोचना हुई। लेकिन कुछ दिनों बाद ही एक अन्य ईरानी जल पोत द्वारा तकनीकी खराबी के कारण सहायता मांगे जाने पर उसे कोच्चि बंदरगाह पर रुकने की अनुमति देकर भारत सरकार ने ईरान की सहानुभूति अर्जित कर ली। साथ ही उसे दवाइयां एवं अन्य जरूरी सामग्री भेजकर मानवीय दृष्टिकोण का परिचय दिया। इससे  नाराज कतर नामक  देश ने भारत को गैस न देने की  धमकी दे डाली , जो हमारा सबसे बड़ा गैस आपूर्तिकर्ता है। लेकिन सरकार ने उसे दो टूक समझा दिया कि भारत अपने मानवीय कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सजग है। प्रधानमंत्री मोदी और इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू की निकटता जगजाहिर है।  भारत और इजराइल के बीच अस्त्र - शस्त्र के अलावा युद्ध तकनीक के सौदे भी सर्वविदित हैं। लेकिन इस युद्ध के दौरान भारत सरकार ने सावधानी भरी चतुराई का परिचय देते हुए संतुलन बनाए रखा। वहीं ईरान के  स्कूली बच्चों को मारे जाने की आलोचना करते हुए शांति से विवाद हल करने की अपील भी की। सबसे बड़ी बात ये रही कि युद्ध प्रभावित देशों में रहने वाले भारतीयों को सुरक्षित निकाल लाने के अभियान सफलतापूर्वक संचालित हुए। ईरान  में फंसे भारतीय नागरिकों की वापसी बड़ी समस्या थी जिसे कूटनीतिक पहल से हल किया गया। युद्ध के आगे बढ़ते ही पेट्रोल , डीजल और गैस की कमी होने लगी। ईरान द्वारा तेल उत्पादक देशों पर किए हमलों से वहां या तो उत्पादन बंद करना पड़ा या उसमें काफी कमी आ गई। लेकिन उससे बड़ी समस्या ईरान द्वारा हार्मुज समुद्री मार्ग अवरुद्ध किए जाने से उत्पन्न हुई। ऐसे में एक तरफ तो केंद्र सरकार ने वैकल्पिक स्रोतों से खरीदी शुरू की वहीं ईरान को भी इस बात के लिए राजी किया कि वह हार्मुज़ से उसके टैंकर निकलने की अनुमति दे। सौभाग्य से दोनों प्रयास सफल रहे। उल्लेखनीय डोनाल्ड ट्रम्प ने जब  भारत पर रूस से तेल न खरीदने का दबाव बनाया तब श्री मोदी ने अनेक अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों का दौरा कर तेल और गैस के सौदे कर लिए थे। वह बुद्धिमत्ता आज काम आ रही है और भारत अमेरिका, अर्जेंटीना, नाइजीरिया और ऑस्ट्रेलिया के  अलावा अनेक छोटे देशों से तेल और गैस की खरीदी कर उनकी कमी रोकने में काफी हद तक कामयाब हुआ जबकि पड़ोसी देशों में स्थिति गंभीर बनी हुई है। तेल कंपनियों द्वारा कीमतें बढ़ाए जाने की आशंका के बीच आज केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज घटाकर जो बुद्धिमत्ता दिखाई वह समय की मांग है। हालांकि अनेक शहरों से पेट्रोल और गैस के अभाव की खबरें आ रही हैं लेकिन स्थिति में सुधार भी दिख रहा है। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने ईरान सहित युद्ध में शामिल अन्य देशों के राष्ट्रप्रमुखों से बातचीत कर बेहतर संबंध बनाए रखे। दूसरी तरफ विदेश मंत्री जयशंकर भी सक्रिय रहकर वैश्विक स्तर पर भारत के प्रभाव को बनाए रखने में जुटे हैं। आज प्रधानमंत्री द्वारा राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बात कर संकट की इस घड़ी में केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय बनाए रखने की पहल भी समझदारी भरा कदम  है। एक महीने से चल रहे इस युद्ध से खुद को दूर रखते हुए संबंधित पक्षों के साथ रिश्ते बनाए रखना आसान नहीं था। लेकिन भारत ने ये कर दिखाया क्योंकि बीते कुछ सालों में हमारी विदेश नीति काफी व्यापक हुई है। प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं का मखौल उड़ाने वाले भले न मानें किंतु उनका फायदा अब  दिखाई दे रहा है। भारत को इसी नीति पर आगे भी चलते रहना चाहिए जिसमें बजाय भावनाओं में बहने के विशुद्ध राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी जाती है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 26 March 2026

बाहरी मदद के बिना लंबी लड़ाई नहीं लड़ सकेगा ईरान


मध्यपूर्व में भड़की आग ने ईरान और इजराइल के साथ ही अनेक खाड़ी देशों को लपेट  लिया है। अमेरिका और इजराइल की सैन्य शक्ति के मुकाबले के साथ ही ईरान ने सऊदी अरब , कतर , बहरीन , यू. ए. ई, ओमान और तुर्किये तक मिसाइलों से हमले किए।  विशालकाय अमेरिकी युद्धपोतों तक पर निशाना साधने में वह पीछे नहीं रहा। यहां तक कि हिन्द महासागर में स्थित ब्रिटेन और अमेरिका के सैन्य अड्डे डिएगो गार्सिया तक पर हमले का दुस्साहस कर बैठा। सैन्य मोर्चे के साथ ही ईरान ने होर्मुज नामक समुद्री मार्ग से जल पोतों की आवाजाही रोककर पूरी दुनिया में कच्चे तेल और गैस का संकट उत्पन्न कर दिया । दरअसल होर्मुज ईरान का तुरुप का पत्ता है। इसीलिए अमेरिका के मित्र देश भी अपना दामन बचाने में लग गए। ट्रम्प द्वारा युद्धविराम की घोषणा का मजाक उड़ाते हुए ईरान ने अपनी शर्तें जाहिर करते हुए कह दिया कि वह अमेरिका के सामने नहीं झुकेगा और उसने अपना हमलावर रुख जारी  रखा। युद्ध  रोकने की जो पहल अमेरिका ने की वह इज़राइल को भी रास नहीं आई और उसने ईरान के साथ ही लेबनान पर हमले तेज कर दिए। इस युद्ध में  सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि इजराइल से भी दो कदम आगे बढ़कर सऊदी अरब ने अमेरिका से मांग की है कि ईरान को पूरी तरह नेस्तनाबूत किया जाए जिससे मध्यपूर्व उसके आतंक से मुक्त हो सके। खाड़ी के अन्य मुस्लिम देश भी ईरान की कमर तोड़ने के समर्थक हैं जिन्हें लगने लगा है कि ईरान यदि इस युद्ध में से सकुशल निकल आया तब वह एक सैन्य महाशक्ति के तौर पर स्थापित हो जाएगा और उस स्थिति में उन देशों की सुरक्षा पर खतरे के बादल मंडराते रहेंगे। सबसे बड़ी चिंता उन्हें अपने तेल और गैस के परिवहन की है क्योंकि  युद्ध बिना किसी अंतिम निर्णय पर पहुंचे रुक गया तो ईरान  होर्मुज के जरिए अनुचित दबाव बनाने से बाज नहीं आएगा। इस युद्ध ने उसे इस समुद्री रास्ते का रणनीतिक महत्व समझा दिया है। इसीलिए भावी परिस्थितियों का अंदाज कोई नहीं लगा पा रहा। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि लड़ाई लंबी चलने पर ईरान आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक तौर पर पूरी तरह टूट चुका होगा। वहीं  राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व का सफाया होने से उसकी निर्णय क्षमता खत्म होने के बाद वह अव्यवस्था और अराजकता में फंसकर रह जायेगा। उस स्थिति में जिन पड़ोसी मुस्लिम   देशों को उसने अपना दुश्मन बना लिया वे भी हिसाब चुकता करने आगे आयेंगे। बड़ी बात नहीं ईरान भौगोलिक तौर पर विखंडन का शिकार हो जाए। डोनाल्ड ट्रम्प के लिए इस लड़ाई में जीत हासिल करना जीवन - मरण का सवाल है। इजराइल तो हर लड़ाई में कुछ न कुछ हासिल कर लेता है। लेबनान की काफी जमीन पर अपना कब्जा जमाकर उसने अपनी सीमा का विस्तार कर लिया। उससे भी ज्यादा फायदा उसे ये मिल रहा है कि सऊदी अरब के साथ ही खाड़ी के तेल संपदा सम्पन्न  देश ईरान के डर  से इज़राइल के साथ खड़े होने मजबूर हो गए। इस  कारण ईरान अकेला पड़ गया है। जो एक - दो इस्लामिक देश उसके साथ हैं वे भी कूटनीतिक और सामरिक तौर पर उतने ताकतवर नहीं हैं। ऐसे  में कहा जा सकता है कि ज्यादा बहादुर साबित होने के फेर में ईरान ने अपनी बर्बादी की पटकथा तैयार कर ली। उसे चाहिए था कि पड़ोसी देशों पर हमले से बचे क्योंकि इससे वे तटस्थ बने रहने बाध्य हो जाते। दूसरी गलती उसने होर्मुज से आवाजाही रोककर कर दी क्योंकि इस कदम ने उसे दुनिया की नजर में खलनायक बना दिया।  चीन और रूस भी सतही तौर पर उसके पक्ष में नजर आते हैं परन्तु  तेल और गैस की आपूर्ति रोके जाने के कारण वे भी ईरान से खुश नहीं हैं। ट्रम्प इस समुद्री मार्ग को खोलने का जो दबाव डाल रहे है उसका उद्देश्य भी तेल और गैस संकट दूर करना है । हालांकि ईरान ने भारत सहित कुछ देशों के जलपोतों को निकलने की सुविधा का ऐलान किया है किंतु अमेरिका ने अपनी चेतावनी के मुताबिक हमले तेज किए तो यह रास्ता फिर बंद हो जाएगा। ऐसी स्थिति में ईरान को चाहिए वह एक साथ सभी मोर्चे खोलने के बजाय जंग रोकने की बुद्धिमत्ता दिखाए। उस स्थिति में अमेरिका और इजराइल भी वैश्विक दबाव में आएंगे क्योंकि तेल और गैस का संकट पूरी दुनिया को परेशान किए हुए है। ईरान को ये बात समझ लेना चाहिए कि बिना  बाहरी मदद के वह ज्यादा समय तक लड़ नहीं सकेगा। वर्तमान परिस्थितियों में रूस यूक्रेन  में फंसा होने से उसकी सहायता करने में असमर्थ है। सीरिया में असद की सत्ता को भी वह इसीलिए नहीं बचा सका। रहा सवाल चीन का तो वह बहुत ही चालाक है। उसे ईरान का तेल तो चाहिए किंतु वह इस बात के लिए हमेशा सतर्क रहता है कि दूसरे को बचाने में उसका हाथ न जल जाए।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 25 March 2026

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला धर्मांतरण करने वालों को बड़ा धक्का


सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए कहा कि केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से जुड़े दलित ही अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त कर सकते हैं। अगर कोई दलित  धर्मांतरण कर ईसाई बनता है तो वह अनुसूचित जाति का दर्जा खो देगा। इसका कारण यह है कि हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म में ही अनुसूचित जातियां मौजूद हैं। फैसले में स्पष्ट तौर पर कहा गया कि कानून इस बात की इजाजत नहीं देता कि व्यक्ति  ईसाई धर्म का पालन करते हुए अनु . जाति को मिलने वाले लाभ ले। आंध्र प्रदेश में ईसाई धर्म अपनाने के बाद पादरी बन गए एक दलित ने किसी व्यक्ति पर जातिसूचक गाली देने का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज करवाया किंतु उच्च न्यायालय ने उसे सुनने से मना करते हुए कहा कि ईसाई बनने के बाद वह अनु. जाति के अंतर्गत प्राप्त संवैधानिक लाभ तथा संरक्षण का पात्र नहीं रहा। उस फैसले के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की गई जिसने उच्च न्यायालय के निर्णय को सही मानते हुए साफ कर दिया कि जो व्यक्ति अनु. जाति में नहीं आता, वह एससी-एसटी एक्ट का लाभ नहीं ले सकता। ऐसे मामलों में सामान्य धाराओं के तहत ही केस दर्ज करना होगा। इसके अलावा एक  और महत्वपूर्ण बात सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कही गई कि कोई दलित अन्य धर्म अपनाने के बाद दोबारा मूल धर्म में लौटता है, तो सिर्फ  इसकी घोषणा ही पर्याप्त नहीं होगी। उसे मूल समुदाय द्वारा अपनी घर वापसी को स्वीकार किए जाने संबंधी प्रमाण प्रस्तुत करना होगा जिसमें स्पष्ट हो कि वह पुरानी रीतियों का पालन कर रहा है।  सर्वोच्च न्यायालय का संदर्भित फ़ैसला इसलिए काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय से ये मांग सुनने में आ रही है कि ईसाई बने दलितों को भी अनु. जाति के अंतर्गत उससे जुड़े लाभ मिलें। अब सर्वोच्च न्यायालय ने  ही दो टूक कह दिया कि हिन्दू , बौद्ध और सिखों में ही जाति व्यवस्था है इसलिए ईसाई बने किसी दलित द्वारा आरक्षण से जुड़े संरक्षण या अन्य लाभों का दावा करना गैर कानूनी है। इस फैसले का दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। विशेष रूप से से हिन्दू समाज के दलित समुदाय के लोगों का ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन करवाने के अभियान के लिए ये फैसला किसी धक्के से कम नहीं। उल्लेखनीय है धर्मांतरण करने के बाद भी कुछ दलित अपने नाम के साथ जुड़ा जातिसूचक उपनाम नहीं बदलते। इसका उद्देश्य अनु. जाति को मिलने वाले लाभ प्राप्त करते रहना है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने  फैसले से अनेक भ्रांतियों को खत्म करते हुए स्पष्ट कर दिया कि जाति व्यवस्था हिन्दू , सिख और बुद्ध समुदाय में ही लागू है। ईसाई धर्म में इसका कोई प्रावधान नहीं है। इसीलिए हिन्दू धर्म छोड़कर ईसाई बन जाने वाला दलित आरक्षण या उससे जुड़े अन्य अधिकारों से अपने आप वंचित हो जाता है। इस फैसले का असर पंजाब में भी होगा जहां बड़ी संख्या में ईसाई मिशनरियों के प्रभाव में आकर दलित श्रेणी के सिख , ईसाइयत अपनाते जा रहे हैं। इस फैसले से वे भी अनु. जाति को मिलने वाले लाभ की पात्रता खो बैठेंगे। हो सकता है दलितों की राजनीति करने वाले राजनीतिक नेता सर्वोच्च न्यायालय के उक्त फैसले को दलित विरोधी बताकर उसकी आलोचना करने लगें और सर्वोच्च न्यायालय से पुनर्विचार की अपील भी की जाए। बड़ी बात नहीं संसद में उक्त फैसले को उलटने की मांग भी उठे। उल्लेखनीय है अनु. जाति और जनजाति को जातिगत भेदभाव के नाम पर भड़काने के साथ ही लालच देकर ईसाई बनाने का अभियान निरंतर जारी है। हालांकि 2014 के बाद केन्द्र में मोदी सरकार के आने के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में होने वाले धर्मांतरण में कमी आई है। मिशनरियों को विदेशों से मिलने वाले आर्थिक अनुदान पर भी शिकंजा कसा गया। उत्तर पूर्व के राज्यों में भी राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रभाव बढ़ने से मिशनरियों की गतिविधियों पर नियंत्रण लगा है। म.प्र, छत्तीसगढ़, उड़ीसा , महाराष्ट्र, आंध्र, झारखंड में व्याप्त नक्सली आतंक के सफाए से भी ईसाई मिशनरियों का अभियान कमजोर हुआ है। बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय का ताजा फैसला उन राजनीतिक ताकतों के लिए किसी तमाचे से कम नहीं जो विदेशी इशारे पर दलित समुदाय को मूल धारा से अलग कर देश में अलगाववाद को बढ़ावा देने में जुटी हुई हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 24 March 2026

युद्धविराम: ट्रम्प की बात का कोई भरोसा नहीं


गत दिवस इसी स्तम्भ में ईरान युद्ध में आने वाले कुछ घंटे महत्वपूर्ण होने की जो संभावना व्यक्त की गई थी वह सत्य साबित हुई । और शाम होते तक अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने आगामी पांच दिन तक ईरान के ऊर्जा केंद्रों पर हमला नहीं करने की घोषणा कर दी। उनके ऐलान से पूरी दुनिया ने राहत की सांस ली जिसका परिणाम  कच्चे तेल की कीमतों में 11 फीसदी जैसी बड़ी  गिरावट के रूप में देखने मिला। ट्रम्प के अनुसार ईरान से बातचीत के बाद उक्त फैसला लिया गया। दूसरी तरफ ईरान ने उनके दावे को गलत बताते हुए कह दिया कि लड़ाई रोकने जैसी कोई चर्चा नहीं हुई और वह अपने हमले जारी रखेगा। साथ ही युद्धविराम के लिए अपनी  पुरानी शर्तों को दोहरा दिया। इसी तरह इजराइल ने भी स्पष्ट कर दिया कि ईरान और लेबनान पर उसके हमले जारी रहेंगे। ईरान और इजराइल द्वारा ट्रम्प के उलट घोषणा किए जाने से तनाव जारी रहने की आशंका प्रबल हो गई है। इसीलिए कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट आज तेजी में बदलने लगी। आज ही ट्रम्प का एक और गैर जिम्मेदाराना बयान आ गया जिसमें कहा गया कि ईरान पर हमला उन्होंने अपने रक्षा सचिव के कहने पर किया था। ये खबर भी आ गई कि उपराष्ट्रपति वेंस इस हमले के विरुद्ध थे। ट्रम्प प्रशासन के भीतर भी इस मामले को लेकर मतभेदों की जो खबरें बाहर आ रही हैं उनके अनुसार अमेरिका को केवल ईरान की परमाणु इकाइयों को नष्ट करना था किंतु वह बड़े युद्ध में उलझ गया। इस  संबंध में ट्रम्प के बयान पहले दिन से ही विरोधाभासी रहे हैं। दो दिन पहले तक वे ईरान  को पूरी तरह कमजोर करने का दावा कर रहे थे।  48 घंटे में होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों की आवाजाही नहीं खोलने पर उसके ऊर्जा केंद्रों पर हमले की उनकी धमकी के जवाब में ईरान ने भी वैसा ही करने की धौंस दे डाली। इसके बाद इस लड़ाई के खतरनाक रूप लेने की सम्भावना बढ़ने लगी। उधर टर्की , मिस्र और कतर सहित कुछ अन्य मुस्लिम देश भी युद्धविराम के लिए कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय हो गए। लेकिन आश्चर्य की बात ये है कि ट्रम्प इस बाबत पाकिस्तान से बात कर रहे हैं जिसकी न ईरान से पटरी बैठ रही है और न ही इजराइल से कोई रिश्ता है। ऐसे में इस युद्धविराम का कोई ठोस कारण और फायदा किसी की समझ में नहीं आ रहा। होर्मुज से समुद्री यातायात खुलवाने में अन्य देशों द्वारा सहायता  नहीं करने के बाद ट्रम्प ने ये कहकर पल्ला झाड़ लिया कि जिन्हें इसकी जरूरत हो वे ही आगे आएं। लेकिन इस बात का उनके पास कोई जवाब नहीं है कि ईरान पर हमले के पहले उसने किसी से  चर्चा क्यों नहीं की? बहरहाल मौजूदा स्थिति में सबसे ढुलमुल स्थिति अमेरिका की है। ट्रम्प रोजाना नए - नए दावे करते हैं। संभवतः वे पहले ऐसे  राष्ट्रपति हैं जिनकी विश्वसनीयता अमेरिका के परम्परागत मित्र देशों तक में नहीं बची। इसमें दो राय नहीं कि यदि नाटो में शामिल सभी देश ईरान के विरुद्ध मोर्चा खोल देते तो उसकी अकड़ कम हो जाती। संयोग से इजराइल और अमेरिका दोनों भौगोलिक दृष्टि से  काफी दूर होने से उनकी फौजों के लिए ईरान में प्रवेश काफी कठिन है। इसीलिए ये जंग हवाई माध्यम से ही लड़ी जा रही है। वैसे ट्रम्प का सिरफिरापन देखते हुए ये कहना मुश्किल है कि वे युद्धविराम की घोषणा पर कायम भी रहेंगे । बड़ी बात नहीं  होर्मुज  और खार्ग द्वीप की घेराबंदी के लिए व्यूह रचना बनाने उन्होंने समय लिया हो। कूटनीतिक क्षेत्रों में ये चर्चा भी है कि ईरान द्वारा घुटना टेकने से इंकार किए जाने से ट्रम्प की हताशा बढ़ रही है और वे किसी तरह अपना पिंड छुड़ाना चाह रहे हैं । हालांकि ऐसा करना इजराइल के साथ धोखा होगा । बीते कुछ दिनों से ट्रम्प और इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू के बीच मतभेद की खबरें भी आती रही हैं। दरअसल इजराइल इस जंग को अंजाम तक पहुंचाना चाहता है ताकि ईरान रूपी खतरा हमेशा के लिए खत्म हो जाए। मध्यपूर्व  के अन्य देश भी उसके साथ हैं। लेकिन ट्रम्प की हरकतों से लगता है वे इजराइल के साथ भी यूक्रेन जैसा व्यवहार करते हुए उसे अधर में फंसाकर चलते बनेंगे। असल में ट्रम्प ने इस युद्ध से कुछ लक्ष्य तो हासिल कर ही लिए। पहला ईरान को इस तबाही से उबरने में दशकों लग जाएंगे और दूसरा मध्यपूर्व के तेल उत्पादक देशों की क्षमता घट गई जिसके कारण अमेरिका अब वेनेजुएला का तेल और अपनी गैस बेचकर धन  कमाएगा। तीसरा लाभ उसे ये हो गया कि दुनिया भर में डॉलर के विरुद्ध जो मोर्चेबंदी चल रही थी उस पर विराम लग गया। ट्रम्प की नीतियों में कूटनीति से ज्यादा व्यापारिक हित  नजर आते हैं इसीलिए अपने लाभ के लिए वे किसी को भी धोखा देने में संकोच नहीं करते।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 23 March 2026

ईरान में चल रही जंग में आने वाले कुछ घंटे महत्वपूर्ण


ईरान से शुरू हुआ युद्ध प्रत्यक्ष तौर पर तो मध्य पूर्व और खाड़ी देशों तक सीमित है लेकिन इससे पूरी दुनिया में अभूतपूर्व ऊर्जा संकट उत्पन्न हो गया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा उत्पन्न टैरिफ संकट से वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले  ही अस्त - व्यस्त थी। लेकिन ईरान के साथ अमेरिका और इजराइल की इस जंग ने सब कुछ उलट - पुलट दिया। प्राप्त जानकारी के अनुसार ईरान अपना तेल चीन को बेचने  के अलावा होर्मुज समुद्री मार्ग से तेल टैंकरों को सुरक्षित निकलने के नाम पर अनाप - शनाप  की कमाई कर रहा है। जबकि सऊदी अरब सहित अन्य खाड़ी देशों में तेल और गैस का उत्पादन ठप पड़ जाने से आर्थिक संकट  है। ट्रम्प द्वारा युद्ध विराम की पेशकश पर ईरान ने  नुकसान की भरपाई के अलावा आगे हमला नहीं करने की शर्त रखकर  स्पष्ट कर दिया कि वह आसानी से हार नहीं मानेगा। ट्रम्प द्वारा 48 घंटे में होर्मुज नहीं खोलने पर उसके तेल और गैस भंडार नष्ट किए जाने की धमकी के जवाब में ईरान ने इजराइल सहित अन्य खाड़ी  देशों में समुद्री जल को पीने योग्य बनाने के लिए लगाए संयंत्रों पर  हमले का ऐलान कर दिया। कुल मिलाकर  अमेरिका और इजराइल के अलावा ईरान भी इतना आगे बढ़ चुका है कि किसी के लिए भी पीछे हटना आत्महत्या करने जैसा होगा। ये आकलन करना भी कठिन है कि अब तक किसका पलड़ा भारी है क्योंकि अमेरिका और इजराइल के  हमलों से ईरान ने न सिर्फ  बचाव किया अपितु पलटवार करने में भी कोई  कसर नहीं छोड़ी । यद्यपि ट्रम्प और नेतन्याहू ने ईरान के  राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व की प्रथम पंक्ति को लगभग समाप्त कर दिया किंतु उसके बाद भी यदि वह हमले का जवाब उसी  शैली में दे रहा है तब ये मान लेना  होगा कि ईरान के बड़े नेताओं, सैन्य अधिकारियों और वैज्ञानिकों के ठिकानों की सटीक जानकारी लगाकर उन्हें मार देने में सफल होने के बाद भी अमेरिका और इजराइल ये जानने में विफल रहे कि उसके पास मिसाइलों का कितना भंडार है और वह कितने दिन तक जंग में टिका रह सकता है। ये  भी गौरतलब है कि अभी तक मुकाबला मिसाइलों और ड्रोन तक  ही सीमित है। अमेरिका और इजराइल ने जरूर ईरान के अंदरूनी ठिकानों पर हवाई हमले कर बमवर्षा की लेकिन ईरान पूरी तरह मिसाइलों के जरिए ही आक्रमण कर रहा है। इजराइल ने जब ईरान के परमाणु संयंत्र पर हमला किया तो जवाब में उसने भी इजराइल के परमाणु संयंत्र पर मिसाइलें दागकर हिसाब बराबर कर दिया। इसी के साथ हिन्द महासागर में डिएगो गार्सिया स्थित ब्रिटिश और अमेरिकी अड्डे पर भी उसने मिसाइलों से हमला करने में संकोच नहीं किया। युद्ध विश्लेषकों का कहना है ईरान का ये दुस्साहस इस लड़ाई को नया मोड़ दे सकता है। कुछ तो इसकी तुलना दूसरे विश्व युद्ध में जापान द्वारा दक्षिण एशिया में पर्ल हार्बर के अमेरिकी अड्डे पर किए हमले से कर रहे हैं जिससे बौखलाकर अमेरिका ने जापान पर परमाणु बम गिरवाकर उसे घुटने टेकने बाध्य कर दिया। यद्यपि डोनाल्ड ट्रम्प और नेतन्याहू ईरान पर परमाणु हमले जैसा कदम तो नहीं उठाएंगे क्योंकि  विश्व जनमत इसे बर्दाश्त नहीं करेगा । लेकिन इजराइल ,  ईरान को घायल कर छोड़ने के पक्ष में नहीं है इसलिए संभावना  है कि वह अमेरिका के साथ मिलकर ऐसा कुछ अवश्य करेगा जिससे कि ईरान पूरी तरह से निहत्था और असहाय होकर रह जाए। सबसे महत्वपूर्ण ये है कि एक -  दो को छोड़कर बाकी पश्चिम एशियाई मुस्लिम देश भी इजराइल के सुर में सुर मिलाते हुए ईरान की कमर तोड़ने का समर्थन कर रहे हैं क्योंकि  उनकी तेल संपदा को उसके हमलों से जो नुकसान हुआ उसके कारण उनका आर्थिक ढांचा चरमरा गया। खाड़ी देशों में होने वाले विदेशी पूंजी निवेश के दरवाजे भी ईरान की मिसाइल और ड्रोन हमलों ने बंद कर दिए। अमेरिका के लिए भी ये लड़ाई प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है वरना उसका बचा - खुचा आभामंडल भी फीका पड़ जाएगा। जहां तक बात इजराइल की है तो इस जंग का अंतिम परिणाम जो भी हो किंतु जिन पड़ोसी मुस्लिम देशों पर ईरान ने हमले किए वे स्वाभाविक रूप से उसके साथ जुड़कर एक क्षेत्रीय गठबंधन बनाने के लिए बाध्य होंगे। आने वाले कुछ घंटों  में मध्य एशिया में किसी बड़ी घटना की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि प्रशांत महासगर से अमेरिकी नौसैनिक ईरान के खार्ग द्वीप की घेराबंदी करने पहुंच रहे हैं। इसका उद्देश्य ईरान की आय के स्रोत को बाधित कर देना है। इसके बाद वह क्या पैंतरा दिखाता है उस पर इस लड़ाई का फैसला निर्भर करेगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 21 March 2026

मौके का फायदा उठाकर चीन भी ताईवान कब्जाने की फिराक में



पहले रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला कर उसके बड़े भूभाग पर कब्जा करना, फिर अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति को सपत्नीक उठाकर ले आना और ग्रीनलैंड पर अधिकार जताना, ईरान पर इजराइल के साथ हमला करना और अब डोनाल्ड ट्रंप द्वारा क्यूबा पर कब्जे की धमकी देने से पूरी वैश्विक व्यवस्था अस्त व्यस्त हो चली है। ईरान द्वारा होर्मुज  समुद्री मार्ग से आवागमन अवरुद्ध करने से दुनिया भर में तेल और गैस का अभूतपूर्व संकट उत्पन्न हो गया है। अमेरिका की पहल पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने गत दिवस आपातकालीन बैठक बुलाकर होर्मुज खुलवाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मोर्चेबंदी का प्रयास किया। नाटो देश इस लड़ाई में अमेरिका की अपेक्षानुसार चूंकि सहयोग नहीं दे रहे इसलिए ट्रम्प उन्हें कायर बताकर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। लगभग रोजाना वे दावा कर रहे हैं कि ईरान की सैन्य शक्ति को कमजोर कर दिए जाने से वह ज्यादा दिनों तक लड़ने लायक नहीं बचा किंतु उनके दावों को गलत साबित करते हुए ईरान , इजराइल सहित उन पड़ोसी देशों को भी निशाना बना रहा है जिन्हें अमेरिका समर्थक माना जाता है। आज तो उसने हजारों किलोमीटर दूर हिन्द महासागर स्थित डिएगो गार्सिया में अमेरिका और ब्रिटेन के संयुक्त सैन्य अड्डे पर मिसाइल हमला कर लड़ाई का दायरा और बढ़ा दिया। हालांकि एक मिसाइल को नष्ट कर दिया गया वहीं दूसरी लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही गिर गई किंतु ईरान के इस कदम से अब इस युद्ध में नया मोड़ आता दिख रहा है। कुछ दिनों पहले ईरान ने धमकी दी थी कि वह अमेरिका के तटीय इलाकों पर ड्रोन से हमला करने वाला है जिसके बाद अमेरिका में आंतरिक सुरक्षा के इंतजाम और कड़े कर दिए गए। अभी तक ईरान के समर्थन में रूस और चीन जैसी दो बड़ी विश्व शक्तियाँ मुखर हुई हैं किंतु वे इस लड़ाई से दूर ही हैं। इसी कारण ईरान को अकेले ही जूझना पड़ रहा है। जहां तक सवाल रूस का है तो वह यूक्रेन के साथ चल रही जंग में इतनी बुरी तरह उलझा हुआ है कि वहां से निकलकर ईरान की मदद करना उसके लिए न तो संभव है और न ही व्यवहारिक। लेकिन  ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीददार रहा चीन इस लड़ाई में उसकी मदद को क्यों नहीं आगे आया ये सवाल विश्व राजनीति में रुचि रखने वालों के मस्तिष्क में कौंध रहा है। यहां ये भी उल्लेखनीय है कि वेनेजुएला से भी चीन बड़ी मात्रा में तेल खरीदता था किंतु उसके राष्ट्रपति का अपहरण कर अमेरिका द्वारा वहां के तेल भंडारों पर आधिपत्य जमाने के बावजूद चीन ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। इस बारे में स्पष्ट है कि चीन और अमेरिका के रिश्ते डोनाल्ड ट्रम्प के दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद से तनावपूर्ण चल रहे हैं। रूसी तेल की खरीद के कारण ट्रम्प ने भारत सहित चीन पर भी भारी - भरकम टैरिफ थोप दिया । ऐसे में उम्मीद की जा रही थी कि चीन ईरान के बचाव में उतरेगा किंतु अब तक तो इसके कोई संकेत नहीं मिले। हालांकि चीन की तरफ से अमेरिका विरोधी बयान जरूर आए किंतु ऐसा कहीं से भी नहीं लगा कि वह खुलकर उसकी मदद हेतु आयेगा। वैश्विक मामलों पर नजर रखने वालों ने इसका जो कारण बताया वह बेहद चौंकाने वाला है। उनका मानना है कि रूस द्वारा यूक्रेन और अमेरिका द्वारा वेनेजुएला में की गई कार्रवाई के बाद ईरान पर हमला और फिर ग्रीनलैंड के अलावा क्यूबा पर कब्जे को लेकर की जा रही बयानबाजी के कारण चीन भी ताईवान पर हमला कर अपनी वन चाइना की महत्वाकांक्षी कार्ययोजना को अंजाम देने पर भीतर - भीतर तैयारी कर रहा है। यद्यपि ताईवान की रक्षा हेतु भी अमेरिकी बेड़े सदैव तैनात रहते हैं लेकिन होर्मुज समुद्री मार्ग खुलवाने के लिए प्रशांत क्षेत्र से अनेक अमेरिकी पोत ईरान की तरफ रवाना होने से इस क्षेत्र में अमेरिका की सैन्य उपस्थिति प्रभावित हो रही है। चीन इसी स्थिति का लाभ लेकर ताईवान को हड़पने की फिराक में है। सामान्य परिस्थितियों में अमेरिका इतनी आसानी से उसे ऐसा नहीं करने देता किंतु वर्तमान में वह ईरान की जंग में बुरी तरह फंस गया है। सबसे बड़ी बात विश्व जनमत की ओर से होने वाले विरोध का डर भी कम हुआ है। चीन के वर्तमान नेतृत्व का सोचना है रूस और अमेरिका द्वारा किसी दूसरे देश की सार्वभौमिकता पर हमला किये जाने के बाद न तो संयुक्त राष्ट्र संघ उनका कुछ बिगाड़ पाया और न ही दुनिया के तमाम देश उन्हें रोक सके। और फिर ताईवान तो  मूल रूप से उसी का भूभाग रहा है। ये आशंका कितनी सच साबित होगी कहना कठिन है किंतु चीन और चालाकी एक दूसरे के समानार्थी हैं। ऐसे में यदि मौके का लाभ उठाकर वह ताईवान पर कब्जा करने की कार्रवाई करे तो उसे रोकना मुश्किल होगा। रूस और अमेरिका ने उसकी हिम्मत बढ़ा दी है। यदि ऐसा हुआ तब दुनिया  एक और जंग झेलने मजबूर हो जाएगी।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 20 March 2026

अपनी बर्बादी के लिए ईरान खुद जिम्मेदार


ईरान पर अमेरिका और इजराइल की सैन्य कार्रवाई के कारण भड़की लड़ाई तीन सप्ताह  के बाद भी रुकने का नाम नहीं ले रही  किंतु ये स्पष्ट  है कि ईरान की कमर टूटने लगी है। यद्यपि वह इजराइल , कतर , सऊदी अरब , बहरीन , ओमान में मिसाइलें और ड्रोन छोड़कर  तेल और गैस भंडार तथा रिफाइनरियों को नुकसान पहुंचा रहा है । होर्मुज नामक समुद्री मार्ग से तेल और गैस की आपूर्ति रोककर उसने दुनिया को संकट में डाल दिया। दो दिन पहले जब डोनाल्ड ट्रम्प ने नाटो देशों  से  होर्मुज खुलवाने सहयोग मांगा तब सभी ने ट्रम्प को  ठेंगा दिखा दिया किंतु अब वे  तैयार हो गए हैं। दूसरी तरफ सऊदी अरब ने भी ईरान को  चेतावनी दी है कि वह हमले बंद करे वरना उसके सब्र का बांध टूट जाएगा। ऐसी ही धमकी वे सभी देश दे रहे हैं जिन पर ईरान मिसाइलें दाग रहा है।  आज इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने तो पत्रकार वार्ता में उपस्थित होकर अपने जीवित रहने का प्रमाण दे दिया। वहीं अपने नेताओं के मारे जाने का सिलसिला जारी रहने से  कमजोर  होकर ईरान बदहवासी में हमले कर रहा है।  लेकिन इसकी कीमत उसे अपनी बर्बादी के तौर पर चुकानी पड़ रही है। अमेरिका और इजराइल के दावे कुछ हद तक अतिरंजित हो सकते हैं। लेकिन ईरान की नौसेना अमेरिकी घेराबंदी को तोड़ नहीं सकी। दुनिया भर में ईरान इस बात के लिए तो प्रशंसा बटोर रहा है कि उसने अभी तक अमेरिका के सामने घुटने नहीं टेके और इजराइल के अभेद्य सुरक्षा तंत्र में भी सेंध लगा दी परंतु अपनी ताकत का जरूरत से ज्यादा आकलन करने के साथ ही  ढेर सारे मोर्चे खोलकर उसने मुस्लिम देशों की  सहानुभूति  खो दी। लड़ाई लंबी खिंचेगी या युद्धविराम हो जाएगा ये  अभी अनिश्चित है क्योंकि इजराइल नहीं चाहेगा कि ईरान को घायल अवस्था में छोड़कर दोबारा सिर उठाने का मौका दिया जाए। मौके का लाभ उठाकर वह लेबनान की जमीन हथियाता जा रहा है। इधर अमेरिका और इजराइल  ईरान की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह नेस्तनाबूत करने के  लिए उसके सैन्य , व्यावसायिक, प्रशासनिक ठिकानों के साथ ही तेल और गैस भंडारों को नष्ट कर रहे हैं। शस्त्र भंडार और सैन्य उत्पादन इकाइयां जमींदोज हो जाने से उसका रक्षा उत्पादन ठप पड़ गया है। वहीं बैलेस्टिक मिसाइलों और ड्रोन के भंडार खाली होने के कारण  मारक क्षमता भी दिन ब दिन घट रही है। यदि नाटो देश होर्मुज से समुद्री परिवहन के लिए एकजुट होकर आगे आए तब ईरान के लिए मुकाबला करना आसान नहीं रहेगा। आज उसे अपनी वह गलती कचोट रही होगी जब उसने हमास को उकसाकर इजराइल पर हमला करवा दिया। दरअसल मौजूदा युद्ध की नींव हमास के उस हमले से ही पड़ी । उस समय भी इजराइल ने पलटवार करते हुए हमास के संरक्षक ईरान पर जबरदस्त हवाई हमले किए थे। हालांकि वह लड़ाई  लंबी नहीं चली लेकिन गाजा पूरी तरह मलबे के ढेर में बदल गया । इस युद्ध का अंतिम परिणाम जो भी हो किंतु ईरान  में चौतरफा विनाश का जो मंजर दिखाई दे रहा उसे देखते  हुए उसकी कथित बहादुरी भी यूक्रेन की  तरह से ही हँसी का पात्र बनकर रह गई। ईरान की सत्ता जिन लोगों के पास है वे कितनी भी डींगें हांके किंतु हर पल बर्बादी उन्हें घेरती जा रही है जिसका परिणाम सिवाय पराजय के और हो ही नहीं सकता। इसके बाद ईरान मे खामेनेई शैली का इस्लामी कट्टरवाद जारी रहेगा, शाह रजा पहलवी वाला राजतंत्र लौटेगा या कोई नई व्यवस्था उत्पन्न होगी ये कह पाना कठिन है। अरब जगत के इस बड़े और ताकतवर देश के विनाश के लिये जाहिर तौर पर तो इजराइल और अमेरिका जिम्मेदार हैं लेकिन सही बात ये है कि खामेनेई के रहते अड़ियलपन और अव्यावहारिक नीतियां अपनाकर ईरान ने अपने पांव पर खुद ही कुल्हाड़ी मार ली जिसके कारण  देश दशकों पीछे चला गया। और क्या पता युद्ध के बाद वह एकजुट  रहेगा या उसके कई टुकड़े हो जाएंगे। 


-रवीन्द्र वाजपेयी