हालांकि अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प की पराजय के संकेत स्पष्ट तौर पर मिल रहे थे लेकिन उसके बाद भी वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बनी रही। ये माना जा रहा था कि अमेरिकी जनता की नाराजगी दूर करने के लिए शायद वे ईरान युद्ध को रोककर शांति स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाकर अपनी छवि में सुधार करने का दाँव चलेंगे। लेकिन मतदान के ठीक पहले ट्रम्प ने ईरान पर जबरदस्त हवाई हमलों की कारवाई कर डाली। उनका वह निर्णय वाकई चौंकाने वाला था क्योंकि तमाम सर्वेक्षण ये बता रहे थे कि ईरान के साथ चल रही जंग से अमेरिकी जनता बेहद नाराज है क्योंकि उसके कारण उनके देश को हासिल तो कुछ हुआ नहीं उल्टे महंगाई की मार पड़ गई। सबसे बड़ा नुकसान अमेरिका के दबदबे में कमी होने के रूप में सामने आया। ट्रम्प को लगता था कि ईरान कुछ दिनों में घुटने टेक देगा लेकिन उसने जो पलटवार किया उसकी वजह से पूरा प. एशिया युद्ध की लपटों में घिर गया। अमेरिका की सैन्य शक्ति की पोल खुलना उसका सबसे बड़ा नुकसान है। गैर जिम्मेदाराना धमकियों की वजह से भी उनकी जगहंसाई हुई। कल चुनाव परिणाम आने के बाद ट्रम्प के साथ ही उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने स्वीकार किया कि उनकी पार्टी की जबरदस्त पराजय का कारण ईरान के साथ युध्द ही है। इससे ऐसा लगा कि इस हार के बाद ट्रम्प लड़ाई रोकने का फैसला करेंगे। इसी उम्मीद में अमेरिका सहित पूरी दुनिया के शेयर बाजार गुलजार हो उठे। भारत में भी निवेशकों की बल्ले - बल्ले हो गई। कच्चे तेल के दाम भी तेजी से नीचे आये। लेकिन इसके बाद उन्होंने एक बार फिर वही सब कहना शुरू कर दिया जिसकी वजह से उनकी फजीहत हुई। इसलिए ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि प. एशिया में शांति स्थापित होगी और कच्चे तेल की आपूर्ति में आये व्यवधान के कारण वैश्विक स्तर पर जो उथलपुथल मची वह भी रुक जाएगी। इसका कारण ट्रम्प का यह बयान है कि अगर उन्हें दोबारा मौका मिले, तो भी वह ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का ही फैसला लेंगे ताकि तेहरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोका जा सके। उन्होंने ये डींग भी हाँकी कि जंग को कब रोकना है, यह पूरी तरह उनके विवेक पर निर्भर करेगा। यद्यपि रक्षा विशेषज्ञों का सोचना है कि घरेलू राजनीतिक परिस्थितियों में आये बदलाव के बाद अब उन पर ईरान के साथ कूटनीतिक समझौता कर लड़ाई रोकने का दबाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है। भले ही ट्रम्प ये दावा कर रहे हैं कि वे राष्ट्रपति को प्राप्त वीटो के अधिकार का उपयोग कर कांग्रेस ( संसद )के निर्णयों को लागू होने से रोकेंगे किंतु दोनों सदनों कब्जा कर चुके डेमोक्रेट्स ट्रम्प प्रशासन की युद्ध नीतियों पर नियंत्रण करने की तैयारी कर रहे हैं। इसके अंतर्गत युद्ध के खर्चों और सैन्य बजट की कड़ी समीक्षा के अलावा राष्ट्रपति को प्राप्त बिना कांग्रेस की मंजूरी के युद्ध जारी रखने की सैन्य शक्तियों को सीमित करने के लिए कानून लाने के संकेत भी मिल रहे हैं। कूटनीतिक चैनलों से आ रही खबरों के अनुसार मध्यावधि चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की ऐतिहासिक शिकस्त से ट्रम्प बैकफुट पर आ गए हैं। और कतर व ओमान जैसे बिचौलियों के जरिए पर्दे के पीछे शांति वार्ता फिर से तेज हो गई है। लेकिन जब तक ईरान के साथ होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी सैन्य गतिरोध खत्म नहीं होता और दोनों देश किसी ठोस समझौते तक नहीं पहुँचते तब तक युद्ध के पूरी तरह रुकने की उम्मीद व्यर्थ है। इतना जरूर है कि कांग्रेस में बहुमत खो देने के बाद ट्रम्प अपने देश में तो कमजोर हुए ही हैं साथ ही विदेश नीति के मोर्चे पर भी उनकी हैसियत में कमी आई है। देखना ये है कि वे इस बदलाव के मुताबिक खुद में सुधार लाते हैं या कुत्ते की पूँछ की तरह टेढ़े ही बने रहते हैं। वैसे मूलतः ट्रम्प एक व्यवसायी हैं। युद्ध के बीच भी कूटनीतिक बैठकों में अपने बेटे और दामाद को भेजकर वे आर्थिक लाभ की कोशिश करते रहे जो किसी भी दृष्टि से शोभनीय नहीं था । लेकिन उनके लिए गरिमा जैसे शब्द बेमानी हैं। इसलिए अमेरिकी जनता द्वारा दिये गए इस जोरदार झटके के बावजूद यदि वे पहले जैसे पागलपन का प्रदर्शन करते रहें तो आश्चर्य नहीं होगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी