कल दोपहर से राजनीति में रुचि रखने वालों का ध्यान तीन राज्यों में हुए विधानसभा उपचुनावों के परिणामों ओर केंद्रित हो गया। हालांकि गुजरात के नतीजे को ज्यादा महत्व नहीं मिला जबकि भाजपा ने बड़े अंतर से उस सीट पर कब्जा बनाये रखा। लेकिन बिहार की बाँकीपुर और म.प्र की दतिया सीट के परिणामों ने सुबह से ही राजनीतिक नेताओं के अलावा समाचार माध्यमों को भी व्यस्त कर दिया। इसका कारण दोनों जगहों पर भाजपा को पराजय मिलना बना। चूंकि तीनों राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं इसलिये नतीजों का विश्लेषण उसी के इर्द - गिर्द घूम रहा है। बीते कुछ महीनों से देश में भाजपा विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध में मुहिम चलाई जा रही है इसीलिये गुजरात में कांग्रेस की हार को चर्चा योग्य नहीं माना गया जबकि दतिया तथा बाँकीपुर में भाजपा की पराजय सुर्खियां बटोर ले गई। ये स्वाभाविक भी था क्योंकि भले ही दतिया की सीट 2023 में भी कांग्रेस ने जीती थी किंतु प्रदेश में बहुमत वाली सरकार और सभी लोकसभा सीटों पर कब्जे के बाद भी दतिया में बड़ी हार भाजपा के लिए विचारणीय भी है और चिंतनीय भी। हालांकि शिवराज सिंह चौहान की सरकार के समय दमोह के विधानसभा उपचुनाव में भाजपा को इससे भी बड़ी हार देखने मिली थी। हुआ यूँ कि कांग्रेस विधायक ने भाजपा में आने पर त्यागपत्र दिया तब उपचुनाव में पार्टी ने उनको मैदान में उतार दिया। इससे दमोह के कद्दावर नेता जयंत मलैया नाराज हो गए और फिर वही सब हुआ जिसकी पुनरावृत्ति दतिया में देखने मिली। यद्यपि उसके बाद 2023 में भाजपा ने शिवराज के नेतृत्व में धमाकेदार जीत अर्जित कर सरकार बनाई और लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया। कहने का आशय ये है कि दतिया में भाजपा की हार को कांग्रेस सत्ता में वापसी मानकर आश्वस्त हो जाए तो वह मुगालते में रहेगी क्योंकि इस नतीजे के पीछे नरोत्तम मिश्रा को टिकिट नहीं मिलने से उत्पन्न आंतरिक कलह भी कारण बनी और दूसरा भाजपा में हार की समीक्षा कर भविष्य के लिए सावधान रहने की जो क्षमता है वह कांग्रेस की खुशी को स्थायी रहने देगी इसमें संदेह है। हालांकि प्रदेश कांग्रेस की कमान जिन युवाओं के हाथ है उनके लिए जरूर ये जश्न मनाने का अवसर है क्योंकि ये साबित हो गया कि पार्टी बिना कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के भी चलाई जा सकती है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और मुख्यमंत्री मोहन यादव के लिए इस हार से संगठन और सरकार को उबारना बड़ी चुनौती होगी क्योंकि नरोत्तम की पीढ़ी के जो नेता अपने भविष्य के प्रति चिन्तित हो उठे थे उन्हें संजीवनी मिल गई है। लेकिन कल आये तीन परिणामों में बिहार की बाँकीपुर सीट अचानक राष्ट्रीय राजनीति में चर्चित हो उठी क्योंकि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन वहाँ से पाँच बार विधायक रहे। राज्यसभा के लिए चुने जाने पर उन्होंने उससे इस्तीफा दे दिया। उनके पिता भी वहीं से विधायक बनते रहे। इसलिये भाजपा वहाँ अति आत्मविश्वास से भरी हुई थी। लेकिन पहले तो उसने जिसे टिकिट दी वह पीछे हट गया और दूसरा प्रत्याशी उतारे जाने पर जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने मैदान में उतरकर सबको चौंका दिया। विधानसभा चुनाव में जनसुराज की दुर्गति के आधार पर भाजपा और तेजस्वी यादव की आरजेडी प्रशांत को हलके में लेने की गलती कर बैठे। नीतीश कुमार को हटाकर सम्राट चौधरी की ताजपोशी करवाकर भाजपा ने बिहार की गद्दी तो हासिल कर ली किंतु नीतीश समर्थक उस निर्णय को पचा नहीं सके थे। और फिर एक ब्राह्मण युवक का एनकाउंटर भाजपा के प्रतिबद्ध सवर्ण मतदाताओं की नाराजगी की वजह बन गया। यही वजह रही कि राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट पर भी पार्टी संगठन अपने मतदाताओं को मतदान केंद्र तक नहीं ला सका। लेकिन उसका लाभ बजाय तेजस्वी के प्रत्याशी को मिलने के प्रशांत को मिलने से ये बात उजागर हो गई कि बिहार में लालू की राजनीतिक विरासत खत्म होने को है। हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि प्रशांत किशोर वहाँ वैकल्पिक राजनीति के ध्वजवाहक बन जायेंगे किंतु उनका उदय लालू ब्रांड राजनीति को हाशिये में धकेलने का कारण तो बन ही सकता है। कुछ लोग इन परिणामों को जेन जी आंदोलन से जोड़ रहे हैं जो निरर्थक है क्योंकि उपचुनाव सदैव स्थानीय मुद्दों से प्रभावित होते हैं। वरना गुजरात में भी भाजपा को हार का सामना करना पड़ता। बावजूद इसके म.प्र और बिहार में मिली पराजय भाजपा के लिए चेतावनी भी है और चुनौती भी क्योंकि इससे उसके विरोधियों का उत्साहवर्धन तो हुआ ही है।
- रवीन्द्र वाजपेयी