Friday, 29 May 2026

नक्सलियों के सफाए के बाद अब घुसपैठियों पर अमित शाह की नजर


केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने  कहा है कि  ममता बनर्जी  के शासन में रोजाना घुसपैठ होती थी, लेकिन अब डर के मारे घुसपैठिए खुद वापस लौटने लगे हैं।  गृहमंत्री ने चेतावनी देते हुए कहा ,वे खुद  चले जाते हैं, तो  सरकार उन पर कोई केस नहीं करेगी और लौटने में  पूरी मदद भी करेगी। उन्होंने आशा व्यक्त की  कि घुसपैठियों की पहचान का अभियान शुरू होने से पहले ही वे  लौट जाएंगे। उनकी अपील ऐसे समय आई जब प. बंगाल ही नहीं देश के अन्य हिस्सों में बसे बांग्लादेशी घुसपैठिए वापस लौटने के लिए प. बंगाल आकर सीमा पर जमा हो रहे हैं। शुभेंदु सरकार ने डिटेक्ट , डिटेन ,और डिपोर्ट  जैसी घोषणा कर जो आक्रामक रवैया अपनाया उससे घुसपैठियों में दहशत फैलने लगी।  वस्तुतः ममता बैनर्जी की सरकार ने न तो घुसपैठियों को आने से रोकने के लिए कोई योजना बनाई और न ही उन्हें वापस भेजने का साहस दिखाया।  उससे भी बड़ी चिंता का कारण ये है कि उनके राशन और आधार कार्ड बनने के अलावा मतदाता सूचियों में नाम भी दर्ज हो गए। इसीलिये विधानसभा चुनाव के पहले चुनाव आयोग ने एस.आई.आर की प्रक्रिया प्रारंभ की तब ममता बैनर्जी ने अड़ंगे लगाने का हरसंभव प्रयास किया किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। लाखों नाम मतदाता सूचियों से इसलिए अलग हुए क्योंकि  वे  जरूरी दस्तावेज नहीं दे सके। तृणमूल कांग्रेस को जीत का जो आत्मविश्वास था उसका कारण मुस्लिम मतदाताओं के साथ ही  घुसपैठिये भी रहे।  मतदाता सूची से बाहर होने वाले घुसपैठियों को उम्मीद थी कि ममता सरकार ही लौटकर आएगी इसलिए  वे निश्चिंत बैठे रहे। लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया । भाजपा ने सत्ता में आते ही जो तेवर दिखाये उनसे उनको ये महसूस होने लगा कि डिटेंशन (हिरासत) में आने के बजाय बेहतर होगा वापस अपने मुल्क लौटा जाए। चौंकाने वाली बात ये है कि न सिर्फ़ प. बंगाल वरन दक्षिणी राज्यों में कार्यरत घुसपैठिए भी बांग्लादेश लौटने के लिए आने लगे। हाल ही में मुख्यमंत्री श्री अधिकारी ने ये कहकर हलचल मचा दी कि ममता सरकार जिन करोड़ों महिलाओं को प्रतिमाह 1500 रुपए दे रही थी उनमें 30 लाख बांग्लादेशी महिलाएं भी हैं। इसीलिए राज्य सरकार ने महिलाओं को 3 हजार रुपए हर महीने देने संबंधी  वायदे को पूरा करने के पहले  लाभार्थियों की नई सूची तैयार करने का फैसला किया। इसके अलावा भी मुफ्त राशन एवं अन्य  सुविधाओं का लाभ घुसपैठियों को पिछली सरकार दे रही होगी। सवाल ये है कि ममता बैनर्जी जैसी वरिष्ट नेत्री को इन घुसपैठियों को संरक्षण देने की क्या जरूरत पड़ गई? स्मरणीय है बांग्लादेश से घुसपैठियों का  आना वामपंथी सरकार के कार्यकाल में भी जारी रहा। प. बंगाल की जनता ने उस सरकार से नाराज होकर ही ममता बैनर्जी को सत्ता सौंपी थी किंतु उनके राज में तो प. बंगाल घुसपैठियों का स्वर्ग बन गया। यहां की राजनीति में मुस्लिम वर्चस्व का कारण ये घुसपैठिए ही रहे। चूंकि भाजपा ने घुसपैठ को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया इसीलिए हिन्दू मतों का ध्रुवीकरण उसके पक्ष में हुआ। दरअसल ममता राज में घुसपैठियों के आतंक से हिंदुओं में भय व्याप्त था। चूंकि कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां भी तुष्टीकरण करती रहीं इसलिए जब भाजपा ने घुसपैठियों के विरुद्ध कार्रवाई का वायदा किया तो जनता ने  उसको जबरदस्त समर्थन देकर सत्ता सौंप दी। मुख्यमंत्री श्री अधिकारी की प्रशंसा की जानी चाहिए जिन्होंने बिना देर लगाए घुसपैठियों को वापस भेजने के लिए ठोस कदम उठाए जिनका असर दिखने भी लगा है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर में सीमा पर कंटीले तार की बाड़ लगाने हेतु केंद्र सरकार द्वारा मांगी जमीन देने का फैसला भी घुसपैठ रोकने की दिशा में बड़ा कदम है। ममता सरकार बरसों से इस मामले को दबाकर बैठी थी। प. बंगाल में घुसपैठियों के विरुद्ध चल रही कार्रवाई राष्ट्रीय स्तर पर की जानी चाहिए क्योंकि बांग्लादेशी और रोहिंग्या दोनों ही घुसपैठिए मुस्लिम कट्टरपंथियों के साथ मिलकर आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन गए हैं। बीते कुछ वर्षों में हुईं अनेक आतंकवादी वारदातों के तार बांग्लादेश से जुड़े पाये जाने से इसकी पुष्टि हो चुकी है। गृह मंत्री अमित शाह  नक्सलवादियों के आतंक का खात्मा कर अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय दे चुके हैं । उनकी ताजा चेतावनी के बाद ये उम्मीद की जा सकती है कि देश इन घुसपैठियों द्वारा उत्पन्न समस्या से भी मुक्त हो जाएगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 28 May 2026

सर्वोच्च न्यायालय ने वोट चोरी नामक गुब्बारे की हवा निकाल दी


अन्ततः सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एस. आई.आर ) को विधि सम्मत मानते हुए स्पष्ट कर  दिया कि चुनाव आयोग के पास प्रक्रिया का पालन करते हुए मतदाता सूची में संशोधन करने का अधिकार है, अतः यह पूरी तरह से संवैधानिक और वैध है। गत दिवस दिए फैसले में उसने स्वीकार किया कि जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट को अपडेट और संशोधित करने की शक्ति प्राप्त है। एस.आई.आर विरोधी याचिकाओं को रद्द करते हुए न्यायालय ने स्पष्ट  किया कि उसमें कोई खामी नहीं है।  फैसले में कहा गया है कि आयोग मतदाता सूची में शामिल होने की पात्रता के  साथ ही शर्तों के साथ नागरिकता की जांच भी कर सकता है। इस फैसले से उन लोगों को निराशा हुई होगी जो ये प्रचार करने में जुटे रहे कि मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की आड़ में केंद्र सरकार के इशारे पर उन मतदाताओं के नाम योजनाबद्ध तरीके से काटे गए जिन्हें भाजपा विरोधी समझा जाता था। उधर चुनाव आयोग बाकायदा घोषणा करता रहा कि नाम काटे गए मतदाता आवश्यक दस्तावेजों के साथ दोबारा आवेदन कर सकते हैं। बिहार में ऐसा हुआ भी । इसी के साथ ही 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले नए मतदाताओं को नाम जोड़ने के लिए भी पर्याप्त अवसर दिया गया। बिहार और प. बंगाल में एस. आई. आर का सबसे ज्यादा विरोध हुआ। प. बंगाल में तो सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायाधीशों तक को उसकी प्रक्रिया संपन्न करने में लगाया जिससे पारदर्शिता बनी रहे। जिन पांच राज्यों में पिछले महीने विधानसभा चुनाव हुए वहां भारी मतदान से एक बात तो साबित हो गयी कि मतदाताओं का चुनाव प्रक्रिया में पूरा विश्वास है।  आयोग द्वारा की गई व्यवस्था को भी खुलकर सराहा गया। एस. आई. आर के विरोध में विपक्ष ने ये सोचकर हल्ला मचाया कि जनता भी उसके साथ सड़कों पर उतरेगी किन्तु बिहार में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की यात्रा और प. बंगाल में ममता बैनर्जी द्वारा सड़क से सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ने के बावजूद उन्हें न जन समर्थन मिला और न अदालत ने प्रक्रिया रोकी। अब जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने एस. आई.आर को कानून सम्मत बताते हुए उसे चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में मान लिया और आधार कार्ड को नागरिकता का प्रमाण मानने से भी मना कर दिया तब विपक्ष और उसके पीछे खड़े मोदी विरोधियों को भी ये समझ जाना चाहिए कि ये मुद्दा बेअसर हो चुका है। वोट चोरी को लेकर राहुल गांधी ने  मुख्य चुनाव आयुक्त को घेरने के लिए धरती - आसमान एक कर दिये वहीं ममता बैनर्जी तो धरने तक पर बैठ गईं। लेकिन उनकी बात न जनता के गले उतरी और न ही सर्वोच्च न्यायालय ने ही उसे महत्व दिया। बिहार, और प. बंगाल में भाजपा को मिली सफलता से ये साबित हो गया कि एस. आई. आर के विरोध को जनता ने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया।  सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट फैसले के बाद वोट चोरी का गुब्बारा पूरी तरह फूट चुका है। बिहार और प. बंगाल में शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न होने का कारण मतदाता सूचियों में किया गया संशोधन ही है। अवैध बांग्लादेशियों के अलावा मृत हो चुके लोगों के नाम बड़े पैमाने पर कटने से मतदाता सूचियाँ शुद्ध हो गईं जिससे फर्जी मतदान रोका जा सका। सर्वोच्च न्यायालय ने भविष्य में होने वाले चुनावों के पहले छूटे हुए सभी मतदाताओं के नाम जोड़ने का निर्देश देकर चुनाव आयोग को एस. आई. आर जारी रखने की छूट दे दी। सवाल ये है कि क्या विपक्ष अपना विरोध जारी रखेगा या आयोग के साथ समन्वय स्थापित कर मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने में सहयोग करेगा जिसमें उसका भी हित है। लेकिन इसके लिए उनको अपने संगठन में कसावट लानी होगी। राहुल गांधी जैसे नेताओं को भी ये बात समझनी चाहिए कि जितना समय , श्रम और संसाधन उन्होंने बिहार में चुनाव आयोग को गाली देने में खर्च किया उतना अपनी पार्टी को मजबूत करने में लगाते तब कांग्रेस की इतनी दुर्गति नहीं होती।  प. बंगाल में उन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी तो सब सीटों पर उतार दिए किंतु प्रचार से दूरी बनाकर उनकी फजीहत करवा दी। यहां तक कि पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा माने जाने वाले अधीर रंजन चौधरी लोकसभा में हारने के बाद विधानसभा चुनाव में भी तीसरे स्थान पर रहे।  बिहार और प. बंगाल में  औंधे मुंह गिरने के बाद ममता सहित अन्य विपक्षी नेता एकजुट होकर भाजपा से निपटने की बातें कर रहे हैं किंतु उनके पास इस बात का कोई उत्तर नहीं है कि इन चुनावों में एकता से परहेज क्यों किया गया और आगे उसकी क्या गारंटी है? बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय ने बिना लाग - लपेट के एस. आई. आर को चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में मानते हुए  चुनाव प्रक्रिया का आवश्यक भाग बताते हुए विपक्ष द्वारा फैलाए गए झूठ की कलई खोल दी है। ये फैसला विपक्ष के लिए सबक भी है कि वह हवा - हवाई मुद्दों से दूर रहते हुए जनहित से जुड़े विषयों पर आवाज उठाये। लेकिन पिछले अनुभव बताते हैं कि विपक्ष में आत्मावलोकन की प्रवृत्ति और जनता की अपेक्षाओं को महसूस करने की क्षमता खत्म हो चुकी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 27 May 2026

घुसपैठिये आस्तीन में छिपे साँप


देश के सीमावर्ती इलाकों सहित कुछ अन्य क्षेत्रों में डेमोग्राफिक चेंज ( आबादी में असंतुलित बदलाव) लम्बे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिंता का विषय रहा है।  प. बंगाल के  हालिया विधानसभा चुनाव में डेमोग्राफिक चेंज और बांग्लादेशियों की घुसपैठ ममता  सरकार के विरुद्ध बड़ा मुद्दा  था । भाजपा को  सत्ता तक लाने में इसका प्रमुख योगदान रहा। नए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने घुसपैठियों को उनके देश वापस भेजने की घोषणा कर इसे जीवित रखने का संकेत दे दिया था। इसकी पुष्टि गत दिवस हो गयी जब केंद्रीय  गृह मंत्री अमित शाह ने डेमोग्राफिक चेंज पर एक  उच्चस्तरीय समिति के गठन की घोषणा करते हुए कहा कि  घुसपैठ और अन्य कारणों से अप्राकृतिक डेमोग्राफिक चेंज किसी भी देश के वर्तमान व भविष्य के लिए गंभीर चुनौती है। जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता में बनाई गई इस समिति में जनगणना आयुक्त के साथ दुर्गा शंकर मिश्रा (से . नि.आईएएस), बालाजी श्रीवास्तव (से.नि .आईपीएस) और डॉ. शमिका रवि समिति के सदस्य रहेंगे वहीं संयुक्त सचिव (फॉरेनर्स-I), गृह मंत्रालय सदस्य सचिव बनाए गए हैं। वैसे तो घुसपैठियों की समस्या 1947 के बाद से ही चली आ रही है। जम्मू कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर राज्यों में  पड़ोसी देशों से  आकर बसे घुसपैठियों ने  सामाजिक वातावरण को बिगाड़ने के साथ ही जमीन कब्जाने जैसे कारनामे किए जिससे उनका मूल निवासियों से टकराव भी हुआ। 1971 में बांग्लादेश बनने के पहले जो 1 करोड़ से ज्यादा शरणार्थी भारत  में घुसे उनको वापस भेजना तो दूर उल्टे वह सिलसिला बेरोकटोक जारी रहा। धीरे - धीरे ये घुसपैठिये देश के भीतरी हिस्सों तक फैलते गए और मुस्लिम वोट बैंक के सौदागरों ने इन्हें नागरिकता दिलवाने में भरपूर सहायता और संरक्षण प्रदान किया। इसके बाद म्यांमार से खदेड़े गए रोहिंग्या मुस्लिमों ने भी पूर्वोत्तर राज्यों में अपने ठिकाने बना लिए। उ.प्र और बिहार के जो क्षेत्र नेपाल की तराई में हैं वहां अचानक मदरसों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि भी चौंकाने वाली रही। बिहार में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के विधायक इसी इलाके से जीते भी। असम भी  जनसंख्या संतुलन बिगड़ने की समस्या से जूझता आ रहा है। इसीलिए मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने पिछले कार्यकाल में ही मदरसे बंद करवा दिए थे । देवभूमि कहलाने वाले हिन्दू बहुल उत्तराखंड राज्य में भी मुस्लिम आबादी रहस्यमय तरीके से बढ़ी जिससे सुरक्षा एजेंसियां चिंता में पड़ गईं। ये बात पूरे देश में अनुभव की जा रही है कि डेमोग्राफिक चेंज हमारी संप्रभुता के साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून व्यवस्था, सामाजिक संरचना में गंभीर बदलाव और जनजातीय समाज के संरक्षण से जुड़ी गंभीर समस्या है। गत दिवस गठित समिति अवैध प्रवास और अन्य असामान्य कारणों से पूरे देश में हो रहे जनसांख्यिकी बदलाव का व्यापक मूल्यांकन करते हुए धार्मिक एवं सामाजिक समुदायों के स्तर पर इसके पैटर्न का विश्लेषण कर सुनियोजित और समयबद्ध समाधान प्रस्तुत करेगी।  बड़ी बात नहीं इस समिति का विरोध भी वे राजनीतिक दल करने लगें जो आबादी के असंतुलन में अपनी चुनावी संभावनाएं देखते हैं। प. बंगाल में जब भी बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालने की बात उठी ममता बैनर्जी उनके बचाव में खुलकर सामने आईं। सीएए और मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का विरोध करने में भी उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके घुसपैठिया प्रेम का सबसे बड़ा उदाहरण ये था कि उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा कई बार लिखित अनुरोध किए जाने पर भी बांग्लादेश सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने के लिए जमीन देने में कोई रुचि नहीं दिखाई। वहीं सत्ता बदलते  ही मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी ने  केंद्र सरकार द्वारा मांगी गई भूमि सौंप दी। गौरतलब है घुसपैठिये केवल आबादी ही नहीं बढ़ाते अपितु हमारे संसाधनों का उपयोग करते हुए जिंदगी बसर करते हैं।  चूंकि इनमें बड़ी संख्या मुस्लिमों की होती है लिहाज़ा ये जिस क्षेत्र में बसते हैं वह मुख्य धारा से कट जाने के कारण राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का केंद्र बने नहीं रहता। उ.प्र, बिहार, असम और प. बंगाल में अनेक ऐसे निर्वाचन क्षेत्र हैं जिनमें केवल मुसलमान ही जीत सकता है। यहां घुसपैठियों के कारण भारत विरोधी माहौल खुले आम देखा जा सकता है। इस समिति की आवश्यकता काफी पहले से महसूस की जा रही थी। केंद्र सरकार ने इसका गठन कर बहुत ही सामयिक और साहसिक कदम उठाया है। ये घुसपैठिए आस्तीन में छिपे साँप से कम नहीं  हैं जिनका फ़न कुचलना देश की अखंडता और सुरक्षित भविष्य के लिए अत्यावश्यक है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 26 May 2026

ट्रम्प की हालत सांप - छछूंदर जैसी हो गई


दुनिया को अपनी उंगली पर नचाने वाले अमेरिका की स्थिति बेहद हास्यास्पद हो गई है। ईरान के साथ युद्ध में तीन महीने बाद भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ये तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे युद्ध की समाप्ति किस प्रकार करें क्योंकि न तो वे ईरान को पूरी तरह पराजित करने में सफल हुए और न ही उसके परमाणु कार्यक्रम को रुकवाने में उन्हें सफलता मिली। ईरान के तेल को बेचकर पैसा कमाने और होर्मुज समुद्री मार्ग का चौधरी बनकर उसके तेल व्यापार को नियंत्रित करने का उनका मंसूबा भी पूरा होता नहीं दिख रहा। अपने दुमछल्ले पाकिस्तान को मोहरा बनाकर कूटनीतिक पहल करने का अमेरिकी दांव भी अब तक तो कारगर साबित नहीं हो सका क्योंकि वार्ता की टेबिल सजने के बाद भी ईरान ने ट्रम्प की शर्तें मान लेने से इंकार कर दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति आये दिन ये शिगूफा छोड़ते रहते हैं कि ईरान उनकी शर्तों को मान गया है । लेकिन कुछ देर बाद ही वे उसे धमकी देने लग जाते हैं। उनके हर दावे का ईरान ने मजाक ही उड़ाया और हमले की धमकियों का जवाब भी उसी भाषा में देने में संकोच नहीं किया। गत सप्ताह ऐसा लगा था कि दोनों के बीच सहमति बन गई है। इसके कारण गत दिवस दुनिया के शेयर बजारों में उछाल भी देखा गया किंतु  पीछे - पीछे ये खबर भी आ गई कि अमेरिकी सैन्य दस्तों ने होर्मुज में ईरानी नौसैनिक नावों आदि पर हमले किये। ट्रम्प की ये डींग भी हवा - हवाई होकर रह गई कि ईरान अगले 20 साल तक परमाणु अस्त्र नहीं बनाने राजी हो गया है। कुल मिलाकर प. एशिया में चल रहे युद्ध के समाप्त होने सम्बन्धी कूटनीतिक बातचीत एक कदम आगे , दो कदम पीछे वाली स्थिति में है। इस लड़ाई की जड़ है इसराइल जिसे अमेरिका का सबसे चहेता माना जाता है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के अनुरोध पर ही ट्रम्प ने  हजारों कि.मी दूर आकर ईरान से पंगा लेने जैसा निर्णय लिया जबकि अफगानिस्तान में 20। साल डटे रहने के बावजूद तालिबानी कट्टरपंथियों से समझौता करने का दर्द अभी भी वाशिंगटन भूला नहीं है। उल्लेखनीय है गाजा  पट्टी नामक फिलीस्तीन के हिस्से पर ईरान द्वारा पालित - पोषित हमास नामक इस्लामिक आतंकवादी संगठन का शासन था। उसने अचानक बेवजह इसराइल पर हमले कर उसके सैकड़ों नागरिकों को बंधक बना लिया। उसके जवाब में नेतन्याहू ने वही किया जो इसराइल का स्वाभाव है। हमास की तबाही का बीड़ा उठाकर नेतान्याहू ने समूचे गाजा को मलबे के ढेर में बदल दिया। ईरान के साथ चल रही मौजूदा जंग की पृष्ठभूमि में इसराइल और हमास के बीच हुई लड़ाई ही है।नेतन्याहू  अमेरिका को ये समझाने में तो सफल हो गए कि ईरान ही प. एशिया में अमेरिका के प्रभुत्व को चुनौती देने वाला है। यदि उसे ठिकाने लगा दिया जाए तो अधिकांश अरब जगत पर उनका दबदबा कायम होने से कोई नहीं रोक सकेगा। अमेरिका तो बीते अनेक दशकों से ईरान में अपनी समर्थित सत्ता कायम करने के प्रयास कर रहा था लेकिन तमाम  प्रतिबंधों और दबावों के बाद भी उसके मंशा पूर्ण न हो सकी। दरअसल इसराइल को ये डर सताता रहा है कि ईरान ने परमाणु अस्त्र बना लिए तो उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। गाजा में हुए युद्ध के दौरान भी इसीलिए अमेरिका ने ईरान के आण्विक केंद्रों पर भीषण बमबारी की थी। लेकिन जैसी कि जानकारी मिली उसके अनुसार ईरान ने परमाणु अस्त्र बनाने के लिए संगृहीत परिष्कृत यूरेनियम पहले ही दूसरे सुरक्षित स्थानों छिपा दिया था। इस बार की लड़ाई में भी अमेरिका ने ईरान को परमाणु शक्ति बनने से रोकने के लिये हरसम्भव प्रयास किये किंतु अब तक तो वह ऐसा नहीं कर सका। ईरान ने न तो परमाणु कार्यक्रम रद्द करने का आश्वासन दिया और न ही परिष्कृत यूरेनियम भंडार उसे सौंपने पर सहमत हुआ। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिये अचूक कार्ययोजना बनाने के फेर में ट्रम्प और नेतन्याहू ये भूल गए कि ईरान ने मिसाइलों के क्षेत्र में भी अकल्पनीय उपलब्धि हासिल कर ली है। बीते तीन महीनों में अमेरिका और इसराइल के जबरदस्त हमलों के जवाब में ईरान ने जिस बड़ी मात्रा में इसराइल ही नहीं बल्कि अमेरिका के समर्थक सऊदी अरब , ओमान , कतर और यू.ए.ई आदि पर मिसाइलें बरसाईं वह अप्रत्याशित था। युद्धविराम के दौरान भी ये जानकारी आई कि ईरान के पास अभी भी हजारों मिसाइलाें का जखीरा है। अमेरिका और  इसराइल के सैकड़ों हवाई हमले भी इन्हें नष्ट नहीं कर सके क्योंकि ये जखीरा भूमि के नीचे है । यही वजह है कि डोनाल्ड ट्रम्प लगभग रोजाना ईरान को मिटा देने की धमकी देने के कुछ देर बाद ही शांति समझौते की कहानी लेकर बैठ जाते हैं। सही बात ये है कि ईरान भी अमेरिका की कमजोरी भांप चुका है। इतने तनावपूर्ण माहौल में ट्रम्प की चीन यात्रा भी उनकी दयनीयता को दर्शाती है। उन्हें लगता था वे चीन के राष्ट्रपति के जरिए ईरान को समझौते के लिए बाध्य कर ले जाएंगे किंतु बीजिंग में उनकी किरकिरी ही हुई। आज के हालात में ट्रम्प की स्थिति सांप - छछूंदर जैसी हो गई है और वे  अमेरिका के सबसे कमजोर और घटिया राष्ट्रपति के रूप में कुख्यात हो चले हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 25 May 2026

पेट्रोल - डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने का सही अवसर




अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद से ही अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि  होने से ज्यादातर देशों में तो पेट्रोल , डीजल और गैस महंगे हुए किंतु भारत में दाम नहीं बढ़े। भले ही इसका कारण पर्याप्त भंडार बताया गया किंतु सच्चाई ये है कि केंद्र सरकार पांच राज्यों के चुनाव परिणामों का इंतजार कर रही थी। ये  साबित भी हो गया जब चुनाव के कुछ  दिनों बाद ही पेट्रोल डीजल के दामों में वृद्धि की गई। उल्लेखनीय है मूल्य वृद्धि करने से पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  लोगों से पेट्रोल - डीजल की फिजूलखर्ची रोकने के साथ ही एक वर्ष तक विदेश यात्रा और सोने की खरीदी से परहेज करने की अपील की थी जिसका उद्देश्य बहुमूल्य विदेशी मुद्दा बचाना था। उक्त चीजों का आयात  अमेरिकी डॉलर में होने से उसकी मांग बढ़ती है जिसका परिणाम रुपये की  गिरती कीमत के रूप में सामने है। प्रधानमंत्री की उक्त अपील में ही मूल्य वृद्धि का संकेत निहित था। सोने पर आयात शुल्क में वृद्धि और चांदी के आयात में कानूनी रोक लगाना इसका प्रमाण है। अंत में पेट्रोल - डीजल का क्रम आया और बीते 15 दिनों  में ही चार किश्तों में लगभग 10 रु. प्रति लिटर की वृद्धि की जा चुकी है। जाहिर है हाल - फिलहाल कोई चुनाव नहीं हाेने की वजह से केंद्र सरकार को राजनीतिक खतरा नजर नहीं आ रहा। यद्यपि जनता भी इस बात को समझ रही है कि पेट्रोल - डीजल का 85 फीसदी विदेशों से आता है जिसकी कीमतें खाड़ी युद्ध के कारण तेजी से न सिर्फ बढ़ीं अपितु ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य नामक समुद्री मार्ग से आवाजाही रोककर उनकी आपूर्ति भी बाधित कर दी गई।  तेल और गैस  संयंत्रों पर हुए हमलों के कारण उत्पादन भी घट गया। ऐसे में इन हालातों से भारत का अछूता रहना असंभव था। युद्ध प्रारंभ होने के दो माह  बाद केंद्र सरकार ने दाम बढ़ाने का सिलसिला शुरू किया जिसकी चौथी किश्त आज से लागू हो गई। अभी ये कहना कठिन है कि ये वृद्धि कहां जाकर रुकेगी क्योंकि खाड़ी देशों से आने वाला कच्चा तेल  परिवहन लागत कम होने से  सस्ता पड़ता है जबकि अमेरिका, कैनेडा और वेनेजुएला से आयात में ज्यादा समय और खर्च  लगता हैं। ऐसे में कीमतें बढ़ाने के वाजिब कारण तो हैं किंतु इसी  के साथ ये सवाल उठता है कि जब रूस और ईरान से सस्ता तेल खरीदा गया तब उस उसका लाभ आम जनता को क्यों नहीं दिया गया?  मौजूदा हालात में पेट्रोल - डीजल महंगा होना बेहद स्वाभाविक है। यहां तक कि ईरान और अमेरिका के बीच समझौते के बाद युद्धविराम होने पर भी  मूल्य वृद्धि भले थम जाए लेकिन बढ़ी हुई कीमतें  कम होने में कितना समय लगेगा ये कोई नहीं बता सकता क्योंकि कच्चे तेल का उत्पादन और आपूर्ति युद्ध पूर्व जैसी स्थिति में आने में लंबा समय लगेगा। और ये भी कि तेल उत्पादक देश युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई के लिए कीमतें गिरने नहीं देंगे। ऐसे में पेट्रोलियम पदार्थों के दाम और बढ़ें तो आश्चर्य नहीं होगा। लेकिन सरकार चाहे  तो वैश्विक बदलावों के अनुरूप पेट्रोल - डीजल  की मूल्य वृद्धि करते हुए भी उन पर लगने वाले टेक्सों को स्थिर रखकर कुछ राहत तो दे ही सकती है। मसलन आज जो कीमतें बढ़ाई गईं उनमें राज्यों का टैक्स जोड़ने पर वह और अधिक हो गई। अतीत में कई बार ऐसा हुआ जब केंद्र और राज्य सरकारों ने अपने - अपने हिस्से के टैक्स में कमी कर मूल्य वृद्धि के बोझ से आम उपभोक्ता को राहत दी। सरकार भी जानती है कि पेट्रोल - डीजल की मूल्य वृद्धि से परिवहन महंगा होने पर महंगाई बढ़ती है। ये देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि वे पेट्रोल - डीजल के दाम बढ़ने के बावजूद अपने टैक्स को यथावत रहने दें। यदि इस फॉर्मूले को अपनाया जाए तो जनता के कंधों पर मूल्य वृद्धि का बोझ अपेक्षाकृत कम पड़ेगा । वैसे होना तो ये चाहिए कि पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस को जीएसटी के दायरे में लाया जाए। वर्तमान में ज्यादातर राज्यों में भाजपा और उसके समर्थक दलों वाली राज्य सरकारें होने से जीएसटी काउंसिल में उक्त प्रस्ताव पारित करवाने में कोई रुकावट नहीं आएगी। वन नेशन वन टैक्स की व्यवस्था लागू करने और आपदा में अवसर तलाशने का यह उपयुक्त समय है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 22 May 2026

कोरोना से भी बड़े संकट में फंस गई दुनिया


प. एशिया में चल रही जंग अब दिशाहीन होती जा रही है। अमेरिका और इसराइल की ये सोच पूरी तरह गलत साबित हुई कि वे ईरान को कुछ ही दिनों में घुटनाटेक करवा लेंगे। शुरुआत में ही उसके सर्वोच्च नेता खामेनेई को मारने में कामयाब होने से उनका हौसला काफी बुलंद हुआ था। लेकिन ईरान के जवाबी हमलों ने सारे समीकरण उलट दिए। सबसे बड़ी बात ये हुई कि उसने अमेरिकी युद्धपोतों और लड़ाकू विमानों के अलावा इज़राइल को ही निशाना नहीं बनाया अपितु सऊदी अरब, ओमान, कतर और यू.ए.ई पर भी मिसाइलें दाग दीं क्योंकि इनमें अमेरिकी सैन्य अड्डों के अलावा पश्चिमी देशों का काफी पूंजी निवेश हैं। इसी के साथ ही ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य नामक समुद्री मार्ग को बंद कर दिया। परिणामस्वरूप युद्ध का क्षेत्र तो फैला ही पूरी दुनिया में कच्चे तेल और गैस की किल्लत होने लगी। इसीलिए इस लड़ाई को दूर से देख रहे देशों के हित भी इससे जुड़ गए। ईरान भी समझ गया कि इस लड़ाई में पूरी तरह जीतना तो संभव नहीं है अतः उसने होर्मुज को बतौर ट्रम्प कार्ड उपयोग करते हुए पूरे युद्ध को नया मोड़ दे दिया। इसका असर ये हुआ कि उसके परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने के बजाय अमेरिका की चिंता होर्मुज पर आकर अटक गई। ईरान ने उससे गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलने का फैसला करने के साथ कुछ चुनिन्दा देशों को ही उसकी अनुमति दी। इससे अमेरिका भन्ना गया और उसने वहां अपने युद्धपोत तैनात कर ये संकेत दिया कि वह इस समुद्री मार्ग पर ईरान का आधिपत्य खत्म कर देगा। साथ ही टोल चुकाकर आने वाले जलपोतों पर कार्रवाई की धमकी दे डाली। पाकिस्तान की मध्यस्थता में आयोजित ईरान - अमेरिका की शान्ति वार्ता भी विफल हो गई। हालांकि कहने को तो युद्धविराम चल रहा है लेकिन एक तरफ जहां इसराइल ने लेबनान पर हमले जारी रखे हैं वहीं दूसरी तरफ ईरान भी कभी ओमान तो कभी यू.ए.ई पर बारूदी वर्षा करने बाज नहीं आ रहा। इसी के साथ खाड़ी के ज्यादातर देशों ने हथियारों की खरीददारी बढ़ाकर युद्ध के लंबा खिंचने की आशंका को बढ़ावा दिया है। एक बात और भी उल्लेखनीय है कि सऊदी अरब ने पाकिस्तान के हजारों सैनिक किराए पर लेने के साथ ही लड़ाकू विमान भी अपने यहां तैनात करवाए हैं। दरअसल सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच ये संधि हुई है कि किसी एक पर हमला दोनों पर माना जाएगा। मौजूदा जंग में ईरानी मिसाइलों ने सऊदी अरब को काफी नुकसान पहुंचाया है। उस दृष्टि से तो पाकिस्तानी  सेना और लड़ाकू विमानों की सऊदी अरब में तैनाती स्वाभाविक है। लेकिन इसमें एक विरोधाभास ये भी है कि एक तरफ तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख ईरान और अमेरिका के बीच समझौता करवाने के लिए हाथ - पांव मारते हुए दोनों ओर के शांति प्रस्तावों को इधर से उधर पहुंचाने की मशक्कत में जुटे हुए हैं और दूसरी तरफ वह सऊदी अरब को अपने सैनिकों और लड़ाकू विमानों की सेवाएं देकर ईरान के विरोधी पाले में खड़ा हो गए। हालांकि शांति वार्ता का मंच सजाकर खुद को कूटनीति का उस्ताद समझने वाले पाकिस्तान को ईरान और अमेरिका दोनों फटकार लगाते रहते हैं। मौजूदा स्थिति में ईरान और अमेरिका दोनों के बीच समझौते की गाड़ी कहां तक पहुंची ये कोई नहीं बता सकता किंतु इस उहापोह के कारण पूरी दुनिया हलाकान है। पेट्रोल - डीजल और गैस के बिना आज के जीवन की कल्पना असंभव है। युद्ध की शुरुआत में सभी को लगा कि हफ्ते दो हफ्ते में ये जंग रुक जाएगी लेकिन तीन महीने  के बाद भी इस मसले का कोई हल दूरदराज तक नजर नहीं आ रहा।  हालांकि सही बात ये भी है कि ईरान और अमेरिका दोनों को ये समझ नहीं आ रहा कि सम्मानजनक तरीके से कैसे अपनी गर्दन निकालें। डोनाल्ड ट्रम्प थोड़ा ठण्डे पड़ते हैं तो सऊदी अरब सहित खाड़ी के अन्य देश उन पर दबाव डालते हैं कि ईरान को घायल छोड़कर न जाएं। ताजा खबर ये है कि इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू और ट्रम्प के बीच भी तनातनी हो गई है। आज किसी की समझ में ये नहीं आ रहा कि इस जंग को खत्म कैसे करें क्योंकि दोनों पक्ष अपने को पराजित मानने के लिए तैयार नहीं हैं। साथ ये भी अनुभव हो रहा है कि जंग की शुरुआत जिस भी उद्देश्य से हुई हो किंतु अब वह उद्देश्यविहीन होकर रह गई है। अमेरिका और इसराइल यदि ईरान को झुकाने में सफल नहीं हुए तो ईरान भी अपनी बर्बादी को रोकने में नाकामयाब हुआ। दुर्भाग्य से संरासंघ पूरी तरह नकारा हो गया है। भले ही इसे विश्व युद्ध न कहा जाए लेकिन इसके कारण पूरा विश्व परेशान हो उठा है। आज की स्थिति में ये युद्ध कहां जाकर रुकेगा कहना मुश्किल है किंतु कोरोना महामारी से किसी तरह उबर रही दुनिया उससे भी बड़े संकट में फंस गई है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 21 May 2026

राहुल की विदेश यात्राओं का ब्यौरा भी सार्वजनिक हो


लोकतंत्र में विपक्ष द्वारा सत्ता पक्ष की आलोचना अस्वाभाविक नहीं होती। सरकार की गलतियों को उजागर करना उसका कर्तव्य माना जाता है। सत्ता पक्ष को  जहां मतदाता देश चलाने की जिम्मेदारी सौंपते हैं वहीं विपक्ष से अपेक्षा की जाती है कि वह जनता की तकलीफों को सत्ता पक्ष की जानकारी में लाते हुए उन्हें दूर करने के लिए सुझाव दे। भारत में  ये परम्परा शुरुआत से ही कायम रही। जब कांग्रेस के पास विशाल बहुमत होता था , तब भी संसद में मुट्ठी भर विपक्षी सांसद नेहरू सरकार को जमकर घेर लेते थे। इंदिरा जी के शासन में भी कम संख्याबल के बावजूद विपक्ष ने हमलावर रवैया जारी रखा। उनकी  हत्या के पश्चात राजीव गांधी को ऐतिहासिक बहुमत तो मिल गया किंतु विपक्षी घेराबंदी के चलते वे महज पांच साल बाद अलोकप्रिय होकर सत्ता से हाथ गंवा बैठे और 1991 में आज ही के दिन तमिलनाडु में  श्रीलंका के आतंकवादी संगठन लिट्टे ने उनकी हत्या करवा दी। धीरे - धीरे विपक्ष संसद में ताकतवर होता गया और मिली - जुली सरकारों का दौर आया जो 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर रुका। यद्यपि 2024 में बहुमत से पीछे रहने के बाद श्री मोदी को भी मिली - जुली सरकार चलानी पड़ रही है किंतु उनकी शख्सियत इतनी बड़ी  है कि सहयोगी दल भी दबाव डालने से बचते हैं। और फिर लोकसभा के बाद हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा और एनडीए के शानदार प्रदर्शन से केंद्र सरकार के स्थायित्व को लेकर व्यक्त की जाने वाली आशंकाएं अपनी मौत मरती गईं ।  विशेष रूप से महाराष्ट्र, बिहार और प. बंगाल में भाजपा ने जिस धमाकेदार अंदाज में वापसी की उसके कारण विपक्ष की दशा और दिशा दोनों बिगड़ चुकी हैं। प्रधानमंत्री की हालिया विदेश यात्रा को लेकर जिस तरह के तंज कसे जा रहे हैं उनसे इसकी पुष्टि हो जाती है। सबसे पहले कहा गया कि जनता को पेट्रोल - डीजल का खर्च घटाने और एक वर्ष तक  विदेशों में सैर - सपाटा टालने की नसीहत देने के बाद वे खुद कई देशों की यात्रा पर निकल गए। उसके बाद नॉर्वे की एक महिला पत्रकार के सवाल का जवाब नहीं देने पर प्रधानमंत्री के चिरपरिचित विरोधी उनको घेरते हुए भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर खतरे का ढोल  पीटा जाने लगा। और फिर इटली की प्रधानमंत्री को  टॉफी देने वाले चित्र पर हल्ला मचा। ध्यान देने योग्य बात ये है कि प्रधानमंत्री के विदेश दौरे आनन - फानन में तय नहीं होते। महीनों पूर्व अधिकारी स्तर पर इसकी तैयारी होती है जिसमें बातचीत के मुद्दे और समझौतों का प्रारूप तैयार किया जाता है। उस दृष्टि से देखें तो यूएई से प्रारंभ और इटली में संपन्न अपनी यात्रा के दौरान श्री मोदी ने जो समझौते हस्ताक्षरित किये यदि वे देश हित के विरुद्ध हों तब विपक्ष को आलोचना करने का पूरा अधिकार है। लेकिन इस मामले में वह खाली हाथ है। जहां तक बात नॉर्वे की महिला पत्रकार के सवाल का जवाब नहीं देने की तो न सिर्फ विपक्ष अपितु मोदी विरोधी गैंग के रूप में कुख्यात हो चुके यू ट्यूबर इस मुद्दे पर बिना सच्चाई जाने प्रधानमंत्री पर हमलावर हो गए। लेकिन जल्द ही उन्हें शर्मसार होना पड़ा जब उक्त महिला पत्रकार की बेहूदगी का पर्दाफाश हो गया। जिस अवसर पर उसने श्री मोदी से सवाल पूछा उसमें पत्रकारों से चर्चा का कार्यक्रम नहीं था। बाद में भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने पत्रकार वार्ता में उस महिला पत्रकार को प्रश्न पूछने का अवसर देते हुए उसका उत्तर देने की पेशकश की तब वह उठकर चली गई। अब उसके अपने देश में हुई उसकी जमकर किरकिरी हो रही है और भारत में प्रधानमंत्री को मीडिया विरोधी और प्रेस की आजादी को खतरे में बताने वाले मुंह छिपाते फिर रहे हैं। यही स्थिति इटली की प्रधानमंत्री के साथ उनके चित्र के बारे में है। जिसे लेकर अनर्गल टिप्पणियां की जा रही हैं। गत दिवस लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने तो प्रधानमंत्री के प्रति गद्दार शब्द का प्रयोग कर एक बार साबित कर दिया कि आयु की आधी शताब्दी पार करने के बाद भी वे परिपक्वता के कोसों दूर हैं। कांग्रेस की वर्तमान दुरावस्था के लिए उनका यही गैर जिम्मेदाराना आचरण जिम्मेदार है। यदि उनमें तनिक भी साहस है तो वे अपनी गोपनीय विदेश यात्राओं का ब्यौरा देश के सामने रखें। प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा का तो पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध रहता है किंतु कैबिनेट मंत्री का दर्जा और उच्च स्तरीय सुरक्षा प्राप्त श्री गांधी की चंद विदेश यात्राओं को छोड़कर ज्यादातर पूरी तरह गोपनीय क्यों रहती हैं इसका खुलासा भी उन्हें करना चाहिए।  लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि उससे बहुत सारी वे बातें सामने आ जाएंगी जिन पर पर्दा पड़ा हुआ है। ऐसा लगता है प. बंगाल में भाजपा की जीत विपक्ष और माेदी विरोधी गिरोह को बर्दाश्त नहीं हो रही। 


- रवीन्द्र वाजपेयी