Saturday, 7 March 2026

भारत विरोधी होने पर बालेन शाह का हश्र भी माओवादियों जैसा होगा


गत वर्ष नेपाल में युवाओं के अराजक आंदोलन के कारण  चीन समर्थक के. पी. शर्मा ओली सरकार को सत्ता छोड़नी पड़ी। यद्यपि उनको शेख हसीना की तरह देश छोड़कर नहीं जाना पड़ा किंतु अनेक मंत्रियों सहित  पर हुए हमलों से  साबित हो गया कि  सत्ता के प्रति जनता का गुस्सा बेकाबू हो चला था। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के खिलाफ हुए उस आंदोलन का नेतृत्व किसी राजनीतिक दल या नेता के हाथ में न होकर राजधानी काठमांडू के युवा महापौर बालेन शाह के हाथ में था जो निर्दलीय जीतकर आए थे। पेशे से रैपर ( गायक ) इस युवा ने नेपाल के युवाओं को सरकार के विरुद्ध सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित किया। इस काम में सोशल मीडिया उसका प्रमुख अस्त्र था जिस पर प्रतिबंध के बाद वैसे ही हालात बन गए जब 2006 में महाराजा ज्ञानेंद्र को राजगद्दी माओवादियों को सौंपना पड़ गई। उसके बाद से देश राजनीतिक अस्थिरता के भँवर में फंस कर रह गया। माओवादियों में बिखराव से प्रधानमंत्री बदलते रहे लेकिन जनता ने जिन  उम्मीदों के चलते राजतंत्र को हटाया वे पूरी नहीं हुईं । चीन के दबाव  में माओवादी सरकारों ने भारत से रिश्ते बिगाड़ने का क्रम जारी रखा जिसका चरमोत्कर्ष नेपाल द्वारा प्रारंभ सीमा विवाद के  बाद भारत द्वारा आर्थिक नाकेबंदी के रूप में देखने मिला। दुनिया के एकमात्र हिंदू राष्ट्र को माओवादियों ने भले ही धर्मनिरपेक्ष बना दिया किंतु नेपाल में हिंदू धर्म और संस्कृति की जड़ें काफी गहरी हैं। लाखों नेपाली भारत में रोजगार से जुड़े हैं। आर्थिक दृष्टि से भी वह काफी कुछ भारत पर निर्भर है। इसलिये माओवादी चाहकर भी हिंदू धर्म  और संस्कृति को खत्म नहीं कर सके। गत वर्ष हुए युवाओं के आंदोलन के  बाद बालेन शाह महानायक के तौर पर उभरे किंतु  अंतरिम सरकार में  उन्हें महत्व नहीं मिला। दो दिन पहले हुए आम चुनाव में बालेन की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने एक नई राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरकर दशकों पुराने दलों के आधिपत्य को खत्म कर दिया। चीन समर्थक पूर्व प्रधानमंत्री के.पी शर्मा ओली  तक बालेन शाह से चुनाव  हार गए। गगन थापा और माओवादी क्रांति के चेहरे रहे पुष्पदहल कमल को भी  कम सीटें मिलने से सत्ता  बालेन शाह के हाथ जाना तय है। नेपाल में यह एक नए युग की शुरुआत है जहां युवा अपनी राजनीतिक भागीदारी के जरिए शासन में बदलाव लाने में कामयाब हो गए। हाल ही में बांग्लादेश में भी सत्ता तारिक रहमान नामक युवा के हाथ आ गई। लेकिन  फर्क ये है कि तारिक के पिता राष्ट्रपति और माँ प्रधानमंत्री रहीं जबकि बालेन की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं है। वे भारत में इंजीनियरिंग पढने के बाद गायक के रूप में युवाओं में लोकप्रिय हुए। लेकिन चर्चा में तब आए जब काठमांडू के महापौर चुनाव  निर्दलीय लड़कर जीते। उसी के बाद उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा परवान चढ़ीं और देखते ही देखते उन्होंने पहले सत्ता को उखाड़ फेंकने वाले आंदोलन को हवा दी और अब सत्ता के शीर्ष पर विराजमान होने जा रहे हैं। उनके प्रधानमंत्री बनने को लेकर सबसे ज्यादा उत्सुकता भारत में है। उल्लेखनीय है बांग्लादेश के बाद जब नेपाल में युवाओं ने सत्ता को उखाड़ फेंका तब भारत में भी वैसी ही उथल - पुथल की आशंका व्यक्त की जाने लगी किन्तु वह निर्मूल सिद्ध हुई । दरअसल उक्त दोनों सत्ता परिवर्तनों के पीछे अमेरिका की भूमिका मानी जाती है। बांग्लादेश के कार्यकारी शासक बने मो. यूनुस तो  अमेरिका के घोषित पिट्ठू थे। ऐसा ही संदेह बालेन शाह को लेकर भी है।  उन्होंने महापौर बनते ही भारत विरोधी बयान देने शुरू कर दिए और हिन्दी फिल्मों पर भी रोक लगाई ।  साथ ही चीन विरोधी बयान भी दिए। वैसे भी उनका आंदोलन ही चीन समर्थित सरकार के विरुद्ध था। इस सबसे लगता है बालेन की अपनी कोई सोच नहीं है।  अब सवाल ये है कि क्या वे नेपाल को गरीबी , बेरोजगारी , भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं से राहत दिलवा सकेंगे या फिर माओवादियों की तरह से ही सत्ता की चकाचौंध में अपना उद्देश्य और वायदे भूल जाएंगे। बालेन नेपाल को यदि विकास के रास्ते पर ले जाना चाहते हैं तो वह भारत के संरक्षण और सहयोग से ही संभव होगा क्योंकि चीन की रूचि नेपाल की बेहतरी से ज्यादा तिब्बत की तरह उसे हड़पने में है। ऐसे  में उन्होंने भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया अपनाया तब वे भी जल्द ही जनता की नजरों से उतर जाएंगे और उन माओवादी नेताओं की कतार में खड़े दिखेंगे जो भारत का विरोध करते - करते हाशिए पर चले गए।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 6 March 2026

नीतीश का दिल्ली आना किसी बड़े घटनाक्रम की शुरुआत



बिहार में साधारण व्यक्ति भी राजनीति पर पैनी नजर रखता है। सामाजिक न्याय की जिस राजनीति ने बीते लगभग चार दशक से देश को प्रभावित किया उसकी जड़ें यहां गहराई तक  हैं। समाजवादी चिंतकों ने यहां जाति व्यवस्था को मिटाने के लिए जो काम किया उसका ये लाभ तो हुआ कि आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से दबे वर्ग को राजनीतिक नेतृत्व में हिस्सेदारी ही नहीं मिली बल्कि पूरा नेतृत्व ही उसके हाथ चला गया। इसका सिलसिला कर्पूरी ठाकुर से होते हुए नीतीश कुमार निर्बाध चला आ रहा है। ऐसा नहीं है कि  उच्च जातियों का वर्चस्व समाप्त हो गया किंतु धीरे - धीरे उनकी पकड़ कमजोर हो चली है।  यही वजह है कि लालू प्रसाद यादव  से पीड़ित जनता ने उच्च जाति की बजाय पिछड़ी जाति के नीतीश कुमार को ही अपना भाग्य विधाता बनाया। 2005 से जीतन राम मांझी के के 10 माह छोड़कर नीतीश मुख्यमंत्री बने  रहे। जीतन राम को भी उन्हीं ने गद्दी पर बिठाया था। लगभग 20 साल तक मुख्यमंत्री रहने के बाद नीतीश ने गत दिवस राज्यसभा के लिए नामांकन भरकर एक बार फिर राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया ।  गत  विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीतने के बाद भी भाजपा ने उन्हीं को मुख्यमंत्री बनाया जैसा वह उसके पहले वाले चुनाव में भी कर चुकी थी। चुनाव के दौरान विरोधियों ने उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति का खूब मजाक बनाया किंतु जनता ने सुशासन बाबू की उनकी  छवि पर  विश्वास जताते हुए रिकॉर्ड दसवीं बार उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर पसंद किया। हालांकि निजी ईमानदारी और विकास के मुद्दे पर उनका रिकॉर्ड अपने पूर्ववर्ती सभी मुख्यमंत्रियों से काफी बेहतर रहा किंतु राजनीतिक प्रतिबद्धता के मामले में नीतीश ने अनेक अवसरों पर  अपनी साख भी गिराई। नरेंद्र मोदी के प्रति नफरत का खुला प्रदर्शन करने के बाद वे उनके नेतृत्व को स्वीकार करते हुए भाजपा के साथ आये और फ़िर बिना कोई कारण बताए उन्हीं लालू प्रसाद की गोद में  बैठ गए जिनको भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भिजवाने में उनकी भूमिका रही।  उल्लेखनीय है नीतीश की सौम्य और सुलझे हुए राजनेता की छवि बनाने में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में बतौर मंत्री उनका कार्य सहायक बना । उस समय वे लालू और शरद यादव से अलग होकर जॉर्ज फर्नांडीज के साथ समता पार्टी बना चुके थे।  बाद में वे जनता दल (यू) के सर्वेसर्वा बनकर बिहार की राजनीति की सबसे ताकतवर शख्सियत बन गए। पिछड़ी जाति का होने के बावजूद वे कभी भी किसी जाति विशेष का चेहरा नहीं बने और यही गुण उनकी सफलता का आधार बना। अचानक बिहार छोड़कर दिल्ली का रुख करने के पीछे राजनीतिक मजबूरी है या कोई रणनीति इसका खुलासा फिलहाल नहीं हुआ। और हो सकता है कभी न हो। स्मरणीय है 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले इंडिया नामक विपक्षी गठबंधन के सूत्रधार वही थे किंतु अचानक एनडीए में लौटकर नरेंद्र मोदी के झंडे तले खड़े हो गए। उनके उस कदम से उनके साथ पलटू राम जैसा विशेषण जुड़  गया किंतु मोदी सरकार की वापसी से उनकी ताकत बढ़ गई। बाद में हुए विधानसभा चुनाव में नीतीश और भाजपा ने लालू परिवार की राजनीति को लगभग समाप्त कर दिया।  बढ़ती आयु से नीतीश की क्षमता भी कम होती जा रही थी। साथ ही मुख्यमंत्री बने रहकर रिटायर होने के बजाय राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका निभाकर  और ऊंचाई हासिल करने की महत्वाकांक्षा भी पटना की बजाय नई दिल्ली में रहकर ही पूरी हो सकती है। फिलहाल वे क्या बनेंगे इसका पता आने वाले कुछ दिनों में पता चल जाएगा। रही बात उनके उत्तराधिकारी की तो उन्होंने कोई बड़ा दांव नहीं चला तो भाजपा बिहार में पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनवाने में सफल हो जाएगी।   दरअसल नीतीश की पार्टी में ऐसा कोई नहीं है जो उनकी जगह ले सके। दूसरी तरफ भाजपा का संगठन पूरे बिहार में होने से वह सरकार ज्यादा बेहतर तरीके से चला सकेगी। हालांकि नीतीश के बेटे निशांत का नाम पार्टी के नेता के साथ ही उपमुख्यमंत्री पद के लिये उछला है। लेकिन ऐसा होने पर नीतीश और भाजपा दोनों को सवालों के घेरे में खड़ा करेगा। हालांकि भाजपा के तो अनेक नेता परिवार के नाम पर आगे आए जिनमें उसके नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन भी हैं किंतु नीतीश ने अपने परिवार को अभी तक  दूर रखा। ऐसे में बेटे की ताजपोशी  उनके आलोचकों खास तौर पर तेजस्वी यादव को अवसर प्रदान करेगी किंतु लालू और उनकी संतानों के विपरीत नीतीश और उनके परिवार की छवि कहीं बेहतर है। नीतीश का बिहार छोड़ दिल्ली का रुख करना राष्ट्रीय राजनीति में किसी नए धमाके की शुरुआत हो सकती है। वैसे भी नरेंद्र मोदी और अमित शाह के दौर में चौंकाने वाले फैसले नई बात नहीं हैं। प. बंगाल के चुनाव के पहले नितिन नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना और नीतीश को दिल्ली बुलाना किसी बड़े घटनाक्रम की शुरुआत है।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 3 March 2026

ईरान भी हिटलर जैसी भूल कर बैठा


इजराइली और अमेरिकी हमले के बाद जो पलटवार ईरान की ओर से हुआ उसने लड़ाई को प. एशिया के बड़े हिस्से में फैला दिया। वैसे ईरान की दुश्मनी इजराइल और अमेरिका से है किंतु उसने उन मुस्लिम देशों पर भी मिसाइलें छोड़ दीं जिनमें या तो अमेरिका के सैनिक अड्डे हैं या फिर वे उसके समर्थक हैं। दुबई जैसे व्यावसायिक केंद्र पर ड्रोन और मिसाइल से किए हमले का औचित्य किसी को समझ नहीं आया।  संभवतः ईरान के रणनीतिकारों को ये लगा कि दुबई में अमेरिकी कंपनियों और धनकुबेरों ने काफी निवेश कर रखा है। ऐसे में वहां धमाके करने से पश्चिमी देशों के निवेशक  इस जगह से दूर भागने लगेंगे। इस हमले के जरिए ईरान ने कतर और ओमान जैसे देशों को ये संदेश दिया कि वे अमेरिकी अड्डे रखने से परहेज करें। गत दिवस ईरान ने सऊदी अरब में स्थित दुनिया के सबसे प्रमुख तेल शोधक कारखाने को भी निशाना बनाया। ये कहना गलत नहीं होगा कि ईरान  ने हमलों का पूरी ताकत से जवाब दिया है। अमेरिका से बात करने से इंकार कर वह जताना  चाह रहा  है कि भारी नुकसान के बावजूद वह लड़ाई जारी रखने में सक्षम है ।संभवतः इसीलिए डोनाल्ड ट्रम्प को कहना पड़ा कि युद्ध लंबा खिंच सकता है। इसी के बाद दुनिया भर के शेयर बाजारों में हड़कम्प मच गया। सोना ,चांदी और कच्चा तेल  महंगा होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था डगमगाने लगी। दरअसल ईरान जोश में होश खो बैठा वरना वह लड़ाई को इजराइल और अमेरिका के विरुद्ध ही सीमित रखता। इसमें दो मत नहीं है कि प. एशियाई देशों में ईरान ही इजराइल से टकराने की सामर्थ्य रखता है। उसके पास मिसाइलों का विशाल भंडार है। चीन और रूस से प्राप्त सैन्य उपकरणों के बल पर ही वह अमेरिकी दबाव के सामने झुकने से इंकार करता रहा। हमास और हिजबुल्ला जैसे आतंकवादी संगठन उसी के संरक्षण में इजराइल पर हमले करते रहे। लेकिन उसके शासक भूल गये कि इजराइल की पीठ पर अमेरिका का  हाथ है। उसने भले ही अत्याधुनिक युद्ध तकनीक विकसित कर ली हो किंतु बिना अमेरिका के वह अपना अस्तित्व कायम नहीं रख पाता। अमेरिका के कारण ही ब्रिटेन , जर्मनी और फ्रांस से भी इजराइल को समर्थन और सहायता मिलती रही है। हालांकि बीते एक - दो दशकों में परिदृश्य काफी बदला है। अनेक मुस्लिम देशों ने इजराइल से दुश्मनी त्यागकर तटस्थता अपना ली है। हालांकि वे फिलीस्तीन को सैद्धांतिक समर्थन देते रहते हैं। हमास के साथ जंग में भी ईरान और लेबनान ही इजराइल के विरुद्ध खड़े हुए। मौजूदा युद्ध के पहले ओमान , कतर और सऊदी अरब कोशिश करते रहे कि अमेरिका ईरान पर हमला न करे किंतु ईरान ने उनको ही निशाना बनाकर अपने प्रति सुहानुभूति रखने वाले समाप्त कर दिये।  चार दिन बाद भी भले ही वह डटे  रहने की दृढ़ता दिखा रहा है और तेहरान  में तत्काल सत्ता परिवर्तन की संभावना भी नजर नहीं आ रही । लेकिन  इजराइली और  अमेरिकी हमलों से ईरान धीरे - धीरे गाजा वाली स्थिति की ओर बढ़ रहा है जिसमें समूचा देश  मलबे में बदल जाएगा। हालांकि ईरान भौगोलिक दृष्टि से बड़ा देश है जिसके आबादी 9 करोड़ है किंतु इस संकट में उसे जिस बाहरी सहायता की जरूरत है उससे वह वंचित है। अमेरिका तो खुलकर मैदान में है और ट्रम्प लड़ाई को और भयावह बनाने की धमकी दे रहे हैं किंतु न तो रूस के राष्ट्रपति पुतिन और न ही चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग खुलकर ईरान के पक्ष में नजर आ रहे हैं। ये देखते हुए लगता है इजराइल  और अमेरिका ने ईरान को अलग - थलग करने में सफलता अर्जित कर आधी जंग जीत ली है जिसके लिए ईरान खुद जिम्मेदार है। इतनी बड़ी लड़ाई के अंतिम परिणाम का अंदाज मात्र चार दिनों में लगा पाना संभव नहीं है किन्तु ये कहना गलत नहीं होगा कि एक साथ दर्जन भर मोर्चे खोलकर ईरान के हुक्मरानों ने वैसी ही भयंकर भूल कर दी जो हिटलर ने दूसरे महायुद्ध में की थी। आज ईरान किसी प्रमुख मुस्लिम देश से सहायता मांगने की स्थिति में नहीं रहा। हमास , हिजबुल्ला और हूती जैसे आतंकवादी संगठनों के बल पर इजराइल को झुका लेने की सोच ने उसको बर्बादी के कगार पर ला खड़ा किया। हिटलर भी अपनी महत्वाकांक्षाओं को सीमित रखता तब वह वह शर्मनाक मौत से बच सकता था। खामेनेई की मौत के बाद ईरान के रणनीतिकारों को ये एहसास हो  जाना चाहिए था कि आजकल का युद्ध तलवारों से नहीं बल्कि तकनीक से लड़ा जाता है जिसमें बहादुरी से ज्यादा होशियारी की जरूरत होती है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 2 March 2026

ईरान की मूर्खता से मुस्लिम देश भी उसके दुश्मन बन बैठे



ईरान पर इजराइल और अमेरिका द्वारा किए गए हमले से प. एशिया में एक बार फिर युद्ध की आग भड़क उठी है। ईरान के सर्वोच्च शासक अली खामेनेई के साथ ही सेनाध्यक्ष और रक्षा मंत्री इजराइली मिसाइल की मार से मौत के शिकार हो गए। उनके अलावा भी उच्च पदों पर बैठी अनेक हस्तियां भी जान गंवा बैठीं। ईरान के सैन्य ठिकानों विशेष रूप से मिसाइलों के भंडार और परमाणु संस्थान इजराइल और अमेरिका के निशाने पर हैं। जैसी कि ईरान धमकी दे चुका था उसने भी पलटवार करते हुए इजराइल पर एक साथ सैकड़ों मिसाइलें दाग दीं। लेकिन इस जंग में सबसे बड़ा मोड़ ये आ गया कि इस्लामिक देशों की कथित एकता के परखच्चे उड़ गए। इस्लामिक देशों के संगठन के अलावा इस्लामिक नाटो नामक नई सैन्य संधि जैसी बातें  अप्रासंगिक होकर रह गईं। इसका कारण ईरान के नेताओं की मूर्खता ही है जिन्होंने इजरायल पर हमले के साथ-साथ सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, बहरीन, ओमान को भी निशाना बना दिया। इस कदम से मुस्लिम जगत दो फाड़ हो गया । उक्त देश अमेरिका के सहयोगी देश हैं। जिनके बारे में ईरान को आशंका है कि उनमें स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों का इस्तेमाल उस पर हमले के लिए हो सकता है। यद्यपि शुरुआत में मुस्लिम देशों ने ईरान पर इजराइली हमले की आलोचना की थी।  लेकिन ईरान द्वारा उन पर ही मिसाइलें छोड़ दीं तब मजबूरन वे उसके विरुद्ध खड़े दिखने लगे।   उक्त  देशों में से कुछ ने  इस युद्ध को रोकने हेतु अमेरिका से संपर्क भी किया था किंतु उसी दौरान ईरान ने उन्हीं के यहाँ धमाके कर दिए । ईरान के पक्ष में केवल लेबनान में जमे हिजबुल्ला नामक इस्लामिक आतंकवादी संगठन ने ही इजराइल पर हमले किए हैं। गाजा युद्ध में पिटने के बाद हमास की कमर पहले ही टूटी है जबकि ईरान की तरफदारी करने वाले तीसरे आतंकवादी संगठन हूती में भी इतना दम नहीं है जो इज़राइल को झुका सके। ऐसे में अच्छी छवि वाला एक भी इस्लामिक देश या संगठन ईरान के बचाव में नजर नहीं आ रहा। परमाणु शक्ति संपन्न एकमात्र मुस्लिम देश पाकिस्तान ईरान का निकटस्थ पड़ोसी होने के बावजूद अमेरिका के गुलाम जैसा है। यही वजह है कि ईरान को न तो बाहरी सैन्य सहायता मिल रही है और न ही कूटनीतिक संरक्षण। रूस जहां यूक्रेन युद्ध रूपी समस्या में फंसा है वहीं जिन चीनी मिसाइलों और रक्षा प्रणाली के बल पर ईरान अमेरिका से भिड़ने का दुस्साहस कर बैठा वे एक बार फिर धोखा दे गईं। स्मरणीय है ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी पाकिस्तान की चीन निर्मित रक्षा प्रणाली बुरी तरह विफल रही । दूसरी तरफ पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइलों को भारत ने हवा में ही नष्ट कर दिया था। लगातार दो युद्धों में चीन निर्मित युद्ध सामग्री के घटिया साबित होने से विश्व शक्ति के रूप में उसके रुतबे में जबरदस्त गिरावट आई है। कुल मिलाकर ये स्पष्ट हो गया है कि ईरान गीदड़ भभकी कितनी भी देता रहे लेकिन उसके पास उस स्तर की आक्रमण या रक्षा क्षमता नहीं है जो इजराइल जैसे छोटे देश ने विकसित कर ली। इसके विपरीत ईरानी हुक्मरान अमेरिका को धमकाकर ही खुश रहे। उन्हें डोनाल्ड ट्रम्प की रणनीति को समझकर समय रहते कूटनीतिक मोर्चा खोलना चाहिए था। सऊदी अरब , कतर और सं. अरब अमीरात को भरोसे में लेकर अमेरिका को हमलावर होने से रोका जा सकता था किंतु ख़ामेनेई अपने बनाए संसार में ही सिमटे रहे। युद्ध का अंतिम परिणाम क्या होगा ये कहना मुश्किल है लेकिन अमेरिका ने खामेनेई को मारकर एक लक्ष्य तो हासिल कर ही लिया। अब वह इजराइल के साथ मिलकर उसकी बची - खुची सैन्य क्षमता को नष्ट कर उसे झुकने मजबूर करेगा। ईरान की असली ताकत उसके तेल भंडार हैं लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते वह उनका समुचित उपयोग नहीं कर पा रहा। इस लड़ाई के बाद उसकी परमाणु बम बनाने की योजना भी अधर में फंसकर रह जाएगी। ईरान के नए शासकों के सामने सबसे बड़ी समस्या ये है कि अभी तक तो प. एशिया में इजराइल ही  घोषित तौर पर उसका शत्रु था लेकिन अब वे  मुस्लिम देश भी उसके दुश्मन बन गए जिन पर उसने मिसाइलों और ड्रोन से हमला करने की बेवकूफी कर दी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 28 February 2026

न्यायपालिका में रचनात्मक आलोचना सुनने का साहस होना चाहिए


बीते दो दिनों में न्यायपालिका से जुड़ी दो खबरों से एक बार फिर न्याय प्रक्रिया को लेकर चर्चाएं चल पड़ी हैं। एन.सी.ई.आर.टी द्वारा कक्षा आठवीं की एक पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक अध्याय शामिल किए जाने पर देश के मुख्य न्यायाधीश भड़क उठे और तत्काल उसे हटाने का आदेश देते हुए कहा कि जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाए। एन.सी.ई.आर.टी द्वारा माफी के बावजूद कड़ा रुख दिखाते हुए उन्होंने मामले को जारी रखने की बात कही।  पुस्तक  से विवादित अध्याय भले हटा दिया गया किंतु इससे न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार नहीं  हट सकेगा जिसे अनेक पूर्व न्यायाधीश भी खुले आम स्वीकार कर चुके हैं। एन.सी.ई.आर.टी सरकारी विभाग है लिहाजा उस पर तो धौंस काम कर गई  लेकिन न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार पर न जाने कितने लेख प्रकाशित होने के अलावा गोष्ठियां होती हैं। ऐसे में मुख्य न्यायाधीश कहां - कहां रोक लगाएंगे ये बड़ा सवाल है। दिल्ली उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के सरकारी निवास में रुपयों के बंडल मिलने के बाद भी अब तक उन्हें पद से नहीं हटाया जा सका। यदि उनकी जगह कोई अन्य सरकारी अधिकारी होता तब कम से कम उसका निलंबन तो हो ही जाता। दरअसल  न्यायाधीश कानून के रखवाले होते हुए भी कुछ मामलों में उससे ऊपर हैं जिन्हें कदाचरण के बावजूद हटाने के लिए संसद में महाभियोग पारित होना जरूरी है। सामान्य तौर पर देखें तो ये कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत का खुला उल्लंघन है। न्यायाधीशों को विशेष अधिकार और संरक्षण पूर्णरूपेण उचित है किंतु नैतिकता भी कोई चीज होती है। गत दिवस दिल्ली की एक निचली अदालत ने बहुचर्चित शराब घोटाले में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सहित 27 आरोपियों को पूरी तरह निर्दोष मानकर सीबीआई के आरोप पत्र को खारिज करते हुए जांचकर्ता सीबीआई अधिकारी की विभागीय जांच का आदेश दे दिया। अब श्री केजरीवाल  आरोप लगा रहे हैं कि उन्हें झूठा फंसाकर जेल में डाल दिया गया। राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के  इतर देखें तो जिस तरह अदालत ने  जांच अधिकारी की जांच  का आदेश दिया क्या उसी तरह उन न्यायाधीशों की जांच नहीं होनी चाहिए जिन्होंने आरोप पत्र को प्रथम दृष्टया विचार योग्य मानते हुए मुकदमे की अनुमति तो दी ही, साथ ही गिरफ्तार होने वालों की जमानत याचिका लम्बे समय तक निरस्त की जाती रही। निचली अदालत ने अपने फैसले में संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति के विरुद्ध  प्रकरण दर्ज़ करने में सावधानी बरतने की नसीहत भी जांच एजेंसी को दे डाली । लेकिन जिस आरोपपत्र की एक भी बात अदालत ने सही नहीं मानी उसे प्राथमिक तौर विचार योग्य मानने वाले न्यायाधीश भी तो सवालों के घेरे में हैं । जिस तरह श्री केजरीवाल और उनकी पार्टी के अन्य नेता सीबीआई  और सरकार पर आरोप लगा रहे हैं, कल को वैसी ही बातें उन्हें बरी करने वाले न्यायाधीश के बारे में भी कही जाएंगी। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि इस तरह के फैसलों की समीक्षा भी विभागीय स्तर पर हो जिसमें एक तरफ अदालत  आरोपियों की  जमानत अर्जी  टालती रही वहीं दूसरी तरफ पूरा आरोपपत्र रद्दी की टोकरी में फेंकने लायक समझा गया। अब यदि सीबीआई की अपील पर उच्च न्यायालय निचली अदालत के फैसले को उलट दे तब क्या निचली अदालत के न्यायाधीश शक के दायरे में नहीं आएंगे? ऐसे ही सवाल और भी हैं। देश के मुख्य न्यायाधीश ने एन.सी.ई.आर.टी की किताब से न्यायपालिका में भ्रष्टाचार वाला पाठ हटवाकर न्यायपालिका की प्रतिष्ठा कितनी बचाई ये तो विश्लेषण का विषय है। लेकिन उनके रवैए से ये जरूर साफ हो गया कि न्यायपालिका में भी असहिष्णुता बढ़ रही है। संसद द्वारा न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन का जो प्रस्ताव सर्व सम्मति से पारित किया गया उसे सर्वोच्च न्यायालय ने इसलिए खारिज कर दिया था क्योंकि उसके लागू होने से न्यायाधीशों की नियुक्ति में उसकी दखलंदाजी खत्म हो जाती। सही बात ये है कि विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने में संकोच नहीं करने वाली न्यायपालिका को अपने कार्यक्षेत्र में किसी की प्रकार की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं होने से लोकतंत्र के उक्त तीन स्तंभों के बीच संतुलन और परस्पर सम्मान का भाव गड़बड़ा रहा है। इस स्थिति में सुधार तभी संभव है जब न्यायपालिका में अपनी रचनात्मक आलोचना सुनने का साहस हो।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 27 February 2026

केजरीवाल - सिसौदिया दोषमुक्त लेकिन सीबीआई कठघरे में



दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया सहित दो दर्जन आरोपियों को बहुचर्चित शराब घोटाले में स्थानीय राउज एवेन्यू अदालत द्वारा दोषमुक्त मानकर सीबीआई के जांच  अधिकारी की विभागीय जांच का आदेश दे दिया। अदालत ने सीबीआई द्वारा प्रस्तुत आरोप पत्र में खामियां पाते हुए स्पष्ट कर दिया कि वह आरोपियों के विरुद्ध समुचित प्रमाण और साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी। उल्लेखनीय है केजरीवाल सरकार द्वारा लागू की गई शराब नीति को लेकर काफी हल्ला मचा था। सीएजी रिपोर्ट में उक्त नीति से दिल्ली सरकार को दो हजार करोड़ रु. के नुकसान का खुलासा होने के बाद कांग्रेस ने उपराज्यपाल से शिकायत करते हुए जांच की मांग के साथ ही श्री केजरीवाल से त्यागपत्र भी मांगा। हालांकि बाद में जब उनकी गिरफ्तारी हुई तब कांग्रेस ही उनके बचाव में कूद पड़ी। यहां तक कि दिल्ली में विपक्ष की एक रैली में सोनिया गांधी ने मंच पर उनकी पत्नी को अपने बगल में बिठाकर सबको चौंकाया। इस मामले में केजरीवाल सरकार के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया के  अलावा तेलंगाना के तत्कालीन मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की बेटी के. कविता भी गिरफ्तार हुई थीं, जिनका संबंध दक्षिण भारत की उस शराब लॉबी से बताया गया जिसकी उक्त शराब नीति में बड़ी भूमिका चर्चा में रही। बहरहाल निचली अदालत के  फैसले से श्री केजरीवाल और उनके दाहिने हाथ श्री सिसौदिया को राहत मिल गई। इसमें दो मत नहीं कि गत वर्ष दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की पराजय के पीछे उक्त विवाद का भी योगदान रहा। आम आदमी पार्टी की भ्रष्टाचार विरोधी छवि को शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी ने बुरी तरह धूमिल कर दिया। हालांकि सीबीआई निचली अदालत के फैसले से संतुष्ट नहीं है । उसके वकीलों के अनुसार वे फैसले का अध्ययन करने के उपरांत उच्च न्यायालय में इसके विरुद्ध अपील करेंगे। उच्च न्यायालय इस फैसले पर क्या रुख अपनाता है इसका अनुमान लगाना मुश्किल है लेकिन निचली अदालत ने सभी आरोपियों को पूरी तरह दोषमुक्त मानने के जो कारण बताए उनसे सीबीआई की क्षमता पर एक बार फिर सवाल खड़े होंगे। सीएजी रिपोर्ट में शराब नीति से दिल्ली सरकार को हुए नुकसान पर कांग्रेस ने उपराज्यपाल को शिकायत देकर जांच की मांग की थी । उसी के बाद इस मामले ने जोर पकड़ा। बाद में सीबीआई के साथ ही ईडी भी जांच में शामिल हो गई । निचली अदालत ने शराब नीति में भ्रष्टाचार के आरोपों को रद्द  करने के जो कारण बताए  उनसे सीबीआई कठघरे में खड़ी हो गई । फैसले में साफ कहा गया है कि एक हजार पृष्ठ का आरोप पत्र अपर्याप्त प्रमाणों के अभाव में स्वीकार करने योग्य नहीं हैं। अदालत ने सीबीआई के जांच अधिकारी की विभागीय जांच का आदेश देकर मामले को नया मोड़ दे दिया। इस फैसले से सीबीआई की साख एक बार फिर गिरी है। यही हाल ईडी का भी है। दोनों जांच एजेंसियों पर विपक्ष ये आरोप लगाता है कि वे सरकार के दबाव में काम करती हैं। ये बात भी सही है कि इन एजेंसियों द्वारा शुरुआत तो धमाकेदार अंदाज में की जाती है लेकिन ज्यादातर मामलों में वे आरोपों को साबित करने में सफल नहीं रहतीं। इसका एक कारण उन पर काम का जबरदस्त बोझ भी है। इस फैसले के बाद शराब घोटाले संबंधी सीएजी की रिपोर्ट पर भी उंगलियां उठेंगी क्योंकि उसी के आधार पर कांग्रेस ने पहली शिकायत दर्ज करवाई थी। हो सकता है सीबीआई उच्च न्यायालय में अपील करते हुए इस फैसले पर स्थगन प्राप्त करने में कामयाब हो जाए लेकिन निचली अदालत द्वारा उसके आरोप पत्र को सिरे से खारिज किया जाना इस बात का प्रमाण है कि उसने ठीक से जांच नहीं की और इसीलिए वह समुचित प्रमाण और गवाह पेश करने में विफल रही। इस फैसले से केंद्र सरकार को भी आलोचना का शिकार होना पड़ेगा क्योंकि सीबीआई उसी के अधीन है। भले ही कांग्रेस ने शराब नीति के विरुद्ध मोर्चा खोलकर केजरीवाल सरकार के लिए मुसीबत खड़ी की हो किंतु आज के फैसले के बाद विपक्ष को ये कहने का अवसर मिल गया कि केंद्र सरकार सीबीआई का दुरुपयोग विपक्ष को घेरने के लिए करती है। आरोप मुक्त होने वाले नेताओं ने भाजपा पर आरोप लगाना शुरू भी कर दिया। अब उच्च न्यायालय में इस फैसले के  विरुद्ध की जाने वाली अपील का क्या हश्र होता है ये तो भविष्य बताएगा किंतु निचली अदालत के फैसले ने जहां सीबीआई और केंद्र सरकार को जबरदस्त झटका दिया है  वहीं आम आदमी पार्टी को खुलकर होली खेलने का अवसर प्रदान कर दिया।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 26 February 2026

हमास की मूर्खता से खून के आंसू पीने मजबूर हैं फिलीस्तीनी


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे समय इजराइल  गए जब ईरान पर अमेरिकी हमले की आशंका से समूचा विश्व परेशान है। यदि डोनाल्ड ट्रम्प  ईरान के शासक खामेनेई को हटाने  के लिए सैन्य कार्रवाई करते हैं तो  वैश्विक अर्थव्यवस्था पूरी तरह हिल जाएगी। दरअसल इस्लामिक देशों में ईरान पर ही अमेरिका का बस नहीं चलता। ज्यादातर अरब देश  अमेरिकी प्रभाव में हैं । ईरान भी रूस और चीन के खुले समर्थन के कारण अमेरिका से ऐंठता है। हालांकि उसका अपना सैन्य सामर्थ्य भी बाकी अरब देशों की तुलना में अधिक है। इजराइल और हमास की जंग में जब इजराइल ने ईरान पर हवाई हमले किए तब  उसने पलटवार करते हुए राजधानी सहित इजराइल के अनेक स्थानों पर मिसाइलों की बरसात कर दहशत फैला दी। उसी वजह से इजराइल भी युद्धविराम के लिए तैयार हुआ। हालांकि तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। ऐसे हालातों में श्री मोदी का तेल अवीव जाना बड़ी कूटनीतिक पहल है। हालांकि इसके पीछे  नए रक्षा सौदों को कारण माना जा रहा है किंतु इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के साथ  करीबी रिश्ते होने से इस यात्रा में  भू - राजनीति की मौजूदा स्थिति और उसमें भारत की भूमिका पर भी चर्चा होगी। लेकिन भारत में कुछ लोगों को यह यात्रा नागवार गुजर रही है। कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश ने तंज किया है कि इजराइल द्वारा फिलिस्तीनियों पर किए जा रहे अत्याचार को नजरअंदाज कर श्री मोदी तेल अवीव जा रहे हैं। असदुद्दीन ओवैसी ने भी दौरे की आलोचना की। वहीं प्रियंका गांधी ने प्रधानमंत्री को सुझाव दिया कि वे इजराइली संसद को संबोधित करते समय फिलीस्तीन का मुद्दा उठाएं। उल्लेखनीय है कांग्रेस हमेशा से इजराइल के साथ प्रगाढ़ संबंध रखने के विरोध में रही है । ओवैसी का इजराइल विरोध भी स्वाभाविक है जिन्होंने लोकसभा की शपथ के बाद फिलीस्तीन के पक्ष में नारा लगाया था। इजराइल - हमास जंग के दौरान प्रियंका भी कंधे पर फिलीस्तीन लिखा झोला टांगकर संसद में नजर आई थीं। निःसंदेह मासूम बच्चों , महिलाओं और वृद्ध - लाचार लोगों पर हमले करना मानवीयता के विरुद्ध है। गाजा में  इजराइली हमलों के कारण  बिजली , पानी , दवाइयां, दूध - भोजन का अभाव होने से लाखों लोग अकल्पनीय यातनाएं झेलने बाध्य हुए। लेकिन संकट के उस दौर में इजिप्ट सहित पड़ोसी मुस्लिम देशों ने अपनी सीमाएं बंद कर दीं ताकि गाजा से शरणार्थी उनके यहां प्रवेश न कर पाएं। आज भारत में जो लोग मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए इजराइल की आलोचना करते हैं उनके मुंह से एक शब्द भी इजिप्ट के विरोध में नहीं सुनाई दिया। स्मरणीय है इजराइल के साथ जो समझौता यासर अराफात के समय हुआ उसमें गाजा और वेस्ट बैंक नामक फिलीस्तीन के दो हिस्से बने। इजराइल दोनों के बीच में हैं। गाजा को बिजली सहित अन्य जरूरी सुविधाएं वही प्रदान करता था। 2006 में हमास नामक इस्लामिक सैन्य संगठन ने गाजा की  सत्ता हथिया ली । ईरान सहित तमाम इजराइल विरोधी मुस्लिम देशों का समर्थन और संरक्षण मिलने से वह मजबूत होता गया। 7 अक्टूबर  2023 को अचानक हमास ने इजराइल पर ड्रोन के जरिए हमले किये और मिसाइलें भी बरसाईं जिससे सैकड़ों इजराइली मारे गए। हमास के लड़ाके इजराइल में घुसकर सैकड़ों लोगों को बंधक बनाकर ले गए। उसी के बाद नेतन्याहू ने आर - पार की जंग छेड़ने का ऐलान करते हुए हमास की कमर तोड़ने का अभियान शुरू किया। आज  फिलीस्तीनी जो भोग रहे हैं उसका कसूरवार  हमास तथा उसकी पीठ पर हाथ रखने वाला ईरान ही है।  सर्वविदित है कि ईरान ने हमास को इसके लिए उकसाया था क्योंकि कुछ  दिनों बाद  ही इजराइल और सऊदी अरब में ऐतिहासिक समझौता होने वाला था ।  ईरान  उसे रुकवाना चाहता था। इसलिए उसने हमास के कंधे का इस्तेमाल किया। इस प्रकार गाजा की बर्बादी और फिलीस्तीन के अस्तित्व पर नए खतरे का जिम्मेदार हमास है। इसलिए भारत में जो राजनीतिक दल फिलिस्तीनियों के लिए आंसू बहा रहे हैं उन्हें हमास की आलोचना करना चाहिए जिसने गाजावासियों को खून के आंसू पीने मजबूर कर दिया। अतीत को  किनारे कर दें तो गाजा में 7 अक्टूबर 2023 के बाद इजराइल ने जो किया वह हमास के पागलपन का दुष्परिणाम  था। ऐसे में इजराइल से पहले हमास को कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। लेकिन न तो ओवैसी ऐसा करेंगे और न ही कांग्रेस क्योंकि ऐसा करने से भारत के मुसलमान नाराज हो जाएंगे।


- रवीन्द्र वाजपेयी