आगामी 30 सितंबर को नई दिल्ली में होने जा रही इंडिया ब्लॉक की बैठक पर विश्लेषकों की नजर है। इसका उद्देश्य वैसे तो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों की संयुक्त रणनीति बनाकर उन पर त्यागपत्र देने का दबाव बनाना है।साथ ही संसद के अगले सत्र में उनके विरुद्ध महाभियोग लाने पर भी विचार होगा। हालांकि इसके पहले भी उनके विरोध में मोर्चा खोला जा चुका है किंतु कामयाबी नहीं मिली। स्मरणीय है मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया जब बिहार विधानसभा चुनाव के पहले शुरू हुई तब सर्वोच्च न्यायालय तक विवाद पहुंचा किंतु उसने कुछ शर्तों के साथ उसे जारी रखने की अनुमति दे दी। जिससे उत्साहित होकर चुनाव आयोग ने अनेक राज्यों में उसको शुरू कर दिया। धीरे- धीरे इस की चर्चा अदालती कार्यवाही की खबरों तक सिमटकर रह गई। लेकिन हाल ही में एक अखबार द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त के अन्य दो आयुक्तों के साथ मतभेद की खबर प्रकाशित किये जाने से ये मुद्दा गरमा गया जिसे लपकते हुए विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त से त्यागपत्र देने की मांग कर डाली। राहुल गाँधी ने तो दिल्ली की पत्रकार वार्ता में ज्ञानेश कुमार को देशद्रोही तक कह डाला। साथ ही 2024 में चुनी गई लोकसभा की वैधता पर सवाल उठाते हुए यहाँ तक कह दिया कि उसके द्वारा बनाये गए कानून भी रद्द करने योग्य हैं। कांग्रेस ने उक्त खबर प्रकाशित होने के बाद देश भर में प्रदर्शन भी किये किंतु अन्य विपक्षी पार्टियों द्वारा किया गया विरोध जुबानी ज्यादा रहा इसलिए इंडिया ब्लॉक की बैठक बुलाने का फैसला हुआ ताकि ये लगे कि ये मुख्य चुनाव आयुक्त का विरोध समूचे विपक्ष की आवाज है। इस बैठक में कौन - कौन से दल शामिल होंगे इस पर सभी की निगाह लगी हैं। ये भी महत्वपूर्ण होगा कि शीर्ष नेता इसमें उपस्थित होंगे या अपना प्रतिनिधि भेजकर औपचारिकता का निर्वहन करेंगे। सच ये है कि लोकसभा चुनाव के बाद से इस गठबंधन में बिखराव आने से कोई संगठनात्मक स्वरूप ही सामने नहीं आ सका । बीते दो - ढाई सालों में जितने भी विधानसभा चुनाव हुए उनमें कई राज्यों में इंडिया ब्लॉक से जुड़े दल ही आपस में भिड़ गए। हरियाणा, दिल्ली, बिहार, प. बंगाल और केरल इसके उदाहरण हैं। उ.प्र , पंजाब और हिमाचल प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव की तैयारियां होने लगी हैं। लेकिन अभी तक विपक्षी एकता की कोई संभावना नजर नहीं आ रही। उ.प्र में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ गठजोड़ का इंतजार किये बिना रथयात्रा शुरू कर दी। और तो और वे श्री गाँधी के निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली तक जा पहुंचे जिस पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने तीखी प्रतिक्रिया दी। इसी तरह पंजाब में भी आम आदमी पार्टी का कांग्रेस से टकराव है। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण का विरोध तो कमोबेश सभी विपक्षी दल कर रहे हैं किंतु राहुल गाँधी के इंडिया ब्लॉक की बैठक में छाए रहने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता। और यही सबसे बड़ा पेच है क्योंकि अखिलेश यादव श्री गाँधी को महत्व देकर अपनी चमक कम नहीं करना चाहेंगे। स्मरणीय है उ.प्र में कांग्रेस विधानसभा की 200 सीटें मांग रही है परंतु अखिलेश 100 के लिए भी राजी नहीं हैं। ऐसी ही स्थिति श्री केजरीवाल की है जो पंजाब में कांग्रेस को किसी भी प्रकार की रियायत देने राजी नहीं हैं। अखिलेश को ये भी लग रहा है कि ज्ञानेश कुमार के विरोध में उनका समय बर्बाद होगा जिसका असर चुनावी तैयारियों पर पड़ सकता है। दरअसल वे बिहार चुनाव में वोट चोरी के विरोध में निकाली गई यात्रा के दुष्परिणाम को भूले नहीं हैं जिसमें श्री गाँधी ने तेजस्वी यादव को भी साथ रखा। वह यात्रा पूरी तरह बेअसर रही। नतीजों के बाद ये बात काफी उछली कि यदि तेजस्वी उस यात्रा से दूर रहते तब शायद वे बेहतर तरीके से चुनाव प्रचार कर पाते। ये सब देखते हुए 30 सितंबर की बैठक में इंडिया ब्लॉक की एकता का खुलासा हो जाएगा। रही बात मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध मोर्चा खोलने की तो भले ही राहुल इस पर कितना भी हल्ला मचा लें किंतु अब तक के अनुभव बताते हैं कि आम जनता को इसमें कोई रुचि नहीं है बजाय उन लोगों को छोड़कर जिनके नाम मतदाता सूची से कट गए हों।
- रवीन्द्र वाजपेयी