Saturday, 26 September 2026

लद्दाख़ में अलगाववाद की जड़ें जमाने का षडयंत्र रच रहे वांगचुक



लद्दाख़ के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने एक बार फिर विवादित बयान देकर अपनी अलगाववादी मानसिकता का परिचय दे दिया। लेह में गत वर्ष हुई हिंसा के बाद उन्हें कई महीनों तक जेल में रखा गया था। लेकिन जब उन्हें रिहा किया गया तब ये चर्चा चली थी कि शायद उनका केंद्र सरकार से समझौता हो गया है। स्मरणीय है 2019 में लद्दाख़ को जम्मू कश्मीर से अलग करने के बाद केंद्र शासित क्षेत्र बना दिया गया किंतु जम्मू कश्मीर  की तरह उसे विधानसभा नहीं दी गई जिसकी मांग को लेकर लेह में हुए आंदोलन ने उपद्रव का रूप ले लिया था। उस घटना के एक साल पूरा होने पर  केंद्र सरकार के खिलाफ तेवर दिखाते हुए वांगचुक ने आरोप लगा दिया कि  लद्दाख में भय व दमन का ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जो चीन, तिब्बत में नहीं कर रहा है। इसी के साथ वे यहाँ तक बोल गए कि जब लद्दाख के सामने भारत व चीन के विकल्प थे, तब भारत को इसलिए चुना गया था क्योंकि यहां लोकतांत्रिक व्यवस्था व नागरिकों को गरिमा के साथ रहने का अधिकार मिलने की उम्मीद थी। आज लद्दाख का माहौल चिंता का विषय है। इस बयान के जरिये उन्होंने  ये एहसान जताने की कोशिश की मानो लद्दाख यदि भारत में है तो इसका श्रेय उन्हें या वहाँ के कथित नेताओं को है। जबकि हकीकत ये है कि लद्दाख़ सदैव से भारत का हिस्सा रहा । और 1962 में चीन के हमले के समय भारतीय सेनाओं ने अपना बलिदान देकर उसकी रक्षा की, वरना तिब्बत की तरह लद्दाख़ भी चीन के शिकंजे में आ जाता और वांगचुक जैसे लोग जुबान खोलने लायक भी नहीं बचते। इसीलिए उनका ये कहना कि लद्दाख़ में स्थिति तिब्बत से ज्यादा खराब हैं और भारत सरकार चीन से अधिक दमन कर रही है , न केवल सच्चाई से कोसों दूर अपितु घोर आपत्तिजनक भी है। उनके इस बयान पर ऐतराज जताते हुए तिब्बत से पलायन कर भारत  में बसे तिब्बतियों के धर्मशाला स्थित तिब्बत सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेशन प्रवक्ता तेंजिन लेक्शे ने गत दिवस जारी बयान में वांगचुक को गलत ठहराते हुए कहा कि तिब्बत में चीन आज भी जोर जबरदस्ती कर रहा है। वहां पर लोगों को मौलिक शिक्षा, धर्म के अधिकार नहीं है। जो लोग लद्दाख़ गए हैं उन्हें कहीं से ये नहीं लगता कि वहाँ के नागरिकों पर किसी बात की पाबंदी है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सीमावर्ती इलाकों में अधो संरंचना के जो काम हुए उनकी वजह से सीमा पार से आने वाले खतरों से निपटने में जहाँ सेना को मजबूती मिली वहीं लद्दाख़ के निवासियों को भी मानसिक सुरक्षा का एहसास हुआ। सेना केवल सीमाओं पर ही चौकसी नहीं रखती बल्कि लद्दाख़ की जनता के स्वास्थ्य और शिक्षा की व्यवस्था भी करती है। ऐसे में वांगचुक द्वारा लद्दाख़ में तिब्बत से भी ज्यादा दमन चक्र चलने जैसी बात कहना कश्मीर घाटी के उन पाक समर्थक अलगाववादियों का समर्थन है जो भारत में रहते हुए भी पाकिस्तान के प्रति वफादारी दिखाने से बाज़ नहीं आते थे। इसीलिए ये कहना गलत नहीं होगा कि वांगचुक भी चीनी एजेंट की तरह  बोल रहे हैं। वरना उन जैसे शिक्षित व्यक्ति को ये तो पता ही होगा कि तिब्बत पर जबरन कब्जा करने के बाद चीन की साम्यवादी सरकार ने तिब्बतियों के धर्म और संस्कृति को नष्ट करने के लिए योजनाबद्ध प्रयास किये। तिब्बती लड़कियों की चीनी नस्ल के युवकों से बलात शादियाँ करवाने का अभियान चलाया। हजारों बौद्ध भिक्षुक रहस्यमय तरीके से लापता हो गए। बौद्ध मठों में रखा प्राचीन साहित्य नष्ट कर दिया गया। चीन की मुख्य भूमि से लाये लोगों को बसाकर वहाँ का जनसंख्या संतुलन बिगाड़ने का प्रयास भी हुआ। तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा का नाम तक कोई नहीं ले सकता। चीन ने तिब्बत के चारों तरफ लौह आवरण जैसा बना रखा है। वहाँ विदेशी सैलानी और मीडिया तक को आने नहीं दिया जाता। मानव अधिकार संगठन जैसी संस्थाओं को भी तिब्बती जनता की दयनीय स्थिति देखने नहीं दी जाती। अब इस स्थिति को वांगचुक लद्दाख़ से बेहतर मानते हैं तब ये मान लेना सही होगा कि वे आस्तीन के सांप हैं । उनके भारत विरोधी ताकतों से रिश्तों का संदेह इस बयानबाजी से और पुख्ता हो गया है। दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में वांगचुक द्वारा अनशन पर बैठने की काफी चर्चा हुई। उन्होंने इस पार्टी के विदेशों से सम्बन्धों का जिस प्रकार खंडन किया उससे भी उनके इर्द - गिर्द मंडरा रहा रहस्य और गहरा गया। जब उन्होंने मेदांता अस्पताल में केन्द्रीय मंत्रियों की मौजूदगी में अनशन खत्म किया तब लगा था कि उनके रवैये में कुछ सुधार हुआ किंतु उनके ताजा बयान से उनका असली देश विरोधी चेहरा एक बार फिर उजागर हो गया है। इसके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए वरना लद्दाख़ में भी अलगाववाद की हवा बहने लगेगी जिसका फ़ायदा उठाकर चीन इस इलाके को हड़पने की कोशिश कर सकता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी



Friday, 25 September 2026

चुनाव आयोग : आरोपों को साबित भी करे विपक्ष



एक अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयोग के दो आयुक्तों ने कुछ मामलों में अपनी असहमति दिखाई जिसे नजरंदाज कर दिया गया। साथ ही कुछ फैसले उनकी जानकारी के बिना ले लिए गए जिसके बारे में  उन्होंने भारत सरकार के कैबिनेट सचिव को पत्र भी लिखा था। अखबार के मुताबिक उक्त आपत्तियां एस. आई. आर से जुड़ी हुई थीं। रिपोर्ट प्रकाशित होते ही राजनीतिक तूफान आ गया। राहुल गाँधी, ममता बैनर्जी और अरविंद केजरीवाल का बोलना तो समझ में भी आता है लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी  भी बहती गंगा में हाथ धोने लगी। इन सबका निशाना बने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार। कोई उन्हें देशद्रोही कह रहा है तो कोई गिरफ्तारी और त्यागपत्र की मांग कर रहा है। आयोग ने स्पष्टीकरण दिया कि आयुक्तों के बीच विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा और विमर्श के दौरान असहमति होने के बाद भी अंतिम निर्णय एक राय से होते हैं। लेकिन विपक्ष ने जिस तरह से ताबड़तोड़ हमले मुख्य चुनाव आयुक्त पर किये उससे लगता है मानो उसे इस बारे में पहले से ही जानकारी थी। नीट परीक्षा को लेकर आया उबाल ठंडा पड़ चुका है। पंजाब और दिल्ली वि.वि छात्र संघ चुनाव में अभाविप की जीत से जंतर मंतर आंदोलन की हवा निकल चुकी है। अंबानी और अडानी के विरुद्ध उठाये गए मुद्दे भी फुस्स साबित हुए। रक्षा सौदों पर किया शोर- शराबा भी जनता को प्रभावित नहीं कर सका।  ब्रिक्स सम्मेलन  से प्रधानमंत्री की छवि और चमकी है। अभी तक जितने भी चुनाव सर्वे आये उनमें उ.प्र, और उत्तराखंड में भाजपा की वापसी तय मानी जा रही है। वहीं पंजाब में आम आदमी पार्टी और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के हाथ से सत्ता खिसकती दिख रही है। विपक्ष में कोई एकजुटता नहीं हो पा रही। जंतर मंतर आंदोलन पर आम आदमी पार्टी और वामपंथियों के कब्जे ने कांग्रेस को तनाव में डाल दिया । उसके साथ कोई गठबंधन को तैयार नहीँ है। केजरीवाल को भी चिंता है कि दिल्ली से पैर उखड़ने के बाद पंजाब में भी हार सिर पर मंडरा रही है। ममता बैनर्जी ने इंडिया गठबंधन में सांस फूंकने की असफल कोशिश की । शरद पवार ,  सोनिया गाँधी और लालू प्रसाद यादव का स्वास्थ्य आड़े आ रहा है। राहुल गाँधी और अखिलेश यादव के बीच  अघोषित प्रतिस्पर्धा चल रही है। आरक्षण  पर भाजपा से नाराज सवर्ण जातियाँ इस असमंजस में हैं कि किसके साथ जाएं क्योंकि राहुल गाँधी का बस चले तो 100 प्रतिशत आरक्षण कर दें। वहीं सपा, राजद और बसपा का तो आधार ही आरक्षण टिका हुआ  है। शिवसेना, तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी  का जनाधार भी कम हुआ है। कुल मिलाकर विपक्ष को कुछ सूझ नहीं रहा था। ऐसे में चुनाव आयोग के बारे में प्रकाशित एक खबर पर होहल्ला शुरू कर दिया गया। आयोग की कार्यप्रणाली में यदि कमी है तो उसकी जाँच होनी चाहिए। लेकिन लंबे समय से वोट चोरी का ढोल पीटने वाले राहुल उसका एक भी प्रमाण नहीं दे सके। ईवीएम पर लगाए गए आरोप भी हवा हवाई होकर रह गए । गत दिवस  श्री गाँधी ने अपनी खीझ ये कहते हुए निकाली कि 1971 का चुनाव जीतने के दो वर्ष बाद ही स्व. इंदिरा गाँधी के विरुद्ध सत्ता विरोधी लहर  पैदा हो गई थी किंतु भाजपा सरकार के विरुद्ध नहीं होती। इसके साथ ही उन्होंने बचकानेपन का परिचय देते हुए पहले तो ज्ञानेश कुमार को देशद्रोही बताया और फिर उन्हें सरकार के विरुद्ध गवाह बनने का सुझाव देने लगे। इस बारे में जब तक संदर्भित दोनों चुनाव आयुक्त सामने आकर कुछ नहीं बोलते तब तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचना बेमानी है। ये सवाल भी उठता है कि यदि ज्ञानेश कुमार अपनी मर्जी थोप रहे थे तब दोनों चुनाव आयुक्तों को  राष्ट्रपति से शिकायत करनी थी अथवा त्यागपत्र देकर  अपनी बात रखनी चाहिए थी।  चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। उसके सर्वोच्च पदाधिकारी को देशद्रोही कहना किसी को भी शोभा नहीं देता। इसी तरह 2024 में वोट चोरी से बनी संसद द्वारा बनाये सभी कानूनों को अवैध बता देना भी समझ से परे है। यदि श्री गाँधी को लगता है वर्तमान लोकसभा गलत तरीके से चुनी गई तब उन्हें उसकी सदस्यता से त्यागपत्र देकर एक उदाहरण पेश करना चाहिए। लेकिन उनका रवैया केवल शोर मचाना रह गया है। फ्रांस से रक्षा सौदे , हिंडनबर्ग रिपोर्ट और  पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे की किताब को लेकर श्री गाँधी द्वारा मचाया गया हल्ला व्यर्थ साबित हुआ। संसद के कई सत्र बर्बाद होने के बाद भी विपक्ष कुछ साबित नहीं कर सका। जब भी कोई चुनाव आता है श्री गाँधी एक नया मुद्दा पकड़कर बैठ जाते हैं। लेकिन जनता उनकी बात को अनसुना करती आई है और आगे भी करती रहेगी क्योंकि वे किसी भी लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने में सफल नहीं हुए । चुनाव आयोग संबंधी जितने भी विवाद हैं उन पर सर्वोच्च न्यायालय में बहस जारी है। बेहतर होगा उसके फैसले का इंतजार किया जाए। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 24 September 2026

ओबीसी को खुश करने के फेर में बाकी जाति समूह नाराज हो सकते हैं राहुल से



म.प्र में ओबीसी आरक्षण का मामला बीते अनेक वर्षों से विवादों में फंसा हुआ है। वर्ष 2019 में तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने ओबीसी जातियों का आरक्षण बढ़ाकर 14 से 27 फीसदी कर दिया था । इसकी वजह से प्रदेश में सभी आरक्षण मिलकर 50 फीसदी की संवैधानिक सीमा से अधिक हो गए। इसके विरुद्ध दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने उस पर रोक लगा दी। 2020 में वह सरकार गिर गई और शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा प्रदेश की सत्ता पर काबिज हो गई। कानूनी रोक के कारण राज्य में  87:13 के  फॉर्मूले के तहत चयन परीक्षाओं के 87% पदों पर परिणाम जारी किए जा रहे हैं और 13% पद रोके (होल्ड) गए हैं। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा जिसने उच्च न्यायालय को नियमित सुनवाई कर इस विवाद का निपटारा करने का निर्देश दिया। लेकिन अभी तक बात कानूनी बहस में ही उलझी हुई है। दरअसल उच्च न्यायालय  में अनु. जनजाति वर्ग की ओर से ये ऐतराज जताया गया कि ओबीसी आरक्षण 14% से बढ़ाकर 27% करने से कुल आरक्षण 73% हो जाएगा। इससे अनारक्षित श्रेणी के साथ-साथ उन अनु. जनजाति उम्मीदवारों के लिए मौके घट जाएंगे जो अपनी योग्यता के आधार पर सामान्य  श्रेणी में चुने जाते हैं। इसके अलावा ये आपत्ति भी है कि बिना पर्याप्त सामाजिक और संख्यात्मक आंकड़ों  के आरक्षण की सीमा में वृद्धि अनुचित  है। स्मरणीय है प्रदेश में अनु. जाति के लिए 16, जनजाति के लिए 20, ओबीसी के लिए 14 और EWS के लिए 10 फीसदी आरक्षण लागू है। ऐसे में ओबीसी आरक्षण 14 से 27 प्रतिशत  होने पर यह सीमा करीब 73 फीसदी हो जाएगी, जिस पर कानूनी और संवैधानिक चुनौतियां चल रही हैं। म. प्र उच्च न्यायालय में इस पूरे मामले पर नियमित सुनवाई में आरक्षित और अनारक्षित दोनों पक्ष अपने तर्क रख रहे हैं। लेकिन इस मामले में अदालत से बाहर भी राजनीतिक दांव - पेच चले जा रहे हैं। कांग्रेस का आरोप है कि उसने ओबीसी को न्याय देते हुए उनके आरक्षण का प्रतिशत 14 से बढ़ाकर 27 किया था किंतु भाजपा ने सत्ता में लौटते ही उसमें रोड़े अटकाते हुए अदालत में फंसा दिया और सुनवाई के दौरान भी जवाब देने में विलंब करते हुए मामले को जबरन खींच रही है। लेकिन प्रदेश सरकार के सामने भी ये समस्या है कि ओबीसी को खुश करने के फेर में अन्य जाति समूह मुँह फुलाकर बैठ जाएंगे। अदालत में तो जो होगा सो होगा किंतु लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र भेजकर  ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के साथ ही जिन 13 फीसदी उम्मीदवारों की नियुक्तियाँ रुकी पड़ी हैं उन्हें तत्काल नियुक्ति पत्र देने की मांग की है। श्री गाँधी को ऐसा करने की सुध शायद न आती यदि इंदौर में छात्रों की गूँज कार्यक्रम के दौरान एक युवती ने ये मुद्दा न छेड़ा होता। इस पत्र के जरिये श्री गाँधी ने प्रदेश के ओबीसी वोट बैंक को अपने पाले में खींचने का पांसा फेंका है जो कि भाजपा का प्रतिबद्ध मतदाता रहा है। भाजपा ने भी इस वर्ग को लुभाने के लिए 2003 से अब तक जिन उमा भारती, बाबूलाल गौर, शिवराज सिंह चौहान और डॉ. मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया, वे सभी ओबीसी हैं। और ये भी कि ओबीसी आरक्षण के विवाद के बावजूद भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में धमाकेदार जीत हासिल करने के बाद लोकसभा की सभी 29 सीटें कब्जा लीं। सवाल ये है कि क्या कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त संवैधानिक पद  पर आसीन श्री गाँधी अदालत में विचाराधीन किसी मामले के बारे में ऐसा पत्र लिख सकते हैं? छात्रों और बेरोजगारों के पक्ष में आवाज उठाना नेता प्रतिपक्ष का कर्तव्य है लेकिन श्री गाँधी चूंकि एक राष्ट्रीय पार्टी के नेता हैं इसलिए उन्हें आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर सोच - समझकर अपनी राय रखनी चाहिए। इस समय देश का जो वातावरण है उसे देखते हुए राजनेताओं को गंभीरता के साथ जिम्मेदारी का भी प्रदर्शन करना चाहिए क्योंकि सूचना क्रांति और सोशल मीडिया के इस दौर में  छोटी सी बात का बतंगड़ बनते देर नहीं लगती। म.प्र के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर श्री गाँधी ओबीसी वर्ग की सहानुभूति भले बटोर लें किंतु अनु. जाति / जनजाति और सवर्ण जातियाँ उनसे नाराज हो जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। दुर्भाग्य से सत्ता की  अंधी दौड़ में सभी राजनीतिक दल कमोबेश देश को जातीय संघर्ष में धकेलने में जुटे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी























 
  
 



    


    




    






Wednesday, 23 September 2026

आई. आई. टी से उठा विवाद खतरनाक मोड़ ले सकता है



दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले हुए आंदोलन के कारण शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को त्यागपत्र देना पड़ा था। केन्द्र सरकार ने शिक्षा क्षेत्र में व्याप्त विसंगतियों को दूर करने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति भी बना दी। उसके बाद वह आंदोलन तो समाप्त हो गया किंतु उसमें मनुवाद को लेकर जो गालीबाजी हुई उसकी प्रतिक्रियास्वरूप जिस आरक्षण विरोधी आंदोलन का सूत्रपात हुआ उसकी चर्चा पूरे देश में है। शिक्षा संस्थानों में कम अंकों के बाद भी आरक्षित श्रेणी के छात्र को प्रवेश दिया जाना और अधिक अंक प्राप्त करने वाले सवर्ण को वंचित किये जाने से छात्र के साथ ही उनके माता - पिता ही नहीं बल्कि समूचे सवर्ण समाज में भारी नाराजगी है। यूजीसी अधिसूचना से भड़का गुस्सा नीट पेपर लीक के बाद और बढ़ गया। आजकल सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफॉर्म पर केन्द्र सरकार के विरोध में जो हवा बह रही है उसके पीछे आरक्षण और अनु. जाति/ जनजाति कानून भी है। कहा जा रहा है कि राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा को अनेक शहरों में मिली कड़ी टक्कर का कारण उसके परंपरागत सवर्ण मतदाताओं का छिटकना रहा जिसके कारण बड़ी संख्या में निर्दलीय जीतने में सफल रहे। हालांकि एक को छोड़कर सभी बड़े शहरों में भाजपा के महापौर बन गए किंतु बहुमत जुटाने के लिए उसे जोड़ - तोड़ का सहारा लेना पड़ा। इसी तरह दिल्ली वि.वि छात्र संघ चुनाव में भाजपा समर्थित अभाविप को तीन पदों पर जीत तो हासिल हो गई किंतु अंतर कम होने के पीछे भी सवर्णों की नाराजगी बताई जा रही है। इसीलिए उ.प्र विधानसभा के आगामी चुनाव भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण माने जा रहे हैं जहाँ ब्राह्मण मतदाताओं की भूमिका निर्णायक हो सकती है। यदि उनमें थोड़े से भी खिसके तब पार्टी के लिए संकट खड़ा हो सकता है। इस बारे में विचारणीय बात ये है कि अनु. जाति/ जनजाति कानून को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सवर्ण विरोधी छवि बनाने की सुनियोजित कोशिश वह वर्ग कर रहा है जो दलित और पिछड़ी जातियों को सवर्णों के विरुद्ध भड़काने में आगे - आगे रहता है। राजनीतिक नेताओं द्वारा फैलाये जा रहे ज़हर के चलते जातिगत भेदभाव विद्वेष से बढ़कर दुश्मनी का रूप ले चुका है। ताजा उदाहरण बॉम्बे आई.आई.टी का है जहाँ एक दलित छात्र द्वारा आत्महत्या किये जाने के बाद पूरा माहौल तनावपूर्ण है। जो जानकारी आई उसके अनुसार एक अध्यापक ने उक्त दलित छात्र को नकल करते पकड़ लिया। उसके बाद उसने छात्रावास के कमरे में जाकर आत्महत्या कर ली। निश्चित रूप से ये अत्यंत दुखद घटना है। छात्र किसी भी जाति का हो उसका इस तरह चला जाना न केवल परिवार अपितु समाज के लिए भी आघात है। हालांकि ये बात भी चिंता के साथ चिंतन योग्य है कि आई. आई. टी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में प्रतिवर्ष दर्जनों छात्र आत्महत्या करते हैं जहाँ कड़ी मेहनत के बाद प्रवेश मिलता है। बॉम्बे आई. आई.टीके जिस छात्र की आत्महत्या का मामला सुर्खियों में है उसके माता - पिता ने उस अध्यापक पर अनु. जाति/जनजाति के तहत प्राथमिकी दर्ज करवाते हुए उसकी गिरफ्तारी की मांग कर डाली। आरोप है कि अध्यापक संस्थान के निदेशक के दबाव में उक्त छात्र को पहले से प्रताड़ित करते आ रहे थे। आत्महत्या करने वाला छात्र चूंकि दलित था इसलिए  राजनीतिक दल रोटी सेंकने सक्रिय हो गए। अध्यापक को फांसी देने तक की मांग उठने लगी। चंद्रशेखर आजाद जैसे दलित सांसद ने भी भड़काऊ बयान दे डाला। इस बीच उक्त अध्यापक को डीन के दायित्व से मुक्त कर दिया जिसके बाद देश भर के आई.आई.टी संस्थानों के ज्यादातर अध्यापक उनके समर्थन में मैदान में आ गए। इस प्रकार पूरे मामले की दिशा ही बदल गई। आत्महत्या प्रकरण की जांच शुरू हो चुकी है। उसके निष्कर्षों के लिए प्रतीक्षा करने के बजाय जिस प्रकार का शक्ति प्रदर्शन चल पड़ा है उसके बाद शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए आरक्षण की व्यवस्था के साथ ही अनु. जाति/जनजाति कानून के औचित्य पर भी सामाजिक स्तर पर बहस होने लगी है। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य शोषित और वंचित वर्ग को मुख्यधारा में लाने के साथ ही उन पर होने वाले अत्याचारों को रोकना है। लेकिन इस बात की समीक्षा नहीं की जाती कि वह उद्देश्य किस हद तक पूरा हुआ ? ये सवाल भी है कि दलितों को  जो कानूनी संरक्षण दिया गया उसके दुरूपयोग को रोकने के लिए क्या कदम उठाये जा रहे हैं ? बॉम्बे आई. आई. टी से उठा विवाद एक छात्र की आत्महत्या और अध्यापक की भूमिका तक सीमित न रहकर राष्ट्रीय स्तर पर समाज को टुकड़ों में बाँटने और आपस में लड़ाने की स्थिति उत्पन्न न कर दे इस बात की चिंता सभी को करना होगी। आरक्षित वर्ग को संरक्षण और सहयोग मिलना ही चाहिए किंतु इसके चलते यदि सामाजिक ढांचा चरमराने लगे तो ये देश के लिए ख़तरनाक होगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 22 September 2026

फूहड़पन का शिकार होकर रह गया इंदौर का आयोजन



गत सप्ताह  इंदौर में कांग्रेस नेता राहुल गाँधी द्वारा आयोजित छात्रों की गूँज में जमा हजारों की भीड़ में वास्तविक छात्र कितने थे इसे लेकर संशय है। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं को छात्र बनाकर भीड़  बटोरी गई। वहीं कांग्रेस का दावा है कि  राहुल के बढ़ते आकर्षण के कारण अपेक्षा से अधिक छात्रों ने  आयोजन  के लिए अपना पंजीयन करवाया था। हालाँकि उक्त आयोजन में छात्रों और युवाओं की संख्या काफी थी। श्री गाँधी उनसे जुड़े मुद्दे उठा भी रहे थे किंतु इसी दौरान एक स्टैंड अप कामेडियन धड़धड़ाते हुए मंच पर आया और  राहुल से लिपटकर अजीब सी हरकतें करने लगा । पहले - पहल तो किसी को कुछ समझ नहीं आया किंतु जब श्री गाँधी ने उसे मोदी जी कहकर संबोधित किया तब  स्पष्ट हुआ कि वह नौटंकी दरअसल प्रधानमंत्री के विदेशी नेताओं से मिलने का मजाक बनाने के लिए की गई। उसी दौरान कामेडियन बार - बार श्री गाँधी से लिपटता रहा और वे भी उसे गले लगाते रहे ।  फिर कामेडियन ने भद्दे अंदाज में माँ को कुर्सी दो जैसी बात दोहराई। स्मरणीय है कुछ समय पहले एक सभा में किसी वृद्ध महिला को खड़ा देख श्री मोदी ने उन्हें कुर्सी देने की बात मंच से कही थी।कामेडियन ने उसी की नकल का भौंड़ा प्रयास किया। और फिर कुछ बड़बड़ाते हुए वह कामेडियन लौट गया। उस फूहड़पन के वीडियो सोशल मीडिया पर आ जाने से छात्रों की गूँज कार्यक्रम की चर्चा तो ठंडी पड़ गई और उस स्तरहीन कामेडी  की गूँज सर्वत्र सुनाई दे रही है। दिल्ली में कांग्रेस के एक बड़े आयोजन में पूर्व सांसद  संदीप दीक्षित ने भी इसी तरह  राहुल से गले मिलकर प्रधानमंत्री की नकल करने का नाटक रचा था जिसकी काफी निंदा हुई। इंदौर में तो उसकी और भी बेहूदे तरीके से पुनरावृत्ति हुई। जिस कामेडियन को छात्रों की गूँज नामक आयोजन में प्रधानमंत्री की नकल करने बुलाया गया वह पूरे समय हें... हें... हें करता रहा। माँ को कुर्सी दो जैसे वाक्य का भी कोई अर्थ उपस्थित श्रोता नहीं समझ सके। वो तो जब राहुल ने उसे मोदी जी कहकर संबोधित किया तब लगा कि पूरी नौटंकी का मकसद क्या था? चूंकि श्री गाँधी भी उस कामेडियन के साथ सह अभिनेता बने रहे इसलिए उस सस्तेपन के लिए वे भी जिम्मेदार माने जा रहे हैं। यदि वे उस व्यक्ति को माँ को कुर्सी दो कहने पर भी रोक देते तब भी नुकसान की कुछ भरपाई हो जाती किंतु ऐसा नहीं हुआ। परिणामस्वरूप जिस उद्देश्य से उतना बड़ा जलसा हुआ वह तो गौण होकर रह गया लेकिन उस  नौटंकी की गूँज सर्वत्र सुनाई दे रही है। कांग्रेस समर्थक लाॅबी ये कहते हुए इसका बचाव कर रही है कि प्रधानमंत्री और भाजपा का प्रचारतंत्र भी तो कांग्रेस नेताओं का मजाक बनाने में नहीं चूकता। लेकिन श्री गाँधी जिस मुद्दे को लेकर इंदौर में छात्रों के बीच गए वह गंभीर और सामयिक था। वे उसके जरिये छात्रों की भावनाओं को समझने और अपनी बात उनसे कहने तक सीमित रहते तब वह आयोजन सार्थक हो जाता। लेकिन ये बात स्पष्ट हो गई कि श्री गाँधी में दो दशक के संसदीय अनुभव के बाद भी अपेक्षित परिपक्वता का अभाव है। इसीलिए उनकी समूची उठापटक का नतीजा निराशाजनक ही रहता है। कांग्रेस इन दिनों  उन्हें प्रधानमंत्री का चेहरा बनाने के लिए पूरे पेशेवर अंदाज में प्रयासरत है। लेकिन श्री गाँधी खुद अपनी छवि खराब कर लेते हैं। कांग्रेस में इमरान प्रतापगढ़ी जैसे युवा शायर हैं जो ऐसे आयोजनों में छात्रों को प्रभावशाली तरीके से आकर्षित कर सकते हैं। लेकिन लगता है श्री गाँधी इस बात से भयभीत रहते हैं कि दूसरा कोई उन पर भारी न पड़ जाए। इसीलिए वे फूहड़पन फैला रहे स्टैंड अप कामेडियन की सेवाएं लेने मजबूर हुए। ऐसा लगता है उनको सही राह दिखाने वाला कोई नेता पार्टी में नहीं है। जो दो - चार वरिष्ट हैं भी तो उनमें इतना साहस नहीं कि वे उनकी गलतियों पर टोक सकें। यह भी संयोग ही रहा कि जब इंदौर के आयोजन में श्री गाँधी की सहभागिता से प्रधानमंत्री का उपहास हो रहा था , उसी समय दिल्ली वि.वि छात्र संघ चुनाव में कांग्रेस के छात्र संगठन एन.एस.यू.आई का सूपड़ा साफ हो रहा था। किसी ने कहा है - आजकल रंगमंच पर अच्छे अभिनेता इसलिए नहीं मिलते क्योंकि राजनीति फूहड़पन को भी श्रेष्ठ अभिनय का पुरस्कार दे देती है। लगता है कांग्रेस में भी आजकल यही हो रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी



Monday, 21 September 2026

दिल्ली वि.वि में विद्यार्थी परिषद की जीत से जेन जी का गुब्बारा फूटा



बीते सप्ताह के अंत में दिल्ली वि.वि छात्र संघ के चुनाव बड़ी राजनीतिक खबर बने। इसलिए नहीं क्योंकि भाजपा समर्थित अ. भा. विद्यार्थी परिषद ने अध्यक्ष, सचिव और सह सचिव पद पर जीत हासिल कर ली बल्कि इसलिए क्योंकि इस बार छात्रों के बीच यूजीसी और नीट परीक्षा पेपर लीक से उत्पन्न नाराजगी के चलते केन्द्र सरकार के विरुद्ध जबरदस्त गुस्सा महसूस किया जा रहा था। दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में जेन जी कहे जाने वाले युवा वर्ग ने जिस प्रकार का रोष व्यक्त किया उसे राजनीतिक पंडितों ने  देश में सत्ता परिवर्तन की शुरुआत मानकर जरूरत से ज्यादा महत्व प्रदान किया। इसी के साथ ही आरक्षण विरोधी मुहिम से सवर्ण जातियों में मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान के प्रति बेरुखी का भाव सतह पर तैरता दिखाई  देने लगा जो कि भाजपा का परंपरागत समर्थक रहा है । ऐसे में ज्यादातर लोग मानकर चल रहे थे कि केन्द्र सरकार के प्रति युवाओं के मन में बढ़ रहे असंतोष का नुकसान दिल्ली वि. वि  चुनाव में विद्यार्थी परिषद को भुगतना पड़ेगा। हालांकि इस बार परिषद ने जिन तीन पदों पर सफलता हासिल की उनमें जीत का अंतर पिछले वर्षों की अपेक्षा काफी कम रहा। उपाध्यक्ष पद पर तो एक निर्दलीय लंबे अंतर से विजयी हुआ । लेकिन इस चुनाव से  विद्यार्थी परिषद की मजबूत पकड़ एक बार फिर साबित हो गई । दूसरी ओर  कांग्रेस की छात्र इकाई एन. एस. यू. आई  अपनी मातृ संस्था की तरह जोश तो खूब दिखाती है लेकिन जीत का हुनर भूल चुकी है। जिसने कमजोर प्रत्याशी उतारकर अपनी हार का रास्ता खोल दिया। उपाध्यक्ष पद पर विजयी छात्र दीपांश शौकीन एन. एस. यू. आई से जुड़ा था और उसका अच्छा खासा प्रभाव भी था किंतु उसे किनारे कर दिया गया।  यदि दीपांश पर एन. एस. यू. आई ने भरोसा जताया होता तब पूरा चुनाव पलट सकता था। कांग्रेस नेतृत्व की अधकचरी सोच का एक प्रमाण ये भी है कि  प्रत्याशी चयन का काम राहुल गाँधी के खासमखास जे.एन.यू के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को सौंपा गया जो कम्युनिस्ट पार्टी छोड़कर कांग्रेस में आये और आते ही श्री गाँधी ने उन्हें अपनी कोर टीम का हिस्सा बना लिया। उन्हें बेशक जे. एन .यू की छात्र राजनीति का जमीनी अनुभव है जहाँ आज भी वामपंथियों का वर्चस्व बना हुआ है लेकिन दिल्ली वि.वि का माहौल अलग हटकर है जहाँ लंबे समय से विद्यार्थी परिषद ने छात्र संघ पर अपना आधिपत्य कायम रखा है। इस चुनाव में समाजवादी विचारधारा के अलावा वामपंथी छात्र संगठनों के उम्मीदवारों ने भी किस्मत आजमाई । सह सचिव पद पर तो समाजवादी उम्मीदवार ने विद्यार्थी परिषद को टक्कर दी जबकि एन. एस. यू. आई तीसरे स्थान पर खिसक गई।  इस चुनाव में वामपंथी संगठनों ने भी कुछ पदों पर हाथ आजमाया किंतु वे भी वोट कटवा की भूमिका से आगे न बढ़ सके। कन्हैया कुमार पूर्व कामरेड होने के नाते यदि वामपंथी उम्मीदवार को एन. एस. यू. आई के पक्ष में बिठा देते तब हो सकता है उसे एक पद तो हासिल हो जाता। लेकिन उन्होंने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया। कांग्रेस का भी पूरा ध्यान म.प्र के इंदौर शहर में राहुल गाँधी के गूँज नामक आयोजन पर लगा रहा। कुल मिलाकर एक अच्छा मौका एन. एस. यू. आई के हाथ से निकल गया। स्मरणीय है हाल ही में चंडीगढ़  स्थित पंजाब वि.वि छात्रसंघ चुनाव में भी विद्यार्थी परिषद ने जीत हासिल की थी। इस आधार पर जेन जी का जो गुब्बारा फुलाया गया था वह पहली ही परीक्षा में फूट गया। हालांकि एक वि.वि के चुनाव से राष्ट्रीय राजनीति की भविष्यवाणी करने पर सवाल उठाये जा  सकते हैं किंतु दिल्ली वि.वि में विभिन्न राज्यों से आये छात्र अध्ययन करते हैं इसलिए यहाँ की राजनीति पर भी राष्ट्रीय सोच का असर दिखता है। कांग्रेस के लिए बुरी खबर इसके पहले राजस्थान से भी आ चुकी थी जहाँ स्थानीय निकाय चुनाव में तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद भाजपा ने ज्यादातर नगर निगमों पर कब्जा कर लिया जबकि प्रदेश की सवर्ण जातियों में आरक्षण को लेकर भाजपा के विरुद्ध नाराजगी खुलकर सामने आ रही थी। लेकिन इसका लाभ निर्दलीयों को मिला । इससे जाहिर हो गया कि भाजपा से नाराज उसका समर्थक वर्ग अभी भी कांग्रेस पर भरोसा नहीं कर पा रहा। दिल्ली वि.वि छात्र संघ के चुनाव परिणाम राहुल गाँधी के लिए भी विचारणीय हैं जो सब काम छोड़कर युवाओं को आकर्षित करने में जुटे हैं। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 19 September 2026

100 फीसदी टैरिफ : ब्रिक्स सम्मेलन की सफलता से बौखलाए ट्रम्प



नई दिल्ली में संपन्न ब्रिक्स सम्मेलन में भारत द्वारा चीन और रूस के साथ जुगलबंदी से भन्नाये अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की खिसियाहट भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने के रूप में सामने आई है। हालांकि ट्रम्प ने भारत पर अभी 100 फीसदी टैरिफ लागू तो नहीं किया किंतु उन्हें एक नए कानून के तहत रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर यह टैरिफ लगाने का अधिकार मिल गया है जिस पर उन्होंने गत दिवस हस्ताक्षर भी कर दिये। सैंक्शनिंग रशिया एक्ट 2026 नामक इस कानून से ट्रम्प को इसे लागू करने की  शक्ति मिल गई है। यद्यपि इसका ये अर्थ निकालना जल्दबाजी होगी कि भारत पर  तुरंत 100% आयात शुल्क  लग गया है। लेकिन राष्ट्रपति ट्रम्प को उक्त कानून बनने से तत्संबंधी अधिकार मिल गया है। दूसरी तरफ भारत ने इस कानून के पारित होने के बाद एक बार फिर साफ कर दिया है कि उसकी प्राथमिकता देश की ऊर्जा सुरक्षा है और वह अपनी जरूरत के हिसाब से जहाँ से चाहे  तेल खरीदता रहेगा। यदि ट्रम्प इस कानून से मिले अधिकार के अंतर्गत  भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने की धमकी को हकीकत में बदल देते हैं तब  हमारे देश से अमेरिका को टैक्सटाइल और ज्वैलरी के निर्यात  पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। लेकिन इनके अतिरिक्त वहाँ बसे भारतीय समुदाय के अलावा दक्षिण एशियाई देशों के अप्रवासी भी दैनिक उपयोग एवं खाने - पीने की जिन भारतीय चीजों का उपयोग करते हैं वे महंगी होने से उनकी मांग पर भी असर पड़ेगा जिससे भारत का व्यापार घाटा बढ़ने का खतरा है।  डोनाल्ड ट्रंप को मिला 100% टैरिफ वाला ब्रह्मास्त्र, भारत पर कितना असर डालेगा ये तो भविष्य ही बताएगा । लेकिन यह भी सच है कि  भारत भी चुप नहीं बैठेगा जिसका संकेत पहले ही विदेश मंत्रालय दे चुका है। ट्रम्प ने टैरिफ नामक आर्थिक हथियार का उपयोग दोबारा सत्ता हासिल करते ही शुरू कर दिया था। उनकी मुख्य खुन्नस भारत से है क्योंकि उसने अमेरिकी प्रतिबंधों की परवाह न करते हुए रूस से न सिर्फ कच्चे तेल की खरीद बड़ी मात्रा में जारी रखी बल्कि भारतीय रिफाइनरियों ने उस कच्चे तेल का शोधन कर उन यूरोपीय देशों को बेचकर  भरपूर धन अर्जित किया जिन्होंने अमेरिकी दबाव में रूस पर व्यापारिक प्रतिबंध लगा दिये थे। भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल को पेट्रोल और डीजल का रूप देकर निर्यात किये जाने से अमेरिका द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों की हवा निकल गई। डोनाल्ड ट्रम्प कई मर्तबा ये आरोप लगा चुके हैं कि भारत के इस कृत्य के चलते ही रूस को जमकर कमाई हुई और वह यूक्रेन युद्ध को इतना लम्बा खींचने में सक्षम हो सका। हालांकि ट्रम्प की नाराजगी चीन से भी है किंतु  उसने रेयर मिनरल की आपूर्ति रोकने की धमकी देकर उनके हौसले ठंडे कर दिये। भारत से ट्रम्प की चिढ़ वैसे तो ऑपरेशन सिंदूर के दौरान बढ़ी जब भारतीय मिसाइलों ने पाकिस्तान के उन महत्वपूर्ण सैनिक ठिकानों के साथ आयुध भंडारों पर कहर बरपाया जिनके बारे में ये आशंका व्यक्त की गई कि अमेरिका ने अपने परमाणु हथियार इन भंडारों में छिपा रखे हैं। और जब युद्ध विराम करवाने के ट्रम्प के दावों को भी भारत ने झुठला दिया तब उनकी त्यौरियाँ और चढ़ गईं। अपना दबदबा दिखाने के लिए उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अनेक मर्तबा अमेरिका आने का संदेश भेजा जिसे प्रधानमंत्री ने महत्व नहीं दिया। लेकिन हालिया ब्रिक्स सम्मेलन में भारत की कूटनीतिक सक्रियता अमेरिका को रास नहीं आ रही। रूस और चीन के राष्ट्रपति क्रमशः पुतिन और जिनपिंग के साथ श्री मोदी की नजदीकी ने ट्रम्प को चिंता में डाल दिया। जिनपिंग ने उक्त सम्मेलन में जिस मज़बूती से पश्चिम के आर्थिक प्रभुत्व को नकारा उसने ट्रम्प का गुस्सा और बढ़ा दिया। इस आग में घी डाला ब्रिक्स देशों द्वारा डॉलर की बादशाहत कम करने के लिए एक - दूसरे की मुद्रा में ज्यादा से ज्यादा लेनदेन करने संबंधी संकल्प पारित कर। ट्रम्प को लगता है इस मुहिम के शिल्पकार नरेंद्र मोदी ही हैं। इसीलिए  ट्रम्प ने ब्रिक्स सम्मेलन खत्म होते ही 100 टैरिफ नामक दबाव का उपयोग किया। लेकिन वे भूल रहे हैं अब तक उनका ये दाँव कारगर नहीं हुआ। भारत, रूस और चीन के अलावा ब्राजील और द. अफ्रीका जैसी बड़ी  अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों ने भी ट्रम्प के टैरिफ आतंक के सामने झुकने से इंकार कर दिया। ईरान के साथ लड़ाई में बुरी तरह फंसे ट्रम्प बदहवासी में और भी ऊटपटांग फैसले ले सकते हैं। लेकिन वे भूल रहे हैं कि उनके ऐसे फैसले अमेरिका की साख और धाक दोनों का सत्यानाश कर रहे हैं और इस निर्णय का भी वही हश्र होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी