देश की राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर नीट परीक्षा पेपर लीक के मुद्दे पर नवगठित कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले हुए आंदोलन को जेन जी के आक्रोश का प्रतीक बताकर ये अवधारणा स्थापित करने का सुनियोजित प्रयास किया गया कि कुछ हजार लोग ही देश के छात्रों और युवाओं के प्रतिनिधि हैं। लेकिन छात्रों की समस्याओं के नाम पर सरकार पर दबाव बनाने के लिए किये गए उस आंदोलन का असली उद्देश्य जल्द सामने आ गया जब आम आदमी पार्टी के साथ ही वामपंथी गिरोह उस पर काबिज हो गए। देखते - देखते कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में शुरू हुए आंदोलन पर उन वामपंथी आंदोलनजीवियों ने कब्जा कर लिया जिनमें भारत तेरे टुकड़े होंगे का नारा लगाने और जम्मू कश्मीर को भारत का अविभाज्य अंग नहीं मानने वाले तत्व शामिल थे। इसका खुलासा तभी हो गया जब उमर खालिद और शर्जिल इमाम के पक्ष में नारेबाजी के साथ ही हिंदू राष्ट्र और मनुवाद के विरुद्ध मंच से भी आपत्तिजनक बातें कही गईं। कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं से अपेक्षित था कि वे नक्सली मानसिकता में डूबे देश विरोधी तत्वों को जंतर मंतर से बाहर करते किंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि वे खुद भी उसी गैंग के सदस्य हैं। इसका प्रमाण उनके रास्वसंघ विरोधी बयानों से मिल गया। लेकिन इस आंदोलन का सबसे घिनौना रूप तब सामने आया जब प्रधानमंत्री को अश्लील गालियाँ दी जाने लगीं। लड़के ही नहीं बल्कि कम उम्र की लड़कियों को माँ - बहन की गालियां देते हुए देखकर पूरा देश शर्मसार हो गया। जंतर मंतर पर मौजूद युवकों और युवतियों के एक वर्ग ने जिस स्तर के अश्लील पोस्टर प्रदर्शित किये वह मानसिक विकृति का चर्मोत्कर्ष था। केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र के बाद तो मोदी विरोधी पत्रकारों का समूह इस बात का ढोल पीटने बैठ गया कि जेन जी ने सरकार को झुका दिया और यही 2029 में सत्ता बदलने वाली ताकत बनेगी। लेकिन जंतर मंतर के समानांतर छात्रों और युवाओं का एक और आंदोलन झारखंड की राजधानी रांची में भी चल रहा था। राज्य में हुई परीक्षाओं में धांधली के विरोध में धरना देकर बैठे युवाओं की मांग उनके जरिये हुई नियुक्तियाँ रद्द करने और भ्रष्टाचार की जाँच करवाने की थी। वहाँ भी जंतर मंतर जैसा माहौल था। युवा धरना दे रहे थे, अनशन जारी था, नारे गूँज रहे थे। विधानसभा का घेराव करने का प्रयास करने वाले जत्थों पर लाठी चार्ज सहित वही सब हुआ जो दिल्ली पुलिस ने किया। लेकिन मोदी विरोधी दरबारी मीडिया को रांची आंदोलन में रुचि नहीं थी क्योंकि वहाँ के जेन जी ने किसी नेता को गाली नहीं दी, अश्लील नारेबाजी या नंगापन दर्शाती प्रचार सामग्री नहीं लहराई गई। और जब जेएनयू के ढपली बाजों ने वहाँ पहुंचकर माहौल में गंदगी फैलानी चाही तब उन्हें आंदोलन स्थल से बाहर कर दिया गया। इस आंदोलन से जुबानी हमदर्दी तो राहुल गाँधी, प्रियंका वाड्रा, अभिजीत दिपके ने दिखाई और लाठीचार्ज की निंदा भी की। लेकिन झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के विरुद्ध एक शब्द नहीं कहा। इसके अलावा प्रकाश राज , अरुंधती रॉय, नसीरुद्दीन शाह और शबाना आज़मी ने भी रांची के जेन जी के पास जाने की सौजन्यता नहीं दिखाई। जंतर मंतर के गाली गलौच भरे माहौल में क्रांति की आहट सुनने वाले दिमागी नक्सलियों को रांची आंदोलन से इसलिए एलर्जी थी क्योंकि उसके पीछे राष्ट्रवादी ताकतें थीं। वहाँ के जेन जी किसी जाति के विरोध में नारे नहीं लगा रहे थे और उनका आचरण अनुशासित था। आखिरकार गत दिवस मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को आंदोलन की मुख्य मांगें मानना पड़ी। उसके बाद आंदोलनकारियों ने भी जश्न मनाया किंतु किसी सितारा होटल में नहीं बल्कि सड़कों पर ही। देखना ये है कि पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का जो वर्ग जंतर मंतर आंदोलन में शामिल जेन जी में भारत का भविष्य और सत्ता परिवर्तन के सपने देखने लगा है वह रांची के जेन जी आंदोलन की सफलता का क्या आकलन करता है? ये प्रश्न इसलिए उठ खड़ा हुआ है क्योंकि देश के युवाओं ने दो स्थानों पर एक जैसे मुद्दे पर, एक ही शैली का आंदोलन किया किंतु जिसकी सबसे ज्यादा चर्चा हुई उसमें अश्लीलता, बेअदबी, उद्दंडता और विध्वंसक मानसिकता का बोलबाला नजर आया । वहीं दूसरे आंदोलन ने जेन जी के संस्कारित, अनुशासित, व्यवस्थित और रचनात्मक होने का उदाहरण सामने रखा। रांची आंदोलन की सफलता उन लोगों के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा है जो युवा पीढ़ी को जबरन गलत रास्ते पर धकेलने का षडयंत्र रच रहे थे। ढपली बजाकर आजादी मांगने वाले वामपंथी छात्र संगठनों को भी ये गलतफहमी छोड़ देनी चाहिए कि देश का जेन जी जेएनयू से निकलने वाली मानसिकता से प्रभावित है। भारत का भविष्य सही अर्थों में रांची आंदोलन में शामिल युवा शक्ति है न कि जंतर मंतर के हुड़दंगी।
- रवीन्द्र वाजपेयी