Monday, 23 February 2026

शीर्ष धर्माचार्यों के आचरण की समीक्षा करने की व्यवस्था जरूरी


हाल ही में दो और हिन्दू धर्माचार्य यौन शोषण के आरोप में घिर गए। उत्तम स्वामी नामक आध्यात्मिक हस्ती के विरुद्ध राजस्थान की एक युवती ने शोषण की शिकायत कर सनसनी फैला दी। आरोप लगते ही स्वामी  जबलपुर के निकट अपने आश्रम में हो रही कथा छोड़कर कहीं चले गए। ये महाशय कुछ समय पहले म.प्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से इस कारण नाराज हो गए थे क्योंकि वे उनके आयोजन में समय देकर भी नहीं पहुंच सके। सौजन्यतावश श्री यादव ने आभासी माध्यम से उनसे क्षमा भी मांगी किंतु बजाय क्षमा याचना स्वीकार करने के स्वामी ने उन्हें खूब फटकारा। जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार भाजपा के बड़े - बड़े नेता इनके अनुयायी हैं। दूसरी घटना बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य  होने का दावा करने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़ी है जिनके विरुद्ध पास्को कानून में प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश न्यायालय ने जारी किया है। इसका आधार वह शिकायत है जिसके अनुसार उनके किसी आश्रम में कुछ बालकों का भी यौन शोषण हुआ। उल्लेखनीय है दो पीठों के शंकराचार्य रहे स्वामी स्वरूपानंद की मृत्यु उपरांत स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बद्रीनाथ पीठ के शंकराचार्य बने किंतु उनकी नियुक्ति शुरुआत से ही विवादों में घिरी रही। जगन्नाथ पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सहित अनेक धर्मगुरु और अखाड़ा परिषद तक उन्हें विधिवत नियुक्त शंकराचार्य नहीं मानती। ये विवाद भी न्यायालय में विचाराधीन है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को चर्चा में रहने का शौक भी है। हाल ही में प्रयागराज के माघ मेले में भी इन्होंने बखेड़ा खड़ा कर दिया जिसके  बाद बिना स्नान किए ही इन्हें वापस जाना पड़ा। उसके बाद से ये उ.प्र के मुख्यमंत्री  योगी आदित्यनाथ के पीछे पड़ गए। वैसे तो वे प्रधानमंत्री से भी चिढ़ते हैं। यद्यपि इनके गुरु स्वामी स्वरूपानंद जी भी ऐलानिया तौर पर कांग्रेस समर्थक माने जाते थे किंतु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जिस तरह की कड़वाहट दिखाते हैं उससे उनकी छवि एक आदतन असंतुष्ट व्यक्ति की बन गई। उनके विरुद्ध जो प्रकरण दर्ज हुआ उसमें यदि वे गिरफ्तार हुए तब उनकी स्थिति भी आशाराम बापू जैसी होकर रह जाएगी। लेकिन यहां सवाल किसी उत्तम स्वामी या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद नामक व्यक्ति का नहीं बल्कि सनातन धर्म की परंपरा के ध्वजावाहक आध्यात्मिक विभूतियों के चरित्र पर लगे लांछन का है।  इन जैसे अन्य किसी भी धर्मगुरु पर जब इस तरह का आरोप लगता है तब उससे केवल उनकी प्रतिष्ठा ही तार - तार नहीं होती अपितु सनातन धर्म में आस्था रखने वाले असंख्य लोगों की भावनाएं आहत होती हैं। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि अनेक साधु - संन्यासी  पद , प्रतिष्ठा, विलासितापूर्ण जीवनशैली के मोहपाश में बंधते जा रहे हैं। उनके पास नेता , अधिकारी , बिल्डर और अन्य  ऐसे तत्व भी मंडराते दिखते हैं जो उनकी आड़ में अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं और बदले में वे उनके सुख - सुविधा का प्रबंध करते हैं। जैन मुनियों के विपरीत सनातन धर्म से जुड़ी अध्यात्मिक विभूतियों में सांसारिकता के प्रति जो लगाव बढ़ता जा रहा है उससे  सनातन धर्म के आलोचकों को मुंह चलाने का अवसर बिन मांगे मिल जाता है। उत्तम स्वामी और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर लगे आरोपों की सत्यता तो जांच के बाद ही सामने आएगी किन्तु सनातन धर्म के संचालन की जो वर्तमान व्यवस्था है उससे जुड़े महानुभावों को अपने आभामंडल की चिंता छोड़कर ऐसी आचार संहिता बनानी चाहिए जिससे साधु - संन्यासी का चोला ओढ़कर धर्म विरोधी आचरण करने वालों पर लगाम कसी जा सके। उत्तम स्वामी और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर लगे आरोप की जांच करना और दोषी पाए जाने पर दंडित करना तो अदालत के अधिकार में आता है लेकिन धर्म से जुड़ी विभूतियों के आचार - व्यवहार का निर्देशन  - नियंत्रण करने के लिए धार्मिक क्षेत्र की ही कोई नियामक संस्था होनी चाहिए। अखाड़ा परिषद, विद्वत परिषद और चारों शंकराचार्यों को मिलकर धर्म संस्थान से जुड़े प्रमुख लोगों के आचार - व्यवहार पर नजर रखने के साथ ही समय - समय पर उसकी समीक्षा भी करनी चाहिए। साधु के आवरण में शैतानी के उदाहरण पौराणिक काल से मिलते रहे हैं किंतु तब की दंड प्रक्रिया भी प्रभावशाली थी। बड़े - बड़े धर्माचार्य बात - बात में ये दुहाई तो देते हैं कि वे कानून से ऊपर हैं तब ये प्रश्न भी उठता ही है कि फिर उनके धर्मविरुद्ध आचरण पर दंड देने का अधिकार किसे है? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 21 February 2026

ए .आई समिट में उपद्रव से कांग्रेस की ही छवि धूमिल हुई



राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक विरोध की अभिव्यक्ति लोकतांत्रिक समाज की पहचान है। विपक्ष में बैठे दल और उनके नेता सरकार को घेरने का कोई अवसर अवसर नहीं छोड़ते। लेकिन जहां देश का हित और प्रतिष्ठा जुड़ी हो वहां दलीय मतभेद किनारे रखते हुए एकजुटता का प्रदर्शन जरूरी होता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब देश पर उत्पन्न संकट के समय और राष्ट्रीय गौरव से जुड़े किसी भी प्रसंग के अवसर पर सर्वदलीय एकता देखने मिली। लेकिन अब दलीय स्वार्थ को प्राथमिकता देते हुए देश के सम्मान से खिलवाड़ किया जाने लगा है। उदाहरणार्थ गलवान घाटी और ऑपरेशन सिंदूर में सेना द्वारा प्रदर्शित पराक्रम पर सवाल उठाए गए। बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक की सफलता पर भी संदेह जताया गया। ताजा प्रकरण है दिल्ली में चल रही ए. आई समिट में कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा कपड़े उतारकर प्रदर्शन और नारेबाजी करना। कांग्रेस पार्टी के अनुसार उसके कार्यकर्ता भारत - अमेरिका ट्रेड डील का विरोध करने गए थे। इस डील का विरोध करने का कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों को पूरा अधिकार है। यदि उसमें कहीं भी देश के हितों के साथ समझौता हुआ हो तो उसके विरुद्ध आवाज उठाने में कोई बुराई नहीं है। संसद में भी विपक्ष उसके कुछ प्रावधानों पर अपनी आपत्तियां दर्ज करवा चुका है जिसके उत्तर में सरकार के मंत्रियों ने स्पष्ट किया कि भारत के किसानों सहित अन्य वर्गों के हितों की सुरक्षा का ध्यान रखा गया है। अमेरिकी सरकार ने भी कुछ स्पष्टीकरण दिए। ऐसे में बेहतर होगा विपक्ष और उक्त डील पर ऐतराज जता रहे अन्य संगठन अंतिम फैसला होने तक प्रतीक्षा करते। यदि उन्हें अपनी सक्रियता ही दिखानी है तो विरोध के और भी तौर - तरीकों और मंचों का उपयोग किया जा सकता था। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ए. आई समिट जिसमें अनेक राष्ट्रप्रमुखों के अतिरिक्त दुनिया की दिग्गज बहुराष्ट्रीय आई. टी कंपनियों के शीर्ष अधिकारी , देशी - विदेशी उद्योगपति एकत्र हुए हों, उसके आयोजन स्थल में घुसकर जिस तरह का प्रदर्शन कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया उससे पार्टी की विवेक शून्यता एक बार फिर उजागर हो गई। ए. आई समिट भाजपा का आयोजन नहीं है। अपितु उसकी मेजबानी भारत सरकार द्वारा की गई। दुनिया भर की हस्तियों की उपस्थिति से ये साबित हो गया कि भारत के तकनीकी कौशल और प्रबंधन क्षमता के प्रति विश्वास बढ़ा है। गूगल सहित अन्य विदेशी कंपनियों द्वारा ए. आई के क्षेत्र में अरबों - खरबों के निवेश की घोषणा इस आयोजन की सफलता का जीता - जागता प्रमाण है। कांग्रेस को यदि ये इसलिए अच्छा नहीं लग रहा कि समिट में आए राष्ट्रप्रमुखों और कार्पोरेट जगत की शीर्ष वैश्विक हस्तियों ने प्रधानमंत्री श्री मोदी की प्रशंसा की तो ये उसकी खीझ दर्शाता है । उसे ये नहीं भूलना चाहिए कि इस समिट ने भारत की प्रतिष्ठा में वृद्धि की है और ए. आई के क्षेत्र में वह विश्व का नेतृत्व करने की हैसियत में आ गया। ये बात भी सही है कि इसका श्रेय श्री मोदी को मिल रहा है और मिलना भी चाहिए। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस समिट की आलोचना की थी किंतु उन्हीं की पार्टी के वरिष्ट नेता शशि थरूर ने खुलकर उसकी प्रशंसा की। बावजूद इसके कांग्रेस को इस आयोजन में रही कमियों पर उंगली उठाने का पूरा अधिकार है किंतु भारत - अमेरिकी ट्रेड डील के बहाने आयोजन स्थल में घुसकर उत्पात करने का औचित्य समझ से परे है। राहुल गांधी प्रधानमंत्री और भाजपा का उग्र विरोध कर अपना राजनीतिक भविष्य उज्ज्वल करना चाह रहे हैं । लेकिन उसका जनमानस पर प्रभाव क्यों नहीं पड़ता इसका विश्लेषण उन्हें करना चाहिए। लोकसभा चुनाव में सीटें बढ़ जाने से उन्हें ये लगने लगा था कि श्री मोदी की चमक कम हो गई किंतु उसके बाद जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए उनमें कांग्रेस का दयनीय प्रदर्शन श्री गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े करने पर्याप्त है। ए. आई समिट में कांग्रेस कार्यकर्ताओं का अशोभनीय प्रर्दशन इस बात का प्रमाण है कि पार्टी में अपनी गलतियों से सीख लेने की प्रवृत्ति समाप्त हो चुकी है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 20 February 2026

मुफ्त योजनाओं को रोकने सर्वोच्च न्यायालय को ही आगे आना होगा


कुछ साल पहले भी सर्वोच्च न्यायालय यही बात कह चुका है। गत दिवस एक बार मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत सहित दो अन्य न्यायाधीशों की संयुक्त पीठ ने सरकार द्वारा चलाई जा रही मुफ्त  योजनाओं पर तंज़ कसते हुए कहा कि यदि सबको मुफ्त खाद्यान्न और नगद राशि दी जाएगी तो लोग काम क्यों करेंगे ? न्यायालय ने जरूरतमंदों को  लाभान्वित किए जाने के औचित्य को तो स्वीकार किया किन्तु जो साधन संपन्न हैं उन्हें ही सरकारी सहायता दिए जाने पर ऐतराज जताया। उसने इस बात का उल्लेख किया कि मुफ्त योजनाएं चुनाव जीतने का औजार बनती जा रही हैं और धीरे - धीरे केंद्र के अलावा राज्यों ने भी इस तरीके को अपना लिया। न्यायालय ने राज्यों द्वारा कर्ज में डूबे होने के बाद भी  सरकारी खजाना लुटाए जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए समझाइश दी कि बजाय मुफ्त में खिलाकर निठल्ला बनाने के सरकार लोगों को रोजगार दे और अपना धन विकास कार्यों में खर्च करे । पीठ ने निर्धन और साधनहीन विद्यार्थियों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए आर्थिक सहायता देने की पैरवी करते हुए कहा कि सरकारी सहायता उन्हीं को मिले जो इसके सुपात्र हैं। उल्लेखनीय है इसकी शुरुआत दशकों पहले तमिलनाडु से हुई जब के. कामराज ने शालाओं में बच्चों के निःशुल्क आहार की योजना लागू की।  बाद में जितने मुख्यमंत्री आए उन सबने मुफ्त योजनाओं में नया कुछ जोड़ा और जयललिता के आते तक तक मिक्सी , मंगलसूत्र और टी.वी बांटकर चुनाव जीतने का प्रबंध होने लगा। इससे प्रेरित होकर अन्य राज्यों में भी  सत्ता हासिल करने और फिर उसमें बने रहने के लिए सरकारी खजाने को लुटाने का जो सिलसिला प्रारंभ हुआ वह शेर की सवारी का रूप ले चुका है  जिस पर रोक लगाना राजनीतिक आत्महत्या करना होगा। गत  वर्ष दिल्ली विधानसभा के चुनाव में प्रधानमंत्री ने जब आदमी पार्टी सरकार  की मुफ्त योजनाओं को रेवड़ी कहकर उनकी आलोचना की तब जवाब में अरविंद केजरीवाल ने  ये प्रचार शुरू कर दिया कि भाजपा सत्ता में आई तो वह मुफ्त बिजली, पानी और महिलाओं की बस यात्रा पर रोक लगा देगी । इस प्रचार से घबराई भाजपा ने  आश्वासन दिया कि सभी मुफ्त सुविधाएं जारी रहेंगी और झुग्गी वासियों को पक्के मकान दिये जाएंगे। भाजपा ने आम आदमी पार्टी द्वारा महिलाओं को प्रति माह 2100 रु. के वायदे से आगे बढ़कर 2500 रु. देने का वायदा कर दिया। विडंबना ये है कि सभी दल एक  - दूसरे पर खैरात बाँटकर चुनाव जीत लेने का आरोप लगाते हैं किंतु खुद  उससे परहेज नहीं करते। आशय ये है कि खेल सभी एक जैसे  रहे हैं किंतु हारने वाला विजेता पर बेईमानी  का आरोप लगाने से बाज नहीं आता। पूर्व में सर्वोच्च न्यायालय ये पूछ चुका है कि सरकार मुफ्त अनाज कब तक बांटेगी? कांग्रेस भी मोदी सरकार के आर्थिक प्रगति के दावे का मजाक उड़ाते हुए कहती है कि ऐसा है तो 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज क्यों देना पड़ रहा है ? लेकिन  मुफ्त अनाज वितरण जिस राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत किया जा रहा है वह सोनिया गाँधी की पहल पर मनमोहन सिंह सरकार द्वारा ही  पारित करवाया गया था। कुछ साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने ही सरकारी गोदामों में अनाज के सड़ने की शिकायतों पर कहा था कि इससे बेहतर है वह गरीबों में बाँट दिया जाए। मोदी सरकार ने कोरोना काल में जब निःशुल्क अनाज वितरण शुरू किया तब वह समय की मांग थी जिसे अब वह चाहकर भी  बंद नहीं कर पायेगी । चुनाव आयोग भी कह चुका है कि ऐसा करना उसके लिए तभी संभव होगा जब संसद उसके लिए कोई कानून बनाए जिसके कोई आसार नजर नहीं आते। सवाल ये है कि सर्वोच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान लेकर चुनाव के समय मुफ्त योजनाओं के वायदे किये जाने पर रोक क्यों नहीं लगाता? अनेक मामलों में वह ऐसा कर भी चुका है। ये मुद्दा भी विचारणीय है कि आर्थिक संसाधनों की कमी के बाद भी इस तरह के वायदे करने का क्या औचित्य है जिनके कारण विकास सहित अन्य महत्वपूर्ण कार्य प्रभावित होते हैं।  लोकतंत्र में कमजोर वर्ग का संरक्षण सरकार का दायित्व होता है। भारत के अलावा अन्य देशों में भी अनुदान के जरिये लोगों की मदद की जाती है। लेकिन संपन्न देश तो सक्षम हैं जबकि विशाल आबादी वाले भारत जैसे देश में  मुफ्त योजनाओं को स्थायी बना देना व्यवहारिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से अनुचित है। चूंकि राजनीतिक नेताओं को मुफ्त योजनाओं के भरोसे चुनाव जीतना आसान लगता है इसलिए उनसे कोई उम्मीद करना बेकार है। चुनाव आयोग में पदस्थ नौकरशाहों में भी बिल्ली के गले में घंटी बांधने का साहस नहीं है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय को ही आगे आकर स्वतः संज्ञान लेते हुए ठोस कदम उठाना चाहिए जिससे सत्ता हासिल करने के लिए सरकारी धन का अनुचित उपयोग रोका जा सके।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 19 February 2026

कर्ज का बोझ बजट में दिखाए सपनों पर भारी पड़ सकता है


म.प्र सरकार द्वारा आगामी वित्तीय वर्ष का बजट गत दिवस विधान सभा में प्रस्तुत किया गया। जहां तक प्रतिक्रियाओं का सवाल है तो सरकार समर्थक जहां वित्तमंत्री जगदीश देवड़ा द्वारा पेश इस बजट  को क्रांतिकारी मानते हुए प्रदेश के सर्वांगीण विकास में सहायक बताते नहीं थक रहे वहीं विपक्ष की नजर में यह आंकड़ों की बाजीगरी के सिवाय और कुछ भी नहीं। इसी तरह व्यापार और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों की राय भी  भिन्न - भिन्न है। जिस उद्योग या व्यवसाय को वित्तमंत्री ने कोई सौगात अथवा राहत प्रदान की वह  इसकी प्रशंसा में जुटा है किंतु जिनके हाथ कुछ नहीं लगा वे जाहिर तौर पर नाखुश हैं। क्षेत्रीय स्तर पर भी ऐसा ही अनुभव किया जा सकता है।  जिस इलाके की विकास योजनाओं के लिए धन का प्रावधान किया गया , उनके लिए यह बजट स्वागत योग्य है और जो क्षेत्र वंचित रह गए उनमें बिना लाग लपेट के इसे विकास विरोधी माना जा रहा है। शासकीय कर्मचारियों, बेरोजगार नौजवानों और गृहिणियों के बीच भी बजट को लेकर प्रतिक्रियाएं तात्कालिक लाभ या नुकसान पर आधारित है। वित्तमंत्री ने लाभार्थियों के लिए जी भरकर खजाना खोला है। शिक्षा , स्वास्थ्य और  आधारभूत संरचना के लिए भी आकर्षक प्रावधान किए गए हैं। विकास के कुछ बड़े प्रकल्पों का संकल्प भी उन्होंने दर्शाया है। लेकिन सबसे बड़ी बात है श्री देवड़ा ने  किसी भी प्रकार का नया कर नहीं लगाया । हालांकि ये एक तरह का  फैशन सा बन गया है जिसके जरिए बजट को लोक - लुभावन बनाने का प्रयास किया जाता है। वैसे भी आम जनता को बजट का तकनीकी  पक्ष उतना पल्ले नहीं पड़ता जितना ये कि उस पर कितना बोझ  बढ़ेगा या कितनी राहत मिलेगी? दरअसल नया कर लगाने से परहेज कर ज्यादातर वित्तमंत्री खुद को जनता का शुभचिंतक साबित करने का प्रयास करते हैं और वही श्री देवड़ा ने बड़ी ही खूबसूरती से किया। म.प्र में 2003 से अब तक मात्र 15 माह की कमलनाथ सरकार छोड़कर भाजपा ही सत्ता पर काबिज है। इसमें दो मत नहीं हैं कि इस अवधि में प्रदेश उस दयनीय अवस्था से  काफी हद तक बाहर आया है जो 10 साल कांग्रेस  की सरकार चलाने वाले दिग्विजय सिंह छोड़ गए थे। उनके शासनकाल में बिजली, सड़क और पानी की जो शर्मनाक स्थिति थी उसमें जबरदस्त सुधार हुआ है और यही कारण रहा कि कभी बीमारू राज्य के तौर पर बदनाम यह प्रदेश कृषि और उद्योगों के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति कर सका। सड़कों और बिजली की भरपूर उपलब्धता ने बड़े औद्योगिक घरानों को यहां निवेश हेतु आकर्षित किया वहीं पर्यटन भी बढ़ा। लेकिन यह उपलब्धि कुछ क्षेत्र विशेष तक सीमित रहने से जो क्षेत्रीय असंतुलन उत्पन्न हो गया है उसे दूर करना बेहद जरूरी हैं । प्रदेश में जनकल्याण की जो योजनाएं प्रारंभ की गईं उनकी वजह से जहां भाजपा का जनाधार मजबूत हुआ वहीं समाज के पिछड़े वर्ग की स्थिति में भी सुधार हुआ। इन योजनाओं की सफलता का असर पूरे देश में देखने मिल रहा है। 2023 में शिवराज सिंह चौहान द्वारा लागू की गई लाड़ली बहना योजना तो तकरीबन प्रत्येक राज्य में अलग - अलग नामों से लागू की जा रही है। लेकिन इस सबसे अलग हटकर देखें तो डॉ. मोहन यादव की सरकार के इस महत्वाकांक्षी बजट के आकर्षक प्रावधानों को प्रदेश पर बढ़ते जा रहे कर्ज का बोझ झटका दे सकता है। ऐसे में ये प्रश्न सहज रूप से उठता है कि कर्ज पर आधारित  अर्थव्यवस्था उन लक्ष्यों को पूरा करने में कहां तक कामयाब हो सकेगी जो बजट में निर्धारित किए गए। यदि वित्तमंत्री के इस स्पष्टीकरण पर विश्वास कर भी लिया जाए कि जितना भी कर्ज लिया गया उसका उपयोग आधारभूत संरचना एवं अन्य विकास कार्यों में ही किया गया तो भी ये प्रश्न तो उठेगा ही कि बिना नया कर लगाए जनकल्याण योजनाओं और नई विकास परियोजनाओं के लिए राशि कहां से आएगी? जब तक प्रदेश में तमिलनाडु , गुजरात और महाराष्ट्र जैसा सघन औद्योगिकीकरण नहीं हो जाता तब तक करों की आय के अलावा बेरोजगारी की स्थिति में भी सुधार होना मुश्किल है। बजट में हजारों नई सरकारी नौकरियों का प्रावधान स्वागतयोग्य है किंतु प्रदेश सरकार का स्थापना व्यय और बढ़ने से नई परेशानियां सामने आए बिना नहीं रहेंगी। बजट में किसानों , महिलाओं , युवाओं सहित हर वर्ग को लुभाने के प्रावधान हैं किंतु ले देकर वही बात आ जाती है कि बिना आय बढ़ाए ये सपने पूरे कैसे होंगे?  विकासशील अर्थव्यवस्था में कर्ज लेना बुरा नहीं बशर्ते उसकी अदायगी के लिए दूरदर्शी नियोजन किया जाए। उधार लेकर घी पीने की महर्षि चार्वाक की सलाह तात्कालिक सुख तो दे सकती है किंतु कालांतर में कष्टकारक होती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 18 February 2026

ए. आई के क्षेत्र में भारत ने सही समय पर कदम बढ़ाया


दिल्ली में चल रहे ए. आई ( आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस) सम्मेलन में कई देशों के दिग्गज उद्यमियों के साथ ही  इस विधा में हाथ आजमाने के इच्छुक नए खिलाड़ी हिस्सा ले रहे हैं। सूचना क्रांति के दौर से निकलकर अब दुनिया ए. आई नामक चमत्कारिक खोज के पीछे चल पड़ी है जो मानव मस्तिष्क का कृत्रिम रूप है। रोबोट नामक मशीनी मानव से शुरू यह यात्रा जिस तेजी से बढ़ रही है उसे देखते हुए  माना जाने लगा है कि जो उसके साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चलेगा वह विकास की दौड़ में  पिछड़ जाएगा। जब कम्यूटर आए थे तब उन्हें स्वीकार करने में पूरी दुनिया ने थोड़ा समय लिया था किंतु ए. आई चूंकि उसी में से विकसित होकर निकला लिहाजा उसके प्रति काफी उत्साह नजर आने लगा। शुरुआत में इस कृत्रिम बौद्धिकता के प्रयोग की सफलता पर संदेह के बादल मंडराते रहे। नैतिकतावादियों ने भी  अपनी आपत्तियां दर्ज करवाईं। समाजशास्त्रियों के बीच भी ए. आई को लेकर बहस चल रही है। पौराणिक कथाओं में ऐसे अनेक पात्रों का वर्णन है जो किसी वरदान के परिणामस्वरूप अत्यधिक शक्ति संपन्न बन गए। साथ ही उनमें असाधारण कार्य करने की क्षमता उत्पन्न हो गई जिसके चलते वे समाज के लिए खतरा बन गए। स्थिति बेकाबू होते देख वरदान देने वाले ने ही उन्हें नष्ट किया। ए. आई से होने वाली समस्याओं और खतरों को लेकर दुनिया भर में अनेक फिल्में भी बनीं किंतु इस सबका कोई असर देखने नहीं मिला और तकनीक के विकास में लगे वैज्ञानिकों ने ए. आई की उपयोगिता को इतने प्रभावशाली ढंग से पेश किया कि चाहे न चाहे पूरे विश्व को ये मान लेना पड़ा कि इसको अपनाने के सिवाय उसके पास और कोई विकल्प नहीं है। लेकिन बात यहां खत्म नहीं हो जाती। मनुष्य की खोजी बुद्धि ने एक ऐसा तंत्र और यंत्र खोज निकाला जो मानव मस्तिष्क के सोचने की शक्ति और बुद्धि कौशल में उससे भी कई गुना आगे है। कैलकुलेटर जैसी छोटी सी चीज शुरुआत में आश्चर्यचकित कर देती थी। फिर सूचना तकनीक ने और छलांगे लगाईं। कंप्यूटर से सुपर कंप्यूटर तक की यात्रा ने पूरे विश्व की तकदीर और तस्वीर दोनों बदलकर रख दी। डिजिटल तकनीक और फिर इंटरनेट के उपयोग करने में सक्षम एंड्रॉयड मोबाइल फोन ने विकास के नए झंडे गाड़ते हुए पूरी दुनिया को जोड़ दिया। आज यदि एक क्षण के लिए भी मोबाइल बंद कर दिया जाए तो लोग परेशान हो उठते हैं। कंप्यूटर और इंटरनेट की जुगलबंदी ने पूरी दुनिया को ऐसे शिकंजे में कस दिया है जिससे मुक्त होना असम्भव है। शुरू में ये आशंका व्यक्त की जाती थी कि कम्प्यूटर परंपरागत रोजगार छीन लेगा। कुछ समय तक ये हुआ भी लेकिन जल्द ही स्पष्ट हो गया कि बिना उसके इंसानी जिंदगी में ठहराव आ जाएगा। कंप्यूटर का ज्ञान शिक्षित होने का पैमाना बन गया। अब तो छोटे बच्चे तक उसमें पारंगत हो गए हैं। ये कहना भी गलत न होगा कि कम्प्यूटर , इंटरनेट और मोबाइल ने जिंदगी सरल बनाई है और सुविधाएं बढ़ीं हैं। सूचना प्रेषण और संपर्क को इसने जो आसानी दी उसने विकास की नई परिभाषा गढ़ दी। लेकिन ए. आई के बारे में जो कुछ भी सामने आया है उसके आधार पर कहा जा सकता है कि यह मानवीय मस्तिष्क का मशीनी रूपांतरण है जिसे खुद मनुष्य ने ही बनाया है। इसकी क्षमता, कार्यक्षेत्र और सटीक कार्यशैली कल्पनातीत होते हुए भी वास्तविकता है। आज ए. आई तकनीक सर्वत्र चर्चा का विषय बन चुकी है। इससे मिलने वाले लाभों को लेकर सर्वत्र उत्सुकता भी है। लेकिन इसके साथ ही भय भी है क्योंकि जिस मशीनी मानव का विकास ए. आई के रूप में किया गया उसमें इंसान से सैकड़ों गुना क्षमता और प्रतिभा तो है किंतु वह भावना शून्य होने से हमारे सुख - दुख को कितना बांट सकेगा इसमें संदेह है। इसके अलावा ये सवाल भी उठ  रहा है कि क्या मनुष्य ए. आई का विकास कर अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी तो नहीं मार रहा क्योंकि एक  रोबोट जितना काम कर सकता है उतना कई मनुष्य नहीं कर सकते। लेकिन महज इस आधार पर उसे स्वीकार करने में हिचक नहीं होनी चाहिए क्योंकि इसके जरिए मानवीय चिकित्सा और शिक्षा जैसे क्षेत्र में  चमत्कारिक सुधार संभव हैं। साथ ही इसकी मदद से विज्ञान के विकास को पंख लगने के कारण नए रोजगार उत्पन्न होंगे। ये संतोष का विषय है कि भारत ने समय रहते ए. आई के रास्ते पर अपना कदम बढ़ा दिए हैं। वैश्विक सम्मेलन में देश के उद्योगपतियों सहित अन्य लोगों ने जो भी रुचि और उत्साह दिखाया वह विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के हमारे प्रयास को सफल बनाने में सहायक होगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 17 February 2026

पंजाब में खालिस्तानी आतंक का सिर उठाना खतरे का संकेत


पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान अस्पताल में भर्ती हैं। खालिस्तान समर्थक एक संगठन द्वारा भेजे गए ईमेल में उस अस्पताल को उड़ाने की धमकी के साथ ही उन्हें  पोलोनियम नामक विषैले पदार्थ से संक्रमित किए जाने का खुलासा किया गया है। खालिस्तान नेशनल आर्मी के नाम से आए ईमेल में पंजाब को खालिस्तानियों का बताते हुए श्री मान का हाल भी पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत  सिंह जैसा किए जाने की धमकी दी गई है जिन्हें खालिस्तानियों ने मानव बम से उड़ा दिया था।  मुख्यमंत्री को विषैली चीज से संक्रमित करने और बेअंत सिंह जैसा हाल करने जैसी धमकी के बाद सुरक्षा बल चिंता में है। राज्य में कानून व्यवस्था की निरंतर बिगड़ती स्थिति के बाद खालिस्तानी आतंक के सिर उठाने से राज्य में अस्सी - नब्बे के दशक का वह दौर वापस आने की आशंका बढ़ती जा रही है जब वहां देश विरोधी ताकतों ने दहशत फैला रखी थी।  अनेक नेता और पत्रकार मारे गए। अमृतसर के ऐतिहासिक स्वर्ण मंदिर के अकाल तख्त पर ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसी सैन्य कार्रवाई हुई जिसमें खालिस्तानी सरगना जरनैल सिंह भिंडरावाला मारा गया। बाद में उसी के प्रतिशोधस्वरूप प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उन्हीं के दो सिख अंगरक्षकों ने गोलियों से भून दिया। जिन जनरल वैद्य के नेतृत्व में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ उनकी भी सेवा निवृत्ति के बाद पुणे में खालिस्तानियों  द्वारा हत्या कर दी गई। जैसे - तैसे वह आतंक खत्म हुआ और पंजाब में शांति लौट आई। जो सिख समुदाय कांग्रेस से नाराज था उसने भी पुरानी बातें भूलकर उसे राज्य की सत्ता सौंपने की दरियादिली दिखाई। लेकिन बीते कुछ सालों में पंजाब की  धरती में दबे खालिस्तानी आतंक के बीज फिर अंकुरित होने लगे। इसका संकेत नवंबर 2020 से एक साल तक दिल्ली में चले किसानों के उस धरने में मिला जो था तो केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए तीन कृषि कानूनों के विरोध में किन्तु धीरे - धीरे उसमें खालिस्तानी तत्व घुस आए। चूंकि उसमें पंजाब से आए सिखों की बड़ी संख्या थी इसलिए शुरुआत में   किसी को समझ में नहीं आया किंतु जब कुछ सिख नौजवान भिंडरावाले के चित्र अंकित टी शर्ट में नजर आए तब ये बात सामने आई कि किसानों की आड़ में खालिस्तानी तत्व सक्रिय हो गए। धीरे - धीरे विदेशी आर्थिक सहायता के संकेत भी मिले। विशेष रूप से कैनेडा और  ब्रिटेन में किसान आंदोलन के समर्थन में जिस तरह से भारत विरोधी उपद्रव देखने मिले उनके बाद ये संदेह पुख्ता होने लगा कि खालिस्तानी आतंक का पुनर्जन्म हो रहा है। उसी दौरान  गणतंत्र दिवस के दिन दिल्ली के लाल किले में की गई तोड़फोड़ के बाद एक निहंग सिख द्वारा लालकिले पर निशान साहब फहराने की हिमाकत भी दुनिया ने देखी। हालांकि केंद्र सरकार द्वारा तीनों कृषि कानूनों को वापस लिए जाने के बाद धरना तो बेनतीजा समाप्त हो गया किंतु पंजाब में खालिस्तानी आतंक का बीजारोपण हो गया। उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को भारी सफलता मिलने के पीछे खालिस्तान समर्थक ताकतों का समर्थन भी चर्चा में रहा। आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे डॉ. कुमार विश्वास तो शुरू से ही आरोप लगाते रहे हैं कि पार्टी के सर्वोच्च नेता अरविंद केजरीवाल की खालिस्तानी  अलगाववादियों से संगामित्ती है। और जब श्री केजरीवाल ने श्री मान को मुख्यमंत्री बनवाया तब ये बात स्पष्ट हो गई कि इस सीमावर्ती संवेदनशील राज्य में बजाय किसी सक्षम राजनीतिक शख्सियत के उन्होंने ऐसे व्यक्ति को गद्दी पर बिठा दिया जिसे वे  कठपुतली की तरह नचा सकें। इस संबंध में एक बात और उल्लेखनीय है कि श्री मान द्वारा पंजाब की गद्दी संभालने के बाद खाली की गई संगरूर लोकसभा सीट से अकाली दल ( अमृतसर) के सिमरनजीत सिंह मान जीते जो कट्टरपंथी सिख राजनीति से जुड़े थे। उसी के बाद से पंजाब में हत्याओं और हिंदुओं के धर्मस्थलों पर खालिस्तानियों के हमलों का सिलसिला शुरू हो गया। ये बात पूरी तरह सही है कि खालिस्तानी संगठनों को पाकिस्तान और कैनेडा से भरपूर सहायता मिलती है किंतु पंजाब में कमजोर सरकार और अपरिपक्व मुख्यमंत्री के होने से भी देश विरोधी ताकतों का हौसला बुलंद है। जब भगवंत सिंह मान को धमकियां मिलने लगीं और खालिस्तानी पंजाब को एक बार फ़िर आतंक की आग में झोंकने आमादा हो गए तब राज्य सरकार को होश आया किंतु सच्चाई ये है कि इस स्थिति के लिए मुख्यमंत्री मान के साथ ही आम आदमी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी बराबरी का कसूरवार है जिसने सत्ता हासिल करने के लिए पंजाब में खालिस्तानी आतंक को दोबारा पनपने का अवसर दिया।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 16 February 2026

बजट सत्र के बीच में लंबा अवकाश देना निरर्थक


संसद के बजट सत्र का पहला चरण गत सप्ताह पूर्ण होने के बाद सत्रावसान हो गया। अब 9 मार्च से दोबारा सत्र शुरू होगा जिसमें बजट  पारित किया जाएगा। साथ ही लोकसभाध्यक्ष के विरुद्ध प्रस्तुत अविश्वास प्रस्ताव पर भी सत्ता - और विपक्ष में गर्मागर्मी रहेगी। सत्र के पहले चरण में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लोकसभा  में प्रधानमंत्री का भाषण हुए बिना ही धन्यवाद प्रस्ताव पारित करना पड़ा क्योंकि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा किसी पत्रिका में प्रकाशित पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे की कथित पुस्तक के अंश पढ़ने के कारण सत्ता और विपक्ष के  बीच हुए टकराव ने अप्रिय रूप ले लिया। सदन के  भीतर और उसके बाहर जिस प्रकार की रस्साकशी और व्यक्तिगत छींटाकशी देखने मिली उसके  कारण संसद की गरिमा तो तार - तार हुई ही सांसदों के आचरण का गिरता स्तर भी देश और दुनिया के सामने आ गया। विपक्ष ने प्रधानमंत्री पर अशोभनीय आरोप लगाए तो सत्ता पक्ष ने भी जवाबी हमला करते हुए पंडित नेहरू और उनके राजनीतिक वारिसों की कलई खोलना शुरू कर दिया। राहुल ने एक पुस्तक का मामला उठाया तो भाजपा के निशिकांत चौधरी बस्ता भर किताबें लेकर आ गए। दोनों तरफ से हुई कीचड़ फेंक प्रतियोगिता में किसकी जीत और किसकी हार हुई ये कहाना मुश्किल है। विपक्ष ने अपनी खीझ लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला के प्रति अविश्वास प्रस्ताव पेश कर निकाली तो भाजपा की ओर से श्री गांधी की सदस्यता रद्द करने की पेशकश हो गई। कई दिन  इस मांग पर हंगामा होता रहा कि राहुल को बोलने दिया जाए। लोकसभा के विवाद की छाया राज्यसभा पर भी पड़ी जिससे वहां की कार्यवाही भी बाधित होती रही। जिन लोकसभा सदस्यों का निलंबन हुआ वे भी संसद के प्रवेश द्वार पर धरना दिए बैठे रहे। लेकिन जनरल नरवणे की जिस पुस्तक को लेकर संसद का बहुमूल्य समय और जनता के  करोड़ों रु. बेकार हो गए उसकी चर्चा सत्र का अवकाश होते ही बंद हो गई। ऐसा पहली बार नहीं हुआ। पहले भी ये देखने में आया है कि संसद  में जिन मुद्दों को लेकर हंगामा होता है और विपक्ष सदन नहीं चलने देता वे सत्र के बाद ठन्डे बस्ते में चले जाते हैं। चूंकि सदन के भीतर लगाए गए आरोप - प्रत्यारोप कानून के क्षेत्राधिकार से बाहर होते हैं इसलिए दोनों पक्ष बिना डरे बहुत कुछ ऐसा बोल देते हैं जो बाहर अवमानना के अंतर्गत आता है। जनरल नरवणे की पुस्तक को लेकर दिल्ली पुलिस में प्रकरण दर्ज़ हो चुका है।  उसके प्रकाशक ने स्पष्टीकरण दे दिया है कि वह अभी तक अप्रकाशित है। श्री नरवणे वैसे तो इस विवाद पर मौन रहे किंतु प्रकाशक के स्पष्टीकरण का उन्होंने तत्काल अनुमोदन कर दिया।  बीते तीन दिनों में न ही श्री गांधी या अन्य किसी विपक्षी नेता ने पुस्तक के बारे में कुछ कहा और न ही सत्ता पक्ष ने विपक्ष पर पलटवार का कोई प्रयास किया। रोज शाम को नेताओं और पत्रकारों को बिठाकर बहस करवाने वाले टीवी चैनलों ने भी दूसरे विषयों को पकड़ लिया। ये सब देखकर लगता है संसद केवल सनसनी फैलाने का मंच बनकर रह गई है। वह जमाना, जब सदन में मुद्दों पर पक्ष - विपक्ष से गंभीर चर्चा होती थी, अब केवल स्मृतियों में ही रह गया है। इसके लिए कौन कितना दोषी है इसका निर्णय करना कठिन है क्योंकि जो आज पक्ष में हैं वे भी विपक्ष में रहते हुए सदन को बाधित करने को संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा मानते थे। कुल मिलाकर संसद की गरिमा केवल दिखावे तक सीमित रह गई है। लोकसभाध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर श्री गांधी द्वारा हस्ताक्षर नहीं किए जाने पर कांग्रेस ने स्पष्टीकरण दिया कि स्पीकर को पद से हटाने के नोटिस पर नेता प्रतिपक्ष का हस्ताक्षर करना संसदीय लोकतंत्र में सही नहीं है। लेकिन क्या नेता प्रतिपक्ष के सामने उन्हीं की पार्टी के सांसदों द्वारा आसंदी पर कागज फेंकना और गर्भगृह में आकर नारेबाजी करना  संसदीय लोकतंत्र के लिए सही है ? राष्ट्रपति का अभिभाषण और बजट जैसे विषय विपक्ष के लिए अपना दृष्टिकोण रखने का बेहतरीन अवसर होते हैं जिसका लाभ उसे उठाना चाहिए क्योंकि जब सदन  नहीं चलता तब भी सत्ता पक्ष का काम तो जैसे - तैसे हो ही जाता है किंतु विपक्ष के हाथ कुछ नहीं लगता। ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि कांग्रेस भले ही सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है लेकिन अन्य दलों के पास भी ऐसे सांसद हैं जो  अपनी बात प्रभावशाली तरीके से रखते हैं किंतु हंगामे की वजह से उन्हें बोलने ही नहीं मिलता। ये देखते हुए इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि होली के बाद जब संसद का सत्र दोबारा शुरू होगा तब भी इसी तरह का तनावपूर्ण माहौल बना रहेगा क्योंकि जिस उद्देश्य से ये अवकाश दिया जाता है उसके सदुपयोग के प्रति ज्यादातर सांसदों में लेश मात्र गंभीरता नहीं है।


- रवीन्द्र वाजपेयी