Friday, 19 June 2026

ईरान के बंधन मुक्त हो जाने से प. एशिया के समीकरण बदले

 

अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते  की खबर से दुनिया ने राहत की सांस ली है। 19 जून को यह समझौता विधिवत लागू होगा। हालांकि  होर्मुज से तेल और गैस टैंकरों वाले जहाजों का निकलना शुरू हो जाने से लगभग चार माह से चले आ रहे तेल और गैस संकट में कुछ कमी आयेगी । लेकिन हालात पूरे तौर पर सामान्य होने में कई महीने लग सकते हैं क्योंकि ईरान ने इस समुद्री क्षेत्र में जो बारूदी सुरंगें बिछा रखी हैं उन्हें हटाने में समय लगेगा। दूसरा पेच ये भी है कि 6 माह बाद ईरान द्वारा ओमान के साथ मिलकर इस जल मार्ग का उपयोग करने वाले जहाजों से टोल वसूलने की तैयारी की जा रही है जो  विवाद का नया कारण बन सकती है।  इसी तरह ईरान को दी जाने वाली क्षति पूर्ति की राशि को लेकर अमेरिका द्वारा हाथ खींच लिए जाने के बाद सऊदी अरब, दुबई  , ओमान, कतर आदि परेशान हैं क्योंकि अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस इन देशों पर दबाव बना रहे है कि वे ईरान को हुए नुकसान की भरपाई करें जबकि ईरान की मिसाइलों ने इन तेल उत्पादक देशों की इकाइयों को जो नुकसान पहुंचाया उससे उबरने में उन्हें कम से कम एक साल लगेगा। इससे अलग हटकर देखें तो प. एशिया में स्थायी शांति तब तक नहीं आ सकती जब तक इजराइल के अस्तित्व को ईरान सहित अरब जगत के सभी मुस्लिम देश मान्य नहीं करते। यद्यपि जोर्डन, मिस्र, ओमान, सं. अरब अमीरात आदि इजराइल से रिश्ते कायम कर चुके हैं किंतु ईरान के अलावा , तुर्किये और पाकिस्तान जैसे कुछ मुस्लिम देश इजराइल के  अस्तित्व को मंजूर नहीं करते। और फिर जिस समझौते को लेकर पूरा विश्व प्रसन्न है उससे दूरी बनाकर  इजराइल ने लेबनान पर हमले जारी रखते हुए संकेत दे दिया कि वह अपने रास्ते खुद तय करेगा। यद्यपि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस ने इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू और समझौते का विरोध कर रहे उनके मंत्रियों को काफी भला - बुरा कहा किंतु इजराइल ने अपनी सैन्य कारवाई को रोकने से इंकार कर दिया जिसके कारण समझौते के पहले आज होने वाली बैठक रद्द हो गई। ईरान लगातार दोहरा रहा है कि लेबनान पर हमले नहीं रुके तब वह शांत नहीं बैठेगा। इस सबसे लगता है कि अमेरिका तो अपना पिंड छुड़ाकर निकला जा रहा है किंतु प. एशिया में अशांति के बीज अभी भी मिट्टी में दबे हैं जो जरा सी नमी मिलते ही पनप सकते हैं। एक बात और जो दुनिया भर की चिंता का कारण बन गई वह है ईरान का छुट्टा हो जाना। अमेरिका ने उसे तेल बेचने की छूट के अलावा उसकी जप्त दौलत मुक्त करने की अनुमति देकर प.एशिया में एक ताकतवर शक्ति केंद्र की जड़ें जमा दीं। ईरान ने इस यद्ध में अपनी मारक क्षमता से अमेरिका जैसी महाशक्ति तक का मुकाबला किया। इजराइल के अभेद्य समझे जाने वाले आयरन डोम भी उसकी मिसाइलों को न रोक सके। शुरुआत में  लड़ाई में एक पक्ष अमेरिका और इजराइल थे वहीं मुकाबले में था ईरान। अपने सर्वोच्च शासक खामेनेई की हत्या के बाद उसका हौसला थोड़ा तो हिला किंतु उसने चतुराई पूर्वक अन्य खाड़ी देशों को निशाना बनाकर युद्ध क्षेत्र का विस्तार कर दिया जिससे अमेरिका पर दबाव बढ़ने लगा। कुल मिलाकर डोनाल्ड ट्रंप की मूर्खता से प्रतिबंधों से जकड़े ईरान को नई आजादी मिल गई और वह भी ताकत के बल पर। इसीलिए जो लोग सोचते हैं कि इस समझौते से युद्ध बंद हो जाएगा और प. एशिया में सामान्य स्थितियां लौटेंगी वे ज्यादा दूर तक देखने में सक्षम नहीं हैं। सच्चाई ये है कि अमेरिका ने अपने आप को भले इस युद्ध से अलग कर लिया किंतु इजराइल, होर्मुज और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर प. एशिया में तलवारें म्यान से बाहर आती रहेंगी। अमेरिका की मजबूरी ये भी है कि इस क्षेत्र में उसके आर्थिक और सामरिक हित भी हैं। यदि उसने पूरी तरह दूरी बनाई तब चीन और रूस बिना देर गंवाये ईरान के जरिये अपना वर्चस्व इस तेल संपन्न इलाके में बढ़ाएंगे । भारत को इस घटनाक्रम पर पैनी नजर रखनी चाहिए क्योंकि चीन की उपस्थिति पाकिस्तान के लिए हितकारी होगी। ऐसे में हमें नये सिरे से कूटनीतिक बिसात बिछानी पड़ेगी। वैसे सं. अरब अमीरात, ओमान, कतर, जोर्डन, सऊदी अरब आदि से हमारे रिश्ते मजबूत हैं। और इजराइल समर्थक होने पर भी ईरान से हमारे संबंध यथावत हैं। लेकिन कूटनीति में कब कौन बदल जाए कहना मुश्किल है। यदि अमेरिका ने अपने दत्तक पुत्र इजराइल को ठेंगा दिया तब कुछ भी संभव है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 18 June 2026

ट्रंप के आश्वासन भरासे लायक नहीं



फ्रांस में चल रहे जी 7 सम्मेलन  में  सभी विषयों पर अमेरिका - ईरान युद्ध हावी रहा क्योंकि बीते कुछ महीनों से उसके चलते पूरी दुनिया का ध्यान बाकी समस्याओं से हट सा गया था। हालांकि रूस और यूक्रेन युद्ध ने भी वैश्विक व्यवस्था पर काफी असर डाला किंतु ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमले के बाद उत्पन्न परिस्थितियों ने पेट्रोल, डीजल और गैस आदि की आपूर्ति बाधित कर दी। परिणाम स्वरूप  कीमत  बढ़ जाने से सभी देशों की अर्थव्यवस्था पर विपरीत असर पड़ने लगा। तेल संयंत्रों को हुए नुकसान के कारण लंबे समय तक उत्पादन में कमी रहने की आशंका बढ़ती जा रही है।  युद्ध रोकने के लिए चल रही शांति प्रक्रिया में आ रही बाधाएं भी विचलित कर रही थीं। हालांकि आज अमेरिका और ईरान दोनों ने युद्ध रुकने की पुष्टि कर समूचे विश्व को राहत प्रदान की। युद्ध विराम कितना कारगर होगा ये तो भविष्य ही बताएगा क्योंकि  इजराइल में इस समझौते का जिस तरह विरोध हो रहा है उसे देखते हुए स्थायी शांति  की उम्मीद संदेह के घेरे में ही रहेगी। इसी बीच  डोनाल्ड ट्रंप द्वारा जी 7 सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ में जो बातें कहीं उनमें कुछ भी नयापन नहीं है। पूर्व में भी वे श्री मोदी को अपना दोस्त बताते हुए ऐसी ही टिप्पणियां करते रहे हैं। लेकिन उसी के साथ ही भारत पर टैरिफ बढ़ाने के अलावा मनमाने प्रतिबंध लगाने से भी बाज नहीं आये। डोनाल्ड ट्रंप के  बेसिर पैर वाले दावों की शुरुआत ऑपरेशन सिंदूर के समय से हुई जब उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम करवाने का श्रेय खुद को देकर शांति के नोबल पुरस्कार के लिए दावा कर दिया। हद तो तब हो गई जब पाकिस्तान ने उनके नाम की सिफारिश भी कर दी। ईरान पर हमले के बाद की गई उनकी घोषणाओं को देखें तो साफ हो जाता है कि वे अपनी बात से पलट जाने वाले इंसान हैं जिन्हें  पद की गरिमा की रत्ती भर भी परवाह नहीं रहती। इसीलिए अमेरिका जैसी महाशक्ति के राष्ट्राध्यक्ष होने के बाद भी ट्रंप की छवि एक मसखरे की बन चुकी है। गत दिवस उन्होंने श्री मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक में ये कहकर सनसनी फैला दी कि उनके राष्ट्रपति रहते हुए यदि भारत पर कोई हमला होता है, तो अमेरिका बिना किसी औपचारिक लिखित समझौते के भी भारत की मदद करेगा। साथ ही उन्होंने श्री मोदी को सख्त रणनीतिकार बताते हुए माना कि उनके नेतृत्व में भारत दुनिया के लिए बहुत अहम भूमिका निभा रहा है। ट्रंप का यह बदला हुआ रुख श्री मोदी द्वारा होर्मुज में व्यापारिक जहाजों पर हुए  अमेरिकी हमलों में भारतीय नाविकों की जान जाने का मुद्दा उठाये जाने के बाद सामने आया। समुद्री सुरक्षा और गैर सैनिक जहाजों को निशाना बनाये जाने पर भारत के विरोध को जी 7 सम्मेलन में अच्छा समर्थन मिलने और अनेक राष्ट्राध्यक्षों द्वारा श्री मोदी को दिये जा रहे सम्मान को देखकर  अमेरिकी राष्ट्रपति लचीला रुख अपनाने बाध्य हुए ।  और फिर द्विपक्षीय बातचीत के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री की तारीफ के पुल बांधते हुए बिना मांगे ही हमले के समय मदद का आश्वासन भी दे डाला। ये वही ट्रंप हैं जो ऑपरेशन सिंदूर  के बाद से पाकिस्तान को गोद में बिठाकर भारत को उपेक्षित करते रहे। और तो और  उसके सेनाध्यक्ष आसिफ मुनीर को साथ में  भोजन करवाने की तस्वीरें प्रचारित करने में भी शर्म नहीं की जबकि कूटनीतिक शिष्टाचार के लिहाज से मुनीर उनकी हैसियत से बहुत नीचे हैं।  ईरान युद्ध रूकवाने के लिए मध्यस्थता के लिए भी ट्रंप ने पाकिस्तान को आगे किया। वे सोचते रहे कि भारत इससे डर जायेगा और उनकी खुशामद करेगा। लेकिन न तो टैरिफ विवाद पर भारत झुका और न ही व्यापार डील में अपने हितों की सौदेबाजी की। रूस से कच्चे तेल की खरीदी में भी अमेरिकी दबाव को उपेक्षित करते हुए भारत ने यूरोपीय यूनियन सहित अनेक देशों से मुक्त व्यापार संधि हस्ताक्षरित कर ट्रंप को ठेंगा दिखा दिया । इसीलिए जी 7 सम्मेलन में उनको श्री मोदी और भारत के प्रति अपने झुकाव का प्रदर्शन करना पड़ा। लेकिन  दूसरे कार्यकाल में अब तक उनका जो आचरण रहा उसे देखते हुए  भारत को उन पर लेश मात्र विश्वास नहीं किया जा सकता। वैसे भी ईरान पर बेतहाशा बारूद बरसाने के बावजूद उसके साथ समझौते के लिए मजबूर ट्रंप के आश्वासन अब भरोसे लायक नहीं बचे। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 17 June 2026

उद्धव के पास न सत्ता बची न संगठन


प.बंगाल में ममता बैनर्जी की सरकार के धराशायी होते ही तृणमूल कांग्रेस दो फाड़ हो गई। पहले विधायक टूटे और फिर सांसदों ने भी  किनारा करते हुए अलग गुट बना लिया। चुनाव में लगे झटके से से वे उबर भी नहीं पाईं थीं कि पार्टी में आये बिखराव ने उनके राजनीतिक भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया। चुनाव परिणाम के बाद इंडिया गठबंधन को मजबूत कर राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का नेतृत्व करने की उनकी महत्वाकांक्षा भी  हवा में उड़ गई क्योंकि  विधानसभा और संसद दोनों ही में तृणमूल काँग्रेस की सदस्य संख्या अंगुलियों पर गिनने लायक ही बच रही है। बड़ी बात नहीं यदि आने वाले दिनों में ये बचे - खुचे भी  ममता का साथ छोड़कर चलते बनें। इसी बीच ये खबरें भी आने लगीं कि उद्धव ठाकरे के पास बची शिवसेना (यूबीटी) के 9 में से 6 सांसद भी एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ जुड़ने जा रहे हैं। इसे लेकर मुंबई से दिल्ली तक राजनीतिक हलचलें तेज हैं। उद्धव को ये समझ आ गया है कि पहले से ही ढह चुके उनके दुर्ग की बची - खुची दीवारें भी गिरने के कगार पर हैं। इसीलिए उन्होंने हताशा भरे स्वर में कहा कि जिसे जाना हो वह चला जाए। हालांकि उनके बड़बोले प्रवक्ता संजय राउत ने आदतानुसार आरोप लगा दिया कि पार्टी छोड़ रहे सांसदों को 50 - 50 करोड़ रु. का लालच दिया गया जिसमें 15 करोड़ दिये जा चुके हैं। हालांकि इसका कोई प्रमाण उन्होंने नहीं दिया। लेकिन इससे अलग हटकर देखें तो ये स्पष्ट हो जाएगा कि उद्धव के पास अपनी पार्टी को सहेजकर रखने का कोई आधार नहीं बचा। उनके स्वर्गीय पिता बाल ठाकरे राजनीति में हिंदुत्व के सबसे बड़े प्रतीक थे जिन्होंने कभी भी मुस्लिम तुष्टीकरण का सहारा नहीं लिया। लेकिन उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी उद्धव ने उस कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिला लिया जो अपनी मुस्लिम परस्ती के लिए कुख्यात हैं। और तो और वे  सत्ता के लालच में उस इंडिया गठबंधन में शामिल होने में भी नहीं सकुचाये जिसमें अखिलेश और तेजस्वी यादव के अलावा ममता बैनर्जी जैसे हिंदुत्व नाम से चिढ़ने वाले नेताओं के अलावा  वामपंथी और द्रमुक जैसी पार्टियां भी  हैं जिन्हें धर्म की अवधारणा से ही चिढ़ है। यही कारण रहा कि स्व. बाल ठाकरे के प्रखर हिंदुत्व से प्रभावित होकर शिवसेना से जुड़े तमाम लोग उद्धव द्वारा सत्ता की खातिर मुस्लिम परस्त पार्टियों के सामने झुकने से नाराज होकर  अलग हो गए । चूंकि भाजपा ही मौजूदा  दौर में हिंदुत्व की सबसे प्रखर और मुखर प्रवक्ता है लिहाजा एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में विधायकों की बगावत से उद्धव सत्ता से बाहर हुए और फिर पार्टी और चुनाव चिन्ह भी हाथ से निकल गए। 2024 के लोकसभा चुनाव  में महाराष्ट्र में इंडिया गठबंधन को जबरदस्त सफलता मिली तो उद्धव सहित कांग्रेस और एनसीपी जोश से भर उठीं। यद्यपि शरद पवार की पार्टी भी उसके पूर्व ही दो फाड़ हो चुकी थी। उनके भतीजे अजीत पवार ने बगावत कर चाचा से पार्टी छीन ली और भाजपा के साथ सत्ता में हिस्सेदारी कर ली। लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजों से मिली वह खुशी कुछ महीनों बाद ही मातम में बदल गई जब विधानसभा चुनाव में भाजपा , एकनाथ शिंदे और अजीत पवार के महायुति नामक  गठजोड़ ने प्रचंड जीत हासिल कर कांग्रेस, शरद पवार और उद्धव ठाकरे को चारों खाने चित्त कर दिया। यही कहानी स्थानीय निकाय चुनावों में भी दोहराई गई । लेकिन उद्धव ठाकरे को सबसे बड़ा धक्का लगा मुंबई में जब बीएमसी ( मुंबई महानगर पालिका) पर ठाकरे परिवार का दशकों पुराना कब्जा भी भाजपा ने समाप्त कर दिया। स्मरणीय है बीएमसी  अविभाजित शिवसेना का अभेद्य दुर्ग होने के साथ उसके लिए कुबेर का खजाना था। उसका बजट अनेक राज्यों से भी ज्यादा होने से ठाकरे परिवार इसके जरिये फलता - फूलता गया। लेकिन सत्ता और संगठन के साथ सैद्धांतिक पूंजी भी गंवाने के बाद उद्धव पूरी तरह प्रभाव शून्य हो चले हैं।  आधा दर्जन  सांसद और टूटे तो उनकी राजनीतिक जमीन पूरी तरह खिसक जाएगी। यद्यपि इस स्थिति के लिए ममता बैनर्जी की तरह वे भी भाजपा को दोषी ठहराएँगे। लेकिन वे अपने पिता स्व. बाल ठाकरे के कट्टर अनुयायियों को  अपने साथ जोड़कर नहीं रख पा रहे तो यह उनकी कमजोरी है ।  इसलिए पार्टी के सत्यानाश का कसूरवार भी वही हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 16 June 2026

शांति समझौते का भविष्य इसराइल के रुख पर निर्भर

मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस : संपादकीय
- रवीन्द्र वाजपेयी

शांति समझौते का भविष्य इसराइल के रुख पर निर्भर

अब ये मानकर चला जा सकता है कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता हस्ताक्षरित होने जा रहा है। उसके प्रारूप पर दोनों देशों की ओर से हस्ताक्षर किये जाने के बाद  रविवार को स्विटजरलैंड के जिनेवा शहर में उसे अंतिम रूप दिया जाएगा।  रोचक बात है कि  इस समझौते के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ के साथ ही चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ आसिफ मुनीर ने  काफी दौड़ भाग की। इस्लामाबाद में दोनों पक्षों के बीच वार्ताएं भी हुईं किंतु जब समझौते को अंतिम रूप देने का अवसर आया तब  पाकिस्तान की राजधानी को ठेंगा दिखाते हुए अमेरिका और ईरान ने जिनेवा  पसंद किया। इससे लगता है कि पाकिस्तान की भूमिका संदेश वाहक तक ही सीमित रही। बहरहाल अब समझौते को अंतिम रूप दिया जा चुका है तब इस बात का विश्लेषण होने लगा है कि किसने क्या खोया क्या पाया? जो विवरण  आया है उसके मुताबिक जो मुख्य बातें हैं उनमें ईरान द्वारा होर्मुज जलमार्ग को खोलना और अमेरिका द्वारा ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी खत्म करना है। इसके अलावा ईरान के पुनर्निर्माण हेतु अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान को 300 अरब डॉलर देंगे।  ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगने के बारे अन्तिम फैसले हेतु 60 दिन की समय सीमा निर्धारित किये जाने से लगता है अमेरिका और ईरान दोनों इस बेनतीजा जंग से ऊब चुके हैं और किसी तरह से अपना पिंड छुड़ाना चाहते हैं। लेकिन इस युद्ध के लिए अमेरिका को मनाने वाले इसराइल का रुख दूध में नींबू निचोड़ने वाला है। उसने साफ - साफ कह दिया है कि वह इस समझौते से पूरी तरह दूर रहेगा और लेबनान पर उसके हमले नहीं रुकेंगे। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की धौंस भी बेअसर साबित हुई। पहले तो ईरान भी इस बात पर अड़ा हुआ था कि लेबनान पर इसराइल की सैन्य कारवाई रुके बिना समझौते की गाड़ी आगे नहीं बढ़ेगी। लेकिन ऐसा लगता है तीन महीने से चली आ रही जंग ने उसके हौसले भी कमजोर कर दिये। हालांकि ऊपरी तौर पर वह अपने को बेहद मजबूत दिखाता है लेकिन अमेरिका और इसराइल की मिसाइलों से समूचा देश खंडहर में तब्दील हो चुका है। जनता भी बेतहाशा महंगाई और दैनिक उपयोग की वस्तुओं के अभाव से आक्रोशित है। मूलभूत ढांचा बुरी तरह चरमरा जाने से सर्वत्र अव्यवस्था है। ऐसे में ईरान के नेतृत्व को ये डर लगने लगा कि अवसर का लाभ उठाकर अमेरिका कहीं सत्ता परिवर्तन न करवा दे जो इस युद्ध के सबसे प्रमुख उद्देश्यों में था। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि अमेरिका और ईरान  पर उनके समर्थक देशों का दबाव भी युद्धविराम के लिए बढ़ता जा रहा था। तेल उत्पादक देशों की बिक्री रुक जाने से उनकी अर्थव्यवस्था का भी कचूमर निकलने लगा था। ये देश अमेरिका पर जंग रुकवाकर हालात सामान्य करने का आग्रह कर रहे थे वहीं चीन जैसे ईरान के संरक्षक भी उसे सलाह दे रहे थे कि जैसे भी हो युद्ध रोकने का रास्ता निकाला जाए क्योंकि उनको भी तेल संकट की चिंता सताने लगी थी। इस प्रकार एक दूसरे को बर्बाद करने पर आमादा अमेरिका और ईरान ने न चाहते हुए भी ऐसे समझौते को स्वीकार करने का मन बना लिया जिसकी सफलता को लेकर वे खुद भी आश्वस्त नहीं हैं। इसराइल द्वारा अमेरिका की बात न मानना निश्चित रूप से चौंकाता है किंतु एक संभावना ये भी है कि ऐसा करने के लिए उसे डोनाल्ड ट्रम्प ने ही उकसाया हो 2। प. एशिया में इसराइल और अमेरिका की जुगलबंदी से इस तरह के कूटनीतिक दाँव - पेच नये नहीं हैं।  इस  प्रकार इस समझौते की सफलता इसराइल के रुख पर निर्भर करेगी क्योंकि उसने लेबनान पर हमले नहीं रोके तब ईरान भी उसके बचाव में कूदे बिना नहीं रहेगा। और ऐसा होने पर युद्ध ईरान विरुद्ध इसराइल की शक्ल ले लेगा जिसमें अमेरिका किसके साथ रहेगा ये बताने की जरूरत नहीं है। पूरी दुनिया इस समझौते के बाद तेल संकट के हल होने की जो उम्मीद लगा रही है वह आसानी से पूरी होने में संदेह ही है क्योंकि ईरान इतनी आसानी से चीजें अपने हाथ से निकलने नहीं देगा। यही बात इसराइल पर भी लागू होती है क्योंकि वह उस ईरान को कभी भी चैन से नहीं रहने देना चाहेगा जो उसे मिटाने पर आमादा हो। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 15 June 2026

अमेरिका और ईरान में समझौते के बाद भी शांति की गारंटी नहीं


अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते को लेकर  दावा किया जा रहा है कि आगामी 19 जून को दोनों उस पर हस्ताक्षर कर देंगे। हालांकि  इस तरह की घोषणाएं कई मर्तबा  सुनने में आईं लेकिन कभी अमेरिका को ईरान की शर्तें मंजूर नहीं हुईं तो कभी ईरान ने अमेरिकी प्रस्तावों पर  असहमति जाहिर करते हुए टांग अड़ा दी। इस विलंब के लिये इसराइल भी कम जिम्मेदार नहीं है जो ईरान के जबरदस्त विरोध के बावजूद लेबनान पर हमले रोकने तैयार नहीं है। हद तो तब हो गई जब उसके प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा की गई डाँट - डपट की परवाह तक नहीं की। अब जबकि ऐसा लग रहा है कि समझौता अंतिम चरण में पहुँच चुका है तब इसराइल ने ये कहकर सनसनी फैला दी कि वह इसका हिस्सा नहीं है। उल्लेखनीय है नेतन्याहू ही नहीं सऊदी अरब सहित अनेक अरब देश भी ट्रम्प से अनुरोध कर चुके हैं कि ईरान को पूरी तरह घुटनाटेक करवाये बिना लड़ाई रोकना भारी भूल होगी क्योंकि आगे भी वह पड़ोसी देशों के विरुद्ध आक्रामक रवैया अख्तियार करने से बाज नहीं आयेगा। दरअसल अमेरिका किसी भी तरह इस युद्ध से निकलना चाह रहा है क्योंकि उसे ये समझ में आ गया है कि बिना थल सेना उतारे ईरान को परास्त करना असंभव होगा। हालांकि वह ऐसा करने में सक्षम है किंतु वियतनाम और अफगानिस्तान के कड़वे अनुभवों को याद करने पर ट्रम्प उस दिशा में आगे बढ़ने से रुक गये। ईरान के विरुद्ध इस कारवाई का घोषित मकसद तो उसे परमाणु हथियार बनाने से रोकना था लेकिन असली बात है तेल का खेल।   रूस और ईरान द्वारा सस्ता तेल बेचे जाने से अमेरिका परेशान था क्योंकि उसका भरपूर लाभ भारत और चीन जैसे देश उठा रहे थे जिससे अमेरिका के पेट में मरोड़ होता आया है। और फ़िर ब्रिक्स नामक जिस संगठन ने डॉलर के दबदबे को समाप्त करने की पहल की उसमें भारत, चीन और ब्राज़ील के साथ ही ईरान भी शामिल हो गया। जहाँ तक प्रश्न  इसराइल का है तो उसकी और ईरान की दुश्मनी का कारण हमास , हिजबुल्ला और हूती जैसे इस्लामिक आतंकवादी संगठन हैं जिनकी पीठ पर ईरान का खुला हाथ है। इस जंग की जड़ में भी हमास द्वारा इसराइल पर किया गया हमला था जिसके बाद प. एशिया में युद्ध की आग भड़क उठी। इसराइल और ईरान के बीच सीधी लड़ाई भी उसी दौरान शुरू हुई थी जिसमें अमेरिका ने भी हिस्सा लिया और ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया। हालांकि  युद्धविराम तो हो गया लेकिन ईरान का आक्रामक रुक जारी रहने से इसराइल ने अमेरिका को इस बात के लिए राजी  कर लिया कि  उसकी कमर पूरी तरह तोड़ दी जाए। चूंकि ऐसा करने में अमेरिका के भी दूरगामी  स्वार्थ सिद्ध होते थे लिहाजा ट्रम्प भी तैयार हो गए। लेकिन वे ईरान द्वारा किये गए पलटवार का पूर्वानुमान लगाने में चूक गए। यही वजह रही कि जंग लंबी खिंचने के साथ ही अनेक देशों में फैल गई। बहरहाल समझौते के करीब पहुँचने के बाद भी ये आशंका बनी हुई है कि अंतिम क्षणों में भी ऐसा कुछ होगा जिससे कि शांति की उम्मीदें धरी रह जाएं। ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को अमेरिका की इच्छानुसार स्थगित कर देगा क्योंकि उसके पास यही तो सौदेबाजी का सबसे बड़ा हथियार है। उसने यूक्रेन के हश्र को भी देखा जो परमाणु शक्ति विहीन होने के दुष्परिणाम भोग रहा है। इसी तरह होर्मुज पर पूरी तरह नियंत्रण खत्म करने पर भी ईरान राजी हो जाएगा ये भी मुश्किल है।  एक बात और भी काबिले गौर है कि ईरान के भीतर भी इस संभावित समझौते के विरोध में सत्ता से जुड़ा एक तबका आवाज उठा  रहा है। उसका कहना है कि युद्ध रोकने की ज्यादा जरूरत ट्रम्प को है ऐसे में ईरान को अपनी शर्तों पर अड़े रहना चाहिए। अमेरिका द्वारा समझौते के जिन बिंदुओं की जानकारी दी जा रही है उसके अनुसार तो ईरान दबाव में आ गया लगता है। यद्यपि  जप्त संपत्ति लौटाने और युद्ध में हुई क्षति के मुआवजे जैसे प्रावधान उसे राहत देने वाले हैं किंतु बाकी सब अमेरिका की जीत का इशारा कर रहे हैं। ऐसे में फिलहाल ये विश्वास कर लेना जल्दबाजी होगी कि 19 तारीख पूरी दुनिया के लिए राहत लेकर आयेगी। बड़ी बात नहीं जिस तरह अमेरिका और इसराइल के बीच शांति समझौते को लेकर मतभेद उभरे वैसा ही कुछ ईरान में भी हो जाए जिसके चलते वहाँ  नेतृत्व के दोफ़ाड़ होने से आखिरी क्षणों में गतिरोध उत्पन्न हो।  उस दृष्टि से अगले कुछ दिन बेहद उत्सुकता और उत्तेजना से भरे रहेंगे। देखने वाली बात ये भी है कि ट्रम्प की विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म होने के कारण समझौते के बावजूद प. एशिया में शांति कायम होने पर  संदेह बना रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 13 June 2026

कब , कहां और कितना बोलना है इस कला में पारंगत हैं जयशंकर


विदेश मंत्री एस. जयशंकर द्वारा हाल ही में की गई टिप्पणियां हमारी विदेश नीति की दृढ़ता का प्रमाण हैं। कुछ दिन पहले उन्होंने यूरोपीय देशों को लताड़ते हुए कहा था कि उन्हें इस मानसिकता से निकलना चाहिए कि यूरोप की समस्याएं दुनिया की समस्याएं हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं यूरोप की समस्याएं नहीं हैं। इसी तरह जब पश्चिमी देशों ने रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और रूस से कच्चे तेल की खरीद पर सवाल उठाए तो उन्होंने ने उन्हें कड़ा जवाब देते हुए याद दिलाया कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और आम जनता के हितों को ध्यान में रखकर निर्णय लेता है। सुरक्षा और नैतिकता के  सवाल पर यूरोप द्वारा भारत को उपदेश देने पर पलटवार करते हुए उन्होंने कहा था कि कोई भी यूरोपीय देश भारतीय हथियारों से कभी खतरे में नहीं पड़ा, लेकिन यूरोपीय हथियारों ने दशकों तक भारत के खिलाफ काम किया है। उनका इशारा पाकिस्तान को दिए जाने वाले हथियारों की ओर था। दरअसल श्री जयशंकर की उक्त स्पष्टोक्तियां यूरोपीय देशों के उस उलाहने के बाद आईं जिसमें ये कहा गया था कि भारत ने रूस के साथ निकटता के चलते यूरोपीय हितों को नजरंदाज किया। रूस से तेल खरीदने के प्रश्न पर उन्होंने दो टूक कहा कि यूक्रेन युद्ध के शुरू होने के बाद जब यूरोपीय देशों ने अरब के तेल उत्पादक देशों से तेल की खरीदी बढ़ाई तब अमेरिका ने ही भारत से अनुरोध किया था कि रूस से कच्चा तेल खरीदे जिससे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतें स्थिर रहें। उन्होंने ये कहने में भी संकोच नहीं किया कि उसके बाद अमेरिका ने भारत पर टैरिफ बढ़ाने जैसी हरकत की। हालांकि इसके पूर्व भी भारत सरकार कई मर्तबा ये कह चुकी है कि वह अपने व्यावसायिक हितों के अनुरूप निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है और जहां से सस्ता मिलेगा वहां से वह खरीदी करने में संकोच नहीं करेगी। दरअसल अमेरिका और यूरोपीय देश आज भी गोरी चमड़ी वाले श्रेष्ठता के भाव से ग्रसित हैं। भले ही उपनिवेशों का दौर इतिहास बन चुका हो किंतु यूरोप अभी तक यही मानकर चलता है कि उनके अधीन रहे एशियाई और अफ्रीकी देश उनको पूर्ववत सम्मान देते रहें और जैसा वे चाहें वैसा ही करें। चूंकि पाकिस्तान जैसे देश आज भी इन देशों के सामने दुम हिलाते घूमते रहते हैं इसलिए भारत से भी वे वैसी ही अपेक्षा करते हैं और पूरी नहीं होने पर अनुचित दबाव बनाने से नहीं चूकते। कूटनीति में चूंकि प्रतिवाद भी सही समय पर और नपे - तुले शब्दों में किया जाता है इसीलिये अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प हों या कोई और , भारत की ओर से उनकी कटाक्षपूर्ण टिप्पणियों का जल्दबाजी में जवाब नहीं दिया जाता। विपक्ष इसे लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने में जुटा रहता है लेकिन विदेश नीति के अनुभवी लोग जानते हैं कि इस क्षेत्र में जल्दबाजी नुकसानदेह होती है। इसराइल - हमास, रूस - यूक्रेन और अब अमेरिका - ईरान जंग के बारे में भारत सरकार की प्रतिक्रियाओं में जो संयम और संतुलन दिखा वह हमारी विदेश नीति की परिपक्वता का प्रमाण है। ये बात सही है कि स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की तरह श्री मोदी के पास विदेश नीति का समुचित अनुभव भले न हो किंतु उनमें योग्य व्यक्ति का चयन करने की जबर्दस्त क्षमता है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में अजीत डोभाल और विदेश मंत्री के लिये श्री जयशंकर का चयन प्रधानमंत्री की पैनी नजर का सबूत है। यद्यपि स्व. सुषमा स्वराज ने भी विदेश मंत्री रहते हुए मोदी सरकार के दबदबे को वैश्विक मंचों पर बखूबी स्थापित किया था जिसे उनके उत्तराधिकारी श्री जयशंकर ने और भी ऊंचाई प्रदान कर दी। हालांकि जिस तरह श्री डोभाल के पास गुप्तचर सेवा का व्यापक अनुभव था ठीक वैसे ही श्री जयशंकर को भी विदेश सेवा में रहते हुए चीन और अमेरिका में राजदूत रहने के बाद विदेश सचिव बनने से कूटनीतिक क्षेत्र का व्यापक तजुर्बा है। इसीलिए वे दुनिया के बड़े से बड़े नेता से मिलते समय या किसी भी वैश्विक मंच पर  आत्मविश्वास से भरे नजर आते हैं। कब , कहां और कितना बोलना है इस कला में पारंगत विदेश मंत्री ने हाल ही में एक विदेशी पत्रकार द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान युद्धविराम करवाने में अमेरिका की भूमिका पर जो जवाब दिया वह उन लोगों के लिए आँखें खोलने वाला है जो अभी भी ये राग अलापते रहते हैं कि भारत ने अमेरिका के दबाव में युद्ध रोक दिया। प. एशिया में चल रहे वर्तमान तनाव के दौरान भी हमारी विदेश नीति ने संजीदगी का परिचय देते हुए युद्ध में शामिल सभी पक्षों से संवाद कायम रखकर जिस तरह राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा की वह प्रशंसनीय है। प्रधानमंत्री श्री मोदी द्वारा हाल ही में की गई 5 देशों की यात्रा भी उसी दिशा में बढ़ाया गया कदम था। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 12 June 2026

सं.रा.संघ का होना न होना बराबर


दूसरे विश्व युद्ध के बाद अस्तित्व में आए सं.रा.संघ का मुख्य कार्य दुनिया भर में शांति सहअस्तित्व और आपसी सहयोग की भावना विकसित करना है। उपनिवेशों का दौर धीरे - धीरे कमजोर पड़ने से छोटे - छोटे अनेक सर्वप्रभुता संपन्न देशों का उदय हुआ जिन्हें सं.रा.संघ की सदस्यता प्रदान कर बड़े देशों के साथ बराबरी से बैठने का अधिकार मिला। हालांकि सं.रा.संघ की सुरक्षा परिषद में पाँच स्थायी सदस्यों को मिले वीटो अधिकार की वजह से सामंती व्यवस्था के अवशेष कायम हैं किंतु दुनिया भर में मानवीयता की सेवा और साधनहीन देशों को संरक्षण प्रदान करने में इस विश्व संस्था ने प्रभावी भूमिका का निर्वहन भी किया। वहीं तनाव के अनेक अवसरों पर   मध्यस्थ बनकर दुनिया को जंग से बचाया। उसके द्वारा पोषण , स्वास्थ्य, शिक्षा और सेवा के अनेक प्रकल्प भी संचालित हो रहे हैं। यूनीसेफ और यूनेस्को जैसे नाम पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। सं.रा.संघ की महासभा के महासचिव का चुनाव सभी सदस्यों के मतदान से होता है। सुरक्षा परिषद में भी बारी - बारी से सामान्य सदस्य निर्वाचित होते हैं लेकिन पांच स्थायी सदस्यों को प्राप्त वीटो नामक अधिकार के कारण उनका होना न होना बराबर है क्योंकि इनमें से एक भी किसी फैसले को रोक सकता है। यही कारण है कि यह विश्व संस्था इन पांच सदस्य देशों के हाथ की कठपुतली बनकर रह गई है। ताजा उदाहरण इज़राइल - हमास, रूस - यूक्रेन और अमेरिका - इसराइल की ईरान के साथ चल रही जंग में सं.रा.संघ की उदासीन भूमिका है। युद्ध में विस्थापित हुए लोगों की सहायता करने में जरूर उसकी सक्रियता दिखाई दी लेकिन युद्धरत देशों के बीच सुलह करवाकर शांति स्थापना के अपने दायित्व के निर्वहन में वह पूरी तरह असफल रहा है। सबसे बड़ी विडंबना ये है कि उसने इस दिशा में समुचित प्रयास किए हों ऐसा भी नहीं लगता। इसके पीछे जाहिर तौर पर सुरक्षा परिषद के वीटो शक्ति सम्पन्न देशों का ही दबाव है जो अपने स्वार्थ के लिए पूरी दुनिया को आग में झोंकने में संकोच नहीं करते। इसराइल और हमास के बीच छिड़ी जंग में अमेरिका और उसके साथी पश्चिमी देश जहां इसराइल के साथ खड़े रहे वहीं रूस और चीन ने भले ही प्रत्यक्ष रूप से हमास का समर्थन न किया हो किंतु उनके द्वारा इजराइल का विरोध भी एक तरह से हमास के प्रति उनका झुकाव दर्शाता है। रूस और यूक्रेन की लड़ाई में अमेरिका , ब्रिटेन और फ्रांस मिलकर भी रूस को झुका नहीं सके क्योंकि सुरक्षा परिषद में वीटो नामक हथियार होने से वह अकेला ही सब पर भारी है। हालांकि चीन भी उसके पीछे ही खड़ा हुआ है। वर्तमान  में ईरान की अमेरिका और इसराइल के साथ हो रही जंग ने पूरी दुनिया को हलाकान कर रखा है। तेल उत्पादक देशों के इसमें शामिल हो जाने के कारण पूरे विश्व में पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और उर्वरक का संकट उत्पन्न हो गया है। कोरोना संकट से किसी तरह उबरी दुनिया उक्त तीन युद्धों के कारण अभूतपूर्व मुसीबत में फंसी हुई है। शांति के प्रस्ताव फटे हुए कागज के टुकड़ों की तरह उड़ते देखे जा सकते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प मोहल्ले के गुंडे की तरह व्यवहार करने पर आमादा हैं। लेकिन कोई उन्हें रोकने - टोकने वाला नहीं है। वे एक पल युद्ध समाप्त होने की बात करते और दूसरे ही पल ज़ोरदार हमले की धमकी देते हैं। कहने को ये लड़ाई कुछ देशों तक सीमित है लेकिन इसके कारण पैदा हुए ऊर्जा संकट ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है। इसीलिए ये अपेक्षा की जाती है कि सं.रा.संघ आगे आकर इसे रुकवाने और स्थायी शांति के लिए अपने प्रभाव का उपयोग करेगा किंतु शांति के लिए जो प्रयास चल रहे हैं उनमें उसकी कोई भूमिका नहीं होने से युद्ध की आग बुझने का नाम नहीं ले रही। उल्लेखनीय है ट्रम्प ने सत्ता में लौटते ही सं.रा.संघ की उपयोगिता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। केवल वे ही नहीं रूस के राष्ट्रपति पुतिन और चीन के  जिनपिंग भी अपनी स्वेच्छाचारिता के लिए कुख्यात हैं किंतु सं.रा.संघ में उन्हें रोकने तो क्या उनसे बात करने तक साहस नहीं बचा। एक समय था जब इस विश्व संस्था के महासचिव को पूरी दुनिया जानती थी किंतु अब तो वे खबरों से ही गायब होते जा रहे हैं। सं.रा.संघ के इसी निकम्मेपन के कारण दुनिया विनाश के कगार पर आ खड़ी हुई है। ऐसे में ट्रम्प की देखा सीखी अन्य देशों के नेता भी इसकी निरर्थकता का रोना रोने लग जाएं तो आश्चर्य होगा। कभी - कभी तो लगता है कि सं.रा.संघ जीते जी ही इतिहास बनने के कगार पर है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी