आजादी के बाद दलित राजनीति के सबसे बड़े चेहरे और बसपा के संस्थापक स्व. कांशीराम की जयंती के दो दिन पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा उनकी प्रशंसा के पीछे उनके प्रति श्रद्धा नहीं अपितु आगामी वर्ष उ.प्र विधानसभा के चुनाव में दलित वोट बैंक को दोबारा हासिल करना है जो कभी कांग्रेस की ताकत था। हालांकि कांशीराम थे पंजाब के लेकिन उन्होंने भांप लिया था कि उ.प्र में जड़ें जमाये बिना बसपा राष्ट्रीय राजनीति में जगह नहीं बना सकेगी और इसीलिए उन्होंने जाटव समाज की एक युवती मायावती को चुना। उ.प्र की होने से दलित वर्ग में उनकी स्वीकार्यता बढ़ती गई और बैसाखियों के सहारे मुख्यमंत्री बनने वाली मायावती ने 2007 में स्पष्ट बहुमत हासिल कर सबको चौंका दिया। हालांकि वह दौर पांच साल में ढलान पर आ गया। आज उनकी पार्टी का एक भी सांसद नहीं है वहीं उ.प्र में मात्र एक विधायक। वे खुद भी सांसद या विधायक नहीं हैं। बीते कुछ चुनावों में पूरे दलित समुदाय की नेता होने के बजाय मायावती अपने सजातीय वर्ग तक ही सिमट गईं । हाल ही में उन्होंने लखनऊ में एक विशाल रैली का आयोजन कर अपना प्रभाव पुनर्स्थापित करने का प्रयास भी किया था। लेकिन उ.प्र में उनकी वापसी की संभावना न के बराबर है । अब सवाल ये है कि राहुल गांधी के मन में कांशीराम के प्रति प्यार क्यों उमड़ पड़ा और उन्हें भारत रत्न देने की मांग कांग्रेस की ओर से उछलने लगी। राजनेताओं की हर बात के पीछे कहीं न कहीं चुनाव होता है। राहुल ने भी कांशीराम की वंदना इसीलिए की। लेकिन वे यह भी बोल गए कि कांग्रेस में कमियां थीं, इसलिए कांशीराम सफल हुए। अगर कांग्रेस अपना काम करती तो कांशीराम सफल नहीं हो पाते। एक और चौंकाने वाली बात उन्होंने ये कही कि अगर भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू जीवित रहे होते तो कांशीराम कांग्रेस की तरफ से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री होते। स्मरणीय हैं नेहरू जी 1964 में ही चल बसे थे जबकि कांशीराम 1978 में बामसेफ की स्थापना के साथ उभरे। 1984 में उन्होंने बसपा बनाई। श्री गांधी के मुताबिक भारत का संविधान महात्मा गांधी, डॉ.अंबेडकर और कांशीराम के विचारों पर आधारित था। उनकी ये बात इसलिए हास्यास्पद है क्योंकि जब देश आजाद हुआ उस समय कांशीराम महज 13 साल और संविधान लागू होते समय 16 वर्ष के थे। राहुल के कांशीराम प्रेम में भी विरोधाभास नजर आया। एक तरफ तो उन्होंने कहा कि कांग्रेस की कमियों के कारण वे सफल हुए । इसका मतलब यदि कांग्रेस में कमियां न होतीं तब वह कांशीराम को सफल नहीं होने देती। वहीं दूसरी तरफ ये शिगूफा छोड़ दिया कि नेहरू जी जीवित रहते तो वे कांशीराम को उ.प्र का मुख्यमंत्री बना देते। इस बात से ये सवाल उठ खड़ा होता है कि यदि कांग्रेस को बसपा नेता के प्रति यदि इतना लगाव था तब इंदिरा गांधी ने उन्हें उ.प्र का मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया? इस संदर्भ में याद रखने वाली बात ये है कि 1977 के चुनाव में जब अपने दौर के सबसे बड़े दलित नेता बाबू जगजीवन राम ने कांग्रेस छोड़ दी तब दलित राजनीति में एक खालीपन पैदा होने लगा। दरअसल उनके मन में प्रधानमंत्री न बन पाने की कसक थी जो जनता पार्टी में आने पर भी पूरी नहीं हो सकी। जब ये तय हो गया कि उनका राजनीतिक सफर समाप्त होने को है तभी 1978 में कांशीराम द्वारा बसपा का गठन कर दलित राजनीति को उसका अपना मंच दिया। सवाल ये है कि कांग्रेस ने युवा कांशीराम को अपने साथ क्यों नहीं जोड़ा ?कल लखनऊ में श्री गांधी ने कांशीराम को महात्मा गांधी और डॉ. अंबेडकर के समकक्ष रखते हुए कहा कि दोनों ने कभी समझौता नहीं किया। लेकिन इतिहास गवाह है कि अंबेडकर जी की राजनीतिक दुर्गति करने में कांग्रेस कभी पीछे नहीं रही। पहले उन्हें नेहरू मंत्रिमंडल से निकलने मजबूर किया गया और फिर लोकसभा के चुनाव में हरवा दिया। यहां तक कि उन्हें भारत रत्न देने से भी परहेज किया गया। 1990 में गैर कांग्रेसी सरकार ने ये काम किया। ऐसे में श्री गांधी का ये कहना गले नहीं उतरता कि नेहरू जी जीवित रहते तो कांशीराम को उ.प्र का मुख्यमंत्री बना देते। कांग्रेस द्वारा उन्हें भारत रत्न दिये जाने की मांग उठाना भी अटपटा है क्योंकि उनके जीवनकाल में पार्टी ने उनको कभी महत्व नहीं दिया। बहरहाल , श्री गांधी की ये स्वीकृति सच्चाई के काफी करीब है कि कांग्रेस की कमियों के कारण ही कांशीराम आगे बढ़ सके। लेकिन उन्हें ये भी बताना भी चाहिए कि कांग्रेस में कमियों के लिए कौन जिम्मेदार है क्योंकि पार्टी पर नेहरू - गांधी परिवार का एकछत्र आधिपत्य आज तक बना हुआ है। सही बात तो ये है कि कांग्रेस की कमियों के चलते ही न सिर्फ दलित बल्कि पिछड़े भी उससे दूर हो गए। और ऐसा कहीं से भी नहीं लग रहा कि पार्टी अपनी कमियों को दूर कर गलतियों से सीखने को तैयार है।
- रवीन्द्र वाजपेयी