Thursday, 12 February 2026

सांसदों की भीड़ में सर्वमान्य नेताओं का अभाव


ऐसा लगता है कि संसद के बजट सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव बढ़ता ही जाएगा । परिणामस्वरुप सार्थक चर्चा के बजाय आरोप - प्रत्यारोप  होते रहेंगे और इसी दौरान बजट पारित भी हो जाएगा। वैसे भी राहुल गांधी के आक्रामक भाषण और वित्तमंत्री के तीखे जवाब के बाद बहस में कोई आकर्षण नहीं रहा। सौभाग्य से राज्यसभा अपेक्षाकृत शांत है जहां चर्चा कुछ बेहतर तरीके से हो रही है। अब तक दोनों सदनों में जितने भी सांसदों ने बजट पर  विचार रखे उनमें सबसे सुलझा हुआ भाषण राज्यसभा में आम पार्टी के सदस्य राघव चड्ढा ने दिया जो पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट भी हैं। उन्होंने बजट के कुछ प्रावधानों की प्रशंसा की तो कुछ की आलोचना भी। लेकिन एक जिम्मेदार सांसद की तरह वित्तमंत्री को अनेक उपयोगी सुझाव भी दिए। उस दौरान निर्मला सीतारमण बड़े ध्यान से उन्हें सुनती रहीं। बेहतर हो जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में वित्तमंत्री द्वारा बजट पर हुई  बहस के जवाब में दिए भाषण की प्रशंसा की ठीक वैसे ही उन्हें श्री राघव की तारीफ भी करनी चाहिए जिन्होंने विपक्ष में रहते हुए भी उत्तेजना फैलाने की बजाय उच्च सदन का सदस्य होने की पात्रता प्रमाणित की। बहरहाल लोकसभा में जो टकराव है उससे अप्रिय स्थितियां उत्पन्न होने की आशंका बढ़ रही है। कांग्रेस द्वारा लोकसभाध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव तो रखवा दिया गया किंतु तृणमूल कांग्रेस के साथ न आने से उसकी वजनदारी कम हो गई। कांग्रेस की चिंता ये है कि  प्रस्ताव धराशायी होने के बाद वह अध्यक्ष को लेकर क्या करेगी? दूसरी तरफ नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार गलतियां करते जा रहे हैं। बजट पर बोलते हुए भारत माँ को बेचने जैसी हल्की बात बोलकर उन्होंने मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को गद्दार बोलने वाली गलती दोहरा दी। इसके अलावा अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में एपस्टीन फाइल का जो जिक्र किया वह भी अवांछित और अप्रासंगिक था। व्यापार समझौते का जितना भी विवरण सार्वजानिक हुआ उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे भारत के झुकने का संकेत हो। उल्टे अमेरिका ने कुछ बातों पर स्पष्टीकरण देकर विपक्ष द्वारा उठाई जा रही शंकाओं का समाधान कर दिया। सदन के बाहर संसद के परिसर में  प्रदर्शित वह बैनर भी संसदीय मर्यादा के विरुद्ध है जिसमें प्रधानमंत्री मोदी को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सामने घुटना टेककर बैठा दिखाया गया है। श्री गांधी के भाषण के कुछ अंशों पर सत्ता पक्ष ने विशेषाधिकार हनन कार्रवाई  की जो घोषणा की है वह निश्चित तौर पर पलटवार ही है । इसी तरह पूर्व थल सेनाध्यक्ष नरवणे की कथित अप्रकाशित पुस्तक की प्रति का प्रदर्शन करने के कारण कानून का शिकंजा नेता प्रतिपक्ष के इर्द -गिर्द कसता जा रहा है। इस मुकाबले में कौन विजेता होकर निकलेगा वह उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना ये कि संसदीय प्रणाली की गरिमा बचेगी या नहीं? सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव नई बात नहीं। संसद के भीतर गर्मागर्मी भी होती रही है । लेकिन मौजूदा माहौल  वैचारिक विरोध से आगे बढ़कर शत्रुता का एहसास करवा रहा है। प्रधानमंत्री के प्रति राहुल जिस तरह की टिप्पणियां करते हैं वह उनकी अपरिपक्वता का परिचायक है। वहीं सत्ता पक्ष भी श्री गांधी की जरूरत से ज्यादा घेराबंदी करता है। बेहतर हो उनको भी अन्य विपक्षी नेताओं जितना ही महत्व दिया जाए । यद्यपि संसदीय प्रणाली में नेता प्रतिपक्ष का पद बेहद महत्वपूर्ण होता है और उसे भविष्य का  संभावित प्रधानमंत्री माना जाता है। साठ के दशक में पहली बार सांसद बने अटलबिहारी वाजपेयी के भाषण सुनकर पं.जवाहर लाल नेहरू ने उनमें भविष्य का प्रधानमंत्री देख लिया था। 1977 तक संसद में कांग्रेस का इकतरफा दबदबा हुआ करता था। लेकिन तब  विपक्ष की कम संख्या के बाद भी अनेक ऐसे सदस्य होते थे जो अपनी प्रतिभा और संसदीय ज्ञान के बल पर सरकार को झुका देते थे। लेकिन उनके और सत्ता पक्ष के बीच वैसी कटुता नजर नहीं आती थी जो आज स्थायी रूप ले चुकी है। दुर्भाग्य से  सैकड़ों सांसदों के बीच ऐसे नेताओं का अभाव हो गया है जो इस तरह के विवाद में दोनों पक्षों के बीच सुलह करवा सकें। और  जो हैं भी वे अपना सम्मान बचाए फिरते हैं। कुल मिलाकर संसद की  छवि जनमानस में लगातार गिरती जा रही है जो लोकतंत्र के लिए अशुभ संकेत है। राहुल गांधी सहित विपक्ष के अन्य नेताओं को ये ध्यान रखना चाहिए कि संसद के न चलने से सरकार को तो खास फर्क नहीं पड़ता परन्तु विपक्ष में बैठे सांसद अपनी बात रखने से वंचित हो जाते हैं। और ये भी कि श्री गांधी के नेता प्रतिपक्ष बन जाने के बाद कांग्रेस हरियाणा, महाराष्ट्र , दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनाव में चारों खाने चित्त हो चुकी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 11 February 2026

अविश्वास प्रस्ताव पर तृणमूल की दूरी से विपक्षी एकता खतरे में


लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध  अविश्वास प्रस्ताव पर तृणमूल कांग्रेस ने हस्ताक्षर नहीं किए। पार्टी के अनुसार वह पहले विपक्ष की सभी मांगों को देखने के बाद ही इसकी समर्थन पर फैसला करेगी। लेकिन पार्टी का ये कहना उसके रुख का संकेत है कि अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव अंतिम हथियार होता है । इससे लगता है तृणमूल मतदान के समय अनुपस्थित रह सकती है। हालांकि राहुल गांधी को सदन में बोलने नहीं देने के विरोध में विपक्ष द्वारा उठाए गए कदमों में पार्टी साथ रही। जिन 8 सदस्यों को निलंबित किया गया उनमें तृणमूल के कल्याण बैनर्जी भी हैं। सदन के बाहर धरने में भी तृणमूल सांसद नजर आए। सदन के भीतर अध्यक्ष  और सरकार के विरोध में पार्टी सांसद मुखर रहे हैं। बावजूद उसके अविश्वास प्रस्ताव पर उसका पीछे हटना इंडिया गठबंधन में बढ़ रही दरार का प्रमाण है। स्मरणीय है प. बंगाल विधानसभा  चुनाव में कांग्रेस ने  अकेले लड़ने का जो फैसला लिया उससे ममता बैनर्जी नाराज हैं। पिछले दो चुनावों में कांग्रेस का वामपंथी मोर्चे से गठबंधन  था। लेकिन इससे उसका अपना जनाधार खिसककर भाजपा में चला गया। 2021 के चुनाव में तो वह शून्य पर अटक गई। गत लोकसभा चुनाव में भी ममता ने कांग्रेस को घास नहीं डाली जिससे लोकसभा में कांग्रेस  दल के नेता अधीर रंजन चौधरी तक चुनाव हार गए। उसके बाद  कांग्रेस को लगा कि वामपंथियों के साथ लड़ने से उसका परम्परागत मतदाता नाराज है क्योंकि वामपंथी सत्ता की डरावनी यादें आज भी ताजा हैं। कांग्रेस द्वारा वाम मोर्चे का दामन थामने से हिन्दू समाज विशेष तौर पर सवर्णों का  वोट बैंक खिसककर भाजपा की झोली में जा गिरा। इसके अलावा मुस्लिम मतदाता भी  कांग्रेस की कमजोर स्थिति देख तृणमूल की शरण में चले गए। ऐसे में जब कांग्रेस  एकला चलो की नीति पर लौटी तो तृणमूल के कान खड़े हुए। हालांकि प.बंगाल में इंडिया गठबंधन में दरार के लिए ममता ही जिम्मेवार हैं जो  अपना एकाधिकार बनाए रखने के लिए किसी अन्य पार्टी को आगे नहीं बढ़ने देना चाहतीं। राष्ट्रीय स्तर पर भले ही वे भाजपा के विरुद्ध कांग्रेस के साथ हों किंतु प. बंगाल में  कांग्रेस को  उभरने का अवसर नहीं देना चाहतीं। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर भी वे पसंद नहीं  करतीं। ऐसे में श्री बिरला के विरुद्ध कांग्रेस की पहल पर लाए गए अविश्वास प्रस्ताव से दूरी बनाकर ममता ने  आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को किनारे लगाने का इरादा स्पष्ट कर दिया । वैसे भी बीते वर्षों में अनेक अवसर आए जब संसद में तृणमूल ने एन वक्त पर कांग्रेस द्वारा सरकार के विरुद्ध शुरू की गई मुहिम को पलीता लगा दिया। अडानी समूह संबंधी विवाद को लेकर जेपीसी के गठन की मांग का भी तृणमूल कांग्रेस ने विरोध किया था। दरअसल ममता बैनर्जी को ये लगता है कि कांग्रेस के मजबूत होने से राहुल गांधी की संभावनाएं प्रबल होंगी जो उनकी महत्वाकांक्षाओं की राह में बाधा बनेगी। इसीलिए वे समय - समय पर कांग्रेस को झटका देती रही हैं। गोवा विधानसभा के पिछले चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारकर उन्होंने कांग्रेस के लिए खाई खोद दी। इसी तरह दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को समर्थन देकर कांग्रेस को शून्य से आगे नहीं बढ़ने दिया। वैसे भी लोकसभा चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन की एकजुटता बनी नहीं रह सकी।  संसद के भीतर भी विपक्ष की साझा रणनीति नहीं दिखाई देती। बिहार विधानसभा के चुनाव में  करारी हार के बाद राहुल की  राजनीतिक समझ पर कांग्रेस के भीतर से ही सवाल उठने लगे हैं। बिहार के जमीनी मुद्दों से इतर वे वोट चोरी की रट ही लगाए रहे। संसद के सत्रों में भी वे कोई न कोई विवाद खड़ा कर देते हैं जिससे वे तो चर्चा में आ जाते हैं किंतु शेष विपक्ष को अपनी बात रखने का अवसर ही नहीं मिलता। समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव भी राहुल की इस आदत से नाराज बताए जाते हैं। अंदरखाने की खबर तो ये भी है कि तमिलनाडु में द्रमुक भी आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को झटका देने की सोच रही है। उधर केरल में कांग्रेस की चुनौती के चलते वामपंथी पार्टियां भी उससे दूरी बना रही हैं। याद रहे वायनाड में पहले भी राहुल और  प्रियंका वाड्रा के लड़ने का वामपंथियों ने काफी विरोध किया था। इस प्रकार ये स्पष्ट है कि राहुल गांधी की कार्यशैली के कारण इंडिया गठबंधन में पहले  जैसी कसावट नहीं रही। लोकसभाध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर तृणमूल द्वारा हस्ताक्षर नहीं करना साधारण बात नहीं है। इसके जरिए दरअसल ममता बैनर्जी ने कांग्रेस को ये संदेश दे दिया कि उनके भाजपा विरोध को कांग्रेस का समर्थन समझने की भूल न करे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 10 February 2026

बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम कटने से भयभीत हैं ममता


प. बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एस. आई. आर) को रोकने के आखिरी प्रयास में भी राज्य की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी  विफल रहीं। सर्वोच्च न्यायालय में दिग्गज वकीलों के साथ ही वे खुद भी पैरवी करने उतरीं और  उक्त प्रक्रिया को रुकवाना  चाहा किंतु उनकी दलीलें काम नहीं आईं।  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पुनरीक्षण रोकने से इंकार के बाद अब सुश्री बैनर्जी के पास  एस आई.आर में रोड़ा अटकाने के अवसर खत्म हो चुके हैं। गत  दिवस न्यायालय ने साफ शब्दों में  कहा कि  एस.आई.आर  जारी  रहेगी और  इस संवैधानिक काम में किसी की भी दखलअंदाजी बर्दाश्त नहीं होगी।  राज्य सरकार को ये आदेश भी दिया कि वह  आयोग की मदद के लिए 8 हजार  से अधिक अधिकारी तुरंत मुहैया कराए। इसके अलावा अदालत ने नामों में गलती वाले मतदाताओं को राहत देते  हुए कहा वे 14 फरवरी के एक हफ्ते बाद तक अपने कागजात दिखा सकेंगे। आयोग की इस शिकायत पर कि बंगाल में उनके अधिकारियों को काम करने से रोका जा रहा है और कुछ जगहों पर तो नोटिस तक जला दिया गया, सर्वोच्च ने नाराज  होकर कहा कि संविधान पूरे देश के लिए एक है और किसी को भी सरकारी काम में बाधा डालने की अनुमति नहीं है। इस प्रकार जैसे बिहार में विपक्षी दलों द्वारा ऐड़ी - चोटी का जोर लगाए जाने के बाद भी मतदाता सूचियों  पुनरीक्षण नहीं रुका वही स्थिति  बंगाल में भी बन गई । ममता ने तो बिहार में एस. आई. आर शुरू होते ही अपने राज्य में उसे रोकने की घोषणा जोर - शोर से की थी। राज्य के जिन शासकीय कर्मचारियों को चुनाव आयोग ने  पुनरीक्षण का काम दिया उनको भी असहयोग हेतु भड़काया गया। काम के बोझ से बी. एल. ओ की मौत का भी खूब प्रचार किया गया। छोटी - छोटी बातों को लेकर उच्च और सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे खटखटाए गए। लेकिन  सारी कोशिशें व्यर्थ साबित हुईं।  उल्लेखनीय है बिहार के बाद  पुनरीक्षण का काम अनेक राज्यों में शुरू हुआ लेकिन वहां प. बंगाल जैसी हाय - तौबा देखने नहीं मिली । ममता को इस बात का डर सता रहा है कि  उनकी सबसे बड़ी बैसाखी कहलाने वाले जिन मुसलमानों के नाम बड़ी संख्या में काटे गए उनमें बांग्लादेशी घुसपैठियों की भी अधिकता है जो इस प्रक्रिया के शुरू होते ही  गायब हो गए।  ऐसे लाखों मतदाताओं ने आयोग के नोटिसों का जवाब भी नहीं दिया। ममता के डर का एक कारण ये भी है कि 30 फीसदी से भी अधिक मुस्लिम मतदाताओं के एकमुश्त समर्थन की गारंटी नहीं रही। कांग्रेस और वाममोर्चा इस बार अलग - अलग लड़ेंगे । जाहिर है वे भी मुस्लिम मतों में  सेंध लगाएंगे। लेकिन उनकी चिंता का सबसे बड़ा कारण असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एमआईएम के अलावा मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रखने वाले तृणमूल के बागी विधायक हुमायूं कबीर का मैदान में उतरना है। बिहार में ओवैसी की सफलता से ममता घबराहट में हैं। ऊपर से बाबरी मस्जिद के लिए मुस्लिम समुदाय जिस उत्साह के साथ हुमायूं कबीर के साथ जुड़ा उसने मुस्लिम मतों में बंटवारे की आशंका उत्पन्न कर दी। दूसरी तरफ घुसपैठियों को संरक्षण और मुसलमानों के जरूरत से ज्यादा संरक्षण के कारण हिन्दुओं में पहली बार ममता के विरुद्ध गोलबंद होने की संभावना बढ़ रही है। बांग्लादेश में बीते एक - डेढ़ साल से हिंदुओं पर मुस्लिम कट्टरपंथियों के अत्याचार की जो खबरें आ रही हैं उनके कारण भी हिंदुओं के बीच ये भावना तेजी से फैल रही है कि उन्हें अपने हितों का संरक्षण करने वाली सरकार चाहिए जिसकी गुंजाइश भाजपा में ही नजर आती है। हालांकि ममता की सत्ता को उखाड़ फेंकना भाजपा के लिए भी इतना आसान नहीं है क्योंकि जब तक उसे हिंदुओं के 70 - 75 फीसदी मत नहीं मिलते तब तक राइटर्स बिल्डिंग पर कब्जा नामुमकिन है। बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खाली हाथ लौटा दिए जाने के बाद ममता पर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ा है। भाजपा इसका कितना फायदा उठा सकेगी ये कहना फिलहाल मुश्किल है क्योंकि  ममता चुनाव की अधिकृत घोषणा के पहले ऐसी कोई चाल  चल सकती हैं जैसी बिहार में नीतीश सरकार ने महिलाओं के खाते में 10 हजार जमा करने के रूप में चली थी। हालांकि  एस. आई. आर की प्रक्रिया को रोकने के लिए उन्होंने जिस तरह से हाथ - पांव मारे वह  उन पर पराजयबोध के हावी होने का संकेत है। वरना विधानसभा में इतने विशाल बहुमत और 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा से काफी बेहतर प्रदर्शन के बाद भी वे मतदाता सूचियों से नाम काटे जाने से इतनी विचलित नहीं होतीं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 9 February 2026

अमेरिका से समझौते की प्रशंसा और आलोचना में जल्दबाजी से बचें


भारत - अमेरिका  व्यापार समझौते  का जो प्रारूप जारी हुआ उसके पक्ष और विपक्ष में विभिन्न प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। उद्योग और व्यापार जगत के ज्यादातर दिग्गजों ने उसको देशहित में बताते हुए सरकार को बधाई दी है। इसका प्रमाण शेयर बाजार में तेजी बने रहना है। आज ये खबर भी आ गई कि  समझौता की तारीख तक भारतीय निर्यातकों पर लगे अतिरिक्त टैरिफ के 40 हजार करोड़ रु. अमेरिका उन्हें लौटाएगा जो बड़ी राहत है। लेकिन दूसरी तरफ कतिपय किसान संगठन प्रचार कर रहे हैं कि  भारत के कृषि और डेरी उद्योग  की बलि चढ़ा दी गई। इसे लेकर राष्ट्रव्यापी आंदोलन की घोषणा भी की गई है। ऐसे में विपक्षी दल भला कहां चुप बैठते सो उन्होंने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के समक्ष झुकने वाला आरोप लगा दिया। किसानों और दुग्ध उत्पादकों को होने वाले नुकसान की बात किसान आंदोलन के अघोषित सलाहकार रहे योगेंद्र यादव सहित वह लॉबी भी कर रही है जो मोदी सरकार का विरोध करने के बहाने ढूंढ़ती रहती है। बहरहाल समझौते के विरोधियों ने अब तक जो मुद्दे उठाए उनमें आगामी 5 सालों में 500 अरब डॉलर का सामान खरीदना भी है। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा का कहना है कि भारत को अमेरिका से होने वाले आयात में ढाई गुना वृद्धि करना पड़ेगी जो फिलहाल 40 - 42 अरब डॉलर प्रतिवर्ष ही है। साथ ही कुछ फलों और पशु आहार के आयात की छूट पर भी उंगलियां उठ रही हैं। लेकिन प्रधानमंत्री और इस समझौते के  प्रमुख पात्र वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया कि सरकार  किसानों के हितों की रक्षा करने प्रतिबद्ध रही है। लेकिन सबसे सटीक स्पष्टीकरण कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दिया। उनके मुताबिक सोयाबीन, मक्का, चावल, गेहूं, चीनी, अनाज, पोल्ट्री, डेयरी उत्पाद, केला, स्ट्रॉबेरी, चेरी, खट्टे फल, हरी मटर, काबुली चना, मूंग, तिलहन, एथनॉल और तंबाकू जैसे उत्पादों पर अमेरिका को  कोई रियायत नहीं मिली। वहां  से दूध, पाउडर, क्रीम, दही, छाछ, मक्खन, घी, बटर ऑयल, पनीर और चीज जैसे किसी भी डेयरी उत्पाद का आयात करने पर भारत राजी नहीं हुआ। उन्होंने भारतीय मसालों को भी  खतरे से बाहर बताया। लेकिन कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा ने उक्त समझौते की ये कहते हुए आलोचना की है कि सरकार ने कुछ उत्पादों के आयात की अनुमति देकर भारत के कृषि उद्योग को नुकसान पहुंचाने का रास्ता खोल दिया है। चूंकि अभी तक समझौते का प्रारूप ही जारी हुआ है इसलिए समर्थन और विरोध में किए जा दावों और प्रतिदावों की पुष्टि  संभव नहीं है। मार्च में जब समझौते पर हस्ताक्षर होंगे तब ही ये बात सामने आ सकेगी कि प्रशंसक सही हैं या आलोचक ? ट्रम्प के इस दावे पर भी सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए कि भारत ने रूस से कच्चा तेल आयात करना बंद कर दिया जिसके कारण 25 प्रतिशत की पेनाल्टी  घटा दी गई। रूस ने तो इसका खंडन कर दिया किंतु भारत सरकार की कोई टिप्पणी अभी तक नहीं आई। यद्यपि पहले भी ट्रम्प इस तरह के शिगूफे छोड़ते रहे हैं किंतु भारत ने तेल खरीदना जारी रखा। अमेरिका सरकार के अनेक प्रवक्ताओं का साफ कहना है कि भारत ने रूस से तेल खरीदी नहीं रोकी तब 25 का  टैरिफ दोबारा थोप दिया जाएगा। ऐसे में समझौते के विस्तृत प्रारूप पर हस्ताक्षर होने  के पहले भारत  को इस मुद्दे पर अमेरिका से दो टूक बात कर लेना चाहिए। ये बात तो सही है कि कोई भी समझौता एकपक्षीय नहीं हो सकता। अमेरिका यदि भारत के साथ होने वाले व्यापार घाटे को कम करना चाह रहा है तो ये उसका अधिकार है। हर देश इस बारे में प्रयासरत रहता है। चूंकि अभी तक अमेरिका हमारा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा जो हमारे सामान पर शून्य टैरिफ लगाता था इसलिए 18 प्रतिशत का टैरिफ निश्चित रूप से भारी है। लेकिन उससे पूरी तरह कारोबारी रिश्ते तोड़ना अव्यवहारिक भी है और असम्भव भी । इसीलिए भारत ने  टैरिफ हमले के जवाब में अनेक देशों से मुक्त व्यापार संधि करते हुए विश्व व्यापार में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति का दांव चला। शुरू में तो ट्रम्प ने इसे हल्के में लिया किंतु जैसे ही यूरोपीय यूनियन से संधि हुई उनको चिंता सताने लगी जिसके बाद उन्होंने समझौता होने की घोषणा कर दी। यद्यपि गतिरोध खत्म होना तो खुशी की बात है किंतु अब कोई ऐसी मजबूरी नहीं है कि अमेरिका को वे रियायतें दी जाए जो  हमारे किसान ही क्यों  उद्योगपति और व्यापारी के हितों के भी विरुद्ध हों। सरकार लोगों की नाराजगी से बचने के लिए किसी बात पर अभी पर्दा डाल भी दे किंतु जब समझौता अपने विस्तृत रूप में सामने आएगा तब तो सब स्पष्ट होगा ही। इसलिए बेहतर है सरकार पूरी ज़िम्मेदारी से ही समझौते संबंधी जानकारी दे क्योंकि सूचना क्रांति के इस युग में कुछ भी छिपा नहीं रह सकता। वैसे आलोचकों को भी जल्दबाजी से बचना चाहिए।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 7 February 2026

हमारी निजता धड़ल्ले से बिक रही और हमें पता ही नहीं



सर्वोच्च न्यायालय ने व्हाट्स एप को लोगों की निजता का उल्लंघन करने के लिए डांट पिलाई है। सोशल मीडिया के इस मंच से करोड़ों भारतीय भी जुड़े हैं । निःशुल्क सेवा देने वाले व्हाट्स एप की कमाई उसका उपयोग करने वालों के डेटा ( निजी विवरण) के व्यावसायिक उपयोग से होता है। हालांकि केवल व्हाट्स एप ही नहीं बल्कि सोशल मीडिया के किसी भी प्लेटफार्म अथवा इंटरनेट का उपयोग करने वाले की व्यक्तिगत जानकारी मार्केटिंग कंपनियों को बेचकर ये सब अनाप - शनाप धन कमाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय सहित अन्य नियामक एजेंसियां इस बारे में काफी सख्ती दिखाती रही हैं । मोटे जुर्माने भी लगाए गए किंतु डेटा बेचने का गोरखधंधा बेरोकटोक जारी है। दावा तो यहां तक होता है कि मोबाइल फोन पर की जाने वाली कोई बातचीत गोपनीय नहीं रहती। मोबाइल धारक किस समय किस स्थान पर है इसकी जानकारी भी आसानी से लग जाती है। इसी की मदद से अपराधी भी पकड़े जाते हैं। मोबाइल फोन पर बातचीत रिकॉर्ड करने की सुविधा के कारण ही अनेक व्यक्ति व्हाट्स एप पर बातचीत करते हैं। लेकिन ये बात बिना संकोच कही जा सकती है कि मोबाइल और इंटरनेट का उपयोग करने वाले की निजता में खुलेआम डाका डाला जा रहा है जिसको रोकना न तो सरकार के बस में है और न ही न्यायपालिका के। यही वजह है कि अतीत में उठाए गए सख्त कदम बेअसर होकर रह गए। सही बात तो ये है कि जब से दुनिया एक बाजार बन गई है तब से उसमें रहने वाले हर व्यक्ति को उपभोक्ता मान लिया गया है। व्यापार करने वालों का जाल इतना घना है कि कितना भी सतर्क रहें उसमें फंसने से नहीं बचा जा सकता। मसलन एक व्यक्ति जैसे ही कहीं जाने के लिए रेल या हवाई जहाज की टिकिट आरक्षित करता है त्योंही उसके गंतव्य वाली जगह के होटल और टैक्सी वालों के संदेश मोबाइल पर आने लग जाते हैं। इसी तरह जैसे ही कोई व्यक्ति पर्यटन की योजना बनाने हेतु गूगल पर सर्च करता है त्योंही उसके पास तत्संबंधी संदेश आने लगते हैं । लगभग हर व्यक्ति के मोबाइल पर दिन पर प्रॉपर्टी बेचने वालों के फोन के अलावा निवेश योजनाओं के बारे में अनजान नंबरों से संपर्क किया जाना आम बात है। इसके अलावा कर्ज देने वाली संस्थाओं के अवांछित फोन भी परेशान करते हैं। यदि आप आरक्षित टिकिट पर रेल यात्रा कर रहे हैं तब गाड़ी चलते ही आपको रास्ते में भोजन सेवा उपलब्ध करवाने वालों के संदेश आने लगते हैं। एक कार के बारे में गूगल पर जानकारी एकत्र करने पर दूसरी कंपनियां भी आपको अपनी कार खरीदने के लिए संपर्क करने लगती हैं। गला काट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में बाजार का उपभोक्ता तक पहुंचना अटपटा नहीं है । लेकिन इसके अतिरेक से होने वाली परेशानी भी कम नहीं है। सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले व्यक्ति की निजी रुचि के अलावा उसकी राजनीतिक विचारधारा तक का आकलन फेसबुक और एक्स पर उसकी गतिविधियों से कर लिया जाता है। इस डेटा का उपयोग चुनाव के समय प्रत्याशी और राजनीतिक पार्टियां भी करती हैं। इस सबसे स्पष्ट है कि डेटा विश्वव्यापी कारोबार बन चुका है जिसके चलते हर खास और आम के बारे में समूची जानकारी की खरीद - बिक्री होती है। हालांकि उसका उपयोग केवल व्यापारिक उद्देश्यों तक सीमित न होकर सरकारी योजनाओं के सर्वेक्षण हेतु भी होता है। लेकिन चिंता का विषय ये है कि जिस तरह आधार कार्ड और पैन कार्ड से किसी भी व्यक्ति के बारे में सारी जानकारी सरकारी एजेंसियां पता कर सकती हैं ठीक वैसे ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के उपयोगकर्ताओं की समूची जानकारी उसके संचालकों की अनुमति के बिना सहज रूप से बिना कुछ किए मिल जाती है जिसको बेचकर अकूत दौलत कमाई जाती है। इसीलिए किसी देश या व्यावसायिक प्रतिष्ठान की मजबूती उसके पास उपलब्ध डेटा से तय होती है। सर्वोच्च न्यायालय ने व्हाट्स एप पर जो चाबुक चलाया उसका कितना असर होगा ये कहना कठिन है किंतु किसी व्यक्ति की निजता का सौदा उसकी जानकारी और मर्जी के बिना होना अनैतिक भी है और खतरनाक भी। सबसे ज़्यादा चिंता इस बात की है कि सोशल मीडिया और इंटरनेट का पूरा नियंत्रण अमेरिका के चंद धनकुबेरों के हाथ में है। जिसके कारण ये डर बना रहता है कि कहीं उनकी कमान भी डोनाल्ड ट्रम्प जैसे सनकी के हाथ आ गई तब जो होगा उसकी कल्पना भी डराती है।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 6 February 2026

संसद केवल भाजपा और कांग्रेस की नहीं: अन्य सांसदों को भी बोलने का अधिकार


संसद में हंगामा जारी है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव संबंधी अपने भाषण में पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक के अंश पढ़े जाने पर उत्पन्न विवाद बढ़ता चला गया। आसंदी पर  कागज फेंकने वाले कुछ विपक्षी सांसद पूरे  सत्र के लिए निलंबित भी किए गए। इसके विरोध में विपक्ष की कतिपय महिला सांसदों द्वारा प्रधानमंत्री के आसन को घेरने के बाद किसी अप्रिय घटना की आशंका के चलते अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अभिभाषण पर हुई बहस का उत्तर देने से रोक दिया। और फिर लोकसभा ने बिना उनका जवाब सुने ही धन्यवाद प्रस्ताव का अनुमोदन कर दिया। हालांकि प्रधानमंत्री ने गत दिवस राज्यसभा में 95 मिनिट के लंबे भाषण में विपक्ष पर तीखे हमले करते हुए अपनी सरकार की उपलब्धियों का बखान किया परंतु लोकसभा में अन्य विपक्षी दलों के नेता भी इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने से वंचित रह गए क्योंकि कांग्रेस ने सदन को बाधित करने की अपनी रणनीति जारी रखी। हालांकि बाकी विपक्ष भी ऊपरी तौर पर तो श्री गांधी की हां में हां मिलाता रहा किंतु निजी चर्चा में अनेक सांसदों ने इस बाद पर नाराजगी जताई कि राहुल लगभग प्रत्येक सत्र में कोई न कोई विवाद उत्पन्न कर सदन चलने नहीं देते जिसके कारण दूसरे विपक्षी दलों के सांसदों को  अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिल पाता। राहुल की बहिन प्रियंका वाड्रा का कहना है कि सदन चलाना सरकार की ज़िम्मेदारी है । अर्थात विपक्ष जो भी करे उसकी छूट उसे दी जाती रहे। लेकिन आजाद समाज पार्टी सांसद चंद्रशेखर आजाद ने विपक्ष को भी उसका दायित्व याद दिलाते हुए कहा कि हंगामे से अन्य दलों के सांसद अपने क्षेत्र के मुद्दे नहीं उठा पाते। हालांकि ये न तो पहला सत्र है जो हंगामे के कारण बाधित है और न ही आखिरी क्योंकि आजकल संसद और विधानसभाओं के सत्र केवल संवैधानिक बाध्यताओं के कारण ही होते हैं। उनमें गंभीर बहस होने के बजाय आपसी आरोप - प्रत्यारोप में समय खराब किया जाता है। बजट जैसे अति महत्वपूर्ण विषय पर भी कई बार चर्चा नहीं होती । राष्ट्रपति के अभिभाषण पर कांग्रेस के अलावा अन्य दलों के सांसद भी बोलना चाहते होंगे लेकिन हंगामे के कारण सदन स्थगित होता रहा। आज भी यही हुआ जिसके बाद लोकसभा सोमवार तक स्थगित कर दी गई जबकि विषय सूची के अनुसार अनेक सांसदों द्वारा पेश किए गैर सरकारी विधेयकों पर चर्चा होना थी। यदि यही हाल रहा तो बड़ी  बात नहीं बजट भी इसी तरह स्वीकृत हो जाएगा। अब सवाल ये है कि क्या संसद केवल भाजपा और कांग्रेस की है? ये बात इसलिए उठ खड़ी हुई क्योंकि जबसे राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष बने तभी से वे खुद को चर्चा में रखने के लिए हर सत्र में ऐसा कुछ कर बैठते हैं जिससे सत्ता पक्ष उत्तेजित होता है और सदन चल नहीं पाता। ऐसे  में श्री गांधी तो खबरों में आ जाते हैं लेकिन बाकी दलों के ही नहीं बल्कि उनकी अपनी पार्टी के सांसदों का समय बर्बाद होता है। जहां तक सत्तारूढ़ भाजपा का प्रश्न है तो उसे भी ये स्थिति रास आती है क्योंकि सरकार जिस विधेयक या प्रस्ताव को पारित करवाना चाहती है वह बिना बहस के ही स्वीकृत हो जाता है। आने वाले कुछ महीनों में देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। उनमें से चुनकर आए लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य इस सत्र में वहां के मुद्दे उठाकर राजनीतिक लाभ लेना चाहते होंगे किंतु यदि आगे भी सदन नहीं चला तब उनके पास सिवाय हाजरी लगाकर दैनिक भत्ता पकाने के और कोई रास्ता नहीं बचेगा। राहुल गांधी और सत्ता पक्ष के टकराव में सपा , द्रमुक और तृणमूल कांग्रेस जैसे बड़े दलों के  सांसदों की सदन में  उपस्थिति भी चेहरा दिखाने तक सीमित है। बेहतर होता इनके जो नेता हैं वे कांग्रेस और भाजपा दोनों पर दबाव बनाते हुए  कहते कि उनकी खींचतान में बाकी दलों के सांसदों से बोलने का अवसर छीन लिया जाता है। सरकार और मुख्य विपक्षी दल जाहिर तौर पर सदन में प्रभावी और विशेषाधिकार सम्पन्न  हैं किंतु उनकी  रस्सा कशी में छोटे - छोटे दलों के सांसद सदन में बैठकर भी दर्शक बने रहते हैं। भारत की संसदीय प्रणाली बहुदलीय है। यहां तक कि निर्दलीय सांसद तक जीतकर आते हैं। ऐसे में सदन की कार्रवाई में सभी को भाग लेने का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन मौजूदा स्थिति में ऐसा होता प्रतीत नहीं होता। लोकसभा के अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को चाहिए कि वे ऐसी व्यवस्था करें जिससे सदन बड़ी पार्टियों के शिकंजे से बाहर निकले और कुछ नामचीन चेहरे लोकतंत्र के मंदिर के मठाधीश न बन सकें।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 5 February 2026

बिट्टू को बड़ा नेता बना दिया राहुल ने


पार्टी छोड़कर गए नेता को दल बदलू कहना आम बात है। आजादी के बाद से अब तक हजारों दलबदल हो चुके हैं। इक्का - दुक्का छोड़कर ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां कांग्रेस से अलग हुए नेताओं द्वारा ही बनाई गईं। शुरुआती दौर में दलबदल के पीछे वैचारिक मतभेद हुआ करते थे किंतु धीरे - धीरे निहित स्वार्थ और सत्ता का आकर्षण इसकी वजह बनने लगा। आपसी मतभेदों के कारण भी लोगों ने दल बदला और पार्टियां टूटीं। अनेक  क्षेत्रीय पार्टियां तो परिवार के सदस्यों के बीच हुई खींचतान के कारण बिखराव का शिकार हो गईं। ये भी देखने मिला कि पार्टी छोड़कर जाने वाला कुछ समय बाद वापस लौट आया।   पार्टी से बगावत कर नया दल बनाने वाले नेता के साथ भी गठबंधन किया गया। इन्हीं सब बातों के कारण राजनीति और राजनेताओं की प्रतिष्ठा में लगातार कमी आती चली गई। लेकिन नेताओं को इससे फर्क नहीं पड़ता। इसका उदाहरण गत दिवस संसद के प्रांगण में देखने मिला। प्रवेश द्वार पर कांग्रेस सांसद धरना दिए बैठे हुए थे जिनमें नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी थे। इसी दौरान केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को  आता देख श्री गांधी ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा मेरा गद्दार दोस्त आ रहा है और फिर उनसे हाथ मिलाना चाहा। लेकिन श्री बिट्टू ने हाथ नहीं मिलाया और उन्हें गद्दार कहे जाने के जवाब में नेता प्रतिपक्ष को देश का दुश्मन कहकर बढ़ गए। उसके बाद श्री गांधी खिसियाहट में बोलते रहे चिंता मत करो   गद्दार दोस्त तुम वापस आओगे। इस घटना का दृश्य पूरे देश ने देखा। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हुई किंतु कुछ प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कुछ नेताओं ने रोका वरना बिट्टू और राहुल में हाथापाई भी हो सकती थी। उल्लेखनीय है रवनीत पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. बेअंत सिंह के पोते हैं जिनके कार्यकाल में ही पंजाब में खालिस्तानी आतंकवादियों पर लगाम लगाई गई। लेकिन इसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी जब आतंकवादियों ने उनकी हत्या कर दी थी। रवनीत 2024 में कांग्रेस छोड़ भाजपा में आ गए थे। राहुल हमेशा अपनी दादी और पिता की हत्या का जिक्र करते हुए अपने परिवार के बलिदान का महिमामंडन करते हैं। संयोगवश वही विरासत रवनीत सिंह के पास भी है। इसीलिए उन्होंने  कांग्रेस पर सिखों के कत्लेआम जैसे आरोप लगाते हुए  उन्हें गद्दार कहे जाने को पंजाब और सिखों का अपमान बताते हुए पलटवार किया। इस विवाद के बाद ये सवाल उठ खड़ा हुआ कि यदि बिट्टू गद्दार हैं तब राहुल को सबसे पहले पप्पू कहने वाले नवजोत सिंह सिद्धू क्या हैं जो भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए और जिन्हें पंजाब में पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने अपनी लुटिया डुबो ली। और फिर श्री गांधी ने गद्दार कहते हुए बिट्टू की कांग्रेस में वापसी की जो उम्मीद जताई वह भी उनके बचपने का परिचायक है। भाजपा छोड़ कांग्रेस में आए शत्रुघ्न सिन्हा को राहुल ने बिहार में टिकिट दी। हारने के बाद वे तृणमूल कांग्रेस में जाकर सांसद बन गए किंतु उन्हें गद्दार कहने की हिम्मत श्री गांधी में नहीं हुई। स्मरणीय है म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के अनुज लक्ष्मण सिंह 2004 में सोनिया गांधी के विदेशी मूल का विरोध कर भाजपा में चले गए और सांसद बन गए। लेकिन पाँच साल बाद फिर कांग्रेस में लौटकर  विधायक बन गए। उन्हें किसी ने गद्दार नहीं कहा। सबसे बड़ा विरोधाभास तो ये है  कि जिन शरद पवार ने सोनिया जी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए कांग्रेस छोड़कर एनसीपी बनाई वे इंडिया गठबंधन के शीर्ष नेताओं में शुमार होते हैं और श्रीमती गांधी भी उनसे सलाह लेने में संकोच नहीं करतीं। ऐसे और भी अनेक उदाहरण हैं जिनमें दलबदल करने वाले नेता को दोबारा कांग्रेस ही नहीं अन्य पार्टियों ने भी गले लगाने में संकोच नहीं किया क्योंकि ऐसा करने में उन्हें राजनीतिक लाभ नजर आया। इसीलिए श्री गांधी द्वारा रवनीत सिंह बिट्टू के बारे में जो कहा वह राजनीतिक शालीनता के विरुद्ध तो था ही,  निजी तौर पर भी आपत्तिजनक है। राहुल की गिनती अब राष्ट्रीय स्तर के नेताओं में होती है जबकि रवनीत का राजनीतिक कद उनके मुकाबले बहुत छोटा है। ऐसे में यदि राहुल उनसे सौजन्यतावश हाथ मिलाते तो उसका अच्छा असर होता और उन्हें देश का दुश्मन होने जैसा तीखा जवाब नहीं सुनना पड़ता। दरअसल ऐसी ही गलतियों के कारण श्री गांधी की छवि गंभीर नेता की नहीं बन पा रही जिसका नुकसान उनकी पार्टी को उठाना पड़ता है।


- रवीन्द्र वाजपेयी