Tuesday, 4 August 2026

भाजपा के लिए चेतावनी भी और चुनौती भी



कल दोपहर से राजनीति में रुचि रखने वालों  का ध्यान तीन राज्यों में हुए विधानसभा उपचुनावों के परिणामों ओर केंद्रित हो गया। हालांकि गुजरात के  नतीजे को ज्यादा महत्व नहीं मिला जबकि भाजपा ने बड़े अंतर से उस सीट पर कब्जा बनाये रखा। लेकिन बिहार की बाँकीपुर और म.प्र की दतिया सीट के परिणामों ने सुबह से ही राजनीतिक नेताओं  के अलावा समाचार माध्यमों को भी व्यस्त कर दिया। इसका कारण दोनों जगहों पर भाजपा को पराजय मिलना बना। चूंकि  तीनों राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं इसलिये नतीजों का विश्लेषण उसी के इर्द - गिर्द घूम रहा है।  बीते कुछ महीनों से देश में भाजपा विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध में  मुहिम चलाई जा रही है इसीलिये  गुजरात में कांग्रेस की हार को चर्चा योग्य नहीं माना गया जबकि दतिया तथा बाँकीपुर में भाजपा की पराजय  सुर्खियां बटोर ले गई। ये स्वाभाविक भी था क्योंकि भले ही दतिया की सीट 2023 में भी कांग्रेस ने जीती थी किंतु  प्रदेश में बहुमत वाली सरकार और सभी  लोकसभा सीटों पर कब्जे के बाद भी दतिया में बड़ी हार भाजपा के लिए विचारणीय भी है और चिंतनीय भी। हालांकि शिवराज सिंह चौहान की सरकार के समय दमोह के  विधानसभा उपचुनाव में  भाजपा को इससे भी बड़ी हार देखने मिली थी। हुआ यूँ कि कांग्रेस विधायक ने भाजपा में आने पर त्यागपत्र दिया तब उपचुनाव में पार्टी ने उनको मैदान में उतार दिया। इससे दमोह के कद्दावर नेता जयंत मलैया नाराज हो गए और फिर वही सब हुआ जिसकी पुनरावृत्ति दतिया में देखने मिली। यद्यपि उसके बाद  2023 में भाजपा ने शिवराज के नेतृत्व में धमाकेदार जीत अर्जित कर सरकार बनाई और लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया। कहने का आशय ये है कि दतिया में भाजपा की हार को कांग्रेस सत्ता में वापसी मानकर आश्वस्त हो जाए तो वह मुगालते में रहेगी क्योंकि इस नतीजे के पीछे  नरोत्तम मिश्रा को टिकिट नहीं मिलने से उत्पन्न आंतरिक कलह भी कारण बनी और दूसरा भाजपा में हार की समीक्षा कर भविष्य के लिए सावधान रहने की जो क्षमता है वह कांग्रेस की खुशी को स्थायी रहने देगी इसमें संदेह है। हालांकि प्रदेश कांग्रेस  की कमान जिन युवाओं के हाथ है उनके लिए जरूर ये जश्न मनाने का अवसर है क्योंकि  ये साबित हो गया कि पार्टी बिना कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के भी चलाई जा सकती है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और मुख्यमंत्री मोहन यादव के लिए इस हार से संगठन और सरकार को उबारना बड़ी चुनौती होगी क्योंकि नरोत्तम की पीढ़ी के जो नेता अपने भविष्य के प्रति चिन्तित हो उठे थे उन्हें  संजीवनी मिल गई है। लेकिन कल आये तीन परिणामों में बिहार की बाँकीपुर सीट अचानक राष्ट्रीय राजनीति में चर्चित हो उठी क्योंकि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन वहाँ से पाँच बार विधायक रहे।  राज्यसभा के लिए चुने जाने पर उन्होंने उससे इस्तीफा दे दिया। उनके पिता भी वहीं से विधायक बनते रहे। इसलिये भाजपा वहाँ  अति आत्मविश्वास से भरी हुई थी। लेकिन पहले तो उसने जिसे टिकिट दी वह पीछे हट गया और दूसरा प्रत्याशी उतारे जाने पर जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने मैदान में उतरकर सबको चौंका दिया। विधानसभा चुनाव में जनसुराज की दुर्गति  के आधार पर भाजपा और तेजस्वी यादव की आरजेडी प्रशांत को हलके में लेने की गलती कर बैठे। नीतीश कुमार को हटाकर सम्राट चौधरी की ताजपोशी करवाकर भाजपा ने बिहार की गद्दी तो हासिल कर ली किंतु नीतीश समर्थक उस निर्णय को पचा नहीं  सके थे। और फिर एक ब्राह्मण युवक का एनकाउंटर भाजपा के प्रतिबद्ध सवर्ण मतदाताओं की नाराजगी की वजह बन गया। यही वजह रही कि राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट पर भी पार्टी संगठन अपने मतदाताओं को मतदान केंद्र तक नहीं ला सका। लेकिन उसका लाभ बजाय तेजस्वी के प्रत्याशी को मिलने के प्रशांत को मिलने से ये बात उजागर हो गई कि बिहार में लालू की राजनीतिक विरासत खत्म होने को है। हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि प्रशांत किशोर वहाँ वैकल्पिक राजनीति के ध्वजवाहक बन जायेंगे किंतु  उनका उदय लालू ब्रांड राजनीति को हाशिये में धकेलने का कारण तो बन ही सकता है। कुछ लोग इन परिणामों को जेन जी आंदोलन से जोड़ रहे हैं जो निरर्थक है क्योंकि उपचुनाव सदैव स्थानीय मुद्दों से प्रभावित होते हैं। वरना गुजरात में भी भाजपा को हार का सामना करना पड़ता। बावजूद इसके म.प्र  और बिहार में मिली पराजय भाजपा के लिए चेतावनी भी है और चुनौती भी क्योंकि इससे उसके विरोधियों का उत्साहवर्धन तो हुआ ही है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 3 August 2026

मानसून की चेतावनी को गंभीरता से लिया जाए



अगस्त महीने की शुरुआत तक म.प्र में मानसून की आधी बारिश हो जाती थी। लेकिन इस साल एक चौथाई से भी कम बरसात होने से न केवल किसान अपितु व्यापारी और सामान्य जन भी परेशान हैं। सरकार के माथे पर भी पसीना छलछलाने लगा है। कई जिलों में धान की बोनी बरसात के अभाव में बेकार चली गई। भूजल स्तर नीचे जाने से सिंचाई हेतु लगाए गए पंप आदि भी जवाब देने लगे हैं। गर्मियों में पीने के पानी की जो किल्लत हुई वह बरसात के मौसम में भी जारी रहने से आगामी गर्मियों में क्या होगा इसकी चिंता स्थानीय निकायों को सताने लगी है। अच्छे मानसून से हमारे देश में व्यापार भी फलता - फूलता है जिस पर आर्थिक विकास की इमारत  खड़ी होती है। बढ़ते शहरीकरण के बाद भी भारतीय बाजारों में रौनक ग्रामीण भारत के बल पर ही आती है। चिंता का सबसे बड़ा कारण ये है कि वर्षा कम होने से खरीफ फसल तो खराब होगी ही जमीन सूखी होने से अगली रबी फसल पर भी इसका असर पड़े बिना नहीं रहेगा। फसलें खराब होने से खाद्यान्न का अभाव होगा जिसका परिणाम महंगाई के रूप में देखने मिलेगा। हालांकि ज्योतिष शास्त्र के जानकारों का कहना है कि सनातनी मान्यताओं के अनुसार इस वर्ष अधिक मास ( पुरुषोत्तम मास) होने से सावन की शुरुआत भी देर से हुई लिहाजा मानसून का दौर भी देर तक चलेगा। यदि ऐसा होता है तब भी गनीमत है किंतु उस स्थिति में भी धान सहित इस मौसम की फसलें खराब होने से किसानों को भारी नुकसान होना तय है। लेकिन सावन और भादों में भी मानसून रूठा रहा तब पीने के पानी के साथ ही बिजली का संकट भी उत्पन्न हुए बिना नहीं रहेगा क्योंकि प्रदेश के जितने भी बड़े बांध हैं उनमें जलभराव की स्थिति बेहद चिंताजनक है। बांध खाली रहने से पनबिजली उत्पादन तो घटेगा ही, नहरों से होने वाली सिंचाई में भी कमी आयेगी। लंबे अरसे बाद ये हालात उत्पन्न हुए हैं जब म.प्र का बड़ा हिस्सा कमजोर मानसून का शिकार हो रहा है। वरना बरसात का आंकड़ा कुछ जिलों में कम तो कुछ में ज्यादा होने से औसत बराबर हो जाया करता था। लेकिन इस साल अब तक जो स्थिति देखने मिल रही है उसके मुताबिक प्रदेश का बड़ा हिस्सा मानसून की बेरुखी झेलने मजबूर है। नदियों का मायका कहे जाने वाले इस राज्य में अनेक बड़े बांध भी हैं। उनमें होने वाले जल भंडारण से म.प्र ही नहीं बल्कि गुजरात और महाराष्ट्र के हित भी जुड़े हुए  है। इसलिये शासन - प्रशासन को अभी से आपदा प्रबंधन की योजना बना लेनी चाहिए। इस स्थिति में वर्षा जल संचयन ( वाटर हार्वेस्टिंग) अभियान की उपेक्षा भी उभरकर आ रही है। घरों सहित सरकारी भवनों की छतों पर वर्षा जल को बेकार नालियों में बहने देने के बजाय निकटवर्ती नलकूप से जोड़ देने से उसका भूजल स्तर गर्मियों में भी बना रहता है। इसके अलावा छतों से आने वाले बरसाती पानी को एक गड्ढे ( सोक पिट) के जरिये जमीन के नीचे भेज देने से भी आस  - पास का भूजल स्तर बरकरार रहने से अल्प वृष्टि के समय जल संकट से निपटना आसान हो जाता है। वर्षा जल संचयन बेहद महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है जिसे पूरा करने की जिम्मेदारी मूलतः स्थानीय निकायों की है। कम से कम नये बनने वाले भवनों में तो इसे अनिवार्य किया ही जा सकता है। नये भवनों का नक्शा स्वीकृत करने में भी वर्षा जल संचयन की व्यवस्था अनिवार्य रूप से किये जाने के निर्देश होते हैं। लेकिन इस बारे में  ध्यान  नहीं दिये जाने से ये योजना केवल कागजों और आंकड़ों तक ही सीमित है। उम्मीद की जानी चाहिए कि देर से ही सही किंतु अंततोगत्वा इंद्र देव प्रसन्न होकर पर्याप्त वर्षा करवा देंगे जिससे प्रदेश को जल संकट से राहत मिलने के साथ ही किसानों की चिंता दूर हो सकेगी। लेकिन ऐसे अवसरों पर आपदा प्रबंधन के साथ ही आपदा को अवसर बनाने  की सूझबूझ भी दिखानी चाहिए। इसके लिए जरूरी है मानसून के भरोसे हाथ पर हाथ रखकर बैठने के बजाय भविष्य में आने वाले संकट से निपटने के पुख्ता इंतजाम समय रहते किये जाएं। पानी की बरबादी रोकने के अलावा उसके संचयन की प्रणाली को जन अभियान बनाकर लागू किया जाना चाहिए। मानसून ने इस वर्ष जो चेतावनी दी है उससे सावधान होकर भविष्य में आने वाले संकट के लिए प्रदेश को तैयार रहना चाहिए। शासन और प्रशासन के साथ ही जनता को भी ये याद रखना चाहिए कि जल ही जीवन है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 1 August 2026

सनातन धर्म के अपमान का विरोध जरूरी वरना तनाव बढ़ेगा



कांग्रेस सांसद प्रियंका वाड्रा ने लोकसभा में पेपर लीक रोकने सम्बन्धी विधेयक पर चर्चा करते हुए व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि सरकार की बनाई नई कमेटी में एक्स- आई.बी चीफ, आई. टी कंपनी के मालिक और गोमूत्र के विशेषज्ञ हैं। गोमूत्र विशेषज्ञ को शिक्षा के बारे में क्या पता होगा? उनके इतना कहते ही कांग्रेस सांसदों ने ठहाके लगाकर सरकार का उपहास किया। लेकिन प्रियंका का कटाक्ष  उन्हीं के गले पड़ गया। गोमूत्र विशेषज्ञ के रूप में जिस व्यक्ति पर श्रीमती वाड्रा ने तंज कसा उनका नाम वी. कामकोटि है जो वर्तमान में आई.आई.टी ,  मद्रास में निदेशक हैं। दरअसल 2025 में उनके एक वीडियो में  दावा किया गया था कि गोमूत्र के एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुण से अनेक बीमारियां ठीक होती हैं। उनके दावे का आधार विभिन्न साइंस जर्नल में प्रकाशित शोध पत्र थे। उल्लेखनीय है श्री कामकोटि कंप्यूटर साइंस में डॉक्टरेट हैं और इसी विषय के विशेषज्ञ भी। उन पर किये गए कटाक्ष पर देश के 215 शिक्षाविदों ने श्रीमती वाड्रा को पत्र लिखकर कहा कि किसी शिक्षाविद् पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी करते वक्त तथ्य और उस व्यक्ति की गरिमा का ध्यान रखा जाना चाहिए। मतभेद हो सकते हैं, लेकिन किसी का मजाक उड़ाना सही नहीं। हमें उस बयान पर निराशा है, जिसमें आपने प्रोफे. कामकोटि को गोमूत्र विशेषज्ञ कहा। यह टिप्पणी चाहे व्यंग्य के रूप में की हो, राजनीतिक बयानबाजी के तहत, गलत है। विवाद और बढ़े उसके पूर्व ही कांग्रेस के वरिष्ट नेता रहे स्व. ऑस्कर फर्नांडीज द्वारा राज्यसभा में दिये पुराने भाषण का वीडियो प्रसारित होने लगा जिसमें उन्होंने  मेरठ के पास एक आश्रम के ड्राइवर का संस्मरण साझा करते हुए बताया था कि गोमूत्र के सेवन से उसका गंभीर कैंसर ठीक हो गया था। इसके अलावा स्व.फर्नांडीज ने यह भी बताया कि घुटनों के गंभीर दर्द के बावजूद, डॉक्टरों की सर्जरी सलाह को ठुकराकर उन्होंने वज्रासन और योग अपनाए, जिससे उन्हें पूरा लाभ मिला। शिक्षाविदों के पत्र और सोनिया गाँधी के निकटस्थ रहे स्व. फर्नांडीज के उल्लिखित भाषण के बाद अब श्रीमती वाड्रा सवालों के घेरे में आ गईं हैं। उन्होंने प्रोफ़े.कामकोटि को गोमूत्र विशेषज्ञ कहकर उनका मजाक उड़ाते हुए सवाल उठाया कि उन्हें शिक्षा के बारे में क्या पता? उनकी ये टिप्पणी साबित कर गई कि उनमें गंभीरता का अभाव है। हालांकि उनके बारे में ये अवधारणा बनने लगी थी कि अपने भाई राहुल गाँधी की तुलना में वे ज्यादा परिपक्व हैं। लोकसभा में उनके भाषण श्री गाँधी से बेहतर माने गए। उसी कारण  कतिपय विश्लेषक उनमें कांग्रेस का भविष्य देखने लगे थे। लेकिन प्रोफ़े. कामकोटि की  शैक्षणिक पृष्ठभूमि और पेशेवर दक्षता जाने बिना उन्हें  गोमूत्र विशेषज्ञ बताकर उनकी हंसी उड़ाकर उन्होंने उन संभावनाओं को धूमिल कर दिया। अब तक उन्होंने स्व. फर्नांडीज का संदर्भित भाषण पढ़ लिया होगा। तो क्या वे उनके उस भाषण का भी ऐसा ही मजाक उड़ाएंगी? उससे भी बड़ा प्रश्न ये है कि सनातन धर्म से जुड़ी बातों का ही मजाक उड़ाया जाता है। चाहे प्रियंका हों या कोई और वे सभी हिंदुओं की परंपराओं और प्रतीकों के बारे में जिस दबंगी से बोल जाते हैं यदि ऐसा ही वे किसी अन्य धर्म के बारे में बोलने का दुस्साहस करें तब उनकी क्या फजीहत होगी ये बताने की आवश्यकता नहीं है। योग, आयुर्वेद , ज्योतिष आदि को दकियानूसी बताकर उनका मजाक उड़ाना फैशन बन गया है। गोमूत्र और गोबर को लेकर भी स्तरहीन बातें की जाती हैं। आश्चर्य ये है कि ऐसा सब कहने वाले अपने को प्रगतिशील बताते नहीं थकते। लेकिन वे भूल जाते हैं कि इन्हीं सब विषयों पर उन देशों में शोध हो रहे हैं जो विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी माने जाते हैं। हाल ही में राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने मनु स्मृति को लेकर आधारहीन और अनर्गल प्रलाप किया। ऐसा लगता है सनातन धर्म में जो सहनशीलता है उसका बेजा फ़ायदा उठाने का दुस्साहस बढ़ता जा रहा है। महज राजनीतिक स्वार्थ के लिए देश के बहुसंख्यक समाज की भावनाओं का अपमान करने के इस चलन का विरोध होना जरूरी है वरना देश का साम्प्रदायिक सद्भाव खतरे में पड़ जाएगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी




Friday, 31 July 2026

आज के जमाने में मनु स्मृति का जिक्र औचित्यहीन



मल्लिकार्जुन खरगे देश के वरिष्ट राजनेताओं में से हैं।  कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के साथ ही वे राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष भी हैं। । मूलतः कर्नाटक के  खरगे जी दलित समुदाय से आते हैं। अपने गृह राज्य के मुख्यमंत्री बनने के लिए उन्होंने काफी हाथ - पैर मारे किंतु पार्टी हायकमान ने उन्हें उपकृत न करते हुए उनके  पुत्र प्रियांक को राज्य में मंत्री बनवा दिया जिन्होंने तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री स्टालिन के बेटे उदयनिधि द्वारा सनातन की तुलना डेंगू और मलेरिया से करते हुए उसे समाप्त करने जैसी बात का खुलकर समर्थन किया था। समय - समय पर मल्लिकार्जुन जी भी अपने दलित होने का एहसास करवाना नहीं भूलते। ताजा प्रमाण राज्यसभा में उनके द्वारा मनु स्मृति का उल्लेख करते हुए लगाये गए आरोप हैं। जब सत्ता पक्ष के साथ ही सदन के सभापति ने उनसे आरोपों को प्रमाणित करने कहा तब वे शांत हो गए। दरअसल मनु स्मृति और मनुवाद ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें लेकर दलित समुदाय के मन में सवर्णों के प्रति विद्वेष भरा जाता है। मायावती और चंद्रशेखर आजाद जैसे नेता भी इन्हें बतौर औजार उपयोग करते रहते हैं। इनके अलावा जे.एन.यू की ढपलीबाज टुकड़े - टुकड़े गैंग भी मनुवाद से आजादी के नारे लगाया करती है। दिल्ली के जंतर मंतर  पर संपन्न काॅकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में भी मनुवाद के साथ ही ब्राह्मण वाद के विरोध में नारेबाजी सुनाई दी। पार्टी के जन्मदाता अभिजीत दिपके भी अपने दलित होने का उल्लेख करते हुए डाॅ. अंबेडकर का पोस्टर लहराते देखे गए। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि आरक्षण की श्रेणी में आने वाले राजनेताओं द्वारा अपने समुदाय का भयादोहन करने के लिए मनु स्मृति और मनुवाद के विरोध का ढोल पीटा जाता है। जबकि 21 वीं सदी के भारतीय समाज में 10 फीसदी सवर्ण हिंदुओं को भी मनु स्मृति के बारे में लेशमात्र जानकारी नहीं होगी। यदि  दलित नेता और दलित समुदाय से जुड़े साहित्यकार  मनु स्मृति का जिक्र न करें तब कुछ वर्षों बाद शायद यह लोगों की स्मृति से ही वह विलुप्त हो जाएगी। और फिर जिस मनु स्मृति  के आधार पर दलित राजनीति के पुरोधा ब्राह्मण वाद को कोसते हैं उसका जो अनुवाद वर्तमान में प्रचलित है उसकी प्रामाणिकता ही संदिग्ध है। सवर्ण वर्ग कभी भी अपने बचाव हेतु मनु स्मृति का उपयोग नहीं करता । भारत की सामाजिक व्यवस्था संबंधी किसी भी कानूनी विवाद में मनु स्मृति को आधार अथवा संदर्भ ग्रंथ नहीं माना जाता। ऐसे में खरगे जी और उन जैसे अन्य दलित नेता अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए मनु स्मृति के बहाने जो जातिगत विद्वेष फैलाते हैं उससे दलितों का कोई लाभ नहीं होता। दलितों के कल्याण के प्रति उनकी चिंता वाजिब है लेकिन मनु स्मृति के बहाने गैर दलित जातियों के बारे में अनावश्यक प्रलाप करने वाले कांग्रेस अध्यक्ष उस समय क्यों शांत रहे जब कांग्रेस के सबसे ताकतवर नेता राहुल गाँधी ने सवर्ण समुदाय को कांग्रेस के पक्ष में लाने के लिए खुद को जनेऊ धारी सारस्वत ब्राह्मण  प्रचारित करवाया। इसके बाद वे अनेक मंदिर और मठों में कर्मकांड करते दिखाये गए। मानसरोवर की यात्रा कर शिव भक्त होने का दावा भी किया। यद्यपि उसका कोई राजनीतिक लाभ नहीं होने के बाद श्री गाँधी को ब्राह्मण साबित करने की मुहिम ठंडी पड़ गई और बीते कुछ सालों से वे जातिगत जन गणना और जिसकी जितनी भागीदारी उसकी उतनी हिस्सेदारी का मुद्दा पकड़कर बैठ गए। खरगे जी ने मनु स्मृति के नाम पर दलितों को शिक्षा से रोके जाने का जो  आरोप लगाया उसका कोई प्रमाण वे नहीं दे सके। सही बात ये है कि आज  आरक्षण के विरोध में जो आवाजें उठ रही हैं उनका कारण श्री खरगे और उन जैसे कुछ दलित नेता ही हैं जिनकी अनावश्यक और अप्रासंगिक टिप्पणियों से सामाजिक समरसता को क्षति पहुंचती है। आजादी के आठ दशक बाद भी  यदि दलित समुदाय आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्तर पर दौड़ में पीछे है तो फिर आरक्षण की उपयोगिता और सार्थकता पर दलितों के बीच ही विमर्श होना चाहिए। सवाल ये भी है कि दलित नेताओं की संतानें तो आगे बढ़ जाती हैं तो आम दलित क्यों नहींं? कर्नाटक में कांग्रेस के और भी दलित विधायक होंगे किंतु मंत्री पद पर खरगे जी के बेटे को ही बिठाया गया। सरकारी नौकरियों और राजनीति में जितने भी दलित नेता हैं उनके परिजन हर तरह से सुविधाजनक स्थिति में हैं। ऐसे में इन नेताओं द्वारा मनु स्मृति की आड़ लेकर जो रोना - धोना किया जाता है वह पूरी तरह पाखंड है और  उसी का प्रदर्शन श्री खरगे द्वारा किया गया। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 30 July 2026

कोचिंग माफिया पर भी शिकंजा कसा जाए



लोक परीक्षा संशोधन विधेयक गत दिवस लोकसभा में पारित होने के बाद आज राज्यसभा में विचारार्थ रखा जा रहा है। सत्ता पक्ष के संख्या बल को देखते हुए वहाँ भी इसके स्वीकृत होने की पूरी संभावना है जिसके बाद राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षरित होकर इसे कानून की शक्ल मिल जायेगी। नीट परीक्षा के प्रश्न पत्र लीक हो जाने के बाद देश भर में सरकार द्वारा ली जाने वाली परीक्षाओं के प्रश्न पत्रों की गोपनीयता भंग होने को लेकर छात्रों के साथ ही उनके अभिभावकों के मन में भी व्यवस्था को लेकर जबरदस्त गुस्सा देखने मिला। कुछ परीक्षार्थियों द्वारा आत्महत्या करने के कारण शिक्षा मंत्रालय की अक्षमता का मुद्दा उठ खड़ा हुआ। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के अध्यक्ष से लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान निशाने में आने लगे। इस चिंगारी को नई -  नवेली कॉकरोच जनता पार्टी ने हवा देकर दिल्ली के जंतर मंतर पर आंदोलन खड़ा कर दिया जिसकी परिणिति श्री प्रधान के त्यागपत्र से हुई। हालांकि शिक्षा मंत्रालय से जुड़े अनेक अधिकारियों पर भी गाज गिरी किंतु परीक्षा संचालित करवाने वाली नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के शीर्ष पदाधिकारी को आश्चर्यजनक ढंग से अभय दान दे दिया गया। चौतरफा दबाव के बाद सरकार ने प्रश्न पत्र लीक होने से रोकने के लिए विशेषज्ञों की एक उच्च स्तरीय समिति भी गठित कर दी और उसी के साथ प्रश्न पत्र लीक करने वालों को कड़ा दंड देने वाला कानून बनाने की पहल संदर्भित विधेयक के माध्यम से कर दी।  नीट परीक्षा के प्रश्न पत्र लीक होने के मामले में कई लोग गिरफ़्त में आ चुके हैं। मामले के त्वरित निपटारे हेतु फास्ट ट्रैक कोर्ट भी गठित किया गया है। सीबीआई इस प्रकरण में जाँच एजेंसी है। इस बारे में  जिन लोगों पर अपराधिक मामले दर्ज हुए उनमें कुछ कोचिंग संचालकों के अलावा प्रश्न पत्र तैयार करने वाले शिक्षक, और दलाल किस्म के लोग हैं। देर - सवेर कुछ और लोगों का पर्दाफ़ाश होना तय है। लेकिन सबसे बड़ी जरूरत है शिक्षा जैसे पवित्र पेशे में आई इस बुराई की जड़ों में मठा डालने की। और इसके लिए शिक्षा का व्यवसायीकरण रोकना पहली आवश्यकता है। आजकल अखबारी पन्नों के अलावा होर्डिंग्स और डिजिटल मीडिया पर कोचिंग संस्थानों के बड़े - बड़े विज्ञापन इस बात का प्रमाण हैं कि शिक्षा अब पूरी तरह एक उद्योग बन चुकी है जिसमें पूँजी का खेल होने से मुनाफाखोरी चरम पर है। कोचिंग व्यवसाय को माफिया कहा जाना बेशक अटपटा लगता है ।  लेकिन बिहार की राजधानी पटना में दो कोचिंग संचालकों के  विवाद में गोली चलने तक की नौबत आ आ गई जिसके चलते एक संचालक को जेल जाना पड़ा। राजस्थान का कोटा शहर तो कोचिंग की राजधानी कहलाता है। ये बात भी धीरे - धीरे सामने आती जा रही है कि प्रश्न पत्र लीक होने में कोचिंग संचालकों की भी भूमिका रहती है। इनकी अनाप - शनाप कमाई का अंदाज इनके द्वारा प्रचार पर किया जाने वाला खर्च है। अखबार के प्रथम पृष्ठ कोचिंग संस्थानों के विज्ञापनों से भरे रहते हैं। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि बिल्डर और ऑटोमोबाइल उद्योग की  टक्कर के विज्ञापनदाता इन दिनों कोचिंग संस्थान हैं।  चूंकि इनका व्यवसाय इनके संस्थान से सफल होकर निकलने वाले छात्रों पर ही टिका होता है इसीलिये ये परीक्षा परिणाम आते ही करोड़ों के विज्ञापनों की झड़ी लगा देते हैं। यही सब देखते हुए प्रश्न पत्र लीक मामले में कतिपय कोचिंग संचालक शक के दायरे में है। जैसी कि चर्चा है उसके अनुसार इस बार की नीट परीक्षा के अलावा अतीत में संघ लोकसेवा आयोग सहित राज्यों की प्रवेश और चयन परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक होने में शिक्षा माफिया की सक्रिय हिस्सेदारी है। इसीलिये सरकार को चाहिए कोचिंग संस्थानों पर शिकंजा कसने के लिए सख्त इंतजाम करे क्योंकि इनके कारण हमारे देश में शाला स्तर की शिक्षा की गुणवत्ता का सत्यानाश हो रहा है। हाल ही में एक सर्वे ने ध्यान खींचा जिसके अनुसार आई.आई.टी जैसे विश्वस्तरीय संस्थान के प्राध्यापक से अधिक वेतन और भत्ते कोटा के कुछ कोचिंग संस्थान देते हैं। भले ही इसकी पुष्टि न की जा सके किंतु प्रश्न पत्र लीक होने के मामलों में कोचिंग माफिया की गर्दन में फँदा डालना बेहद जरूरी है। वरना कितने भी कानून बना लिए बजाएं पैसे की ताकत के आगे व्यवस्था लाचार नजर आयेगी। इसके साथ ही नेशनल टेस्टिंग एजेंसी और संघ लोक सेवा आयोग में होने वाली नियुक्तियों में राजनीतिक प्रतिबद्धता को परे रखते हुए योग्यता और प्रामणिकता का ध्यान रखा जाए। वरना आगे पाट पीछे सपाट की स्थिति बनी रहेगी। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 29 July 2026

पाक अधिकृत कश्मीर में हो रही बगावत से भारत को सतर्क रहना होगा



पाक अधिकृत कश्मीर के हालात भी बलूचिस्तान की तरह ही बेहद तनावपूर्ण हैं।  पाकिस्तान के हुक्मरानों के अलावा सेना के जनरल चाहे जब जम्मू - कश्मीर को भारत से छीनने की डींगें हाँकते रहते हैं। आजादी के फौरन बाद उसने कबायलियों की शक्ल में बाकायदा सेना भेजकर  कश्मीर के एक हिस्से पर कब्जा जमा लिया। भारतीय सेना ने जब हमलावरों को पीछे धकेलना शुरू किया तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लॉर्ड माउंटबेटन और शेख अब्दुल्ला के बहकावे में आकर सं.रा संघ में शिकायत कर दी। उसके बाद युद्ध तो रुक गया किंतु पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर का हिस्सा आज तक उसके अधीन ही बना हुआ है। दूसरी समस्या नेहरू जी पैदा कर गए जम्मू - कश्मीर को धारा 370 के अंतर्गत विशेष दर्जा देकर। इसके चलते मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी में अलगाववाद बढ़ते - बढ़ते आतंकवाद का रूप ले बैठा जिसके पीछे पाकिस्तान का खुला हाथ था। इसी के तहत घाटी से हिंदुओं को पलायन करने बाध्य किया गया। वहाँ पाकिस्तान का झंडा लहराना और भारत विरोधी नारेबाजी आम बात थी। सेना की टुकड़ियों पर पत्थरबाजी व्यवसाय बन गई थी । इस स्थिति को समाप्त करने के लिए वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार ने धारा 370 समाप्त करने जैसा साहसिक कदम उठाते हुए जम्मू - कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा विलोपित कर दिया। इसके बाद घाटी में अलगाववाद पूरी तरह समाप्त हो गया हो ये मान लेना तो गलत होगा लेकिन वह लगातार कमजोर होता जा रहा है। आतंकवादियों की गतिविधियां भी पहले से काफी घट गई हैं। हालांकि अपना घर छोड़ने मजबूर किये कश्मीरी हिंदुओं की वापसी अब तक संभव नहीं हो सकी किंतु पहलगाम हत्याकांड के बाद उत्पन्न चिंता और भय अब नहीं दिखाई देता। जिसका प्रमाण वहाँ पर्यटकों की रिकार्ड संख्या है। धारा 370 हटने के बाद राज्य में चुनाव भी सफलतापूर्वक संपन्न हो सके। लेकिन इसे संयोग कहें या कुछ और कि इधर जम्मू - कश्मीर में शांति स्थापित हो रही है उधर पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान के प्रति असंतोष बढ़ते - बढ़ते बगावत की सीमा तक आ पहुंचा है। पाकिस्तानी सेना वहाँ वैसा ही दमन कर रही है जैसा 1971में उसने बांग्लादेश में  किया था। गत दिवस ही सेना की गोली से 30 आंदोलनकारियों के मारे जाने की खबर वहाँ की गंभीर स्थिति का प्रमाण है। जो खबरें आ रही हैं उनके मुताबिक पाकिस्तान इस समय उसी समस्या में फंसा हुआ है जो उसने जम्मू - काश्मीर सहित भारत के अनेक हिस्सों में पैदा करने का कुचक्र रचा था। पाक अधिकृत कश्मीर उससे अलग होकर भारत से जुड़ने के संकेत दे रहा है। बलूचिस्तान अपने को अलग देश घोषित कर चुका है। पश्चिमी सीमांत पर खैबर पख्तून और तालिबानी इस्लामाबाद की नींद उड़ाए हुए हैं। सिंध में भी अलगाववाद की दबी हुई चिंगारी फिर भड़कती दिख रही है। कुल मिलाकर मुल्क के अंदरूनी हालात बेहद संगीन हैं। भारत का विभाजन कर अस्तित्व में आया ये देश आज खुद खंडित होने के कगार पर है। भारत के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर है क्योंकि उसका गिलगित वाला हिस्सा पाकिस्तान ने चीन को सौंप दिया। स्मरणीय है चीन इस क्षेत्र से वन बेल्ट वन रोड जैसे प्रकल्प पर तेजी से काम कर रहा है जिससे उसे प. एशिया और यूरोप तक अपना व्यापार विस्तारित करने में मदद मिलेगी । लेकिन बलूचिस्तान के अलावा पाक अधिकृत कश्मीर में चीन का बढ़ता विरोध पाकिस्तान के दुर्भाग्य की पटकथा लिख रहा है। पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर भारत में शामिल होने जा रहा है इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि पाकिस्तान के साथ ही चीन भी आसानी से ऐसा नहीं होने देगा। लेकिन उस पार के कश्मीर में पाकिस्तान का नियंत्रण  लगातार कमजोर होता जा रहा है जो भारत के हित  में है क्योंकि अपनी आंतरिक अशांति से जूझने के कारण  आतँकवाद का निर्यात करने की उसकी क्षमता कमजोर होगी। लेकिन  एक  बात गौरतलब है कि भारत का वह वर्ग जो जम्मू -  कश्मीर में अलगाववादियों के प्रति सहानुभूति दर्शाते हुए भारतीय सेना को अत्याचारी ठहराने में तनिक भी शर्म नहीं करता था वह पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तानी सेना द्वारा चलाये जा रहे दमन चक्र पर मुँह में दही जमाये बैठा है। धारा 370 के हटाये जाने पर छाती पीटने वाली रुदालियों की टोली पाक अधिकृत कश्मीर में मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ती देखकर भी शांत है। दरअसल उसे इस बात की चिंता सताये जा रही है कि कश्मीर के उस हिस्से पर पाकिस्तान की पकड़ कमजोर पड़ने से कहीं वह जम्मू कश्मीर के साथ वापस न जुड़ जाए। भारत को इस स्थिति पर पैनी नजर रखनी होगी क्योंकि पाकिस्तान और चीन मिलकर भारत के लिए कोई परेशानी खड़ी कर सकते हैं। और फिर हमारे यहाँ आस्तीन के सांप भी कम नहीं हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 28 July 2026

छात्रों की मौत पर हुए आंदोलन के बाद जश्न का क्या औचित्य



काॅकरोच जनता पार्टी ने आज से अपना आंदोलन फिर शुरू करने की धमकी दी है। उसका आरोप है कि जंतर मंतर आंदोलन समाप्त करने के लिए सरकार के साथ जो बातचीत हुई उसमें धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र और नीट पेपर लीक पर आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवार को एक करोड़ रु. की क्षतिपूर्ति के साथ ही इस आंदोलन के सिलसिले में दिल्ली के अलावा देश के किसी भी हिस्से में छात्रों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने के बात तय थी। श्री प्रधान ने तो त्यागपत्र दे दिया और पीड़ित परिवारों को आर्थिक क्षतिपूर्ति की प्रक्रिया भी प्रारंभ हो रही है किंतु छात्रों पर अपराधिक प्रकरण दर्ज होने और गिरफ्तारी की खबरें समझौते का उल्लंघन है। इसके बाद बिहार सरकार ने 26 तारीख तक छात्रों के विरुद्ध दायर सभी प्रकरण वापस लेने का फैसला कर लिया। लेकिन पार्टी के जन्मदाता अभिजीत दिपके का आरोप है कि दिल्ली और मुंबई में आंदोलन में शामिल  अनेक छात्रों को  पूछताछ के नाम पर जबरन थाने में बिठाकर रखा गया है जिससे उनके मन में भय व्याप्त है। उन्होंने एक वीडियो संदेश में स्पष्ट तौर पर कहा कि यदि उक्त कारवाई जारी रही तो पार्टी दोबारा आंदोलन शुरू कर देगी। इस सबके बीच आंदोलन के नेताओं ने वरिष्ट अधिवक्ता कपिल सिब्बल से संपर्क साधा जिन्होंने ऐसे मामलों में कानूनी सहायता का आश्वासन भी दे दिया। इस बारे विचारणीय बात  ये  है कि  आंदोलन खत्म करते समय जो समझौता हुआ था उसमें छात्रों का उल्लेख था। लेकिन जो कारवाई हो रही है वह उन आपराधिक तत्वों के विरुद्ध है जिन्होंने पुलिस पर हमला किया, सरकारी वाहन तोड़े और पत्थरबाजी की। उल्लेखनीय है कि काॅकरोच जनता पार्टी पर जब ये आरोप लगा कि उसके आंदोलन में हिंसक तत्व घुस आये जिन्होंने पुलिस कर्मियों पर हमले किये तब उनका जबाब था कि भाजपा और रास्वसंघ ने अपने गुंडे आंदोलन में भेजकर हिंसा फैलाई। अब जब पुलिस वीडियो और सी.सी कैमरों की रिकार्डिंग के जरिये आंदोलन को हिंसक रूप देने वालों की  धरपकड़ कर रही है तब काॅकरोच जनता पार्टी को  अपनी असलियत सामने आने का डर सता रहा है। जिस समझौते के उल्लंघन का रोना पार्टी नेता रो रहे हैं उसमें भी अपराधी तत्वों को अभयदान का कोई जिक्र नहीं था।  सर्वोच्च न्यायालय ने भी आंदोलन को लोकतांत्रिक अधिकार मानते हुए पुलिस की बर्बरता पर जहाँ ऐतराज जताया वहीं उस पर होने वाले हमलों पर भी चिंता जताई। काॅकरोच जनता पार्टी की मांग है कि दिल्ली पुलिस अपनी कारवाई के लिए माफी मांगे लेकिन दूसरी तरफ वह उपद्रवी तत्वों द्वारा पुलिस पर हमले और सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ के जिम्मेदार लोगों को बचाने में लगी है। इस दोहरे रवैये के कारण वह आलोचनाओं का शिकार हो रही है। आंदोलन के प्रति गंभीरता पर सवालिया निशान भी उसने स्वयं खड़े कर दिये जब सोशल मीडिया पर काॅकरोच जनता पार्टी के नेताओं के वे वीडियो जारी हुए जिसमें वे लड़के - लड़कियों के साथ किसी आलीशान होटल में नाचते हुए जश्न मनाते दिखे। जब इसे लेकर उनकी फजीहत शुरू हुई तब बजाय शर्मिंदगी व्यक्त करने के कहा गया कि जेन जी का यही तरीका है। यदि ये नाच - गाना आंदोलन खत्म करने वाली रात जंतर मंतर पर हुआ होता तब ये नेता वहाँ मौजूद भीड़ पर उसकी जिम्मेदारी डालकर बच निकलते ।  लेकिन अपना घर छोड़कर  आंदोलन स्थल पर दिन - रात मौजूद रहे कथित जेन जी  को घर वापसी का रास्ता पकड़ने का निर्देश देकर गिने - चुने दरबारियों के साथ नाच - गाने की महफ़िल सजाना उन हजारों युवक - युवतियों के साथ छलावा है जिनके बल पर तीन - चार पेशेवर लोगों ने पूरे देश को अशांत करने की कोशिश की।  बहरहाल , आंदोलन की समाप्ति के बाद  होटल में जश्न मनाते हुए इस पार्टी के नेताओं के वीडियो उन जेन जी लड़के - लड़कियों  के लिए आँखें खोल देने वाले हैं जो उनके बहकावे में आकर कई हफ्ते धूप में पसीना बहाते रहे। और अब तो कपिल सिब्बल ने इस पार्टी को 1 करोड़ रु.देने की घोषणा भी कर दी। इसके बाद  बड़ी बात नहीं यदि बड़ी बात नहीं अगला आंदोलन भी किसी  होटल या रिसार्ट में आयोजित हो क्योंकि हर बात पर ये सफाई दी जाती है कि जेन जी कुछ अलग  हटकर सोचने और करने में यकीन रखते हैं। आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारजन इन नाचते हुए जेन जी नेताओं को देखकर क्या सोच रहे होंगे इसकी कल्पना भी विचलित कर देती है। आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारजन इन नाचते हुए जेन जी नेताओं को देखकर क्या सोच रहे होंगे इसकी कल्पना भी विचलित कर देती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी