Monday, 13 July 2026

मोदी द्वारा तीन देशों की यात्रा में किये समझौतों से देश को दूरगामी लाभ


मोदी विरोधी यू ट्यूबर डाॅ. पुण्य प्रसून वाजपेयी ने अपने ताजा वीडियो में खुलासा किया कि भारत में अब तक जितने भी प्रधानमंत्री हुए उनमें नरेंद्र मोदी द्वारा की गईं विदेश यात्राओं की संख्या बाकी सभी की मिलाकर भी अधिक हैं। विपक्षी पार्टियां भी अमूमन प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर छींटाकशी करते हुए उनके महंगे विमान का जिक्र करना नहीं भूलतीं। ये बात पूरी तरह सही है कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। भारत जैसे देश में इस पर उंगलियाँ उठना स्वाभाविक है जहाँ करोड़ों लोग गरीबी रेखा से नीचे ज़िंदगी बसर करने मजबूर हैं। लेकिन इसी के साथ ये देखना भी जरूरी है कि श्री मोदी की विदेश यात्राएं किस उद्देश्य से की जाती हैं ? यदि वे महज सैर - सपाटे के लिए होती हों तब उनकी आलोचना स्वाभाविक है। लेकिन अब तक जो कुछ भी देखने मिला उससे ये साफ है कि उनकी  विदेश यात्राएं पूरी तरह देश के दूरगामी हितों पर केंद्रित होती हैं। ऐसा नहीं है कि पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों के विदेशी दौरे निरुद्देश्य हुआ करते थे किंतु उस दौर में भारत की वैश्विक भूमिका आज जैसी विस्तृत नहीं होने से उन यात्राओं का दायरा रिश्ते मजबूत करने तक सीमित रहता था, लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। भारत एक परमाणु शक्ति संपन्न देश होने के साथ ही सॉफ्टवेयर, अंतरिक्ष, चिकित्सा, रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में बड़ी ताकत के तौर पर पहचान बनाता जा रहा है। दुनिया भर में फैले भारतवंशी देश की प्रतिष्ठा में वृद्धि कर रहे हैं। उदारीकरण के बाद उत्पन्न स्थितियों में विश्व एक बाजार बन गया है जिसके कारण केवल निर्यातक बनकर कोई नहीं रह सकता। उत्पादन के लिये कच्चा माल और तकनीक का आयात जरूरी है वहीं  विकसित देशों को अपने उत्पादों के लिए बाजार की जरूरत पड़ती है। दुनिया  में जारी मौजूदा उठापटक के पीछे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष तौर पर बाजारवाद की छाया है। विदेश नीति भी घूम - फिरकर आर्थिक हितों से प्रभावित होती है। इसीलिए राष्ट्राध्यक्ष अपने विदेशी दौरों में देश के बड़े उद्योगपतियों को ले जाते हैं। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने इस बात को पूरी तरह समझते हुए विदेश दौरों में व्यापारिक समझौतों को प्राथमिकता दी और बड़ी आर्थिक शक्तियों के विकल्प के तौर पर विभिन्न देशों के साथ तार जोड़ते हुए देश के आर्थिक, कूटनीतिक और सामरिक हितों की सुरक्षा का प्रबंध किया। अमेरिका द्वारा प्रतिकूलता दिखाये जाने के कारण भारत के लिए अपने संबंधों का विकेंद्रीकरण आवश्यक होता जा रहा था। उस लिहाज से भारत  ने  चतुराई दिखाई और विभिन्न देशों से समझौते रूपी  दूरदर्शिता दिखाकर उसके दबाव को कम करने में सफलता हासिल की। यूरोपीय यूनियन और ब्रिटेन से मुक्त व्यापार समझौता इसका उदाहरण है जो अमेरिका के टैरिफ रूपी  आतंक का माकूल जवाब है। गत सप्ताह श्री मोदी ने इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे में जिस प्रकार के व्यापारिक, रणनीतिक और सांस्कृतिक समझौते किये वे मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में भारत की जरूरतों को निर्बाध पूरा करने के साथ ही  कूटनीतिक स्थिति को मजबूत बनाने में मददगार होंगे। दक्षिण एशिया और प्रशांत क्षेत्र में चीन की कुटिल नीतियों का मुकाबला करने के लिये तमाम देश भारत की ओर आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं। ब्रिक्स का प्रमुख सदस्य होने के बाद  भी भारत क्वाड नामक संगठन का सदस्य भी है जो चीन के विरुद्ध मोर्चेबंदी के लिए कार्यरत है। इंडोनेशिया के साथ सबांग बंदरगाह को विकसित करने के  अलावा ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम और क्रिटिकल मिनरल्स की आपूर्ति और न्यूजीलैंड के साथ महत्वपूर्ण रणनीतिक  समझौते क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में भारत की प्रभावशाली भूमिका का प्रमाण है। अमेरिका - ईरान और रूस - यूक्रेन के बीच युद्ध के लंबे खिंचने के कारण दुनिया के सामने जो संकट आते जा रहे हैं उनसे होने वाले नुकसान से बचने के लिए समय रहते वैकल्पिक व्यवस्था करना ही बुद्धिमत्ता है। प्रधानमंत्री का ताजा विदेश दौरा उसी दिशा में बढ़ाया गया कदम है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 11 July 2026

बढ़ती आबादी को मानव संसाधन में बदलना समय की मांग


आज विश्व जनसंख्या दिवस है। पूरी दुनिया  चिंतित है कि आबादी इसी तरह बढ़ती रही तो धरती पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन  घटते चले जायेंगे और तब उनके लिए वैसी ही लड़ाई होगी जैसी कई सालों से रूस और यूक्रेन के बीच चली आ रही है। वहीं प. एशिया में  चल रहे युद्ध के पीछे भी कच्चा तेल नामक काला सोना ही है। चीन की विस्तारवादी नीतियाँ भी प्राकृतिक संसाधनों को हथियाने पर आधारित हैं। भविष्य में पेय जल की समस्या भी विकराल होने जा रही है।और तब उसके लिए भी संघर्ष होगा। उल्लेखनीय है भारत अब चीन को पीछे छोड़ सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गया है। दूसरी तरफ चीन और जापान सरीखे देश जन्म दर में गिरावट से चिंतित हैं क्योंकि  उनके उद्योगों को श्रमिक मिलने की किल्लत होने लगी है। उधर परिवार नामक संस्था के टूटने से भी अनेक विकसित देशों में आबादी  ठहर गई है। यूरोप के कुछ छोटे देशों की आबादी तो लाखों में है किंतु अपने प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों के कारण वे विकसित और संपन्न राष्ट्रों में शुमार होते हैं।  लेकिन बेहतर जिंदगी के चलते अन्य देशों के नागरिक जिस तेजी से यहां बसते जा रहे हैं उससे माहौल बिगड़ने लगा है ।  विशेष रूप से अरब देशों से आए शरणार्थी समस्या बन गए हैं । दुनिया में बढ़ती आबादी से  जमीन और पानी की कमी के साथ ही वाहनों की बढ़ती संख्या  पर्यावरण के लिए खतरा बन गई  है। समुद्र में चल रहे हजारों जहाज और आकाश में विचरते वायुयानों से जो प्रदूषण होता है उसका दुष्प्रभाव धरती पर रहने वालों पर भी पड़ रहा है। विशेषज्ञों का निष्कर्ष  है कि  पृथ्वी पर मौजूद संसाधन  जनसंख्या के अनुपात में  घटते जा रहे हैं। विलासिता पूर्ण जीवनशैली  के कारण भी प्रकृति से खिलवाड़ होने से प्राकृतिक आपदाएं जल्दी - जल्दी आने लगी हैं।  जानलेवा कोरोना  वायरस ने   साबित कर दिया कि मनुष्य की अनगिनत कथित उपलब्धियां किसी न किसी बिंदु पर आकर शक्तिहीन हो जाती हैं । अमेरिका जैसा विकसित और ताकतवर देश भी चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय कुछ न करने की स्थिति में आ जाता है। विश्व भर में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर चिंता व्यक्त की जाती है किंतु जितना दिखावा होता है उसका आधा भी काम नहीं होने से स्थिति एक कदम आगे दो कदम पीछे की बन चुकी है। विकासशील देशों को कार्बन उत्सर्जन के लिए उपदेश देने वाले बड़े राष्ट्र पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं । चीन ने अपनी आबादी में वृद्धि को तो  थाम लिया लेकिन कार्बन उत्सर्जन के मामले में वह बेहद लापरवाह है।  भारत की ही बात करें तो आर्थिक विकास के मामले में चीन से हमारा मुकाबला है । लेकिन उसने  जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण के साथ ही विशाल आबादी को उत्पादकता से जोड़ा जिसके बाद अफीमचियों के लिए कुख्यात चीन ने अमेरिका को टक्कर दे डाली। साम्यवादी व्यवस्था  के बाद भी उसने उदारीकरण की पश्चिमी अवधारणा को अपने अनुरूप बनाया जिसके कारण  लगभग सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने वहाँ अपनी उत्पादन इकाईयां लगाई। दूसरी तरफ भारत में साठ और सत्तर के दशक तक परिवार नियोजन का जो अभियान जोर - शोर से चलाया जाता था वह उपेक्षा का शिकार होकर रह गया। चुनावी राजनीति ने जिस मुफ्त संस्कृति का विकास किया उसकी वजह से करोड़ों लोग बिना हाथ - पैर चलाए सरकारी सहायता पर अपना पेट भर रहे हैं। विरोधाभास ये है कि  बेरोजगारी के आंकड़े  उच्च स्तर पर हैं लेकिन खेती , उद्योग और छोटे कारोबारी तक  कामगारों की कमी से त्रस्त हैं। चीन ने जिस आबादी को संसाधन बनाया वही हमारे देश में बोझ बनकर रह गई। इसके लिए निश्चित रूप से  राजनीति उत्तरदायी है जिसने  कामचोरी को बढ़ावा  दिया। किसी को हजार -  दो हजार बेरोजगारी भत्ता देने के बजाय यदि उससे रोजाना घंटे - दो घंटे भी काम करवाया जाए तो उसे श्रम का महत्व समझ आएगा । इसी तरह महिलाओं के खातों में  पांच सौ - हजार जमा करने से उनका सशक्तीकरण हो जायेगा , ये सोचना मूर्खों के  स्वर्ग में रहने जैसा है। ये सच है कि चीन में चुनाव महज दिखावा है इसलिए वहां रेवड़ियां नहीं बांटी जाती और काम करने में सक्षम प्रत्येक व्यक्ति को उत्पादकता से जोड़ा गया है। वहीं हमारे देश में तो चुनाव कभी न खत्म होने वाला महोत्सव है जिसके दौरान जो मांगोगे वहीं मिलेगा वाली दरियादिली दिखाई जाती है। और तो और जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने  में भी धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप जैसी बातें आड़े आने लगती है। दुनिया का उत्पादन केंद्र बनने की उम्मीद और सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने की  महत्वाकांक्षा में जनसंख्या का बोझ बड़ी बाधा बन रहा है। हालांकि वर्तमान राष्ट्रीय जनसंख्या नीति  2000 का मुख्य उद्देश्य प्रजनन दर को कम करके 2045 तक जनसंख्या को स्थिर करना है। लेकिन इसका हश्र भी परिवार नियोजन अभियान जैसा ही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 10 July 2026

एथेनॉल मिले पेट्रोल के दाम भी कम होना चाहिए



इन दिनों पेट्रोल में एथेनॉल मिलाए जाने का मामला सुर्खियों में है। पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल (E20) के मिश्रण की योजना सरकार द्वारा पर्यावरण संरक्षण और विदेशी मुद्रा बचाने के लिए लागू की गई  है । इसके अंतर्गत अधिकांश पेट्रोल पंपों पर अब 20 फीसदी एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल ही उपलब्ध है। पर्यावरण संरक्षण और आयात खर्च घटाने के अलावा पेट्रोल में एथेनॉल के मिश्रण को किसानों की आय बढ़ाने का साधन भी बताया जा रहा है। सतही तौर पर तो ये देशहित में  प्रतीत होता है किंतु इसके साथ ही कुछ विवाद भी उठ खड़े हुए हैं । केंद्र सरकार के परिवहन मंत्री नितिन गडकरी  पर आरोप  है कि उन्होंने अपने बेटे को आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिए पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिलाने का फैसला करवाया जिसकी फैक्टरी  में इसका उत्पादन होता है। ये भी कहा जा रहा है कि एथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में ऊर्जा थोड़ी कम होती है, जिसके कारण वाहनों की माइलेज में लगभग 2 से 6 प्रतिशत तक की कमी आ जाती है। साथ ही यदि वाहन एथेनॉल  के अनुकूल नहीं है (विशेषकर पुरानी गाड़ियां), तो इंजन के  फ्यूल पाइप या पंप में जंग लगने की शिकायत आ सकती है। दूसरी तरफ ये दावा भी किया जा रहा है कि बीते कुछ वर्षों में बनी अधिकांश गाड़ियां पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिश्रण के लिए पूरी तरह सक्षम हैं।। साथ ही जो वाहन चालक एथेनॉल रहित पेट्रोल उपयोग करना चाहते हैं वे प्रीमियम पेट्रोल का विकल्प चुन सकते हैं, जिनमें एथेनॉल की मात्रा न के बराबर या बहुत कम होती है। दुनिया के अनेक देशों में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का चलन बढ़ रहा है। लेकिन  उन्होंने उसके अनुकूल वाहनों का उत्पादन करने के बाद ही इस दिशा में कदम बढ़ाये। लेकिन भारत में निर्धारित समय  से पहले ही उसे लागू करने के कारण सवाल उठ खड़े हुए। इसे लेकर केंद्र सरकार पर नीतिगत हमलों से ज्यादा श्री गडकरी पर व्यक्तिगत निशाने साधे जा रहे हैं। इसका कारण उनके परिवार का एथेनॉल उत्पादन से जुड़ा होना है ।  उनकी चुप्पी पर भी सवाल उठने लगे। इसे भाजपा के भीतर चल रही खेमेबाजी से भी जोड़कर देखा जाने लगा। ये अटकलें भी लगने लगीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा निकट भविष्य में अपने मंत्रीमंडल में किये जाने वाले फेरबदल में श्री गडकरी को बाहर का रास्ता भी दिखाया जा सकता है। यद्यपि ऐसा होना काफी कठिन है क्योंकि एक तो उन्हें रास्वसंघ की पसंद माना  जाता है और दूसरा ये कि मोदी सरकार की विकास मूलक छवि के निर्माण में परिवहन मंत्रालय का प्रमुख योगदान है। आज देश में सड़कों विशेष रूप से राजमार्गों और एक्सप्रेस हाइवे का जो जाल बिछा है उसका श्रेय श्री गडकरी के खाते में ही दर्ज होता है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि उनकी लोकप्रियता दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर है। ऐसे में उनकी घेराबंदी से सरकार भी दबाव में आ रही थी। संभवतः यही देखकर वे सामने  आये और  पेट्रोल में एथेनॉल के मिश्रण से निजी लाभ के आरोप का खंडन करते हुए स्पष्ट किया कि उसके उत्पादन में उनके बेटे की इकाई की हिस्सेदारी महज 0.07 प्रतिशत तक ही सीमित है। इसके साथ ही उन्होंने एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से वाहनों के इंजिन को होने वाले नुकसान के प्रचार को निराधार बताते हुए चुनौती दी कि जिस किसी के वाहन को क्षति पहुंची हो वह आकर बताये। अब, कितने लोग अपनी शिकायतें लेकर मंत्री जी तक पहुँचेगे ये तो भविष्य ही बताएगा किंतु कांग्रेस के प्रवक्ता तहसीन पूनावाला ने श्री गडकरी द्वारा निजी फायदा न होने के दावे  पर पलटवार करते हुए कहा कि 0.07 प्रतिशत हिस्सेदारी से भी 50 से 100 करोड़ आय हो सकती है। खैर, राजनीति अपनी जगह है लेकिन एथेनॉल को लेकर जो संदेह आम उपभोक्ता के मन में है उसे दूर करना जरूरी है। विदेशी  मुद्रा की बचत के अलावा पर्यावरण को होने वाले नुकसान को रोकने में जनता पूर्णतः सरकार के साथ है किंतु अपने वाहन को नुकसान हो ये किसी को स्वीकार नहीं होगा। इसके अलावा चूंकि एथेनॉल अपेक्षाकृत सस्ता है लिहाजा उसको मिलाने के बाद पेट्रोल के दाम भी उसी अनुपात में कम किये जाने जरूरी हैं। बेहतर हो केन्द्र सरकार पूरे प्रकरण पर विस्तारपूर्वक आलोचनाओं का बिंदुवार जवाब दे जिससे कि भ्रांति दूर की जा सके। ये बात भी स्पष्ट होनी चाहिए कि  एथेनॉल का उपयोग निर्धारित समय सीमा से पहले करने का कारण क्या है ? हालांकि इस बारे में डॉ. मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में पेट्रोलियम मंत्री रहे मणिशंकर अय्यर द्वारा संसद में दिये जा रहे वक्तव्य का वीडियो भी काफी प्रसारित हो रहा है जिसमें वे पेट्रोल में एथेनॉल मिलाये जाने की तरफदारी करते सुने जा सकते हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 9 July 2026

अच्छा हुआ भारत ने अमेरिका - ईरान के झगड़े से खुद को दूर रखा

मेरिका और ईरान के बीच लड़ाई रुकवाने के लिए पाकिस्तान  की कूटनीतिक पहल पर जब  विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर से पूछा गया कि भारत इस मामले में क्यों पीछे रहा तब उन्होंने उत्तर दिया था कि हम दलाली नहीं करते। उसके बाद मोदी सरकार के पेशेवर  विरोधियों ने पाकिस्तान की शान में कसीदे पढ़ते हुए भारतीय विदेश नीति की  आलोचना का अभियान छेड़ दिया। विदेश मंत्री की दलाली वाली टिप्पणी का मखौल उड़ाने में भी  कोई कसर नहीं छोड़ी गई। इसके लिए भी सरकार को कठघरे में खड़ा किया गया कि उसने खामेनेई की हत्या की  निंदा करने में विलंब किया और बजाय  शीर्ष स्तर पर बयान जारी करने के विदेश सचिव को ईरानी दूतावास भेजकर शोक संदेश सौंपा। जब अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि बातचीत हेतु पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में जमा हुए और अंतरिम युद्धविराम पर सहमति बनी तब भी भारतीय विदेश नीति पर  निशाने साधे गए और  पाकिस्तान की अमेरिका और ईरान से नजदीकी बढ़ने को भारत के लिए खतरा बताया जाने लगा। हालांकि जब अंतिम रूप से युद्धविराम हुआ तब भले ही उस पर हस्ताक्षर पाकिस्तान में नहीं हुए किंतु जब उसे इस्लामाबाद समझौता कहा गया तब सरकार विरोधी प्रचारतंत्र को एक मौका और मिल गया। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री श्री जयशंकर  तमाम आलोचनाओं का उत्तर देने के बजाय संयमित बयानों तक ही सीमित रहे और पूरा ध्यान कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति जारी रहने पर केंद्रित रखा। उसका लाभ ये हुआ कि युद्ध रुकते ही भारत ने ईरान सहित  अन्य तेल उत्पादक देशों से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदकर देश को ऊर्जा संकट से बचाये रखा। यह भी  संज्ञान योग्य है कि युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद पाकिस्तान को किनारे कर दिया गया। वहीं फ्रांस में हुए जी - 7 सम्मेलन में  राष्ट्रपति ट्रम्प ने  श्री मोदी की प्रशंसा करते हुए भारत के महत्व को स्वीकार किया।   युद्धविराम के बाद भी अमेरिका, ईरान और इजरायल तीनों के बीच  धमकियों के आदान -  प्रदान के अलावा बीच - बीच में आक्रमण और प्रत्याक्रमण का दौर भी चलता  रहा। होर्मुज पर कब्जे को लेकर ईरान की हेकड़ी और ट्रम्प की धमकियां भी नहीं रुकीं। बीते कुछ दिनों में खामेनेई के अंतिम संस्कार के लिए दुनिया भर से कूटनीतिक हस्तियां ईरान में जमा थीं। उसी दौरान ईरान ने होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर मिसाइलें छोड़ कर भड़काऊ कारवाई कर दी जिसके बाद ट्रम्प ने युद्धविराम खत्म कर ईरान में दर्जनों ठिकानों पर बमबारी करवा डाली।  जिसने शांति की संभावना पर  पानी फेर दिया। आश्चर्य ये है कि खुद को कूटनीति का उस्ताद समझ बैठे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उनके फील्ड मार्शल आसिफ मुनीर  युद्धविराम के टूटने पर असहाय  बैठे हैं । ये देखने के बाद इस विवाद में भारत द्वारा अपने को निर्लिप्त रखने की नीति का औचित्य स्वतः ही सिद्ध हो गया। सही बात ये है कि अमेरिका ने पाकिस्तान को ईरान से संवाद स्थपित करने के लिए बतौर औजार उपयोग किया। यदि वाकई  उसकी वजनदारी इतनी होती तब दोनों पक्षों के बीच संवाद सेतु की भूमिका निभाते हुए दोबारा तनाव पैदा होने ही नहीं देता।   वैश्विक राजनीति के मौजूदा समीकरणों को देखते हुए इस युद्धविराम की सफलता शुरू से ही संदिग्ध रही। डोनाल्ड ट्रम्प तो अविश्वसनीयता के जीते - जागते प्रतीक हैं ही किंतु ईरान के नेताओं में भी वह गंभीरता नहीं है जो ऐसे अवसरों पर अपेक्षित होती है। इसीलिए ये कहना गलत नहीं है कि भारत ने इन दोनों के बीच सुलह कराने की कोशिश से खुद को दूर रखकर बुद्धिमत्ता दिखाई। जहाँ तक पाकिस्तान का सवाल है तो जो देश अपने पड़ोसी अफ़ग़ानिस्तान के साथ लड़ाई नहीं रोक पा रहा वह अमेरिका और ईरान जैसे बड़े देशों की जंग रुकवा देगा ये सोचना भी बेकार है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 8 July 2026

सैन्य महाशक्ति बनने की दिशा में एक और कदम




भारत केवल सोने और कच्चे तेल का ही सबसे बड़ा आयातक नहीं बल्कि विदेशी हथियारों के सबसे बड़े खरीददारों में से भी है। अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन  स्वीडन और इजराइल आदि देशों से हम अस्त्र - शस्त्र, खरीदते रहे हैं।  तोप, लड़ाकू विमान, पनडुब्बी आदि का निर्माण भारत में होने के बावजूद उनमें लगने वाले कल - पुर्जों के लिए विदेशों पर निर्भरता खत्म नहीं हो सकी ।  इस वजह से इनके उत्पादन में विलंब होता आया है। मोदी सरकार ने इसीलिए टेक्नालाजी ट्रांसफर पर जोर देना शुरू किया जिसके अनुकूल परिणाम भी मिलने लगे हैं। इसके साथ ही रक्षा उत्पादन के क्षेत्र को सरकारी एकाधिकार से निकालकर  निजी क्षेत्र को उसमें हिस्सेदारी देने जैसा बहुप्रतीक्षित और साहसिक कदम भी उठाया गया है । यद्यपि निजीकरण के विरोध के नाम पर इस फैसले पर भी उंगलियाँ उठीं। विशेष रूप से ये आपत्ति की गई कि निजी उद्योगों को रक्षा उत्पादन का समुचित तजुर्बा नहीं है। लेकिन बीते कुछ सालों में जो अनुभव आया उसने सरकार के निर्णय के औचित्य पर मुहर लगाते हुए आलोचकों के मुँह बंद कर दिये। सबसे बड़ी बात ये हुई कि भारत ने अपने रक्षा सौदों को एक - दो देशों तक सीमित न रखते हुए राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी और बिना दबाव के उन्हें अंतिम रूप दिया। विपक्ष खास तौर पर कांग्रेस ने इन सौदों पर प्रधानमंत्री को घेरने का हरसंभव प्रयास किया । 2019 के लोकसभा चुनाव में राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री को घेरने के लिए चौकीदार चोर है जैसा नारा बुलंद किया किंतु जनता ने उसे अनसुना करते हुए उनको पहले से अधिक सीटें देकर उनकी नीतियों का अनुमोदन कर दिया। जिसके बाद केंद्र सरकार का उत्साह और बढ़ा जिसके चलते उसने रक्षा सौदों के मामले में तेजी से निर्णय लेते हुए सेनाओं को अस्त्र - शस्त्रों से सुसज्जित करने का अभियान छेड़ा। 2014 में जब ये सरकार सत्ता में आई तब हमारी सेनाएं उनकी कमी से जूझ रही थीं जिसकी जानकारी सार्वजनिक होने से जनता का मनोबल गिरने लगा । लेकिन अब स्थितियाँ बदल गईं हैं। सर्जिकल स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमारी सैन्य शक्ति की क्षमता और श्रेष्ठता पूरी दुनिया के सामने प्रमाणित हो गई। विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की महत्वाकांक्षा पूरी होने के लिए जरूरी है हम सैन्य शक्ति के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर बनें। और उससे भी बढ़कर ये कि रक्षा उत्पादन में विदेशों पर हमारी निर्भरता घटने के बाद हम अपने अस्त्र - शस्त्रों का निर्यात कर सही मायनों में महाशक्ति बनें। गौरव का विषय है कि भारत ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिये हैं। वियतनाम के बाद अब इंडिनेशिया ने भी भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने का सौदा किया जिस पर उसकी राजधानी  जकार्ता में गत दिवस प्रधानमंत्री श्री मोदी ने  वहाँ के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के साथ हस्ताक्षर किये। इसके अलावा अन्य क्षेत्रों में व्यापारिक भागीदारी को लेकर भी अनेक समझौते किये गए जिनमें धरती से अंतरिक्ष तक चलने वाली अनेकानेक गतिविधियाँ शामिल हैं। लेकिन प्रधानमंत्री ने इंडोनेशिया के सबाँग बंदरगाह को विकसित करने का जो समझौता किया वह मलक्का जल डमरूमध्य में भारत की उपस्थिति को मजबूती प्रदान करने वाला है जिससे इस क्षेत्र के समुद्र में चीन के बढ़ते दबदबे को चुनौती दी जा सकेगी। उल्लेखनीय है दक्षिण एशिया के तमाम छोटे - छोटे देश चीन की विस्तारवादी नीतियों से भयभीत होकर भारत के साथ जुड़ना चाह रहे हैं। वियतनाम के बाद इंडिनेशिया के साथ हुए समझौते इसके प्रमाण हैं। जाहिर है भारत अब एक क्षेत्रीय महाशक्ति के तौर पर खुद को स्थापित करने में सफल हो रहा है। प्रधानमंत्री की ये यात्रा इस दिशा में बढ़ाया गया बड़ा कदम है। सबाँग बंदरगाह के विकास का अनुबंध चीन की उस चाल का सटीक जवाब है जो उसने हाल ही में बांग्लादेश के एक बंदरगाह को हथियाकर चली थी। पहले ये सौदा भारत के साथ होना था। इस प्रकार इंडोनेशिया की इस यात्रा से श्री मोदी ने एक साथ कई लक्ष्य साधे। मौजूदा वैश्विक हालातों में भारत की ये उल्लेखनीय सफलता है जिसका असर  निकट भविष्य में महसूस होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 7 July 2026

बर्फ़ानी बाबा के लिए खतरा बना आस्था का अतिरेक


जम्मू कश्मीर स्थित अमरनाथ की पवित्र गुफा में स्वनिर्मित बर्फ के शिवलिंग का दर्शन करने लाखों श्रृद्धालु प्रतिवर्ष आते हैं। दुर्गम रास्तों से होते हुए वहाँ पहुँचने का सफर मुश्किल  होने के बाद भी आस्था के वशीभूत देश - विदेश से सनातनी परंपरा के अनुगामी शिव भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है। पहले पहलगाम से चंदनबाड़ी होते हुए अमरनाथ पहुंचा जाता था, जिसमें तीन दिन लगते थे। लेकिन अब बालटाल से  दूसरा मार्ग  खुल जाने से यात्रा की अवधि कम हो गई है। यात्रियों के लिए पूरे रास्ते में निःशुल्क भोजन का प्रबंध भंडारों के रूप में होता है। यह यात्रा कश्मीर घाटी के मुस्लिम वॅाशिंदों के लिए आय का बड़ा साधन है क्योंकि अमरनाथ आने वाले यात्रियों का बड़ा वर्ग कश्मीर में अन्य स्थानों का भ्रमण भी करता है जिसके कारण वहाँ पर्यटन उद्योग भी फलता - फूलता है। यद्यपि आतंकवाद के दौर  में घाटी का पर्यटन बहुत कम हो गया था किंतु अमरनाथ यात्रा का उत्साह लगातार बढ़ता रहा जो आतंकवाद की प्रतिक्रिया थी। धारा 370 हटने के बाद घाटी के हालात सुधरे तब इस यात्रा का आकर्षण और बढ़ा। पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद श्रृद्धालुओं में नये सिरे से जोश दिखाई देने लगा। इस साल गर्मियों में जम्मू कश्मीर में पर्यटकों की संख्या ने भी पुराने कीर्तिमान तोड़ दिये। इसीलिए उम्मीद की जा रही है कि इस वर्ष अमरनाथ यात्रा में श्रृद्धालुओं की बाढ़ आ जायेगी। यद्यपि कश्मीर घाटी से आतंकवाद की विदाई हो चुकी है किंतु उसके कुछ बीज अभी भी अंकुरित हो जाते हैं। यही कारण है कि यात्रा मार्ग पर सुरक्षा व्यवस्था का दायित्व  सेना को सौंपा जाता है। लेकिन इस सबसे अलग हटकर जिस पहलू पर लोगों का ध्यान नहीं जाता वह है इस यात्रा से अमरनाथ के पर्यणवरण पर पड़ने वाला प्रभाव। 3 जुलाई से  अमरनाथ यात्रा शुरू होते ही मात्र चार दिनों में लगभग 60 हजार यात्री अमरनाथ की यात्रा कर चुके हैं। 57 दिनों तक चलने वाली इस यात्रा हेतु 4 लाख लोगों का पंजीयन हो चुका है। लेकिन श्रृद्धालुओं को निराश करने वाली खबर ये है कि पवित्र गुफा में बनने वाला पवित्र हिम शिवलिंग तेजी से पिघलकर  करीब एक फीट का रह गया है । जबकि मई माह में इसकी ऊंचाई लगभग 7 फीट और  पहली पूजा के समय  5 फीट से अधिक थी। यदि यही स्थिति रही और पर्यटकों की भीड़ निरंतर बढ़ती गई तब आने वाले दिनों में गुफा के भीतर शिवलिंग आकार ही नहीं लेगा। उल्लेखनीय है अमरनाथ में बढ़ती भीड़ के कारण प्राकृतिक विपदाएं भी आने लगी हैं। इस साल वहाँ हेलीकाप्टर सेवा रोकने का कारण भी पर्यावरण को होने वाले नुकसान को रोकना ही है। सोचने वाली बात ये है कि श्रृद्धालु जिस प्रकृति निर्मित पवित्र शिवलिंग के दर्शन हेतु तरह - तरह के कष्ट सहने के साथ ही समय और पैसा खर्च करते हुए आता है, वही उसे न दिखे तो निराशा और दुःख होना स्वाभाविक है। हालांकि अमरनाथ के इस अद्भुत शिवलिंग का पिघलना नई बात नहीं है। प्रतिवर्ष यात्रा शुरू होने के बाद से ऐसा होता है। इसका सीधा कारण इस निर्जन स्थान पर अचानक भीड़ की मौजूदगी है जो दो महीनों तक बनी रहती है। जैसे - जैसे सनातन के प्रति श्रृद्धा और प्रतिबद्धता में वृद्धि हो रही है वैसे - वैसे धर्मस्थलों में जन सैलाब उमड़ने लगा है। लेकिन जो धर्मस्थल पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित हैं उनमें अपेक्षा से अधिक मानवीय उपस्थिति उनके नैसर्गिक स्वरूप के लिए हानिकारक बनती है । भूस्खलन की बढ़ती घटनाएं इसका प्रमाण हैं। कुछ साल पहले अमरनाथ में  गुफा के पीछे से अचानक आया जनसैलाब प्रलय का एहसास करवा गया था। केदारनाथ त्रासदी की स्मृति भी रोंगटे खड़े कर देती है। ये कहना गलत नहीं है कि  अमरनाथ में शिवलिंग के पिघलने  का सबसे बड़ा कारण वहाँ श्रृद्धालुओं की बढ़ती भीड़ ही है। हमारा आशय किसी की आस्था को ठेस पहुँचाना कदापि नहीं है किंतु तीर्थ यात्रा और पर्यटन में जो भावनात्मक अंतर है उसका निहितार्थ समझने की जरूरत है। और जिस बर्फ़ानी बाबा को देखने जाएं , वही लुप्त रहें तो यात्रा का स्वाभाविक आनंद और उससे जुड़ी आत्मिक शांति प्राप्त नहीं होती। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 6 July 2026

मुंबई की बदहाली शर्मनाक



इस साल मानसून देर से आया। उसके कारण देश के बड़े भूभाग में जल संकट के साथ ही खरीफ फसल के लिए धान के रोपे लगाने में विलंब होने से किसान परेशान है। नदियों, तालाबों और कुओं आदि का जल स्तर खतरे के निशान से भी नीचे चला गया। भूजल स्तर गिरने से जलापूर्ति पर भी बुरा असर पड़ा है। हालांकि अब मानसून सक्रिय होकर आगे बढ़ रहा है। लेकिन जिस तरह उसके विलंबित होने से स्थिति चिंताजनक हो उठी वही दशा उसके आने के बाद देखने मिल रही है। जिसकी बानगी देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई है। बीते दो - तीन दिनों से वहाँ भारी बारिश होने से जनजीवन अस्त - व्यस्त हो गया है। मुंबई - पुणे के रास्ते में अनेक स्थानों पर भूस्खलन के कारण यातायात अवरुद्ध  है। मुंबई महानगर और उसके उपनगरीय क्षेत्रों में भी अति वृष्टि से सभी व्यवस्थाएं चरमरा गई हैं। निचले इलाकों में जल भराव की समस्या तो सभी शहरों में कमोबेश एक जैसी है। लेकिन मुंबई कोई साधारण शहर न होकर वैश्विक पहचान रखता है। इसीलिए यहाँ होने वाली किसी भी छोटी - बड़ी घटना की चर्चा दूर - दूर तक होती है। आज मिल रही खबरों के  मुताबिक मुंबई से जाने और आने वाली उड़ानें बड़ी संख्या में रद्द की जा चुकी हैं या विलम्बित हैं। इस महानगर की जीवन रेखा कही जाने लोकल ट्रेन सेवा पर भी बुरा असर पड़ा है। दर्जनों गाड़ियां रद्द करने से सप्ताह के पहले दिन ही लाखों लोग अपने गन्तव्य तक नहीं जा सके। कुल मिलाकर हालात चिंताजनक होने के साथ ही शर्मनाक भी हैं। हालांकि अप्रत्याशित रूप से होने वाली भारी बरसात के कारण किसी भी शहर में व्यवस्थाएं   गड़बड़ा जाना स्वाभाविक  हैं किंतु मुंबई में ऐसा होना इसलिए शर्मिंदा करता है क्योंकि यह एक अंतर्राष्ट्रीय महानगर होने से देश की छवि को पूरी दुनिया के समक्ष प्रस्तुत करता है।  देश का मुख्य व्यवसायिक केंद्र होने से यहाँ गतिविधियां ठप होने से प्रतिदिन करोड़ों - अरबों का नुकसान होता है। एक ही दिन में जरूरत से ज्यादा बरसात होने पर स्थितियाँ खराब होना स्वाभाविक है लेकिन मुंबई में चूंकि प्रति वर्ष ऐसा होता है इसलिए ये विचारणीय प्रश्न है कि महाराष्ट्र सरकार और मुंबई महानगर पालिका हर साल पैदा होने वाले इस संकट से लोगों को बचाने के लिए क्या करते हैं ? हालांकि देश के सभी महानगरों के अलावा अन्य प्रमुख शहरों की स्थिति भी भारी बरसात होने पर चिंताजनक हो जाती है जिससे ये साबित होता है कि हमारे देश में शहरों की बसाहट और उनका नियोजन दोषपूर्ण है।  अनियोजित विस्तार  और आबादी के बढ़ते बोझ के कारण शहरों की कमर टूटती जा रही है। यद्यपि चर्चा बड़े शहरों की ज्यादा होती है लेकिन बढ़ते शहरीकरण का दुष्प्रभाव अब पूरे देश में अनुभव किया जा सकता है। मुंबई में आई मौजूदा आपदा के परिप्रेक्ष्य में इस दिशा में राष्ट्रीय स्तर पर कदम उठाये जाने चाहिए। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी की स्मार्ट सिटी योजना के तहत अरबों रुपये खर्च करने के बाद जिन शहरों की सूरत सुधारने का दावा सरकारी दस्तावेजों में दर्ज है उनमें भी बरसात बुरे हाल कर देती है। इन सबसे साबित होता है कि  सिर्फ महानगर ही नहीं अपितु छोटे और मध्यम आकार के शहरों में आपदा प्रबन्धन की स्थिति चिंताजनक है। हर साल इससे होने वाले नुकसान को रोकने की व्यवस्था हो सके तो देश की अर्थव्यवस्था को बड़े नुकसान से बचाने के अलावा जनता को होने वाली तकलीफों से निजात मिल सकती है।

- रवीन्द्र वाजपेयी