Thursday, 26 February 2026

हमास की मूर्खता से खून के आंसू पीने मजबूर हैं फिलीस्तीनी


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे समय इजराइल  गए जब ईरान पर अमेरिकी हमले की आशंका से समूचा विश्व परेशान है। यदि डोनाल्ड ट्रम्प  ईरान के शासक खामेनेई को हटाने  के लिए सैन्य कार्रवाई करते हैं तो  वैश्विक अर्थव्यवस्था पूरी तरह हिल जाएगी। दरअसल इस्लामिक देशों में ईरान पर ही अमेरिका का बस नहीं चलता। ज्यादातर अरब देश  अमेरिकी प्रभाव में हैं । ईरान भी रूस और चीन के खुले समर्थन के कारण अमेरिका से ऐंठता है। हालांकि उसका अपना सैन्य सामर्थ्य भी बाकी अरब देशों की तुलना में अधिक है। इजराइल और हमास की जंग में जब इजराइल ने ईरान पर हवाई हमले किए तब  उसने पलटवार करते हुए राजधानी सहित इजराइल के अनेक स्थानों पर मिसाइलों की बरसात कर दहशत फैला दी। उसी वजह से इजराइल भी युद्धविराम के लिए तैयार हुआ। हालांकि तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। ऐसे हालातों में श्री मोदी का तेल अवीव जाना बड़ी कूटनीतिक पहल है। हालांकि इसके पीछे  नए रक्षा सौदों को कारण माना जा रहा है किंतु इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के साथ  करीबी रिश्ते होने से इस यात्रा में  भू - राजनीति की मौजूदा स्थिति और उसमें भारत की भूमिका पर भी चर्चा होगी। लेकिन भारत में कुछ लोगों को यह यात्रा नागवार गुजर रही है। कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश ने तंज किया है कि इजराइल द्वारा फिलिस्तीनियों पर किए जा रहे अत्याचार को नजरअंदाज कर श्री मोदी तेल अवीव जा रहे हैं। असदुद्दीन ओवैसी ने भी दौरे की आलोचना की। वहीं प्रियंका गांधी ने प्रधानमंत्री को सुझाव दिया कि वे इजराइली संसद को संबोधित करते समय फिलीस्तीन का मुद्दा उठाएं। उल्लेखनीय है कांग्रेस हमेशा से इजराइल के साथ प्रगाढ़ संबंध रखने के विरोध में रही है । ओवैसी का इजराइल विरोध भी स्वाभाविक है जिन्होंने लोकसभा की शपथ के बाद फिलीस्तीन के पक्ष में नारा लगाया था। इजराइल - हमास जंग के दौरान प्रियंका भी कंधे पर फिलीस्तीन लिखा झोला टांगकर संसद में नजर आई थीं। निःसंदेह मासूम बच्चों , महिलाओं और वृद्ध - लाचार लोगों पर हमले करना मानवीयता के विरुद्ध है। गाजा में  इजराइली हमलों के कारण  बिजली , पानी , दवाइयां, दूध - भोजन का अभाव होने से लाखों लोग अकल्पनीय यातनाएं झेलने बाध्य हुए। लेकिन संकट के उस दौर में इजिप्ट सहित पड़ोसी मुस्लिम देशों ने अपनी सीमाएं बंद कर दीं ताकि गाजा से शरणार्थी उनके यहां प्रवेश न कर पाएं। आज भारत में जो लोग मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए इजराइल की आलोचना करते हैं उनके मुंह से एक शब्द भी इजिप्ट के विरोध में नहीं सुनाई दिया। स्मरणीय है इजराइल के साथ जो समझौता यासर अराफात के समय हुआ उसमें गाजा और वेस्ट बैंक नामक फिलीस्तीन के दो हिस्से बने। इजराइल दोनों के बीच में हैं। गाजा को बिजली सहित अन्य जरूरी सुविधाएं वही प्रदान करता था। 2006 में हमास नामक इस्लामिक सैन्य संगठन ने गाजा की  सत्ता हथिया ली । ईरान सहित तमाम इजराइल विरोधी मुस्लिम देशों का समर्थन और संरक्षण मिलने से वह मजबूत होता गया। 7 अक्टूबर  2023 को अचानक हमास ने इजराइल पर ड्रोन के जरिए हमले किये और मिसाइलें भी बरसाईं जिससे सैकड़ों इजराइली मारे गए। हमास के लड़ाके इजराइल में घुसकर सैकड़ों लोगों को बंधक बनाकर ले गए। उसी के बाद नेतन्याहू ने आर - पार की जंग छेड़ने का ऐलान करते हुए हमास की कमर तोड़ने का अभियान शुरू किया। आज  फिलीस्तीनी जो भोग रहे हैं उसका कसूरवार  हमास तथा उसकी पीठ पर हाथ रखने वाला ईरान ही है।  सर्वविदित है कि ईरान ने हमास को इसके लिए उकसाया था क्योंकि कुछ  दिनों बाद  ही इजराइल और सऊदी अरब में ऐतिहासिक समझौता होने वाला था ।  ईरान  उसे रुकवाना चाहता था। इसलिए उसने हमास के कंधे का इस्तेमाल किया। इस प्रकार गाजा की बर्बादी और फिलीस्तीन के अस्तित्व पर नए खतरे का जिम्मेदार हमास है। इसलिए भारत में जो राजनीतिक दल फिलिस्तीनियों के लिए आंसू बहा रहे हैं उन्हें हमास की आलोचना करना चाहिए जिसने गाजावासियों को खून के आंसू पीने मजबूर कर दिया। अतीत को  किनारे कर दें तो गाजा में 7 अक्टूबर 2023 के बाद इजराइल ने जो किया वह हमास के पागलपन का दुष्परिणाम  था। ऐसे में इजराइल से पहले हमास को कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। लेकिन न तो ओवैसी ऐसा करेंगे और न ही कांग्रेस क्योंकि ऐसा करने से भारत के मुसलमान नाराज हो जाएंगे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 25 February 2026

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर राष्ट्रीय विमर्श आवश्यक


नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग ( NCERT)  की तरफ से कक्षा 8 के लिए सोशल साइंस की जो नई पुस्तक जारी की गई उसके एक अध्याय को लेकर खूब चर्चा हो रही है जिसमें भारतीय न्यायपालिका  की भूमिका के साथ ही इसमें भ्रष्टाचार की भी बात कही गई है। पुस्तक में लिखा गया है कि हमारी  न्यायिक व्यवस्था में अलग-अलग स्तरों पर भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या है। साथ ही यह भी बताया गया है कि  अदालतों को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है उनमें भ्रष्टाचार भी एक है। इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय से लेकर बाकी तमाम अदालतों में लंबित पड़े मामलों का भी जिक्र करते हुए इसे  बड़ी समस्या बताने  के अलावा लंबित  प्रकरणों के आंकड़े भी दिए  गए हैं। भ्रष्टाचार की बात को साबित करने के लिए पूर्व मुख्य  न्यायाधीश जस्टिस बी. आर गवई के एक बयान को  इस अध्याय में शामिल किया गया है, जिसमें उन्होंने न्यायपालिका के भीतर खामियों की बात कही थी। लेकिन आज इस अध्याय को लेकर नया विवाद उत्पन्न हो गया जब सर्वोच्च न्यायालय में वरिष्ट अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत से इसका का संज्ञान लेने का अनुरोध करते हुए कहा कि इससे न्यायपालिका की छवि खराब होगी। इस  पर प्रधान न्यायाधीश  ने कहा कि वह किसी को भी न्यायपालिका को बदनाम करने की इजाजत नहीं देंगे। श्री सूर्यकांत ने कहा कि उन्हें इस विषय पर कई फोन और संदेश मिले हैं और  पूरी तरह से मामले से अवगत हैं । उन्हें पता है कि इससे कैसे निपटना है। उन्होंने संकेत दिया कि यह एक सुनियोजित और सोची-समझी कोशिश लगती है वे इस पर अभी ज्यादा टिप्पणी नहीं करना चाहते, लेकिन उचित कदम उठाए जाएंगे। अब चूंकि खुद मुख्य न्यायाधीश ने संज्ञान ले लिया है इसलिए माना जा सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय उक्त अध्याय को हटाने के लिए दबाव बनाया जाएगा और सरकार भी न्यायपालिका की नाराजगी से बचने के लिए उसके आदेश को शिरोधार्य कर लेगी। ये भी संभव है कि जिस विभाग ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार जैसे संवदेनशील विषय को पाठ्यक्रम में शामिल करने का दुस्साहस किया उसके दो - चार अधिकारियों पर गाज गिर जाए। न्यायपालिका से जुड़े संगठन भी वैसा ही बवाल मचा सकते हैं जैसा कि हाल ही में यूजीसी द्वारा जारी नियमावली के विरोध में देखने मिला था। लेकिन इससे अलग हटकर देखें तो न्यायापालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार किसी से छिपा नहीं है। उसे विद्यालयीन छात्रों को पढ़ाए जाने के औचित्य पर सवाल उठ सकते हैं किंतु समय आ गया है जब इस बारे में राष्ट्रीय विमर्श हो। जो न्यायपालिका भ्रष्टाचार के दोषियों को दंड देती है यदि उसके दामन पर भी दाग लगने लगें तो समूची व्यवस्था के प्रति अविश्वास और नाराजगी उत्पन्न होगी ही। कुछ हद तक इसका एहसास होने भी लगा है। पुस्तक में जो सामग्री समाहित है उसकी समीक्षा कर आपत्ति जताने का न्यायपालिका को पूरा अधिकार है किंतु जितनी तत्परता इस मामले में दिग्गज अधिवक्ता और माननीय न्यायाधीश दिखा रहे हैं वैसी ही अन्य जरूरी मामलों में नजर क्यों नहीं आती उसका उत्तर कौन देगा? सही बात ये है कि भ्रष्टाचार गाजर घास की तरह राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त है और न्यायपालिका भी  अछूती नहीं है। हालांकि आज भी न्यायाधीशों का बड़ा वर्ग अपनी कर्तव्यनिष्ठा के लिए विख्यात है किंतु सभी के बारे में ऐसी गारंटी नहीं ली जा सकती। भले ही ये बात अच्छी न लगे किंतु अधिवक्ता समुदाय भी इस पवित्र संस्था की छवि खराब करने के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। त्वरित और सस्ते न्याय के आश्वासन केवल उपदेशों तक सीमित रह गए हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति से लेकर सेवानिवृत्ति के उपरांत उन्हें दिए जाने वाले पदों को लेकर तरह - तरह की चर्चाएं सुनाई देती हैं। बेहतर हो न्यायपालिका इन विषयों का संज्ञान लेकर जनमानस में अपनी छवि को सुधारने आगे आए क्योंकि विश्वास के बढ़ते संकट के बीच वही है जिससे कोई उम्मीद है वरना तो पूरे कुएं में भांग घुलने वाली स्थिति है ।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 24 February 2026

भ्रष्टाचार के बोझ से ढह रहे विकास रूपी पुल


म.प्र में जबलपुर - भोपाल हाइवे पर शहपुरा के निकट बना पुल गत दिवस ढह गया। इसका एक हिस्सा कुछ माह पहले क्षतिग्रस्त होने के कारण उसकी मरम्मत चल रही थी । लेकिन दो दिन पहले दूसरे हिस्से का भी वही हश्र हुआ। उस पुल के नीचे से रेल की पटरी गुजरती है। जिस समय पुल टूटा तब कोई रेलगाड़ी वहां से नहीं गुजरी अन्यथा बड़ी अनहोनी घट जाती। पुल ढहने की खबर फैलते ही शासन - प्रशासन हरकत में आया और ठेकेदार सहित निर्माण कार्य की देखरेख करने वाली  कंपनी को ब्लैक लिस्ट करने के अलावा अपराधिक प्रकरण दर्ज करवा दिया गया। लोक निर्माण मंत्री ने पुल निर्माण की प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों की पेंशन रोकने जैसी घोषणा भी कर डाली। इस मार्ग के यातायात को वैकल्पिक रास्तों पर मोड़ दिया गया। पुल को दोबारा उपयोग लायक बनाने में कितना समय लगेगा ये कहना कठिन है और तब तक जबलपुर से सड़क मार्ग जाने वाले वाहनों को अपेक्षाकृत कम बेहतर रास्तों से आवागमन करना होगा जिससे ज्यादा समय लगने के अलावा जाम की स्थिति भी बनना तय है जो पहले दिन से ही दिखाई देने लगी। जनता की मांग है कि इस हिस्से का टोल टैक्स तब तक न वसूला जाए जब तक पुल पर दोबारा यातायात शुरू न हो।  जाहिर है विपक्ष  प्रदेश सरकार को घेरेगा जो उसका अधिकार भी है और दायित्व भी। लोकनिर्माण मंत्री ने इसीलिए बिना देर लगाए हादसे के जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कड़े कदम उठाने की पहल कर दी। सवाल ये है कि ऐसे  निर्माणों में इस तरह की लापरवाही और भ्रष्टाचार कब तक होता रहेगा? देश भर में आए दिन सड़क , पुल - पुलिया में घटिया निर्माण की बात सामने आती है। और फिर वैसा ही कर्मकांड होता है जैसा संदर्भित घटना के बाद देखने मिल रहा है। भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की तरफ बढ़ रहा है। हाइवे और एक्सप्रेस हाइवे के कारण सड़क मार्ग की यात्रा आरामदेह हो गई। परिणामस्वरूप देश के ऑटोमोबाइल उद्योग को भी पंख लग गए। फ्लाय ओवर और एलीवेटेड सड़कें बदलते भारत की तस्वीर पेश करते हैं। दो दिन पूर्व ही दिल्ली से मेरठ के बीच वंदे भारत प्रारंभ होने से ढाई - तीन घंटे की यात्रा एक घंटे में संभव हो गई। बुलेट ट्रेन शुरू होने का समय भी नजदीक आ रहा है। आधारभूत संरचना ( इंफ्रास्ट्रक्चर) पर विशेष ध्यान दिए जाने से देश का आत्मविश्वास बढ़ा है। लेकिन जिस एक बात की कमी खलती है वह है गुणवत्ता का अभाव। इसके पीछे केवल लापरवाही हो तो समझ में आता है किन्तु असली समस्या है भ्रष्टाचार । बिहार में तो एक पुल ऐसा भी है जो निर्माण के दौरान जितनी बार ढहा वह एक रिकॉर्ड है। गुजरात में भी एक नदी पर बने पुल का नवीनीकरण होने के बाद वह ढह गया जिससे दर्जनों लोग डूबकर मर गए। ऐसे जाने कितने हादसे यदा - कदा सुनने में आते हैं जिनमें जनहानि होने के बाद सरकार मुआवजा बांटकर दाएं - बाएं हो जाती है। जांच के दिखावे के बाद कुछ बलि के बकरे हलाल किए जाते हैं और फिर भ्रष्ट व्यवस्था अपनी गति से चल पड़ती है। यही वजह है कि विकास के ज्यादातर काम गुणवत्ता की कसौटी पर फिसड्डी साबित हो जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि ठेकेदार , इंजीनियर , अधिकारी और नेताओं के इस अपवित्र गठबंधन से देश को आज़ादी कब मिलेगी ? जब हम विकसित देशों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का हौसला दिखा रहे हैं तब हमें ये भी देखना होगा कि वहां भ्रष्टाचार करने वाले को किस प्रकार का दंड दिया जाता है ? सबसे ज्यादा जीडीपी पर  अपनी पीठ ठोकने के साथ ही ये सोचने की भी जरूरत है कि कहीं वह भ्रष्टाचार  के बोझ तले दबकर न रह जाए। देश में सैकड़ों वर्ष पुराने  मंदिरों , किलों और महलों के अलावा पुल भी हैं । आजादी के पहले बने अनेक छोटे - छोटे बांध आज भी खड़े हैं। चूंकि निर्माण में ईमानदारी बरती गई थी इसलिए इनकी मजबूती आज  भी यथावत है। लेकिन स्वाधीन भारत में जो सरकारी निर्माण हुए उनमें कुछ अपवाद छोड़कर बाकी की स्थिति किसी से छिपी नहीं है।  ये कहना किसी भी दृष्टि से गलत नहीं है कि  देश में भ्रष्टाचार और बेईमानी में वृद्धि की दर जीडीपी से कहीं ज्यादा है। जबलपुर के निकट ढहा पुल कहने को तो छोटा सा हादसा है क्योंकि उसमें कोई हताहत नहीं हुआ। लेकिन देखने वाली बात ये है कि वह पुल बहुत पुराना नहीं है। इस घटना के बाद पूरे प्रदेश से अनेक ऐसे पुलों की जानकारी आ रही है जो घटिया निर्माण के कारण कभी भी गिर सकते हैं। राज्य सरकार और संबंधित विभागों का ये दायित्व है कि उन सबकी फौरन जांच करवाकर जो भी उचित हो किया जावे जिससे आने वाले खतरे को समय रहते टाला जा सके। और ये भी कि इन सबके लिए जो भी दोषी हों उन्हें इतना कड़ा दंड मिले जिससे भ्रष्टाचार करने वालों का कलेजा कांपे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 23 February 2026

शीर्ष धर्माचार्यों के आचरण की समीक्षा करने की व्यवस्था जरूरी


हाल ही में दो और हिन्दू धर्माचार्य यौन शोषण के आरोप में घिर गए। उत्तम स्वामी नामक आध्यात्मिक हस्ती के विरुद्ध राजस्थान की एक युवती ने शोषण की शिकायत कर सनसनी फैला दी। आरोप लगते ही स्वामी  जबलपुर के निकट अपने आश्रम में हो रही कथा छोड़कर कहीं चले गए। ये महाशय कुछ समय पहले म.प्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से इस कारण नाराज हो गए थे क्योंकि वे उनके आयोजन में समय देकर भी नहीं पहुंच सके। सौजन्यतावश श्री यादव ने आभासी माध्यम से उनसे क्षमा भी मांगी किंतु बजाय क्षमा याचना स्वीकार करने के स्वामी ने उन्हें खूब फटकारा। जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार भाजपा के बड़े - बड़े नेता इनके अनुयायी हैं। दूसरी घटना बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य  होने का दावा करने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़ी है जिनके विरुद्ध पास्को कानून में प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश न्यायालय ने जारी किया है। इसका आधार वह शिकायत है जिसके अनुसार उनके किसी आश्रम में कुछ बालकों का भी यौन शोषण हुआ। उल्लेखनीय है दो पीठों के शंकराचार्य रहे स्वामी स्वरूपानंद की मृत्यु उपरांत स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बद्रीनाथ पीठ के शंकराचार्य बने किंतु उनकी नियुक्ति शुरुआत से ही विवादों में घिरी रही। जगन्नाथ पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सहित अनेक धर्मगुरु और अखाड़ा परिषद तक उन्हें विधिवत नियुक्त शंकराचार्य नहीं मानती। ये विवाद भी न्यायालय में विचाराधीन है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को चर्चा में रहने का शौक भी है। हाल ही में प्रयागराज के माघ मेले में भी इन्होंने बखेड़ा खड़ा कर दिया जिसके  बाद बिना स्नान किए ही इन्हें वापस जाना पड़ा। उसके बाद से ये उ.प्र के मुख्यमंत्री  योगी आदित्यनाथ के पीछे पड़ गए। वैसे तो वे प्रधानमंत्री से भी चिढ़ते हैं। यद्यपि इनके गुरु स्वामी स्वरूपानंद जी भी ऐलानिया तौर पर कांग्रेस समर्थक माने जाते थे किंतु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जिस तरह की कड़वाहट दिखाते हैं उससे उनकी छवि एक आदतन असंतुष्ट व्यक्ति की बन गई। उनके विरुद्ध जो प्रकरण दर्ज हुआ उसमें यदि वे गिरफ्तार हुए तब उनकी स्थिति भी आशाराम बापू जैसी होकर रह जाएगी। लेकिन यहां सवाल किसी उत्तम स्वामी या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद नामक व्यक्ति का नहीं बल्कि सनातन धर्म की परंपरा के ध्वजावाहक आध्यात्मिक विभूतियों के चरित्र पर लगे लांछन का है।  इन जैसे अन्य किसी भी धर्मगुरु पर जब इस तरह का आरोप लगता है तब उससे केवल उनकी प्रतिष्ठा ही तार - तार नहीं होती अपितु सनातन धर्म में आस्था रखने वाले असंख्य लोगों की भावनाएं आहत होती हैं। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि अनेक साधु - संन्यासी  पद , प्रतिष्ठा, विलासितापूर्ण जीवनशैली के मोहपाश में बंधते जा रहे हैं। उनके पास नेता , अधिकारी , बिल्डर और अन्य  ऐसे तत्व भी मंडराते दिखते हैं जो उनकी आड़ में अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं और बदले में वे उनके सुख - सुविधा का प्रबंध करते हैं। जैन मुनियों के विपरीत सनातन धर्म से जुड़ी अध्यात्मिक विभूतियों में सांसारिकता के प्रति जो लगाव बढ़ता जा रहा है उससे  सनातन धर्म के आलोचकों को मुंह चलाने का अवसर बिन मांगे मिल जाता है। उत्तम स्वामी और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर लगे आरोपों की सत्यता तो जांच के बाद ही सामने आएगी किन्तु सनातन धर्म के संचालन की जो वर्तमान व्यवस्था है उससे जुड़े महानुभावों को अपने आभामंडल की चिंता छोड़कर ऐसी आचार संहिता बनानी चाहिए जिससे साधु - संन्यासी का चोला ओढ़कर धर्म विरोधी आचरण करने वालों पर लगाम कसी जा सके। उत्तम स्वामी और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर लगे आरोप की जांच करना और दोषी पाए जाने पर दंडित करना तो अदालत के अधिकार में आता है लेकिन धर्म से जुड़ी विभूतियों के आचार - व्यवहार का निर्देशन  - नियंत्रण करने के लिए धार्मिक क्षेत्र की ही कोई नियामक संस्था होनी चाहिए। अखाड़ा परिषद, विद्वत परिषद और चारों शंकराचार्यों को मिलकर धर्म संस्थान से जुड़े प्रमुख लोगों के आचार - व्यवहार पर नजर रखने के साथ ही समय - समय पर उसकी समीक्षा भी करनी चाहिए। साधु के आवरण में शैतानी के उदाहरण पौराणिक काल से मिलते रहे हैं किंतु तब की दंड प्रक्रिया भी प्रभावशाली थी। बड़े - बड़े धर्माचार्य बात - बात में ये दुहाई तो देते हैं कि वे कानून से ऊपर हैं तब ये प्रश्न भी उठता ही है कि फिर उनके धर्मविरुद्ध आचरण पर दंड देने का अधिकार किसे है? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 21 February 2026

ए .आई समिट में उपद्रव से कांग्रेस की ही छवि धूमिल हुई



राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक विरोध की अभिव्यक्ति लोकतांत्रिक समाज की पहचान है। विपक्ष में बैठे दल और उनके नेता सरकार को घेरने का कोई अवसर अवसर नहीं छोड़ते। लेकिन जहां देश का हित और प्रतिष्ठा जुड़ी हो वहां दलीय मतभेद किनारे रखते हुए एकजुटता का प्रदर्शन जरूरी होता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब देश पर उत्पन्न संकट के समय और राष्ट्रीय गौरव से जुड़े किसी भी प्रसंग के अवसर पर सर्वदलीय एकता देखने मिली। लेकिन अब दलीय स्वार्थ को प्राथमिकता देते हुए देश के सम्मान से खिलवाड़ किया जाने लगा है। उदाहरणार्थ गलवान घाटी और ऑपरेशन सिंदूर में सेना द्वारा प्रदर्शित पराक्रम पर सवाल उठाए गए। बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक की सफलता पर भी संदेह जताया गया। ताजा प्रकरण है दिल्ली में चल रही ए. आई समिट में कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा कपड़े उतारकर प्रदर्शन और नारेबाजी करना। कांग्रेस पार्टी के अनुसार उसके कार्यकर्ता भारत - अमेरिका ट्रेड डील का विरोध करने गए थे। इस डील का विरोध करने का कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों को पूरा अधिकार है। यदि उसमें कहीं भी देश के हितों के साथ समझौता हुआ हो तो उसके विरुद्ध आवाज उठाने में कोई बुराई नहीं है। संसद में भी विपक्ष उसके कुछ प्रावधानों पर अपनी आपत्तियां दर्ज करवा चुका है जिसके उत्तर में सरकार के मंत्रियों ने स्पष्ट किया कि भारत के किसानों सहित अन्य वर्गों के हितों की सुरक्षा का ध्यान रखा गया है। अमेरिकी सरकार ने भी कुछ स्पष्टीकरण दिए। ऐसे में बेहतर होगा विपक्ष और उक्त डील पर ऐतराज जता रहे अन्य संगठन अंतिम फैसला होने तक प्रतीक्षा करते। यदि उन्हें अपनी सक्रियता ही दिखानी है तो विरोध के और भी तौर - तरीकों और मंचों का उपयोग किया जा सकता था। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ए. आई समिट जिसमें अनेक राष्ट्रप्रमुखों के अतिरिक्त दुनिया की दिग्गज बहुराष्ट्रीय आई. टी कंपनियों के शीर्ष अधिकारी , देशी - विदेशी उद्योगपति एकत्र हुए हों, उसके आयोजन स्थल में घुसकर जिस तरह का प्रदर्शन कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया उससे पार्टी की विवेक शून्यता एक बार फिर उजागर हो गई। ए. आई समिट भाजपा का आयोजन नहीं है। अपितु उसकी मेजबानी भारत सरकार द्वारा की गई। दुनिया भर की हस्तियों की उपस्थिति से ये साबित हो गया कि भारत के तकनीकी कौशल और प्रबंधन क्षमता के प्रति विश्वास बढ़ा है। गूगल सहित अन्य विदेशी कंपनियों द्वारा ए. आई के क्षेत्र में अरबों - खरबों के निवेश की घोषणा इस आयोजन की सफलता का जीता - जागता प्रमाण है। कांग्रेस को यदि ये इसलिए अच्छा नहीं लग रहा कि समिट में आए राष्ट्रप्रमुखों और कार्पोरेट जगत की शीर्ष वैश्विक हस्तियों ने प्रधानमंत्री श्री मोदी की प्रशंसा की तो ये उसकी खीझ दर्शाता है । उसे ये नहीं भूलना चाहिए कि इस समिट ने भारत की प्रतिष्ठा में वृद्धि की है और ए. आई के क्षेत्र में वह विश्व का नेतृत्व करने की हैसियत में आ गया। ये बात भी सही है कि इसका श्रेय श्री मोदी को मिल रहा है और मिलना भी चाहिए। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस समिट की आलोचना की थी किंतु उन्हीं की पार्टी के वरिष्ट नेता शशि थरूर ने खुलकर उसकी प्रशंसा की। बावजूद इसके कांग्रेस को इस आयोजन में रही कमियों पर उंगली उठाने का पूरा अधिकार है किंतु भारत - अमेरिकी ट्रेड डील के बहाने आयोजन स्थल में घुसकर उत्पात करने का औचित्य समझ से परे है। राहुल गांधी प्रधानमंत्री और भाजपा का उग्र विरोध कर अपना राजनीतिक भविष्य उज्ज्वल करना चाह रहे हैं । लेकिन उसका जनमानस पर प्रभाव क्यों नहीं पड़ता इसका विश्लेषण उन्हें करना चाहिए। लोकसभा चुनाव में सीटें बढ़ जाने से उन्हें ये लगने लगा था कि श्री मोदी की चमक कम हो गई किंतु उसके बाद जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए उनमें कांग्रेस का दयनीय प्रदर्शन श्री गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े करने पर्याप्त है। ए. आई समिट में कांग्रेस कार्यकर्ताओं का अशोभनीय प्रर्दशन इस बात का प्रमाण है कि पार्टी में अपनी गलतियों से सीख लेने की प्रवृत्ति समाप्त हो चुकी है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 20 February 2026

मुफ्त योजनाओं को रोकने सर्वोच्च न्यायालय को ही आगे आना होगा


कुछ साल पहले भी सर्वोच्च न्यायालय यही बात कह चुका है। गत दिवस एक बार मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत सहित दो अन्य न्यायाधीशों की संयुक्त पीठ ने सरकार द्वारा चलाई जा रही मुफ्त  योजनाओं पर तंज़ कसते हुए कहा कि यदि सबको मुफ्त खाद्यान्न और नगद राशि दी जाएगी तो लोग काम क्यों करेंगे ? न्यायालय ने जरूरतमंदों को  लाभान्वित किए जाने के औचित्य को तो स्वीकार किया किन्तु जो साधन संपन्न हैं उन्हें ही सरकारी सहायता दिए जाने पर ऐतराज जताया। उसने इस बात का उल्लेख किया कि मुफ्त योजनाएं चुनाव जीतने का औजार बनती जा रही हैं और धीरे - धीरे केंद्र के अलावा राज्यों ने भी इस तरीके को अपना लिया। न्यायालय ने राज्यों द्वारा कर्ज में डूबे होने के बाद भी  सरकारी खजाना लुटाए जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए समझाइश दी कि बजाय मुफ्त में खिलाकर निठल्ला बनाने के सरकार लोगों को रोजगार दे और अपना धन विकास कार्यों में खर्च करे । पीठ ने निर्धन और साधनहीन विद्यार्थियों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए आर्थिक सहायता देने की पैरवी करते हुए कहा कि सरकारी सहायता उन्हीं को मिले जो इसके सुपात्र हैं। उल्लेखनीय है इसकी शुरुआत दशकों पहले तमिलनाडु से हुई जब के. कामराज ने शालाओं में बच्चों के निःशुल्क आहार की योजना लागू की।  बाद में जितने मुख्यमंत्री आए उन सबने मुफ्त योजनाओं में नया कुछ जोड़ा और जयललिता के आते तक तक मिक्सी , मंगलसूत्र और टी.वी बांटकर चुनाव जीतने का प्रबंध होने लगा। इससे प्रेरित होकर अन्य राज्यों में भी  सत्ता हासिल करने और फिर उसमें बने रहने के लिए सरकारी खजाने को लुटाने का जो सिलसिला प्रारंभ हुआ वह शेर की सवारी का रूप ले चुका है  जिस पर रोक लगाना राजनीतिक आत्महत्या करना होगा। गत  वर्ष दिल्ली विधानसभा के चुनाव में प्रधानमंत्री ने जब आदमी पार्टी सरकार  की मुफ्त योजनाओं को रेवड़ी कहकर उनकी आलोचना की तब जवाब में अरविंद केजरीवाल ने  ये प्रचार शुरू कर दिया कि भाजपा सत्ता में आई तो वह मुफ्त बिजली, पानी और महिलाओं की बस यात्रा पर रोक लगा देगी । इस प्रचार से घबराई भाजपा ने  आश्वासन दिया कि सभी मुफ्त सुविधाएं जारी रहेंगी और झुग्गी वासियों को पक्के मकान दिये जाएंगे। भाजपा ने आम आदमी पार्टी द्वारा महिलाओं को प्रति माह 2100 रु. के वायदे से आगे बढ़कर 2500 रु. देने का वायदा कर दिया। विडंबना ये है कि सभी दल एक  - दूसरे पर खैरात बाँटकर चुनाव जीत लेने का आरोप लगाते हैं किंतु खुद  उससे परहेज नहीं करते। आशय ये है कि खेल सभी एक जैसे  रहे हैं किंतु हारने वाला विजेता पर बेईमानी  का आरोप लगाने से बाज नहीं आता। पूर्व में सर्वोच्च न्यायालय ये पूछ चुका है कि सरकार मुफ्त अनाज कब तक बांटेगी? कांग्रेस भी मोदी सरकार के आर्थिक प्रगति के दावे का मजाक उड़ाते हुए कहती है कि ऐसा है तो 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज क्यों देना पड़ रहा है ? लेकिन  मुफ्त अनाज वितरण जिस राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत किया जा रहा है वह सोनिया गाँधी की पहल पर मनमोहन सिंह सरकार द्वारा ही  पारित करवाया गया था। कुछ साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने ही सरकारी गोदामों में अनाज के सड़ने की शिकायतों पर कहा था कि इससे बेहतर है वह गरीबों में बाँट दिया जाए। मोदी सरकार ने कोरोना काल में जब निःशुल्क अनाज वितरण शुरू किया तब वह समय की मांग थी जिसे अब वह चाहकर भी  बंद नहीं कर पायेगी । चुनाव आयोग भी कह चुका है कि ऐसा करना उसके लिए तभी संभव होगा जब संसद उसके लिए कोई कानून बनाए जिसके कोई आसार नजर नहीं आते। सवाल ये है कि सर्वोच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान लेकर चुनाव के समय मुफ्त योजनाओं के वायदे किये जाने पर रोक क्यों नहीं लगाता? अनेक मामलों में वह ऐसा कर भी चुका है। ये मुद्दा भी विचारणीय है कि आर्थिक संसाधनों की कमी के बाद भी इस तरह के वायदे करने का क्या औचित्य है जिनके कारण विकास सहित अन्य महत्वपूर्ण कार्य प्रभावित होते हैं।  लोकतंत्र में कमजोर वर्ग का संरक्षण सरकार का दायित्व होता है। भारत के अलावा अन्य देशों में भी अनुदान के जरिये लोगों की मदद की जाती है। लेकिन संपन्न देश तो सक्षम हैं जबकि विशाल आबादी वाले भारत जैसे देश में  मुफ्त योजनाओं को स्थायी बना देना व्यवहारिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से अनुचित है। चूंकि राजनीतिक नेताओं को मुफ्त योजनाओं के भरोसे चुनाव जीतना आसान लगता है इसलिए उनसे कोई उम्मीद करना बेकार है। चुनाव आयोग में पदस्थ नौकरशाहों में भी बिल्ली के गले में घंटी बांधने का साहस नहीं है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय को ही आगे आकर स्वतः संज्ञान लेते हुए ठोस कदम उठाना चाहिए जिससे सत्ता हासिल करने के लिए सरकारी धन का अनुचित उपयोग रोका जा सके।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 19 February 2026

कर्ज का बोझ बजट में दिखाए सपनों पर भारी पड़ सकता है


म.प्र सरकार द्वारा आगामी वित्तीय वर्ष का बजट गत दिवस विधान सभा में प्रस्तुत किया गया। जहां तक प्रतिक्रियाओं का सवाल है तो सरकार समर्थक जहां वित्तमंत्री जगदीश देवड़ा द्वारा पेश इस बजट  को क्रांतिकारी मानते हुए प्रदेश के सर्वांगीण विकास में सहायक बताते नहीं थक रहे वहीं विपक्ष की नजर में यह आंकड़ों की बाजीगरी के सिवाय और कुछ भी नहीं। इसी तरह व्यापार और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों की राय भी  भिन्न - भिन्न है। जिस उद्योग या व्यवसाय को वित्तमंत्री ने कोई सौगात अथवा राहत प्रदान की वह  इसकी प्रशंसा में जुटा है किंतु जिनके हाथ कुछ नहीं लगा वे जाहिर तौर पर नाखुश हैं। क्षेत्रीय स्तर पर भी ऐसा ही अनुभव किया जा सकता है।  जिस इलाके की विकास योजनाओं के लिए धन का प्रावधान किया गया , उनके लिए यह बजट स्वागत योग्य है और जो क्षेत्र वंचित रह गए उनमें बिना लाग लपेट के इसे विकास विरोधी माना जा रहा है। शासकीय कर्मचारियों, बेरोजगार नौजवानों और गृहिणियों के बीच भी बजट को लेकर प्रतिक्रियाएं तात्कालिक लाभ या नुकसान पर आधारित है। वित्तमंत्री ने लाभार्थियों के लिए जी भरकर खजाना खोला है। शिक्षा , स्वास्थ्य और  आधारभूत संरचना के लिए भी आकर्षक प्रावधान किए गए हैं। विकास के कुछ बड़े प्रकल्पों का संकल्प भी उन्होंने दर्शाया है। लेकिन सबसे बड़ी बात है श्री देवड़ा ने  किसी भी प्रकार का नया कर नहीं लगाया । हालांकि ये एक तरह का  फैशन सा बन गया है जिसके जरिए बजट को लोक - लुभावन बनाने का प्रयास किया जाता है। वैसे भी आम जनता को बजट का तकनीकी  पक्ष उतना पल्ले नहीं पड़ता जितना ये कि उस पर कितना बोझ  बढ़ेगा या कितनी राहत मिलेगी? दरअसल नया कर लगाने से परहेज कर ज्यादातर वित्तमंत्री खुद को जनता का शुभचिंतक साबित करने का प्रयास करते हैं और वही श्री देवड़ा ने बड़ी ही खूबसूरती से किया। म.प्र में 2003 से अब तक मात्र 15 माह की कमलनाथ सरकार छोड़कर भाजपा ही सत्ता पर काबिज है। इसमें दो मत नहीं हैं कि इस अवधि में प्रदेश उस दयनीय अवस्था से  काफी हद तक बाहर आया है जो 10 साल कांग्रेस  की सरकार चलाने वाले दिग्विजय सिंह छोड़ गए थे। उनके शासनकाल में बिजली, सड़क और पानी की जो शर्मनाक स्थिति थी उसमें जबरदस्त सुधार हुआ है और यही कारण रहा कि कभी बीमारू राज्य के तौर पर बदनाम यह प्रदेश कृषि और उद्योगों के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति कर सका। सड़कों और बिजली की भरपूर उपलब्धता ने बड़े औद्योगिक घरानों को यहां निवेश हेतु आकर्षित किया वहीं पर्यटन भी बढ़ा। लेकिन यह उपलब्धि कुछ क्षेत्र विशेष तक सीमित रहने से जो क्षेत्रीय असंतुलन उत्पन्न हो गया है उसे दूर करना बेहद जरूरी हैं । प्रदेश में जनकल्याण की जो योजनाएं प्रारंभ की गईं उनकी वजह से जहां भाजपा का जनाधार मजबूत हुआ वहीं समाज के पिछड़े वर्ग की स्थिति में भी सुधार हुआ। इन योजनाओं की सफलता का असर पूरे देश में देखने मिल रहा है। 2023 में शिवराज सिंह चौहान द्वारा लागू की गई लाड़ली बहना योजना तो तकरीबन प्रत्येक राज्य में अलग - अलग नामों से लागू की जा रही है। लेकिन इस सबसे अलग हटकर देखें तो डॉ. मोहन यादव की सरकार के इस महत्वाकांक्षी बजट के आकर्षक प्रावधानों को प्रदेश पर बढ़ते जा रहे कर्ज का बोझ झटका दे सकता है। ऐसे में ये प्रश्न सहज रूप से उठता है कि कर्ज पर आधारित  अर्थव्यवस्था उन लक्ष्यों को पूरा करने में कहां तक कामयाब हो सकेगी जो बजट में निर्धारित किए गए। यदि वित्तमंत्री के इस स्पष्टीकरण पर विश्वास कर भी लिया जाए कि जितना भी कर्ज लिया गया उसका उपयोग आधारभूत संरचना एवं अन्य विकास कार्यों में ही किया गया तो भी ये प्रश्न तो उठेगा ही कि बिना नया कर लगाए जनकल्याण योजनाओं और नई विकास परियोजनाओं के लिए राशि कहां से आएगी? जब तक प्रदेश में तमिलनाडु , गुजरात और महाराष्ट्र जैसा सघन औद्योगिकीकरण नहीं हो जाता तब तक करों की आय के अलावा बेरोजगारी की स्थिति में भी सुधार होना मुश्किल है। बजट में हजारों नई सरकारी नौकरियों का प्रावधान स्वागतयोग्य है किंतु प्रदेश सरकार का स्थापना व्यय और बढ़ने से नई परेशानियां सामने आए बिना नहीं रहेंगी। बजट में किसानों , महिलाओं , युवाओं सहित हर वर्ग को लुभाने के प्रावधान हैं किंतु ले देकर वही बात आ जाती है कि बिना आय बढ़ाए ये सपने पूरे कैसे होंगे?  विकासशील अर्थव्यवस्था में कर्ज लेना बुरा नहीं बशर्ते उसकी अदायगी के लिए दूरदर्शी नियोजन किया जाए। उधार लेकर घी पीने की महर्षि चार्वाक की सलाह तात्कालिक सुख तो दे सकती है किंतु कालांतर में कष्टकारक होती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी