Thursday, 5 November 2026

पराजय के बाद भी ट्रम्प का पागलपन जारी रह सकता है



हालांकि अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प की पराजय के संकेत स्पष्ट तौर पर मिल रहे थे लेकिन उसके बाद भी वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बनी रही। ये माना जा रहा था कि अमेरिकी जनता की नाराजगी दूर करने के लिए शायद वे ईरान युद्ध को रोककर शांति स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाकर अपनी छवि में सुधार करने का दाँव चलेंगे। लेकिन मतदान के ठीक पहले ट्रम्प ने ईरान पर जबरदस्त हवाई हमलों की कारवाई कर डाली। उनका वह निर्णय वाकई चौंकाने वाला था क्योंकि तमाम सर्वेक्षण ये बता रहे थे कि ईरान के साथ चल रही जंग से अमेरिकी जनता बेहद नाराज है क्योंकि उसके कारण उनके देश को हासिल तो कुछ हुआ नहीं उल्टे महंगाई की मार पड़ गई। सबसे बड़ा नुकसान अमेरिका के दबदबे में कमी होने के रूप में सामने आया। ट्रम्प को लगता था कि ईरान कुछ दिनों में घुटने टेक देगा लेकिन उसने जो पलटवार किया उसकी वजह से पूरा प. एशिया युद्ध की लपटों में घिर गया। अमेरिका की सैन्य शक्ति की पोल खुलना उसका सबसे बड़ा नुकसान है।  गैर जिम्मेदाराना धमकियों की वजह से भी उनकी जगहंसाई हुई। कल चुनाव परिणाम आने के बाद ट्रम्प के साथ ही उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने स्वीकार किया कि उनकी पार्टी की जबरदस्त पराजय का कारण ईरान के साथ युध्द ही है। इससे ऐसा लगा कि इस हार के बाद ट्रम्प  लड़ाई रोकने का फैसला करेंगे। इसी उम्मीद में अमेरिका सहित पूरी दुनिया के शेयर बाजार गुलजार हो उठे। भारत में भी निवेशकों की बल्ले - बल्ले हो गई। कच्चे तेल के दाम भी तेजी से नीचे आये। लेकिन इसके बाद उन्होंने एक बार फिर वही सब कहना शुरू कर दिया जिसकी वजह से उनकी फजीहत हुई। इसलिए ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि प. एशिया में शांति स्थापित होगी और कच्चे तेल की आपूर्ति में आये व्यवधान के कारण वैश्विक स्तर पर जो उथलपुथल मची वह भी रुक जाएगी। इसका कारण ट्रम्प का यह बयान है कि अगर उन्हें दोबारा मौका मिले, तो भी वह ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का ही फैसला लेंगे ताकि तेहरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोका जा सके। उन्होंने ये डींग भी हाँकी कि जंग को कब रोकना है, यह पूरी तरह उनके विवेक पर निर्भर करेगा। यद्यपि  रक्षा विशेषज्ञों का सोचना है कि घरेलू  राजनीतिक परिस्थितियों में आये बदलाव के बाद अब उन पर ईरान के साथ कूटनीतिक समझौता  कर लड़ाई रोकने का दबाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है। भले ही ट्रम्प ये दावा कर रहे हैं कि वे राष्ट्रपति को प्राप्त वीटो के अधिकार का उपयोग कर कांग्रेस ( संसद )के निर्णयों को लागू होने से रोकेंगे किंतु दोनों सदनों कब्जा कर चुके डेमोक्रेट्स  ट्रम्प प्रशासन की युद्ध नीतियों पर नियंत्रण करने की तैयारी कर रहे हैं। इसके अंतर्गत युद्ध के खर्चों और सैन्य बजट की कड़ी समीक्षा के अलावा राष्ट्रपति को प्राप्त बिना कांग्रेस की मंजूरी के युद्ध जारी रखने की सैन्य शक्तियों को सीमित करने के लिए कानून लाने के संकेत भी मिल रहे हैं। कूटनीतिक चैनलों से आ रही खबरों के अनुसार मध्यावधि चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की ऐतिहासिक शिकस्त से  ट्रम्प बैकफुट पर आ गए हैं। और कतर व ओमान जैसे बिचौलियों के जरिए पर्दे के पीछे  शांति वार्ता फिर से तेज हो गई है। लेकिन जब तक ईरान के साथ  होर्मुज जलडमरूमध्य  में जारी सैन्य गतिरोध खत्म नहीं होता और दोनों देश किसी ठोस समझौते तक नहीं पहुँचते  तब तक युद्ध के पूरी तरह रुकने की उम्मीद व्यर्थ है। इतना जरूर है कि कांग्रेस में बहुमत खो देने के बाद ट्रम्प अपने देश में तो कमजोर हुए ही हैं साथ ही विदेश नीति के मोर्चे पर भी उनकी हैसियत में कमी आई है। देखना ये है कि वे इस बदलाव के मुताबिक खुद में सुधार लाते हैं या कुत्ते की पूँछ की तरह टेढ़े ही बने रहते हैं। वैसे मूलतः ट्रम्प एक व्यवसायी हैं। युद्ध के बीच भी  कूटनीतिक बैठकों में अपने बेटे और दामाद को भेजकर वे आर्थिक लाभ की कोशिश करते रहे जो किसी भी दृष्टि से शोभनीय नहीं था । लेकिन उनके लिए गरिमा जैसे शब्द बेमानी हैं। इसलिए अमेरिकी जनता द्वारा दिये गए इस जोरदार झटके के बावजूद यदि वे पहले जैसे पागलपन का प्रदर्शन करते रहें तो आश्चर्य नहीं होगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 4 November 2026

मूर्खतापूर्ण फैसले ले डूबे ट्रम्प को : भारत का विरोध महंगा पड़ा



अमेरिका में हुए मध्यावधि चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की जबरदस्त झटका लगा है। विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने उच्च सदन सीनेट में स्पष्ट बहुमत के साथ ही संसद के निम्न सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भी  बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है। ज्यादातर राज्यों के गवर्नर भी डेमोक्रेटिक पार्टी के चुने गए हैं। यद्यपि अमेरिका का इतिहास बताता है कि पिछले  21 मध्यावधि चुनावों में 19 में राष्ट्रपति की पार्टी हारी।  दूसरी बार राष्ट्रपति  बनते समय ट्रम्प लोकप्रियता के शिखर पर थे। उन्हें युवाओं सहित सभी वर्गों का समर्थन प्राप्त हुआ था। अमेरिका को फिर से महान बनाने का जो नारा उन्होंने उछाला उसका जबरदस्त प्रभाव हुआ।  अमेरिकी युवाओं को रोजगार के ज्यादा अवसर प्रदान करने के लिए अवैध प्रवासियों को बाहर करने  का वायदा भी कारगर रहा ।अर्थव्यवस्था में आ रही गिरावट को रोकने संबंधी  चुनावी वायदे के बल पर ट्रम्प ने  दोबारा व्हाइट हाऊस पर कब्जा किया। उनकी जीत में भारतवंशी प्रवासियों का महत्वपूर्ण योगदान था। उन्होंने जिन जे.डी वेंस को उपराष्ट्रपति हेतु चुना उनकी पत्नी भी भारतीय मूल की हिंदू हैं। चुनाव जीतने के बाद उन्होंने अपने सचिवालय में जब बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोगों को नियुक्त किया तब ये अवधारणा और मजबूत हुई कि वे भारत के प्रति उस दोस्ताने को जारी रखेंगे जो  पहले कार्यकाल में देखने मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनके निजी रिश्तों को देखते हुए भारत को उनसे काफी उम्मीदें थीं किन्तु पदभार ग्रहण करते ही उन्होंने उन पर पानी फेर दिया। सबसे पहले तो भारत  से होने वाले आयात पर  मनमर्जी का टैरिफ थोपने की  हरकत की। उसके बाद ऑपरेशन सिंदूर के समय युद्धविराम का झूठा श्रेय लूटने की जबरिया कोशिश की। लेकिन हद तब हो गई जब उन्होंने पाकिस्तान की पीठ पर हाथ रखते हुए भारत के हितों के विरुद्ध तमाम फैसले लिए। वहाँ के सेनाध्यक्ष आसिफ मुनीर को व्हाइट हाउस बुलाकर भोज देने के पीछे उनका मकसद भारत को चिढ़ाना ही था। भारतीय प्रवासियों को हथकड़ी लाकार वापस भेजने जैसे उनके फैसले निश्चित तौर पर दोस्ती के सर्वथा विपरीत थे। रूसी तेल न खरीदने का दबाव बनाकर वे भारत को घुटनाटेक करवाने के लिए टैरिफ की दरें बढ़ाते चले गए। उनका सोचना था कि प्रधानमंत्री मोदी उनसे मिलने वॅाशिंगटन आयें किंतु ऐसा नहीं होने पर वे और खुर्रा गए। हालांकि केवल भारत के प्रति उनका व्यवहार दुर्भावनापूर्ण नहीं रहा। यूरोपीय देशों से अमेरिका के मैत्रीपूर्ण रिश्तों को भी ट्रम्प ने बिगाड़ दिया। ग्रीनलैंड पर कब्जे की उनकी धमकी से तो अमेरिका और यूरोप के बीच युद्ध का खतरा तक पैदा हो गया। कैनेडा पर कब्जे की मंशा जताने से भी वे बाज नहीं आए। और वेनेजुएला के राष्ट्रपति को सपत्नीक उठवाकर अमेरिका के जेल में डालकर तो उन्होंने सारे कूटनीतिक नियम तोड़ दिये। नोबल पुरस्कार के लिए भीख मांगने जैसे  अंदाज से जहाँ उनकी खिल्ली उड़ी वहीं न मिलने पर ऊटपटांग बयान देकर वे अपनी भद्द पिटवाते रहे। लेकिन ईरान के साथ जारी युद्ध में  उनकी मूर्खता का चर्मोत्कर्ष सामने आया । पूरी ताकत लगाने के बाद भी वे ईरान को झुकाने में कामयाब नहीं हो सके । उल्टे प. एशिया में अमेरिका के मित्र राष्ट्रों की ईरान ने जमकर ठुकाई कर दी। इसकी वजह से समूचा विश्व तो ऊर्जा संकट का सामना कर ही रहा है खुद अमेरिका भी उसकी चपेट में आ गया। ट्रम्प के सनकीपन की वजह से अमेरिका की आर्थिक स्थिति बजाय सुधरने के और बिगड़ चुकी है। कुल मिलाकर अपने दूसरे कार्यकाल में डोनाल्ड ट्रम्प आर्थिक, सैनिक और कूटनीतिक सभी मोर्चों पर बुरी तरह असफल साबित हुए। इसी वजह से जनता में उनके प्रति नाराजगी बढ़ती चली गई जिसका प्रमाण ये परिणाम हैं। ऐसे में  कहना गलत नहीं होगा कि जिस प्रकार उनकी जीत में भारतीय समुदाय का समर्थन बड़ा कारण रहा उसी तरह उनकी इस हार में भी वहाँ बसे भारतीय मूल के मतदाताओं का हाथ है। संसद के दोनों सदनों में बहुमत गँवा देने के बाद ट्रम्प की अकड़ में कमी आयेगी या खिसियाहट में वे  और ज्यादा मूर्खताएं करेंगे ये तो आने वाला समय बताएगा किंतु अमेरिकी मतदाताओं ने उनकी नाक में जो नकेल डाल दी उसके बाद वे पहले जैसी दादागिरी कर सकेंगे इसमें संदेह है। भारत की दृष्टि से ये परिणाम शुभ संकेत हैं । अमेरिका के साथ ट्रेड डील, टैरिफ और वीजा जैसे लंबित मुद्दे जल्द सुलझ सकते हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि ट्रम्प को भारत की अहमियत समझ में आ गई।   


- रवीन्द्र वाजपेयी 




 

Tuesday, 3 November 2026

अब्दुल्ला परिवार की चौधराहट के खात्मे की शुरुआत



जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अपनी दूसरी शादी का जश्न पूरी तरह मना पाते उसके पहले ही उनकी सरकार पर खतरे के बादल मंडराने लगे। लगभग 25 विधायक और कुछ सांसदों सहित पार्टी के अनेक नेता बगावत पर उतारू  हैं। मंत्रीमंडल में ताजा फेरबदल के बाद सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस  के भीतर गंभीर राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है। बगावत पर उतारू विधायकों ने पार्टी नेतृत्व को दो सप्ताह का समय  देते हुए मांग रखी है कि पूरे मंत्रिमंडल का फिर पुनर्गठन किये जाने के अलावा मुख्यमंत्री  के नजदीक माने जाने वाले सलाहकार नासिर असलम वानी के अलावा  बाकी सलाहकारों को पदमुक्त किया जाए। सरकार द्वारा लिए जाने वाले महत्वपूर्ण  फैसलों में विधायकों के साथ समुचित विचार - विमर्श किये जाने का भी दबाव बनाया जा रहा है। विद्रोह पर आमादा विधायकों का आरोप है कि सत्ता में आने के बाद उमर अब्दुल्ला धारा 370 और जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे से जुड़े चुनावी वादों पर केंद्र सरकार के सामने राज्य का पक्ष मजबूती से नहीं रख सके। राजधानी श्रीनगर से पार्टी  सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेंहदी ने भी मुख्यमंत्री उमर और उनके पिता डॉ. फारूक अब्दुल्ला पर धारा 370 को बहाल करवाने के वायदे से मुकरने का आरोप लगाते हुए नेशनल कॉन्फ्रेंस छोड़ने के अलावा  लोकसभा सदस्यता से इस्तीफे का ऐलान करते हुए  सनसनी मचा दी। हालांकि पार्टी के अंतरिम अध्यक्ष शौकत मीर सहित कुछ और नेताओं का दावा है कि असन्तुष्टों से बातचीत के जरिये मामला सुलझा लिया जाएगा और पार्टी एकजुट बनी रहेगी। वैसे तो ऊपरी तौर पर  इस  नाराजगी की वजह मंत्रीमंडल में स्थान नहीं मिलना माना जा रहा है। लेकिन असली कारण मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की लचर कार्यशैली के अलावा उनका सामंतवादी  व्यवहार भी है। सत्ता में वापसी के समय तो वे बड़ी ऊँची - ऊंची बातें किया करते थे। जिनमें धारा 370 और राज्य को विशेष दर्जे की बहाली के अलावा केंद्र शासित राज्य की स्थिति समाप्त कर पूर्ण राज्य का दर्जा दोबारा हासिल करना था। समय - समय पर उमर और उनके पिता पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला केंद्र से टकराव का इरादा व्यक्त करते रहते हैं , लेकिन उसकी हिम्मत नहीं बटोर सके। इसका कारण केंद्र का सख्त रवैया है।  अब्दुल्ला परिवार का ये दोगलापन नई बात नहीं है। फारुख के पिता शेख अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर में अलगाववाद के बीज बोये थे। दुर्भाग्य से पं. जवाहर लाल नेहरू उन पर आँख मूँदकर भरोसा करते रहे । उनके शेख अब्दुल्ला प्रेम ने इस सीमावर्ती राज्य को ऐसा नासूर बना दिया जो आजादी के आठ दशक बाद भी समस्या बना हुआ है। अब्दुल्ला परिवार के सामंतवादी  व्यवहार की वजह से ही नेशनल काँफ्रेंस से कई नेता निकले जिनमें मुफ्ती मो. सईद प्रमुख थे जिन्होंने पीडीपी नामक पार्टी बनाई।। लेकिन वह भी नेशनल काँफ्रेंस के नक्शे कदम पर चलते हुए परिवारवाद के शिकन्जे में फंस गई।  मुफ्ती की बेटी मेहबूबा मुफ्ती भी मुख्यमंत्री बनीं । इन दोनों परिवारों ने बारी - बारी से मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी के लोगों को भारत के विरुद्ध भड़काकर अपना राजनीतिक प्रभुत्व बनाये रखा । वहीं जम्मू क्षेत्र की जमकर उपेक्षा की क्योंकि वह हिन्दू बहुल है। मोदी सरकार ने धारा 370 हटाने के साथ ही परिसीमन के जरिये इस संतुलन को समाप्त किया जिसके कारण भाजपा मजबूत विपक्ष के तौर पर उभरी। नेशनल काँफ्रेंस के भीतर  बगावत की लहरें और ऊँची उठेंगी या शांत कर दी जाएंगी ये कहना कठिन है लेकिन इसे अब्दुल्ला परिवार की चौधराहट के खात्मे की शुरुआत माना जा सकता है। मुफ्ती खानदान पहले ही ढलान पर है। फारुख जब तक जीवित हैं तब तक भले ही उमर की सियासत कायम रहे किंतु मौजूदा संकट से अब्दुल्ला परिवार का भविष्य भी खतरे में आ गया है। जम्मू कश्मीर में हुए बड़े बदलावों के बाद नये शक्ति केंद्रों के उभरने की संभावना बढ़ रही है किंतु घाटी में होने वाली किसी भी हलचल पर केंद्र को नजर रखनी होगी क्योंकि वहाँ अलगाववाद के बीज सर्वत्र बिखरे पड़े हैं जो समय - समय पर अंकुरित हो जाते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 2 November 2026

रामलीला मैदान की रैली से सपा फायदे में कांग्रेस खाली हाथ



मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाये जाने की मांग को लेकर गत दिवस दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन की महारैली में कितने लोग आये इसे लेकर परस्पर विरोधी दावे हो रहे हैं। विपक्षी खेमा इस बात को लेकर उत्साहित है कि जनमत उसकी तरफ झुक रहा है। दूसरी तरफ भाजपा का प्रचार तंत्र रामलीला मैदान के खाली पड़े रहे  हिस्सों के साथ उन कुर्सियों के चित्र प्रसारित करने में जुटा रहा जिन पर कोई भी बैठा नहीं था। ड्रोन से लिए गए चित्रों  में दर्शाई गई भीड़ के बारे में ये भी कहा जा रहा है कि ए. आई तकनीक का इस्तेमाल कर मैदान को भरा दिखाया गया जबकि हकीकत में रैली में शामिल विपक्षी दल दावों के मुताबिक लोग नहीं ला सके। खैर, भीड़ कितनी आई ये उतना मायने नहीं रखता जितना ये कि विपक्ष विशेष रूप से कांग्रेस ने लंबे समय बाद अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की। अन्य विपक्षी पार्टियों की बात करें तो आम आदमी पार्टी का रैली में शामिल नहीं होना पहले से तय था क्योंकि पंजाब विधानसभा के आगामी चुनाव में उसका कांग्रेस से मुख्य मुकाबला होने वाला है।  गठबंधन के अन्य सदस्यों में द्रमुक भी कांग्रेस के तमिलनाडु में जोसेफ विजय की सरकार का हिस्सा बनने से नाराज  होने से रैली से दूर रही। बीजू जनता दल और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने भी कांग्रेस का न्यौता स्वीकार नहीं किया। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी की गैर मौजूदगी चौंकाने वाली रही। उसके मुखिया अभिजीत दिपके ने इसका कारण ये बताया कि वे अपनी पार्टी का स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखेंगे। इंडिया गठबंधन में शामिल अन्य पार्टियों के नेता तो मंच पर नजर आये किंतु रैली में मौजूद  संवाददाताओं और विश्लेषकों की मानें तो इसके सबसे बड़े लाभार्थी अखिलेश यादव रहे । कहा जा रहा है रामलीला मैदान में आये 60 से 70 फीसदी लोग उ.प्र के थे जिन्हें या तो समाजवादी पार्टी लेकर आई या फिर दिल्ली से सटे प. उतर प्रदेश के वे किसान जो किसान आंदोलन के समय से भाजपा विरोधी हैं।  आयोजन की सूत्रधार कांग्रेस थी इसलिए मुख्य आकर्षण राहुल गाँधी रहे।  आने वाले कुछ महीनों में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं उनमें सर्वाधिक चर्चा उ.प्र की है जहाँ 80 लोकसभा सीटें हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा से ज्यादा सीटें जीत जाने के बाद समाजवादी पार्टी का हौसला बुलंद  है। वहीं भाजपा  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर चुनाव जीतने के प्रति आश्वस्त है । मायावती और ओवैसी भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए हाथ पाँव मार रहे हैं। लेकिन कांग्रेस सबसे दयनीय स्थिति में है। प्रदेश संगठन में बदलाव के बावजूद वह मुकाबले में नजर नहीं आ रही। उम्मीद थी कि रामलीला मैदान में अखिलेश यादव विधानसभा चुनाव में विपक्षी एकता की रूपरेखा स्पष्ट करेंगे । उन्होंने मंच का उपयोग अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए तो किया किंतु  कांग्रेस की मांग अनुसार सीटें छोड़ने का कोई संकेत नहीं दिया। ये बात पूरी तरह सही है कि कल के जलसे का सबसे ज्यादा फ़ायदा समाजवादी पार्टी को  ही हो सकता है क्योंकि उ.प्र का काफी हिस्सा दिल्ली से सटा हुआ जो है। एक और बात जो इस रैली में देखने मिली वह थी विपक्ष द्वारा किसी भावी कार्ययोजना का ऐलान न करना। दीपावली बाद चुनाव वाले राज्यों के नेता उसमें व्यस्त हो जाएंगे। आज की स्थिति में कांग्रेस के लिए केवल पंजाब में उम्मीद की हल्की सी किरण है। उ.प्र में वह पूरी तरह अखिलेश यादव के रहमो - करम पर निर्भर है वहीं उत्तराखंड में भी उसकी संभावनाएं बहुत अच्छी नहीं हैं। आगामी वर्ष के अंत में हिमाचल और गुजरात में होने वाले चुनाव में भी भाजपा की जीत तय है। आम आदमी पार्टी भी यहाँ कांग्रेस की जड़ें खोदने में लगी है। ये सब देखते हुए आपसी खींचतान छोड़कर  भाजपा के विरोध में ठोस  गठबंधन बनाकर विपक्षी मतों में बंटवारे को रोकने जैसा फैसला होता तब इस रैली की  सफलता स्वप्रमाणित हो जाती। लेकिन पूरा जमावड़ा वोट चोरी और ज्ञानेश कुमार जैसे मुद्दे पर सिमट गया जिसके प्रति  जनता में कोई रुचि नहीं है। बेहतर होता संघर्ष की भावी रूपरेखा ही पेश कर दी जाती। लेकिन बजाय कोई ठोस बात करने के श्री गाँधी सहित मंच पर बैठे सभी नेता उन्हीं बातों और आरोपों को दोहराते रहे जो बीते कई महीनों से सुनाई दे रहे हैं। चूंकि रैली में आये ज्यादातर नेता सत्ता गँवा चुके हैं। इसलिए वे अपनी खीझ निकालते रहे लेकिन  सही बात ये है कि उन सबने एक दूसरे को हरवाया है। प. बंगाल और केरल इसके जीवंत प्रतीक हैं। जहाँ तक बात कांग्रेस की है तो जब तक वह उ.प्र और बिहार में दोबारा खड़ी नहीं होती तब तक राष्ट्रीय स्तर पर उसकी वापसी असम्भव है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 31 October 2026

इसराइल के चुनाव भारत के बहुसंख्यक समाज के लिए सबक



इसराइल में किसी को बहुमत नहीं मिलने में अनोखा कुछ भी नहीं है क्योंकि पहले भी ऐसा कई बार हो चुका है। इस बार भी प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके प्रतिद्वंद्वी  पूर्व सेनाध्यक्ष गादी आइसेनकोट दोनों बहुमत से पीछे रह गए हैं। उन्हें क्रमशः 53 और 48 सीटें मिलीं। लेकिन पेच ये फंस गया कि कुल 120 में से 19 सीटें अरब पार्टी ले गई जिसे इसराइल में रहने वाले मुस्लिम मतदाताओं का एकमुश्त समर्थन मिला। चूंकि यहूदियों और मुसलमानों में जन्मजात बैर है , लिहाजा नेतन्याहू और गादी दोनों अरब पार्टी से दूरी बनाये रखने का दावा तो कर रहे हैं लेकिन तब तक नई सरकार नहीं बन पायेगी जब तक इन दोनों में कोई टूटन न हो।  अब सबकी नजर राष्ट्रपति इजाक हर्ज़ोग पर टिकी हैं। यदि सरकार बनाने लायक बहुमत कोई नहीं जुटा सका तब नये चुनाव की नौबत आ सकती है। लेकिन ये चुनाव इसलिए चौंकाने वाले बन गए क्योंकि पहली बार मुस्लिम मतदाता धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत होकर तीसरी शक्ति बनकर  उभरे। त्रिशंकु संसद होने की वजह से सत्ता की चाबी उनके हाथ में आने से इसराइल की अंदरूनी राजनीति का संतुलन गड़बड़ा गया। यहूदी समुदाय बहुमत में होने के बावजूद जहाँ दो नेताओं के बीच विभाजित हो गया वहीं अल्पसंख्यक मुसलमान रणनीतिक मतदान करते हुए गोलबंद हो  गए जिसके कारण अरब पार्टी ने 19 सीटों पर काबिज होकर नेतन्याहू और गादी दोनों का खेल बिगाड़ दिया। पूरे नतीजे  आने के पहले ही रुझानों के आधार पर नेतन्याहू ने चुनाव में विदेशी हस्तक्षेप का आरोप लगाकर सनसनी फैला दी। उनके आरोप के बाद शक की सुई ईरान की ओर घूम गई क्योंकि वह किसी भी कीमत पर नेतन्याहू की वापसी नहीं चाहता था। इधर इसराइल में भी यहूदियों का एक तबका नेतन्याहू से इसलिए नाराज है कि हमास द्वारा किये गए हमले ने इसराइल की अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी ।  हालांकि किरकिरी से बचने उन्होंने गाज़ा पर ताबड़तोड़ हमले करते हुए उसे मलबे के ढेर में बदलते हुए हमास की कमर तोड़ दी। लेकिन उसी कारण ईरान के साथ भी लड़ाई का बीजारोपण हुआ जिसने बाद में बड़ा रूप ले लिया। इसके चलते इसराइल को कुछ हासिल तो हुआ नहीं उल्टे युद्ध पर हुए अनाप शनाप खर्च ने अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया। ईरानी मिसाइलें जिस बड़ी संख्या में इसराइल में गिरीं उससे आम नागरिक भी असुरक्षित अनुभव करने लगे। इसके अलावा नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के आरोप भी जमकर लगे। बावजूद उसके वे सबसे ज्यादा सीटें जिताकर लाये और उस नाते सत्ता के प्रमुख दावेदार तो हैं किंतु मुसलमानों की अरब पार्टी से मदद लेना उनके और गादी दोनों के लिए आत्मघाती होगा। इस चुनाव परिणाम ने केवल  इसराइल की आंतरिक राजनीति को ही नहीं हिलाया अपितु उन समस्त देशों को चिंता में डाल दिया जहाँ मुस्लिम अल्पसंख्यकों  की आबादी बीते कुछ वर्षों में बढ़ी और वे मतदाता बनकर चुनाव को प्रभावित करने के साथ - साथ सामाजिक जीवन और कानून व्यवस्था के लिए भी मुसीबत बनते जा रहे हैं। यूरोप के अनेक देश मुस्लिम आबादी को बसाकर खून के आँसू रो रहे हैं जो शरणार्थी बनकर आने के बाद अब शरिया लागू करने का दबाव बनाने लगे हैं। अमेरिका की व्यवसायिक राजधानी न्यूयॉर्क में मुस्लिम महापौर निर्वाचित होते ही उपद्रव शुरू होने लगे। ब्रिटेन में तो लगभग सभी बड़े शहरों का स्थानीय निकाय मुस्लिमों के कब्जे में है। विचारणीय बात ये है कि जब इजराइल जैसे सख्त देश में रहने मुसलमान राजनीतिक तौर पर गोलबंद होकर राजनीतिक समीकरणों को उलझा सकते हैं तब भारत जैसी उदार और खुली प्रजातांत्रिक व्यवस्था में यदि देश की जनसंख्या के कुल 15 से 20 ( अनुमानित) फीसदी मुसलमान एकजुट हो जाएं तो लोकसभा में इतनी संख्या में उनके सांसद चुने जा सकते हैं जो त्रिशंकु की स्थिति में रिंग मास्टर बन जाएं। चुनाव बाद इसराइल में यहूदियों के बीच फूट पर सामाजिक विमर्श शुरू हो गया है।  भारत के बहुसंख्यक समाज को भी इसराइल में उत्पन्न राजनीतिक गतिरोध से सबक लेना चाहिए। वरना बड़ी बात नहीं निकट भविष्य में हमारे देश में भी इसराइल जैसी परिस्थिति पैदा हो जाए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

इसराइल के चुनाव भारत के बहुसंख्यक समाज के लिए सबक



इसराइल में किसी को बहुमत नहीं मिलने में अनोखा कुछ भी नहीं है क्योंकि पहले भी ऐसा कई बार हो चुका है। इस बार भी प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके प्रतिद्वंद्वी  पूर्व सेनाध्यक्ष गादी आइसेनकोट दोनों बहुमत से पीछे रह गए हैं। उन्हें क्रमशः 53 और 48 सीटें मिलीं। लेकिन पेच ये फंस गया कि कुल 120 में से 19 सीटें अरब पार्टी ले गई जिसे इसराइल में रहने वाले मुस्लिम मतदाताओं का एकमुश्त समर्थन मिला। चूंकि यहूदियों और मुसलमानों में जन्मजात बैर है , लिहाजा नेतन्याहू और गादी दोनों अरब पार्टी से दूरी बनाये रखने का दावा तो कर रहे हैं लेकिन तब तक नई सरकार नहीं बन पायेगी जब तक इन दोनों में कोई टूटन न हो।  अब सबकी नजर राष्ट्रपति इजाक हर्ज़ोग पर टिकी हैं। यदि सरकार बनाने लायक बहुमत कोई नहीं जुटा सका तब नये चुनाव की नौबत आ सकती है। लेकिन ये चुनाव इसलिए चौंकाने वाले बन गए क्योंकि पहली बार मुस्लिम मतदाता धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत होकर तीसरी शक्ति बनकर  उभरे। त्रिशंकु संसद होने की वजह से सत्ता की चाबी उनके हाथ में आने से इसराइल की अंदरूनी राजनीति का संतुलन गड़बड़ा गया। यहूदी समुदाय बहुमत में होने के बावजूद जहाँ दो नेताओं के बीच विभाजित हो गया वहीं अल्पसंख्यक मुसलमान रणनीतिक मतदान करते हुए गोलबंद हो  गए जिसके कारण अरब पार्टी ने 19 सीटों पर काबिज होकर नेतन्याहू और गादी दोनों का खेल बिगाड़ दिया। पूरे नतीजे  आने के पहले ही रुझानों के आधार पर नेतन्याहू ने चुनाव में विदेशी हस्तक्षेप का आरोप लगाकर सनसनी फैला दी। उनके आरोप के बाद शक की सुई ईरान की ओर घूम गई क्योंकि वह किसी भी कीमत पर नेतन्याहू की वापसी नहीं चाहता था। इधर इसराइल में भी यहूदियों का एक तबका नेतन्याहू से इसलिए नाराज है कि हमास द्वारा किये गए हमले ने इसराइल की अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी ।  हालांकि किरकिरी से बचने उन्होंने गाज़ा पर ताबड़तोड़ हमले करते हुए उसे मलबे के ढेर में बदलते हुए हमास की कमर तोड़ दी। लेकिन उसी कारण ईरान के साथ भी लड़ाई का बीजारोपण हुआ जिसने बाद में बड़ा रूप ले लिया। इसके चलते इसराइल को कुछ हासिल तो हुआ नहीं उल्टे युद्ध पर हुए अनाप शनाप खर्च ने अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया। ईरानी मिसाइलें जिस बड़ी संख्या में इसराइल में गिरीं उससे आम नागरिक भी असुरक्षित अनुभव करने लगे। इसके अलावा नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के आरोप भी जमकर लगे। बावजूद उसके वे सबसे ज्यादा सीटें जिताकर लाये और उस नाते सत्ता के प्रमुख दावेदार तो हैं किंतु मुसलमानों की अरब पार्टी से मदद लेना उनके और गादी दोनों के लिए आत्मघाती होगा। इस चुनाव परिणाम ने केवल  इसराइल की आंतरिक राजनीति को ही नहीं हिलाया अपितु उन समस्त देशों को चिंता में डाल दिया जहाँ मुस्लिम अल्पसंख्यकों  की आबादी बीते कुछ वर्षों में बढ़ी और वे मतदाता बनकर चुनाव को प्रभावित करने के साथ - साथ सामाजिक जीवन और कानून व्यवस्था के लिए भी मुसीबत बनते जा रहे हैं। यूरोप के अनेक देश मुस्लिम आबादी को बसाकर खून के आँसू रो रहे हैं जो शरणार्थी बनकर आने के बाद अब शरिया लागू करने का दबाव बनाने लगे हैं। अमेरिका की व्यवसायिक राजधानी न्यूयॉर्क में मुस्लिम महापौर निर्वाचित होते ही उपद्रव शुरू होने लगे। ब्रिटेन में तो लगभग सभी बड़े शहरों का स्थानीय निकाय मुस्लिमों के कब्जे में है। विचारणीय बात ये है कि जब इजराइल जैसे सख्त देश में रहने मुसलमान राजनीतिक तौर पर गोलबंद होकर राजनीतिक समीकरणों को उलझा सकते हैं तब भारत जैसी उदार और खुली प्रजातांत्रिक व्यवस्था में यदि देश की जनसंख्या के कुल 15 से 20 ( अनुमानित) फीसदी मुसलमान एकजुट हो जाएं तो लोकसभा में इतनी संख्या में उनके सांसद चुने जा सकते हैं जो त्रिशंकु की स्थिति में रिंग मास्टर बन जाएं। चुनाव बाद इसराइल में यहूदियों के बीच फूट पर सामाजिक विमर्श शुरू हो गया है।  भारत के बहुसंख्यक समाज को भी इसराइल में उत्पन्न राजनीतिक गतिरोध से सबक लेना चाहिए। वरना बड़ी बात नहीं निकट भविष्य में हमारे देश में भी इसराइल जैसी परिस्थिति पैदा हो जाए। 

इसराइल के चुनाव  भारत के बहुसंख्यक समाज के लिए सबक

इसराइल में किसी को बहुमत नहीं मिलने में अनोखा कुछ भी नहीं है क्योंकि पहले भी ऐसा कई बार हो चुका है। इस बार भी प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके प्रतिद्वंद्वी  पूर्व सेनाध्यक्ष गादी आइसेनकोट दोनों बहुमत से पीछे रह गए हैं। उन्हें क्रमशः 53 और 48 सीटें मिलीं। लेकिन पेच ये फंस गया कि कुल 120 में से 19 सीटें अरब पार्टी ले गई जिसे इसराइल में रहने वाले मुस्लिम मतदाताओं का एकमुश्त समर्थन मिला। चूंकि यहूदियों और मुसलमानों में जन्मजात बैर है , लिहाजा नेतन्याहू और गादी दोनों अरब पार्टी से दूरी बनाये रखने का दावा तो कर रहे हैं लेकिन तब तक नई सरकार नहीं बन पायेगी जब तक इन दोनों में कोई टूटन न हो।  अब सबकी नजर राष्ट्रपति इजाक हर्ज़ोग पर टिकी हैं। यदि सरकार बनाने लायक बहुमत कोई नहीं जुटा सका तब नये चुनाव की नौबत आ सकती है। लेकिन ये चुनाव इसलिए चौंकाने वाले बन गए क्योंकि पहली बार मुस्लिम मतदाता धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत होकर तीसरी शक्ति बनकर  उभरे। त्रिशंकु संसद होने की वजह से सत्ता की चाबी उनके हाथ में आने से इसराइल की अंदरूनी राजनीति का संतुलन गड़बड़ा गया। यहूदी समुदाय बहुमत में होने के बावजूद जहाँ दो नेताओं के बीच विभाजित हो गया वहीं अल्पसंख्यक मुसलमान रणनीतिक मतदान करते हुए गोलबंद हो  गए जिसके कारण अरब पार्टी ने 19 सीटों पर काबिज होकर नेतन्याहू और गादी दोनों का खेल बिगाड़ दिया। पूरे नतीजे  आने के पहले ही रुझानों के आधार पर नेतन्याहू ने चुनाव में विदेशी हस्तक्षेप का आरोप लगाकर सनसनी फैला दी। उनके आरोप के बाद शक की सुई ईरान की ओर घूम गई क्योंकि वह किसी भी कीमत पर नेतन्याहू की वापसी नहीं चाहता था। इधर इसराइल में भी यहूदियों का एक तबका नेतन्याहू से इसलिए नाराज है कि हमास द्वारा किये गए हमले ने इसराइल की अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी ।  हालांकि किरकिरी से बचने उन्होंने गाज़ा पर ताबड़तोड़ हमले करते हुए उसे मलबे के ढेर में बदलते हुए हमास की कमर तोड़ दी। लेकिन उसी कारण ईरान के साथ भी लड़ाई का बीजारोपण हुआ जिसने बाद में बड़ा रूप ले लिया। इसके चलते इसराइल को कुछ हासिल तो हुआ नहीं उल्टे युद्ध पर हुए अनाप शनाप खर्च ने अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया। ईरानी मिसाइलें जिस बड़ी संख्या में इसराइल में गिरीं उससे आम नागरिक भी असुरक्षित अनुभव करने लगे। इसके अलावा नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के आरोप भी जमकर लगे। बावजूद उसके वे सबसे ज्यादा सीटें जिताकर लाये और उस नाते सत्ता के प्रमुख दावेदार तो हैं किंतु मुसलमानों की अरब पार्टी से मदद लेना उनके और गादी दोनों के लिए आत्मघाती होगा। इस चुनाव परिणाम ने केवल  इसराइल की आंतरिक राजनीति को ही नहीं हिलाया अपितु उन समस्त देशों को चिंता में डाल दिया जहाँ मुस्लिम अल्पसंख्यकों  की आबादी बीते कुछ वर्षों में बढ़ी और वे मतदाता बनकर चुनाव को प्रभावित करने के साथ - साथ सामाजिक जीवन और कानून व्यवस्था के लिए भी मुसीबत बनते जा रहे हैं। यूरोप के अनेक देश मुस्लिम आबादी को बसाकर खून के आँसू रो रहे हैं जो शरणार्थी बनकर आने के बाद अब शरिया लागू करने का दबाव बनाने लगे हैं। अमेरिका की व्यवसायिक राजधानी न्यूयॉर्क में मुस्लिम महापौर निर्वाचित होते ही उपद्रव शुरू होने लगे। ब्रिटेन में तो लगभग सभी बड़े शहरों का स्थानीय निकाय मुस्लिमों के कब्जे में है। विचारणीय बात ये है कि जब इजराइल जैसे सख्त देश में रहने मुसलमान राजनीतिक तौर पर गोलबंद होकर राजनीतिक समीकरणों को उलझा सकते हैं तब भारत जैसी उदार और खुली प्रजातांत्रिक व्यवस्था में यदि देश की जनसंख्या के कुल 15 से 20 ( अनुमानित) फीसदी मुसलमान एकजुट हो जाएं तो लोकसभा में इतनी संख्या में उनके सांसद चुने जा सकते हैं जो त्रिशंकु की स्थिति में रिंग मास्टर बन जाएं। चुनाव बाद इसराइल में यहूदियों के बीच फूट पर सामाजिक विमर्श शुरू हो गया है।  भारत के बहुसंख्यक समाज को भी इसराइल में उत्पन्न राजनीतिक गतिरोध से सबक लेना चाहिए। वरना बड़ी बात नहीं निकट भविष्य में हमारे देश में भी इसराइल जैसी परिस्थिति पैदा हो जाए। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 29 October 2026

भाजपा के लिए चिंता और कांग्रेस को चिंतन जरूरी



हालांकि कुछ राज्यों में हुए स्नातक और शिक्षक श्रेणी के विधान परिषद चुनाव परिणामों के आधार पर कोई बड़ी भविष्यवाणी करना तो जल्दबाजी होगी परंतु राष्ट्रीय पार्टी होने से कांग्रेस और भाजपा के लिए देश के किसी भी हिस्से में मिली जीत या हार मायने रखती है। उस दृष्टि से उ.प्र, बिहार और महाराष्ट्र में भाजपा को जैसी सफलता मिलनी चाहिए थी वैसी नहीं मिलना उसके लिए चिंता का विषय है। उ.प्र में भले ही उसने पिछला प्रदर्शन दोहराया किंतु प्रधानमंत्री  के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी और रक्षा मंत्री  के गढ़  लखनऊ में समाजवादी पार्टी से मिली हार उसके लिए शोचनीय है। यद्यपि 11 में से 6 सीटें  जीतकर भाजपा ने यथास्थिति बनाये रखी परंतु सपा का 3 से 5 पर आ जाना अखिलेश यादव के लिए उत्साहवर्धक है।  इस चुनाव में शिक्षक और स्नातक वर्ग के मतदाता होने से इसे सुशिक्षित लोगों का चुनाव कहा जाता है। उस लिहाज से भाजपा के लिए ये  एक चेतावनी  हैं जो योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में तीसरी बार सरकार बनाने के प्रति आश्वस्त नजर आ रही है। यद्यपि अभी तक जितने भी चुनाव पूर्व सर्वेक्षण हुए वे योगी सरकार की वापसी के संकेत दे रहे हैं। लेकिन गत लोकसभा चुनाव में उ.प्र ने ही भाजपा को स्पष्ट बहुमत से वंचित कर दिया था। इसलिए विधान परिषद चुनाव में सपा का प्रदर्शन विधानसभा चुनाव में कड़े मुकाबले का संकेत कहा जा सकता है। पड़ोसी राज्य बिहार में यद्यपि भाजपा और जनता दल (यू) ने 8 में से 4 सीटों पर जीत हासिल की वहीं एक लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद और एक प्रशांत किशोर की जनसुराज के खाते में गई जबकि शेष दो पर निर्दलीय जीते।  राजद का एक सीट पर सिमटना भाजपा के लिए संतोषजनक हो सकता है किंतु जनसुराज का एक सीट जीतना बिहार में नये विकल्प की संभावना को बल देता है। 2 निर्दलीयों की जीत भी सत्तारूढ़ भाजपा - जनता दल (यू)  के लिए चेतावनी है। तीसरे राज्य महाराष्ट्र से भी भाजपा के लिए अच्छी खबर नहीं आई जहाँ 1 सीट उसे और 1 सहयोगी शिवसेना ( शिंदे) के हाथ लगी किंतु शेष 3 सीटों में से 2  एनसीपी (शरद पवार ) को मिलीं। वहीं पूरे देश में कांग्रेस  को केवल नागपुर में सफलता मिली जो भाजपा के लिए बड़ा झटका है क्योंकि वह केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस का गृहनगर है । यद्यपि कर्नाटक में भाजपा ने 4 में से 3  और उसके सहयोगी जनता दल ( सेकुलर )  ने 1 सीट जीतकर सत्तारूढ़ कांग्रेस को चारों खाने चित्त कर दिया। इस प्रकार उम्मीद से कम प्रदर्शन करने के बाद भी भाजपा ने खुद 13 और उसके सहयोगियों ने 3 सीटें जीतकर 16 का आंकड़ा  छू लिया वहीं कांग्रेस 1 पर सिमटी रही जबकि उसके सहयोगी 3 सीटें जीते। संसद के दोनों सदनों में मुख्य विपक्षी दल होने के बाद भी कांग्रेस का इन चुनावों में बुरी तरह हारना उसके लिए निरशाजनक है। उ.प्र, बिहार और महाराष्ट्र में भले ही भाजपा और उसके सहयोगी दलों के पास सत्ता है लेकिन कर्नाटक में सरकार होने के बावजूद काँग्रेस का दयनीय प्रदर्शन उसकी जमीनी कमजोरी का प्रमाण है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के लिए तो ये बेहद शर्मनाक है क्योंकि कर्नाटक उनका गृहराज्य है। राहुल गाँधी जितने जोरशोर से केंद्र सरकार के विरुद्ध आवाज उठा रहे हैं उसके बाद भी पार्टी शासित राज्य में खाली हाथ रहना निश्चित तौर पर उसके लिए चिंतन का विषय है। विशेष रूप से इसलिए क्योंकि मोदी सरकार के विरोध में विपक्ष इतना आक्रामक पहली बार हुआ और जंतर मंतर पर हुए आंदोलन से भाजपा पहली बार रक्षात्मक नजर आई। उक्त परिणामों के बाद भाजपा ने कांग्रेस पर  तंज कसते हुए सवाल किया कि विधान परिषद के चुनाव तो ईवीएम से नहीं हुए ,अपितु उनमें मतपत्रों का उपयोग हुआ। बावजूद उसके वह क्यों बुरी तरह हारी? स्मरणीय है  कांग्रेस आये दिन भाजपा को ईवीएम की बजाय मतपत्रों से चुनाव करवाने की चुनौती दिया करती है। क्षेत्रीय पार्टियों का दायरा तो सीमित होता है किंतु भाजपा - कांग्रेस के लिए छोटा - बड़ा हर मुकाबला महत्वपूर्ण है। उस दृष्टि से भाजपा के लिए उक्त चुनाव परिणाम जहाँ खुशफहमी से बाहर आने का संकेत हैं वहीं कांग्रेस के लिये मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखने के बजाय जनता से जुड़ाव बढ़ाने का जनादेश। 


- रवीन्द्र वाजपेयी