Monday, 16 February 2026

बजट सत्र के बीच में लंबा अवकाश देना निरर्थक


संसद के बजट सत्र का पहला चरण गत सप्ताह पूर्ण होने के बाद सत्रावसान हो गया। अब 9 मार्च से दोबारा सत्र शुरू होगा जिसमें बजट  पारित किया जाएगा। साथ ही लोकसभाध्यक्ष के विरुद्ध प्रस्तुत अविश्वास प्रस्ताव पर भी सत्ता - और विपक्ष में गर्मागर्मी रहेगी। सत्र के पहले चरण में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लोकसभा  में प्रधानमंत्री का भाषण हुए बिना ही धन्यवाद प्रस्ताव पारित करना पड़ा क्योंकि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा किसी पत्रिका में प्रकाशित पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे की कथित पुस्तक के अंश पढ़ने के कारण सत्ता और विपक्ष के  बीच हुए टकराव ने अप्रिय रूप ले लिया। सदन के  भीतर और उसके बाहर जिस प्रकार की रस्साकशी और व्यक्तिगत छींटाकशी देखने मिली उसके  कारण संसद की गरिमा तो तार - तार हुई ही सांसदों के आचरण का गिरता स्तर भी देश और दुनिया के सामने आ गया। विपक्ष ने प्रधानमंत्री पर अशोभनीय आरोप लगाए तो सत्ता पक्ष ने भी जवाबी हमला करते हुए पंडित नेहरू और उनके राजनीतिक वारिसों की कलई खोलना शुरू कर दिया। राहुल ने एक पुस्तक का मामला उठाया तो भाजपा के निशिकांत चौधरी बस्ता भर किताबें लेकर आ गए। दोनों तरफ से हुई कीचड़ फेंक प्रतियोगिता में किसकी जीत और किसकी हार हुई ये कहाना मुश्किल है। विपक्ष ने अपनी खीझ लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला के प्रति अविश्वास प्रस्ताव पेश कर निकाली तो भाजपा की ओर से श्री गांधी की सदस्यता रद्द करने की पेशकश हो गई। कई दिन  इस मांग पर हंगामा होता रहा कि राहुल को बोलने दिया जाए। लोकसभा के विवाद की छाया राज्यसभा पर भी पड़ी जिससे वहां की कार्यवाही भी बाधित होती रही। जिन लोकसभा सदस्यों का निलंबन हुआ वे भी संसद के प्रवेश द्वार पर धरना दिए बैठे रहे। लेकिन जनरल नरवणे की जिस पुस्तक को लेकर संसद का बहुमूल्य समय और जनता के  करोड़ों रु. बेकार हो गए उसकी चर्चा सत्र का अवकाश होते ही बंद हो गई। ऐसा पहली बार नहीं हुआ। पहले भी ये देखने में आया है कि संसद  में जिन मुद्दों को लेकर हंगामा होता है और विपक्ष सदन नहीं चलने देता वे सत्र के बाद ठन्डे बस्ते में चले जाते हैं। चूंकि सदन के भीतर लगाए गए आरोप - प्रत्यारोप कानून के क्षेत्राधिकार से बाहर होते हैं इसलिए दोनों पक्ष बिना डरे बहुत कुछ ऐसा बोल देते हैं जो बाहर अवमानना के अंतर्गत आता है। जनरल नरवणे की पुस्तक को लेकर दिल्ली पुलिस में प्रकरण दर्ज़ हो चुका है।  उसके प्रकाशक ने स्पष्टीकरण दे दिया है कि वह अभी तक अप्रकाशित है। श्री नरवणे वैसे तो इस विवाद पर मौन रहे किंतु प्रकाशक के स्पष्टीकरण का उन्होंने तत्काल अनुमोदन कर दिया।  बीते तीन दिनों में न ही श्री गांधी या अन्य किसी विपक्षी नेता ने पुस्तक के बारे में कुछ कहा और न ही सत्ता पक्ष ने विपक्ष पर पलटवार का कोई प्रयास किया। रोज शाम को नेताओं और पत्रकारों को बिठाकर बहस करवाने वाले टीवी चैनलों ने भी दूसरे विषयों को पकड़ लिया। ये सब देखकर लगता है संसद केवल सनसनी फैलाने का मंच बनकर रह गई है। वह जमाना, जब सदन में मुद्दों पर पक्ष - विपक्ष से गंभीर चर्चा होती थी, अब केवल स्मृतियों में ही रह गया है। इसके लिए कौन कितना दोषी है इसका निर्णय करना कठिन है क्योंकि जो आज पक्ष में हैं वे भी विपक्ष में रहते हुए सदन को बाधित करने को संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा मानते थे। कुल मिलाकर संसद की गरिमा केवल दिखावे तक सीमित रह गई है। लोकसभाध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर श्री गांधी द्वारा हस्ताक्षर नहीं किए जाने पर कांग्रेस ने स्पष्टीकरण दिया कि स्पीकर को पद से हटाने के नोटिस पर नेता प्रतिपक्ष का हस्ताक्षर करना संसदीय लोकतंत्र में सही नहीं है। लेकिन क्या नेता प्रतिपक्ष के सामने उन्हीं की पार्टी के सांसदों द्वारा आसंदी पर कागज फेंकना और गर्भगृह में आकर नारेबाजी करना  संसदीय लोकतंत्र के लिए सही है ? राष्ट्रपति का अभिभाषण और बजट जैसे विषय विपक्ष के लिए अपना दृष्टिकोण रखने का बेहतरीन अवसर होते हैं जिसका लाभ उसे उठाना चाहिए क्योंकि जब सदन  नहीं चलता तब भी सत्ता पक्ष का काम तो जैसे - तैसे हो ही जाता है किंतु विपक्ष के हाथ कुछ नहीं लगता। ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि कांग्रेस भले ही सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है लेकिन अन्य दलों के पास भी ऐसे सांसद हैं जो  अपनी बात प्रभावशाली तरीके से रखते हैं किंतु हंगामे की वजह से उन्हें बोलने ही नहीं मिलता। ये देखते हुए इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि होली के बाद जब संसद का सत्र दोबारा शुरू होगा तब भी इसी तरह का तनावपूर्ण माहौल बना रहेगा क्योंकि जिस उद्देश्य से ये अवकाश दिया जाता है उसके सदुपयोग के प्रति ज्यादातर सांसदों में लेश मात्र गंभीरता नहीं है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 14 February 2026

नेपाल के बाद बांग्लादेश में भी जेन - जी ठगा महसूस कर रहे



वर्ष 2024 के अगस्त माह में युवाओं के जबरदस्त आंदोलन के परिणामस्वरूप हालात इतने बिगड़े कि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को जान बचाकर भारत आना पड़ा।  तब से वे दिल्ली के  निकट कड़ी सुरक्षा के बीच रह रही हैं। हालांकि भारत सरकार ने उन्हें आज तक औपचारिक तौर शरण नहीं दी। लेकिन बांग्लादेश के अनुरोध के बावजूद वापस भी नहीं भेजा। उनकी पार्टी अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया गया लिहाजा वह चुनाव में भाग नहीं ले सकी।  गत दिवस आए परिणामों के बाद उनकी परम्परागत विरोधी बीएनपी प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में लौटी जिसके कारण हसीना की घर वापसी के आसार धूमिल हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अवामी लीग समर्थक मतदाता विशेष तौर पर  हिन्दू समुदाय ने कट्टरपंथी जमात - ए - इस्लामी के आतंक से बचने के लिए तारिक रहमान की बीएनपी को समर्थन देना बेहतर समझा।  सबसे चौंकाने वाली बात रही हसीना को सत्ता से हटाने के लिए हुए आंदोलन का नेतृत्व करने वाले छात्र नेताओं को मतदाताओं द्वारा तिरस्कृत किया जाना। उल्लेखनीय हैं श्रीलंका में हुए सत्ता परिवर्तन में युवाओं की प्रमुख भूमिका के बाद बांग्लादेश और नेपाल में भी उसी शैली में सरकार बलपूर्वक पलटी गई और गुस्साई जनता ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री आवास में घुसकर लूटपाट की। उन दृश्यों को पूरी दुनिया में देखा गया। कुछ अन्य देशों में भी इसी तरह सत्ताधीश हटाए हटाए गए जिसके बाद जेन - जी नामक एक नया संबोधन चल पड़ा। लोकतांत्रिक देशों के युवाओं में  सत्ता के प्रति बढ़ते असंतोष की परिणिति हिंसक जनांदोलन के रूप में होने से भारत में भी ऐसा ही होने की आशंका व्यक्त की गई। इसके पीछे वही ताकतें हैं जो लगातार देश को अस्थिर करने के लिए प्रयासरत हैं। सी.ए.ए , एन. आर.सी  और कृषि कानूनों आदि के बहाने जो आन्दोलन खड़े किए गए उनमें अलगाववादी ताकतों की भूमिका स्पष्ट तौर पर दिखाई दी। जेएनयू, अलीगढ़ मुस्लिम , जादवपुर और उस्मानिया विवि में हुए छात्र आंदोलनों में भी वही झलक दिखाई दी। दिल्ली के शाहीन बाग धरने को नया प्रयोग नाम दिया गया। साल भर से ज्यादा दिल्ली में रास्ता रोककर किए गए किसान आंदोलन से किसानों का तो राई - रत्ती भला नहीं हुआ लेकिन पंजाब में खालिस्तानी आतंक का पुनर्जन्म अवधि हो गया। इसलिए बांग्लादेश और नेपाल में जब अराजक तरीके से सत्ता बदली गई तब भारत में भी कुछ लोगों को वैसे ही युवा आंदोलन की उम्मीद नजर आने लगी। वोट चोरी के नाम पर जनता को भड़काकर अव्यवस्था फैलाने का ताना - बाना बुना गया। उस मुहिम से  भी वही तबका जुड़ गया जो उसके पहले के सभी आंदोलनों में सक्रिय रहा। बिहार के मतदाताओं ने वोट चोरी का ढोल पीटने वालों के दुष्प्रचार पर जिस तरह पानी फेरा उसके बाद भारत में जेन - जी के नाम पर राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा करने की कोशिश विफल हो गई। उसके बाद  एस.आई.आर ( मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण) का विरोध कर जनता को भड़काने की चाल चली गई किंतु उसे भी जन समर्थन नहीं मिला। दरअसल इसका कारण ये है युवा शक्ति  आंदोलन तो खड़ा कर देती है किंतु जनता उसे सत्ता संचालन के लायक नहीं समझती। श्रीलंका और नेपाल में हुए सत्ता परिवर्तन में युवाओं की निर्णायक भूमिका के बाद भी नई सरकार में ले देकर फिर पेशेवर राजनेता ही लौट आए। और यही बांग्लादेश के चुनाव परिणाम दर्शा रहे हैं। जनता ने बीएनपी को  सरकार और जमात - ए - इस्लामी को तो विपक्ष में बिठा दिया। लेकिन जिन युवाओं के कारण बंगलादेश में बड़ी जनक्रांति हुई उनको पूरी तरह नकार दिया । इसी तरह नेपाल में भी जिन युवा नेताओं ने कुछ दिनों के भीतर सत्ता के महारथियों को उखाड़ फेंका उन्हें सत्ता प्रतिष्ठान की देहलीज पर ही रोक दिया गया। उक्त उदाहरणों से ये निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जेन - जी का उपयोग एक औजार के रूप में किया जाता है। इसके पीछे विदेशी शक्तियों का हाथ होता है। बांग्लादेश और नेपाल की घटनाओं में इसका प्रमाण खुलकर सामने आया। संयोगवश भारत में युवा शक्ति को भड़काकर अराजकता के रास्ते पर ले जाने का षडयंत्र लगातार विफल हो रहा है। इसका कारण हमारे समाज का अहिंसक स्वाभाव है। इसलिए भारत में सत्ता परिवर्तन मतदान से होता है रक्तपात से नहीं। दुर्भाग्य से हमारे सभी पड़ोसी देशों पाकिस्तान , नेपाल , श्रीलंका , बंगलादेश, म्यांमार में लोकतंत्र कभी सेना तो कभी भीड़ के कदमों तले रौंदा जा चुका है किंतु देश विरोधी शक्तियों की तमाम कोशिशें भारत में नाकामयाब होती रही हैं। नक्सलवाद की जड़ें उखड़ जाना इस बात का ताजा प्रमाण है कि भारत की युवा शक्ति की लोकतांत्रिक व्यवस्था में गहरी आस्था है।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 13 February 2026

विशाल बहुमत के बाद भी तारिक की राह आसान नहीं होगी




आखिरकार बांग्लादेश में चुनाव हो ही गए जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया की पार्टी बीएनपी को प्रचंड बहुमत मिला। अब इसके नेता तारिक रहमान का प्रधानमंत्री बनना से सुनिश्चित है जो खालिदा जिया के बेटे हैं और गत 25 जनवरी को ही देश लौटे थे जिसके पाँच दिन बाद ही बेगम चल बसीं। तारिक के पिता जिया उर रहमान भी  राष्ट्रपति रहे थे । देश की राजनीति  50 सालों से मुजीबुर्रहमान और जिया उर रहमान के परिवार के बीच ही झूलती रही। जिया के बाद उनकी पत्नी सत्ता में आईं वहीं मुजीब की बेटी शेख हसीना भी लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहीं। और अगस्त 2024 में तख्ता पलट होने के बाद  भारत। आकर यहीं रह रही हैं जो दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट का बड़ा कारण है। बांग्लादेश की अदालत ने हसीना को मृत्युदंड सुना दिया जिसके बाद वह लगातार उन्हें वापस भेजने की मांग कर रहा है। कहा जाता है कि हिंदुओं पर अत्याचार के पीछे हसीना का भारत में रहना भी कारण है। हालांकि  बांग्लादेश बनने के कुछ सालों बाद  मुजीब की हत्या होने के उपरांत  सत्ता ज्यादातर भारत विरोधियों के हाथ रही जिससे हिंदुओं की हत्या , महिलाओं के साथ दुराचार , मंदिरों आदि को नष्ट करने जैसे अपराध सरकारी संरक्षण में होते रहे। शेख हसीना के 15 वर्षीय काल में जरूर कुछ कमी आई लेकिन हिन्दू आबादी और  धर्मस्थलों की पूरी तरह सुरक्षा नहीं हो सकी। हसीना को अपदस्थ करने के बाद मुस्लिम कट्टरपंथियों ने हिंदुओं के साथ जो व्यवहार किया उसने 1947 की कड़वी यादें ताजा कर दीं। बावजूद इसके खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर शामिल हुए और उनके बेटे तारिक रहमान से निजी मुलाकात कर चर्चा की। संभवतः इसीलिए चुनाव घोषणापत्र में बीएनपी ने हिंदुओं की सुरक्षा का वायदा शामिल किया। प्रचार के दौरान भी तारिक भारत के साथ बेहतर रिश्तों की बात कहते रहे। इसीलिए हिन्दू मतदाताओं ने बीएनपी का समर्थन भी किया। मुख्य विपक्षी दल के तौर पर जमात - ए - इस्लामी उभरी जिसके नेता अजहरुल इस्‍लाम को मो. यूनुस की अंतरिम सरकार के बनने के बाद 1971 के मुक्ति संग्राम का विरोध करने के आरोप में युद्ध अपराधी मानकर मृत्युदंड सुनाने के साथ ही जमात को भी प्रतिबंधित कर दिया गया। लेकिन बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी सजा रद्द कर  पार्टी का पंजीयन भी बहाल कर दिया। कहा जाता है जमात पर यूनुस का वरद हस्त था और वे उसे सत्ता में देखना चाह रहे थे। लेकिन खालिदा की आकस्मिक मौत के बाद बीएनपी के पक्ष में सहानुभूति पैदा हुई। जिस छात्र संगठन की हसीना की सत्ता उखाड़ फेंकने में प्रमुख भूमिका रही उसे भी मतदाताओं ने नकार दिया। तारिक  ने चुनाव के दौरान खुद को एक सुलझे हुए नेता के तौर पर पेश किया और भारत के साथ बेहतर संबंध रखने की उम्मीद भी जताई।  दूसरी तरफ जमात घोषित तौर पर इस्लामिक कट्टरपंथी व्यवस्था की वकालत कर रही थी।बहरहाल तारिक  को दो तिहाई बहुमत देकर मतदाताओं ने राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित की । देखना ये है कि क्या हिंदुओं का थोक समर्थन मिलने से तारिक उनके प्रति संवेदनशील रहने के साथ ही भारत के साथ संबंध सुधारने की दिशा में आगे बढ़ेंगे जो मो. यूनुस के आने के बाद बुरी तरह बिगड़ गए थे। ये सवाल भी है कि तारिक क्या यूनुस के प्रभाव से बाहर निकलकर फैसले ले पाएंगे क्योंकि कट्टरपंथी जमात नई सरकार को परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। बांग्लादेश के  कट्टरपंथियों पर पाकिस्तान जिस तरह डोरे डाल रहा है उसकी वजह से  भारत विरोधी भावनाओं को भड़काने के प्रयास होते रहेंगे जिसका दुष्परिणाम हिंदुओं पर अत्याचार के तौर पर सामने आ सकता है। और ये भी कि क्या शेख हसीना के भारत में रहते तक तारिक उसके साथ नज़दीक आने का साहस बटोर सकेंगे?  सीमा और नदियों के पानी के अलावा घुसपैठियों की वापसी जैसे तमाम विवादित मुद्दे लंबित हैं। वहीं बांग्लादेश पर प्रभाव जमाने के लिए पाकिस्तान, अमेरिका और चीन प्रयासरत हैं। यूनुस ने वहां चीन की जड़ें जमाने में काफी सहायता दी। डोनाल्ड ट्रम्प भी एक द्वीप पर नजर गड़ाए हैं। ऐसे में तारिक के लिए अंतर्राष्ट्रीय दबाव बड़ी समस्या बनेंगे। हालांकि उनका और बांग्लादेश दोनों का हित तो भारत के साथ दोस्ती बढ़ाने में ही है किंतु उसमें शेख हसीना को पनाह देना बाधा बन सकता है जिनके राज में ही खालिदा जिया जेल गईं और तारिक को देश छोड़ना पड़ा। ये सब देखते हुए इस देश और नई सरकार के बारे में कोई भी भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी क्योंकि इस देश की सियासत शुरू से ही कड़वाहट से भरी रही। सबसे बड़ी बात यहां इस्लामिक धर्मांधता का बोलबाला है जिसके कारण इसकी आजादी के लिए खून बहाने वाले भारत को छोड़ ये देश पाकिस्तान के करीब जा पहुंचा जिसके हुक्मरानों और फौजियों ने बांग्लादेशी जनता और महिलाओं पर अमानुषिक अत्याचार किए थे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 12 February 2026

सांसदों की भीड़ में सर्वमान्य नेताओं का अभाव


ऐसा लगता है कि संसद के बजट सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव बढ़ता ही जाएगा । परिणामस्वरुप सार्थक चर्चा के बजाय आरोप - प्रत्यारोप  होते रहेंगे और इसी दौरान बजट पारित भी हो जाएगा। वैसे भी राहुल गांधी के आक्रामक भाषण और वित्तमंत्री के तीखे जवाब के बाद बहस में कोई आकर्षण नहीं रहा। सौभाग्य से राज्यसभा अपेक्षाकृत शांत है जहां चर्चा कुछ बेहतर तरीके से हो रही है। अब तक दोनों सदनों में जितने भी सांसदों ने बजट पर  विचार रखे उनमें सबसे सुलझा हुआ भाषण राज्यसभा में आम पार्टी के सदस्य राघव चड्ढा ने दिया जो पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट भी हैं। उन्होंने बजट के कुछ प्रावधानों की प्रशंसा की तो कुछ की आलोचना भी। लेकिन एक जिम्मेदार सांसद की तरह वित्तमंत्री को अनेक उपयोगी सुझाव भी दिए। उस दौरान निर्मला सीतारमण बड़े ध्यान से उन्हें सुनती रहीं। बेहतर हो जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में वित्तमंत्री द्वारा बजट पर हुई  बहस के जवाब में दिए भाषण की प्रशंसा की ठीक वैसे ही उन्हें श्री राघव की तारीफ भी करनी चाहिए जिन्होंने विपक्ष में रहते हुए भी उत्तेजना फैलाने की बजाय उच्च सदन का सदस्य होने की पात्रता प्रमाणित की। बहरहाल लोकसभा में जो टकराव है उससे अप्रिय स्थितियां उत्पन्न होने की आशंका बढ़ रही है। कांग्रेस द्वारा लोकसभाध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव तो रखवा दिया गया किंतु तृणमूल कांग्रेस के साथ न आने से उसकी वजनदारी कम हो गई। कांग्रेस की चिंता ये है कि  प्रस्ताव धराशायी होने के बाद वह अध्यक्ष को लेकर क्या करेगी? दूसरी तरफ नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार गलतियां करते जा रहे हैं। बजट पर बोलते हुए भारत माँ को बेचने जैसी हल्की बात बोलकर उन्होंने मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को गद्दार बोलने वाली गलती दोहरा दी। इसके अलावा अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में एपस्टीन फाइल का जो जिक्र किया वह भी अवांछित और अप्रासंगिक था। व्यापार समझौते का जितना भी विवरण सार्वजानिक हुआ उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे भारत के झुकने का संकेत हो। उल्टे अमेरिका ने कुछ बातों पर स्पष्टीकरण देकर विपक्ष द्वारा उठाई जा रही शंकाओं का समाधान कर दिया। सदन के बाहर संसद के परिसर में  प्रदर्शित वह बैनर भी संसदीय मर्यादा के विरुद्ध है जिसमें प्रधानमंत्री मोदी को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सामने घुटना टेककर बैठा दिखाया गया है। श्री गांधी के भाषण के कुछ अंशों पर सत्ता पक्ष ने विशेषाधिकार हनन कार्रवाई  की जो घोषणा की है वह निश्चित तौर पर पलटवार ही है । इसी तरह पूर्व थल सेनाध्यक्ष नरवणे की कथित अप्रकाशित पुस्तक की प्रति का प्रदर्शन करने के कारण कानून का शिकंजा नेता प्रतिपक्ष के इर्द -गिर्द कसता जा रहा है। इस मुकाबले में कौन विजेता होकर निकलेगा वह उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना ये कि संसदीय प्रणाली की गरिमा बचेगी या नहीं? सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव नई बात नहीं। संसद के भीतर गर्मागर्मी भी होती रही है । लेकिन मौजूदा माहौल  वैचारिक विरोध से आगे बढ़कर शत्रुता का एहसास करवा रहा है। प्रधानमंत्री के प्रति राहुल जिस तरह की टिप्पणियां करते हैं वह उनकी अपरिपक्वता का परिचायक है। वहीं सत्ता पक्ष भी श्री गांधी की जरूरत से ज्यादा घेराबंदी करता है। बेहतर हो उनको भी अन्य विपक्षी नेताओं जितना ही महत्व दिया जाए । यद्यपि संसदीय प्रणाली में नेता प्रतिपक्ष का पद बेहद महत्वपूर्ण होता है और उसे भविष्य का  संभावित प्रधानमंत्री माना जाता है। साठ के दशक में पहली बार सांसद बने अटलबिहारी वाजपेयी के भाषण सुनकर पं.जवाहर लाल नेहरू ने उनमें भविष्य का प्रधानमंत्री देख लिया था। 1977 तक संसद में कांग्रेस का इकतरफा दबदबा हुआ करता था। लेकिन तब  विपक्ष की कम संख्या के बाद भी अनेक ऐसे सदस्य होते थे जो अपनी प्रतिभा और संसदीय ज्ञान के बल पर सरकार को झुका देते थे। लेकिन उनके और सत्ता पक्ष के बीच वैसी कटुता नजर नहीं आती थी जो आज स्थायी रूप ले चुकी है। दुर्भाग्य से  सैकड़ों सांसदों के बीच ऐसे नेताओं का अभाव हो गया है जो इस तरह के विवाद में दोनों पक्षों के बीच सुलह करवा सकें। और  जो हैं भी वे अपना सम्मान बचाए फिरते हैं। कुल मिलाकर संसद की  छवि जनमानस में लगातार गिरती जा रही है जो लोकतंत्र के लिए अशुभ संकेत है। राहुल गांधी सहित विपक्ष के अन्य नेताओं को ये ध्यान रखना चाहिए कि संसद के न चलने से सरकार को तो खास फर्क नहीं पड़ता परन्तु विपक्ष में बैठे सांसद अपनी बात रखने से वंचित हो जाते हैं। और ये भी कि श्री गांधी के नेता प्रतिपक्ष बन जाने के बाद कांग्रेस हरियाणा, महाराष्ट्र , दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनाव में चारों खाने चित्त हो चुकी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 11 February 2026

अविश्वास प्रस्ताव पर तृणमूल की दूरी से विपक्षी एकता खतरे में


लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध  अविश्वास प्रस्ताव पर तृणमूल कांग्रेस ने हस्ताक्षर नहीं किए। पार्टी के अनुसार वह पहले विपक्ष की सभी मांगों को देखने के बाद ही इसकी समर्थन पर फैसला करेगी। लेकिन पार्टी का ये कहना उसके रुख का संकेत है कि अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव अंतिम हथियार होता है । इससे लगता है तृणमूल मतदान के समय अनुपस्थित रह सकती है। हालांकि राहुल गांधी को सदन में बोलने नहीं देने के विरोध में विपक्ष द्वारा उठाए गए कदमों में पार्टी साथ रही। जिन 8 सदस्यों को निलंबित किया गया उनमें तृणमूल के कल्याण बैनर्जी भी हैं। सदन के बाहर धरने में भी तृणमूल सांसद नजर आए। सदन के भीतर अध्यक्ष  और सरकार के विरोध में पार्टी सांसद मुखर रहे हैं। बावजूद उसके अविश्वास प्रस्ताव पर उसका पीछे हटना इंडिया गठबंधन में बढ़ रही दरार का प्रमाण है। स्मरणीय है प. बंगाल विधानसभा  चुनाव में कांग्रेस ने  अकेले लड़ने का जो फैसला लिया उससे ममता बैनर्जी नाराज हैं। पिछले दो चुनावों में कांग्रेस का वामपंथी मोर्चे से गठबंधन  था। लेकिन इससे उसका अपना जनाधार खिसककर भाजपा में चला गया। 2021 के चुनाव में तो वह शून्य पर अटक गई। गत लोकसभा चुनाव में भी ममता ने कांग्रेस को घास नहीं डाली जिससे लोकसभा में कांग्रेस  दल के नेता अधीर रंजन चौधरी तक चुनाव हार गए। उसके बाद  कांग्रेस को लगा कि वामपंथियों के साथ लड़ने से उसका परम्परागत मतदाता नाराज है क्योंकि वामपंथी सत्ता की डरावनी यादें आज भी ताजा हैं। कांग्रेस द्वारा वाम मोर्चे का दामन थामने से हिन्दू समाज विशेष तौर पर सवर्णों का  वोट बैंक खिसककर भाजपा की झोली में जा गिरा। इसके अलावा मुस्लिम मतदाता भी  कांग्रेस की कमजोर स्थिति देख तृणमूल की शरण में चले गए। ऐसे में जब कांग्रेस  एकला चलो की नीति पर लौटी तो तृणमूल के कान खड़े हुए। हालांकि प.बंगाल में इंडिया गठबंधन में दरार के लिए ममता ही जिम्मेवार हैं जो  अपना एकाधिकार बनाए रखने के लिए किसी अन्य पार्टी को आगे नहीं बढ़ने देना चाहतीं। राष्ट्रीय स्तर पर भले ही वे भाजपा के विरुद्ध कांग्रेस के साथ हों किंतु प. बंगाल में  कांग्रेस को  उभरने का अवसर नहीं देना चाहतीं। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर भी वे पसंद नहीं  करतीं। ऐसे में श्री बिरला के विरुद्ध कांग्रेस की पहल पर लाए गए अविश्वास प्रस्ताव से दूरी बनाकर ममता ने  आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को किनारे लगाने का इरादा स्पष्ट कर दिया । वैसे भी बीते वर्षों में अनेक अवसर आए जब संसद में तृणमूल ने एन वक्त पर कांग्रेस द्वारा सरकार के विरुद्ध शुरू की गई मुहिम को पलीता लगा दिया। अडानी समूह संबंधी विवाद को लेकर जेपीसी के गठन की मांग का भी तृणमूल कांग्रेस ने विरोध किया था। दरअसल ममता बैनर्जी को ये लगता है कि कांग्रेस के मजबूत होने से राहुल गांधी की संभावनाएं प्रबल होंगी जो उनकी महत्वाकांक्षाओं की राह में बाधा बनेगी। इसीलिए वे समय - समय पर कांग्रेस को झटका देती रही हैं। गोवा विधानसभा के पिछले चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारकर उन्होंने कांग्रेस के लिए खाई खोद दी। इसी तरह दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को समर्थन देकर कांग्रेस को शून्य से आगे नहीं बढ़ने दिया। वैसे भी लोकसभा चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन की एकजुटता बनी नहीं रह सकी।  संसद के भीतर भी विपक्ष की साझा रणनीति नहीं दिखाई देती। बिहार विधानसभा के चुनाव में  करारी हार के बाद राहुल की  राजनीतिक समझ पर कांग्रेस के भीतर से ही सवाल उठने लगे हैं। बिहार के जमीनी मुद्दों से इतर वे वोट चोरी की रट ही लगाए रहे। संसद के सत्रों में भी वे कोई न कोई विवाद खड़ा कर देते हैं जिससे वे तो चर्चा में आ जाते हैं किंतु शेष विपक्ष को अपनी बात रखने का अवसर ही नहीं मिलता। समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव भी राहुल की इस आदत से नाराज बताए जाते हैं। अंदरखाने की खबर तो ये भी है कि तमिलनाडु में द्रमुक भी आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को झटका देने की सोच रही है। उधर केरल में कांग्रेस की चुनौती के चलते वामपंथी पार्टियां भी उससे दूरी बना रही हैं। याद रहे वायनाड में पहले भी राहुल और  प्रियंका वाड्रा के लड़ने का वामपंथियों ने काफी विरोध किया था। इस प्रकार ये स्पष्ट है कि राहुल गांधी की कार्यशैली के कारण इंडिया गठबंधन में पहले  जैसी कसावट नहीं रही। लोकसभाध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर तृणमूल द्वारा हस्ताक्षर नहीं करना साधारण बात नहीं है। इसके जरिए दरअसल ममता बैनर्जी ने कांग्रेस को ये संदेश दे दिया कि उनके भाजपा विरोध को कांग्रेस का समर्थन समझने की भूल न करे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 10 February 2026

बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम कटने से भयभीत हैं ममता


प. बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एस. आई. आर) को रोकने के आखिरी प्रयास में भी राज्य की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी  विफल रहीं। सर्वोच्च न्यायालय में दिग्गज वकीलों के साथ ही वे खुद भी पैरवी करने उतरीं और  उक्त प्रक्रिया को रुकवाना  चाहा किंतु उनकी दलीलें काम नहीं आईं।  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पुनरीक्षण रोकने से इंकार के बाद अब सुश्री बैनर्जी के पास  एस आई.आर में रोड़ा अटकाने के अवसर खत्म हो चुके हैं। गत  दिवस न्यायालय ने साफ शब्दों में  कहा कि  एस.आई.आर  जारी  रहेगी और  इस संवैधानिक काम में किसी की भी दखलअंदाजी बर्दाश्त नहीं होगी।  राज्य सरकार को ये आदेश भी दिया कि वह  आयोग की मदद के लिए 8 हजार  से अधिक अधिकारी तुरंत मुहैया कराए। इसके अलावा अदालत ने नामों में गलती वाले मतदाताओं को राहत देते  हुए कहा वे 14 फरवरी के एक हफ्ते बाद तक अपने कागजात दिखा सकेंगे। आयोग की इस शिकायत पर कि बंगाल में उनके अधिकारियों को काम करने से रोका जा रहा है और कुछ जगहों पर तो नोटिस तक जला दिया गया, सर्वोच्च ने नाराज  होकर कहा कि संविधान पूरे देश के लिए एक है और किसी को भी सरकारी काम में बाधा डालने की अनुमति नहीं है। इस प्रकार जैसे बिहार में विपक्षी दलों द्वारा ऐड़ी - चोटी का जोर लगाए जाने के बाद भी मतदाता सूचियों  पुनरीक्षण नहीं रुका वही स्थिति  बंगाल में भी बन गई । ममता ने तो बिहार में एस. आई. आर शुरू होते ही अपने राज्य में उसे रोकने की घोषणा जोर - शोर से की थी। राज्य के जिन शासकीय कर्मचारियों को चुनाव आयोग ने  पुनरीक्षण का काम दिया उनको भी असहयोग हेतु भड़काया गया। काम के बोझ से बी. एल. ओ की मौत का भी खूब प्रचार किया गया। छोटी - छोटी बातों को लेकर उच्च और सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे खटखटाए गए। लेकिन  सारी कोशिशें व्यर्थ साबित हुईं।  उल्लेखनीय है बिहार के बाद  पुनरीक्षण का काम अनेक राज्यों में शुरू हुआ लेकिन वहां प. बंगाल जैसी हाय - तौबा देखने नहीं मिली । ममता को इस बात का डर सता रहा है कि  उनकी सबसे बड़ी बैसाखी कहलाने वाले जिन मुसलमानों के नाम बड़ी संख्या में काटे गए उनमें बांग्लादेशी घुसपैठियों की भी अधिकता है जो इस प्रक्रिया के शुरू होते ही  गायब हो गए।  ऐसे लाखों मतदाताओं ने आयोग के नोटिसों का जवाब भी नहीं दिया। ममता के डर का एक कारण ये भी है कि 30 फीसदी से भी अधिक मुस्लिम मतदाताओं के एकमुश्त समर्थन की गारंटी नहीं रही। कांग्रेस और वाममोर्चा इस बार अलग - अलग लड़ेंगे । जाहिर है वे भी मुस्लिम मतों में  सेंध लगाएंगे। लेकिन उनकी चिंता का सबसे बड़ा कारण असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एमआईएम के अलावा मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रखने वाले तृणमूल के बागी विधायक हुमायूं कबीर का मैदान में उतरना है। बिहार में ओवैसी की सफलता से ममता घबराहट में हैं। ऊपर से बाबरी मस्जिद के लिए मुस्लिम समुदाय जिस उत्साह के साथ हुमायूं कबीर के साथ जुड़ा उसने मुस्लिम मतों में बंटवारे की आशंका उत्पन्न कर दी। दूसरी तरफ घुसपैठियों को संरक्षण और मुसलमानों के जरूरत से ज्यादा संरक्षण के कारण हिन्दुओं में पहली बार ममता के विरुद्ध गोलबंद होने की संभावना बढ़ रही है। बांग्लादेश में बीते एक - डेढ़ साल से हिंदुओं पर मुस्लिम कट्टरपंथियों के अत्याचार की जो खबरें आ रही हैं उनके कारण भी हिंदुओं के बीच ये भावना तेजी से फैल रही है कि उन्हें अपने हितों का संरक्षण करने वाली सरकार चाहिए जिसकी गुंजाइश भाजपा में ही नजर आती है। हालांकि ममता की सत्ता को उखाड़ फेंकना भाजपा के लिए भी इतना आसान नहीं है क्योंकि जब तक उसे हिंदुओं के 70 - 75 फीसदी मत नहीं मिलते तब तक राइटर्स बिल्डिंग पर कब्जा नामुमकिन है। बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खाली हाथ लौटा दिए जाने के बाद ममता पर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ा है। भाजपा इसका कितना फायदा उठा सकेगी ये कहना फिलहाल मुश्किल है क्योंकि  ममता चुनाव की अधिकृत घोषणा के पहले ऐसी कोई चाल  चल सकती हैं जैसी बिहार में नीतीश सरकार ने महिलाओं के खाते में 10 हजार जमा करने के रूप में चली थी। हालांकि  एस. आई. आर की प्रक्रिया को रोकने के लिए उन्होंने जिस तरह से हाथ - पांव मारे वह  उन पर पराजयबोध के हावी होने का संकेत है। वरना विधानसभा में इतने विशाल बहुमत और 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा से काफी बेहतर प्रदर्शन के बाद भी वे मतदाता सूचियों से नाम काटे जाने से इतनी विचलित नहीं होतीं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 9 February 2026

अमेरिका से समझौते की प्रशंसा और आलोचना में जल्दबाजी से बचें


भारत - अमेरिका  व्यापार समझौते  का जो प्रारूप जारी हुआ उसके पक्ष और विपक्ष में विभिन्न प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। उद्योग और व्यापार जगत के ज्यादातर दिग्गजों ने उसको देशहित में बताते हुए सरकार को बधाई दी है। इसका प्रमाण शेयर बाजार में तेजी बने रहना है। आज ये खबर भी आ गई कि  समझौता की तारीख तक भारतीय निर्यातकों पर लगे अतिरिक्त टैरिफ के 40 हजार करोड़ रु. अमेरिका उन्हें लौटाएगा जो बड़ी राहत है। लेकिन दूसरी तरफ कतिपय किसान संगठन प्रचार कर रहे हैं कि  भारत के कृषि और डेरी उद्योग  की बलि चढ़ा दी गई। इसे लेकर राष्ट्रव्यापी आंदोलन की घोषणा भी की गई है। ऐसे में विपक्षी दल भला कहां चुप बैठते सो उन्होंने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के समक्ष झुकने वाला आरोप लगा दिया। किसानों और दुग्ध उत्पादकों को होने वाले नुकसान की बात किसान आंदोलन के अघोषित सलाहकार रहे योगेंद्र यादव सहित वह लॉबी भी कर रही है जो मोदी सरकार का विरोध करने के बहाने ढूंढ़ती रहती है। बहरहाल समझौते के विरोधियों ने अब तक जो मुद्दे उठाए उनमें आगामी 5 सालों में 500 अरब डॉलर का सामान खरीदना भी है। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा का कहना है कि भारत को अमेरिका से होने वाले आयात में ढाई गुना वृद्धि करना पड़ेगी जो फिलहाल 40 - 42 अरब डॉलर प्रतिवर्ष ही है। साथ ही कुछ फलों और पशु आहार के आयात की छूट पर भी उंगलियां उठ रही हैं। लेकिन प्रधानमंत्री और इस समझौते के  प्रमुख पात्र वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया कि सरकार  किसानों के हितों की रक्षा करने प्रतिबद्ध रही है। लेकिन सबसे सटीक स्पष्टीकरण कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दिया। उनके मुताबिक सोयाबीन, मक्का, चावल, गेहूं, चीनी, अनाज, पोल्ट्री, डेयरी उत्पाद, केला, स्ट्रॉबेरी, चेरी, खट्टे फल, हरी मटर, काबुली चना, मूंग, तिलहन, एथनॉल और तंबाकू जैसे उत्पादों पर अमेरिका को  कोई रियायत नहीं मिली। वहां  से दूध, पाउडर, क्रीम, दही, छाछ, मक्खन, घी, बटर ऑयल, पनीर और चीज जैसे किसी भी डेयरी उत्पाद का आयात करने पर भारत राजी नहीं हुआ। उन्होंने भारतीय मसालों को भी  खतरे से बाहर बताया। लेकिन कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा ने उक्त समझौते की ये कहते हुए आलोचना की है कि सरकार ने कुछ उत्पादों के आयात की अनुमति देकर भारत के कृषि उद्योग को नुकसान पहुंचाने का रास्ता खोल दिया है। चूंकि अभी तक समझौते का प्रारूप ही जारी हुआ है इसलिए समर्थन और विरोध में किए जा दावों और प्रतिदावों की पुष्टि  संभव नहीं है। मार्च में जब समझौते पर हस्ताक्षर होंगे तब ही ये बात सामने आ सकेगी कि प्रशंसक सही हैं या आलोचक ? ट्रम्प के इस दावे पर भी सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए कि भारत ने रूस से कच्चा तेल आयात करना बंद कर दिया जिसके कारण 25 प्रतिशत की पेनाल्टी  घटा दी गई। रूस ने तो इसका खंडन कर दिया किंतु भारत सरकार की कोई टिप्पणी अभी तक नहीं आई। यद्यपि पहले भी ट्रम्प इस तरह के शिगूफे छोड़ते रहे हैं किंतु भारत ने तेल खरीदना जारी रखा। अमेरिका सरकार के अनेक प्रवक्ताओं का साफ कहना है कि भारत ने रूस से तेल खरीदी नहीं रोकी तब 25 का  टैरिफ दोबारा थोप दिया जाएगा। ऐसे में समझौते के विस्तृत प्रारूप पर हस्ताक्षर होने  के पहले भारत  को इस मुद्दे पर अमेरिका से दो टूक बात कर लेना चाहिए। ये बात तो सही है कि कोई भी समझौता एकपक्षीय नहीं हो सकता। अमेरिका यदि भारत के साथ होने वाले व्यापार घाटे को कम करना चाह रहा है तो ये उसका अधिकार है। हर देश इस बारे में प्रयासरत रहता है। चूंकि अभी तक अमेरिका हमारा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा जो हमारे सामान पर शून्य टैरिफ लगाता था इसलिए 18 प्रतिशत का टैरिफ निश्चित रूप से भारी है। लेकिन उससे पूरी तरह कारोबारी रिश्ते तोड़ना अव्यवहारिक भी है और असम्भव भी । इसीलिए भारत ने  टैरिफ हमले के जवाब में अनेक देशों से मुक्त व्यापार संधि करते हुए विश्व व्यापार में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति का दांव चला। शुरू में तो ट्रम्प ने इसे हल्के में लिया किंतु जैसे ही यूरोपीय यूनियन से संधि हुई उनको चिंता सताने लगी जिसके बाद उन्होंने समझौता होने की घोषणा कर दी। यद्यपि गतिरोध खत्म होना तो खुशी की बात है किंतु अब कोई ऐसी मजबूरी नहीं है कि अमेरिका को वे रियायतें दी जाए जो  हमारे किसान ही क्यों  उद्योगपति और व्यापारी के हितों के भी विरुद्ध हों। सरकार लोगों की नाराजगी से बचने के लिए किसी बात पर अभी पर्दा डाल भी दे किंतु जब समझौता अपने विस्तृत रूप में सामने आएगा तब तो सब स्पष्ट होगा ही। इसलिए बेहतर है सरकार पूरी ज़िम्मेदारी से ही समझौते संबंधी जानकारी दे क्योंकि सूचना क्रांति के इस युग में कुछ भी छिपा नहीं रह सकता। वैसे आलोचकों को भी जल्दबाजी से बचना चाहिए।


- रवीन्द्र वाजपेयी