स्वाधीनता दिवस पर लालकिले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनेक मुद्दों पर सरकार की कार्य योजना देश के सामने रखी। इनमें विद्यार्थियों पर केंद्रित ऑन लाइन कोचिंग और 1 करोड़ युवाओं को ए.आई.(आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस) प्रशिक्षण संबंधी घोषणा के अलावा समुद्र से तेल निकालकर आत्मनिर्भरता हासिल करना और परमाणु ऊर्जा के उत्पादन के लक्ष्य पूरे करना भी है। श्री मोदी ने देश के विकास के लिए शक्ति की सप्तधारा का आह्वान किया, जिसमें मैन्युफैक्चरिंग, गतिशक्ति, और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता जैसे प्रमुख कार्य शामिल हैं। ऊर्जा सुरक्षा पर जोर देते हुए उन्होंने देश में सेमीकंडक्टर संयंत्र और महत्वपूर्ण खनिजों के उत्पादन को बढ़ाने की जरूरत के साथ ही युवाओं से डिजिटल जनगणना अभियान में सक्रिय रूप से भाग लेने और सटीक डेटा ऑनलाइन अपलोड करने का आह्वान किया। राष्ट्रगीत वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने का विशेष उल्लेख भी उनके भाषण में विशेष रूप से हुआ। और लालकिले से पहली बार राष्ट्रागान जन, गण , मन के अलावा वंदे मातरम के सभी छंदों को प्रस्तुत किया गया। लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा आंतरिक सुरक्षा को सुदृढ़ करने दिमागी नक्सलियों से सतर्क रहने का जो आह्वान किया उसे लेकर विवाद पैदा हो गया। उन्होंने हाल ही में सशस्त्र नक्सलवादियों के सफ़ाये का उल्लेख करते हुए आगाह किया कि उसके बाद भी देश में इस मानसिकता वाले लोगों को भड़काकर समाज को बांटना चाहते हैं जिनसे बचना चाहिए। हालांकि शहरी नक्सली शब्द का उपयोग पहले भी किया जाता रहा है। लेकिन दिमागी नक्सली शब्द पहली बार उपयोग में आया। संभवतः उनका अभिप्राय ये था कि हिंसा फैलाकर देश में साम्यवादी शासन व्यवस्था स्थापित करने के षडयंत्र में जुटे हथियारबंद नक्सलवादियों के खात्मे के उपरांत भी उनके मानस पुत्र दूसरे रूप में सामाजिक जीवन में घुसे हुए हैं और व्यवस्था के विरुद्ध लोगों को उकसाकर आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। इन दिमागी नक्सलियों के बीच सोशल मीडिया के जरिये संवाद और संपर्क कायम रहने से कुछ विशिष्ट समूह बन गए हैं जिनका एकमात्र काम देश को अराजकता में धकेलना है। प्रधानमंत्री द्वारा इनसे सतर्क रहने की अपील किये जाने के बाद से ही इस तबके की घबराहट सामने आ गई। चूंकि नक्सली हिंसा को कभी भी जनसमर्थन नहीं मिला इसलिए उसके अदृश्य प्रवक्ता पत्रकार, साहित्यकार , अध्यापक और एनजीओ चलाने वाले कथित सामाजिक कार्यकर्ता अप्रत्यक्ष तौर पर साम्यवादी विचारधारा के प्रसार का प्रयास करते रहते हैं। इस मुहिम में इन्होंने कांग्रेस सहित हर उस राजनीतिक पार्टी में घुसपैठ की जो रास्वसंघ और भाजपा की विरोधी हो। शिक्षा, साहित्य,कला संस्कृति, इतिहास, समाचार जगत, सिनेमा जैसी विधाओं में इन्होंने अपनी जगह बनाई। लेकिन बीते एक दशक से ये वर्ग परेशान है क्योंकि इनके षडयंत्र बेनकाब होने लगे। इन दिमागी नक्सलियों में हताशा इसलिए भी बढ़ रही हैं क्योंकि प. बंगाल और त्रिपुरा के बाद केरल की सत्ता भी इनके हाथ से निकल गई। ऐसे में केवल दिमागी नक्सलियों के जरिये ही साम्यवादी अपना अस्तित्व बचाने का ताना - बाना बुन रहे हैं। जब प्रधानमंत्री ने इनके इरादों पर सीधे चोट की तो सहानुभूति हासिल करने के लिए ये प्रचार करने लगे कि सरकार से सवाल पूछने और व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों का विरोध करने वालों को नक्सली कहकर भयभीत किया जा रहा है। पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम भी खुद को दिमागी नक्सली बताने लगे। स्मरणीय है इनके कार्यकाल में नक्सलियों द्वारा कई बड़े नरसंहार किये गए थे किंतु इनकी सरकार उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकी । अब जबकि वर्तमान गृहमंत्री अमित शाह ने हथियारबंद नक्सलियों का खात्मा करने में सफलता हासिल कर ली तब नक्सली मानसिकता के पैरोकारों में घबराहट फैलना लाजमी है। प्रधानमंत्री द्वारा इनके विरुद्ध लोगों को सावधान रहने की अपील किये जाने के बाद ये तबका नक्सली विचारधारा को अभिव्यक्ति की आजादी और सरकार के विरोध से जोड़कर खुद को पाक साफ साबित करने में जुट गया है। लेकिन भारत के युवाओं सहित समाज का बड़ा वर्ग इनके जाल में नहीं फंसने वाला। चंद ढपलीबाजों के झुंड यदि युवाओं को प्रभावित करने में सक्षम होते तो इस देश में माओवादी सत्ता आ चुकी होती। मौजूदा परिदृश्य को देखते हुए प्रधानमंत्री द्वारा दिमागी नक्सलियों पर जो निशाना लगाया वह सही जगह जाकर लगा है।
- रवीन्द्र वाजपेयी