Friday, 8 May 2026

तमिलनाडु में राजनीतिक अस्थिरता का खतरा


4 मई को चुनाव परिणाम के बाद तमिलनाडु की राजनीति बुरी तरह उलझ गई है। सत्तारूढ़ पार्टी द्रमुक और मुख्य विपक्षी अन्ना द्रमुक को पीछे छोड़ते हुए तमिल अभिनेता जेम्स विजय की  पार्टी टीवीके 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ा दल बन गई। शुरुआत में लगा कि बहुमत के लिए जरूरी 10 सीटें उसे आसानी से मिल जाएंगी। कांग्रेस ने अपने 5 विधायकों के समर्थन का पत्र सौंपकर उसकी संभावनाएं बढ़ा दीं। लेकिन राज्यपाल ने सरकार बनाने के उनके दावे को ठुकराते हुए  118 विधायकों के समर्थन के प्रमाण मांगकर अड़ंगा लगा दिया। मुख्यमंत्री स्टालिन खुद भी विधानसभा चुनाव हार गए इसलिए उनकी  पार्टी द्रमुक द्वारा विजय का साथ देना अस्वाभाविक ही था। लेकिन उनको बड़ा धक्का तब लगा जब  साथ में चुनाव  लड़ी कांग्रेस ने  पूछे बिना ही विजय को समर्थन दे दिया। उधर भाजपा का साथ नहीं लेने की उनकी घोषणा के कारण अन्ना द्रमुक का समर्थन मुश्किल है जिसका भाजपा से गठबंधन है। उसी के बाद  आशंका व्यक्त की जाने लगी कि द्रमुक और अन्ना द्रमुक के कुछ विधायक तोड़कर विजय बहुमत की व्यवस्था कर लेंगे। कुछ छोटे दलों से समर्थन मिलने की चर्चा भी सुनाई दी किन्तु इन पंक्तियों के लिखे जाने तक  पेच फंसा हुआ है। राज्यपाल दो बार विजय से  कह चुके हैं कि  118 विधायकों के समर्थन के बगैर वे उन्हें सरकार बनाने के लिए नहीं बुलाएंगे। इस उहापोह के बीच एक असम्भव सी लगने वाली बात राजनीतिक गलियारों में फैली जिसके अनुसार विजय का रास्ता रोकने के लिए द्रमुक और अन्ना द्रमुक दशकों पुरानी शत्रुता को भूलकर एक साथ आएंगे।  ऐसा होने  पर दोनों के क्रमशः 73 और 53 विधायक मिलकर 126 हो जाएंगे जो बहुमत से 8 ज्यादा हैं। ये भी कहा जा रहा है कि राज्यपाल द्वारा विजय को मुख्यमंत्री नहीं बनने देने के पीछे भाजपा का दबाव है। दरअसल पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व प. बंगाल और असम में सरकार बन जाने के बाद ही तमिलनाडु की गुत्थी सुलझाना चाह रहा है। स्टालिन और अन्ना द्रमुक के शीर्ष नेता के बीच लंबी चर्चा के दावे भी किए जा रहे हैं। यद्यपि दोनों पार्टियां इस बारे में बोलने से कतरा रही हैं।  कुल मिलाकर अब तक गतिरोध बना हुआ है। ऐसी स्थितियों में राज्यपाल के अधिकार और भूमिका को लेकर भी विमर्श शुरू हो गया है। विजय का दावा है  सबसे बड़ा दल होने के कारण राज्यपाल को उन्हें सरकार बनाने का अवसर देते हुए सदन में बहुमत साबित करने का निर्देश देना चाहिए।  यद्यपि संविधान में बहुमत शब्द का ही उल्लेख है। उस दृष्टि से राज्यपाल अपनी जगह सही हैं। दूसरी तरफ  ये भी  देखने में आया है कि स्पष्ट बहुमत नहीं होने पर भी सबसे बड़ी पार्टी के नेता को राज्यपाल सदन में बहुमत साबित करने की शर्त पर मुख्यमंत्री नियुक्त कर देते हैं। इस संबंध में कर्नाटक का उदाहरण दिया जा रहा है जहां कुछ वर्ष पूर्व  भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी किंतु उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। बावजूद उसके राज्यपाल ने उसके नेता येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री बना दिया किंतु सदन में बहुमत साबित नहीं कर पाने के कारण उन्हें गद्दी छोड़नी पड़ी। उ.प्र में भी कई दशक पहले राज्यपाल रोमेश भंडारी ने बिना बहुमत के जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बना दिया किंतु वे भी बहुमत साबित न कर पाए । उक्त दोनों मामलों में राज्यपाल की भूमिका आलोचना का पात्र बनी। हो सकता है तमिलनाडु के राज्यपाल भी अल्पमत  सरकार बनवाने के आरोप से बचना चाह रहे हों। ये बात सही है कि यदि वे स्पष्ट बहुमत के बिना विजय को मुख्यमंत्री बना देते हैं तब जोड़ - तोड़ और खरीद फरोख्त से इंकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस के अलावा वामपंथी और कुछ छोटी पार्टियों के इक्का - दुक्का विधायकों को द्रमुक और अन्ना द्रमुक गठबंधन से तोड़ने के बाद भी उनकी सरकार पर खतरे की तलवार लटकती रहेगी। ऐसे में पहले ही स्पष्ट बहुमत हासिल करना राजनीतिक स्थिरता के लिए बेहतर विकल्प है।    देखना ये है कि विजय सत्ता की देहलीज पर आकर भी बाहर ही खड़े रह जाएंगे और  द्रविड़ आंदोलन से निकली द्रमुक और अन्ना द्रमुक पुरानी दुश्मनी भूलकर विजय के सपनों पर पानी फेर देंगी। रोचक बात ये है कि दोनों राष्ट्रीय पार्टियां भाजपा और कांग्रेस अपने दम पर इस गुत्थी को सुलझाने में असमर्थ हैं क्योंकि उनके पास अंगुलियों पर गिनने लायक विधायक हैं। इधर विजय धमकी दे रहे हैं कि द्रमुक और अन्नाद्रमुक की सरकार बनी तो उनके 108 विधायक त्यागपत्र दे देंगे। हालांकि ये बहुत ही अव्यवहारिक कदम होगा और क्या पता सभी विधायक इसके लिए तैयार न हों और पार्टी ही टूट जाए। कुल मिलाकर तमिलनाडु का जनादेश बहुत ही पेचीदा है। आखिरकार सरकार किसी न किसी की तो बनेगी किन्तु उसका स्थायित्व हमेशा खतरे में रहेगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 6 May 2026

करारी हार के बाद भी त्यागपत्र न देना दिमागी दिवालियापन


कोई अनुभवहीन व्यक्ति  कहे तो समझ में आता है लेकिन कई बार केंद्र में मंत्री  और 15 सालों तक प. बंगाल जैसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री रह चुकीं ममता बैनर्जी द्वारा चुनावों में मिली करारी हार के बाद भी त्यागपत्र नहीं देने की घोषणा को दिमागी दिवालियापन ही कहा जाएगा। इस चुनाव में सुश्री बैनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस बहुमत से काफी पीछे रह गईं। वे स्वयं भी भवानीपुर की अपनी सीट पर 15 हजार  से हार गईं। सामान्य तौर  प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री अपनी पार्टी को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में शालीनता के साथ जनादेश को स्वीकार करते हुए राष्ट्रपति या राज्यपाल के पास जाकर अपना त्यागपत्र सौंप देता है। लेकिन उसे नई सरकार के बनने तक काम चलाऊ तौर पर पद पर  रहने कहा जाता है। अतीत में जब भी किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की पार्टी जनादेश हासिल करने में विफल रही तब उन्होंने त्यागपत्र देने में संकोच नहीं किया। दरअसल ये किसी कानून से अधिक लोकतांत्रिक मर्यादा और नैतिकता से प्रेरित आचरण है। गत दिवस  सुश्री बैनर्जी ने जो आरोप चुनाव आयोग, भाजपा और केंद्र सरकार पर लगाए वे अपनी जगह हैं। चुनाव में हुई गड़बड़ी की शिकायत याचिकाओं के जरिए न्यायालय में की जा सकती है। लेकिन चुनाव हारने के बावजूद पद नहीं छोड़ने की जिद का कोई औचित्य नहीं है। इसीलिए अन्य विपक्षी दलों और नेताओं तक ने उनकी हेकड़ी का समर्थन नहीं किया। उल्टे अनेक भाजपा विरोधी यू ट्यूबर पत्रकार भी उनके इस गैर जिम्मेदाराना फैसले की आलोचना करते सुने गए। जहां तक बात संवैधानिक प्रावधानों की है तो चुनाव आयोग द्वारा नई विधानसभा के लिए चुने  सदस्यों की सूची राज्यपाल को भेजे जाने के बाद उसके गठन की  अधिसूचना राजपत्र के जरिए जारी होते ही पुरानी विधानसभा अस्तित्वहीन हो जाती है। इसी के साथ ही राज्यपाल बहुमत प्राप्त दल के निर्वाचित नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त  कर शपथ हेतु आमंत्रित करते हैं।  ममता बैनर्जी इतना तो जानती ही होंगी कि निवर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 7 मई तक ही है। ऐसे में वे त्यागपत्र न दें तब  भी राज्यपाल नए मुख्यमंत्री की नियुक्ति कर  शपथ दिलवा सकते हैं। तब तक सुश्री बैनर्जी सहानुभूति बटोरने का कितना भी प्रयास करें किंतु उन्हें सफलता नहीं मिलेगी। बेहतर होता वे  जनादेश को गरिमा के साथ स्वीकार करते हुए राज्यपाल से मिलकर पद से हटने की पेशकश करतीं किंतु जिद्दी स्वभाव के लिए प्रसिद्ध सुश्री बैनर्जी ने हार की खीज में त्यागपत्र नहीं देने की घोषणा कर खुद को हँसी और आलोचना  का पात्र बना लिया। उन्होंने विपक्षी एकता के लिए काम करने की बात भी कही है । लेकिन वे भूल गईं कि इंडिया गठबंधन जिस दुर्दशा का शिकार है उसके लिए वे  भी जिम्मेदार हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस और वामपंथी दलों को मात्र 2 सीटें देने का प्रस्ताव दिया। बाद में कांग्रेस और वामपंथियों ने गठबंधन किया। उसके पहले गोवा विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी खड़े कर कांग्रेस का नुकसान भी वे करवा चुकी थीं। दिल्ली में उन्होंने कांग्रेस की बजाय आम आदमी पार्टी को समर्थन दिया। इस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच लगभग 5 फीसदी का अंतर है। लेकिन कांग्रेस , वामपंथी और अन्य मिलकर 12- 13 प्रतिशत मत बटोर ले गए। यदि  वे सबको एकजुट कर भाजपा विरोधी मोर्चा बनातीं तब चुनाव परिणाम कुछ और हो सकता था । सुश्री बैनर्जी के पास अपनी बात रखने के लिए कानून सम्मत अनेक विकल्प हैं। लेकिन लगता है सत्ता के सान्निध्य में रहने से अब उनमें संघर्ष की हिम्मत नहीं रही। और फिर उनके अस्थिर स्वभाव के कारण अन्य दलों के नेतागण भी उनसे छिटकते हैं। सच  तो ये  है कि उनकी  पराजय से कांग्रेस और वामपंथियों के अलावा अन्य दलों में भी प्रसन्नता है क्योंकि विपक्षी एकता में वे बड़ा रोड़ा थीं। दरअसल राष्ट्रीय नेता बनने की महत्वाकांक्षा होने से वे किसी और को बर्दाश्त नहीं करना चाहतीं। राहुल गांधी की नेतृत्वक्षमता पर भी वे कई बार उंगली उठा चुकी हैं। विपक्षी गठबंधन का नेता बनने के लिए समानान्तर रूप से वे तमाम विपक्षी नेताओं से भी मिलीं किंतु कामयाब नहीं हुईं। अब जबकि उनका बनाया  ढांचा बुरी तरह ढह चुका है और अपने ही राज्य में उनकी राजनीतिक हैसियत शिखर से लुढ़कर जमीन पर आ गई है तब उन्हें अकड़ छोड़कर सौजन्यता और समझदारी दिखानी चाहिए थी किंतु वे अपने उस स्वभाव को बदलने राजी नहीं हैं जिसने उन्हें सत्ता के सिंहासन से उतारकर सड़क पर ला खड़ा किया।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 5 May 2026

चुनाव परिणामों का संदेश मुफ्त उपहार ही नहीं अच्छी सरकार भी चाहिए


पांच राज्यों के चुनावों में जो पार्टी जीती वह सरकार बनाने में जुट गई वहीं जिनके हाथ पराजय आई वे भविष्य की तैयारी में लग जाएंगे।  निकट भविष्य में जहां चुनाव होने वाले हैं उन राज्यों के लिए रणनीति और मोर्चेबंदी का काम भी जल्द शुरू हो जाएगा।  2027 में गोवा , मणिपुर, उ प्र, उत्तराखंड , पंजाब, हिमाचल और गुजरात में विधानसभा चुनाव होंगे। मणिपुर में शायद अशांति के चलते चुनाव प्रक्रिया निलंबित रहे किंतु बाकी में निर्धारित समय पर मतदान होगा। असम और प. बंगाल में शानदार सफलता के कारण भाजपा का हौसला निश्चित रूप से ऊंचाई पर होगा। हालांकि दक्षिण में उसे पुडुचेरी से ही संतोष करना पड़ा।  केरल में तो वह  तीन सीटें जीत भी गई किंतु तमिलनाडु में शून्य उसका पीछा नहीं छोड़ रहा। आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों में मणिपुर को छोड़ भी दें तो गोवा , उत्तराखंड, उ.प्र और गुजरात में अपनी सरकार की वापसी के लिए वह हरसम्भव प्रयास करेगी। इसी के साथ  हिमाचल की सत्ता कांग्रेस से छीनने के अलावा पंजाब में अपने दम पर पैर जमाने की रणनीति बनाएगी। हाल ही में आम आदमी पार्टी के कुछ सांसदों को तोड़कर उसने अपने इरादे जता दिए हैं। वहीं कांग्रेस, समाजवादी पार्टी , आम आदमी पार्टी और अकाली दल भी अपने ढंग से व्यूह रचना करेंगे।   लेकिन गत दिवस आए परिणामों से सभी दलों को ये सबक लेना चाहिए कि मुफ्त उपहार बांटकर चुनाव तो जीता जा सकता है किंतु सत्ता में बने रहने के लिए जरूरी है सरकार का प्रदर्शन हर मोर्चे पर जन अपेक्षाओं के अनुरूप हो। कल सम्पन्न चुनावों वाली सभी राज्य सरकारों ने मतदाताओं को लुभाने के लिए कोई न कोई  योजना चला रखी थी । केरल में विजयन और तमिलनाडु की स्टालिन सरकार ने सीधे खाते में नगदी के अलावा जनकल्याण की अनेक योजनाएं संचालित करते हुए सत्ता में बने रहने की जमीन तैयार की। ऐसा ही देखने मिला प. बंगाल में जहां ममता बैनर्जी ने महिलाओं और युवाओं को लुभाने के लिए तरह - तरह के मुफ्त उपहार बांटे। असम में भी चुनाव के पहले मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने महिलाओं के खाते में हजारों रुपए जमा करवा दिए। वैसे तो सभी राज्यों में जन कल्याण के नाम पर सरकारें  खजाना लुटा रही हैं। चुनाव जीतने के लिए भी मौजूदा खैरातों से ज्यादा का वायदा भी आम  है। प. बंगाल में महिलाओं को तृणमूल सरकार 1500 रु. प्रतिमाह देती थी। उसका  तोड़ निकालते हुए भाजपा ने 3 हजार का वायदा कर दिया। आम तौर पर देखने मिला है कि मतदाता  जो मिल रहा है उस पर ही भरोसा जताता है। म. प्र, महाराष्ट्र,झारखंड, बिहार और असम में ये साबित भी हुआ। लेकिन छत्तीसगढ़। और राजस्थान की पिछली कांग्रेस सरकारों ने  दिल खोलकर खजाना लुटाया लेकिन मतदाताओं ने उन्हें उखाड़ फेंका। कल आए नतीजों में असम में हिमंता सरकार तो मुफ्त खैरात बांटकर सत्ता में वापस आ गई जबकि प. बंगाल में ममता बैनर्जी, तमिलनाडु में स्टालिन और केरलम में विजयन की सरकार को खैरात भी बचा नहीं सकी। सुश्री बैनर्जी और स्टालिन तो खुद भी हार गए।  मोटे तौर पर कह सकते हैं कि प्रतिद्वंदी पार्टी के अधिक लुभावने वायदों के लालच में मतदाताओं ने मौजूदा सरकार के उपकारों को भुला दिया किंतु ये सच्चाई से आँखें चुराने जैसा है।  सही बात ये है कि  साधारण समझ वाला मतदाता भी  समझने लगा है कि इन मुफ्त उपहारों की आड़ में सत्ता में बैठे लोग किस तरह अपना घर भर रहे हैं। इसके अलावा शासन चलाने के तौर - तरीके भी जनता के संज्ञान में आने लगे हैं। ममता बैनर्जी, स्टालिन और विजयन मजबूत नेता माने जाते थे। लेकिन कानून व्यवस्था, महिला सुरक्षा और भ्रष्टाचार के अलावा देश की एकता - अखंडता जैसे मुद्दों की अनदेखी उन्हें महंगी पड़ी। प. बंगाल में घुसपैठियों के प्रति ममता सरकार के लचीले रवैये ने लोगों का गुस्सा बढ़ाया। वहीं जरूरत से ज्यादा मुस्लिम तुष्टीकरण की सहज प्रतिक्रिया हिन्दू ध्रुवीकरण के रूप में देखने मिली। महिलाओं पर अत्याचार के प्रति गैर जिम्मेदाराना बयानबाजी और तृणमूल के गुंडों का आतंक मुफ्त योजनाओं पर भारी पड़ा। तमिलनाडु तो खैरातों का मुख्यालय है। अभिनेता विजय ने 8 ग्राम सोना देने का वायदा कर स्टालिन सरकार की योजनाओं की चमक फीकी करने का दांव चला किंतु उनकी जीत के पीछे द्रमुक सरकार का खराब प्रदर्शन, मुख्यमंत्री के बेटे की सनातन के विरुद्ध स्तरहीन बयानबाजी जैसी गलतियों ने इस सरकार की जड़ें खोखली कर दीं। इसी तरह केरलम में विजयन सरकार अपने राजनीतिक विरोधियों के दमन के लिए बदनाम हो चली थी।।राज्य में आई प्राकृतिक आपदा के समय भी उसका प्रदर्शन बहुत खराब रहा। वामपंथी सरकारें सुशासन के लिए जानी जाती रहीं किंतु विजयन सरकार इस मामले में भी बदनाम हो गई। कुल मिलाकर निष्कर्ष ये है कि केवल खैरात बांटकर ताउम्र सत्ता में बने रहने की गलतफहमी राजनीतिक दलों और नेताओं को दूर करना चाहिए। हिमंता ने घुसपैठियों के मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाकर मतदाताओं पर छाप छोड़ी जबकि कांग्रेस मुस्लिम तुष्टीकरण के लालच में बहुसंख्यक हिंदुओं का समर्थन खो बैठी। उसके 19 विधायकों में से 18।मुस्लिम और एक ईसाई है जिसका निहितार्थ आसानी से निकाला जा सकता है। ममता बैनर्जी भी भ्रष्टाचार, महिला उत्पीड़न, गुंडागर्दी और घुसपैठियों की समस्या से मुंह मोड़कर बैठ गईं। नतीजा सामने है। ये देखते हुए जिन्हें जीत मिली उन्हें ये एहसास होना चाहिए कि मुफ्त उपहार सत्ता में ला तो सकते हैं लेकिन उसमें बने रहने के लिए सुशासन जरूरी है। वरना न खैरातें काम आएगी और न ही जातिवाद।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 4 May 2026

प. बंगाल में भाजपा ने इतिहास रचा तो तमिलनाडु में विजय धुरंधर



पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम आने शुरू हो गए हैं। दोपहर एक बजे तक की स्थिति  यथावत रही तब ये नतीजे तमिलनाडु रूपी केवल एक अपवाद छोड़कर उम्मीद के मुताबिक ही हैं। इस मिनी आम चुनाव में प. बंगाल सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा। ममता बैनर्जी जैसी मजबूत जनाधार वाली  नेत्री को सत्ता से हटाने की संभावना पर राजनीति के अच्छे - अच्छे जानकार कुछ कहने से बच रहे थे । मैदान में घूमने वाले टीवी पत्रकार भी ये तो मान रहे थे कि  भाजपा ने इस बार अभूतपूर्व मोर्चेबंदी की है किंतु वे ये कहने से भी नहीं चूकते थे कि सुश्री बैनर्जी द्वारा महिलाओं को प्रति  माह दी जा रही 1500 रु. की राशि का करिश्मा काम करेगा जैसा झारखंड में हेमंत सोरेन की जीत से दिख गया था। 30 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं का पुख्ता समर्थन भी तृणमूल  की बड़ी पूंजी मानी जा रही थी। राज्य में ममता दीदी की टक्कर का कोई नेता भाजपा के पास नहीं होने के नाम पर भी 2021 जैसे नतीजे दोहराए जाने का दावा भी किया जा रहा था। लोकसभा चुनाव में भाजपा को लगे झटके के बाद तृणमूल  का उत्साह और बढ़ गया । लेकिन आज आए परिणाम ने साबित कर दिया कि माँ, मानुष और माटी जैसे भावनात्मक नारे के नाम पर सत्ता में आईं ममता बैनर्जी ने जिस अराजकता को बढ़ावा दिया उसके विरुद्ध प. बंगाल की जनता ने मौन क्रांति कर दी। जिस तरह से मतदाता कैमरे के सामने बोलने से कतराते थे उसने 1977 के लोकसभा चुनाव की याद दिला दी जब इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल की दहशत में आम जनता कुछ बोलने से तो डरती थी किंतु चुनाव में उसने उनकी सत्ता को उखाड़ फेंका। प. बंगाल का चुनाव परिणाम भी ठीक वैसा ही है जिसने नजदीकी मुकाबले के अनुमानों को बंगाल की खाड़ी में डुबोकर भाजपा को ऐतिहासिक बहुमत प्रदान कर दिया। बड़ी बात नहीं वह 200 का आंकड़ा भी पार कर जाए। ये जीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सटीक रणनीति और व्यूहरचना का सुपरिणाम होने के साथ ही मुस्लिम तुष्टीकरण के विरुद्ध जनादेश है। प. बंगाल में भाजपा की प्रचंड जीत ने बिहार के बाद एक बार फिर उस मिथक को तोड़ दिया कि मुस्लिम मतों का थोक समर्थन जीत की गारंटी है। इस परिणाम का असर उ.प्र के आगामी विधानसभा चुनाव पर पड़े बिना नहीं रहेगा जहां अखिलेश यादव मुस्लिम मतों के बल पर सत्ता में वापसी के ख्वाब देख रहे हैं। प. बंगाल के पड़ोसी असम में भाजपा की धमाकेदार तीसरी जीत से किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि हिमंता बिस्वा सरमा भी योगी आदित्यनाथ की तरह ही हिंदुत्व के महानायक के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। इसी तरह केरलम में वामपंथी सरकार का पतन तो सुनिश्चित था। लेकिन इस राज्य में कोई अन्य विकल्प नहीं होने से कांग्रेस की अगुआई वाले यूडीएफ को आशा से अधिक सीटें मिल गईं। हालांकि एनडीए ने तीसरी शक्ति बनने के लिए काफी मशक्कत की लेकिन उसे इस रूप में सफ़लता मिली कि वामपंथी मतों को खींचकर उसने अपने सबसे बड़े वैचारिक विरोधी की जड़ें उखाड़कर अपना भविष्य उज्ज्वल बना लिया। केरलम में यूडीएफ की बड़ी जीत कांग्रेस के लिए बेशक उत्साहवर्धक है। राहुल गांधी ने यहां काफी जोर भी लगाया था किंतु इस राज्य का राष्ट्रीय राजनीति में ज्यादा महत्व नहीं है। यही हाल पुडुचेरी का भी है जहां एनडीए की सत्ता में वापसी से दक्षिण भारत तक के समीकरण प्रभावित नहीं होते। लेकिन द्रविड़ राजनीति के गढ़ तमिलनाडु ने इस बार जो किया वह बीते 60 सालों का  सबसे बड़ा चुनावी उलटफेर है। विजय नामक लोकप्रिय तमिल अभिनेता की नवोदित पार्टी टीवीके बहुमत की देहलीज पर आ पहुंची। इस प्रकार विजय तमिलनाडु में धुरंधर की तरह समूचे परिदृश्य पर छा गए। यद्यपि एम. जी. रामचन्द्रन और जयललिता भी फिल्मी दुनिया से थे । उनके बाद रजनीकांत और कमला हासन ने भी सियासत में हाथ आजमाए किंतु असफल रहे। ये देखते हुए विजय ने नया इतिहास रचते हुए द्रविड़ आंदोलन से पैदा हुई दोनों पार्टियों द्रमुक और अन्ना द्रमुक को पीछे छोड़ दिया। हालांकि उनके पास बहुमत के लिए कुछ सीटें कम हैं इसलिए उन्हें बाहर से समर्थन लेना होगा। खबर है कांग्रेस ने उनकी तरफ सहयोग का हाथ बढ़ाया भी है किंतु अभी तमिलनाडु का खेल खुला हुआ है।  वैसे  द्रमुक और अन्ना द्रमुक दुश्मनी भूलकर एक हो जाएं तो अभी भी सत्ता उनके पास बनी रह सकती है । इस चुनाव ने मुख्यमंत्री स्टालिन की ऐंठ भी खत्म कर दी जो तीसरे स्थान पर आ गए। उनके बेटे द्वारा किया ग़या सनातन का विरोध भी उनकी दुर्गति का कारण बना। आज शाम तक अंतिम परिणाम घोषित हो जाएंगे जिसके बाद बिंदुवार विश्लेषण किया जा सकेगा। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के लिए आज का दिन बड़ी खुशी लेकर आया है। लोकसभा चुनाव में लगे झटके से उबरकर हरियाणा,महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार के बाद प. बंगाल जीतकर उसने ये साबित कर दिया कि उसके अच्छे दिन जारी हैं। जो लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध दिन - रात दुष्प्रचार किया करते हैं प. बंगाल में  भाजपा की जबर्दस्त जीत उनके मुंह पर भी झन्नाटेदार तमाचा है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 2 May 2026

पेट्रोल - डीजल के दाम बाजार से जोड़ने के साथ ही उन्हें जीएसटी के दायरे में लाएं


ईरान संकट के कारण उत्पन्न हालातों में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ना स्वाभाविक है। पूरी दुनिया इससे प्रभावित हो तब भारत का  अछूता रहना नामुमकिन है जो अपनी ज़रूरत का 85 फीसदी आयात करता है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के कारण केंद्र सरकार ने पेट्रोल , डीजल और रसोई गैस के दाम नहीं बढ़ाए किंतु जैसे ही मतदान पूरा हुआ वैसे ही पहला झटका दिया कमर्शियल गैस सिलेंडर की मूल्य वृद्धि के रूप में और वह भी लगभग 1 हजार प्रति सिलेंडर। आम जनता की नाराजगी से बचने फिलहाल घरेलू रसोई गैस सिलेंडर के दाम नहीं बढ़े और डीजल - पेट्रोल की मूल्यवृद्धि भी रोककर रखी गई है। लेकिन  कमर्शियल गैस के बढ़े दाम का असर भी अप्रत्यक्ष रूप से जनता पर पड़े बिना नहीं रहेगा। हालांकि सरकार की ओर से घुमा - फिराकर कहा जा रहा है कि ईरान  संकट से पेट्रोलियम कंपनियों को काफी घाटा हो रहा है किंतु इस मामले में वह अपराध बोध से ग्रस्त है। क्योंकि बीते कुछ सालों में रूस से मिले सस्ते कच्चे तेल के कारण पेट्रोलियम कंपनियों ने भरपूर मुनाफा बटोरा।  अंतर्राष्ट्रीय मूल्य निचले स्तर पर रहने से भी सरकारी तेल कंपनियों का खजाना खूब भरा। चूंकि उसका लाभ उपभोक्ताओं को देने से परहेज किया गया इसलिए जब ईरान युद्ध के चलते  कच्चे तेल और गैस की कीमतें चढ़ीं तब सरकार के पास दाम बढ़ाने का कोई औचित्य या यूं कहें कि नैतिक आधार नहीं है। लेकिन तमाम वित्तीय संस्थान ये संभावना जता रहे हैं कि यदि खाड़ी में संकट जारी रहा और होर्मुज में चल रही नाकेबंदी जारी रही तब चाहे - अनचाहे पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस महंगी करनी ही होगी। जनता भी परिस्थितियों का तकाजा समझ रही है। लेकिन इस बारे में दो बातें हैं जिन पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। पहली ये कि वाजपेयी सरकार के समय पेट्रोल - डीजल की कीमतों को बाजार के उतार - चढ़ाव से जोड़ने की जो व्यवस्था हुई उसे दोबारा प्रारम्भ किया जाए। हालांकि उसी सरकार ने चुनाव आते ही मतदाताओं की नाराजगी से बचने उस पर रोक लगाकर दाम स्थिर रखे। मौजूदा केंद्र सरकार ने प्रारंभ में उस प्रथा को दोबारा लागू करने का साहस दिखाया। उसके अंतर्गत जैसे ही मूल्य घटते या बढ़ते उसी के अनुसार उपभोक्ता को भी उनकी खरीदी करनी पड़ती। आम तौर पर ये घटा - बढ़ी 1 रुपए के भीतर होने से असहनीय नहीं लगती थी किंतु अज्ञात कारणों से उस व्यवस्था को फिर निलंबित कर दिया गया। जिसके कारण कीमतें तो स्थिर रखी गईं किंतु जब वैश्विक स्तर पर कच्चा तेल सस्ता हुआ तब उसका लाभ उपभोक्ता को देने से बचा गया। कुछ समय तक तो पिछले घाटे की पूर्ति का बहाना समझ में आता  है लेकिन उसकी भरपाई के बाद भी पेट्रोलियम कंपनियों द्वारा पूरा मुनाफा हड़पने की नीति समझ से परे है। दूसरी बात जीएसटी से अभी तक पेट्रोलियम पदार्थों को बाहर रखना है। यदि अन्य उपभोक्ता वस्तुओं जैसी जीएसटी की दर डीजल - पेट्रोल और रसोई गैस पर निश्चित कर दी जाए तब इनके दाम काफी नीचे आ जाएंगे। शुरुआत में तो उससे सरकार के राजस्व में कमी परिलक्षित होगी किंतु जिस तरह गत वर्ष किए गए बदलाव के बावजूद सरकार को हर माह मिलने वाली जीएसटी वसूली में खास फर्क नहीं आया वैसे ही पेट्रोल - डीजल आदि को जीएसटी के दायरे में लाने पर आम जनता को होने वाली बचत अंततः बाजार में ही आएगी जिससे जीएसटी वसूली का संतुलन बना रहेगा। कमर्शियल गैस सिलेंडर के दाम तकरीबन 1 हजार रुपए बढ़ा देने के बाद ये आशंका बढ़ चली है कि 4 मई के बाद पेट्रोल - डीजल और घरेलू रसोई गैस की कीमतों में भी वृद्धि होगी। विपक्षी दल तो काफी पहले से कहते आ रहे हैं कि ईरान संकट के बावजूद दाम नहीं बढ़ाकर सरकार कोई मेहरबानी नहीं कर रही अपितु वह पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान जनता के गुस्से से बचना चाह रही है। ये सब देखते हुए उचित तो यही होगा कि पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस को बाजार के उतार - चढ़ाव से जोड़कर उनकी कीमतों में पारदर्शिता लाने के साथ ही उन्हें जीएसटी के अंतर्गत लाकर अनाप - शनाप करों के बोझ को कम करने की ईमानदारी दिखाई जाए। ये बात सही है आर्थिक अनुशासन को लागू करने में चुनावी नफा - नुकसान आड़े आते हैं किंतु  देश को वाकई आर्थिक महाशक्ति बनाना है तब ऐसे निर्णय लेने ही होंगे जिनमें कड़ाई और व्यवहारिकता का समन्वय हो। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 1 May 2026

4 मई के बाद राष्ट्रीय राजनीति में बनेंगे नए समीकरण


पांच राज्यों के  चुनाव परिणाम आने में अभी दो दिन बाकी हैं। सभी पार्टियां बढ़ - चढ़कर दावे कर रही हैं।  इन परिणामों का राष्ट्रीय राजनीति पर क्या प्रभाव होगा इसे लेकर राजनीति के पंडितों में विमर्श प्रारंभ हो गया है। इसके दो संकेत गत दिवस मिले जब त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को समर्थन दिए जाने के सवाल पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने तो समय आने पर विचार करने की बात कही वहीं सीपीआई के एक प्रवक्ता ने टीवी चैनल पर इस संभावना को पूरी तरह नकार दिया। इसी तरह की परिस्थिति तमिलनाडु में भी उत्पन्न हो सकती है जहां अभिनेता विजय की पार्टी टी.वी.के को अप्रत्याशित सफलता मिलने का अनुमान लगाकर एक्सिस माय इंडिया नामक  एजेंसी ने सनसनी फैला दी। उसके बाद ही तमिलनाडु में राजनीति के खिलाड़ी ये गुणा - भाग करने में व्यस्त हो गए कि  किसी को बहुमत नहीं मिला और विजय की पार्टी सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी तब क्या स्टालिन उनको सत्ता पर बिठाएंगे या अन्न द्रमुक गठबंधन उनकी ताजपोशी करवाएगा? केरलम  में त्रिशंकु की हल्की ही सही किंतु कुछ उम्मीद अभी भी वामपंथी खेमे के मन में है किंतु प्रश्न ये भी उठता है कि उस स्थिति में समर्थन कौन देगा क्योंकि एन.डी.ए का समर्थन न तो एल.डी.एफ को रास आयेगा और न ही कांग्रेस वाला यू.डी.एफ उसे हजम कर पाएगा। इस चुनाव में तमिलनाडु में सत्ताधारी द्रमुक के साथ कांग्रेस और वामपंथी दलों के  अलावा मुस्लिम लीग सहित छोटे - छोटे क्षेत्रीय दल हैं। उस दृष्टि से इसे इंडिया गठबंधन का रूप कहा जा सकता है। लेकिन प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के विरुद्ध वामपंथी तो मोर्चा खोलकर बैठे ही कांग्रेस भी एकला चलो की नीति के साथ लड़ी। राहुल गांधी ने तो ममता बैनर्जी पर आरोप तक लगा दिया कि उनके कुशासन के चलते ही राज्य में भाजपा का सितारा चमका। वहीं केरल में वामपंथी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए कांग्रेस ने कोई कसर नहीं छोड़ी।  हालांकि लोकसभा चुनाव के बाद ही इंडिया गठबंधन बिखरा - बिखरा सा है और विपक्षी एकता स्थानीय मुद्दों एवं समीकरणों के आधार पर निर्भर हो गई। मसलन हरियाणा में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को जरा भी भाव नहीं दिया। उसके बाद दिल्ली में दोनों के बीच तलवारें खिंचीं। लेकिन रोचक बात ये रही कि ममता बैनर्जी ने तृणमूल की तरफ से शत्रुघ्न सिन्हा को आम आदमी पार्टी के प्रचार के लिए भेजा जबकि सपा अध्यक्ष अखिलेश  यादव ने खुद अरविंद केजरीवाल के पक्ष में सभाएं लीं। बिहार में भी कांग्रेस और तेजस्वी यादव के महागठबंधन ने विपक्ष की अन्य पार्टियों को भाव नहीं दिया। प. बंगाल में तृणमूल, वामपंथी और कांग्रेस के अलग - अलग लड़ने से विपक्षी एकता का गुब्बारा पूरी तरह फूट गया। रही - सही कसर पूरी कर दी तेजस्वी, केजरीवाल और अखिलेश द्वारा तृणमूल कांग्रेस के समर्थन में सभाएं लेकर। जो संकेत हैं उनके अनुसार यदि सुश्री बैनर्जी के हाथ से सत्ता खिसक जाती है तब वे वामपंथियों के साथ ही कांग्रेस को भी गरियाएंगी। इसी तरह केरलम की सत्ता गंवाने के बाद वामपंथी कांग्रेस पर गुस्सा उतारेंगे। इन चुनावों के बाद  विपक्ष का चेहरा कौन बनेगा इस पर भी खींचतान होना तय है क्योंकि यदि ममता बैनर्जी ने सत्ता बचा ली तब  उनकी वजनदारी स्वाभाविक रूप से बढ़ेगी और तमाम छोटे - छोटे दल राहुल गांधी को किनारे कर उनके पीछे खड़े हो जाएंगे। वहीं केरलम में जीत मिलने के बाद कांग्रेस राहुल गांधी को एक बार फिर महिमामंडित करने में जुट जाएगी। हालांकि सुश्री बैनर्जी सरकार नहीं बना सकीं तब भी वे श्री गांधी के नेतृत्व को स्वीकार कर सकेंगी ये संदिग्ध है। और उस स्थिति में भाजपा और कांग्रेस दोनों के विरोध में तीसरे मोर्चे की वापसी तो हो सकती है। यद्यपि वामपंथी उसमें शामिल होंगे इसमें संदेह है क्योंकि उनकी ममता से कुढ़न जगजाहिर है। स्टालिन भी कांग्रेस को नहीं छोड़ सकते। केरलम की हार के बाद वामपंथी भी राहुल के नेतृत्व को कितना स्वीकार करेंगे ये कह पाना मुश्किल है । कुल मिलाकर 4 मई के बाद देश में विपक्षी राजनीति में नए समीकरण देखने मिलेंगे। यदि भाजपा  प. बंगाल पर झण्डा गाड़ने में कामयाब हो गई तब अन्य दलों से नेता आकर उसके साथ जुड़ेंगे। जिसकी बानगी राघव चड्ढा सहित आम आदमी पार्टी के 6 सांसद दे चुके हैं। खबर तो ये भी है कि ममता सरकार हटी तो तृणमूल में भी भगदड़ मचेगी।  कल रात आए एक एग्जिट पोल के बाद इसकी आशंका और बढ़ गई है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 30 April 2026

पूर्वानुमानों से काफी मिलते - जुलते हैं एग्जिट पोल



गत दिवस प. बंगाल में दूसरे चरण का मतदान संपन्न होते ही पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो गई। उसके बाद से ही एग्जिट पोल आने लगे जो कि काफी कुछ अपेक्षित ही हैं। मसलन प. बंगाल में ज्यादातर एजेंसियों ने भाजपा सरकार बनने की संभावना जताई है। इक्का - दुक्का अभी भी ममता बैनर्जी द्वारा चौका लगाए जाने की भविष्यवाणी कर रहे हैं। एक्सिस माय इंडिया ने पहले चरण वाली 152 सीटों का जो एग्जिट पोल जारी किया उसके अनुसार 2021 की स्थिति उलट रही है। अर्थात भाजपा 100 के करीब और तृणमूल कांग्रेस 50 के इर्द - गिर्द रहेगी। कल हुए 142 सीटों के मतदान का एग्जिट पोल सम्भवतः आज जारी होगा। लोकसभा चुनाव में एग्जिट पोल  गलत निकलने के कारण उक्त एजेंसी के संचालक प्रवीण गुप्ता को काफी आलोचना झेलनी पड़ी। उसके बाद के सभी चुनावों में उन्होंने  पर्याप्त समय लिया। बिहार में भी उनका एग्जिट पोल एक दिन बाद ही जारी हुआ था। आज एक्सिस माय इंडिया का बचा हुआ एग्जिट पोल भी यदि भाजपा को बहुमत मिलने की बात कहता है तब फिर सुश्री बैनर्जी के लिए ये बहुत बड़ा धक्का होगा। असम के बारे में तो किसी को संदेह था ही नहीं कि  हिमंता बिस्वा सर्मा की सरकार बड़े बहुमत के साथ लौटेगी। सभी एग्जिट पोल एक स्वर से उसकी पुष्टि कर रहे हैं। केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में भाजपा के गठबंधन वाली एनडीए की सरकार  दोबारा बनने की संभावना भी आश्चर्यचकित नहीं कर रही। इसी तरह केरल में वाम मोर्चे की सरकार को हटाकर 10 साल बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ की वापसी भी सुनिश्चित मानी जा रही थी। लेकिन पड़ोसी राज्य तमिलनाडु में तमिल फिल्मों के लोकप्रिय अभिनेता विजय द्वारा बनाई गई पार्टी ने मैदान में उतरकर अनिश्चितता पैदा कर दी। हालांकि ज्यादातर एग्जिट पोल सत्तारूढ़ द्रमुक के नेतृत्व वाली स्टालिन सरकार के लौटने की भविष्यवाणी कर रहे हैं लेकिन एक्सिस माय इंडिया ने विजय की पार्टी के सबसे बड़े दल के तौर पर उभरने की भविष्यवाणी कर सनसनी मचा दी है । इस पोल के अनुसार तमिलनाडु में त्रिशंकु विधानसभा बनने जा रही है। यदि वाकई ऐसा हुआ तब विजय , द्रमुक को साथ लेंगे या अन्ना द्रमुक - भाजपा गठबंधन के साथ गठजोड़ करेंगे,  ये सवाल राजनीतिक विश्लेषकों को परेशान कर रहा है। विजय की नई - नवेली पार्टी यदि सत्ता में आ गई तब 6 दशक बाद तमिलनाडु में उस द्रविड़ राजनीति का वर्चस्व समाप्त होगा जो पेरियार रामास्वामी से अन्ना दौरई, करुणानिधि, एम. जी रामचंद्रन और जयललिता से होते हुए स्टालिन तक निर्बाध चली आ रही है। द्रमुक के विभाजन के बाद  अन्ना द्रमुक बनी किंतु प्रदेश की राजनीति पर इन दोनों का ही कब्जा बना रहा। यदि विजय ने इसे तोड़ा तो वह इस राज्य की राजनीति की दिशा बदल सकता है क्योंकि वैसा होने पर भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां अपना जनाधार बढ़ाने में सक्षम होंगी जो उक्त दोनों दलों की पिछलग्गू बनने के लिए मजबूर हैं। हालांकि विजय के हाथ में सत्ता जाने की बात गले नहीं उतर रही किंतु तमिलनाडु की जनता द्रमुक और अन्ना द्रमुक से ऊबकर किसी नए विकल्प का चयन कर ले तो ये इस राज्य के लिए शुभ संकेत होगा। लौटकर प. बंगाल की चर्चा करें तो ये बात तो हर कोई मान रहा है कि पहले तो भाजपा ने ममता बैनर्जी को बुरी तरह घेरकर मुकाबले के इकतरफा होने की आशंका को नष्ट किया और फिर  आक्रामक रणनीति के सहारे तृणमूल के चुनाव प्रबंधन की जड़ों को कमजोर  किया।  सुश्री बैनर्जी ने मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण को मुद्दा बनाकर लड़ाई कोलकाता बनाम केंद्र करने की भरसक कोशिश की किंतु जिस तरह बिहार में लालू प्रसाद यादव के जंगल राज की खौफनाक यादें ताजा कर  भाजपा ने तेजस्वी यादव को पटकनी दे दी ठीक वही रणनीति अपनाकर  प.बंगाल में महिला सुरक्षा और तृणमूल की गुंडागर्दी के मुद्दे को गर्माकर बदलाव की भावना को लोगों के दिल में बिठाया। रही - सही कसर पूरी हो गई केंद्रीय बलों की तैनाती से जिसके कारण मतदाताओं को आतंकित कर मतदान करने से रोकने जैसी हरकतों पर नियंत्रण लग सका। बहरहाल अब तो मतदान हो चुका और 4 मई की सुबह तक अनुमानों के घोड़े दौड़ते रहेंगे किंतु जैसा कि ज्यादातर एग्जिट पोल बता रहे हैं यदि प. बंगाल में ममता सरकार को हटाकर भाजपा अपना झंडा फहराने में कामयाब हुई तब राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी और उनके मुख्य रणनीतिकार अमित शाह का कद और ऊंचा हो जाएगा। जिसका प्रभाव अगले वर्ष होने वाले उ.प्र, पंजाब और गुजरात विधानसभा के चुनाव पर पड़ना तय है। तृणमूल के हाथ से सत्ता खिसकने से अखिलेश यादव का हौसला भी पस्त होगा। वहीं कांग्रेस के हाथ केरल की सत्ता आने से वह इंडिया गठबंधन से बाहर निकलकर एकला चलो की नीति अपनाएगी। वैसे भी अब इस गठबंधन में कोई दम नहीं बची है। एक लिहाज से अच्छा ही होगा यदि क्षेत्रीय पार्टियों के चंगुल से कांग्रेस मुक्त हो क्योंकि उन्हीं के चलते उसकी दुर्दशा हुई है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी