हालांकि ये मान लेना तो जल्दबाजी होगी कि इसराइल अमेरिका के नियंत्रण से निकल रहा है। लेकिन ईरान के साथ जंग में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का ढुलमुल रवैया उसके लिए मुसीबत बन गया है । दरअसल इस लड़ाई का मूल कारण तो यही यहूदी राष्ट्र है जिसे बनाने में अमेरिका का प्रमुख योगदान रहा हैं। भले ही आज इजराइल विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में विकसित देशों के समकक्ष और सैन्य दृष्टि से भी आत्मनिर्भर हो चुका हो लेकिन बिना अमेरिकी संरक्षण के उसके अस्तित्व पर खतरे के बादल मंडराते रहेंगे। मौजूदा जंग में जब अमेरिका और ईरान युद्धविराम करने और बातचीत के जरिए स्थायी तौर पर शांति कायम रखने की दिशा में आगे बढ़े तब इसराइल को उक्त वार्ता में शामिल नहीं करने से उसके प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने अपना गुस्सा व्यक्त किया और शांति वार्ता के दौरान ही लेबनान पर हमले जारी रखे जिससे ईरान भड़क उठा। उसके अनुसार युद्धविराम के दायरे में इसराइल और लेबनान की लड़ाई भी शामिल थी। लेकिन नेतन्याहू ने न सिर्फ हमले जारी रखे बल्कि लेबनान के इलाकों को कब्जे में लेने का सिलसिला भी जारी रखा। अमेरिका ने जब भी ईरान के साथ समझौते के लिए कदम बढ़ाए, इसराइल ने उसे चेताते हुए कहा कि ईरान को अधमरा करके छोड़ने से भविष्य में नई समस्या पैदा होना तय है। उधर शांति वार्ता के बीच भी ईरान द्वारा इसराइल का अस्तित्व मिटाने की धमकी दी जाती रही। सच है कि ट्रम्प इस लड़ाई से ऊब चुके हैं। तीन महीने बाद भी अमेरिका इस जंग से वह सब हासिल नहीं कर सका जिसके लिए उसने अरबों - खरबों डॉलर फूंक दिए। न तो वह ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह तबाह कर सका और न ही उसके तेल व्यापार पर कब्जा करने का उसका मंसूबा ही पूरा हो सका। होर्मुज से यातायात शुरू होने में अभी भी रुकावटें हैं। यद्यपि लड़ाई को पूरी तरह से रोकने के लिये दोनों पक्षों के बीच संवाद तो बना हुआ है किंतु इसराइल के अलावा अमेरिका समर्थक अन्य तेल उत्पादक देशों को भी ये बात पच नहीं रही कि अमेरिका उन्हें ईरान के आतंक के सामने छोड़कर चलता बने। शांति प्रस्ताव का ये हिस्सा तो इसराइल , सऊदी अरब, कतर, यूएई और ओमान को शायद ही स्वीकार होगा कि युद्ध में हुई बर्बादी के मुआवजे स्वरूप ईरान को अरबों डॉलर की आर्थिक मदद दी जाए। इसराइल को ये पता है कि प.एशिया में अमेरिका की प्रभावशाली उपस्थिति उसके सहयोग के बिना सम्भव ही नहीं होगी। नेतन्याहू ने इसीलिये लेबनान पर हमले बंद करने की जगह और तेज कर दिए। बीच में उन्होंने वाशिंगटन जाकर भी ट्रम्प को ये समझाने की कोशिश की थी कि लड़ाई को अंतिम परिणाम तक ले जाए बिना रोक देना आत्मघाती होगा क्योंकि उसके बाद ईरान घायल शेर की तरह और खूंखार हो जाएगा और वह अपने इरादे छिपा भी नहीं रहा। बीते कुछ दिनों में ट्रम्प ने कई बार शांति समझौते के अंतिम रूप लेने की घोषणा की किंतु कुछ देर बाद ही ईरान ने उनकी बात काटते हुए कड़ी शर्तें रख दीं। अब खबर ये है कि उसने अमेरिका को दो टूक बता दिया कि जब तक इसराइल द्वारा लेबनान पर हमले नहीं रोके जाते वह बातचीत नहीं करेगा। इसी के साथ ये भी पता भी चला है कि ट्रम्प ने इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू पर नाराज होकर लेबनान पर हमले रोकने कहा किंतु नेतन्याहू उनकी मानेंगे ये फिलहाल स्पष्ट नहीं है। इसी बीच ये दावा भी सुनने आया है कि लेबनान में सक्रिय आतंकवादी संगठन हिजबुल्ला को अमेरिका ने लड़ाई रोकने राजी कर लिया है। लेकिन यदि इसराइल ने ट्रम्प की बात नहीं मानी तब प. एशिया में बारूदी धमाके रोकने की उम्मीद हवा - हवाई होकर रह जाएगी। दरअसल ईरान समझ चुका है कि उसके पास खोने को अब कुछ भी नहीं बचा। इसलिए वह सिर पर कफ़न बांधकर खड़ा हुआ है। ईरानी रणनीतिकार ये बात भी समझ चुके हैं कि डोनाल्ड ट्रम्प इस लड़ाई से निकलने के लिए छटपटा रहे हैं। इसीलिये वे ईरान को इतिहास बनाने वाली डींगें हांकने के बजाय उसके पुनर्निर्माण में सहायता जैसी बातें कर रहे हैं। लेकिन इस समूचे विवाद में ये बात सदैव याद रखनी होगी कि जब तक ईरान ही नहीं सभी अरबी मुस्लिम देश इसराइल के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते और ईरान उसे नेस्तनाबूत करने की जिद नहीं छोड़ेगा तब तक स्थायी शांति की बात सोचना भी निरर्थक है। आज के हालात में ट्रम्प बुरी तरह फंस गए हैं। ईरान पर अपनी शर्तें वे थोप नहीं पा रहे और इसराइल भी उनकी बात नहीं मान रहा। ऐसे में प. एशिया में शांति प्रक्रिया की स्थिति एक कदम आगे दो कदम पीछे जैसी हो गई है ।
- रवीन्द्र वाजपेयी