Tuesday, 21 April 2026

सीमावर्ती इलाके की रिफाइनरी में आग लगना चिंताजनक


देश में प्रधानमंत्री सबसे अधिक सुरक्षा प्राप्त व्यक्ति हैं। उनके दौरे के पहले संबंधित स्थान के बारे में सुरक्षा एजेंसियां सघन जाँच करती हैं। किसी भी आकस्मिक दुर्घटना के होने पर उन्हें सुरक्षित रखने के पुख्ता प्रबंध भी किए जाते हैं। 1984 में श्रीमती इंदिरा गांधी की उनके निवास पर ही अंगरक्षकों द्वारा की गई हत्या के बाद वीआईपी सुरक्षा के प्रति काफी ध्यान दिया जाने लगा। उस दृष्टि से गत दिवस राजस्थान के  बाड़मेर जिले स्थित पचपदरा रिफाइनरी में अचानक आग लगना बेहद गंभीर एवं चिंताजनक घटना है। करीब 9 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष क्षमता वाली यह परियोजना देश के सबसे बड़े ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स में से एक है। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसका उद्घाटन करने वाले थे। उद्घाटन से ठीक एक दिन पहले उसमें  आग  लगने से सुरक्षा एजेंसियों के चेहरों की हवाइयां उड़ी हुई हैं क्योंकि रिफाइनरी उस स्थान से एक किलोमीटर से  भी कम की दूरी पर स्थित है जहां उद्घाटन समारोह होने वाला था। और फिर यह घटना उस समय हुई, जब प्रदेश के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा उद्घाटन की तैयारियों का जायजा लेने के लिए वहां पहुंचने वाले थे। हालांकि किसी बड़े नुकसान  की जानकारी नहीं है, लेकिन आग लगने के सही कारणों का अभी पता नहीं चल सका। इस रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स को भारत की ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक विकास के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा था।  हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड और राज्य सरकार के संयुक्त उद्यम के रूप में विकसित की गई इस परियोजना में 79,450 करोड़ रुपए से अधिक का निवेश किया गया है। साथ ही ये देश के सबसे बड़े ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स में से एक है। यद्यपि आग समय रहते बुझा ली गई परंतु इतने संवेदनशील संयंत्र में हुए अग्निकांड को साधारण मानकर भुलाना खतरनाक होगा। यदि प्रधानमंत्री इसका उद्घाटन न कर रहे होते तब भी यह अग्निकांड औद्योगिक संयंत्रों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाने के साथ ही निर्माण कार्य में हुई तकनीकी गलती की ओर इशारा करता है। यदि उद्घाटन समारोह की तैयारियां देखने  मुख्यमंत्री आग लगने वाले समय संयंत्र के भीतर रहे होते तब उनके साथ न जाने कितने लोग दुर्घटना का शिकार होते। और कहीं आज प्रधानमंत्री के वहां होते हुए आग भड़क उठती तब जो होता उसकी कल्पना भी दहला देती है । उक्त घटना के बाद आज होने वाला उदघाटन समारोह स्थगित कर दिया गया है। आग लगने के कारणों की सूक्ष्म जांच के बाद सही स्थिति सामने आएगी किन्तु बाड़मेर की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए यह अग्निकांड अनेक आशंकाओं को जन्म दे रहा है। उल्लेखनीय है बाड़मेर जिले की लगभग 250 कि.मी सीमा पाकिस्तान से सटी होने से विदेशी षड़यंत्र  की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। हालांकि तत्काल किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी किंतु रिफाइनरी जैसे संयंत्र में उद्घाटन के एक दिन पहले हुई अग्नि दुर्घटना के पीछे देश विरोधी ताकतों की साज़िश होने को पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता। विशेष रूप से तब जब प्रधानमंत्री इसका शुभारम्भ करने आज वहां उपस्थित रहने वाले थे। जांच एजेंसियों के साथ ही रिफाइनरी के निर्माण से जुड़े तकनीकी विशेषज्ञ भी घटना की तह में जाएंगे । लेकिन सीमावर्ती जिले में स्थित इस महत्वाकांक्षी परियोजना के शुभारम्भ के एक दिन पूर्व हुए अग्निकांड की जांच में सेना से जुड़ी जांच एजेंसियों को भी शामिल किया जाना उचित होगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 20 April 2026

अंततः ईरान को समर्पण करना ही पड़ेगा


मध्यपूर्व का मसला उलझता ही जा रहा है। ज्यादातर लोगों का मानना है कि ईरान के जबरदस्त प्रतिरोध के कारण अमेरिका बुरी तरह फंस गया है और किसी तरह इज्जत बचाकर निकलने का रास्ता तलाश रहा है । इसीलिए जब 15 दिन का युद्धविराम हुआ तब यही प्रचारित हुआ कि अमेरिका और इजराइल दोनों ईरान को घुटनाटेक करवाने में नाकामयाब रहने के कारण ही लड़ाई रोकने बाध्य हुए। अयातुल्ला ख़ामेनेई सहित अनेक बड़े नेताओं और सैन्य अधिकारियों की हत्या के बाद ईरान में सत्ता परिवर्तन और शाह पहलवी वंश के उत्तराधिकारी को तेहरान बुलवाकर उसकी ताजपोशी की जो योजना डोनाल्ड ट्रम्प ने बनाई थी उसके मूर्तरूप लेने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही। जिन नेताओं के हाथ फिलहाल ईरान की कमान है वे भी अमेरिकी दबाव के सामने झुकने से इंकार कर रहे हैं। इसी कारण से इस्लामाबाद में हुई पहले दौर की शांति वार्ता बेनतीजा खत्म हो गई। और कल होने वाला दूसरा दौर भी खटाई में पड़ता दिख रहा है क्योंकि ईरान ने अपने प्रतिनिधिमंडल को नहीं भेजने का ऐलान कर दिया है। युद्धविराम के शुरू होते ही इजराइल द्वारा लेबनान पर किए गए ताबड़तोड़ हमलों से भी ईरान नाराज हो उठा। लेकिन सबसे बड़ा पेच है होर्मुज जलडमरूमध्य जो न सिर्फ ईरान बल्कि तेल उत्पादक खाड़ी देशों की जीवन रेखा बन गया है। दुनिया में 20 प्रतिशत  कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति चूंकि ईरान के कब्जे वाले इसी समुद्री रास्ते से होती है इसीलिए उसने इसे भी हथियार के रूप में इस्तेमाल कर अभूतपूर्व वैश्विक ऊर्जा संकट उत्पन्न कर दिया। इसके अलावा वहां से गुजरने वाले जहाजों पर टोल टैक्स के तौर पर भारी - भरकम राशि चुकाने की बंदिश लगा दी। हालांकि भारत, ईराक , चीन, पाकिस्तान और रूस के जहाजों को होर्मुज से बेरोकटोक आने - जाने की छूट  दी गई किंतु ज्यों ही अमेरिका को लगा कि ईरान इस जलडमरूमध्य में आवागमन पर नियंत्रण लगाकर अपने आर्थिक और सामरिक उद्देश्य पूरे कर रहा है त्यों ही उसने भी जवाबी नाकेबंदी करते हुए उन जहाजों को रोकना शुरू  कर दिया जो ईरान को टोल चुकाकर होर्मुज़ से बाहर निकले।  ईरान का रवैया भी होर्मुज़ को लेकर बेहद अनिश्चित या यूं कहें कि गैर जिम्मेदाराना है। युद्धविराम के बाद से वह अनेक बार इस रास्ते को खोलने के बाद बंद कर चुका है। कई बार तो एक दिन में ही सुबह उसने होर्मुज खोला और शाम को पुनः बंद कर दिया। इस ऊहापोह से उसकी विश्वसनीयता पर तो आंच आई ही साथ ही ये भी साफ हो गया कि  अमेरिका को शिकस्त देने के उसके दावे हवा - हवाई ही हैं। ट्रम्प  द्वारा लगातार ये दबाव बनाया जा रहा है कि ईरान होर्मुज को अंतर्राष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र मानकर मुक्त आवागमन के लिए उपलब्ध करवाए। साथ ही परमाणु बम बनाने के लिए जो परिष्कृत ईंधन है उसे भी अमेरिका को सौंपने के अलावा अपनी सैन्य शक्ति विशेष रूप से मिसाइलों के उत्पादन में कमी लाए। इसके अलावा भी अनेक ऐसी शर्तें हैं जो ईरान के नेतृत्व को नागवार गुजर रही हैं। इससे नाराज ट्रम्प  ईरान के तमाम बिजली घर और पुलों को नष्ट करने की धमकी दे रहे हैं। कल होने वाली शांति वार्ता यदि हुई भी तो उसके सफल होने की आशा करना व्यर्थ है। अब तक की स्थिति में अमेरिका और इजराइल भले ही लड़ाई को परिणाम तक पहुंचाने में असफल रहे हों किंतु रूस और चीन जैसी महाशक्तियों के प्रत्यक्ष समर्थन के बाद भी ईरान अपनी बर्बादी को नहीं रोक सका। जल्द ही कोई रास्ता नहीं निकला तब उसके शीर्ष नेतृत्व में मतभेद  उभरना तय है। सबसे बड़ी चिंता खामेनेई द्वारा  बनाए गए आईआरजीसी (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर) द्वारा समानांतर सत्ता चलाने की है। गत दिवस होर्मुज से गुजर रहे भारत के जहाजों पर हुई गोलीबारी इसका प्रमाण है। खबर है आईआरजीसी होर्मुज को अपनी मिल्कियत बनाकर आय का स्रोत बनाना चाह रहा है। ईरान सरकार के कुछ नेता भी इस योजना के पीछे हैं। कुल मिलाकर ईरान अब नेतृत्व शून्यता की स्थिति में आ गया है। अमेरिका भी इसी का इंतजार कर रहा है। बड़ी बात नहीं युद्धविराम की अवधि पूरी होते ही ये इलाका एक बार फिर से जंग की आग में जल उठे। लेकिन इस बार अमेरिका भारी पड़ेगा क्योंकि उसने पहले चरण की गलतियों से सीख लेने के बाद ईरान की पुख्ता घेराबंदी करते हुए उसकी कमजोरियों को भांप लिया है। बावजूद इसके तेहरान में बैठे नेता आसानी से समर्पण नहीं करेंगे किंतु देर - सवेर उन्हें ऐसा करना ही पड़ेगा क्योंकि उनके पास लंबी लड़ाई लड़ने की शक्ति बची नहीं है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 18 April 2026

परिसीमन विधेयक गिरने के बाद भी महिला आरक्षण राष्ट्रीय एजेंडा बना


1999 में कर्नाटक की वेल्लारी लोकसभा सीट पर कांग्रेस  नेत्री सोनिया गांधी और भाजपा उम्मीदवार स्व. सुषमा स्वराज के बीच हुआ मुकाबला देश के चुनावी इतिहास में प्रमुखता से दर्ज है। हालांकि कड़ी टक्कर  के बावजूद सुषमा जी 50 हजार मतों से परास्त हो गईं थीं। लेकिन हारने के बाद अपनी प्रतिक्रिया में उन्होंने कहा था कि कुछ हार , जीत से भी ज्यादा गौरवशाली होती हैं।  दरअसल वे जानती थीं कि कर्नाटक में जो उस समय तक कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था, श्रीमती गांधी को पराजित करना असंभव था। लेकिन पार्टी की सुनियोजित रणनीति के अंतर्गत उन्होंने वह चुनौती  न सिर्फ स्वीकार की अपितु कुछ ही दिनों में कन्नड़ में भाषण देना सीखकर मतदाताओं पर गहरी छाप भी छोड़ी। गत दिवस लोकसभा में महिला आरक्षण लागू करने के लिए सरकार द्वारा प्रस्तुत परिसीमन  संबंधी संविधान संशोधन विधेयक दो तिहाई बहुमत के अभाव में गिर गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की अपील और आश्वासन विपक्ष को प्रभावित नहीं कर सके। विधेयक के पारित नहीं होने को विपक्ष अपनी बड़ी जीत मानकर उत्साहित भी है और आनंदित भी। कहा जा रहा है कि विपक्ष में सेंध लगाने में भाजपा विफल रही। लेकिन किसी भी कोण से ये लगा ही नहीं कि सरकार की तरफ से विपक्ष में तोड़फोड़ का प्रयास हुआ हो। सत्र के पहले दिन ही कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे सहित लगभग सभी विपक्षी दलों ने  विधेयकों का विरोध करने की घोषणा कर दी थी। ऐसे  में आवश्यक संख्याबल नहीं होने पर सत्ता पक्ष में जो चिंता  दिखाई देनी थी  उसका कोई लक्षण नजर नहीं आया। उल्टे प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और सरकार की ओर से मोर्चा संभालने वाले सभी वक्ता पूरे आत्मविश्वास में दिखे । सही बात ये है कि सरकार विधेयकों का हश्र जानती थी , फिर भी विशेष सत्र बुलाकर उसने महिला आरक्षण को देश का मुख्य राजनीतिक एजेंडा बनाने का जो दांव चला वह कारगर साबित हुआ। विपक्ष से बार - बार ये आवाजें आती रहीं कि वह महिला आरक्षण के नहीं बल्कि परिसीमन के विरोध में है। इसीलिए जब संशोधन विधेयक गिर गया तब भाजपा ने बिना देर किए विपक्ष को महिला विरोधी बताते हुए कठघरे में खड़ा करने का अभियान छेड़ दिया। यद्यपि विपक्ष ने 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं के लिए बढ़ाई जा रही सीटों के प्रस्ताव को तो रुकवा दिया किंतु आम महिला मतदाता को परिसीमन जैसा तकनीकी शब्द समझ नहीं आएगा। उसके दिमाग में यदि ये बात बैठ गई कि मोदी सरकार महिलाओं के लिए लोकसभा में सीटें बढ़ाना चाहती थी किंतु विपक्ष ने अड़ंगा लगा दिया तो भाजपा इसका लाभ उठा सकती है। मसलन प. बंगाल और तमिलनाडु में सुशिक्षित महिलाओं को भाजपा अपनी बात समझाने में सफल हो गई और 5 फीसदी मत उसने अतिरिक्त खींच लिए तो  बड़ा उलटफेर हो सकता है। विपक्ष का ये कहना शत - प्रतिशत सही है कि सरकार द्वारा संसद का विशेष सत्र उक्त दोनों राज्यों में मतदान के कुछ दिन पहले बुलाने का कारण विशुद्ध राजनीतिक था। लेकिन सभी राजनीतिक दल अवसर का लाभ उठाने के लिए ऐसी कोशिश करते रहे हैं। अब ये तो चुनाव परिणाम ही बताएंगे कि सरकार अपनी रणनीति में सफल रही या विपक्ष की मोर्चेबंदी कामयाब क्योंकि  कुछ दिनों के भीतर किसी भी दल के लिए भी मतदाताओं को परिसीमन के समर्थन या विरोध में गोलबंद करना आसान नहीं है। इसीलिए कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का ये सोचना सही है कि दरअसल भाजपा ने उ.प्र, पंजाब और गुजरात विधानसभा के आगामी चुनाव के  मद्देनजर महिला आरक्षण को लागू करने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाकर खुद। को महिला हितैषी साबित करने का प्रयास किया। विपक्ष की दिक्कत ये है कि संसद में प्रदर्शित एकता के बावजूद मैदानी स्तर पर वह विभाजित है। केरल में कांग्रेस और वामपंथियों के बीच सांप और नेवले जैसी दुश्मनी है। इसी तरह प. बंगाल में ममता बैनर्जी के विरुद्ध कांग्रेस , वामपंथी और ओवैसी सभी ताल ठोक रहे हैं। ये देखते हुए पांच राज्यों के चुनावों के बाद भाजपा बड़े पैमाने पर महिला आरक्षण का मुद्दा उठाएगी और तब विपक्ष के लिए उ.प्र, गुजरात और पंजाब के मतदाताओं को ये समझाना मुश्किल होगा कि उनमें लोकसभा की सीटें बढ़ाने के प्रस्ताव को  क्यों रोका गया। अखिलेश यादव ने तो मुस्लिम महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग उठाकर अपने ही गोल में गेंद डाल दी। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री ने उन्हें अपना मित्र बता दिया जिसका खंडन करने के बजाय श्री यादव मुस्कुराते रहे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 17 April 2026

महिला आरक्षण को लेकर कोई भी दल ईमानदार नहीं


संसद में विपक्ष का रवैया देखकर सरकार ने 2023 में पारित महिला आरक्षण अधिनियम को कल की तारीख से ही लागू कर दिया।  हालांकि इसे लेकर अभी भी भ्रम है कि ये आरक्षण 2029 के लोकसभा चुनाव से प्रभावशील होगा या जनगणना के उपरांत नये सिरे से परिसीमन के उपरांत 2034 से? विपक्ष ने इस अधिनियम को तत्काल लागू करने के औचित्य पर सवाल उठाए। सरकार की मंशा इसके पीछे स्पष्ट नजर आ रही है। दरअसल वह विपक्ष को महिला आरक्षण का विरोधी साबित करने का प्रयास कर रही है। हालांकि उसकी कोशिश कितनी कामयाब होती है ये फिलहाल कहना मुश्किल है । लेकिन कल कांग्रेस सांसद प्रियंका वाड्रा ने सुझाव दिया था कि लोकसभा की वर्तमान सदस्य संख्या पर ही एक तिहाई महिला आरक्षण लागू किया जाए। लगता है सरकार ने भी ऐसा ही कुछ करने का मन बनाया होगा। अन्यथा संसद के विशेष अधिवेशन के बीच अचानक  महिला आरक्षण विधेयक को कानून की शक्ल देने का और कोई कारण समझ नहीं आता। बेहतर हो भाजपा संसद में एक तिहाई टिकिटें महिलाओं को देने की घोषणा करते हुए विपक्ष पर दबाव बना दे।  इस बारे में ये कहना गलत नहीं होगा कि कांग्रेस संगठन की वर्तमान स्थिति देखते हुए वह स्वयं श्रीमती वाड्रा के सुझाव को लागू करने का साहस नहीं दिखा सकेगी। क्षेत्रीय  पार्टियों की स्थिति तो और भी खराब है क्योंकि उनके यहां मुख्य रूप से पुरुषों का ही वर्चस्व है। कल सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लोकसभा में जब मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण देने की मांग की तब गृहमंत्री अमित शाह ने पलटवार करते हुए कहा था कि समाजवादी पार्टी अपनी सभी टिकटें मुस्लिम महिलाओं को दे दे तो उन्हें कोई ऐतराज नहीं होगा। इस पर श्री यादव चुप होकर बैठे रह गए। लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाकर महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने के विचार पर समाज के भीतर भी तरह - तरह की चर्चाएं चल रही हैं जिनमें ये भी कहा जा रहा है कि सांसदों की संख्या बढ़ाने से जो आर्थिक बोझ बढ़ेगा वह अंततः जनता को ही वहन करना पड़ेगा। सबसे बड़ी बात ये है कि महिला आरक्षण का विधेयक 2023 में पारित होने के बाद किसी भी पार्टी ने उसे लागू करने की मांग नहीं की जो उनकी ईमानदारी पर संदेह उत्पन्न करती है। जहां तक प्रश्न जनगणना और उसमें भी जातीय जनगणना का है तो गृहमंत्री ने स्पष्ट कर दिया कि उसकी प्रक्रिया शुरू  हो चुकी है। लेकिन जिसकी जितनी भागीदारी उसकी उतनी हिस्सेदारी का नारा लगाने वाले राहुल गांधी क्या ये वायदा सार्वजनिक तौर पर कर सकते हैं कि कांग्रेस टिकिट वितरण करते समय उक्त नारे पर अमल करेगी? इसी तरह पिछड़ों की राजनीति करने वाली सपा और राजद जैसी पार्टियां पूरी तरह ओबीसी अन्य आरक्षित जातियों के लोगों को ही उम्मीदवार बनाएंगी? स्मरणीय है दलितों की मसीहा होने का दावा करने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती ने ब्राह्मण जाति के सतीश चंद्र मिश्र को पार्टी का महासचिव बनाने के साथ ही राज्यसभा में भी भेजा। सही  बात ये है कि महिला आरक्षण का सैद्धांतिक आधार पर समर्थन करने में तो सभी पार्टियां आगे - आगे नजर आती हैं किंतु उसे व्यवहार में उतारने के बारे में आगे - पीछे हो जाती हैं। कांग्रेस में सोनिया गांधी लंबे समय तक अध्यक्ष रहीं किंतु उन्होंने  उत्तराधिकारी के तौर पर अपने पुत्र को आगे बढ़ाया और साथ ही बेटी को महामंत्री बनाकर स्थापित कर दिया। आज पार्टी में और किसी महिला नेत्री का नाम सुनाई नहीं देता। यही हाल सपा का है जो अखिलेश के परिवार की निजी कंपनी है। तृणमूल कांग्रेस में अनेक महिला सांसद होने के बाद भी ममता बैनर्जी का राजनीतिक वारिस उनका भतीजा अभिषेक ही है। भाजपा भी पुरुष प्रधान पार्टी ही है। संसद में उसकी अनेक महिला सांसद होने के बाद भी स्व. सुषमा स्वराज जैसी प्रथम पंक्ति की नेत्री एक भी नहीं बची। दिखाने को दिल्ली की मुख्यमंत्री का चेहरा बतौर महिला मुख्यमंत्री आगे किया जा सकता है लेकिन निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी कितनी है ये सभी जानते हैं। इसमें दो मत नहीं हैं कि महिलाओं की शासन और प्रशासन में भागीदारी बढ़नी चाहिए। लेकिन इसके पहले उन्हें हर दृष्टि से सक्षम और आत्मनिर्भर बनाने पर भी ध्यान दिया जाना जरूरी है। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक संसद और विधानसभाओं में उनकी संख्या बढ़ने से उनकी सामाजिक स्थिति में सुधार होना असंभव है। पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं को मिले आरक्षण के बाद की स्थितियां किसी से छिपी नहीं हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 16 April 2026

मुस्लिम महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग देश के दूसरे विभाजन का षड़यंत्र


लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित किए जाने के लिए सदन  की मौजूदा सदस्य संख्या बढ़ाने एवं उसके लिए परिसीमन करने के उद्देश्य से आज लोकसभा में सरकार की ओर से तीन संशोधन विधेयक प्रस्तुत कर दिए गए। जैसा कि अपेक्षित था विपक्ष ने इसका जोरदार विरोध शुरू कर दिया जिसका उद्देश्य भाजपा को इसका राजनीतिक लाभ लेने से रोकने के साथ ही आरक्षण के भीतर आरक्षण रूपी पुराना पेच फंसाकर पूरी प्रक्रिया को बाधित करना  है। बरसों  पहले महिलाओं को आरक्षण के प्रस्ताव  का संसद में स्व. शरद यादव , स्व. मुलायम सिंह यादव के अलावा भाजपा नेत्री उमाश्री भारती ने भी ये कहते हुए विरोध किया था कि इसमें ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से कोटा रखा जाए। । आज बहस के दौरान ये संकेत मिल जाएगा कि विपक्ष का अंतिम फैसला क्या होगा क्योंकि प. बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होना शेष है। इसीलिए सभी राजनीतिक दल  अपना दृष्टिकोण सोच - समझकर ही तय करेंगे। ये तो स्पष्ट है कि यदि ये विधेयक संसद में पारित हो गए तो प. बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव में भाजपा महिला मतदाताओं के बीच खुद को उनका हितचिंतक साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। और कहीं विपक्ष इन विधेयकों पर फैसला टलवाने में कामयाब हो गया तब भाजपा का प्रचारतंत्र उसे महिला विरोधी ठहराकर कठघरे में खड़ा करने में जुट जाएगा। लेकिन इससे अलग हटकर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने  मुस्लिम महिलाओं के लिए भी आरक्षण जैसी खतरनाक मांग उठाते हुए पूछा कि आखिर मुस्लिम महिलाएं कहां जाएंगी? इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने तंज कसा कि आप अपनी पार्टी की सभी टिकटें मुस्लिम महिलाओं को ही दे देना। बहस में अन्य दलों के विचार भी सुनने मिलेंगे। लेकिन अखिलेश द्वारा मुस्लिम महिलाओं के लिए भी आरक्षण की मांग उठाकर जो दांव चला उससे वे अगले वर्ष होने वाले उ.प्र विधानसभा के चुनाव में  मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने में भले सफल हो जाएं किंतु उनकी यह मांग देश हित के सर्वथा विरुद्ध है। मुसलमानों को सेना में आरक्षण देने का मुद्दा उनके स्वर्गीय पिता मुलायम सिंह ने भी छेड़ा था। उनकी मुस्लिम परस्ती के कारण ही उन्हें मुल्ला मुलायम सिंह कहा जाने लगा था। हालांकि उस मांग को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल सका किंतु आज उनके पुत्र अखिलेश ने  मुस्लिम महिलाओं  के लिए अलग से आरक्षण जैसी मांग छेड़कर मुस्लिम तुष्टीकरण वाली  पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ाने का काम कर दिया। हालांकि अखिलेश सहित पूरी समाजवादी पार्टी उ.प्र में मुस्लिम समुदाय का चरण चुंबन करने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करती किंतु इस मांग से उस दौर की याद ताजा हो उठी जब मुस्लिमों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र बनाकर अंग्रेजी सत्ता ने भारत के दो टुकड़े करने की शुरुआत कर दी थी। मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण यदि कर दिया जाए तो  कल को मुस्लिम पुरुषों के लिए भी अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग जोर पकड़ेगी जो देश की अखंडता के लिए बड़ा खतरा होगी। अखिलेश यादव विदेश में पढ़कर आए हैं। ऐसे में उनसे ये अपेक्षा करना गलत नहीं होता कि वे  आधुनिक सोच का परिचय दें। लेकिन ऐसा लगता है वोट बैंक की वासना में  समाज को जातियों में बांटने के बाद वे और उनकी पार्टी अब देश का नया बंटवारा करने की जमीन तैयार कर रहे हैं। महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें बढ़ाए जाने का उद्देश्य आधी आबादी को राष्ट्रनिर्माण में भागीदार बनाना है। लेकिन इसमें धर्म के नाम पर आरक्षण जैसी खतरनाक मांग उठाकर अखिलेश ने एक बार दिखा दिया कि उन्हें देश की एकता और अखंडता की कोई चिंता नहीं है। महिला आरक्षण के लिए आज प्रस्तुत विधेयक पारित हों या न हों किंतु संसद में अखिलेश ने मुस्लिम महिलाओं के लिए आरक्षण की जो बात छेड़ी उसके लिए उनके विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए। क्योंकि ये मांग उस शपथ का उल्लंघन करती है जिसमें उन्होंने बतौर सांसद देश की अखंडता को अक्षुण्ण रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त की थी। ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि  इस देश विरोधी मांग पर मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस चुप रही। गृह मंत्री श्री शाह ने तो अखिलेश की मांग को असंवैधानिक बताकर सही किया परन्तु अब इस बात का इंतजार रहेगा कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी बहस में भाग लेते हुए अखिलेश द्वारा मुस्लिम महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण संबंधी मांग का विरोध करते हैं या नहीं? 


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 15 April 2026

सांसद - विधायक बनने वाली महिलाओं में निर्णय क्षमता जरूरी



लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण प्रदान करने का प्रस्ताव संसद द्वारा 2023 में ही पारित किया जा चुका है। लेकिन इसे लागू करते हुए एक तिहाई सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए संसद का दो दिवसीय अधिवेशन आमंत्रित किया गया है । इसमें परिसीमन सम्बन्धी विधेयक पारित किया जाना है जिसके बाद लोकसभा में 850 सीटें हो जाएंगी। परिसीमन का आधार 2011 की जनगणना को बनाया जाएगा। दक्षिण के राज्यों को चिंता है कि उ.प्र और बिहार की जनसंख्या ज़्यादा होने से महिला आरक्षण में सबसे ज्यादा लाभ उन्हें मिल जाएगा। हालांकि सरकार की ओर से ये आश्वासन दिया जा रहा है कि किसी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा ।  विपक्षी दलों की ओर से जो संकेत आ रहे हैं उन्हें देखते हुए इस अधिवेशन में सरकार द्वारा लाए जाने वाले प्रस्ताव का पारित होना आसान नहीं है क्योंकि सत्ता पक्ष के पास दोनों सदनों में संविधान संशोधन लायक दो तिहाई बहुमत का अभाव है। हालांकि महिलाओं  को लोकसभा और विधानसभा में एक तिहाई आरक्षण प्रदान करने के लिए सीटों की संख्या में वृद्धि के  लिए सैद्धांतिक रूप से सभी दल सहमत हैं किंतु असली विवाद श्रेय लूटने का है। कांग्रेस नेत्री सोनिया गांधी ने संसद के अधिवेशन की तारीखों को लेकर जो सवाल उठाया उसका कारण भी राजनीतिक ही है। दरअसल  विपक्ष को  शक है कि प. बंगाल और तमिलनाडु  विधानसभा चुनाव  के मतदान के हफ्ते भर पहले महिलाओं की एक तिहाई सीटें बढ़ाने जैसे बेहद महत्वपूर्ण प्रस्ताव को पारित करवाने का पूरा श्रेय लूटकर भाजपा उक्त दोनों राज्यों में महिला मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए इसका उपयोग करेगी ।  लेकिन सरकार का कहना है कि यदि 2029 के लोकसभा चुनाव में सीटें बढ़ाना है तब इस बारे में संसद को जल्द फैसला करना चाहिए। अन्यथा फिर बात 2034 तक टल जाएगी। उस दृष्टि से सरकार की तत्परता औचित्यपूर्ण है। रही बात उसके राजनीतिक लाभ की तो यदि इस तरह के प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित होते हैं तब कोई एक दल  उसका श्रेय नहीं लूट पाता। इसीलिए प्रधानमंत्री ने सभी दलों से अपील की है कि वे इस प्रस्ताव को समर्थन देकर  महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने को संवैधानिक रूप देने में सहायक बनें। ये प्रस्ताव संसद में पारित हो पाता है या नहीं ये तो दो दिन बाद ही पता चलेगा किंतु नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर जिस प्रकार केंद्र सरकार  प्रचार कर रही है उसे देखते हुए विपक्ष का भयभीत होना स्वाभाविक है। राजनीति के जानकार इस बात से भली - भांति अवगत हैं कि प्रधानमंत्री किसी भी फैसले के पहले गहन मंथन करते हुए उसके दूरगामी फायदे और नुकसान का आकलन करते हैं। 2029 से  लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं की सीटें बढ़ाने का निर्णय भी उन्होंने काफी सोच - समझकर लिया होगा। यदि विपक्षी दल इस प्रस्ताव का विरोध करते हैं तब  भाजपा इसे मुद्दा बनाकर उनको महिला विरोधी साबित करने में जुट जाएगी। विपक्ष भी इस दांव को समझ रहा है। लेकिन इस सबसे हटकर जो बात जनसामान्य के मन में उठ रही है वह है सांसद - विधायक बनने वाली महिलाओं का शैक्षणिक स्तर और उससे भी बढ़कर सार्वजनिक जीवन में कार्य करने का अनुभव। ये इसलिए जरूरी है क्योंकि देश भर में पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए किए गए आरक्षण के परिणामस्वरुप उनका प्रतिनिधित्व तो बेशक बढ़ा किंतु गुणवत्ता नहीं होने से महिला सशक्तीकरण का जो उद्देश्य इसके पीछे था वह पूरा नहीं हो सका। इसलिए संसद और विधानसभाओं में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित करने के साथ ही राजनीतिक दलों को ये देखना होगा कि जिन महिलाओं को वे चुनाव मैदान में उतारें उनमें बतौर जनप्रतिनिधि अपने दायित्व के प्रति जागरूकता हो । साथ ही निर्णय लेने के लिए पुरुषों पर पूर्णतः निर्भरता से भी वे मुक्त हों। हालांकि आरक्षित सीटों से ऐसे अनेक पुरुष सांसद और विधायक भी चुनकर आते हैं जिन्हें मिट्टी के माधो कहा जा सकता है। लेकिन आजादी के आठ दशक बाद महिलाओं को जब देश चलाने में हिस्सेदारी मिल रही है तब इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि शुरुआत में ही ऐसे मापदण्ड बना दिए जाएं जिससे इस ऐतिहासिक फैसले के औचित्य पर सवाल न उठ सकें। आज जब महिलाएं सभी क्षेत्रों में अपनी क्षमता को सफलता पूर्वक प्रमाणित कर रही हैं तब संसद और विधानसभाओं में भी उनकी एक तिहाई भागीदारी समय की मांग और देशहित में है। ऐसे में इस विधेयक के पारित होने के बाद  राजनीतिक दलों को इस दिशा में भी सोचना चाहिए कि सदन में आने वाली नारी अबला नहीं अपितु सबला हो।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 14 April 2026

होर्मुज़ रोककर पूरी दुनिया से दुश्मनी ले बैठा ईरान


मध्यपूर्व में भले ही युद्धविराम हो गया हो किंतु ईरान और अमेरिका के  बीच शांति वार्ता के बेनतीजा खत्म होने के बाद दोनों पक्षों से जिस प्रकार की बयानबाजी सुनाई दे रही है वह इस बात का संकेत है कि जंग की चिंगारी कभी भी भड़क सकती है । इसका पहला कारण तो इजराइल और लेबनान के बीच लड़ाई का जारी रहना और दूसरा है ईरान द्वारा होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर कब्जा जताकर आवाजाही पर रोक लगाना। इसके जवाब में अमेरिका ने भी होर्मुज की नाकाबंदी का ऐलान करते हुए धमकी दे डाली कि यदि कोई जहाज ईरान को टोल चुकाकर होर्मुज से निकलेगा तो उसे रोका जाएगा। हालांकि इसके बाद भारत और चीन के जलपोत उक्त समुद्री मार्ग से सुरक्षित निकलकर आ गए। भारत ने भी अपने जहाजों की हिफाजत के लिए नौसेना का बेड़ा तैनात कर रखा है। ईरान द्वारा होर्मुज़ पर अपना पूर्ण अधिकार होने का दावा करने से पूरी दुनिया परेशान है क्योंकि इस युद्ध के पहले तक ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी तथा सभी देशों के जहाज बेरोकटोक इस समुद्री मार्ग का उपयोग किया करते थे। स्मरणीय है सऊदी अरब , बहरीन, कतर ,यू.ए.ई और ओमान आदि से गैस और कच्चे तेल का निर्यात होर्मुज से ही होता है। इस युद्ध के पहले इस समुद्री मार्ग का नाम शायद ही कभी इतना चर्चा में आया हो। लेकिन ईरान ने जिस तरह से इसे अपना हथियार बनाया उसकी वजह से पूरी दुनिया के सामने नया संकट उत्पन्न हो गया है। ऊपर से अमेरिका के बड़बोले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा नित नई धमकियां दिए जाने से शांति की संभावनाएं शून्य होती जा रही हैं। सवाल ये है कि ईरान होर्मुज़ को कितने दिनों तक बंद रख सकेगा? और ये भी कि अमेरिका किस अधिकार से उसे खुलवाने के लिए चौधरी बनकर खड़ा है। ऐसा लगता है ईरान और अमेरिका दोनों महीने भर की लड़ाई से थक कर चूर हैं। ईरान को तो विनाशलीला का प्रत्यक्ष दर्शन करने के अलावा सैन्य क्षमता का भी भारी नुकसान झेलना पड़ा। तेल से होने वाली कमाई भी अवरुद्ध है। उधर अमेरिका भी लड़ाई के उम्मीद से ज़्यादा खिंच जाने से परेशान है। सैन्य साजो - सामान के अलावा उस पर आर्थिक बोझ भी बढ़ गया है। सबसे बड़ी बात उसके सर्वशक्तिमान होने का दंभ चकनाचूर हो गया। खाड़ी देशों में स्थित उसके सैनिक अड्डों पर ईरान ने जिस तरह खुलकर हमले किए उससे अमेरिका की धाक मिट्टी में मिल गई। ये कहना गलत नहीं होगा कि सऊदी अरब , कतर , बहरीन, ओमान और यू.ए.ई को अपने यहां अमेरिकी सैन्य अड्डे रखने की सजा भुगतनी पड़ी। ईरान ने इज़राइल की तरह से ही इन देशों पर  भी ताबड़तोड़ हमले किए। विशेष तौर पर तेल उत्पादक इकाइयों को निशाना बनाकर उनकी अर्थव्यवस्था चौपट करने में लेश मात्र भी संकोच नहीं किया। इजराइल की अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था भी सवालिया निशानों के घेरे में आ गई। सवाल उठ रहा है कि इस्लामाबाद वार्ता असफल हो जाने के बाद ईरान , अमेरिका और इजराइल का अगला कदम क्या होगा क्योंकि एक महीने से ज़्यादा तक लड़ने के बाद भी दोनों पक्षों के हाथ खाली हैं। मसलन न तो ईरान अमेरिका और इजराइल को घुटने टेकने बाध्य कर सका और न ही डोनाल्ड ट्रम्प का ईरान में सत्ता पलट का मंसूबा पूरा हो सका। बर्बादी के मुहाने पर होने के बावजूद ईरान  परमाणु कार्यक्रम बंद करने राजी नहीं है ओर न ही होर्मुज पर  किसी भी प्रकार की रियायत देने तैयार हुआ। ऐसे में इस बात की आशंका  है कि अमेरिका खिसियाहट में ऐसा कुछ करेगा जिससे ईरान हार मान ले। वहीं जवाब में ईरान भी कोई ऐसा कदम उठा सकता है जिसके कारण तेल उत्पादक देशों में तबाही आ जाए। इजराइल भी जिस प्रकार लेबनान की जमीन पर कब्जा करने में जुटा है वह भी इस जंग के जारी रहने का संकेत है। ऐसा लगता है ईरान , अमेरिका और इज़राइल युद्धविराम के बहाने मिले समय का उपयोग अपनी अगली रणनीति बनाने के लिए कर रहे हैं। इस्लामाबाद में इसीलिए न ईरान झुकने तैयार हुआ और न अमेरिका ने लचीलापन दिखाया। उधर इज़राइल ने युद्धविराम को ठेंगा दिखाते हुए जिस प्रकार लेबनान पर आग बरसाना जारी रखा उससे स्पष्ट हो गया कि वह  लड़ने पर उतारू है। अमेरिका का असली निशाना दरअसल चीन है। इसीलिए ट्रम्प ने  धमकी दे डाली कि ईरान को हथियार दिए तो  चीन पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया जाएगा। इस लिहाज से आने वाले कुछ दिन उत्सुकता भरे होंगे। देखना ये है कि ईरान होर्मुज को बंद रखने में कब तक सफल होता है क्योंकि उसके पास अब यही ब्रह्मास्त्र बचा है। लेकिन उससे आवागमन रोककर वह पूरी दुनिया से दुश्मनी लेने की गलती कर बैठा है।


- रवीन्द्र वाजपेयी