Friday, 3 April 2026

मुस्लिमों के नाम कटने से ममता का आत्मविश्वास डगमगाया


प. बंगाल के बारे में चुनाव आयोग ने ऐसी टिप्पणी की होती तब ममता बैनर्जी उस पर चढ़ बैठतीं। लेकिन गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण  में लगे न्यायिक अधिकारियों को धमकाए जाने पर  ममता सरकार को कड़ी फटकार लगाई। शीर्ष अदालत के गुस्से का कारण दरअसल मालदा जिले की घटना है जिसमें मतदाता सूची से नाम कटने का विरोध कर रहे लोगों ने तीन महिला न्यायाधीशों सहित सात न्यायिक अधिकारियों को  घंटों बंधक बनाकर रखा। इस मामले पर स्वतः आपातकालीन सुनवाई के दौरान  मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपिन पंचोली की पीठ ने न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा में राज्य प्रशासन की विफलता पर गुस्सा जताते हुए घटना की जांच सीबीआई या एनआईए को सौंपने का निर्देश दिया। प्राप्त जानकारी के अनुसार जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक सहित वरिष्ठ राज्य अधिकारी  घटनास्थल पर अनुपस्थित थे जिसके कारण आधी रात के बाद अधिकारियों की रिहाई सुनिश्चित करने के लिए उच्च स्तर पर हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ी। पीठ ने न्यायिक अधिकारियों पर  पथराव सहित हिंसा के आरोप भी दर्ज किए । साथ ही चुनाव आयोग को उनकी सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों की तैनाती और उनके परिवारों को सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया। ये पहला अवसर नहीं है जब ममता राज में इस तरह की प्रायोजित अराजकता देखने मिली हो। सीबीआई और ईडी के बाद चुनाव आयोग को लेकर उनका रवैया ऐसा रहा मानो वे किसी शत्रु देश से आए हों। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण के काम में सहयोग करना तो दूर रहा उल्टे हरसंभव व्यवधान उत्पन्न करने का प्रयास मुख्यमंत्री के इशारे पर हुआ ये बात किसी से छिपी नहीं है। प. बंगाल के अलावा जिन चार राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं वहां भी मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की प्रक्रिया संचालित हुई । ऐसा नहीं है कि वहां उ विरोध न हुआ हो किंतु प. बंगाल में जिस तरह से उत्पात हुआ उससे लगता है ममता का आत्मविश्वास डगमगा रहा है। उनकी सरकार ने इसके विरोध में सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा तक खटखटाया। यहां तक कि खुद ही पैरवी करने खड़ी हो गईं परन्तु  दाल नहीं गली। सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाता सूचियों पर आपत्तियों का निराकरण न्यायिक अधिकारियों के निरीक्षण में करवाने का निर्णय सुनाकर ये संकेत दे दिया कि उसे राज्य सरकार पर भरोसा नहीं है। मालदा जिले में हुई उक्त घटना से साबित हो गया कि तृणमूल पार्टी मतदाता सूचियों के  पुनरीक्षण से कितनी घबराई हुई है।  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केंद्रीय एजेंसियों की तैनाती का निर्देश दिए जाने से इस  आशंका की पुष्टि हो गई कि राज्य सरकार स्थानीय पुलिस के जरिए चुनाव अपने पक्ष में करने में लगी हुई थी। हालांकि प्रत्येक प्रदेश में सत्तारूढ़ दल ऐसा करने में संकोच नहीं करता किंतु सुश्री बैनर्जी का अंदाज ऐसा है मानो प. बंगाल कोई अलग देश हो। संघीय ढांचे के अंतर्गत उनके राज्य को  भी संविधान प्रदत्त व्यवस्थाओं के अंतर्गत केंद्र सरकार के साथ तालमेल बनाकर चलना होता है। कुछ मामलों में राज्यों को स्वायत्तता है किंतु वे केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र को चुनौती नहीं दे सकते। ममता का राजनीतिक उदय वामपंथी सरकार के राज में व्याप्त अराजकता के विकल्प के रूप में हुआ था किंतु सत्ता संभालते ही तृणमूल कांग्रेस में भी वही असामाजिक तत्व घुस आए जो कभी सीपीएम में रहकर पूरे समाज को आतंकित किया करते थे। बीते 15 सालों में प. बंगाल में जिस तरह की अराजकता देखने मिली उसने वामपंथी राज को भी पीछे छोड़ दिया। मुसलमानों के तुष्टीकरण में भी ममता ने नए कीर्तिमान स्थापित करते हुए बांग्लादेशी घुसपैठियों को स्थायी रूप से बसने में मदद की । ये चुनाव उनके लिए जीवन - मरण का सवाल है क्योंकि सत्ता हाथ से निकलते ही तृणमूल कांग्रेस तिनके की तरह बिखर जाएगी। पार्टी का कोई वैचारिक आधार नहीं है। वे सत्ता से बाहर हो ही जाएंगी ये कहना जल्दबाजी होगी किंतु बात - बात पर आग बबूला हो जाने से उनकी हताशा परिलक्षित हो रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस जिस प्रकार प. बंगाल की अराजक स्थिति का संज्ञान लिया उसके कारण ममता की मुसीबतें और बढ़ गई हैं। दरअसल उनकी झल्लाहट का असली कारण मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं का नाम कट जाना है। चुनाव आयोग के विरुद्ध तो वे सड़कों पर मोर्चा खोलकर बैठ गईं थीं किंतु सवाल ये  है कि सर्वोच्च न्यायालय का विरोध वे किस मुंह से करेंगी?

- रवीन्द्र वाजपेयी



Thursday, 2 April 2026

नेताओं और नौकरशाहों के बच्चे भी सरकारी शालाओं में पढ़ें


म.प्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का ये दावा सुनकर सुखद एहसास हुआ कि प्रदेश में सरकारी शालाओं के प्रति आकर्षण बढ़ रहा हैं। उन्होंने गत दिवस नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत पर कहा कि निजी विद्यालयों की चकाचौंध को छोड़कर अभिभावक अपने नौनिहालों को सरकारी विद्यालय में दाखिला दिलवाने में रुचि ले रहे हैं जहां बेहतर परीक्षा परिणाम आने लगे। मुख्यमंत्री ने इस बात पर भी संतोष जताया कि पढ़ाई बीच में छोड़कर जाने (ड्रॉप आउट) विद्यार्थियों की संख्या में भी उल्लेखनीय कमी आई है। मुख्यमंत्री स्वयं सुशिक्षित हैं एवं पूर्ववर्ती शिवराज सिंह चौहान सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री रह चुके हैं। उनकी गिनती जमीन से जुड़े नेता के तौर पर होने से ये माना जा सकता है कि उन्हें जनसाधारण से जुड़ी बातों के बारे में समुचित जानकारी होगी। उन्होंने सरकारी शालाओं की छवि और स्तर में सुधार की बात छेड़कर उम्मीद की किरण जगा दी है। आज से चार - पांच दशक पहले के परिदृश्य की कल्पना करें तो समाज का बड़ा वर्ग अपने बच्चों को सरकारी शालाओं में पढ़ाता था। उन्हीं विद्यालयों से पढ़कर निकले छात्रों में से न जाने कितने आज देश - विदेश में अपनी प्रतिभा के बल पर महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान हैं। नेताओं की  जमात में भी सरकारी शालाओं में शिक्षित तमाम लोग हैं। लेकिन धीरे - धीरे हालात बदलते गए और जिस प्रकार से चिकित्सा के क्षेत्र में निजी अस्पतालों का दबदबा बढ़ा वैसा ही शिक्षा जगत में भी दिखने लगा। जहां तक बात उच्च शिक्षा की है  तो एक बार निजी संस्थानों की उपयोगिता समझ में भी आती है किंतु निजी क्षेत्र ने विद्यालय स्तर पर जिस प्रकार अपना फैलाव किया उससे सरकारी शालाओं की दशा  दयनीय होने लगी। ये स्थिति क्यों पैदा हुई इस पर लंबी बहस हो सकती है। वैसे  भी शिक्षा के क्षेत्र में सरकारों ने जितने प्रयोग आजादी के बाद किए वे किसी कीर्तिमान से कम नहीं हैं। शिक्षा नीति में भी समय - समय पर बदलाव किए जाते रहे किंतु कुछ अपवाद छोड़कर ज्यादातर सरकारी शालाएं दुर्दशा का शिकार होती चली गईं।  इसीलिए डॉ. यादव ने सरकारी विद्यालयों की तारीफ करते हुए जो चित्र प्रस्तुत किया यदि वह सही है तो ये बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इतने मात्र से संतुष्ट हो जाना ठीक नहीं होगा। मुख्यमंत्री यदि चाहते हैं कि शासकीय शालाओं की दशा सुधरे ताकि ज्यादा से ज्यादा अभिभावक निजी शालाओं के मोहजाल से मुक्त होकर अपने बच्चों को उनमें दाखिल करवाएं तब उनको अपने विधायकों , मंत्रियों और पार्टी के नेताओं के अलावा शासकीय अधिकारियों से ये अनुरोध करना चाहिए कि वे भी अपने बच्चों को निजी विद्यालयों के बजाय शासकीय शालाओं में पढ़ाएं। यदि उनमें से आधे भी इसके लिए राजी हो जाएं तब सरकारी विद्यालयों की  प्रतिष्ठा अपने आप बढ़ जाएगी। कुछ वर्ष पूर्व अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस आशय का आदेश भी पारित किया था कि सरकारी अधिकारियों की संतानें सरकारी शालाओं में पढ़ें। देश में अनेक प्रशासनिक अधिकारियों ने स्वेच्छा से ऐसा किया भी किंतु उनकी संख्या ऊँट के मुंह में जीरे समान ही है। ये देखते हुए यदि डॉ. यादव  नौकरशाहों , जनप्रतिनिधियों और पार्टी नेताओं को  इस बात के लिए प्रेरित करें कि वे शासकीय शाला में ही बच्चों को शिक्षा दिलवाएं तो इसका जबरदस्त असर पड़ेगा और  सरकारी शालाओं की तस्वीर और तकदीर दोनों में अकल्पनीय सुधार हो सकेगा। जाहिर है जिस संस्थान में विधायक, मंत्री और कलेक्टर - एस. पी के बच्चे पढ़ेंगे वहां की व्यवस्था और स्तर का अंदाज सहज रूप से लगाया जा सकता है। मुद्दे की बात ये है कि जब तक नेताओं और नौकरशाहों के बच्चे  सरकारी शालाओं में नहीं पढ़ेंगे तब तक वे निजी क्षेत्र की शिक्षा संस्थानों की तुलना में पिछड़े रहेंगे। सही  बात है कि जब शासन और प्रशासन में उच्च पदों पर बैठे महानुभावों को ही सरकारी शालाओं और  अस्पतालों पर भरोसा नहीं है तब जनता से अपेक्षा किस मुंह से की जाती है। बेहतर होगा जिस तरह मंत्री और अधिकारी अपनी संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करते हैं उसी तरह ये जानकारी भी सामने आनी  चाहिए कि उनके बच्चे किस संस्थान में पढ़ रहे हैं?


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 1 April 2026

कठिन चुनौतियों के बीच शुरू हो रहा वित्तीय वर्ष


आज से भारत में नया वित्तीय वर्ष प्रारंभ हो रहा है। बीते साल की तीन तिमाही में अच्छे प्रदर्शन से वार्षिक विकास दर 7 प्रतिशत रहने की उम्मीद व्यक्त  की गई थी। वहीं अगले वर्ष में उसके और उछलने का अनुमान था। हालांकि  डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा थोपे गए टैरिफ के कारण निर्यात पर बुरा असर पड़ा किंतु सरकार  वैकल्पिक बाजारों की तलाश कर उस दबाव को कम करने में कामयाब रही। इसीलिए जहां अनेक देशों के कदम लड़खड़ाने लगे वहीं भारत ने  मजबूती से  खड़े रहकर ब्रिटेन , यूरोपीय यूनियन , न्यूजीलैंड आदि से मुक्त व्यापार संधि कर अपने निर्यात को बहुमुखी बना दिया। सबसे बड़ी चतुराई ये रही कि ट्रम्प की बेसिरपैर की बातों में उलझने से बचते हुए उसकी काट निकालकर देशहित को सुरक्षित रखा गया। हालांकि  अनुमानित विकास दर का आंकड़ा थोड़ा नीचे आया किंतु  वैश्विक परिस्थितियों में उसे काफी अच्छा माना गया। लेकिन बीती 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल ने संयुक्त रूप से ईरान पर हमला बोल दिया। अमेरिका मान रहा था कि ईरान जल्द ही घुटने टेक देगा। पहले ही हमले में उसके सर्वोच्च शासक खामेनेई के अलावा कुछ दिग्गज सैन्य अधिकारियों के मारे जाने से ये लगा कि वहां सत्ता परिवर्तन करवाने की  उसकी योजना सफल हो जाएगी । लेकिन  पांसे उल्टे पड़ गए। ईरान ने आक्रमण ही सर्वोत्तम सुरक्षा है के सिद्धांत पर चलते हुए इजराइल पर तो मिसाइलें बरसाई हीं  उन तमाम पड़ोसी देशों पर भी हमले किए जहां अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं। यही नहीं अमेरिका के बेहद अत्यधिक शक्तिशाली कहे जाने वाले युद्धपोतों को निशाना बनाने से भी बाज नहीं आया। इसकी वजह से तेल उत्पादक देशों में उत्पादन थम गया।  उससे भी बड़ी समस्या तब उठ खड़ी हुई जब ईरान ने अपने कब्जे वाले होर्मुज़  नामक समुद्री रास्ते से आवाजाही रोक दी। जिससे सऊदी अरब , कतर , बहरीन , ओमान आदि से आने वाले  तेल और गैस के टैंकर फंस गए। नतीजा पूरी दुनिया में इन चीजों के संकट के रूप में सामने आया। इसका विपरीत प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा और बीते कारोबारी साल का उत्साहजनक वातावरण साल खत्म होते तक चिंताओं में बदल गया। पेट्रोल , डीजल और गैस के संकट ने न सिर्फ आम नागरिक के जनजीवन को झकझोर दिया बल्कि उद्योग  - व्यवसाय के सामने मुसीबतों के पहाड़ खड़े कर दिए।  हजारों कारखाने बंद हो गए। गैस की किल्लत से बड़े होटल, रेस्टोरेंट , ढाबे ही नहीं ठेले और खोमचे पर चाय सहित अन्य खाद्य सामग्री बेचने वालों तक का कारोबार ठप पड़ गया। शहरों से श्रमिकों के पलायन की खबरें आने लगीं। विदेशी पूंजी बड़ी मात्रा में वापस जाने से विदेशी मुद्रा  भंडार घटने लगा। ईरान  युद्ध के थमने की फिलहाल कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कल कह दिया कि ईरान की परमाणु क्षमता को नष्ट करने के साथ ही उसके तेल और गैस उत्पादन इकाइयों को नुकसान पहुंचाकर उसने तो अपना मकसद पूरा कर लिया। अब जिसे होर्मुज का उपयोग करना हो वह अपने स्तर पर प्रयास करे। दरअसल ट्रम्प इस बात पर उखड़ गए कि नाटो से जुड़े ज्यादातर यूरोपीय देशों ने अमेरिकी युद्धक विमानों को अपने आकाश से उड़ने की अनुमति नहीं दी। आज यू.ए.ई ने जरूर होर्मुज़ खुलवाने के लिए लड़ाई में शामिल होने की इच्छा जताई। सऊदी अरब भी अमेरिका से अनुरोध कर चुका है कि वह ईरान को घायल करके न छोड़े। इसके जवाब में ट्रम्प ने युद्ध का खर्च खाड़ी देशों से वसूलने का ऐलान कर दिया। कुल मिलाकर जंग अभी कुछ हफ्ते और जारी रहने की उम्मीद है। जिसके परिणाम लंबे समय तक दुनिया को भुगतने होंगे। भारत भी इससे अछूता नहीं रह सकता। विश्व व्यापार में उसकी जो मजबूत स्थिति बनती जा रही थी उस पर बुरा असर पड़ने से इंकार नहीं किया जा सकता। हालांकि युद्ध जल्दी रुक जाता है तब भारत को मध्यपूर्व में निर्माण गतिविधियों के जरिए अच्छा व्यवसाय मिलने की उम्मीद बढ़ जाएगी जैसा अफगानिस्तान में देखने मिला किंतु ईरान अपने यदि होर्मुज़  को लेकर अड़ियलपन दिखाता रहा तब तेल और गैस की कीमतों में उछाल को रोकना मुश्किल हो जाएगा जिसका असर  अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है। ये देखते हुए केंद्र सरकार को चाहिए वह अभी से संभावित संकट का सामना करने की रणनीति बनाकर ऐसे उपाय करे जिससे उद्योग - व्यापार में रुकावट न आए। साथ ही आम जनता को भी तकलीफ न हो। विश्वव्यापी संकट से भारत का बचे रहना तो नामुमकिन है किंतु समय रहते तैयारी कर ली जाए तो नुकसान को कम तो किया ही जा सकता है। नेतृत्व की परीक्षा भी ऐसे ही समय होती है। मोदी सरकार ने कोरोना संकट के समय जो कार्यकुशलता दिखाई वैसा ही कुछ करते हुए इस आपदा में भी अवसर तलाशने का कारनामा दिखाना चाहिए।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 31 March 2026

शहरी नक्सलियों की कमर तोड़ना भी जरूरी


गृहमंत्री अमित शाह तय समय सीमा में नक्सलियों के आतंक की समाप्ति के लिए प्रशंसा के हकदार हैं। गत दिवस संसद में नक्सलवाद को लेकर दिया उनका भाषण निःसंदेह सराहनीय था। ये कारनामा बिना दृढ़ इच्छा शक्ति के संभव नहीं था। पिछली सरकारें इस मामले में पूरी तरह विफल रहीं। इसका कारण एक तो उनके मन में समाया डर था दूसरा उस दौर के शासन - प्रशासन में घुसे वामपंथी विचाराधारा के पोषक तत्व थे। दरअसल  नक्सलियों का उद्देश्य आर्थिक विषमता, शोषण और पिछड़ापन मिटाना नहीं अपितु भारत में खूनी क्रांति के जरिए चीन की पिट्ठू माओवादी सरकार बनवाना था। प्रारंभ में तो उनकी छवि क्रांतिकारियों जैसी बनी लेकिन धीरे - धीरे  स्पष्ट हो गया कि वे चीन द्वारा प्रशिक्षित और पालित गिरोह हैं जिन्हें भारत में खूनी क्रांति  का जिम्मा सौंपा गया है। शुरुआत में लगा  कि नक्सली , वामपंथी विचारधारा का उग्रपंथी स्वरूप है लेकिन जल्द ही स्पष्ट  हो गया कि सारे साम्यवादी एक हैं। नक्सली जहां जंगली इलाकों में बंदूक के बल पर माओवाद फैलाते थे वहीं शहरी इलाकों में बैठे साम्यवादी कला , साहित्य, शिक्षा, पत्रकारिता , प्रशासन और राजनीति जैसे क्षेत्रों में सक्रिय रहकर नक्सली हिंसा के औचित्य को साबित करने में जुटे रहते। इन शहरी नक्सलियों ने शासन और प्रशासन में जड़ें जमाते हुए नीति - निर्धारण की प्रक्रिया में घुसपैठ कर ली। भोले  - भाले आदिवासियों को  भड़काकर हिंसा के रास्ते पर धकेलने का काम जहां हथियारबंद नक्सली करते रहे वहीं साहित्य , मनोरंजन , शिक्षा जैसे क्षेत्रों में घुसे शहरी नक्सली वामपंथ के पक्ष में वातावरण बनाने में लगे रहे। इस कार्य में उन्हें कांग्रेस सहित अन्य गैर भाजपा सरकारों का प्रत्यक्ष और परोक्ष समर्थन मिलता रहा। देश में ऐसे अनेक  संगठन हैं जो सरकारी अनुदान के बल पर वामपंथ का प्रचार करते रहे। अनेक सरकारी संस्थाओं में शहरी नक्सलियों की नियुक्ति की जाती रही। इनमें से जब भी किसी को पकड़ा जाता तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकशाही के लिए खतरे का ढोल बजने लगता। जेएनयू,जादवपुर ,जामिया मीलिया ,उस्मानिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालयों में वामपंथी छात्र एवं शिक्षक मोमबत्ती लेकर निकल पड़ते। हाल ही में जब हिडमा नामक नक्सली सरगना  मारा गया तब जे.एन.यू में बैठे नक्सल समर्थक छात्रों ने दिल्ली के इंडिया गेट पर  प्रदर्शन करते हुए नारे लगाए थे कि कितने हिडमा मारोगे , हर घर से हिडमा निकलेगा।  ऐसी ही नारेबाजी अफज़ल गुरु की फांसी के बाद जेएनयू में की गई थी। नक्सलियों द्वारा निर्दोषों की नृशंस हत्याओं पर ये शहरी नक्सली मुंह में दही जमाकर बैठे रहते थे। 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार आने  और विशेष रूप से श्री शाह के गृह मंत्री बनने के बाद  किए गए युद्धस्तरीय प्रयासों का ही सुफल है कि पशुपति से तिरुपति तक रेड कार्पेट बिछाने का चीन प्रवर्तित वामपंथी षडयंत्र मिट्टी में मिल गया। त्रिपुरा में जहां वामपंथी सत्ता का अंत हुआ वहीं प. बंगाल में भी वामपंथी प्रभुत्व लुप्त होता जा रहा है। केरल का एकमात्र साम्यवादी किला भी धराशायी होने के कगार पर है। ऐसे में  नक्सलवाद के नाम पर होने वाली हिंसा की जड़ें खोद देना बड़ी उपलब्धि है। श्री शाह ने गत दिवस संसद में सही कहा कि नक्सलवाद  विचारधारा आधारित अपराध है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि जो इक्का - दुक्का नक्सली बचे हैं वे भी मुख्यधारा में लौटें वरना  मारे जाएंगे। सबसे बड़ी सफलता ये है कि  नक्सलियों को हथियार रखकर शांति के रास्ते पर लौटने का पूरा अवसर दिया गया। लेकिन जिन्होंने सुरक्षा बलों पर हमले करने का दुस्साहस किया उन्हें मौत के घाट उतारा गया। हिंसा के जरिए देश को भीतर से कमजोर करने वालों के सफाए के बाद जरूरत है , समाज में बैठे उन शहरी नक्सलियों का पर्दाफाश किए जाने की जो देश में अराजकता की स्थिति उत्पन्न करना चाह रहे हैं। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में युवा आंदोलन के जरिए सत्ता परिवर्तन के बाद भारत में भी वैसा ही करने की कोशिश भी की गई। लेकिन राष्ट्रवादी विचारधारा के बढ़ते पर प्रभाव के चलते देश को अस्थिर करने वाली शक्तियां कामयाब नहीं हो सकीं। बावजूद  इसके सरकार को सजग रहना होगा क्योंकि भले ही हथियारबंद नक्सलियों का सफाया हो गया हो परन्तु शहरी नक्सली और  उनकी पीठ पर हाथ रखने वाली विदेशी शक्तियां नए रूप में सक्रिय हुए बिना नहीं रहेंगी। ऐसे में नक्सलवाद को प्रश्रय देने वाली सोच को ही खत्म करना होगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 30 March 2026

ईरान के सामने युद्धविराम ही विकल्प


प. एशिया में चल रहा युद्ध जिस मोड़ पर आ पहुंचा है उसमें दोनों पक्ष हताश नजर आ रहे हैं। इजराइल और अमेरिका एक माह में ईरान से घुटने नहीं टिकवा सके। उल्टे ईरान ने उनका ये दंभ तोड़ दिया कि वे अजेय हैं। इसीलिए अमेरिका ईरान की जमीन पर फ़ौजी उतारने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। पहली बार देखने मिल रहा है कि इज़राइल ,ईरान और उसके पालित हिजबुल्ला और हूती की मिसाइलों का सामना करने मजबूर है। अपने जन्म के बाद से ही इजराइल अपने पड़ोसी मुस्लिम देशों के साथ लड़ता आ रहा है। अभेद्य समझी जाने वाली रक्षा प्रणाली के कारण शत्रुओं के विमान और मिसाइलें उसको नुकसान पहुंचाने में सफल नहीं होती थीं। लेकिन गाजा के पिछले युद्ध में ईरानी मिसाइलों ने इजराइल में धमाके कर ये जता दिया कि उसकी सुरक्षा प्रणाली अभेद्य नहीं रही। बीते एक माह में ईरान ने न सिर्फ इजराइल बल्कि खाड़ी के उन तमाम देशों को सफलतापूर्वक निशाना बनाया जहां अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं। हालांकि इसकी कीमत भी उसे चुकाना  पड़ रही है। अमेरिका और इजराइल ने उसके समूचे ढांचे को तहस - नहस कर दिया है। पूरा देश मलबे में तब्दील होता जा रहा है। दशकों में उसने जो सैन्य क्षमता विकसित की वह  कमजोर पड़ने लगी है। भले ही उसके बचे हुए नेता बढ़ - चढ़कर बयानबाजी कर  मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में सफल दिखते हों किन्तु बाजी धीरे - धीरे ही सही ईरान के हाथ से निकल रही है। उसके बुनियादी ढांचे को बर्बाद करने की अमेरिका और इजराइल ने जो कार्ययोजना बनाई है उसका उद्देश्य ईरान में पूरी तरह अव्यवस्था फैलाकर उसका मनोबल तोड़ना है।  जो हालात बनते जा रहे हैं उन्हें देखते हुए अमेरिका और इजराइल ईरान को पूरी तरह तबाह करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। जवाब में ईरान भी वैसा ही करने पर आमादा है। हालांकि दोनों तरफ से एक दूसरे के सैन्य प्रतिष्ठानों को नष्ट करने का सिलसिला जारी है किंतु अब उसके आगे बढ़कर शैक्षणिक और शोध संस्थानों, जनसुविधा केंद्रों, जल शोधन संयंत्रों आदि पर किए जा रहे हमलों से लगने लगा है कि लड़ाई दिशाहीन हो रही है। ईरान भले ही एक महीने से अमेरिका और इजराइल के अलावा अनेक देशों को निशाना बनाए हुए है किंतु वह भीतर से खोखला होने के कगार पर है। इसीलिए वह अमेरिका को जमीनी लड़ाई के लिए उकसा रहा है। वैसे तो अमेरिका के समुद्री बेड़े ईराक को घेरे हुए हैं जिनमें कमांडो प्रशिक्षण प्राप्त हजारों सैनिक हैं किंतु डोनाल्ड ट्रम्प और उनके सैन्य सलाहकार ये जानते हैं कि भौगोलिक दृष्टि से ईरान जैसे बड़े देश को फौजें उतारकर पराजित करना आत्मघाती होगा। इसका कारण ये है कि अभी तक ईरान को अपनी थलसेना का उपयोग करने का अवसर ही नहीं मिला। अमेरिका के लिए हजारों किलोमीटर से अपनी बड़ी सेना लाना संभव नहीं है। उसके यूरोपीय सहयोगी देश पहले ही ठेंगा दिखा चुके हैं। इजराइल पहले से ही सैनिकों की कमी से जूझ रहा है। वहीं सऊदी अरब सहित ईरान विरोधी अन्य देशों के पास उतनी सक्षम और पेशेवर सेना नहीं है । यही वजह है कि अमेरिका ईरान को इतना तोड़ देना चाहता है जिससे उसकी  प्रतिरोधक क्षमता इतनी कम हो जाए जिससे कि अमेरिकी फौजों को कम से कम नुकसान हो। इसीलिए ट्रम्प की रणनीति होर्मुज की नाकाबंदी  खुलवाने के साथ - साथ ईरान के सबसे बड़े तेल व्यापार केंद्र खार्ग द्वीप पर कैसे भी कब्जा जमाना है। बीच - बीच में लड़ाई रोकने के लिए कूटनीतिक प्रयासों की खबरें भी आ रही हैं। लेकिन ईरान जिस प्रकार ऐंठा हुआ है उसकी वजह से शांति प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही। पाकिस्तान में तीन मुस्लिम देशों की बैठक भी इसलिए निरर्थक है क्योंकि उसमें अमेरिका , इज़राइल और ईरान की उपस्थिति ही नहीं हैं। ये सब देखते हुए यह जंग उस खतरनाक स्तर को छू रही है जिसमें दोनों पक्ष युद्ध के प्रचलित तौर - तरीकों से हटकर बदहवासी में जो दिख रहा है उसी को बर्बाद करने पर आमादा है। लेकिन इस होड़ में ईरान के पूरी तरह तबाह हो जाने का खतरा बढ़ गया है। उसका नीति - निर्धारक राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व रोज घट रहा है। रक्षा उत्पादन ठप्प हो चला है। तेल की बिक्री से होने वाली आय भी रुकी पड़ी है। मुद्रा की विनिमय शक्ति दम तोड़ बैठी है। महंगाई चरम पर है। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा चुकी हैं। अमेरिका और इज़राइल के बमवर्षक विमान बिना प्रतिरोध के ईरान में आग बरसाकर चले जाते हैं। विद्युत और पेय जल की आपूर्ति बाधित होने से जनजीवन अस्त - व्यस्त हो गया है। नुकसान इजराइल और अन्य खाड़ी देशों का भी हुआ है किंतु ईरान की तुलना में काफी कम होने से वहां उतनी अव्यवस्था नहीं है। ऐसे में ईरान यदि संपूर्ण विनाश से बचना चाहता है तब उसके सामने युद्धविराम करना ही एकमात्र विकल्प है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 28 March 2026

हवाई अड्डे सुधर रहे किंतु सेवाओं का स्तर गिर रहा


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के निकट नोएडा स्थित जेवर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के पहले चरण का लोकार्पण कर दिया। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के प्रारंभ होने से दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का भार कम होगा। जेवर एशिया का सबसे बड़ा हवाई अड्डा है जहां से हर 2 मिनिट में एक उड़ान निकलेगी। बुनियादी ढांचे का विकास जिन चीजों से आंका जाता है उनमें हवाई अड्डे भी प्रमुख  हैं। महानगरों में जहां से बड़ी मात्रा में अंतर्राष्ट्रीय हवाई यातायात संचालित होता है , एक हवाई अड्डा होने से विमानों की आवाजाही में परेशानी होती है। यात्रियों की भीड़ बढ़ने से सुविधाओं का भी टोटा पड़ जाता है।  ये कहना गलत नहीं होगा कि 2014 के बाद देश में राजमार्ग, पुल , फ्लाईओवर, रेलवे स्टेशन आदि के साथ ही हवाई अड्डों के निर्माण और उन्नयन की दिशा में सराहनीय कार्य हुआ। कोरोना के समय लॉक डाउन का लाभ लेकर नई रेल पटरियां बिछाने का काम भी बड़े पैमाने पर किया गया।  दुनिया में भारत की जो अच्छी छवि निर्मित हो सकी उसमें बुनियादी ढांचे का योगदान महत्वपूर्ण है। हाल ही में मुंबई में भी दूसरे अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का शुभारम्भ हो चुका है। जेवर का हवाई अड्डा जिस नोएडा में स्थित है वह उ.प्र का हिस्सा होने के बावजूद एन.सी.आर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र ) में  शामिल है। इसीलिए इसके प्रारंभ होने से दिल्ली स्थित अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे की भीड़ कम होगी तथा ज्यादा उड़ानों का संचालन हो सकेगा। लेकिन हवाई अड्डों का विकास होने मात्र से है हवाई यात्रा के स्तर को सुधारना संभव नहीं है। देश के अनेक माध्यम श्रेणी शहरों में हवाई सेवा प्रारंभ की जा चुकी है। पुराने हवाई अड्डों का विकास किए जाने से उनमें बड़े विमानों की आवाजाही भी संभव हो सकी है परन्तु इसका दूसरा पहलू  निराशा उत्पन्न करने वाला है । उड्डयन व्यवसाय में निजी क्षेत्र के पदार्पण के बाद उम्मीद थी कि सेवाओं में सुधार होगा तथा प्रतिस्पर्धा के चलते किराए वाजिब होंगे। सरकार के नियंत्रण वाली  एयर लाइंस की दयनीय स्थिति से त्रस्त यात्रियों को लगता था निजी एयर लाइंस तुलनात्मक रूप से बेहतर सुविधाएं प्रदान करेंगी। शुरुआत में ऐसा लगा भी लेकिन धीरे - धीरे निजी एयर लाइंस की बदहाली भी सामने आने लगी। ज्यादा कमाई के फेर में सीटें तो बढ़ा दी गईं किंतु उनके आरामदेह नहीं होने से लंबी दूरी की यात्रा तकलीफदेह हो गई। एक ही परिवार के सदस्यों को  एक साथ बैठने के लिए अतिरिक्त पैसे की मांग की जाने लगी। विमान के भीतर दी जाने वाली सुविधाएं भी नाममात्र की किए जाने से हवाई यात्रा से जुड़ा सुखद एहसास  घटता गया। कुछ एयर लाइंस तो पानी भी मांगने पर देती हैं। हवाई जहाजों का रखरखाव ठीक ढंग नहीं होने से आए दिन आपातकालीन लैंडिंग के समाचार आते हैं। विमान खराब होने की स्थिति में उड़ान में विलंब या उसके रद्द होने पर हवाई अड्डे पर मौजूद  एयर लाइंस का स्टाफ यात्रियों के साथ जिस गैर जिम्मेदाराना ढंग से पेश आता है वह किसी से छिपा नहीं है। किसी त्यौहार या अन्य विशिष्ट अवसर पर अनाप - शनाप किराया वसूलना आम हो गया है। गत वर्ष एक एयर लाइन पर रोक लग जाने के बाद बाकी एयर लाइंस ने जिस बेरहमी से लूटपाट की उसे नहीं रोक पाना सरकार की बड़ी विफलता थी। चौतरफा आलोचना के बाद भी किरायों में मनमानी लूटमार एक जमाने में  होने वाली सिनेमा टिकटों की कालाबाजारी की याद दिला देती है। हवाई अड्डों पर उपलब्ध सेवाएं भी मध्यमवर्गीय यात्रियों की क्षमता से बाहर हैं। सरकार को इस दिशा में ध्यान देना चाहिए। हमारा आशय उड्डयन क्षेत्र में हो रहे विकास को निरर्थक साबित करना कदापि नहीं है। दरअसल होना ये चाहिए कि बुनियादी ढांचे में सुधार के साथ ही सेवाओं का स्तर , वायुयानों का रखरखाव, हवाई जहाज के भीतर  और हवाई अड्डे पर तैनात एयर लाइंस के स्टाफ के व्यवहार में भी सुधार हो। सही बात ये है कि गुणवत्ता के बिना विकास अधूरा होता है। अर्थव्यवस्था में आई मजबूती के कारण देश में  मध्यम आय वर्गीय यात्री भी हवाई यात्रा के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। लेकिन उस तुलना में सेवाओं और सुविधाओं का स्तर नहीं सुधरा जिससे लोगों में असंतोष बढ़ रहा है। ये देखते हुए सरकार को चाहिए कि केवल हवाई अड्डे बनाकर ही संतुष्ट न हो बल्कि उसी के साथ ही ये भी देखे कि हवाई यात्रा सुरक्षित होने के अलावा सस्ती और सुविधा संपन्न भी हो। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 27 March 2026

भारत की विदेश नीति कसौटी पर खरी साबित हुई


मध्यपूर्व में युद्ध के कारण उत्पन्न तेल और गैस संकट के लिए भारत की विदेश नीति पर उंगलियां उठाने वालों के लिए ये खबर निराशा उत्पन्न करने वाली होगी कि ईरान ने होर्मुज़ समुद्री मार्ग से पांच देशों के जल पोतों को आने - जाने की सुविधा प्रधान कर दी है। ईरान के विदेश मंत्री के अनुसार भारत, रूस , चीन , पाकिस्तान और ईराक चूंकि मित्र देश हैं इसलिए इनके लिए होर्मुज खुला रहेगा। इसके पहले भी भारत के अनेक जल पोत तेल और गैस लेकर उक्त समुद्री मार्ग से सुरक्षित स्वदेश लौट चुके हैं। युद्ध की शुरुआत में विपक्ष  के अलावा सरकार विरोधी लॉबी आरोप लगाती रही थी कि युद्ध के ऐन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजराइल यात्रा के दौरान उन्हें  इसकी जानकारी मिल गई थी। ईरानी  नेता खामेनेई के मारे जाने पर राष्ट्रीय शोक नहीं मनाने के फैसले पर भी सवाल उठे। हालांकि  विदेश सचिव ने ईरान के दूतावास जाकर शोक पुस्तिका में श्रद्धांजलि देकर कूटनीतिक संतुलन बनाए रखा। कुछ दिनों बाद भारत में नौसैनिक अभ्यास से लौट रहे ईरानी युद्धपोत को श्रीलंका के पास अमेरिकी पनडुब्बी ने डुबो दिया तब भी केंद्र सरकार की आलोचना हुई। लेकिन कुछ दिनों बाद ही एक अन्य ईरानी जल पोत द्वारा तकनीकी खराबी के कारण सहायता मांगे जाने पर उसे कोच्चि बंदरगाह पर रुकने की अनुमति देकर भारत सरकार ने ईरान की सहानुभूति अर्जित कर ली। साथ ही उसे दवाइयां एवं अन्य जरूरी सामग्री भेजकर मानवीय दृष्टिकोण का परिचय दिया। इससे  नाराज कतर नामक  देश ने भारत को गैस न देने की  धमकी दे डाली , जो हमारा सबसे बड़ा गैस आपूर्तिकर्ता है। लेकिन सरकार ने उसे दो टूक समझा दिया कि भारत अपने मानवीय कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सजग है। प्रधानमंत्री मोदी और इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू की निकटता जगजाहिर है।  भारत और इजराइल के बीच अस्त्र - शस्त्र के अलावा युद्ध तकनीक के सौदे भी सर्वविदित हैं। लेकिन इस युद्ध के दौरान भारत सरकार ने सावधानी भरी चतुराई का परिचय देते हुए संतुलन बनाए रखा। वहीं ईरान के  स्कूली बच्चों को मारे जाने की आलोचना करते हुए शांति से विवाद हल करने की अपील भी की। सबसे बड़ी बात ये रही कि युद्ध प्रभावित देशों में रहने वाले भारतीयों को सुरक्षित निकाल लाने के अभियान सफलतापूर्वक संचालित हुए। ईरान  में फंसे भारतीय नागरिकों की वापसी बड़ी समस्या थी जिसे कूटनीतिक पहल से हल किया गया। युद्ध के आगे बढ़ते ही पेट्रोल , डीजल और गैस की कमी होने लगी। ईरान द्वारा तेल उत्पादक देशों पर किए हमलों से वहां या तो उत्पादन बंद करना पड़ा या उसमें काफी कमी आ गई। लेकिन उससे बड़ी समस्या ईरान द्वारा हार्मुज समुद्री मार्ग अवरुद्ध किए जाने से उत्पन्न हुई। ऐसे में एक तरफ तो केंद्र सरकार ने वैकल्पिक स्रोतों से खरीदी शुरू की वहीं ईरान को भी इस बात के लिए राजी किया कि वह हार्मुज़ से उसके टैंकर निकलने की अनुमति दे। सौभाग्य से दोनों प्रयास सफल रहे। उल्लेखनीय डोनाल्ड ट्रम्प ने जब  भारत पर रूस से तेल न खरीदने का दबाव बनाया तब श्री मोदी ने अनेक अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों का दौरा कर तेल और गैस के सौदे कर लिए थे। वह बुद्धिमत्ता आज काम आ रही है और भारत अमेरिका, अर्जेंटीना, नाइजीरिया और ऑस्ट्रेलिया के  अलावा अनेक छोटे देशों से तेल और गैस की खरीदी कर उनकी कमी रोकने में काफी हद तक कामयाब हुआ जबकि पड़ोसी देशों में स्थिति गंभीर बनी हुई है। तेल कंपनियों द्वारा कीमतें बढ़ाए जाने की आशंका के बीच आज केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज घटाकर जो बुद्धिमत्ता दिखाई वह समय की मांग है। हालांकि अनेक शहरों से पेट्रोल और गैस के अभाव की खबरें आ रही हैं लेकिन स्थिति में सुधार भी दिख रहा है। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने ईरान सहित युद्ध में शामिल अन्य देशों के राष्ट्रप्रमुखों से बातचीत कर बेहतर संबंध बनाए रखे। दूसरी तरफ विदेश मंत्री जयशंकर भी सक्रिय रहकर वैश्विक स्तर पर भारत के प्रभाव को बनाए रखने में जुटे हैं। आज प्रधानमंत्री द्वारा राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बात कर संकट की इस घड़ी में केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय बनाए रखने की पहल भी समझदारी भरा कदम  है। एक महीने से चल रहे इस युद्ध से खुद को दूर रखते हुए संबंधित पक्षों के साथ रिश्ते बनाए रखना आसान नहीं था। लेकिन भारत ने ये कर दिखाया क्योंकि बीते कुछ सालों में हमारी विदेश नीति काफी व्यापक हुई है। प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं का मखौल उड़ाने वाले भले न मानें किंतु उनका फायदा अब  दिखाई दे रहा है। भारत को इसी नीति पर आगे भी चलते रहना चाहिए जिसमें बजाय भावनाओं में बहने के विशुद्ध राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी जाती है।


- रवीन्द्र वाजपेयी