Tuesday, 12 May 2026

विपक्षी एकता झमेले में: तीसरे मोर्चे के पुनर्जन्म की अटकलें


तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी नाटकीयता का अनुभव होने लगा है। अभिनेता  विजय,  कांग्रेस और वामपंथियों सहित एक - दो अन्य विधायकों का समर्थन मिलने से  बहुमत की देहलीज तो पार कर गए लेकिन  खतरे खत्म नहीं हुआ।  कांग्रेस द्वारा   विजय को समर्थन देने से द्रमुक की नाराजगी खुलकर सामने आ गई जब पार्टी ने संसद में अपने सांसदों को कांग्रेस से अलग बिठाने का पत्र भेज दिया। दरअसल  समर्थन देने से पहले राहुल गांधी या पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने द्रमुक या इंडिया गठबंधन से बातचीत नहीं की। साथ ही दोनों विजय के शपथ ग्रहण में भी शामिल हुए। उल्लेखनीय है चुनाव प्रचार के दौरान श्री गांधी का ये बयान काफी चर्चित हुआ था कि राजनीतिक नेताओं में केवल स्टालिन ( पूर्व मुख्यमंत्री) ही हैं जिन्हें वे भाई कहते हैं। शायद इसलिए शपथ के बाद अपने भाषण में विजय ने राहुल को भाई कहकर संबोधित किया। बहरहाल विजय को समर्थन देकर कांग्रेस ने तमिलनाडु में नए समीकरण बनाने का जो दांव चला उसे श्री गांधी के राजनीतिक चातुर्य और सफलता के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है। लेकिन गहराई से देखें तो 22 लोकसभा और 10 राज्यसभा सांसदों वाले द्रमुक को छोड़कर विजय की नई नवेली पार्टी से गठबन्धन कौन सी बुद्धिमत्ता है इसका उत्तर नहीं मिल रहा। स्मरणीय है पिछले लोकसभा चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन पूरी तरह सुप्तावस्था में चला गया। उसके बाद हुए विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में उसके घटक दल एक दूसरे के विरुद्ध मैदान में उतरे। हरियाणा से शुरू हुआ सिलसिला हालिया चुनावी मुकाबलों में भी दिखा। प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस और वामपंथी अलग - अलग लड़े। इसी तरह केरल में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और वामपंथियों के बीच ही रहा। प. बंगाल के बारे में श्री गांधी का वह बयान काफी चर्चित हुआ कि ममता बैनर्जी के कुशासन के कारण ही भाजपा को इस राज्य में पांव जमाने का मौका मिला। लेकिन उनके पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है कि तृणमूल सरकार की गलत नीतियों का लाभ कांग्रेस क्यों नहीं उठा सकी? चुनाव के बाद सुश्री बैनर्जी ने 100 सीटें उनसे छीने जाने का जो आरोप चुनाव आयोग पर लगाया उसके समर्थन में तो श्री गांधी कूद पड़े किंतु उन्हें ये तथ्य भी स्वीकार करना चाहिए कि भाजपा विरोधी मतों में बंटवारा करने के लिए कांग्रेस और वामपंथी भी बराबर के दोषी हैं। करारी हार के बाद ममता ने     विपक्षी एकता की मजबूती के लिए काम करने की प्रतिबद्धता दर्शाई किंतु ये कहना भी गलत नहीं होगा कि इंडिया गठबंधन की मिट्टी पलीत करने के लिए वे भी कम दोषी नहीं हैं। इस गठबंधन में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की बड़ी भूमिका थी।। लेकिन जब उनको संयोजक बनाने का प्रस्ताव आया तब सुश्री बैनर्जी ने पुरजोर विरोध किया। परिणामस्वरूप नीतीश ने भाजपा के साथ गठजोड़ कर लिया। यदि ममता ने वह अड़ियलपन न दिखाया होता तो बड़ी बात नहीं केंद्र में गैर भाजपाई सरकार बनी होती। प. बंगाल में भी उन्होंने गठबंधन के अन्य दलों के लिए लोकसभा सीट छोड़ने से इंकार कर दिया।  उसके बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के समर्थन भी प्रचार करने सांसद शत्रुघ्न सिन्हा को भेजा। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी अरविंद केजरीवाल के पक्ष में सभाएं लीं। लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा ने जबरदस्त वापसी करते हुए हरियाणा , महाराष्ट्र  , बिहार, असम , और पुडुचेरी में जहां अपनी सत्ता बचाकर रखी वहीं विपक्ष के मजबूत स्तम्भ माने जा रहे अरविंद केजरीवाल और ममता बैनर्जी का वर्चस्व तोड़कर क्रमशः दिल्ली और प. बंगाल में सरकार बना ली और वह भी भारी बहुमत के साथ। हालांकि कांग्रेस ने केरल जीतकर एक उपलब्धि अपने खाते में भी दर्ज कर ली लेकिन वह भी इंडिया गठबंधन के घटक वामपंथियों को हराकर। आज तमिलनाडु में हुए बड़े उलटफेर में अन्ना द्रमुक के लगभग 30 विधायकों ने विजय सरकार को समर्थन देने का ऐलान कर कांग्रेस को चौंका दिया क्योंकि इसके बाद विजय सरकार के पास सुविधाजनक बहुमत होने से कांग्रेस का दबाव खत्म हो गया। कुल मिलाकर विपक्ष की एकता दूर की कौड़ी बनी हुई है। उ.प्र के चुनाव में अखिलेश आम आदमी पार्टी से नजदीकियाँ बढ़ा रहे हैं। वहीं चुनाव हारने के बाद कोलकाता जाकर सुश्री बैनर्जी से मिलकर अपनी सहानुभूति व्यक्त कर आए। स्मरणीय है श्री केजरीवाल और श्री यादव ने कांग्रेस को ठेंगा दिखाते हुए तृणमूल कांग्रेस का प्रचार किया था। ये सब देखते हुए निकट भविष्य में होने वाले चुनावी मुकाबलों में भी विपक्षी एकता की संभावनाएं नगण्य ही हैं। पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस में सांप और नेवले जैसा बैर है। गुजरात में भी यही स्थिति है। उ.प्र में अखिलेश भी इस बार कांग्रेस से दूरी बनाकर चलना चाह रहे हैं क्योंकि वह अपनी ताकत से ज्यादा मांग करती है। सही बात ये है कि लोकसभा चुनाव में 99 सीटें जीतकर राहुल गांधी की वजनदारी राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ने लगी थी किंतु उसके बाद भी चुनावों में उनका प्रदर्शन बहुत ही दयनीय रहा। केरल की जीत भी स्थानीय कारणों से हुई। इसीलिए ये कहना गलत नहीं होगा कि विपक्षी एकता में कांग्रेस सबसे बड़ी बाधक है क्योंकि एक तो गांधी परिवार श्रेष्ठता के भाव से बाहर निकलने तैयार नहीं है वहीं ज्यादातर विपक्षी दल राहुल गांधी के नेतृत्व में काम करने से कतराते हैं। इसका परिणाम तीसरे मोर्चे के पुनर्जन्म के रूप में हो तो आश्चर्य नहीं होगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 11 May 2026

सोमनाथ का अमृत महोत्सव: हिन्दू नव जागरण का प्रतीक


आजादी के बाद जब महमूद गजनवी द्वारा  तोड़े गए सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की बात उठी तब  पं. जवाहरलाल नेहरू ने उस पर सरकारी खर्च करने का विरोध किया। हालांकि सरदार पटेल जिन्होंने उसके निर्माण का आदेश दिया था वे टस से मस नहीं हुए और जनता से 25 लाख चंदा एकत्र कर काम शुरू किया। उनकी मृत्यु के बाद नेहरू सरकार में मंत्री, प्रख्यात शिक्षाविद् कन्हैयालाल माणिकलाल  मुंशी की देखरेख में मंदिर को दोबारा भव्य स्वरूप प्रदान किया गया। लेकिन 11 मई 1951को उसमें शिवलिंग की स्थापना समारोह में जाने से पं. नेहरू ने ये कहते हुए इंकार कर दिया कि उन्हें  मंदिर का पुनर्निर्माण पसंद नहीं क्योंकि यह हिन्दू पुनरुत्थानवाद है। यही नहीं उन्होंने राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भी सोमनाथ मंदिर जाने से रोका किंतु वे नहीं माने और उस समारोह में शामिल हुए। उस आयोजन के आज 75 वर्ष पूर्ण होने पर भव्य अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  इस ऐतिहासिक अवसर के साक्ष्य बने। बड़ी बात नहीं धर्म निरपेक्षता के झंडा बरदारों की आंखों में यह अमृत महोत्सव  उसी तरह खटके जैसे अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण उन्हें आज तक बर्दाश्त नहीं हुआ। जनेऊधारी ब्राह्मण और शिवभक्त होने का दावा करने वाले राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अभी तक अयोध्या के राम मंदिर जाने की जरूरत नहीं समझी क्योंकि मुस्लिम मतदाताओं की नाराजगी का डर उन्हें नींद में भी सताता है। लेकिन सोमनाथ जैसे मंदिर क्या केवल सनातन धर्म की धरोहर हैं ? महमूद गजनवी ने उस मंदिर को ध्वस्त कर केवल किसी एक धर्म को नहीं बल्कि भारत की अस्मिता को चोट पहुंचाई थी। सरदार पटेल ने जब उसके पुनरुद्धार की पहल की तब पं. नेहरू ने  उसका जो विरोध किया वह धर्म निरपेक्षता नहीं अपितु मुस्लिम तुष्टीकरण था। इस  तरह देश का विभाजन जिस मानसिकता ने किया उसे ही प्रश्रय देने की गलती उन्होंने दोहराई। दुर्भाग्य से उनके वैचारिक उत्तराधिकारी भी उसी परिपाटी पर चलते हुए धर्म निरपेक्षता का अर्थ मुस्लिम परस्ती लगा बैठे। मुसलमानों के मत इकतरफा बटोरने के इस फॉर्मूले ने कई दशकों तक अनेक दलों को राजनीतिक लाभ पहुंचाया किंतु समय बीतने के साथ इसकी प्रतिक्रिया हिंदू समाज में भी होने लगी जो असम और प. बंगाल के  हालिया चुनाव में  साफ नजर आई। इसे लेकर सेकुलर जमात चिंतित है किंतु  बहुत पुरानी बात नहीं जब कांग्रेस को ये लगा कि भाजपा से निपटने के लिए उसे भी हिन्दू जनमानस में अपनी जगह बनानी चाहिए। इसके बाद पार्टी के एक प्रवक्ता ने राहुल गांधी को ब्राह्मण साबित करते हुए उनका गोत्र तक बता दिया। उसके बाद  श्री गांधी मंदिरों और मठों में परम्परागत परिधान धारण कर पूजा - अर्चना करते देखे गए। उनकी अनुजा प्रियंका वाड्रा भी हिन्दू मंदिरों में मत्था टेकने लगीं। लेकिन मतदाताओं पर समुचित प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि उनका उद्देश्य विशुद्ध राजनीतिक था। हालांकि ये भी कहा जा सकता है कि भाजपा भी तो चुनाव जीतने के लिए हिंदुत्व का ढोल बजाती है किंतु  नरेंद्र मोदी और राहुल गाँधी के मंदिर जाने में जमीन - आसमान का अंतर है। और जिस दिन कांग्रेस सहित सेकुलर कहलाने वाले  राजनीतिक दल इस अंतर को समझ जाएंगे उस दिन हिन्दू समाज के बीच उनकी छवि सुधर जाएगी। हालिया चुनावी मुकाबलों में असम और प.बंगाल में हुए हिन्दू ध्रुवीकरण को खतरा बताकर छाती पीटने वाले  तब मौन रहते थे जब जाति और धर्म आधारित एम - वाय (मुस्लिम - यादव) को जीत की गारंटी मानकर प्रचारित किया जाता था। प. बंगाल में मुस्लिम मतदाताओं का भाजपा के विरोध में गोलबंद होना दीवार पर लिखी इबारत थी। उसकी प्रतिक्रिया हिन्दू गोलबंदी के रूप में इसी चुनाव में क्यों देखने मिली उसका सीधा - सीधा उत्तर ये है कि  वहां तुष्टीकरण  चरमोत्कर्ष पर जा पहुंचा। तृणमूल सांसद और प. बंगाल की सबसे चर्चित चुनाव प्रचारक सायोनी घोष ने कहा कि अभी उनकी पार्टी के इतने बुरे दिन नहीं आए जो जय श्री राम जैसे  राजनीतिक नारे का सहारा ले किंतु चुनावी मंचों पर वे हमारे दिल में काबा, लबों पे मदीना गाकर मुस्लिम तुष्टीकरण में जुटी रहीं। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि उनके उस गायन ने हिन्दू जनमानस को एकजुट होकर मतदान करने उद्वेलित किया। पता नहीं इस देश के सेकुलर वादियों को ये अक्ल कब आएगी कि सोमनाथ और अयोध्या के मंदिर केवल सनातन  की आस्था के ही नहीं अपितु राष्ट्रीय स्वाभिमान के जीवंत प्रतीक हैं। दुर्भाग्य से आजादी के बाद हमारे देश की समृद्ध संस्कृति और गौरवशाली आध्यात्मिक विरासत के प्रति जो उपेक्षा भाव रखा गया उसके विरुद्ध पनपा असंतोष  अब मुखर हो चला है। इसे हिन्दू पुनरुत्थान कहें या नव जागरण किंतु सदियों बाद ये दौर लौट रहा है। सोमनाथ मंदिर का अमृत महोत्सव उसी का प्रतीक है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 9 May 2026

बंगाल आज जो सोचता है वही कल पूरा देश सोचेगा


प. बंगाल के लिए आज का दिन वाकई ऐतिहासिक है। भाजपा के वैचारिक पूर्वज  जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के गृह प्रदेश में  इस राष्ट्रवादी विचारधारा का हाशिए पर रहना चौंकाता था। पहले कांग्रेस और उसके बाद वामपंथियों ने यहां लंबे समय तक शासन किया। उसके बाद 2011 में ममता बैनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस नामक पार्टी ने वामपंथियों के किले को ध्वस्त करते हुए  नई शुरुआत की। कांग्रेस से राजनीति  शुरू करने वाली ममता ने जब देखा कि उनकी पार्टी वामपंथियों से लड़ने में अनिच्छुक है तब उन्होंने बगावत की और  आखिरकार उस राइटर्स बिल्डिंग पर अपना परचम लहरा दिया जहां से उन्हें अपमानित कर निकाल दिया गया था। उम्मीद थी कि वे बंगाल को उस अराजक स्थिति से निकालकर भद्र लोक के दौर में वापस ले जायेंगी। उल्लेखनीय है बंगाल में ही नक्सलवाद जैसे आतंक का जन्म हुआ था। इसके अलावा वामपंथियों ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए बांग्लादेश से आए घुसपैठियों को  मतदाता बनवाकर जनसंख्या असंतुलन उत्पन्न कर दिया। वामपंथियों के शासन में पार्टी कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी चरम पर थी। कांग्रेस उसका मुकाबला करने की बजाय आत्मसमर्पण कर चुकी थी। ऐसे में जब ममता का उदय हुआ तब लगा वे उस दुरावस्था को दूर करेंगी किंतु जल्द ही वे भी उसी संस्कृति में ढल गईं। स्मरणीय है जो गुंडातंत्र वामपंथियों की मैदानी ताकत हुआ करता था उसी के विरोध में बंगाल की जनता ने सुश्री बैनर्जी को सत्ता सौंपी थी किंतु जल्दी ही वही गुंडे तृणमूल कांग्रेस के हिस्से बन गए और उसके बाद जो हुआ वह वामपंथी सरकार के दौर से भी बुरा अनुभव रहा। लेकिन जिस तरह वामपंथियों से लड़ने में कांग्रेस असमर्थ साबित हुई ठीक उसी तरह उसने ममता सरकार के विरुद्ध भी अपनी लाचारी दिखाई। धीरे - धीरे मार्क्सवादी भी हाशिए पर चले गए। इस शून्य को भरने के लिए कमर कसी भाजपा ने। लेकिन वामपंथी सरकार के समय राष्ट्रवादी विचारधारा पर जो दमनचक्र चला उसने ममता राज में और भी वीभत्स रूप ले लिया। बतौर मुख्यमंत्री उन्होंने जिस तरह वामपंथियों और कांग्रेस को मुख्यधारा से बाहर फेंका उससे उन्हें ये गुमान हो चला कि अब वे पूरी तरह चुनौती विहीन हो चली हैं। साधारण सूती साड़ी और हवाई चप्पल उनकी पहचान थी किंतु धीरे - धीरे वे उन सभी विकृतियों से घिरती चली गईं जिनके कारण बड़े - बड़े सत्ताधीश जनता की नजरों से गिरकर इतिहास की गहरी खाई में समा गए। प.बंगाल में हुआ राजनीतिक परिवर्तन किसी तात्कालिक घटना की प्रतिक्रिया नहीं अपितु एक लंबे वैचारिक संघर्ष की सफल परिणिति है। देशवासियों को ये बात भूलनी नहीं चाहिए कि देश के विभाजन की नींव इसी बंगाल से पड़ी थी। विभाजन के उस दौर में पूरे राज्य में मुस्लिम गुंडों ने जो अत्याचार किया उस पर कांग्रेस और वामपंथियों ने पर्दा डाल रखा था। ममता भी उसी राह पर चलीं। लेकिन समय चक्र हमेशा एक समान नहीं रहता। आखिर जनता के मन में ये बात बैठने लगी कि भाषा , संस्कृति और खाना - पान जैसे सतही विषयों में उसे उलझाकर सत्ता में बैठे तत्व देश की सुरक्षा और अखंडता का सौदा कर रहे हैं। 4 मई को ईवीएम से निकला जनादेश वह आक्रोश था जो मन में होने पर भी  भयवश व्यक्त नहीं हो पा रहा था। भाजपा ने बीते 10 वर्षों में प. बंगाल के मतदाताओं को इस बात के प्रति आश्वस्त किया कि वह  न केवल उनकी बल्कि शत्रु देशों से सटी सीमाओं की सुरक्षा भी करेगी। प. बंगाल को बदहाली से निकालकर सोनार बांग्ला की स्थिति में ले जाने का जो वायदा नरेंद्र मोदी ने किया और उनके दाहिने हाथ अमित शाह ने लोगों को भयमुक्त होकर बदलाव के अभियान में शामिल होने के लिए प्रेरित किया उसके कारण आज वहां हिन्दू राष्ट्रवाद का उद्घोष संभव हो सका। ये चुनाव केवल सत्ता बदलने तक सीमित न रहे ये देखना उन लोगों का दायित्व है जो इस वैचारिक क्रान्ति के आधारस्तम्भ हैं। सुवेंदु अधिकारी को प. बंगाल की जनता के विश्वास की रक्षा का जो दायित्व आज मिला है उसे उन्हें प्राण - प्रण से निभाना होगा। प. बंगाल की भौगोलिक स्थिति राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। आर्थिक स्थिति भी दयनीय है और कानून व्यवस्था अराजकता का पर्याय है। ऐसे में प. बंगाल की सत्ता भाजपा और सुवेंदु दोनों के लिए कठिन चुनौती है। इस बदलाव का राष्ट्रीय राजनीति पर दूरगामी असर पड़े बिना नहीं रहेगा। योगी और हिमंता के बाद सुवेंदु देश में हिंदूवादी राजनीति के नए चेहरे होंगे। जिन लोगों को इस चुनाव में हुआ हिन्दू ध्रुवीकरण हजम नहीं हो रहा उन्हें ये सोचना चाहिए कि देश का बहुसंख्यक वर्ग अब तुष्टीकरण के नाम पर चल रहे वोटों के व्यापार को रोकने स्वप्रेरणा से लामबंद हो रहा है। इसे रोकने के लिए जितने भी प्रपंच रचे जाएंगे उनका अपनी मौत मरना सुनिश्चित है। एक जमाने में कहा जाता था कि बंगाल आज जो सोचता है वही कल पूरा देश सोचेगा। आध्यात्मिक, बौद्धिक और राजनीतिक क्रांति की इस भूमि पर जो राजनीतिक परिवर्तन आज साकार हुआ उसे भविष्य का संकेत कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 8 May 2026

तमिलनाडु में राजनीतिक अस्थिरता का खतरा


4 मई को चुनाव परिणाम के बाद तमिलनाडु की राजनीति बुरी तरह उलझ गई है। सत्तारूढ़ पार्टी द्रमुक और मुख्य विपक्षी अन्ना द्रमुक को पीछे छोड़ते हुए तमिल अभिनेता जेम्स विजय की  पार्टी टीवीके 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ा दल बन गई। शुरुआत में लगा कि बहुमत के लिए जरूरी 10 सीटें उसे आसानी से मिल जाएंगी। कांग्रेस ने अपने 5 विधायकों के समर्थन का पत्र सौंपकर उसकी संभावनाएं बढ़ा दीं। लेकिन राज्यपाल ने सरकार बनाने के उनके दावे को ठुकराते हुए  118 विधायकों के समर्थन के प्रमाण मांगकर अड़ंगा लगा दिया। मुख्यमंत्री स्टालिन खुद भी विधानसभा चुनाव हार गए इसलिए उनकी  पार्टी द्रमुक द्वारा विजय का साथ देना अस्वाभाविक ही था। लेकिन उनको बड़ा धक्का तब लगा जब  साथ में चुनाव  लड़ी कांग्रेस ने  पूछे बिना ही विजय को समर्थन दे दिया। उधर भाजपा का साथ नहीं लेने की उनकी घोषणा के कारण अन्ना द्रमुक का समर्थन मुश्किल है जिसका भाजपा से गठबंधन है। उसी के बाद  आशंका व्यक्त की जाने लगी कि द्रमुक और अन्ना द्रमुक के कुछ विधायक तोड़कर विजय बहुमत की व्यवस्था कर लेंगे। कुछ छोटे दलों से समर्थन मिलने की चर्चा भी सुनाई दी किन्तु इन पंक्तियों के लिखे जाने तक  पेच फंसा हुआ है। राज्यपाल दो बार विजय से  कह चुके हैं कि  118 विधायकों के समर्थन के बगैर वे उन्हें सरकार बनाने के लिए नहीं बुलाएंगे। इस उहापोह के बीच एक असम्भव सी लगने वाली बात राजनीतिक गलियारों में फैली जिसके अनुसार विजय का रास्ता रोकने के लिए द्रमुक और अन्ना द्रमुक दशकों पुरानी शत्रुता को भूलकर एक साथ आएंगे।  ऐसा होने  पर दोनों के क्रमशः 73 और 53 विधायक मिलकर 126 हो जाएंगे जो बहुमत से 8 ज्यादा हैं। ये भी कहा जा रहा है कि राज्यपाल द्वारा विजय को मुख्यमंत्री नहीं बनने देने के पीछे भाजपा का दबाव है। दरअसल पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व प. बंगाल और असम में सरकार बन जाने के बाद ही तमिलनाडु की गुत्थी सुलझाना चाह रहा है। स्टालिन और अन्ना द्रमुक के शीर्ष नेता के बीच लंबी चर्चा के दावे भी किए जा रहे हैं। यद्यपि दोनों पार्टियां इस बारे में बोलने से कतरा रही हैं।  कुल मिलाकर अब तक गतिरोध बना हुआ है। ऐसी स्थितियों में राज्यपाल के अधिकार और भूमिका को लेकर भी विमर्श शुरू हो गया है। विजय का दावा है  सबसे बड़ा दल होने के कारण राज्यपाल को उन्हें सरकार बनाने का अवसर देते हुए सदन में बहुमत साबित करने का निर्देश देना चाहिए।  यद्यपि संविधान में बहुमत शब्द का ही उल्लेख है। उस दृष्टि से राज्यपाल अपनी जगह सही हैं। दूसरी तरफ  ये भी  देखने में आया है कि स्पष्ट बहुमत नहीं होने पर भी सबसे बड़ी पार्टी के नेता को राज्यपाल सदन में बहुमत साबित करने की शर्त पर मुख्यमंत्री नियुक्त कर देते हैं। इस संबंध में कर्नाटक का उदाहरण दिया जा रहा है जहां कुछ वर्ष पूर्व  भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी किंतु उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। बावजूद उसके राज्यपाल ने उसके नेता येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री बना दिया किंतु सदन में बहुमत साबित नहीं कर पाने के कारण उन्हें गद्दी छोड़नी पड़ी। उ.प्र में भी कई दशक पहले राज्यपाल रोमेश भंडारी ने बिना बहुमत के जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बना दिया किंतु वे भी बहुमत साबित न कर पाए । उक्त दोनों मामलों में राज्यपाल की भूमिका आलोचना का पात्र बनी। हो सकता है तमिलनाडु के राज्यपाल भी अल्पमत  सरकार बनवाने के आरोप से बचना चाह रहे हों। ये बात सही है कि यदि वे स्पष्ट बहुमत के बिना विजय को मुख्यमंत्री बना देते हैं तब जोड़ - तोड़ और खरीद फरोख्त से इंकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस के अलावा वामपंथी और कुछ छोटी पार्टियों के इक्का - दुक्का विधायकों को द्रमुक और अन्ना द्रमुक गठबंधन से तोड़ने के बाद भी उनकी सरकार पर खतरे की तलवार लटकती रहेगी। ऐसे में पहले ही स्पष्ट बहुमत हासिल करना राजनीतिक स्थिरता के लिए बेहतर विकल्प है।    देखना ये है कि विजय सत्ता की देहलीज पर आकर भी बाहर ही खड़े रह जाएंगे और  द्रविड़ आंदोलन से निकली द्रमुक और अन्ना द्रमुक पुरानी दुश्मनी भूलकर विजय के सपनों पर पानी फेर देंगी। रोचक बात ये है कि दोनों राष्ट्रीय पार्टियां भाजपा और कांग्रेस अपने दम पर इस गुत्थी को सुलझाने में असमर्थ हैं क्योंकि उनके पास अंगुलियों पर गिनने लायक विधायक हैं। इधर विजय धमकी दे रहे हैं कि द्रमुक और अन्नाद्रमुक की सरकार बनी तो उनके 108 विधायक त्यागपत्र दे देंगे। हालांकि ये बहुत ही अव्यवहारिक कदम होगा और क्या पता सभी विधायक इसके लिए तैयार न हों और पार्टी ही टूट जाए। कुल मिलाकर तमिलनाडु का जनादेश बहुत ही पेचीदा है। आखिरकार सरकार किसी न किसी की तो बनेगी किन्तु उसका स्थायित्व हमेशा खतरे में रहेगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 6 May 2026

करारी हार के बाद भी त्यागपत्र न देना दिमागी दिवालियापन


कोई अनुभवहीन व्यक्ति  कहे तो समझ में आता है लेकिन कई बार केंद्र में मंत्री  और 15 सालों तक प. बंगाल जैसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री रह चुकीं ममता बैनर्जी द्वारा चुनावों में मिली करारी हार के बाद भी त्यागपत्र नहीं देने की घोषणा को दिमागी दिवालियापन ही कहा जाएगा। इस चुनाव में सुश्री बैनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस बहुमत से काफी पीछे रह गईं। वे स्वयं भी भवानीपुर की अपनी सीट पर 15 हजार  से हार गईं। सामान्य तौर  प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री अपनी पार्टी को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में शालीनता के साथ जनादेश को स्वीकार करते हुए राष्ट्रपति या राज्यपाल के पास जाकर अपना त्यागपत्र सौंप देता है। लेकिन उसे नई सरकार के बनने तक काम चलाऊ तौर पर पद पर  रहने कहा जाता है। अतीत में जब भी किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की पार्टी जनादेश हासिल करने में विफल रही तब उन्होंने त्यागपत्र देने में संकोच नहीं किया। दरअसल ये किसी कानून से अधिक लोकतांत्रिक मर्यादा और नैतिकता से प्रेरित आचरण है। गत दिवस  सुश्री बैनर्जी ने जो आरोप चुनाव आयोग, भाजपा और केंद्र सरकार पर लगाए वे अपनी जगह हैं। चुनाव में हुई गड़बड़ी की शिकायत याचिकाओं के जरिए न्यायालय में की जा सकती है। लेकिन चुनाव हारने के बावजूद पद नहीं छोड़ने की जिद का कोई औचित्य नहीं है। इसीलिए अन्य विपक्षी दलों और नेताओं तक ने उनकी हेकड़ी का समर्थन नहीं किया। उल्टे अनेक भाजपा विरोधी यू ट्यूबर पत्रकार भी उनके इस गैर जिम्मेदाराना फैसले की आलोचना करते सुने गए। जहां तक बात संवैधानिक प्रावधानों की है तो चुनाव आयोग द्वारा नई विधानसभा के लिए चुने  सदस्यों की सूची राज्यपाल को भेजे जाने के बाद उसके गठन की  अधिसूचना राजपत्र के जरिए जारी होते ही पुरानी विधानसभा अस्तित्वहीन हो जाती है। इसी के साथ ही राज्यपाल बहुमत प्राप्त दल के निर्वाचित नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त  कर शपथ हेतु आमंत्रित करते हैं।  ममता बैनर्जी इतना तो जानती ही होंगी कि निवर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 7 मई तक ही है। ऐसे में वे त्यागपत्र न दें तब  भी राज्यपाल नए मुख्यमंत्री की नियुक्ति कर  शपथ दिलवा सकते हैं। तब तक सुश्री बैनर्जी सहानुभूति बटोरने का कितना भी प्रयास करें किंतु उन्हें सफलता नहीं मिलेगी। बेहतर होता वे  जनादेश को गरिमा के साथ स्वीकार करते हुए राज्यपाल से मिलकर पद से हटने की पेशकश करतीं किंतु जिद्दी स्वभाव के लिए प्रसिद्ध सुश्री बैनर्जी ने हार की खीज में त्यागपत्र नहीं देने की घोषणा कर खुद को हँसी और आलोचना  का पात्र बना लिया। उन्होंने विपक्षी एकता के लिए काम करने की बात भी कही है । लेकिन वे भूल गईं कि इंडिया गठबंधन जिस दुर्दशा का शिकार है उसके लिए वे  भी जिम्मेदार हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस और वामपंथी दलों को मात्र 2 सीटें देने का प्रस्ताव दिया। बाद में कांग्रेस और वामपंथियों ने गठबंधन किया। उसके पहले गोवा विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी खड़े कर कांग्रेस का नुकसान भी वे करवा चुकी थीं। दिल्ली में उन्होंने कांग्रेस की बजाय आम आदमी पार्टी को समर्थन दिया। इस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच लगभग 5 फीसदी का अंतर है। लेकिन कांग्रेस , वामपंथी और अन्य मिलकर 12- 13 प्रतिशत मत बटोर ले गए। यदि  वे सबको एकजुट कर भाजपा विरोधी मोर्चा बनातीं तब चुनाव परिणाम कुछ और हो सकता था । सुश्री बैनर्जी के पास अपनी बात रखने के लिए कानून सम्मत अनेक विकल्प हैं। लेकिन लगता है सत्ता के सान्निध्य में रहने से अब उनमें संघर्ष की हिम्मत नहीं रही। और फिर उनके अस्थिर स्वभाव के कारण अन्य दलों के नेतागण भी उनसे छिटकते हैं। सच  तो ये  है कि उनकी  पराजय से कांग्रेस और वामपंथियों के अलावा अन्य दलों में भी प्रसन्नता है क्योंकि विपक्षी एकता में वे बड़ा रोड़ा थीं। दरअसल राष्ट्रीय नेता बनने की महत्वाकांक्षा होने से वे किसी और को बर्दाश्त नहीं करना चाहतीं। राहुल गांधी की नेतृत्वक्षमता पर भी वे कई बार उंगली उठा चुकी हैं। विपक्षी गठबंधन का नेता बनने के लिए समानान्तर रूप से वे तमाम विपक्षी नेताओं से भी मिलीं किंतु कामयाब नहीं हुईं। अब जबकि उनका बनाया  ढांचा बुरी तरह ढह चुका है और अपने ही राज्य में उनकी राजनीतिक हैसियत शिखर से लुढ़कर जमीन पर आ गई है तब उन्हें अकड़ छोड़कर सौजन्यता और समझदारी दिखानी चाहिए थी किंतु वे अपने उस स्वभाव को बदलने राजी नहीं हैं जिसने उन्हें सत्ता के सिंहासन से उतारकर सड़क पर ला खड़ा किया।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 5 May 2026

चुनाव परिणामों का संदेश मुफ्त उपहार ही नहीं अच्छी सरकार भी चाहिए


पांच राज्यों के चुनावों में जो पार्टी जीती वह सरकार बनाने में जुट गई वहीं जिनके हाथ पराजय आई वे भविष्य की तैयारी में लग जाएंगे।  निकट भविष्य में जहां चुनाव होने वाले हैं उन राज्यों के लिए रणनीति और मोर्चेबंदी का काम भी जल्द शुरू हो जाएगा।  2027 में गोवा , मणिपुर, उ प्र, उत्तराखंड , पंजाब, हिमाचल और गुजरात में विधानसभा चुनाव होंगे। मणिपुर में शायद अशांति के चलते चुनाव प्रक्रिया निलंबित रहे किंतु बाकी में निर्धारित समय पर मतदान होगा। असम और प. बंगाल में शानदार सफलता के कारण भाजपा का हौसला निश्चित रूप से ऊंचाई पर होगा। हालांकि दक्षिण में उसे पुडुचेरी से ही संतोष करना पड़ा।  केरल में तो वह  तीन सीटें जीत भी गई किंतु तमिलनाडु में शून्य उसका पीछा नहीं छोड़ रहा। आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों में मणिपुर को छोड़ भी दें तो गोवा , उत्तराखंड, उ.प्र और गुजरात में अपनी सरकार की वापसी के लिए वह हरसम्भव प्रयास करेगी। इसी के साथ  हिमाचल की सत्ता कांग्रेस से छीनने के अलावा पंजाब में अपने दम पर पैर जमाने की रणनीति बनाएगी। हाल ही में आम आदमी पार्टी के कुछ सांसदों को तोड़कर उसने अपने इरादे जता दिए हैं। वहीं कांग्रेस, समाजवादी पार्टी , आम आदमी पार्टी और अकाली दल भी अपने ढंग से व्यूह रचना करेंगे।   लेकिन गत दिवस आए परिणामों से सभी दलों को ये सबक लेना चाहिए कि मुफ्त उपहार बांटकर चुनाव तो जीता जा सकता है किंतु सत्ता में बने रहने के लिए जरूरी है सरकार का प्रदर्शन हर मोर्चे पर जन अपेक्षाओं के अनुरूप हो। कल सम्पन्न चुनावों वाली सभी राज्य सरकारों ने मतदाताओं को लुभाने के लिए कोई न कोई  योजना चला रखी थी । केरल में विजयन और तमिलनाडु की स्टालिन सरकार ने सीधे खाते में नगदी के अलावा जनकल्याण की अनेक योजनाएं संचालित करते हुए सत्ता में बने रहने की जमीन तैयार की। ऐसा ही देखने मिला प. बंगाल में जहां ममता बैनर्जी ने महिलाओं और युवाओं को लुभाने के लिए तरह - तरह के मुफ्त उपहार बांटे। असम में भी चुनाव के पहले मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने महिलाओं के खाते में हजारों रुपए जमा करवा दिए। वैसे तो सभी राज्यों में जन कल्याण के नाम पर सरकारें  खजाना लुटा रही हैं। चुनाव जीतने के लिए भी मौजूदा खैरातों से ज्यादा का वायदा भी आम  है। प. बंगाल में महिलाओं को तृणमूल सरकार 1500 रु. प्रतिमाह देती थी। उसका  तोड़ निकालते हुए भाजपा ने 3 हजार का वायदा कर दिया। आम तौर पर देखने मिला है कि मतदाता  जो मिल रहा है उस पर ही भरोसा जताता है। म. प्र, महाराष्ट्र,झारखंड, बिहार और असम में ये साबित भी हुआ। लेकिन छत्तीसगढ़। और राजस्थान की पिछली कांग्रेस सरकारों ने  दिल खोलकर खजाना लुटाया लेकिन मतदाताओं ने उन्हें उखाड़ फेंका। कल आए नतीजों में असम में हिमंता सरकार तो मुफ्त खैरात बांटकर सत्ता में वापस आ गई जबकि प. बंगाल में ममता बैनर्जी, तमिलनाडु में स्टालिन और केरलम में विजयन की सरकार को खैरात भी बचा नहीं सकी। सुश्री बैनर्जी और स्टालिन तो खुद भी हार गए।  मोटे तौर पर कह सकते हैं कि प्रतिद्वंदी पार्टी के अधिक लुभावने वायदों के लालच में मतदाताओं ने मौजूदा सरकार के उपकारों को भुला दिया किंतु ये सच्चाई से आँखें चुराने जैसा है।  सही बात ये है कि  साधारण समझ वाला मतदाता भी  समझने लगा है कि इन मुफ्त उपहारों की आड़ में सत्ता में बैठे लोग किस तरह अपना घर भर रहे हैं। इसके अलावा शासन चलाने के तौर - तरीके भी जनता के संज्ञान में आने लगे हैं। ममता बैनर्जी, स्टालिन और विजयन मजबूत नेता माने जाते थे। लेकिन कानून व्यवस्था, महिला सुरक्षा और भ्रष्टाचार के अलावा देश की एकता - अखंडता जैसे मुद्दों की अनदेखी उन्हें महंगी पड़ी। प. बंगाल में घुसपैठियों के प्रति ममता सरकार के लचीले रवैये ने लोगों का गुस्सा बढ़ाया। वहीं जरूरत से ज्यादा मुस्लिम तुष्टीकरण की सहज प्रतिक्रिया हिन्दू ध्रुवीकरण के रूप में देखने मिली। महिलाओं पर अत्याचार के प्रति गैर जिम्मेदाराना बयानबाजी और तृणमूल के गुंडों का आतंक मुफ्त योजनाओं पर भारी पड़ा। तमिलनाडु तो खैरातों का मुख्यालय है। अभिनेता विजय ने 8 ग्राम सोना देने का वायदा कर स्टालिन सरकार की योजनाओं की चमक फीकी करने का दांव चला किंतु उनकी जीत के पीछे द्रमुक सरकार का खराब प्रदर्शन, मुख्यमंत्री के बेटे की सनातन के विरुद्ध स्तरहीन बयानबाजी जैसी गलतियों ने इस सरकार की जड़ें खोखली कर दीं। इसी तरह केरलम में विजयन सरकार अपने राजनीतिक विरोधियों के दमन के लिए बदनाम हो चली थी।।राज्य में आई प्राकृतिक आपदा के समय भी उसका प्रदर्शन बहुत खराब रहा। वामपंथी सरकारें सुशासन के लिए जानी जाती रहीं किंतु विजयन सरकार इस मामले में भी बदनाम हो गई। कुल मिलाकर निष्कर्ष ये है कि केवल खैरात बांटकर ताउम्र सत्ता में बने रहने की गलतफहमी राजनीतिक दलों और नेताओं को दूर करना चाहिए। हिमंता ने घुसपैठियों के मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाकर मतदाताओं पर छाप छोड़ी जबकि कांग्रेस मुस्लिम तुष्टीकरण के लालच में बहुसंख्यक हिंदुओं का समर्थन खो बैठी। उसके 19 विधायकों में से 18।मुस्लिम और एक ईसाई है जिसका निहितार्थ आसानी से निकाला जा सकता है। ममता बैनर्जी भी भ्रष्टाचार, महिला उत्पीड़न, गुंडागर्दी और घुसपैठियों की समस्या से मुंह मोड़कर बैठ गईं। नतीजा सामने है। ये देखते हुए जिन्हें जीत मिली उन्हें ये एहसास होना चाहिए कि मुफ्त उपहार सत्ता में ला तो सकते हैं लेकिन उसमें बने रहने के लिए सुशासन जरूरी है। वरना न खैरातें काम आएगी और न ही जातिवाद।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 4 May 2026

प. बंगाल में भाजपा ने इतिहास रचा तो तमिलनाडु में विजय धुरंधर



पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम आने शुरू हो गए हैं। दोपहर एक बजे तक की स्थिति  यथावत रही तब ये नतीजे तमिलनाडु रूपी केवल एक अपवाद छोड़कर उम्मीद के मुताबिक ही हैं। इस मिनी आम चुनाव में प. बंगाल सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा। ममता बैनर्जी जैसी मजबूत जनाधार वाली  नेत्री को सत्ता से हटाने की संभावना पर राजनीति के अच्छे - अच्छे जानकार कुछ कहने से बच रहे थे । मैदान में घूमने वाले टीवी पत्रकार भी ये तो मान रहे थे कि  भाजपा ने इस बार अभूतपूर्व मोर्चेबंदी की है किंतु वे ये कहने से भी नहीं चूकते थे कि सुश्री बैनर्जी द्वारा महिलाओं को प्रति  माह दी जा रही 1500 रु. की राशि का करिश्मा काम करेगा जैसा झारखंड में हेमंत सोरेन की जीत से दिख गया था। 30 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं का पुख्ता समर्थन भी तृणमूल  की बड़ी पूंजी मानी जा रही थी। राज्य में ममता दीदी की टक्कर का कोई नेता भाजपा के पास नहीं होने के नाम पर भी 2021 जैसे नतीजे दोहराए जाने का दावा भी किया जा रहा था। लोकसभा चुनाव में भाजपा को लगे झटके के बाद तृणमूल  का उत्साह और बढ़ गया । लेकिन आज आए परिणाम ने साबित कर दिया कि माँ, मानुष और माटी जैसे भावनात्मक नारे के नाम पर सत्ता में आईं ममता बैनर्जी ने जिस अराजकता को बढ़ावा दिया उसके विरुद्ध प. बंगाल की जनता ने मौन क्रांति कर दी। जिस तरह से मतदाता कैमरे के सामने बोलने से कतराते थे उसने 1977 के लोकसभा चुनाव की याद दिला दी जब इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल की दहशत में आम जनता कुछ बोलने से तो डरती थी किंतु चुनाव में उसने उनकी सत्ता को उखाड़ फेंका। प. बंगाल का चुनाव परिणाम भी ठीक वैसा ही है जिसने नजदीकी मुकाबले के अनुमानों को बंगाल की खाड़ी में डुबोकर भाजपा को ऐतिहासिक बहुमत प्रदान कर दिया। बड़ी बात नहीं वह 200 का आंकड़ा भी पार कर जाए। ये जीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सटीक रणनीति और व्यूहरचना का सुपरिणाम होने के साथ ही मुस्लिम तुष्टीकरण के विरुद्ध जनादेश है। प. बंगाल में भाजपा की प्रचंड जीत ने बिहार के बाद एक बार फिर उस मिथक को तोड़ दिया कि मुस्लिम मतों का थोक समर्थन जीत की गारंटी है। इस परिणाम का असर उ.प्र के आगामी विधानसभा चुनाव पर पड़े बिना नहीं रहेगा जहां अखिलेश यादव मुस्लिम मतों के बल पर सत्ता में वापसी के ख्वाब देख रहे हैं। प. बंगाल के पड़ोसी असम में भाजपा की धमाकेदार तीसरी जीत से किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि हिमंता बिस्वा सरमा भी योगी आदित्यनाथ की तरह ही हिंदुत्व के महानायक के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। इसी तरह केरलम में वामपंथी सरकार का पतन तो सुनिश्चित था। लेकिन इस राज्य में कोई अन्य विकल्प नहीं होने से कांग्रेस की अगुआई वाले यूडीएफ को आशा से अधिक सीटें मिल गईं। हालांकि एनडीए ने तीसरी शक्ति बनने के लिए काफी मशक्कत की लेकिन उसे इस रूप में सफ़लता मिली कि वामपंथी मतों को खींचकर उसने अपने सबसे बड़े वैचारिक विरोधी की जड़ें उखाड़कर अपना भविष्य उज्ज्वल बना लिया। केरलम में यूडीएफ की बड़ी जीत कांग्रेस के लिए बेशक उत्साहवर्धक है। राहुल गांधी ने यहां काफी जोर भी लगाया था किंतु इस राज्य का राष्ट्रीय राजनीति में ज्यादा महत्व नहीं है। यही हाल पुडुचेरी का भी है जहां एनडीए की सत्ता में वापसी से दक्षिण भारत तक के समीकरण प्रभावित नहीं होते। लेकिन द्रविड़ राजनीति के गढ़ तमिलनाडु ने इस बार जो किया वह बीते 60 सालों का  सबसे बड़ा चुनावी उलटफेर है। विजय नामक लोकप्रिय तमिल अभिनेता की नवोदित पार्टी टीवीके बहुमत की देहलीज पर आ पहुंची। इस प्रकार विजय तमिलनाडु में धुरंधर की तरह समूचे परिदृश्य पर छा गए। यद्यपि एम. जी. रामचन्द्रन और जयललिता भी फिल्मी दुनिया से थे । उनके बाद रजनीकांत और कमला हासन ने भी सियासत में हाथ आजमाए किंतु असफल रहे। ये देखते हुए विजय ने नया इतिहास रचते हुए द्रविड़ आंदोलन से पैदा हुई दोनों पार्टियों द्रमुक और अन्ना द्रमुक को पीछे छोड़ दिया। हालांकि उनके पास बहुमत के लिए कुछ सीटें कम हैं इसलिए उन्हें बाहर से समर्थन लेना होगा। खबर है कांग्रेस ने उनकी तरफ सहयोग का हाथ बढ़ाया भी है किंतु अभी तमिलनाडु का खेल खुला हुआ है।  वैसे  द्रमुक और अन्ना द्रमुक दुश्मनी भूलकर एक हो जाएं तो अभी भी सत्ता उनके पास बनी रह सकती है । इस चुनाव ने मुख्यमंत्री स्टालिन की ऐंठ भी खत्म कर दी जो तीसरे स्थान पर आ गए। उनके बेटे द्वारा किया ग़या सनातन का विरोध भी उनकी दुर्गति का कारण बना। आज शाम तक अंतिम परिणाम घोषित हो जाएंगे जिसके बाद बिंदुवार विश्लेषण किया जा सकेगा। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के लिए आज का दिन बड़ी खुशी लेकर आया है। लोकसभा चुनाव में लगे झटके से उबरकर हरियाणा,महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार के बाद प. बंगाल जीतकर उसने ये साबित कर दिया कि उसके अच्छे दिन जारी हैं। जो लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध दिन - रात दुष्प्रचार किया करते हैं प. बंगाल में  भाजपा की जबर्दस्त जीत उनके मुंह पर भी झन्नाटेदार तमाचा है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी