Saturday, 18 July 2026

वांगचुक को बलि का बकरा बनाया काॅकरोच जनता पार्टी ने



इसका संकेत तो गुरुवार को ही मिल गया था जिस दिन दिल्ली उच्च न्यायालय ने सरकार को निर्देशित किया था कि वह  दिल्ली के जंतर मंतर पर अनशनरत लद्दाख़ की चर्चित शख्सियत सोनम वांगचुक का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण करवाए और जरूरत होने पर उनकी चिकित्सा का प्रबंध भी करे। उल्लेखनीय है नीट परीक्षा के पर्चे लीक होने के बाद सोशल मीडिया पर धूमकेतु की तरह उभरी काॅकरोच जनता पार्टी द्वारा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग को लेकर लगातार किये जा रहे आंदोलन का जब कोई प्रभाव नहीं पड़ा तब राजधानी दिल्ली में जंतर मंतर पर श्री वांगचुक को अनशन पर बिठा दिया गया। लद्दाख़ को पूर्ण राज्य बनाये जाने की मांग को लेकर वे आंदोलन का नेतृत्व करते रहे हैं और कुछ महीनों तक जेल में भी रहे। लेकिन ये बात संदेहों को जन्म देती है कि अमेरिका में बैठे अभिजीत दीपके नामक व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर काॅकरोच जनता पार्टी नामक एक संगठन की घोषणा की और देखते - देखते ही उसके साथ लाखों अनुयायी जुड़ते चले गए। उसके बाद जब वह भारत लौटा तब एक वर्ग विशेष ने उसे मसीहा बनाना चाहा किंतु दिल्ली आने के कुछ घंटों बाद ही जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन  ने काॅकरोच जनता पार्टी के ढोल की पोल खोल दी। अभिजीत को लगा था कि देश का युवा उन्हें हाथों - हाथ लेगा। लेकिन दिल्ली के अलावा भी वे जहाँ - जहाँ गए उनके आयोजन फ्लॉप शो साबित हुए। अंततः दिल्ली में अनशन का फैसला लिया गया और बजाय खुद मैदान संभालने के श्री वांगचुक को अनशन पर बिठा दिया। अभिजीत समझ चुके थे कि उनके नाम में वह आकर्षण नहीं है लिहाजा वांगचुक के कंधे पर बन्दूक रखकर निशाना लगाना चाहा। लेकिन ये दाँव भी कारगर नहीं रहा। जेएनयू और  कुछ ढपलीबाज   वामपंथी छात्रों को छोड़कर न तो वे युवा आये जिनके लिए वांगचुक को भूखा रखा गया और न आम जनता। राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने अनशन स्थल पर आकर मगरमच्छी आँसू तो खूब बहाये लेकिन मैदानी समर्थन नहीं दिया। यही वजह रही कि आंदोलन न गति पकड़ सका और न ही उसकी कोई दिशा ही स्पष्ट हुई। शिक्षा मंत्री का त्यागपत्र मांगने से हटकर जंतर मंतर में टुकड़े - टुकड़े  गैंग के देश विरोधी नारे गूंजने लगे। असल में इस आंदोलन को फुस्स करवाने में सभी प्रमुख विपक्षी दलों की भूमिका रही। अरविंद केजरीवाल भले ही श्री वांगचुक को शिक्षा मंत्री बनाये जाते जाने की मांग कर अपने को उनका हितैषी साबित करना चाह रहे हों लेकिन। उनकी पार्टी भी नहीं चाहती कि काॅकरोच जनता पार्टी उसका विकल्प बन जाए। आज पुलिस ने श्री वांगचुक को उठाकर अस्पताल भेज दिया जिसके बाद अब अभिजीत दीपके ने अनशन करने का ऐलान कर दिया। लेकिन नीट परीक्षा का परिणाम घोषित होने से इस आंदोलन की धार पहले ही कमजोर पड़ चुकी है। सोमवार से संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है। विपक्षी पार्टियां  उसमें सरकार को घेरकर राजनीतिक फ़ायदा उठाना चाहेंगी। इसीलिए उन्होंने इस आंदोलन को दिखावटी समर्थन तो दिया किंतु  जंतर मंतर की सीमा से बाहर नहीं आने दिया। सरकार पर अनशन की उपेक्षा का जो आरोप है उसमें दम इसलिये नहीं है क्योंकि काॅकरोच जनता पार्टी अभी तक संगठित स्वरूप नहीं ले सकी। और श्री वांगचुक का इस आंदोलन से जुड़ना भी अप्रासंगिक था। उनकी छवि  आंदोलनजीवी की बन जाने से वे मीडिया की सुर्खियों में सिमटकर रह गये। रही - सही कसर पूरी कर दी जेएनयू के छात्र - छात्राओं ने जो बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बनकर समूचे आंदोलन पर अतिक्रमण कर बैठे। हिंदू देवी - देवताओं का अपमान करने वाले एक स्टैंड अप कामेडियन ने भी आंदोलन को पलीता लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सच कहें तो काॅकरोच जनता पार्टी ने एक अच्छे भले मुद्दे का कचरा कर दिया। स्मरणीय है किसान आंदोलन अपने साथ देश भर के किसानों को नहीं जोड़ पाने के कारण अपनी मौत मर गया था, वहीं शाहीन बाग का धरना भी अंततः फुस्स होकर रह गया। ठीक वैसे ही ये आंदोलन भी अधोगति को प्राप्त हो रहा है  ये कहना गलत नहीं होगा कि काॅकरोच जनता पार्टी ने सोनम वांगचुक की जान खतरे में डालकर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने की जो चाल चली थी वह उल्टी पड़ गई और अभिजीत दीपके का नौ नौसिखियापन भी उजागर हो गया। 

-रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 17 July 2026

बांग्लादेश के साथ जैसे को तैसा की नीति अपनानी चाहिए



बांग्लादेश से रिश्ते सुधरने की उम्मीदें धीरे - धीरे खत्म होती जा रही हैं।  चीन को मोंगला बंदरगाह के समीप इकौनोमिक ज़ोन के  विकास का काम सौंपने के बाद  गत दिवस उसने भारतीय सीमा से बेहद नजदीक स्थित तीस्ता परियोजना भी उसको सौंप दी जो इसके लिए उसे 7 हजार डॉलर का ऋण देगा। भारत ने इसके लिए 9 हजार करोड़ का प्रस्ताव दिया था। ऐसा ही मोंगला परियोजना को लेकर हुआ था। उल्लेखनीय है शेख हसीना के शासनकाल में भारत और बांग्लादेश के रिश्ते काफी सुधर गए थे। यद्यपि कट्टरपंथी मुस्लिम वहाँ रह रही हिन्दु आबादी पर अत्याचार करने से बाज नहीं आते थे। मंदिरों सहित हिंदुओं के धर्मस्थलों पर हमले आम बात थी। बावजूद इसके सरकारी स्तर पर संवाद बना रहा और अनेक लंबित विवाद भी सुलझे । लेकिन हसीना  का तख्ता उलटने के बाद स्थितियाँ पूरी तरह बिगड़ गईं। दरअसल उनको भारत में। पनाह दिये जाने से बांग्ला देश की अंतरिम सरकार के मुखिया मो. युनुस को बहाना मिल गया। हालांकि उनका झुकाव पहले से ही चीन की तरफ था। लेकिन चुनाव के बाद जब तारिक रहमान भारी बहुमत से प्रधानमंत्री बने तब शुरुआत में ये लगा था कि संभवतः बांग्लादेश दोबारा भारत के साथ सम्बन्ध सुधारेगा। लेकिन शेख हसीना का भारत में बने रहना आड़े आ गया। उनकी गैर मौजूदगी में ही उन्हें मृत्युदंड सुनाया जा चुका है। बांग्लादेश सरकार लगातार उनकी वापसी के लिए दबाव बनाती रही है जिसे भारत ने नजरंदाज कर दिया। जाहिर है इससे उसकी नाराजगी बढ़ी होगी। हालांकि अपने जन्म के कुछ बरस बाद शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या होने के बाद से बांग्लादेश में बैठे सभी शासक भारत से दुश्मनी की राह पर चले। हसीना के कार्यकाल को जरूर अपवाद कहा जा सकता है। लेकिन उसके बाद से ये देश भारत विरोधी ताकतों से जुड़ने लगा। बांग्लादेश के नये शासक  तारिक रहमान लंबे समय तक विदेश में रहे हैं। इसीलिए उनसे उम्मीद रही कि वे कट्टरता को त्यागकर भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के साथ संबंध कायम करने आगे आयेंगे। लेकिन चीन के साथ किये ताजा  समझौतों से ये साफ हो चला है कि वे भी अपने मरहूम  पिता और माँ की तरह से ही भारत विरोध की मानसिकता के वशीभूत हैं। यद्यपि हाल ही में शेख हसीना ने ये कहते हुए सबको चौंका दिया था कि वे आगामी दिसम्बर माह में ढाका लौटकर अदालत के समक्ष आत्म समर्पण करते हुए फांसी की सजा रद्द करने की अपील करेंगी। उसके बाद ऐसा लगा था कि दोनों देशों के रिश्तों में चली आ रही तल्खी दूर होने लगी है। लेकिन तारिक रहमान द्वारा चीन की यात्रा और फिर दो महत्वपूर्ण परियोजनाओं के विकास हेतु भारत के प्रस्तावों को ठुकराते हुए चीन की गोद में बैठ जाने के बाद इस बात में कोई शंका नहीं रह गई है कि हमारा ये पड़ोसी भी हमारे दुश्मनों के साथ मिल गया है। तीस्ता परियोजना भारत की सीमा से महज 20 - 22 कि.मी दूर होने से हमारी सुरक्षा के लिए खतरा है। सिलिगुड़ी कारीडोर वैसे भी बेहद संवेदनशील माना जाता है। प. बंगाल में भाजपा सरकार बन जाने के बाद बांग्लादेश सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने के अभियान में तेजी के अलावा घुसपैठियों को वापस भेजने जैसी कारवाई से बांग्लादेश भन्नाया हुआ है। असम की भाजपा सरकार भी अवैध घुसपैठ को रोकने के लिए बेहद आक्रामक है। चीन के साथ तारिक रहमान सरकार रक्षा समझौते भी कर रही है। निश्चित रूप से उसके ताजा कदम विशुद्ध रूप से भारत विरोधी मोर्चेबंदी ही है। आश्चर्य तो तब होता है जब बांग्लादेश उस पाकिस्तान के साथ गलबहियाँ करने में भी नहीं हिचकता जिसने उसकी जनता पर अमानुषिक अत्याचार किये थे। पाकिस्तान के कब्जे से से उसे मुक्त करने में भारत ने जो सैन्य कारवाई की और करोड़ों बांग्लादेशियों को शरण दी उसके प्रति कृतज्ञता की बजाय बांग्लादेश भारत के साथ हर वह हरकत करने पर आमादा है जो किसी शत्रु देश के साथ की जाती है। ऐसे में भारत को उसके साथ किसी भी प्रकार की सहानुभूति रखने से बचते हुए कड़ाई से पेश आना चाहिए क्योंकि चीन का वहाँ बैठना हमारी सुरक्षा के लिए चिंता पैदा करने वाला है। सबसे बड़ा कदम उन घुसपैठियों की वापसी का उठाया जाए जो हमारी अर्थव्यवस्था पर बोझ के साथ ही आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बने हुए हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 16 July 2026

आस्था को जो ठेस लगी उसकी टीस लंबे समय तक बनी रहेगी



अयोध्या स्थित भव्य राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का प्रकरण पूरी दुनिया में चर्चित हो गया। सनातन में आस्था रखने वाले करोड़ों रामभक्तों को उक्त घटना ने पीड़ा पहुंचाई क्योंकि मसला केवल रुपये - पैसे की हेराफेरी तक सीमित न रहकर उन नैतिक मूल्यों और मर्यादाओं के उल्लंघन से भी जुड़ा हुआ है जिनका प्रभु श्री राम ने जीवन भर पालन किया और जिसकी वजह से उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम जैसा पवित्र संबोधन प्राप्त हुआ। इस मामले की जाँच चल रही है और मामला सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंचा है। इसलिए उसके कानूनी पक्ष पर कुछ भी बोलना फिलहाल जल्दबाजी होगी। लेकिन जो न्यास राम मंदिर की व्यवस्था देखता है उसके प्रशासनिक ढांचे में  शीर्ष स्तर पर हो रहे बदलाव से ही मामले की गंभीरता स्पष्ट हो जाती है। उक्त न्यास में रा.स्व.संघ से जुड़े लोग महत्वपूर्ण दायित्वों पर थे लिहाजा मामले को राजनीतिक रंग भी दिया जाने लगा जो कि स्वाभाविक  है। उ.प्र में आगामी वर्ष विधानसभा चुनाव होने वाले हैं ।  ये देखते हुए भाजपा विरोधी ताकतों को हमलावर होने का मौका मिल गया। जाहिर है केंद्र और राज्य दोनों में सत्ता पक्ष इस मामले में रक्षात्मक होने के लिए मजबूर हो गया है। खैर, राजनीति के अपने तौर - तरीके होते हैं इसलिए इस मामले में भी दोनों पक्षों से जिस तरह के वार और पलटवार हो रहे हैं उनसे किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। लेकिन इस कांड के उजागर होते ही देश भर से विभिन्न मंदिरों, धर्म स्थलों और उनकी व्यवस्था देख रहे न्यासों के प्रबंधन में आर्थिक अनियमिताओं की खबरें निकलकर आने लगीं जिनके मूल में चंदे और चढ़ावे की चोरी ही मुख्य रूप से सामने आई है। कुछ प्रसिद्ध धर्मस्थलों से  बहुमूल्य मुकुट एवं आभूषण आदि गायब होने की शिकायतें भी मिल रही हैं। शुरुआत में ऐसा लगा कि सारी अव्यवस्था हिन्दू मंदिरों को लेकर ही है किंतु मुस्लिम समुदाय के बीच से भी वक्फ संपत्ति से जुड़े घोटाले सामने आने लगे। अन्य धार्मिक संगठनों के भीतर भी इसी तरह की हेराफेरी चर्चाओं में आ गई। देश के अनेक हिस्सों में ईसाई समुदाय से जुड़ी बेशकीमती जमीनों की बंदरबांट भी किसी से छिपी नहीं है। कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं होगा कि धर्म के नाम पर अधर्म करने वालों के हौसले बुलंद हैं जिन्हें न ईश्वरीय कोप का डर है और न ही कानून का। जहाँ तक बात धार्मिक केंद्रों और उनसे जुड़े आर्थिक प्रबंधन की है तो उसमें भावना का स्थान सर्वोपरि है। भले ही व्यक्ति बतौर कर्मचारी उससे जुड़ा हो किंतु उस स्थल या संस्थान की पवित्रता उसे प्रभावित करती होगी , ये विश्वास जनमानस में गहराई तक समाया हुआ था। इसीलिए मंदिर में पुजारी के आसन पर बैठे व्यक्ति की योग्यता और जाति के बारे में जाने बिना श्रृद्धालु जन उसे आदर देते हैं। चौंकाने वाली बात ये है कि राम मंदिर से आई चंदा और चढ़ावा घोटाले की जानकारी  के बाद देश भर से ऐसी ही खबरों की बाढ़ सी आ गई।  सनातन धर्म के अलावा  अन्य धर्मों से जुड़ी संस्थाओं एवं संपत्तियों की लूटखसोट का पर्दाफ़ाश भी उन्हीं से जुड़े लोगों द्वारा किया जा रहा है। इन सबसे ये बात खुलकर सामने आ गई है कि लोग श्रद्धा भाव से धर्म स्थलों और उनका प्रबंधन देखने वाले संस्थानों को जो आर्थिक सहयोग देते हैं उसका निजी स्वार्थपूर्ति हेतु भी दुरूपयोग होता है। मंदिरों में चढ़ाई जाने वाली  बहुमूल्य वस्तुओं की पेशेवर चोरों द्वारा की जाने वाली चोरी पर किसी को आश्चर्य नहीं होता क्योंकि उनसे ईमानदारी की अपेक्षा कोई नहीं करता । लेकिन मंदिरों और धर्मस्थलों में सेवा प्रदान करने वालों से तो ईमानदारी और समर्पण  की उम्मीद की जाती है क्योंकि किसी भी धर्म में चोरी - बेईमानी नहीं सिखाई जाती। यही वजह है कि अयोध्या में हुई चढ़ावे की चोरी के बाद लगातार आ रही खबरें धर्म प्रेमियों को धक्का पहुँचा रही हैं। कानून दोषियों को दंडित करेगा इसका भरोसा भी लोगों को है किंतु देश भर से आ रही खबरों से लोगों की आस्था को जो ठेस लगी उसकी टीस लंबे समय तक बनी रहेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 15 July 2026

ट्रम्प के टैरिफ आतंक का जवाब हैं मुक्त व्यापार समझौते



अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा शुरू किये टैरिफ युद्ध ने एक नई तरह की  उथल - पुथल को जन्म दिया जिसके कारण अंतराष्ट्रीय व्यापार की समूची स्थापित व्यवस्था के मानदंड टूट - फूट गए। दरअसल ट्रम्प का घोषित उद्देश्य  कम आयात शुल्क के कारण अमेरिका को होने वाले व्यापार घाटे में कमी लाना था जिसमें वे काफी हद तक सफल भी हुए। लेकिन जोश में होश खो बैठने वाली उक्ति को चरितार्थ करते हुए उन्होंने टैरिफ रूपी अस्त्र से दुनिया भर  को एक साथ आतंकित करने की जो मूर्खता की उसके कारण सभी प्रमुख देशों ने अपने आर्थिक हितों के संरक्षण के लिए अमेरिका पर निर्भरता घटाने की मुहिम छेड़ दी। परिणामस्वरूप नये - नये  व्यापार समझौते होने लगे। उसी का एक उदाहरण भारत और ब्रिटेन के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता है जो आज से लागू हो गया। उल्लेखनीय है  ट्रम्प के टैरिफ दबाव के जवाब में नरेंद्र मोदी सरकार  का ये छटवाँ मुक्त व्यापार समझौता है। इसके पूर्व भारत  मॉरीशस, यूएई, ऑस्ट्रेलिया, ईएफटीए (यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ) और ओमान के साथ ऐसे ही समझौते हस्ताक्षरित कर चुका है। यही वजह है कि अमेरिका के साथ विचाराधीन  नया व्यापार समझौता करने में भारत ने जल्दबाजी नहीं दिखाई और ट्रम्प द्वारा थोपी गई इकतरफा शर्तों को मंजूर नहीं किया।  ब्रिटेन के साथ जो ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता आज, 15 जुलाई 2026 से लागू हुआ उसके अंतर्गत भारत द्वारा निर्यात किये जाने वाले लगभग  99% उत्पादों पर ब्रिटेन ने आयात शुल्क शून्य  कर दिया है। समझौते की मुख्य बातों पर नज़र डालें तो इससे विशेष तौर पर भारतीय  कपड़ा, चमड़े से बनी चीजें , सोने - चांदी के जेवरात, , समुद्री खाद्य (मछली आदि) और इंजीनियरिंग सामग्री के अलावा कृषि उत्पादों को ब्रिटिश बाजार में बड़े पैमाने पर आयात  शुल्क-मुक्त बाजार उपलब्ध होगा। दूसरी तरफ भारत सरकार ब्रिटेन से आयातित वस्तुओं  पर आयात शुल्क में चरणबद्ध कटौती करेगी। इनमें  स्कॉच व्हिस्की का टैरिफ 150% से घटाकर 40% करने के अलावा ब्रिटेन में बनी पूरी तरह तैयार कारों (सहित इलेक्ट्रिक वाहनों) पर आयात शुल्क धीरे - धीरे  110% से घटाकर 10% तक लाया जाएगा। इसके साथ ही ब्रिटेन में कार्यरत भारतीय पेशेवरों के लिए कार्य शर्तों का सरलीकरण भी इस समझौते का हिस्सा हैं। भारत ने सेब, अखरोट, सहित कुछ बीज, सोने की ईंटों व स्मार्टफोन जैसे संवेदनशील उत्पादों पर कोई शुल्क रियायत नहीं दी है। वहीं ब्रिटेन ने भी चावल, चीनी व कुछ मांस उत्पादों को समझौते के दायरे से बाहर रखा । समझौते में प्रावधान है कि भारत से ब्रिटेन जाने वाले कर्मचारियों और उनके नियोक्ताओं को पांच वर्ष तक ब्रिटेन में सोशल सिक्योरिटी योगदान नहीं देना होगा जो आईटी कंपनियों को राहत प्रदान करने वाला है। इनके अलावा भी  ऐसे अनेक बिंदु हैं जिनमें दोनों, पक्षों के हितों को संवर्धन होगा। यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ से भी चूंकि ऐसा ही समझौता किया जा चुका है इसलिए अब समूचे यूरोप के साथ भारत के व्यापारिक रिश्ते तो मज़बूत होंगे ही कूटनीतिक संबंधों में भी मिठास आयेगी। कुल मिलाकर ये मुक्त व्यापार समझौते अमेरिका के टैरिफ आतंक के विरुद्ध की गई मोर्चेबंदी है जिसमें भारत के साथ उन देशों ने भी समझौते करने में कोई झिझक नहीं दिखाई जो अमेरिकी शिविर के माने जाते हैं। इनसे एक बात स्पष्ट हो गई कि भारत केवल एक उपभोक्ता बाजार नहीं अपितु उत्पादक के तौर पर भी अपनी जगह बनाता जा रहा है। सबसे खुशनुमा पहलू ये है कि अब तक जिन - जिन देशों से मुक्त व्यापार समझौते किये गए उन सभी में अप्रवासी मूल के भारतवंशियों की बड़ी संख्या है। उनमें से कुछ वहाँ स्थायी तौर पर बस जाने के बाद भी भारतीय जीवन शैली से जुड़े होने से भारतीय वस्तुओं के उपभोक्ता हैं। उनके अलावा पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल के भी जो नागरिक उक्त देशों में रहते हैं वे भी भारतीय उत्पादों के मुरीद होने से उनकी मांग रहती है। इसीलिए  मुक्त व्यापार समझौता लागू होने से हमारे निर्यात को मजबूती मिलने के साथ ही अमेरिका के टैरिफ से होने वाले नुकसान की भरपाई हो सकेगी। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 14 July 2026

बदलते वैश्विक समीकरणों में भारत और चीन का महत्व बढ़ रहा



रूस - यूक्रेन और अमेरिका - ईरान की जंग रुकने का नाम नहीं ले रही। पूरी दुनिया इन युद्धों से हलाकान है। वैश्विक अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है। कच्चे तेल और गैस आदि की आपूर्ति बाधित होने से अभूतपूर्व ऊर्जा संकट पैदा हो गया है। ईरान द्वारा होर्मुज नामक समुद्री मार्ग बंद किये जाने से प. एशिया के तेल उत्पादक देशों का व्यापार ठप होकर रह गया है। दोनों तरफ से बरसाई जा रही बारूद ने तेल रिफ़ाइनरियों को या तो तबाह कर दिया या जबरदस्त नुकसान पहुंचाया जिसके कारण उनकी उत्पादन क्षमता प्रभावित हो गई। अमेरिका होर्मुज  खोलने का साहस दिखाता भी है तो ईरान तेल वाहक जहाजों पर मिसाइलें दागकर दहशत फैलाने से बाज नहीं आता। उसका दावा है वह इस समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलेगा जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी ऐसी ही धमकी दे रहे हैं। दूसरी तरफ यूक्रेन पर रूसी हमले को शुरू हुए बरसों बीत गए। प्रारंभ में लगता था दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य महाशक्तियों में शामिल रूस  के सामने यूक्रेन दो - चार दिनों में ही घुटने टेक देगा । रूस द्वारा उसके सीमावर्ती भूभाग पर कब्जा जमा लेने से उक्त सम्भावना और मजबूत हो गई । लेकिन जो ताजा जानकारी आ रही है उसके अनुसार यूक्रेन धीरे - धीरे ही  सही रूस के कब्जे से अपनी खोई हुई जमीन वापस लेता जा रहा है। लेकिन इससे भी बड़ी बात ये है कि उसने रूस जैसे कच्चे तेल और गैस संपन्न देश में तेल संकट उत्पन्न कर दिया। बजाय बड़े लड़ाकू विमानों के छोटे - छोटे ड्रोन के जरिये इस विश्व शक्ति के बड़े - बड़े तेल शोधन संयंत्रों को नष्ट कर डाला। परिणामस्वरूप राजधानी मॉस्को तक में पेट्रोल पंप खाली पड़े हैं। ये उस देश की हालत है जो कल तक बड़े पैमाने पर तेल और गैस निर्यात किया करता था। यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की की स्थिति रूस के राष्ट्रपति पुतिन की तुलना में अत्यंत दयनीय बताई जाती थी। लेकिन खैरात के हथियारों से लड़ने वाले यूक्रेन ने रूस की अपार सैन्य क्षमता की पोल खोलकर रख दी। इस युद्ध के कारण रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों का दुष्प्रभाव भी अब असर दिखाने लगा है। कमोबेश ऐसी ही हालत प. एशिया में चल रहे युद्ध में खुद को दुनिया का खलीफा समझने वाले अमेरिका की देखने मिल रही है जो हजारों मिसाइलें दागने और पूरे देश को मलबे के ढेर में बदल देने के बाद भी ईरान को घुटनाटेक करवाने में नाकामयाब साबित हुआ है। यूक्रेन की तरह ईरान को भी इस लड़ाई में  अकल्पनीय क्षति पहुंची है। उसकी तेल उत्पादन क्षमता पर तो विपरीत असर पड़ा ही अन्य क्षेत्रों में भी  भारी तबाही झेलनी पड़ी। सरकार और सेना में पदस्थ अनेक शीर्ष हस्तियां मारी गईं। सड़क, पुल, कारखाने तबाह हो गए। हजारों नागरिक जान गँवा बैठे। लड़ाई शुरू होते ही उसके सर्वोच्च नेता खामेनेई की जिस तरह ह्त्या हुई उसके बाद ही ये उम्मीद लगाई जाने लगी थी कि वह अमेरिका के सामने झुक जाएगा। लेकिन उसने उन सभी अरब देशों को निशाना बनाने जैसा दुस्साहस कर डाला जिनमें अमेरिका के सैन्य अड्डे थे । इन देशों को ये गुमान था कि अमेरिका उनका अभेद्य रक्षा कवच है। और इसीलिए वे ईरान  विरोधी शिविर में जाकर बैठे हुए थे। लेकिन ईरान ने उनकी खुशफहमी को तो धक्का पहुंचाया ही अमेरिका के सर्वशक्तिमान होने के अहंकार को भी जबरदस्त चोट पहुंचा दी। युद्धविराम करते समय भी उसने डोनाल्ड ट्रम्प की कड़ी शर्तों पर रजामंदी न देकर बता दिया कि भारी नुकसान के बाद भी वह आत्म समर्पण नहीं करेगा। बीते कुछ दिनों में युद्धविराम की जिस प्रकार धज्जियां उड़ रही हैं उन्हें देखते हुए ये कहा जा सकता है कि अमेरिका की अब तक की पूरी रणनीति नाकामयाब रही है। यहाँ तक कि इजराइल की रक्षा प्रणाली तक ईरान के हमलों को रोक पाने में विफल साबित हुई। उक्त दोनों लड़ाइयों ने दुनिया की दो महाशक्तियों की दादागिरी को जबरदस्त चोट पहुंचाई है। रूस की विशाल सैन्य शक्ति जहाँ यूक्रेन को झुकाने में  नाकामयाब रही वहीं अमेरिका के बेहद आक्रामक रवैये के बावजूद ईरान झुकने के लिए तैयार नहीं है। कुछ महीनों पहले जब डोनाल्ड ट्रम्प ने ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी दी तब यूरोप के वे छोटे - छोटे देश तक उनके विरुद्ध मोर्चा खोलकर बैठ गए जो दूसरे महायुद्ध के बाद से अमेरिका के संरक्षण में रह रहे थे। इस प्रकार मौजूदा परिदृश्य में विश्व का शक्ति संतुलन बदलता प्रतीत हो रहा है। रूस और अमेरिका जहाँ अपने ही बनाये जाल में फंसने के बाद उससे निकल नहीं पा रहे वहीं चीन बिना उलझे चुपचाप अपनी स्थिति मज़बूत करता जा रहा है। आने वाले समय में विश्व की महाशक्तियों को लेकर कुछ और भ्रम भी टूटना तय है। दुनिया को अपनी मुठ्ठी में बन्द करने का दम्भ भरने वाले चन्द देश अपने अंतर्विरोधों के चलते प्रभाव  खोते जा रहे हैं। इसके चलते वैश्विक शक्ति केंद्र पश्चिम से खिसक कर पूरब अर्थात एशिया की तरफ बढ़ रहा है। और इसीलिए भारत और चीन के महत्व तथा प्रभुत्व में उत्तरोत्तर वृद्धि दिखाई देने लगी है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 13 July 2026

मोदी द्वारा तीन देशों की यात्रा में किये समझौतों से देश को दूरगामी लाभ


मोदी विरोधी यू ट्यूबर डाॅ. पुण्य प्रसून वाजपेयी ने अपने ताजा वीडियो में खुलासा किया कि भारत में अब तक जितने भी प्रधानमंत्री हुए उनमें नरेंद्र मोदी द्वारा की गईं विदेश यात्राओं की संख्या बाकी सभी की मिलाकर भी अधिक हैं। विपक्षी पार्टियां भी अमूमन प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर छींटाकशी करते हुए उनके महंगे विमान का जिक्र करना नहीं भूलतीं। ये बात पूरी तरह सही है कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। भारत जैसे देश में इस पर उंगलियाँ उठना स्वाभाविक है जहाँ करोड़ों लोग गरीबी रेखा से नीचे ज़िंदगी बसर करने मजबूर हैं। लेकिन इसी के साथ ये देखना भी जरूरी है कि श्री मोदी की विदेश यात्राएं किस उद्देश्य से की जाती हैं ? यदि वे महज सैर - सपाटे के लिए होती हों तब उनकी आलोचना स्वाभाविक है। लेकिन अब तक जो कुछ भी देखने मिला उससे ये साफ है कि उनकी  विदेश यात्राएं पूरी तरह देश के दूरगामी हितों पर केंद्रित होती हैं। ऐसा नहीं है कि पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों के विदेशी दौरे निरुद्देश्य हुआ करते थे किंतु उस दौर में भारत की वैश्विक भूमिका आज जैसी विस्तृत नहीं होने से उन यात्राओं का दायरा रिश्ते मजबूत करने तक सीमित रहता था, लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। भारत एक परमाणु शक्ति संपन्न देश होने के साथ ही सॉफ्टवेयर, अंतरिक्ष, चिकित्सा, रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में बड़ी ताकत के तौर पर पहचान बनाता जा रहा है। दुनिया भर में फैले भारतवंशी देश की प्रतिष्ठा में वृद्धि कर रहे हैं। उदारीकरण के बाद उत्पन्न स्थितियों में विश्व एक बाजार बन गया है जिसके कारण केवल निर्यातक बनकर कोई नहीं रह सकता। उत्पादन के लिये कच्चा माल और तकनीक का आयात जरूरी है वहीं  विकसित देशों को अपने उत्पादों के लिए बाजार की जरूरत पड़ती है। दुनिया  में जारी मौजूदा उठापटक के पीछे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष तौर पर बाजारवाद की छाया है। विदेश नीति भी घूम - फिरकर आर्थिक हितों से प्रभावित होती है। इसीलिए राष्ट्राध्यक्ष अपने विदेशी दौरों में देश के बड़े उद्योगपतियों को ले जाते हैं। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने इस बात को पूरी तरह समझते हुए विदेश दौरों में व्यापारिक समझौतों को प्राथमिकता दी और बड़ी आर्थिक शक्तियों के विकल्प के तौर पर विभिन्न देशों के साथ तार जोड़ते हुए देश के आर्थिक, कूटनीतिक और सामरिक हितों की सुरक्षा का प्रबंध किया। अमेरिका द्वारा प्रतिकूलता दिखाये जाने के कारण भारत के लिए अपने संबंधों का विकेंद्रीकरण आवश्यक होता जा रहा था। उस लिहाज से भारत  ने  चतुराई दिखाई और विभिन्न देशों से समझौते रूपी  दूरदर्शिता दिखाकर उसके दबाव को कम करने में सफलता हासिल की। यूरोपीय यूनियन और ब्रिटेन से मुक्त व्यापार समझौता इसका उदाहरण है जो अमेरिका के टैरिफ रूपी  आतंक का माकूल जवाब है। गत सप्ताह श्री मोदी ने इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे में जिस प्रकार के व्यापारिक, रणनीतिक और सांस्कृतिक समझौते किये वे मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में भारत की जरूरतों को निर्बाध पूरा करने के साथ ही  कूटनीतिक स्थिति को मजबूत बनाने में मददगार होंगे। दक्षिण एशिया और प्रशांत क्षेत्र में चीन की कुटिल नीतियों का मुकाबला करने के लिये तमाम देश भारत की ओर आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं। ब्रिक्स का प्रमुख सदस्य होने के बाद  भी भारत क्वाड नामक संगठन का सदस्य भी है जो चीन के विरुद्ध मोर्चेबंदी के लिए कार्यरत है। इंडोनेशिया के साथ सबांग बंदरगाह को विकसित करने के  अलावा ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम और क्रिटिकल मिनरल्स की आपूर्ति और न्यूजीलैंड के साथ महत्वपूर्ण रणनीतिक  समझौते क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में भारत की प्रभावशाली भूमिका का प्रमाण है। अमेरिका - ईरान और रूस - यूक्रेन के बीच युद्ध के लंबे खिंचने के कारण दुनिया के सामने जो संकट आते जा रहे हैं उनसे होने वाले नुकसान से बचने के लिए समय रहते वैकल्पिक व्यवस्था करना ही बुद्धिमत्ता है। प्रधानमंत्री का ताजा विदेश दौरा उसी दिशा में बढ़ाया गया कदम है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 11 July 2026

बढ़ती आबादी को मानव संसाधन में बदलना समय की मांग


आज विश्व जनसंख्या दिवस है। पूरी दुनिया  चिंतित है कि आबादी इसी तरह बढ़ती रही तो धरती पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन  घटते चले जायेंगे और तब उनके लिए वैसी ही लड़ाई होगी जैसी कई सालों से रूस और यूक्रेन के बीच चली आ रही है। वहीं प. एशिया में  चल रहे युद्ध के पीछे भी कच्चा तेल नामक काला सोना ही है। चीन की विस्तारवादी नीतियाँ भी प्राकृतिक संसाधनों को हथियाने पर आधारित हैं। भविष्य में पेय जल की समस्या भी विकराल होने जा रही है।और तब उसके लिए भी संघर्ष होगा। उल्लेखनीय है भारत अब चीन को पीछे छोड़ सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गया है। दूसरी तरफ चीन और जापान सरीखे देश जन्म दर में गिरावट से चिंतित हैं क्योंकि  उनके उद्योगों को श्रमिक मिलने की किल्लत होने लगी है। उधर परिवार नामक संस्था के टूटने से भी अनेक विकसित देशों में आबादी  ठहर गई है। यूरोप के कुछ छोटे देशों की आबादी तो लाखों में है किंतु अपने प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों के कारण वे विकसित और संपन्न राष्ट्रों में शुमार होते हैं।  लेकिन बेहतर जिंदगी के चलते अन्य देशों के नागरिक जिस तेजी से यहां बसते जा रहे हैं उससे माहौल बिगड़ने लगा है ।  विशेष रूप से अरब देशों से आए शरणार्थी समस्या बन गए हैं । दुनिया में बढ़ती आबादी से  जमीन और पानी की कमी के साथ ही वाहनों की बढ़ती संख्या  पर्यावरण के लिए खतरा बन गई  है। समुद्र में चल रहे हजारों जहाज और आकाश में विचरते वायुयानों से जो प्रदूषण होता है उसका दुष्प्रभाव धरती पर रहने वालों पर भी पड़ रहा है। विशेषज्ञों का निष्कर्ष  है कि  पृथ्वी पर मौजूद संसाधन  जनसंख्या के अनुपात में  घटते जा रहे हैं। विलासिता पूर्ण जीवनशैली  के कारण भी प्रकृति से खिलवाड़ होने से प्राकृतिक आपदाएं जल्दी - जल्दी आने लगी हैं।  जानलेवा कोरोना  वायरस ने   साबित कर दिया कि मनुष्य की अनगिनत कथित उपलब्धियां किसी न किसी बिंदु पर आकर शक्तिहीन हो जाती हैं । अमेरिका जैसा विकसित और ताकतवर देश भी चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय कुछ न करने की स्थिति में आ जाता है। विश्व भर में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर चिंता व्यक्त की जाती है किंतु जितना दिखावा होता है उसका आधा भी काम नहीं होने से स्थिति एक कदम आगे दो कदम पीछे की बन चुकी है। विकासशील देशों को कार्बन उत्सर्जन के लिए उपदेश देने वाले बड़े राष्ट्र पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं । चीन ने अपनी आबादी में वृद्धि को तो  थाम लिया लेकिन कार्बन उत्सर्जन के मामले में वह बेहद लापरवाह है।  भारत की ही बात करें तो आर्थिक विकास के मामले में चीन से हमारा मुकाबला है । लेकिन उसने  जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण के साथ ही विशाल आबादी को उत्पादकता से जोड़ा जिसके बाद अफीमचियों के लिए कुख्यात चीन ने अमेरिका को टक्कर दे डाली। साम्यवादी व्यवस्था  के बाद भी उसने उदारीकरण की पश्चिमी अवधारणा को अपने अनुरूप बनाया जिसके कारण  लगभग सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने वहाँ अपनी उत्पादन इकाईयां लगाई। दूसरी तरफ भारत में साठ और सत्तर के दशक तक परिवार नियोजन का जो अभियान जोर - शोर से चलाया जाता था वह उपेक्षा का शिकार होकर रह गया। चुनावी राजनीति ने जिस मुफ्त संस्कृति का विकास किया उसकी वजह से करोड़ों लोग बिना हाथ - पैर चलाए सरकारी सहायता पर अपना पेट भर रहे हैं। विरोधाभास ये है कि  बेरोजगारी के आंकड़े  उच्च स्तर पर हैं लेकिन खेती , उद्योग और छोटे कारोबारी तक  कामगारों की कमी से त्रस्त हैं। चीन ने जिस आबादी को संसाधन बनाया वही हमारे देश में बोझ बनकर रह गई। इसके लिए निश्चित रूप से  राजनीति उत्तरदायी है जिसने  कामचोरी को बढ़ावा  दिया। किसी को हजार -  दो हजार बेरोजगारी भत्ता देने के बजाय यदि उससे रोजाना घंटे - दो घंटे भी काम करवाया जाए तो उसे श्रम का महत्व समझ आएगा । इसी तरह महिलाओं के खातों में  पांच सौ - हजार जमा करने से उनका सशक्तीकरण हो जायेगा , ये सोचना मूर्खों के  स्वर्ग में रहने जैसा है। ये सच है कि चीन में चुनाव महज दिखावा है इसलिए वहां रेवड़ियां नहीं बांटी जाती और काम करने में सक्षम प्रत्येक व्यक्ति को उत्पादकता से जोड़ा गया है। वहीं हमारे देश में तो चुनाव कभी न खत्म होने वाला महोत्सव है जिसके दौरान जो मांगोगे वहीं मिलेगा वाली दरियादिली दिखाई जाती है। और तो और जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने  में भी धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप जैसी बातें आड़े आने लगती है। दुनिया का उत्पादन केंद्र बनने की उम्मीद और सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने की  महत्वाकांक्षा में जनसंख्या का बोझ बड़ी बाधा बन रहा है। हालांकि वर्तमान राष्ट्रीय जनसंख्या नीति  2000 का मुख्य उद्देश्य प्रजनन दर को कम करके 2045 तक जनसंख्या को स्थिर करना है। लेकिन इसका हश्र भी परिवार नियोजन अभियान जैसा ही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी