Friday, 24 July 2026

संसदीय गरिमा का पुनर्स्थापन सरकार और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी



म.प्र विधानसभा का मानसून सत्र समय से पहले ही समाप्त होने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। सरकार द्वारा प्रस्तुत तमाम विधेयक होहल्ले के बीच पारित हो गए जिनमें समान नागरिक संहिता जैसा महत्वपूर्ण विधेयक भी था। बीते कुछ सालों से देखने मिल रहा है कि विधानसभा और संसद के सत्रों का ज्यादातर समय हंगामे की बलि चढ़ जाता है। विपक्ष अपनी कुछ मांगों को लेकर अड़ता है जिन्हें सत्ता पक्ष द्वारा नहीं माने जाने पर गतिरोध बना रहता है। अक्सर विपक्ष और आसंदी के बीच कहासुनी होने पर भी सदन स्थगित करने की नौबत आ जाती है। आम तौर पर सत्ता और मुख्य विपक्ष में टकराव से सदन की कारवाई बाधित होती है जिससे छोटे - छोटे दलों के सांसदों को अपने क्षेत्र के मुद्दे उठाने का अवसर नहीं मिल पाता। म.प्र विधानसभा को ही लें तो पिछली बार कोई भी सत्र पूरी अवधि तक कब चला, ये शायद ही कोई बता पायेगा। संसद के भी अनेक सत्र  बिना कोई विधायी कामकाज किये ही पूरे हो गये और मौजूदा सत्र भी उसी ओर बढ़ता दिख रहा है। इस स्थिति के लिए दोनों पक्ष एक दूसरे को कसूरवार ठहराते हैं लेकिन सही बात ये है कि संसदीय प्रणाली के महत्व को कम करने में दोनों पक्षों का बराबर दोष है। सत्ता पक्ष को लगता है सदन जितना कम चले उतना उसके लिए हितकर है क्योंकि  सदन स्थगित रहने से वह संवेदनशील मुद्दों पर जवाबदेही से बचने में सफल हो जाता है। हंगामे के माहौल में प्रश्नकाल तक स्थगित होता है जबकि इसके जरिये बहुत सी ऐसी जानकारियां उजागर होती हैं जो अन्यथा लोगों तक नहीं पहुँच पातीं। प्रश्नकाल में मंत्री द्वारा दिये उत्तर पर प्रश्नकर्ता सांसद पूरक प्रश्न भी पूछ सकता है। इस अवसर के छिन जाने से सांसदों के अधिकारों का हनन होने के साथ ही प्रश्नों के उत्तर तैयार करने में लगने वाले समय और  संसाधन व्यर्थ चले जाते हैं। ये देखते हुए विपक्ष को ये सावधानी रखनी चाहिए कि प्रश्नकाल को स्थगित होने से बचाये। हालांकि  वह ये कहकर बचना चाहता है कि सदन चलाना सरकार की जिम्मेदारी है किंतु ऐसा कहने मात्र से वह अपनी भूमिका के निर्वहन से नहीं भाग  नहीं सकता। मसलन सत्र शुरू होते ही किसी   मुद्दे पर तत्काल चर्चा की जिद सत्ता पक्ष द्वारा स्वीकार नहीं किये जाने पर सदन को नहीं चलने देने की गलती विपक्ष के लिए नुकसान दायक होती है। संसद के वर्तमान सत्र में भी यही देखने मिल रहा है। सत्र शुरू होने के पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सर्वदलीय बैठक बुलाकर सत्र के सुचारु रूप से संचालन पर आम सहमति बनाते हैं। लेकिन सत्र शुरू होने पर ऐसा लगता ही नहीं कि ये लोग दो दिन पहले बैठकर सदन चलाने के लिए मीठी - मीठी बातें कर रहे थे। सदन की कार्य सूची पहले से तैयार होती है। आकस्मिक घटनाओं और मुद्दों पर ध्यानाकर्षण और स्थगन प्रस्ताव लाये जा सकते हैं। लेकिन सब काम छोड़कर तुरंत चर्चा कराये जाने की मांग पूरी नहीं होने पर सदन को न चलने देने पर सरकार से ज्यादा हानि विपक्ष की होती है क्योंकि सत्ता पक्ष के पास तो अपनी बात रखने  के तमाम साधन हैं जबकि विपक्ष के लिए संसद और विधानसभा ही  हैं जहाँ से वे अपनी बात  जनता तक पहुंचा सकते हैं। ये देखते हुए रणनीतिक तौर पर बेहतर होगा कि विपक्ष सदन को बाधित करने की गलती से बचे। वैसे भी व्यवधान के दौरान  सरकार अपनी जरूरत के विधेयकों को पारित करवा ही लेती है किंतु विपक्ष उन पर अपनी राय रखने से वंचित रह जाता है। संसदीय प्रणाली की खूबसूरती सदन में होने वाली बहस में से ही उभरकर सामने आती है। देश की छवि भी इस बात से बनती है कि देश और जनता से जुड़े मुद्दों पर सत्ता और विपक्ष की सोच क्या है?  वर्तमान परिदृश्य इस लिहाज से निराश करने वाला है क्योंकि संसद और विधानसभाओं में ऐसे प्रभावशाली सदस्य कम ही हैं जिनका भाषण उनके विरोधी भी ध्यान से सुना करते थे। आज देश में  विश्वास का जो संकट है उसके लिए संसदीय प्रणाली की गिरती छवि भी बड़ा कारण है। भारत में भी बांग्लादेश और नेपाल जैसी अराजकता की आशंका के पीछे संसद के भीतर होने वाले हंगामे भी हैं। जनता के मन में ये बात बैठती जा रही है कि  जनप्रतिनिधि केवल अपना और अपनों का ही भला सोचते हैं। इस अवधारणा को और प्रबल होने से रोकने के लिए संसदीय प्रणाली की पुरानी गरिमा की पुनर्स्थापना जरूरी है जिसका दायित्व किसी एक दल या नेता का न होकर सभी का है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 23 July 2026

जंतर मंतर आंदोलन पूरी तरह पेशेवर आंदोलनजीवियों के कब्जे में


 
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन का अब छात्रों से कोई लेना - देना नहीं रहा। इसे शांतिपूर्ण कहना भी हास्यास्पद है। जिस तरह शालीन बाग में धरने के पीछे अलगाववादी ताकतें सक्रिय रहीं उसी तरह किसानों के साल भर चले धरने में धीरे - धीरे खालिस्तानी अलगाववादी घुस आये जिसकी परिणिति लाल किले पर खालिस्तानी झंडा फहराने के तौर पर हुई।  यही स्थिति इस आंदोलन की है जिसमें असली छात्र कितने हैं ये जाँच का विषय है। ये बात इसलिए उठी क्योंकि प्रश्न पत्र लीक होने पर दोबारा हुई नीट परीक्षा के परिणाम घोषित होने के बाद  सफल हुए छात्र भविष्य की तैयारी में लग गए । नया शैक्षणिक सत्र प्रारंभ होने से भी अन्य छात्र प्रवेश आदि में व्यस्त  हैं। किसी राजनीतिक दल के छात्र संगठन ने भी जंतर मंतर आंदोलन से जुड़ने में रुचि नहीं दिखाई। आम आदमी पार्टी को छोड़ अन्य कोई राजनीतिक दल भी सक्रिय रूप से सामने नहीं आया। धरना स्थल पर आकर अपनी मौजूदगी की औपचारिकता जरूर अनेक नेताओं ने दिखाई किंतु 20 जुलाई को संसद भवन की तरफ बढ़ती भीड़ पूरी तरह नेतृत्वविहीन होने से अराजक हो उठी। इस तरह के आंदोलन जब भी हुए उनका नेतृत्व करने वाले आगे - आगे रहते थे। लेकिन 20 जुलाई को जंतर मंतर पर मंच लूटने वाले कथित छात्र हितैषी छू मंतर हो गए। भीड़ को संसद भवन में घुसने के लिए उकसाकर कॉकरोच जनता पार्टी के नामचीन चेहरे कहाँ रहे इसका जवाब उन्हें देना चाहिए। एक को तो बर्गर खाने के अपराध में प्रवक्ता पद से हटा दिया किंतु कुछ युवाओं ने ही पकड़कर उसके वीडियो बना लिए वरना उसे भी न हटाया जाता। कहा जा रहा है दो नेताओं को जगत प्रकाश नड्डा ने अपने निवास पर रोके रखा लेकिन पार्टी के सबसे बड़े चेहरे अभिजीत संसद जाने वाले जत्थों के अग्रिम भाग में क्यों नहीं दिखे  ? हर आंदोलन में बेगानी शादी में अब्दुल्ला बनकर कूदने वाले योगेंद्र यादव एक कोने में खड़े अपना वीडियो बनवाते रहे। मुंबई से अभिनेता नसीरुद्दीन शाह भी अपने दो बेटों को जंतर मंतर लेकर आये किंतु जब लाठीचार्ज हुआ तब वे कहां थे कोई नहीं जानता। नीले झंडों के साथ जय भीम का नारा लगाने वाली भीड़ भीम आर्मी के नेता सांसद चंद्रशेखर रावण लेकर आये थे किंतु पुलिस की कारवाई से बचने वे भी भीड़ से दूर रहे। अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसौदिया, आतिशी भी आग में पेट्रोल डालकर दूर बैठ गए। कुल मिलाकर आंदोलन को अराजक तत्वों के हाथ सौंपकर तमाम नेता पीछे रह गए। यही वजह है कि वे पिटने से भी बचे और उनके विरुद्ध कोई प्रकरण भी दर्ज नहीं हुआ।  उस घटनाक्रम के बाद जो राजनीति हो रही है उसमें न तो शिक्षा प्रणाली में सुधार की चिंता है और न ही छात्रों के हित की क्योंकि आंदोलन की कमान  पेशेवर आंदोलनजीवियों के हाथ में है जिन्हें छात्र राजनीति का धेले भर अनुभव नहीं है। कॉकरोच जनता पार्टी अभी तक आम आदमी पार्टी को छोड़कर अधिकांश दलों के लिए अछूत बनी हुई है। राहुल गाँधी द्वारा प्रधानमंत्री आवास पर दिये धरने को आप सांसद संजय सिंह और आतिशी ने जिस तरह कांग्रेस और सरकार की जुगलबंदी करार दिया उससे स्पष्ट हो गया कि विपक्ष की राजनीति आपदा में अवसर तलाशने पर केंद्रित है। गत दिवस लोकसभा में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस सांसदों के बीच हुई कहा सुनी के पीछे भी श्रेय लूटने की प्रतिस्पर्धा ही थी। यद्यपि सरकार के सामने भी संकट कम नहीं हैं। विपक्ष की रणनीति उन महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित नहीं होने देने की है जिन पर भाजपा की आगामी व्यूह रचना निर्भर है। बीते काफी समय से अन्य पार्टियों में तोड़फोड़ मचाकर भाजपा दो तिहाई बहुमत का प्रबंध करने में जुटी थी। हालांकि धर्मेंद्र प्रधान को अभी तक नहीं हटाया जाना  इस बात का संकेत है कि मोदी - शाह का आत्मविश्वास कायम है। लेकिन अंदरखाने की राजनीति का अंदाजा लगाना मुश्किल है। बात इतनी आगे बढ़ चुकी है कि किसी भी पक्ष के लिए पीछे लौटना आत्मघाती होगा। रही बात आंदोलनकारियों  की तो वे खुद भ्रमित हैं। शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र की मांग तो पूरी हुई नहीं और वे प्रधानमंत्री को हटाने की मांग कर बैठे। सोनम वांगचुक भी अनिर्णय में फंसे हुए हैं। चूंकि सरकार के विरोध में खड़ी ताकतों में समन्वय और आपसी विश्वास नहीं है इसीलिए आंदोलन गैर जिम्मेदाराना तरीके से संचालित है। रोज शाम को जंतर मंतर पर दिखाई देने वाली अराजकता इसका प्रमाण है। चीन के साम्यवादी नेता माओ त्से तुंग ने कहा था क्रांति कोई चाय पार्टी नहीं है। लेकिन जंतर मंतर पर सुबह से रात तक पार्टियां देखी जा सकती हैं। वहाँ से जो वीडियो लगातार आ रहे हैं उनसे अनेक चेहरों के नकाब उतर चुके हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 22 July 2026

छात्र हित छोड़ आंदोलन पर राजनीतिक स्वार्थ हावी



दिल्ली में नीट परीक्षा प्रश्न पत्र लीक होने के विरोध में चल रहा आंदोलन दो टुकड़ों में बट चुका है। उल्लेखनीय है नवगठित कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग को लेकर राजधानी के जंतर मंतर पर काफी दिनों से धरना दिया जा रहा है। बाद में इसमें लद्दाख़ के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने भी उसी मांग को लेकर अनशन शुरू कर दिया तो आंदोलन की चर्चा सर्वत्र फैलने लगी। विभिन्न पार्टियों के नेता उनसे मिलने आये और समर्थन दिया। लेकिन श्री वांगचुक के आग्रह पर भी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी धरना स्थल पर नहीं आये और पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा को भेजकर रस्म अदायगी कर दी। अन्य विपक्षी दलों के नेताओं ने भी जंतर मंतर से एक सुरक्षित दूरी बनाए रखी। लेकिन आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल सहित तमाम नेता धरना स्थल पर उपस्थिति दर्ज करवाने  में सबसे आगे दिखे। इस वजह से पहले से चल रही इस चर्चा को बल मिला कि सोशल मीडिया से जन्मी कॉकरोच जनता पार्टी भी आम आदमी पार्टी की मानस पुत्री ही है। वामपंथी छात्र संगठनों ने भी इस आंदोलन में खुलकर हिस्सेदारी दिखाई। राहुल गाँधी के धरनास्थल पर आकर सोनम वांगचुक से न मिलने का कारण जल्द स्पष्ट हो गया। दरअसल कांग्रेस  इस बात को भांप गई कि  जनता पार्टी की आड़ में अरविंद केजरीवाल खुद को पुनर्स्थापित करना चाह रहे हैं ताकि निकट भविष्य में होने जा रहे विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी मजबूती से खड़ी हो सके। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है पंजाब जहाँ आम आदमी पार्टी ही सत्ता में है। लेकिन उसकी लोकप्रियता लगातार गिरने से कांग्रेस के हौसले बुलंद हैं। दूसरी ओर भाजपा भी प. बंगाल जैसा उलटफेर करने की तैयारी कर रही है। हिमाचल प्रदेश में भी आम आदमी पार्टी , कांग्रेस के मतों में सेंध लागाएगी । दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल दिल्ली की सत्ता हाथ से निकल जाने के लिए राहुल को जिम्मेदार मानते हैं जिन्होंने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारकर भाजपा की राह आसान बना दी।  उसके बाद से ही दोनों में छत्तीस का आंकड़ा चला आ रहा था। इसीलिए कांग्रेस जो पहले से ही नीट परीक्षा मामले में मुखर थी, जंतर मंतर के धरने से कटी - कटी रही। 20 जुलाई को जब  संसद भवन की ओर बढ़ रही भीड़ पर लाठीचार्ज हुआ और पूरे देश में उसकी चर्चा हुई तब कांग्रेस को लगा कि अब भी वह इस आंदोलन से दूर रही तो फिर मुद्दा उसके हाथ से पूरी तरह फिसल चुका होगा और वह युवा विरोधी कहलायेगी। इसीलिए गत दिवस राहुल गाँधी ने सबको चौंकाते हुए प्रधानमंत्री निवास पर डेरा जमाया और केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह की समझाइश पर भी नहीं उठे तब पुलिस ने उन्हें और प्रियंका वाड्रा को हिरासत में लेकर कुछ देर बाद रिहा कर दिया। राजनीतिक तौर पर ये सामान्य घटना थी किंतु  इसके जरिये काँग्रेस ने आंदोलन की लगाम अपने हाथ में लेने का दांव चल दिया। इसका असर भी फौरन दिखा जब आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह और दिल्ली की पूर्व मुख्यमन्त्री आतिशी मार्लेना ने सोशल मीडिया पर इसे जंतर मंतर का आंदोलन कमजोर करने के लिए कांग्रेस और भाजपा की जुगलबंदी बता दिया। स्मरणीय है कांग्रेस द्वारा आम आदमी पार्टी को भाजपा की बी टीम कहा जाता रहा है। इसके बाद कॉकरोच जनता पार्टी के लोगों ने देर रात कनाट प्लेस में उपद्रव मचाकर अपनी खीझ निकाली। लेकिन कल के घटनाक्रम से ये स्पष्ट हो गया कि छात्रों के नाम पर राजनीतिक पार्टियां अपना स्वार्थ सिद्ध करने में जुटी हैं। न जंतर मंतर पर नीट पीड़ित छात्र नजर आ रहे हैं और न ही राहुल के साथ दिखे। संसद जाते हुए लाठी खाने वालों में भी छात्र कम आंदोलनजीवी ज्यादा थे। भले ही दोनों पक्ष अपने - अपने मतलब के लिए आंदोलन को आगे  खींचते रहें किंतु उसकी गंभीरता और वजनदारी रोज घटती जा रही है। संसद का सत्र चलने के कारण  जो सरगर्मी है वह भी जल्द खत्म होना तय है। विडंबना ये है कि इस आंदोलन का चेहरा बने लोगों का छात्रों से कोई सम्बन्ध नहीं है। ऐसे में पहले दिन से दिशाहीन नजर आ रही ये मुहिम पूरी तरह भटकते हुए राजनेताओं के शिकंजे में आ चुकी है।  रही बात कॉकरोच जनता पार्टी की तो उसका वही हश्र होना तय है जो कॉकरोच का होता है। वैसे भी उसका नियंत्रण विदेश में बैठी उन अदृश्य शक्तियों के हाथ  में है जो भारत में अराजकता फैलाना चाह रही हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी





Tuesday, 21 July 2026

दिल्ली में किसानों का जमावड़ा जंतर मंतर पर भारी पड़ सकता है



दिल्ली के जंतर मंतर पर चल रहे कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में गत दिवस संसद भवन तक छात्रों का मार्च आयोजित किया गया था। पुलिस के रोकने पर भी हज़ारों  लोग उस ओर बढ़े। संसद का सत्र भी चूंकि कल से है शुरू हुआ था लिहाजा सुरक्षा व्यवस्था काफी कड़ी थी। जब प्रदर्शनकारी अनियंत्रित होने लगे तब पुलिस द्वारा लाठी चार्ज और अश्रु गैस जैसे परंपरागत तरीके अपनाकर भीड़ को तितर - बितर किया गया। दोनों पक्षों द्वारा एक दूसरे पर आरोप लगाए जा रहे हैं। पुलिस का कहना है भीड़ द्वारा पथराव एवं सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ के बाद स्थिति बिगड़ी वहीं आंदोलन के कर्ताधर्ताओं की मानें तो पुलिस द्वारा लाठी चार्ज और अश्रु गैस छोड़े जाने से भीड़ भड़क उठी। विभिन्न वीडियो देखने पर पता चलता है कि दोनों तरफ के आरोप काफी हद तक सही हैं। भीड़ द्वारा पत्थर फेंके जाने के साथ पुलिस के वाहनों को क्षति पहुंचाए जाने के दृश्य साफ नजर आये वहीं पुलिस को भी डंडे बरसाते हुए देखा गया। ये बात पूरी तरह सच है कि सुरक्षा बल सख्ती न दिखाते  तो प्रदर्शनकारी संसद परिसर में घुसकर अकल्पनीय स्थिति उत्पन्न कर सकते थे। ये आशंका इसलिए पैदा हुई क्योंकि छात्रों के नाम पर उपद्रवी तत्व भी प्रदर्शन में शामिल थे जिनका उद्देश्य अराजकता फैलाना था। दरअसल  इस आंदोलन को गैर राजनीतिक बनाये रखने के दावे झूठे निकले जब आम आदमी पार्टी के अलावा भीम आर्मी सांसद दलित नेता चंद्रशेखर आजाद ने पहले तो धरना स्थल पर मंच साझा किया और फिर प्रदर्शन में भी मौजूद रहे। सपा सांसद डिंपल यादव ने भी उपस्थिति दर्ज कराई। योगेंद्र यादव,शबाना आज़मी अरुंधति रॉय, प्रकाश राज और स्वरा भास्कर जैसी घोषित मोदी विरोधी हस्तियां भी नजर आईं। जेएनयू से जुड़े  सरकार विरोधी संगठनों  ने तो धरना स्थल पर पहले दिन से ही कब्जा जमा लिया था। इस आयोजन के पीछे नीट परीक्षा के पर्चे लीक होने से परीक्षार्थियों में उपजी नाराजगी थी जिसके बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग जोर पकड़ती गई। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी का इस आंदोलन से जुड़ना आज तक रहस्य बना हुआ है क्योंकि उसका प्रादुर्भाव देश के मुख्य न्यायाधीश द्वारा किये एक कटाक्ष की प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ था। इसके अलावा सोनम वांगचुक का लद्दाख़ से आकर इस आंदोलन से जुड़ना भी चौंकाने वाला रहा। धीरे - धीरे यह मुहिम छात्रों के हाथ से निकालकर पेशेवर आंदोलनजीवियों के नियन्त्रण में आ गई। इसी के चलते वहाँ वही नारे गूंजने लगे जो जेएनयू परिसर की पहचान बन चुके हैं। हिंदू देवी - देवताओं का उपहास, मनुवाद को कोसते हुए जय भीम के नारे और क्रांति के नाम पर अल्लाह की तारीफ जैसी भड़काऊ बातें सुनाई दीं। देश विरोधी शर्जील इमाम और खालिद उमर को महान बताने की जुर्रत के साथ ही धारा 370 की वापसी का दंभ भरा गया। कल जो प्रदर्शन हुआ उसमें भीम आर्मी की जुटाई भीड़ छात्रों पर भारी पड़ी। इन्हीं सब कारणों से आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटक गया। सोनम वांगचुक तक सांसदों से मिलकर अनशन तोड़ने के लिए राजी हो गए। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक माइग्रेन नामक बीमारी की आड़ लेकर भूख हड़ताल से पीछे हट गए। सरकार के बुलावे पर पार्टी के दो प्रतिनिधि केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा से मिलने जा पहुंचे लेकिन रात में दोबारा जंतर मंतर पर तम्बू तानकर आंदोलन जारी रखने की डींग हाँकी गई। लेकिन अब तक ये समझ से परे है कि इस आयोजन का असली सूत्रधार कौन है? अभिजीत दीपके के भारत लौटते ही उसकी आम आदमी पार्टी से निकटता स्पष्ट हो गई थी। इसीलिए इस आंदोलन में उस पार्टी का पूरा शीर्ष नेतृत्व मौजूद रहा। यही वजह थी की कांग्रेस ने कल के प्रदर्शन से दूरी बनाये रखी। राहुल गाँधी का बयान प्रधानमंत्री के  विरुद्ध तो आया किंतु कॉकरोच जनता पार्टी की तरफदारी से वे बचे और तो और सोनम वांगचुक की मिजाजपुर्सी की जरूरत भी नहीं समझी। स्मरणीय है किसी आंदोलन की सफलता के लिए किसी या कुछ राजनीतिक पार्टियों की हिस्सेदारी जरूरी होती है जिसका इस अभियान में अभाव है। हालांकि आम आदमी पार्टी पर्दे के पीछे है, लेकिन दीपके एण्ड कम्पनी का कोई ढांचा नहीं है। ऐसे में कुछ दिन के होहल्ले के बाद इसकी वजनदारी कम होती जायेगी। सबसे खास बात ये है कि भारत - अमेरिका के बीच होने वाली व्यापार संधि  के विरोध में दिल्ली के सिंधु बॉर्डर पर किसान जमा होने लगे हैं। ऐसे में अब आंदोलन का केन्द्र जंतर मंतर से खिसक कर किसानों के धरने पर पहुँच जाए तो आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि राजनीतिक दलों और मीडिया को भी किसानों में ज्यादा रुचि होगी विशेष रूप से पंजाब विधानसभा के आगामी चुनाव को देखते हुए।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 20 July 2026

समान नागरिक संहिता विधेयक : म.प्र सरकार का साहसिक निर्णय


मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता में गत दिवस संपन्न म.प्र मंत्रीपरिषद की बैठक में यूसीसी ( समान नागरिक संहिता) विधेयक को स्वीकृति दिये जाने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि यह भाजपा के मूलभूत मुद्दों में रहा है। पार्टी द्वारा शासित अनेक राज्यों में ये पहले ही पारित किया जा चुका है। आज से प्रारंभ हुए विधानसभा के मानसून सत्र में इसे  पेश भी कर दिया गया। हालांकि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 342 और  366 (खंड 25) के तहत आने वाली भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया अनु जनजातियों पर लागू नहीं होगा। बैठक के बाद मुख्यमंत्री श्री यादव ने विधेयक पर चर्चा करते हुए कहा कि किसी भी धर्म और समुदाय के लोगों के लिए प्रदेश में सिर्फ एक ही शादी की अनुमति है। विवाह  के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं की 18 वर्ष ही रहेगी। मौखिक तलाक को पूरी तरह गैर-कानूनी माना जाएगा। शादी और तलाक का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किये जाने के साथ ही विधेयक में  हलाला जैसी प्रथा को दंडनीय अपराध माना गया है। यूसीसी में बेटों और बेटियों को संपत्ति के उत्तराधिकार में समान अधिकार दिए गए हैं। इसके अलावा मृतक बच्चे की संपत्ति में उसके परिवार के साथ ही माता-पिता भी बराबर हिस्से के अधिकारी होंगे। लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए भी अनेक शर्तें और कानूनी आवश्यकताएं पूरी करनी होंगी। जिनके उल्लंघन पर सजा और अर्थडण्ड भोगना होगा। ऐसे जोड़ों द्वारा उत्पन्न संतान अवैध नहीं कहलाएगी  , साथ ही सम्बन्ध विच्छेद पर महिला गुजारा भत्ते की अधिकारी होगी। मुख्यमंत्री श्री यादव के अनुसार  समान नागरिक संहिता को लेकर  सभी राजनीतिक दलों से सुझाव मांगे गए किंतु कांग्रेस पार्टी के प्रतिनिधि उसमें नहीं आए। उन्होंने दावा किया कि आम जनता से सुझाव मांगे जाने पर 80% मुस्लिम महिलाओं ने इसके पक्ष में अपनी राय दी। इस विधेयक को मुस्लिम विरोधी प्रचारित किये जाने के उत्तर में श्री यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से  म.प्र  में  ऐसा यूसीसी कानून लागू किया जाएगा  जिसमें  सभी धर्मावलंबियों को समान अधिकार और न्याय मिले। इस दावे के बावजूद प्रदेश विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस इस विधेयक का विरोध ही करेगी क्योंकि उसके मुताबिक  समान नागरिक संहिता की बात मुस्लिम विरोधी है। मुस्लिम धर्मगुरु भी इसे अपने पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप मानकर इसकी मुखालफत करते आये हैं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीन तलाक़ को गैर कानूनी बताये जाने के बाद इस समुदाय की महिलाओं द्वारा भी तीन तलाक़ और हलाला के विरुद्ध आवाजें उठाई जाने लगीं । लिव इन रिलेशनशिप से जुड़ी विकृतियाँ भी समस्या बड़ी सामाजिक समस्या बनती जा रही है। सबसे बड़ी बात ये है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के कारण बहुसंख्यक हिन्दू समाज में ये भावना तेजी से बढ़ती गई कि धर्मनिरपेक्ष होने की सारी जिम्मेदारी उसी के कन्धों पर है। सामाजिक कुरीतियों को मिटाने के लिए पंडित नेहरू की सरकार ने हिंदुओं में प्रचलित विवाह और उत्तराधिकार संबंधी परंपराओं को संशोधित करने के लिए तो कानून बना दिया किंतु मुस्लिम पर्सनल लॉ को छेड़ने की हिम्मत नहीं दिखा सके।  उसी भेदभाव के कारण  गंगा - जमुनी संस्कृति की अवधारणा धीरे - धीरे कमजोर पड़ती गई और बजाय अल्पसंख्यक के मुस्लिम समुदाय खुद को विशेषाधिकार संपन्न मानकर राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करने के साथ ही दबाव समूह बनने लगा। देश में जिस हिंदूवादी राजनीति का प्रादुर्भाव हुआ उसके पीछे मुस्लिम पर्सनल लॉ के नाम पर हुआ तुष्टीकरण ही प्रमुख कारण माना जाना चाहिए। हालांकि ईसाइयों के प्रति भी नरम रुख रखा गया किंतु जितनी छूट मुसलमानों को मज़हबी मामलों में मिली वह अनावश्यक ही नहीं आपत्तिजनक भी थी जिसके कारण देश में अलगाववाद को बढ़ावा मिला। स्व. राजीव गाँधी की  सरकार द्वारा शाह बानो संबंधी सर्वोच्च न्यायालय का फैसला उलटकर उसे और बढ़ावा दिया। भाजपा ने केंद्रीय सत्ता में आने के बाद से ही इस विसंगति को रोकने की दिशा में प्रयास किये तथा अपने शासन वाले अनेक प्रदेशों में समान नागरिक संहिता लागू करवाई। उसी क्रम में म.प्र सरकार ने भी जो साहस दिखाया उसके लिए वह प्रशंसा की हकदार है। विपक्ष को चाहिए इस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित करवाकर समाज को अच्छा संदेश देने में सहायक बने। 

 नागरिक संहिता विधेयक : म.प्र सरकार का साहसिक निर्णय

मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता में गत दिवस संपन्न म.प्र मंत्रीपरिषद की बैठक में यूसीसी ( समान नागरिक संहिता) विधेयक को स्वीकृति दिये जाने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि यह भाजपा के मूलभूत मुद्दों में रहा है। पार्टी द्वारा शासित अनेक राज्यों में ये पहले ही पारित किया जा चुका है। आज से प्रारंभ हुए विधानसभा के मानसून सत्र में इसे  पेश भी कर दिया गया। हालांकि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 342 और  366 (खंड 25) के तहत आने वाली भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया अनु जनजातियों पर लागू नहीं होगा। बैठक के बाद मुख्यमंत्री श्री यादव ने विधेयक पर चर्चा करते हुए कहा कि किसी भी धर्म और समुदाय के लोगों के लिए प्रदेश में सिर्फ एक ही शादी की अनुमति है। विवाह  के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं की 18 वर्ष ही रहेगी। मौखिक तलाक को पूरी तरह गैर-कानूनी माना जाएगा। शादी और तलाक का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किये जाने के साथ ही विधेयक में  हलाला जैसी प्रथा को दंडनीय अपराध माना गया है। यूसीसी में बेटों और बेटियों को संपत्ति के उत्तराधिकार में समान अधिकार दिए गए हैं। इसके अलावा मृतक बच्चे की संपत्ति में उसके परिवार के साथ ही माता-पिता भी बराबर हिस्से के अधिकारी होंगे। लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए भी अनेक शर्तें और कानूनी आवश्यकताएं पूरी करनी होंगी। जिनके उल्लंघन पर सजा और अर्थडण्ड भोगना होगा। ऐसे जोड़ों द्वारा उत्पन्न संतान अवैध नहीं कहलाएगी  , साथ ही सम्बन्ध विच्छेद पर महिला गुजारा भत्ते की अधिकारी होगी। मुख्यमंत्री श्री यादव के अनुसार  समान नागरिक संहिता को लेकर  सभी राजनीतिक दलों से सुझाव मांगे गए किंतु कांग्रेस पार्टी के प्रतिनिधि उसमें नहीं आए। उन्होंने दावा किया कि आम जनता से सुझाव मांगे जाने पर 80% मुस्लिम महिलाओं ने इसके पक्ष में अपनी राय दी। इस विधेयक को मुस्लिम विरोधी प्रचारित किये जाने के उत्तर में श्री यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से  म.प्र  में  ऐसा यूसीसी कानून लागू किया जाएगा  जिसमें  सभी धर्मावलंबियों को समान अधिकार और न्याय मिले। इस दावे के बावजूद प्रदेश विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस इस विधेयक का विरोध ही करेगी क्योंकि उसके मुताबिक  समान नागरिक संहिता की बात मुस्लिम विरोधी है। मुस्लिम धर्मगुरु भी इसे अपने पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप मानकर इसकी मुखालफत करते आये हैं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीन तलाक़ को गैर कानूनी बताये जाने के बाद इस समुदाय की महिलाओं द्वारा भी तीन तलाक़ और हलाला के विरुद्ध आवाजें उठाई जाने लगीं । लिव इन रिलेशनशिप से जुड़ी विकृतियाँ भी समस्या बड़ी सामाजिक समस्या बनती जा रही है। सबसे बड़ी बात ये है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के कारण बहुसंख्यक हिन्दू समाज में ये भावना तेजी से बढ़ती गई कि धर्मनिरपेक्ष होने की सारी जिम्मेदारी उसी के कन्धों पर है। सामाजिक कुरीतियों को मिटाने के लिए पंडित नेहरू की सरकार ने हिंदुओं में प्रचलित विवाह और उत्तराधिकार संबंधी परंपराओं को संशोधित करने के लिए तो कानून बना दिया किंतु मुस्लिम पर्सनल लॉ को छेड़ने की हिम्मत नहीं दिखा सके।  उसी भेदभाव के कारण  गंगा - जमुनी संस्कृति की अवधारणा धीरे - धीरे कमजोर पड़ती गई और बजाय अल्पसंख्यक के मुस्लिम समुदाय खुद को विशेषाधिकार संपन्न मानकर राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करने के साथ ही दबाव समूह बनने लगा। देश में जिस हिंदूवादी राजनीति का प्रादुर्भाव हुआ उसके पीछे मुस्लिम पर्सनल लॉ के नाम पर हुआ तुष्टीकरण ही प्रमुख कारण माना जाना चाहिए। हालांकि ईसाइयों के प्रति भी नरम रुख रखा गया किंतु जितनी छूट मुसलमानों को मज़हबी मामलों में मिली वह अनावश्यक ही नहीं आपत्तिजनक भी थी जिसके कारण देश में अलगाववाद को बढ़ावा मिला। स्व. राजीव गाँधी की  सरकार द्वारा शाह बानो संबंधी सर्वोच्च न्यायालय का फैसला उलटकर उसे और बढ़ावा दिया। भाजपा ने केंद्रीय सत्ता में आने के बाद से ही इस विसंगति को रोकने की दिशा में प्रयास किये तथा अपने शासन वाले अनेक प्रदेशों में समान नागरिक संहिता लागू करवाई। उसी क्रम में म.प्र सरकार ने भी जो साहस दिखाया उसके लिए वह प्रशंसा की हकदार है। विपक्ष को चाहिए इस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित करवाकर समाज को अच्छा संदेश देने में सहायक बने। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 18 July 2026

वांगचुक को बलि का बकरा बनाया काॅकरोच जनता पार्टी ने



इसका संकेत तो गुरुवार को ही मिल गया था जिस दिन दिल्ली उच्च न्यायालय ने सरकार को निर्देशित किया था कि वह  दिल्ली के जंतर मंतर पर अनशनरत लद्दाख़ की चर्चित शख्सियत सोनम वांगचुक का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण करवाए और जरूरत होने पर उनकी चिकित्सा का प्रबंध भी करे। उल्लेखनीय है नीट परीक्षा के पर्चे लीक होने के बाद सोशल मीडिया पर धूमकेतु की तरह उभरी काॅकरोच जनता पार्टी द्वारा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग को लेकर लगातार किये जा रहे आंदोलन का जब कोई प्रभाव नहीं पड़ा तब राजधानी दिल्ली में जंतर मंतर पर श्री वांगचुक को अनशन पर बिठा दिया गया। लद्दाख़ को पूर्ण राज्य बनाये जाने की मांग को लेकर वे आंदोलन का नेतृत्व करते रहे हैं और कुछ महीनों तक जेल में भी रहे। लेकिन ये बात संदेहों को जन्म देती है कि अमेरिका में बैठे अभिजीत दीपके नामक व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर काॅकरोच जनता पार्टी नामक एक संगठन की घोषणा की और देखते - देखते ही उसके साथ लाखों अनुयायी जुड़ते चले गए। उसके बाद जब वह भारत लौटा तब एक वर्ग विशेष ने उसे मसीहा बनाना चाहा किंतु दिल्ली आने के कुछ घंटों बाद ही जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन  ने काॅकरोच जनता पार्टी के ढोल की पोल खोल दी। अभिजीत को लगा था कि देश का युवा उन्हें हाथों - हाथ लेगा। लेकिन दिल्ली के अलावा भी वे जहाँ - जहाँ गए उनके आयोजन फ्लॉप शो साबित हुए। अंततः दिल्ली में अनशन का फैसला लिया गया और बजाय खुद मैदान संभालने के श्री वांगचुक को अनशन पर बिठा दिया। अभिजीत समझ चुके थे कि उनके नाम में वह आकर्षण नहीं है लिहाजा वांगचुक के कंधे पर बन्दूक रखकर निशाना लगाना चाहा। लेकिन ये दाँव भी कारगर नहीं रहा। जेएनयू और  कुछ ढपलीबाज   वामपंथी छात्रों को छोड़कर न तो वे युवा आये जिनके लिए वांगचुक को भूखा रखा गया और न आम जनता। राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने अनशन स्थल पर आकर मगरमच्छी आँसू तो खूब बहाये लेकिन मैदानी समर्थन नहीं दिया। यही वजह रही कि आंदोलन न गति पकड़ सका और न ही उसकी कोई दिशा ही स्पष्ट हुई। शिक्षा मंत्री का त्यागपत्र मांगने से हटकर जंतर मंतर में टुकड़े - टुकड़े  गैंग के देश विरोधी नारे गूंजने लगे। असल में इस आंदोलन को फुस्स करवाने में सभी प्रमुख विपक्षी दलों की भूमिका रही। अरविंद केजरीवाल भले ही श्री वांगचुक को शिक्षा मंत्री बनाये जाते जाने की मांग कर अपने को उनका हितैषी साबित करना चाह रहे हों लेकिन। उनकी पार्टी भी नहीं चाहती कि काॅकरोच जनता पार्टी उसका विकल्प बन जाए। आज पुलिस ने श्री वांगचुक को उठाकर अस्पताल भेज दिया जिसके बाद अब अभिजीत दीपके ने अनशन करने का ऐलान कर दिया। लेकिन नीट परीक्षा का परिणाम घोषित होने से इस आंदोलन की धार पहले ही कमजोर पड़ चुकी है। सोमवार से संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है। विपक्षी पार्टियां  उसमें सरकार को घेरकर राजनीतिक फ़ायदा उठाना चाहेंगी। इसीलिए उन्होंने इस आंदोलन को दिखावटी समर्थन तो दिया किंतु  जंतर मंतर की सीमा से बाहर नहीं आने दिया। सरकार पर अनशन की उपेक्षा का जो आरोप है उसमें दम इसलिये नहीं है क्योंकि काॅकरोच जनता पार्टी अभी तक संगठित स्वरूप नहीं ले सकी। और श्री वांगचुक का इस आंदोलन से जुड़ना भी अप्रासंगिक था। उनकी छवि  आंदोलनजीवी की बन जाने से वे मीडिया की सुर्खियों में सिमटकर रह गये। रही - सही कसर पूरी कर दी जेएनयू के छात्र - छात्राओं ने जो बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बनकर समूचे आंदोलन पर अतिक्रमण कर बैठे। हिंदू देवी - देवताओं का अपमान करने वाले एक स्टैंड अप कामेडियन ने भी आंदोलन को पलीता लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सच कहें तो काॅकरोच जनता पार्टी ने एक अच्छे भले मुद्दे का कचरा कर दिया। स्मरणीय है किसान आंदोलन अपने साथ देश भर के किसानों को नहीं जोड़ पाने के कारण अपनी मौत मर गया था, वहीं शाहीन बाग का धरना भी अंततः फुस्स होकर रह गया। ठीक वैसे ही ये आंदोलन भी अधोगति को प्राप्त हो रहा है  ये कहना गलत नहीं होगा कि काॅकरोच जनता पार्टी ने सोनम वांगचुक की जान खतरे में डालकर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने की जो चाल चली थी वह उल्टी पड़ गई और अभिजीत दीपके का नौ नौसिखियापन भी उजागर हो गया। 

-रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 17 July 2026

बांग्लादेश के साथ जैसे को तैसा की नीति अपनानी चाहिए



बांग्लादेश से रिश्ते सुधरने की उम्मीदें धीरे - धीरे खत्म होती जा रही हैं।  चीन को मोंगला बंदरगाह के समीप इकौनोमिक ज़ोन के  विकास का काम सौंपने के बाद  गत दिवस उसने भारतीय सीमा से बेहद नजदीक स्थित तीस्ता परियोजना भी उसको सौंप दी जो इसके लिए उसे 7 हजार डॉलर का ऋण देगा। भारत ने इसके लिए 9 हजार करोड़ का प्रस्ताव दिया था। ऐसा ही मोंगला परियोजना को लेकर हुआ था। उल्लेखनीय है शेख हसीना के शासनकाल में भारत और बांग्लादेश के रिश्ते काफी सुधर गए थे। यद्यपि कट्टरपंथी मुस्लिम वहाँ रह रही हिन्दु आबादी पर अत्याचार करने से बाज नहीं आते थे। मंदिरों सहित हिंदुओं के धर्मस्थलों पर हमले आम बात थी। बावजूद इसके सरकारी स्तर पर संवाद बना रहा और अनेक लंबित विवाद भी सुलझे । लेकिन हसीना  का तख्ता उलटने के बाद स्थितियाँ पूरी तरह बिगड़ गईं। दरअसल उनको भारत में। पनाह दिये जाने से बांग्ला देश की अंतरिम सरकार के मुखिया मो. युनुस को बहाना मिल गया। हालांकि उनका झुकाव पहले से ही चीन की तरफ था। लेकिन चुनाव के बाद जब तारिक रहमान भारी बहुमत से प्रधानमंत्री बने तब शुरुआत में ये लगा था कि संभवतः बांग्लादेश दोबारा भारत के साथ सम्बन्ध सुधारेगा। लेकिन शेख हसीना का भारत में बने रहना आड़े आ गया। उनकी गैर मौजूदगी में ही उन्हें मृत्युदंड सुनाया जा चुका है। बांग्लादेश सरकार लगातार उनकी वापसी के लिए दबाव बनाती रही है जिसे भारत ने नजरंदाज कर दिया। जाहिर है इससे उसकी नाराजगी बढ़ी होगी। हालांकि अपने जन्म के कुछ बरस बाद शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या होने के बाद से बांग्लादेश में बैठे सभी शासक भारत से दुश्मनी की राह पर चले। हसीना के कार्यकाल को जरूर अपवाद कहा जा सकता है। लेकिन उसके बाद से ये देश भारत विरोधी ताकतों से जुड़ने लगा। बांग्लादेश के नये शासक  तारिक रहमान लंबे समय तक विदेश में रहे हैं। इसीलिए उनसे उम्मीद रही कि वे कट्टरता को त्यागकर भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के साथ संबंध कायम करने आगे आयेंगे। लेकिन चीन के साथ किये ताजा  समझौतों से ये साफ हो चला है कि वे भी अपने मरहूम  पिता और माँ की तरह से ही भारत विरोध की मानसिकता के वशीभूत हैं। यद्यपि हाल ही में शेख हसीना ने ये कहते हुए सबको चौंका दिया था कि वे आगामी दिसम्बर माह में ढाका लौटकर अदालत के समक्ष आत्म समर्पण करते हुए फांसी की सजा रद्द करने की अपील करेंगी। उसके बाद ऐसा लगा था कि दोनों देशों के रिश्तों में चली आ रही तल्खी दूर होने लगी है। लेकिन तारिक रहमान द्वारा चीन की यात्रा और फिर दो महत्वपूर्ण परियोजनाओं के विकास हेतु भारत के प्रस्तावों को ठुकराते हुए चीन की गोद में बैठ जाने के बाद इस बात में कोई शंका नहीं रह गई है कि हमारा ये पड़ोसी भी हमारे दुश्मनों के साथ मिल गया है। तीस्ता परियोजना भारत की सीमा से महज 20 - 22 कि.मी दूर होने से हमारी सुरक्षा के लिए खतरा है। सिलिगुड़ी कारीडोर वैसे भी बेहद संवेदनशील माना जाता है। प. बंगाल में भाजपा सरकार बन जाने के बाद बांग्लादेश सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने के अभियान में तेजी के अलावा घुसपैठियों को वापस भेजने जैसी कारवाई से बांग्लादेश भन्नाया हुआ है। असम की भाजपा सरकार भी अवैध घुसपैठ को रोकने के लिए बेहद आक्रामक है। चीन के साथ तारिक रहमान सरकार रक्षा समझौते भी कर रही है। निश्चित रूप से उसके ताजा कदम विशुद्ध रूप से भारत विरोधी मोर्चेबंदी ही है। आश्चर्य तो तब होता है जब बांग्लादेश उस पाकिस्तान के साथ गलबहियाँ करने में भी नहीं हिचकता जिसने उसकी जनता पर अमानुषिक अत्याचार किये थे। पाकिस्तान के कब्जे से से उसे मुक्त करने में भारत ने जो सैन्य कारवाई की और करोड़ों बांग्लादेशियों को शरण दी उसके प्रति कृतज्ञता की बजाय बांग्लादेश भारत के साथ हर वह हरकत करने पर आमादा है जो किसी शत्रु देश के साथ की जाती है। ऐसे में भारत को उसके साथ किसी भी प्रकार की सहानुभूति रखने से बचते हुए कड़ाई से पेश आना चाहिए क्योंकि चीन का वहाँ बैठना हमारी सुरक्षा के लिए चिंता पैदा करने वाला है। सबसे बड़ा कदम उन घुसपैठियों की वापसी का उठाया जाए जो हमारी अर्थव्यवस्था पर बोझ के साथ ही आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बने हुए हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी