कांग्रेस कार्यसमिति ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम के केवल दो पद ही गाने का प्रस्ताव गत दिवस पारित कर दिया। उसका कहना है कि 1937 में भी पार्टी द्वारा वंदे मातरम के प्रारंभिक दो पद ही गाने का निर्णय तमाम बड़े नेताओं की उपस्थिति में किया गया था। और उसी के आधार पर आजादी के बाद जब संविधान बना तब गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा रचित जन गण मन को राष्ट्रगान घोषित किया गया। वहीं वंदे मातरम को राष्ट्रगीत की मान्यता देते हुए उसके शुरुआती दोनों पद गाने पर सहमति बनी। तब से अभी तक यही परिपाटी चली आ रही थी । सरकारी आयोजनों में राष्ट्रगीत होने के साथ ही वंदे मातरम का गायन अनिवार्य नहीं था। लेकिन मानसून सत्र में संसद ने इसे भी राष्ट्रगान के समकक्ष मान्यता देते हुए ये कानून पारित कर दिया कि वंदे मातरम का गायन राष्ट्रगान के पहले होगा। इसके सभी छंद गाये जाएंगे और इस दौरान सभी खड़े रहेंगे। नये कानून के अनुसार वंदे मातरम का अपमान दंडनीय अपराध होगा। लेकिन कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने तो सार्वजनिक रूप से कहा है कि इस्लाम का अनुयायी होने से उन्होंने वंदे मातरम न कभी गाया , न कभी गाएंगे। ऐसे ही बयान कुछ मुस्लिम संगठनों के नेताओं ने भी दिये। इसका कारण राष्ट्रगीत के दो पदों के बाद के हिस्से में हिन्दू देवियों का महिमामंडन है। निजी तौर पर किसी व्यक्ति का अपनी धार्मिक मान्यताओं के वशीभूत ऐसा करने का औचित्य एक बार स्वीकार कर भी लिया जाए लेकिन एक राजनीतिक दल जिसकी आजादी की लड़ाई में अग्रणी भूमिका रही हो , वह उस गीत के पूरे हिस्से से दूरी बनाते हुए केवल दो पदों को ही मान्य करे तब वह उस भावना का भी अपमान है जिसमें डूबकर स्वाधीनता सेनानी वंदे मातरम गाते थे। रही बात धार्मिक मान्यताओं की तो मुस्लिम धर्मावलंबियों के मुताबिक वे केवल अल्लाह की ही जयकार कर सकते हैं। उस दृष्टि से तो राष्ट्रध्वज तिरंगे का अभिवादन करने के साथ ही भारत माता की जय बोलना भी इस्लामी मान्यताओं के विरुद्ध है। उल्लेखनीय है मुस्लिम लीग ने स्वाधीनता के पहले भी वंदे मातरम का विरोध किया था। अब सवाल ये है कि कांग्रेस की देखासीखी अन्य पार्टियां भी कोई कारण बताकर वंदे मातरम के साथ ही राष्ट्रगान जन गण मन को पूरा गाने से इंकार करते हुए उसमें मनमाफिक संशोधन करने का प्रस्ताव पारित करें तब क्या ऐसा करने की छूट उन्हें दी जानी चाहिए? कुछ प्रदेशों ने तो राष्ट्रध्वज के साथ ही अपना अलग झंडा भी बना लिया जिस पर विवाद छिड़ा था। गौरतलब है हमारे संविधान तक में हिंदू देव पुरुषों और पौराणिक प्रतीक चिन्हों के चित्र हैं। सरकार के अनेक संस्थानों के ध्येय वाक्य वैदिक मंत्रों पर आधारित हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की समाधि पर भी हे राम लिखा गया है। ये देखते हुए कांग्रेस द्वारा वंदे मातरम को लेकर जो प्रस्ताव पारित किया गया वह अनावश्यक भी है और आपत्तिजनक भी। हमारे देश में अनेक ऐसी क्षेत्रीय पार्टियां हैं जो संघीय ढांचे की अवधारणा का विरोध करती हैं। द्रमुक के एक नेता ने तो यहाँ तक धमकी दे डाली थी कि राष्ट्रभाषा के नाम पर हिन्दी लादे जाने पर तमिलनाडु अलग देश बन जाएगा। पूर्वोत्तर में सक्रिय रहे अनेक अलगाववादी संगठन भी देश से अलग होने की धमकी देते रहे हैं। जम्मू कश्मीर में धारा 370 रहते तक अलगाववाद की भावना चरम पर थी। ऐसे में यदि कांग्रेस जैसी देश की सबसे पुरानी पार्टी राष्ट्रगीत जैसे राष्ट्रीय सम्मान के प्रतीक को आधा - अधूरा स्वीकार करे तो इससे उन ताकतों का हौसला बुलंद होता है जिन्हें भारत को माँ कहने में शर्म आती है। कांग्रेस के इस फैसले के राजनीतिक स्तर पर होने वाले विरोध से परे हटकर देखें तो ये एक खतरनाक सोच को बढ़ावा देने वाला है। जल्द ही पंजाब में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं जहाँ खालिस्तान समर्थक सिर उठा रहे हैं। दिल्ली में हुए किसान आंदोलन के दौरान लालकिले पर राष्ट्रध्वज के स्थान पर एक धार्मिक झंडा लगाए जाने का दुस्साहस तक किया गया। अरुंधती रॉय जैसे लोग आज भी जम्मू कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानते। जेएनयू के वामपंथी छात्र संगठन आजादी - आजादी का जो नारा लगाते हैं वह भी अलगाववाद से प्रेरित ही है। ऐसे में कांग्रेस को वंदे मातरम में कांट- छांट करने जैसा प्रस्ताव पारित करने के पहले उसके संभावित नुकसान के बारे में सोचना चाहिए था। महज इसलिए कि भाजपा सरकार ने उसके बारे में कानून बनाकर उसे सम्मान दिया, उसका विरोध करना बेहद गैर जिम्मेदाराना निर्णय है। यदि किसी को अपने धार्मिक बंदिशों के चलते राष्ट्रगीत गाने में ऐतराज है तो ये उसका निजी मामला हो सकता है लेकिन एक राजनीतिक पार्टी ऐसा सोचे तो ये राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध होगा। कांग्रेस को इससे राजनीतिक नुकसान होगा सो अलग।
- रवीन्द्र वाजपेयी