Saturday, 2 May 2026

पेट्रोल - डीजल के दाम बाजार से जोड़ने के साथ ही उन्हें जीएसटी के दायरे में लाएं


ईरान संकट के कारण उत्पन्न हालातों में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ना स्वाभाविक है। पूरी दुनिया इससे प्रभावित हो तब भारत का  अछूता रहना नामुमकिन है जो अपनी ज़रूरत का 85 फीसदी आयात करता है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के कारण केंद्र सरकार ने पेट्रोल , डीजल और रसोई गैस के दाम नहीं बढ़ाए किंतु जैसे ही मतदान पूरा हुआ वैसे ही पहला झटका दिया कमर्शियल गैस सिलेंडर की मूल्य वृद्धि के रूप में और वह भी लगभग 1 हजार प्रति सिलेंडर। आम जनता की नाराजगी से बचने फिलहाल घरेलू रसोई गैस सिलेंडर के दाम नहीं बढ़े और डीजल - पेट्रोल की मूल्यवृद्धि भी रोककर रखी गई है। लेकिन  कमर्शियल गैस के बढ़े दाम का असर भी अप्रत्यक्ष रूप से जनता पर पड़े बिना नहीं रहेगा। हालांकि सरकार की ओर से घुमा - फिराकर कहा जा रहा है कि ईरान  संकट से पेट्रोलियम कंपनियों को काफी घाटा हो रहा है किंतु इस मामले में वह अपराध बोध से ग्रस्त है। क्योंकि बीते कुछ सालों में रूस से मिले सस्ते कच्चे तेल के कारण पेट्रोलियम कंपनियों ने भरपूर मुनाफा बटोरा।  अंतर्राष्ट्रीय मूल्य निचले स्तर पर रहने से भी सरकारी तेल कंपनियों का खजाना खूब भरा। चूंकि उसका लाभ उपभोक्ताओं को देने से परहेज किया गया इसलिए जब ईरान युद्ध के चलते  कच्चे तेल और गैस की कीमतें चढ़ीं तब सरकार के पास दाम बढ़ाने का कोई औचित्य या यूं कहें कि नैतिक आधार नहीं है। लेकिन तमाम वित्तीय संस्थान ये संभावना जता रहे हैं कि यदि खाड़ी में संकट जारी रहा और होर्मुज में चल रही नाकेबंदी जारी रही तब चाहे - अनचाहे पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस महंगी करनी ही होगी। जनता भी परिस्थितियों का तकाजा समझ रही है। लेकिन इस बारे में दो बातें हैं जिन पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। पहली ये कि वाजपेयी सरकार के समय पेट्रोल - डीजल की कीमतों को बाजार के उतार - चढ़ाव से जोड़ने की जो व्यवस्था हुई उसे दोबारा प्रारम्भ किया जाए। हालांकि उसी सरकार ने चुनाव आते ही मतदाताओं की नाराजगी से बचने उस पर रोक लगाकर दाम स्थिर रखे। मौजूदा केंद्र सरकार ने प्रारंभ में उस प्रथा को दोबारा लागू करने का साहस दिखाया। उसके अंतर्गत जैसे ही मूल्य घटते या बढ़ते उसी के अनुसार उपभोक्ता को भी उनकी खरीदी करनी पड़ती। आम तौर पर ये घटा - बढ़ी 1 रुपए के भीतर होने से असहनीय नहीं लगती थी किंतु अज्ञात कारणों से उस व्यवस्था को फिर निलंबित कर दिया गया। जिसके कारण कीमतें तो स्थिर रखी गईं किंतु जब वैश्विक स्तर पर कच्चा तेल सस्ता हुआ तब उसका लाभ उपभोक्ता को देने से बचा गया। कुछ समय तक तो पिछले घाटे की पूर्ति का बहाना समझ में आता  है लेकिन उसकी भरपाई के बाद भी पेट्रोलियम कंपनियों द्वारा पूरा मुनाफा हड़पने की नीति समझ से परे है। दूसरी बात जीएसटी से अभी तक पेट्रोलियम पदार्थों को बाहर रखना है। यदि अन्य उपभोक्ता वस्तुओं जैसी जीएसटी की दर डीजल - पेट्रोल और रसोई गैस पर निश्चित कर दी जाए तब इनके दाम काफी नीचे आ जाएंगे। शुरुआत में तो उससे सरकार के राजस्व में कमी परिलक्षित होगी किंतु जिस तरह गत वर्ष किए गए बदलाव के बावजूद सरकार को हर माह मिलने वाली जीएसटी वसूली में खास फर्क नहीं आया वैसे ही पेट्रोल - डीजल आदि को जीएसटी के दायरे में लाने पर आम जनता को होने वाली बचत अंततः बाजार में ही आएगी जिससे जीएसटी वसूली का संतुलन बना रहेगा। कमर्शियल गैस सिलेंडर के दाम तकरीबन 1 हजार रुपए बढ़ा देने के बाद ये आशंका बढ़ चली है कि 4 मई के बाद पेट्रोल - डीजल और घरेलू रसोई गैस की कीमतों में भी वृद्धि होगी। विपक्षी दल तो काफी पहले से कहते आ रहे हैं कि ईरान संकट के बावजूद दाम नहीं बढ़ाकर सरकार कोई मेहरबानी नहीं कर रही अपितु वह पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान जनता के गुस्से से बचना चाह रही है। ये सब देखते हुए उचित तो यही होगा कि पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस को बाजार के उतार - चढ़ाव से जोड़कर उनकी कीमतों में पारदर्शिता लाने के साथ ही उन्हें जीएसटी के अंतर्गत लाकर अनाप - शनाप करों के बोझ को कम करने की ईमानदारी दिखाई जाए। ये बात सही है आर्थिक अनुशासन को लागू करने में चुनावी नफा - नुकसान आड़े आते हैं किंतु  देश को वाकई आर्थिक महाशक्ति बनाना है तब ऐसे निर्णय लेने ही होंगे जिनमें कड़ाई और व्यवहारिकता का समन्वय हो। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 1 May 2026

4 मई के बाद राष्ट्रीय राजनीति में बनेंगे नए समीकरण


पांच राज्यों के  चुनाव परिणाम आने में अभी दो दिन बाकी हैं। सभी पार्टियां बढ़ - चढ़कर दावे कर रही हैं।  इन परिणामों का राष्ट्रीय राजनीति पर क्या प्रभाव होगा इसे लेकर राजनीति के पंडितों में विमर्श प्रारंभ हो गया है। इसके दो संकेत गत दिवस मिले जब त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को समर्थन दिए जाने के सवाल पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने तो समय आने पर विचार करने की बात कही वहीं सीपीआई के एक प्रवक्ता ने टीवी चैनल पर इस संभावना को पूरी तरह नकार दिया। इसी तरह की परिस्थिति तमिलनाडु में भी उत्पन्न हो सकती है जहां अभिनेता विजय की पार्टी टी.वी.के को अप्रत्याशित सफलता मिलने का अनुमान लगाकर एक्सिस माय इंडिया नामक  एजेंसी ने सनसनी फैला दी। उसके बाद ही तमिलनाडु में राजनीति के खिलाड़ी ये गुणा - भाग करने में व्यस्त हो गए कि  किसी को बहुमत नहीं मिला और विजय की पार्टी सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी तब क्या स्टालिन उनको सत्ता पर बिठाएंगे या अन्न द्रमुक गठबंधन उनकी ताजपोशी करवाएगा? केरलम  में त्रिशंकु की हल्की ही सही किंतु कुछ उम्मीद अभी भी वामपंथी खेमे के मन में है किंतु प्रश्न ये भी उठता है कि उस स्थिति में समर्थन कौन देगा क्योंकि एन.डी.ए का समर्थन न तो एल.डी.एफ को रास आयेगा और न ही कांग्रेस वाला यू.डी.एफ उसे हजम कर पाएगा। इस चुनाव में तमिलनाडु में सत्ताधारी द्रमुक के साथ कांग्रेस और वामपंथी दलों के  अलावा मुस्लिम लीग सहित छोटे - छोटे क्षेत्रीय दल हैं। उस दृष्टि से इसे इंडिया गठबंधन का रूप कहा जा सकता है। लेकिन प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के विरुद्ध वामपंथी तो मोर्चा खोलकर बैठे ही कांग्रेस भी एकला चलो की नीति के साथ लड़ी। राहुल गांधी ने तो ममता बैनर्जी पर आरोप तक लगा दिया कि उनके कुशासन के चलते ही राज्य में भाजपा का सितारा चमका। वहीं केरल में वामपंथी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए कांग्रेस ने कोई कसर नहीं छोड़ी।  हालांकि लोकसभा चुनाव के बाद ही इंडिया गठबंधन बिखरा - बिखरा सा है और विपक्षी एकता स्थानीय मुद्दों एवं समीकरणों के आधार पर निर्भर हो गई। मसलन हरियाणा में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को जरा भी भाव नहीं दिया। उसके बाद दिल्ली में दोनों के बीच तलवारें खिंचीं। लेकिन रोचक बात ये रही कि ममता बैनर्जी ने तृणमूल की तरफ से शत्रुघ्न सिन्हा को आम आदमी पार्टी के प्रचार के लिए भेजा जबकि सपा अध्यक्ष अखिलेश  यादव ने खुद अरविंद केजरीवाल के पक्ष में सभाएं लीं। बिहार में भी कांग्रेस और तेजस्वी यादव के महागठबंधन ने विपक्ष की अन्य पार्टियों को भाव नहीं दिया। प. बंगाल में तृणमूल, वामपंथी और कांग्रेस के अलग - अलग लड़ने से विपक्षी एकता का गुब्बारा पूरी तरह फूट गया। रही - सही कसर पूरी कर दी तेजस्वी, केजरीवाल और अखिलेश द्वारा तृणमूल कांग्रेस के समर्थन में सभाएं लेकर। जो संकेत हैं उनके अनुसार यदि सुश्री बैनर्जी के हाथ से सत्ता खिसक जाती है तब वे वामपंथियों के साथ ही कांग्रेस को भी गरियाएंगी। इसी तरह केरलम की सत्ता गंवाने के बाद वामपंथी कांग्रेस पर गुस्सा उतारेंगे। इन चुनावों के बाद  विपक्ष का चेहरा कौन बनेगा इस पर भी खींचतान होना तय है क्योंकि यदि ममता बैनर्जी ने सत्ता बचा ली तब  उनकी वजनदारी स्वाभाविक रूप से बढ़ेगी और तमाम छोटे - छोटे दल राहुल गांधी को किनारे कर उनके पीछे खड़े हो जाएंगे। वहीं केरलम में जीत मिलने के बाद कांग्रेस राहुल गांधी को एक बार फिर महिमामंडित करने में जुट जाएगी। हालांकि सुश्री बैनर्जी सरकार नहीं बना सकीं तब भी वे श्री गांधी के नेतृत्व को स्वीकार कर सकेंगी ये संदिग्ध है। और उस स्थिति में भाजपा और कांग्रेस दोनों के विरोध में तीसरे मोर्चे की वापसी तो हो सकती है। यद्यपि वामपंथी उसमें शामिल होंगे इसमें संदेह है क्योंकि उनकी ममता से कुढ़न जगजाहिर है। स्टालिन भी कांग्रेस को नहीं छोड़ सकते। केरलम की हार के बाद वामपंथी भी राहुल के नेतृत्व को कितना स्वीकार करेंगे ये कह पाना मुश्किल है । कुल मिलाकर 4 मई के बाद देश में विपक्षी राजनीति में नए समीकरण देखने मिलेंगे। यदि भाजपा  प. बंगाल पर झण्डा गाड़ने में कामयाब हो गई तब अन्य दलों से नेता आकर उसके साथ जुड़ेंगे। जिसकी बानगी राघव चड्ढा सहित आम आदमी पार्टी के 6 सांसद दे चुके हैं। खबर तो ये भी है कि ममता सरकार हटी तो तृणमूल में भी भगदड़ मचेगी।  कल रात आए एक एग्जिट पोल के बाद इसकी आशंका और बढ़ गई है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 30 April 2026

पूर्वानुमानों से काफी मिलते - जुलते हैं एग्जिट पोल



गत दिवस प. बंगाल में दूसरे चरण का मतदान संपन्न होते ही पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो गई। उसके बाद से ही एग्जिट पोल आने लगे जो कि काफी कुछ अपेक्षित ही हैं। मसलन प. बंगाल में ज्यादातर एजेंसियों ने भाजपा सरकार बनने की संभावना जताई है। इक्का - दुक्का अभी भी ममता बैनर्जी द्वारा चौका लगाए जाने की भविष्यवाणी कर रहे हैं। एक्सिस माय इंडिया ने पहले चरण वाली 152 सीटों का जो एग्जिट पोल जारी किया उसके अनुसार 2021 की स्थिति उलट रही है। अर्थात भाजपा 100 के करीब और तृणमूल कांग्रेस 50 के इर्द - गिर्द रहेगी। कल हुए 142 सीटों के मतदान का एग्जिट पोल सम्भवतः आज जारी होगा। लोकसभा चुनाव में एग्जिट पोल  गलत निकलने के कारण उक्त एजेंसी के संचालक प्रवीण गुप्ता को काफी आलोचना झेलनी पड़ी। उसके बाद के सभी चुनावों में उन्होंने  पर्याप्त समय लिया। बिहार में भी उनका एग्जिट पोल एक दिन बाद ही जारी हुआ था। आज एक्सिस माय इंडिया का बचा हुआ एग्जिट पोल भी यदि भाजपा को बहुमत मिलने की बात कहता है तब फिर सुश्री बैनर्जी के लिए ये बहुत बड़ा धक्का होगा। असम के बारे में तो किसी को संदेह था ही नहीं कि  हिमंता बिस्वा सर्मा की सरकार बड़े बहुमत के साथ लौटेगी। सभी एग्जिट पोल एक स्वर से उसकी पुष्टि कर रहे हैं। केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में भाजपा के गठबंधन वाली एनडीए की सरकार  दोबारा बनने की संभावना भी आश्चर्यचकित नहीं कर रही। इसी तरह केरल में वाम मोर्चे की सरकार को हटाकर 10 साल बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ की वापसी भी सुनिश्चित मानी जा रही थी। लेकिन पड़ोसी राज्य तमिलनाडु में तमिल फिल्मों के लोकप्रिय अभिनेता विजय द्वारा बनाई गई पार्टी ने मैदान में उतरकर अनिश्चितता पैदा कर दी। हालांकि ज्यादातर एग्जिट पोल सत्तारूढ़ द्रमुक के नेतृत्व वाली स्टालिन सरकार के लौटने की भविष्यवाणी कर रहे हैं लेकिन एक्सिस माय इंडिया ने विजय की पार्टी के सबसे बड़े दल के तौर पर उभरने की भविष्यवाणी कर सनसनी मचा दी है । इस पोल के अनुसार तमिलनाडु में त्रिशंकु विधानसभा बनने जा रही है। यदि वाकई ऐसा हुआ तब विजय , द्रमुक को साथ लेंगे या अन्ना द्रमुक - भाजपा गठबंधन के साथ गठजोड़ करेंगे,  ये सवाल राजनीतिक विश्लेषकों को परेशान कर रहा है। विजय की नई - नवेली पार्टी यदि सत्ता में आ गई तब 6 दशक बाद तमिलनाडु में उस द्रविड़ राजनीति का वर्चस्व समाप्त होगा जो पेरियार रामास्वामी से अन्ना दौरई, करुणानिधि, एम. जी रामचंद्रन और जयललिता से होते हुए स्टालिन तक निर्बाध चली आ रही है। द्रमुक के विभाजन के बाद  अन्ना द्रमुक बनी किंतु प्रदेश की राजनीति पर इन दोनों का ही कब्जा बना रहा। यदि विजय ने इसे तोड़ा तो वह इस राज्य की राजनीति की दिशा बदल सकता है क्योंकि वैसा होने पर भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां अपना जनाधार बढ़ाने में सक्षम होंगी जो उक्त दोनों दलों की पिछलग्गू बनने के लिए मजबूर हैं। हालांकि विजय के हाथ में सत्ता जाने की बात गले नहीं उतर रही किंतु तमिलनाडु की जनता द्रमुक और अन्ना द्रमुक से ऊबकर किसी नए विकल्प का चयन कर ले तो ये इस राज्य के लिए शुभ संकेत होगा। लौटकर प. बंगाल की चर्चा करें तो ये बात तो हर कोई मान रहा है कि पहले तो भाजपा ने ममता बैनर्जी को बुरी तरह घेरकर मुकाबले के इकतरफा होने की आशंका को नष्ट किया और फिर  आक्रामक रणनीति के सहारे तृणमूल के चुनाव प्रबंधन की जड़ों को कमजोर  किया।  सुश्री बैनर्जी ने मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण को मुद्दा बनाकर लड़ाई कोलकाता बनाम केंद्र करने की भरसक कोशिश की किंतु जिस तरह बिहार में लालू प्रसाद यादव के जंगल राज की खौफनाक यादें ताजा कर  भाजपा ने तेजस्वी यादव को पटकनी दे दी ठीक वही रणनीति अपनाकर  प.बंगाल में महिला सुरक्षा और तृणमूल की गुंडागर्दी के मुद्दे को गर्माकर बदलाव की भावना को लोगों के दिल में बिठाया। रही - सही कसर पूरी हो गई केंद्रीय बलों की तैनाती से जिसके कारण मतदाताओं को आतंकित कर मतदान करने से रोकने जैसी हरकतों पर नियंत्रण लग सका। बहरहाल अब तो मतदान हो चुका और 4 मई की सुबह तक अनुमानों के घोड़े दौड़ते रहेंगे किंतु जैसा कि ज्यादातर एग्जिट पोल बता रहे हैं यदि प. बंगाल में ममता सरकार को हटाकर भाजपा अपना झंडा फहराने में कामयाब हुई तब राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी और उनके मुख्य रणनीतिकार अमित शाह का कद और ऊंचा हो जाएगा। जिसका प्रभाव अगले वर्ष होने वाले उ.प्र, पंजाब और गुजरात विधानसभा के चुनाव पर पड़ना तय है। तृणमूल के हाथ से सत्ता खिसकने से अखिलेश यादव का हौसला भी पस्त होगा। वहीं कांग्रेस के हाथ केरल की सत्ता आने से वह इंडिया गठबंधन से बाहर निकलकर एकला चलो की नीति अपनाएगी। वैसे भी अब इस गठबंधन में कोई दम नहीं बची है। एक लिहाज से अच्छा ही होगा यदि क्षेत्रीय पार्टियों के चंगुल से कांग्रेस मुक्त हो क्योंकि उन्हीं के चलते उसकी दुर्दशा हुई है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 29 April 2026

गुजरात भाजपा का अभेद्य दुर्ग बन चुका है


गत दिवस गुजरात में स्थानीय निकायों के जो चुनाव परिणाम घोषित हुए उनमें सत्तारूढ़ भाजपा ने जबरदस्त सफलता हासिल करते हुए सभी नगर निगमों पर अपना आधिपत्य बनाए रखा, वहीं नगर पालिकाओं और जिला‑तालुका पंचायतों में भी उसे भारी बहुमत मिला। पार्टी ने 84 में से 78 नगर पालिकाएं जीत लीं जबकि कांग्रेस को 6 में ही सफलता मिली। जिला पंचायत स्तर पर भी भाजपा ने दमदार प्रदर्शन करते  हुए 34 में से 33 जिला पंचायतें कब्जा लीं। साथ ही तालुका पंचायतों में उसे कुल 260 में से 253 पर विजय मिली जबकि शेष सीटें कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के खाते में गईं। एकमात्र जिला पंचायत नर्मदा ही भाजपा के हाथ से फिसली जहां आम आदमी पार्टी ने 22 में से 15 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया। आम तौर  पर किसी राज्य में विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद होने वाले स्थानीय निकायों के चुनाव परिणाम सत्ताधारी दल के पक्ष में ही जाते हैं। लेकिन गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव ऐसे समय हुए जब भाजपा की राज्य सरकार का लगभग तीन चौथाई कार्यकाल पूर्ण हो चुका है और सभी पार्टियां 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव की रणनीति बनाने में जुटी हुई हैं।  बावजूद  इसके भाजपा ने अपना दबदबा  बरकरार रखा जिससे सरकार के साथ ही पार्टी संगठन की भी मजबूत पकड़ साबित होती है। स्मरणीय है 2022 में संपन्न विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 182 सीटों में 156 जीतकर कीर्तिमान स्थापित किया  वहीं कांग्रेस अपने सबसे खराब प्रदर्शन के चलते मात्र 17 सीटों पर ही सिमट गई जबकि तीसरी ताकत बनकर मैदान में उतरी अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के मुफ्त बिजली जैसे वायदे भी भाजपा की सुनामी के सामने टिक नहीं सके। हालांकि 5 सीटें जीतकर उसने अपना खाता जरूर खोल दिया।  कांग्रेस के दयनीय प्रदर्शन का एक कारण आम आदमी की मौजूदगी भी थी जिसने भाजपा विरोधी मतों में बंटवारा करते हुए कांग्रेस की लुटिया डुबो दी। उस प्रदर्शन से उत्साहित आम आदमी पार्टी ने  अपनी सक्रियता काफी बढ़ाई। खुद श्री केजरीवाल भी गुजरात पर काफी ध्यान देते रहे। पार्टी का मानना है कि कांग्रेस के कमजोर होते जाने से गुजरात में जो शून्य उत्पन्न हो गया है उसे भरकर वह बतौर विकल्प स्थापित हो सकती है।  इसीलिए आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर इन स्थानीय निकाय चुनावों को सेमी फाइनल मुकाबला माना जा रहा था।  विपक्षी दल चाहते तो भाजपा के समक्ष कड़ी चुनौती पेश कर सकते थे किंतु चुनाव परिणामों ने भाजपा को अजेय सिद्ध कर दिया । जहां तक बात कांग्रेस की है तो स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक पार्टी की दिशा और दशा दोनों ही चिंताजनक हैं। लेकिन राष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर धूमकेतु की तरह से उभरी आम आदमी पार्टी ने गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव में जैसा लचर प्रदर्शन किया उससे लगता है दिल्ली विधानसभा चुनाव में पराजित होने के बाद पार्टी का हौसला टूटने लगा है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि मतदान के पहले ही पार्टी के 7 राज्यसभा सदस्यों के भाजपा में चले जाने से गुजरात का कैडर तो निराश हुआ ही ,  आम जनता को भी लगा कि वह डूबता जहाज है, लिहाजा उसे समर्थन देना अपना मत बेकार करना है। इन चुनाव परिणामों से भाजपा के उत्साह में वृद्धि स्वाभाविक है। ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह अपने गृह राज्य की बजाय प. बंगाल के महासमर में व्यस्त रहे तब भाजपा ने स्थानीय नेतृत्व के बलबूते जो सफलता हासिल की वह प्रशंसनीय है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने स्थानीय निकाय चुनावों में अपने प्रदर्शन से अपने समर्थकों को तो निराश किया ही गुजरात में वैकल्पिक राजनीति की संभावनाओं पर भी विराम लगा दिया। आम आदमी पार्टी के लिए जमीनी स्तर पर अपना कैडर स्थापित करने के लिए ये स्थानीय चुनाव सुनहरा मौका था जिसमें वह चूक गई। रही बात कांग्रेस की तो ऐसा लगता है वह हारने की आदी हो चली है। इन चुनावों की चौंकाने वाली बात है भुज में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के  कुछ पार्षदों का जीतना जो इस बात का संकेत है कि मुस्लिम मतदाताओं का मन भी कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों से उचटने लगा है। गुजरात में आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा जहां दोगुने उत्साह से उतरेगी वहीं कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के सामने अपने अस्तित्व को बचाए रखने की चुनौती होगी।

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- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 28 April 2026

ईरान के पास होर्मुज खोलने के अलावा और कोई रास्ता नहीं


ऐसा लगता है ईरान अपने बनाए चक्रव्यूह में खुद ही उलझ गया है।  होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर वह सोच रहा था कि पूरी दुनिया उसके सामने नतमस्तक हो जाएगी किंतु अमेरिका ने जवाबी नाकेबंदी करते हुए उसकी अकड़ निकाल दी। इसकी वजह से दूसरे देशों के जहाजों की आवाजाही तो रुकी ही किंतु ईरान के अपने तेल की बिक्री भी ठप हो गई। इसके कारण उसकी भंडारण क्षमता जवाब देने लगी। यदि वह उत्पादन रोकता है तो तेल के कुओं में समुद्री जल भरने का खतरा है वहीं उत्पादन जारी रखने के बाद भी चूंकि  उस तेल का विक्रय नहीं हो पा रहा इसलिए उसे सुरक्षित रखना मुश्किल है।  होर्मुज के रास्ते से निकलने वाले जहाजों से टोल वसूलने की उसकी योजना भी अमेरिका द्वारा की गई नाकेबंदी से टांय - टांय फुस्स होकर रह गई।  डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा युद्धविराम को आगे बढ़ाए जाने पर ईरान को लगा कि अमेरिका लड़ाई जारी रखने से डर रहा है। लेकिन ट्रम्प ने इधर ईरान को बातचीत में उलझाकर रखा और उधर होर्मुज को घेरकर ईरान की आर्थिक रीढ़ पर प्रहार कर दिया। इस्लामाबाद में पहले दौर की बातचीत बेनतीजा खत्म होने के बाद ऐसा लगा था कि जंग दोबारा शुरू हो जाएगी किंतु अमेरिका ने बजाय सीधे लड़ने के दूसरे तरह का मोर्चा खोलकर ईरान को फंसा दिया। अगले दौर की शांति वार्ता में जिस तरह से रुकावटें आईं उनसे ईरान का राष्ट्रीय नेतृत्व भी परेशान है। उसके द्वारा रखी जाने वाली शर्तें अमेरिका द्वारा सिरे से खारिज की जा रही हैं। इस लड़ाई में बाकी अरब देशों पर हमले कर ईरान ने पड़ोस में रिश्ते इस कदर खराब कर लिए कि कोई उसकी मदद को सामने नहीं आ रहा। गत दिवस उसके विदेश मंत्री भागे - भागे रूस जाकर राष्ट्रपति पुतिन से मिले  और लौटकर बयान दे दिया कि अमेरिका उसे परमाणु कार्यक्रम जारी रखने की अनुमति दे तो वह होर्मुज खोलने राजी है। लेकिन ट्रम्प समझ गए कि ईरान की नस दबी हुई है इसीलिए उन्होंने न सिर्फ उसके प्रस्ताव को ठुकरा दिया बल्कि जल्द ही उसकी तेल लाइनों पर हमले की धमकी दे डाली। इस सबसे एक बात तो स्पष्ट है कि ईरान के पास अब सौदेबाजी के लिए केवल होर्मुज बच रहा है। यदि अमेरिका ने उसकी अन्य शर्तों को नहीं माना तब उसके पास इस समुद्री मार्ग को खोलने के सिवाय दूसरा कोई रास्ता नहीं बचेगा । दरअसल अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के बाद चीन ही ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीददार रहा है। उसके बदले वह ईरान को हथियारों की  आपूर्ति करता रहा है। इसमें दो राय नहीं है कि अमेरिका और इजराइल ने जिस इरादे से ईरान पर हमले किए थे वे इस हद तक ही पूरे हुए कि वह लंबी लड़ाई लड़ने लायक नहीं बचा। पूरे देश में जो बर्बादी हुई उससे उबरने में भी बहुत लंबा समय और संसाधन लगेंगे। लेकिन तेहरान में सत्ता पलट की जो उम्मीद ट्रम्प और इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने लगा रखी थी उसके पूरे होने के आसार भी नजर नहीं आ रहे। वहीं ये भी सच है कि ईरान ने चीन और रूस के बहकावे में आकर पलटवार करने का दुस्साहस तो कर दिया किन्तु वे दोनों दूर से तमाशा देखते रहे और ईरान पिटता रहा। आज की स्थिति में यदि अमेरिका और इजराइल  दोबारा जंग शुरू करने से बचना चाह रहे हैं तो ईरान भी आगे लड़ पाने में सक्षम नहीं है। इसीलिए वह रोजाना नए  - नए शांति प्रस्ताव देकर बचाव का रास्ता खोज रहा है। गत दिवस ईरानी विदेश मंत्री और पुतिन की मुलाकात के बाद ईरान ने परमाणु कार्यक्रम जारी रखे जाने के एवज में होर्मुज खोलने का प्रस्ताव रखा जिसे अमेरिका ने ठुकरा दिया। शांति वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर ईरान भी अब सतर्क हो गया है। उसके एक नेता ने पाकिस्तान की ईमानदारी पर संदेह भी जताया है। आज की स्थिति में ईरान के लिए यही श्रेयस्कर होगा कि वह मामूली शर्तों के साथ होर्मुज खोल दे। इससे उसकी अर्थव्यवस्था को भी सहारा मिलेगा वहीं उसे अन्य देशों की सहानुभूति भी प्राप्त हो सकेगी। उसे ये समझ लेना चाहिए कि वह न तो आर्थिक तौर पर पहले जैसा संपन्न है और न ही उसकी सैन्य क्षमता बड़ा मुकाबला करने लायक बची है। परिस्थितियों का तकाजा है कि वह इस संकट को किसी तरह टल जाने दे। उसे किसी रणनीतिकार की ये सलाह स्मरण रखनी चाहिए कि बहादुरी का सबसे बेहतर तरीका होशियारी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 27 April 2026

दिन ब दिन हिंसक हो रहा अमेरिकी समाज



अमेरिका में गत दिवस राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा वाशिंगटन के एक सुप्रसिद्ध होटल में पत्रकारों के लिए आयोजित रात्रि भोज में उस समय अफरातफरी मच गई जब आयोजन आयोजन कक्ष के बाहर हथियारबंद एक व्यक्ति ने कई गोलियां चलाकर दहशत फैला दी। सुरक्षा कर्मियों ने तत्काल सभी विशिष्टजनों को सुरक्षित निकाला और उस व्यक्ति को दबोच लिया। उसकी गोली एक सुरक्षा कर्मी को भी लगी किन्तु वह लाइफ जैकेट पहने हुए था इसलिए बच गया। हालांकि कोई बड़ी अनहोनी नहीं हुई। अब तक जो कुछ भी सामने आया उसके अनुसार पेशे से इंजीनियर हमलावर ट्रम्प सरकार से असंतुष्ट था। इस घटना के पीछे किसी बड़े षड़यंत्र की आशंका का पता नहीं चल सका।  ट्रम्प ने स्वयं भी कहा कि ईरान युद्ध से इसका कोई संबंध नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार से नाराज कोई व्यक्ति इस तरह का कदम क्यों उठाएगा जिसमें अव्वल तो खुद उसकी जान जाने का खतरा था और बच जाने पर पूरी जिंदगी जेल में सड़ना तय है। इसके साथ ही ये बात भी विचारणीय है कि एक साधारण  नागरिक महंगे स्वचालित हथियार आखिर क्यों रखेगा? लेकिन इस प्रश्न का उत्तर अमेरिका में इसलिए अप्रासंगिक है क्योंकि अपने लोकतंत्र पर इतराने और दुनिया के सबसे सम्पन्न और शक्तिशाली राष्ट्र होने के घमंड में चूर इस देश में आम आदमी  किसी भी तरह की पिस्तौल , रिवाल्वर, रायफल यहां तक कि ए.के 47 जैसी स्वचालित गन भी बिना लायसेंस के खरीदकर रख सकता है। इसका एक आशय ये भी है कि वहां प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सुरक्षा का प्रबंध खुद करना पड़ता है। साथ ही सरकार अपने नागरिकों को इतना समझदार समझती है कि वे इन हथियारों का उपयोग गलत उद्देश्य से नहीं करेंगे। लेकिन इसी अमेरिका के दो राष्ट्रपति अब्राहम  लिंकन और जॉन एफ.कैनेडी के  अलावा रॉबर्ट कैनेडी और मार्टिन लूथर किंग जैसे अनेक दिग्गज नेता इसी हथियार स्वतंत्रता के शिकार हो चुके हैं। इसके बाद वहां इस व्यवस्था को नियंत्रित करने पर काफी बहस चली। कुछ राज्यों ने प्रतिबंधात्मक नियम भी बनाए। लाइसेंस प्राप्त विक्रेता से ही शस्त्र खरीदने के साथ ही खरीददार की पृष्ठभूमि जांचने जैसी अनिवार्यता भी रखी गई और न्यूनतम आयु का निर्धारण भी किया गया। बावजूद इसके अमेरिका में गन कल्चर का बोलबाला रोका नहीं जा सका। दुनिया भर को उपदेश देने वाले अमेरिका की कानून व्यवस्था में भी तमाम विसंगतियां हैं। अनेक महानगर तो अपराधिक गतिविधियों के लिए कुख्यात हैं। इनमें रात्रि  के समय किसी सुनसान इलाके में जाना जान जोखिम में डालने जैसा है। लूटमार करने वाले  मांग पूरी नहीं होने पर बेरहमी से गोली मारकर भाग जाते हैं।  ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि अमेरिका में पिस्तौल और बंदूक जैसी खतरनाक चीज आसानी से उपलब्ध होने से उसके उपयोग के प्रति भी गंभीरता का नितान्त अभाव है। बीते कुछ सालों में सभ्यता के ठेकदार इस देश में किशोरावस्था के अनेक बच्चों ने बंदूक चलाकर अपने विद्यालय के सहपाठियों की हत्या कर डाली जिसका कारण मामूली आपसी विवाद निकला। समाजशास्त्रियों ने  ऐसी घटनाओं के बारे में निष्कर्ष निकाला कि माता - पिता के झगड़े संतानों को भी तनावग्रस्त बना रहे हैं। परिवार नामक संस्था के टूटते जाने का जो मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभाव बच्चों पर पड़ता है उसके कारण सामाजिक विघटन की स्थिति उत्पन्न हो चुकी है। आर्थिक समृद्धि और सामाजिक सुरक्षा के बावजूद आम अमेरिकी तनाव में जी रहा है। यद्यपि इस सबका गत दिवस वॉशिंगटन के होटल में हुए गोलीकांड से सीधा संबंध नहीं है जहां राष्ट्रपति ट्रम्प की पार्टी चल रही थी। लेकिन इस घटना से अमेरिका में हथियारों की आसान उपलब्धता के औचित्य पर तो प्रश्नचिन्ह लगा ही। इतने सम्पन्न देश में तो कानून व्यवस्था इतनी अच्छी होनी चाहिए कि आम नागरिक को पिस्तौल और बंदूक जैसी चीज़ें खरीदने की जरूरत ही न पड़े। मनोवैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं कि उत्तेजना की स्थिति में किसी व्यक्ति के पास हथियार होना उसके लिए आत्मघाती होने के साथ ही किसी अन्य की जान के लिए भी खतरा बन सकता है। हमारे देश में भी अपने खुद के हथियार से आत्महत्या करने के प्रकरण आए दिन सामने आते हैं। ऐसे में अमेरिका जैसे देश में जहां परिवार टूटने के साथ ही सामाजिक ढांचे की दरार चौड़ी होती जा  रही हो, हथियार रखने की आजादी खून की होली खेलने का अवसर प्रदान करती है। यद्यपि ये उसका आंतरिक मामला है किंतु भारतीय मूल के लाखों लोग अमेरिका में बसे होने से वहां खेल - खेल में गोलियां चल जाने की हर खबर उनकी कुशलता के प्रति चिंता उत्पन्न कर देती है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 25 April 2026

अन्ना हजारे का श्राप केजरीवाल का पीछा नहीं छोड़ रहा


जिस दिन आम आदमी पार्टी ने राघव चड्ढा को राज्यसभा में उपनेता पद से हटाया उसी दिन से उनके भाजपा में जाने की अटकलें लगाई जा रही थीं। लेकिन वैसा होने पर वे राज्यसभा सदस्यता से हाथ धो बैठते वहीं त्यागपत्र देने पर उनकी राजनीतिक वजन दारी खत्म हो सकती थी। इसीलिए राघव ने न सिर्फ अपनी सदस्यता बचाते हुए भाजपा का दामन थामा बल्कि अपने साथ 6 अन्य  सांसदों को भी बटोरकर  पार्टी के 10 सदस्यीय संसदीय दल में विभाजन करवा दिया। दो तिहाई सांसदों की बगावत होने से सभी दलबदल कानून के डंडे से बच गए। जहां तक बात श्री चड्ढा के भाजपा की गोद में बैठने की ही है तो इससे किसी को आश्चर्य नहीं हुआ किंतु वे 6 और सांसदों को तोड़कर  ले आयेंगे इसकी भनक किसी को भी नहीं थी। जैसी कि परम्परा है उन्होंने पार्टी पर अपने उद्देश्यों से भटकने का आरोप लगा दिया। हालांकि जिस भाजपा को वे हमेशा गरियाते रहे वह उन्हें अचानक  क्यों प्रिय लगने लगी ये उन्होंने नहीं बताया।  जिन अशोक मित्तल को उनकी जगह राज्यसभा में पार्टी का उपनेता नियुक्त किया गया उनके यहां हाल  ही में ई.डी ने छापा मारा था। इसलिए जब वे भी श्री चड्ढा के साथ भाजपा में आए तब ये सवाल  उठ खड़ा हुआ कि क्या वे छापे से  भयभीत होकर भाजपाई बने? हालांकि अन्य जिन पांच सांसदों ने पार्टी छोड़ी उन पर ऐसा कोई आरोप नहीं है और शैक्षणिक और पेशेवर दृष्टि से भी वे काफी योग्य हैं ,सिवाय सुप्रसिद्ध क्रिकेटर हरभजन सिंह के। सब कुछ इतना अचानक हुआ कि बड़े - बड़े खबरखोजी भी हतप्रभ रह गए। वैसे राघव का विद्रोह तो समझ में आने लायक था और श्री मित्तल के पाला बदलने की वजह भी स्पष्ट है किंतु बाकी 5 सांसद किस वजह से भाजपा में आए ये रहस्यों के घेरे में है। बहरहाल इस सबके  पीछे पंजाब विधानसभा का  अगला चुनाव है। हालांकि इन सांसदों में कोई भी ऐसा नहीं है जो पंजाब में बड़ा दखल रखता हो। लेकिन 7 सांसदों के पार्टी छोड़ने से आम आदमी पार्टी को  आघात तो लगा ही है। पंजाब में सरकार बनाने में राघव की भी भूमिका रही थी। इसीलिए वे वहां  से राज्यसभा भेजे गए। लेकिन बाद में  उनसे पंजाब का प्रभार छीन लिया गया। शराब घोटाले से दिल्ली विधानसभा चुनाव तक राघव पार्टी से दूर बने रहे। राज्यसभा में भी वे पार्टी लाइन से अलग हटकर मुद्दे उठाते रहे । लेकिन गत दिवस जो धमाका उन्होंने किया उसके बाद ये चर्चा जोरों पर है कि पंजाब में  आम आदमी पार्टी के 50 विधायक भी पाला बदलने वाले हैं। इसके पीछे आलाकमान के साथ ही मुख्यमंत्री भगवंत मान का रूखा व्यवहार बताया जाता है।  7 सांसदों के दलबदल से बौखलाई आम आदमी पार्टी अपना गुस्सा भाजपा पर उतार रही है लेकिन श्री केजरीवाल ये भूल जाते हैं कि आज जिसे वे गद्दारी कह रहे हैं ये तो उन्हीं के द्वारा शुरू की गई थी जब उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु अन्ना हजारे को  अपमानित कर हाशिए पर धकेल दिया। उसके बाद पार्टी के संस्थापकों में से प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, डॉ . धर्मवीर, कुमार विश्वास , कपिल मिश्र, शाजिया इल्मी, आशुतोष आदि भी पार्टी छोड़ने मजबूर हुए। कुछ को तो धक्के मारकर बाहर किया गया। इस प्रकार आंदोलन की कोख से निकली यह पार्टी जितनी जल्दी ऊपर उठी उतनी ही जल्दी उसका ग्राफ भी नीचे जा रहा है। समाज के विभिन्न क्षेत्रों की जो प्रतिभाएं अपना काम,- धंधा छोड़कर नई राजनीति के इस अभियान से जुड़ीं उनमें से ज्यादातर हताश होकर लौट गए।  राज्यसभा की सीटों की जो बंदरबांट की उसने भी पार्टी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया। हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि पार्टी इस बगावत से खत्म हो जाएगी। लेकिन श्री केजरीवाल की राष्ट्रीय स्तर पर बतौर विकल्प उभरने की महत्वाकांक्षा पर जरूर तुषारापात हो गया। रही बात भाजपा की तो उसके पास आम आदमी पार्टी सांसदों को शामिल करना पंजाब में अपने पैर जमाने की योजना से जुड़ा है। यद्यपि इससे उसे किसी बड़े लाभ की उम्मीद तो नहीं रखनी चाहिए। वैसे भी भाजपा के नेता ही नहीं आम कार्यकर्ता भी अन्य पार्टियों से आने वाली भीड़ से चिढ़ने लगे हैं क्योंकि इसके आने से उनके अवसर छिन जाते हैं। ऐसे में राघव भले ही भाजपा में अपनी जगह बनाने में कामयाब हो जाएं लेकिन बाकी 6 सांसदों को विशेष महत्व नहीं मिल पाएगा। इस झटके के बाद श्री केजरीवाल और उनकी चौकड़ी अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करती है या नहीं ये फिलहाल कहना कठिन है। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि अपनी अलग पहचान बनाने वाली आम आदमी पार्टी चुनावी राजनीति के चक्रव्यूह में फंसकर  एक आम पार्टी बनकर रह गई है। ऐसा लगता है अन्ना हजारे का श्राप केजरीवाल एंड कंपनी का पीछा नहीं छोड़ रहा।



- रवीन्द्र वाजपेयी