Wednesday, 26 August 2026

मिसाइलों के उत्पादन में निजी क्षेत्र की भागीदारी स्वागत योग्य



राजनीतिक उहापोह के बीच इस खबर ने ध्यान आकर्षित किया कि अब मिसाइलें बनाने का लाइसेंस  निजी कंपनियों को भी दिया जाएगा और डी. आर. डी. ओ (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ) उन्हें  तकनीक स्थानांतरित भी करेगा। लेकिन परमाणु अस्त्र ले जाने में सक्षम मिसाइलों के उत्पादन से निजी क्षेत्र को अलग ही रखा जाएगा। रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी हमारे देश में कुछ साल पहले ही शुरू हुई। हालांकि अमेरिका सहित अनेक विकसित देश इस नीति को काफी पहले अपना चुके थे जिसके कारण उन्हें जबर्दस्त लाभ हुआ ।  मसलन उत्पादन बढ़ने के साथ ही अन्य देशों को उनका निर्यात भी बढ़ा। भारत भी जो सैन्य सामग्री आयात करता है उसमें विदेशी निजी कंपनियों के उत्पाद भी काफी होते हैं। हमारे देश में रक्षा उत्पादन पर लंबे समय तक  सरकारी नियंत्रण रहने से तकनीक का विकास अपेक्षित गति से नहीं हो सका। डी. आर. डी. ओ ने अवश्य काफी अनुसंधान किये जिसका लाभ हमारे मिसाइल कार्यक्रम की सफलता के रूप में सामने आया भी। लेकिन सरकारी क्षेत्र होने से उत्पादन हेतु निर्धारित समय सीमा का पालन नहीं हो पाता। कई बार आर्थिक संसाधनों की कमी समस्या बन जाती है। तेजस जैसा छोटा लड़ाकू विमान विकसित करने में दशकों लग गए । हालांकि देश में रक्षा उत्पादन के दर्जनों शासकीय संस्थान हैं जिनमें लाखों लोग काम करते हैं। इनमें बनने वाले बम, तोपें, गन, सहित अन्य सैन्य उपकरणों का आजादी के बाद हुए सभी युद्धों में समुचित उपयोग हुआ। जरूरत के समय इन संस्थानों में दिन - रात काम चलता है। ऐसे में ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि रक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में निजी उद्यमियों को  भला क्यों प्रवेश दिया जा रहा है? लेकिन समय के साथ चलने के लिए जरूरी है कि रक्षा उत्पादन में विश्वस्तरीय आधुनिकतम तकनीक को अपनाया जाए जिससे  हमारी सेनाएं पूरी तरह से सक्षम हो सकें साथ ही रक्षा उत्पादन के वैश्विक बाजार में भारत भी अपना स्थान बना सके। उल्लेखनीय है कि ब्रह्मोस मिसाइल सहित अनेक रक्षा उत्पादनों के निर्यात में भारत को बड़ी सफलता मिलने के बाद से इस दिशा में विचार शुरू हुआ। यद्यपि राजनीतिक खींचतानी और श्रमिक संगठनों के दबाव के कारण समय रहते  इस दिशा में नीतिगत निर्णय लेने का साहस सरकारी स्तर पर प्रदर्शित नहीं किया जा सका किंतु वर्तमान केंद्र सरकार ने एक तरफ जहाँ सेनाओं को सुसज्जित करने के लिए दुनिया भर से रिकार्ड तोड़ खरीदी की वहीं मेक इन इंडिया की नीति को उपभोक्ता वस्तुओं तक सीमित नहीं रखते हुए रक्षा उत्पादन के क्षेत्र तक उसका विस्तार कर दिया। इसके प्रारंभिक परिणाम अच्छे निकलने के कारण उसका उत्साह बढ़ा और धीरे - धीरे इसका दायरा बढ़ाते हुए मिसाइलों सहित अनेक संवेदनशील उपकरणों के उत्पादन लिए निजी क्षेत्र को अनुमति दे दी। डी. आर. डी. ओ द्वारा किये गए अनुसंधान को निजी क्षेत्र को देने का लाभ ये होगा कि इस काम में लगने वाला समय और संसाधन बच जाने से ये कंपनियां शीघ्रता से अपना उत्पादन शुरू कर सकेंगी। इस नीति का दोहरा लाभ ये होगा कि एक तरफ तो हमारे निर्यात में वृद्धि होगी वहीं दूसरी तरफ इन कंपनियों द्वारा उत्पादित जो भी सैन्य सामग्री हमारे लिए आवश्यक होगी उसका आयात नहीं करना पड़ेगा जिससे बेशमीमती विदेशी मुद्रा की बचत होने से व्यापार घाटा कम होगा साथ ही भारतीय रुपये के विनिमय मूल्य में भी सुधार होगा। यद्यपि विपक्ष खास तौर पर राहुल गाँधी जैसे नेता इस नीति पर हाय तौबा मचाये बिना नहीं रहेंगे क्योंकि जिन निजी कंपनियों के नाम सामने आये हैं उनमें अंबानी और अडानी की भी हैं जिनके विरोध में वे रोजाना कुछ न कुछ बोलते रहते हैं। लेकिन सरकार को इन सबसे विचलित हुए बिना आगे बढ़ना चाहिए। अभी तक जिन निजी कंपनियों को रक्षा उत्पादन के लिए लाइसेंस दिये गए उन सबका प्रदर्शन और उपलब्धियां उत्साह बढ़ाने वाली हैं। और फिर जब भारत में निजी क्षेत्र के उद्यमी उपग्रह प्रक्षेपण जैसे कारनामे सफलतापूर्वक कर सकते हैं तब मिसाइल और ऐसे ही अत्याधुनिक रक्षा उपकरण बनाने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होगी। साथ ही इसके चलते भारत की छवि दुनिया के पटल पर  एक विकसित और ताकतवर  देश के रूप में स्थापित होगी जिसके कारण विदेशी निवेशक भी आकर्षित होंगे। बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन में प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता कितनी आवश्यक है ये प. एशिया के वर्तमान संकट ने साबित कर दिया। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 25 August 2026

ब्रिक्स सम्मेलन के पहले कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन खतरे का संकेत



कॉकरोच जनता पार्टी ने धमकी दी है कि वह आगामी 5 सितंबर को दिल्ली के इंडिया गेट से पुलिस मुख्यालय तक मार्च निकालेगी। इसका नेतृत्व नीट पेपर लीक के कारण आत्महत्या करने वाले छात्रों के अलावा उन प्रदर्शनकारियों के परिजन करेंगे जिन पर जंतर मंतर आंदोलन के दौरान अपराधिक मामले दर्ज हुए हैं। पार्टी का कहना है कि  आंदोलन  जिन शर्तों पर समझौता हुआ था उनमें आत्महत्या पीड़ित परिवारों को मुआवजा और संसद भवन मार्च के दौरान  प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध दर्ज अपराधिक प्रकरण वापस लिया जाना भी था। लेकिन उक्त दोनों पूरी नहीं हुईं ।  उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार स्पष्ट कर चुकी है कि वह देख रही है कि मुआवजा किस प्रावधान के अंतर्गत दिया जा सकता है क्योंकि देश में हर साल अनेक छात्र विभिन्न कारणों से आत्महत्या करते हैं। इसलिए ये मुआवजा नजीर न बन जाए इसका ध्यान रखना भी जरूरी है। वैसे भी ऐसे मामलों में नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ता है जिनमें समय लगता है। और फिर आत्महत्या के मामले अलग - अलग राज्यों में होने के कारण स्थानीय प्रशासन की रिपोर्ट भी जरूरी होती है। इसी तरह  अपराधिक प्रकरण रद्द करने संबंधी आश्वासन के समय कॉकरोच जनता पार्टी ने खुद कहा था कि पुलिस पर हुए हमले और  सरकारी वाहनों में  तोड़फ़ोड़ उन अपराधी तत्वों द्वारा की गई जो छात्र बनकर आंदोलन में घुस आये थे। अतः उन पर कार्रवाई की जा सकती है। दिल्ली पुलिस ने भी अपनी प्रारंभिक जाँच रिपोर्ट में कहा कि  हिंसक उपद्रव करने वाले सैकड़ों प्रदर्शनकारियों का अपराधिक रिकार्ड है, जो छात्र नहीं हैं।  सर्वोच्च न्यायालय भी कह चुका है पुलिस पर हमला करने वालों के विरुद्ध प्रकरण दर्ज किये जा सकते  हैं। ऐसा लगता है कॉकरोच जनता पार्टी बहुत जल्दबाजी में है क्योंकि जंतर मंतर आंदोलन में हुए गाली - गलौच और अश्लीलता के प्रदर्शन की वजह से उसकी काफी आलोचना हुई। वहीं  रांची आंदोलन अपने अनुशासन और शालीनता के लिए प्रशंसित हुआ। इसके अलावा कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं को अनेक स्थानों पर विरोध का सामना करना पड़ा। राजस्थान में तो उनकी पिटाई तक हो गई। उनकी उम्मीद के मुताबिक देश भर में युवा आंदोलन भी नहीं खड़ा हो रहा। धर्मेंद्र प्रधान के हटने के बाद छात्रों में पैदा किया गुस्सा भी ठंडा पड़ गया। ये देखते हुए पार्टी ने  5 सितंबर को दिल्ली में मार्च निकालने की जो धमकी दी उसका समय जान बूझकर ऐसा रखा गया जिससेे केंद्र सरकार दबाव में आ जाए। इसका कारण 12 - 13 सितंबर को दिल्ली में होने जा रहा ब्रिक्स सम्मेलन है जिसमें चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति पुतिन सहित 20 देशों के शीर्ष नेताओं का आगमन संभावित है। भारत इसकी मेजबानी कर रहा है। इसलिए सरकार किसी भी सूरत में दिल्ली की शांति - व्यवस्था भंग नहीं होने देना चाहेगी। जंतर मंतर आंदोलन के कड़वे अनुभव के बाद कॉकरोच जनता पार्टी पर भरोसा करना भी भूल होगी। किसी भी अंतर्राष्ट्रीय आयोजन के पहले माहौल तनावपूर्ण होने पर विदेशी मेहमान अपना आगमन टाल सकते हैं । इसीलिए दिल्ली पुलिस सहित अन्य  एजेंसियां भी अभी से सुरक्षा प्रबंधों में जुट चुकी हैं। कॉकरोच जनता पार्टी इस बात से अनभिज्ञ हो ऐसा नहीं है। लेकिन उसके नेताओं का सार्वजनिक व्यवहार बेहद गैर जिम्मेदाराना है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि उनमें वैसा ही अहंकार आ गया है जैसा कुछ साल पहले तक अरविंद केजरीवाल में देखा जाता था जो प्रधानमंत्री  को चुनौती देते हुए कहते थे कि इस जन्म में तो वे आम आदमी पार्टी को नहीं हरा पाएंगे। और फिर अभी तक अभिजीत दिपके और उनकी टीम यही तय नहीं कर सकी कि उनकी दिशा क्या है? यदि वे 5 सितंबर के प्रदर्शन के लिए अड़ते हैं तब ये संदेह और पक्का हो जाएगा कि उनकी पीठ पर उन विदेशी शक्तियों का हाथ है जो भारत में अराजकता फैलाकर आंतरिक सुरक्षा को खतरे में डालना चाहती हैं। वरना ब्रिक्स जैसे बेहद महत्वपूर्ण वैश्विक सम्मेलन के एक सप्ताह पूर्व दिल्ली  में ऐसा कुछ करने की क्या जरूरत आ गई जिससे कि कानून व्यवस्था बनाये रखने की समस्या उत्पन्न हो। ऐसे आयोजनों की सफलता देश की प्रतिष्ठा बढ़ाती है। लेकिन ऐसा लगता है कॉकरोच जनता पार्टी को उसकी लेश मात्र चिंता नहीं है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 24 August 2026

पहले जनेऊधारी कश्मीरी ब्राह्मण होने का दावा और अब मनु स्मृति का विरोध



वर्ष 2017 के नवंबर माह में  राहुल गाँधी सोमनाथ मंदिर में दर्शन हेतु गए तब वहाँ अतिथि पुस्तिका में उनका नाम गैर हिन्दू के तौर पर दर्ज  किया गया। उस समय  गुजरात विधानसभा के चुनाव चल रहे थे। श्री गाँधी का नाम गैर हिन्दू के रूप में दर्ज होने की जानकारी सार्वजनिक होते ही कांग्रेस  में ये भय व्याप्त हो गया कि इसके कारण गुजरात में हिंदुओं के बीच पार्टी का रहा - सहा जनाधार भी खिसक न जाए। इसलिए फ़ौरन बचाव अभियान शुरू हुआ। राहुल खुद तो नहीं बोले किंतु कांग्रेस की ओर से रणदीप सुरजेवाला ने पत्रकार वार्ता में  श्री गाँधी का नाम गैर हिन्दू बताये जाने को भाजपा की साजिश बताते हुए कहा कि वे कश्मीरी ब्राह्मण हैं और उनका गोत्र दत्तात्रेय है ।  उन्होंने राहुल के जनेऊधारी होने का दावा करते हुए  प्रमाण स्वरूप कुछ चित्र भी जारी किये गए जिनमें स्व. राजीव गाँधी की अस्थियाँ संचय करने के दौरान उन्हें जनेऊ धारण किये दिखाया गया है। एक अन्य चित्र में वे अपनी बहिन प्रियंका के विवाह के मौके पर भी जनेऊ में दिखे। उसके बाद श्री गाँधी को न सिर्फ हिन्दू अपितु ब्राह्मण साबित करने के योजनाबद्ध प्रयास भी होने लगे।  पुष्कर में भी श्री गाँधी ने खुद को कश्मीरी ब्राह्मण और  गोत्र दत्तात्रेय लिखवाया। फिर  शिव भक्त बताते हुए मानसरोवर की यात्रा पर गए। हालांकि लौटते समय उन्होंने चीनी सरकार के प्रतिनिधियों से मुलाकात भी की जिसके बारे में कोई खुलासा नहीं हुआ। उसके पहले डोलकाम में चीन के साथ चल रहे टकराव के समय वे नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास भी गए जिसके बारे में न तो उन्होंने कुछ बताया और न ही कांग्रेस पार्टी ने। स्मरणीय है राजीव गाँधी फाउंडेशन को चीन से मिलने वाला अनुदान भी काफी चर्चाओं में रहा। बहरहाल, हिंदुओं विशेषतः भाजपा के पक्के समर्थक माने जाने वाले सवर्ण मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए राहुल को ब्राहमण साबित करने का अभियान आगे भी जारी रहा जिसके अंतर्गत वे हिन्दू मंदिरों और मठों में मत्था टेकने के साथ ही पूजा - अनुष्ठान भी करते देखे गए। लेकिन उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली जिसका कारण उनकी जाति और धर्म को लेकर व्याप्त अनिश्चितता है। स्मरणीय है उनके दादा पारसी थे। उस आधार पर उनका धर्म भी वही माना जाता है । इसलिए जब  श्री गाँधी ने जनेऊधारी कश्मीरी ब्राह्मण होने का दावा किया तब जनमानस में उसे मान्यता नहीं मिली जिसका प्रमाण काँग्रेस की पराजय का सिलसिला जारी रहना है। यहाँ तक कि राहुल को 2019 के लोकसभा चुनाव में अपनी पुश्तैनी सीट अमेठी से भी हार का सामना करना पड़ा जहाँ के ब्राह्मण नेहरू - गाँधी परिवार के स्थायी समर्थक थे। उसी के बाद श्री गाँधी का ब्राह्मण प्रेम ढलान पर आ गया। और वे जातियों के गुणा - भाग में जुट गए। जातिगत जनगणना के अलावा नौकरियों में जातियों की संख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व का मुद्दा उन्होंने उठाया किंतु 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली सीमित सफलता से बढ़ा उनका उत्साह  हरियाणा , महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार और प. बंगाल के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के दयनीय प्रदर्शन से ठण्डा पड़ गया। और तभी से उन्होंने सपा - बसपा और वामपंथियों की नकल करते हुए मनुवाद और ब्राह्मणवाद पर हमले शुरू किये जिसका ताजा प्रमाण बीते पिछले दिनों पुणे में आयोजित छात्राओं के एक जलसे में मिला। जहाँ उन्होंने मनु स्मृति के एक हिस्से में लड़कियों के पिता, पति और बेटों के अधीन रहने की व्यवस्था की आलोचना करते हुए उपस्थित छात्राओं को पितृ सत्तात्मक सोच से मुक्त होने की सलाह दी। वे बिना मनु स्मृति को उद्धृत किये भी लड़कियों को आत्मनिर्भर होने के लिए प्रेरित कर सकते थे किंतु उन्होंने मनु स्मृति को कठघरे में खड़ा किया जिसका उद्देश्य सीधे - सीधे दलित और पिछड़ी जातियों में उच्च जातियों के प्रति विद्वेष का भाव उत्पन्न करना था। लेकिन जिस तरह राहुल का जनेऊधारी कश्मीरी ब्राह्मण होने का स्वांग जनता को रास नहीं आया उसी तरह मनु स्मृति को गाली देकर दलित और पिछड़े वर्ग को आकर्षित करने का ये दाँव भी बेअसर ही रहेगा। इसकी वजह ये है कि जिस तरह उनके ब्राह्मण होने में बनावटीपन था वही मनुवाद के विरोध में भी है। सही बात तो ये है कि श्री गाँधी आगामी उ.प्र और पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को दोबारा खड़ा करने हाथ - पाँव मार रहे हैं। लेकिन उ.प्र में जहाँ भाजपा विरोधी दलित और पिछड़ा वर्ग के अलावा मुस्लिम भी कांग्रेस के बजाय अखिलेश यादव और मायावती के प्रभाव में हैं वहीं पंजाब में कांग्रेस की आपसी लड़ाई उसकी संभावनाओं पर ग्रहण लगा रही है। बेहतर हो श्री गाँधी हिन्दू समाज में फूट डालकर चुनाव जीतने का ख्वाब छोड़ दें। वैसे भी हर चुनावी हार के बाद उनका मुद्दा बदलता रहता है। इसीलिए लंबे समय से किसी ने उनके मुँह से वोट चोरी नहीं सुनी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी



Saturday, 22 August 2026

इस्लामिक नाटो : डर न सही किंतु सतर्कता जरूरी





पाकिस्तान में तुर्किये के लड़ाकू विमानों की खेप उतरने के बाद भारत में चिंता महसूस की जा रही है। हाल ही में सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने  एक समझौता किया जिसके अनुसार इनमें से किसी एक पर हुआ हमला सभी पर माना जाएगा। इस्लामिक नाटो का गठन होने के पहले पाकिस्तान व सऊदी अरब में इस तरह का  समझौता हो चुका था। लेकिन उसकी पोल उस समय खुल गई जब ईरान ने सऊदी अरब पर मिसाइलें दागीं तब पाकिस्तान ने कुछ नहीं किया। उल्टे वह ईरान और अमेरिका के बीच  मध्यस्थता में जुटा रहा। हालांकि उन कोशिशों का कोई लाभ नहीं हुआ और ईरान तथा अमेरिका दोनों ने उसको  हाशिये पर धकेल दिया। दरअसल पाकिस्तान को इस बात का डर सता रहा है कि इजरायल उसे भी निशाना बना सकता है। इसीलिए उसने पहले सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता किया और अब तुर्किये को भी उसमें जोड़कर अपने लिए रक्षा कवच  का इंतजाम कर लिया। स्मरणीय है तुर्किये पिछले काफी समय से भारत विरोधी रुख अपनाते हुए पाकिस्तान को सैन्य सामग्री उपलब्ध करवाने में आगे - आगे है। ये भी खबर है कि उसके लड़ाकू विमानों के अलावा चीन ने भी अपने युद्धक विमान पाकिस्तान में तैनात किये हैं। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इस जमावड़े को सीधे - सीधे भारत विरोधी मोर्चेबंदी न भी मानें किंतु इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि भविष्य में  तनाव उत्पन्न होने पर ये विमान भारत के विरुद्ध इस्तेमाल हो सकते हैं। फिलहाल तो ये लग रहा है कि पाकिस्तान को भारत के साथ ही इसरायल से भी डर लग रहा है। इसके अलावा ईरान भी उसे संदेह की नजर से देखने लगा है क्योंकि इस्लामाबाद में भले ही अमेरिका और उसके बीच मध्यस्थता की बिसात बिछी किंतु पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख आसिफ मुनीर जिस प्रकार से डोनाल्ड ट्रम्प के चरण चुंबन में जुटे रहे उससे ईरानी हुकूमत सशंकित हो उठी है। उधर इसरायल की नाराजगी इस बात से है कि पाकिस्तान ने गाजा लड़ाई के समय हमास का साथ दिया वहीं  अन्य इस्लामिक आतंकवादी संगठनों के प्रति भी उसकी, सहानुभूति सर्वविदित है।   और फिर पाकिस्तान खुद भी आतंकवाद की नर्सरी के तौर पर कुख्यात है। लेकिन इस्लामिक नाटो के गठन में जो जल्दबाजी की गई उसके पीछे का कारण  उसकी आंतरिक उथल - पुथल है। बीएलए (बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी) नामक संगठन द्वारा बलूचिस्तान को अलग देश बनाने के लिए किये जा रहे सशस्त्र संघर्ष ने इस्लामाबाद में बैठे हुक्मरानों की नाक में दम कर रखा है। इसकी, देखा सीखी सिंध प्रांत में जिये सिंध आंदोलन के बीज फिर अंकुरित होने लगे हैं। पश्चिमी सीमांत पर  अफ़ग़ानिस्तान पालित तालिबानी लड़ाके पाकिस्तान की सीमा में घुसकर जमीन कब्जाते जा रहे हैं। और अब पाक अधिकृत कश्मीर में भी  वैसा ही विद्रोह देखने मिल रहा है जैसा 1970 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में हुआ जिसके बाद मुल्क के दो टुकड़े हो गए। पाक अधिकृत कश्मीर और बलूचिस्तान में चीन का बड़ा पूंजी निवेश होने से वहाँ की तनावपूर्ण स्थिति ने बीजिंग की नींद उड़ा दी है। उसके जो प्रकल्प चल रहे हैं उनमें कार्यरत इंजीनियरों सहित अन्य कर्मियों पर जानलेवा हमले हो चुके हैं। स्थानीय जनता के विरोध से कई काम बंद  हैं। पाकिस्तानी सरकार का आरोप है कि मुल्क के भीतर हो रही गड़बड़ियों में   भारत की भूमिका है। उसे ये भय भी है कि पाक आधिकृत कश्मीर और बलूचिस्तान में भारत वैसी ही कार्रवाई कर सकता है जैसी उसने बांग्लादेश में की थी। उसकी चिंता ये भी है कि अफ़ग़ानिस्तान से भारत  के रिश्ते बेहद मधुर चल रहे हैं। वह इस देश को हर संभव सहायता दे रहा है। इस्लामाबाद को इस बात की आशंका है कि भारत , अफगानिस्तान की धरती से बलूचिस्तान के स्वाधीनता संघर्ष को सक्रिय सहायता दे सकता है। चूंकि राजनीतिक अस्थिरता भी पाकिस्तान के लिए सिरदर्द बनी हुई है इसलिए उसे बाहरी संरक्षण की जरूरत पड़ गई। हालांकि इस्लामिक नाटो उसकी हिफाजत कर सकेगा ये संदिग्ध है क्योंकि तुर्किये और सऊदी अरब दोनों अपनी समस्याओं में जिस तरह उलझे हैं उनसे निकलकर पाकिस्तान की मदद करना बेहद कठिन है। हाँ, ईरान पर दबाव बनाने के लिए अवश्य ये गठजोड़ कारगर हो सकता है। भारत को इससे डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि सऊदी अरब , भारत से पंगा लेने की हिमाकत नहीं करेगा। चीन भी घुड़कियाँ कितनी भी दे लेकिन वह सीधी टक्कर से बचता है। लेकिन सतर्कता जरूरी है क्योंकि तुर्किये और पाकिस्तान धूर्तता के पर्याय हैं। हालांकि पाकिस्तान अपनी आंतरिक समस्याओं में उलझा होने से सीमा पर बड़ी हरकत करने से बचेगा क्योंकि बालाकोट और पिछले मिनी युद्ध की पिटाई वह भूला नहीं होगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 21 August 2026

जेन जी आंदोलन को मुख्य धारा की राजनीति का समर्थन नहीं



बीते एक दशक में अनेक युवा चेहरे धूमकेतु की तरह उभरे जिन्होंने  बड़े - बड़े आंदोलन खड़े कर सरकार को चुनौती दी । भले ही वे उसे अंजाम तक नहीं पहुंचा सके किंतु  युवाओं का एक वर्ग उनके प्रति आकृष्ट हुआ। उनके आह्वान पर जमा हजारों की भीड़  जोशीले भाषण सुनकर तोडफ़ोड़ और हिंसा के रास्ते पर चलने में भी नहीं डरती। हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकुर, जिग्नेश मेवाणी,  कन्हैया कुमार , उमर खालिद, शर्जील इमाम और ऐसे ही अनेक नाम युवा क्रांति के अग्रदूत बनकर परिदृश्य पर उभरे किंतु जिस तेजी से उनका सितारा चमका उसी तेजी से वह फीका पड़ गया।इनमें से कुछ जेल में हैं, कुछ मामूली सफलता पाकर संतुष्ट हैं और बाकी ने अपना भविष्य सुरक्षित करने के लिए किसी राजनीतिक पार्टी का दामन थाम लिया। लेकिन उसके बाद भी वे उस शोहरत को बरकरार नहीं रख सके जो उन्हें कुछ समय के लिए मिली। दरअसल उन्होंने जिस जमीन बड़ी इमारत खड़ी करने का दुस्साहस किया वह ठोस नहीं थी। किसी  ज्वलंत मुद्दे को गर्म करके भीड़ एकत्र कर उसे  उकसाने में उन्हें भले ही सफलता मिली किंतु वह टिकाऊ नहीं हो सकी। दरअसल वे इस बात को नजरंदाज कर बैठे कि भीड़ को संगठित शक्ति में बदलना  कठिन होता है। वह क्षणिक तौर पर तो प्रभाव छोड़ती है किंतु जल्द ही उसमें बिखराव आने लगता है। महत्वाकांक्षाओं का टकराव  अंतर्कलह का रूप लेता है जिसके कारण  आंदोलन का मूल स्वरूप नष्ट होकर निजी हित सर्वोपरि हो जाते हैं।  उदाहरण के तौर पर  हार्दिक पटेल और कन्हैयाकुमार जैसे नाम उल्लेखनीय हैं। हार्दिक ने गुजरात की शक्तिशाली पटेल जाति को भाजपा सरकार के विरुद्ध सड़कों पर उतारकर  राजनीतिक समीकरण उलट - पुलट करने की संभावना उत्पन्न कर दी थी। लेकिन अंततः वे भी भाजपा शरणम् गच्छामि होकर विधायक बने बैठे हैं। दलितों की आवाज उठाकर प्रकाश में आये जिग्नेश भी लंबी रेस का घोड़ा नहीं बन पाए। दिल्ली स्थित वामपंथियों की वैचारिक नर्सरी कहे जाने वाले जे. एन. यू के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार अपनी ओजस्वी भाषण शैली के चलते वामपंथ के भविष्य  के तौर पर उभरे। लेकिन जब कोई संभावना नहीं दिखी तब कांग्रेस में आकर राहुल गाँधी के पिछलग्गू बन बैठे। 2019  में बिहार के घरेलू मैदान बेगूसराय और 2024 में बाहरी दिल्ली में उन्हें शर्मनाक पराजय झेलना पड़ी जबकि इस सीट पर लाखों की संख्या में बिहारी मतदाता हैं। इसी तरह का उदाहरण है अन्ना हजारे के आंदोलन से उत्पन्न आम आदमी पार्टी जो भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था का नारा लगाकर सत्ता तक जा पहुंची।  उसके आकर्षण में फंसकर अनेक  प्रतिभाशाली युवा अपना स्वर्णिम भविष्य दांव पर लगाकर साफ - सुथरी राजनीति का झंडा उठाये घूमने लगे। लेकिन जल्द ही उसके अनेक संस्थापक  खुद बाहर आ गये और जिन्होंने अरविंद केजरीवाल को उनके वायदे याद दिलाये उन्हें धकियाकर बाहर कर दिया गया। इसी तरह अनेक युवा भी निराश होकर दूसरे रास्ते पर चले गये। आज पार्टी की दशा और दिशा क्या है ये बताने की जरूरत नहीं है। उपरोक्त उदाहरण देने का उद्देश्य ये बताना मात्र है कि क्षणिक उन्माद के बल पर चमकने वाले आंदोलन और उसका नेतृत्व करने वाले चंद चेहरे समय के प्रवाह में कहाँ ओझल हो जाते हैं,  पता ही नहीं चलता। बीते कुछ समय से हमारे देश में युवाओं को समूहबद्ध कर एक बड़ा आंदोलन खड़ा करने का अभियान चल रहा है। जेन जी नामक एक  आयु वर्ग को सामने लाकर व्यवस्था में व्याप्त विकृतियों के विरुद्ध आंदोलन के जरिये सत्ता को चुनौती देने का प्रयोग शुरू किया गया जिसका पहला प्रदर्शन दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए आंदोलन के रूप में देखा गया।लेकिन तात्कालिक सफलता के बाद वह सैलाब जैसे आया वैसे ही चलता बना। अब उसके कथित नेता अपने लिए किसी भूमिका की तलाश में हैं। लेकिन जो युवा शक्ति उस आंदोलन में नजर आई उसका कोई संगठित ढांचा नहीं होने के कारण उस आंदोलन की उपलब्धियों से ज्यादा उसके साथ जुड़ी नकारात्मक बातों की चर्चा हो रही है। ये कहना भी गलत न होगा कि आंदोलन में शामिल अनेक युवा और छात्र अपराधबोध से ग्रसित हैं। दो दिन पहले लद्दाख़ जा रही एक युवती ने जेन जी के नाम पर वहाँ उपस्थित सेना के अधिकारी और सुरक्षा बल के लोगों से जो बेहूदगी की उसकी पूरे देश में निंदा हो रही है। जेन जी को मोहरा बनाकर देश में अव्यवस्था और  अराजकता फैलाने की जो योजना कुछ लोगों ने तैयार की थी वह शुरुआती दौर में ही दम तोड़ती दिख रही है क्योंकि उसके पीछे अधकचरी सोच और देश को अस्थिर करने में लगीं विदेशी शक्तियों का हाथ है। यही वजह है कि इस खेल को मुख्य धारा की राजनीति का समर्थन हासिल नहीं हो पाया। ऐसे में बड़ी बात नहीं अभिजीत दिपके और उनके कुछ साथी जल्द ही किसी पार्टी की गोद में बैठे दिखें। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 20 August 2026

कांग्रेस के फैसले से अलगाववादी ताकतों का हौसला बुलंद होगा



कांग्रेस कार्यसमिति ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम के केवल दो पद ही गाने का प्रस्ताव गत दिवस पारित कर दिया। उसका कहना है कि 1937 में भी पार्टी द्वारा वंदे मातरम के प्रारंभिक दो पद ही गाने का निर्णय तमाम बड़े नेताओं की उपस्थिति में किया गया था। और उसी के आधार पर आजादी के बाद जब संविधान बना तब गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा रचित जन गण मन को राष्ट्रगान घोषित किया गया। वहीं वंदे मातरम को राष्ट्रगीत की मान्यता देते हुए उसके शुरुआती दोनों पद गाने पर सहमति बनी। तब से अभी तक यही परिपाटी चली आ रही थी । सरकारी आयोजनों में राष्ट्रगीत होने के साथ ही वंदे मातरम का गायन अनिवार्य नहीं था। लेकिन मानसून सत्र में संसद ने इसे भी राष्ट्रगान के समकक्ष मान्यता देते हुए ये कानून पारित कर दिया कि वंदे मातरम का गायन राष्ट्रगान के पहले होगा। इसके सभी छंद गाये जाएंगे और इस दौरान सभी खड़े रहेंगे। नये कानून के अनुसार वंदे मातरम का अपमान दंडनीय अपराध होगा। लेकिन कांग्रेस सांसद  इमरान मसूद ने तो    सार्वजनिक रूप से कहा है कि इस्लाम का अनुयायी होने से उन्होंने वंदे मातरम न कभी गाया , न कभी गाएंगे। ऐसे ही बयान कुछ मुस्लिम संगठनों के नेताओं ने भी दिये। इसका कारण राष्ट्रगीत के दो पदों के बाद के हिस्से में हिन्दू देवियों का महिमामंडन है। निजी तौर पर किसी व्यक्ति का अपनी धार्मिक मान्यताओं के वशीभूत ऐसा करने का औचित्य एक बार स्वीकार कर भी लिया जाए लेकिन  एक राजनीतिक दल जिसकी आजादी की लड़ाई में अग्रणी भूमिका रही हो , वह उस गीत के पूरे हिस्से से दूरी बनाते हुए केवल दो पदों को ही मान्य करे तब वह उस भावना का भी अपमान है जिसमें डूबकर स्वाधीनता सेनानी वंदे मातरम गाते थे। रही बात धार्मिक मान्यताओं  की तो मुस्लिम धर्मावलंबियों के मुताबिक  वे केवल अल्लाह की ही जयकार कर सकते हैं।  उस दृष्टि से तो राष्ट्रध्वज तिरंगे का अभिवादन करने के साथ ही भारत माता की जय बोलना भी इस्लामी मान्यताओं के विरुद्ध है। उल्लेखनीय है मुस्लिम  लीग ने स्वाधीनता के पहले भी वंदे मातरम का विरोध किया था। अब सवाल ये है कि कांग्रेस की देखासीखी अन्य पार्टियां भी कोई कारण बताकर वंदे मातरम के साथ ही राष्ट्रगान जन गण मन को पूरा गाने से इंकार करते हुए उसमें मनमाफिक संशोधन करने का प्रस्ताव पारित करें तब क्या ऐसा करने की छूट उन्हें दी जानी चाहिए? कुछ प्रदेशों ने तो राष्ट्रध्वज के साथ ही अपना अलग झंडा भी बना लिया जिस पर विवाद छिड़ा था। गौरतलब है हमारे संविधान तक में हिंदू देव पुरुषों  और पौराणिक प्रतीक चिन्हों के चित्र हैं। सरकार के अनेक संस्थानों के ध्येय वाक्य वैदिक मंत्रों पर आधारित हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की समाधि पर भी हे राम लिखा गया है। ये देखते हुए कांग्रेस द्वारा वंदे मातरम को लेकर जो प्रस्ताव पारित किया गया वह अनावश्यक भी है और आपत्तिजनक भी। हमारे देश में अनेक ऐसी क्षेत्रीय पार्टियां हैं जो संघीय ढांचे की अवधारणा का विरोध करती हैं। द्रमुक के एक नेता ने तो यहाँ तक धमकी दे डाली थी कि  राष्ट्रभाषा के नाम पर हिन्दी लादे जाने पर तमिलनाडु अलग देश बन जाएगा। पूर्वोत्तर में सक्रिय रहे अनेक अलगाववादी संगठन भी देश से अलग होने की धमकी देते रहे हैं। जम्मू कश्मीर में धारा 370 रहते तक अलगाववाद की भावना चरम पर थी। ऐसे में यदि कांग्रेस जैसी देश की सबसे पुरानी पार्टी राष्ट्रगीत जैसे राष्ट्रीय सम्मान के प्रतीक को आधा - अधूरा स्वीकार करे तो इससे उन ताकतों का हौसला बुलंद होता है जिन्हें भारत को माँ कहने में शर्म आती है। कांग्रेस के इस फैसले के राजनीतिक स्तर पर होने वाले विरोध से परे हटकर देखें तो ये एक खतरनाक सोच को बढ़ावा देने वाला है। जल्द ही पंजाब में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं जहाँ खालिस्तान समर्थक सिर उठा रहे हैं। दिल्ली में हुए किसान आंदोलन के दौरान लालकिले पर राष्ट्रध्वज के स्थान पर एक धार्मिक झंडा लगाए जाने का दुस्साहस तक किया गया। अरुंधती रॉय जैसे लोग आज भी जम्मू कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानते। जेएनयू के वामपंथी छात्र संगठन आजादी - आजादी का जो नारा लगाते हैं वह भी अलगाववाद से प्रेरित ही है। ऐसे में कांग्रेस को वंदे मातरम में कांट- छांट करने जैसा प्रस्ताव पारित करने के पहले उसके संभावित नुकसान के बारे में सोचना चाहिए था। महज इसलिए कि भाजपा सरकार ने उसके बारे में कानून बनाकर उसे सम्मान दिया, उसका विरोध करना बेहद गैर जिम्मेदाराना निर्णय है। यदि किसी को अपने धार्मिक बंदिशों के चलते राष्ट्रगीत गाने में ऐतराज है तो ये उसका निजी मामला हो सकता है लेकिन एक राजनीतिक पार्टी ऐसा सोचे तो ये राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध होगा। कांग्रेस को इससे राजनीतिक नुकसान होगा सो अलग। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 19 August 2026

प. एशिया में परमाणु युद्ध की आशंका बढ़ रही




पूरी दुनिया को हलाकान करने वाला प. एशिया संकट सुलझने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच हुए युद्धविराम के बाद ऐसा लगा था कि शायद शांति कायम हो जाएगी किंतु दोनों ही पक्षों के अड़ियल रवैये के चलते जंग रुक - रुककर चलती ही रही। इसके लिए कुछ सीमा तक इजरायल भी कसूरवार है जिसने युद्धविराम को न मानते हुए लेबनान और उसके यहाँ सक्रिय हिज़्बुल्लाह नामक आतंकवादी संगठन के ठिकानों पर हमले जारी रखे। इससे नाराज ईरान  भी हमलावर रुख अपनाने से बाज नहीं आया। सबसे बडी़ समस्या बना होर्मुज नामक जलडमरूमध्य जहाँ से दुनिया को 20 फीसदी कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति होती है। यद्यपि इस समुद्री मार्ग के एक भाग पर ओमान की हिस्सेदारी भी है किंतु फिलहाल तो ईरान ने यहाँ के यातायात पर अपना नियंत्रण स्थापित कर रखा है और जो भी जहाज गुजरते हैं उनसे भारी - भरकम टोल टैक्स वसूल रहा है। हालांकि उसने ओमान को होर्मुज के नियंत्रण में साझेदार बनाने की पेशकश भी की लेकिन अमेरिका इसके लिए राजी नहीं है । कल ही उसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने होर्मुज को अमेरिका का हिस्सा बताते हुए नया नक्शा जारी कर दिया। प. एशिया के इस तनाव ने पूरी दुनिया को ऊर्जा संकट में डाल दिया है। दाम बढ़ने के साथ ही आपूर्ति प्रभावित होने से लगभग सभी देश परेशान हैं। इस बेवजह की लड़ाई के लिए कौन जिम्मेदार है ये कह पाना मुश्किल है। हालांकि शुरुआत गाजा का शासन संभाल रहे हमास द्वारा इजरायल पर किये अप्रत्याशित  हमले से हुई। इस इस्लामिक आतंकवादी संगठन की पीठ पर ईरान का हाथ सर्वविदित है। लेकिन पहले वार में सफल होने के बाद हमास का वह दुस्साहस गाजा के विनाश का कारण बन गया। हमास को नेस्तनाबूत करने के साथ ही इजरायल ने गाजा पर अपना कब्जा जमा लिया। इसके बाद ही उसके प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने डोनाल्ड ट्रम्प को ईरान पर हमला करने के लिए उकसाया। वैसे भी अमेरिका लंबे समय से ईरान से खार खाये बैठा था और उसके परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए पहले भी वह बमबारी कर चुका था। ट्रम्प को लगा ये अच्छा अवसर है ईरान को घुटनाटेक करवाते हुए वहाँ अपने अनुकूल सत्ता कायम करने का। पहले ही दिन उसके सर्वोच्च शासक खामेनेई की हत्या में सफलता मिलने से अमेरिका और इजरायल दोनों का हौसला आसमान पर जा पहुंचा। अमेरिका में जा बसे ईरान के शाह के बेटे को तेहरान लाकर उनकी ताजपोशी की योजना भी बना ली गई।लेकिन ईरान ने जंग को  बड़े हिस्से में फैलाते हुए अमेरिका और इजरायल दोनों को चौंका दिया।दुबई, ओमान, अबू धाबी, सऊदी अरब, कतर जैसे देशों में बने अमेरिकी सैनिक अड्डों पर मिसाइलें दागकर ट्रम्प की हेकड़ी निकाल दी। ईरान की ये कार्रवाई अभी भी जारी है। ट्रम्प द्वारा ईरान को दी गई धमकियाँ बंदर घुड़की साबित हुई हैं। भले ही अमेरिकी बमबारी ने ईरान को दशकों पीछे धकेल दिया हो किंतु उसे झुकाने का मंसूबा धरा का धरा रह गया। होर्मुज को ईरान के कब्जे से मुक्त करवाने में भी ट्रम्प नाकामयाब साबित हुए। ऐसे में  इस लड़ाई का अंत दिखाई नहीं दे रहा। ईरान ट्रम्प की कोई शर्त मानने राजी नहीं है। दूसरी तरफ इजरायल भी आर - पार के मूड में है। ईरान के पड़ोसी देश शांति की कोई पहल करते भी हैं तो कभी ट्रम्प और नेतन्याहू टांग फंसा देते हैं, कभी ईरान बाधक बन जाता है। संरासंघ इस समूचे घटनाक्रम में मिट्टी का माधो साबित हुआ है। वहीं रूस खुद ही यूक्रेन के साथ अंतहीन जंग में उलझा है जबकि चीन ईरान को पर्दे के पीछे रहकर पूरी मदद करने के बावजूद सामने आने तैयार नहीं है। इस प्रकार  कोई बड़ी ताकत इस लड़ाई को रुकवाने आगे नहीं आ रही। जहाँ तक भारत का प्रश्न है तो ये परिस्थिति बेहद तकलीफदेह है। खाड़ी देशों से कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति पर तो असर पड़ा ही इन देशों को  होने वाले निर्यात पर भी विपरीत असर पड़ा है। ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस से खरीदी करने पर ट्रम्प लगातार बढ़ाते हुए टैरिफ को 100 फीसदी तक ले आये। आज की स्थिति में इस संकट का हल किसी को नहीं पता। हालांकि अमेरिका और ईरान दोनों को बड़ा नुकसान होने के साथ ही उनकी सैन्य क्षमता भी न्यूनतम स्तर पर आ गई है। लेकिन अभी भी अमेरिका, ईरान और इजरायल तीनों युद्ध रोकने के कोई संकेत नहीं दे रहे। ऐसा लगता है कोई भी ये एहसास नहीं होने देना चाह रहा कि उसका दम फूल गया। हालांकि इस अनिश्चितता के बीच इस बात की आशंका उत्पन्न होने लगी है कि इस लड़ाई का अंत परमाणु अस्त्रों से न हो क्योंकि ट्रम्प जैसा सिरफिरा व्यक्ति  पागलपन में किसी भी सीमा तक जा सकता है। और ऐसा हुआ तब इस लड़ाई के विश्वयुद्ध में बदलने का खतरा और बढ़ जाएगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी