राजनीतिक उहापोह के बीच इस खबर ने ध्यान आकर्षित किया कि अब मिसाइलें बनाने का लाइसेंस निजी कंपनियों को भी दिया जाएगा और डी. आर. डी. ओ (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ) उन्हें तकनीक स्थानांतरित भी करेगा। लेकिन परमाणु अस्त्र ले जाने में सक्षम मिसाइलों के उत्पादन से निजी क्षेत्र को अलग ही रखा जाएगा। रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी हमारे देश में कुछ साल पहले ही शुरू हुई। हालांकि अमेरिका सहित अनेक विकसित देश इस नीति को काफी पहले अपना चुके थे जिसके कारण उन्हें जबर्दस्त लाभ हुआ । मसलन उत्पादन बढ़ने के साथ ही अन्य देशों को उनका निर्यात भी बढ़ा। भारत भी जो सैन्य सामग्री आयात करता है उसमें विदेशी निजी कंपनियों के उत्पाद भी काफी होते हैं। हमारे देश में रक्षा उत्पादन पर लंबे समय तक सरकारी नियंत्रण रहने से तकनीक का विकास अपेक्षित गति से नहीं हो सका। डी. आर. डी. ओ ने अवश्य काफी अनुसंधान किये जिसका लाभ हमारे मिसाइल कार्यक्रम की सफलता के रूप में सामने आया भी। लेकिन सरकारी क्षेत्र होने से उत्पादन हेतु निर्धारित समय सीमा का पालन नहीं हो पाता। कई बार आर्थिक संसाधनों की कमी समस्या बन जाती है। तेजस जैसा छोटा लड़ाकू विमान विकसित करने में दशकों लग गए । हालांकि देश में रक्षा उत्पादन के दर्जनों शासकीय संस्थान हैं जिनमें लाखों लोग काम करते हैं। इनमें बनने वाले बम, तोपें, गन, सहित अन्य सैन्य उपकरणों का आजादी के बाद हुए सभी युद्धों में समुचित उपयोग हुआ। जरूरत के समय इन संस्थानों में दिन - रात काम चलता है। ऐसे में ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि रक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में निजी उद्यमियों को भला क्यों प्रवेश दिया जा रहा है? लेकिन समय के साथ चलने के लिए जरूरी है कि रक्षा उत्पादन में विश्वस्तरीय आधुनिकतम तकनीक को अपनाया जाए जिससे हमारी सेनाएं पूरी तरह से सक्षम हो सकें साथ ही रक्षा उत्पादन के वैश्विक बाजार में भारत भी अपना स्थान बना सके। उल्लेखनीय है कि ब्रह्मोस मिसाइल सहित अनेक रक्षा उत्पादनों के निर्यात में भारत को बड़ी सफलता मिलने के बाद से इस दिशा में विचार शुरू हुआ। यद्यपि राजनीतिक खींचतानी और श्रमिक संगठनों के दबाव के कारण समय रहते इस दिशा में नीतिगत निर्णय लेने का साहस सरकारी स्तर पर प्रदर्शित नहीं किया जा सका किंतु वर्तमान केंद्र सरकार ने एक तरफ जहाँ सेनाओं को सुसज्जित करने के लिए दुनिया भर से रिकार्ड तोड़ खरीदी की वहीं मेक इन इंडिया की नीति को उपभोक्ता वस्तुओं तक सीमित नहीं रखते हुए रक्षा उत्पादन के क्षेत्र तक उसका विस्तार कर दिया। इसके प्रारंभिक परिणाम अच्छे निकलने के कारण उसका उत्साह बढ़ा और धीरे - धीरे इसका दायरा बढ़ाते हुए मिसाइलों सहित अनेक संवेदनशील उपकरणों के उत्पादन लिए निजी क्षेत्र को अनुमति दे दी। डी. आर. डी. ओ द्वारा किये गए अनुसंधान को निजी क्षेत्र को देने का लाभ ये होगा कि इस काम में लगने वाला समय और संसाधन बच जाने से ये कंपनियां शीघ्रता से अपना उत्पादन शुरू कर सकेंगी। इस नीति का दोहरा लाभ ये होगा कि एक तरफ तो हमारे निर्यात में वृद्धि होगी वहीं दूसरी तरफ इन कंपनियों द्वारा उत्पादित जो भी सैन्य सामग्री हमारे लिए आवश्यक होगी उसका आयात नहीं करना पड़ेगा जिससे बेशमीमती विदेशी मुद्रा की बचत होने से व्यापार घाटा कम होगा साथ ही भारतीय रुपये के विनिमय मूल्य में भी सुधार होगा। यद्यपि विपक्ष खास तौर पर राहुल गाँधी जैसे नेता इस नीति पर हाय तौबा मचाये बिना नहीं रहेंगे क्योंकि जिन निजी कंपनियों के नाम सामने आये हैं उनमें अंबानी और अडानी की भी हैं जिनके विरोध में वे रोजाना कुछ न कुछ बोलते रहते हैं। लेकिन सरकार को इन सबसे विचलित हुए बिना आगे बढ़ना चाहिए। अभी तक जिन निजी कंपनियों को रक्षा उत्पादन के लिए लाइसेंस दिये गए उन सबका प्रदर्शन और उपलब्धियां उत्साह बढ़ाने वाली हैं। और फिर जब भारत में निजी क्षेत्र के उद्यमी उपग्रह प्रक्षेपण जैसे कारनामे सफलतापूर्वक कर सकते हैं तब मिसाइल और ऐसे ही अत्याधुनिक रक्षा उपकरण बनाने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होगी। साथ ही इसके चलते भारत की छवि दुनिया के पटल पर एक विकसित और ताकतवर देश के रूप में स्थापित होगी जिसके कारण विदेशी निवेशक भी आकर्षित होंगे। बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन में प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता कितनी आवश्यक है ये प. एशिया के वर्तमान संकट ने साबित कर दिया।
- रवीन्द्र वाजपेयी