Thursday, 10 September 2026

कश्मीरी पंडितों को मिल रही धमकियों को गंभीरता से लेना जरूरी



जम्मू कश्मीर में अलगाववाद को जन्म देने वाली धारा 370 को हटे सात वर्ष बीत गए। इन दौरान झेलम और चिनाब में न जाने कितना पानी बह चुका है। शुरुआत  में वहाँ  केंद्र सरकार के उस कदम को लेकर गुस्से से अधिक ये डर था कि धारा 370  हटने पर  जम्मू कश्मीर को प्राप्त विशेष हैसियत खत्म होने से  केंद्र सरकार की दखलंदाजी बढ़ जाएगी ।इससे भी बड़ा कारण था  पूर्ण राज्य की हैसियत खत्म कर उसे केंद्र शासित राज्य बनाने के साथ ही कारगिल और लद्दाख़ को  उससे अलग कर  देना। हालांकि जम्मू कश्मीर में विधानसभा कायम रखी गई किंतु पूर्ण राज्य के दर्जे के अभाव में केंद्र का नियंत्रण शासन - प्रशासन पर बढ़ गया। केंद्र सरकार ने इतने योजनाबद्ध  तरीके से सब किया कि अलगाववादी नेताओं के अलावा राजनीतिक पार्टियां भी  दंग रह गईं। विधानसभा भंग रहने से राज्य का प्रशासन चूंकि राज्यपाल के अधीन था  लिहाजा  संभावित प्रतिरोध से निपटने के सभी इंतजाम इतनी कुशलता से किये गए कि  अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार की धमकियाँ धरी रह गईं। पाकिस्तान के टुकड़ों पर पलने वाले हुर्रियत काँफ्रेस के अलगाववादी नेता भी चूं - चपाट नहीं कर सके। आम जनता शुरुआत में तो  सहमी - सहमी रही किंतु जल्द ही सब सामान्य होने लगा। उसके बाद केंद्र सरकार ने नये सिरे से परिसीमन करवाया । इसके कारण जम्मू और घाटी के बीच जो राजनीतिक असंतुलन बना हुआ था वह दूर किया जा सका। इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में भारी मतदान से साबित हो गया कि अलगाववादियों की धमकियों को ठेंगा दिखाते हुए जनता ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को महत्व दिया। राज्य में इतने निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव पहले कभी नहीं हुए। उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने और पूर्ण राज्य के दर्जे की वापसी के मुद्दे के अलावा केंद्र के साथ रिश्ते भी बेहतर रहे।  कई मसलों पर मेहबूबा मुफ्ती भले ही केंद्र से टकराव के मूड में नजर आईं किंतु उमर और उनके पिता फारुख अब्दुल्ला ने बेहद सकारात्मक रुख दिखाया। राज्य में पर्यटन उद्योग के पुराने दिन लौटने से अर्थव्यवस्था में जबरदस्त सुधार हुआ। यद्यपि पहलगाम में हुई आतंकवादी घटना से माहौल खराब करने की कोशिश पाकिस्तान की तरफ से हुई जिसके जवाब में ऑपरेशन सिंदूर हुआ। उसके बाद घाटी में एक बार फिर सामान्य स्थितियाँ लौटीं जिसका प्रमाण पर्यटकों की रिकार्ड संख्या है। शिक्षण संस्थान भी नियमित चल रहे हैं। खेल प्रतियोगिताएं आयोजित होने लगीं। सिनेमा घरों में दर्शक बेखौफ आने लगे। कुल मिलाकर शांति - व्यवस्था बहाल होने से  खुशनुमा माहौल नज़र आने लगा । लेकिन अचानक कश्मीर घाटी में प्रधानमंत्री पैकेज के तहत कार्यरत कश्मीरी हिंदू (पंडित) कर्मचारियों को आतंकवादी संगठनों द्वारा लगातार नौकरी छोड़ने या मौत का सामना करने की धमकियां मिलने की खबरों से चिंता के बादल मंडराने लगे। लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े छद्म संगठन यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल द्वारा घाटी में काम कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों के नाम, फोन नंबर, पते और गाड़ियों के नंबर तक सार्वजनिक कर दिए जाने से  लगभग 7,000 कश्मीरी हिंदू कर्मचारी चिंता और दशहत में हैं।  सुरक्षा एजेंसियां कर्मचारियों की सुरक्षा पुख्ता करने के लिए प्रयासरत हैं किंतु अचानक उत्पन्न इस स्थिति ने घाटी में पंडितों के पुनर्वास की योजना को खतरे में डाल दिया क्योंकि अपनी और परिवार की सुरक्षा के प्रति उनकी चिंता सर्वोपरि है। हालांकि उमर सरकार ने इन धमकियों का विरोध किया है और अन्य किसी संगठन ने भी कश्मीरी पंडितों के विरोध में आवाज नहीं उठाई किंतु केंद्र सरकार को इस पर पैनी नज़र रखनी चाहिए। ऐसा लगता है जिस आतंकवाद को उसने बड़ी ही हिम्मत के साथ खत्म किया उसके कुछ बीज मिट्टी में दबे रह गए जो समय - समय पर अंकुरित होते रहते हैं। यद्यपि सुरक्षा बलों की मुस्तैदी के चलते वे कामयाब नहीं हो पा रहे। इसके अलावा स्थानीय लोगों का भी पहले जैसा सहयोग उनको नहीं मिल रहा। बावजूद इसके इन धमकियों को गंभीरता से लेना चाहिए। राज्य सरकार की गतिविधियों की भी चौकसी जरूरी है क्योंकि अब्दुल्ला परिवार के मन में अभी भी 370 हटने की कसक बाकी है। पाक अधिकृत कश्मीर में चल रहे सरकार विरोधी आंदोलन से भन्नाया पाकिस्तान नये सिरे से घाटी में आतंकवाद फैलाने का षडयंत्र रच सकता है। कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को दी जा धमकियाँ दरअसल भारत सरकार को चुनौती है। इसलिए इसके पहले कि आतंकवाद रूपी सांप फिर फन उठाये उसे कुचल देना जरूरी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 9 September 2026

मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति का विरोध कर अकेले पड़े भगवंत मान



विधानसभा चुनाव के कुछ महीनों पहले पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार और केंद्र  के बीच पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के नए मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति को लेकर टकराव बढ़ गया। भगवंत मान  सरकार द्वारा  केंद्र पर संवैधानिक प्रक्रिया की अनदेखी का आरोप लगाते हुए कैबिनेट बैठक में उक्त नियुक्ति के खिलाफ  प्रस्ताव पारित किया गया। श्री मान  ने आरोप लगाया कि केंद्र ने राज्य सरकार की सहमति लिए बिना नए मुख्य न्यायाधीश  की नियुक्ति का आदेश जारी कर दिया जो कि स्थापित प्रक्रिया के सर्वथा विरुद्ध है । लेकिन इसके विपरीत विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने न्यायमूर्ति  मिश्रा को  मुख्य न्यायाधीश बनने पर बधाई देते हुए न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक भूमिका की सराहना करते हुए पंजाब सरकार पर निशाना साधा। साथ ही  मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति का विरोध करने और शपथ ग्रहण समारोह से दूर रहने के भगवंत मान सरकार के फैसले की निंदा करते  हुए कहा कि सरकारों को न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए। श्री बाजवा का बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कांग्रेस केन्द्र  की नरेंद्र मोदी सरकार की ऐलानिया विरोधी है । इस विवाद में नया मोड़ तब आया जब वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि राज्य सरकार पंजाब के राज्यपाल को भी पत्र लिखकर आग्रह करेगी कि नव नियुक्त चीफ जस्टिस को पद की शपथ न दिलाई जाए क्योंकि यह नियुक्ति पंजाब को अनदेखा करके की गई है। लेकिन पंजाब सरकार की आपत्ति के जबाब में  भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्य पाल जैन  ने मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति श्री मिश्रा की नियुक्ति पर पंजाब सरकार के विरोध को दुर्भाग्यपूर्ण और अनावश्यक बताया। उन्होंने कहा कि नियुक्ति राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 217(1) के तहत की है और न्यायाधीशों की नियुक्ति की तय प्रक्रिया का पूरी तरह पालन हुआ है। अधिकृत जानकारी के मुताबिक बीते  6 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम ने उक्त  नियुक्ति की सिफारिश की थी जिस पर 10 अगस्त को पंजाब व हरियाणा सरकारों से राय मांगी गई। हरियाणा ने तो समय पर राय दे दी, परंतु  पंजाब ने अपनी राय नहीं भेजी। श्री जैन ने कहा कि राज्य की राय जरूरी है, लेकिन बाध्यकारी नहीं और  न ही उसके पास वीटो का अधिकार ही है। इस सबके बीच पंजाब और हरियाणा बार एसोसियेशन भी मुख्यमंत्री के विरोध में कूद पड़ा। एसोसियेशन के ऑनरेरी सेक्रेटरी परमप्रीत सिंह बाजवा द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा की नियुक्ति का पंजाब सरकार द्वारा विरोध किए जाने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा  कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है और कार्यपालिका को न्यायिक नियुक्तियों पर राजनीतिक दबाव नहीं बनाना चाहिए। एसोसिएशन की आपात बैठक में कार्यकारिणी ने पंजाब सरकार से नियुक्ति प्रक्रिया का सम्मान करने और हाईकोर्ट की गरिमा बनाए रखने की अपील की। एसोसिएशन ने न्यायपालिका के साथ मजबूती से खड़े रहने का संकल्प भी लिया। इस प्रकार मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान और आम आदमी पार्टी इस मामले में अकेले पड़ गए। उन्हें  उम्मीद थी कि कांग्रेस मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में पंजाब सरकार की  उपेक्षा किये जाने के लिए केन्द्र सरकार पर हमला करेगी। लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी। और तो और बार एसोसियेशन ने भी राज्य सरकार के विरोध को गलत ठहराकर मुख्यमंत्री को कटघरे में खड़ा कर दिया। सवाल ये है कि मान सरकार ने  मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति पर क्या सोचकर ऐतराज किया ? संभवतः वे विधानसभा चुनाव के पहले ये प्रचारित करना चाह रहे थे कि केन्द्र पंजाब से दुर्भावना रखता है। लेकिन कांग्रेस और बार एसोसियेशन ने उनके विरोध में बयान देकर राज्य सरकार को ही कटघरे में ला खड़ा किया। वैसे भी ये ऐसा मुद्दा नहीं था जिस पर इस नाजुक मौके पर केन्द्र से पंगा लिया जाए। ये देखते हुए लगता है मुख्यमंत्री मान अपने राजनीतिक संरक्षक दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नक्शे कदम पर चल रहे हैं जिनका 10  वर्षीय कार्यकाल केन्द्र की मोदी सरकार से लड़ते - भिड़ते बीता और अंततः वे सत्ता और प्रतिष्ठा दोनों गँवा बैठे। पंजाब से आ रहे संकेत वहाँ भी दिल्ली जैसा तख्ता पलट होने की संभावना जता रहे हैं जिन्हें मुख्यमंत्री मान की हरकतें  सुनिश्चित बना रही हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 8 September 2026

राष्ट्रीय राजधानी में दम तोड़ती व्यवस्था



दिल्ली के एक निजी हॉस्टल में चल रही मरम्मत के दौरान अचानक वह इमारत धराशायी होने से उसमें रह रहे 7 छात्र मौत का शिकार हो गए। भवन स्वामी को पत्नी और पुत्र सहित गिरफ्तार कर लिया गया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने नगर निगम को भी इसके लिए दोषी माना है। घटना के बाद परंपरानुसार शासन -  प्रशासन , मंत्री, जनप्रतिनिधि मोर्चे पर नजर आने लगे। लापरवाही की पहली गाज गिरी कुछ अधिकारियों पर  निलंबन के रूप में। दिल्ली का मामला है तो सर्वोच्च न्यायालय की चौखट तक भी पहुंच गया। न्यायालय की फटकार के बाद अब दिल्ली में चल रहे सभी हॉस्टलों की जांच के निर्देश दे दिये गए हैं। हाल ही में एक निजी गेस्ट हाउस में आग  लग जाने के कारण कुछ लोगों की मौत होने के बाद भी अवैध निर्माणों की जाँच का अभियान छेड़ा गया और  उस इलाके में पदस्थ नगरीय निकाय के अमले पर भी दंडात्मक कार्रवाई की गई। उसके कुछ समय पहले एक तलघर में चल रहे कोचिंग संस्थान में बाढ़ का पानी भर जाने के कारण कई छात्र जान से हाथ धो बैठे। उस घटना के बाद राजधानी में कुकुरमुत्तों की तरह उग आये कोचिंग संस्थानों में व्याप्त अनियमितताओं की जाँच एवं नियम विरुद्ध किये गए अवैध निर्माणों पर कार्रवाई का ऐलान किया गया। कुछ दिनों तक नेता और नौकरशाह मुस्तैद नजर भी आये और न्यायपालिका ने भी रुचि दिखाई किंतु जल्द ही सारी सक्रियता फुस्स होकर रह गई। सही बात ये है कि हमारे देश में अवैध कार्यों का पर्दाफ़ाश तभी होता है जब कोई दुर्घटना हो जाए। दिल्ली देश की राजधानी होने से अंतर्राष्ट्रीय शहर माना जाता है। इसमें होने वाली किसी भी घटना का प्रचार दुनिया भर में होता है। वैसे भी यह एक ऐतिहासिक महानगर है। लेकिन दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में इसकी गणना होना शर्मिंदा भी करता है। चार दिन बाद दिल्ली में ब्रिक्स नामक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन होने जा रहा है जिसमें पुतिन और जिनपिंग जैसे वैश्विक दिग्गजों के अलावा द. अफ्रीका और ब्राजील आदि देशों के राष्ट्राध्यक्ष आने की संभावना है। ऐसे समय  राजधानी में हुआ  उक्त हादसा देश की छवि खराब करने का कारण भी बन सकता है। उल्लेखनीय बात ये है कि एक तरफ तो दिल्ली के अनेक इलाके अत्यंत विकसित हैं जहाँ ये लगता ही नहीं कि हम भारत में हैं । वहीं इसी महानगर के अन्य क्षेत्रों में व्यवस्था पूरी तरह दम तोड़ चुकी है। होना तो ये चाहिए कि देश की राजधानी न सिर्फ हमारे अन्य शहरों अपितु दुनिया भर में अपनी खूबसूरती और व्यवस्था के लिए प्रसिद्ध हो। लेकिन धीरे - धीरे उसकी घनी बसाहट वाले क्षेत्र अव्यवस्था के बोझ तले दबे जा रहे हैं। इस विसंगति को दूर करने की जिम्मेदारी जिन सरकारी विभागों की है वे गले तक भ्रष्टाचार में डूबे होने से विकास एवं नगरीय नियोजन की सारी नीतियां मिट्टी में मिल जाती हैं। राजधानी में बैठी केन्द्र सरकार देश भर के शहरों में स्वच्छता के साथ शुद्ध हवा का सर्वेक्षण करवाकर उन्हें पुरस्कृत करती है। लेकिन उसकी नाक के नीचे राष्ट्रीय राजधानी न स्वच्छता में कोई स्थान रखती है और न ही प्रदूषण रहित हवा में। इसका कारण वहाँ के नगरीय निकायों का निकम्मापन ही है।  केन्द्र शासित होने की बावजूद दिल्ली में विधानसभा और प्रदेश सरकार है। उसमें बैठे लोगों को चाहिए वे इस महानगर को बदहाली से निकालने ईमानदारी से प्रयास करें। केवल मुफ्त बिजली, पेय जल और बस यात्रा जैसी खैरात बांटने से वोट तो हासिल किये जा सकते हैं किंतु दिल्ली की दुर्दशा दूर नहीं हो सकती। राजधानी में बाहर के लाखों छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए आते हैं। कम बजट के चलते उन्हें होस्टल में रहना होता है जिनके मालिक किराया तो वसूलते हैं किंतु सुविधा और सुरक्षा की उपेक्षा की जाती है। नगरीय निकाय के साथ ही पुलिस और प्रशासन का भी दायित्व है कि ऐसे स्थानों की जाँच कर देखे कि वे नियमानुसार संचालित हैं या नहीं? लेकिन जब तक कोई दुर्घटना नहीं होती तब तक समूचा तंत्र कुंभकर्ण की तरह सोता रहता है। ऐसे में ये सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब राष्ट्रीय राजधानी में व्यवस्था इतनी लचर है तब देश के छोटे और मध्यम श्रेणी शहरों का क्या हाल होगा? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 7 September 2026

ज़हरीली शराब के कारोबारियों को संरक्षण देने वाले भी बराबरी के कसूरवार




म.प्र के सागर जिले में जहरीली शराब पीने से डेढ़ दर्जन लोग अपनी जान गँवा बैठे। अस्पताल में इलाजरत 100 से अधिक लोगों में से भी अनेक की हालत चिंताजनक  है। इतने लोगों की मौत होने की खबर मिलते ही प्रदेश सरकार हरकत में आई और आबकारी विभाग के स्थानीय अमले पर निलंबन और स्थानांतरण जैसी कारवाई की गई। आबकारी आयुक्त और स्वास्थ्य विभाग के प्रभारी उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला ने सागर पहुँचकर हालात का जायजा भी लिया। शराब  व्यवसाय से जुड़े  दर्जनों लोगों के विरुद्ध प्रकरण दर्ज होने के साथ ही कुछ गिरफ़्तरियाँ भी हो चुकी हैं। मामला स्थानीय स्तर पर सस्ती शराब बनाने का था। दाम कम होने के लालच में पियक्कड़ों ने वह शराब खरीदकर उसका सेवन किया जिसके बाद मौत का मंजर सामने आया। चूंकि मामला बेहद गंभीर है इसलिए ये विश्वास किया जा सकता है कि प्रदेश सरकार कठोर कार्रवाई करने में पीछे नहीं हटेगी ।  अन्यथा उसे जनता के गुस्से का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन यह मुद्दा केवल इस कांड के लिए कसूरवार लोगों को  सजा दिलवाने तक सीमित नहीं है । अपितु देखने वाली बात ये है कि शराब के कारोबार से जुड़ा भ्रष्टाचार और उसे मिलने वाले प्रशासनिक और राजनीतिक संरक्षण पर रोकथाम कैसे लगे? शराब की बुराइयों से सभी वाक़िफ़ हैं। संपन्न वर्ग के पास तो महंगे ब्रांड की शराब पीने की सामर्थ्य होती है जो उसके साथ अच्छी खुराक लेने में भी सक्षम है। कुछ लोग शराब का सेवन औषधि के तौर पर सीमित मात्रा में करते हैं। सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रदर्शन के लिए भी आजकल शराब पीने का फैशन है। अभिजात्य वर्ग में महिलाओं के सुरा पान का चलन भी बढ़ता जा रहा है। युवाओं में भी शराब का आकर्षण वृद्धि की ओर है। लेकिन सागर में गत दिवस जो हादसा हुआ उसका शिकार गरीब तबके के लोग हुए। बताया जा रहा है मात्र 20 रु.कीमत कम होने की वजह से सेकड़ों लोगों ने स्थानीय कुछ लोगों द्वारा बनाई जो शराब खरीदकर पी उसने अनेक जिंदगियां छीन लीं। इस घटना से शराब के कारोबार के साथ जुड़ी अमानवीयता एक बार उजागर हो गई। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि नशे का ये कारोबार  भले ही उसे बनाने और बेचने वालों के साथ ही भ्रष्ट नौकरशाहों और उनको संरक्षण प्रदान करने वाले नेताओं को मालामाल करता हो लेकिन समाज के निचले तबके के लिए ये बर्बादी का कारण है। शराब के सेवन से लाखों लोगों का स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि पारिवारिक जीवन भी  तबाह हो रहा है। असंख्य ऐसे नशैड़ी मिल जाएंगे जो पीने की लत की वजह से कर्ज के बोझ में दबे हुए हैं। गरीबों की बस्तियों में साहूकारों द्वारा  उनको मोटी ब्याज दरों पर कर्ज दिये जाने के बाद उसकी वसूली के लिए बेरहमी बरती जाती है। शराब के नशे में धुत होकर किये जाने वाले अपराधों के बारे में भी शासन, प्रशासन और राजनेता पूरी जानकारी रखते हैं। बावजूद इसके शराब से जुड़े काले - कारनामों पर अंकुश लगाने के बारे में कोई गंभीर नहीं है। सबसे बड़ा मजाक तो ये है कि एक तरफ तो सरकार अपना खजाना भरने के लिए शराब की दुकानें खुलवाती है और दूसरी तरफ नशा उन्मूलन का अभियान चलाती है। नशा मुक्ति केंद्र जिस प्रशासन द्वारा संचालित हैं, वही कुछ अपवाद छोड़कर शराब के अवैध व्यवसाय को प्रश्रय प्रदान करने वाला है। इस आधार पर ये संदेह करना गलत नहीं लगता कि सागर में जहरीली शराब बनाने और बेचने वालों को आबकारी विभाग में बैठे उन लोगों का खुला संरक्षण होगा जो सिर से पाँव तक भ्रष्ट होने से पैसे के लिए किसी भी हद तक गिरने के लिए तैयार रहते हैं। अब इतनी इंसानी जानें जहरीली शराब की बलि चढ़ गईं तब कठोर कार्रवाई का कर्मकांड तो होगा ही परंतु आबकारी विभाग के इंच - इंच में व्याप्त भ्रष्टाचार पर रोक लगने की कोई उम्मीद  दूर - दराज तक दिखाई नहीं देती। इसका कारण ये है कि शराब की बिक्री से एक तरफ जहाँ सरकार का खजाना भरता है वहीं दूसरी तरफ ये नेता - नौकरशाह गठजोड़ के लिए भी मुफ्त कमाई का स्रोत है। गौरतलब है सरकारी व्यवस्था के अंतर्गत चलने वाले शराब कारोबार से तो उसे राजस्व मिलता है लेकिन अवैध रूप से शराब बनाने और बेचने के कारोबार से केवल भ्रष्ट सरकारी अमले की जेबें ही गर्म होती हैं। सागर में जो हुआ उसके बाद मुख्यमंत्री ने दोषियों को नहीं बख्शे जाने का ऐलान तो कर दिया। इसलिए उनकी धरपकड़ होने और सजा मिलने की उम्मीद की जा सकती है किंतु ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति तभी रोकी जा सकेगी जब आबकारी विभाग में ईमानदारी और जनता के प्रति संवेदनशीलता का भाव हो , जिसकी संभावना फिलहाल तो नहीं लग रही। 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 5 September 2026

प्रधानमंत्री हेतु विजय का नाम उछलने से कांग्रेस में बेचैनी



अभिनेता से नेता बने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय का राजनीति में उतरना और फिर विधानसभा चुनाव में उनकी नवगठित पार्टी का बहुमत के करीब पहुंचना नाटकीयता से भरी किसी तमिल फिल्म का एहसास करा गया। बीते छह दशकों से तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज होते रहे द्रमुक और अन्ना द्रमुक जैसे मजबूत स्तंभों को विजय की पार्टी टीवीके ने  एक झटके में धराशायी कर दिया। यहाँ तक कि पिछली सरकार के मुख्यमंत्री  स्टालिन तक चुनाव हार गए। ये परिणाम इसलिए और चौंकाने वाला रहा क्योंकि जो काम कांग्रेस और भाजपा  नहीं कर पाईं वह विजय ने चंद महीनों के भीतर कर दिखाया। हालांकि वे बहुमत से थोड़ा पीछे रहे किंतु कांग्रेस , द्रमुक से गठबंधन तोड़ विजय को टेका लगाते हुए सरकार में हिस्सेदार भी बन बैठी। अन्ना द्रमुक के भी कुछ विधायक समर्थन में आ गए। मुख्यमंत्री बनते ही विजय ने फिल्मी अंदाज में लोक -लुभावन फैसलों की बौछार लगाते हुए  सरकार का खजाना खोल दिया।  विधायकों का वेतन बढ़ाने के अलावा उन्हें नई कारें देकर वे अपनी सरकार को स्थायित्व देने में भी जुट गए। यहाँ तक तो सब ठीक था किंतु विजय के अचानक उभार से पार्टी में  मांग उठने लगी कि उनको आगामी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर पेश किया जाए। खुद मुख्यमंत्री इस मांग से सहमत हैं  या नहीं, ये फिलहाल स्पष्ट नहीं हो सका किंतु इससे उनके सहयोगी दल  कांग्रेस की बेचैनी बढ़ गई जो राहुल गाँधी के अलावा और किसी को प्रधानमंत्री बनाये जाने के बारे  में सुनना भी पसंद नहीं करती। इसीलिए  राज्य के पर्यटन मंत्री और कांग्रेस नेता राजेश कुमार ने एक  बयान में  स्पष्ट कर दिया है कि यदि गठबंधन 2029 में प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गांधी का समर्थन नहीं करता है, तो विजय कैबिनेट में शामिल कांग्रेस के दोनों मंत्री अपने पद से इस्तीफा दे देंगे। उल्लेखनीय है टीवीके के नेता आधव अर्जुन और सरथकुमार ने खुले तौर पर शीर्ष पद के लिए विजय का समर्थन किया है, जबकि तूतीकोरिन में पीएम के लिए विजय का समर्थन करने वाले पोस्टर भी सामने आए हैं, जिससे यह विवाद और गहरा गया है। तमिलनाडु में अभिनेता रहते हुए ही विजय के सैकड़ों प्रशंसक क्लब और हजारों व्हाट्स एप ग्रुप बन गए थे। उंन्होंने पार्टी तो चुनाव से कुछ पहले ही बनाई थी परंतु उक्त क्लबों और व्हाट्स एप के जरिये अपना जनाधार स्थापित करने का काम  काफी पहले से शुरू कर रखा था और इसके लिए महंगी पेशेवर एजेंसियों की सेवाएं ली गई । मतदान  उपरांत जब एक्सिस माय इंडिया नामक सर्वेक्षण एजेंसी  ने टीवीके के सबसे बडी पार्टी बनने की भविष्यवाणी की तो समूचा राजनीतिक जगत चौंक गया।  बहरहाल धमाकेदार जीत और फिर बिना मांगे कांग्रेस सहित वामपंथी और अन्ना द्रमुक के एक खेमे का समर्थन मिलने से विजय का उत्साह बढ़ गया। इसीलिए उन्होंने मुफ्त उपहारों और सुविधाओं के जरिये अपना जनाधार पुख्ता करने के साथ ही तमिल भावनाओं को उभारने  का अभियान शुरू कर दिया। केन्द्र से टकराने में भी वे संकोच नही कर रहे। लेकिन अचानक प्रधानमंत्री के लिए उनका नाम पार्टी के भीतर से उछाला जाना इस बात का संकेत है कि उनकी महत्वाकांक्षा हिलोरें मारने लगी हैं। शायद उन्हें ये लग रहा है कि यदि वे प्रधानमंत्री पद के लिए दावा ठोककर 2029 के लोकसभा चुनाव में उतरते हैं तब वे  दक्षिण भारत का चेहरा बनकर उत्तर और दक्षिण भारत के बीच विभाजन करवाने में सफल हो जाएंगे। हालांकि अतीत में पी.वी नरसिम्हा राव और एच. डी देवगौड़ा के रूप में दक्षिणी भारत से दो प्रधानमंत्री बन चुके हैं किंतु वे समूचे दक्षिण भारत का चेहरा नहीं बन सके। विजय को लगता है युवा होने से वे नई पीढी़ के मतदाताओं को अपने पक्ष में गोलबंद कर सके तब प्रधानमंत्री पद के लिए जनता के सामने तीन विकल्प होंगे जिनमें दो उत्तर भारत से होने की वजह से दक्षिण की राजनीतिक उपेक्षा का मुद्दा गरमाया जा सकेगा। इसीलिए काँग्रेस में घबराहट फैल गई। मंत्रियों के अलावा पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम के सांसद पुत्र कार्ति ने भी टीवीके की उक्त मांग के विरुद्ध बयान दे दिया। खबर है काँग्रेस का शीर्ष नेतृत्व विजय से बात करने वाला है। अभी तक टीवीके द्वारा कोई स्पष्टीकरण न दिये जाने से काँग्रेस चिंता में है क्योंकि उसके दूर हो जाने पर भी राज्य सरकार को खतरा नहीं है। क्या होगा ये अभी पक्का नहीं है किंतु तमिलनाडु की राजनीति में फॉर्मूला फिल्म जैसे उतार - चढ़ाव शुरू हो जाने से उसके अंत के प्रति उत्सुकता बढ़ रही है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 4 September 2026

मोदी का बढ़ता प्रभाव ट्रम्प को बर्दाश्त नहीं हो रहा



दिल्ली में होने जा रहे ब्रिक्स सम्मेलन के एक हफ्ते पहले अमेरिका ने धमकी दी है कि ईरान से व्यापारिक गतिविधियां बढ़ाने पर वह भारत पर भी वैसे ही आर्थिक प्रतिबंध लगा देगा जैसे उसने ईरान और रूस पर लगा रखे हैं। इस धमकी का कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बीच 31 अगस्त 2026 को किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन के दौरान हुई द्विपक्षीय बैठक है। जिसमें दोनों नेताओं ने भारत और ईरान के बीच पुरानी दोस्ती को और मजबूत करने का संकल्प लिया। प्रधानमंत्री मोदी ने आने वाले समय में तेहरान के साथ व्यापार के दायरे को बढ़ाने और उसमें विविधता लाने की इच्छा व्यक्त की। प. एशिया में तनाव और संघर्ष की शुरुआत के बाद दोनों नेताओं की यह पहली आमने-सामने की मुलाकात थी। इसके बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि कोई भी देश ईरान को प्रतिबंधों से बचने में मदद नहीं कर सकता।अगर कोई देश ईरान के लिए ऐसी व्यवस्था बनाने में मदद करता है, जिससे वह पैसा कमा सके और उस धन का इस्तेमाल आतंकवाद को समर्थन देने या परमाणु हथियार बनाने में हो, तो अमेरिका ऐसे देशों पर भी प्रतिबंध लगाएगा। भारत सरकार ने इस पर तो कोई प्रतिक्रिया नहीं दी लेकिन वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का अमेरिका के साथ प्रस्तावित ट्रेड डील को लेकर ये कहना कि जब तक राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा भारत पर लगाए जा रहे अनाप - शनाप टैरिफ की दरें सामान्य नहीं जातीं तब तक यह डील अटकी रहेगी। इसे एक तरह से अमेरिकी विदेश मंत्री की धौंस का जवाब कहा जा रहा है। अमेरिका के दबाव के चलते ही भारत ने ईरान से कच्चा तेल खरीदना बंद किया जबकि ये खरीदी बजाय डॉलर के  भारतीय रुपये में होने से विदेशी मुद्रा भंडार पर बोझ नहीं पड़ता था। लेकिन उसके बाद रूस के साथ वैसी ही व्यवस्था होने से भारत में ऊर्जा संकट उत्पन्न नहीं हो सका। अमेरिका ने इस पर भी आपत्ति जताते हुए आरोप लगाया कि भारत द्वारा कच्चे तेल की खरीद से रूस को यूक्रेन के साथ लड़ाई लंबी खींचने की ताकत मिल रही है। राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा उसी कारण टैरिफ का भार बढ़ाया जाता रहा । उनका दबाव ये है कि भारत अमेरिका से तेल और गैस खरीदने के साथ ही वेनेजुएला से भी आयात करे जहाँ के तेल भंडारों पर अमेरिका ने जबरन कब्जा कर रखा है। हालांकि चीन भी भारत की तरह ही रूस के कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक है ।  लेकिन भू - राजनीति के मद्देनजर ट्रम्प उसके प्रति उतने कठोर नहीं हो सके। बहरहाल अमेरिका की ताजा धमकी के पीछे का छिपा हुआ कारण ये भी है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी ट्रम्प से मिलने वॅाशिंगटन नहीं गए। ऑपरेशन सिंदूर के बाद उन्होंने जिस प्रकार पाकिस्तान की तरफदारी करते हुए भारत को नीचा दिखाने का खेल खेला वह भारत को नागवार गुजरा। इसीलिए जब जी - 8 सम्मेलन में शामिल होने श्री मोदी कैनेडा गए तब उनके पहुँचने से पहले ही जरूरी कार्य के बहाने ट्रम्प वापस लौट गए। और फिर फोन पर प्रधानमंत्री को वाॅशिंगटन आमंत्रित कर  व्हाइट हाउस में दोपहर भोज पर बातचीत का प्रस्ताव दिया। लेकिन जब श्री मोदी को पता चला कि उसी भोज में पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष आसिफ मुनीर भी रहेंगे तब उन्होंने ट्रम्प को फिर कभी मिलने का वायदा कर टरका दिया जो कि एक तरह से नाराजगी की अभिव्यक्ति ही थी। जाहिर है उससे ट्रम्प के अहं को चोट पहुंची और टैरिफ वृद्धि की उनकी धमकियाँ और तेज हो गईं।   उसके बाद गत जून माह में फ्रांस की राजधानी पेरिस में जी 7 सम्मेलन में जब दोनों का सामना हुआ तब ट्रम्प ने श्री मोदी से अकेले में बात करते हुए उन्हें अपना दोस्त बताकर खुश करना चाहा किंतु भारत ने अपने तौर - तरीके नहीं बदले। अमेरिका के ऐलानिया धमकियों के बावजूद रूस से तेल सहित सैन्य सौदे लगातार हो रहे हैं। किर्गिस्तान के हालिया शिखर सम्मेलन में मोदी, पुतिन और जिनपिंग की नजदीकी देखने के अलावा ईरानी राष्ट्रपति से प्रधानमंत्री की निजी बातचीत ने अमेरिका का गुस्सा बढ़ा दिया है। उसे डर है ब्रिक्स के दिल्ली सम्मेलन में भारत, रूस, चीन, द. अफ्रीका और ब्राजील मिलकर किसी नये वैश्विक समीकरण को जन्म दे सकते हैं जो अमेरिकी चौधराहट के लिए खतरा बनेगा। इसीलिये उसने पहले से ही धमकी देना शुरू कर दिया लेकिन ट्रम्प के मूर्खतापूर्ण फैसलों से उनके साथ ही अमेरिका की धाक भी मिट्टी में मिल चुकी है। ईरान युद्ध में उसका दम फूलने लगा है। दूसरी तरफ भारत ने वैश्विक मंचों पर अपनी वजनदारी बढ़ाई है। ब्रिक्स सम्मेलन के बाद वैश्विक राजनीति में बड़े बदलाव होने की संभावना है जिसमें भारत महत्वपूर्ण भूमिका में होगा। और यही ट्रम्प की खिसियाहट का कारण है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 3 September 2026

मनुस्मृति जलाने से कांग्रेस को नुकसान ही होगा



हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद कुछ सिरफिरे लोगों द्वारा मंच का शुद्धिकरण किये जाने की कांग्रेस ने कड़े शब्दों में निंदा करते हुए उस कृत्य के दोषी भाजपा कार्यकर्ताओं पर प्रकरण दर्ज करने की मांग की थी। पार्टी का आरोप है कि  दलित नेता के अपमान के दोषियों को  कटघरे में खड़ा करने के बजाय उल्टे कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के विरुद्ध मामला दायर कर दिया गया। इसके विरोध में देश भर में कांग्रेस ने विरोध प्रदर्शन करते हुए भाजपा को दलित विरोधी मानसिकता से ग्रसित बताया। यहाँ तक तो ठीक था  लेकिन इसके आगे जो हुआ और जो होने की चर्चा चल रही है उसके कारण श्री खरगे को जो सहानुभूति और कांग्रेस को राजनीतिक बढ़त हासिल हुई उस पर पानी फिरना तय है । जो खबरें आईं उनके अनुसार श्री गाँधी ने युवा कांग्रेस को निर्देश दिये हैं कि रा. स्व. संघ और भाजपा के दफ्तरों के सामने मनुस्मृति की प्रतियां जलाई जाएं। उसके बाद युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदयभानु चिब के नेतृत्व में दिल्ली में संघ और भाजपा  मुख्यालय के बाहर मनुस्मृति की प्रतियां और पन्ने जलाकर विरोध प्रदर्शन किया गया । साथ ही पूरे देश में ऐसा ही प्रतीकात्मक विरोध करने की घोषणा भी की गई । दरअसल आजकल श्री गाँधी पर दलितों का हितचिंतक बनने का भूत सवार है। लेकिन न तो उनके पास कोई वैचारिक पृष्ठभूमि है और न ही व्यक्तित्व। दलितों के बीच जाकर काम करने का  अनुभव भी इतना नहीं है जिसके आधार पर उनके दलित प्रेम को निश्छल और स्वाभाविक माना जाए। कभी - कभार किसी दलित के घर जाकर भोजन करने का नाटक तो प्रायः सभी नेता करते हैं ।  इसीलिए इन नौटंकियों का कोई असर नही होता। दरअसल श्री गाँधी आज तक यही नहीँ समझ सके कि जनता के दिलों में जगह कैसे बनाई जाती है। कांग्रेस अध्यक्ष का उनका कार्यकाल विफलता और दिशाहीनता का पर्याय बन कर रह गया। एक समय था जब उच्च जातियों के साथ ही दलित समुदाय में भी कांग्रेस का एकछत्र राज हुआ करता था। उ.प्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है। लेकिन कालांतर में पार्टी के हाथ से दोनों खिसकते गए। सवर्णों का बहुमत भाजपा के साथ जा मिला वहीं दलितों को बसपा ने खींच लिया। यादव और मुसलमान सपा के पाले में चले आये। परिणामस्वरूप कांग्रेस घुटनों के बल आ गई। उ.प्र जैसी हवा अन्य राज्यों में भी बहने से कांग्रेस अर्श से फर्श पर आ गई। बदहवासी में राहुल ब्राह्मण होने का स्वांग रचते देखे गये। उन्हें लगा इससे कांग्रेस का सवर्ण वोट बैंक वापस आ जाएगा। लेकिन राज्य दर राज्य पराजय का मुँह देखने के बाद उन पर जाति आधारित जनगणना की धुन सवार हुई। लेकिन वह भी काम नहीं आई तब वे जाति के अनुपात में प्रतिनिधित्व का ढोल पीटने लगे। हालांकि उनके राजनीतिक व्यवहार में कृत्रिमता और अक्खड़पन होने से हर दाँव उल्टा पड़ता गया। निराश होकर वे समाज में जातीय संघर्ष पैदा करने में जुट गए और बतौर औजार उस मनुस्मृति का इस्तेमाल करने लगे जो सामाजिक, वैधानिक और यहाँ तक कि आध्यात्मिक तौर पर भी पूर्णतः अप्रासंगिक हो चली थी। सामान्यतः हिंदुओं के घरों में रामायण, श्रीमद् भागवत और गीता होती है। गिने - चुने लोग वेद - पुराण भी संग्रहित करते हैं। अन्य धार्मिक पुस्तकें एवं पत्रिकाओं को पढ़ने वाले पाठक भी हैं किंतु मनुस्मृति पूरी तरह विस्मृत हो चुकी थी। किसी भी प्रवचन या धार्मिक अनुष्ठान में उसका उल्लेख अपवादस्वरूप ही सुनाई देगा। ऐसे में न जाने किसने श्री गाँधी को समझाइश दे दी कि  मनुस्मृति का सहारा लें तो शायद उनकी नैया पार लग जाए। इसीलिए संविधान की किताब लेकर घूमने वाले राहुल , मनुस्मृति लिए घूम रहे हैं। उनको लगता था कि पूरा दलित समुदाय उनके पीछे चल पड़ेगा किंतु एक बार फिर वे गलत साबित होने जा रहे हैं। उनकी मुहिम का असर ये हुआ कि मनुस्मृति देखते ही देखते राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन गई। इस ग्रंथ को महिला विरोधी प्रचारित करने की उनकी चाल उल्टी पड़ी और सोशल मीडिया पर मनुस्मृति में महिलाओं के सम्मान में कही गई बातों के उद्धरण देकर लोगों ने श्री गाँधी का मजाक उड़ाने के साथ ही ये चुनौती दे डाली कि हिम्मत है तो मुस्लिम समाज में महिलाओं की दशा पर कुछ बोलकर बताएं । अब मनुस्मृति को जलाने जैसी मूर्खता के कारण वे उस सवर्ण मतदाता को वापस भाजपा की ओर जाने मजबूर कर रहे हैं जो यूजीसी जैसे विवादों के चलते उससे छिटकने का मन बना रहा था। राहुल भूल गए कि उ.प्र में दलितों के मसीहा बनने के फेर में रामचरित मानस जलाने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य राजनीतिक परिदृश्य से ओझल हो चुके  हैं। ऐसा लगता है श्री गाँधी के सलाहकारों को भारत के लोगों की मानसिकता का लेश मात्र भी पता नहीं है । इसीलिए वे बजाय पिछली गलतियों से सबक लेने के उन्हें नई गलतियां करने के लिए उकसाते हैं। 

मनुस्मृति जलाने से कांग्रेस को नुकसान ही होगा

हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद कुछ सिरफिरे लोगों द्वारा मंच का शुद्धिकरण किये जाने की कांग्रेस ने कड़े शब्दों में निंदा करते हुए उस कृत्य के दोषी भाजपा कार्यकर्ताओं पर प्रकरण दर्ज करने की मांग की थी। पार्टी का आरोप है कि  दलित नेता के अपमान के दोषियों को  कटघरे में खड़ा करने के बजाय उल्टे कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के विरुद्ध मामला दायर कर दिया गया। इसके विरोध में देश भर में कांग्रेस ने विरोध प्रदर्शन करते हुए भाजपा को दलित विरोधी मानसिकता से ग्रसित बताया। यहाँ तक तो ठीक था  लेकिन इसके आगे जो हुआ और जो होने की चर्चा चल रही है उसके कारण श्री खरगे को जो सहानुभूति और कांग्रेस को राजनीतिक बढ़त हासिल हुई उस पर पानी फिरना तय है । जो खबरें आईं उनके अनुसार श्री गाँधी ने युवा कांग्रेस को निर्देश दिये हैं कि रा. स्व. संघ और भाजपा के दफ्तरों के सामने मनुस्मृति की प्रतियां जलाई जाएं। उसके बाद युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदयभानु चिब के नेतृत्व में दिल्ली में संघ और भाजपा  मुख्यालय के बाहर मनुस्मृति की प्रतियां और पन्ने जलाकर विरोध प्रदर्शन किया गया । साथ ही पूरे देश में ऐसा ही प्रतीकात्मक विरोध करने की घोषणा भी की गई । दरअसल आजकल श्री गाँधी पर दलितों का हितचिंतक बनने का भूत सवार है। लेकिन न तो उनके पास कोई वैचारिक पृष्ठभूमि है और न ही व्यक्तित्व। दलितों के बीच जाकर काम करने का  अनुभव भी इतना नहीं है जिसके आधार पर उनके दलित प्रेम को निश्छल और स्वाभाविक माना जाए। कभी - कभार किसी दलित के घर जाकर भोजन करने का नाटक तो प्रायः सभी नेता करते हैं ।  इसीलिए इन नौटंकियों का कोई असर नही होता। दरअसल श्री गाँधी आज तक यही नहीँ समझ सके कि जनता के दिलों में जगह कैसे बनाई जाती है। कांग्रेस अध्यक्ष का उनका कार्यकाल विफलता और दिशाहीनता का पर्याय बन कर रह गया। एक समय था जब उच्च जातियों के साथ ही दलित समुदाय में भी कांग्रेस का एकछत्र राज हुआ करता था। उ.प्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है। लेकिन कालांतर में पार्टी के हाथ से दोनों खिसकते गए। सवर्णों का बहुमत भाजपा के साथ जा मिला वहीं दलितों को बसपा ने खींच लिया। यादव और मुसलमान सपा के पाले में चले आये। परिणामस्वरूप कांग्रेस घुटनों के बल आ गई। उ.प्र जैसी हवा अन्य राज्यों में भी बहने से कांग्रेस अर्श से फर्श पर आ गई। बदहवासी में राहुल ब्राह्मण होने का स्वांग रचते देखे गये। उन्हें लगा इससे कांग्रेस का सवर्ण वोट बैंक वापस आ जाएगा। लेकिन राज्य दर राज्य पराजय का मुँह देखने के बाद उन पर जाति आधारित जनगणना की धुन सवार हुई। लेकिन वह भी काम नहीं आई तब वे जाति के अनुपात में प्रतिनिधित्व का ढोल पीटने लगे। हालांकि उनके राजनीतिक व्यवहार में कृत्रिमता और अक्खड़पन होने से हर दाँव उल्टा पड़ता गया। निराश होकर वे समाज में जातीय संघर्ष पैदा करने में जुट गए और बतौर औजार उस मनुस्मृति का इस्तेमाल करने लगे जो सामाजिक, वैधानिक और यहाँ तक कि आध्यात्मिक तौर पर भी पूर्णतः अप्रासंगिक हो चली थी। सामान्यतः हिंदुओं के घरों में रामायण, श्रीमद् भागवत और गीता होती है। गिने - चुने लोग वेद - पुराण भी संग्रहित करते हैं। अन्य धार्मिक पुस्तकें एवं पत्रिकाओं को पढ़ने वाले पाठक भी हैं किंतु मनुस्मृति पूरी तरह विस्मृत हो चुकी थी। किसी भी प्रवचन या धार्मिक अनुष्ठान में उसका उल्लेख अपवादस्वरूप ही सुनाई देगा। ऐसे में न जाने किसने श्री गाँधी को समझाइश दे दी कि  मनुस्मृति का सहारा लें तो शायद उनकी नैया पार लग जाए। इसीलिए संविधान की किताब लेकर घूमने वाले राहुल , मनुस्मृति लिए घूम रहे हैं। उनको लगता था कि पूरा दलित समुदाय उनके पीछे चल पड़ेगा किंतु एक बार फिर वे गलत साबित होने जा रहे हैं। उनकी मुहिम का असर ये हुआ कि मनुस्मृति देखते ही देखते राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन गई। इस ग्रंथ को महिला विरोधी प्रचारित करने की उनकी चाल उल्टी पड़ी और सोशल मीडिया पर मनुस्मृति में महिलाओं के सम्मान में कही गई बातों के उद्धरण देकर लोगों ने श्री गाँधी का मजाक उड़ाने के साथ ही ये चुनौती दे डाली कि हिम्मत है तो मुस्लिम समाज में महिलाओं की दशा पर कुछ बोलकर बताएं । अब मनुस्मृति को जलाने जैसी मूर्खता के कारण वे उस सवर्ण मतदाता को वापस भाजपा की ओर जाने मजबूर कर रहे हैं जो यूजीसी जैसे विवादों के चलते उससे छिटकने का मन बना रहा था। राहुल भूल गए कि उ.प्र में दलितों के मसीहा बनने के फेर में रामचरित मानस जलाने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य राजनीतिक परिदृश्य से ओझल हो चुके  हैं। ऐसा लगता है श्री गाँधी के सलाहकारों को भारत के लोगों की मानसिकता का लेश मात्र भी पता नहीं है । इसीलिए वे बजाय पिछली गलतियों से सबक लेने के उन्हें नई गलतियां करने के लिए उकसाते हैं। 

- रवीन्द्र वाजपेयी