विपक्ष द्वारा प्रस्तुत अविश्वास प्रस्ताव धराशायी होने के बाद लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला ने साफ - साफ कह दिया कि सदन कानून से ही चलेगा। उल्लेखनीय है अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस मिलते ही उन्होंने सदन में आना बंद कर दिया था। दोबारा सदन में आने पर उनके तेवर पूर्ववत ही दिखाई दिए जबकि विपक्ष अपराधबोध से ग्रसित था क्योंकि जिस व्यक्ति पर उसने तमाम आरोपों की झड़ी लगा दी थी उसी को माननीय कहकर संबोधित करना पड़ रहा है। वैसे भी प्रस्ताव पर बहस में विपक्ष अपेक्षित पैनापन नहीं दिखा सका । कई मर्तबा तो ऐसा लगा जैसे वह प्रस्ताव रूपी बोझ को जल्द - से जल्द उतारना चाहता था। प्रस्ताव गिरना तो था ही लेकिन विपक्ष चाहता तो आए दिन उत्पन्न होने वाले गतिरोध को दूर करने का रास्ता निकालकर अपने लिए सुखद स्थिति बना सकता था किंतु वह एक बार फिर चूक गया। संसदीय प्रणाली में अध्यक्ष /सभापति सदन का मुखिया होता है। विषय सूची , विभिन्न दलों को बोलने का समय निर्धारण के वेसाथ ही विवाद की स्थिति में व्यवस्था देने जैसे निर्णय उसके अधिकार क्षेत्र में होते हैं। उसकी अध्यक्षता में एक कार्य मंत्रणा समिति भी होती है जिसमें विभिन्न दलों का सदस्य संख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व होता है। विपक्ष के समझदार नेता अध्यक्ष या सभापति से सौजन्यतापूर्ण संबंध बनाकर अपने लिए बेहतर स्थितियां निर्मित कर लेते हैं। डॉ.राममनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर, मधु लिमये,जॉर्ज फर्नांडीज, लालकृष्ण आडवाणी, सोमनाथ चटर्जी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली जैसे विपक्षी नेताओं को हर पीठासीन अधिकारी बोलने के लिए पर्याप्त समय ही नहीं देते थे बल्कि उनके भाषण के बीच में टोकाटाकी करने वाले सत्ता पक्ष के सांसदों को फटकार भी लगाते थे। आज वैसे विपक्षी नेता संसद में इक्का - दुक्का ही हैं । ऐसा ही आपसी सद्भाव प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष में हुआ करता था। पंडित नेहरू के दौर में विपक्ष की संख्या कम होने के बाद भी उसके कुछ सांसद सरकार को घेरने में कामयाब हो जाते थे। इंदिरा जी के समय में कटुता बढ़ी किंतु उसके बावजूद अटल जी और चन्द्रशेखर जैसे नेताओं के साथ उनका संवाद बना रहा। पी.वी नरसिम्हा राव और अटल जी के निजी रिश्ते भी जगजाहिर थे। हालांकि संसद में दोनों एक दूसरे की तीखी आलोचना में परहेज नहीं करते थे। लोकसभाध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति सामान्यतः सत्ता पक्ष से जुड़े होते हैं किंतु विपक्ष सम्मान का भाव रखते हुए शालीन व्यवहार करे तो वे भी उसे संरक्षण देने में पीछे नहीं रहते। विपक्ष को सरकार और आसंदी के विरुद्ध बोलने का पूरा अधिकार है किंतु उसमें मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। यदि श्री गांधी समय - समय पर प्रधानमंत्री और श्री बिरला से मेल - मुलाकात करते रहें तो इससे आपसी संबंध सुधरने के अलावा संसद का वातावरण भी खुशनुमा रहेगा। उनको शरद पवार से सीखना चाहिए जो राजनीतिक मतभेद भुलाकर गाहे - बगाहे प्रधानमंत्री से मिलकर अपने क्षेत्र की समस्याओं को समाधान करवा लेते हैं। कुछ समय पहले प्रियंका वाड्रा ने सदन में विनम्रता पूर्वक परिवहन मंत्री नितिन गडकरी से अपने क्षेत्र के विकास कार्यों के लिए चर्चा हेतु समय मांगा जिसे मंत्री ने तत्काल स्वीकार कर कहा कभी भी आइए। बाद में प्रियंका उनसे मिलीं। इसी कारण सत्तापक्ष के एक सांसद ने कहा भी प्रियंका को नेता प्रतिपक्ष होना चाहिए। स्मरणीय है उक्त अविश्वास प्रस्ताव पर श्री गांधी ने हस्ताक्षर नहीं किए तब कहा गया कि ऐसा संसदीय लोकतंत्र की परंपराओं का पालन करने के लिए लिया गया है, जिसमें विपक्ष के नेता द्वारा सीधे स्पीकर के खिलाफ याचिका पर हस्ताक्षर करना उचित नहीं माना जाता। यदि यही सौजन्यता वे श्री बिरला से मिलकर व्यक्त कर आते तब बात इतनी नहीं बढ़ती। अब जबकि अविश्वास प्रस्ताव गिर चुका है तब विपक्ष को चाहिये वह सदन के वातावरण में घुल चुकी कटुता दूर करने अपने व्यवहार में लचीलापन लाए। हर समय तैश में बोलना अथवा सत्ता पक्ष और प्रधानमंत्री पर व्यर्थ के कटाक्ष करने से श्री गांधी को कुछ लाभ नहीं होने वाला। बेहतर हो वे उन पूर्व विपक्षी नेताओं के व्यक्तित्व और कृतित्व का का अनुसरण करें जिनका सम्मान सत्ता पक्ष भी करता था।
- रवीन्द्र वाजपेयी