जैसी कि उम्मीद थी वही हुआ। अमेरिका और ईरान के बीच आज होने वाली दूसरे दौर की शांति वार्ता की टेबिल खाली पड़ी रह गई। इस्लामाबाद में अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस और उनकी टीम के आगमन का इंतजार होता रहा। उधर ईरान ने ये शर्त रख दी कि जब तक होर्मुज से अमेरिकी नाकेबंदी नहीं हटेगी वह बातचीत नहीं करेगा। इस पर डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने चिर - परिचित अंदाज में धमकी दी कि बातचीत नहीं होने पर युद्धविराम की अवधि खत्म होते ही ईरान पर जबरदस्त हमला करते हुए उसके बिजली संयंत्र और पुल वगैरह तबाह कर दिए जाएंगे। हालांकि ताजा जानकारी के अनुसार उन्होंने युद्धविराम बढ़ाने की घोषणा भी कर दी किन्तु इस बार उसकी कोई अवधि नहीं बताई। अपितु ये कह दिया कि ईरान की ओर से ठोस प्रस्ताव आने तक उसे जारी रखा जाएगा। साथ ही वे बातचीत पूरी होने तक प्रतीक्षा करेंगे चाहे उसका अंजाम कुछ भी हो। ट्रम्प के इस ऐलान से ये तो स्पष्ट हो गया कि ईरान की तरह से ही अमेरिका भी होर्मुज़ को हथियार बनाकर अपना हाथ ऊपर रखना चाह रहा है। ये बात सही है कि इस समुद्री रास्ते के अवरुद्ध रहने से ईरान को भारी नुकसान हो रहा है। तेल उत्पादक अन्य खाड़ी देशों के लिए भी होर्मुज का बंद रहना समस्या पैदा करने वाला है। वहीं यूरोप सहित दुनिया के तमाम देश इस जलडमरूमध्य को तत्काल खोलने का दबाव बना रहे हैं क्योंकि नाकेबंदी से उनको मिलने वाली कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति रुकी हुई है। शुरू में ईरान ने होर्मुज़ बंद करने का दांव चलकर पूरी दुनिया को परेशान किया और अब अमेरिकी नौसेना द्वारा रास्ता रोके जाने से विश्व भर में ऊर्जा संकट बढ़ता जा रहा है। हालांकि इसके लिए ज्यादा दोषी ईरान को ही कहा जाएगा जिसने पहले होर्मुज से तेल टैंकरों की आवाजाही रोकी और फिर टोल वसूली के जरिए पैसा कमाने की तरकीब सोची। लेकिन उसका मंसूबा पूरा नहीं हो सका क्योंकि ट्रम्प इस बात को भांप गए कि होर्मुज से आवागमन जारी रहने से ईरान की अर्थव्यवस्था को संबल मिल जाएगा। इसीलिए 15 दिन के युद्धविराम की घोषणा होते ही अमेरिका ने अपना जहाजी बेड़ा अड़ाकर ईरान की मुसीबत बढ़ा दी। ईरान ने इसीलिए बातचीत जारी रखने के लिए नाकेबंदी हटाए जाने की शर्त तो रख दी परंतु अमेरिका द्वारा परमाणु ईंधन सौंपे जाने जैसे प्रस्ताव पर चुप्पी साधे हुए है। दरअसल जब दोनों पक्ष एक दूसरे पर ऐसी शर्तें थोप रहे हों जिन्हें मान लेने का आशय झुक जाना होगा तब बातचीत कैसे आगे बढ़ेगी ये बड़ा सवाल है। जहां तक बात पाकिस्तान की है तो ये स्पष्ट हो गया है कि इस बातचीत में वह केवल अमेरिका का संदेशवाहक है। पहले दौर की बातचीत से ही स्पष्ट हो गया कि न तो वह अमेरिका को कुछ समझाने की हैसियत रखता है और न ही ईरान उसकी बात मानने राजी है। इसलिए होर्मुज को लेकर उसने एक शब्द न ईरान से कहा और न ही अमेरिका से। दरअसल ट्रम्प ने शांति वार्ता के लिए इस्लामाबाद का चयन इसलिए किया क्योंकि ईरान का प्रतिनिधिमंडल दूर किसी देश में जाने के लिए सम्भवतः राजी नहीं होता। आज की वार्ता को ग्रहण लग जाने के बाद ट्रम्प द्वारा युद्धविराम को बढ़ाया जाना उनकी मजबूरी है। वहीं ईरान द्वारा बातचीत से कन्नी काटने के पीछे का कारण ये है कि वह आमने - सामने बैठकर अपनी शर्त मनवाने की स्थिति में नहीं रह गया है। इससे अलग हटकर देखें तो दोनों पक्ष एक दूसरे की कमजोरी जान गए हैं। ईरान समझ गया है कि अमेरिका ले - देकर इस जंग से निकलना चाह रहा है। वहीं ट्रम्प भी भांप चुके हैं कि युद्ध जारी रखने पर भी कुछ हासिल होने वाला नहीं है। दुनिया के तमाम बड़े देश भी उनके गैर जिम्मेदाराना रवैए से नाराज हैं जिनमें अमेरिका के पुराने दोस्त भी हैं। यही वजह है कि दोनों पक्ष धमकियां तो बढ़ - चढ़कर दे रहे हैं किंतु लड़ाई से बचना भी चाह रहे हैं। ये स्थिति कब तक जारी रहेगी ये कहना मुश्किल है क्योंकि जहां डोनाल्ड ट्रम्प पूरी तरह से अविश्वसनीय हैं वहीं ईरान का नेतृत्व भी पुख्ता निर्णय लेने में असमर्थ दिख रहा है। ये देखते हुए किसी अप्रत्याशित घटनाक्रम की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि होर्मुज दोनों पक्षों के लिए प्रतिष्ठा के प्रश्न से अधिक गले की फांस बन गया है।
- रवीन्द्र वाजपेयी