रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन वर्तमान विश्व के सबसे वरिष्ट राष्ट्राध्यक्ष हैं। वर्ष 2000 से लगातार वे रूस जैसी विश्व शक्ति का नेतृत्व करते आ रहे हैं। सोवियत संघ के बिखराव के बाद रूस आर्थिक बदहाली के साथ ही राजनीतिक अस्थिरता में फंस चुका था। उद्योग ठप पड़ने से विश्व व्यापार में उसकी हिस्सेदारी नगण्य थी। दरअसल सोवियत संघ के दौर में पूर्वी यूरोप के साम्यवादी देश उसके आर्थिक उपनिवेश थे किंतु अचानक सब उलट - पुलट हो गया। सोवियत संघ तो टुकड़ों में बँटा ही उसके प्रभावक वाले साम्यवादी देश भी मुक्त अर्थव्यवस्था के प्रति आकर्षित होकर अमेरिका की तरफ झुकने लगे। कभी - कभी तो लगा रूस भी अमेरिका का पिट्ठू बनकर रह जाएगा। चीन ने भी उसके साथ सटी सीमा में अपनी चिर - परिचित हरकतें शुरू कर दीं। ऐसे में रूस की खुफिया एजेंसी के.जी.बी के पूर्व प्रमुख पुतिन ने जब सत्ता संभाली तब किसी को उम्मीद नहीं थी कि वे देश को संकट से उबारकर विश्व शक्ति की हैसियत वापस दिलवा सकेंगे। लेकिन अपने दृढ इरादों का परिचय देते हुए उन्होंने रूस को आर्थिक और सैन्य क्षेत्र में एक बार अग्रणी देशों के बीच ला खड़ा किया । साथ ही कूटनीति रूपी शतरंज में भी अपनी चालों से सभी को चकित कर दिया। यही कारण है कि पूरा विश्व उनके फैसलों को गंभीरता से लेता है। शुरुआत में ऐसा लग रहा था कि यूक्रेन के साथ लड़ाई करके उन्होंने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली । हालांकि 3 साल बाद भी वे भले ही यूक्रेन को घुटने नहीं टिकवा सके किंतु उसके बड़े भूभाग पर रूसी सेनाएं काबिज हैं । अमेरिका और उसके समर्थक देशों द्वारा थोपे गए आर्थिक प्रतिबंधों ने रूस की जबरदस्त घेराबंदी की किंतु पुतिन ने भारत और चीन के साथ व्यापार बढ़ाकर उस चक्रव्यूह को भेदने में सफलता हासिल कर ली। और जब अमेरिका ने ईरान पर हमला किया तब उन्होंने चीन के साथ मिलकर ईरान को सैन्य सहायता के अलावा कूटनीतिक समर्थन देकर अमेरिका को उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया जहाँ से वह न आगे बढ़ने की हिम्मत कर पा रहा है और न ही पीछे ही हटने की स्थिति में है। पुतिन के बढ़े हुए आत्मविश्वास का ताजा उदाहरण गत दिवस ब्रिक्स सम्मेलन में मिला जब जी - 7 नामक समूह पर तंज कसने में उन्होंने कोई संकोच नहीं किया। इस समूह में अमेरिका, कैनेडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और ग्रेट ब्रिटेन शामिल हैं। यूरोपियन यूनियन भी इसमें आमन्त्रित रहता है। ब्रिक्स बिजिनेस समिट में बोलते हुए पुतिन ने उक्त समूह को तथाकथित जी 7 कहते हुए सवाल उठाया कि वे खुद को महान क्यों कहते हैं, जबकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में उनका योगदान काफी घट चुका है। उन्होंने कहा कि गत पांच वर्षों में दुनिया की जीडीपी में ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी 40% से अधिक रही जबकि जी-7 देशों की केवल 29% । पुतिन के अनुसार, वैश्विक आर्थिक वृद्धि का अशिकांश हिस्सा ब्रिक्स देशों से आया जिससे साफ है कि अब नए विकास केंद्र उभर रहे हैं। इसी के साथ उन्होंने पश्चिमी देशों पर निशाना साधते हुए कहा कि यूरोप और दुनिया भर में चल रही उथल-पुथल पश्चिमी नेतृत्व की नीतिगत गलतियों का दुष्परिणाम है। उल्लेखनीय है पुतिन ने उक्त बात तब कही जब चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग दिल्ली नहीं पहुंचे थे। ऐसे में ब्रिक्स के मंच से जी 7 जैसे आर्थिक दिग्गज की वजनदारी को चुनौती देकर उन्होंने जो नया मोर्चा खोला वह उनकी कूटनीतिक पहल का प्रमाण है। भारत चूंकि इस सम्मेलन का मेजबान है इसलिए वह ऐसी कोई भी बात कहने से बचेगा जो विवाद उत्पन्न करे किंतु अमेरिका विरोधी लामबंदी की बागडोर पुतिन को सौंपकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चतुराई का ही परिचय दिया। ब्रिक्स सम्मेलन में सबसे पहले पहुंचकर रूसी राष्ट्रपति ने श्री मोदी से बातचीत के दौरान कुछ बड़े रक्षा सौदों को अंतिम रूप देने का जो प्रयास किया वह भी अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी देशों को चुनौती है। भारत और चीन के बीच चले आ रहे सीमा विवाद के बावजूद वे पुतिन ही हैं जो श्री मोदी और जिनपिंग के बीच पुल की भूमिका में हैं। ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी, पुतिन और जिनपिंग की जुगलबंदी का जो नया रूप सामने आ रहा है उसके चलते वैश्विक राजनीतिक संतुलन में बड़ा बदलाव आने की सम्भावना मजबूत हो रही है।
- रवीन्द्र वाजपेयी