नितिन नबीन जब भाजपा के अध्यक्ष बने तब पार्टी के कार्यकर्ता और नेता तक भौचक रह गए। हालांकि वे भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय महासचिव रह चुके थे किंतु उस दौरान भी उनका नाम बिहार के अलावा अन्य राज्यों के भाजपाईयों ने भी नहीं सुना होगा। यद्यपि वे अपने पिता की सीट बांकीपुर से चार बार विधायक रहे और प्रदेश सरकार में मंत्री भी। उनके राजनीतिक कौशल ने पार्टी नेतृत्व को तब प्रभावित किया जब छत्तीसगढ़ के पिछले विधानसभा चुनाव में उनके चुनाव प्रभारी रहते पार्टी को बड़ी विजय मिली। उनको राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाये जाने पर ये चर्चा भी चली कि प. बंगाल के विधानसभा चुनाव में कायस्थ मतदाताओं को लुभाने के लिए भाजपा ने उनकी ताजपोशी की। वैसे उनके गृहराज्य बिहार में भी कायस्थों की बड़ी संख्या तथा राजनीतिक प्रभाव रहा है। नितिन के चयन का आधार बनी उनकी 46 वर्ष की आयु भी बनी। हालांकि राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद खाली की गई उनकी बांकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव में जनसुराज पार्टी के प्रशांत किशोर की बड़ी जीत से उनकी किरकिरी भी हुई। लेकिन उसके बाद से वे लगातार दौरा करते हुए पार्टी कैडर में अपनी पहिचान बनाने में जुटे हुए हैं। दिल्ली वि.वि छात्रसंघ चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को मिली सफलता से ये संकेत मिला कि युवाओं के बीच बढ़ते असंतोष के बावजूद भाजपा का वैचारिक आधार बरकरार है। दरअसल पिछले कुछ महीनों के घटनाक्रम से भाजपा के माथे पर पसीना छलकने लगा था । दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले हुए आंदोलन के जरिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की युवा विरोधी छवि बनाने का जो प्रयास हुआ उससे भाजपा के साथ ही रा. स्व. संघ भी चिंतित हो उठा। इसीलिए प्रधानमंत्री और संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत के युवाओं से प्रत्यक्ष संवाद के कार्यक्रम आयोजित हुए। निकट भविष्य में होने वाले चुनावों में युवाओं को अपने पाले में खींचने सभी दल प्रयासरत हैं। भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने और बनाये रखने में युवाओं का बड़ा योगदान है। लेकिन पार्टी और संघ दोनों को ये एहसास हो चला है कि जो नया मतदाता पहली बार मतदान करेगा उसके साथ सामंजस्य बिठाने में बुजुर्ग या अधेड़ नेता कामयाब नहीं हो सकेंगे। इसीलिए पार्टी अब संगठन और सत्ता में अपेक्षाकृत युवा चेहरों को आगे लाने की तैयारी में है। विभिन्न राज्यों में कम आयु वर्ग के मुख्यमंत्री बनाये जाने से इसके संकेत मिलने लगे थे। नितिन नबीन को पार्टी अध्यक्ष बनाकर उस प्रक्रिया को और आगे बढ़ाया गया। उनकी कार्यकारिणी में भी युवा चेहरों को काफी महत्व मिला । यदि यूजीसी और नीट पेपर लीक जैसी समस्याएं न आई होतीं तब शायद श्री मोदी अपने मंत्रीमंडल में भी फेरबदल करते हुए ऐसे युवा सांसदों को शामिल कर चुके होते जो छवि और क्षमता दोनों कसौटियों पर खरे उतरे हैं। ताजा खबर के अनुसार पार्टी संगठन में सबसे ताकतवर माने जाने वाले संसदीय बोर्ड से भी अति बुजुर्गों की जगह नये सदस्यों को शामिल किये जाने साथ ही केंद्रीय मंत्रीमंडल का भी पुनर्गठन भी जल्द होगा। हालांकि कुछ वरिष्ट मंत्रियों को तो नहीं छेड़ा जा सकता अन्यथा उंगलियां प्रधानमंत्री पर भी उठेंगी । लेकिन उन मंत्रियों की छुट्टी की जाएगी जिनका प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा। उल्लेखनीय है प्रधानमंत्री ने हाल ही में मंत्रियों के कार्यों की समीक्षा की थी। सही बात ये है कि किसी भी पार्टी को अपना जनाधार बनाये रखना है तो उसे नये नेतृत्व का सृजन करते रहना चाहिए क्योंकि जो नये मतदाता पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं वे नई सोच रखते हैं। जिस तरह टीम का कप्तान वरिष्ट होने पर भी तभी सफल हो पाता है जब उसके पास कुछ युवा खिलाड़ी भी हों जिनमें जीत के प्रति जुनून हो। इसी तरह प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की लोकप्रियता के बाद भी सरकार की छवि मंत्रियों के किया - कलापों पर निर्भर होती है। धर्मेंद्र प्रधान इसके सबसे ताजा उदाहरण हैं। शिक्षा मंत्री रहते हुए वे अपने विभाग को ठीक से संभाल नहीं सके जिसकी वजह से पार्टी और प्रधानमंत्री दोनों के सामने, छवि का संकट उत्पन्न हो गया। इसीलिए श्री प्रधान को कुर्सी छोड़ना पड़ी । भाजपा के लिए ये अच्छा है कि वह छोटे - छोटे झटकों से संभल गई जबकि बाकी पार्टियां इसकी हिम्मत नहीं जुटा पाने के कारण कमजोर होती जा रही हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी