Friday, 21 August 2026

जेन जी आंदोलन को मुख्य धारा की राजनीति का समर्थन नहीं



बीते एक दशक में अनेक युवा चेहरे धूमकेतु की तरह उभरे जिन्होंने  बड़े - बड़े आंदोलन खड़े कर सरकार को चुनौती दी । भले ही वे उसे अंजाम तक नहीं पहुंचा सके किंतु  युवाओं का एक वर्ग उनके प्रति आकृष्ट हुआ। उनके आह्वान पर जमा हजारों की भीड़  जोशीले भाषण सुनकर तोडफ़ोड़ और हिंसा के रास्ते पर चलने में भी नहीं डरती। हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकुर, जिग्नेश मेवाणी,  कन्हैया कुमार , उमर खालिद, शर्जील इमाम और ऐसे ही अनेक नाम युवा क्रांति के अग्रदूत बनकर परिदृश्य पर उभरे किंतु जिस तेजी से उनका सितारा चमका उसी तेजी से वह फीका पड़ गया।इनमें से कुछ जेल में हैं, कुछ मामूली सफलता पाकर संतुष्ट हैं और बाकी ने अपना भविष्य सुरक्षित करने के लिए किसी राजनीतिक पार्टी का दामन थाम लिया। लेकिन उसके बाद भी वे उस शोहरत को बरकरार नहीं रख सके जो उन्हें कुछ समय के लिए मिली। दरअसल उन्होंने जिस जमीन बड़ी इमारत खड़ी करने का दुस्साहस किया वह ठोस नहीं थी। किसी  ज्वलंत मुद्दे को गर्म करके भीड़ एकत्र कर उसे  उकसाने में उन्हें भले ही सफलता मिली किंतु वह टिकाऊ नहीं हो सकी। दरअसल वे इस बात को नजरंदाज कर बैठे कि भीड़ को संगठित शक्ति में बदलना  कठिन होता है। वह क्षणिक तौर पर तो प्रभाव छोड़ती है किंतु जल्द ही उसमें बिखराव आने लगता है। महत्वाकांक्षाओं का टकराव  अंतर्कलह का रूप लेता है जिसके कारण  आंदोलन का मूल स्वरूप नष्ट होकर निजी हित सर्वोपरि हो जाते हैं।  उदाहरण के तौर पर  हार्दिक पटेल और कन्हैयाकुमार जैसे नाम उल्लेखनीय हैं। हार्दिक ने गुजरात की शक्तिशाली पटेल जाति को भाजपा सरकार के विरुद्ध सड़कों पर उतारकर  राजनीतिक समीकरण उलट - पुलट करने की संभावना उत्पन्न कर दी थी। लेकिन अंततः वे भी भाजपा शरणम् गच्छामि होकर विधायक बने बैठे हैं। दलितों की आवाज उठाकर प्रकाश में आये जिग्नेश भी लंबी रेस का घोड़ा नहीं बन पाए। दिल्ली स्थित वामपंथियों की वैचारिक नर्सरी कहे जाने वाले जे. एन. यू के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार अपनी ओजस्वी भाषण शैली के चलते वामपंथ के भविष्य  के तौर पर उभरे। लेकिन जब कोई संभावना नहीं दिखी तब कांग्रेस में आकर राहुल गाँधी के पिछलग्गू बन बैठे। 2019  में बिहार के घरेलू मैदान बेगूसराय और 2024 में बाहरी दिल्ली में उन्हें शर्मनाक पराजय झेलना पड़ी जबकि इस सीट पर लाखों की संख्या में बिहारी मतदाता हैं। इसी तरह का उदाहरण है अन्ना हजारे के आंदोलन से उत्पन्न आम आदमी पार्टी जो भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था का नारा लगाकर सत्ता तक जा पहुंची।  उसके आकर्षण में फंसकर अनेक  प्रतिभाशाली युवा अपना स्वर्णिम भविष्य दांव पर लगाकर साफ - सुथरी राजनीति का झंडा उठाये घूमने लगे। लेकिन जल्द ही उसके अनेक संस्थापक  खुद बाहर आ गये और जिन्होंने अरविंद केजरीवाल को उनके वायदे याद दिलाये उन्हें धकियाकर बाहर कर दिया गया। इसी तरह अनेक युवा भी निराश होकर दूसरे रास्ते पर चले गये। आज पार्टी की दशा और दिशा क्या है ये बताने की जरूरत नहीं है। उपरोक्त उदाहरण देने का उद्देश्य ये बताना मात्र है कि क्षणिक उन्माद के बल पर चमकने वाले आंदोलन और उसका नेतृत्व करने वाले चंद चेहरे समय के प्रवाह में कहाँ ओझल हो जाते हैं,  पता ही नहीं चलता। बीते कुछ समय से हमारे देश में युवाओं को समूहबद्ध कर एक बड़ा आंदोलन खड़ा करने का अभियान चल रहा है। जेन जी नामक एक  आयु वर्ग को सामने लाकर व्यवस्था में व्याप्त विकृतियों के विरुद्ध आंदोलन के जरिये सत्ता को चुनौती देने का प्रयोग शुरू किया गया जिसका पहला प्रदर्शन दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए आंदोलन के रूप में देखा गया।लेकिन तात्कालिक सफलता के बाद वह सैलाब जैसे आया वैसे ही चलता बना। अब उसके कथित नेता अपने लिए किसी भूमिका की तलाश में हैं। लेकिन जो युवा शक्ति उस आंदोलन में नजर आई उसका कोई संगठित ढांचा नहीं होने के कारण उस आंदोलन की उपलब्धियों से ज्यादा उसके साथ जुड़ी नकारात्मक बातों की चर्चा हो रही है। ये कहना भी गलत न होगा कि आंदोलन में शामिल अनेक युवा और छात्र अपराधबोध से ग्रसित हैं। दो दिन पहले लद्दाख़ जा रही एक युवती ने जेन जी के नाम पर वहाँ उपस्थित सेना के अधिकारी और सुरक्षा बल के लोगों से जो बेहूदगी की उसकी पूरे देश में निंदा हो रही है। जेन जी को मोहरा बनाकर देश में अव्यवस्था और  अराजकता फैलाने की जो योजना कुछ लोगों ने तैयार की थी वह शुरुआती दौर में ही दम तोड़ती दिख रही है क्योंकि उसके पीछे अधकचरी सोच और देश को अस्थिर करने में लगीं विदेशी शक्तियों का हाथ है। यही वजह है कि इस खेल को मुख्य धारा की राजनीति का समर्थन हासिल नहीं हो पाया। ऐसे में बड़ी बात नहीं अभिजीत दिपके और उनके कुछ साथी जल्द ही किसी पार्टी की गोद में बैठे दिखें। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 20 August 2026

कांग्रेस के फैसले से अलगाववादी ताकतों का हौसला बुलंद होगा



कांग्रेस कार्यसमिति ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम के केवल दो पद ही गाने का प्रस्ताव गत दिवस पारित कर दिया। उसका कहना है कि 1937 में भी पार्टी द्वारा वंदे मातरम के प्रारंभिक दो पद ही गाने का निर्णय तमाम बड़े नेताओं की उपस्थिति में किया गया था। और उसी के आधार पर आजादी के बाद जब संविधान बना तब गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा रचित जन गण मन को राष्ट्रगान घोषित किया गया। वहीं वंदे मातरम को राष्ट्रगीत की मान्यता देते हुए उसके शुरुआती दोनों पद गाने पर सहमति बनी। तब से अभी तक यही परिपाटी चली आ रही थी । सरकारी आयोजनों में राष्ट्रगीत होने के साथ ही वंदे मातरम का गायन अनिवार्य नहीं था। लेकिन मानसून सत्र में संसद ने इसे भी राष्ट्रगान के समकक्ष मान्यता देते हुए ये कानून पारित कर दिया कि वंदे मातरम का गायन राष्ट्रगान के पहले होगा। इसके सभी छंद गाये जाएंगे और इस दौरान सभी खड़े रहेंगे। नये कानून के अनुसार वंदे मातरम का अपमान दंडनीय अपराध होगा। लेकिन कांग्रेस सांसद  इमरान मसूद ने तो    सार्वजनिक रूप से कहा है कि इस्लाम का अनुयायी होने से उन्होंने वंदे मातरम न कभी गाया , न कभी गाएंगे। ऐसे ही बयान कुछ मुस्लिम संगठनों के नेताओं ने भी दिये। इसका कारण राष्ट्रगीत के दो पदों के बाद के हिस्से में हिन्दू देवियों का महिमामंडन है। निजी तौर पर किसी व्यक्ति का अपनी धार्मिक मान्यताओं के वशीभूत ऐसा करने का औचित्य एक बार स्वीकार कर भी लिया जाए लेकिन  एक राजनीतिक दल जिसकी आजादी की लड़ाई में अग्रणी भूमिका रही हो , वह उस गीत के पूरे हिस्से से दूरी बनाते हुए केवल दो पदों को ही मान्य करे तब वह उस भावना का भी अपमान है जिसमें डूबकर स्वाधीनता सेनानी वंदे मातरम गाते थे। रही बात धार्मिक मान्यताओं  की तो मुस्लिम धर्मावलंबियों के मुताबिक  वे केवल अल्लाह की ही जयकार कर सकते हैं।  उस दृष्टि से तो राष्ट्रध्वज तिरंगे का अभिवादन करने के साथ ही भारत माता की जय बोलना भी इस्लामी मान्यताओं के विरुद्ध है। उल्लेखनीय है मुस्लिम  लीग ने स्वाधीनता के पहले भी वंदे मातरम का विरोध किया था। अब सवाल ये है कि कांग्रेस की देखासीखी अन्य पार्टियां भी कोई कारण बताकर वंदे मातरम के साथ ही राष्ट्रगान जन गण मन को पूरा गाने से इंकार करते हुए उसमें मनमाफिक संशोधन करने का प्रस्ताव पारित करें तब क्या ऐसा करने की छूट उन्हें दी जानी चाहिए? कुछ प्रदेशों ने तो राष्ट्रध्वज के साथ ही अपना अलग झंडा भी बना लिया जिस पर विवाद छिड़ा था। गौरतलब है हमारे संविधान तक में हिंदू देव पुरुषों  और पौराणिक प्रतीक चिन्हों के चित्र हैं। सरकार के अनेक संस्थानों के ध्येय वाक्य वैदिक मंत्रों पर आधारित हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की समाधि पर भी हे राम लिखा गया है। ये देखते हुए कांग्रेस द्वारा वंदे मातरम को लेकर जो प्रस्ताव पारित किया गया वह अनावश्यक भी है और आपत्तिजनक भी। हमारे देश में अनेक ऐसी क्षेत्रीय पार्टियां हैं जो संघीय ढांचे की अवधारणा का विरोध करती हैं। द्रमुक के एक नेता ने तो यहाँ तक धमकी दे डाली थी कि  राष्ट्रभाषा के नाम पर हिन्दी लादे जाने पर तमिलनाडु अलग देश बन जाएगा। पूर्वोत्तर में सक्रिय रहे अनेक अलगाववादी संगठन भी देश से अलग होने की धमकी देते रहे हैं। जम्मू कश्मीर में धारा 370 रहते तक अलगाववाद की भावना चरम पर थी। ऐसे में यदि कांग्रेस जैसी देश की सबसे पुरानी पार्टी राष्ट्रगीत जैसे राष्ट्रीय सम्मान के प्रतीक को आधा - अधूरा स्वीकार करे तो इससे उन ताकतों का हौसला बुलंद होता है जिन्हें भारत को माँ कहने में शर्म आती है। कांग्रेस के इस फैसले के राजनीतिक स्तर पर होने वाले विरोध से परे हटकर देखें तो ये एक खतरनाक सोच को बढ़ावा देने वाला है। जल्द ही पंजाब में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं जहाँ खालिस्तान समर्थक सिर उठा रहे हैं। दिल्ली में हुए किसान आंदोलन के दौरान लालकिले पर राष्ट्रध्वज के स्थान पर एक धार्मिक झंडा लगाए जाने का दुस्साहस तक किया गया। अरुंधती रॉय जैसे लोग आज भी जम्मू कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानते। जेएनयू के वामपंथी छात्र संगठन आजादी - आजादी का जो नारा लगाते हैं वह भी अलगाववाद से प्रेरित ही है। ऐसे में कांग्रेस को वंदे मातरम में कांट- छांट करने जैसा प्रस्ताव पारित करने के पहले उसके संभावित नुकसान के बारे में सोचना चाहिए था। महज इसलिए कि भाजपा सरकार ने उसके बारे में कानून बनाकर उसे सम्मान दिया, उसका विरोध करना बेहद गैर जिम्मेदाराना निर्णय है। यदि किसी को अपने धार्मिक बंदिशों के चलते राष्ट्रगीत गाने में ऐतराज है तो ये उसका निजी मामला हो सकता है लेकिन एक राजनीतिक पार्टी ऐसा सोचे तो ये राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध होगा। कांग्रेस को इससे राजनीतिक नुकसान होगा सो अलग। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 19 August 2026

प. एशिया में परमाणु युद्ध की आशंका बढ़ रही




पूरी दुनिया को हलाकान करने वाला प. एशिया संकट सुलझने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच हुए युद्धविराम के बाद ऐसा लगा था कि शायद शांति कायम हो जाएगी किंतु दोनों ही पक्षों के अड़ियल रवैये के चलते जंग रुक - रुककर चलती ही रही। इसके लिए कुछ सीमा तक इजरायल भी कसूरवार है जिसने युद्धविराम को न मानते हुए लेबनान और उसके यहाँ सक्रिय हिज़्बुल्लाह नामक आतंकवादी संगठन के ठिकानों पर हमले जारी रखे। इससे नाराज ईरान  भी हमलावर रुख अपनाने से बाज नहीं आया। सबसे बडी़ समस्या बना होर्मुज नामक जलडमरूमध्य जहाँ से दुनिया को 20 फीसदी कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति होती है। यद्यपि इस समुद्री मार्ग के एक भाग पर ओमान की हिस्सेदारी भी है किंतु फिलहाल तो ईरान ने यहाँ के यातायात पर अपना नियंत्रण स्थापित कर रखा है और जो भी जहाज गुजरते हैं उनसे भारी - भरकम टोल टैक्स वसूल रहा है। हालांकि उसने ओमान को होर्मुज के नियंत्रण में साझेदार बनाने की पेशकश भी की लेकिन अमेरिका इसके लिए राजी नहीं है । कल ही उसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने होर्मुज को अमेरिका का हिस्सा बताते हुए नया नक्शा जारी कर दिया। प. एशिया के इस तनाव ने पूरी दुनिया को ऊर्जा संकट में डाल दिया है। दाम बढ़ने के साथ ही आपूर्ति प्रभावित होने से लगभग सभी देश परेशान हैं। इस बेवजह की लड़ाई के लिए कौन जिम्मेदार है ये कह पाना मुश्किल है। हालांकि शुरुआत गाजा का शासन संभाल रहे हमास द्वारा इजरायल पर किये अप्रत्याशित  हमले से हुई। इस इस्लामिक आतंकवादी संगठन की पीठ पर ईरान का हाथ सर्वविदित है। लेकिन पहले वार में सफल होने के बाद हमास का वह दुस्साहस गाजा के विनाश का कारण बन गया। हमास को नेस्तनाबूत करने के साथ ही इजरायल ने गाजा पर अपना कब्जा जमा लिया। इसके बाद ही उसके प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने डोनाल्ड ट्रम्प को ईरान पर हमला करने के लिए उकसाया। वैसे भी अमेरिका लंबे समय से ईरान से खार खाये बैठा था और उसके परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए पहले भी वह बमबारी कर चुका था। ट्रम्प को लगा ये अच्छा अवसर है ईरान को घुटनाटेक करवाते हुए वहाँ अपने अनुकूल सत्ता कायम करने का। पहले ही दिन उसके सर्वोच्च शासक खामेनेई की हत्या में सफलता मिलने से अमेरिका और इजरायल दोनों का हौसला आसमान पर जा पहुंचा। अमेरिका में जा बसे ईरान के शाह के बेटे को तेहरान लाकर उनकी ताजपोशी की योजना भी बना ली गई।लेकिन ईरान ने जंग को  बड़े हिस्से में फैलाते हुए अमेरिका और इजरायल दोनों को चौंका दिया।दुबई, ओमान, अबू धाबी, सऊदी अरब, कतर जैसे देशों में बने अमेरिकी सैनिक अड्डों पर मिसाइलें दागकर ट्रम्प की हेकड़ी निकाल दी। ईरान की ये कार्रवाई अभी भी जारी है। ट्रम्प द्वारा ईरान को दी गई धमकियाँ बंदर घुड़की साबित हुई हैं। भले ही अमेरिकी बमबारी ने ईरान को दशकों पीछे धकेल दिया हो किंतु उसे झुकाने का मंसूबा धरा का धरा रह गया। होर्मुज को ईरान के कब्जे से मुक्त करवाने में भी ट्रम्प नाकामयाब साबित हुए। ऐसे में  इस लड़ाई का अंत दिखाई नहीं दे रहा। ईरान ट्रम्प की कोई शर्त मानने राजी नहीं है। दूसरी तरफ इजरायल भी आर - पार के मूड में है। ईरान के पड़ोसी देश शांति की कोई पहल करते भी हैं तो कभी ट्रम्प और नेतन्याहू टांग फंसा देते हैं, कभी ईरान बाधक बन जाता है। संरासंघ इस समूचे घटनाक्रम में मिट्टी का माधो साबित हुआ है। वहीं रूस खुद ही यूक्रेन के साथ अंतहीन जंग में उलझा है जबकि चीन ईरान को पर्दे के पीछे रहकर पूरी मदद करने के बावजूद सामने आने तैयार नहीं है। इस प्रकार  कोई बड़ी ताकत इस लड़ाई को रुकवाने आगे नहीं आ रही। जहाँ तक भारत का प्रश्न है तो ये परिस्थिति बेहद तकलीफदेह है। खाड़ी देशों से कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति पर तो असर पड़ा ही इन देशों को  होने वाले निर्यात पर भी विपरीत असर पड़ा है। ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस से खरीदी करने पर ट्रम्प लगातार बढ़ाते हुए टैरिफ को 100 फीसदी तक ले आये। आज की स्थिति में इस संकट का हल किसी को नहीं पता। हालांकि अमेरिका और ईरान दोनों को बड़ा नुकसान होने के साथ ही उनकी सैन्य क्षमता भी न्यूनतम स्तर पर आ गई है। लेकिन अभी भी अमेरिका, ईरान और इजरायल तीनों युद्ध रोकने के कोई संकेत नहीं दे रहे। ऐसा लगता है कोई भी ये एहसास नहीं होने देना चाह रहा कि उसका दम फूल गया। हालांकि इस अनिश्चितता के बीच इस बात की आशंका उत्पन्न होने लगी है कि इस लड़ाई का अंत परमाणु अस्त्रों से न हो क्योंकि ट्रम्प जैसा सिरफिरा व्यक्ति  पागलपन में किसी भी सीमा तक जा सकता है। और ऐसा हुआ तब इस लड़ाई के विश्वयुद्ध में बदलने का खतरा और बढ़ जाएगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 18 August 2026

भारत का भविष्य रांची आंदोलन के जेन जी हैं जंतर मंतर के गालीबाज नहीं



देश की राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर नीट परीक्षा पेपर लीक के मुद्दे पर नवगठित कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले हुए आंदोलन को जेन जी के आक्रोश का प्रतीक बताकर ये अवधारणा स्थापित करने का सुनियोजित प्रयास किया गया कि  कुछ हजार लोग ही देश के छात्रों और युवाओं के प्रतिनिधि हैं। लेकिन छात्रों की समस्याओं के नाम पर  सरकार पर दबाव बनाने के लिए किये गए उस आंदोलन का असली उद्देश्य जल्द सामने आ गया जब आम आदमी पार्टी के साथ ही वामपंथी गिरोह उस पर काबिज हो गए। देखते - देखते  कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में शुरू हुए आंदोलन पर उन वामपंथी आंदोलनजीवियों ने कब्जा कर लिया जिनमें भारत तेरे टुकड़े होंगे का नारा लगाने और जम्मू कश्मीर को भारत का अविभाज्य अंग नहीं मानने वाले तत्व शामिल थे। इसका खुलासा तभी हो गया जब उमर खालिद और शर्जिल इमाम के पक्ष में नारेबाजी के साथ ही हिंदू राष्ट्र और मनुवाद के विरुद्ध मंच से भी आपत्तिजनक बातें कही गईं। कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं से अपेक्षित था कि वे नक्सली मानसिकता  में डूबे  देश विरोधी तत्वों को जंतर मंतर से बाहर करते किंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि वे खुद भी उसी गैंग के सदस्य हैं। इसका प्रमाण उनके रास्वसंघ विरोधी बयानों से मिल गया। लेकिन इस आंदोलन का सबसे घिनौना रूप तब सामने आया जब  प्रधानमंत्री को अश्लील गालियाँ दी जाने लगीं। लड़के ही नहीं बल्कि कम उम्र की लड़कियों को माँ - बहन की गालियां देते हुए देखकर पूरा देश शर्मसार हो गया। जंतर मंतर पर मौजूद युवकों और युवतियों के एक वर्ग ने जिस स्तर के अश्लील पोस्टर प्रदर्शित किये वह मानसिक विकृति का चर्मोत्कर्ष था। केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र के बाद तो मोदी विरोधी पत्रकारों का समूह इस बात का ढोल पीटने बैठ गया कि जेन जी ने सरकार को झुका दिया और यही 2029 में सत्ता बदलने वाली ताकत बनेगी। लेकिन जंतर मंतर के समानांतर छात्रों और युवाओं का एक और आंदोलन झारखंड की राजधानी रांची में भी चल रहा था। राज्य में हुई परीक्षाओं में धांधली के विरोध में धरना देकर बैठे युवाओं की मांग उनके जरिये हुई नियुक्तियाँ रद्द करने और भ्रष्टाचार की जाँच करवाने की थी। वहाँ भी जंतर मंतर जैसा माहौल था। युवा धरना दे रहे थे, अनशन  जारी था, नारे गूँज रहे थे। विधानसभा का घेराव करने का प्रयास करने वाले जत्थों पर लाठी चार्ज सहित वही सब हुआ जो दिल्ली पुलिस ने किया। लेकिन मोदी विरोधी दरबारी मीडिया को रांची आंदोलन में रुचि नहीं थी क्योंकि वहाँ के जेन जी ने किसी नेता को गाली नहीं दी, अश्लील नारेबाजी या नंगापन दर्शाती प्रचार सामग्री नहीं लहराई गई। और जब जेएनयू के ढपली बाजों ने  वहाँ पहुंचकर माहौल में गंदगी फैलानी चाही तब उन्हें आंदोलन स्थल से बाहर कर दिया गया। इस आंदोलन से जुबानी हमदर्दी तो राहुल गाँधी, प्रियंका वाड्रा, अभिजीत दिपके ने दिखाई और लाठीचार्ज की निंदा भी की। लेकिन झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के विरुद्ध  एक शब्द नहीं कहा। इसके अलावा प्रकाश राज , अरुंधती रॉय, नसीरुद्दीन शाह और शबाना आज़मी ने भी रांची के जेन जी के पास जाने की सौजन्यता नहीं दिखाई। जंतर मंतर के गाली गलौच भरे माहौल में क्रांति की आहट सुनने वाले दिमागी नक्सलियों को रांची आंदोलन से इसलिए एलर्जी थी क्योंकि उसके पीछे राष्ट्रवादी ताकतें थीं। वहाँ के जेन जी किसी जाति के विरोध में नारे नहीं लगा रहे थे और उनका आचरण अनुशासित था। आखिरकार गत दिवस मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को आंदोलन की मुख्य मांगें मानना पड़ी। उसके बाद आंदोलनकारियों ने भी जश्न मनाया किंतु किसी सितारा होटल में नहीं बल्कि सड़कों पर ही। देखना ये है कि पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का जो वर्ग जंतर मंतर आंदोलन में शामिल जेन जी में भारत  का भविष्य और सत्ता परिवर्तन के सपने देखने लगा है वह रांची के जेन जी आंदोलन की सफलता का क्या आकलन करता है? ये प्रश्न इसलिए  उठ खड़ा हुआ है क्योंकि देश के युवाओं ने दो स्थानों पर एक जैसे मुद्दे पर, एक ही शैली का आंदोलन किया किंतु जिसकी सबसे ज्यादा चर्चा हुई उसमें अश्लीलता, बेअदबी, उद्दंडता और विध्वंसक मानसिकता का बोलबाला नजर आया ।  वहीं दूसरे आंदोलन ने जेन जी के संस्कारित, अनुशासित, व्यवस्थित और रचनात्मक होने का उदाहरण  सामने रखा। रांची आंदोलन की सफलता उन लोगों के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा है जो युवा पीढ़ी को जबरन गलत रास्ते पर धकेलने का षडयंत्र रच रहे थे।  ढपली बजाकर आजादी मांगने वाले वामपंथी छात्र संगठनों को भी ये गलतफहमी छोड़ देनी चाहिए कि देश का जेन जी जेएनयू से निकलने वाली मानसिकता से प्रभावित है। भारत का भविष्य सही अर्थों में रांची आंदोलन में शामिल युवा शक्ति है न कि जंतर मंतर के हुड़दंगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 17 August 2026

दिमागी नक्सली: निशाना सही जगह लगा



स्वाधीनता दिवस पर लालकिले से  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनेक मुद्दों पर  सरकार की कार्य योजना देश के सामने रखी। इनमें विद्यार्थियों पर केंद्रित ऑन लाइन कोचिंग और 1 करोड़ युवाओं को ए.आई.(आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस) प्रशिक्षण संबंधी घोषणा के अलावा समुद्र से तेल निकालकर आत्मनिर्भरता हासिल करना और परमाणु ऊर्जा के उत्पादन के लक्ष्य पूरे करना भी है। श्री मोदी ने देश के विकास के लिए शक्ति की सप्तधारा का आह्वान किया, जिसमें मैन्युफैक्चरिंग, गतिशक्ति, और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता जैसे प्रमुख कार्य शामिल हैं।  ऊर्जा सुरक्षा पर जोर देते हुए उन्होंने देश में सेमीकंडक्टर संयंत्र और महत्वपूर्ण खनिजों के उत्पादन को बढ़ाने की जरूरत के साथ ही युवाओं से डिजिटल जनगणना अभियान में सक्रिय रूप से भाग लेने और सटीक डेटा ऑनलाइन अपलोड करने का आह्वान किया। राष्ट्रगीत वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने का विशेष उल्लेख भी उनके भाषण में विशेष रूप से हुआ। और लालकिले से पहली बार राष्ट्रागान जन, गण , मन के अलावा वंदे मातरम के सभी छंदों को प्रस्तुत किया गया। लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा आंतरिक सुरक्षा को सुदृढ़ करने दिमागी नक्सलियों से सतर्क रहने का जो आह्वान किया उसे लेकर विवाद पैदा हो गया। उन्होंने हाल ही में सशस्त्र नक्सलवादियों के सफ़ाये का उल्लेख करते हुए आगाह किया कि उसके बाद भी देश में इस मानसिकता वाले  लोगों को भड़काकर समाज को बांटना चाहते हैं जिनसे बचना चाहिए। हालांकि शहरी नक्सली शब्द का उपयोग पहले भी  किया जाता रहा है। लेकिन दिमागी नक्सली शब्द पहली बार उपयोग में आया। संभवतः उनका अभिप्राय ये था कि  हिंसा फैलाकर देश में साम्यवादी शासन व्यवस्था स्थापित करने के षडयंत्र में जुटे हथियारबंद नक्सलवादियों के खात्मे के उपरांत भी उनके मानस पुत्र दूसरे रूप में सामाजिक जीवन में घुसे हुए हैं और  व्यवस्था के विरुद्ध लोगों को उकसाकर आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। इन दिमागी नक्सलियों के बीच सोशल मीडिया के जरिये संवाद और संपर्क कायम रहने से कुछ विशिष्ट समूह बन गए हैं जिनका एकमात्र काम देश को अराजकता में धकेलना है। प्रधानमंत्री द्वारा इनसे सतर्क रहने की अपील किये जाने के बाद से ही इस तबके की घबराहट सामने आ गई। चूंकि नक्सली हिंसा को कभी भी जनसमर्थन नहीं मिला इसलिए उसके अदृश्य प्रवक्ता  पत्रकार, साहित्यकार , अध्यापक और एनजीओ चलाने वाले कथित सामाजिक कार्यकर्ता अप्रत्यक्ष तौर पर साम्यवादी विचारधारा के प्रसार का प्रयास करते रहते हैं।  इस मुहिम में इन्होंने कांग्रेस सहित हर उस राजनीतिक पार्टी में घुसपैठ की जो रास्वसंघ और भाजपा की विरोधी हो। शिक्षा, साहित्य,कला संस्कृति, इतिहास, समाचार जगत, सिनेमा जैसी विधाओं में इन्होंने अपनी जगह बनाई। लेकिन बीते एक दशक से ये वर्ग परेशान है क्योंकि   इनके षडयंत्र बेनकाब होने लगे। इन दिमागी नक्सलियों में हताशा इसलिए भी बढ़ रही हैं क्योंकि प. बंगाल और त्रिपुरा के बाद केरल की सत्ता भी इनके हाथ से निकल गई। ऐसे में केवल दिमागी नक्सलियों के जरिये ही साम्यवादी अपना अस्तित्व बचाने का ताना - बाना बुन रहे हैं। जब प्रधानमंत्री ने इनके इरादों पर सीधे चोट की तो  सहानुभूति हासिल करने के लिए ये प्रचार करने लगे कि सरकार से सवाल पूछने और व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों का विरोध करने वालों को  नक्सली कहकर भयभीत किया जा रहा है। पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम भी खुद को दिमागी नक्सली बताने लगे। स्मरणीय है इनके कार्यकाल में नक्सलियों द्वारा कई बड़े नरसंहार किये गए थे किंतु इनकी सरकार उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकी । अब जबकि वर्तमान गृहमंत्री अमित शाह ने हथियारबंद नक्सलियों का खात्मा करने में सफलता हासिल कर ली तब नक्सली मानसिकता के पैरोकारों में घबराहट फैलना लाजमी है। प्रधानमंत्री द्वारा इनके विरुद्ध लोगों को सावधान रहने की अपील किये जाने  के बाद ये तबका नक्सली विचारधारा को अभिव्यक्ति की आजादी और सरकार के विरोध से जोड़कर खुद को पाक साफ साबित करने में जुट गया है। लेकिन भारत के युवाओं सहित समाज का बड़ा वर्ग इनके जाल में नहीं फंसने वाला। चंद ढपलीबाजों के झुंड यदि युवाओं को प्रभावित करने में सक्षम होते तो इस देश में माओवादी सत्ता आ चुकी होती। मौजूदा परिदृश्य को देखते हुए प्रधानमंत्री द्वारा दिमागी नक्सलियों पर जो निशाना लगाया वह सही जगह जाकर लगा है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 15 August 2026

विदेशी पैसे से रचा जा रहा देश को कमजोर करने का षडयंत्र



     आजादी का पर्व प्रत्येक भारतीय के लिए गौरव की अनुभूति का अवसर है , चाहे वह देश में रहता हो याp दुनिया के किसी अन्य हिस्से में। इसलिये इसकी रक्षा करना भी हम सभी का परम कर्तव्य है। स्वाधीनता के बाद अनगिनत कठिनाइयों से गुजरकर भारत ने विश्व में अपना सम्मानजनक स्थान बनाया तो उसके पीछे प्रत्येक देशवासी का योगदान है , चाहे वह किसान , श्रमिक, उद्योगपति - व्यवसायी या स्वरोजगार से जुड़ा छोटा उद्यमी ही क्यों न हो। असंगठित क्षेत्र में कार्यरत करोड़ों लोगों ने भी देश की विकास यात्रा को गतिशील बनाने में उल्लेखनीय भूमिका का निर्वहन किया है। आज का भारत आत्मनिर्भरता और आत्म सम्मान का प्रतीक है। 
    वो दिन इतिहास  बन चुके हैं जब हमें  खाद्यान्न आयातित करना पड़ता था। अपनी सैन्य जरूरतों के लिए भी जहाँ हम पूरी तरह बड़ी शक्तियों पर आश्रित थे वहीं आज  हम रक्षा उत्पादनों का निर्यात कर रहे हैं। शिक्षा, चिकित्सा, विज्ञान, तकनीक जैसे क्षेत्रों में भी भारत ने सफलता के नये आकाश छूने का कारनामा कर दिखाया है। धरती से अंतरिक्ष तक हमारी उपलब्धियों से पूरा विश्व प्रभावित है। निश्चित रूप से ये सफलताएं संतोष का विषय हैं। हमारी अर्थव्यवस्था तनावपूर्ण वैश्विक हालातों  के बाद भी  तेजी से  बढ़ रही है । वैश्विक समुदाय के रूप में  भारतवंशियों ने दुनिया भर में अपनी प्रतिभा के झंडे गाड़कर देश का सम्मान बढ़ाया है। लेकिन इन सुखद स्थितियों के बावजूद  एक वर्ग विशेष अपनी नकारात्मक सोच के साथ निराशा फैलाने में जुटा है। किसी भी उपलब्धि पर संदेह व्यक्त करना इनकी कार्यशैली है । यहाँ तक कि सेना के पराक्रम को भी झुठलाने में इन्हें लज्जा नहीं आती।   जनता द्वारा लगातार ठुकराए जाने के बाद हताशा में डूबे ये लोग देश को भीतर से कमजोर कर राजनीतिक अस्थिरता फैलाने का षडयंत्र रच रहे हैं। जाहिर है भारत के उत्थान से परेशान विदेशी ताकतें इन कोशिशों को हवा दे रही हैं। चुनाव प्रणाली, न्यायपालिका और संसद जैसे संवैधानिक संस्थानों के प्रति अविश्वास का भाव उत्पन्न कर अव्यवस्था फैलाने के इस सुनियोजित प्रयास के प्रति प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक को सतर्क होकर उसे विफल करने आगे आना चाहिए। सीमा के पार बैठे शत्रु की पहिचान करना कठिन नहीं है किंतु घर के भीतर के दुश्मनों के चेहरों को अनावृत करना आज के दौर की सबसे बड़ी प्राथमिकता है। 
     भारत की बढ़ती शक्ति से बेचैन वैश्विक शक्तियाँ आर्थिक, कूटनीतिक और सैन्य दबाव बनाकर हमें दबाना चाहती हैं। उनका मुकाबला करने  का जो साहस देश ने दिखाया वह हमारे आत्मविश्वास का प्रतीक है। लेकिन इसे बनाये रखने के लिए सब एक आवाज में बोलें ये जरूरी है। राजनीतिक मतभिन्नता अपनी जगह है किंतु जहाँ बात देश के सम्मान और हितों की हो तब सारे मतभेद भुलाना ही राष्ट्रभक्ति है।   ऑपरेशन सिंदूर के बाद एक ओर जहाँ भारत के सामर्थ्य की सराहना दुनिया भर में हुई वहीं कुछ बड़े देश ईर्ष्या से भर उठे और अनुचित दबाव डालकर हमारे मनोबल को तोड़ना चाहते हैं। दुर्भाग्य से उन्हें अपने देश के ही कुछ तत्व प्रोत्साहित कर रहे हैं जिन्हें सिवाय अपने स्वार्थ के और कुछ नहीं दिखता। हाल ही में छात्रों के आंदोलन की आड़ में अराजकता और अश्लीलता का जो शर्मनाक अनुभव देश ने किया वह भविष्य के खतरों की ओर इशारा करता है।  दरअसल हथियारबंद नक्सलियों के सफ़ाये के बाद भी शहरी नक्सलियों के रूप में विध्वंसक तत्व  सक्रिय हैं। इसीलिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज लाल किले से अपने भाषण में दिमागी नक्सलियों से देश को बचाने की जो बात कही , वह बेहद सामयिक और आवश्यक है। युवा पीढ़ी को विद्रोह के लिए भड़काकर आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न करने का जो षडयंत्र विदेशी पैसे पर पल रहे गद्दारों द्वारा रचा जा रहा है उससे हर देशवासी को सतर्क रहना होगा। साथ ही अपने बच्चों को जिन्हें जेन जी कहा जा रहा है , इन दिमागी नक्सलियों से दूर रखें अन्यथा हमारी एकता और अखंडता छिन्न - भिन्न होते देर नहीं लगेगी। 

    आइये, आज इस राष्ट्रीय पर्व पर थोड़ा समय  देश के भविष्य पर विमर्श हेतु भी निकालें क्योंकि सीमा के उस पार बैठे दुश्मन को सबक सिखाने के लिए तो हमारी सेनाएं  पूरी तरह समर्थ हैं। लेकिन देश को कमजोर करने वाली उन ताकतों के हौसले धवस्त करने का दायित्व हम सबका है जो आस्तीन का सांप बनी बैठी हैं। स्मरण रहे 15 अगस्त  केवल सरकारी आयोजन न होकर आत्मावलोकन एवं दायित्वबोध जागृत करने का अवसर भी है।

स्वाधीनता दिवस की अनंत शुभकामनाएं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 14 August 2026

भ्रष्टाचार के रहते खाद्य वस्तुओं में शुद्धता की उम्मीद करना बेकार


कुछ दिनों से  नकली पनीर और घटिया किस्म का घी पकड़े जाने की खबरें लगातार मिल रही हैं। चिंता तब  और बढ़ जाती है जब डी मार्ट जैसे नामी - गिरामी रिटेल स्टोर्स में गुणवत्ता विहीन खाद्य सामग्री बेची जा रही हो। पनीर के कुछ ब्रांड प्रतिबंधित भी हो रहे हैं। आजकल देश में क्विक डिलीवरी का व्यवसाय भी खूब चल पड़ा है जिसमें ब्लिंकिट नामक कंपनी काफी चर्चा में है जो ग्राहक द्वारा ऑर्डर की गई वस्तु चंद  मिनिटों में  ही उसके ठिकाने पर पहुंचा देती है , और किसी भी समय। इस कंपनी के अनेक भंडारों पर मारे गए छापों के बाद जो चित्र सार्वजनिक हुए वे डराने वाले हैं क्योंकि वहाँ भरपूर गंदगी के साथ कीड़े - मकोड़े घूमते मिले। अनेक खाद्य वस्तुओं की पैकिंग खुली पाई गई। सब्जी और फलों का रख - रखाव भी बेहद खराब तरीके का मिला। गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को सख़्त लहजे में चेतावनी दी कि देश में  खाद्य वस्तुओं के पैकेट पर सामने की तरफ चीनी, नमक और सैचुरेटेड फेट की मात्रा अंकित की जाए जिससे उपभोक्ता अंधेरे में न रहे। हालांकि अभी भी पैकेटबंद खाद्य वस्तुओं में उपयोग की जाने वाली सामग्री के नाम और मात्रा लिखने का नियम है किंतु बेहद बारीक अक्षरों में होने से उसे पढ़ना कठिन होता है। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को 15 दिनों की मोहलत देते हुए कहा है कि उसके बाद वह स्वयं आदेश पारित कर देगा।  इसलिए सरकारी मशीनरी हरकत में आयेगी ।  लेकिन सवाल ये है कि खाद्य वस्तुएँ बनाने वाली कंपनियों द्वारा पैकेट के ऊपर जो जानकारी दी जाएगी उसकी सत्यता की जांच कौन करेगा? ये बात इसलिए उठती है क्योंकि जिस सरकारी विभाग के पास इसका  जिम्मा है यदि वह ईमानदार होता तब खाद्य वस्तुओं में मिलावट और गुणवत्ता का अभाव जैसी समस्या ही उत्पन्न नहीं होती। जिन जांच लैब में खाद्य वस्तुओं के सैम्पल जाँच हेतु भेजे जाते हैं उनकी प्रामाणिकता भी संदेह के घेरे में है। इसीलिये अनेक बड़े नाम वाले ब्रांड की खाद्य वस्तुएँ गुणवत्ता के मानक पर खरी नहीं उतरने के बावजूद भी उनका बाल भी बांका नहीं होता। लेकिन छोटी हैसियत वाले  उत्पादक पर शिकंजा कसने की मुस्तैदी दिखाई देती है। विशेष रूप से त्यौहारों के अवसरों पर खाद्य विभाग का अमला शिकार पर निकलता है । दो - चार दिन छापेमारी होती है, सैंपल जांच हेतु भेजे जाते हैं, जिस स्थान पर खाद्य वस्तुओं का उत्पादन होता है वहाँ की गंदगी के चित्र प्रसारित करवाये जाते हैं , दूषित सामग्री की जप्ती कर उसे नष्ट किया जाता है, जुर्माना भी वसूला जाता है। लेकिन ये तमाशा ज्यादा दिन नहीं चल पाता। बदलती जीवनशैली, आर्थिक स्थिति में सुधार और  हैसियत के दिखावे के लिए आजकल पैकेट बंद खाद्य वस्तुओं का उपभोग बढ़ता जा रहा है। बिस्किट के साथ पैकेट बंद मिठाई, नमकीन का चलन भी जोरों पर । और अब तो  रोटी, पराठे, रेडी टु ईट सब्जियां आदि भी बाजार में उपलब्ध हैं। जूस, सॉस, जैम, जेली, अचार, आइसक्रीम, शेक, सॉफ्ट ड्रिंक्स , बेकरी उत्पाद जैसी दर्जनों चीजें बड़े पैमाने पर बन और बिक रही हैं। खाद्य तेलों का कारोबार भी फैलता जा रहा है। अर्थव्यवस्था की दृष्टि से देखें तो ये बेहद शुभ संकेत है। सरकार को टैक्स के साथ लोगों को रोजगार  भी मिलता है। लेकिन खाने - पीने की चीजों में होने वाली मिलावट और गुणवत्ता की कमी से उपभोक्ता का आर्थिक शोषण होने के साथ ही उसके स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर होता है। इसकी तुलना नकली या घटिया दवा बनाने और बेचने से करना गलत नहीं होगा। ये सवाल भी  उठ खड़ा होता है घटिया खाद्य सामग्री के उत्पादन को प्रारंभिक स्तर पर रोकने का प्रबंध क्यों नहीं होता? खाद्य विभाग मिठाई की गुणवत्ता की जाँच तो करता है किंतु उसमें उपयोग होने वाले वाले मावे या दूध की जाँच प्रारंभिक स्तर पर करने की कोई व्यवस्था नहीं है। ये सब देखते हुए कहा जा सकता है कि छापे मारकर  पनीर, घी , मिठाई आदि की जप्ती भी  कुछ दिन का तमाशा है। रही बात सर्वोच्च अदालत द्वारा दी गई हिदायत की तो वह भी सुनने में तो भले अच्छी लगे किंतु जब तक सरकारी तंत्र ईमानदार और संवेदनशील नहीं होगा तब तक किसी सुधार की उम्मीद करना व्यर्थ है। सही बात तो ये है कि भ्रष्टाचार और पैसे की असीमित भूख ने मानवीय संवेदनाओं को गहराई तक दफना दिया है। जिस देश में दवा के नाम पर ज़हर बिकता हो वहाँ खाद्य वस्तुओं की शुद्धता के दावे शपथपत्र देकर झूठ बोलने जैसा है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी