हमारे देश में राजनीति का जो स्वरूप है उसमें सही उपलब्धियां तो पीछे रह जाती हैं जबकि छोटी - छोटी बातों का ढिंढोरा पीटा जाता है। इसका ताजा उदाहरण है देश से नक्सली आतंक की समाप्ति । ये इतना बड़ा कारनामा है जिसकी राष्ट्रीय स्तर पर उसी तरह चर्चा होनी चाहिए थी जैसी जम्मू - कश्मीर से धारा 370 हटाने की हुई थी जिसने देश का बहुत नुकसान किया। इसके कारण ही इस सीमावर्ती राज्य में आतंकवाद की जड़ें जमने से राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हर पल मंडराता रहा। ये बात भी बिल्कुल सही है कि कश्मीर घाटी को पाकिस्तान समर्थक अलगाववादियों से बचाने के लिए सुरक्षा बलों के हजारों जवानों ने अपना बलिदान दिया। इसके अलावा हजारों बेगुनाह नागरिकों को आतंकवादियों ने मौत के घाट उतारकर दहशत फैलाई। 1990 की जनवरी में कश्मीरी पंडितों सहित लाखों अन्य गैर मुस्लिमों को रातों - रात अपना घर और कारोबार छोड़कर घाटी से जिस तरह भागना पड़ा वह स्वाधीन भारत की एक अत्यंत दर्दनाक घटना थी। इसीलिए जब धारा 370 हटी तब उन सभी लोगों के पेट में दर्द हुआ जो कश्मीर घाटी में अलगाववाद को हवा देकर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकते थे। बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उस महत्वपूर्ण निर्णय को अंजाम तक पहुंचाने वाले गृहमंत्री अमित शाह की प्रशंसा करने के धारा 370 हटाये जाने के तरीके पर ऐतराज जताया गया। कुछ बड़बोले नेताओं ने तो सत्ता में आने पर उसकी बहाली तक का वायदा कर डाला। सर्वोच्च न्यायालय तक में अपीलें की गईं। हालांकि देश का जनमत सरकार के साथ खड़ा होने से इन तत्वों को निराशा हाथ लगी। उसके बाद जब श्री शाह ने नक्सलवाद के सफ़ाये का संकल्प लिया तब उसके विरोध में भी एक वर्ग मुखर हो उठा। जिन शहरी नक्सलियों की धरपकड़ हुई उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर महिमामंडित करने का प्रयास भी हुआ। लेकिन गृहमंत्री ने बिना विचलित हुए अपना अभियान जारी रखा। बिहार, झारखंड, उड़ीसा, आंध्र, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ , उ.प्र और मध्यप्रदेश के बड़े भूभाग में नक्सलियों का आतंक देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन गया था। इसके पीछे चीन का हाथ जगजाहिर है। नक्सलियों ने नृशंस हत्याओं के जरिये दहशत फैलाने का जो जाल रचा उसके कारण जन सामान्य भी उन्हें आश्रय देने मजबूर हो गया। शासन - प्रशासन को आतंकित करने के लिए पुलिस कर्मियों और सुरक्षा बलों की हत्या करने में नक्सलियों ने कभी संकोच नहीँ किया। जिस किसी पर उनको संदेह हुआ कि वह उनकी सूचना पुलिस को देता है उसकी जान अत्यन्त निर्दयता से उन्होंने ली। छतीसगढ़ में एक साथ सुरक्षा बलों के 70 से भी अधिक जवानों और अधिकारियों को विस्फोटक के जरिये उड़ा देने का उनका कृत्य राक्षसी मानसिकता का वीभत्स प्रदर्शन था। इसी तरह वहाँ के दर्जन भर कांग्रेस नेताओं की सामूहिक हत्या ने भी समूचे तंत्र को आतंकित कर दिया। शोषण के विरुद्ध हथियार उठाकर माओवादी क्रांति करने का मंसूबा पालने वाले नक्सलियों ने अपने संगठनों के विभिन्न नाम ररखकर भ्रम फैलाने का दाँव चला। वहीं आर्थिक संसाधन जुटाने के लिए खनिज व्यवसायियों से गुंडा टैक्स की तरह वसूली प्रारंभ की। इसके अलावा साथी महिला नक्सलियों के यौन शोषण के आरोप भी लगने लगे। लेकिन अमित शाह ने लाइलाज माने जाने वाले नक्सली आतंक के खात्मे के लिए समयबद्ध कार्य योजना बनाकर 31 मार्च 2026 की तारीख तय की। शुरुआत में लगा ये असम्भव है किंतु उनका वह संकल्प अब हकीकत में बदल चुका है। इस अभूतपूर्व सफलता के बाद श्री शाह ने देश को नशा मुक्त करने का जो संकल्प लिया वह समय की मांग है। देश में ड्रग्स का कारोबार जिस तेजी से फैल रहा है वह भविष्य की बड़ी चिंताओं में से है क्योंकि इसके शिकंजे में फंसकर लाखों युवा अपना जीवन नष्ट कर चुके हैं। इसके अलावा ये अपराधों को भी जन्म दे रहा है। पंजाब और जम्मू कश्मीर जैसे सीमावर्ती राज्यों में ड्रग्स का फैलाव होने से यह विदेशी जासूसों के लिए सहायक हो रहा है। देश के भीतरी हिस्सों में भी ड्रग्स की आदत बड़ी सामाजिक समस्या बन चुकी है। ये देखते हुए गृहमंत्री द्वारा नशे रूपी जहर से देश को मुक्त करवाने की जो सोच दिखाई वह पूरी तरह जनहित के साथ ही युवा पीढ़ी को बर्बादी से रोकने का प्रयास है। इसका राजनीति से ऊपर उठकर समर्थन होना चाहिए। श्री शाह की कार्य शैली और संकल्प शक्ति देखते हुए ये विश्वास किया जा सकता है कि जिस तरह उन्होंने नक्सली आतंक से देश को बचाया उसी तरह वे ड्रग्स रूपी जहर से भी देश को मुक्ति दिलाएंगे।
- रवीन्द्र वाजपेयी