Tuesday, 28 April 2026

ईरान के पास होर्मुज खोलने के अलावा और कोई रास्ता नहीं


ऐसा लगता है ईरान अपने बनाए चक्रव्यूह में खुद ही उलझ गया है।  होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर वह सोच रहा था कि पूरी दुनिया उसके सामने नतमस्तक हो जाएगी किंतु अमेरिका ने जवाबी नाकेबंदी करते हुए उसकी अकड़ निकाल दी। इसकी वजह से दूसरे देशों के जहाजों की आवाजाही तो रुकी ही किंतु ईरान के अपने तेल की बिक्री भी ठप हो गई। इसके कारण उसकी भंडारण क्षमता जवाब देने लगी। यदि वह उत्पादन रोकता है तो तेल के कुओं में समुद्री जल भरने का खतरा है वहीं उत्पादन जारी रखने के बाद भी चूंकि  उस तेल का विक्रय नहीं हो पा रहा इसलिए उसे सुरक्षित रखना मुश्किल है।  होर्मुज के रास्ते से निकलने वाले जहाजों से टोल वसूलने की उसकी योजना भी अमेरिका द्वारा की गई नाकेबंदी से टांय - टांय फुस्स होकर रह गई।  डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा युद्धविराम को आगे बढ़ाए जाने पर ईरान को लगा कि अमेरिका लड़ाई जारी रखने से डर रहा है। लेकिन ट्रम्प ने इधर ईरान को बातचीत में उलझाकर रखा और उधर होर्मुज को घेरकर ईरान की आर्थिक रीढ़ पर प्रहार कर दिया। इस्लामाबाद में पहले दौर की बातचीत बेनतीजा खत्म होने के बाद ऐसा लगा था कि जंग दोबारा शुरू हो जाएगी किंतु अमेरिका ने बजाय सीधे लड़ने के दूसरे तरह का मोर्चा खोलकर ईरान को फंसा दिया। अगले दौर की शांति वार्ता में जिस तरह से रुकावटें आईं उनसे ईरान का राष्ट्रीय नेतृत्व भी परेशान है। उसके द्वारा रखी जाने वाली शर्तें अमेरिका द्वारा सिरे से खारिज की जा रही हैं। इस लड़ाई में बाकी अरब देशों पर हमले कर ईरान ने पड़ोस में रिश्ते इस कदर खराब कर लिए कि कोई उसकी मदद को सामने नहीं आ रहा। गत दिवस उसके विदेश मंत्री भागे - भागे रूस जाकर राष्ट्रपति पुतिन से मिले  और लौटकर बयान दे दिया कि अमेरिका उसे परमाणु कार्यक्रम जारी रखने की अनुमति दे तो वह होर्मुज खोलने राजी है। लेकिन ट्रम्प समझ गए कि ईरान की नस दबी हुई है इसीलिए उन्होंने न सिर्फ उसके प्रस्ताव को ठुकरा दिया बल्कि जल्द ही उसकी तेल लाइनों पर हमले की धमकी दे डाली। इस सबसे एक बात तो स्पष्ट है कि ईरान के पास अब सौदेबाजी के लिए केवल होर्मुज बच रहा है। यदि अमेरिका ने उसकी अन्य शर्तों को नहीं माना तब उसके पास इस समुद्री मार्ग को खोलने के सिवाय दूसरा कोई रास्ता नहीं बचेगा । दरअसल अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के बाद चीन ही ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीददार रहा है। उसके बदले वह ईरान को हथियारों की  आपूर्ति करता रहा है। इसमें दो राय नहीं है कि अमेरिका और इजराइल ने जिस इरादे से ईरान पर हमले किए थे वे इस हद तक ही पूरे हुए कि वह लंबी लड़ाई लड़ने लायक नहीं बचा। पूरे देश में जो बर्बादी हुई उससे उबरने में भी बहुत लंबा समय और संसाधन लगेंगे। लेकिन तेहरान में सत्ता पलट की जो उम्मीद ट्रम्प और इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने लगा रखी थी उसके पूरे होने के आसार भी नजर नहीं आ रहे। वहीं ये भी सच है कि ईरान ने चीन और रूस के बहकावे में आकर पलटवार करने का दुस्साहस तो कर दिया किन्तु वे दोनों दूर से तमाशा देखते रहे और ईरान पिटता रहा। आज की स्थिति में यदि अमेरिका और इजराइल  दोबारा जंग शुरू करने से बचना चाह रहे हैं तो ईरान भी आगे लड़ पाने में सक्षम नहीं है। इसीलिए वह रोजाना नए  - नए शांति प्रस्ताव देकर बचाव का रास्ता खोज रहा है। गत दिवस ईरानी विदेश मंत्री और पुतिन की मुलाकात के बाद ईरान ने परमाणु कार्यक्रम जारी रखे जाने के एवज में होर्मुज खोलने का प्रस्ताव रखा जिसे अमेरिका ने ठुकरा दिया। शांति वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर ईरान भी अब सतर्क हो गया है। उसके एक नेता ने पाकिस्तान की ईमानदारी पर संदेह भी जताया है। आज की स्थिति में ईरान के लिए यही श्रेयस्कर होगा कि वह मामूली शर्तों के साथ होर्मुज खोल दे। इससे उसकी अर्थव्यवस्था को भी सहारा मिलेगा वहीं उसे अन्य देशों की सहानुभूति भी प्राप्त हो सकेगी। उसे ये समझ लेना चाहिए कि वह न तो आर्थिक तौर पर पहले जैसा संपन्न है और न ही उसकी सैन्य क्षमता बड़ा मुकाबला करने लायक बची है। परिस्थितियों का तकाजा है कि वह इस संकट को किसी तरह टल जाने दे। उसे किसी रणनीतिकार की ये सलाह स्मरण रखनी चाहिए कि बहादुरी का सबसे बेहतर तरीका होशियारी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 27 April 2026

दिन ब दिन हिंसक हो रहा अमेरिकी समाज



अमेरिका में गत दिवस राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा वाशिंगटन के एक सुप्रसिद्ध होटल में पत्रकारों के लिए आयोजित रात्रि भोज में उस समय अफरातफरी मच गई जब आयोजन आयोजन कक्ष के बाहर हथियारबंद एक व्यक्ति ने कई गोलियां चलाकर दहशत फैला दी। सुरक्षा कर्मियों ने तत्काल सभी विशिष्टजनों को सुरक्षित निकाला और उस व्यक्ति को दबोच लिया। उसकी गोली एक सुरक्षा कर्मी को भी लगी किन्तु वह लाइफ जैकेट पहने हुए था इसलिए बच गया। हालांकि कोई बड़ी अनहोनी नहीं हुई। अब तक जो कुछ भी सामने आया उसके अनुसार पेशे से इंजीनियर हमलावर ट्रम्प सरकार से असंतुष्ट था। इस घटना के पीछे किसी बड़े षड़यंत्र की आशंका का पता नहीं चल सका।  ट्रम्प ने स्वयं भी कहा कि ईरान युद्ध से इसका कोई संबंध नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार से नाराज कोई व्यक्ति इस तरह का कदम क्यों उठाएगा जिसमें अव्वल तो खुद उसकी जान जाने का खतरा था और बच जाने पर पूरी जिंदगी जेल में सड़ना तय है। इसके साथ ही ये बात भी विचारणीय है कि एक साधारण  नागरिक महंगे स्वचालित हथियार आखिर क्यों रखेगा? लेकिन इस प्रश्न का उत्तर अमेरिका में इसलिए अप्रासंगिक है क्योंकि अपने लोकतंत्र पर इतराने और दुनिया के सबसे सम्पन्न और शक्तिशाली राष्ट्र होने के घमंड में चूर इस देश में आम आदमी  किसी भी तरह की पिस्तौल , रिवाल्वर, रायफल यहां तक कि ए.के 47 जैसी स्वचालित गन भी बिना लायसेंस के खरीदकर रख सकता है। इसका एक आशय ये भी है कि वहां प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सुरक्षा का प्रबंध खुद करना पड़ता है। साथ ही सरकार अपने नागरिकों को इतना समझदार समझती है कि वे इन हथियारों का उपयोग गलत उद्देश्य से नहीं करेंगे। लेकिन इसी अमेरिका के दो राष्ट्रपति अब्राहम  लिंकन और जॉन एफ.कैनेडी के  अलावा रॉबर्ट कैनेडी और मार्टिन लूथर किंग जैसे अनेक दिग्गज नेता इसी हथियार स्वतंत्रता के शिकार हो चुके हैं। इसके बाद वहां इस व्यवस्था को नियंत्रित करने पर काफी बहस चली। कुछ राज्यों ने प्रतिबंधात्मक नियम भी बनाए। लाइसेंस प्राप्त विक्रेता से ही शस्त्र खरीदने के साथ ही खरीददार की पृष्ठभूमि जांचने जैसी अनिवार्यता भी रखी गई और न्यूनतम आयु का निर्धारण भी किया गया। बावजूद इसके अमेरिका में गन कल्चर का बोलबाला रोका नहीं जा सका। दुनिया भर को उपदेश देने वाले अमेरिका की कानून व्यवस्था में भी तमाम विसंगतियां हैं। अनेक महानगर तो अपराधिक गतिविधियों के लिए कुख्यात हैं। इनमें रात्रि  के समय किसी सुनसान इलाके में जाना जान जोखिम में डालने जैसा है। लूटमार करने वाले  मांग पूरी नहीं होने पर बेरहमी से गोली मारकर भाग जाते हैं।  ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि अमेरिका में पिस्तौल और बंदूक जैसी खतरनाक चीज आसानी से उपलब्ध होने से उसके उपयोग के प्रति भी गंभीरता का नितान्त अभाव है। बीते कुछ सालों में सभ्यता के ठेकदार इस देश में किशोरावस्था के अनेक बच्चों ने बंदूक चलाकर अपने विद्यालय के सहपाठियों की हत्या कर डाली जिसका कारण मामूली आपसी विवाद निकला। समाजशास्त्रियों ने  ऐसी घटनाओं के बारे में निष्कर्ष निकाला कि माता - पिता के झगड़े संतानों को भी तनावग्रस्त बना रहे हैं। परिवार नामक संस्था के टूटते जाने का जो मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभाव बच्चों पर पड़ता है उसके कारण सामाजिक विघटन की स्थिति उत्पन्न हो चुकी है। आर्थिक समृद्धि और सामाजिक सुरक्षा के बावजूद आम अमेरिकी तनाव में जी रहा है। यद्यपि इस सबका गत दिवस वॉशिंगटन के होटल में हुए गोलीकांड से सीधा संबंध नहीं है जहां राष्ट्रपति ट्रम्प की पार्टी चल रही थी। लेकिन इस घटना से अमेरिका में हथियारों की आसान उपलब्धता के औचित्य पर तो प्रश्नचिन्ह लगा ही। इतने सम्पन्न देश में तो कानून व्यवस्था इतनी अच्छी होनी चाहिए कि आम नागरिक को पिस्तौल और बंदूक जैसी चीज़ें खरीदने की जरूरत ही न पड़े। मनोवैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं कि उत्तेजना की स्थिति में किसी व्यक्ति के पास हथियार होना उसके लिए आत्मघाती होने के साथ ही किसी अन्य की जान के लिए भी खतरा बन सकता है। हमारे देश में भी अपने खुद के हथियार से आत्महत्या करने के प्रकरण आए दिन सामने आते हैं। ऐसे में अमेरिका जैसे देश में जहां परिवार टूटने के साथ ही सामाजिक ढांचे की दरार चौड़ी होती जा  रही हो, हथियार रखने की आजादी खून की होली खेलने का अवसर प्रदान करती है। यद्यपि ये उसका आंतरिक मामला है किंतु भारतीय मूल के लाखों लोग अमेरिका में बसे होने से वहां खेल - खेल में गोलियां चल जाने की हर खबर उनकी कुशलता के प्रति चिंता उत्पन्न कर देती है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 25 April 2026

अन्ना हजारे का श्राप केजरीवाल का पीछा नहीं छोड़ रहा


जिस दिन आम आदमी पार्टी ने राघव चड्ढा को राज्यसभा में उपनेता पद से हटाया उसी दिन से उनके भाजपा में जाने की अटकलें लगाई जा रही थीं। लेकिन वैसा होने पर वे राज्यसभा सदस्यता से हाथ धो बैठते वहीं त्यागपत्र देने पर उनकी राजनीतिक वजन दारी खत्म हो सकती थी। इसीलिए राघव ने न सिर्फ अपनी सदस्यता बचाते हुए भाजपा का दामन थामा बल्कि अपने साथ 6 अन्य  सांसदों को भी बटोरकर  पार्टी के 10 सदस्यीय संसदीय दल में विभाजन करवा दिया। दो तिहाई सांसदों की बगावत होने से सभी दलबदल कानून के डंडे से बच गए। जहां तक बात श्री चड्ढा के भाजपा की गोद में बैठने की ही है तो इससे किसी को आश्चर्य नहीं हुआ किंतु वे 6 और सांसदों को तोड़कर  ले आयेंगे इसकी भनक किसी को भी नहीं थी। जैसी कि परम्परा है उन्होंने पार्टी पर अपने उद्देश्यों से भटकने का आरोप लगा दिया। हालांकि जिस भाजपा को वे हमेशा गरियाते रहे वह उन्हें अचानक  क्यों प्रिय लगने लगी ये उन्होंने नहीं बताया।  जिन अशोक मित्तल को उनकी जगह राज्यसभा में पार्टी का उपनेता नियुक्त किया गया उनके यहां हाल  ही में ई.डी ने छापा मारा था। इसलिए जब वे भी श्री चड्ढा के साथ भाजपा में आए तब ये सवाल  उठ खड़ा हुआ कि क्या वे छापे से  भयभीत होकर भाजपाई बने? हालांकि अन्य जिन पांच सांसदों ने पार्टी छोड़ी उन पर ऐसा कोई आरोप नहीं है और शैक्षणिक और पेशेवर दृष्टि से भी वे काफी योग्य हैं ,सिवाय सुप्रसिद्ध क्रिकेटर हरभजन सिंह के। सब कुछ इतना अचानक हुआ कि बड़े - बड़े खबरखोजी भी हतप्रभ रह गए। वैसे राघव का विद्रोह तो समझ में आने लायक था और श्री मित्तल के पाला बदलने की वजह भी स्पष्ट है किंतु बाकी 5 सांसद किस वजह से भाजपा में आए ये रहस्यों के घेरे में है। बहरहाल इस सबके  पीछे पंजाब विधानसभा का  अगला चुनाव है। हालांकि इन सांसदों में कोई भी ऐसा नहीं है जो पंजाब में बड़ा दखल रखता हो। लेकिन 7 सांसदों के पार्टी छोड़ने से आम आदमी पार्टी को  आघात तो लगा ही है। पंजाब में सरकार बनाने में राघव की भी भूमिका रही थी। इसीलिए वे वहां  से राज्यसभा भेजे गए। लेकिन बाद में  उनसे पंजाब का प्रभार छीन लिया गया। शराब घोटाले से दिल्ली विधानसभा चुनाव तक राघव पार्टी से दूर बने रहे। राज्यसभा में भी वे पार्टी लाइन से अलग हटकर मुद्दे उठाते रहे । लेकिन गत दिवस जो धमाका उन्होंने किया उसके बाद ये चर्चा जोरों पर है कि पंजाब में  आम आदमी पार्टी के 50 विधायक भी पाला बदलने वाले हैं। इसके पीछे आलाकमान के साथ ही मुख्यमंत्री भगवंत मान का रूखा व्यवहार बताया जाता है।  7 सांसदों के दलबदल से बौखलाई आम आदमी पार्टी अपना गुस्सा भाजपा पर उतार रही है लेकिन श्री केजरीवाल ये भूल जाते हैं कि आज जिसे वे गद्दारी कह रहे हैं ये तो उन्हीं के द्वारा शुरू की गई थी जब उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु अन्ना हजारे को  अपमानित कर हाशिए पर धकेल दिया। उसके बाद पार्टी के संस्थापकों में से प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, डॉ . धर्मवीर, कुमार विश्वास , कपिल मिश्र, शाजिया इल्मी, आशुतोष आदि भी पार्टी छोड़ने मजबूर हुए। कुछ को तो धक्के मारकर बाहर किया गया। इस प्रकार आंदोलन की कोख से निकली यह पार्टी जितनी जल्दी ऊपर उठी उतनी ही जल्दी उसका ग्राफ भी नीचे जा रहा है। समाज के विभिन्न क्षेत्रों की जो प्रतिभाएं अपना काम,- धंधा छोड़कर नई राजनीति के इस अभियान से जुड़ीं उनमें से ज्यादातर हताश होकर लौट गए।  राज्यसभा की सीटों की जो बंदरबांट की उसने भी पार्टी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया। हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि पार्टी इस बगावत से खत्म हो जाएगी। लेकिन श्री केजरीवाल की राष्ट्रीय स्तर पर बतौर विकल्प उभरने की महत्वाकांक्षा पर जरूर तुषारापात हो गया। रही बात भाजपा की तो उसके पास आम आदमी पार्टी सांसदों को शामिल करना पंजाब में अपने पैर जमाने की योजना से जुड़ा है। यद्यपि इससे उसे किसी बड़े लाभ की उम्मीद तो नहीं रखनी चाहिए। वैसे भी भाजपा के नेता ही नहीं आम कार्यकर्ता भी अन्य पार्टियों से आने वाली भीड़ से चिढ़ने लगे हैं क्योंकि इसके आने से उनके अवसर छिन जाते हैं। ऐसे में राघव भले ही भाजपा में अपनी जगह बनाने में कामयाब हो जाएं लेकिन बाकी 6 सांसदों को विशेष महत्व नहीं मिल पाएगा। इस झटके के बाद श्री केजरीवाल और उनकी चौकड़ी अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करती है या नहीं ये फिलहाल कहना कठिन है। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि अपनी अलग पहचान बनाने वाली आम आदमी पार्टी चुनावी राजनीति के चक्रव्यूह में फंसकर  एक आम पार्टी बनकर रह गई है। ऐसा लगता है अन्ना हजारे का श्राप केजरीवाल एंड कंपनी का पीछा नहीं छोड़ रहा।



- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 24 April 2026

प. बंगाल में कांग्रेस ने बिना लड़े ही हथियार डाल दिए



गत दिवस प. बंगाल में पहले चरण और तमिलनाडु में सभी सीटों पर मतदान संपन्न हो गया। दोनों राज्यों में भारी मतदान से चुनाव विश्लेषक हैरानी में हैं। वैसे उक्त दोनों ही राज्य राजनीतिक दृष्टि से बेहद जागरूक माने जाते हैं। दोनों में एक साम्यता ये भी है कि तमिलनाडु में जहां कांग्रेस 1967 में सत्ता से बाहर होने के बाद वापिस नहीं आई वहीं प. बंगाल में 1977 में वामपंथियों ने कांग्रेस से राज्य की सत्ता छीनी। उनके बाद 2011 से वहां ममता बैनर्जी मुख्यमंत्री हैं। इस प्रकार तमिलनाडु में 60 और प. बंगाल में 50 वर्षों से कांग्रेस सरकार नहीं बना सकी। तमिलनाडु में तो वह कभी द्रमुक तो कभी अन्ना द्रमुक के साथ गठबंधन करने से सत्ता के साथ जुड़े रहने में सफल रही । वहीं प. बंगाल में वह वामपंथियों के शासन में तो मुख्य विपक्षी दल रही लेकिन ममता बैनर्जी द्वारा तृणमूल कांग्रेस स्थापित करने के बाद कांग्रेस की दशा दिन ब दिन दयनीय होती गई। 2021 में तो उसे विधानसभा में एक भी सीट नहीं मिली। यही हाल एक जमाने में सबसे बड़ी ताकत रही वामपंथी पार्टियों की भी हो गई। इस खालीपन को आश्चर्यजनक तौर पर भरा भाजपा ने जो 2016 में 3 सीटें जीतने के बाद 2021 में सीधे 77 पर पहुंचकर प्रमुख विपक्षी पार्टी बन गई। इसलिए इस चुनाव में उसे ही सुश्री बैनर्जी के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। ये आश्चर्य का विषय है कि इतने दशकों के बाद भी कांग्रेस ने न तो तमिलनाडु में द्रमुक और अन्ना द्रमुक की चौधराहट खत्म करने की हिम्मत दिखाई और न ही प. बंगाल में सत्ता हासिल करने के लिए किसी भी प्रकार का उत्साह दिखाया। उस दृष्टि से भाजपा इन राज्यों में शून्य से अपना सफर शुरू कर मुख्यधारा में आने में सफल होती दिखाई दे रही है। तमिलनाडु में वह अकेले लड़ने का दुस्साहस करने के बाद इस बार अन्ना द्रमुक के साथ गठबंधन में भागीदार है। हालांकि उसकी रुचि अपना मत प्रतिशत बढ़ाने में ज्यादा है किंतु जिस तरह केरल में उसने उत्तर भारतीय पार्टी की छवि से हटकर अपनी पहिचान बना ली ठीक वैसे ही तमिलनाडु में भी अपनी जड़ें मजबूत करने की दीर्घकालीन योजना पर तेजी से काम कर रही है जबकि कांग्रेस यहां अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने के प्रति पूरी तरह उदासीन है। वर्तमान में वह उस द्रमुक की सहयोगी है जिसके दामन पर पर कभी राजीव गांधी की हत्या के छींटे पड़े थे। मुख्यमंत्री स्टालिन के बेटे ने तो सनातन धर्म की तुलना डेंगू और कोरोना से करते हुए उसी नष्ट करने जैसी डींग हांक दी। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे ने भी सनातन धर्म विरोधी उस बयान का समर्थन कर दिया। यही हाल प. बंगाल में भी है। स्मरणीय है ममता बैनर्जी ने कांग्रेस को वामपंथियों की बी टीम बताते हुए तृणमूल कांग्रेस बनाई थी। उनका आरोप सही साबित हुआ जब पिछले चुनावों में कांग्रेस ने ममता सरकार के विरोध में वामपंथियों से गठबंधन किया। हालांकि उससे हुए नुकसान के बाद इस चुनाव में वह अकेले मैदान में उतरी तो है लेकिन प्रथम चरण के मतदान तक कोई ये कहने वाला नहीं है कि वह कहीं भी मुकाबले में है। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर बने इंडिया नामक विपक्षी गठबंधन में तृणमूल भी शामिल है किंतु ममता चूंकि राहुल गांधी के नेतृत्व में काम नहीं करना चाहतीं इसलिए वे प. बंगाल में कांग्रेस को जरा भी भाव नहीं देतीं। वर्तमान चुनाव में जब श्री गांधी की पहल पर कांग्रेस ने वामपंथियों से अलग होकर एकला चलो रे का फैसला किया तब ये लगा था कि शायद पार्टी खुद को पुनर्स्थापित करने का प्रयास करेगी। पड़ोसी राज्य असम में उसने ऐसा किया भी। शुरुआत में श्री गांधी ने भी ममता सरकार को सिंडीकेट द्वारा संचालित बताकर ये संकेत दिया कि पार्टी इस बार आक्रामक होकर लड़ेगी। लेकिन असम का चुनाव संपन्न होने के बाद न तो राहुल और न ही प्रियंका ने प. बंगाल में वैसा डेरा जमाया जैसा अमित शाह ने कर दिखाया । जबकि केरल में भी मतदान हो चुका था और तमिलनाडु में कांग्रेस सीमित सीटों पर लड़ रही है और वह भी द्रमुक के भरोसे। प. बंगाल में गत दिवस हुए भारी मतदान के बाद चुनाव विशेषज्ञ भी पशोपेश में हैं किंतु एक बात पर सभी एकमत हैं कि या तो तृणमूल की सरकार बनेगी या भाजपा की। लेकिन कोई भी ये नहीं बता पा रहा कि कांग्रेस का क्या होगा? यहां तक कि उसके सबसे बड़े नेता अधीर रंजन चौधरी की जीत भी संदेह के घेरे में है। प. बंगाल पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार है । भाजपा ने त्रिपुरा , अरुणाचल और असम में पांव जमाने के बाद अब प. बंगाल में भी खुद को बतौर विकल्प स्थापित कर लिया है। यदि 4 मई को उसकी सरकार बन गई तब उसके लिए भविष्य की चुनौतियां आसान हो जाएंगी लेकिन कांग्रेस के लिए स्थितियां और चिंताजनक होने से उसमें बिखराव आ सकता है।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 23 April 2026

भारी मतदान लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत



जीत - हार का फैसला तो 4 मई की दोपहर तक ही हो सकेगा किंतु प. बंगाल की 152 और तमिलनाडु की सभी विधानसभा सीटों के लिए दोपहर 12 बजे तक मतदान का प्रतिशत लगभग 50 फीसदी तक पहुंचना लोकतन्त्र और चुनाव आयोग के प्रति जनता के विश्वास का  प्रमाण है। इसके पहले असम और केरलम में हुए मतदान ने भी पिछले कीर्तिमान ध्वस्त कर उन आलोचकों का मुंह बंद कर दिया था जो चुनाव आयोग पर आरोपों की बौछार करते आ रहे थे। विशेष रूप से प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण  के काम में जैसे अड़ंगे लगाए उसके बाद  कई बार ऐसा लगा कि वहां राष्ट्रपति शासन न लगाना पड़ जाए किंतु अंततः मतदाता सूचियों से 91 लाख नाम कट जाने के बाद भी स्थिति नियंत्रण में रही। ममता बैनर्जी ने अपना पूरा प्रचार मतदाता सूचियों में किए गए सुधारों पर ही लगा दिया। उनका आरोप यह था कि केंद्र सरकार के इशारे पर चुनाव आयोग तृणमूल  समर्थक मतदाताओं का नाम हटा रहा है। और बांग्लादेशी घुसपैठियों की आड़ में मुस्लिम समुदाय को विशेष निशाना बनाया गया। हालांकि जनता के बीच ये मुद्दा ज्यादा नहीं गर्माया क्योंकि चुनाव आयोग ने सभी मतदाताओं को नाम जुड़वाने का समुचित अवसर दिया और वह भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त न्यायाधीशों की उपस्थिति में। प. बंगाल  का चुनावी इतिहास  आतंक और हिंसा से भरा रहा है । इस चुनाव में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती से मतदाताओं के मन में व्याप्त डर को काफी हद तक दूर करने में सहायता मिली है। दोपहर तक कुछ घटनाओं को छोड़कर जिस प्रकार मतदाताओं में उत्साह दिखा उसके अनुसार शाम तक मतदान का आंकड़ा 80- 90 को छू जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। इसका अर्थ ये भी लगाया जा सकता है कि तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में मुस्लिम गोलबंदी की प्रतिक्रियास्वरूप हिन्दू मतदाता भी ध्रुवीकृत हुआ है।  तमाम सियासी विशेषज्ञ भी मान रहे हैं कि 30 फीसदी मुस्लिम बैंक की एकजुटता के जवाब में यदि 70 प्रतिशत हिन्दू मतदाताओं ने एकता दिखा दी तब सुश्री बैनर्जी का किला धसक सकता है। स्मरणीय है 2021 में तृणमूल का चुनाव प्रबंधन देख रहे प्रशांत किशोर ने दावा किया था कि भाजपा 100 सीटों से ज्यादा नहीं जीतेगी। उनकी भविष्यवाणी सही साबित हुई और भाजपा 77 पर अटक गई। हालांकि तृणमूल के प्रवक्ता इस बार भी इसी तरह के दावे कर रहे हैं किंतु चुनावी पंडित खुलकर स्वीकार कर रहे हैं कि भाजपा ने बहुत जबर्दस्त मोर्चेबंदी की है जिसके अंतर्गत यदि वह अपने मतदाताओं को मतदान केंद्र तक लाने में सफल हो गई तब प. बंगाल में बदलाव की संभावना बढ़ जाएगी। दूसरे जिस राज्य में आज मतदान हो रहा है वह है तमिलनाडु जहां एक ही चरण में चुनाव हो जाएगा। मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण यहां भी हुआ लेकिन स्टालिन सरकार ने उसे मुद्दा बनाने के बजाय अपने परम्परागत प्रतिद्वंद्वी अन्ना द्रमुक के साथ भाजपा के गठबंधन के मद्देनजर केंद्र सरकार , उत्तर भारत और हिन्दी के विरोध पर अपने प्रचार को केंद्रित रखा । वहीं विपक्षी गठबंधन ने  भ्रष्टाचार ओर विकास में कमी के लिए स्टालिन सरकार को घेरा।  भाजपा इस राज्य में अभी भी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए प्रयासरत है। शुरुआत में ऐसा लग रहा था कि अन्ना द्रमुक और भाजपा का गठबंधन सत्तारूढ़ द्रमुक और कांग्रेस के गठजोड़ पर भारी पड़ेगा। जो चुनाव पूर्व सर्वेक्षण आए उनमें भी मिलते - जुलते संकेत दिए गए परंतु संसद में लाए गए परिसीमन विधेयकों के बाद स्टालिन ने राज्य की लोकसभा सीटें घटने की आशंका को तूल देकर तमिल भावना को उभारने का जो दांव चला उसके कारण राज्य में बदलाव की संभावना संदिग्ध हो चली है। हालांकि तमिलनाडु में भी प. बंगाल जैसा भारी मतदान होने से नतीजों को लेकर कुछ कहना जल्दबाजी होगी लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि चुनाव किसी के भी पक्ष में इकतरफा नहीं रहेगा। ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि राज्य में दोनों प्रमुख प्रतिद्वंदी दलों का संगठन जमीनी स्तर पर है। उनकी विचारधारा भी मूलतः एक जैसी ही है। इसलिए मुकाबला चेहरों पर होता है। कुछ लोगों का मानना है कि इस लिहाज से स्टालिन भारी हैं। लेकिन लोकप्रिय तमिल अभिनेता जे. विजय की नवगठित पार्टी के कूदने से चुनाव में अनिश्चितता बढ़ गई है क्योंकि अभी तक ये आकलन कोई नहीं कर पाया कि विजय के उम्मीदवारों को मिलने वाले मत किस गठबंधन को नुकसान पहुंचाएंगे? बहरहाल भारी मतदान झटका है उन लोगों के लिए जो चुनाव प्रक्रिया को बेवजह कठघरे में खड़ा करते रहते हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 22 April 2026

होर्मुज अमेरिका और ईरान के गले की फांस बन गया


जैसी कि उम्मीद थी वही हुआ। अमेरिका और ईरान के बीच आज होने वाली दूसरे दौर की शांति वार्ता की टेबिल खाली पड़ी रह गई। इस्लामाबाद में अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस और उनकी टीम के आगमन का इंतजार होता रहा। उधर ईरान ने ये शर्त रख दी कि जब तक होर्मुज से अमेरिकी नाकेबंदी नहीं हटेगी वह बातचीत नहीं करेगा। इस पर डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने चिर - परिचित अंदाज में धमकी दी कि बातचीत नहीं होने पर युद्धविराम की अवधि खत्म होते ही ईरान पर जबरदस्त हमला करते हुए उसके बिजली संयंत्र और पुल वगैरह तबाह कर दिए जाएंगे। हालांकि ताजा जानकारी के अनुसार उन्होंने युद्धविराम बढ़ाने की घोषणा भी कर दी किन्तु  इस बार उसकी कोई अवधि नहीं बताई। अपितु ये कह दिया कि ईरान की ओर से ठोस प्रस्ताव आने तक उसे जारी रखा जाएगा। साथ ही वे बातचीत पूरी होने तक प्रतीक्षा करेंगे चाहे उसका अंजाम कुछ भी हो। ट्रम्प के इस ऐलान से ये तो स्पष्ट हो गया कि ईरान की तरह से ही अमेरिका भी होर्मुज़ को हथियार बनाकर अपना हाथ ऊपर रखना चाह रहा है। ये बात सही है कि इस समुद्री रास्ते के अवरुद्ध रहने से ईरान को भारी नुकसान हो रहा है। तेल उत्पादक अन्य खाड़ी देशों के लिए भी होर्मुज का बंद रहना समस्या पैदा करने वाला है। वहीं यूरोप सहित दुनिया के तमाम देश इस  जलडमरूमध्य को तत्काल खोलने का दबाव बना रहे हैं क्योंकि नाकेबंदी से उनको मिलने वाली कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति रुकी हुई है। शुरू  में ईरान ने होर्मुज़ बंद करने का दांव चलकर पूरी दुनिया को परेशान किया और अब अमेरिकी नौसेना द्वारा रास्ता रोके जाने से विश्व भर में ऊर्जा संकट बढ़ता जा रहा है। हालांकि इसके लिए ज्यादा दोषी ईरान को ही कहा जाएगा जिसने पहले होर्मुज से तेल टैंकरों की आवाजाही रोकी और फिर टोल वसूली के जरिए पैसा कमाने की तरकीब सोची। लेकिन उसका मंसूबा पूरा नहीं हो सका क्योंकि ट्रम्प इस बात को भांप गए कि होर्मुज से आवागमन जारी रहने से ईरान की अर्थव्यवस्था को संबल मिल जाएगा। इसीलिए 15 दिन के युद्धविराम की घोषणा होते ही अमेरिका ने अपना जहाजी बेड़ा अड़ाकर ईरान की मुसीबत बढ़ा दी। ईरान ने इसीलिए बातचीत जारी रखने के लिए नाकेबंदी हटाए जाने की शर्त तो रख दी परंतु अमेरिका द्वारा परमाणु ईंधन सौंपे जाने जैसे प्रस्ताव पर चुप्पी साधे हुए है। दरअसल जब दोनों पक्ष एक दूसरे पर ऐसी शर्तें थोप रहे हों जिन्हें मान लेने का आशय झुक जाना होगा तब बातचीत कैसे आगे बढ़ेगी ये बड़ा सवाल है। जहां तक बात पाकिस्तान की है तो ये स्पष्ट हो गया है कि इस बातचीत में वह केवल अमेरिका का संदेशवाहक है। पहले दौर की बातचीत से ही स्पष्ट हो गया कि न तो वह अमेरिका को कुछ समझाने की हैसियत रखता है और न ही ईरान उसकी बात मानने राजी है। इसलिए होर्मुज को लेकर उसने एक शब्द न ईरान से कहा और न ही अमेरिका से। दरअसल ट्रम्प ने शांति वार्ता के लिए इस्लामाबाद का चयन इसलिए किया क्योंकि ईरान का प्रतिनिधिमंडल दूर किसी देश में जाने के लिए सम्भवतः राजी नहीं होता। आज की वार्ता को ग्रहण लग जाने के बाद ट्रम्प द्वारा युद्धविराम को बढ़ाया जाना उनकी मजबूरी है। वहीं ईरान द्वारा बातचीत से कन्नी काटने के पीछे का कारण ये है कि वह आमने - सामने बैठकर अपनी शर्त मनवाने की स्थिति में नहीं रह गया है। इससे अलग हटकर देखें तो दोनों पक्ष एक दूसरे की कमजोरी जान गए हैं। ईरान समझ गया है कि अमेरिका ले - देकर इस जंग से निकलना चाह रहा है। वहीं ट्रम्प भी भांप चुके हैं कि युद्ध जारी रखने पर भी कुछ हासिल होने वाला नहीं है। दुनिया के तमाम बड़े देश भी उनके गैर जिम्मेदाराना रवैए से नाराज हैं जिनमें अमेरिका के पुराने दोस्त भी हैं। यही वजह है कि दोनों पक्ष धमकियां तो बढ़ - चढ़कर दे रहे हैं किंतु लड़ाई से बचना भी चाह रहे हैं। ये स्थिति कब तक जारी रहेगी ये कहना मुश्किल है क्योंकि जहां डोनाल्ड ट्रम्प पूरी तरह से अविश्वसनीय हैं वहीं ईरान का नेतृत्व भी पुख्ता निर्णय लेने में असमर्थ दिख रहा है। ये देखते हुए किसी अप्रत्याशित घटनाक्रम की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि होर्मुज दोनों पक्षों के लिए प्रतिष्ठा के प्रश्न से अधिक गले की फांस बन गया है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 21 April 2026

सीमावर्ती इलाके की रिफाइनरी में आग लगना चिंताजनक


देश में प्रधानमंत्री सबसे अधिक सुरक्षा प्राप्त व्यक्ति हैं। उनके दौरे के पहले संबंधित स्थान के बारे में सुरक्षा एजेंसियां सघन जाँच करती हैं। किसी भी आकस्मिक दुर्घटना के होने पर उन्हें सुरक्षित रखने के पुख्ता प्रबंध भी किए जाते हैं। 1984 में श्रीमती इंदिरा गांधी की उनके निवास पर ही अंगरक्षकों द्वारा की गई हत्या के बाद वीआईपी सुरक्षा के प्रति काफी ध्यान दिया जाने लगा। उस दृष्टि से गत दिवस राजस्थान के  बाड़मेर जिले स्थित पचपदरा रिफाइनरी में अचानक आग लगना बेहद गंभीर एवं चिंताजनक घटना है। करीब 9 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष क्षमता वाली यह परियोजना देश के सबसे बड़े ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स में से एक है। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसका उद्घाटन करने वाले थे। उद्घाटन से ठीक एक दिन पहले उसमें  आग  लगने से सुरक्षा एजेंसियों के चेहरों की हवाइयां उड़ी हुई हैं क्योंकि रिफाइनरी उस स्थान से एक किलोमीटर से  भी कम की दूरी पर स्थित है जहां उद्घाटन समारोह होने वाला था। और फिर यह घटना उस समय हुई, जब प्रदेश के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा उद्घाटन की तैयारियों का जायजा लेने के लिए वहां पहुंचने वाले थे। हालांकि किसी बड़े नुकसान  की जानकारी नहीं है, लेकिन आग लगने के सही कारणों का अभी पता नहीं चल सका। इस रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स को भारत की ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक विकास के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा था।  हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड और राज्य सरकार के संयुक्त उद्यम के रूप में विकसित की गई इस परियोजना में 79,450 करोड़ रुपए से अधिक का निवेश किया गया है। साथ ही ये देश के सबसे बड़े ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स में से एक है। यद्यपि आग समय रहते बुझा ली गई परंतु इतने संवेदनशील संयंत्र में हुए अग्निकांड को साधारण मानकर भुलाना खतरनाक होगा। यदि प्रधानमंत्री इसका उद्घाटन न कर रहे होते तब भी यह अग्निकांड औद्योगिक संयंत्रों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाने के साथ ही निर्माण कार्य में हुई तकनीकी गलती की ओर इशारा करता है। यदि उद्घाटन समारोह की तैयारियां देखने  मुख्यमंत्री आग लगने वाले समय संयंत्र के भीतर रहे होते तब उनके साथ न जाने कितने लोग दुर्घटना का शिकार होते। और कहीं आज प्रधानमंत्री के वहां होते हुए आग भड़क उठती तब जो होता उसकी कल्पना भी दहला देती है । उक्त घटना के बाद आज होने वाला उदघाटन समारोह स्थगित कर दिया गया है। आग लगने के कारणों की सूक्ष्म जांच के बाद सही स्थिति सामने आएगी किन्तु बाड़मेर की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए यह अग्निकांड अनेक आशंकाओं को जन्म दे रहा है। उल्लेखनीय है बाड़मेर जिले की लगभग 250 कि.मी सीमा पाकिस्तान से सटी होने से विदेशी षड़यंत्र  की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। हालांकि तत्काल किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी किंतु रिफाइनरी जैसे संयंत्र में उद्घाटन के एक दिन पहले हुई अग्नि दुर्घटना के पीछे देश विरोधी ताकतों की साज़िश होने को पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता। विशेष रूप से तब जब प्रधानमंत्री इसका शुभारम्भ करने आज वहां उपस्थित रहने वाले थे। जांच एजेंसियों के साथ ही रिफाइनरी के निर्माण से जुड़े तकनीकी विशेषज्ञ भी घटना की तह में जाएंगे । लेकिन सीमावर्ती जिले में स्थित इस महत्वाकांक्षी परियोजना के शुभारम्भ के एक दिन पूर्व हुए अग्निकांड की जांच में सेना से जुड़ी जांच एजेंसियों को भी शामिल किया जाना उचित होगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी