संसद में विपक्ष का रवैया देखकर सरकार ने 2023 में पारित महिला आरक्षण अधिनियम को कल की तारीख से ही लागू कर दिया। हालांकि इसे लेकर अभी भी भ्रम है कि ये आरक्षण 2029 के लोकसभा चुनाव से प्रभावशील होगा या जनगणना के उपरांत नये सिरे से परिसीमन के उपरांत 2034 से? विपक्ष ने इस अधिनियम को तत्काल लागू करने के औचित्य पर सवाल उठाए। सरकार की मंशा इसके पीछे स्पष्ट नजर आ रही है। दरअसल वह विपक्ष को महिला आरक्षण का विरोधी साबित करने का प्रयास कर रही है। हालांकि उसकी कोशिश कितनी कामयाब होती है ये फिलहाल कहना मुश्किल है । लेकिन कल कांग्रेस सांसद प्रियंका वाड्रा ने सुझाव दिया था कि लोकसभा की वर्तमान सदस्य संख्या पर ही एक तिहाई महिला आरक्षण लागू किया जाए। लगता है सरकार ने भी ऐसा ही कुछ करने का मन बनाया होगा। अन्यथा संसद के विशेष अधिवेशन के बीच अचानक महिला आरक्षण विधेयक को कानून की शक्ल देने का और कोई कारण समझ नहीं आता। बेहतर हो भाजपा संसद में एक तिहाई टिकिटें महिलाओं को देने की घोषणा करते हुए विपक्ष पर दबाव बना दे। इस बारे में ये कहना गलत नहीं होगा कि कांग्रेस संगठन की वर्तमान स्थिति देखते हुए वह स्वयं श्रीमती वाड्रा के सुझाव को लागू करने का साहस नहीं दिखा सकेगी। क्षेत्रीय पार्टियों की स्थिति तो और भी खराब है क्योंकि उनके यहां मुख्य रूप से पुरुषों का ही वर्चस्व है। कल सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लोकसभा में जब मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण देने की मांग की तब गृहमंत्री अमित शाह ने पलटवार करते हुए कहा था कि समाजवादी पार्टी अपनी सभी टिकटें मुस्लिम महिलाओं को दे दे तो उन्हें कोई ऐतराज नहीं होगा। इस पर श्री यादव चुप होकर बैठे रह गए। लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाकर महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने के विचार पर समाज के भीतर भी तरह - तरह की चर्चाएं चल रही हैं जिनमें ये भी कहा जा रहा है कि सांसदों की संख्या बढ़ाने से जो आर्थिक बोझ बढ़ेगा वह अंततः जनता को ही वहन करना पड़ेगा। सबसे बड़ी बात ये है कि महिला आरक्षण का विधेयक 2023 में पारित होने के बाद किसी भी पार्टी ने उसे लागू करने की मांग नहीं की जो उनकी ईमानदारी पर संदेह उत्पन्न करती है। जहां तक प्रश्न जनगणना और उसमें भी जातीय जनगणना का है तो गृहमंत्री ने स्पष्ट कर दिया कि उसकी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। लेकिन जिसकी जितनी भागीदारी उसकी उतनी हिस्सेदारी का नारा लगाने वाले राहुल गांधी क्या ये वायदा सार्वजनिक तौर पर कर सकते हैं कि कांग्रेस टिकिट वितरण करते समय उक्त नारे पर अमल करेगी? इसी तरह पिछड़ों की राजनीति करने वाली सपा और राजद जैसी पार्टियां पूरी तरह ओबीसी अन्य आरक्षित जातियों के लोगों को ही उम्मीदवार बनाएंगी? स्मरणीय है दलितों की मसीहा होने का दावा करने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती ने ब्राह्मण जाति के सतीश चंद्र मिश्र को पार्टी का महासचिव बनाने के साथ ही राज्यसभा में भी भेजा। सही बात ये है कि महिला आरक्षण का सैद्धांतिक आधार पर समर्थन करने में तो सभी पार्टियां आगे - आगे नजर आती हैं किंतु उसे व्यवहार में उतारने के बारे में आगे - पीछे हो जाती हैं। कांग्रेस में सोनिया गांधी लंबे समय तक अध्यक्ष रहीं किंतु उन्होंने उत्तराधिकारी के तौर पर अपने पुत्र को आगे बढ़ाया और साथ ही बेटी को महामंत्री बनाकर स्थापित कर दिया। आज पार्टी में और किसी महिला नेत्री का नाम सुनाई नहीं देता। यही हाल सपा का है जो अखिलेश के परिवार की निजी कंपनी है। तृणमूल कांग्रेस में अनेक महिला सांसद होने के बाद भी ममता बैनर्जी का राजनीतिक वारिस उनका भतीजा अभिषेक ही है। भाजपा भी पुरुष प्रधान पार्टी ही है। संसद में उसकी अनेक महिला सांसद होने के बाद भी स्व. सुषमा स्वराज जैसी प्रथम पंक्ति की नेत्री एक भी नहीं बची। दिखाने को दिल्ली की मुख्यमंत्री का चेहरा बतौर महिला मुख्यमंत्री आगे किया जा सकता है लेकिन निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी कितनी है ये सभी जानते हैं। इसमें दो मत नहीं हैं कि महिलाओं की शासन और प्रशासन में भागीदारी बढ़नी चाहिए। लेकिन इसके पहले उन्हें हर दृष्टि से सक्षम और आत्मनिर्भर बनाने पर भी ध्यान दिया जाना जरूरी है। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक संसद और विधानसभाओं में उनकी संख्या बढ़ने से उनकी सामाजिक स्थिति में सुधार होना असंभव है। पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं को मिले आरक्षण के बाद की स्थितियां किसी से छिपी नहीं हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी