जनमत
Saturday, 7 February 2026
हमारी निजता धड़ल्ले से बिक रही और हमें पता ही नहीं
Friday, 6 February 2026
संसद केवल भाजपा और कांग्रेस की नहीं: अन्य सांसदों को भी बोलने का अधिकार
संसद में हंगामा जारी है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव संबंधी अपने भाषण में पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक के अंश पढ़े जाने पर उत्पन्न विवाद बढ़ता चला गया। आसंदी पर कागज फेंकने वाले कुछ विपक्षी सांसद पूरे सत्र के लिए निलंबित भी किए गए। इसके विरोध में विपक्ष की कतिपय महिला सांसदों द्वारा प्रधानमंत्री के आसन को घेरने के बाद किसी अप्रिय घटना की आशंका के चलते अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अभिभाषण पर हुई बहस का उत्तर देने से रोक दिया। और फिर लोकसभा ने बिना उनका जवाब सुने ही धन्यवाद प्रस्ताव का अनुमोदन कर दिया। हालांकि प्रधानमंत्री ने गत दिवस राज्यसभा में 95 मिनिट के लंबे भाषण में विपक्ष पर तीखे हमले करते हुए अपनी सरकार की उपलब्धियों का बखान किया परंतु लोकसभा में अन्य विपक्षी दलों के नेता भी इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने से वंचित रह गए क्योंकि कांग्रेस ने सदन को बाधित करने की अपनी रणनीति जारी रखी। हालांकि बाकी विपक्ष भी ऊपरी तौर पर तो श्री गांधी की हां में हां मिलाता रहा किंतु निजी चर्चा में अनेक सांसदों ने इस बाद पर नाराजगी जताई कि राहुल लगभग प्रत्येक सत्र में कोई न कोई विवाद उत्पन्न कर सदन चलने नहीं देते जिसके कारण दूसरे विपक्षी दलों के सांसदों को अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिल पाता। राहुल की बहिन प्रियंका वाड्रा का कहना है कि सदन चलाना सरकार की ज़िम्मेदारी है । अर्थात विपक्ष जो भी करे उसकी छूट उसे दी जाती रहे। लेकिन आजाद समाज पार्टी सांसद चंद्रशेखर आजाद ने विपक्ष को भी उसका दायित्व याद दिलाते हुए कहा कि हंगामे से अन्य दलों के सांसद अपने क्षेत्र के मुद्दे नहीं उठा पाते। हालांकि ये न तो पहला सत्र है जो हंगामे के कारण बाधित है और न ही आखिरी क्योंकि आजकल संसद और विधानसभाओं के सत्र केवल संवैधानिक बाध्यताओं के कारण ही होते हैं। उनमें गंभीर बहस होने के बजाय आपसी आरोप - प्रत्यारोप में समय खराब किया जाता है। बजट जैसे अति महत्वपूर्ण विषय पर भी कई बार चर्चा नहीं होती । राष्ट्रपति के अभिभाषण पर कांग्रेस के अलावा अन्य दलों के सांसद भी बोलना चाहते होंगे लेकिन हंगामे के कारण सदन स्थगित होता रहा। आज भी यही हुआ जिसके बाद लोकसभा सोमवार तक स्थगित कर दी गई जबकि विषय सूची के अनुसार अनेक सांसदों द्वारा पेश किए गैर सरकारी विधेयकों पर चर्चा होना थी। यदि यही हाल रहा तो बड़ी बात नहीं बजट भी इसी तरह स्वीकृत हो जाएगा। अब सवाल ये है कि क्या संसद केवल भाजपा और कांग्रेस की है? ये बात इसलिए उठ खड़ी हुई क्योंकि जबसे राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष बने तभी से वे खुद को चर्चा में रखने के लिए हर सत्र में ऐसा कुछ कर बैठते हैं जिससे सत्ता पक्ष उत्तेजित होता है और सदन चल नहीं पाता। ऐसे में श्री गांधी तो खबरों में आ जाते हैं लेकिन बाकी दलों के ही नहीं बल्कि उनकी अपनी पार्टी के सांसदों का समय बर्बाद होता है। जहां तक सत्तारूढ़ भाजपा का प्रश्न है तो उसे भी ये स्थिति रास आती है क्योंकि सरकार जिस विधेयक या प्रस्ताव को पारित करवाना चाहती है वह बिना बहस के ही स्वीकृत हो जाता है। आने वाले कुछ महीनों में देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। उनमें से चुनकर आए लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य इस सत्र में वहां के मुद्दे उठाकर राजनीतिक लाभ लेना चाहते होंगे किंतु यदि आगे भी सदन नहीं चला तब उनके पास सिवाय हाजरी लगाकर दैनिक भत्ता पकाने के और कोई रास्ता नहीं बचेगा। राहुल गांधी और सत्ता पक्ष के टकराव में सपा , द्रमुक और तृणमूल कांग्रेस जैसे बड़े दलों के सांसदों की सदन में उपस्थिति भी चेहरा दिखाने तक सीमित है। बेहतर होता इनके जो नेता हैं वे कांग्रेस और भाजपा दोनों पर दबाव बनाते हुए कहते कि उनकी खींचतान में बाकी दलों के सांसदों से बोलने का अवसर छीन लिया जाता है। सरकार और मुख्य विपक्षी दल जाहिर तौर पर सदन में प्रभावी और विशेषाधिकार सम्पन्न हैं किंतु उनकी रस्सा कशी में छोटे - छोटे दलों के सांसद सदन में बैठकर भी दर्शक बने रहते हैं। भारत की संसदीय प्रणाली बहुदलीय है। यहां तक कि निर्दलीय सांसद तक जीतकर आते हैं। ऐसे में सदन की कार्रवाई में सभी को भाग लेने का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन मौजूदा स्थिति में ऐसा होता प्रतीत नहीं होता। लोकसभा के अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को चाहिए कि वे ऐसी व्यवस्था करें जिससे सदन बड़ी पार्टियों के शिकंजे से बाहर निकले और कुछ नामचीन चेहरे लोकतंत्र के मंदिर के मठाधीश न बन सकें।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Thursday, 5 February 2026
बिट्टू को बड़ा नेता बना दिया राहुल ने
पार्टी छोड़कर गए नेता को दल बदलू कहना आम बात है। आजादी के बाद से अब तक हजारों दलबदल हो चुके हैं। इक्का - दुक्का छोड़कर ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां कांग्रेस से अलग हुए नेताओं द्वारा ही बनाई गईं। शुरुआती दौर में दलबदल के पीछे वैचारिक मतभेद हुआ करते थे किंतु धीरे - धीरे निहित स्वार्थ और सत्ता का आकर्षण इसकी वजह बनने लगा। आपसी मतभेदों के कारण भी लोगों ने दल बदला और पार्टियां टूटीं। अनेक क्षेत्रीय पार्टियां तो परिवार के सदस्यों के बीच हुई खींचतान के कारण बिखराव का शिकार हो गईं। ये भी देखने मिला कि पार्टी छोड़कर जाने वाला कुछ समय बाद वापस लौट आया। पार्टी से बगावत कर नया दल बनाने वाले नेता के साथ भी गठबंधन किया गया। इन्हीं सब बातों के कारण राजनीति और राजनेताओं की प्रतिष्ठा में लगातार कमी आती चली गई। लेकिन नेताओं को इससे फर्क नहीं पड़ता। इसका उदाहरण गत दिवस संसद के प्रांगण में देखने मिला। प्रवेश द्वार पर कांग्रेस सांसद धरना दिए बैठे हुए थे जिनमें नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी थे। इसी दौरान केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को आता देख श्री गांधी ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा मेरा गद्दार दोस्त आ रहा है और फिर उनसे हाथ मिलाना चाहा। लेकिन श्री बिट्टू ने हाथ नहीं मिलाया और उन्हें गद्दार कहे जाने के जवाब में नेता प्रतिपक्ष को देश का दुश्मन कहकर बढ़ गए। उसके बाद श्री गांधी खिसियाहट में बोलते रहे चिंता मत करो गद्दार दोस्त तुम वापस आओगे। इस घटना का दृश्य पूरे देश ने देखा। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हुई किंतु कुछ प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कुछ नेताओं ने रोका वरना बिट्टू और राहुल में हाथापाई भी हो सकती थी। उल्लेखनीय है रवनीत पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. बेअंत सिंह के पोते हैं जिनके कार्यकाल में ही पंजाब में खालिस्तानी आतंकवादियों पर लगाम लगाई गई। लेकिन इसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी जब आतंकवादियों ने उनकी हत्या कर दी थी। रवनीत 2024 में कांग्रेस छोड़ भाजपा में आ गए थे। राहुल हमेशा अपनी दादी और पिता की हत्या का जिक्र करते हुए अपने परिवार के बलिदान का महिमामंडन करते हैं। संयोगवश वही विरासत रवनीत सिंह के पास भी है। इसीलिए उन्होंने कांग्रेस पर सिखों के कत्लेआम जैसे आरोप लगाते हुए उन्हें गद्दार कहे जाने को पंजाब और सिखों का अपमान बताते हुए पलटवार किया। इस विवाद के बाद ये सवाल उठ खड़ा हुआ कि यदि बिट्टू गद्दार हैं तब राहुल को सबसे पहले पप्पू कहने वाले नवजोत सिंह सिद्धू क्या हैं जो भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए और जिन्हें पंजाब में पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने अपनी लुटिया डुबो ली। और फिर श्री गांधी ने गद्दार कहते हुए बिट्टू की कांग्रेस में वापसी की जो उम्मीद जताई वह भी उनके बचपने का परिचायक है। भाजपा छोड़ कांग्रेस में आए शत्रुघ्न सिन्हा को राहुल ने बिहार में टिकिट दी। हारने के बाद वे तृणमूल कांग्रेस में जाकर सांसद बन गए किंतु उन्हें गद्दार कहने की हिम्मत श्री गांधी में नहीं हुई। स्मरणीय है म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के अनुज लक्ष्मण सिंह 2004 में सोनिया गांधी के विदेशी मूल का विरोध कर भाजपा में चले गए और सांसद बन गए। लेकिन पाँच साल बाद फिर कांग्रेस में लौटकर विधायक बन गए। उन्हें किसी ने गद्दार नहीं कहा। सबसे बड़ा विरोधाभास तो ये है कि जिन शरद पवार ने सोनिया जी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए कांग्रेस छोड़कर एनसीपी बनाई वे इंडिया गठबंधन के शीर्ष नेताओं में शुमार होते हैं और श्रीमती गांधी भी उनसे सलाह लेने में संकोच नहीं करतीं। ऐसे और भी अनेक उदाहरण हैं जिनमें दलबदल करने वाले नेता को दोबारा कांग्रेस ही नहीं अन्य पार्टियों ने भी गले लगाने में संकोच नहीं किया क्योंकि ऐसा करने में उन्हें राजनीतिक लाभ नजर आया। इसीलिए श्री गांधी द्वारा रवनीत सिंह बिट्टू के बारे में जो कहा वह राजनीतिक शालीनता के विरुद्ध तो था ही, निजी तौर पर भी आपत्तिजनक है। राहुल की गिनती अब राष्ट्रीय स्तर के नेताओं में होती है जबकि रवनीत का राजनीतिक कद उनके मुकाबले बहुत छोटा है। ऐसे में यदि राहुल उनसे सौजन्यतावश हाथ मिलाते तो उसका अच्छा असर होता और उन्हें देश का दुश्मन होने जैसा तीखा जवाब नहीं सुनना पड़ता। दरअसल ऐसी ही गलतियों के कारण श्री गांधी की छवि गंभीर नेता की नहीं बन पा रही जिसका नुकसान उनकी पार्टी को उठाना पड़ता है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Wednesday, 4 February 2026
सड़क और सदन का अंतर समझने में विफल हैं राहुल
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लंबे समय से सांसद हैं। कांग्रेस के महामंत्री और अध्यक्ष जैसे पदों का दायित्व भी निर्वहन कर चुके हैं। सोनिया गांधी की अस्वस्थता के कारण अब वही पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं। इसीलिए अपेक्षा रहती है कि वे जनता से जुड़े मुद्दे उठाकर सत्ता पक्ष को घेरें। लेकिन वे अप्रासंगिक बातें उछालकर सनसनी फैलाने को ही राजनीति समझ बैठे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर नीतिगत मामलों में निशाना साधना पूरी तरह उचित है। सरकार की गलतियों पर उसे कठघरे में खड़ा करना भी नेता प्रतिपक्ष से अपेक्षित होता है। लेकिन वे अपनी शक्ति ऐसे मुद्दों पर खर्च कर देते हैं जिनका समुचित आधार नहीं होने से वे आम जनता को प्रभावित नहीं करते। हर बात में अडानी को घसीटने से उनकी खीझ ही जाहिर होती है। इसी तरह प्रधानमंत्री पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से दबने जैसी उनकी टिप्पणियां भी असर नहीं छोड़तीं। यदि ये सब उनके अपने दिमाग की उपज है तब तो कुछ कहने को बचता ही नहीं और यदि सलाहकार ये सब बोलने के लिए प्रेरित करते हैं तब फिर ये मान लेना पड़ेगा कि वे उनके शुभचिंतक नहीं हैं । इन दिनों राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस के दौरान उनके द्वारा पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक के अंश पढ़ने को लेकर उठा विवाद चर्चा में है। किसी पत्रिका में प्रकाशित उक्त अंशों को श्री गांधी ने सदन में पढ़ने का प्रयास किया जिस पर सत्ता पक्ष ने ऐतराज किया । दरअसल संदर्भित पुस्तक की पांडुलिपि प्रकाशक द्वारा नियमानुसार रक्षा मंत्रालय के पास स्वीकृति हेतु भेज दी गई। जिससे सुरक्षा संबंधी कोई संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक न हो। श्री गांधी ने जो अंश पढ़ा उसके जरिए वे ये साबित करना चाहते थे कि 2020 में चीन जब हमारी भूमि की तरफ बढ़ रहा था तब सरकार ने सेना को समय पर निर्देश देने में विलम्ब किया । और सेनाध्यक्ष द्वारा कई बार निर्देश मांगने पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उन्हें प्रधानमंत्री का ये निर्देश दिया कि जो उचित लगे करो। सरकार की आपत्ति के बाद लोकसभा अध्यक्ष ने श्री गांधी को वे अंश पढ़ने से रोक दिया। इस पर हंगामा होने से लोकसभा की कार्यवाही बाधित हो रही है। जहां तक बात जनरल नरवणे की पुस्तक की है तो प्रकाशन के पूर्व उसके किसी हिस्से को उद्धृत करना इसलिए गलत है क्योंकि रक्षा मंत्रालय की अनुमति के बाद ही उसे प्रामाणिक माना जाएगा। और यदि ये मान भी लिया जाए कि प्रधानमंत्री ने थलसेनाध्यक्ष को जो उचित लगे करो जैसा निर्देश दिया तब तो यह प्रशंसा योग्य है। ऑपरेशन सिंदूर शुरू होने के पूर्व भी तीनों सेनाध्यक्षों को श्री मोदी ने ऐसे ही निर्देश दिए थे। वैसे भी 2014 में इस सरकार के आने के बाद सेना को मोर्चे पर जवाबी कार्रवाई के लिए रोज - रोज ऊपर से आदेश नहीं लेना पड़ते। श्री गांधी द्वारा लोकसभा में श्री नरवणे की पुस्तक का मामला छेड़ने के बाद दर्जनों ऐसे साक्षात्कारों की रीलें प्रसारित होने लगीं जिनमें पूर्व सेनाध्यक्ष ये कहते सुने जा सकते हैं कि 2020 के संघर्ष में भारत ने चीन की जो पिटाई की उसे वह लंबे समय तक नहीं भूलेगा। उन्होंने ये बात भी जोर देकर दोहराई कि चीन एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सका। हालांकि श्री गांधी हमेशा आरोप लगाते रहे हैं कि चीन ने हमारी काफी जमीन उस संघर्ष में दबा ली। अमेरिका के साथ ट्रेड डील पर भी उनकी प्रतिक्रिया उनके पद की गरिमा के अनुरूप नहीं थी। सबसे बड़ी बात ये रही कि बतौर नेता प्रतिपक्ष श्री गांधी को राष्ट्रपति के जिस अभिभाषण पर बोलना था उस पर वे बोले ही नहीं। जबकि इस अवसर का लाभ उठाकर सत्ता पक्ष को अच्छे से घेर सकते थे। अब तक के उनके प्रदर्शन को देखते हुए कहा जा सकता है कि वे सांसद की भूमिका में समुचित प्रभाव छोड़ने में असफल रहे हैं। जनरल नरवणे की पुस्तक और अमेरिका से ट्रेड डील पर उनकी टिप्पणियां उनकी अपरिपक्वता को ही दर्शाती हैं। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर प्रतिवर्ष सरकार की ओर से जवाब देते हुए विपक्ष को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं। और आज भी यही होगा। बजट जैसे महत्वपूर्ण सत्र में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। लेकिन उसके निर्वहन के लिए समुचित अध्ययन और प्रभावी संबोधन जरूरी है। लेकिन श्री गांधी आज तक नहीं समझ पाए कि सड़क और सदन दोनों जगहों पर विरोध के तरीके अलग होते हैं। इसीलिये वे जनता को प्रभावित नहीं कर पाते। वोट चोरी का मुद्दा इसका प्रमाण है। निकट भविष्य में कांग्रेस को अनेक राजनीतिक चुनौतियों से जूझना है। लेकिन यदि श्री गांधी इसी तरह की सतही राजनीति करते रहे तब उसे महाराष्ट्र और बिहार जैसे नतीजे झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Tuesday, 3 February 2026
यूरोपीय यूनियन के साथ भारत की संधि से दबाव में आया अमेरिका
अमेरिका ने भारत पर लगाए गए टैरिफ को घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच कल रात हुई बातचीत के बाद ये खबर उजागर हुई। ट्रम्प ने श्री मोदी की प्रशंसा के पुल बांधते हुए भारत - अमेरिका के बीच व्यापार संधि होने की उम्मीद भी जताई। उनका ये भी कहना था कि भारत रूस से कच्चे तेल की खरीदी घटाने और अमेरिका से बढ़ाने सहमत हो गया है। ट्रम्प ये भी कह रहे हैं कि भारत को वेनेजुएला से भी तेल खरीदना चाहिए। उन्होंने जब भारत पर टैरिफ बढ़ाया तब शुरुआत में वह 25 फीसदी था । बाद में रूस से तेल खरीदी जारी रखने पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने की धमकी भी दे डाली। इसके कारण भारतीय निर्यातकों को झटका लगा क्योंकि अमेरिका भारतीय वस्तुओं का सबसे बड़ा खरीददार रहा है। वहां बसे लाखों प्रवासी भारतीयों के अलावा पाकिस्तानी , श्रीलंकाई , बांग्लादेशी और नेपाल के लोगों के बीच भारतीय समान काफी लोकप्रिय है। चूंकि टैरिफ बढ़ने के कारण चीजें महंगी हो गईं इसलिए निर्यात पर बुरा असर पड़ा जिससे भारतीय उद्योगों की चिंता बढ़ गई। विपक्ष द्वारा श्री मोदी और ट्रम्प की कथित दोस्ती का मजाक बनाया जाने लगा। राहुल गांधी ये प्रचारित करने में जुट गए कि प्रधानमंत्री अमेरिकी राष्ट्रपति से दबते हैं तभी उनकी बातों पर प्रतिक्रिया नहीं देते। इस सबके बीच रूपये का डॉलर की तुलना में नीचे गिरने का सिलसिला भी जारी रहा और विदेशी निवेशकों ने भी भारतीय बाजारों से जमकर अपनी पूंजी निकाली। लेकिन अमेरिका के साथ वार्ता जारी रखते हुए भी भारत ने टैरिफ युद्ध के जवाब में वैकल्पिक मोर्चे खोल दिए। ब्रिटेन और ओमान के अलावा और भी अनेक देशों से मुक्त व्यापार संधि कर भारतीय निर्यातकों को नुकसान की भरपाई करने का मौका दिया। इसके बाद भी ट्रम्प की ऐंठ जारी थी लेकिन गत सप्ताह भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच बहुप्रतीक्षित मुक्त व्यापार संधि पर हस्ताक्षर होते ही अमेरिका की घबराहट बढ़ी जिसका परिणाम 7 प्रतिशत टैरिफ घटने के तौर पर सामने आया। भारत के पड़ोसी और दक्षिण एशिया के तमाम देशों पर कम टैरिफ होने से हमारे निर्यात पर बुरा असर पड़ रहा था। लेकिन 18 प्रतिशत की दर से भारत का हाथ ऊंचा हो गया। आज शेयर बाजार में आई उछाल से ये स्पष्ट हो गया कि टैरिफ में कमी भारत के हित में है। हालांकि ट्रम्प ने जो बातें कहीं उनकी पुष्टि न तो श्री मोदी ने की और न ही अन्य किसी ने। बहरहाल ये उम्मीद अवश्य जताई कि व्यापार संधि पर निर्णय अंतिम चरण में है । इस बारे में एक बात तो स्पष्ट है कि अमेरिका से व्यापार सम्बन्ध पूरी तरह तोड़ देना न तो संभव है और न ही व्यवहारिक। लेकिन ये भी उतना ही सच है कि भारत जैसे विशाल देश के लिए किसी देश की धौंस सहना भी आत्मसम्मान के विरुद्ध है । फिर चाहे वह अमेरिका ही हो। इसलिए जब श्री मोदी ने ट्रम्प के ऊलजलूल बयानों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने से परहेज किया तब विपक्ष ने भले ही इसे उनकी कमजोरी बताया किंतु धीरे - धीरे ही सही किंतु ये बात सामने आ गई कि उन्होंने ट्रम्प से जुबान लड़ाने की बजाय अपनी शक्ति विकल्पों की तलाश में लगाई जिसका प्रतिफल सामने भी आया। दरअसल ट्रम्प के सामने टैरिफ में कमी किए जाने के अलावा कोई विकल्प बचा ही नहीं था। अमेरिका से व्यापारिक एवं कूटनीतिक रिश्ते बनाए रखना निश्चित रूप से जरूरी है किंतु उसके दबाव के सामने झुकते जाना राष्ट्रीय हित में नहीं होने से ही व्यापार समझौता लटका रहा। हालांकि अभी भी उस पर हस्ताक्षर होना बाकी है। ऐसे में ट्रम्प द्वारा टैरिफ घटाए जाने के ऐलान से संतुष्ट होना गलत होगा क्योंकि वे अव्वल दर्जे के अविश्वसनीय इंसान हैं। इसलिए जब तक समझौते का पूरा मसौदा सामने नहीं आता तब तक अंतिम निष्कर्ष निकालना भी जल्दबाजी होगी। विपक्ष आरोप लगा रहा है कि इस समझौते में भारतीय किसानों के हितों की बलि चढ़ा दी गई। हालांकि इस बारे में भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। स्मरणीय है अमेरिका अपने कृषि और खाद्य उत्पादों के लिए भारतीय बाजार उपलब्ध करवाने का दबाव बना रहा था किंतु भारत के राजी नहीं होने से ही समझौता अटका पड़ा रहा। भारत में अमेरिकी राजदूत के दावे के बावजूद अभी ये स्पष्ट नहीं है कि समझौते के प्रावधान क्या हैं? और फिर ट्रम्प जैसे अस्थिर दिमाग वाले व्यक्ति कब अपनी बात से पलट जाएं ये कहना कठिन है। लेकिन सतही तौर पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि यूरोपीय यूनियन और भारत के बीच हुई मुक्त व्यापार संधि से अमेरिका दबाव में आ गया जिसके बाद ही टैरिफ घटाने की पहल हुई।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Monday, 2 February 2026
मौजूदा परिस्थितियों के मद्देनजर संतुलित है बजट
यदि यही बजट कांग्रेस सरकार का होता तब भाजपा की टिप्पणियां भी वैसी ही होतीं जैसी कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों के नेताओं से सुनने मिलीं। वैसे भी बजट पर तत्काल प्रतिक्रिया देना आसान नहीं होता। आम जनता की रुचि आयकर छूट में वृद्धि और दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुओं की कीमतों में कमी या वृद्धि होती है। लेकिन बजट के कुछ प्रावधानों के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं । वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा लगातार नौवाँ बजट पेश करने से स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री को उन पर भरोसा है। हालांकि इस पद पर आसीन व्यक्ति को लोकप्रियता कम ही मिलती है क्योंकि सरकारी योजनाओं एवं कार्यों का श्रेय या तो प्रधानमंत्री को मिलता है अथवा संबंधित विभाग के मंत्री को। पहले बजट के बारे में यही चर्चित होता था कि कि कर कितना बढ़ा और क्या महंगा , क्या सस्ता हुआ? रेलवे बजट अलग प्रस्तुत होने से मुख्य बजट का आकार भी कम ही होता था । आजकल एक ही बजट में सरकार अपना आर्थिक नियोजन देश के सामने रखती है। लेकिन भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका के कारण अब दुनिया भर के विशेषज्ञ इसका विश्लेषण करते हुए भारत की आर्थिक सेहत का आकलन करते हैं। इसीलिए अब उसे वैश्विक परिस्थितियों और जरूरतों के मुताबिक तैयार किया जाता है। गत दिवस प्रस्तुत बजट में भी इसीलिए दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलने का आत्मविश्वास व्यक्त किया गया है। इसीलिए कल शेयर बाजार में आई गिरावट के बाद आज सकारात्मक संकेत आने लगे । हालांकि इस बजट में आम उपभोक्ता , व्यवसायी और उद्योगपतियों को सीधे लाभ होते भले न दिखे लेकिन उसकी बुनावट कुछ इस तरह की है जिससे सभी वर्गों को वित्तीय और व्यवस्था की दृष्टि से राहत मिलेगी। अधो संरचना के लिए भरपूर प्रावधानों के अलावा आयकर से जुड़ी तमाम परेशानियां दूर करने का प्रयास अच्छा कदम है। इसी के साथ विदेश में संपत्ति , विदेश यात्रा से लौटने पर लाये जाने वाले सामान पर शुल्क में सरलीकरण से लोगों को लाभ मिलेगा। देश में विदेशी निवेश के आने के लिए अनुकूल वातावरण बनाने का प्रयास भी स्वागतयोग्य है। चिकित्सा सुविधाओं के विकास की दिशा में जो सोच दर्शाई गई वह विकसित भारत की कल्पना को साकार करने में सहायक साबित होगी। आधुनिकतम तकनीक को अपनाकर उसका विकास करना समय की मांग है जिसका वित्त मंत्री ने काफी ध्यान रखा। रक्षा खर्च में वृद्धि के अलावा इस क्षेत्र में आत्म निर्भरता हेतु प्रावधान महत्वपूर्ण कदम है। कोरोना काल में उत्पन्न संकट से दुनिया उबर पाती उसके पहले ही रूस - यूक्रेन और इजराइल - हमास के बीच युद्ध होने से पूरी दुनिया हिल गई। बची - खुची कसर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सनकीपन ने पूरी कर दी जिसके चलते पूरी दुनिया में उथल - पुथल है। ट्रम्प ने भारत पर टैरिफ थोपकर उसे दबाने का काम किया किन्तु प्रधानमंत्री मोदी ने उसे न सिर्फ बेअसर किया बल्कि वैकल्पिक बाजार खड़े कर भारत को संकट से उबारने का रास्ता तैयार कर दिया। इसीलिए इस बजट से सीधे - सीधे फायदा लोगों को न दिखे किंतु सूक्ष्म विश्लेषण करने पर महसूस होता है कि इसमें मौजूदा परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऐसे प्रावधान हैं जिनसे कि अव्वल तो लोगों पर बोझ न बढ़े और अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें लाभान्वित भी किया जावे। आयकर छूट की सीमा चूंकि गत वर्ष बढ़ाई जा चुकी थी इसलिए उसे नहीं छुआ गया किंतु आयकर संबंधी सुधारों के माध्यम से व्यवस्था के सरलीकरण का प्रयास जरूर किया गया। कैंसर सहित कुछ जीवनरक्षक दवाओं को आयात शुल्क से मुक्त करना संवेदनशीलता का प्रमाण है। गत वर्ष जीएसटी सुधारों से आम उपभोक्ता को सीधा लाभ पहुंचाया जा चुका है। इसीलिए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव सामने होने पर भी लोक - लुभावन घोषणाओं से बचते हुए ऐसा बजट तैयार किया गया जिसमें सभी वर्गों का लाभ है। विकसित भारत पर केंद्रित यह बजट देश के आत्मविश्वास भी परिचायक है। अन्यथा विकास के नाम पर आम जनता और उद्योग - व्यवसायियों पर करों का भार बढ़ाया जाता। आयात और विदेश व्यापार में दी गई राहत साहसिक कदम है। राजमार्गों के साथ ही रेल कारीडोर और विमानों का भारत में निर्माण महत्वाकांक्षी कदम हैं जिनसे दुनिया की नजर में देश की छवि सुधरती है। बजट में कुछ जोखिम भी उठाए गए हैं जिनका निहित उद्देश्य ट्रम्प टैरिफ से उत्पन्न हालातों का सामना करना है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि मौजूदा परिस्थितियों में इससे संतुलित बजट वित्त मंत्री पेश नहीं कर सकती थीं। हालांकि इससे होने वाले फायदे और नुकसान सामने आने में थोड़ा वक्त लगेगा। फिर भी इतना तो कहा ही जा सकता है कि यदि बजट ने कुछ दिया नहीं तो कुछ छीना भी नहीं। और जब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था डांवाडोल है तब भारत में आर्थिक स्थिरता बनाए रखना भी बड़ी बात है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Saturday, 31 January 2026
हामिद अंसारी की नजर में महमूद गजनवी विदेशी नहीं भारतीय था
पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने एक हालिया साक्षात्कार में महमूद गजनवी को विदेशी मानने से इंकार करते हुए उसे भारतीय लुटेरा बता दिया। इसके पहले भी वे अनेक विवादास्पद बयान देकर अपनी किरकिरी करवा चुके हैं। गाजीपुर (उ.प्र) के जिस प्रसिद्ध अंसारी परिवार से वे जुड़े हैं संयोगवश कुख्यात माफिया मुख्तार अंसारी भी उसी से था। हालांकि इस परिवार का इतिहास काफी समृद्ध रहा किंतु अब इसकी प्रतिष्ठा धूल - धूसरित हो चुकी है। मुख्तार के कारनामों ने तो खानदान के नाम पर कालिख पोती ही लेकिन देश के दूसरे सबसे बड़े संवैधानिक पद पर बैठने वाले हामिद अंसारी भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे। सवाल ये है कि गजनवी को भारतीय लुटेरा बताने जैसा अपना शोध उन्होंने उपराष्ट्रपति रहते उजागर क्यों नहीं किया? विदेश सेवा में रहते हुए विदेशों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हामिद अंसारी को जब लगा कि अब उन्हें कोई सरकारी पद मिलने की संभावना नहीं बची तब उन्हें देश में मुसलमान असुरक्षित नजर आने लगे। प्रसिद्ध पत्रकार प्रदीप सिंह का आरोप है कि अंसारी ने ईरान में भारत के दूत रहने के दौरान वहां कार्यरत रॉ के एक अधिकारी की जानकारी ईरान की गुप्तचर एजेंसी सवाक को दे दी थी । उसके बाद उस अधिकारी का अपहरण कर लिया गया था किंतु उसे छुड़ाने के लिए अंसारी ने कोई प्रयास नहीं किया। 2017 में देश की गुप्तचर एजेंसी रॉ के अनेक पूर्व अधिकारियों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर आग्रह किया था कि हामिद अंसारी के कार्यकाल की जांच कराई जावे। एक पाकिस्तानी पत्रकार ने तो ये कहकर सनसनी मचा दी थी कि वह उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के आमंत्रण पर भारत आया और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई .एस.आई के लिये महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाईं। इस पर अपना पल्ला झाड़ते हुए अंसारी ने सफ़ाई दी कि विदेशी पत्रकारों को सरकार के कहने पर आमंत्रित किया जाता था। इन सबसे ये स्पष्ट होता है कि उनको देश ने जो सम्मान दिया वे उसके पात्र नहीं थे। महमूद गजनवी को विदेशी नहीं मानने की उनकी सोच उनकी दूषित और क्षुद्र मानसिकता का प्रमाण है। उनकी मानें तो गजनवी को राजनीतिक सुविधा के लिए विदेशी लुटेरा कहा जाता है। इतिहास साक्षी है कि भारत पर 17 बार हमला करने वाले गजनवी ने सोमनाथ मंदिर को भी लूटा था। वह एक क्रूर व्यक्ति था जिसने सनातन धर्म के अनेक पवित्र स्थलों को ध्वस्त किया। अंसारी उसे भारतीय लुटेरा बताकर क्या साबित करना चाहते हैं ये तो वही जानें किंतु गनीमत है उन्होंने उसे लुटेरा तो माना। दरअसल अंसारी की बातें उन वामपंथी इतिहासकारों की सोच से प्रभावित हैं जो अकबर को धर्मनिरपेक्ष मानते तथा औरंगजेब की शान में कसीदे पढ़ते है। अब देखना ये है कि राहुल गांधी , ममता बैनर्जी, अखिलेश यादव जैसे नेता महमूद गजनवी को भारतीय लुटेरा बताए जाने पर हामिद अंसारी की निंदा करते हैं या मुस्लिम तुष्टीकरण की खातिर उनकी हाँ में हाँ मिलाएंगे। असदुद्दीन ओवैसी की प्रतिक्रिया भी अपेक्षित है। गौरतलब है कि अंसारी ने ये कहने से परहेज किया कि महमूद गजनवी धर्मांध मुसलमान था और उसने हिन्दू मंदिरों और जनता को ही निशाना बनाया। बड़ी बात नहीं भविष्य में वे महमूद गजनवी को धर्म निरपेक्ष और पृथ्वीराज चौहान को कट्टरपंथी बताने लग जाएं। आश्चर्य नहीं होगा यदि उनके भीतर छिपा इतिहासकार ये भी बताने लगे कि महमूद गजनवी तो पर्यटक के रूप में आया था किंतु यहां के लोगों ने उसे परेशान किया जिसके कारण उसने लूटपाट की। देश के उपराष्ट्रपति रह चुके हामिद अंसारी द्वारा इस प्रकार की बयानबाजी इतिहास को झुठलाने के साथ ही विदेशी आक्रांताओं को निर्दोष साबित करने का घिनौना प्रयास है। वे कांग्रेस पार्टी के कृपापात्र रहे हैं। ऐसे में उससे ये अपेक्षा करना गलत नहीं है कि वह पूर्व उपराष्ट्रपति के इस विचार की निंदा करे। महमूद गजनवी को भारतीय लुटेरा कहकर भ्रम पैदा करने का प्रयास बेहद खतरनाक है। यदि इसका विरोध नहीं किया जाता तो वह दिन दूर नहीं जब चंगेज खां और नादिर शाह की तारीफ के पुल भी बांधे जाने लगेंगे।
- रवीन्द्र वाजपेयी