आजादी का पर्व प्रत्येक भारतीय के लिए गौरव की अनुभूति का अवसर है , चाहे वह देश में रहता हो याp दुनिया के किसी अन्य हिस्से में। इसलिये इसकी रक्षा करना भी हम सभी का परम कर्तव्य है। स्वाधीनता के बाद अनगिनत कठिनाइयों से गुजरकर भारत ने विश्व में अपना सम्मानजनक स्थान बनाया तो उसके पीछे प्रत्येक देशवासी का योगदान है , चाहे वह किसान , श्रमिक, उद्योगपति - व्यवसायी या स्वरोजगार से जुड़ा छोटा उद्यमी ही क्यों न हो। असंगठित क्षेत्र में कार्यरत करोड़ों लोगों ने भी देश की विकास यात्रा को गतिशील बनाने में उल्लेखनीय भूमिका का निर्वहन किया है। आज का भारत आत्मनिर्भरता और आत्म सम्मान का प्रतीक है।
वो दिन इतिहास बन चुके हैं जब हमें खाद्यान्न आयातित करना पड़ता था। अपनी सैन्य जरूरतों के लिए भी जहाँ हम पूरी तरह बड़ी शक्तियों पर आश्रित थे वहीं आज हम रक्षा उत्पादनों का निर्यात कर रहे हैं। शिक्षा, चिकित्सा, विज्ञान, तकनीक जैसे क्षेत्रों में भी भारत ने सफलता के नये आकाश छूने का कारनामा कर दिखाया है। धरती से अंतरिक्ष तक हमारी उपलब्धियों से पूरा विश्व प्रभावित है। निश्चित रूप से ये सफलताएं संतोष का विषय हैं। हमारी अर्थव्यवस्था तनावपूर्ण वैश्विक हालातों के बाद भी तेजी से बढ़ रही है । वैश्विक समुदाय के रूप में भारतवंशियों ने दुनिया भर में अपनी प्रतिभा के झंडे गाड़कर देश का सम्मान बढ़ाया है। लेकिन इन सुखद स्थितियों के बावजूद एक वर्ग विशेष अपनी नकारात्मक सोच के साथ निराशा फैलाने में जुटा है। किसी भी उपलब्धि पर संदेह व्यक्त करना इनकी कार्यशैली है । यहाँ तक कि सेना के पराक्रम को भी झुठलाने में इन्हें लज्जा नहीं आती। जनता द्वारा लगातार ठुकराए जाने के बाद हताशा में डूबे ये लोग देश को भीतर से कमजोर कर राजनीतिक अस्थिरता फैलाने का षडयंत्र रच रहे हैं। जाहिर है भारत के उत्थान से परेशान विदेशी ताकतें इन कोशिशों को हवा दे रही हैं। चुनाव प्रणाली, न्यायपालिका और संसद जैसे संवैधानिक संस्थानों के प्रति अविश्वास का भाव उत्पन्न कर अव्यवस्था फैलाने के इस सुनियोजित प्रयास के प्रति प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक को सतर्क होकर उसे विफल करने आगे आना चाहिए। सीमा के पार बैठे शत्रु की पहिचान करना कठिन नहीं है किंतु घर के भीतर के दुश्मनों के चेहरों को अनावृत करना आज के दौर की सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
भारत की बढ़ती शक्ति से बेचैन वैश्विक शक्तियाँ आर्थिक, कूटनीतिक और सैन्य दबाव बनाकर हमें दबाना चाहती हैं। उनका मुकाबला करने का जो साहस देश ने दिखाया वह हमारे आत्मविश्वास का प्रतीक है। लेकिन इसे बनाये रखने के लिए सब एक आवाज में बोलें ये जरूरी है। राजनीतिक मतभिन्नता अपनी जगह है किंतु जहाँ बात देश के सम्मान और हितों की हो तब सारे मतभेद भुलाना ही राष्ट्रभक्ति है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद एक ओर जहाँ भारत के सामर्थ्य की सराहना दुनिया भर में हुई वहीं कुछ बड़े देश ईर्ष्या से भर उठे और अनुचित दबाव डालकर हमारे मनोबल को तोड़ना चाहते हैं। दुर्भाग्य से उन्हें अपने देश के ही कुछ तत्व प्रोत्साहित कर रहे हैं जिन्हें सिवाय अपने स्वार्थ के और कुछ नहीं दिखता। हाल ही में छात्रों के आंदोलन की आड़ में अराजकता और अश्लीलता का जो शर्मनाक अनुभव देश ने किया वह भविष्य के खतरों की ओर इशारा करता है। दरअसल हथियारबंद नक्सलियों के सफ़ाये के बाद भी शहरी नक्सलियों के रूप में विध्वंसक तत्व सक्रिय हैं। इसीलिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज लाल किले से अपने भाषण में दिमागी नक्सलियों से देश को बचाने की जो बात कही , वह बेहद सामयिक और आवश्यक है। युवा पीढ़ी को विद्रोह के लिए भड़काकर आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न करने का जो षडयंत्र विदेशी पैसे पर पल रहे गद्दारों द्वारा रचा जा रहा है उससे हर देशवासी को सतर्क रहना होगा। साथ ही अपने बच्चों को जिन्हें जेन जी कहा जा रहा है , इन दिमागी नक्सलियों से दूर रखें अन्यथा हमारी एकता और अखंडता छिन्न - भिन्न होते देर नहीं लगेगी।
आइये, आज इस राष्ट्रीय पर्व पर थोड़ा समय देश के भविष्य पर विमर्श हेतु भी निकालें क्योंकि सीमा के उस पार बैठे दुश्मन को सबक सिखाने के लिए तो हमारी सेनाएं पूरी तरह समर्थ हैं। लेकिन देश को कमजोर करने वाली उन ताकतों के हौसले धवस्त करने का दायित्व हम सबका है जो आस्तीन का सांप बनी बैठी हैं। स्मरण रहे 15 अगस्त केवल सरकारी आयोजन न होकर आत्मावलोकन एवं दायित्वबोध जागृत करने का अवसर भी है।
स्वाधीनता दिवस की अनंत शुभकामनाएं।
- रवीन्द्र वाजपेयी