Wednesday, 3 June 2026

तृणमूल जैसे बनी वैसे ही टूट रही है


विधानसभा चुनाव में करारी पराजय के बाद भी ममता बैनर्जी की मुश्किलें कम होने के बजाय और बढ़ती जा रही हैं। पूरे राज्य में तृणमूल कांग्रेस से इस्तीफों की झड़ी लगी है। हालांकि जब भी किसी भी पार्टी को ऐसी हार का सामना करना पड़ता है उसमें इस तरह की स्थिति बनना नई बात नहीं है। लेकिन तृणमूल कांग्रेस के विधायकों और सांसदों की बगावत के जो संकेत मिल रहे हैं वे ममता के राजनीतिक आधार को बुरी तरह धवस्त कर सकते हैं। इसका पहला संकेत तब मिला जब अभिषेक बैनर्जी के साथ हुई मारपीट के बाद ममता द्वारा बुलाई गई बैठक में केवल 20 विधायक पहुंचे। उसके बाद दो विधायकों को पार्टी से निकाले जाने की खबरें आ गईं और वे खुलकर ममता के विरुद्ध बोलने लगे। उसी के बाद पार्टी में विभाजन की अटकलें लगने लगीं। गत दिवस ममता द्वारा आयोजित धरना - प्रदर्शन में पार्टी के अधिकांश सांसदों और विधायकों के अनुपस्थित रहने से बगावत की आशंका और बलवती हो गई। आज पार्टी से निकाले गए 2 विधायक विधानसभा अध्यक्ष से मिलकर असली तृणमूल कांग्रेस होने के नाते पार्टी चुनाव चिन्ह के साथ ही नेता प्रतिपक्ष पद मांगने के साथ दावा कर रहे हैं कि उनके पास 59 विधायक हैं  जो दो तिहाई से ज्यादा होने से दलबदल कानून से मुक्त हैं। हालांकि अभी इस बात की पुष्टि नहीं हो सकी कि बागी विधायकों के पास पार्टी तोड़ने लायक संख्याबल है या नहीं। और ये भी कि सांसदों में से कितने ममता का साथ छोड़ने का साहस दिखाएंगे?  ये भी साफ नहीं हैं कि बागी विधायक और सांसद भाजपा में शामिल होंगे या फ़िर अलग गुट बनाकर विपक्ष में बैठेंगे । लेकिन इतना तो पक्का है कि पार्टी में टूटन शुरू हो चुकी है। इसके पीछे किसी वैचारिक मतभेद की बात सोचना तो निरर्थक है क्योंकि तृणमूल कांग्रेस केवल ममता बैनर्जी की निजी महत्वाकांक्षाओं के इर्द - गिर्द सिमटी पार्टी थी जिसका न कोई सिद्धांत है और न ही आदर्श। रही - सही कसर पूरी हो गई ममता द्वारा अपने भतीजे अभिषेक को अघोषित उत्तराधिकारी बनाकर जिनके तेवर किसी बिगड़ैल नवाबजादे से कम नहीं थे। ममता मूलतः सड़क से उठी जुझारू नेत्री थीं जिन्होंने वामपंथी सत्ता से लड़ने में कांग्रेस की असमर्थता से असंतुष्ट होकर  तृणमूल कांग्रेस का गठन किया और आखिरकार वामपंथी सत्ता को उखाड़ फेंका।  लेकिन कोई विचारधारा नहीं होने से पार्टी सत्ता से चिपके रहने का साधन बन गई । और इसीलिये उसमें वामपंथी सरकार के दौर में अराजकता फैलाने वाले असामाजिक तत्वों ने आराम से घुसपैठ कर ली। सत्ता की चकाचौंध में  ममता ने इस बुराई से आँखें मूंदते हुए केवल चुनाव जीतने को ही अपना लक्ष्य बनाते हुए मुस्लिम तुष्टीकरण के रिकॉर्ड तोड़ दिए। चूंकि वामपंथी और कांग्रेस धीरे - धीरे कमजोर होते गए इसलिए ममता को लगा वे अपराजेय हो चुकी हैं। और इसीलिये उन्होंने जनता की तकलीफों को जानने के बजाय उनकी उपेक्षा शुरू कर दी।  अभिषेक ने अघोषित युवराज की तरह जिस समानान्तर शासन व्यवस्था को जन्म दिया वह अराजकता का पर्याय होने से जनता की नाराजगी का कारण बनी जो बीती 4 मई को चुनावी परिणाम के रूप में सामने आई। लेकिन ममता की अकड़ कम नहीं हुई और उन्होंने इस्तीफा देने से इंकार कर दिया जो कि संसदीय शिष्टाचार का अभिन्न हिस्सा है। बहरहाल तृणमूल कांग्रेस टूटे या एकजुट रहे ये उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना ये कि निजी जागीर बनी हुई क्षेत्रीय पार्टियों ने  जिस सिद्धांतविहीनता और अवसरवाद को बढ़ावा दिया उसकी वजह से से समूचा राजनीतिक माहौल प्रदूषित होकर रह गया। तृणमूल के जो विधायक, सांसद और अन्य नेता ममता से किनारा कर रहे हैं उसकी एकमात्र वजह है उनके हाथ से सत्ता खिसक जाना। चूंकि वे सब ममता के करिश्मे के आकर्षण में तृणमूल से जुड़े थे इसलिए ज्योंही वह खत्म हुआ त्योंही दीदी असहनीय लगने लगीं। ममता ने वामपंथी सत्ता को हटाकर जो उम्मीदें जगाई थीं उन्हें पूरी करने जनता ने उनको 15 साल दिए जो कम नहीं थे। इससे कम समय में नरेंद्र मोदी ने गुजरात को विकास का प्रतीकचिन्ह बनाकर खुद को प्रधानमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार बना लिया और बीते 12 वर्षों से देश की बागडोर संभाले हुए हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में आशाजनक नतीजे नहीं मिलने के बावजूद वे निराश नहीं हुए और राज्य दर राज्य भाजपा की विजय के आधार बने हुए हैं तो इसका कारण उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि है। ममता की पार्टी सत्ता से हटते ही महज एक महीने के भीतर यदि बिखराव के कगार पर है तो उसकी वजह  विचारशून्यता ही है। दरअसल तृणमूल कांग्रेस सत्ता के लिये एकत्र लोगों का जमावड़ा है जिनके बीच न कोई सैद्धांतिक साम्यता है और न ही जनसेवा की भावना। इसीलिये चुनावी पराजय के बाद ही पार्टी खंडित होने आ गई। महाराष्ट्र में जो हाल उद्धव ठाकरे का हुआ वही प. बंगाल में ममता बैनर्जी का होने जा रहा है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 2 June 2026

ईरान और इसराइल दोनों नहीं मान रहे ट्रम्प की बात


हालांकि ये मान लेना तो जल्दबाजी होगी कि इसराइल  अमेरिका के नियंत्रण से निकल रहा है। लेकिन ईरान के साथ जंग में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का ढुलमुल रवैया उसके लिए मुसीबत  बन गया है । दरअसल इस लड़ाई का मूल कारण तो यही यहूदी राष्ट्र है जिसे बनाने  में अमेरिका का प्रमुख योगदान रहा हैं। भले ही आज इजराइल विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में विकसित देशों के समकक्ष और सैन्य दृष्टि से भी आत्मनिर्भर हो चुका हो लेकिन  बिना अमेरिकी संरक्षण के उसके अस्तित्व पर खतरे के बादल  मंडराते रहेंगे। मौजूदा जंग में जब अमेरिका और ईरान युद्धविराम करने और बातचीत के जरिए स्थायी तौर पर शांति कायम रखने की दिशा में आगे बढ़े तब इसराइल को उक्त वार्ता में शामिल नहीं करने से उसके प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने अपना गुस्सा व्यक्त किया और शांति वार्ता के दौरान ही लेबनान पर हमले जारी रखे जिससे ईरान भड़क उठा। उसके  अनुसार युद्धविराम के दायरे में इसराइल और लेबनान की लड़ाई भी शामिल थी। लेकिन नेतन्याहू ने  न सिर्फ हमले जारी रखे बल्कि लेबनान के इलाकों को कब्जे में लेने का सिलसिला भी जारी रखा। अमेरिका ने जब भी ईरान के साथ समझौते के लिए कदम बढ़ाए, इसराइल ने उसे चेताते हुए कहा कि ईरान को अधमरा करके छोड़ने से भविष्य में नई समस्या पैदा होना तय है। उधर शांति वार्ता के बीच भी ईरान द्वारा इसराइल का अस्तित्व मिटाने की धमकी दी जाती रही। सच है कि  ट्रम्प इस लड़ाई से ऊब चुके हैं। तीन महीने बाद भी अमेरिका इस जंग से वह सब हासिल नहीं कर सका जिसके लिए उसने अरबों - खरबों डॉलर फूंक दिए। न तो वह ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह तबाह कर सका और न ही उसके तेल व्यापार पर कब्जा करने का  उसका मंसूबा ही पूरा हो सका। होर्मुज से यातायात शुरू होने में अभी भी रुकावटें हैं। यद्यपि लड़ाई को पूरी तरह से रोकने के लिये दोनों पक्षों के बीच संवाद तो बना हुआ है किंतु इसराइल के अलावा अमेरिका समर्थक अन्य तेल उत्पादक देशों को भी ये बात पच नहीं रही कि अमेरिका उन्हें ईरान के आतंक के सामने छोड़कर चलता बने।  शांति प्रस्ताव का ये हिस्सा तो इसराइल , सऊदी अरब, कतर, यूएई और ओमान  को शायद ही स्वीकार होगा कि युद्ध में हुई बर्बादी के मुआवजे स्वरूप ईरान को अरबों डॉलर की आर्थिक मदद दी जाए।  इसराइल को ये पता है कि प.एशिया में अमेरिका की प्रभावशाली उपस्थिति उसके सहयोग के बिना सम्भव ही नहीं होगी। नेतन्याहू ने इसीलिये  लेबनान पर हमले बंद करने की जगह और तेज कर दिए। बीच में  उन्होंने वाशिंगटन जाकर भी ट्रम्प को ये समझाने की कोशिश की थी कि लड़ाई को अंतिम परिणाम तक ले जाए बिना रोक देना आत्मघाती होगा क्योंकि उसके बाद ईरान घायल शेर की तरह और खूंखार हो जाएगा और वह अपने इरादे छिपा भी नहीं रहा। बीते कुछ दिनों में ट्रम्प ने कई बार  शांति समझौते के अंतिम रूप लेने की घोषणा की किंतु कुछ देर बाद ही ईरान ने उनकी बात काटते हुए कड़ी शर्तें रख दीं। अब खबर ये है कि उसने अमेरिका को दो टूक बता दिया कि जब तक इसराइल द्वारा लेबनान पर हमले नहीं रोके जाते वह बातचीत नहीं करेगा। इसी के साथ ये भी पता भी चला है कि ट्रम्प  ने इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू पर नाराज होकर लेबनान पर हमले रोकने कहा किंतु नेतन्याहू  उनकी  मानेंगे ये फिलहाल स्पष्ट नहीं है। इसी बीच ये दावा भी सुनने आया है कि लेबनान में सक्रिय आतंकवादी संगठन हिजबुल्ला को अमेरिका ने लड़ाई रोकने राजी कर लिया है। लेकिन यदि इसराइल ने ट्रम्प की बात नहीं मानी तब प. एशिया में बारूदी धमाके रोकने की उम्मीद हवा - हवाई होकर रह जाएगी। दरअसल ईरान समझ चुका है कि उसके पास खोने को अब कुछ भी नहीं बचा। इसलिए वह सिर पर कफ़न बांधकर खड़ा हुआ है।  ईरानी रणनीतिकार ये बात भी समझ चुके हैं कि डोनाल्ड ट्रम्प  इस लड़ाई से निकलने के लिए छटपटा रहे हैं। इसीलिये वे ईरान को इतिहास बनाने वाली डींगें हांकने के बजाय उसके पुनर्निर्माण में सहायता जैसी बातें कर रहे हैं। लेकिन इस समूचे विवाद में ये बात सदैव याद रखनी होगी कि जब तक ईरान ही नहीं सभी अरबी मुस्लिम देश इसराइल के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते और ईरान उसे नेस्तनाबूत करने की जिद नहीं छोड़ेगा तब तक स्थायी शांति की बात सोचना भी निरर्थक है। आज के हालात में ट्रम्प  बुरी तरह फंस गए हैं। ईरान पर अपनी शर्तें वे थोप नहीं पा रहे और इसराइल भी उनकी बात नहीं मान रहा। ऐसे में प. एशिया में शांति प्रक्रिया की स्थिति एक कदम आगे दो कदम पीछे जैसी हो गई है ।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 1 June 2026

हिंसा गलत किंतु अभिषेक के प्रति किसी को सहानुभूति नहीं



प. बंगाल में  चुनाव प्रचार के दौरान तृणमूल सांसद और  ममता बैनर्जी के भतीजे अभिषेक बैनर्जी ने गृहमंत्री अमित शाह को चुनौती दी थी कि हिम्मत है तो 4 मई को कोलकाता आकर दिखाएं, तब देख लेंगे। कुछ  साल पहले भाजपा के पूर्व अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा पर प. बंगाल में हुए हमले पर उन्होंने कहा था कि वह जनता के आक्रोश का परिणाम था। इसी तरह उन्होंने चुनाव बाद एक भाजपा उम्मीदवार को गर्दन पकड़कर मछली बाजार ले जाकर उनसे मछली बिकवाने जैसी धमकी दी थी। अभिषेक को  लेकर चर्चा  थी कि सुश्री बैनर्जी  विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री का चेहरा बनकर केंद्रीय राजनीति में चली  जाएंगी और प. बंगाल की सत्ता पर वे आसीन होंगे। यही वजह थी कि तृणमूल के ज्यादातर सांसद और विधायक ही नहीं बल्कि पार्टी कार्यकर्ता भी उनके करीबी बने रहने का प्रयास करते  थे।लेकिन चुनाव परिणाम आते ही सब उलट - पुलट हो गया। सुश्री बैनर्जी भवानीपुर नामक अपनी सीट पर खुद ही हार गईं। संयोगवश 2021 में नंदीग्राम और इस बार भवानीपुर से उन्हें हराने वाले सुवेंदु अधिकारी ही रहे जो वर्तमान मुख्यमंत्री हैं। उनके सत्ता संभालते ही राज्य में राजनीतिक माहौल के  अलावा सामाजिक वातावरण में भी बड़ा परिवर्तन देखा जा रहा हैं। बांग्लादेशी घुसपैठियों के वापस जाने की खबरों के अलावा सरकारी जमीनों पर बने उनके मकान और दूकानें हटने लगे। रेलवे स्टेशन के बाहर फैले अतिक्रमण भी देखते - देखते समेट लिए गए। अवैध टोल नाकों का कारोबार खत्म हो गया। तृणमूल कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी और अवैध वसूली (कट मनी) पर अपने आप रोक लग गई। तृणमूल सरकार के विरुद्ध जनाक्रोश चुनाव परिणाम में तो प्रकट हुआ ही किन्तु उसके बाद पार्टी के अनेक दफ्तरों में भी तोड़फोड़ की गई। यद्यपि केंद्रीय बलों की मौजूदगी की वजह से इस बार हिंसा और हत्याओं की वारदातें नगण्य हैं। हालांकि इसकी शुरुआत तो शुबेंदु अधिकारी के निजी सचिव की हत्या से हुई परंतु दो दिन पहले अभिषेक बैनर्जी  और फिर तृणमूल सांसद कल्याण बैनर्जी के साथ हुई मारपीट को ज्यादा उछाला जा रहा है। तृणमूल इस पर सहानुभूति बटोरने का प्रयास कर  रही है। लेकिन पार्टी के भीतर  जिस तरह का ठंडापन देखने मिला वह बहुत कुछ कह गया।  वैसे इस प्रकार की घटनाएं लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं हैं। लेकिन ममता और अभिषेक दोनों के लिये ये आत्मावलोकन का अवसर है। उन्हें बीते 15 साल में  हुईं  राजनीतिक हिंसा की याद करनी चाहिए जिनमें मारे गए सैकड़ों लोगों में भाजपा के अलावा वामपंथी और कांग्रेस के लोग भी थे। हजारों नागरिक भी तृणमूल के गुंडों के अत्याचार के शिकार हुए। अनगिनत महिलाओं के साथ बलात्कार की खबरें तो राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आईं जिनका संज्ञान महिला एवं मानवाधिकार आयोग ने भी लिया। आज तृणमूल  अपने दफ्तरों और नेताओं पर हमले की चंद घटनाओं पर हायतौबा मचा रही है किंतु ये कहना गलत नहीं होगा कि प. बंगाल में जिस खूनी संस्कृति की शुरुआत वामपंथी शासनकाल में हुई थी उसे तृणमूल कांग्रेस ने और बढ़ावा दिया।  लेकिन भाजपा को उन तत्वों की घुसपैठ रोकना होगी जिन्होंने पहले वामपंथी सरकार के रहते आतंक फैलाया और फिर ममता राज में तृणमूल के दफ्तर में डेरा जमाकर बैठ गए। प. बंगाल की राजनीति में विशेष रूप से चुनाव के दौरान हिंसा का इतिहास काफी पुराना है। लेकिन इस बार  केंद्रीय बलों की तैनाती के चलते हिंसा की वारदातों में जबरदस्त कमी आई। ऐसा ही चुनाव के बाद भी देखने मिल रहा है। इस संबंध में  याद रखना जरूरी है कि जब बांग्लादेश और नेपाल में युवाओं ने सत्ता परिवर्तन किया और सरकार के उच्च पदों पर बैठे नेताओं के साथ मारपीट की है तब हमारे देश के कतिपय विपक्षी नेता और सोशल मीडिया पर मोदी विरोधी अभियान चलाने वाले कुछ पत्रकारों ने  युवाओं को भड़काने का कुचक्र रचते हुए  भारत में भी जेन जी क्रांति का शिगूफा छोड़ा। अब प. बंगाल में तृणमूल नेताओं के साथ जो हो रहा है वह उसी जेन जी क्रांति का नमूना है। बेहतर हो ममता बैनर्जी और उनके बड़बोले भतीजे अभिषेक अपने पापों का प्रायश्चित करने जनता से माफ़ी माँगें। लोकतंत्र में चुनावी हार एक सामान्य प्रक्रिया है किंतु जो नेता उसे विनम्रता से शिरोधार्य करते हैं उनका सम्मान बचा रहता है। लेकिन ममता ने चुनाव हारने के बाद भी पद से इस्तीफा नहीं देने की हेकड़ी दिखाकर जनादेश का जो अपमान किया उससे तृणमूल के प्रति नफरत और बढ़ गई।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 30 May 2026

जमानत अर्जी पर त्वरित फैसले जैसी व्यवस्था अन्य मामलों में भी हो


सर्वोच्च न्यायालय ने  जमानत आवेदनों और विचाराधीन कैदियों संबंधी फैसला सुनाते हुए निर्देशित  किया है कि देश की सभी अदालतों को जमानत आवेदनों पर आदर्श रूप से उसी दिन या अधिकतम अगले दिन तक निर्णय लेना अनिवार्य है। शीर्ष अदालत के  अनुसार जमानत नियम है जबकि कारावास अपवाद है। उक्त फैसले में विचाराधीन कैदियों की रिहाई को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा  मौलिक अधिकार  बताते हुए कहा कि यू.ए.पी.ए जैसे कठोर कानूनों में भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है । इसलिए अदालतों को जमानत का आदेश उसी दिन या अगले दिन या फैसला सुरक्षित रखने की स्थिति में  3 महीने के भीतर सुनाना होगा। साथ ही जमानत मिल जाने पर उसकी जानकारी तुरंत जेल प्रशासन को भेजी जाना चाहिए ताकि आरोपी उसी दिन या अगले दिन रिहा हो सके। मानवाधिकारों और सभ्य समाज की दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय का उक्त आदेश बेहद महत्वपूर्ण है। अदालत ने ये निर्देश भी दिया कि अग्रिम जमानत के  लिए किसी व्यक्ति को आत्मसमर्पण हेतु बाध्य नहीं किया जा सकता। कुछ दिनों पहले आतंकवाद से जुड़े कुछ लोगों को अनेक वर्षों से जेल में रखे जाने पर भी सर्वोच्च  न्यायालय ने टीका - टिप्पणी की थी। चूंकि गैर कानूनी गतिविधियों में जेल में बन्द लोगों की स्वतंत्रता को भी अदालत ने आवश्यक मान लिया ऐसे में देश भर की जेलों में बंद सैकड़ों विचाराधीन कैदियों की रिहाई का रास्ता खुल गया है जिनके विरुद्ध या  तो आरोप पत्र  पेश नहीं हुआ या फिर उस पर सुनवाई टलती आ रही है। उल्लेखनीय है फरवरी 2020 में हुए दिल्ली दंगों के आरोपी के तौर पर यू.ए.पी.ए में गिरफ्तार शर्जील इमाम और उमर खालिद को लंबे समय से जेल में बंद रखे जाने पर भी सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी जमानत और त्वरित सुनवाई के अधिकार पर पर विचार करते हुए मामला बड़ी पीठ को भेज दिया। 6 साल से जेल की हवा खा रहे उक्त दोनों की जमानत अर्जियां निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक कई मर्तबा इस आधार पर रद्द कर दिया कि प्रथम दृष्टया आरोप संगीन है। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले में  उन लोगों के लिए तो राहत की खबर है जो जमानत अर्जी की सुनवाई न होने से या तो जेल में हैं या फरार रहने बाध्य हो गए हैं। न्यायिक हिरासत के कारण जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों में बड़ी संख्या उन लोगों की भी है जो जमानत के लिए वकील का खर्च उठाने में असमर्थ हैं। गौरतलब है एक अर्जी नामंजूर हो जाने के बाद व्यक्ति ऊंची अदालत में आवेदन करे तो फ़िर मोटी फीस वकील साहब को देनी होती है। किसी आपराधिक प्रकरण में गिरफ्तारी के भय से अग्रिम जमानत हेतु आवेदन लगाना भी बेहद खर्चीला है। जिसके रद्द होने पर व्यक्ति छिपा फिरता है। कुल मिलाकर जमानत का पूरा मामला बेहद पेचीदा है और साधारण आर्थिक हैसियत वाले के लिए तो आसमान से तारे तोड़ने जैसा। उस दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय का संदर्भित फैसला स्वागतयोग्य है।  लेकिन सर्वोच्च न्यायालय का ये कहना कुछ मामलों में समस्या भी खड़ी कर सकता है कि आतंकवाद जैसे खतरनाक अपराधों में बंद आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी सर्वोपरि है। प्रश्न ये है कि शर्जील इमाम और उमर खालिद जैसे लोगों को जमानत मिलना क्या कानून - व्यवस्था के लिए खतरा नहीं होगा? यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय ऐसे लोगों के बारे में उदारता दिखाते समय देश की एकता ओर अखंडता की रक्षा के प्रति लापरवाह नहीं हो सकता किन्तु इस फैसले से निचले स्तर की अदालतों पर जमानत अर्जी  मंजूर करने में जल्दबाजी का दबाव आने का खतरा पैदा हो गया है। सर्वोच्च न्यायालय अतीत में जमानत देने में आनाकानी के लिए निचली अदालतों की आलोचना कर चुका है। ये फैसला उसी से प्रभावित है जिसमें फायदे और नुकसान दोनों ही हैं क्योंकि न्यायाधीश भी मनुष्य होते हैं और सभी की सोच और योग्यता एक समान हो ये जरूरी नहीं है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय की ये बात सही है कि जमानत जैसे गंभीर विषय में सुनवाई के बाद फैसला सुनाने के लिए निश्चित समय सीमा होनी चाहिए। साथ ही ये भी कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार भी हर किसी को है। लेकिन इस फैसले के परिप्रेक्ष्य में ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि केवल जमानत अर्जी पर ही त्वरित फैसले करने की बंदिश लगाने वाला सर्वोच्च न्यायालय  सामान्य न्याय प्रक्रिया में होने वाले विलम्ब को खत्म करने के बारे में ऐसा ही निर्देश कब देगा ? शीर्ष अदालत में विराजमान माननीय न्यायमूर्तियों को ये बताने की जरूरत नहीं है कि लम्बी और मंहगी न्यायिक प्रक्रिया के कारण आम नागरिक के मन में न्यायपालिका के प्रति विश्वास और सम्मान लगातार घटता जा रहा है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 29 May 2026

नक्सलियों के सफाए के बाद अब घुसपैठियों पर अमित शाह की नजर


केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने  कहा है कि  ममता बनर्जी  के शासन में रोजाना घुसपैठ होती थी, लेकिन अब डर के मारे घुसपैठिए खुद वापस लौटने लगे हैं।  गृहमंत्री ने चेतावनी देते हुए कहा ,वे खुद  चले जाते हैं, तो  सरकार उन पर कोई केस नहीं करेगी और लौटने में  पूरी मदद भी करेगी। उन्होंने आशा व्यक्त की  कि घुसपैठियों की पहचान का अभियान शुरू होने से पहले ही वे  लौट जाएंगे। उनकी अपील ऐसे समय आई जब प. बंगाल ही नहीं देश के अन्य हिस्सों में बसे बांग्लादेशी घुसपैठिए वापस लौटने के लिए प. बंगाल आकर सीमा पर जमा हो रहे हैं। शुभेंदु सरकार ने डिटेक्ट , डिटेन ,और डिपोर्ट  जैसी घोषणा कर जो आक्रामक रवैया अपनाया उससे घुसपैठियों में दहशत फैलने लगी।  वस्तुतः ममता बैनर्जी की सरकार ने न तो घुसपैठियों को आने से रोकने के लिए कोई योजना बनाई और न ही उन्हें वापस भेजने का साहस दिखाया।  उससे भी बड़ी चिंता का कारण ये है कि उनके राशन और आधार कार्ड बनने के अलावा मतदाता सूचियों में नाम भी दर्ज हो गए। इसीलिये विधानसभा चुनाव के पहले चुनाव आयोग ने एस.आई.आर की प्रक्रिया प्रारंभ की तब ममता बैनर्जी ने अड़ंगे लगाने का हरसंभव प्रयास किया किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। लाखों नाम मतदाता सूचियों से इसलिए अलग हुए क्योंकि  वे  जरूरी दस्तावेज नहीं दे सके। तृणमूल कांग्रेस को जीत का जो आत्मविश्वास था उसका कारण मुस्लिम मतदाताओं के साथ ही  घुसपैठिये भी रहे।  मतदाता सूची से बाहर होने वाले घुसपैठियों को उम्मीद थी कि ममता सरकार ही लौटकर आएगी इसलिए  वे निश्चिंत बैठे रहे। लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया । भाजपा ने सत्ता में आते ही जो तेवर दिखाये उनसे उनको ये महसूस होने लगा कि डिटेंशन (हिरासत) में आने के बजाय बेहतर होगा वापस अपने मुल्क लौटा जाए। चौंकाने वाली बात ये है कि न सिर्फ़ प. बंगाल वरन दक्षिणी राज्यों में कार्यरत घुसपैठिए भी बांग्लादेश लौटने के लिए आने लगे। हाल ही में मुख्यमंत्री श्री अधिकारी ने ये कहकर हलचल मचा दी कि ममता सरकार जिन करोड़ों महिलाओं को प्रतिमाह 1500 रुपए दे रही थी उनमें 30 लाख बांग्लादेशी महिलाएं भी हैं। इसीलिए राज्य सरकार ने महिलाओं को 3 हजार रुपए हर महीने देने संबंधी  वायदे को पूरा करने के पहले  लाभार्थियों की नई सूची तैयार करने का फैसला किया। इसके अलावा भी मुफ्त राशन एवं अन्य  सुविधाओं का लाभ घुसपैठियों को पिछली सरकार दे रही होगी। सवाल ये है कि ममता बैनर्जी जैसी वरिष्ट नेत्री को इन घुसपैठियों को संरक्षण देने की क्या जरूरत पड़ गई? स्मरणीय है बांग्लादेश से घुसपैठियों का  आना वामपंथी सरकार के कार्यकाल में भी जारी रहा। प. बंगाल की जनता ने उस सरकार से नाराज होकर ही ममता बैनर्जी को सत्ता सौंपी थी किंतु उनके राज में तो प. बंगाल घुसपैठियों का स्वर्ग बन गया। यहां की राजनीति में मुस्लिम वर्चस्व का कारण ये घुसपैठिए ही रहे। चूंकि भाजपा ने घुसपैठ को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया इसीलिए हिन्दू मतों का ध्रुवीकरण उसके पक्ष में हुआ। दरअसल ममता राज में घुसपैठियों के आतंक से हिंदुओं में भय व्याप्त था। चूंकि कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां भी तुष्टीकरण करती रहीं इसलिए जब भाजपा ने घुसपैठियों के विरुद्ध कार्रवाई का वायदा किया तो जनता ने  उसको जबरदस्त समर्थन देकर सत्ता सौंप दी। मुख्यमंत्री श्री अधिकारी की प्रशंसा की जानी चाहिए जिन्होंने बिना देर लगाए घुसपैठियों को वापस भेजने के लिए ठोस कदम उठाए जिनका असर दिखने भी लगा है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर में सीमा पर कंटीले तार की बाड़ लगाने हेतु केंद्र सरकार द्वारा मांगी जमीन देने का फैसला भी घुसपैठ रोकने की दिशा में बड़ा कदम है। ममता सरकार बरसों से इस मामले को दबाकर बैठी थी। प. बंगाल में घुसपैठियों के विरुद्ध चल रही कार्रवाई राष्ट्रीय स्तर पर की जानी चाहिए क्योंकि बांग्लादेशी और रोहिंग्या दोनों ही घुसपैठिए मुस्लिम कट्टरपंथियों के साथ मिलकर आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन गए हैं। बीते कुछ वर्षों में हुईं अनेक आतंकवादी वारदातों के तार बांग्लादेश से जुड़े पाये जाने से इसकी पुष्टि हो चुकी है। गृह मंत्री अमित शाह  नक्सलवादियों के आतंक का खात्मा कर अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय दे चुके हैं । उनकी ताजा चेतावनी के बाद ये उम्मीद की जा सकती है कि देश इन घुसपैठियों द्वारा उत्पन्न समस्या से भी मुक्त हो जाएगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 28 May 2026

सर्वोच्च न्यायालय ने वोट चोरी नामक गुब्बारे की हवा निकाल दी


अन्ततः सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एस. आई.आर ) को विधि सम्मत मानते हुए स्पष्ट कर  दिया कि चुनाव आयोग के पास प्रक्रिया का पालन करते हुए मतदाता सूची में संशोधन करने का अधिकार है, अतः यह पूरी तरह से संवैधानिक और वैध है। गत दिवस दिए फैसले में उसने स्वीकार किया कि जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट को अपडेट और संशोधित करने की शक्ति प्राप्त है। एस.आई.आर विरोधी याचिकाओं को रद्द करते हुए न्यायालय ने स्पष्ट  किया कि उसमें कोई खामी नहीं है।  फैसले में कहा गया है कि आयोग मतदाता सूची में शामिल होने की पात्रता के  साथ ही शर्तों के साथ नागरिकता की जांच भी कर सकता है। इस फैसले से उन लोगों को निराशा हुई होगी जो ये प्रचार करने में जुटे रहे कि मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की आड़ में केंद्र सरकार के इशारे पर उन मतदाताओं के नाम योजनाबद्ध तरीके से काटे गए जिन्हें भाजपा विरोधी समझा जाता था। उधर चुनाव आयोग बाकायदा घोषणा करता रहा कि नाम काटे गए मतदाता आवश्यक दस्तावेजों के साथ दोबारा आवेदन कर सकते हैं। बिहार में ऐसा हुआ भी । इसी के साथ ही 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले नए मतदाताओं को नाम जोड़ने के लिए भी पर्याप्त अवसर दिया गया। बिहार और प. बंगाल में एस. आई. आर का सबसे ज्यादा विरोध हुआ। प. बंगाल में तो सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायाधीशों तक को उसकी प्रक्रिया संपन्न करने में लगाया जिससे पारदर्शिता बनी रहे। जिन पांच राज्यों में पिछले महीने विधानसभा चुनाव हुए वहां भारी मतदान से एक बात तो साबित हो गयी कि मतदाताओं का चुनाव प्रक्रिया में पूरा विश्वास है।  आयोग द्वारा की गई व्यवस्था को भी खुलकर सराहा गया। एस. आई. आर के विरोध में विपक्ष ने ये सोचकर हल्ला मचाया कि जनता भी उसके साथ सड़कों पर उतरेगी किन्तु बिहार में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की यात्रा और प. बंगाल में ममता बैनर्जी द्वारा सड़क से सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ने के बावजूद उन्हें न जन समर्थन मिला और न अदालत ने प्रक्रिया रोकी। अब जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने एस. आई.आर को कानून सम्मत बताते हुए उसे चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में मान लिया और आधार कार्ड को नागरिकता का प्रमाण मानने से भी मना कर दिया तब विपक्ष और उसके पीछे खड़े मोदी विरोधियों को भी ये समझ जाना चाहिए कि ये मुद्दा बेअसर हो चुका है। वोट चोरी को लेकर राहुल गांधी ने  मुख्य चुनाव आयुक्त को घेरने के लिए धरती - आसमान एक कर दिये वहीं ममता बैनर्जी तो धरने तक पर बैठ गईं। लेकिन उनकी बात न जनता के गले उतरी और न ही सर्वोच्च न्यायालय ने ही उसे महत्व दिया। बिहार, और प. बंगाल में भाजपा को मिली सफलता से ये साबित हो गया कि एस. आई. आर के विरोध को जनता ने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया।  सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट फैसले के बाद वोट चोरी का गुब्बारा पूरी तरह फूट चुका है। बिहार और प. बंगाल में शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न होने का कारण मतदाता सूचियों में किया गया संशोधन ही है। अवैध बांग्लादेशियों के अलावा मृत हो चुके लोगों के नाम बड़े पैमाने पर कटने से मतदाता सूचियाँ शुद्ध हो गईं जिससे फर्जी मतदान रोका जा सका। सर्वोच्च न्यायालय ने भविष्य में होने वाले चुनावों के पहले छूटे हुए सभी मतदाताओं के नाम जोड़ने का निर्देश देकर चुनाव आयोग को एस. आई. आर जारी रखने की छूट दे दी। सवाल ये है कि क्या विपक्ष अपना विरोध जारी रखेगा या आयोग के साथ समन्वय स्थापित कर मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने में सहयोग करेगा जिसमें उसका भी हित है। लेकिन इसके लिए उनको अपने संगठन में कसावट लानी होगी। राहुल गांधी जैसे नेताओं को भी ये बात समझनी चाहिए कि जितना समय , श्रम और संसाधन उन्होंने बिहार में चुनाव आयोग को गाली देने में खर्च किया उतना अपनी पार्टी को मजबूत करने में लगाते तब कांग्रेस की इतनी दुर्गति नहीं होती।  प. बंगाल में उन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी तो सब सीटों पर उतार दिए किंतु प्रचार से दूरी बनाकर उनकी फजीहत करवा दी। यहां तक कि पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा माने जाने वाले अधीर रंजन चौधरी लोकसभा में हारने के बाद विधानसभा चुनाव में भी तीसरे स्थान पर रहे।  बिहार और प. बंगाल में  औंधे मुंह गिरने के बाद ममता सहित अन्य विपक्षी नेता एकजुट होकर भाजपा से निपटने की बातें कर रहे हैं किंतु उनके पास इस बात का कोई उत्तर नहीं है कि इन चुनावों में एकता से परहेज क्यों किया गया और आगे उसकी क्या गारंटी है? बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय ने बिना लाग - लपेट के एस. आई. आर को चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में मानते हुए  चुनाव प्रक्रिया का आवश्यक भाग बताते हुए विपक्ष द्वारा फैलाए गए झूठ की कलई खोल दी है। ये फैसला विपक्ष के लिए सबक भी है कि वह हवा - हवाई मुद्दों से दूर रहते हुए जनहित से जुड़े विषयों पर आवाज उठाये। लेकिन पिछले अनुभव बताते हैं कि विपक्ष में आत्मावलोकन की प्रवृत्ति और जनता की अपेक्षाओं को महसूस करने की क्षमता खत्म हो चुकी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 27 May 2026

घुसपैठिये आस्तीन में छिपे साँप


देश के सीमावर्ती इलाकों सहित कुछ अन्य क्षेत्रों में डेमोग्राफिक चेंज ( आबादी में असंतुलित बदलाव) लम्बे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिंता का विषय रहा है।  प. बंगाल के  हालिया विधानसभा चुनाव में डेमोग्राफिक चेंज और बांग्लादेशियों की घुसपैठ ममता  सरकार के विरुद्ध बड़ा मुद्दा  था । भाजपा को  सत्ता तक लाने में इसका प्रमुख योगदान रहा। नए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने घुसपैठियों को उनके देश वापस भेजने की घोषणा कर इसे जीवित रखने का संकेत दे दिया था। इसकी पुष्टि गत दिवस हो गयी जब केंद्रीय  गृह मंत्री अमित शाह ने डेमोग्राफिक चेंज पर एक  उच्चस्तरीय समिति के गठन की घोषणा करते हुए कहा कि  घुसपैठ और अन्य कारणों से अप्राकृतिक डेमोग्राफिक चेंज किसी भी देश के वर्तमान व भविष्य के लिए गंभीर चुनौती है। जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता में बनाई गई इस समिति में जनगणना आयुक्त के साथ दुर्गा शंकर मिश्रा (से . नि.आईएएस), बालाजी श्रीवास्तव (से.नि .आईपीएस) और डॉ. शमिका रवि समिति के सदस्य रहेंगे वहीं संयुक्त सचिव (फॉरेनर्स-I), गृह मंत्रालय सदस्य सचिव बनाए गए हैं। वैसे तो घुसपैठियों की समस्या 1947 के बाद से ही चली आ रही है। जम्मू कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर राज्यों में  पड़ोसी देशों से  आकर बसे घुसपैठियों ने  सामाजिक वातावरण को बिगाड़ने के साथ ही जमीन कब्जाने जैसे कारनामे किए जिससे उनका मूल निवासियों से टकराव भी हुआ। 1971 में बांग्लादेश बनने के पहले जो 1 करोड़ से ज्यादा शरणार्थी भारत  में घुसे उनको वापस भेजना तो दूर उल्टे वह सिलसिला बेरोकटोक जारी रहा। धीरे - धीरे ये घुसपैठिये देश के भीतरी हिस्सों तक फैलते गए और मुस्लिम वोट बैंक के सौदागरों ने इन्हें नागरिकता दिलवाने में भरपूर सहायता और संरक्षण प्रदान किया। इसके बाद म्यांमार से खदेड़े गए रोहिंग्या मुस्लिमों ने भी पूर्वोत्तर राज्यों में अपने ठिकाने बना लिए। उ.प्र और बिहार के जो क्षेत्र नेपाल की तराई में हैं वहां अचानक मदरसों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि भी चौंकाने वाली रही। बिहार में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के विधायक इसी इलाके से जीते भी। असम भी  जनसंख्या संतुलन बिगड़ने की समस्या से जूझता आ रहा है। इसीलिए मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने पिछले कार्यकाल में ही मदरसे बंद करवा दिए थे । देवभूमि कहलाने वाले हिन्दू बहुल उत्तराखंड राज्य में भी मुस्लिम आबादी रहस्यमय तरीके से बढ़ी जिससे सुरक्षा एजेंसियां चिंता में पड़ गईं। ये बात पूरे देश में अनुभव की जा रही है कि डेमोग्राफिक चेंज हमारी संप्रभुता के साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून व्यवस्था, सामाजिक संरचना में गंभीर बदलाव और जनजातीय समाज के संरक्षण से जुड़ी गंभीर समस्या है। गत दिवस गठित समिति अवैध प्रवास और अन्य असामान्य कारणों से पूरे देश में हो रहे जनसांख्यिकी बदलाव का व्यापक मूल्यांकन करते हुए धार्मिक एवं सामाजिक समुदायों के स्तर पर इसके पैटर्न का विश्लेषण कर सुनियोजित और समयबद्ध समाधान प्रस्तुत करेगी।  बड़ी बात नहीं इस समिति का विरोध भी वे राजनीतिक दल करने लगें जो आबादी के असंतुलन में अपनी चुनावी संभावनाएं देखते हैं। प. बंगाल में जब भी बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालने की बात उठी ममता बैनर्जी उनके बचाव में खुलकर सामने आईं। सीएए और मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का विरोध करने में भी उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके घुसपैठिया प्रेम का सबसे बड़ा उदाहरण ये था कि उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा कई बार लिखित अनुरोध किए जाने पर भी बांग्लादेश सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने के लिए जमीन देने में कोई रुचि नहीं दिखाई। वहीं सत्ता बदलते  ही मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी ने  केंद्र सरकार द्वारा मांगी गई भूमि सौंप दी। गौरतलब है घुसपैठिये केवल आबादी ही नहीं बढ़ाते अपितु हमारे संसाधनों का उपयोग करते हुए जिंदगी बसर करते हैं।  चूंकि इनमें बड़ी संख्या मुस्लिमों की होती है लिहाज़ा ये जिस क्षेत्र में बसते हैं वह मुख्य धारा से कट जाने के कारण राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का केंद्र बने नहीं रहता। उ.प्र, बिहार, असम और प. बंगाल में अनेक ऐसे निर्वाचन क्षेत्र हैं जिनमें केवल मुसलमान ही जीत सकता है। यहां घुसपैठियों के कारण भारत विरोधी माहौल खुले आम देखा जा सकता है। इस समिति की आवश्यकता काफी पहले से महसूस की जा रही थी। केंद्र सरकार ने इसका गठन कर बहुत ही सामयिक और साहसिक कदम उठाया है। ये घुसपैठिए आस्तीन में छिपे साँप से कम नहीं  हैं जिनका फ़न कुचलना देश की अखंडता और सुरक्षित भविष्य के लिए अत्यावश्यक है।


- रवीन्द्र वाजपेयी