प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे समय इजराइल गए जब ईरान पर अमेरिकी हमले की आशंका से समूचा विश्व परेशान है। यदि डोनाल्ड ट्रम्प ईरान के शासक खामेनेई को हटाने के लिए सैन्य कार्रवाई करते हैं तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पूरी तरह हिल जाएगी। दरअसल इस्लामिक देशों में ईरान पर ही अमेरिका का बस नहीं चलता। ज्यादातर अरब देश अमेरिकी प्रभाव में हैं । ईरान भी रूस और चीन के खुले समर्थन के कारण अमेरिका से ऐंठता है। हालांकि उसका अपना सैन्य सामर्थ्य भी बाकी अरब देशों की तुलना में अधिक है। इजराइल और हमास की जंग में जब इजराइल ने ईरान पर हवाई हमले किए तब उसने पलटवार करते हुए राजधानी सहित इजराइल के अनेक स्थानों पर मिसाइलों की बरसात कर दहशत फैला दी। उसी वजह से इजराइल भी युद्धविराम के लिए तैयार हुआ। हालांकि तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। ऐसे हालातों में श्री मोदी का तेल अवीव जाना बड़ी कूटनीतिक पहल है। हालांकि इसके पीछे नए रक्षा सौदों को कारण माना जा रहा है किंतु इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के साथ करीबी रिश्ते होने से इस यात्रा में भू - राजनीति की मौजूदा स्थिति और उसमें भारत की भूमिका पर भी चर्चा होगी। लेकिन भारत में कुछ लोगों को यह यात्रा नागवार गुजर रही है। कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश ने तंज किया है कि इजराइल द्वारा फिलिस्तीनियों पर किए जा रहे अत्याचार को नजरअंदाज कर श्री मोदी तेल अवीव जा रहे हैं। असदुद्दीन ओवैसी ने भी दौरे की आलोचना की। वहीं प्रियंका गांधी ने प्रधानमंत्री को सुझाव दिया कि वे इजराइली संसद को संबोधित करते समय फिलीस्तीन का मुद्दा उठाएं। उल्लेखनीय है कांग्रेस हमेशा से इजराइल के साथ प्रगाढ़ संबंध रखने के विरोध में रही है । ओवैसी का इजराइल विरोध भी स्वाभाविक है जिन्होंने लोकसभा की शपथ के बाद फिलीस्तीन के पक्ष में नारा लगाया था। इजराइल - हमास जंग के दौरान प्रियंका भी कंधे पर फिलीस्तीन लिखा झोला टांगकर संसद में नजर आई थीं। निःसंदेह मासूम बच्चों , महिलाओं और वृद्ध - लाचार लोगों पर हमले करना मानवीयता के विरुद्ध है। गाजा में इजराइली हमलों के कारण बिजली , पानी , दवाइयां, दूध - भोजन का अभाव होने से लाखों लोग अकल्पनीय यातनाएं झेलने बाध्य हुए। लेकिन संकट के उस दौर में इजिप्ट सहित पड़ोसी मुस्लिम देशों ने अपनी सीमाएं बंद कर दीं ताकि गाजा से शरणार्थी उनके यहां प्रवेश न कर पाएं। आज भारत में जो लोग मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए इजराइल की आलोचना करते हैं उनके मुंह से एक शब्द भी इजिप्ट के विरोध में नहीं सुनाई दिया। स्मरणीय है इजराइल के साथ जो समझौता यासर अराफात के समय हुआ उसमें गाजा और वेस्ट बैंक नामक फिलीस्तीन के दो हिस्से बने। इजराइल दोनों के बीच में हैं। गाजा को बिजली सहित अन्य जरूरी सुविधाएं वही प्रदान करता था। 2006 में हमास नामक इस्लामिक सैन्य संगठन ने गाजा की सत्ता हथिया ली । ईरान सहित तमाम इजराइल विरोधी मुस्लिम देशों का समर्थन और संरक्षण मिलने से वह मजबूत होता गया। 7 अक्टूबर 2023 को अचानक हमास ने इजराइल पर ड्रोन के जरिए हमले किये और मिसाइलें भी बरसाईं जिससे सैकड़ों इजराइली मारे गए। हमास के लड़ाके इजराइल में घुसकर सैकड़ों लोगों को बंधक बनाकर ले गए। उसी के बाद नेतन्याहू ने आर - पार की जंग छेड़ने का ऐलान करते हुए हमास की कमर तोड़ने का अभियान शुरू किया। आज फिलीस्तीनी जो भोग रहे हैं उसका कसूरवार हमास तथा उसकी पीठ पर हाथ रखने वाला ईरान ही है। सर्वविदित है कि ईरान ने हमास को इसके लिए उकसाया था क्योंकि कुछ दिनों बाद ही इजराइल और सऊदी अरब में ऐतिहासिक समझौता होने वाला था । ईरान उसे रुकवाना चाहता था। इसलिए उसने हमास के कंधे का इस्तेमाल किया। इस प्रकार गाजा की बर्बादी और फिलीस्तीन के अस्तित्व पर नए खतरे का जिम्मेदार हमास है। इसलिए भारत में जो राजनीतिक दल फिलिस्तीनियों के लिए आंसू बहा रहे हैं उन्हें हमास की आलोचना करना चाहिए जिसने गाजावासियों को खून के आंसू पीने मजबूर कर दिया। अतीत को किनारे कर दें तो गाजा में 7 अक्टूबर 2023 के बाद इजराइल ने जो किया वह हमास के पागलपन का दुष्परिणाम था। ऐसे में इजराइल से पहले हमास को कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। लेकिन न तो ओवैसी ऐसा करेंगे और न ही कांग्रेस क्योंकि ऐसा करने से भारत के मुसलमान नाराज हो जाएंगे।
- रवीन्द्र वाजपेयी