जनमत
Saturday, 18 July 2026
वांगचुक को बलि का बकरा बनाया काॅकरोच जनता पार्टी ने
Friday, 17 July 2026
बांग्लादेश के साथ जैसे को तैसा की नीति अपनानी चाहिए
Thursday, 16 July 2026
आस्था को जो ठेस लगी उसकी टीस लंबे समय तक बनी रहेगी
Wednesday, 15 July 2026
ट्रम्प के टैरिफ आतंक का जवाब हैं मुक्त व्यापार समझौते
Tuesday, 14 July 2026
बदलते वैश्विक समीकरणों में भारत और चीन का महत्व बढ़ रहा
Monday, 13 July 2026
मोदी द्वारा तीन देशों की यात्रा में किये समझौतों से देश को दूरगामी लाभ
मोदी विरोधी यू ट्यूबर डाॅ. पुण्य प्रसून वाजपेयी ने अपने ताजा वीडियो में खुलासा किया कि भारत में अब तक जितने भी प्रधानमंत्री हुए उनमें नरेंद्र मोदी द्वारा की गईं विदेश यात्राओं की संख्या बाकी सभी की मिलाकर भी अधिक हैं। विपक्षी पार्टियां भी अमूमन प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर छींटाकशी करते हुए उनके महंगे विमान का जिक्र करना नहीं भूलतीं। ये बात पूरी तरह सही है कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। भारत जैसे देश में इस पर उंगलियाँ उठना स्वाभाविक है जहाँ करोड़ों लोग गरीबी रेखा से नीचे ज़िंदगी बसर करने मजबूर हैं। लेकिन इसी के साथ ये देखना भी जरूरी है कि श्री मोदी की विदेश यात्राएं किस उद्देश्य से की जाती हैं ? यदि वे महज सैर - सपाटे के लिए होती हों तब उनकी आलोचना स्वाभाविक है। लेकिन अब तक जो कुछ भी देखने मिला उससे ये साफ है कि उनकी विदेश यात्राएं पूरी तरह देश के दूरगामी हितों पर केंद्रित होती हैं। ऐसा नहीं है कि पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों के विदेशी दौरे निरुद्देश्य हुआ करते थे किंतु उस दौर में भारत की वैश्विक भूमिका आज जैसी विस्तृत नहीं होने से उन यात्राओं का दायरा रिश्ते मजबूत करने तक सीमित रहता था, लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। भारत एक परमाणु शक्ति संपन्न देश होने के साथ ही सॉफ्टवेयर, अंतरिक्ष, चिकित्सा, रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में बड़ी ताकत के तौर पर पहचान बनाता जा रहा है। दुनिया भर में फैले भारतवंशी देश की प्रतिष्ठा में वृद्धि कर रहे हैं। उदारीकरण के बाद उत्पन्न स्थितियों में विश्व एक बाजार बन गया है जिसके कारण केवल निर्यातक बनकर कोई नहीं रह सकता। उत्पादन के लिये कच्चा माल और तकनीक का आयात जरूरी है वहीं विकसित देशों को अपने उत्पादों के लिए बाजार की जरूरत पड़ती है। दुनिया में जारी मौजूदा उठापटक के पीछे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष तौर पर बाजारवाद की छाया है। विदेश नीति भी घूम - फिरकर आर्थिक हितों से प्रभावित होती है। इसीलिए राष्ट्राध्यक्ष अपने विदेशी दौरों में देश के बड़े उद्योगपतियों को ले जाते हैं। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने इस बात को पूरी तरह समझते हुए विदेश दौरों में व्यापारिक समझौतों को प्राथमिकता दी और बड़ी आर्थिक शक्तियों के विकल्प के तौर पर विभिन्न देशों के साथ तार जोड़ते हुए देश के आर्थिक, कूटनीतिक और सामरिक हितों की सुरक्षा का प्रबंध किया। अमेरिका द्वारा प्रतिकूलता दिखाये जाने के कारण भारत के लिए अपने संबंधों का विकेंद्रीकरण आवश्यक होता जा रहा था। उस लिहाज से भारत ने चतुराई दिखाई और विभिन्न देशों से समझौते रूपी दूरदर्शिता दिखाकर उसके दबाव को कम करने में सफलता हासिल की। यूरोपीय यूनियन और ब्रिटेन से मुक्त व्यापार समझौता इसका उदाहरण है जो अमेरिका के टैरिफ रूपी आतंक का माकूल जवाब है। गत सप्ताह श्री मोदी ने इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे में जिस प्रकार के व्यापारिक, रणनीतिक और सांस्कृतिक समझौते किये वे मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में भारत की जरूरतों को निर्बाध पूरा करने के साथ ही कूटनीतिक स्थिति को मजबूत बनाने में मददगार होंगे। दक्षिण एशिया और प्रशांत क्षेत्र में चीन की कुटिल नीतियों का मुकाबला करने के लिये तमाम देश भारत की ओर आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं। ब्रिक्स का प्रमुख सदस्य होने के बाद भी भारत क्वाड नामक संगठन का सदस्य भी है जो चीन के विरुद्ध मोर्चेबंदी के लिए कार्यरत है। इंडोनेशिया के साथ सबांग बंदरगाह को विकसित करने के अलावा ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम और क्रिटिकल मिनरल्स की आपूर्ति और न्यूजीलैंड के साथ महत्वपूर्ण रणनीतिक समझौते क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में भारत की प्रभावशाली भूमिका का प्रमाण है। अमेरिका - ईरान और रूस - यूक्रेन के बीच युद्ध के लंबे खिंचने के कारण दुनिया के सामने जो संकट आते जा रहे हैं उनसे होने वाले नुकसान से बचने के लिए समय रहते वैकल्पिक व्यवस्था करना ही बुद्धिमत्ता है। प्रधानमंत्री का ताजा विदेश दौरा उसी दिशा में बढ़ाया गया कदम है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Saturday, 11 July 2026
बढ़ती आबादी को मानव संसाधन में बदलना समय की मांग
आज विश्व जनसंख्या दिवस है। पूरी दुनिया चिंतित है कि आबादी इसी तरह बढ़ती रही तो धरती पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन घटते चले जायेंगे और तब उनके लिए वैसी ही लड़ाई होगी जैसी कई सालों से रूस और यूक्रेन के बीच चली आ रही है। वहीं प. एशिया में चल रहे युद्ध के पीछे भी कच्चा तेल नामक काला सोना ही है। चीन की विस्तारवादी नीतियाँ भी प्राकृतिक संसाधनों को हथियाने पर आधारित हैं। भविष्य में पेय जल की समस्या भी विकराल होने जा रही है।और तब उसके लिए भी संघर्ष होगा। उल्लेखनीय है भारत अब चीन को पीछे छोड़ सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गया है। दूसरी तरफ चीन और जापान सरीखे देश जन्म दर में गिरावट से चिंतित हैं क्योंकि उनके उद्योगों को श्रमिक मिलने की किल्लत होने लगी है। उधर परिवार नामक संस्था के टूटने से भी अनेक विकसित देशों में आबादी ठहर गई है। यूरोप के कुछ छोटे देशों की आबादी तो लाखों में है किंतु अपने प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों के कारण वे विकसित और संपन्न राष्ट्रों में शुमार होते हैं। लेकिन बेहतर जिंदगी के चलते अन्य देशों के नागरिक जिस तेजी से यहां बसते जा रहे हैं उससे माहौल बिगड़ने लगा है । विशेष रूप से अरब देशों से आए शरणार्थी समस्या बन गए हैं । दुनिया में बढ़ती आबादी से जमीन और पानी की कमी के साथ ही वाहनों की बढ़ती संख्या पर्यावरण के लिए खतरा बन गई है। समुद्र में चल रहे हजारों जहाज और आकाश में विचरते वायुयानों से जो प्रदूषण होता है उसका दुष्प्रभाव धरती पर रहने वालों पर भी पड़ रहा है। विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि पृथ्वी पर मौजूद संसाधन जनसंख्या के अनुपात में घटते जा रहे हैं। विलासिता पूर्ण जीवनशैली के कारण भी प्रकृति से खिलवाड़ होने से प्राकृतिक आपदाएं जल्दी - जल्दी आने लगी हैं। जानलेवा कोरोना वायरस ने साबित कर दिया कि मनुष्य की अनगिनत कथित उपलब्धियां किसी न किसी बिंदु पर आकर शक्तिहीन हो जाती हैं । अमेरिका जैसा विकसित और ताकतवर देश भी चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय कुछ न करने की स्थिति में आ जाता है। विश्व भर में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर चिंता व्यक्त की जाती है किंतु जितना दिखावा होता है उसका आधा भी काम नहीं होने से स्थिति एक कदम आगे दो कदम पीछे की बन चुकी है। विकासशील देशों को कार्बन उत्सर्जन के लिए उपदेश देने वाले बड़े राष्ट्र पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं । चीन ने अपनी आबादी में वृद्धि को तो थाम लिया लेकिन कार्बन उत्सर्जन के मामले में वह बेहद लापरवाह है। भारत की ही बात करें तो आर्थिक विकास के मामले में चीन से हमारा मुकाबला है । लेकिन उसने जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण के साथ ही विशाल आबादी को उत्पादकता से जोड़ा जिसके बाद अफीमचियों के लिए कुख्यात चीन ने अमेरिका को टक्कर दे डाली। साम्यवादी व्यवस्था के बाद भी उसने उदारीकरण की पश्चिमी अवधारणा को अपने अनुरूप बनाया जिसके कारण लगभग सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने वहाँ अपनी उत्पादन इकाईयां लगाई। दूसरी तरफ भारत में साठ और सत्तर के दशक तक परिवार नियोजन का जो अभियान जोर - शोर से चलाया जाता था वह उपेक्षा का शिकार होकर रह गया। चुनावी राजनीति ने जिस मुफ्त संस्कृति का विकास किया उसकी वजह से करोड़ों लोग बिना हाथ - पैर चलाए सरकारी सहायता पर अपना पेट भर रहे हैं। विरोधाभास ये है कि बेरोजगारी के आंकड़े उच्च स्तर पर हैं लेकिन खेती , उद्योग और छोटे कारोबारी तक कामगारों की कमी से त्रस्त हैं। चीन ने जिस आबादी को संसाधन बनाया वही हमारे देश में बोझ बनकर रह गई। इसके लिए निश्चित रूप से राजनीति उत्तरदायी है जिसने कामचोरी को बढ़ावा दिया। किसी को हजार - दो हजार बेरोजगारी भत्ता देने के बजाय यदि उससे रोजाना घंटे - दो घंटे भी काम करवाया जाए तो उसे श्रम का महत्व समझ आएगा । इसी तरह महिलाओं के खातों में पांच सौ - हजार जमा करने से उनका सशक्तीकरण हो जायेगा , ये सोचना मूर्खों के स्वर्ग में रहने जैसा है। ये सच है कि चीन में चुनाव महज दिखावा है इसलिए वहां रेवड़ियां नहीं बांटी जाती और काम करने में सक्षम प्रत्येक व्यक्ति को उत्पादकता से जोड़ा गया है। वहीं हमारे देश में तो चुनाव कभी न खत्म होने वाला महोत्सव है जिसके दौरान जो मांगोगे वहीं मिलेगा वाली दरियादिली दिखाई जाती है। और तो और जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने में भी धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप जैसी बातें आड़े आने लगती है। दुनिया का उत्पादन केंद्र बनने की उम्मीद और सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने की महत्वाकांक्षा में जनसंख्या का बोझ बड़ी बाधा बन रहा है। हालांकि वर्तमान राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 का मुख्य उद्देश्य प्रजनन दर को कम करके 2045 तक जनसंख्या को स्थिर करना है। लेकिन इसका हश्र भी परिवार नियोजन अभियान जैसा ही है।
- रवीन्द्र वाजपेयी