कॉकरोच जनता पार्टी को अपनी घटती ताकत का एहसास गया। 5 सितंबर को दिल्ली में मार्च निकालने की धमकी उसने वापस ले ली। उसका आरोप था कि केन्द्र सरकार ने उस समझौते का पालन नहीं किया जिसके आधार पर जंतर मंतर आंदोलन समाप्त हुआ था। स्मरणीय है 20 जुलाई को संसद भवन के लिए निकाले गए मार्च के दौरान पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच हुए संघर्ष के बाद अपराधिक प्रकरण दर्ज किये गए थे। पार्टी की प्रमुख मांग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की थी किंतु उसी के साथ आंदोलनकारियों पर दर्ज प्रकरण रद्द किये जाने और नीट पेपर लीक के कारण आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवार को एक करोड़ रु. बतौर मुआवजा दिये जाने की बात भी जोड़ दी गई। केन्द्र सरकार ने उक्त तीनों मांगों पर सहमति दे दी जिसके बाद कॉकरोच जनता पार्टी ने अपना आंदोलन समाप्त कर दिया। लेकिन प्रधान के त्यागपत्र के अलावा शेष दोनों मांगें लम्बित रहने के कारण वह दोबारा आंदोलन की चेतावनी दे रही थी। यद्यपि 1 करोड़ के मुआवजे के लिए सरकारी कवायद शुरू हो चुकी है लेकिन अपराधिक प्रकरण रद्द नहीं होने से पार्टी की चिंता बढ़ती जा रही थी। ऐसे में दबाव बनाने के लिए 5 सितंबर को जंतर मंतर से मार्च निकालने की घोषणा की गई। चूंकि उसके अगले सप्ताह दिल्ली में होने जा रहे ब्रिक्स सम्मेलन में रूस, चीन, ईरान, ब्राज़ील और द. अफ्रीका जैसे देशों के राष्ट्राध्यक्ष आने वाले हैं इसलिए सरकार को चिंता थी कि 20 जुलाई जैसी परिस्थिति उत्पन्न हुई तो विदेशी हस्तियों का आगमन रुक सकता है जो देश की छवि के लिए नुकसानदायक होता। इसीलिए सरकार ने छात्रों पर दर्ज प्रकरण वापस लेने की अर्जी सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल कर दी जिसके बाद पार्टी ने 5 सितम्बर को मार्च निकालने की धमकी वापस ले ली। लेकिन जिस बात पर वह दबाव नहीं बना सकी वह है 2800 से अधिक लोगों पर दर्ज प्रकरण जिनके बारे में दिल्ली पुलिस का कहना है कि उनकी अपराधिक पृष्ठभूमि है और 20 जुलाई को हुए उपद्रव में उनका हाथ था। शुरू में तो पार्टी इस बात पर अड़ी थी कि सभी मामले वापस लिए जाएं । लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में दिल्ली पुलिस की कार्रवाई को सही ठहराते हुए पुलिस पर हमला करने वाले अपराधी तत्वों पर मुकदमा दायर करने को जायज बता कर उसको झटका दे दिया। इसीलिए उसने भी अपने कदम पीछे खींचने में बेहतरी समझी। हालांकि उसने ऐसा मजबूरी में ही किया क्योंकि जंतर मंतर के साथ ही रांची में भी चले छात्र आंदोलन ने जहाँ शालीनता और अनुशासन का बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत किया वहीं जंतर मंतर में अश्लीलता और अभद्रता का जो बेशर्म प्रदर्शन हुआ उसकी पूरे देश में जबरदस्त निंदा हुई। उसके बाद पार्टी नेताओं पर कई शहरों में हमले भी हुए। 20 जुलाई को संसद के लिए निकाले मार्च को रोकने पुलिस द्वारा किये गए बल प्रयोग को राष्ट्रव्यापी मुद्दा बनाकर केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा करने के लिए समूचा विपक्ष जुट गया और संसद तक नहीं चलने दी गई। लेकिन अब जबकि ये बात साफ होती जा रही है कि उस आंदोलन को हिंसक मोड़ देने वाले छात्र नहीं अपितु अपराधी तत्व थे तब वह आरोप भी सत्य प्रतीत होने लगा है कि जंतर मंतर पर जो कुछ भी हुआ वह देश में अराजकता फैलाने का एक सुनियोजित षडयंत्र था। केन्द्र सरकार ने स्थिति को बिगड़ने से रोकने के लिये बुद्धिमत्ता दिखाते हुए आंदोलनकारियों की मांगें मान लीं। हालांकि इसके लिए उसे अपने समर्थकों का गुस्सा भी झेलना पड़ा । लेकिन गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस ने धैर्य के साथ आंदोलन में घुसे अपराधी तत्वों की घेराबन्दी करते हुए कॉकरोच जनता पार्टी के साथ ही शेष विपक्ष के आरोपों को गलत साबित कर दिया। ये देखते हुए पार्टी ने 5 सितंबर का मार्च रद्द कर अपनी कमजोरी पर पर्दा डाला है। बीते कुछ दिनों में उसे ये एहसास हो गया था कि काठ की हांडी बार - बार नहीं चढ़ती। जंतर मंतर आंदोलन के बाद उसके नेताओं ने दौरे तो खूब किये किंतु उन्हें अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने के साथ ही जो जानकारियां प्रकाश में आईं उनसे उनकी छवि खराब होने लगी। केन्द्र सरकार ने अपराधी तत्वों पर प्रकरण दर्ज करने की जो दृढ़ता दिखाई वह बेहद जरूरी है जिससे भविष्य में युवाओं की आड़ में पेशेवर अपराधी अपनी कारस्तानी न दिखा पाएं।
- रवीन्द्र वाजपेयी