संसद के बजट सत्र का पहला चरण गत सप्ताह पूर्ण होने के बाद सत्रावसान हो गया। अब 9 मार्च से दोबारा सत्र शुरू होगा जिसमें बजट पारित किया जाएगा। साथ ही लोकसभाध्यक्ष के विरुद्ध प्रस्तुत अविश्वास प्रस्ताव पर भी सत्ता - और विपक्ष में गर्मागर्मी रहेगी। सत्र के पहले चरण में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लोकसभा में प्रधानमंत्री का भाषण हुए बिना ही धन्यवाद प्रस्ताव पारित करना पड़ा क्योंकि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा किसी पत्रिका में प्रकाशित पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे की कथित पुस्तक के अंश पढ़ने के कारण सत्ता और विपक्ष के बीच हुए टकराव ने अप्रिय रूप ले लिया। सदन के भीतर और उसके बाहर जिस प्रकार की रस्साकशी और व्यक्तिगत छींटाकशी देखने मिली उसके कारण संसद की गरिमा तो तार - तार हुई ही सांसदों के आचरण का गिरता स्तर भी देश और दुनिया के सामने आ गया। विपक्ष ने प्रधानमंत्री पर अशोभनीय आरोप लगाए तो सत्ता पक्ष ने भी जवाबी हमला करते हुए पंडित नेहरू और उनके राजनीतिक वारिसों की कलई खोलना शुरू कर दिया। राहुल ने एक पुस्तक का मामला उठाया तो भाजपा के निशिकांत चौधरी बस्ता भर किताबें लेकर आ गए। दोनों तरफ से हुई कीचड़ फेंक प्रतियोगिता में किसकी जीत और किसकी हार हुई ये कहाना मुश्किल है। विपक्ष ने अपनी खीझ लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला के प्रति अविश्वास प्रस्ताव पेश कर निकाली तो भाजपा की ओर से श्री गांधी की सदस्यता रद्द करने की पेशकश हो गई। कई दिन इस मांग पर हंगामा होता रहा कि राहुल को बोलने दिया जाए। लोकसभा के विवाद की छाया राज्यसभा पर भी पड़ी जिससे वहां की कार्यवाही भी बाधित होती रही। जिन लोकसभा सदस्यों का निलंबन हुआ वे भी संसद के प्रवेश द्वार पर धरना दिए बैठे रहे। लेकिन जनरल नरवणे की जिस पुस्तक को लेकर संसद का बहुमूल्य समय और जनता के करोड़ों रु. बेकार हो गए उसकी चर्चा सत्र का अवकाश होते ही बंद हो गई। ऐसा पहली बार नहीं हुआ। पहले भी ये देखने में आया है कि संसद में जिन मुद्दों को लेकर हंगामा होता है और विपक्ष सदन नहीं चलने देता वे सत्र के बाद ठन्डे बस्ते में चले जाते हैं। चूंकि सदन के भीतर लगाए गए आरोप - प्रत्यारोप कानून के क्षेत्राधिकार से बाहर होते हैं इसलिए दोनों पक्ष बिना डरे बहुत कुछ ऐसा बोल देते हैं जो बाहर अवमानना के अंतर्गत आता है। जनरल नरवणे की पुस्तक को लेकर दिल्ली पुलिस में प्रकरण दर्ज़ हो चुका है। उसके प्रकाशक ने स्पष्टीकरण दे दिया है कि वह अभी तक अप्रकाशित है। श्री नरवणे वैसे तो इस विवाद पर मौन रहे किंतु प्रकाशक के स्पष्टीकरण का उन्होंने तत्काल अनुमोदन कर दिया। बीते तीन दिनों में न ही श्री गांधी या अन्य किसी विपक्षी नेता ने पुस्तक के बारे में कुछ कहा और न ही सत्ता पक्ष ने विपक्ष पर पलटवार का कोई प्रयास किया। रोज शाम को नेताओं और पत्रकारों को बिठाकर बहस करवाने वाले टीवी चैनलों ने भी दूसरे विषयों को पकड़ लिया। ये सब देखकर लगता है संसद केवल सनसनी फैलाने का मंच बनकर रह गई है। वह जमाना, जब सदन में मुद्दों पर पक्ष - विपक्ष से गंभीर चर्चा होती थी, अब केवल स्मृतियों में ही रह गया है। इसके लिए कौन कितना दोषी है इसका निर्णय करना कठिन है क्योंकि जो आज पक्ष में हैं वे भी विपक्ष में रहते हुए सदन को बाधित करने को संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा मानते थे। कुल मिलाकर संसद की गरिमा केवल दिखावे तक सीमित रह गई है। लोकसभाध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर श्री गांधी द्वारा हस्ताक्षर नहीं किए जाने पर कांग्रेस ने स्पष्टीकरण दिया कि स्पीकर को पद से हटाने के नोटिस पर नेता प्रतिपक्ष का हस्ताक्षर करना संसदीय लोकतंत्र में सही नहीं है। लेकिन क्या नेता प्रतिपक्ष के सामने उन्हीं की पार्टी के सांसदों द्वारा आसंदी पर कागज फेंकना और गर्भगृह में आकर नारेबाजी करना संसदीय लोकतंत्र के लिए सही है ? राष्ट्रपति का अभिभाषण और बजट जैसे विषय विपक्ष के लिए अपना दृष्टिकोण रखने का बेहतरीन अवसर होते हैं जिसका लाभ उसे उठाना चाहिए क्योंकि जब सदन नहीं चलता तब भी सत्ता पक्ष का काम तो जैसे - तैसे हो ही जाता है किंतु विपक्ष के हाथ कुछ नहीं लगता। ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि कांग्रेस भले ही सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है लेकिन अन्य दलों के पास भी ऐसे सांसद हैं जो अपनी बात प्रभावशाली तरीके से रखते हैं किंतु हंगामे की वजह से उन्हें बोलने ही नहीं मिलता। ये देखते हुए इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि होली के बाद जब संसद का सत्र दोबारा शुरू होगा तब भी इसी तरह का तनावपूर्ण माहौल बना रहेगा क्योंकि जिस उद्देश्य से ये अवकाश दिया जाता है उसके सदुपयोग के प्रति ज्यादातर सांसदों में लेश मात्र गंभीरता नहीं है।
- रवीन्द्र वाजपेयी