कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने गत दिवस कहा कि वे राजनीतिक दल नहीं बनाएंगे क्योंकि राजनीतिक दल से अधिक जरूरत दबाव समूह की है जो जनहित के मुद्दों को उठा सके। महाराष्ट्र के संभाजीनगर में पार्टी के कोर ग्रुप की बैठक के अवसर पर उन्होंने उक्त ऐलान किया। इसके पीछे की सोच उजागर करते हुए उन्होंने कहा कि कॉकरोच जनता पार्टी चूंकि भावी आंदोलनों में अन्य दलों तथा संगठनों का सहयोग चाहती है लिहाजा उसने खुद राजनीतिक दल बनने से परहेज किया। उल्लेखनीय है जंतर - मंतर पर किये गए आंदोलन में कॉकरोच जनता पार्टी को आम आदमी पार्टी ने खुलकर समर्थन दिया वहीं जेएनयू के अनेक वामपंथी संगठनों ने भी सक्रिय हिस्सा लिया। इसके बाद अभिजीत और उनके प्रमुख सहयोगियों के आम आदमी पार्टी से पुराने संबंध होने की बात सामने आने लगी। कहा तो यहाँ तक गया कि ये पार्टी दरअसल अरविंद केजरीवाल ने ही बनवाई है जिसके जरिये सरकार के विरुद्ध माहौल बनाया जा सके। केजरीवाल का सोचना ये था कि उनके बैनर तले बाकी पार्टियां आने में संकोच करेंगी। उनकी योजना उस लिहाज से सफल कही जाएगी क्योंकि जंतर मंतर पर हुए आंदोलन में राजनीतिक दलों के अलावा गैर राजनीतिक तबका भी शामिल हुआ। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी को राजनीतिक दल में नहीं बदलने के फैसले के पीछे केवल यही कारण नहीं है। सही बात तो ये है कि जंतर मंतर वाला आंदोलन जितना विख्यात हुआ उतना ही कुख्यात भी। आखिरी दौर में तो अभिजीत और उनकी कोर टीम के हाथ से उसका नियंत्रण निकल चुका था जिससे वह गम्भीरता खोने लगा। उनकी समझ में एक बात और आ गई कि केजरीवाल के पीछे अन्ना हजारे के आंदोलन की पुण्याई थी जबकि कॉकरोच जनता पार्टी इस मामले में खाली हाथ है। और ये भी कि केजरीवाल आम आदमी पार्टी बनाने के पहले से ही अपने एन .जी.ओ के कारण दिल्ली में समाज के निचले स्तर में पैठ बना चुके थे। उनके साथ सिविल सोसाइटी की अनेक विख्यात हस्तियां जुड़ी होने से पहिचान का संकट नहीं था। इसके विपरीत अभिजीत और उनके दाएं - बाएं हाथ कहे जाने वाले कतिपय लोगों की आम जनता में न कोई छवि है और न ही साख। उल्टे जंतर मंतर पर हुई गाली - गलौच के कारण उनका दामन दागदार हो गया। ऊपर से आंदोलन की समाप्ति पर आलीशान होटल में जश्न मनाते हुए पार्टी नेताओं के वीडियो सार्वजनिक होने के बाद बजाय शर्मिंदगी महसूस करने के जेन जी के नाम पर उसका बचाव करने से भी समाज के बड़े वर्ग में उनके बारे में नकारात्मक अवधारणा स्थापित हो गई। धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र होते ही जिस जल्दबाजी में अभिजीत एंड कंपनी ने अपना बोरिया - बिस्तर समेटा उससे उनकी ईमानदारी और लंबी लड़ाई लड़ने की क्षमता पर भी संदेह पैदा होने लगा। सरकार द्वारा जो लिखित आश्वासन दिये जाने थे वे न मिलने पर देशव्यापी आंदोलन की धमकी भी फुस्स साबित हुई। जो जानकारी आ रही है उसके मुताबिक दिल्ली पुलिस ने अनेक ऐसे लोगों पर शिकंजा कस दिया है जिन्होंने आंदोलन के दौरान पुलिस पर घातक हमले किये और सरकारी वाहनों को नुकसान पहुंचाया। अनेक के पास हथियार होने का मामला भी जाँच में है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपराधिक तत्वों पर कार्रवाई की छूट दे दी। आंदोलन के बाद कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं से जब पंजाब और कर्नाटक में हुए पेपर लीक पर वहाँ के शिक्षा मंत्री को हटाये जाने की मांग करने और आंदोलन करने के बारे में पूछा गया तो वे बगलें झांकने लगे। झारखंड में चल रहे छात्रों के आंदोलन को जुबानी समर्थन देने से आगे पार्टी नहीं बढ़ पा रही है। ये देखते हुए उन आशंकाओं को बल मिल रहा है कि सोशल मीडिया पर पैदा हुई कॉकरोच जनता पार्टी लंबी रेस का घोड़ा नहीं है। हालांकि राजनीति में न जाने की बात अन्ना आंदोलन के बाद अरविंद केजरीवाल ने भी कही थी किंतु वह दौर अलग था। इसीलिये कॉकरोच जनता पार्टी को किसी भी पार्टी ने भाव नहीं दिया। जंतर मंतर आंदोलन की आधी - अधूरी सफलता के बाद अब उसके सामने कोई स्पष्ट लक्ष्य नजर नहीं आ रहा। सही बात ये है कि खुद केजरीवाल ही अभिजीत की महत्वाकांक्षाओं के मार्ग में सबसे बड़े रोड़ा हैं। रही बात दबाव समूह बनने की तो अभिजीत और उनके साथी ये भूल रहे हैं कि काठ की हांडी बार - बार आग पर नहीं चढ़ती।
- रवीन्द्र वाजपेयी