Thursday, 19 March 2026

कांग्रेस विहीन विपक्षी गठबंधन की संभावना बढ़ रही


पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के ऐलान के बाद सभी की निगाहें विभिन्न राजनीतिक दलों की रणनीति पर टिक गईं। इनमें असम , प. बंगाल, तमिलनाडु  और केरल जहां पूर्ण राज्य हैं वहीं पुडुचेरी केंद्र शासित । असम में भाजपा और कांग्रेस  ने क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन किया है वहीं प. बंगाल में ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और भाजपा जहां अकेले मैदान में हैं वहीं कांग्रेस और वाममोर्चा गठबंधन तोड़ अलग - अलग मैदान में उतर रहे हैं। तमिलनाडु में द्रमुक और अन्ना द्रमुक जैसे दिग्गजों के साथ क्रमशः काँग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय दल गठबंधन में हैं। अभिनेता विजय की नवोदित पार्टी ने तीसरी ताकत के तौर उतरकर चुनाव को रोचक बना दिया। वहीं केरल में मुकाबला इस बार बेहद कड़ा है।  वाममोर्चा सरकार 10 वर्ष से सत्ता में रहने के कारण सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही है लेकिन कांग्रेस के  नेतृत्व वाला एल.डी.एफ अंतर्कलह के चलते उसका लाभ नहीं ले पा रहा।  केरल में भाजपा छिपा रुस्तम है जिसने हाल ही में तिरुवनंतपुरम की नगरनिगम पर कब्जा जमाकर  कांग्रेस और वाममोर्चे के लिए खतरे घंटी बजा दी है। पुडुचेरी जैसे छोटे  से राज्य की राष्ट्रीय राजनीति में वैसे तो कोई अहमियत नहीं है लेकिन वहां की गठबंधन सरकार में भाजपा की मौजूदगी दक्षिण में उसकी उपस्थिति का एहसास करवा रही है। लेकिन उक्त पांचों राज्यों के चुनाव में चौंकाने वाली बात ये है कि कांग्रेस की अगुआई  में भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती देने वाला इंडिया गठबंधन बिखरा - बिखरा नजर आ रहा है। कहने को तो तमिलनाडु में उसके दो  प्रमुख घटक द्रमुक और कांग्रेस एकजुट हैं लेकिन कांग्रेस पूरी तरह द्रमुक की दयादृष्टि पर निर्भर है। गठबंधन में सबसे बड़ा बिखराव दरअसल केरल में  है जहां कांग्रेस और वामपंथी एक दूसरे के विरुद्ध खुलकर मैदान में हैं। हालांकि पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भी वे एक दूसरे के विरोध में खड़े रहे किंतु इस बार विरोध ने शत्रुता का रूप ले लिया जिसका दुष्परिणाम प. बंगाल में  कांग्रेस और वाम दलों  का गठबंधन टूट जाने के तौर पर देखने मिला। यहां इंडिया गठबंधन में शामिल तृणमूल कांग्रेस, वाममोर्चा और कांग्रेस एक दूसरे के विरुद्ध तलवारें भांज रहे हैं। हालांकि ऐसा ही बिखराव हरियाणा और दिल्ली में भी दिखाई दिया था। बिहार में भी वह कांग्रेस और राजद के महागठबंधन में ही सिमटकर रह गया जिससे झामुमो नाराज हो गया। दिल्ली में तो कांग्रेस की ओर से आम आदमी पार्टी का विरोध करने खुद राहुल गांधी ने मोर्चा संभाला था। बची - खुची कसर पूरी कर दी सपा और तृणमूल कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के समर्थन में उतरकर। उसके बाद से इंडिया गठबंधन की न कोई बैठक हुई और न संयुक्त रणनीति  सामने आई। लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव के ध्वनि मत से नामंजूर हो जाने के बाद कांग्रेस मत विभाजन की मांग करने का साहस नहीं दिखा सकी क्योंकि उसे डर था कि कुछ विपक्षी पार्टियां मतदान से दूर रह सकती हैं। एक बात खुलकर सामने आ रही है कि भाजपा तो उसके सहयोगी क्षेत्रीय दलों के मुकाबले अपना कद बढ़ाती जा रही है वहीं इंडिया गठबंधन में शामिल क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहतीं । ममता बैनर्जी ने तो शुरू से ही कांग्रेस को हाशिये पर रखा। बिहार में चारों खाने चित्त होने के बाद अब तेजस्वी और उनका परिवार भी कांग्रेस से बिदकने लगा है। उ.प्र में अखिलेश यादव भी दूरी बनाते दिख रहे हैं। हाल ही में राहुल गांधी द्वारा बसपा  संस्थापक कांशीराम की तारीफ किए जाने से सपा के कान खड़े हो गए हैं। वहीं शराब घोटाले में निचली अदालत द्वारा दोषमुक्त किए जाते ही अरविंद केजरीवाल ने भाजपा के साथ ही कांग्रेस पर भी निशाना साधा। उनका इशारा विभिन्न आरोपों से घिरे गांधी परिवार के सदस्यों के जेल न जाने पर था। ये सब देखते हुए लगता है उक्त पांच राज्यों के चुनाव के  बाद गुजरात, पंजाब और उ.प्र के आगामी विधानसभा चुनाव के साथ ही 2029 के लोकसभा चुनाव के लिये एक नया विपक्षी गठबंधन आकार लेगा जिसमें  कांग्रेस नहीं होगी। दरअसल क्षेत्रीय दलों में राहुल के प्रति नाराजगी है जो राष्ट्रीय राजनीति से ज्यादा विदेश यात्राओं को  महत्व देते हैं। क्षेत्रीय क्षत्रपों को धीरे - धीरे ये बात समझ में आ रही है कि कांग्रेस का साथ देने से उनका अपना जनाधार खिसकता जा रहा है। शरद पवार , उद्धव ठाकरे, तेजस्वी यादव इसके उदाहरण हैं। इसीलिए ममता बैनर्जी कांग्रेस से छिटकती हैं। बड़ी बात नहीं विधानसभा चुनाव से निपटते ही वे केजरीवाल के साथ मिलकर कांग्रेस विहीन विपक्षी मोर्चे के गठन में जुट जाएं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 18 March 2026

तेल संपन्न इस्लामिक देश भी अब हथियारों की होड़ में शामिल होंगे


ईरान का अमेरिका और इजराइल के साथ युद्ध तीसरे सप्ताह में प्रविष्ट हो चुका है। लेकिन ये कहना कठिन है कि किसका पलड़ा भारी है? हालांकि  जो मोटे तौर पर नजर आ रहा है उसमें पहला ये कि ईरान की आक्रामक क्षमता दिन ब दिन घटती जा रही है । वहीं दूसरा यह कि अमेरिका और इजराइल ने ईरान की क्षमता का कम आकलन किया।  डोनाल्ड ट्रम्प और नेतन्याहू को उम्मीद रही कि  खामेनेई के कुनबे सहित मारे जाने के बाद ईरान  में गृहयुद्ध के हालात बन जाएंगे। इसके पीछे कुछ महीनों पहले महिलाओं द्वारा हिजाब सहित अन्य पाबंदियों के विरोध में किया गया आंदोलन रहा। खामेनेई की मौत के बाद ईरान के कुछ स्थानों पर जनता द्वारा  खुशी मनाये जाने की खबरों से  इस्लामिक सत्ता के पलटने की उम्मीदें भी आसमान छूने लगीं। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और लड़ाई उम्मीद से कहीं ज्यादा लंबी खिंचती दिखाई दे रही है। दरअसल अभी तक दोनों पक्ष ड्रोन और मिसाइलों के जरिए ही लड़ रहे हैं । खबर है अमेरिका अपने मैरीन कमांडरों को  ईरान के खार्ग द्वीप पर उतारकर लड़ाई को जमीन पर लाना चाहता है। ये द्वीप ईरान के तेल निर्यात की श्वास नलिका है। यदि यह मिशन  सफल रहा तब ईरान की कमर टूटना तय है। अन्य विकल्प फिलहाल अमेरिका और इजराइल के पास नहीं है क्योंकि ईरान की मुख्य भूमि पर सैनिक उतारने के खतरों से वे भली- भांति वाकिफ हैं। इसके अलावा  सबसे बड़ी बात इस जंग से निकलकर सामने आई वह है मध्य पूर्व के मुस्लिम देशों में एक - दो को  छोड़कर बाकी की ईरान से दुश्मनी हो जाना। इसका कारण ईरान द्वारा उनमें स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों  के अलावा हवाई अड्डों , होटलों और  तेल भंडारों पर मिसाइलों से किए गए हमले हैं। दुनिया भर के मुसलमानों की आस्था का केंद्र मक्का जिस सऊदी अरब में स्थित है वहां विश्व की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी पर किए हमले के बाद ईरान पूरी तरह अलग - थलग पड़ गया। यद्यपि जिन पड़ोसी मुस्लिम देशों को ईरान ने निशाना बनाया उनमें से एक ने भी उस पर पलटवार नहीं किया । वे केवल ईरानी ड्रोन और मिसाइलों से बचाव तक ही सीमित रहे। हालांकि अपनी गलती को भांपने के बाद ईरान ने उन सबसे माफी भी मांगी किन्तु उसके बाद किए नए हमलों ने हालात और खराब कर दिए। उल्लेखनीय है काफी समय से इस्लामिक नाटो के गठन की चर्चाएं सुनाई दे रही थीं। टर्की और पाकिस्तान इसमें काफी रुचि ले रहे थे। गत वर्ष भारत द्वारा पाकिस्तान के विरुद्ध ऑपरेशन सिंदूर नामक सैन्य कार्रवाई किए जाने के बाद पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच  समझौता हुआ कि किसी एक पर हुआ हमला दूसरे पर माना जाएगा।  लेकिन ईरान द्वारा सऊदी अरब पर हमले के बाद पाकिस्तान उसकी मदद के लिए आगे नहीं आया।  मौजूदा हालात में मुस्लिम देशों को ये बात समझ में आ चुकी है कि धर्म के नाम पर  एकता संभव नहीं रही। ईरान के साथ लेबनान और यमन जैसे देश भी हैं जिनकी इजराइल से सीधी लड़ाई है। बाकी के देश इस्लामिक कट्टरता से ऊपर उठकर आर्थिक विकास की राह पर चल पड़े हैं। इस जंग ने ईरान के साथ उनके रिश्तों में जो कड़वाहट घोल दी उसके बाद अब मध्य पूर्व के तेल संपदा सम्पन्न देशों को भी सुरक्षा संबंधी आत्मनिर्भरता का महत्व समझ आ गया है क्योंकि अमेरिकी अड्डों के बावजूद वे ईरान के  हमलों से नहीं बच सके। इसके अलावा ये संभावना भी है कि यदि अमेरिका और इजराइल मिलकर भी ईरान को पूरी तरह घुटनाटेक नहीं करा सके और कट्टर इस्लामिक सत्ता कायम रही तब मध्य पूर्व में हथियारों की होड़ और बढ़ेगी जिसके परिणामस्वरूप संघर्ष का नया स्वरूप देखने मिल सकता है। लेकिन ट्रम्प और नेतन्याहू ईरान  में सत्ता पलटवाकर शाह युग की वापसी में सफल हो गए तब यह देश अमेरिका का उपनिवेश बन जाएगा। यद्यपि आज की स्थिति में जो दिखाई दे रहा है उसमें भले ही ईरान संपूर्ण पराजय से बच जाए किंतु लड़ाई रुकने के बाद वह  पहले जैसा शक्तिशाली नहीं रहेगा। लड़ाई का अंतिम परिणाम जो भी हो लेकिन मध्य पूर्व के समूचे मुस्लिम देश अब सैन्य सुरक्षा पर खर्च करने बाध्य होंगे और अमेरिका भी उनको तेल के बदले अस्त्र - शस्त्र बेचकर इस लड़ाई के नुकसान की भरपाई करेगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 17 March 2026

ट्रम्प ने जो गड्ढा दूसरों के लिए खोदा उसी में खुद गिर पड़े


पूरी दुनिया को टैरिफ रूपी हथियार से भयाक्रांत करने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने खुद को ऐसे रास्ते पर ला खड़ा किया है जहां से आगे बढ़ना जहां बेहद कठिन है वहीं पीछे लौटने पर उनके साथ ही देश की रही सही साख भी- धाक मिट्टी में मिल जाएगी। दोबारा राष्ट्रपति का पद संभालते ही ट्रम्प ने सर्कस के रिंग मास्टर की तरह हंटर फटकारना शुरू कर दिया। यूक्रेन संकट के समय अमेरिका के दबाव में यूरोप के जिन देशों ने रूस पर प्रतिबंध थोप दिये थी उन्हें भी ट्रम्प ने नहीं बख्शा। ये कहना गलत नहीं होगा कि ट्रम्प  कूटनीतिक सौजन्यता को ताक पर रखते हुए विशुद्ध गुंडागर्दी पर उतर आए। किसी भी राष्ट्रप्रमुख के प्रति स्तरहीन टिप्पणी करना मानो उनका स्वभाव बन गया। सं. रा. संघ तक को धमकाने की जुर्रत उन्होंने कई मर्तबा की। दुनिया भर में जंग रुकवाने का स्वघोषित श्रेय लूटकर नोबल शांति पुरस्कार प्राप्त करने के लिए उन्होंने पाकिस्तान जैसे आतंकवाद के संरक्षक देश से सिफारिश करवाने में शर्म महसूस नहीं की। धीरे - धीरे उनकी हरकतों से पूरा विश्व वाकिफ हो गया।इंतेहा तो तब हो गई जब वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को आधी रात में  शयनकक्ष से उठवाकर अमेरिका के जेल में बंद कर वहां के तेल भंडारों पर विशुद्ध माफिया के अंदाज में कब्जा कर लिया। उसके बाद ग्रीनलैंड को हड़पने की उनकी धमकी से पूरा यूरोप थर्रा उठा। लेकिन डेनमार्क सहित अनेक देशों ने उनका विरोध कर ये संकेत दे दिया कि यूरोप अब आँख मूंदकर अमेरिका का समर्थन नहीं करेगा। इसका प्रमाण बीते  दिनों देखने मिला जब ट्रम्प द्वारा ईरान पर  सैन्य कार्रवाई में सहयोग की अपील को अमेरिका समर्थक अनेक देशों ने ठुकरा दिया।  ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों की आवाजाही रोकने से पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट उत्पन्न हो गया। ट्रम्प चाह रहे थे कि नाटो देश सैन्य कार्रवाई में उनका साथ दें । लेकिन सभी ने  इंकार कर दिया। यहाँ तक  जिन खाड़ी देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं वे भी दाएं - बाएं होने लगे । इनमें से अनेक देशों ने अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजों के साथ ही अपने सैनिक तैनात किए थे। जहां तक बात इस जंग की है तो ये बात पूरा विश्व स्वीकार कर रहा है कि ईरान भले ही घुटने टेकने मजबूर हो जाए किंतु उसने अमेरिका को भी बुरी तरह लहू - लुहान कर दिया। और यही ट्रम्प की परेशानी का कारण  है। पहले हमले में खामेनेई सहित दर्जनों लोगों को मौत के घाट उतारने में सफल होने के बाद ट्रम्प का हौसला बुलंद हो चला था। खामेनेई के अनेक परिजन सहित शीर्ष नेता और सैन्य अधिकारी भी मारे गए किंतु बजाय दहशत में आने के ईरान ने  अमेरिका और इजराइल सहित उन खाड़ी देशों पर भी मिसाइल और ड्रोन से हमले शुरू कर दिए जहां अमेरिका ने सैनिक अड्डे बना रखे थे। साथ  ही सऊदी अरब , ओमान , बहरीन और कतर की तेल और गैस  इकाइयों को निशाना बनाकर उनमें उत्पादन रुकवा दिया। टर्की तक को नहीं बख्शा गया जो खुद को मुस्लिम देशों का नेता बनने का ख़्वाब देखने लगा था। दरअसल ईरान ने उन सभी देशों को संदेश दे दिया कि अमेरिका का साथ देने पर वे भी उसकी मिसाइलों से बच नहीं सकेंगे। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने के बाद समूचा यूरोप तेल और गैस के अलावा खाद्यान्न के लिए तरस चुका है ।अमेरिका समर्थक देशों को लगा कि ट्रम्प को खुश करने के लिए वे ईरान के कोप भाजन क्यों बनें? इसीलिये उन्होंने  अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता दी।  इस प्रकार ट्रम्प को दोहरी किरकिरी झेलनी पड़ रही है। ईरान को घुटने टिकवा देने की उनकी डींगें अभी तक तो हवा - हवाई ही साबित हुई है। ऊपर से पुराने सहयोगी भी ठेंगा दिखा रहे हैं। इसे विश्व राजनीति का नया मोड़ कहा जा सकता है। सोवियत संघ के विघटन के बाद बनी अमेरिका के  वर्चस्व वाली एकध्रुवीय व्यवस्था एक झटके में बिखरती लग रही है। इसके लिए डोनाल्ड ट्रम्प की हरकतें ही जिम्मेदार हैं। जिन्होंने अपने साथ ही अमेरिका की विश्वसनीयता का भी जनाजा निकलवा दिया। पूरी दुनिया के लिए जो गड्ढा उन्होंने खोदा आज वे खुद उसी में गिरकर बचाव की गुहार लगा रहे हैं। लेकिन कोई मदद को नहीं आ रहा । अमेरिका के राष्ट्रपति को दुनिया का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति मानने वाली धारणा मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में पूरी तरह बदल चुकी हैं जिनके चलते ट्रम्प विश्व के सबसे निरीह व्यक्ति नजर आ रहे हैं।। इस युद्ध में ईरान की तबाही तो सुनिश्चित है किन्तु ट्रम्प की गलतियों से अमेरिका की चौधराहट भी खत्म होने को है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 16 March 2026

सिद्धांत और संगठन दरकिनार - चुनाव जिताते मुफ्त उपहार


चुनाव आयोग ने गत दिवस प. बंगाल, असम, तमिलनाडु , केरल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव की तिथियां घोषित कर दीं। इस बार प. बंगाल में दो चरणों में जबकि बाकी चार राज्यों में एक ही दिन मतदान होगा।  चुनाव की तारीखों की घोषणा के पहले उक्त सभी राज्यों की सरकारों ने मतदाताओं को लुभाने वाली योजनाओं की घोषणा करने के साथ ही उन्हें लागू करते हुए खजाना खोल दिया। इनके अंतर्गत मतदाताओं के खाते में सीधे  राशि जमा की गई। इस प्रकार ये बात साबित हो चुकी है कि  चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दल मुफ़्त रेवड़ियों पर ही निर्भर  होकर रह गए हैं। स्मरणीय  है असम और केरल में क्रमशः भाजपा और वामपंथियों की सरकारें हैं। ये दोनों अपनी विचारधारा और सिद्धांतों के लिए जाने जाते हैं।  कैडर आधारित संगठन इनकी असली ताकत है। प. बंगाल में ज्योति बसु ने तीन दशक से ज्यादा अपनी सरकार विचारधारा और कैडर के बलबूते चलाई। भाजपा भी गुजरात और मध्यप्रदेश जैसे प्रदेशों में लंबे समय से काबिज है तो इसके पीछे उसके सिद्धांतों और संगठन का योगदान कहा जाता है। लेकिन पिछले कुछ चुनावों में विचारधारा और संगठन के  बजाय रेवड़ियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। इसीलिये असम की भाजपा  सरकार और केरल की साम्यवादी सत्ता को मतदाताओं की जेब जनहित के नाम पर नगदी से भरनी पड़ रही है। बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव के पहले नीतीश सरकार ने  लाखों महिलाओं के  खाते में 10 हजार जमा करवाकर  जबर्दस्त सफलता हासिल की। उसके पहले ऐसा ही प्रयोग अनेक राज्यों में हुआ जिसका लाभ  सत्तारूढ़ पार्टी को मिला क्योंकि उसने चुनाव से पहले ही सरकारी खर्च से मतदाताओं की जेब गर्म कर दी। प.बंगाल , असम और केरल में लगातार एक ही पार्टी का शासन  चला आ रहा है। उसके बावजूद सत्तारूढ़ पार्टी को चुनावी वर्ष में नई - नई योजनाओं के जरिए खैरात बांटने की मजबूरी झेलनी पड़े तो फिर ये मानना गलत नहीं होगा कि उनकी नीतियों और कार्यप्रणाली जनता को संतुष्ट नहीं रख सकी। तमिलनाडु तो इस मुफ्तखोरी का जनक  ही है। चुनाव जीतने के लिए सरकारी खजाना खाली करने के इस तरीके पर चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय अनेक अवसरों पर ऐतराज व्यक्त कर चुके हैं। लेकिन वे भी इस पर रोक लगाने का साहस नहीं दिखा सके। ये बात भी खुलकर सामने आ चुकी है कि इनके कारण राज्यों पर कर्ज का बोझ बढ़ता चला जा रहा है। यहां तक कि  उसका ब्याज चुकाने तक के लिए नया कर्ज लेने की स्थिति बन रही है। इस  प्रकार ये मुफ्त योजनाएं राजनीतिक दलों के गले की फांस बनती जा रही हैं। एक बार उन्हें शुरू करने के बाद बंद करने का जोखिम उठाने की हिम्मत किसी में नहीं है। ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि मतदाता को भी उपभोक्ता मानकर ज्यादा से ज्यादा छूट जैसे आकर्षण देकर अपनी तरफ खींचना ही चुनावी सफलता का मंत्र बन गया है। चूंकि देश में हर साल कुछ राज्यों में चुनाव होते हैं इसलिए केंद्र सरकार भी मतदाताओं  की नाराजगी से अपनी पार्टी को बचाने के लिए आर्थिक स्तर पर कड़े फैसले नहीं ले पाती। लोक कल्याणकारी राज्य में जनता को खुश रखना सरकार का कर्तव्य है लेकिन घर फूँक तमाशा देखने की इस प्रवृत्ति को नहीं रोका गया तो वह दिन दूर नहीं जब कर्ज का बोझ असहनीय हो जाएगा और तब  जो होगा उसकी कल्पना भी भयभीत कर देती है। अनेक देश मुफ्त रेवड़ियां बांटने के बाद कंगाल होकर अराजकता का शिकार हो चुके हैं। ये  सब जानते हुए भी हमारे राजनीतिक दल अपने निहित स्वार्थों के लिए जिस प्रकार सरकारी खजाना लुटाने पर आमादा हैं वह  मजबूत अर्थव्यवस्था के तमाम दावों को मिट्टी में मिला देगा। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद  इन मुफ्त योजनाओं की आलोचना कर चुके हैं किंतु केंद्र सरकार के साथ ही भाजपा शासित राज्य भी मुफ्त रेवड़ियां बांटने में सबसे आगे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 14 March 2026

लेकिन कांग्रेस में कमियों के लिए जिम्मेदार कौन


आजादी के बाद दलित राजनीति के सबसे बड़े चेहरे और बसपा के संस्थापक स्व. कांशीराम की जयंती के दो दिन पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा उनकी प्रशंसा के पीछे  उनके प्रति  श्रद्धा नहीं अपितु आगामी वर्ष  उ.प्र विधानसभा के चुनाव में दलित वोट बैंक को दोबारा हासिल करना है जो कभी कांग्रेस की ताकत था। हालांकि कांशीराम थे पंजाब के लेकिन उन्होंने भांप लिया था कि  उ.प्र में जड़ें जमाये बिना बसपा राष्ट्रीय राजनीति में जगह नहीं बना सकेगी और इसीलिए उन्होंने  जाटव समाज की एक युवती मायावती को चुना। उ.प्र की होने से दलित वर्ग में उनकी स्वीकार्यता बढ़ती गई और बैसाखियों के सहारे मुख्यमंत्री बनने वाली मायावती ने 2007 में स्पष्ट बहुमत हासिल कर सबको चौंका दिया। हालांकि वह दौर पांच साल में ढलान पर आ गया। आज उनकी पार्टी का एक भी सांसद नहीं है वहीं उ.प्र में मात्र एक विधायक। वे खुद भी सांसद या विधायक नहीं हैं। बीते कुछ चुनावों में पूरे दलित समुदाय की नेता होने के बजाय मायावती अपने सजातीय वर्ग तक ही सिमट गईं ।  हाल ही में उन्होंने लखनऊ में एक विशाल रैली का आयोजन कर अपना प्रभाव पुनर्स्थापित करने का प्रयास भी किया था। लेकिन उ.प्र में उनकी वापसी की संभावना न के बराबर है । अब सवाल ये है कि राहुल गांधी के मन में कांशीराम के प्रति प्यार क्यों उमड़ पड़ा और उन्हें भारत रत्न देने की मांग कांग्रेस की ओर से उछलने लगी। राजनेताओं की  हर बात के पीछे कहीं न  कहीं चुनाव होता है। राहुल ने भी कांशीराम की वंदना इसीलिए की। लेकिन वे यह भी बोल गए कि कांग्रेस में कमियां थीं, इसलिए कांशीराम सफल हुए। अगर कांग्रेस अपना काम करती तो कांशीराम सफल नहीं हो पाते। एक और चौंकाने वाली बात उन्होंने ये कही कि अगर भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू जीवित रहे होते तो कांशीराम कांग्रेस की तरफ से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री होते। स्मरणीय हैं नेहरू जी 1964 में ही चल बसे थे जबकि कांशीराम 1978 में बामसेफ की स्थापना के साथ उभरे।  1984 में उन्होंने बसपा बनाई। श्री  गांधी के मुताबिक भारत का संविधान महात्मा गांधी, डॉ.अंबेडकर और कांशीराम के विचारों पर आधारित था। उनकी ये बात इसलिए हास्यास्पद है क्योंकि जब देश आजाद हुआ उस समय कांशीराम महज 13 साल और संविधान लागू होते समय 16 वर्ष के थे।  राहुल के कांशीराम प्रेम में भी विरोधाभास नजर आया। एक तरफ तो उन्होंने कहा कि कांग्रेस की कमियों के कारण वे सफल हुए । इसका मतलब यदि कांग्रेस में कमियां न होतीं तब वह कांशीराम को सफल नहीं होने देती। वहीं दूसरी तरफ  ये शिगूफा छोड़ दिया कि नेहरू जी जीवित रहते तो वे कांशीराम को उ.प्र का मुख्यमंत्री बना देते।  इस बात से ये सवाल उठ खड़ा होता है कि यदि कांग्रेस को बसपा नेता के प्रति यदि इतना लगाव था तब इंदिरा गांधी ने उन्हें उ.प्र का मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया? इस संदर्भ में याद रखने वाली बात ये है कि 1977 के चुनाव में जब अपने दौर के सबसे बड़े दलित नेता बाबू जगजीवन राम ने कांग्रेस छोड़ दी तब दलित राजनीति में एक खालीपन पैदा होने लगा। दरअसल  उनके मन में प्रधानमंत्री न बन पाने की कसक थी जो जनता पार्टी में आने पर भी पूरी नहीं हो सकी। जब ये तय हो गया कि उनका राजनीतिक सफर समाप्त होने को है तभी 1978 में कांशीराम द्वारा बसपा का गठन कर दलित राजनीति को उसका अपना मंच दिया। सवाल ये है कि कांग्रेस ने युवा कांशीराम को अपने साथ क्यों नहीं जोड़ा ?कल लखनऊ में श्री गांधी ने कांशीराम को महात्मा गांधी और डॉ. अंबेडकर के समकक्ष रखते हुए कहा कि दोनों ने कभी समझौता नहीं किया। लेकिन इतिहास गवाह है कि अंबेडकर जी की राजनीतिक दुर्गति करने में कांग्रेस कभी पीछे नहीं रही। पहले उन्हें नेहरू मंत्रिमंडल से निकलने मजबूर किया गया और फिर लोकसभा के चुनाव में हरवा दिया। यहां तक कि उन्हें भारत रत्न देने से भी परहेज किया गया। 1990 में गैर कांग्रेसी सरकार ने ये काम किया। ऐसे में श्री गांधी का ये कहना गले नहीं उतरता कि नेहरू जी जीवित रहते तो कांशीराम को उ.प्र का मुख्यमंत्री बना देते। कांग्रेस द्वारा उन्हें भारत रत्न दिये जाने की मांग उठाना भी अटपटा है क्योंकि उनके जीवनकाल में पार्टी ने उनको कभी महत्व नहीं दिया।  बहरहाल , श्री गांधी की ये स्वीकृति सच्चाई के काफी करीब है कि कांग्रेस की कमियों के कारण ही कांशीराम आगे बढ़ सके। लेकिन उन्हें ये भी बताना भी चाहिए कि कांग्रेस में कमियों के लिए कौन जिम्मेदार है क्योंकि पार्टी पर नेहरू -  गांधी परिवार का एकछत्र आधिपत्य आज तक बना हुआ है। सही बात तो ये है कि कांग्रेस की कमियों के चलते ही न सिर्फ दलित बल्कि पिछड़े भी उससे दूर हो गए। और ऐसा कहीं से भी नहीं लग रहा कि पार्टी अपनी कमियों को दूर कर गलतियों से सीखने को तैयार है।


- रवीन्द्र वाजपेयी





Friday, 13 March 2026

अविश्वास प्रस्ताव पर खाली हाथ रहा विपक्ष


विपक्ष द्वारा प्रस्तुत अविश्वास प्रस्ताव धराशायी होने के बाद लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला ने  साफ - साफ कह दिया कि सदन कानून से ही चलेगा।  उल्लेखनीय है  अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस मिलते ही उन्होंने सदन में आना बंद कर दिया था। दोबारा सदन में आने पर उनके तेवर पूर्ववत ही दिखाई दिए जबकि विपक्ष अपराधबोध से ग्रसित था क्योंकि जिस व्यक्ति पर उसने तमाम आरोपों की झड़ी लगा दी थी उसी को माननीय कहकर संबोधित करना पड़ रहा है। वैसे भी प्रस्ताव पर बहस में विपक्ष अपेक्षित पैनापन नहीं दिखा सका । कई मर्तबा तो ऐसा लगा जैसे वह प्रस्ताव रूपी बोझ  को जल्द - से जल्द उतारना चाहता था। प्रस्ताव गिरना तो था ही लेकिन विपक्ष चाहता तो आए दिन उत्पन्न होने वाले गतिरोध को दूर करने का रास्ता निकालकर अपने लिए सुखद स्थिति बना सकता था किंतु वह एक बार फिर चूक गया। संसदीय प्रणाली  में अध्यक्ष /सभापति सदन का मुखिया होता है। विषय सूची ,  विभिन्न दलों को बोलने का समय निर्धारण के वेसाथ ही विवाद की स्थिति में व्यवस्था देने जैसे निर्णय उसके अधिकार क्षेत्र में होते हैं। उसकी अध्यक्षता में एक कार्य मंत्रणा समिति  भी होती है जिसमें विभिन्न दलों का सदस्य संख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व होता है। विपक्ष के समझदार नेता अध्यक्ष या सभापति से सौजन्यतापूर्ण संबंध बनाकर अपने लिए बेहतर स्थितियां निर्मित कर  लेते हैं। डॉ.राममनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर, मधु लिमये,जॉर्ज फर्नांडीज, लालकृष्ण आडवाणी, सोमनाथ चटर्जी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली जैसे  विपक्षी नेताओं को हर पीठासीन अधिकारी बोलने के लिए पर्याप्त समय ही नहीं देते थे बल्कि उनके भाषण के बीच में टोकाटाकी करने वाले सत्ता पक्ष के सांसदों को फटकार भी लगाते थे। आज वैसे विपक्षी नेता संसद में  इक्का - दुक्का ही हैं । ऐसा ही आपसी सद्भाव प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष में हुआ करता था। पंडित नेहरू के दौर में विपक्ष की संख्या कम होने के बाद भी उसके कुछ सांसद सरकार को घेरने में कामयाब हो जाते थे। इंदिरा जी के समय में कटुता बढ़ी किंतु उसके बावजूद अटल जी और चन्द्रशेखर जैसे नेताओं के साथ उनका संवाद बना रहा। पी.वी नरसिम्हा राव और अटल जी के निजी रिश्ते भी जगजाहिर थे। हालांकि संसद में दोनों एक दूसरे की तीखी आलोचना में परहेज नहीं करते थे। लोकसभाध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति सामान्यतः सत्ता पक्ष से जुड़े होते हैं किंतु विपक्ष सम्मान का भाव रखते हुए शालीन व्यवहार करे तो वे भी उसे संरक्षण देने में पीछे नहीं रहते। विपक्ष को सरकार और आसंदी के विरुद्ध बोलने का पूरा अधिकार है किंतु उसमें मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। यदि श्री गांधी समय - समय पर प्रधानमंत्री और श्री बिरला से मेल - मुलाकात करते रहें तो इससे आपसी संबंध सुधरने के अलावा संसद का वातावरण भी खुशनुमा रहेगा। उनको  शरद पवार से सीखना चाहिए जो राजनीतिक मतभेद भुलाकर गाहे - बगाहे प्रधानमंत्री से मिलकर अपने क्षेत्र की समस्याओं को समाधान करवा लेते हैं। कुछ समय पहले प्रियंका वाड्रा ने सदन में विनम्रता पूर्वक परिवहन मंत्री नितिन गडकरी से अपने क्षेत्र के विकास कार्यों के लिए चर्चा हेतु समय मांगा जिसे मंत्री ने तत्काल स्वीकार कर कहा कभी भी आइए। बाद में प्रियंका उनसे मिलीं। इसी कारण सत्तापक्ष के एक सांसद ने कहा भी प्रियंका को नेता प्रतिपक्ष होना चाहिए। स्मरणीय  है उक्त अविश्वास प्रस्ताव पर श्री गांधी ने हस्ताक्षर नहीं किए तब  कहा गया कि ऐसा संसदीय लोकतंत्र की परंपराओं का पालन करने के लिए लिया गया है, जिसमें विपक्ष के नेता  द्वारा सीधे स्पीकर के खिलाफ याचिका पर हस्ताक्षर करना उचित नहीं माना जाता। यदि यही सौजन्यता वे श्री बिरला से मिलकर व्यक्त कर आते तब बात इतनी नहीं बढ़ती। अब जबकि अविश्वास प्रस्ताव गिर चुका है तब विपक्ष को चाहिये वह सदन के वातावरण में घुल चुकी कटुता दूर करने अपने व्यवहार में लचीलापन लाए।  हर समय तैश में बोलना अथवा सत्ता पक्ष और प्रधानमंत्री पर व्यर्थ के कटाक्ष करने से श्री गांधी को कुछ लाभ नहीं होने वाला। बेहतर हो वे उन पूर्व विपक्षी नेताओं के व्यक्तित्व और कृतित्व का का अनुसरण करें जिनका सम्मान सत्ता पक्ष भी करता था।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 12 March 2026

रूस और चीन के दूर रहने से ईरान फंस गया


ईरान पर अमेरिका और इजराइल के आक्रमण को दो हफ्ते बीतने जा रहे हैं। अब तक दोनों पक्ष एक - दूसरे को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाने के दावे कर रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रम्प आदतानुसार रोज नया शिगूफा छोड़ते हुए दावा करते हैं कि ईरान तबाह हो चुका है और उसकी सैन्य क्षमता लड़ाई लंबी खींचने लायक नहीं बची। दूसरी तरफ ईरान भी बुलंद हौसलों के साथ कभी इजराइल तो कभी बहरीन और ओमान के तेल भण्डारों पर ड्रोन से बम वर्षा कर नुकसान पहुंचा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही रोककर ईरान ने तेल आपूर्ति रोक दी है। तेल से लदे दर्जनों टैंकर फंसे हुए हैं। एक - दो ने निकलने की कोशिश की तो ईरान ने उन पर हमला कर दिया। थाईलैण्ड का एक जलपोत कल ही ईरानी मिसाइल का शिकार हो गया जिसमें सवार लोगों को ओमान के सुरक्षा दल ने बचाया किंतु कुछ नाविक लापता होने से उनके मारे जाने की आशंका है। गत सप्ताह ईरान ने पड़ोसी मुस्लिम देशों पर किए गए हमलों के लिए माफ़ी मांगकर ये संकेत दिया था कि इजराइल और अमेरिका को छोड़ बाकी सब पर वह हमले नहीं करेगा। लेकिन उसने ये शर्त भी रख दी थी कि जिन मुस्लिम देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं उनसे यदि हमले हुए तब उनके जवाब में ईरान भी पलटवार करेगा। हालांकि बहरीन और ओमान में उसके ताजा हमलों का कारण सामने नहीं आया। इस बीच लड़ाई रोकने के लिए किसी ठोस कूटनीतिक प्रयास की जानकारी नहीं मिली। यद्यपि ट्रम्प ने रूस के राष्ट्रपति पुतिन से घंटे भर फोन पर बात की परंतु उसका कोई सार्थक परिणाम देखने नहीं मिला। अब तक इस लड़ाई में किसका पलड़ा भारी है ये आकलन अच्छे - अच्छे सैन्य विशेषज्ञ नहीं कर पा रहे। कुछ का कहना है कि अमेरिका और इजराइल ने हमले करने में जल्दबाजी कर दी। उनके द्वारा ईरान की सैन्य क्षमता को कम आंका गया। इसके अलावा ये अंदाजा भी गलत निकला कि खामेनेई को मारते ही ईरान का मनोबल टूट जाएगा। आंतरिक विद्रोह की उम्मीद भी ग़लत साबित हुई। इसमें दो राय नहीं हैं कि अमेरिका और इजराइल ने ईरान को बर्बादी के कगार पर खड़ा कर दिया जिससे उबरने में उसे दशकों लग जाएंगे। इस बारे में उसकी तुलना यूक्रेन से करना सही होगा जो रूस के हमलों के कारण मलबे के ढेर में तब्दील हो चुका है। ऐसी ही स्थिति इजराइल ने गाजा की बना दी। बावजूद इसके ईरान यदि मुकाबले में है तब ये मानना पड़ेगा कि अमेरिका और इजराइल से मिलने वाली धमकियों के चलते उसने अपने रक्षा तंत्र के साथ ही आक्रमण क्षमता को काफ़ी विकसित कर लिया था। ऐसा लगता है ईरान लड़ाई को लंबा खींचकर अमेरिका और इजराइल को थका देना चाहता है। वहीं ट्रम्प और इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू की रणनीति ईरान को इतना नुकसान पहुंचाने की है जिससे वह मजबूर होकर घुटने टेके। हालांकि नुकसान इजराइल में भी कम नहीं हुआ लेकिन इस लड़ाई में ज्यादातर मुस्लिम देश उसके साथ होने से वह इस संकट से उबर जाएगा। अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी देश भी उसके नुकसान की भरपाई कर देंगे लेकिन ईरान जिन रूस और चीन के भरोसे अमेरिका जैसी महाशक्ति से टकराने का दुस्साहस कर बैठा वे अब तक मदद हेतु नहीं आए। रूस तो खैर यूक्रेन संकट में फंसा हुआ है किंतु चीन परदे के पीछे रहकर ईरान की कितनी भी मदद करता रहा हो लेकिन सामने आने से बचकर उसने परोक्ष रूप से अमेरिका और इजराइल को ही सहायता दी। इसके पीछे की वजह ये है कि अनेक अरब देशों में इजराइल ने विभिन्न परियोजनाओं में भारी निवेश कर रखा है। यद्यपि ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीददार चीन ही है किंतु वह अपने आर्थिक हितों के प्रति भी सतर्क है। रूस और चीन द्वारा दूर से बैठकर धुआं देखने से ईरान मुसीबत में फंस गया है। इस जंग का परिणाम क्या होगा ये फिलहाल कोई नहीं बता सकता लेकिन इसके जारी रहते पूरी दुनिया ऊर्जा संकट में उलझकर रह गई है और यही वह ब्रह्मास्त्र है जिसका उपयोग कर ईरान  अपनी पराजय को टालना चाह रहा है। कुछ लोगों का मानना है कि अंततः ईरान के मौजूदा नेतृत्व में फूट पड़ जाएगी। फिलहाल  अनिश्चितता की स्थिति है जिसमें दोनों पक्ष एक दूसरे के थकने का इंतजार कर रहे हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी