Tuesday, 7 April 2026

तमिलनाडु में राष्ट्रवादी भावना चुनाव पर असर डाल रही


तमिलनाडु से आ रहे रुझान सत्ता परिवर्तन का संकेत दे रहे हैं। सत्तारूढ़ द्रमुक का कांग्रेस के साथ गठबंधन है। वहीं उसकी प्रमुख प्रतिद्वंदी अन्ना द्रमुक ने  भाजपा को अपने साथ जोड़कर मुकाबले को नजदीकी बना दिया है। लेकिन अभिनेता विजय की नवोदित पार्टी तमिझगा वेत्री कझगम के तीसरी ताकत के तौर पर कूदने से त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति भी बन रही है।  शुरुआती आकलन था कि विजय सत्ता विरोधी मतों में सेंध लगाकर अन्ना द्रमुक गठबंधन अर्थात एन.डी.ए का नुकसान करेंगे किंतु ज्यों - ज्यों मतदान की तारीख करीब आ रही है त्यों - त्यों ये लगने लगा है कि तमिल फिल्मों का ये लोकप्रिय अभिनेता सत्ता पक्ष को भी बराबरी से नुकसान पहुंचा रहा है। स्मरणीय है तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी दुनिया का जबरदस्त प्रभाव रहा है। यद्यपि जयललिता और करुणानिधि के निधन के बाद से इसमें कमी आई। लेकिन विजय ने नई पार्टी के  जरिए हाथ आजमाकर उस दौर को पुनर्जीवित कर दिया। वैसे तो आज की तमिल फिल्मों में विजय बड़ा नाम है किंतु उनके साथ वह वैचारिक ताकत नहीं है जिसके बल पर अन्ना दोरई, एम. जी. रामचंद्रन , करुणानिधि और जयललिता ने लंबे समय तक  दबदबा बनाए रखा। लोकप्रिय अभिनेता कमल हासन ने भी राजनीति में हाथ आजमाया लेकिन फिल्मी सफलता को वे सियासत में नहीं दोहरा सके। कुछ लोगों का मानना है कि युवा पीढ़ी द्रविड़ पार्टियों की संकुचित सोच वाली राजनीति से अलग हटकर व्यापक  दृष्टिकोण से प्रेरित हो रही है। और इसी पर अभिनेता विजय की उम्मीदें टिकी हैं। यद्यपि उनको लेकर  चुनावी पंडित बहुत ज्यादा आश्वस्त नहीं हैं किंतु  अनेक सीटें हैं जिनमें उनके उम्मीदवार दोनों बड़े गठबंधनों में से किसी एक का खेल जरूर बिगाड़ेंगे। यही सोचकर भाजपा ने उन्हें अपने पाले में खींचना चाहा किंतु सफलता नहीं मिली। इसके बाद आए सर्वेक्षणों में अन्ना द्रमुक - भाजपा गठबंधन को सत्ताधारी द्रमुक - कांग्रेस गठजोड़ पर निर्णायक बढ़त दिखाए जाने से  लगने लगा है कि सत्ता विरोधी रुझान मुख्यमंत्री स्टालिन को नुकसान पहुंचा रहा है वहीं अभिनेता विजय की  मौजूदगी भी द्रमुक के जनाधार को  कमजोर करने में कामयाब हो रही है। यदि स्टालिन सत्ता से हाथ धो बैठते हैं तो उसका एक कारण तमिलनाडु की राजनीति में आ रहे हिंदुत्व का उभार भी होगा। उनके मंत्री पुत्र उदयनिधि ने सनातन धर्म की तुलना कोरोना और डेंगू से करते हुए उसे खत्म करने वाला जो बयान दिया था उसकी सवर्ण वर्ग में रोष पूर्ण प्रतिक्रिया हुई थी। हालांकि भाजपा  बड़ी सफलता हासिल कर पाएगी ये कहना कठिन है किंतु मुख्यमंत्री के बेटे के सनातन विरोधी बयान से हिंदुत्व की जो भावना जोर पकड़ने लगी उसका लाभ भाजपा के साथ ही अन्ना द्रमुक को भी मिलता लग रहा है। यदि ये आकलन धरातल पर उतरा और स्टालिन को सत्ता से हाथ धोना पड़ा तब तमिलनाडु की राजनीति में क्रांतिकारी परिवर्तन की शुरुआत होना तय है। हालांकि अन्ना द्रमुक भी निकली तो द्रविड़ राजनीति की कोख से ही है किंतु जयललिता के दौर से ही उसमें हिंदुत्व का पुट आने लगा था। संघीय ढांचे का हिस्सा होने के बावजूद हिन्दी  और उत्तर भारत के विरोध का राग अलापकर तमिलनाडु को मुख्य धारा से अलग रखने वाली सियासत के समानांतर अब राष्ट्रवादी भावना का असर इस चुनाव में नजर आ रहा है। यदि मतदान के दिन तक ये जारी रहा तब सत्ता परिवर्तन की संभावना वास्तविकता में बदलना तय है। स्टालिन इस बात को समझ गए हैं इसीलिए इन दिनों उनके बयानों में वैसा तीखापन नहीं है जैसा प. बंगाल में ममता बैनर्जी की टिप्पणियों में दिखाई देता है। कुल मिलाकर तमिलनाडु का ये चुनाव कई अर्थों में असाधारण है क्योंकि पहली बार है जब भाजपा को विश्लेषक गंभीरता से ले रहे हैं। तमिलनाडु की राजनीति के जानकार ये कहने में भी संकोच नहीं कर रहे कि यदि जनादेश मौजूदा  राज्य सरकार के विरुद्ध आया तब   स्व.करुणानिधि के विशाल परिवार में  उत्तराधिकार की लड़ाई नए सिरे से शुरू होगी जिसके कारण स्टालिन का भविष्य अंधकारमय हो सकता है। गौरतलब है अन्ना द्रमुक के पास भी जयललिता जैसा कोई नेता नहीं होने से भाजपा इस शून्य को भरने में कामयाब हो सकती है क्योंकि उसके उत्तर भारत की पार्टी होने की अवधारणा धीरे - धीरे कमजोर पड़ने लगी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 6 April 2026

केरलम में कांग्रेस की प्रतिष्ठा और वामपंथियों का अस्तित्व दांव पर


जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं उनमें केरलम ( केरल ) में कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों का भविष्य दांव पर लग गया है। दरअसल यही वह राज्य है जिसमें कांग्रेस को उम्मीद दिखाई दे रही है। हालांकि दावा तो वह असम जीतने का भी कर रही है किंतु तमाम सर्वेक्षणों में वहां भाजपा की  वापसी संभावित होने से केरलम में ही कांग्रेस के लिए गुंजाइश है। वहीं दस वर्षों से सत्ता पर विराजमान वामपंथी मोर्चे के सामने अपना इकलौता किला बचाने की चुनौती है। यद्यपि  पार्टी कैडर के अलावा विजयन सरकार की कल्याणकारी नीतियों का जनमानस पर सकारात्मक प्रभाव उसके पक्ष में हैं  लेकिन सत्ता विरोधी भावना भी  दिखाई दे रही है। ऐसा लगता है सरकार समर्थकों में वह उत्साह नहीं है जो जीत का आधार बनता है। अब  तक हिन्दू समुदाय जहां वामपंथियों का परंपरागत वोट बैंक रहा वहीं मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन के चलते कांग्रेस को मुसलमान मत  मिलते रहे। ऐसा ही ईसाई समुदाय के साथ देखा गया जिसे गांधी परिवार के रूप में अपना हितचिंतक महसूस होता है।  2011 की जनगणना के अनुसार, केरल में हिंदू आबादी लगभग 54.73%, मुस्लिम 26.56% और ईसाई 18.38% है। यहां हर पांच साल में सरकार बदलती थी किंतु 2021 में वामपंथी मोर्चे ने लगातार दूसरा चुनाव जीतकर चौंकाया जबकि उसके  बाद लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने बाजी मारी। हाल ही हुए स्थानीय निकाय चुनाव में भी सत्तारूढ़ मोर्चे का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। राजधानी तिरुवनंतपुरम में भाजपा का महापौर बनना उसके लिए खतरे की घंटी बन गया। हालांकि जो संकेत हैं उनके अनुसार एल डी.एफ नामक वामपंथी मोर्चे ने हिम्मत नहीं हारी है । चूंकि प. बंगाल में इस  बार भी  संभावना शून्य है ऐसे में केरलम की सत्ता वामपंथी पार्टियों के लिए जीवन मरण का प्रश्न बन गई है।  इस चुनाव में पराजित होने  पर केरलम में भी उनका हश्र प. बंगाल जैसा होना तय है क्योंकि उनके परम्परागत हिन्दू जनाधार अर्थात शहरी मध्यमवर्ग के अलावा महिलाओं में भाजपा तेजी से अपना प्रभाव कायम करती जा रही है। हालांकि इस बार भाजपा के कितने विधायक जीतेंगे ये कहना  कठिन है किंतु उसका मत प्रतिशत  जिस प्रकार बढ़ता जा रहा है उससे ये माना जा रहा है कि  यू. डी एफ और  एल. डी. एफ की जीत - हार में उसके द्वारा हासिल मतों की बड़ी भूमिका रहेगी। बीते कुछ चुनावों से भाजपा  तिरुवनंतपुरम सीट पर लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करती आई है किंतु इस चुनाव में उसकी उपस्थिति कमोबेश पूरे राज्य में होने से वह बड़ा उलटफेर करने की स्थिति में है। लव जिहाद के विरोध में उसके अभियान ने हिन्दू जनमानस के अलावा ईसाइयों को भी आकर्षित किया है। ये चर्चा भी सुनाई देने लगी है कि अनेक  सीटों पर मुस्लिमों के विरोध में हिंदुओं और ईसाइयों का ध्रुवीकरण एल.डी.एफ और यू.डी.एफ दोनों का खेल बिगाड़ेगा जिसका लाभ भाजपा को मिल सकता है।  अनेक विश्लेषकों का आकलन है कि केरलम में त्रिशंकु विधानसभा की भी स्थिति भी बन सकती है और तब संतुलन भाजपा के नियंत्रण में होगा किंतु उसके लिए दोनों गठबंधनों में से एक नाग नाथ तो दूसरा सांप नाथ है। वहीं कांग्रेस और वामपंथियों के लिए भाजपा से गठजोड़ असम्भव है। हालांकि अंतिम फैसला तो मतदाता ही करेंगे किंतु केरलम में वामपंथी जहां अस्तित्व बचाने लड़ रहे  हैं वहीं कांग्रेस के लिए ये प्रतिष्ठा का प्रश्न है क्योंकि लोकसभा चुनाव  के बाद हुए विधानसभा चुनावों में उसका प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। जम्मू - कश्मीर, हरियाणा, महाराष्ट्र,  झारखंड,दिल्ली और बिहार में उसकी स्थिति पहले से और कमजोर हो गई। इसके कारण जहां राहुल गांधी की क्षमता पर सवाल उठे वहीं इंडिया गठबंधन में निष्क्रिय होकर रह गया। यदि केरलम में इस बार भी सत्ता कांग्रेस के हाथ नहीं लगी तब राहुल के विरुद्ध पार्टी के भीतर भी बड़ा विद्रोह होना तय है। इसी तरह यदि सरकार गंवा बैठे तब बंगाल की खाड़ी के बाद अरब सागर में भी वामपंथी राजनीति का डूबना सुनिश्चित है। भाजपा के लिए केरलम एक अवसर साबित हो सकता है क्योंकि दोनों बड़े मोर्चे में जो भी हारेगा उसकी जगह भविष्य में वही लेगी ये साफ नजर आ रहा है। देश के सबसे सुशिक्षित इस राज्य के मतदाता सदैव सोच -  समझकर ही मतदान करते आए हैं। हालांकि इस बार उनके सामने भी जबरदस्त असमंजस है। साथ ही मध्यपूर्व में चल रहे युद्ध से भी चुनाव के समीकरण प्रभावित हो रहे हैं क्योंकि खाड़ी देशों में कार्यरत केरलम के लाखों लोग वहीं फंसे हुए हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 4 April 2026

आम आदमी पार्टी में बिखराव रुकने का नाम नहीं ले रहा


   हालांकि ये आम आदमी पार्टी का अधिकार है कि वह संसद में किसे अपना नेता , उपनेता या सचेतक बनाए। उस लिहाज से राज्यसभा में  राघव चड्ढा को उपनेता पद से अलग किया जाना उसका आंतरिक मामला है। लेकिन राज्यसभा सचिवालय को ये लिखकर देने से कि उनको बोलने की अनुमति न दी जाए, ये प्रकरण सुर्खियों में आ गया। पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट राघव पार्टी के सौम्य और शालीन चेहरे  हैं। अन्ना आंदोलन के समय ही वे अरविंद केजरीवाल के साथ जुड़ गए।  प्रवक्ता के तौर पर उनका प्रदर्शन  प्रभावशाली रहा।  केजरीवाल सरकार के अनेक मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और कुछ तो जेल भी गए, वहीं राघव अपनी स्वच्छ छवि और सुसंस्कृत व्यवहार के कारण लोकप्रिय होते गए। लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स से शिक्षित इस नेता को पार्टी ने पंजाब  की जिम्मेदारी सौंपी  जहां उसे दिल्ली की तरह से ही धमाकेदार जीत मिली । पुरस्कार स्वरूप उन्हें राज्यसभा में भेजा गया। सदन में लीक से हटकर मुद्दे उठाने के कारण  राघव  प्रभाव छोड़ने में सफल हो गए।  लेकिन अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा से विवाह के बाद उनकी चर्चा राजनेता से ज़्यादा ग्लैमर बॉय के रूप में होने लगी।  टीवी कार्यक्रमों में उनसे पार्टी और राजनीति से जुड़े सवालों की बजाय निजी जीवन पर पर सवाल पूछे जाते। यद्यपि राज्यसभा में  आम जनता से जुड़े मुद्दे  उठाने से  उन्हें सराहना भी मिली । निर्वाचित जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने ( रिकॉल )  का उनका सुझाव लोगों को पसंद आया। हवाई अड्डों पर महंगी खाद्य सामग्री के अलावा गिग वर्कर्स (ओला/उबर ड्राइवर, स्विगी/ज़ोमैटो डिलीवरी पार्टनर,  या कूरियर बॉय)  के शोषण का मुद्दा उठाकर भी वे सुर्खियों में आए।  ऐसे में उनको राज्यसभा में  उपनेता पद से हटाने के निर्णय पर सभी को आश्चर्य हुआ क्योंकि उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच किसी भी मतभेद की खबर उजागर नहीं हुई थी। लेकिन अब जो बातें सुनने में आईं उनसे  स्पष्ट है कि विवाद की शुरुआत काफी पहले हो चुकी थी।  दरअसल जब शराब घोटाले में श्री केजरीवाल और मनीष सिसौदिया की गिरफ्तारी के विरुद्ध पार्टी आंदोलन कर रही थी तब न श्री चड्ढा  नजर आए और न ही कोई बयान आया। बाद में पता लगा कि वे आँखों का इलाज करवाने के लंदन गए हुए थे।  लंबे समय तक वहां रुके रहने पर भी उंगलियां उठीं। लौटने के बाद भी उनकी  सक्रियता राज्यसभा की बैठकों में दिए भाषणों तक सीमित रह गई। गत वर्ष दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी वे अग्रिम मोर्चे पर नहीं दिखे। ज़ाहिर है उनके और  पार्टी के बीच  खाई चौड़ी होती गई । राज्यसभा में उपनेता पद से हटाने के बाद भी हालांकि पार्टी की तरफ़ से इस बारे में  अधिकृत बयान नहीं आया किंतु  सोशल मीडिया पर राघव की प्रतिक्रिया से लगता है कि वे भी शांति भूषण, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और कुमार विश्वास की तरह श्री केजरीवाल के लिए असहनीय हो चले हैं। इसका कारण  पार्टी लाइन के समानान्तर ऐसे मुद्दे उठाना बताया जा रहा है जिनसे उनकी व्यक्तिगत छवि तो चमक रही थी लेकिन पार्टी को कोई लाभ नहीं मिल रहा।  एक वजह ये भी है कि सदन में उनके द्वारा सरकार का विरोध सौम्य शैली में किया जाता रहा वहीं पार्टी के नेता संजय सिंह की शैली बेहद आक्रामक है। आम चर्चा ये है कि राघव धीरे - धीरे भाजपा के करीब जा रहे थे। सदन में बजट के कुछ प्रावधानों की प्रशंसा और सुझाव वाला उनका भाषण पार्टी को नागवार गुजरा। लेकिन अब तक  बाहर नहीं किए जाने से वे पार्टी के व्हिप से बंधे हुए हैं। कार्यकाल के दो वर्ष शेष रहने से राघव इस्तीफा देने की गलती भी शायद ही करें। लेकिन इस घटनाक्रम से ये स्पष्ट हो गया कि आम आदमी पार्टी में बिखराव की प्रक्रिया थमने का नाम नहीं ले रही। श्री केजरीवाल और श्री सिसौदिया को छोड़कर तकरीबन सभी संस्थापक सदस्य या तो खुद छोड़ गए या अपमानित कर बाहर कर दिए गए। राज्यसभा में संजय सिंह और राघव को छोड़कर बाकी जितने भी लोगों को भेजा गया वे पार्टी की छवि और सिद्धांतों के सर्वथा विपरीत है। दिल्ली का  किला ढह जाने के बाद पार्टी की चमक और धमक दोनों में कमी आ चुकी है। श्री केजरीवाल और श्री सिसौदिया भले ही अदालत में निर्दोष हो गए किंतु पुराना दबदबा लौटना संभव नहीं दिखता। ऐसे में राघव जैसे साफ - सुथरे और सुयोग्य नेता को किनारे करना पार्टी के लिए नुकसानदेह हो सकता है। भले ही वे जननेता न हों लेकिन पंजाब चुनाव की रणनीति बनाने में उनका अभाव खलेगा। और यदि वे भाजपा के साथ जुड़ गए तब ज्यादा नुकसान पहुंचा सकते हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 3 April 2026

मुस्लिमों के नाम कटने से ममता का आत्मविश्वास डगमगाया


प. बंगाल के बारे में चुनाव आयोग ने ऐसी टिप्पणी की होती तब ममता बैनर्जी उस पर चढ़ बैठतीं। लेकिन गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण  में लगे न्यायिक अधिकारियों को धमकाए जाने पर  ममता सरकार को कड़ी फटकार लगाई। शीर्ष अदालत के गुस्से का कारण दरअसल मालदा जिले की घटना है जिसमें मतदाता सूची से नाम कटने का विरोध कर रहे लोगों ने तीन महिला न्यायाधीशों सहित सात न्यायिक अधिकारियों को  घंटों बंधक बनाकर रखा। इस मामले पर स्वतः आपातकालीन सुनवाई के दौरान  मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपिन पंचोली की पीठ ने न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा में राज्य प्रशासन की विफलता पर गुस्सा जताते हुए घटना की जांच सीबीआई या एनआईए को सौंपने का निर्देश दिया। प्राप्त जानकारी के अनुसार जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक सहित वरिष्ठ राज्य अधिकारी  घटनास्थल पर अनुपस्थित थे जिसके कारण आधी रात के बाद अधिकारियों की रिहाई सुनिश्चित करने के लिए उच्च स्तर पर हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ी। पीठ ने न्यायिक अधिकारियों पर  पथराव सहित हिंसा के आरोप भी दर्ज किए । साथ ही चुनाव आयोग को उनकी सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों की तैनाती और उनके परिवारों को सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया। ये पहला अवसर नहीं है जब ममता राज में इस तरह की प्रायोजित अराजकता देखने मिली हो। सीबीआई और ईडी के बाद चुनाव आयोग को लेकर उनका रवैया ऐसा रहा मानो वे किसी शत्रु देश से आए हों। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण के काम में सहयोग करना तो दूर रहा उल्टे हरसंभव व्यवधान उत्पन्न करने का प्रयास मुख्यमंत्री के इशारे पर हुआ ये बात किसी से छिपी नहीं है। प. बंगाल के अलावा जिन चार राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं वहां भी मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की प्रक्रिया संचालित हुई । ऐसा नहीं है कि वहां उ विरोध न हुआ हो किंतु प. बंगाल में जिस तरह से उत्पात हुआ उससे लगता है ममता का आत्मविश्वास डगमगा रहा है। उनकी सरकार ने इसके विरोध में सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा तक खटखटाया। यहां तक कि खुद ही पैरवी करने खड़ी हो गईं परन्तु  दाल नहीं गली। सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाता सूचियों पर आपत्तियों का निराकरण न्यायिक अधिकारियों के निरीक्षण में करवाने का निर्णय सुनाकर ये संकेत दे दिया कि उसे राज्य सरकार पर भरोसा नहीं है। मालदा जिले में हुई उक्त घटना से साबित हो गया कि तृणमूल पार्टी मतदाता सूचियों के  पुनरीक्षण से कितनी घबराई हुई है।  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केंद्रीय एजेंसियों की तैनाती का निर्देश दिए जाने से इस  आशंका की पुष्टि हो गई कि राज्य सरकार स्थानीय पुलिस के जरिए चुनाव अपने पक्ष में करने में लगी हुई थी। हालांकि प्रत्येक प्रदेश में सत्तारूढ़ दल ऐसा करने में संकोच नहीं करता किंतु सुश्री बैनर्जी का अंदाज ऐसा है मानो प. बंगाल कोई अलग देश हो। संघीय ढांचे के अंतर्गत उनके राज्य को  भी संविधान प्रदत्त व्यवस्थाओं के अंतर्गत केंद्र सरकार के साथ तालमेल बनाकर चलना होता है। कुछ मामलों में राज्यों को स्वायत्तता है किंतु वे केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र को चुनौती नहीं दे सकते। ममता का राजनीतिक उदय वामपंथी सरकार के राज में व्याप्त अराजकता के विकल्प के रूप में हुआ था किंतु सत्ता संभालते ही तृणमूल कांग्रेस में भी वही असामाजिक तत्व घुस आए जो कभी सीपीएम में रहकर पूरे समाज को आतंकित किया करते थे। बीते 15 सालों में प. बंगाल में जिस तरह की अराजकता देखने मिली उसने वामपंथी राज को भी पीछे छोड़ दिया। मुसलमानों के तुष्टीकरण में भी ममता ने नए कीर्तिमान स्थापित करते हुए बांग्लादेशी घुसपैठियों को स्थायी रूप से बसने में मदद की । ये चुनाव उनके लिए जीवन - मरण का सवाल है क्योंकि सत्ता हाथ से निकलते ही तृणमूल कांग्रेस तिनके की तरह बिखर जाएगी। पार्टी का कोई वैचारिक आधार नहीं है। वे सत्ता से बाहर हो ही जाएंगी ये कहना जल्दबाजी होगी किंतु बात - बात पर आग बबूला हो जाने से उनकी हताशा परिलक्षित हो रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस जिस प्रकार प. बंगाल की अराजक स्थिति का संज्ञान लिया उसके कारण ममता की मुसीबतें और बढ़ गई हैं। दरअसल उनकी झल्लाहट का असली कारण मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं का नाम कट जाना है। चुनाव आयोग के विरुद्ध तो वे सड़कों पर मोर्चा खोलकर बैठ गईं थीं किंतु सवाल ये  है कि सर्वोच्च न्यायालय का विरोध वे किस मुंह से करेंगी?

- रवीन्द्र वाजपेयी



Thursday, 2 April 2026

नेताओं और नौकरशाहों के बच्चे भी सरकारी शालाओं में पढ़ें


म.प्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का ये दावा सुनकर सुखद एहसास हुआ कि प्रदेश में सरकारी शालाओं के प्रति आकर्षण बढ़ रहा हैं। उन्होंने गत दिवस नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत पर कहा कि निजी विद्यालयों की चकाचौंध को छोड़कर अभिभावक अपने नौनिहालों को सरकारी विद्यालय में दाखिला दिलवाने में रुचि ले रहे हैं जहां बेहतर परीक्षा परिणाम आने लगे। मुख्यमंत्री ने इस बात पर भी संतोष जताया कि पढ़ाई बीच में छोड़कर जाने (ड्रॉप आउट) विद्यार्थियों की संख्या में भी उल्लेखनीय कमी आई है। मुख्यमंत्री स्वयं सुशिक्षित हैं एवं पूर्ववर्ती शिवराज सिंह चौहान सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री रह चुके हैं। उनकी गिनती जमीन से जुड़े नेता के तौर पर होने से ये माना जा सकता है कि उन्हें जनसाधारण से जुड़ी बातों के बारे में समुचित जानकारी होगी। उन्होंने सरकारी शालाओं की छवि और स्तर में सुधार की बात छेड़कर उम्मीद की किरण जगा दी है। आज से चार - पांच दशक पहले के परिदृश्य की कल्पना करें तो समाज का बड़ा वर्ग अपने बच्चों को सरकारी शालाओं में पढ़ाता था। उन्हीं विद्यालयों से पढ़कर निकले छात्रों में से न जाने कितने आज देश - विदेश में अपनी प्रतिभा के बल पर महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान हैं। नेताओं की  जमात में भी सरकारी शालाओं में शिक्षित तमाम लोग हैं। लेकिन धीरे - धीरे हालात बदलते गए और जिस प्रकार से चिकित्सा के क्षेत्र में निजी अस्पतालों का दबदबा बढ़ा वैसा ही शिक्षा जगत में भी दिखने लगा। जहां तक बात उच्च शिक्षा की है  तो एक बार निजी संस्थानों की उपयोगिता समझ में भी आती है किंतु निजी क्षेत्र ने विद्यालय स्तर पर जिस प्रकार अपना फैलाव किया उससे सरकारी शालाओं की दशा  दयनीय होने लगी। ये स्थिति क्यों पैदा हुई इस पर लंबी बहस हो सकती है। वैसे  भी शिक्षा के क्षेत्र में सरकारों ने जितने प्रयोग आजादी के बाद किए वे किसी कीर्तिमान से कम नहीं हैं। शिक्षा नीति में भी समय - समय पर बदलाव किए जाते रहे किंतु कुछ अपवाद छोड़कर ज्यादातर सरकारी शालाएं दुर्दशा का शिकार होती चली गईं।  इसीलिए डॉ. यादव ने सरकारी विद्यालयों की तारीफ करते हुए जो चित्र प्रस्तुत किया यदि वह सही है तो ये बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इतने मात्र से संतुष्ट हो जाना ठीक नहीं होगा। मुख्यमंत्री यदि चाहते हैं कि शासकीय शालाओं की दशा सुधरे ताकि ज्यादा से ज्यादा अभिभावक निजी शालाओं के मोहजाल से मुक्त होकर अपने बच्चों को उनमें दाखिल करवाएं तब उनको अपने विधायकों , मंत्रियों और पार्टी के नेताओं के अलावा शासकीय अधिकारियों से ये अनुरोध करना चाहिए कि वे भी अपने बच्चों को निजी विद्यालयों के बजाय शासकीय शालाओं में पढ़ाएं। यदि उनमें से आधे भी इसके लिए राजी हो जाएं तब सरकारी विद्यालयों की  प्रतिष्ठा अपने आप बढ़ जाएगी। कुछ वर्ष पूर्व अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस आशय का आदेश भी पारित किया था कि सरकारी अधिकारियों की संतानें सरकारी शालाओं में पढ़ें। देश में अनेक प्रशासनिक अधिकारियों ने स्वेच्छा से ऐसा किया भी किंतु उनकी संख्या ऊँट के मुंह में जीरे समान ही है। ये देखते हुए यदि डॉ. यादव  नौकरशाहों , जनप्रतिनिधियों और पार्टी नेताओं को  इस बात के लिए प्रेरित करें कि वे शासकीय शाला में ही बच्चों को शिक्षा दिलवाएं तो इसका जबरदस्त असर पड़ेगा और  सरकारी शालाओं की तस्वीर और तकदीर दोनों में अकल्पनीय सुधार हो सकेगा। जाहिर है जिस संस्थान में विधायक, मंत्री और कलेक्टर - एस. पी के बच्चे पढ़ेंगे वहां की व्यवस्था और स्तर का अंदाज सहज रूप से लगाया जा सकता है। मुद्दे की बात ये है कि जब तक नेताओं और नौकरशाहों के बच्चे  सरकारी शालाओं में नहीं पढ़ेंगे तब तक वे निजी क्षेत्र की शिक्षा संस्थानों की तुलना में पिछड़े रहेंगे। सही  बात है कि जब शासन और प्रशासन में उच्च पदों पर बैठे महानुभावों को ही सरकारी शालाओं और  अस्पतालों पर भरोसा नहीं है तब जनता से अपेक्षा किस मुंह से की जाती है। बेहतर होगा जिस तरह मंत्री और अधिकारी अपनी संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करते हैं उसी तरह ये जानकारी भी सामने आनी  चाहिए कि उनके बच्चे किस संस्थान में पढ़ रहे हैं?


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 1 April 2026

कठिन चुनौतियों के बीच शुरू हो रहा वित्तीय वर्ष


आज से भारत में नया वित्तीय वर्ष प्रारंभ हो रहा है। बीते साल की तीन तिमाही में अच्छे प्रदर्शन से वार्षिक विकास दर 7 प्रतिशत रहने की उम्मीद व्यक्त  की गई थी। वहीं अगले वर्ष में उसके और उछलने का अनुमान था। हालांकि  डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा थोपे गए टैरिफ के कारण निर्यात पर बुरा असर पड़ा किंतु सरकार  वैकल्पिक बाजारों की तलाश कर उस दबाव को कम करने में कामयाब रही। इसीलिए जहां अनेक देशों के कदम लड़खड़ाने लगे वहीं भारत ने  मजबूती से  खड़े रहकर ब्रिटेन , यूरोपीय यूनियन , न्यूजीलैंड आदि से मुक्त व्यापार संधि कर अपने निर्यात को बहुमुखी बना दिया। सबसे बड़ी चतुराई ये रही कि ट्रम्प की बेसिरपैर की बातों में उलझने से बचते हुए उसकी काट निकालकर देशहित को सुरक्षित रखा गया। हालांकि  अनुमानित विकास दर का आंकड़ा थोड़ा नीचे आया किंतु  वैश्विक परिस्थितियों में उसे काफी अच्छा माना गया। लेकिन बीती 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल ने संयुक्त रूप से ईरान पर हमला बोल दिया। अमेरिका मान रहा था कि ईरान जल्द ही घुटने टेक देगा। पहले ही हमले में उसके सर्वोच्च शासक खामेनेई के अलावा कुछ दिग्गज सैन्य अधिकारियों के मारे जाने से ये लगा कि वहां सत्ता परिवर्तन करवाने की  उसकी योजना सफल हो जाएगी । लेकिन  पांसे उल्टे पड़ गए। ईरान ने आक्रमण ही सर्वोत्तम सुरक्षा है के सिद्धांत पर चलते हुए इजराइल पर तो मिसाइलें बरसाई हीं  उन तमाम पड़ोसी देशों पर भी हमले किए जहां अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं। यही नहीं अमेरिका के बेहद अत्यधिक शक्तिशाली कहे जाने वाले युद्धपोतों को निशाना बनाने से भी बाज नहीं आया। इसकी वजह से तेल उत्पादक देशों में उत्पादन थम गया।  उससे भी बड़ी समस्या तब उठ खड़ी हुई जब ईरान ने अपने कब्जे वाले होर्मुज़  नामक समुद्री रास्ते से आवाजाही रोक दी। जिससे सऊदी अरब , कतर , बहरीन , ओमान आदि से आने वाले  तेल और गैस के टैंकर फंस गए। नतीजा पूरी दुनिया में इन चीजों के संकट के रूप में सामने आया। इसका विपरीत प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा और बीते कारोबारी साल का उत्साहजनक वातावरण साल खत्म होते तक चिंताओं में बदल गया। पेट्रोल , डीजल और गैस के संकट ने न सिर्फ आम नागरिक के जनजीवन को झकझोर दिया बल्कि उद्योग  - व्यवसाय के सामने मुसीबतों के पहाड़ खड़े कर दिए।  हजारों कारखाने बंद हो गए। गैस की किल्लत से बड़े होटल, रेस्टोरेंट , ढाबे ही नहीं ठेले और खोमचे पर चाय सहित अन्य खाद्य सामग्री बेचने वालों तक का कारोबार ठप पड़ गया। शहरों से श्रमिकों के पलायन की खबरें आने लगीं। विदेशी पूंजी बड़ी मात्रा में वापस जाने से विदेशी मुद्रा  भंडार घटने लगा। ईरान  युद्ध के थमने की फिलहाल कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कल कह दिया कि ईरान की परमाणु क्षमता को नष्ट करने के साथ ही उसके तेल और गैस उत्पादन इकाइयों को नुकसान पहुंचाकर उसने तो अपना मकसद पूरा कर लिया। अब जिसे होर्मुज का उपयोग करना हो वह अपने स्तर पर प्रयास करे। दरअसल ट्रम्प इस बात पर उखड़ गए कि नाटो से जुड़े ज्यादातर यूरोपीय देशों ने अमेरिकी युद्धक विमानों को अपने आकाश से उड़ने की अनुमति नहीं दी। आज यू.ए.ई ने जरूर होर्मुज़ खुलवाने के लिए लड़ाई में शामिल होने की इच्छा जताई। सऊदी अरब भी अमेरिका से अनुरोध कर चुका है कि वह ईरान को घायल करके न छोड़े। इसके जवाब में ट्रम्प ने युद्ध का खर्च खाड़ी देशों से वसूलने का ऐलान कर दिया। कुल मिलाकर जंग अभी कुछ हफ्ते और जारी रहने की उम्मीद है। जिसके परिणाम लंबे समय तक दुनिया को भुगतने होंगे। भारत भी इससे अछूता नहीं रह सकता। विश्व व्यापार में उसकी जो मजबूत स्थिति बनती जा रही थी उस पर बुरा असर पड़ने से इंकार नहीं किया जा सकता। हालांकि युद्ध जल्दी रुक जाता है तब भारत को मध्यपूर्व में निर्माण गतिविधियों के जरिए अच्छा व्यवसाय मिलने की उम्मीद बढ़ जाएगी जैसा अफगानिस्तान में देखने मिला किंतु ईरान अपने यदि होर्मुज़  को लेकर अड़ियलपन दिखाता रहा तब तेल और गैस की कीमतों में उछाल को रोकना मुश्किल हो जाएगा जिसका असर  अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है। ये देखते हुए केंद्र सरकार को चाहिए वह अभी से संभावित संकट का सामना करने की रणनीति बनाकर ऐसे उपाय करे जिससे उद्योग - व्यापार में रुकावट न आए। साथ ही आम जनता को भी तकलीफ न हो। विश्वव्यापी संकट से भारत का बचे रहना तो नामुमकिन है किंतु समय रहते तैयारी कर ली जाए तो नुकसान को कम तो किया ही जा सकता है। नेतृत्व की परीक्षा भी ऐसे ही समय होती है। मोदी सरकार ने कोरोना संकट के समय जो कार्यकुशलता दिखाई वैसा ही कुछ करते हुए इस आपदा में भी अवसर तलाशने का कारनामा दिखाना चाहिए।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 31 March 2026

शहरी नक्सलियों की कमर तोड़ना भी जरूरी


गृहमंत्री अमित शाह तय समय सीमा में नक्सलियों के आतंक की समाप्ति के लिए प्रशंसा के हकदार हैं। गत दिवस संसद में नक्सलवाद को लेकर दिया उनका भाषण निःसंदेह सराहनीय था। ये कारनामा बिना दृढ़ इच्छा शक्ति के संभव नहीं था। पिछली सरकारें इस मामले में पूरी तरह विफल रहीं। इसका कारण एक तो उनके मन में समाया डर था दूसरा उस दौर के शासन - प्रशासन में घुसे वामपंथी विचाराधारा के पोषक तत्व थे। दरअसल  नक्सलियों का उद्देश्य आर्थिक विषमता, शोषण और पिछड़ापन मिटाना नहीं अपितु भारत में खूनी क्रांति के जरिए चीन की पिट्ठू माओवादी सरकार बनवाना था। प्रारंभ में तो उनकी छवि क्रांतिकारियों जैसी बनी लेकिन धीरे - धीरे  स्पष्ट हो गया कि वे चीन द्वारा प्रशिक्षित और पालित गिरोह हैं जिन्हें भारत में खूनी क्रांति  का जिम्मा सौंपा गया है। शुरुआत में लगा  कि नक्सली , वामपंथी विचारधारा का उग्रपंथी स्वरूप है लेकिन जल्द ही स्पष्ट  हो गया कि सारे साम्यवादी एक हैं। नक्सली जहां जंगली इलाकों में बंदूक के बल पर माओवाद फैलाते थे वहीं शहरी इलाकों में बैठे साम्यवादी कला , साहित्य, शिक्षा, पत्रकारिता , प्रशासन और राजनीति जैसे क्षेत्रों में सक्रिय रहकर नक्सली हिंसा के औचित्य को साबित करने में जुटे रहते। इन शहरी नक्सलियों ने शासन और प्रशासन में जड़ें जमाते हुए नीति - निर्धारण की प्रक्रिया में घुसपैठ कर ली। भोले  - भाले आदिवासियों को  भड़काकर हिंसा के रास्ते पर धकेलने का काम जहां हथियारबंद नक्सली करते रहे वहीं साहित्य , मनोरंजन , शिक्षा जैसे क्षेत्रों में घुसे शहरी नक्सली वामपंथ के पक्ष में वातावरण बनाने में लगे रहे। इस कार्य में उन्हें कांग्रेस सहित अन्य गैर भाजपा सरकारों का प्रत्यक्ष और परोक्ष समर्थन मिलता रहा। देश में ऐसे अनेक  संगठन हैं जो सरकारी अनुदान के बल पर वामपंथ का प्रचार करते रहे। अनेक सरकारी संस्थाओं में शहरी नक्सलियों की नियुक्ति की जाती रही। इनमें से जब भी किसी को पकड़ा जाता तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकशाही के लिए खतरे का ढोल बजने लगता। जेएनयू,जादवपुर ,जामिया मीलिया ,उस्मानिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालयों में वामपंथी छात्र एवं शिक्षक मोमबत्ती लेकर निकल पड़ते। हाल ही में जब हिडमा नामक नक्सली सरगना  मारा गया तब जे.एन.यू में बैठे नक्सल समर्थक छात्रों ने दिल्ली के इंडिया गेट पर  प्रदर्शन करते हुए नारे लगाए थे कि कितने हिडमा मारोगे , हर घर से हिडमा निकलेगा।  ऐसी ही नारेबाजी अफज़ल गुरु की फांसी के बाद जेएनयू में की गई थी। नक्सलियों द्वारा निर्दोषों की नृशंस हत्याओं पर ये शहरी नक्सली मुंह में दही जमाकर बैठे रहते थे। 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार आने  और विशेष रूप से श्री शाह के गृह मंत्री बनने के बाद  किए गए युद्धस्तरीय प्रयासों का ही सुफल है कि पशुपति से तिरुपति तक रेड कार्पेट बिछाने का चीन प्रवर्तित वामपंथी षडयंत्र मिट्टी में मिल गया। त्रिपुरा में जहां वामपंथी सत्ता का अंत हुआ वहीं प. बंगाल में भी वामपंथी प्रभुत्व लुप्त होता जा रहा है। केरल का एकमात्र साम्यवादी किला भी धराशायी होने के कगार पर है। ऐसे में  नक्सलवाद के नाम पर होने वाली हिंसा की जड़ें खोद देना बड़ी उपलब्धि है। श्री शाह ने गत दिवस संसद में सही कहा कि नक्सलवाद  विचारधारा आधारित अपराध है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि जो इक्का - दुक्का नक्सली बचे हैं वे भी मुख्यधारा में लौटें वरना  मारे जाएंगे। सबसे बड़ी सफलता ये है कि  नक्सलियों को हथियार रखकर शांति के रास्ते पर लौटने का पूरा अवसर दिया गया। लेकिन जिन्होंने सुरक्षा बलों पर हमले करने का दुस्साहस किया उन्हें मौत के घाट उतारा गया। हिंसा के जरिए देश को भीतर से कमजोर करने वालों के सफाए के बाद जरूरत है , समाज में बैठे उन शहरी नक्सलियों का पर्दाफाश किए जाने की जो देश में अराजकता की स्थिति उत्पन्न करना चाह रहे हैं। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में युवा आंदोलन के जरिए सत्ता परिवर्तन के बाद भारत में भी वैसा ही करने की कोशिश भी की गई। लेकिन राष्ट्रवादी विचारधारा के बढ़ते पर प्रभाव के चलते देश को अस्थिर करने वाली शक्तियां कामयाब नहीं हो सकीं। बावजूद  इसके सरकार को सजग रहना होगा क्योंकि भले ही हथियारबंद नक्सलियों का सफाया हो गया हो परन्तु शहरी नक्सली और  उनकी पीठ पर हाथ रखने वाली विदेशी शक्तियां नए रूप में सक्रिय हुए बिना नहीं रहेंगी। ऐसे में नक्सलवाद को प्रश्रय देने वाली सोच को ही खत्म करना होगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी