Tuesday, 7 July 2026

बर्फ़ानी बाबा के लिए खतरा बना आस्था का अतिरेक


जम्मू कश्मीर स्थित अमरनाथ की पवित्र गुफा में स्वनिर्मित बर्फ के शिवलिंग का दर्शन करने लाखों श्रृद्धालु प्रतिवर्ष आते हैं। दुर्गम रास्तों से होते हुए वहाँ पहुँचने का सफर मुश्किल  होने के बाद भी आस्था के वशीभूत देश - विदेश से सनातनी परंपरा के अनुगामी शिव भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है। पहले पहलगाम से चंदनबाड़ी होते हुए अमरनाथ पहुंचा जाता था, जिसमें तीन दिन लगते थे। लेकिन अब बालटाल से  दूसरा मार्ग  खुल जाने से यात्रा की अवधि कम हो गई है। यात्रियों के लिए पूरे रास्ते में निःशुल्क भोजन का प्रबंध भंडारों के रूप में होता है। यह यात्रा कश्मीर घाटी के मुस्लिम वॅाशिंदों के लिए आय का बड़ा साधन है क्योंकि अमरनाथ आने वाले यात्रियों का बड़ा वर्ग कश्मीर में अन्य स्थानों का भ्रमण भी करता है जिसके कारण वहाँ पर्यटन उद्योग भी फलता - फूलता है। यद्यपि आतंकवाद के दौर  में घाटी का पर्यटन बहुत कम हो गया था किंतु अमरनाथ यात्रा का उत्साह लगातार बढ़ता रहा जो आतंकवाद की प्रतिक्रिया थी। धारा 370 हटने के बाद घाटी के हालात सुधरे तब इस यात्रा का आकर्षण और बढ़ा। पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद श्रृद्धालुओं में नये सिरे से जोश दिखाई देने लगा। इस साल गर्मियों में जम्मू कश्मीर में पर्यटकों की संख्या ने भी पुराने कीर्तिमान तोड़ दिये। इसीलिए उम्मीद की जा रही है कि इस वर्ष अमरनाथ यात्रा में श्रृद्धालुओं की बाढ़ आ जायेगी। यद्यपि कश्मीर घाटी से आतंकवाद की विदाई हो चुकी है किंतु उसके कुछ बीज अभी भी अंकुरित हो जाते हैं। यही कारण है कि यात्रा मार्ग पर सुरक्षा व्यवस्था का दायित्व  सेना को सौंपा जाता है। लेकिन इस सबसे अलग हटकर जिस पहलू पर लोगों का ध्यान नहीं जाता वह है इस यात्रा से अमरनाथ के पर्यणवरण पर पड़ने वाला प्रभाव। 3 जुलाई से  अमरनाथ यात्रा शुरू होते ही मात्र चार दिनों में लगभग 60 हजार यात्री अमरनाथ की यात्रा कर चुके हैं। 57 दिनों तक चलने वाली इस यात्रा हेतु 4 लाख लोगों का पंजीयन हो चुका है। लेकिन श्रृद्धालुओं को निराश करने वाली खबर ये है कि पवित्र गुफा में बनने वाला पवित्र हिम शिवलिंग तेजी से पिघलकर  करीब एक फीट का रह गया है । जबकि मई माह में इसकी ऊंचाई लगभग 7 फीट और  पहली पूजा के समय  5 फीट से अधिक थी। यदि यही स्थिति रही और पर्यटकों की भीड़ निरंतर बढ़ती गई तब आने वाले दिनों में गुफा के भीतर शिवलिंग आकार ही नहीं लेगा। उल्लेखनीय है अमरनाथ में बढ़ती भीड़ के कारण प्राकृतिक विपदाएं भी आने लगी हैं। इस साल वहाँ हेलीकाप्टर सेवा रोकने का कारण भी पर्यावरण को होने वाले नुकसान को रोकना ही है। सोचने वाली बात ये है कि श्रृद्धालु जिस प्रकृति निर्मित पवित्र शिवलिंग के दर्शन हेतु तरह - तरह के कष्ट सहने के साथ ही समय और पैसा खर्च करते हुए आता है, वही उसे न दिखे तो निराशा और दुःख होना स्वाभाविक है। हालांकि अमरनाथ के इस अद्भुत शिवलिंग का पिघलना नई बात नहीं है। प्रतिवर्ष यात्रा शुरू होने के बाद से ऐसा होता है। इसका सीधा कारण इस निर्जन स्थान पर अचानक भीड़ की मौजूदगी है जो दो महीनों तक बनी रहती है। जैसे - जैसे सनातन के प्रति श्रृद्धा और प्रतिबद्धता में वृद्धि हो रही है वैसे - वैसे धर्मस्थलों में जन सैलाब उमड़ने लगा है। लेकिन जो धर्मस्थल पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित हैं उनमें अपेक्षा से अधिक मानवीय उपस्थिति उनके नैसर्गिक स्वरूप के लिए हानिकारक बनती है । भूस्खलन की बढ़ती घटनाएं इसका प्रमाण हैं। कुछ साल पहले अमरनाथ में  गुफा के पीछे से अचानक आया जनसैलाब प्रलय का एहसास करवा गया था। केदारनाथ त्रासदी की स्मृति भी रोंगटे खड़े कर देती है। ये कहना गलत नहीं है कि  अमरनाथ में शिवलिंग के पिघलने  का सबसे बड़ा कारण वहाँ श्रृद्धालुओं की बढ़ती भीड़ ही है। हमारा आशय किसी की आस्था को ठेस पहुँचाना कदापि नहीं है किंतु तीर्थ यात्रा और पर्यटन में जो भावनात्मक अंतर है उसका निहितार्थ समझने की जरूरत है। और जिस बर्फ़ानी बाबा को देखने जाएं , वही लुप्त रहें तो यात्रा का स्वाभाविक आनंद और उससे जुड़ी आत्मिक शांति प्राप्त नहीं होती। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 6 July 2026

मुंबई की बदहाली शर्मनाक



इस साल मानसून देर से आया। उसके कारण देश के बड़े भूभाग में जल संकट के साथ ही खरीफ फसल के लिए धान के रोपे लगाने में विलंब होने से किसान परेशान है। नदियों, तालाबों और कुओं आदि का जल स्तर खतरे के निशान से भी नीचे चला गया। भूजल स्तर गिरने से जलापूर्ति पर भी बुरा असर पड़ा है। हालांकि अब मानसून सक्रिय होकर आगे बढ़ रहा है। लेकिन जिस तरह उसके विलंबित होने से स्थिति चिंताजनक हो उठी वही दशा उसके आने के बाद देखने मिल रही है। जिसकी बानगी देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई है। बीते दो - तीन दिनों से वहाँ भारी बारिश होने से जनजीवन अस्त - व्यस्त हो गया है। मुंबई - पुणे के रास्ते में अनेक स्थानों पर भूस्खलन के कारण यातायात अवरुद्ध  है। मुंबई महानगर और उसके उपनगरीय क्षेत्रों में भी अति वृष्टि से सभी व्यवस्थाएं चरमरा गई हैं। निचले इलाकों में जल भराव की समस्या तो सभी शहरों में कमोबेश एक जैसी है। लेकिन मुंबई कोई साधारण शहर न होकर वैश्विक पहचान रखता है। इसीलिए यहाँ होने वाली किसी भी छोटी - बड़ी घटना की चर्चा दूर - दूर तक होती है। आज मिल रही खबरों के  मुताबिक मुंबई से जाने और आने वाली उड़ानें बड़ी संख्या में रद्द की जा चुकी हैं या विलम्बित हैं। इस महानगर की जीवन रेखा कही जाने लोकल ट्रेन सेवा पर भी बुरा असर पड़ा है। दर्जनों गाड़ियां रद्द करने से सप्ताह के पहले दिन ही लाखों लोग अपने गन्तव्य तक नहीं जा सके। कुल मिलाकर हालात चिंताजनक होने के साथ ही शर्मनाक भी हैं। हालांकि अप्रत्याशित रूप से होने वाली भारी बरसात के कारण किसी भी शहर में व्यवस्थाएं   गड़बड़ा जाना स्वाभाविक  हैं किंतु मुंबई में ऐसा होना इसलिए शर्मिंदा करता है क्योंकि यह एक अंतर्राष्ट्रीय महानगर होने से देश की छवि को पूरी दुनिया के समक्ष प्रस्तुत करता है।  देश का मुख्य व्यवसायिक केंद्र होने से यहाँ गतिविधियां ठप होने से प्रतिदिन करोड़ों - अरबों का नुकसान होता है। एक ही दिन में जरूरत से ज्यादा बरसात होने पर स्थितियाँ खराब होना स्वाभाविक है लेकिन मुंबई में चूंकि प्रति वर्ष ऐसा होता है इसलिए ये विचारणीय प्रश्न है कि महाराष्ट्र सरकार और मुंबई महानगर पालिका हर साल पैदा होने वाले इस संकट से लोगों को बचाने के लिए क्या करते हैं ? हालांकि देश के सभी महानगरों के अलावा अन्य प्रमुख शहरों की स्थिति भी भारी बरसात होने पर चिंताजनक हो जाती है जिससे ये साबित होता है कि हमारे देश में शहरों की बसाहट और उनका नियोजन दोषपूर्ण है।  अनियोजित विस्तार  और आबादी के बढ़ते बोझ के कारण शहरों की कमर टूटती जा रही है। यद्यपि चर्चा बड़े शहरों की ज्यादा होती है लेकिन बढ़ते शहरीकरण का दुष्प्रभाव अब पूरे देश में अनुभव किया जा सकता है। मुंबई में आई मौजूदा आपदा के परिप्रेक्ष्य में इस दिशा में राष्ट्रीय स्तर पर कदम उठाये जाने चाहिए। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी की स्मार्ट सिटी योजना के तहत अरबों रुपये खर्च करने के बाद जिन शहरों की सूरत सुधारने का दावा सरकारी दस्तावेजों में दर्ज है उनमें भी बरसात बुरे हाल कर देती है। इन सबसे साबित होता है कि  सिर्फ महानगर ही नहीं अपितु छोटे और मध्यम आकार के शहरों में आपदा प्रबन्धन की स्थिति चिंताजनक है। हर साल इससे होने वाले नुकसान को रोकने की व्यवस्था हो सके तो देश की अर्थव्यवस्था को बड़े नुकसान से बचाने के अलावा जनता को होने वाली तकलीफों से निजात मिल सकती है।

- रवीन्द्र वाजपेयी





Saturday, 20 June 2026

राम मंदिर घोटाले से दुनिया भर के हिंदुओं के उत्साह को धक्का पहुंचा


अयोध्या का राम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं अपितु दुनिया भर में फैले करोड़ों सनातन धर्म के अनुयायियों की आस्था का सर्वोच्च केंद्र है। सैकड़ों वर्षों के संघर्ष एवं अनेकानेक बलिदानों के बाद इस मंदिर का निर्माण संभव हो सका। इसके लिए बड़े - बड़े धनकुबेरों से लेकर साधारण आर्थिक स्थिति वाले हिंदुओं ने भी यथाशक्ति सहयोग प्रदान किया। मंदिर निर्माण के साथ ही अयोध्या नगरी को उसकी प्राचीन भव्यता के अनुरूप विकसित कर वहाँ समस्त आधुनिक  सुविधाएं उपलब्ध करवाई गईं। इसके कारण श्रद्धालुओं का तांता लगने लगा। देखते ही देखते अयोध्या ने वेटिकन सिटी तक का रिकार्ड तोड़ दिया। हिंदुओं के मंदिरों में दान चढ़ावे की परंपरा का निर्वहन करते हुए श्रद्धालुओं ने न सिर्फ नगद राशि बल्कि सोना - चांदी जैसी बहुमूल्य धातुओं का भी दान किया। तिरुपति बालाजी की तरह ही अयोध्या का राम मंदिर भी दानदाताओं के सहयोग से काफी समृद्ध होने लगा। जो भी यहाँ के दर्शनों हेतु आया मंदिर में उपलब्ध सुविधाओं और व्यवस्थाओं  की प्रशंसा किये बिना नहीं रह सका। लेकिन हाल ही में मंदिर की व्यवस्था से जुड़े कुछ कर्मचारियों और पदाधिकारियों पर ये आरोप लगा कि उन्होंने चढ़ावे और दान की राशि में हेराफेरी की। जाँच और छापेमारी में कुछ लोगों के यहाँ से करोड़ों रुपये और सोना - चांदी वगै़रह मिले। जाँच हेतु गठित एस. आई. टी पूछताछ करने के उपरांत एक - दो दिन में अपनी रिपोर्ट उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंप देगी। उल्लेखनीय है गत दिवस अयोध्या पहुंचकर राम मंदिर के दर्शन करने के बाद योगी जी ने दूध का दूध, पानी का पानी करने के साथ ही दोषियों को कठोरतम दंड देने का आश्वासन दिया। लेकिन इस कांड में  दान और चढ़ावे के गबन के साथ जिन ट्रस्टियों का नाम जुड़ा हुआ है वे सब प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर रास्वसंघ और भाजपा से जुड़े हैं। नृपेन मिश्र जैसे पूर्व नौकरशाह भी केंद्र सरकार के विश्वासपात्र हैं जिन्हें मंदिर निर्माण समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। गत दिवस उनका एक साक्षात्कार टीवी पर प्रसारित हुआ जिसमें उन्होंने ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को निर्दोष बताने के साथ ही स्वीकार किया कि विश्वासपात्र लोगों को दायित्व देने के बाद निगरानी में कमी से ये घोटाला संभव हुआ। जिन लोगों पर संदेह है वे किसी न किसी ट्रस्टी से जुड़े होने से संदेह की सुई उन पर भी जाकर टिक रही है। दान में प्राप्त बहुत सी बहुमूल्य वस्तुओं का रिकार्ड न मिलना जाँच में सामने आया है। अनेक दान दाताओं ने इस आशय की शिकायत भी की है। बहरहाल जाँच पूरी हो जाने पर ही घोटाले का आकार और घोटालेबाजों के चेहरे सामने आएंगे। हो सकता है सीबीआई को भी जाँच की जिम्मेदारी दी जाए। लेकिन इस कांड से राम मंदिर के निर्माण से जुड़े तमाम लोगों की पुण्यायी मिट्टी में मिल गई फिर चाहे वे संघ, भाजपा या विहिप के हों या अन्य किसी क्षेत्र के ।  धार्मिक स्थलों की दान पेटियों में होने वाले घपले नई बात नहीं हैं। धार्मिक ट्रस्टों   की संपत्ति पर अवैध कब्जे भी  आम है। ये बुराई केवल हिंदुओं तक ही सीमित नहीं है। वक़्फ़ और ईसाई समुदाय की संपतियों पर भी उसी के प्रभावशाली लोगों ने कब्जे कर रखे हैं। लेकिन राम मंदिर को सामान्य धार्मिक स्थल नहीं माना जा सकता। भगवान राम के मंदिर तो पूरी दुनिया में है किंतु अयोध्या में बना ये मंदिर हर दृष्टि से विशेष है। इसके साथ आस्था भी जुड़ी है और राष्ट्रीयता की भावना भी। ये कहने में भी कोई गलती नहीं है कि इसके निर्माण से राष्ट्रीय स्वाभिमान और गौरव की वैसी ही पुनर्स्थापना हुई जैसी सोमनाथ के मंदिर के पुनरुद्धार से हुई थी। इसके निर्माण के बाद पूरी दुनिया में जो उत्साह उत्पन्न हुआ उसे इस घोटाले से धक्का पहुंचा है। मुख्यमंत्री योगी को चाहिए वे  अपने आश्वासन के अनुरूप दोषियों को इतना कठोर दंड दिलवाएं जिससे आइंदा किसी में ऐसा करने का दुस्साहस न हो। इसी के साथ संघ और विहिप को भी अपने लोगों की प्रमाणिकता के प्रति सतर्क रहना होगा क्योंकि   इन संगठनों के बारे में हिन्दू समाज के बड़े हिस्से में विश्वास का भाव है। 



- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 19 June 2026

ईरान के बंधन मुक्त हो जाने से प. एशिया के समीकरण बदले

 

अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते  की खबर से दुनिया ने राहत की सांस ली है। 19 जून को यह समझौता विधिवत लागू होगा। हालांकि  होर्मुज से तेल और गैस टैंकरों वाले जहाजों का निकलना शुरू हो जाने से लगभग चार माह से चले आ रहे तेल और गैस संकट में कुछ कमी आयेगी । लेकिन हालात पूरे तौर पर सामान्य होने में कई महीने लग सकते हैं क्योंकि ईरान ने इस समुद्री क्षेत्र में जो बारूदी सुरंगें बिछा रखी हैं उन्हें हटाने में समय लगेगा। दूसरा पेच ये भी है कि 6 माह बाद ईरान द्वारा ओमान के साथ मिलकर इस जल मार्ग का उपयोग करने वाले जहाजों से टोल वसूलने की तैयारी की जा रही है जो  विवाद का नया कारण बन सकती है।  इसी तरह ईरान को दी जाने वाली क्षति पूर्ति की राशि को लेकर अमेरिका द्वारा हाथ खींच लिए जाने के बाद सऊदी अरब, दुबई  , ओमान, कतर आदि परेशान हैं क्योंकि अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस इन देशों पर दबाव बना रहे है कि वे ईरान को हुए नुकसान की भरपाई करें जबकि ईरान की मिसाइलों ने इन तेल उत्पादक देशों की इकाइयों को जो नुकसान पहुंचाया उससे उबरने में उन्हें कम से कम एक साल लगेगा। इससे अलग हटकर देखें तो प. एशिया में स्थायी शांति तब तक नहीं आ सकती जब तक इजराइल के अस्तित्व को ईरान सहित अरब जगत के सभी मुस्लिम देश मान्य नहीं करते। यद्यपि जोर्डन, मिस्र, ओमान, सं. अरब अमीरात आदि इजराइल से रिश्ते कायम कर चुके हैं किंतु ईरान के अलावा , तुर्किये और पाकिस्तान जैसे कुछ मुस्लिम देश इजराइल के  अस्तित्व को मंजूर नहीं करते। और फिर जिस समझौते को लेकर पूरा विश्व प्रसन्न है उससे दूरी बनाकर  इजराइल ने लेबनान पर हमले जारी रखते हुए संकेत दे दिया कि वह अपने रास्ते खुद तय करेगा। यद्यपि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस ने इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू और समझौते का विरोध कर रहे उनके मंत्रियों को काफी भला - बुरा कहा किंतु इजराइल ने अपनी सैन्य कारवाई को रोकने से इंकार कर दिया जिसके कारण समझौते के पहले आज होने वाली बैठक रद्द हो गई। ईरान लगातार दोहरा रहा है कि लेबनान पर हमले नहीं रुके तब वह शांत नहीं बैठेगा। इस सबसे लगता है कि अमेरिका तो अपना पिंड छुड़ाकर निकला जा रहा है किंतु प. एशिया में अशांति के बीज अभी भी मिट्टी में दबे हैं जो जरा सी नमी मिलते ही पनप सकते हैं। एक बात और जो दुनिया भर की चिंता का कारण बन गई वह है ईरान का छुट्टा हो जाना। अमेरिका ने उसे तेल बेचने की छूट के अलावा उसकी जप्त दौलत मुक्त करने की अनुमति देकर प.एशिया में एक ताकतवर शक्ति केंद्र की जड़ें जमा दीं। ईरान ने इस यद्ध में अपनी मारक क्षमता से अमेरिका जैसी महाशक्ति तक का मुकाबला किया। इजराइल के अभेद्य समझे जाने वाले आयरन डोम भी उसकी मिसाइलों को न रोक सके। शुरुआत में  लड़ाई में एक पक्ष अमेरिका और इजराइल थे वहीं मुकाबले में था ईरान। अपने सर्वोच्च शासक खामेनेई की हत्या के बाद उसका हौसला थोड़ा तो हिला किंतु उसने चतुराई पूर्वक अन्य खाड़ी देशों को निशाना बनाकर युद्ध क्षेत्र का विस्तार कर दिया जिससे अमेरिका पर दबाव बढ़ने लगा। कुल मिलाकर डोनाल्ड ट्रंप की मूर्खता से प्रतिबंधों से जकड़े ईरान को नई आजादी मिल गई और वह भी ताकत के बल पर। इसीलिए जो लोग सोचते हैं कि इस समझौते से युद्ध बंद हो जाएगा और प. एशिया में सामान्य स्थितियां लौटेंगी वे ज्यादा दूर तक देखने में सक्षम नहीं हैं। सच्चाई ये है कि अमेरिका ने अपने आप को भले इस युद्ध से अलग कर लिया किंतु इजराइल, होर्मुज और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर प. एशिया में तलवारें म्यान से बाहर आती रहेंगी। अमेरिका की मजबूरी ये भी है कि इस क्षेत्र में उसके आर्थिक और सामरिक हित भी हैं। यदि उसने पूरी तरह दूरी बनाई तब चीन और रूस बिना देर गंवाये ईरान के जरिये अपना वर्चस्व इस तेल संपन्न इलाके में बढ़ाएंगे । भारत को इस घटनाक्रम पर पैनी नजर रखनी चाहिए क्योंकि चीन की उपस्थिति पाकिस्तान के लिए हितकारी होगी। ऐसे में हमें नये सिरे से कूटनीतिक बिसात बिछानी पड़ेगी। वैसे सं. अरब अमीरात, ओमान, कतर, जोर्डन, सऊदी अरब आदि से हमारे रिश्ते मजबूत हैं। और इजराइल समर्थक होने पर भी ईरान से हमारे संबंध यथावत हैं। लेकिन कूटनीति में कब कौन बदल जाए कहना मुश्किल है। यदि अमेरिका ने अपने दत्तक पुत्र इजराइल को ठेंगा दिया तब कुछ भी संभव है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 18 June 2026

ट्रंप के आश्वासन भरासे लायक नहीं



फ्रांस में चल रहे जी 7 सम्मेलन  में  सभी विषयों पर अमेरिका - ईरान युद्ध हावी रहा क्योंकि बीते कुछ महीनों से उसके चलते पूरी दुनिया का ध्यान बाकी समस्याओं से हट सा गया था। हालांकि रूस और यूक्रेन युद्ध ने भी वैश्विक व्यवस्था पर काफी असर डाला किंतु ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमले के बाद उत्पन्न परिस्थितियों ने पेट्रोल, डीजल और गैस आदि की आपूर्ति बाधित कर दी। परिणाम स्वरूप  कीमत  बढ़ जाने से सभी देशों की अर्थव्यवस्था पर विपरीत असर पड़ने लगा। तेल संयंत्रों को हुए नुकसान के कारण लंबे समय तक उत्पादन में कमी रहने की आशंका बढ़ती जा रही है।  युद्ध रोकने के लिए चल रही शांति प्रक्रिया में आ रही बाधाएं भी विचलित कर रही थीं। हालांकि आज अमेरिका और ईरान दोनों ने युद्ध रुकने की पुष्टि कर समूचे विश्व को राहत प्रदान की। युद्ध विराम कितना कारगर होगा ये तो भविष्य ही बताएगा क्योंकि  इजराइल में इस समझौते का जिस तरह विरोध हो रहा है उसे देखते हुए स्थायी शांति  की उम्मीद संदेह के घेरे में ही रहेगी। इसी बीच  डोनाल्ड ट्रंप द्वारा जी 7 सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ में जो बातें कहीं उनमें कुछ भी नयापन नहीं है। पूर्व में भी वे श्री मोदी को अपना दोस्त बताते हुए ऐसी ही टिप्पणियां करते रहे हैं। लेकिन उसी के साथ ही भारत पर टैरिफ बढ़ाने के अलावा मनमाने प्रतिबंध लगाने से भी बाज नहीं आये। डोनाल्ड ट्रंप के  बेसिर पैर वाले दावों की शुरुआत ऑपरेशन सिंदूर के समय से हुई जब उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम करवाने का श्रेय खुद को देकर शांति के नोबल पुरस्कार के लिए दावा कर दिया। हद तो तब हो गई जब पाकिस्तान ने उनके नाम की सिफारिश भी कर दी। ईरान पर हमले के बाद की गई उनकी घोषणाओं को देखें तो साफ हो जाता है कि वे अपनी बात से पलट जाने वाले इंसान हैं जिन्हें  पद की गरिमा की रत्ती भर भी परवाह नहीं रहती। इसीलिए अमेरिका जैसी महाशक्ति के राष्ट्राध्यक्ष होने के बाद भी ट्रंप की छवि एक मसखरे की बन चुकी है। गत दिवस उन्होंने श्री मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक में ये कहकर सनसनी फैला दी कि उनके राष्ट्रपति रहते हुए यदि भारत पर कोई हमला होता है, तो अमेरिका बिना किसी औपचारिक लिखित समझौते के भी भारत की मदद करेगा। साथ ही उन्होंने श्री मोदी को सख्त रणनीतिकार बताते हुए माना कि उनके नेतृत्व में भारत दुनिया के लिए बहुत अहम भूमिका निभा रहा है। ट्रंप का यह बदला हुआ रुख श्री मोदी द्वारा होर्मुज में व्यापारिक जहाजों पर हुए  अमेरिकी हमलों में भारतीय नाविकों की जान जाने का मुद्दा उठाये जाने के बाद सामने आया। समुद्री सुरक्षा और गैर सैनिक जहाजों को निशाना बनाये जाने पर भारत के विरोध को जी 7 सम्मेलन में अच्छा समर्थन मिलने और अनेक राष्ट्राध्यक्षों द्वारा श्री मोदी को दिये जा रहे सम्मान को देखकर  अमेरिकी राष्ट्रपति लचीला रुख अपनाने बाध्य हुए ।  और फिर द्विपक्षीय बातचीत के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री की तारीफ के पुल बांधते हुए बिना मांगे ही हमले के समय मदद का आश्वासन भी दे डाला। ये वही ट्रंप हैं जो ऑपरेशन सिंदूर  के बाद से पाकिस्तान को गोद में बिठाकर भारत को उपेक्षित करते रहे। और तो और  उसके सेनाध्यक्ष आसिफ मुनीर को साथ में  भोजन करवाने की तस्वीरें प्रचारित करने में भी शर्म नहीं की जबकि कूटनीतिक शिष्टाचार के लिहाज से मुनीर उनकी हैसियत से बहुत नीचे हैं।  ईरान युद्ध रूकवाने के लिए मध्यस्थता के लिए भी ट्रंप ने पाकिस्तान को आगे किया। वे सोचते रहे कि भारत इससे डर जायेगा और उनकी खुशामद करेगा। लेकिन न तो टैरिफ विवाद पर भारत झुका और न ही व्यापार डील में अपने हितों की सौदेबाजी की। रूस से कच्चे तेल की खरीदी में भी अमेरिकी दबाव को उपेक्षित करते हुए भारत ने यूरोपीय यूनियन सहित अनेक देशों से मुक्त व्यापार संधि हस्ताक्षरित कर ट्रंप को ठेंगा दिखा दिया । इसीलिए जी 7 सम्मेलन में उनको श्री मोदी और भारत के प्रति अपने झुकाव का प्रदर्शन करना पड़ा। लेकिन  दूसरे कार्यकाल में अब तक उनका जो आचरण रहा उसे देखते हुए  भारत को उन पर लेश मात्र विश्वास नहीं किया जा सकता। वैसे भी ईरान पर बेतहाशा बारूद बरसाने के बावजूद उसके साथ समझौते के लिए मजबूर ट्रंप के आश्वासन अब भरोसे लायक नहीं बचे। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 17 June 2026

उद्धव के पास न सत्ता बची न संगठन


प.बंगाल में ममता बैनर्जी की सरकार के धराशायी होते ही तृणमूल कांग्रेस दो फाड़ हो गई। पहले विधायक टूटे और फिर सांसदों ने भी  किनारा करते हुए अलग गुट बना लिया। चुनाव में लगे झटके से से वे उबर भी नहीं पाईं थीं कि पार्टी में आये बिखराव ने उनके राजनीतिक भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया। चुनाव परिणाम के बाद इंडिया गठबंधन को मजबूत कर राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का नेतृत्व करने की उनकी महत्वाकांक्षा भी  हवा में उड़ गई क्योंकि  विधानसभा और संसद दोनों ही में तृणमूल काँग्रेस की सदस्य संख्या अंगुलियों पर गिनने लायक ही बच रही है। बड़ी बात नहीं यदि आने वाले दिनों में ये बचे - खुचे भी  ममता का साथ छोड़कर चलते बनें। इसी बीच ये खबरें भी आने लगीं कि उद्धव ठाकरे के पास बची शिवसेना (यूबीटी) के 9 में से 6 सांसद भी एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ जुड़ने जा रहे हैं। इसे लेकर मुंबई से दिल्ली तक राजनीतिक हलचलें तेज हैं। उद्धव को ये समझ आ गया है कि पहले से ही ढह चुके उनके दुर्ग की बची - खुची दीवारें भी गिरने के कगार पर हैं। इसीलिए उन्होंने हताशा भरे स्वर में कहा कि जिसे जाना हो वह चला जाए। हालांकि उनके बड़बोले प्रवक्ता संजय राउत ने आदतानुसार आरोप लगा दिया कि पार्टी छोड़ रहे सांसदों को 50 - 50 करोड़ रु. का लालच दिया गया जिसमें 15 करोड़ दिये जा चुके हैं। हालांकि इसका कोई प्रमाण उन्होंने नहीं दिया। लेकिन इससे अलग हटकर देखें तो ये स्पष्ट हो जाएगा कि उद्धव के पास अपनी पार्टी को सहेजकर रखने का कोई आधार नहीं बचा। उनके स्वर्गीय पिता बाल ठाकरे राजनीति में हिंदुत्व के सबसे बड़े प्रतीक थे जिन्होंने कभी भी मुस्लिम तुष्टीकरण का सहारा नहीं लिया। लेकिन उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी उद्धव ने उस कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिला लिया जो अपनी मुस्लिम परस्ती के लिए कुख्यात हैं। और तो और वे  सत्ता के लालच में उस इंडिया गठबंधन में शामिल होने में भी नहीं सकुचाये जिसमें अखिलेश और तेजस्वी यादव के अलावा ममता बैनर्जी जैसे हिंदुत्व नाम से चिढ़ने वाले नेताओं के अलावा  वामपंथी और द्रमुक जैसी पार्टियां भी  हैं जिन्हें धर्म की अवधारणा से ही चिढ़ है। यही कारण रहा कि स्व. बाल ठाकरे के प्रखर हिंदुत्व से प्रभावित होकर शिवसेना से जुड़े तमाम लोग उद्धव द्वारा सत्ता की खातिर मुस्लिम परस्त पार्टियों के सामने झुकने से नाराज होकर  अलग हो गए । चूंकि भाजपा ही मौजूदा  दौर में हिंदुत्व की सबसे प्रखर और मुखर प्रवक्ता है लिहाजा एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में विधायकों की बगावत से उद्धव सत्ता से बाहर हुए और फिर पार्टी और चुनाव चिन्ह भी हाथ से निकल गए। 2024 के लोकसभा चुनाव  में महाराष्ट्र में इंडिया गठबंधन को जबरदस्त सफलता मिली तो उद्धव सहित कांग्रेस और एनसीपी जोश से भर उठीं। यद्यपि शरद पवार की पार्टी भी उसके पूर्व ही दो फाड़ हो चुकी थी। उनके भतीजे अजीत पवार ने बगावत कर चाचा से पार्टी छीन ली और भाजपा के साथ सत्ता में हिस्सेदारी कर ली। लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजों से मिली वह खुशी कुछ महीनों बाद ही मातम में बदल गई जब विधानसभा चुनाव में भाजपा , एकनाथ शिंदे और अजीत पवार के महायुति नामक  गठजोड़ ने प्रचंड जीत हासिल कर कांग्रेस, शरद पवार और उद्धव ठाकरे को चारों खाने चित्त कर दिया। यही कहानी स्थानीय निकाय चुनावों में भी दोहराई गई । लेकिन उद्धव ठाकरे को सबसे बड़ा धक्का लगा मुंबई में जब बीएमसी ( मुंबई महानगर पालिका) पर ठाकरे परिवार का दशकों पुराना कब्जा भी भाजपा ने समाप्त कर दिया। स्मरणीय है बीएमसी  अविभाजित शिवसेना का अभेद्य दुर्ग होने के साथ उसके लिए कुबेर का खजाना था। उसका बजट अनेक राज्यों से भी ज्यादा होने से ठाकरे परिवार इसके जरिये फलता - फूलता गया। लेकिन सत्ता और संगठन के साथ सैद्धांतिक पूंजी भी गंवाने के बाद उद्धव पूरी तरह प्रभाव शून्य हो चले हैं।  आधा दर्जन  सांसद और टूटे तो उनकी राजनीतिक जमीन पूरी तरह खिसक जाएगी। यद्यपि इस स्थिति के लिए ममता बैनर्जी की तरह वे भी भाजपा को दोषी ठहराएँगे। लेकिन वे अपने पिता स्व. बाल ठाकरे के कट्टर अनुयायियों को  अपने साथ जोड़कर नहीं रख पा रहे तो यह उनकी कमजोरी है ।  इसलिए पार्टी के सत्यानाश का कसूरवार भी वही हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 16 June 2026

शांति समझौते का भविष्य इसराइल के रुख पर निर्भर

मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस : संपादकीय
- रवीन्द्र वाजपेयी

शांति समझौते का भविष्य इसराइल के रुख पर निर्भर

अब ये मानकर चला जा सकता है कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता हस्ताक्षरित होने जा रहा है। उसके प्रारूप पर दोनों देशों की ओर से हस्ताक्षर किये जाने के बाद  रविवार को स्विटजरलैंड के जिनेवा शहर में उसे अंतिम रूप दिया जाएगा।  रोचक बात है कि  इस समझौते के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ के साथ ही चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ आसिफ मुनीर ने  काफी दौड़ भाग की। इस्लामाबाद में दोनों पक्षों के बीच वार्ताएं भी हुईं किंतु जब समझौते को अंतिम रूप देने का अवसर आया तब  पाकिस्तान की राजधानी को ठेंगा दिखाते हुए अमेरिका और ईरान ने जिनेवा  पसंद किया। इससे लगता है कि पाकिस्तान की भूमिका संदेश वाहक तक ही सीमित रही। बहरहाल अब समझौते को अंतिम रूप दिया जा चुका है तब इस बात का विश्लेषण होने लगा है कि किसने क्या खोया क्या पाया? जो विवरण  आया है उसके मुताबिक जो मुख्य बातें हैं उनमें ईरान द्वारा होर्मुज जलमार्ग को खोलना और अमेरिका द्वारा ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी खत्म करना है। इसके अलावा ईरान के पुनर्निर्माण हेतु अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान को 300 अरब डॉलर देंगे।  ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगने के बारे अन्तिम फैसले हेतु 60 दिन की समय सीमा निर्धारित किये जाने से लगता है अमेरिका और ईरान दोनों इस बेनतीजा जंग से ऊब चुके हैं और किसी तरह से अपना पिंड छुड़ाना चाहते हैं। लेकिन इस युद्ध के लिए अमेरिका को मनाने वाले इसराइल का रुख दूध में नींबू निचोड़ने वाला है। उसने साफ - साफ कह दिया है कि वह इस समझौते से पूरी तरह दूर रहेगा और लेबनान पर उसके हमले नहीं रुकेंगे। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की धौंस भी बेअसर साबित हुई। पहले तो ईरान भी इस बात पर अड़ा हुआ था कि लेबनान पर इसराइल की सैन्य कारवाई रुके बिना समझौते की गाड़ी आगे नहीं बढ़ेगी। लेकिन ऐसा लगता है तीन महीने से चली आ रही जंग ने उसके हौसले भी कमजोर कर दिये। हालांकि ऊपरी तौर पर वह अपने को बेहद मजबूत दिखाता है लेकिन अमेरिका और इसराइल की मिसाइलों से समूचा देश खंडहर में तब्दील हो चुका है। जनता भी बेतहाशा महंगाई और दैनिक उपयोग की वस्तुओं के अभाव से आक्रोशित है। मूलभूत ढांचा बुरी तरह चरमरा जाने से सर्वत्र अव्यवस्था है। ऐसे में ईरान के नेतृत्व को ये डर लगने लगा कि अवसर का लाभ उठाकर अमेरिका कहीं सत्ता परिवर्तन न करवा दे जो इस युद्ध के सबसे प्रमुख उद्देश्यों में था। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि अमेरिका और ईरान  पर उनके समर्थक देशों का दबाव भी युद्धविराम के लिए बढ़ता जा रहा था। तेल उत्पादक देशों की बिक्री रुक जाने से उनकी अर्थव्यवस्था का भी कचूमर निकलने लगा था। ये देश अमेरिका पर जंग रुकवाकर हालात सामान्य करने का आग्रह कर रहे थे वहीं चीन जैसे ईरान के संरक्षक भी उसे सलाह दे रहे थे कि जैसे भी हो युद्ध रोकने का रास्ता निकाला जाए क्योंकि उनको भी तेल संकट की चिंता सताने लगी थी। इस प्रकार एक दूसरे को बर्बाद करने पर आमादा अमेरिका और ईरान ने न चाहते हुए भी ऐसे समझौते को स्वीकार करने का मन बना लिया जिसकी सफलता को लेकर वे खुद भी आश्वस्त नहीं हैं। इसराइल द्वारा अमेरिका की बात न मानना निश्चित रूप से चौंकाता है किंतु एक संभावना ये भी है कि ऐसा करने के लिए उसे डोनाल्ड ट्रम्प ने ही उकसाया हो 2। प. एशिया में इसराइल और अमेरिका की जुगलबंदी से इस तरह के कूटनीतिक दाँव - पेच नये नहीं हैं।  इस  प्रकार इस समझौते की सफलता इसराइल के रुख पर निर्भर करेगी क्योंकि उसने लेबनान पर हमले नहीं रोके तब ईरान भी उसके बचाव में कूदे बिना नहीं रहेगा। और ऐसा होने पर युद्ध ईरान विरुद्ध इसराइल की शक्ल ले लेगा जिसमें अमेरिका किसके साथ रहेगा ये बताने की जरूरत नहीं है। पूरी दुनिया इस समझौते के बाद तेल संकट के हल होने की जो उम्मीद लगा रही है वह आसानी से पूरी होने में संदेह ही है क्योंकि ईरान इतनी आसानी से चीजें अपने हाथ से निकलने नहीं देगा। यही बात इसराइल पर भी लागू होती है क्योंकि वह उस ईरान को कभी भी चैन से नहीं रहने देना चाहेगा जो उसे मिटाने पर आमादा हो। 


- रवीन्द्र वाजपेयी