Thursday, 11 June 2026

कांग्रेस को चाहिए ममता को उन्हीं के हाल पर छोड़ दे



 चुनाव में जीत - हार  चलती रहती है। कभी कोई पार्टी बड़ी जीत हासिल करती है तो कभी मतदाता उसे चारों खाने चित्त कर देते हैं। जीत के जश्न में तो वे भी शामिल हो जाते हैं जिनका उसमें कोई योगदान नहीं रहा । लेकिन हार के समय वे भी साथ छोड़ देते हैं जो कल तक आगे - पीछे मंडराया करते थे। प. बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी की  पार्टी तृणमूल कांग्रेस में विधानसभा चुनाव हारने के बाद जिस तेजी से टूटन हो रही है उससे एक बात स्पष्ट हो गई कि बिना किसी सैद्धांतिक और वैचारिक आधार वाली पार्टियों का ढांचा विपरीत परिस्थितियों में इसी प्रकार ढह जाता है। 1984 में भाजपा को मात्र  2 लोकसभा सीटें मिलीं। अटल बिहारी वाजपेयी तक हार गए किन्तु अपनी नीतिगत दृढ़ता और मजबूत सैद्धांतिक आधार के कारण मात्र 5 साल बाद ही उसने शानदार वापसी की और आज केंद्र के साथ देश के बड़े हिस्से पर उसका शासन है । कांग्रेस भी 2014 एवं 2019 के लोकसभा चुनाव में मान्यता प्राप्त विपक्ष तक नहीं बन सकी। लेकिन उसमें भी ऐसी भगदड़ नहीं हुई जैसी तृणमूल कांग्रेस में देखने मिल रही है। अन्य दलों को भी समय - समय पर ऐसी ही विपरीत परिस्थितियों से गुजरना पड़ा । ममता बैनर्जी के अलावा तमिलनाडु में स्टालिन और केरलम में विजयन को भी सरकार गँवाना पड़ी किंतु उनकी पार्टी में ऐसी स्थिति देखने नहीं मिली। अन्ना द्रमुक के कुछ विधायकों ने जरूर मुख्यमंत्री विजय को समर्थन देकर उनके बहुमत की समस्या दूर कर दी किन्तु जयललिता के न रहने के बाद वह पार्टी बिना राजा की फौज होकर रह गई इसलिए उसके विधायकों द्वारा पाला बदलने से ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ। लेकिन 15 वर्षों से प. बंगाल की एकछत्र नेत्री बनी रहीं सुश्री बैनर्जी का प्रभुत्व एक ही चुनावी हार के बाद जिस तेजी से बिखरता जा रहा है उसे देखते हुए  कहा जा सकता है कि दो दशक बाद भी तृणमूल कांग्रेस अपना सैद्धांतिक या वैचारिक आधार तैयार नहीं कर सकी। ममता बैनर्जी ने सबसे पहले कांग्रेस की रीढ़ तोड़ी और फिर वामपंथी गुंडों को शामिल कर अपने पैर जमाए। लेकिन सत्ता की चाहत में उन्होंने तुष्टीकरण का जो रास्ता चुना उसके कारण उन्हें सत्ता का सुख तो मिलता रहा लेकिन पार्टी का कोई वैचारिक आधार नहीं बन सका। इसीलिये वे भीड़ की नेता बनकर रह गईं। लगातार तीन चुनाव जीतने के कारण वे खुद को अपराजेय समझ बैठीं और यही गलती उनके लिए आत्मघाती साबित हुई। मात्र एक महीने के भीतर ही तृणमूल तिनके की तरह बिखरने लगी तो उसका मुख्य कारण यही है कि ममता के इर्द - गिर्द जिन लोगों का जमावड़ा रहा उनके निहित स्वार्थ थे। वरना जिन लोगों को उन्होंने सड़क से उठाकर संसद पहुंचा दिया वे इस तरह छोड़ - छोड़कर नहीं भागते। तृणमूल का आरोप है कि सीबीआई और ईडी का डर दिखाकर भाजपा ये सब करवा रही है। लेकिन 60 विधायकों के साथ 20 सांसदों के बागी हो जाने के बाद उक्त आरोप बेमानी लगता है। सही बात ये है कि ये सभी घोर अवसरवादी और सत्ता लोलुप लोग हैं। ऐसे ही तमाम लोग 2021 के चुनाव के बाद भाजपा छोड़ तृणमूल में शामिल हुए थे। इस सामूहिक विद्रोह के बाद ममता का सारा घमंड मिट्टी में मिल गया। जिस कांग्रेस की जड़ें खोदकर उन्होंने प. बंगाल में अपने पाँव जमाये आज उसी के आगे वे नतमस्तक नजर आ रही हैं। कल तक राहुल उन्हें फूटी आँखों नहीं सुहाते थे किंतु आज उनके साथ काम करने वे गांधी परिवार के चक्कर काट रही हैं। खबर तो तृणमूल के कांग्रेस में विलय की भी उड़ रही है। कुल मिलाकर  वर्तमान स्थिति के लिए वे स्वयं जिम्मेदार हैं जिन्होंने चुनावी जीत के लिए राजनीतिक रिश्ते तो खराब किए ही सारे सिद्धांत ताक पर रख दिए। बांग्लादेशी घुसपैठियों को जिस प्रकार वहां बसाया गया वह देश हित के सर्वथा विरुद्ध था। इसीलिये प. बंगाल की जनता ने तृणमूल की जड़ें खोद डालीं। आने वाले दिनों में ममता का क्या भविष्य होगा इस पर सभी की निगाहें लगी रहेंगी किन्तु तृणमूल कांग्रेस का इतिहास बनना सुनिश्चित हैं। वैसे कांग्रेस के लिये यही बेहतर रहेगा कि वह ममता को उनके हाल पर छोड़ दे क्योंकि उन्होंने प. बंगाल की सत्ता हासिल करने की लालच में कांग्रेस के लिए जो गड्ढा खोदा उसकी सजा उन्हें मिलना ही चाहिए वरना वे कांग्रेस का वही हाल करेंगी जो बांग्लादेशी घुसपैठियों ने प. बंगाल का किया था।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 10 June 2026

देश के आत्मविश्वास में वृद्धि मोदी की सबसे बड़ी सफलता


भाजपा इस बात का जश्न मना रही है कि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद पर सर्वाधिक समय तक रहने का स्व.पं. जवाहरलाल नेहरू का कीर्तिमान तोड़ दिया। हालांकि वे  स्व. इंदिरा गांधी के  मुकाबले काफी पीछे हैं। लेकिन किसी गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री का 12 वर्ष से पद पर बने रहना कल्पनातीत था। यद्यपि स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने उस भ्रांति को ध्वस्त किया था कि विपक्ष में सरकार चलाने की योग्यता नहीं है। उन्होंने 1999 से 2004 तक लगातार गठबंधन सरकार चलाकर  राजनीतिक कौशल का परिचय तो दिया ही ये बात भी साबित कर दी कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा ही कांग्रेस का विकल्प है। इसीलिये दस साल बाद जब डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के विरुद्ध सत्ता विरोधी लहर उत्पन्न हुई तब जनता ने नरेंद्र मोदी को स्पष्ट बहुमत प्रदान किया । उल्लेखनीय है श्री वाजपेयी  और श्री मोदी  कभी कांग्रेस में नहीं रहे।  भाजपा को मुख्यधारा की पार्टी बनाने में अटल जी और लालकृष्ण आडवाणी की जोड़ी का योगदान अविस्मरणीय है। लेकिन  उसका विस्तार राष्ट्रीय स्तर पर करने का श्रेय श्री मोदी को ही दिया जाना चाहिए। हालांकि इसमें गृहमंत्री अमित शाह की भूमिका को स्वीकार नहीं करना उनके साथ अन्याय होगा परंतु आज भाजपा जिस शिखर पर है उसके मुख्य शिल्पकार तो प्रधानमंत्री मोदी ही हैं। आज बीते 12 वर्षों की उनकी उपलब्धियों  के साथ गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होंने जो  कर दिखाया उसका भी उल्लेख होना चाहिए जिससे प्रभावित हो जनता ने उन्हें  देश की बागडोर सौंप दी। अपने पहले कार्यकाल में ही उन्होंने अपनी क्षमता का प्रमाण दे दिया था। इसीलिए 2019 में और बड़ी सफलता के साथ सत्ता में लौटे। हालांकि 2024 के परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे किन्तु उनकी स्वीकार्यता कायम रही और बीते दो सालों में कभी भी ऐसा नहीं लगा कि उनकी सरकार बैसाखियों पर टिकी होने से अस्थिर है। हालांकि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी  दावे करते रहे कि ये सरकार गिरने वाली है। लेकिन हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली , बिहार, असम, प. बंगाल और पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव जीतकर श्री मोदी ने उन दावों की हवा निकाल दी। ऐसा नहीं है कि उनके कार्यकाल में रामराज आ गया है और देश एक आदर्श स्थिति में पहुंच गया। लेकिन सबसे बड़ी उपलब्धि  ये है कि उन्होंने देश के आत्मविश्वास को उस ऊंचाई तक पहुंच गया जहां से वह लंबी छलांग लगाने का साहस कर सकता है। आज की दुनिया में भारत की जो मजबूत और सम्मानजनक स्थिति है उसमें प्रधानमंत्री की कूटनीतिक सक्रियता और ठोस निर्णय लेने की क्षमता का योगदान उल्लेखनीय है। आंकड़ों और सरकारी दावों से पूरी तरह अलग वास्तविकता के धरातल पर उतरकर देखें तो  जनसामान्य में ये भरोसा तो उत्पन्न हुआ ही है कि श्री मोदी विपरीत हालातों के बाद भी देश को आगे ले जाने में सफल होंगे। उनकी सरकार द्वारा संचालित जनहित के कार्यों एवं योजनाओं का प्रचार तो सरकार एवं भाजपा करती रहती है इसलिए उनका बखान करने की जरूरत नहीं है। लेकिन  ये कहना सही होगा कि डॉ. मनमोहन सिंह की तुलना में मोदी सरकार का प्रदर्शन इसलिए बेहतर है क्योंकि इसने लोगों में ये विश्वास जगाया है कि देश आर्थिक और सैन्य क्षेत्र में एक बड़ी ताकत है जिसकी उपेक्षा करना किसी के लिए भी संभव नहीं रहा।  पं. नेहरू ने जब सत्ता संभाली तब उनके सामने देश के पुनर्निर्माण की चुनौती तो थी किंतु राजनीतिक दृष्टि से वे चुनौती विहीन रहे। उनके विपरीत सत्ता में आते ही चाहे गांधीनगर हो या नई दिल्ली,श्री मोदी को हर कदम पर चुनौतियों से जूझना पड़ा। और इसीलिए उनके कार्यकाल के 12 वर्ष हर दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। इस दौरान देश हर मोर्चे पर आगे बढ़ा है। दुनिया में श्री मोदी के प्रति आदर और आकर्षण दोनों बढ़े जिसका लाभ भारत की छवि को भी मिल रहा है। चुनौतियों और श्री मोदी का पिछले जन्म का साथ लगता है। लेकिन बजाय डरने के वे उन पर विजय प्राप्त करने के लिए कमर कसकर तैयार रहते हैं। उनका उत्साह और परिश्रम वृति युवाओं के लिए भी प्रेरणा स्रोत है। ये कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि वे  राष्ट्रीय राजनीति में सबसे लोकप्रिय व्यक्तित्व हैं और यही उनकी शक्ति है। हालांकि उनके विरोधी भी कम नहीं हैं किंतु लाख कोशिशों के बावजूद वे उन्हें घेरने में कामयाब नहीं हो पा रहे । राजनीति में उतार - चढ़ाव आते रहते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति या पार्टी के भविष्य के बारे में स्थायी अवधारणा बना लेना सही नहीं होता। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में उनके कद और काबलियत के बराबर कोई शख्सियत नजर नहीं आ रही। रही बात उनके शत्रुओं में वृद्धि की तो चाणक्य नीति का ये उद्धरण इसका जवाब है कि जिसकी शक्ति बढ़ती है, उसी के शत्रु भी बढ़ते हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 9 June 2026

इंडिया गठबंधन की बैठक उत्साह पैदा करने में सफल नहीं रही


दो साल बाद हुई इंडिया गठबंधन की बैठक से ज्यादा उत्सुकता तो  दिल्ली में हुए कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के बारे में देखी गई । वहीं इंडिया गठबंधन को लेकर घटक दलों में ही निराशा व्याप्त रही। 2023 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहल पर यह  बना था। इसका नाम राहुल गांधी ने सुझाया था जो दरअसल इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस है। हिंदी में इसे भारतीय राष्ट्रीय विकासशील समावेशी गठबंधन कहा जाता है। इसका उद्देश्य नरेंद्र मोदी को रोकना था। लेकिन शुरू में ही अपशकुन हो गया जब नीतीश कुमार  भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में वापस आ गए। चन्द्रबाबू नायडू ने भी  भाजपा से हाथ मिला लिया। हालांकि  भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला किंतु नीतीश और नायडू के समर्थन से मोदी प्रधानमंत्री बन ही गए। उस चुनाव में कांग्रेस 99 सीटों के साथ  मुख्य विपक्षी दल बन गई ओर राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष। लेकिन इसके बाद उसमें घमंड आ गया। गठबंधन के अन्य नेताओं के साथ श्री गांधी के व्यवहार में भी रूखापन आया। जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव में उनकी  कार्यशैली पर तो उमर अब्दुल्ला ने भी सार्वजनिक  टिप्पणी कर डाली। हरियाणा में गठबंधन में खुलकर टूटन दिखाई आई और अरविंद केजरीवाल ने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारकर कांग्रेस के लिए गड्ढा खोद दिया। महाराष्ट्र  में यद्यपि गठजोड़ कायम रहा लेकिन भाजपा नीत महायुति ने ऐतिहासिक बहुमत हासिल कर लोकसभा की हार का बदला ले लिया। दिल्ली में कांग्रेस  हरियाणा का बदला लेते हुए सभी सीटों पर लड़ी ।  लेकिन सपा और तृणमूल ने  कांग्रेस को धता बताते हुए आम आदमी पार्टी का साथ दिया। उधर गठबंधन के भीतर से ही  आवाजें उठने लगीं कि वह केवल लोकसभा चुनाव तक ही था।  प. बंगाल ताजा उदाहरण है जहाँ तृणमूल , वामपंथी और कांग्रेस अलग - अलग लड़े। केरल में कांग्रेस और वामपंथी एक दूसरे के दुश्मन बने रहे। तमिलनाडु में कांग्रेस ने द्रमुक के साथ ही चुनाव लड़ा लेकिन जब सत्ता स्टालिन के हाथ से खिसक गई तब पाला बदलकर अभिनेता विजय की सरकार में हिस्सेदारी हासिल कर ली। इससे नाराज द्रमुक ने इंडिया गठबंधन को छोड़ने की घोषणा कर दी। आम आदमी पार्टी ने भी दूरी बना ली क्योंकि पंजाब में कांग्रेस के साथ उसका मुकाबला है और गुजरात में भी वह उसको नुकसान पहुंचाने में जुटी है। इन सब कारणों से इंडिया गठबंधन लोकसभा चुनाव के बाद  निष्क्रिय हो चला था। कांग्रेस अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटी रही तो क्षेत्रीय पार्टियां अपना गढ़ सुरक्षित रखने में व्यस्त रहीं। लेकिन लगातार हारने के बाद सबके होश ठिकाने आ गए । इसीलिए किसी अन्य दल को सुई की नोंक के बराबर जमीन न देने  वाली सुश्री बैनर्जी सत्ता गंवाने के बाद उस इंडिया गठबंधन को मजबूत करने के लिए उछलने लगीं जिसका कबाड़ा करने में उनका योगदान भी कम नहीं है। लेकिन गठबंधन की बैठक के पहले फिर अपशकुन हो गया । तृणमूल के 58 विधायक टूटने  के बाद  पार्टी के 20 सांसद भी एनडीए के साथ चले गए। आम आदमी पार्टी और द्रमुक के खुले बहिष्कार के अलावा उद्धव ठाकरे तथा झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी केवल आभासी माध्यम से हाजिरी दर्ज की । खबर है हेमंत भी भाजपा के संपर्क में हैं। कुल मिलाकर बैठक तो हो गई लेकिन वह उत्साह नजर नहीं आया जो अपेक्षित भी था और आवश्यक भी। एस.आई.आर के विरोध में देश के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखने जैसा निर्णय निहायत बचकाना है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय उसे पूरी तरह सही ठहरा चुका है। बाकी बातें वही हैं जो रोज  सुनाई देती हैं। इसीलिये भाजपा विरोधी राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार भी कल की बैठक के बाद निराश नजर आए। होना तो चाहिए था कि गठबंधन अपने नेता और साझा कार्यक्रम के बारे में फैसला करता क्योंकि नेतृत्व और नीतिगत अस्पष्टता इसकी सबसे बड़ी कमी है। वहीं एनडीए में श्री मोदी को एकमुश्त समर्थन है। उल्लेखनीय है गठबंधन के संयोजक पद को लेकर ममता के विरोध के कारण ही नीतीश ने एनडीए का दामन थामा था। लगता है गठबंधन में शामिल नेता पिछली गलतियों से सबक लेने को तैयार नहीं हैं। द्रमुक और आम आदमी पार्टी के गठबंधन छोड़ने और तृणमूल में खुले विद्रोह से वैसे ही यह जमावड़ा  कमजोर हो  गया है। 2024 के बाद केरल को छोड़ कांग्रेस के कंधों पर भी पराजय का बोझ बढ़ता गया। और फिर आपसी विश्वास की भी कमी है। शरद पवार शारीरिक तौर पर अशक्त हो चले हैं और सोनिया गांधी भी मैदानी राजनीति से दूर हैं। ममता राजनीतिक तौर पर निरीह अवस्था में आ चुकी हैं। बचे अखिलेश तो उ.प्र से आ रहे संकेत योगी बाबा की वापसी पुख्ता कर रहे हैं। इसीलिये भाजपा विरोधी समीक्षकों को भी 2029 में विपक्ष के लिए कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 8 June 2026

कॉकरोच जनता पार्टी की नीति और नीयत दोनों अस्पष्ट और रहस्यमय


युवाओं के आक्रोश को अभिव्यक्त करने के लिये राजनीतिक क्षितिज पर धूमकेतु की तरह उभरी कॉकरोच जनता पार्टी के पहले प्रदर्शन को भले ही फ्लॉप शो न कहा जाए किंतु प्रभावशाली भी नहीं कह सकते। सवाल ये नहीं है कि 6 जून को दिल्ली के जंतर मंतर पर कितनी भीड़ जुटी बल्कि ये कि उसमें वे युवा कितने थे जिनकी समस्या के विरोध में सोशल मीडिया पर अवतरित इस नवजात पार्टी के अध्यक्ष अमेरिका से लंबी यात्रा करने के बाद दिल्ली पहुंचे। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग पर केंद्रित उक्त प्रदर्शन के लिये पुलिस की अनुमति मिलने पर असमंजस था । उसके अध्यक्ष अभिजीत दीपके तो अपनी गिरफ्तारी के प्रति भी आशंकित थे। देश में जेन जी आंदोलन को भड़काकर सत्ता परिवर्तन करवाने के मंसूबे पालने वाला तबका भी चाह रहा था कि कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन पर रोक लग जाए और अभिजीत गिरफ्तार हो जाएं। यदि  ऐसा हो जाता तो फिर युवाओं को भड़काने में उन्हें कामयाबी मिल जाती लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और अभिजीत अपने प्रवक्ताओं के साथ जंतर मंतर पहुंच गए। लेकिन वहां शुरुआत में तो प्रदर्शनकारी कम पत्रकार और दर्शक ज्यादा थे। बाद में भी जो जनता जमा हुई उसमें कॉकरोच जनता पार्टी के कैडर जैसा तो कुछ था नहीं। हां, जेएनयू की ढपली गैंग जरूर अपने एजेंडे के साथ मौजूद थी। उमर खालिद के पक्षधर और हमें चाहिए आजादी के नारे लगाने वाले वामपंथी और कश्मीर के अलगाववादियों के समर्थक भी उस आयोजन में घुसपैठ करने में सफल हो गए। और जब मंच से भी रास्वसंघ का विरोध सुनाई दिया तब पूरा मामला साफ हो गया। प्रदर्शन था तो श्री प्रधान के त्यागपत्र के लिए किंतु उसमें समलैंगिकता का प्रचार करने वाले बेहूदे लोग भी अपना राग अलापते दिखे।  वहीं स्त्री वेशभूषा धारण किए वे युवक भी जो अक्सर जेएनयू परिसर में देखे जा सकते हैं। कुल मिलाकर आयोजन पूरी तरह असंगठित और अव्यवस्थित रहा। अमेरिका की ठण्डक से लौटकर दिल्ली की भीषण गर्मी को सहन न करने पर अभिजीत की तबियत बिगड़ गई। उनके मंचीय साथी भी तापमान बर्दाश्त नहीं सके और उनकी हिम्मत जवाब दे गई। हालांकि इसका असर प्रदर्शन की सफलता पर पड़ा ये कहना गलत होगा क्योंकि वह पहले घंटे में ही विफलता का उदाहरण बन चुका था। सोशल मीडिया पर देखते - देखते लाखों फालोवर होने से अभिभूत अभिजीत जंतर मंतर पर 10 हजार ढंग के लोग भी नहीं जमा कर सके जबकि इससे ज्यादा लोग तो उस इलाक़े में चाय की दुकानों पर खड़े दिख जाते हैं। हालांकि दिल्ली के बाहर से भी कुछ लोग प्रदर्शन में शामिल हुए। कॉकरोच का मुखौटा लगाए सैकड़ों लोग यदि न होते तब ये पता ही न चलता कि वह आयोजन है किसका? बहरहाल जोर - शोर से शुरू हुई ये मुहिम पहले ही इम्तिहान में फुस्स साबित हो गई। इस पार्टी के प्रति अन्य स्थापित दलों की प्रतिक्रिया भी उपेक्षापूर्ण रही। दिल्ली में बैठे राजनीतिक पर्यवेक्षक और पत्रकारों ने भी कॉकरोच जनता पार्टी के इस पहले सार्वजनिक आयोजन को पूरी तरह भटका हुआ और असरहीन निरूपित कर ये जता दिया कि इसका प्रारंभ भले ही धूम - धड़ाके के साथ हुआ हो लेकिन इसे लंबी रेस का घोड़ा नहीं माना जा सकता। अभिजीत ने भारत आने से पूर्व जय भीम का उल्लेख अपने संदेश में किया था और यहां आने के बाद भी वे डॉ. आंबेडकर की पुस्तक हाथ में लिए रहे। उनके इस कृत्य ने वहां उपस्थित उन छात्रों को चौकन्ना कर दिया जो यू.पी.एस.सी के परिपत्र को लेकर पहले से ही नाराज थे। इस प्रकार युवाओं के महानायक बनने के उद्देश्य से भारत लौटे अभिजीत दलित नेता बनने की तैयारी करते दिखे। सही बात ये है कि उनकी नीति और नीयत दोनों अस्पष्ट या यूं कहें कि रहस्यमय हैं। ये संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि उनकी पीठ पर उन विदेशी ताकतों का हाथ है जो राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न करने के लिए नौजवानों को भड़काकर देश को अराजकता में धकेलना चाहते हैं। हालांकि फिलहाल कोई पुख्ता आकलन करना उचित नहीं है लेकिन अरविंद केजरीवाल की शैली में जनांदोलन की शक्ल में राजनीतिक महत्वकांक्षाओं को पूरा करने का प्रयास अब दोबारा सफल नहीं होगा क्योंकि काठ की हांडी बार - बार नहीं चढ़ती। अभिजीत दीपके सोशल मीडिया पर मिले समर्थन की खुशी में उछलते हुए अमेरिका से भारत तो आ गए लेकिन आभासी माध्यम से जनता के दिल में उतरना आसान नहीं होता। भारत की तासीर कुछ अलग हटकर है जिसे समझना उतना आसान नहीं जितना कॉकरोच जनता पार्टी के कर्णधार समझ बैठे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 6 June 2026

व्यवसायीकरण के बाद अपराधीकरण की ओर बढ़ रहा कोचिंग उद्योग


बिहार सरकार की भर्ती परीक्षा में 19000 पदों के लिए नतीजे निकले। पटना के दो कोचिंग संस्थानों में से एक ने अपने  12000 और दूसरे ने 10000 छात्रों का चयन होने का दावा किया। लेकिन इस बात का जवाब दोनों के पास नहीं है कि 19000 पदों के लिए 22000 उम्मीदवारों का चयन कैसे हो गया और क्या सभी चयनित उम्मीदवार इन्हीं कोचिंग के छात्र हैं? किसी बात पर दोनों में विवाद बढ़ा और बात गोली चलने तक जा पहुंची। एक कोचिंग संचालक जेल चले गए और दूसरे भी जाने की तैयारी में हैं। हत्या के प्रयास का आरोप लग रहा है । दूसरे पक्ष के विरुद्ध गोली चलाने की झूठी रिपोर्ट कर उसे सीखचों के पीछे भिजवाकर अपने को विजेता समझ बैठे एक नामी गिरामी कोचिंग संचालक भी खुद  उसी आरोप में जेल जाने वाले हैं। शिक्षा जैसे पवित्र विषय में पैसे और प्रतिस्पर्धा का यह घिनौना रूप देखकर दुख होता है। उक्त कोचिंग संस्थानों के छात्रों द्वारा एक दूसरे के विरुद्ध किया जा रहा प्रदर्शन भी चिंता का कारण है। शिक्षक जैसे सम्मानित  व्यक्ति को  बंदूकधारी अंगरक्षक रखने पड़ें तो आश्चर्य होता है। शिक्षा का कोचिंगकरण उसकी पवित्रता के साथ ही गुणवत्ता को भी प्रभावित कर रहा है। ऐसे में जरूरी  है  सरकार कोई नियामक संस्था बनाए जिससे कुकुरमुत्तों की तरह उग आये कोचिंग संस्थानों की असलियत उजागर हो। प्रतिस्पर्धा में सफल हुए अपने विद्यार्थियों  का फोटो बड़े - बड़े विज्ञापनों में छपवाने वाले इन संस्थानों के संचालकों से ये भी पूछा जाना चाहिए कि उनके संस्थान के कितने छात्र परीक्षा में बैठे और उनमें से कितने असफल रहे? पटना के एक कोचिंग संचालक और एक महिला टी.वी एंकर के बीच तीखी टिप्पणियों के आदान - प्रदान से शुरू हुए विवाद ने नया मोड़ ले लिया जब पटना के दो कोचिंग संस्थान संचालकों के बीच व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा गोली चलने की सीमा तक जा पहुंची और पूरे देश में लोकप्रियता और सम्मान अर्जित कर चुके शिक्षक अब पुलिस थाना और जेल के मकड़जाल में उलझ गए। सबसे दुखद पहलू ये है कि उन्होंने अपने संस्थानों के छात्रों को औजार बनाकर सड़कों पर उतार दिया। इस विवाद का अंत  तो अब कानून तय करेगा किंतु इससे कोचिंग संचालकों की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गई। शिक्षा संस्थानों में छात्रों के बीच उग्र विवाद होते रहते हैं। दिल्ली का जे.एन.यू तो वामपंथियों और संघ परिवार से जुड़े छात्र संगठन की युद्धभूमि बना हुआ है। लेकिन कोचिंग संस्थानों के माहौल में अपेक्षाकृत गंभीरता रहती है। इसके पहले उक्त दोनों कोचिंग संस्थानो को लेकर भी कोई आपत्तिजनक बात सुनने में नहीं आई। लेकिन बीते कुछ दिनों में उनके  विवाद के बाद अब समूचा कोचिंग उद्योग निशाने पर आ गया। इसकी उपयोगिता और प्रामाणिकता पर सवाल उठने लगे हैं। आरोप लग रहे हैं कि ये नोट  छापने की मशीन बन गए  हैं। कुछ कोचिंग संस्थान तो विशुद्ध कॉरपोरेट शैली में अन्य शहरों में भी शाखाएं खोल रहे हैं जिनसे किसी उपभोक्ता वस्तु की डीलरशिप का एहसास होता है। लुभावने विज्ञापनों के जरिए मोटी फीस वसूली जाती है। इस कार्य में भी दलाली का धंधा होता है। यद्यपि कुछ कोचिंग संस्थान अभी भी ईमानदारी से छात्रों का मार्गदर्शन कर उनके बेहतर भविष्य के लिए सार्थक प्रयास करते हैं लेकिन ज्यादातर शिक्षा की दुकानें और शो रूम का रूप ग्रहण कर चुके हैं। इसी  वजह से कोचिंग संस्थानों पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठ रही है। ये कितनी व्यावहारिक है ये निःसंदेह विमर्श का विषय है लेकिन नौजवानों का भविष्य संवारने के लिए यदि कोचिंग ही जरूरी है तब  विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों की उपयोगिता पर भी प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है। ये विवाद और बढ़े तथा कोचिंग संचालकों की व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा    आपराधिक स्वरूप ग्रहण करे उसके पूर्व ही इसे रोकने के कदम उठाए जाने चाहिए क्योंकि इनके साथ लाखों छात्रों का भविष्य और  अभिभावकों की उम्मीदें जुड़ी हुई हैं। इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि हाल ही में नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने के मामले में भी कतिपय कोचिंग संस्थानों की भूमिका का पर्दाफाश हुआ था। केंद्र सरकार को चाहिए इस  बारे में ठोस कदम उठाए वरना शिक्षा के पवित्र क्षेत्र का व्यवसायीकरण होने के बाद उसका माफियाकरण होते देर नहीं लगेगी। पटना में हुए विवाद के बाद बड़ी बात नहीं कोचिंग संचालक गुंडों को भी भागीदार बनाने लगें क्योंकि पैसा कमाने की हवस में इंसान  किसी भी हद तक गिर सकता है। और गुरु से सर बन चुके लोग भी इंसान ही हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 4 June 2026

दिल्ली अग्निकांड: होटल वाले के साथ निगम अधिकारियों को भी दंड मिले


देश की राजधानी दिल्ली के एक होटल में लगी आग से 21 लोग मारे गए जिनमें विदेशी भी थे। 6 कमरों की स्वीकृति वाले इस होटल में 25 कमरे बने थे। आग बुझाने की कोई व्यवस्था भी नहीं थी। उक्त होटल के आसपास बने दर्जनों गेस्टहाउस नुमा होटलों के पास भी फायर एन. ओ. सी नहीं है। साथ ही ज्यादातर में अवैध निर्माण भी है। कुछ साल पहले भी दिल्ली के राजेंद्र नगर इलाके के बेसमेंट में संचालित कोचिंग सेंटर में लगी आग में कुछ छात्रों की मौत के बाद दिल्ली के स्थानीय निकाय नींद से जागे। दिखावटी कार्रवाई में तोड़फोड़, जुर्माना लगाने और लायसेंस रद्द करने जैसे कदम उठाए गए। मरने वालों के परिवारों को मुआवजा बांटकर सरकार ने भी अपना चिरपरिचित कर्मकांड पूरा कर दिया परन्तु समस्या यथावत रही क्योंकि जो सबसे  ज्यादा जरूरी था वह छोड़कर बाकी सब किया गया। ये स्थिति देश के सभी हिस्सों में हैं। कुछ दिनों पूर्व  दिल्ली से सटे गाजियाबाद की एक बहुमंजिला रिहायशी इमारत में आग लगी तब ये बात उजागर हुई कि वहां अग्निशमन विभाग के पास ऊंची सीढ़ियों का अभाव है। सोचने वाली बात ये है कि जब राष्ट्रीय राजधानी में अग्निकांड से बचने के लिए पर्याप्त साधन नहीं हैं तब देश के सुदूर हिस्सों का तो ईश्वर ही मालिक है। चूंकि अग्निशमन व्यवस्था स्थानीय निकाय द्वारा संचालित होती है इसलिए उंगलियां उसी पर उठना स्वाभाविक है। लेकिन उससे भी बड़ी बात ये है कि आग लगने पर उसे जल्द बुझाना तभी संभव होता है जब भवन का निर्माण  नियमानुसार हुआ हो। साथ ही घनी बसाहट वाले क्षेत्रों में अग्निशामक वाहन पहुंच सकें इसकी चिंता भी की जानी चाहिए। लेकिन स्थानीय निकायों का भ्रष्ट तंत्र समय रहते इस बारे में कभी नहीं सोचता क्योंकि उसे लोगों के जान - माल से ज्यादा फिक्र अपनी जेब भरने की रहती हैं। दिल्ली में गत दिवस हुए हादसे ने एक बार फिर साबित कर दिया कि देश भर के अधिकांश स्थानीय निकाय अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में विफल हैं। 6 कमरों की स्वीकृति वाले होटल में 25 कमरे बन गए और नगर निगम के जिम्मेदार लोगों को उसकी जानकारी नहीं लगी ये बात  गले नहीं उतरती । निकतवर्ती तमाम गेस्टहाउसों में भी यही अनियमितता है। जाहिर है अब सबकी जांच होगी और इन अवैध निर्माणों की अनदेखी करने वाला सरकारी अमला ही उनको तोड़ने की मर्दानगी दिखाएगा। जिस होटल मालिक के अवैध निर्माण के  कारण 21 लोगों को ज़िंदा जलने जैसी त्रासदी झेलनी पड़ी उसकी गिरफ्तारी के बाद जो सजा कानून तय करे वह तो उसे मिले ही साथ में मृतकों के परिवार को अतिरिक्त मुआवजा भी उससे वसूला जाए। उस क्षेत्र में तैनात स्थानीय निकाय के अधिकारियों पर भी गैर इरादतन हत्या का मुकदमा चलाया जाए। तीन दशक पहले दिल्ली के ही उपहार सिनेमा घर में लगी आग में भी अनेक लोग जलकर जान गंवा बैठे थे। वह कांड भी बेहद चर्चित हुआ था । उक्त  सिनेमा घर के मालिकों को सात साल की सजा के साथ ही करोड़ों रु. का अर्थदंड भी दिया गया। लेकिन 1997 में हुए अग्निकांड की कानूनी प्रक्रिया निचली अदालत से होते - होते 2022 में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद जाकर पूरी हुई। 25 बरस तक चलने वाली उबाऊ न्यायिक प्रक्रिया से ऐसे हादसों पर विस्मृति की धूल पड़ जाती है। यदि पैसा कमाने के लिए गैर कानूनी कार्य करने वालों को जल्दी दंड मिलने लगे तब तो लोग कानून से डरेंगे भी अन्यथा अग्निकांड होते रहेंगे और निरपराध लोग मारे जाते रहेंगे। दिल्ली में गत दिवस हुए अग्निकांड में चूंकि दर्जन भर विदेशी नागरिकों की जान भी चली गई इसलिए विदेशी समाचार माध्यमों में इस घटना को आधार बनाकर भारत के होटलों में सुरक्षा प्रबंधों के अभाव का बखान किया जा रहा है। इसका दुष्प्रभाव विदेशी पर्यटकों में कमी के रूप में देखने मिल सकता है। किसी भी जिम्मेदार व्यवस्था में गलतियों से सबक लेकर उनकी पुनरावृत्ति रोकने के पुख्ता प्रयास किये जाते हैं लेकिन हमारे देश में चूंकि गलतियों को भुला देने की प्रवृत्ति हावी है इसलिए दुर्घटनाओं को रोकने की फुर्सत ही किसी को नहीं है। अवैध निर्माण और अग्निशमन की जरूरी व्यवस्थाएं न होने के बाद भी व्यावसायिक गतिविधियों का संचालन स्थानीय निकाय की जानकारी के बिना सम्भव ही नहीं। इसीलिए दिल्ली नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों को भी दोषी होटल मालिक के  बराबर कड़ा दंड दिया जाना चाहिए। न्यायपालिका की भी यह जिम्मेदारी है कि ऐसे मामलों में त्वरित सुनवाई कर दोषियों को उनके किए की सजा प्रदान करे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 3 June 2026

तृणमूल जैसे बनी वैसे ही टूट रही है


विधानसभा चुनाव में करारी पराजय के बाद भी ममता बैनर्जी की मुश्किलें कम होने के बजाय और बढ़ती जा रही हैं। पूरे राज्य में तृणमूल कांग्रेस से इस्तीफों की झड़ी लगी है। हालांकि जब भी किसी भी पार्टी को ऐसी हार का सामना करना पड़ता है उसमें इस तरह की स्थिति बनना नई बात नहीं है। लेकिन तृणमूल कांग्रेस के विधायकों और सांसदों की बगावत के जो संकेत मिल रहे हैं वे ममता के राजनीतिक आधार को बुरी तरह धवस्त कर सकते हैं। इसका पहला संकेत तब मिला जब अभिषेक बैनर्जी के साथ हुई मारपीट के बाद ममता द्वारा बुलाई गई बैठक में केवल 20 विधायक पहुंचे। उसके बाद दो विधायकों को पार्टी से निकाले जाने की खबरें आ गईं और वे खुलकर ममता के विरुद्ध बोलने लगे। उसी के बाद पार्टी में विभाजन की अटकलें लगने लगीं। गत दिवस ममता द्वारा आयोजित धरना - प्रदर्शन में पार्टी के अधिकांश सांसदों और विधायकों के अनुपस्थित रहने से बगावत की आशंका और बलवती हो गई। आज पार्टी से निकाले गए 2 विधायक विधानसभा अध्यक्ष से मिलकर असली तृणमूल कांग्रेस होने के नाते पार्टी चुनाव चिन्ह के साथ ही नेता प्रतिपक्ष पद मांगने के साथ दावा कर रहे हैं कि उनके पास 59 विधायक हैं  जो दो तिहाई से ज्यादा होने से दलबदल कानून से मुक्त हैं। हालांकि अभी इस बात की पुष्टि नहीं हो सकी कि बागी विधायकों के पास पार्टी तोड़ने लायक संख्याबल है या नहीं। और ये भी कि सांसदों में से कितने ममता का साथ छोड़ने का साहस दिखाएंगे?  ये भी साफ नहीं हैं कि बागी विधायक और सांसद भाजपा में शामिल होंगे या फ़िर अलग गुट बनाकर विपक्ष में बैठेंगे । लेकिन इतना तो पक्का है कि पार्टी में टूटन शुरू हो चुकी है। इसके पीछे किसी वैचारिक मतभेद की बात सोचना तो निरर्थक है क्योंकि तृणमूल कांग्रेस केवल ममता बैनर्जी की निजी महत्वाकांक्षाओं के इर्द - गिर्द सिमटी पार्टी थी जिसका न कोई सिद्धांत है और न ही आदर्श। रही - सही कसर पूरी हो गई ममता द्वारा अपने भतीजे अभिषेक को अघोषित उत्तराधिकारी बनाकर जिनके तेवर किसी बिगड़ैल नवाबजादे से कम नहीं थे। ममता मूलतः सड़क से उठी जुझारू नेत्री थीं जिन्होंने वामपंथी सत्ता से लड़ने में कांग्रेस की असमर्थता से असंतुष्ट होकर  तृणमूल कांग्रेस का गठन किया और आखिरकार वामपंथी सत्ता को उखाड़ फेंका।  लेकिन कोई विचारधारा नहीं होने से पार्टी सत्ता से चिपके रहने का साधन बन गई । और इसीलिये उसमें वामपंथी सरकार के दौर में अराजकता फैलाने वाले असामाजिक तत्वों ने आराम से घुसपैठ कर ली। सत्ता की चकाचौंध में  ममता ने इस बुराई से आँखें मूंदते हुए केवल चुनाव जीतने को ही अपना लक्ष्य बनाते हुए मुस्लिम तुष्टीकरण के रिकॉर्ड तोड़ दिए। चूंकि वामपंथी और कांग्रेस धीरे - धीरे कमजोर होते गए इसलिए ममता को लगा वे अपराजेय हो चुकी हैं। और इसीलिये उन्होंने जनता की तकलीफों को जानने के बजाय उनकी उपेक्षा शुरू कर दी।  अभिषेक ने अघोषित युवराज की तरह जिस समानान्तर शासन व्यवस्था को जन्म दिया वह अराजकता का पर्याय होने से जनता की नाराजगी का कारण बनी जो बीती 4 मई को चुनावी परिणाम के रूप में सामने आई। लेकिन ममता की अकड़ कम नहीं हुई और उन्होंने इस्तीफा देने से इंकार कर दिया जो कि संसदीय शिष्टाचार का अभिन्न हिस्सा है। बहरहाल तृणमूल कांग्रेस टूटे या एकजुट रहे ये उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना ये कि निजी जागीर बनी हुई क्षेत्रीय पार्टियों ने  जिस सिद्धांतविहीनता और अवसरवाद को बढ़ावा दिया उसकी वजह से से समूचा राजनीतिक माहौल प्रदूषित होकर रह गया। तृणमूल के जो विधायक, सांसद और अन्य नेता ममता से किनारा कर रहे हैं उसकी एकमात्र वजह है उनके हाथ से सत्ता खिसक जाना। चूंकि वे सब ममता के करिश्मे के आकर्षण में तृणमूल से जुड़े थे इसलिए ज्योंही वह खत्म हुआ त्योंही दीदी असहनीय लगने लगीं। ममता ने वामपंथी सत्ता को हटाकर जो उम्मीदें जगाई थीं उन्हें पूरी करने जनता ने उनको 15 साल दिए जो कम नहीं थे। इससे कम समय में नरेंद्र मोदी ने गुजरात को विकास का प्रतीकचिन्ह बनाकर खुद को प्रधानमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार बना लिया और बीते 12 वर्षों से देश की बागडोर संभाले हुए हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में आशाजनक नतीजे नहीं मिलने के बावजूद वे निराश नहीं हुए और राज्य दर राज्य भाजपा की विजय के आधार बने हुए हैं तो इसका कारण उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि है। ममता की पार्टी सत्ता से हटते ही महज एक महीने के भीतर यदि बिखराव के कगार पर है तो उसकी वजह  विचारशून्यता ही है। दरअसल तृणमूल कांग्रेस सत्ता के लिये एकत्र लोगों का जमावड़ा है जिनके बीच न कोई सैद्धांतिक साम्यता है और न ही जनसेवा की भावना। इसीलिये चुनावी पराजय के बाद ही पार्टी खंडित होने आ गई। महाराष्ट्र में जो हाल उद्धव ठाकरे का हुआ वही प. बंगाल में ममता बैनर्जी का होने जा रहा है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी