दुनिया को अपनी उंगली पर नचाने वाले अमेरिका की स्थिति बेहद हास्यास्पद हो गई है। ईरान के साथ युद्ध में तीन महीने बाद भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ये तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे युद्ध की समाप्ति किस प्रकार करें क्योंकि न तो वे ईरान को पूरी तरह पराजित करने में सफल हुए और न ही उसके परमाणु कार्यक्रम को रुकवाने में उन्हें सफलता मिली। ईरान के तेल को बेचकर पैसा कमाने और होर्मुज समुद्री मार्ग का चौधरी बनकर उसके तेल व्यापार को नियंत्रित करने का उनका मंसूबा भी पूरा होता नहीं दिख रहा। अपने दुमछल्ले पाकिस्तान को मोहरा बनाकर कूटनीतिक पहल करने का अमेरिकी दांव भी अब तक तो कारगर साबित नहीं हो सका क्योंकि वार्ता की टेबिल सजने के बाद भी ईरान ने ट्रम्प की शर्तें मान लेने से इंकार कर दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति आये दिन ये शिगूफा छोड़ते रहते हैं कि ईरान उनकी शर्तों को मान गया है । लेकिन कुछ देर बाद ही वे उसे धमकी देने लग जाते हैं। उनके हर दावे का ईरान ने मजाक ही उड़ाया और हमले की धमकियों का जवाब भी उसी भाषा में देने में संकोच नहीं किया। गत सप्ताह ऐसा लगा था कि दोनों के बीच सहमति बन गई है। इसके कारण गत दिवस दुनिया के शेयर बजारों में उछाल भी देखा गया किंतु पीछे - पीछे ये खबर भी आ गई कि अमेरिकी सैन्य दस्तों ने होर्मुज में ईरानी नौसैनिक नावों आदि पर हमले किये। ट्रम्प की ये डींग भी हवा - हवाई होकर रह गई कि ईरान अगले 20 साल तक परमाणु अस्त्र नहीं बनाने राजी हो गया है। कुल मिलाकर प. एशिया में चल रहे युद्ध के समाप्त होने सम्बन्धी कूटनीतिक बातचीत एक कदम आगे , दो कदम पीछे वाली स्थिति में है। इस लड़ाई की जड़ है इसराइल जिसे अमेरिका का सबसे चहेता माना जाता है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के अनुरोध पर ही ट्रम्प ने हजारों कि.मी दूर आकर ईरान से पंगा लेने जैसा निर्णय लिया जबकि अफगानिस्तान में 20। साल डटे रहने के बावजूद तालिबानी कट्टरपंथियों से समझौता करने का दर्द अभी भी वाशिंगटन भूला नहीं है। उल्लेखनीय है गाजा पट्टी नामक फिलीस्तीन के हिस्से पर ईरान द्वारा पालित - पोषित हमास नामक इस्लामिक आतंकवादी संगठन का शासन था। उसने अचानक बेवजह इसराइल पर हमले कर उसके सैकड़ों नागरिकों को बंधक बना लिया। उसके जवाब में नेतन्याहू ने वही किया जो इसराइल का स्वाभाव है। हमास की तबाही का बीड़ा उठाकर नेतान्याहू ने समूचे गाजा को मलबे के ढेर में बदल दिया। ईरान के साथ चल रही मौजूदा जंग की पृष्ठभूमि में इसराइल और हमास के बीच हुई लड़ाई ही है।नेतन्याहू अमेरिका को ये समझाने में तो सफल हो गए कि ईरान ही प. एशिया में अमेरिका के प्रभुत्व को चुनौती देने वाला है। यदि उसे ठिकाने लगा दिया जाए तो अधिकांश अरब जगत पर उनका दबदबा कायम होने से कोई नहीं रोक सकेगा। अमेरिका तो बीते अनेक दशकों से ईरान में अपनी समर्थित सत्ता कायम करने के प्रयास कर रहा था लेकिन तमाम प्रतिबंधों और दबावों के बाद भी उसके मंशा पूर्ण न हो सकी। दरअसल इसराइल को ये डर सताता रहा है कि ईरान ने परमाणु अस्त्र बना लिए तो उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। गाजा में हुए युद्ध के दौरान भी इसीलिए अमेरिका ने ईरान के आण्विक केंद्रों पर भीषण बमबारी की थी। लेकिन जैसी कि जानकारी मिली उसके अनुसार ईरान ने परमाणु अस्त्र बनाने के लिए संगृहीत परिष्कृत यूरेनियम पहले ही दूसरे सुरक्षित स्थानों छिपा दिया था। इस बार की लड़ाई में भी अमेरिका ने ईरान को परमाणु शक्ति बनने से रोकने के लिये हरसम्भव प्रयास किये किंतु अब तक तो वह ऐसा नहीं कर सका। ईरान ने न तो परमाणु कार्यक्रम रद्द करने का आश्वासन दिया और न ही परिष्कृत यूरेनियम भंडार उसे सौंपने पर सहमत हुआ। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिये अचूक कार्ययोजना बनाने के फेर में ट्रम्प और नेतन्याहू ये भूल गए कि ईरान ने मिसाइलों के क्षेत्र में भी अकल्पनीय उपलब्धि हासिल कर ली है। बीते तीन महीनों में अमेरिका और इसराइल के जबरदस्त हमलों के जवाब में ईरान ने जिस बड़ी मात्रा में इसराइल ही नहीं बल्कि अमेरिका के समर्थक सऊदी अरब , ओमान , कतर और यू.ए.ई आदि पर मिसाइलें बरसाईं वह अप्रत्याशित था। युद्धविराम के दौरान भी ये जानकारी आई कि ईरान के पास अभी भी हजारों मिसाइलाें का जखीरा है। अमेरिका और इसराइल के सैकड़ों हवाई हमले भी इन्हें नष्ट नहीं कर सके क्योंकि ये जखीरा भूमि के नीचे है । यही वजह है कि डोनाल्ड ट्रम्प लगभग रोजाना ईरान को मिटा देने की धमकी देने के कुछ देर बाद ही शांति समझौते की कहानी लेकर बैठ जाते हैं। सही बात ये है कि ईरान भी अमेरिका की कमजोरी भांप चुका है। इतने तनावपूर्ण माहौल में ट्रम्प की चीन यात्रा भी उनकी दयनीयता को दर्शाती है। उन्हें लगता था वे चीन के राष्ट्रपति के जरिए ईरान को समझौते के लिए बाध्य कर ले जाएंगे किंतु बीजिंग में उनकी किरकिरी ही हुई। आज के हालात में ट्रम्प की स्थिति सांप - छछूंदर जैसी हो गई है और वे अमेरिका के सबसे कमजोर और घटिया राष्ट्रपति के रूप में कुख्यात हो चले हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी