धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग को लेकर हुए धरने में अनशन करने वाली नेहा बोरा राजनीतिक मंचों पर भी दिखाई देने लगीं। आईसा नामक वामपंथी छात्र संगठन की अध्यक्ष नेहा जेएनयू में डॉक्टरेट कर रही हैं। यदि नीट पेपर लीक न होते तब शायद जंतर मंतर का आंदोलन भी न होता और नेहा भी सुर्खियों में नहीं आतीं। अतीत में जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार देश विरोधी नारों के सिलसिले में जेल गए। वहाँ से छूटने के बाद राहुल गाँधी सहित तमाम विपक्षी नेता उनको समर्थन देने पहुंचे। वामपंथी पत्रकारों सहित सिविल सोसाइटी से वामपंथी रुझान वालों में भी कन्हैया की पीठ थपथपाने की होड़ मच गई। वे इस कारण चर्चा में आये क्योंकि उनके नेतृत्व में जेएनयू में भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारे आम हो गए। साथ ही हिन्दू देवी - देवताओं का खुलकर अपमान होने लगा। उनको इसलिए भी हाथों - हाथ उठाया गया क्योंकि वे भाजपा - संघ और नरेंद्र मोदी के विरुद्ध तीखी भाषा का उपयोग कर रहे थे। वह सब देखकर कन्हैया को राजनीति का कीड़ा काटने लगा और डाक्टरेट करने के उपरांत वे सी.पी.आई में शामिल होकर दलीय राजनीति में कूदकर 2019 में बिहार की बेगूसराय सीट से लोकसभा चुनाव लड़े। लेकिन जेएनयू वाले तेवर काम नहीं आये और बुरी तरह हारे । उस हार ने उनके सिर से वामपंथ का भूत उतार दिया और वे कांग्रेस में आ गए। राहुल गाँधी को भी उनमें संभावनाएं दिखीं तो उन्होंने अपने निकटस्थ लोगों में कन्हैया को जगह दे दी और भारत जोड़ो यात्रा का सह संयोजक बना दिया। टीवी चैनलों पर भी कन्हैया कांग्रेस का पक्ष आक्रामक तरीके से रखने लगे। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव ने उनकी उम्मीदवारी में टाँग अड़ा दी क्योंकि उन्हें कन्हैया में अपने बेटे तेजस्वी का प्रतिद्वंदी नजर आने लगा। और तब कांग्रेस ने उनको बाहरी दिल्ली से उतारा जिसमें लाखों बिहारी मतदाता हैं लेकिन वहाँ भी कन्हैया की नाव डूब गई। और उसके बाद वे श्री गाँधी के पिछलग्गू की हैसियत तक सिमटकर रह गए। बची - खुची भद्द पिट गई दिल्ली विवि छात्रसंघ के हालिया चुनाव में कांग्रेस के छात्र संगठन एन.एस.यू.आई की चारों पदों पर हार से। जंतर - मंतर आंदोलन के बाद हुए उस चुनाव में भाजपा समर्थित अभाविप ने बाजी मारकर जेन जी नामक हौए की हवा निकाल दी। उस चुनाव में एन.एस.यू.आई के उम्मीदवार चूंकि कन्हैया ने तय किये इसलिए ठीकरा उन पर फूटा और तभी से वे हाशिये पर धकेल दिये गए। इसी बीच उनका एक वीडियो आ गया जिसमें वे कहते सुने गए कि वे चाहते तो किसी वि.वि में अध्यापक हो सकते थे किंतु उनका कैरियर बर्बाद हो गया। शायद उनकी पीड़ा का कारण नेहा बोरा को श्री गाँधी द्वारा दिया जा रहा महत्व ही ही है। पिछले दिनों विपक्ष के प्रदर्शन एवं सर्वोच्च न्यायालय तक निकाले गए मार्च में नेहा राहुल के निकट ही दिखाई दीं। इसे लेकर कांग्रेस के भीतर भी उथलपुथल है। खास तौर पर युवा नेताओं को नेहा को राहुल द्वारा दी जा रही तवज्जो रास नहीं आ रही। पार्टी के भीतर ये चर्चा है कि नेहा की बदजुबानी नुकसानदायक हो सकती है। कुछ दिनों पहले उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बारे में उनके गृहनगर गोरखपुर में नेहा ने जिस तरह की निम्नस्तरीय शब्दावली प्रयोग की उसे किसी ने पसंद नहीं किया। अब उन्होंने बांग्लादेश के जेन जी की तारीफ करते हुए कहा कि भारत में जो जेन जी आंदोलन दिखाई दे रहा है, उसकी शुरुआत सबसे पहले बांग्लादेश में हुई थी। उन्होंने बांग्लादेश के युवाओं को क्रांति का रास्ता दिखाने के लिए बधाई देते हुए कहा कि बांग्लादेश ने उन्हें सिखाया कि सत्ता कैसे बदली जाती है। उनके इस बयान की भाजपा ने तो आलोचना की ही अन्य विपक्षी पार्टियां भी सकते में हैं। कांग्रेस भी असमंजस में पड़ गई। भाजपा को ये कहने का मौका मिल गया कि सरकार विरोधी आंदोलन की जड़ें विदेशों में हैं। नेहा के इस बयान से वामपंथियों का देशविरोधी चरित्र एक बार फिर उजागर हो गया है। नेहा के साथ ही वरिष्ट अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने भी सत्ता बदलने की बात कहते हुए खूनखराबे की आशंका जताकर ये दर्शा दिया कि भारत को बांग्लादेश और नेपाल की तरह से ही अराजकता की आग में झोंकने का षडयंत्र रचा जा रहा है जिसकी बानगी कॉकरोच जनता पार्टी के क्रिया कलापों से मिल रही है। राहुल गाँधी द्वारा सर्वोच्च न्यायालय परिसर में घुसने का दुस्साहस उस अराजकता का पहला चरण है। ये सब देखते हुए लगता है मुख्य चुनाव आयुक्त के त्यागपत्र के लिए किया गया आंदोलन तो दिखावा है। इसका असली मकसद देश में अराजकता फैलाकर हिंसा के जरिये सत्ता पर कब्जा करना है जिसका खुलासा बीते एक - दो दिनों में विपक्षी खेमे से आये बयानों से हुआ।
- रवीन्द्र वाजपेयी