Tuesday, 1 September 2026

खबर अच्छी किंतु आंकड़े पेट नहीं भरते



प. एशिया में चल रहे संकट से उत्पन्न विषम परिस्थितियों के बावजूद मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही ( अप्रैल से जून) में भारत की जीडीपी ( सकल घरेलू उत्पाद) दर का 7.8 प्रतिशत का आंकड़ा छूना निश्चित रूप से उत्साहित करने वाला लो nnv   । ईरान और अमेरिका में चल रहे युद्ध के परिणामस्वरूप कच्चे तेल , गैस और उर्वरकों की आपूर्ति बाधित होने से वैश्विक स्तर पर आर्थिक उथलपुथल मची है। भारत में भी पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस महंगी हुई वहीं उर्वरक की कमी से किसान परेशान है। इनके अलावा अमेरिका द्वारा टैरिफ बढ़ाये जाने से हमारे निर्यात पर विपरीत असर तो पड़ा ही कच्चे तेल के महंगे होने से रुपये की विनिमय दर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले चिंताजनक स्थिति तक नीचे आती चली गई। इसके कारण फैली घबराहट में विदेशी निवेशकों द्वारा भारत में लगाई गई पूंजी तेजी से वापस निकाली जिसका असर शेयर बाजार में आई अस्थिरता के अलावा विदेशी मुद्रा भंडार में आई कमी के रूप में सामने आने लगा।  लेकिन इस सबके बाद भी पहली तिमाही में जीडीपी का भारतीय रिजर्व बैंक के अनुमान से अधिक रहना इस बात को प्रमाणित करता है कि हमारा आर्थिक प्रबंधन सही रहा और वैश्विक स्तर पर व्याप्त  घबराहट से प्रभावित हुए बिना सरकार ने वित्तीय अनुशासन बनाये रखा । इससे भारतीय अर्थव्यवस्था में दुनिया भर का विश्वास न सिर्फ कायम रहा अपितु उसमें वृद्धि भी परिलक्षित हुई। अधिकृत जानकारी के अनुसार पहली तिमाही में जीडीपी  ₹81.36 लाख करोड़ रही, जो पिछले वर्ष इसी अवधि में ₹75.46 लाख करोड़ थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 7.8 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि दर पर कहा  कि वैश्विक अनिश्चितताओं और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद यह एक असाधारण उपलब्धि है। वहीं विपक्षी दल कांग्रेस ने इस आंकड़े को भ्रामक बताया और सवाल उठाया कि यह उच्च वृद्धि रोजगार और आम नागरिकों की समृद्धि में क्यों नहीं बदल रही है? ये दोनों ही  प्रतिक्रियाएं अपनी - अपनी जगह ठीक हैं । चौतरफा हमलों के बीच सरकार के लिए ये राहत की खबर है जबकि विपक्ष द्वारा उठाया गया सवाल भी वाजिब है क्योंकि जीडीपी में वृद्धि की दर पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा होने का लाभ यदि देश के आम नागरिक को न मिल सके तब आंकड़े कितने भी आकर्षक क्यों न हों लोगों के चेहरों पर मुस्कुराहट नहीं ला सकते। उस दृष्टि से देखें तो इस समय जो तिमाही चल रही है इसके आंकड़े आने के बाद ही देश की आर्थिक मजबूती का जमीनी आकलन हो सकेगा क्योंकि  मानसून की कमजोर शुरुआत  और  फिर बाढ़ आदि के चलते खरीफ फसल को जो नुकसान पहुँचा उसने चिंता उत्पन्न कर दी है। बरसात में सब्जियां महंगी होना तो आम बात है किंतु बीते कुछ दिनों में शक्कर के दाम जिस तरह उछले उसने सरकार के प्रबंधन पर सवालिया निशान लगा दिये। इसी तरह 20 फीसदी एथनॉल मिलाये जाने के बाद भी पेट्रोल के दाम नहीं घटाए जाने पर सरकार की आलोचना हो रही है। ये आरोप भी लग रहे हैं कि एथनॉल बनाने में गन्ने के उपयोग से एक तरफ जहाँ शक्कर उत्पादन घट गया वहीं कुछ और खाद्यान्न भी उपभोक्ताओं से दूर हो गए। हालांकि कल समाप्त हुए अगस्त माह में 2 लाख करोड़ रु.जीएसटी वसूली का आंकड़ा  सरकार का हौसला बढ़ाने वाला है जो गत वर्ष इसी माह की तुलना में 14 फीसदी अधिक है किंतु देखने वाली बात ये है कि डॉलर महंगा होने से आयात की लागत बढ़ी जिसका असर जीएसटी संग्रह में वृद्धि पर  स्वाभाविक तौर पर पड़ा  ।  हालांकि आयात बढ़ना अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता। बावजूद इसके जीडीपी यदि 8 प्रतिशत को छू रही है तब उसे इस आधार पर संतोषजनक माना जा सकता है क्योंकि वैश्विक हालात पूरी तरह अनिश्चित और विपरीत हैं। यद्यपि आम जनता के लिए ये आंकड़ा तब तक कोई मायने नहीं रखता जब तक उसे सीधी राहत न मिले। उदाहरण के लिए एथनॉल मिलाने के बाद भी यदि पेट्रोल तो सस्ता हो नहीं उल्टे शक्कर सहित खाने - पीने की अन्य चीजें महंगी हो जाएं तब उसकी नाराजगी औचित्यपूर्ण ही कही जाएगी। भले ही विपरीत परिस्थितियों में भी भारत के हालात चिंताजनक नहीं हैं किंतु जनता को इसका भरोसा तभी होगा जब उसे सीधी राहत मिले क्योंकि आंकड़े पेट नहीं भरते। 

- रवीन्द्र वाजपेयी



Monday, 31 August 2026

सवर्ण जेन जी भी चुनाव में बाजी पलट सकते हैं



देश में इन दिनों जो उथलपुथल है उसका कारण युवाओं से जुड़े मुद्दे हैं। यूजीसी अधिसूचना से शुरू विवाद नीट पेपर लीक होने के बाद और गहरा गया। इसी दौरान 12 वीं परीक्षा के मूल्यांकन की विसंगतियाँ भी सामने आ गईं। इनके कारण केंद्र सरकार और भाजपा को कटघरे में खड़ा होना पड़ गया। इस परिस्थिति का लाभ वैसे तो विपक्षी दलों को मिलना चाहिए था किंतु अचानक उभरी कॉकरोच जनता पार्टी ने नीट पेपर लीक के मुद्दे पर दिल्ली के जंतर मंतर पर आंदोलन करते हुए युवाओं को अपने पाले में खींचने में तात्कालिक तौर तो सफलता हासिल कर ही ली। यद्यपि युवाओं में केन्द्र सरकार के विरुद्ध गुस्से की शुरुआत यूजीसी की उस नियमावली से हुई थी जिसमें दलित और ओबीसी छात्रों के उत्पीड़न पर कड़े दण्ड का प्रावधान किया गया था। पहले उसमें केवल दलित वर्ग था किंतु नये नियमों में ओबीसी भी जुड़ने से सवर्ण छात्रों में गुस्से की लहर दौड़ गई। हालांकि उस नियमावली पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगा दी किंतु इसी बीच नीट  पेपर लीक होने से असंतोष का दायरा व्यापक हो गया। 22 छात्रों द्वारा आत्महत्या के कारण नीट मुद्दा यूजीसी विवाद पर भारी पड़ने लगा। कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन तो नीट पेपर लीक और धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र पर ही केंद्रित रहा। लेकिन उसके फ़ौरन बाद आरक्षण विरोधी आंदोलनकारियों ने भी जंतर मंतर पर शक्ति प्रदर्शन किया। हालांकि मुख्य धारा के मीडिया ने उसे खास महत्व नहीं दिया वहीं सरकार ने भी उसके प्रति उपेक्षा दिखाई। हालांकि इस आंदोलन के कारण सोशल मीडिया पर आरक्षण  विरोधी आवाजें तेज हो गईं। इसे यूजीसी विवाद का ही अगला चरण कहना गलत नहीं होगा। इस आंदोलन ने भी नीट परीक्षा में आरक्षण श्रेणी के छात्रों को कम अंकों के बावजूद मेडीकल कॉलेजों में प्रवेश मिलने  का मुद्दा उठाया। उल्लेखनीय है विभिन्न दलों ने जंतर मंतर  आंदोलन के प्रति तो समर्थन जताया परंतु आरक्षण विरोधी आंदोलन के प्रति   सहानुभूति दिखाने तक से परहेज किया। इन युवाओं में भाजपा के प्रति ज्यादा नाराजगी है क्योंकि सवर्ण जातियाँ उसकी परंपरागत समर्थक रही हैं। लेकिन चुनाव जीतने के लिए भाजपा भी दलित और पिछड़ी जातियों के बीच पैठ बढ़ाने में जुटी हुई है। उ.प्र और बिहार जैसे  राज्यों में भाजपा को मिली सफलता इसका प्रमाण है। इससे प्रभावित होकर काँग्रेस भी दलित और पिछड़ी जातियों को लुभाने में लग गई। राहुल गाँधी पूरे देश में घूम - घूमकर मनु स्मृति विरोधी अभियान चला रहे हैं। देश की दोनों प्रमुख पार्टियों द्वारा सवर्णों को भगवान भरोसे छोड़ दिये जाने से अब उनके मन में ये धारणा बैठती जा रही है कि उनका कोई हितचिंतक नहीं है। आरक्षण विरोधी आंदोलन के प्रति सभी राजनीतिक दलों का उपेक्षभाव इसका प्रमाण है। सर्वोच्च न्यायालय तक ने आरक्षण की सुविधा प्राप्त परिवारों को उसके दायरे से बाहर करने जैसी टिप्पणियां समय - समय पर कीं किंतु किसी राजनेता में उनका समर्थन नहीं किया। सभी पार्टियां आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था को जारी रखने की पक्षधर हैं। राहुल गाँधी तो एक कदम आगे बढ़कर मनु स्मृति के बहाने सवर्ण समाज को खलनायक साबित करने में जुटे हुए हैं। लेकिन इस खींचातानी में एक नया वर्ग संघर्ष ओबीसी और अनु. जातियों/ जनजातियों के  बीच दिखने लगा है। इसी के चलते ओबीसी आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाये जाने का दलित और आदिवासी वर्ग विरोध कर रहा है। बड़ी बात नहीं आने वाले समय में ओबीसी जातियों और दलित - आदिवासियों के बीच टकराव की स्थिति बनने लगे। इसी के साथ ये खतरा भी है कि ओबीसी में नये - नये जाति समूह उभरने से आरक्षण के बंटवारे को लेकर उनके बीच ही खींचातानी शुरू न हो जाए। कुल मिलाकर आरक्षण अब भारतीय राजनीति की मजबूरी बन गई है। किसी भी पार्टी या नेता में उसके विरोध में बोलने का साहस नहीं है। लेकिन इसके चलते सवर्ण जातियों के बीच जो नाराजगी बढ़ रही है उसकी चिंता भी की जानी चाहिए। सवर्ण छात्रों का ये कहना सही है कि उनकी समस्याओं को राजनेता जिस तरह उपेक्षित कर देते हैं उसके कारण उनके मन में समूची व्यवस्था के प्रति वितृष्णा बढ़ती जा रही है। देश से प्रतिभाओं के पलायन के पीछे आरक्षण भी बड़ा कारण है।  आजकल सभी पार्टियां जेन जी को खुश करने में लगी हैं। लेकिन उन्हें ये ध्यान रखना होगा कि चुनाव के दिन अशिकांश मतदाता सब भूलकर जाति को ही याद रखते हैं। ऐसे में सवर्ण जातियों के जेन जी की  नाराजगी भी जीत - हार में निर्णायक हो सकती है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 29 August 2026

अमेरिका में संघ विरोधी मुहिम के पीछे बड़ा षडयंत्र



रा.स्व.संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत इन दिनों अमेरिका की यात्रा पर हैं। संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर  समाज के विभिन्न वर्गों से सम्पर्क की योजना के सिलसिले में देश भर में संघ प्रमुख ने लोगों से प्रत्यक्ष संवाद किया। इनमें संघ की विचारधारा के विरोधियों के घर पर जाकर मिलने जैसा अभिनव कार्यक्रम भी था। इसके पीछे का उद्देश्य संघ की विचारधारा और कार्यक्रमों के बारे में उस तबके को अवगत करवाना है जिनके मन में संघ को लेकर अनेकानेक भ्रांतियां हैं। संघ इसमें कितना सफल हुआ ये तो भविष्य बताएगा किंतु इस प्रयास कहें या प्रयोग किंतु लोकतंत्र में इस तरह का संवाद एक स्वस्थ वातावरण का निर्माण करता है। उल्लेखनीय है संघ प्रमुख डॉ. भागवत पूर्व में भी मुस्लिम और ईसाई धर्मगुरुओं से भेंट करते रहे जिसे लेकर तरह - तरह की चर्चाएं भी चलीं। बीते दिनों जब दिल्ली में जंतर मंतर पर युवाओं का आंदोलन हुआ और देश में जेन जी नामक नये आयु वर्ग समूह के मन में व्यवस्था के विरुद्ध व्याप्त असंतोष राष्ट्रीय विमर्श बन गया तब भी डॉ. भागवत ने मुंबई में युवाओं से प्रत्यक्ष संवाद कर उनकी भावनाओं को समझकर उनके असंतोष को दूर करने के लिए उनके प्रति स्थापित अवधारणा और व्यवहार के तौर - तरीकों में समयानुकूल बदलाव का सुझाव दिया। इसी क्रम में वे अमेरिका प्रवास पर गए हैं जहाँ संघ के हजारों स्वयंसेवकों के अलावा हिन्दू समाज रहता है। अपने वैचारिक पक्ष को उसके सामने रखने के उद्देश्य से हो रही इस यात्रा का वहाँ कतिपय तत्व विरोध कर रहे हैं। सबसे पहले चर्चा में आया न्यूयॉर्क के महापौर  ममदानी का विरोध जो ऐलनिया भारत विरोधी हैं। उसके बाद अमेरिका के सरकारी आयोग ने  संघ पर प्रतिबंध लगाने और इसके नेताओं के अमेरिकी वीजा पर रोक की मांग की है। यह मांग अमेरिकी संस्था यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम  ने की है।आयोग ने संघ पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमलों में शामिल होने और भारत में धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित करने का आरोप लगाते हुए संघ नेताओं को राजनयिक सम्मान न देने, उच्चस्तरीय बैठकें न करने और डॉ.भागवत का वीजा रद्द करने की सिफारिश की गई है। हालांकि ये एक सलाहकार संस्था है, इसलिए इसकी सिफारिशें मानने के लिए अमेरिकी सरकार बाध्य नहीं है।भारत सरकार ने इस आयोग को पक्षपाती और तथ्यात्मक रूप से भ्रामक बताते हुए इसकी रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया है। लेकिन  जिस अमेरिका में खालिस्तान समर्थक आतंकवादियों को पनाह मिलती हो और जिसने दुनिया में इस्लामिक आतंकवाद को पाल पोसकर बड़ा किया वहाँ संघ का विरोध अनाधिकार चेष्टा लगता है। और फिर जिस आयोग ने इसकी मांग  की उसका अध्यक्ष ही पाकिस्तानी मूल का है। ये अच्छा है कि अमेरिका के भीतर ही संघ  विरोधी मुहिम की निंदा हो रही है। यद्यपि अमेरिकी प्रशासन ने उक्त माँग पर कोई निर्णय नहीं किया किंतु इससे ये बात स्पष्ट हो गई कि अमेरिका में भी हिंदुत्व विरोधी लाॅबी काफी तेजी से सक्रिय है। इस बारे में ध्यान देने योग्य बात ये है कि हाल ही में जन्मी काकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके भी कुछ माह पहले अमेरिका से लौटे थे और उन्होंने भी यहाँ आकर संघ विरोधी बयानबाजी की। इससे ये आशंका और मजबूत हो गई कि अमेरिका से ही भारत में अस्थिरता फैलाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। संघ प्रमुख की इस यात्रा के विरोध की शुरुआत जिस ममदानी ने की उसकी जीत पर भारत में भी उसी वर्ग विशेष ने खुशियाँ मनाई थीं जो संघ का घोर विरोधी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 27 August 2026

नेपाल हादसे का सबक : पहाड़ों को भी शांति और आराम चाहिए



       नेपाल में आये जलसैलाब ने प्रलय जैसा मंजर उत्पन्न कर दिया। वर्ष 2013 के जून महीने में उत्तराखंड स्थित केदारनाथ धाम में भी इसी तरह के दृश्य देखने मिले थे। उस हादसे में भी सैकड़ों लोग मारे गए थे। केदारनाथ मंदिर से और ऊपर पहाड़ों पर हुई भारी बरसात के कारण हुए हिम स्खलन से बनी बड़ी झील के फूटते ही  असीमित जलधारा ने केदारनाथ धाम सहित गौरीकुंड और उसके आगे तक भयावह दृश्य उत्पन्न कर दिये। जलसैलाब के रास्ते में जो कुछ भी आया वह पलक झपकते नष्ट हो गया।  हिमालय की विशाल पर्वतमाला में प्राकृतिक आपदाओं का आना नई बात नहीं है किंतु केदारनाथ हादसा अकल्पनीय था जिसकी याद तक रोंगटे खड़े कर देती है। गत दिवस नेपाल में जो कुछ भी हुआ उसे उसकी पुनरावृत्ति कहना गलत नहीं होगा। वहाँ भी सैकड़ों लोग मौत का शिकार हुए जिनमें भारत से गए मानसरोवर यात्रियों सहित दर्जनों  देशी - विदेशी  सैलानी भी शामिल हैं । हादसे की विभीषिका समाचार माध्यमों से आये चित्रों और वीडियो से अनुभव की जा सकती है। इस प्राकृतिक आपदा  से भारत को भी सतर्क हो जाना चाहिये क्योंकि हमारे पहाड़ी क्षेत्रों और नेपाल की भौगोलिक संरचना और पर्यावरण की स्थिति कमोबेश एक समान है। बिहार और उ.प्र की नदियों में अचानक आई बाढ़ इसका प्रमाण है। 
       
     पहाड़ों को हौसलों का प्रतीक कहा जाता है। उन तक पहुंचने की इच्छा पर्वतारोहियों के अलावा रोमांच प्रेमी पर्यटकों में भी देखी जाती है। अनेक तीर्थ स्थल पहाड़ों में स्थित हैं। ग्रीष्म काल में हिल स्टेशन भी सैलानियों से भर जाते  हैं। प्रकृति प्रेमियों , साहित्यकारों , कलाकारों और छायाकारों में  भी पहाड़ों के प्रति दीवानगी होती है। पर्वतीय स्थल  मानसिक शांति के साथ - साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक माने जाते हैं। एक समय था जब वहाँ ऋषि - मुनि तपस्या करते थे। जड़ी - बूटियों के खजाने भी पर्वतीय क्षेत्रों में होते थे।  ब्रिटिश राज में   पर्वतीय क्षेत्रों  तक जाने के लिए सड़कें और रेल मार्ग भी बने। शिमला तो अंग्रेजों की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी। हालांकि आजादी के बाद भी पर्यटन केंद्रों के रूप में तीर्थस्थलों के अलावा पर्वतीय स्थानों को विकसित किया गया।  मध्यमवर्गीय पर्यटक बढ़ने से पर्वतीय क्षेत्रों में बेतहाशा भीड़ होने लगी है। विकास के तौर पर  सड़कों और पुलों आदि का निर्माण भी बड़ी मात्रा में हुआ जिनके  लिए वृक्षों की कटाई और पहाड़ों की छटाई भी व्यापक तौर पर की गई । उत्तराखंड में टिहरी बांध जैसी परियोजना भी बनी । पनबिजली संयंत्रों के लिए नदियों के पानी को घुमाने सुरंगें बनाई गईं। इन सबका दुष्परिणाम धीरे - धीरे आने लगा । भूस्खलन , भूकंप , ग्लेशियरों का सिकुड़ना  आदि लक्षणों के जरिए प्रकृति ने चेतावनी देने का क्रम जारी रखा किंतु विवेकहीन विकास के साथ ही आमोद - प्रमोद के उद्देश्य से किए जाने वाले पर्यटन ने उन संकेतों के प्रति उपेक्षाभाव प्रदर्शित किया । यही कारण है कि  उत्तराखंड , हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर के जिन क्षेत्रों में मानवीय आवाजाही ज्यादा होती  हैं वहां पर्यावरण का संतुलन गड़बड़ा गया । पर्वतों  को क्षति पहुंचाए जाने से उनकी आधारभूत संरचना को जो नुकसान हुआ उसकी वजह से  प्राकृतिक आपदाएं जल्दी - जल्दी आने लगी है।
   
    नेपाल की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है जो पर्यटकों के अलावा पर्वतारोहियों की पसंदीदा जगह है। गत दिवस वहाँ जो प्रलय लीला हुई उसे  तात्कालिक संकट मान लेना बड़ी भूल होगी। ये हादसा आगाह करता  है कि पहाड़ों में मानवीय गतिविधियों पर नियंत्रण होना चाहिए।  वहाँ होने वाले निर्माण में  कितनी  भी तकनीकी कुशलता दिखाई जाए किंतु ये सोचना मूर्खता है कि प्रकृति को बांधकर रखा जा सकता है।  हर दुर्घटना के बाद प्रकृति और पर्यावरण सुरक्षा की बातें तो बहुत होती हैं लेकिन जो सुधार होना चाहिए उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया जाता । सही बात तो ये है कि पहाड़ों को भी शांति के साथ आराम चाहिए। इसलिये बेहतर हो पहाड़ों के क्रोध को शांत करने का उपाय तलाश लिया जाए वरना नेपाल जैसी विनाशलीला का सामना हमें भी कब करना पड़ जाए ये कोई नहीं जानता। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 26 August 2026

मिसाइलों के उत्पादन में निजी क्षेत्र की भागीदारी स्वागत योग्य



राजनीतिक उहापोह के बीच इस खबर ने ध्यान आकर्षित किया कि अब मिसाइलें बनाने का लाइसेंस  निजी कंपनियों को भी दिया जाएगा और डी. आर. डी. ओ (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ) उन्हें  तकनीक स्थानांतरित भी करेगा। लेकिन परमाणु अस्त्र ले जाने में सक्षम मिसाइलों के उत्पादन से निजी क्षेत्र को अलग ही रखा जाएगा। रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी हमारे देश में कुछ साल पहले ही शुरू हुई। हालांकि अमेरिका सहित अनेक विकसित देश इस नीति को काफी पहले अपना चुके थे जिसके कारण उन्हें जबर्दस्त लाभ हुआ ।  मसलन उत्पादन बढ़ने के साथ ही अन्य देशों को उनका निर्यात भी बढ़ा। भारत भी जो सैन्य सामग्री आयात करता है उसमें विदेशी निजी कंपनियों के उत्पाद भी काफी होते हैं। हमारे देश में रक्षा उत्पादन पर लंबे समय तक  सरकारी नियंत्रण रहने से तकनीक का विकास अपेक्षित गति से नहीं हो सका। डी. आर. डी. ओ ने अवश्य काफी अनुसंधान किये जिसका लाभ हमारे मिसाइल कार्यक्रम की सफलता के रूप में सामने आया भी। लेकिन सरकारी क्षेत्र होने से उत्पादन हेतु निर्धारित समय सीमा का पालन नहीं हो पाता। कई बार आर्थिक संसाधनों की कमी समस्या बन जाती है। तेजस जैसा छोटा लड़ाकू विमान विकसित करने में दशकों लग गए । हालांकि देश में रक्षा उत्पादन के दर्जनों शासकीय संस्थान हैं जिनमें लाखों लोग काम करते हैं। इनमें बनने वाले बम, तोपें, गन, सहित अन्य सैन्य उपकरणों का आजादी के बाद हुए सभी युद्धों में समुचित उपयोग हुआ। जरूरत के समय इन संस्थानों में दिन - रात काम चलता है। ऐसे में ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि रक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में निजी उद्यमियों को  भला क्यों प्रवेश दिया जा रहा है? लेकिन समय के साथ चलने के लिए जरूरी है कि रक्षा उत्पादन में विश्वस्तरीय आधुनिकतम तकनीक को अपनाया जाए जिससे  हमारी सेनाएं पूरी तरह से सक्षम हो सकें साथ ही रक्षा उत्पादन के वैश्विक बाजार में भारत भी अपना स्थान बना सके। उल्लेखनीय है कि ब्रह्मोस मिसाइल सहित अनेक रक्षा उत्पादनों के निर्यात में भारत को बड़ी सफलता मिलने के बाद से इस दिशा में विचार शुरू हुआ। यद्यपि राजनीतिक खींचतानी और श्रमिक संगठनों के दबाव के कारण समय रहते  इस दिशा में नीतिगत निर्णय लेने का साहस सरकारी स्तर पर प्रदर्शित नहीं किया जा सका किंतु वर्तमान केंद्र सरकार ने एक तरफ जहाँ सेनाओं को सुसज्जित करने के लिए दुनिया भर से रिकार्ड तोड़ खरीदी की वहीं मेक इन इंडिया की नीति को उपभोक्ता वस्तुओं तक सीमित नहीं रखते हुए रक्षा उत्पादन के क्षेत्र तक उसका विस्तार कर दिया। इसके प्रारंभिक परिणाम अच्छे निकलने के कारण उसका उत्साह बढ़ा और धीरे - धीरे इसका दायरा बढ़ाते हुए मिसाइलों सहित अनेक संवेदनशील उपकरणों के उत्पादन लिए निजी क्षेत्र को अनुमति दे दी। डी. आर. डी. ओ द्वारा किये गए अनुसंधान को निजी क्षेत्र को देने का लाभ ये होगा कि इस काम में लगने वाला समय और संसाधन बच जाने से ये कंपनियां शीघ्रता से अपना उत्पादन शुरू कर सकेंगी। इस नीति का दोहरा लाभ ये होगा कि एक तरफ तो हमारे निर्यात में वृद्धि होगी वहीं दूसरी तरफ इन कंपनियों द्वारा उत्पादित जो भी सैन्य सामग्री हमारे लिए आवश्यक होगी उसका आयात नहीं करना पड़ेगा जिससे बेशमीमती विदेशी मुद्रा की बचत होने से व्यापार घाटा कम होगा साथ ही भारतीय रुपये के विनिमय मूल्य में भी सुधार होगा। यद्यपि विपक्ष खास तौर पर राहुल गाँधी जैसे नेता इस नीति पर हाय तौबा मचाये बिना नहीं रहेंगे क्योंकि जिन निजी कंपनियों के नाम सामने आये हैं उनमें अंबानी और अडानी की भी हैं जिनके विरोध में वे रोजाना कुछ न कुछ बोलते रहते हैं। लेकिन सरकार को इन सबसे विचलित हुए बिना आगे बढ़ना चाहिए। अभी तक जिन निजी कंपनियों को रक्षा उत्पादन के लिए लाइसेंस दिये गए उन सबका प्रदर्शन और उपलब्धियां उत्साह बढ़ाने वाली हैं। और फिर जब भारत में निजी क्षेत्र के उद्यमी उपग्रह प्रक्षेपण जैसे कारनामे सफलतापूर्वक कर सकते हैं तब मिसाइल और ऐसे ही अत्याधुनिक रक्षा उपकरण बनाने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होगी। साथ ही इसके चलते भारत की छवि दुनिया के पटल पर  एक विकसित और ताकतवर  देश के रूप में स्थापित होगी जिसके कारण विदेशी निवेशक भी आकर्षित होंगे। बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन में प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता कितनी आवश्यक है ये प. एशिया के वर्तमान संकट ने साबित कर दिया। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 25 August 2026

ब्रिक्स सम्मेलन के पहले कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन खतरे का संकेत



कॉकरोच जनता पार्टी ने धमकी दी है कि वह आगामी 5 सितंबर को दिल्ली के इंडिया गेट से पुलिस मुख्यालय तक मार्च निकालेगी। इसका नेतृत्व नीट पेपर लीक के कारण आत्महत्या करने वाले छात्रों के अलावा उन प्रदर्शनकारियों के परिजन करेंगे जिन पर जंतर मंतर आंदोलन के दौरान अपराधिक मामले दर्ज हुए हैं। पार्टी का कहना है कि  आंदोलन  जिन शर्तों पर समझौता हुआ था उनमें आत्महत्या पीड़ित परिवारों को मुआवजा और संसद भवन मार्च के दौरान  प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध दर्ज अपराधिक प्रकरण वापस लिया जाना भी था। लेकिन उक्त दोनों पूरी नहीं हुईं ।  उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार स्पष्ट कर चुकी है कि वह देख रही है कि मुआवजा किस प्रावधान के अंतर्गत दिया जा सकता है क्योंकि देश में हर साल अनेक छात्र विभिन्न कारणों से आत्महत्या करते हैं। इसलिए ये मुआवजा नजीर न बन जाए इसका ध्यान रखना भी जरूरी है। वैसे भी ऐसे मामलों में नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ता है जिनमें समय लगता है। और फिर आत्महत्या के मामले अलग - अलग राज्यों में होने के कारण स्थानीय प्रशासन की रिपोर्ट भी जरूरी होती है। इसी तरह  अपराधिक प्रकरण रद्द करने संबंधी आश्वासन के समय कॉकरोच जनता पार्टी ने खुद कहा था कि पुलिस पर हुए हमले और  सरकारी वाहनों में  तोड़फ़ोड़ उन अपराधी तत्वों द्वारा की गई जो छात्र बनकर आंदोलन में घुस आये थे। अतः उन पर कार्रवाई की जा सकती है। दिल्ली पुलिस ने भी अपनी प्रारंभिक जाँच रिपोर्ट में कहा कि  हिंसक उपद्रव करने वाले सैकड़ों प्रदर्शनकारियों का अपराधिक रिकार्ड है, जो छात्र नहीं हैं।  सर्वोच्च न्यायालय भी कह चुका है पुलिस पर हमला करने वालों के विरुद्ध प्रकरण दर्ज किये जा सकते  हैं। ऐसा लगता है कॉकरोच जनता पार्टी बहुत जल्दबाजी में है क्योंकि जंतर मंतर आंदोलन में हुए गाली - गलौच और अश्लीलता के प्रदर्शन की वजह से उसकी काफी आलोचना हुई। वहीं  रांची आंदोलन अपने अनुशासन और शालीनता के लिए प्रशंसित हुआ। इसके अलावा कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं को अनेक स्थानों पर विरोध का सामना करना पड़ा। राजस्थान में तो उनकी पिटाई तक हो गई। उनकी उम्मीद के मुताबिक देश भर में युवा आंदोलन भी नहीं खड़ा हो रहा। धर्मेंद्र प्रधान के हटने के बाद छात्रों में पैदा किया गुस्सा भी ठंडा पड़ गया। ये देखते हुए पार्टी ने  5 सितंबर को दिल्ली में मार्च निकालने की जो धमकी दी उसका समय जान बूझकर ऐसा रखा गया जिससेे केंद्र सरकार दबाव में आ जाए। इसका कारण 12 - 13 सितंबर को दिल्ली में होने जा रहा ब्रिक्स सम्मेलन है जिसमें चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति पुतिन सहित 20 देशों के शीर्ष नेताओं का आगमन संभावित है। भारत इसकी मेजबानी कर रहा है। इसलिए सरकार किसी भी सूरत में दिल्ली की शांति - व्यवस्था भंग नहीं होने देना चाहेगी। जंतर मंतर आंदोलन के कड़वे अनुभव के बाद कॉकरोच जनता पार्टी पर भरोसा करना भी भूल होगी। किसी भी अंतर्राष्ट्रीय आयोजन के पहले माहौल तनावपूर्ण होने पर विदेशी मेहमान अपना आगमन टाल सकते हैं । इसीलिए दिल्ली पुलिस सहित अन्य  एजेंसियां भी अभी से सुरक्षा प्रबंधों में जुट चुकी हैं। कॉकरोच जनता पार्टी इस बात से अनभिज्ञ हो ऐसा नहीं है। लेकिन उसके नेताओं का सार्वजनिक व्यवहार बेहद गैर जिम्मेदाराना है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि उनमें वैसा ही अहंकार आ गया है जैसा कुछ साल पहले तक अरविंद केजरीवाल में देखा जाता था जो प्रधानमंत्री  को चुनौती देते हुए कहते थे कि इस जन्म में तो वे आम आदमी पार्टी को नहीं हरा पाएंगे। और फिर अभी तक अभिजीत दिपके और उनकी टीम यही तय नहीं कर सकी कि उनकी दिशा क्या है? यदि वे 5 सितंबर के प्रदर्शन के लिए अड़ते हैं तब ये संदेह और पक्का हो जाएगा कि उनकी पीठ पर उन विदेशी शक्तियों का हाथ है जो भारत में अराजकता फैलाकर आंतरिक सुरक्षा को खतरे में डालना चाहती हैं। वरना ब्रिक्स जैसे बेहद महत्वपूर्ण वैश्विक सम्मेलन के एक सप्ताह पूर्व दिल्ली  में ऐसा कुछ करने की क्या जरूरत आ गई जिससे कि कानून व्यवस्था बनाये रखने की समस्या उत्पन्न हो। ऐसे आयोजनों की सफलता देश की प्रतिष्ठा बढ़ाती है। लेकिन ऐसा लगता है कॉकरोच जनता पार्टी को उसकी लेश मात्र चिंता नहीं है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 24 August 2026

पहले जनेऊधारी कश्मीरी ब्राह्मण होने का दावा और अब मनु स्मृति का विरोध



वर्ष 2017 के नवंबर माह में  राहुल गाँधी सोमनाथ मंदिर में दर्शन हेतु गए तब वहाँ अतिथि पुस्तिका में उनका नाम गैर हिन्दू के तौर पर दर्ज  किया गया। उस समय  गुजरात विधानसभा के चुनाव चल रहे थे। श्री गाँधी का नाम गैर हिन्दू के रूप में दर्ज होने की जानकारी सार्वजनिक होते ही कांग्रेस  में ये भय व्याप्त हो गया कि इसके कारण गुजरात में हिंदुओं के बीच पार्टी का रहा - सहा जनाधार भी खिसक न जाए। इसलिए फ़ौरन बचाव अभियान शुरू हुआ। राहुल खुद तो नहीं बोले किंतु कांग्रेस की ओर से रणदीप सुरजेवाला ने पत्रकार वार्ता में  श्री गाँधी का नाम गैर हिन्दू बताये जाने को भाजपा की साजिश बताते हुए कहा कि वे कश्मीरी ब्राह्मण हैं और उनका गोत्र दत्तात्रेय है ।  उन्होंने राहुल के जनेऊधारी होने का दावा करते हुए  प्रमाण स्वरूप कुछ चित्र भी जारी किये गए जिनमें स्व. राजीव गाँधी की अस्थियाँ संचय करने के दौरान उन्हें जनेऊ धारण किये दिखाया गया है। एक अन्य चित्र में वे अपनी बहिन प्रियंका के विवाह के मौके पर भी जनेऊ में दिखे। उसके बाद श्री गाँधी को न सिर्फ हिन्दू अपितु ब्राह्मण साबित करने के योजनाबद्ध प्रयास भी होने लगे।  पुष्कर में भी श्री गाँधी ने खुद को कश्मीरी ब्राह्मण और  गोत्र दत्तात्रेय लिखवाया। फिर  शिव भक्त बताते हुए मानसरोवर की यात्रा पर गए। हालांकि लौटते समय उन्होंने चीनी सरकार के प्रतिनिधियों से मुलाकात भी की जिसके बारे में कोई खुलासा नहीं हुआ। उसके पहले डोलकाम में चीन के साथ चल रहे टकराव के समय वे नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास भी गए जिसके बारे में न तो उन्होंने कुछ बताया और न ही कांग्रेस पार्टी ने। स्मरणीय है राजीव गाँधी फाउंडेशन को चीन से मिलने वाला अनुदान भी काफी चर्चाओं में रहा। बहरहाल, हिंदुओं विशेषतः भाजपा के पक्के समर्थक माने जाने वाले सवर्ण मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए राहुल को ब्राहमण साबित करने का अभियान आगे भी जारी रहा जिसके अंतर्गत वे हिन्दू मंदिरों और मठों में मत्था टेकने के साथ ही पूजा - अनुष्ठान भी करते देखे गए। लेकिन उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली जिसका कारण उनकी जाति और धर्म को लेकर व्याप्त अनिश्चितता है। स्मरणीय है उनके दादा पारसी थे। उस आधार पर उनका धर्म भी वही माना जाता है । इसलिए जब  श्री गाँधी ने जनेऊधारी कश्मीरी ब्राह्मण होने का दावा किया तब जनमानस में उसे मान्यता नहीं मिली जिसका प्रमाण काँग्रेस की पराजय का सिलसिला जारी रहना है। यहाँ तक कि राहुल को 2019 के लोकसभा चुनाव में अपनी पुश्तैनी सीट अमेठी से भी हार का सामना करना पड़ा जहाँ के ब्राह्मण नेहरू - गाँधी परिवार के स्थायी समर्थक थे। उसी के बाद श्री गाँधी का ब्राह्मण प्रेम ढलान पर आ गया। और वे जातियों के गुणा - भाग में जुट गए। जातिगत जनगणना के अलावा नौकरियों में जातियों की संख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व का मुद्दा उन्होंने उठाया किंतु 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली सीमित सफलता से बढ़ा उनका उत्साह  हरियाणा , महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार और प. बंगाल के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के दयनीय प्रदर्शन से ठण्डा पड़ गया। और तभी से उन्होंने सपा - बसपा और वामपंथियों की नकल करते हुए मनुवाद और ब्राह्मणवाद पर हमले शुरू किये जिसका ताजा प्रमाण बीते पिछले दिनों पुणे में आयोजित छात्राओं के एक जलसे में मिला। जहाँ उन्होंने मनु स्मृति के एक हिस्से में लड़कियों के पिता, पति और बेटों के अधीन रहने की व्यवस्था की आलोचना करते हुए उपस्थित छात्राओं को पितृ सत्तात्मक सोच से मुक्त होने की सलाह दी। वे बिना मनु स्मृति को उद्धृत किये भी लड़कियों को आत्मनिर्भर होने के लिए प्रेरित कर सकते थे किंतु उन्होंने मनु स्मृति को कठघरे में खड़ा किया जिसका उद्देश्य सीधे - सीधे दलित और पिछड़ी जातियों में उच्च जातियों के प्रति विद्वेष का भाव उत्पन्न करना था। लेकिन जिस तरह राहुल का जनेऊधारी कश्मीरी ब्राह्मण होने का स्वांग जनता को रास नहीं आया उसी तरह मनु स्मृति को गाली देकर दलित और पिछड़े वर्ग को आकर्षित करने का ये दाँव भी बेअसर ही रहेगा। इसकी वजह ये है कि जिस तरह उनके ब्राह्मण होने में बनावटीपन था वही मनुवाद के विरोध में भी है। सही बात तो ये है कि श्री गाँधी आगामी उ.प्र और पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को दोबारा खड़ा करने हाथ - पाँव मार रहे हैं। लेकिन उ.प्र में जहाँ भाजपा विरोधी दलित और पिछड़ा वर्ग के अलावा मुस्लिम भी कांग्रेस के बजाय अखिलेश यादव और मायावती के प्रभाव में हैं वहीं पंजाब में कांग्रेस की आपसी लड़ाई उसकी संभावनाओं पर ग्रहण लगा रही है। बेहतर हो श्री गाँधी हिन्दू समाज में फूट डालकर चुनाव जीतने का ख्वाब छोड़ दें। वैसे भी हर चुनावी हार के बाद उनका मुद्दा बदलता रहता है। इसीलिए लंबे समय से किसी ने उनके मुँह से वोट चोरी नहीं सुनी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी