Friday, 22 May 2026

कोरोना से भी बड़े संकट में फंस गई दुनिया


प. एशिया में चल रही जंग अब दिशाहीन होती जा रही है। अमेरिका और इसराइल की ये सोच पूरी तरह गलत साबित हुई कि वे ईरान को कुछ ही दिनों में घुटनाटेक करवा लेंगे। शुरुआत में ही उसके सर्वोच्च नेता खामेनेई को मारने में कामयाब होने से उनका हौसला काफी बुलंद हुआ था। लेकिन ईरान के जवाबी हमलों ने सारे समीकरण उलट दिए। सबसे बड़ी बात ये हुई कि उसने अमेरिकी युद्धपोतों और लड़ाकू विमानों के अलावा इज़राइल को ही निशाना नहीं बनाया अपितु सऊदी अरब, ओमान, कतर और यू.ए.ई पर भी मिसाइलें दाग दीं क्योंकि इनमें अमेरिकी सैन्य अड्डों के अलावा पश्चिमी देशों का काफी पूंजी निवेश हैं। इसी के साथ ही ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य नामक समुद्री मार्ग को बंद कर दिया। परिणामस्वरूप युद्ध का क्षेत्र तो फैला ही पूरी दुनिया में कच्चे तेल और गैस की किल्लत होने लगी। इसीलिए इस लड़ाई को दूर से देख रहे देशों के हित भी इससे जुड़ गए। ईरान भी समझ गया कि इस लड़ाई में पूरी तरह जीतना तो संभव नहीं है अतः उसने होर्मुज को बतौर ट्रम्प कार्ड उपयोग करते हुए पूरे युद्ध को नया मोड़ दे दिया। इसका असर ये हुआ कि उसके परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने के बजाय अमेरिका की चिंता होर्मुज पर आकर अटक गई। ईरान ने उससे गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलने का फैसला करने के साथ कुछ चुनिन्दा देशों को ही उसकी अनुमति दी। इससे अमेरिका भन्ना गया और उसने वहां अपने युद्धपोत तैनात कर ये संकेत दिया कि वह इस समुद्री मार्ग पर ईरान का आधिपत्य खत्म कर देगा। साथ ही टोल चुकाकर आने वाले जलपोतों पर कार्रवाई की धमकी दे डाली। पाकिस्तान की मध्यस्थता में आयोजित ईरान - अमेरिका की शान्ति वार्ता भी विफल हो गई। हालांकि कहने को तो युद्धविराम चल रहा है लेकिन एक तरफ जहां इसराइल ने लेबनान पर हमले जारी रखे हैं वहीं दूसरी तरफ ईरान भी कभी ओमान तो कभी यू.ए.ई पर बारूदी वर्षा करने बाज नहीं आ रहा। इसी के साथ खाड़ी के ज्यादातर देशों ने हथियारों की खरीददारी बढ़ाकर युद्ध के लंबा खिंचने की आशंका को बढ़ावा दिया है। एक बात और भी उल्लेखनीय है कि सऊदी अरब ने पाकिस्तान के हजारों सैनिक किराए पर लेने के साथ ही लड़ाकू विमान भी अपने यहां तैनात करवाए हैं। दरअसल सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच ये संधि हुई है कि किसी एक पर हमला दोनों पर माना जाएगा। मौजूदा जंग में ईरानी मिसाइलों ने सऊदी अरब को काफी नुकसान पहुंचाया है। उस दृष्टि से तो पाकिस्तानी  सेना और लड़ाकू विमानों की सऊदी अरब में तैनाती स्वाभाविक है। लेकिन इसमें एक विरोधाभास ये भी है कि एक तरफ तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख ईरान और अमेरिका के बीच समझौता करवाने के लिए हाथ - पांव मारते हुए दोनों ओर के शांति प्रस्तावों को इधर से उधर पहुंचाने की मशक्कत में जुटे हुए हैं और दूसरी तरफ वह सऊदी अरब को अपने सैनिकों और लड़ाकू विमानों की सेवाएं देकर ईरान के विरोधी पाले में खड़ा हो गए। हालांकि शांति वार्ता का मंच सजाकर खुद को कूटनीति का उस्ताद समझने वाले पाकिस्तान को ईरान और अमेरिका दोनों फटकार लगाते रहते हैं। मौजूदा स्थिति में ईरान और अमेरिका दोनों के बीच समझौते की गाड़ी कहां तक पहुंची ये कोई नहीं बता सकता किंतु इस उहापोह के कारण पूरी दुनिया हलाकान है। पेट्रोल - डीजल और गैस के बिना आज के जीवन की कल्पना असंभव है। युद्ध की शुरुआत में सभी को लगा कि हफ्ते दो हफ्ते में ये जंग रुक जाएगी लेकिन तीन महीने  के बाद भी इस मसले का कोई हल दूरदराज तक नजर नहीं आ रहा।  हालांकि सही बात ये भी है कि ईरान और अमेरिका दोनों को ये समझ नहीं आ रहा कि सम्मानजनक तरीके से कैसे अपनी गर्दन निकालें। डोनाल्ड ट्रम्प थोड़ा ठण्डे पड़ते हैं तो सऊदी अरब सहित खाड़ी के अन्य देश उन पर दबाव डालते हैं कि ईरान को घायल छोड़कर न जाएं। ताजा खबर ये है कि इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू और ट्रम्प के बीच भी तनातनी हो गई है। आज किसी की समझ में ये नहीं आ रहा कि इस जंग को खत्म कैसे करें क्योंकि दोनों पक्ष अपने को पराजित मानने के लिए तैयार नहीं हैं। साथ ये भी अनुभव हो रहा है कि जंग की शुरुआत जिस भी उद्देश्य से हुई हो किंतु अब वह उद्देश्यविहीन होकर रह गई है। अमेरिका और इसराइल यदि ईरान को झुकाने में सफल नहीं हुए तो ईरान भी अपनी बर्बादी को रोकने में नाकामयाब हुआ। दुर्भाग्य से संरासंघ पूरी तरह नकारा हो गया है। भले ही इसे विश्व युद्ध न कहा जाए लेकिन इसके कारण पूरा विश्व परेशान हो उठा है। आज की स्थिति में ये युद्ध कहां जाकर रुकेगा कहना मुश्किल है किंतु कोरोना महामारी से किसी तरह उबर रही दुनिया उससे भी बड़े संकट में फंस गई है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 21 May 2026

राहुल की विदेश यात्राओं का ब्यौरा भी सार्वजनिक हो


लोकतंत्र में विपक्ष द्वारा सत्ता पक्ष की आलोचना अस्वाभाविक नहीं होती। सरकार की गलतियों को उजागर करना उसका कर्तव्य माना जाता है। सत्ता पक्ष को  जहां मतदाता देश चलाने की जिम्मेदारी सौंपते हैं वहीं विपक्ष से अपेक्षा की जाती है कि वह जनता की तकलीफों को सत्ता पक्ष की जानकारी में लाते हुए उन्हें दूर करने के लिए सुझाव दे। भारत में  ये परम्परा शुरुआत से ही कायम रही। जब कांग्रेस के पास विशाल बहुमत होता था , तब भी संसद में मुट्ठी भर विपक्षी सांसद नेहरू सरकार को जमकर घेर लेते थे। इंदिरा जी के शासन में भी कम संख्याबल के बावजूद विपक्ष ने हमलावर रवैया जारी रखा। उनकी  हत्या के पश्चात राजीव गांधी को ऐतिहासिक बहुमत तो मिल गया किंतु विपक्षी घेराबंदी के चलते वे महज पांच साल बाद अलोकप्रिय होकर सत्ता से हाथ गंवा बैठे और 1991 में आज ही के दिन तमिलनाडु में  श्रीलंका के आतंकवादी संगठन लिट्टे ने उनकी हत्या करवा दी। धीरे - धीरे विपक्ष संसद में ताकतवर होता गया और मिली - जुली सरकारों का दौर आया जो 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर रुका। यद्यपि 2024 में बहुमत से पीछे रहने के बाद श्री मोदी को भी मिली - जुली सरकार चलानी पड़ रही है किंतु उनकी शख्सियत इतनी बड़ी  है कि सहयोगी दल भी दबाव डालने से बचते हैं। और फिर लोकसभा के बाद हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा और एनडीए के शानदार प्रदर्शन से केंद्र सरकार के स्थायित्व को लेकर व्यक्त की जाने वाली आशंकाएं अपनी मौत मरती गईं ।  विशेष रूप से महाराष्ट्र, बिहार और प. बंगाल में भाजपा ने जिस धमाकेदार अंदाज में वापसी की उसके कारण विपक्ष की दशा और दिशा दोनों बिगड़ चुकी हैं। प्रधानमंत्री की हालिया विदेश यात्रा को लेकर जिस तरह के तंज कसे जा रहे हैं उनसे इसकी पुष्टि हो जाती है। सबसे पहले कहा गया कि जनता को पेट्रोल - डीजल का खर्च घटाने और एक वर्ष तक  विदेशों में सैर - सपाटा टालने की नसीहत देने के बाद वे खुद कई देशों की यात्रा पर निकल गए। उसके बाद नॉर्वे की एक महिला पत्रकार के सवाल का जवाब नहीं देने पर प्रधानमंत्री के चिरपरिचित विरोधी उनको घेरते हुए भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर खतरे का ढोल  पीटा जाने लगा। और फिर इटली की प्रधानमंत्री को  टॉफी देने वाले चित्र पर हल्ला मचा। ध्यान देने योग्य बात ये है कि प्रधानमंत्री के विदेश दौरे आनन - फानन में तय नहीं होते। महीनों पूर्व अधिकारी स्तर पर इसकी तैयारी होती है जिसमें बातचीत के मुद्दे और समझौतों का प्रारूप तैयार किया जाता है। उस दृष्टि से देखें तो यूएई से प्रारंभ और इटली में संपन्न अपनी यात्रा के दौरान श्री मोदी ने जो समझौते हस्ताक्षरित किये यदि वे देश हित के विरुद्ध हों तब विपक्ष को आलोचना करने का पूरा अधिकार है। लेकिन इस मामले में वह खाली हाथ है। जहां तक बात नॉर्वे की महिला पत्रकार के सवाल का जवाब नहीं देने की तो न सिर्फ विपक्ष अपितु मोदी विरोधी गैंग के रूप में कुख्यात हो चुके यू ट्यूबर इस मुद्दे पर बिना सच्चाई जाने प्रधानमंत्री पर हमलावर हो गए। लेकिन जल्द ही उन्हें शर्मसार होना पड़ा जब उक्त महिला पत्रकार की बेहूदगी का पर्दाफाश हो गया। जिस अवसर पर उसने श्री मोदी से सवाल पूछा उसमें पत्रकारों से चर्चा का कार्यक्रम नहीं था। बाद में भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने पत्रकार वार्ता में उस महिला पत्रकार को प्रश्न पूछने का अवसर देते हुए उसका उत्तर देने की पेशकश की तब वह उठकर चली गई। अब उसके अपने देश में हुई उसकी जमकर किरकिरी हो रही है और भारत में प्रधानमंत्री को मीडिया विरोधी और प्रेस की आजादी को खतरे में बताने वाले मुंह छिपाते फिर रहे हैं। यही स्थिति इटली की प्रधानमंत्री के साथ उनके चित्र के बारे में है। जिसे लेकर अनर्गल टिप्पणियां की जा रही हैं। गत दिवस लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने तो प्रधानमंत्री के प्रति गद्दार शब्द का प्रयोग कर एक बार साबित कर दिया कि आयु की आधी शताब्दी पार करने के बाद भी वे परिपक्वता के कोसों दूर हैं। कांग्रेस की वर्तमान दुरावस्था के लिए उनका यही गैर जिम्मेदाराना आचरण जिम्मेदार है। यदि उनमें तनिक भी साहस है तो वे अपनी गोपनीय विदेश यात्राओं का ब्यौरा देश के सामने रखें। प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा का तो पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध रहता है किंतु कैबिनेट मंत्री का दर्जा और उच्च स्तरीय सुरक्षा प्राप्त श्री गांधी की चंद विदेश यात्राओं को छोड़कर ज्यादातर पूरी तरह गोपनीय क्यों रहती हैं इसका खुलासा भी उन्हें करना चाहिए।  लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि उससे बहुत सारी वे बातें सामने आ जाएंगी जिन पर पर्दा पड़ा हुआ है। ऐसा लगता है प. बंगाल में भाजपा की जीत विपक्ष और माेदी विरोधी गिरोह को बर्दाश्त नहीं हो रही। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 20 May 2026

ट्रम्प को चिढ़ाने और डराने वाली है पुतिन की चीन यात्रा

ट्रम्प को चिढ़ाने और डराने वाली है पुतिन की चीन यात्रा 


कूटनीति कभी न रुकने वाली प्रक्रिया है। दुनिया में चाहे युद्ध हो रहा हो या शांति सबके मूल में कूटनीति ही होती है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया दो वैचारिक गुटों में बंट गई थी जिनमें पूंजीवाद समर्थक देश अमेरिका और साम्यवादी शासन व्यवस्था वाले सोवियत संघ के नेतृत्व में एकजुट हो गए। हालांकि एक तीसरा धड़ा भी बना जिसे गुट निरपेक्ष आंदोलन कहा गया जिसकी शुरुआत भारत, इंडोनेशिया , घाना , युगोस्लाविया और मिस्र ने की और कालान्तर में 100 से ज्यादा देश इसमें शामिल हो गए। इस धड़े ने अपने को अमेरिका और सोवियत संघ के बीच चले शीतयुद्ध से  दूर रखा। यद्यपि इसमें शामिल देशों को दोनों महाशक्तियों से संबंध रखने की छूट थी किंतु आश्चर्य की बात है कि युगोस्लाविया साम्यवादी देश होने के बावजूद उसके नेता मार्शल टीटो सोवियत संघ से दूरी बनाए रखते थे जबकि भारत और अमेरिका के रिश्ते सदैव अविश्वास में उलझे रहे। 1949 में चीन में भी साम्यवादी क्रान्ति होने के बाद माओ त्से तुंग वैश्विक परिदृश्य पर क्रांति के प्रतीक बनकर उभरे। लेकिन उन्होंने भी सोवियत संघ के आधिपत्य को स्वीकार करने के बजाय अपना अलग रास्ता चुना। 1972 तक चीन दुनिया से अलग - थलग माओ द्वारा बनाए गए लौह आवरण में सिमटा रहा। उसे संरासंघ की सदस्यता से भी वंचित रखा गया किंतु 1972 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन चीन की यात्रा पर जा पहुंचे और अनेक समझौते करते हुए व्यापार के अलावा सांस्कृतिक और शैक्षणिक आदान - प्रदान के दरवाजे खोल दिए। स्मरणीय है 1971 में साम्यवादी चीन को संरासंघ की सदस्यता के साथ ही सुरक्षा परिषद में वीटो का अधिकार भी मिल चुका था जो उसके पहले तक ताईवान के पास रहा। उसके बाद से चीन वैश्विक राजनीति और व्यापार की मुख्यधारा में शामिल होने लगा और देखते ही देखते वह अमेरिका के बाद सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने के साथ ही सैन्य क्षमता और  तकनीकी ज्ञान में दुनिया से आगे निकलने लगा। साम्यवादी विचारधारा उसकी एकदलीय शासन प्रणाली में तो परिलक्षित होती है किंतु शी जिनपिंग का चीन , माओ त्से तुंग और चाऊ एन लाई के दौर से बहुत आगे आकर पूंजी आधारित आर्थिक विकास की प्रतिस्पर्धा में आगे निकलता दिखता है। दुनिया भर में उसने निवेश कर रखा है। अमेरिका जैसे संपन्न देश में भी चीनी पूंजी का दबदबा है। यही वजह है कि कभी अफीमचियों के लिए बदनाम चीन आज विकास का जीवंत प्रतीक बन चुका है। हालांकि विस्तारवाद और कुटिलता जैसे अपने मूल स्वभाव को उसने नहीं छोड़ा और इसलिए ज्यादातर पड़ोसी देश उसके प्रति सदैव सशंकित रहते हैं। बावजूद इसके चीन  वैश्विक राजनीति और व्यापार के क्षेत्र में बड़े खिलाड़ी के तौर पर उभरा है। इसका ताजा प्रमाण है अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गत सप्ताह चीन की यात्रा की। यद्यपि ट्रम्प जो सोचकर गए थे वैसा कुछ भी नहीं हुआ। न तो चीन ने उनके व्यापार प्रस्तावों को भाव दिया और न ही ईरान युद्ध रुकवाने में सहायता का आश्वासन । उलटे ताईवान पर कब्जा करने की अपनी मंशा व्यक्त करते हुए ट्रम्प को आगाह कर दिया कि वे इस मसले से दूर ही रहें। पूरी दुनिया में ये बात फैल चुकी है कि जिनपिंग ने ट्रम्प को खाली हाथ लौटने मजबूर कर विश्व राजनीति में चीन के दबदबे को कायम रखा। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। ट्रम्प के बीजिंग से जाने के कुछ दिन बाद ही रूस के राष्ट्रपति पुतिन चीन जा पहुंचे। हालांकि उसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच हुई सहयोग और संधि की रजत जयंती का आयोजन है । लेकिन सच्चाई ये है कि पुतिन की यह बीजिंग यात्रा दरअसल अमेरिका के विरुद्ध मोर्चेबंदी को मजबूत करने के लिए हो रही है। उल्लेखनीय है यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद अमेरिका के नेतृत्व में उसके समर्थक देशों ने रूस पर प्रतिबंध थोप दिए तब चीन और भारत ने तटस्थ रहकर पुतिन का हौसला बढ़ाया। और बड़ी  मात्रा में कच्चा तेल खरीदकर रूस की अर्थव्यवस्था को टेका लगाए रखा। प . एशिया में चल रहे युद्ध में चीन और रूस खुलकर ईरान के साथ हैं। वहीं भारत ने भी अपने हितों के अनुरूप संतुलित नीति अपना रखी है। अब जबकि ट्रम्प इस युद्ध में बुरी तरह उलझ चुके हैं तब चीन और रूस का एक साथ आना किसी बड़ी कूटनीतिक पहल का संकेत है। गौरतलब है कि ये दोनों ब्रिक्स नामक संगठन के संस्थापक सदस्य हैं जिसकी अध्यक्षता इस साल भारत के पास है। सितम्बर में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन के लिए पुतिन भारत आने वाले हैं। इस प्रकार ट्रम्प के बीजिंग से लौटते ही पुतिन का वहां पहुंचना महज औपचारिक उपस्थिति न होकर बड़ा कूटनीतिक दांव है जिसका उद्देश्य ट्रम्प को चिढ़ाने के साथ ही डराना भी है। उल्लेखनीय है भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अनेक देशों की ताबड़तोड़ यात्रा करके अमेरिका को संकेत दे दिया है कि दुनिया अब उसके इशारों पर चलने वाली नहीं है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 19 May 2026

मुसलमानों की राजनीतिक उपयोगिता ढलान पर


सड़क पर नमाज पढ़ने को लेकर प. बंगाल और उ.प्र में हुए विवाद  के बीच ये मुद्दा एक बार गरमाने लगा है। प. बंगाल में हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव के बाद जो सरकार बनी वह भी उ.प्र की योगी सरकार की तरह तुष्टीकरण से परहेज करने की राह पर चल पड़ी है। कोलकाता सहित अन्य शहरों में जो अवैध निर्माण और दुकानें हटाई जा रही हैं उनके बारे में कहा जा रहा है कि वे  बांग्लादेशी घुसपैठियों के अलावा रोहिंग्या मुस्लिमों के थे। हावड़ा और सियालदाह रेलवे स्टेशन पर तो इन तत्वों का कब्जा ही था। हावड़ा ब्रिज के निचले हिस्से में भी यही स्थिति थी। सुवेंदु अधिकारी ने सत्ता संभालते ही  अतिक्रमण और अवैध निर्माणों को हटाने की मुहिम छेड़ दी। इसी के साथ ही मुस्लिम समुदाय द्वारा सड़कों पर नमाज पढ़े जाने पर रोक लगाई तो उपस्थित मुसलमानों की भीड़ ने पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया जिसके जवाब में पुलिस ने भी बलप्रयोग करने में संकोच नहीं किया। ऐसा लगता है प. बंगाल का मुस्लिम समुदाय इसी मुगालते में है कि ममता  सरकार के जमाने में उसे कुछ भी करना की जो छूट मिली हुई थी वह जारी रहेगी। स्मरणीय है चुनाव प्रचार के दौरान श्री अधिकारी ने स्पष्ट कर दिया था कि वे बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति सख्ती के अलावा मुस्लिम समुदाय की उस स्वेच्छाचारिता पर लगाम लगाएंगे जो तृणमूल सरकार के दौर में देखने मिलती रही। दूसरी तरफ उ.प्र में भी सड़कों पर नमाज पढ़ने की मुसलमानों की जिद पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कड़ा रुख दिखाते हुए कहा कि इसकी अनुमति नहीं दी जाएगी। मस्जिदों में स्थानाभाव होने के तर्क पर उन्होंने कहा कि बजाय एक साथ पढ़ने  के वे बारी - बारी से नमाज पढ़ें। साथ ही घरों में जगह कम पड़ती है तो जनसंख्या नियंत्रण पर ध्यान दें। उल्लेखनीय है उ. प्र में आगामी वर्ष विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। यहां भी 20 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं के थोक समर्थन के बल पर  अखिलेश यादव सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाए हुए हैं। लेकिन वे भूल रहे हैं कि बिहार में तेजस्वी यादव का मुस्लिम - यादव समीकरण फुस्स हो गया जहां 18 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं के बावजूद राजद  और कांग्रेस के महागठबंधन का सफाया हो गया। प .बंगाल में तो 30 फीसदी मुस्लिम मतदाता होने पर भी ममता बैनर्जी बुरी तरह पराजित हुईं । असम में भी मुस्लिम मतदाताओं का तिलिस्म टूट गया। ये इसलिए हो सका क्योंकि हिन्दू मतदाताओं के मन में ये बात बैठ गई कि उनकी फूट के चलते मुस्लिम परस्त सरकारें  बन जाती हैं। असम और प. बंगाल में जो राजनीतिक हवा चली उसका असर आगामी सभी चुनावों में पड़े बिना नहीं रहेगा। सुवेंदु अधिकारी और योगी आदित्यनाथ ने सड़कों पर नमाज पढ़ने वालों के विरुद्ध जो सख्ती दिखाई उसको नियम - कानून के पालन से जोड़ने पर महसूस होगा कि वे सही हैं। ये कहना कि अन्य धर्मावलंबी भी सड़कों पर अपने आयोजन करते हैं तो यदि उनसे भी अव्यवस्था फैलती है तब प्रशासन का फ़र्ज़ है वह उन्हें भी रोके। स्मरणीय है मुंबई में सड़कों पर नमाज पढ़े जाने के बाद ही शिवसेना ने महाआरती शुरू की। हालांकि मुस्लिम समुदाय पर मुल्ला - मौलवियों का मनोवैज्ञानिक दबाव रहता है परन्तु सोशल मीडिया पर अनेक मुस्लिम मौलवी एवं प्रवक्ता खुलकर उन पार्टियों की आलोचना कर रहे हैं जिन्होंने मुसलमानों के गैर कानूनी कार्यों की अनदेखी की।  दरअसल लालू प्रसाद यादव, स्व .मुलायम सिंह यादव और ममता बैनर्जी ने चुनाव जीतने के लिए मुसलमानों को भाजपा का भय दिखाकर अपने पक्ष में गोलबंद किया और उसके बदले उन्हें सड़क पर  नमाज पढ़ने , अवैध कारोबार और निर्माण आदि की छूट दे दी । ऐसा करने से ये समुदाय मुख्य धारा से अलग होता गया। सोशल मीडिया पर एक मौलवी की रील जमकर चल रही है जिसमें वे सेकुलर पार्टियों की धज्जियां उड़ाते हुए पूछ रहे हैं कि मुसलमानों को दिल्ली के शाहीन बाग में धरने पर बैठने के लिए उकसाने के बाद न अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव ने वहां आने की जरूरत समझी और न ही राहुल गांधी ने। जबकि इन्हीं के भरोसे मुस्लिम समुदाय खुलकर भाजपा के विरोध में खड़ा हुआ। उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सुनने प. बंगाल चुनाव में जो जनसैलाब उमड़ा वह स्वस्फूर्त था। मुस्लिम समाज को इन संकेतों को समझना चाहिए। धार्मिक आधार पर एकता बुरी बात नहीं है लेकिन इसके लिए भाजपा को गालियां देने से उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ उल्टे हिन्दू मतदाता अपने मतभेद भूलकर राजनीतिक दृष्टि से एकजुट होने लगे। सही बात ये है कि मुसलमानों का उपयोग कर उन्हें अनाथ छोड़ने वाले कथित सेकुलर दल ही उनके सबसे बड़े शत्रु हैं। इस सच्चाई को मुसलमान अभी भी नहीं समझे तब उनकी रही  - सही राजनीतिक उपयोगिता भी घटती जाएगी। असम और प. बंगाल के नतीजे इसका प्रमाण हैं और बड़ी बात नहीं उ.प्र में भी ऐसा ही दिखाई दे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 18 May 2026

ट्रम्प की खिसियाहट दुनिया भर में युद्ध की आग भड़का सकती है


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प  चीन यात्रा से खाली हाथ लौट आए। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई बातचीत के कोई ठोस परिणाम नहीं निकले। खाड़ी युद्ध से उत्पन्न परिस्थितियों में चीन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि ईरान की पीठ पर उसी का हाथ है। यद्यपि रूस भी ईरान के साथ खड़ा है किंतु यूक्रेन के साथ  लंबी लड़ाई में उलझने की वजह से वह चाहकर भी समुचित सहायता ईरान को नहीं दे पा रहा। दूसरी तरफ चीन ने इस बात को समझ लिया है कि वेनेजुएला के बाद यदि ईरान का तेल व्यापार भी अमेरिका के नियंत्रण में आ गया तो वह ऊर्जा संकट में फंस जाएगा क्योंकि अमेरिका समर्थक तेल उत्पादक देश चीन को पेट्रोल - डीजल देने से इंकार कर सकते हैं। जिनपिंग ने इसीलिए ईरान को हरसंभव सहायता दी जिसके बलबूते वह अमेरिका के सामने झुकने भी तैयार नहीं हो रहा। ट्रम्प को उम्मीद थी कि व्यापार समझौतों का लॉलीपॉप दिखाकर वे चीन को इस बात के लिए मना लेंगे कि वह होर्मुज से जहाजों की आवाजाही खोलने के लिए ईरान पर दबाव डाले। लेकिन जिनपिंग ने  ईरान संबंधी कोई आश्वासन तो दिया नहीं उल्टे ये धमकी दे डाली कि अमेरिका ताईवान के मामले में टांग अड़ाने से बाज आए। उल्लेखनीय है जिनपिंग वन चाइना नीति के अंतर्गत ताईवान को चीन में मिलाने के लिए प्रयासरत हैं । लेकिन अमेरिका के खुले संरक्षण के अलावा जापान , ऑस्ट्रेलिया सहित दक्षिण एशिया के अनेक देश इसके विरोध में हैं। इसीलिए चीन सैन्य कार्रवाई से तो परहेज करता आ रहा है परन्तु रूस द्वारा यूक्रेन और अमेरिका द्वारा वेनेजुएला हड़पने के साथ ही ग्रीनलैंड पर दावा ठोकने के बाद ईरान पर हमला कर देने से उसका हौसला मजबूत हुआ है। इसमें दो राय नहीं कि ताईवान है तो चीन का ही हिस्सा। 1949 में साम्यवादी क्रान्ति के बाद वहां के शासक चांग काई शेक भागकर फ़ार्मोसा नामक द्वीप पर चले गए। यही ताईवान कहलाया जिसे संरासंघ में चीन के तौर पर मान्यता मिलने के साथ ही वीटो का अधिकार भी मिला। कालांतर में अमेरिका ने साम्यवादी चीन से ताल्लुकात बढ़ाकर उसे चीन के तौर पर मान्यता देते हुए संरासंघ की सदस्यता के साथ ही सुरक्षा परिषद में वीटो भी दिलवा दिया। यद्यपि ताईवान के स्वतंत्र अस्तित्व को बनाए रखने के लिए उसने उसे आर्थिक और सैन्य संरक्षण देने की नीति जारी रखी। लेकिन चीन की यात्रा से लौटकर ट्रम्प का ये बयान अमेरिका के यूटर्न का प्रमाण है कि ताईवान की आजादी के लिए अमेरिका 15 हजार कि.मी लड़ने नहीं आयेगा। समझने वाली बात ये है कि क्या ट्रम्प ने जिनपिंग को खुश करने ऐसा बयान दिया या फिर ईरान युद्ध के कड़वे अनुभवों ने उनको ऐसा कहने मजबूर किया? कूटनीतिक मामलों में असलियत पर पर्दे पड़े होने से सच्चाई का पता चलना कठिन होता है किंतु उसी के साथ एक तरफ ट्रम्प ने ईरान द्वारा होर्मुज समुद्री मार्ग नहीं खोलने पर दोबारा हमले की धमकी दे डाली। लेकिन सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात है ट्रम्प द्वारा क्यूबा पर भी वेनेजुएला जैसी कार्रवाई करने की धमकी। उल्लेखनीय है दक्षिण अमेरिका में केवल क्यूबा ही वह देश है जिस पर अमेरिका अपनी मर्जी का शासक नहीं बिठा सका। फ़िडेल कास्ट्रो को हटाने या मारने की उसकी कोशिशें बेकार गईं। एक बार तो क्यूबा को लेकर अमेरिका और रूस आमने - सामने आ गए थे। कास्ट्रो के न रहने के बाद अमेरिका अपनी चिर संचित इच्छा पूरी करना चाह रहा है। वेनेजुएला में बिना रोक - टोक  सफल होने के बाद उसे लग रहा है क्यूबा में भी वैसी ही कार्रवाई कर वह अपना रुतबा बढ़ा लेगा। रूस अपनी झंझटों और चीन दूरी के चलते शायद इसमें हस्तक्षेप न करे किंतु ईरान युद्ध के समाप्त होने के पहले यदि ट्रम्प क्यूबा का मोर्चा भी खोलते हैं तब ये लघु विश्व युद्ध का रूप ले सकता है क्योंकि युद्ध क्षेत्र का विस्तार कई महाद्वीपों में हो जाएगा।ऐसे में सवाल ये है कि क्या विश्व जनमत ट्रम्प को क्यूबा हड़पने की छूट देगा? ये  भी हो सकता है अमेरिका ने ताईवान पर चीन की संभावित कार्रवाई के विरुद्ध मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए ये पैंतरा चला हो। हकीकत जो भी हो किंतु ट्रम्प की चीन यात्रा बेनतीजा खत्म होने से प. एशिया के साथ ही दुनिया भर में चल रहे संघर्षों के खत्म होने की उम्मीद धूमिल हो चली है। ट्रम्प के बाद रूसी राष्ट्रपति पुतिन भी चीन जा रहे हैं। जाहिर है अमेरिका विरोधी दोनों दिग्गजों के  बीच होर्मुज में यातायात शुरू करवाने के अलावा क्यूबा संबंधी बात भी हो। फिलहाल तो भारी अनिश्चितता है। हालांकि एक बात जरूर स्पष्ट है कि ट्रम्प अब खिसियाहट की स्थिति में आ चुके हैं और ऐसे में वे कोई ऐसी मूर्खता कर बैठें तो आश्चर्य नहीं होगा जिसके कारण पूरे विश्व में युद्ध की आग फैल जाए।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 16 May 2026

भोजशाला के बाद ज्ञानवापी और श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर फैसले की प्रतीक्षा


म.प्र के धार नगर में स्थित भोजशाला के बारे में उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने गत दिवस ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए कहा कि भोजशाला , वाग्देवी ( सरस्वती) का मंदिर है जिसमें केवल हिंदुओं को बेरोकटोक पूजा - अर्चना का अधिकार है। हालांकि भोजशाला का रखरखाव ए .एस.आई ( भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ) के नियंत्रण में रहेगा किंतु न्यायालय ने 2003 के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें मुस्लिमों को शुक्रवार को तय समय के लिए नमाज की अनुमति दी गई थी। हिंदुओं को भी मंगलवार को ही वहां पूजा की सुविधा थी। 1903 से भोजशाला का संरक्षण पुरातत्व सर्वेक्षण के ही पास है। हिन्दू जहां इसे देवी सरस्वती का मंदिर मानते रहे वहीं मुस्लिमों  की नजर में  वह कमाल मौला परिसर था। उच्च न्यायालय की खंडपीठ के दोनों न्यायाधीशों द्वारा फैसला देने के पूर्व  स्थल का निरीक्षण भी किया गया। पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा भोजशाला में की गई खुदाई और सफाई  में 1,700 से अधिक पुरातात्विक अवशेष और भगवान गणेश, नरसिंह, हनुमान सहित अन्य देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां मिलीं। साथ ही दीवारों और खंभों पर उकेरे संस्कृत श्लोक  और श्री सरस्वत्यै नमः जैसे उल्लेख  मिले। सर्वेक्षण के अनुसार भोजशाला का ढांचा  हिंदू मंदिरों के स्तंभों और नक्काशीदार पत्थरों से निर्मित था। जिसे 11वीं सदी में परमार राजा भोज ने  संस्कृत अध्ययन और देवी वाग्देवी (सरस्वती) की आराधना  केंद्र के रूप में बनवाया था। उच्च न्यायालय ने उक्त प्रमाणों को स्वीकार करते हुए भोजशाला को देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर मानते कहा कि मुसलमान चाहें तो मस्जिद के लिए राज्य सरकार से कहीं अलग भूमि मांग सकते हैं। यद्यपि फैसले से असंतुष्ट मुस्लिम पक्ष सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने के संकेत दे रहा है। इसीलिए हिन्दू पक्ष ने वहां कैविएट दर्ज करवा दिया है । उल्लेखनीय है ऐसे ही प्रमाणों के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या स्थित बाबरी ढांचे वाली भूमि को प्रभु श्री राम की जन्मस्थली मानकर उस पर राम मंदिर बनाने हेतु सौंपते हुए  मुसलमानों को अयोध्या में अन्यत्र मस्जिद निर्माण के लिए भूखंड आवंटन का आदेश दिया था। यद्यपि  मस्जिद के लिए जमीन दिए जाने का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि बाबरी ढांचा हिन्दू मंदिर को ध्वस्त कर ही बनाया गया था। और ठीक वैसी ही स्थिति भोजशाला की है जिस पर मुस्लिम समुदाय का दावा किसी भी दृष्टि से मान्य नहीं हो सकता। इसीलिए भोजशाला को हिन्दू धर्मस्थल स्वीकार करने के बाद  मस्जिद के लिए जमीन देना तो अवैध कब्जे जैसे अपराध पर पुरस्कार प्रदान करने जैसा है। भोजशाला के हिन्दू धर्मस्थल प्रमाणित होने के बाद अब सभी की निगाहें वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर से सटी ज्ञानवापी मस्जिद विवाद पर लग गईं हैं जो न्यायालय में चल रहा है। न्यायालय के आदेश पर हुई खुदाई में ज्ञानवापी के हिन्दू मंदिर होने के सैकड़ों प्रमाण मिल चुके हैं। इसी तरह मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि की दीवार से लगकर बनी शाही मस्जिद को लेकर भी हिन्दू पक्ष का दावा है कि वह  जन्मभूमि का हिस्सा ही है। पूरे देश में ऐसे सैकड़ों हिन्दू धर्मस्थल हैं जिनको मुगलिया दौर में ध्वस्त किया गया या फिर कब्जा कर मस्जिद बना दी गई। होना तो ये चाहिए था कि आजादी के बाद ऐसे सभी स्थलों पर से मुस्लिम आधिपत्य खत्म कर उन्हें हिंदुओं को सौंप दिया जाता परंतु वोट बैंक के लालच में मुस्लिम तुष्टीकरण की जो हवा बही उसमें हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को लगातार ठेस पहुंचाई जाती रही। ये संतोष का विषय है कि अदालतों द्वारा ऐसे विवादित स्थलों के बारे में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को प्रमाण प्रस्तुत करने का दायित्व दिया जा रहा है। अयोध्या के बाद  भोजशाला का फैसला ये दर्शाता है कि मुस्लिम शासकों द्वारा हिंदुओं के आस्था स्थलों पर अवैध कब्जा किया गया था। जिसके प्रमाण खुदाई में मिले अवशेषों से मिल रहे हैं। ये देखते हुए मुस्लिम समुदाय के हित में है कि वह स्वेच्छा से ऐसे सभी विवादित धर्मस्थल हिंदुओं को सौंप दे जिनके बारे में उसे भी पता है कि वे मूलतः हिंदुओं के ही हैं। ऐसा करने से वह बहुसंख्यक समुदाय का सद्भाव अर्जित कर सकेगा, वरना अदालत द्वारा बेदखल किए जाने के बाद उसे पराजय बोध का सामना करना पड़ेगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 15 May 2026

पटाखा फैक्टरी में विस्फोट के लिए पुलिस और प्रशासन भी बराबरी के जिम्मेदार


म.प्र के जबलपुर शहर के समीप  बरगी बांध में एक पखवाड़े पहले हुई क्रूज डूबने की घटना की जांच हेतु आयोग गठित कर दिया गया । जो जानकारी आई है उसके अनुसार क्रूज को काट दिए जाने के कारण दुर्घटना के असली कारणों का पता लगा पाना सम्भव नहीं रहा। लेकिन सतही तौर पर जो प्रतीत हुआ उसके अनुसार प्रशासनिक लापरवाही के कारण अनेक जिंदगियां असमय खत्म हो गईं। प्रदेश भर में क्रूज़ और नावों का संचालन रोकने के बाद संबंधित महकमे ने चुप्पी साध ली। बरगी क्रूज दुर्घटना के घाव अभी हरे ही थे कि गत दिवस प्रदेश के देवास नगर में एक पटाखा फैक्टरी में हुए विस्फोट में 5 श्रमिकों के चीथड़े उड़ गए वहीं घायलों में एक दर्जन की हालत गंभीर है।  पटाखा फैक्टरी में बारूद का होना स्वाभाविक है किंतु जो जानकारी मिली उसके अनुसार फैक्टरी में कई टन बारूद जमा की गई थी जबकि उसे मात्र 15 किलो विस्फोटक रखने का लाइसेंस जारी हुआ था। चूंकि बरसात के पहले फैक्टरी संचालक को किसी बड़े ऑर्डर की आपूर्ति करनी थी इसलिए उसने  नियम विरुद्ध जाने का दुस्साहस किया और स्वीकृत मात्रा से कई गुना अधिक विस्फोटक एकत्र कर फटाफट पटाखे बनाने शुरू कर दिए। छह माह पूर्व प्रारंभ उक्त फैक्टरी का निर्माण भी पूरी तरह नहीं हुआ है। हालांकि दुर्घटना का कारण फिलहाल स्पष्ट नहीं है किंतु भीषण गर्मी में अधूरे निर्माण के बावजूद बारूद जैसी ज्वलनशील चीज का जंगी स्टॉक और बिना समुचित सुरक्षा प्रबंधों के 600 श्रमिकों को काम पर लगाने से ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि फैक्टरी मालिक को नियम - कानून की रत्ती भर परवाह नहीं थी । इसी प्रकार 15 किलो विस्फोटक रखने का लाइसेंस होने पर भी उक्त फैक्टरी को कई टन विस्फोटक की आपूर्ति करने वाले भी खुद को कानून से ऊपर समझते हैं वरना वे इतनी बड़ी हिमाकत नहीं करते। लेकिन ऐसी दुर्घटना के लिए शासन और प्रशासन की जिम्मेदारी को उपेक्षित नहीं किया जा सकता। ये सवाल स्वाभाविक रूप से उठ खड़ा होता है कि पटाखा बनाने वाली उक्त फैक्टरी में अनुमति से बहुत ज्यादा विस्फोटक आता रहा तो प्रशासन को इसकी जानकारी क्यों नहीं लगी? और यदि सरकारी अमला इस बारे में जानता था तब तो उसे भी निरपराध श्रमिकों की मौत के लिए बराबरी से दोषी माना जाना चाहिए। इस दुर्घटना ने एक और आशंका पैदा कर दी कि किसी शहर में विस्फोटकों का जखीरा आ जाने पर भी पुलिस और प्रशासन को उसकी भनक नहीं लगती। इसे दूसरे कोण से देखने पर ये भी कहा जा सकता है कि इस आपराधिक कृत्य को भ्रष्ट तंत्र का संरक्षण था जो अपनी जेब गर्म करने के फेर में जनता की जान को खतरे में डालने से लेशमात्र भी परहेज नहीं करता। कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं होगा कि चाहे बरगी बांध में क्रूज डूबने की घटना हो या फ़िर देवास की पटाखा फैक्टरी में हुआ विस्फोट, इनकी जड़ में प्रशासनिक उदासीनता या अनदेखी ही मूल कारण होता है।  यदि बरगी में क्रूज का रखरखाव सही तरीके से हुआ होता ,यात्रियों को समय पर लाइफ जैकेट पहनने की अनिवार्यता होती और क्रूज डूबने की शुरुआत होते ही बचाव कार्य प्रारंभ हो जाता तब अनेक लोगों की जान बच सकती थी। इसी तरह देवास की पटाखा फैक्टरी के निर्माण और सुरक्षा प्रबंधों की समय रहते समुचित जांच की गई होती तब गत दिवस हुआ हादसा टाला जा सकता था। और फिर 15 किलो की जगह कई टन विस्फोटक का फैक्टरी में जमा होना हे ये साबित करने के लिए काफी है कि फैक्टरी मालिक की पहुंच और पकड़ स्थानीय प्रशासन तक थी। कुछ समाचारों में बताया गया है कि उसकी भाजपा  सांसद से काफी निकटता रही है। यदि ये सही है तब विस्फोटकों के अवैध भंडार के पीछे राजनीतिक दबाव की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। हकीकत जो भी हो लेकिन फैक्टरी मालिक द्वारा किए जा रहे गैर कानूनी कार्यों पर रोक - टोक नहीं होना ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि उसने प्रशासनिक व्यवस्था को या तो खरीद लिया था या किसी अन्य कारण से सरकारी अमला उस पर मेहरबान बने रहते हुए आँखें मूंदें बैठा रहा। इसलिए जांच के दायरे में उक्त पटाखा फैक्टरी के अलावा पुलिस और प्रशासन की नाकामी भी आनी चाहिए क्योंकि अप्रत्यक्ष तौर पर ही सही इस दुर्घटना में उनकी जिम्मेदारी भी कम नहीं है।


- रवीन्द्र वाजपेयी