Tuesday, 21 July 2026

दिल्ली में किसानों का जमावड़ा जंतर मंतर पर भारी पड़ सकता है



दिल्ली के जंतर मंतर पर चल रहे कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में गत दिवस संसद भवन तक छात्रों का मार्च आयोजित किया गया था। पुलिस के रोकने पर भी हज़ारों  लोग उस ओर बढ़े। संसद का सत्र भी चूंकि कल से है शुरू हुआ था लिहाजा सुरक्षा व्यवस्था काफी कड़ी थी। जब प्रदर्शनकारी अनियंत्रित होने लगे तब पुलिस द्वारा लाठी चार्ज और अश्रु गैस जैसे परंपरागत तरीके अपनाकर भीड़ को तितर - बितर किया गया। दोनों पक्षों द्वारा एक दूसरे पर आरोप लगाए जा रहे हैं। पुलिस का कहना है भीड़ द्वारा पथराव एवं सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ के बाद स्थिति बिगड़ी वहीं आंदोलन के कर्ताधर्ताओं की मानें तो पुलिस द्वारा लाठी चार्ज और अश्रु गैस छोड़े जाने से भीड़ भड़क उठी। विभिन्न वीडियो देखने पर पता चलता है कि दोनों तरफ के आरोप काफी हद तक सही हैं। भीड़ द्वारा पत्थर फेंके जाने के साथ पुलिस के वाहनों को क्षति पहुंचाए जाने के दृश्य साफ नजर आये वहीं पुलिस को भी डंडे बरसाते हुए देखा गया। ये बात पूरी तरह सच है कि सुरक्षा बल सख्ती न दिखाते  तो प्रदर्शनकारी संसद परिसर में घुसकर अकल्पनीय स्थिति उत्पन्न कर सकते थे। ये आशंका इसलिए पैदा हुई क्योंकि छात्रों के नाम पर उपद्रवी तत्व भी प्रदर्शन में शामिल थे जिनका उद्देश्य अराजकता फैलाना था। दरअसल  इस आंदोलन को गैर राजनीतिक बनाये रखने के दावे झूठे निकले जब आम आदमी पार्टी के अलावा भीम आर्मी सांसद दलित नेता चंद्रशेखर आजाद ने पहले तो धरना स्थल पर मंच साझा किया और फिर प्रदर्शन में भी मौजूद रहे। सपा सांसद डिंपल यादव ने भी उपस्थिति दर्ज कराई। योगेंद्र यादव,शबाना आज़मी अरुंधति रॉय, प्रकाश राज और स्वरा भास्कर जैसी घोषित मोदी विरोधी हस्तियां भी नजर आईं। जेएनयू से जुड़े  सरकार विरोधी संगठनों  ने तो धरना स्थल पर पहले दिन से ही कब्जा जमा लिया था। इस आयोजन के पीछे नीट परीक्षा के पर्चे लीक होने से परीक्षार्थियों में उपजी नाराजगी थी जिसके बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग जोर पकड़ती गई। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी का इस आंदोलन से जुड़ना आज तक रहस्य बना हुआ है क्योंकि उसका प्रादुर्भाव देश के मुख्य न्यायाधीश द्वारा किये एक कटाक्ष की प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ था। इसके अलावा सोनम वांगचुक का लद्दाख़ से आकर इस आंदोलन से जुड़ना भी चौंकाने वाला रहा। धीरे - धीरे यह मुहिम छात्रों के हाथ से निकालकर पेशेवर आंदोलनजीवियों के नियन्त्रण में आ गई। इसी के चलते वहाँ वही नारे गूंजने लगे जो जेएनयू परिसर की पहचान बन चुके हैं। हिंदू देवी - देवताओं का उपहास, मनुवाद को कोसते हुए जय भीम के नारे और क्रांति के नाम पर अल्लाह की तारीफ जैसी भड़काऊ बातें सुनाई दीं। देश विरोधी शर्जील इमाम और खालिद उमर को महान बताने की जुर्रत के साथ ही धारा 370 की वापसी का दंभ भरा गया। कल जो प्रदर्शन हुआ उसमें भीम आर्मी की जुटाई भीड़ छात्रों पर भारी पड़ी। इन्हीं सब कारणों से आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटक गया। सोनम वांगचुक तक सांसदों से मिलकर अनशन तोड़ने के लिए राजी हो गए। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक माइग्रेन नामक बीमारी की आड़ लेकर भूख हड़ताल से पीछे हट गए। सरकार के बुलावे पर पार्टी के दो प्रतिनिधि केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा से मिलने जा पहुंचे लेकिन रात में दोबारा जंतर मंतर पर तम्बू तानकर आंदोलन जारी रखने की डींग हाँकी गई। लेकिन अब तक ये समझ से परे है कि इस आयोजन का असली सूत्रधार कौन है? अभिजीत दीपके के भारत लौटते ही उसकी आम आदमी पार्टी से निकटता स्पष्ट हो गई थी। इसीलिए इस आंदोलन में उस पार्टी का पूरा शीर्ष नेतृत्व मौजूद रहा। यही वजह थी की कांग्रेस ने कल के प्रदर्शन से दूरी बनाये रखी। राहुल गाँधी का बयान प्रधानमंत्री के  विरुद्ध तो आया किंतु कॉकरोच जनता पार्टी की तरफदारी से वे बचे और तो और सोनम वांगचुक की मिजाजपुर्सी की जरूरत भी नहीं समझी। स्मरणीय है किसी आंदोलन की सफलता के लिए किसी या कुछ राजनीतिक पार्टियों की हिस्सेदारी जरूरी होती है जिसका इस अभियान में अभाव है। हालांकि आम आदमी पार्टी पर्दे के पीछे है, लेकिन दीपके एण्ड कम्पनी का कोई ढांचा नहीं है। ऐसे में कुछ दिन के होहल्ले के बाद इसकी वजनदारी कम होती जायेगी। सबसे खास बात ये है कि भारत - अमेरिका के बीच होने वाली व्यापार संधि  के विरोध में दिल्ली के सिंधु बॉर्डर पर किसान जमा होने लगे हैं। ऐसे में अब आंदोलन का केन्द्र जंतर मंतर से खिसक कर किसानों के धरने पर पहुँच जाए तो आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि राजनीतिक दलों और मीडिया को भी किसानों में ज्यादा रुचि होगी विशेष रूप से पंजाब विधानसभा के आगामी चुनाव को देखते हुए।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 20 July 2026

समान नागरिक संहिता विधेयक : म.प्र सरकार का साहसिक निर्णय


मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता में गत दिवस संपन्न म.प्र मंत्रीपरिषद की बैठक में यूसीसी ( समान नागरिक संहिता) विधेयक को स्वीकृति दिये जाने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि यह भाजपा के मूलभूत मुद्दों में रहा है। पार्टी द्वारा शासित अनेक राज्यों में ये पहले ही पारित किया जा चुका है। आज से प्रारंभ हुए विधानसभा के मानसून सत्र में इसे  पेश भी कर दिया गया। हालांकि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 342 और  366 (खंड 25) के तहत आने वाली भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया अनु जनजातियों पर लागू नहीं होगा। बैठक के बाद मुख्यमंत्री श्री यादव ने विधेयक पर चर्चा करते हुए कहा कि किसी भी धर्म और समुदाय के लोगों के लिए प्रदेश में सिर्फ एक ही शादी की अनुमति है। विवाह  के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं की 18 वर्ष ही रहेगी। मौखिक तलाक को पूरी तरह गैर-कानूनी माना जाएगा। शादी और तलाक का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किये जाने के साथ ही विधेयक में  हलाला जैसी प्रथा को दंडनीय अपराध माना गया है। यूसीसी में बेटों और बेटियों को संपत्ति के उत्तराधिकार में समान अधिकार दिए गए हैं। इसके अलावा मृतक बच्चे की संपत्ति में उसके परिवार के साथ ही माता-पिता भी बराबर हिस्से के अधिकारी होंगे। लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए भी अनेक शर्तें और कानूनी आवश्यकताएं पूरी करनी होंगी। जिनके उल्लंघन पर सजा और अर्थडण्ड भोगना होगा। ऐसे जोड़ों द्वारा उत्पन्न संतान अवैध नहीं कहलाएगी  , साथ ही सम्बन्ध विच्छेद पर महिला गुजारा भत्ते की अधिकारी होगी। मुख्यमंत्री श्री यादव के अनुसार  समान नागरिक संहिता को लेकर  सभी राजनीतिक दलों से सुझाव मांगे गए किंतु कांग्रेस पार्टी के प्रतिनिधि उसमें नहीं आए। उन्होंने दावा किया कि आम जनता से सुझाव मांगे जाने पर 80% मुस्लिम महिलाओं ने इसके पक्ष में अपनी राय दी। इस विधेयक को मुस्लिम विरोधी प्रचारित किये जाने के उत्तर में श्री यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से  म.प्र  में  ऐसा यूसीसी कानून लागू किया जाएगा  जिसमें  सभी धर्मावलंबियों को समान अधिकार और न्याय मिले। इस दावे के बावजूद प्रदेश विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस इस विधेयक का विरोध ही करेगी क्योंकि उसके मुताबिक  समान नागरिक संहिता की बात मुस्लिम विरोधी है। मुस्लिम धर्मगुरु भी इसे अपने पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप मानकर इसकी मुखालफत करते आये हैं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीन तलाक़ को गैर कानूनी बताये जाने के बाद इस समुदाय की महिलाओं द्वारा भी तीन तलाक़ और हलाला के विरुद्ध आवाजें उठाई जाने लगीं । लिव इन रिलेशनशिप से जुड़ी विकृतियाँ भी समस्या बड़ी सामाजिक समस्या बनती जा रही है। सबसे बड़ी बात ये है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के कारण बहुसंख्यक हिन्दू समाज में ये भावना तेजी से बढ़ती गई कि धर्मनिरपेक्ष होने की सारी जिम्मेदारी उसी के कन्धों पर है। सामाजिक कुरीतियों को मिटाने के लिए पंडित नेहरू की सरकार ने हिंदुओं में प्रचलित विवाह और उत्तराधिकार संबंधी परंपराओं को संशोधित करने के लिए तो कानून बना दिया किंतु मुस्लिम पर्सनल लॉ को छेड़ने की हिम्मत नहीं दिखा सके।  उसी भेदभाव के कारण  गंगा - जमुनी संस्कृति की अवधारणा धीरे - धीरे कमजोर पड़ती गई और बजाय अल्पसंख्यक के मुस्लिम समुदाय खुद को विशेषाधिकार संपन्न मानकर राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करने के साथ ही दबाव समूह बनने लगा। देश में जिस हिंदूवादी राजनीति का प्रादुर्भाव हुआ उसके पीछे मुस्लिम पर्सनल लॉ के नाम पर हुआ तुष्टीकरण ही प्रमुख कारण माना जाना चाहिए। हालांकि ईसाइयों के प्रति भी नरम रुख रखा गया किंतु जितनी छूट मुसलमानों को मज़हबी मामलों में मिली वह अनावश्यक ही नहीं आपत्तिजनक भी थी जिसके कारण देश में अलगाववाद को बढ़ावा मिला। स्व. राजीव गाँधी की  सरकार द्वारा शाह बानो संबंधी सर्वोच्च न्यायालय का फैसला उलटकर उसे और बढ़ावा दिया। भाजपा ने केंद्रीय सत्ता में आने के बाद से ही इस विसंगति को रोकने की दिशा में प्रयास किये तथा अपने शासन वाले अनेक प्रदेशों में समान नागरिक संहिता लागू करवाई। उसी क्रम में म.प्र सरकार ने भी जो साहस दिखाया उसके लिए वह प्रशंसा की हकदार है। विपक्ष को चाहिए इस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित करवाकर समाज को अच्छा संदेश देने में सहायक बने। 

 नागरिक संहिता विधेयक : म.प्र सरकार का साहसिक निर्णय

मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता में गत दिवस संपन्न म.प्र मंत्रीपरिषद की बैठक में यूसीसी ( समान नागरिक संहिता) विधेयक को स्वीकृति दिये जाने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि यह भाजपा के मूलभूत मुद्दों में रहा है। पार्टी द्वारा शासित अनेक राज्यों में ये पहले ही पारित किया जा चुका है। आज से प्रारंभ हुए विधानसभा के मानसून सत्र में इसे  पेश भी कर दिया गया। हालांकि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 342 और  366 (खंड 25) के तहत आने वाली भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया अनु जनजातियों पर लागू नहीं होगा। बैठक के बाद मुख्यमंत्री श्री यादव ने विधेयक पर चर्चा करते हुए कहा कि किसी भी धर्म और समुदाय के लोगों के लिए प्रदेश में सिर्फ एक ही शादी की अनुमति है। विवाह  के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं की 18 वर्ष ही रहेगी। मौखिक तलाक को पूरी तरह गैर-कानूनी माना जाएगा। शादी और तलाक का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किये जाने के साथ ही विधेयक में  हलाला जैसी प्रथा को दंडनीय अपराध माना गया है। यूसीसी में बेटों और बेटियों को संपत्ति के उत्तराधिकार में समान अधिकार दिए गए हैं। इसके अलावा मृतक बच्चे की संपत्ति में उसके परिवार के साथ ही माता-पिता भी बराबर हिस्से के अधिकारी होंगे। लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए भी अनेक शर्तें और कानूनी आवश्यकताएं पूरी करनी होंगी। जिनके उल्लंघन पर सजा और अर्थडण्ड भोगना होगा। ऐसे जोड़ों द्वारा उत्पन्न संतान अवैध नहीं कहलाएगी  , साथ ही सम्बन्ध विच्छेद पर महिला गुजारा भत्ते की अधिकारी होगी। मुख्यमंत्री श्री यादव के अनुसार  समान नागरिक संहिता को लेकर  सभी राजनीतिक दलों से सुझाव मांगे गए किंतु कांग्रेस पार्टी के प्रतिनिधि उसमें नहीं आए। उन्होंने दावा किया कि आम जनता से सुझाव मांगे जाने पर 80% मुस्लिम महिलाओं ने इसके पक्ष में अपनी राय दी। इस विधेयक को मुस्लिम विरोधी प्रचारित किये जाने के उत्तर में श्री यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से  म.प्र  में  ऐसा यूसीसी कानून लागू किया जाएगा  जिसमें  सभी धर्मावलंबियों को समान अधिकार और न्याय मिले। इस दावे के बावजूद प्रदेश विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस इस विधेयक का विरोध ही करेगी क्योंकि उसके मुताबिक  समान नागरिक संहिता की बात मुस्लिम विरोधी है। मुस्लिम धर्मगुरु भी इसे अपने पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप मानकर इसकी मुखालफत करते आये हैं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीन तलाक़ को गैर कानूनी बताये जाने के बाद इस समुदाय की महिलाओं द्वारा भी तीन तलाक़ और हलाला के विरुद्ध आवाजें उठाई जाने लगीं । लिव इन रिलेशनशिप से जुड़ी विकृतियाँ भी समस्या बड़ी सामाजिक समस्या बनती जा रही है। सबसे बड़ी बात ये है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के कारण बहुसंख्यक हिन्दू समाज में ये भावना तेजी से बढ़ती गई कि धर्मनिरपेक्ष होने की सारी जिम्मेदारी उसी के कन्धों पर है। सामाजिक कुरीतियों को मिटाने के लिए पंडित नेहरू की सरकार ने हिंदुओं में प्रचलित विवाह और उत्तराधिकार संबंधी परंपराओं को संशोधित करने के लिए तो कानून बना दिया किंतु मुस्लिम पर्सनल लॉ को छेड़ने की हिम्मत नहीं दिखा सके।  उसी भेदभाव के कारण  गंगा - जमुनी संस्कृति की अवधारणा धीरे - धीरे कमजोर पड़ती गई और बजाय अल्पसंख्यक के मुस्लिम समुदाय खुद को विशेषाधिकार संपन्न मानकर राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करने के साथ ही दबाव समूह बनने लगा। देश में जिस हिंदूवादी राजनीति का प्रादुर्भाव हुआ उसके पीछे मुस्लिम पर्सनल लॉ के नाम पर हुआ तुष्टीकरण ही प्रमुख कारण माना जाना चाहिए। हालांकि ईसाइयों के प्रति भी नरम रुख रखा गया किंतु जितनी छूट मुसलमानों को मज़हबी मामलों में मिली वह अनावश्यक ही नहीं आपत्तिजनक भी थी जिसके कारण देश में अलगाववाद को बढ़ावा मिला। स्व. राजीव गाँधी की  सरकार द्वारा शाह बानो संबंधी सर्वोच्च न्यायालय का फैसला उलटकर उसे और बढ़ावा दिया। भाजपा ने केंद्रीय सत्ता में आने के बाद से ही इस विसंगति को रोकने की दिशा में प्रयास किये तथा अपने शासन वाले अनेक प्रदेशों में समान नागरिक संहिता लागू करवाई। उसी क्रम में म.प्र सरकार ने भी जो साहस दिखाया उसके लिए वह प्रशंसा की हकदार है। विपक्ष को चाहिए इस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित करवाकर समाज को अच्छा संदेश देने में सहायक बने। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 18 July 2026

वांगचुक को बलि का बकरा बनाया काॅकरोच जनता पार्टी ने



इसका संकेत तो गुरुवार को ही मिल गया था जिस दिन दिल्ली उच्च न्यायालय ने सरकार को निर्देशित किया था कि वह  दिल्ली के जंतर मंतर पर अनशनरत लद्दाख़ की चर्चित शख्सियत सोनम वांगचुक का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण करवाए और जरूरत होने पर उनकी चिकित्सा का प्रबंध भी करे। उल्लेखनीय है नीट परीक्षा के पर्चे लीक होने के बाद सोशल मीडिया पर धूमकेतु की तरह उभरी काॅकरोच जनता पार्टी द्वारा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग को लेकर लगातार किये जा रहे आंदोलन का जब कोई प्रभाव नहीं पड़ा तब राजधानी दिल्ली में जंतर मंतर पर श्री वांगचुक को अनशन पर बिठा दिया गया। लद्दाख़ को पूर्ण राज्य बनाये जाने की मांग को लेकर वे आंदोलन का नेतृत्व करते रहे हैं और कुछ महीनों तक जेल में भी रहे। लेकिन ये बात संदेहों को जन्म देती है कि अमेरिका में बैठे अभिजीत दीपके नामक व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर काॅकरोच जनता पार्टी नामक एक संगठन की घोषणा की और देखते - देखते ही उसके साथ लाखों अनुयायी जुड़ते चले गए। उसके बाद जब वह भारत लौटा तब एक वर्ग विशेष ने उसे मसीहा बनाना चाहा किंतु दिल्ली आने के कुछ घंटों बाद ही जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन  ने काॅकरोच जनता पार्टी के ढोल की पोल खोल दी। अभिजीत को लगा था कि देश का युवा उन्हें हाथों - हाथ लेगा। लेकिन दिल्ली के अलावा भी वे जहाँ - जहाँ गए उनके आयोजन फ्लॉप शो साबित हुए। अंततः दिल्ली में अनशन का फैसला लिया गया और बजाय खुद मैदान संभालने के श्री वांगचुक को अनशन पर बिठा दिया। अभिजीत समझ चुके थे कि उनके नाम में वह आकर्षण नहीं है लिहाजा वांगचुक के कंधे पर बन्दूक रखकर निशाना लगाना चाहा। लेकिन ये दाँव भी कारगर नहीं रहा। जेएनयू और  कुछ ढपलीबाज   वामपंथी छात्रों को छोड़कर न तो वे युवा आये जिनके लिए वांगचुक को भूखा रखा गया और न आम जनता। राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने अनशन स्थल पर आकर मगरमच्छी आँसू तो खूब बहाये लेकिन मैदानी समर्थन नहीं दिया। यही वजह रही कि आंदोलन न गति पकड़ सका और न ही उसकी कोई दिशा ही स्पष्ट हुई। शिक्षा मंत्री का त्यागपत्र मांगने से हटकर जंतर मंतर में टुकड़े - टुकड़े  गैंग के देश विरोधी नारे गूंजने लगे। असल में इस आंदोलन को फुस्स करवाने में सभी प्रमुख विपक्षी दलों की भूमिका रही। अरविंद केजरीवाल भले ही श्री वांगचुक को शिक्षा मंत्री बनाये जाते जाने की मांग कर अपने को उनका हितैषी साबित करना चाह रहे हों लेकिन। उनकी पार्टी भी नहीं चाहती कि काॅकरोच जनता पार्टी उसका विकल्प बन जाए। आज पुलिस ने श्री वांगचुक को उठाकर अस्पताल भेज दिया जिसके बाद अब अभिजीत दीपके ने अनशन करने का ऐलान कर दिया। लेकिन नीट परीक्षा का परिणाम घोषित होने से इस आंदोलन की धार पहले ही कमजोर पड़ चुकी है। सोमवार से संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है। विपक्षी पार्टियां  उसमें सरकार को घेरकर राजनीतिक फ़ायदा उठाना चाहेंगी। इसीलिए उन्होंने इस आंदोलन को दिखावटी समर्थन तो दिया किंतु  जंतर मंतर की सीमा से बाहर नहीं आने दिया। सरकार पर अनशन की उपेक्षा का जो आरोप है उसमें दम इसलिये नहीं है क्योंकि काॅकरोच जनता पार्टी अभी तक संगठित स्वरूप नहीं ले सकी। और श्री वांगचुक का इस आंदोलन से जुड़ना भी अप्रासंगिक था। उनकी छवि  आंदोलनजीवी की बन जाने से वे मीडिया की सुर्खियों में सिमटकर रह गये। रही - सही कसर पूरी कर दी जेएनयू के छात्र - छात्राओं ने जो बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बनकर समूचे आंदोलन पर अतिक्रमण कर बैठे। हिंदू देवी - देवताओं का अपमान करने वाले एक स्टैंड अप कामेडियन ने भी आंदोलन को पलीता लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सच कहें तो काॅकरोच जनता पार्टी ने एक अच्छे भले मुद्दे का कचरा कर दिया। स्मरणीय है किसान आंदोलन अपने साथ देश भर के किसानों को नहीं जोड़ पाने के कारण अपनी मौत मर गया था, वहीं शाहीन बाग का धरना भी अंततः फुस्स होकर रह गया। ठीक वैसे ही ये आंदोलन भी अधोगति को प्राप्त हो रहा है  ये कहना गलत नहीं होगा कि काॅकरोच जनता पार्टी ने सोनम वांगचुक की जान खतरे में डालकर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने की जो चाल चली थी वह उल्टी पड़ गई और अभिजीत दीपके का नौ नौसिखियापन भी उजागर हो गया। 

-रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 17 July 2026

बांग्लादेश के साथ जैसे को तैसा की नीति अपनानी चाहिए



बांग्लादेश से रिश्ते सुधरने की उम्मीदें धीरे - धीरे खत्म होती जा रही हैं।  चीन को मोंगला बंदरगाह के समीप इकौनोमिक ज़ोन के  विकास का काम सौंपने के बाद  गत दिवस उसने भारतीय सीमा से बेहद नजदीक स्थित तीस्ता परियोजना भी उसको सौंप दी जो इसके लिए उसे 7 हजार डॉलर का ऋण देगा। भारत ने इसके लिए 9 हजार करोड़ का प्रस्ताव दिया था। ऐसा ही मोंगला परियोजना को लेकर हुआ था। उल्लेखनीय है शेख हसीना के शासनकाल में भारत और बांग्लादेश के रिश्ते काफी सुधर गए थे। यद्यपि कट्टरपंथी मुस्लिम वहाँ रह रही हिन्दु आबादी पर अत्याचार करने से बाज नहीं आते थे। मंदिरों सहित हिंदुओं के धर्मस्थलों पर हमले आम बात थी। बावजूद इसके सरकारी स्तर पर संवाद बना रहा और अनेक लंबित विवाद भी सुलझे । लेकिन हसीना  का तख्ता उलटने के बाद स्थितियाँ पूरी तरह बिगड़ गईं। दरअसल उनको भारत में। पनाह दिये जाने से बांग्ला देश की अंतरिम सरकार के मुखिया मो. युनुस को बहाना मिल गया। हालांकि उनका झुकाव पहले से ही चीन की तरफ था। लेकिन चुनाव के बाद जब तारिक रहमान भारी बहुमत से प्रधानमंत्री बने तब शुरुआत में ये लगा था कि संभवतः बांग्लादेश दोबारा भारत के साथ सम्बन्ध सुधारेगा। लेकिन शेख हसीना का भारत में बने रहना आड़े आ गया। उनकी गैर मौजूदगी में ही उन्हें मृत्युदंड सुनाया जा चुका है। बांग्लादेश सरकार लगातार उनकी वापसी के लिए दबाव बनाती रही है जिसे भारत ने नजरंदाज कर दिया। जाहिर है इससे उसकी नाराजगी बढ़ी होगी। हालांकि अपने जन्म के कुछ बरस बाद शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या होने के बाद से बांग्लादेश में बैठे सभी शासक भारत से दुश्मनी की राह पर चले। हसीना के कार्यकाल को जरूर अपवाद कहा जा सकता है। लेकिन उसके बाद से ये देश भारत विरोधी ताकतों से जुड़ने लगा। बांग्लादेश के नये शासक  तारिक रहमान लंबे समय तक विदेश में रहे हैं। इसीलिए उनसे उम्मीद रही कि वे कट्टरता को त्यागकर भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के साथ संबंध कायम करने आगे आयेंगे। लेकिन चीन के साथ किये ताजा  समझौतों से ये साफ हो चला है कि वे भी अपने मरहूम  पिता और माँ की तरह से ही भारत विरोध की मानसिकता के वशीभूत हैं। यद्यपि हाल ही में शेख हसीना ने ये कहते हुए सबको चौंका दिया था कि वे आगामी दिसम्बर माह में ढाका लौटकर अदालत के समक्ष आत्म समर्पण करते हुए फांसी की सजा रद्द करने की अपील करेंगी। उसके बाद ऐसा लगा था कि दोनों देशों के रिश्तों में चली आ रही तल्खी दूर होने लगी है। लेकिन तारिक रहमान द्वारा चीन की यात्रा और फिर दो महत्वपूर्ण परियोजनाओं के विकास हेतु भारत के प्रस्तावों को ठुकराते हुए चीन की गोद में बैठ जाने के बाद इस बात में कोई शंका नहीं रह गई है कि हमारा ये पड़ोसी भी हमारे दुश्मनों के साथ मिल गया है। तीस्ता परियोजना भारत की सीमा से महज 20 - 22 कि.मी दूर होने से हमारी सुरक्षा के लिए खतरा है। सिलिगुड़ी कारीडोर वैसे भी बेहद संवेदनशील माना जाता है। प. बंगाल में भाजपा सरकार बन जाने के बाद बांग्लादेश सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने के अभियान में तेजी के अलावा घुसपैठियों को वापस भेजने जैसी कारवाई से बांग्लादेश भन्नाया हुआ है। असम की भाजपा सरकार भी अवैध घुसपैठ को रोकने के लिए बेहद आक्रामक है। चीन के साथ तारिक रहमान सरकार रक्षा समझौते भी कर रही है। निश्चित रूप से उसके ताजा कदम विशुद्ध रूप से भारत विरोधी मोर्चेबंदी ही है। आश्चर्य तो तब होता है जब बांग्लादेश उस पाकिस्तान के साथ गलबहियाँ करने में भी नहीं हिचकता जिसने उसकी जनता पर अमानुषिक अत्याचार किये थे। पाकिस्तान के कब्जे से से उसे मुक्त करने में भारत ने जो सैन्य कारवाई की और करोड़ों बांग्लादेशियों को शरण दी उसके प्रति कृतज्ञता की बजाय बांग्लादेश भारत के साथ हर वह हरकत करने पर आमादा है जो किसी शत्रु देश के साथ की जाती है। ऐसे में भारत को उसके साथ किसी भी प्रकार की सहानुभूति रखने से बचते हुए कड़ाई से पेश आना चाहिए क्योंकि चीन का वहाँ बैठना हमारी सुरक्षा के लिए चिंता पैदा करने वाला है। सबसे बड़ा कदम उन घुसपैठियों की वापसी का उठाया जाए जो हमारी अर्थव्यवस्था पर बोझ के साथ ही आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बने हुए हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 16 July 2026

आस्था को जो ठेस लगी उसकी टीस लंबे समय तक बनी रहेगी



अयोध्या स्थित भव्य राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का प्रकरण पूरी दुनिया में चर्चित हो गया। सनातन में आस्था रखने वाले करोड़ों रामभक्तों को उक्त घटना ने पीड़ा पहुंचाई क्योंकि मसला केवल रुपये - पैसे की हेराफेरी तक सीमित न रहकर उन नैतिक मूल्यों और मर्यादाओं के उल्लंघन से भी जुड़ा हुआ है जिनका प्रभु श्री राम ने जीवन भर पालन किया और जिसकी वजह से उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम जैसा पवित्र संबोधन प्राप्त हुआ। इस मामले की जाँच चल रही है और मामला सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंचा है। इसलिए उसके कानूनी पक्ष पर कुछ भी बोलना फिलहाल जल्दबाजी होगी। लेकिन जो न्यास राम मंदिर की व्यवस्था देखता है उसके प्रशासनिक ढांचे में  शीर्ष स्तर पर हो रहे बदलाव से ही मामले की गंभीरता स्पष्ट हो जाती है। उक्त न्यास में रा.स्व.संघ से जुड़े लोग महत्वपूर्ण दायित्वों पर थे लिहाजा मामले को राजनीतिक रंग भी दिया जाने लगा जो कि स्वाभाविक  है। उ.प्र में आगामी वर्ष विधानसभा चुनाव होने वाले हैं ।  ये देखते हुए भाजपा विरोधी ताकतों को हमलावर होने का मौका मिल गया। जाहिर है केंद्र और राज्य दोनों में सत्ता पक्ष इस मामले में रक्षात्मक होने के लिए मजबूर हो गया है। खैर, राजनीति के अपने तौर - तरीके होते हैं इसलिए इस मामले में भी दोनों पक्षों से जिस तरह के वार और पलटवार हो रहे हैं उनसे किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। लेकिन इस कांड के उजागर होते ही देश भर से विभिन्न मंदिरों, धर्म स्थलों और उनकी व्यवस्था देख रहे न्यासों के प्रबंधन में आर्थिक अनियमिताओं की खबरें निकलकर आने लगीं जिनके मूल में चंदे और चढ़ावे की चोरी ही मुख्य रूप से सामने आई है। कुछ प्रसिद्ध धर्मस्थलों से  बहुमूल्य मुकुट एवं आभूषण आदि गायब होने की शिकायतें भी मिल रही हैं। शुरुआत में ऐसा लगा कि सारी अव्यवस्था हिन्दू मंदिरों को लेकर ही है किंतु मुस्लिम समुदाय के बीच से भी वक्फ संपत्ति से जुड़े घोटाले सामने आने लगे। अन्य धार्मिक संगठनों के भीतर भी इसी तरह की हेराफेरी चर्चाओं में आ गई। देश के अनेक हिस्सों में ईसाई समुदाय से जुड़ी बेशकीमती जमीनों की बंदरबांट भी किसी से छिपी नहीं है। कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं होगा कि धर्म के नाम पर अधर्म करने वालों के हौसले बुलंद हैं जिन्हें न ईश्वरीय कोप का डर है और न ही कानून का। जहाँ तक बात धार्मिक केंद्रों और उनसे जुड़े आर्थिक प्रबंधन की है तो उसमें भावना का स्थान सर्वोपरि है। भले ही व्यक्ति बतौर कर्मचारी उससे जुड़ा हो किंतु उस स्थल या संस्थान की पवित्रता उसे प्रभावित करती होगी , ये विश्वास जनमानस में गहराई तक समाया हुआ था। इसीलिए मंदिर में पुजारी के आसन पर बैठे व्यक्ति की योग्यता और जाति के बारे में जाने बिना श्रृद्धालु जन उसे आदर देते हैं। चौंकाने वाली बात ये है कि राम मंदिर से आई चंदा और चढ़ावा घोटाले की जानकारी  के बाद देश भर से ऐसी ही खबरों की बाढ़ सी आ गई।  सनातन धर्म के अलावा  अन्य धर्मों से जुड़ी संस्थाओं एवं संपत्तियों की लूटखसोट का पर्दाफ़ाश भी उन्हीं से जुड़े लोगों द्वारा किया जा रहा है। इन सबसे ये बात खुलकर सामने आ गई है कि लोग श्रद्धा भाव से धर्म स्थलों और उनका प्रबंधन देखने वाले संस्थानों को जो आर्थिक सहयोग देते हैं उसका निजी स्वार्थपूर्ति हेतु भी दुरूपयोग होता है। मंदिरों में चढ़ाई जाने वाली  बहुमूल्य वस्तुओं की पेशेवर चोरों द्वारा की जाने वाली चोरी पर किसी को आश्चर्य नहीं होता क्योंकि उनसे ईमानदारी की अपेक्षा कोई नहीं करता । लेकिन मंदिरों और धर्मस्थलों में सेवा प्रदान करने वालों से तो ईमानदारी और समर्पण  की उम्मीद की जाती है क्योंकि किसी भी धर्म में चोरी - बेईमानी नहीं सिखाई जाती। यही वजह है कि अयोध्या में हुई चढ़ावे की चोरी के बाद लगातार आ रही खबरें धर्म प्रेमियों को धक्का पहुँचा रही हैं। कानून दोषियों को दंडित करेगा इसका भरोसा भी लोगों को है किंतु देश भर से आ रही खबरों से लोगों की आस्था को जो ठेस लगी उसकी टीस लंबे समय तक बनी रहेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 15 July 2026

ट्रम्प के टैरिफ आतंक का जवाब हैं मुक्त व्यापार समझौते



अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा शुरू किये टैरिफ युद्ध ने एक नई तरह की  उथल - पुथल को जन्म दिया जिसके कारण अंतराष्ट्रीय व्यापार की समूची स्थापित व्यवस्था के मानदंड टूट - फूट गए। दरअसल ट्रम्प का घोषित उद्देश्य  कम आयात शुल्क के कारण अमेरिका को होने वाले व्यापार घाटे में कमी लाना था जिसमें वे काफी हद तक सफल भी हुए। लेकिन जोश में होश खो बैठने वाली उक्ति को चरितार्थ करते हुए उन्होंने टैरिफ रूपी अस्त्र से दुनिया भर  को एक साथ आतंकित करने की जो मूर्खता की उसके कारण सभी प्रमुख देशों ने अपने आर्थिक हितों के संरक्षण के लिए अमेरिका पर निर्भरता घटाने की मुहिम छेड़ दी। परिणामस्वरूप नये - नये  व्यापार समझौते होने लगे। उसी का एक उदाहरण भारत और ब्रिटेन के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता है जो आज से लागू हो गया। उल्लेखनीय है  ट्रम्प के टैरिफ दबाव के जवाब में नरेंद्र मोदी सरकार  का ये छटवाँ मुक्त व्यापार समझौता है। इसके पूर्व भारत  मॉरीशस, यूएई, ऑस्ट्रेलिया, ईएफटीए (यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ) और ओमान के साथ ऐसे ही समझौते हस्ताक्षरित कर चुका है। यही वजह है कि अमेरिका के साथ विचाराधीन  नया व्यापार समझौता करने में भारत ने जल्दबाजी नहीं दिखाई और ट्रम्प द्वारा थोपी गई इकतरफा शर्तों को मंजूर नहीं किया।  ब्रिटेन के साथ जो ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता आज, 15 जुलाई 2026 से लागू हुआ उसके अंतर्गत भारत द्वारा निर्यात किये जाने वाले लगभग  99% उत्पादों पर ब्रिटेन ने आयात शुल्क शून्य  कर दिया है। समझौते की मुख्य बातों पर नज़र डालें तो इससे विशेष तौर पर भारतीय  कपड़ा, चमड़े से बनी चीजें , सोने - चांदी के जेवरात, , समुद्री खाद्य (मछली आदि) और इंजीनियरिंग सामग्री के अलावा कृषि उत्पादों को ब्रिटिश बाजार में बड़े पैमाने पर आयात  शुल्क-मुक्त बाजार उपलब्ध होगा। दूसरी तरफ भारत सरकार ब्रिटेन से आयातित वस्तुओं  पर आयात शुल्क में चरणबद्ध कटौती करेगी। इनमें  स्कॉच व्हिस्की का टैरिफ 150% से घटाकर 40% करने के अलावा ब्रिटेन में बनी पूरी तरह तैयार कारों (सहित इलेक्ट्रिक वाहनों) पर आयात शुल्क धीरे - धीरे  110% से घटाकर 10% तक लाया जाएगा। इसके साथ ही ब्रिटेन में कार्यरत भारतीय पेशेवरों के लिए कार्य शर्तों का सरलीकरण भी इस समझौते का हिस्सा हैं। भारत ने सेब, अखरोट, सहित कुछ बीज, सोने की ईंटों व स्मार्टफोन जैसे संवेदनशील उत्पादों पर कोई शुल्क रियायत नहीं दी है। वहीं ब्रिटेन ने भी चावल, चीनी व कुछ मांस उत्पादों को समझौते के दायरे से बाहर रखा । समझौते में प्रावधान है कि भारत से ब्रिटेन जाने वाले कर्मचारियों और उनके नियोक्ताओं को पांच वर्ष तक ब्रिटेन में सोशल सिक्योरिटी योगदान नहीं देना होगा जो आईटी कंपनियों को राहत प्रदान करने वाला है। इनके अलावा भी  ऐसे अनेक बिंदु हैं जिनमें दोनों, पक्षों के हितों को संवर्धन होगा। यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ से भी चूंकि ऐसा ही समझौता किया जा चुका है इसलिए अब समूचे यूरोप के साथ भारत के व्यापारिक रिश्ते तो मज़बूत होंगे ही कूटनीतिक संबंधों में भी मिठास आयेगी। कुल मिलाकर ये मुक्त व्यापार समझौते अमेरिका के टैरिफ आतंक के विरुद्ध की गई मोर्चेबंदी है जिसमें भारत के साथ उन देशों ने भी समझौते करने में कोई झिझक नहीं दिखाई जो अमेरिकी शिविर के माने जाते हैं। इनसे एक बात स्पष्ट हो गई कि भारत केवल एक उपभोक्ता बाजार नहीं अपितु उत्पादक के तौर पर भी अपनी जगह बनाता जा रहा है। सबसे खुशनुमा पहलू ये है कि अब तक जिन - जिन देशों से मुक्त व्यापार समझौते किये गए उन सभी में अप्रवासी मूल के भारतवंशियों की बड़ी संख्या है। उनमें से कुछ वहाँ स्थायी तौर पर बस जाने के बाद भी भारतीय जीवन शैली से जुड़े होने से भारतीय वस्तुओं के उपभोक्ता हैं। उनके अलावा पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल के भी जो नागरिक उक्त देशों में रहते हैं वे भी भारतीय उत्पादों के मुरीद होने से उनकी मांग रहती है। इसीलिए  मुक्त व्यापार समझौता लागू होने से हमारे निर्यात को मजबूती मिलने के साथ ही अमेरिका के टैरिफ से होने वाले नुकसान की भरपाई हो सकेगी। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 14 July 2026

बदलते वैश्विक समीकरणों में भारत और चीन का महत्व बढ़ रहा



रूस - यूक्रेन और अमेरिका - ईरान की जंग रुकने का नाम नहीं ले रही। पूरी दुनिया इन युद्धों से हलाकान है। वैश्विक अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है। कच्चे तेल और गैस आदि की आपूर्ति बाधित होने से अभूतपूर्व ऊर्जा संकट पैदा हो गया है। ईरान द्वारा होर्मुज नामक समुद्री मार्ग बंद किये जाने से प. एशिया के तेल उत्पादक देशों का व्यापार ठप होकर रह गया है। दोनों तरफ से बरसाई जा रही बारूद ने तेल रिफ़ाइनरियों को या तो तबाह कर दिया या जबरदस्त नुकसान पहुंचाया जिसके कारण उनकी उत्पादन क्षमता प्रभावित हो गई। अमेरिका होर्मुज  खोलने का साहस दिखाता भी है तो ईरान तेल वाहक जहाजों पर मिसाइलें दागकर दहशत फैलाने से बाज नहीं आता। उसका दावा है वह इस समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलेगा जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी ऐसी ही धमकी दे रहे हैं। दूसरी तरफ यूक्रेन पर रूसी हमले को शुरू हुए बरसों बीत गए। प्रारंभ में लगता था दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य महाशक्तियों में शामिल रूस  के सामने यूक्रेन दो - चार दिनों में ही घुटने टेक देगा । रूस द्वारा उसके सीमावर्ती भूभाग पर कब्जा जमा लेने से उक्त सम्भावना और मजबूत हो गई । लेकिन जो ताजा जानकारी आ रही है उसके अनुसार यूक्रेन धीरे - धीरे ही  सही रूस के कब्जे से अपनी खोई हुई जमीन वापस लेता जा रहा है। लेकिन इससे भी बड़ी बात ये है कि उसने रूस जैसे कच्चे तेल और गैस संपन्न देश में तेल संकट उत्पन्न कर दिया। बजाय बड़े लड़ाकू विमानों के छोटे - छोटे ड्रोन के जरिये इस विश्व शक्ति के बड़े - बड़े तेल शोधन संयंत्रों को नष्ट कर डाला। परिणामस्वरूप राजधानी मॉस्को तक में पेट्रोल पंप खाली पड़े हैं। ये उस देश की हालत है जो कल तक बड़े पैमाने पर तेल और गैस निर्यात किया करता था। यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की की स्थिति रूस के राष्ट्रपति पुतिन की तुलना में अत्यंत दयनीय बताई जाती थी। लेकिन खैरात के हथियारों से लड़ने वाले यूक्रेन ने रूस की अपार सैन्य क्षमता की पोल खोलकर रख दी। इस युद्ध के कारण रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों का दुष्प्रभाव भी अब असर दिखाने लगा है। कमोबेश ऐसी ही हालत प. एशिया में चल रहे युद्ध में खुद को दुनिया का खलीफा समझने वाले अमेरिका की देखने मिल रही है जो हजारों मिसाइलें दागने और पूरे देश को मलबे के ढेर में बदल देने के बाद भी ईरान को घुटनाटेक करवाने में नाकामयाब साबित हुआ है। यूक्रेन की तरह ईरान को भी इस लड़ाई में  अकल्पनीय क्षति पहुंची है। उसकी तेल उत्पादन क्षमता पर तो विपरीत असर पड़ा ही अन्य क्षेत्रों में भी  भारी तबाही झेलनी पड़ी। सरकार और सेना में पदस्थ अनेक शीर्ष हस्तियां मारी गईं। सड़क, पुल, कारखाने तबाह हो गए। हजारों नागरिक जान गँवा बैठे। लड़ाई शुरू होते ही उसके सर्वोच्च नेता खामेनेई की जिस तरह ह्त्या हुई उसके बाद ही ये उम्मीद लगाई जाने लगी थी कि वह अमेरिका के सामने झुक जाएगा। लेकिन उसने उन सभी अरब देशों को निशाना बनाने जैसा दुस्साहस कर डाला जिनमें अमेरिका के सैन्य अड्डे थे । इन देशों को ये गुमान था कि अमेरिका उनका अभेद्य रक्षा कवच है। और इसीलिए वे ईरान  विरोधी शिविर में जाकर बैठे हुए थे। लेकिन ईरान ने उनकी खुशफहमी को तो धक्का पहुंचाया ही अमेरिका के सर्वशक्तिमान होने के अहंकार को भी जबरदस्त चोट पहुंचा दी। युद्धविराम करते समय भी उसने डोनाल्ड ट्रम्प की कड़ी शर्तों पर रजामंदी न देकर बता दिया कि भारी नुकसान के बाद भी वह आत्म समर्पण नहीं करेगा। बीते कुछ दिनों में युद्धविराम की जिस प्रकार धज्जियां उड़ रही हैं उन्हें देखते हुए ये कहा जा सकता है कि अमेरिका की अब तक की पूरी रणनीति नाकामयाब रही है। यहाँ तक कि इजराइल की रक्षा प्रणाली तक ईरान के हमलों को रोक पाने में विफल साबित हुई। उक्त दोनों लड़ाइयों ने दुनिया की दो महाशक्तियों की दादागिरी को जबरदस्त चोट पहुंचाई है। रूस की विशाल सैन्य शक्ति जहाँ यूक्रेन को झुकाने में  नाकामयाब रही वहीं अमेरिका के बेहद आक्रामक रवैये के बावजूद ईरान झुकने के लिए तैयार नहीं है। कुछ महीनों पहले जब डोनाल्ड ट्रम्प ने ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी दी तब यूरोप के वे छोटे - छोटे देश तक उनके विरुद्ध मोर्चा खोलकर बैठ गए जो दूसरे महायुद्ध के बाद से अमेरिका के संरक्षण में रह रहे थे। इस प्रकार मौजूदा परिदृश्य में विश्व का शक्ति संतुलन बदलता प्रतीत हो रहा है। रूस और अमेरिका जहाँ अपने ही बनाये जाल में फंसने के बाद उससे निकल नहीं पा रहे वहीं चीन बिना उलझे चुपचाप अपनी स्थिति मज़बूत करता जा रहा है। आने वाले समय में विश्व की महाशक्तियों को लेकर कुछ और भ्रम भी टूटना तय है। दुनिया को अपनी मुठ्ठी में बन्द करने का दम्भ भरने वाले चन्द देश अपने अंतर्विरोधों के चलते प्रभाव  खोते जा रहे हैं। इसके चलते वैश्विक शक्ति केंद्र पश्चिम से खिसक कर पूरब अर्थात एशिया की तरफ बढ़ रहा है। और इसीलिए भारत और चीन के महत्व तथा प्रभुत्व में उत्तरोत्तर वृद्धि दिखाई देने लगी है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी