Wednesday, 28 October 2026

इजरायल में नये राजनीतिक समीकरण उभरने की संभावना



इजरायल के आम चुनाव संपन्न होने के बाद जो एग्जिट पोल आ रहे हैं उनमें से ज्यादातर का मानना है की प्रधानमंत्री नेतन्याऊ सत्ता से बाहर होने जा रहे हैं। उनके मुकाबले पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइज़ेनकोट मजबूत स्थिति में नज़र आ रहे हैं।गत दिवस संपन्न मतदान के बाद अनेक चुनाव सर्वेक्षण एजेंसियों सहित स्वतंत्र राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मुकाबला बेहद कड़ा है और किसी को भी स्पष्ट बहुमत की संभावना नहीं दिख रही है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के गठबंधन में शामिल दक्षिणपंथी और अति-रूढ़िवादी दलों के गुट को लगभग 52 सीटें मिलने का अनुमान है जिसमें उनकी अपनी लिकुड पार्टी को 27 सीटें मिल सकती हैं। वहीं दूसरी तरफ  पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइज़ेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गुट को लगभग 49 सीटें मिलने का अनुमान है। इस चुनाव में अरब अल्पसंख्यक पार्टियों  के प्रदर्शन पर सबकी निगाहें लगी हैं जिन्हें करीब 19 सीटें मिलने की संभावना है। इजरायल की संसद में कुल 120 सदस्य होते है। ऐसे में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की आवश्यकता होती है।यद्यपि परिणाम 4 नवम्बर तक आयेंगे किंतु प्रारंभिक संकेतों के आधार आंकड़ों के आधार पर न तो नेतन्याहू का गुट और न ही विपक्ष अकेले दम पर बहुमत का आंकड़ा छू पा रहा है।  जो स्थितियाँ बनती दिख रही हैं उनमें सत्ता हासिल करने के लिए  दोनों नेताओं को छोटी पार्टियों के समर्थन की आवश्यकता होगी। इजरायल की राजनीति पर बीते चार साल से चले आ रहे युद्ध की छाया साफ नजर आ रही है। वहाँ की जनता युद्ध से घबराती नहीं है लेकिन एक वर्ग का मानना है कि चुनाव के बाद नई सरकार के गठन में अनेक समीकरण देखने मिल सकते हैं। पहली संभावना यह है कि आइज़ेनकोट उन अन्य पार्टियों के साथ हाथ मिला लें जो किसी भी कीमत पर नेतन्याहू को सत्ता से हटाने पर आमादा हैं। इन पार्टियों में वामपंथी और दक्षिणपंथी नेता शामिल हैं। हालांकि इनके बीच कई मुद्दों पर मतभेद हैं, लेकिन नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के नाम पर वे साथ आने राजी हैं। बावजूद इसके ऐसा गठजोड़ आसान नहीं हो सकता क्योंकि इन पार्टियों को यह तय करना होगा कि प्रधानमंत्री किसे बनाएं और नई सरकार की नीतियाँ कौन सी होंगी।  एक संभावित समीकरण ये भी है कि नेतन्याहू और उनके सहयोगी विपक्षी दलों पर निर्भर हुए बिना सरकार बनाने के लिए पर्याप्त सीटें जीत लें जबकि इससे इतर बनने वाली स्थिति राजनीतिक गतिरोध की है, जिसमें  नेतन्याहू के गठबंधन और  विपक्ष दोनों को सरकार बनाने के लिए आवश्यक 61 सीटें नहीं मिलेंगी। ऐसे में विपक्ष को अधिक सीटें मिलने पर भी, उसके दल सरकार बनाने में सहयोग करने से पीछे हट सकते हैं। इसी तरह कुछ दक्षिणपंथी दल , अरब दलों के साथ सहयोग करने से मना कर सकते हैं। प्रधानमंत्री के नाम पर भी उनमें मतभेद उभर सकते हैं। स्मरणीय है 2019 से 2022 के बीच इजरायल को  पांच चुनाव देखने पड़े  क्योंकि विभिन्न दलों में सरकार बनाने के लिए एक राय नहीं बन पाती थी। कुछ विश्लेषक एक और विकल्प की बात कर रहे हैं जो अल्पमत सरकार का है। ऐसी स्थिति में, आइज़ेनकोट या कोई अन्य विपक्षी नेता अरब पार्टियों को  गठबंधन से बाहर रखकर उनके समर्थन से सरकार बनाने की कोशिश कर सकता है।पूरे परिणाम घोषित होने के बाद  राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग विभिन्न दलों के नेताओं से मुलाकात करेंगे और उनसे पूछेंगे कि वे अगली सरकार का नेतृत्व करने के लिए किसका समर्थन करते हैं। इसके बाद वे उस उम्मीदवार का चयन करेंगे जिसके बारे में उन्हें लगता है कि गठबंधन सरकार बनाने की सबसे अच्छी संभावना है। उस उम्मीदवार को अन्य दलों से बातचीत करनी होगी और सरकार बनाने के लिए पर्याप्त समर्थन जुटाना होगा। इन चर्चाओं में कई सप्ताह या महीने भी लग सकते हैं। इस बार रिकार्ड तोड़ मतदान के कारण भी परिणामों का अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है। इस चुनाव को लेकर इजरायल में जितनी उत्सुकता है उतनी ही भारत में भी है क्योंकि वर्तमान प्रधानमंत्री नेतन्याहू और नरेंद्र मोदी के बीच काफी नजदीकी रिश्ते हैं। इसके कारण दोनों देशों की दोस्ती मजबूत हुई। भारत के प्रमुख रक्षा सहयोगी के रूप में इजरायल की गिनती होती है। ऐसे में नेतन्याहू यदि हटते हैं तब सवाल खड़ा होगा कि क्या उनके उत्तराधिकारी के साथ भी भारत की जुगलबन्दी इसी तरह जारी रहेगी या उसमें अंतर आयेगा। लेकिन इजरायल के लिए भारत से बेहतर रणनीतिक तालमेल रखना उतना ही जरूरी है जितना हमारे लिए। भारत उसके रक्षा उपकरणों सहित अन्य तकनीकी उत्पादों का बड़ा खरीददार है। साथ ही इजरायल के प्रति आम भारतीय के मन में हमदर्दी है। प. एशिया की मौजूदा स्थिति में इजरायल को भारत के समर्थन की बेहद जरूरत है। हालांकि किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए नई सरकार के बनने की प्रतीक्षा करनी होगी। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 27 October 2026

पुस्तक प्रकाशित होने से पहले विवाद पैदा करना अनुचित



सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश संजय किशन कौल द्वारा लिखी गई पुस्तक विदाउट फ़ियर ऑर फ़ेवर , प्रकाशित होने के पहले ही चर्चा में आ गई। एक पत्रिका को दिये साक्षात्कार में उन्होंने उक्त पुस्तक में वर्णित एक घटना का उल्लेख करते हुए दावा किया कि सर्वोच्च न्यायालय के पिछले मुख्य न्यायाधीश डी. वाई चंद्रचूड़ सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए प्रस्तावित नामों पर औपचारिक चर्चा से पूर्व ही सरकार के साथ उन पर विचार-विमर्श करते थे। श्री कौल के मुताबिक उन्हें यह तरीक़ा पसंद नहीं था क्योंकि  उसका मतलब न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए  सरकार से पूर्व स्वीकृति लेने जैसा था।  जस्टिस कौल की तक उक्त पुस्तक अभी बिक्री हेतु उपलब्ध नहीं हुई है। ऐसे में उसके इस अंश को सार्वजनिक करने का सीधा - सीधा उद्देश्य पुस्तक के बाजार में आने से पहले ही उसे विवादित बना देना है ताकि उसकी बिक्री बढ़े। पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक के कुछ अंशों को लेकर तो संसद तक में हंगामा हुआ जिससे सदन की कार्यवाही तक बाधित हुई। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने तो जनरल नरवणे की पुस्तक तक दिखाई जबकि वह छपकर ही नहीं आई थी। जनरल की चुप्पी ने भी पुस्तक को लेकर चले विवाद में रहस्य भी उत्पन्न कर दिया। हालांकि कुछ समय बाद उन्होंने श्री गाँधी द्वारा कही जा रही बातों को निराधार बताते हुए स्पष्ट किया कि उन्हें गलवान घाटी में चीनी सेना के मुकाबले के लिए केन्द्र सरकार की ओर से पूरी छूट मिली हुई थी। उसके बाद वह विवाद ठंडा पड़ गया। राहुल ने भी उसको भुला दिया।लेकिन जस्टिस कौल ने खुद ही साक्षात्कार देकर विवाद की शुरुआत कर दी। जब उनके द्वारा कालेजियम की बैठक से पहले सरकार से विमर्श किये जाने संबंधी खुलासे पर जस्टिस  चंद्रचूड़ से प्रतिक्रिया मांगी गई तब उन्होंने दो टूक कहा कि उन्होंने चूंकि उक्त पुस्तक अभी तक पढ़ी ही नहीं इसलिए जस्टिस संजय कौल ने उक्त बात किस संदर्भ में कही है, उस पर अभी टिप्पणी करना मुश्किल है । इसके बावजूद मैं यह ज़रूर कहना चाहूंगा कि मुख्य न्यायाधीश  के तौर पर मेरा कॉलेजियम की बैठकों का अनुभव बेहद अच्छा रहा और जस्टिस कौल के साथ भी कॉलेजियम के सदस्य के रूप में मेरा रिश्ता हमेशा बेहद सम्मानजनक रहा है।हमारे बीच सार्थक बातचीत हुई है, तर्कपूर्ण संवाद हुए हैं और कॉलेजियम की बैठकों में हम सौहार्दपूर्ण माहौल में साथ रहे हैं। जस्टिस कौल द्वारा एक पत्रिका को दिये साक्षात्कार में पुस्तक के उक्त अंश का उल्लेख किये जाने के बाद  कांग्रेस ने भी सरकार पर हमलावर होते हुए कहा है कि  मोदी सरकार के कार्यकाल में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने आरोप लगाए कि केंद्र सरकार न्यायपालिका पर 'दबाव डाल रही है और उसे कमज़ोर कर रही है। लेकिन इस सबसे हटकर दो बातें हैं जो महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान लोगों द्वारा  सेवा निवृत होने के उपरांत लिखी गई पुस्तकों के संदर्भ में विचारणीय हैं। पहली ये कि पुस्तक प्रकाशित होने के पहले उसके कुछ अंशों को सार्वजनिक कर सनसनी फैलाना कहाँ तक उचित है क्योंकि उसमें जिन लोगों के बारे में लिखा गया वे अपनी प्रतिक्रिया बिना पुस्तक देखे नहीं दे पाते और उसके बाजार में आते - आते तक विवाद शांत पड़ चुका होता है । जनरल नरवणे की पुस्तक रक्षा मंत्रालय में अनापत्ति की प्रतीक्षा कर रही थी तब उसके कुछ हिस्से सार्वजनिक कैसे हुए ये जांच का विषय है। लेकिन सरकार को घेरने में विपक्ष ने आसमान सिर पर उठा लिया। जहाँ तक जस्टिस कौल की उक्त पुस्तक का सवाल है तो पद पर रहते हुए उन्होंने मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ के उन कार्यों का विधिवत विरोध क्यों नहीं किया जिनका पुस्तक में उल्लेख है। और यदि मौखिक विरोध किया भी तब उसका कोई प्रमाण उनके पास नहीं होने से उसका उल्लेख पुस्तक में किया जाना निरर्थक है। कालेजियम के भीतर की सारी प्रक्रिया लिपिबद्ध होती है जिस पर सभी उपस्थित न्यायाधीशों की सहमति होती है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा भी है कि जो प्रस्ताव तैयार होता है उस पर किसी ने असहमति दी हो ऐसा उन्हें याद नहीं। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कालेजियम की बैठक का किसी सदस्य ने बायकाट किया हो ऐसा भी नहीं हुआ। ऐसे में लगता है जस्टिस कौल अपनी असहमति अनौपचारिक तौर पर व्यक्त करते रहे। और यदि ऐसा था तब फिर उसका पुस्तक में उल्लेख अनावश्यक ही माना जायेगा। यदि वे जस्टिस चंद्रचूड़ की कार्यप्रणाली से अपनी असहमति राष्ट्रपति को सूचित कर देते तब उनकी बात में वजनदारी होती। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 26 October 2026

खरगे जैसे बुजुर्ग ऐसी बात करेंगे तब युवाओं को कौन रोकेगा



किसी छुटभैये ने ये कहा होता तब उसको नजरंदाज किया जा सकता था किंतु  80 साल की आयु सीमा लाँघ चुका बुजुर्ग ऐसी निम्नस्तरीय बात सार्वजनिक मंच से कहे तब ये कहना अनुचित नहीं होगा कि उनका मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया है या फिर वे  अवसाद की स्थिति में हैं। संदर्भ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राजयसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा गत दिवस पटना के एक आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में की गई टिप्पणी है जिसकी वजह ने उनके साथ ही समूची कांग्रेस पार्टी कटघरे में खड़ी हो गई। दरअसल पटना में स्व. डॉ. श्री कृष्ण सिंह की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में भाषण देते हुए श्री खरगे बोल उठे  सरकार में अनियमितता करने वालों को जेल भेजा जाएगा। इस पर भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने कहा कि मोदी नहीं जाएंगे। उस पर  चिल्लाते हुए श्री खरगे ने कहा, मोदी का बाप भी जाएगा। और इस बात को उन्होंने कई मर्तबा दोहराया जिससे ये स्पष्ट हो गया कि उनकी जुबान नहीं फिसली अपितु उन्होंने   जान बूझकर वह टिप्पणी की। इसके बाद जो कुछ हुआ वह और भी शर्मनाक  था क्योंकि कांग्रेस कार्यकर्ताओं  ने मोदी नहीं जायेगा चिल्लाने वाले शख्स को भाजपाई मानकर  उसकी पिटाई कर दी। लेकिन पार्टी की किरकिरी तब हुई जब पता चला कि  संतोष नामक वह व्यक्ति भाजपा नहीं बल्कि कांग्रेस पार्टी का कार्यकर्ता ही था। सभागार से निकलने के बाद उस बेचारे ने  बताया कि लोगों को गलतफहमी हुई है। उसके अनुसार वह  तो पूरा वाक्य बोल रहा था कि जब तक जनता बगावत नहीं करेगी, तब तक मोदी कहीं नहीं जाएगा। लेकिन मेरा जब तक , वाला हिस्सा  शोर - शराबे में दब गया और कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने  मुझे बीजेपी का समर्थक समझकर पीट दिया। वहाँ उपस्थित संवाददाताओं ने भी इस बात की पुष्टि की कि  विवाद की शुरुआत एक अधूरे वाक्य और गलतफहमी से हुई।  श्री खरगे की उक्त टिप्पणी के विरोध में गृहमंत्री अमित शाह ने कांग्रेस अध्यक्ष की भाषा को राजनीतिक मर्यादाओं के विरुद्ध बताया वहीं पार्टी ने देशव्यापी प्रदर्शन की घोषणा कर डाली। पटना के कोतवाली थाने में खरगे के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज कराई गई है। यद्यपि ये पहला अवसर नहीं है जब किसी कांग्रेस नेता ने प्रधानमंत्री के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणी की हो। अतीत में ऐसी घटनाएं दोहराई जाती रहीं जिनके चलते कांग्रेस को राजनीतिक नुकसान भी उठाना पड़ा। राहुल गाँधी तो श्री मोदी के बारे में जिस शैली और शब्दों का उपयोग करते हैं उससे आये दिन विवाद उत्पन्न होते हैं। उनके और प्रधानमंत्री के बीच सौजन्य भेंट भी कम ही होती है किंतु श्री खरगे और शुरू मोदी के आपसी संबंध काफी अच्छे हैं। विभिन्न अवसरों पर एक - दूसरे से मिलते समय दोनों परस्पर सम्मान व्यक्त करते नजर आते हैं। इसीलिए कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा प्रधानमंत्री के पिता को लेकर कही गई बात से लोगों को आश्चर्य हुआ। उम्मीद तो ये थी कि कांग्रेस के बुजुर्गवार अध्यक्ष अपनी स्तरहीन टिप्पणी के लिए तत्काल खेद व्यक्त करते हुए क्षमा मांग लेते। लेकिन अभी तक तो उनकी ओर से इस बारे में कुछ नहीं कहा गया। उल्टे कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने बेहद बचकाने अंदाज में उनका बचाव करते हुए सफाई दी है कि उनका इशारा प्रधानमंत्री के वैचारिक मार्गदर्शक संगठन (रा .स्व .संघ)  की ओर था। सवाल ये है कि श्री खेड़ा को ये दिव्य ज्ञान स्व प्रेरणा से हुआ या श्री खरगे ने उन्हें ऐसा कहने के लिए निर्देशित किया। हो सकता है कांग्रेस पार्टी और खुद खरगे जी अतीत में प्रधानमंत्री सहित अन्य भाजपा नेताओं की टिप्पणियों का उदाहरण देकर पटना में कही गई बात को उचित ठहराएं किंतु आरोप - प्रत्यारोप से अलग हटकर देखें तो श्री खरगे ने जो कहा वह उनके पद और उम्र को देखते हुए अप्रत्याशित और आपत्तिजनक था जिसके लिये  वे बिना देर लगाए खेद व्यक्त कर देते तब आलोचना और फजीहत से बच जाते। अब तक उनके और श्री मोदी के बीच निजी संवाद एवं व्यवहार शालीनता की सीमा में ही रहा है। ये देखते हुए अब खरगे जी जब भी प्रधानमंत्री के रूबरू होंगे तब किस मुँह से उनका सामना करेंगे वे बड़ा सवाल है। हालांकि आज की राजनीति में मर्यादा और शालीनता जैसे शब्द अर्थ खोते जा रहे हैं । जंतर मंतर पर हुए आंदोलन के दौरान प्रधानमंत्री के बारे में लड़के - लड़कियों के कुछ गुटों ने जिस अश्लील शब्दावली का उपयोग किया उसकी सर्वत्र निंदा हुई और नई पीढी़ में संस्कारों के क्षरण को लेकर चिंता जताई जाने लगी। लेकिन जब खरगे जी जैसे वयोवृद्ध सार्वजनिक मंच पर इस तरह की भद्दी भाषा का प्रयोग करेंगे तब युवा पीढ़ी को कौन रोकेगा? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 24 October 2026

कुछ पेशेवर किस्म के लोग हर आंदोलन में नजर आते हैं



कुछ वर्ष पहले जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में आंदोलनजीवी शब्द का उपयोग किया तब विपक्ष ने इस पर खूब बवाल मचाया। उसका कहना था कि प्रधानमंत्री ने उन लोगों का मजाक बनाया जो जनहित के लिए आवाज उठाते हैं। लोकतंत्र में जनांदोलन अपनी मांगों को रखने के साथ ही सरकार के विरोध का प्रचलित तरीका है। भारत के स्वाधीनता संग्राम ने पूरे विश्व को ये सिखाया कि हिंसा का सहारा लिए बिना भी ब्रिटिश सत्ता जैसी वैश्विक शक्ति को झुकाया जा सकता है। भारत की आजादी के बाद अनेक देशों ने शांतिपूर्ण अहिंसक आंदोलन के जरिये विदेशी दासता से मुक्ति हासिल की। दक्षिण अफ्रीका के नेल्सन मंडेला तो लगभग तीन दशक तक कारागार में रहने के बाद भी अहिंसक आंदोलन के महानायक बनकर  राष्ट्रपति बने। भारत में तो राजनीति और आंदोलनों का चोली दामन का साथ रहा है। आजादी के आंदोलन में शामिल अग्रणी पंक्ति के अनेक नेता जहाँ सत्ता प्रतिष्ठान के शीर्ष पर विराजमान हुए वहीं उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर ब्रिटिश हुकूमत से लड़ने वाले उतने ही लोकप्रिय और सम्मानित नेताओं ने सैद्धांतिक विरोध के चलते विपक्ष में बैठना पसंद किया। विपक्ष में रहते हुए कुछ नेता श्रमिकों के हितों में संघर्ष के रास्ते पर चले तो कुछ ने कर्मचारियों , किसानों और छात्रों के संगठन भी बनाये। सभी क्षेत्रों के लोगों ने अपनी मांगों के लिए हड़ताल, धरना, प्रदर्शन, रैली अनशन जैसे तरीके अपनाये। राजनीतिक दलों द्वारा भी ग्रामीण क्षेत्र से लेकर तो राजधानी दिल्ली तक में आंदोलनों के जरिये शक्ति प्रदर्शन किया। लेकिन समय के साथ उनका स्तर गिरने से अनुशासनहीनता का बोलबाला हो गया। वाजिब मांगों के बजाय अनुचित दबाव बनाने की प्रवृत्ति जोर पकड़ने लगी। इसके लिए राजनीतिक दलों को दोष देना गलत नहीं होगा जिन्होंने किसी आंदोलन के पीछे छिपे निहित उद्देश्यों को जांचे बिना ही अपने फायदे के लिए उसका समर्थन किया। हालांकि ये स्वीकार करना  होगा कि आंदोलनों से कर्मचारियों, मजदूरों और किसानों की स्थिति में सुधार हुआ किंतु दूसरी तरफ इसका लाभ संगठित क्षेत्र को ही मिलता रहा। अर्थात दबाव समूह से जुड़ा तबका तो अपनी बात मनवाने में कामयाब हो गया किंतु बहुत बड़ा वर्ग  असंगठित होने से वंचितों की श्रेणी में जीने बाध्य है। यही विसंगति देश के सामने मौजूद अनेक समस्याओं की जड़ है। और इसीलिए आंदोलनों के प्रति व्यक्त की जाने वाली भावनाएं बदलने लगीं। हमारे देश में दो बड़े जनांदोलनों के बाद केंद्रीय सत्ता बदली।। इनमें जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुआ संपूर्ण क्रांति आंदोलन जिसके कारण आपातकाल लगा और जब चुनाव करवाये गए तब इंदिरा गाँधी को सत्ता गँवाना पड़ी। उसी तरह अन्ना हजारे द्वारा लोकपाल की स्थापना के लिए किये आंदोलन ने डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के जाने का रास्ता बनाया। लेकिन बीते कुछ सालों में देश जिस तरह के आंदोलन देख रहा है उनमें जनहित की आड़ में देशहित को नुकसान पहुंचाने का जो खेल हो रहा है वह खतरनाक है। चाहे मुद्दा किसानों का हो, दलितों या पिछड़ों का हो, कर्मचारी - श्रमिकों का या छात्रों का। उसके समर्थन में कुछ घिसे - पिटे चेहरे आगे - आगे घूमते दिख जाएंगे। कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली की सीमा पर साल भर चले धरने और शाहीन बाग में सड़क घेरकर किये आंदोलन को प्रोत्साहन और समर्थन देने एक वर्ग विशेष की सक्रियता चर्चा का विषय बनी। जंतर मंतर पर हुए हालिया आंदोलन के दौरान भी वही लोग मौजूदगी दर्ज करवाते नजर आये । उसी तरह  नीट परीक्षा के पेपर लीक होने वाले मामले से शुरू होकर मुख्य चुनाव आयुक्त के त्यागपत्र और एसआईआर रद्द करने के लिए हो रहे आंदोलन में भी अनेक समान चेहरे देखे जा सकते हैं। कभी - कभी तो लगता है इन लोगों की रोजी - रोटी ही आंदोलनों से जुड़ी हुई है। और इसीलिए इन आंदोलनों का स्वरूप बिखरा - बिखरा नज़र आता है। किसान आंदोलन, शाहीन बाग और अब चुनाव आयोग के विरुद्ध सड़कों पर उतरे लोगों के साथ चंद ऐसे लोग अनिवार्य रूप से जुड़ गए हैं जिन्हें आंदोलनजीवी कहा जाना सर्वथा उचित है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने कॉकरोच जनता पार्टी के दो नेताओं की उम्र जानने के बाद कटाक्ष किया कि वे जेन जी नहीं हैं। कुल  मिलाकर ये देखने मिल रहा है कि जनांदोलन के नाम पर कुछ ऐसे पेशेवर लोग खुद को नेता साबित करने में लगे हुए हैं जिन्हें जनता धूल चटा चुकी है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि इन्हीं धंधेबाजों की वजह से आंदोलन अपनी साख खो बैठते हैं। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 23 October 2026

बद्र समझौता : ईरान के विरुद्ध मुस्लिम देशों की मोर्चेबंदी



अगस्त माह में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने मिलकर  मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट हस्ताक्षरित किया था। इसे इस्लामिक नाटो नाम दिया गया क्योंकि इसके तहत किसी एक देश पर हुआ सशस्त्र हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा । जैसी कि नाटो नामक संगठन में व्यवस्था है जिसका नेतृत्व अमेरिका करता है। इसका गठन शीतयुद्ध के दौर में सोवियत संघ के विरोध में किया गया था। इसके तहत जरूरत पड़ने पर परमाणु और मिसाइल सुरक्षा के साथ-साथ साझा सैन्य ट्रेनिंग और खुफिया जानकारी  का लेनदेन भी शामिल है। इसके मुकाबले सोवियत संघ द्वारा वारसा पैक्ट नामक ऐसी ही संधि की गई थी। इन दोनों के अलावा एक तीसरा संगठन गुट निरपेक्ष सम्मेलन के नाम से बना जो उक्त नाटो और वारसा दोनों संधियों से अलग था। इसके नेता के तौर पर भारत के पं. जवाहरलाल नेहरू, यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो, मिस्र के  कर्नल नासेर और इंडोनेशिया के सुकर्णों थे। सोवियत संघ के विघटन के बाद शीतयुद्ध की समाप्ति हो गई। इसके बाद उदारीकरण के अंतर्गत विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया जिसके कारण समूचा विश्व एक बड़े बाजार में तब्दील हो गया। यहाँ तक कि चीन जैसे कट्टर साम्यवादी देश ने भी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के प्रभाव में आकर अपने दरवाजे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खोल दिये। इसके बाद चीन भी अमेरिका की टक्कर में एक आर्थिक महाशक्ति के तौर पर उभर गया। इसके साथ ही उसने सैन्य महाशक्ति के रूप में भी खुद को स्थापित कर लिया। इसके चलते दुनिया का शक्ति संतुलन भी बदलने लगा। धीरे - धीरे और शक्ति केंद्र भी अपनी जगह बनाते चले गए। लेकिन शीतयुद्ध के भयावह दौर से निकलकर दुनिया में आर्थिक विकास की होड़ बीते तीन दशकों में देखने मिली जिसमें अमेरिका के साथ ही चीन, भारत, ब्राज़ील, और द. अफ्रीका जैसे नये खिलाड़ी मैदान में नजर आने लगे। इसकी वजह से अमेरिका की चौधराहट को चुनौती मिलने लगी। लेकिन  अचानक दुनिया दो ऐसी लड़ाइयों में उलझ गई जिनकी वजह से सब उलट - पुलट हो गया। पहले रूस - यूक्रेन और फिर अमेरिका - ईरान के बीच चल रहे युद्ध ने सभी स्थापित संतुलन बिगाड़ दिये। रही - सही कसर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सनकीपन ने पूरी कर दी। रूस - यूक्रेन युद्ध तो एक क्षेत्र विशेष तक सीमित है लेकिन ईरान ने अमेरिका और इजरायल के हमले के प्रत्युत्तर में जवाबी हमला करते हुए अन्य इस्लामिक देशों तक फैला दिया। ये एक अभूतपूर्व स्थिति है क्योंकि इसके पहले तक इजरायल के विरुद्ध समूचा इस्लामिक जगत एकजुट हो जाता था। लेकिन इस जंग ने इस्लामिक देशों में भी गुटबाजी पैदा कर दी। मक्का पैक्ट इसी की उपज थी। लेकिन सऊदी अरब के विरुद्ध हूती हमलों को जिस प्रकार ईरान समर्थन दे रहा है और अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी देशों ने मदद से हाथ पीछे खींचे उसके कारण कुछ इस्लामिक देशों में सैन्य आत्मनिर्भरता की भावना जागी जिसका प्रमाण गत दिवस कतर की राजधानी दोहा में पाकिस्तान, तुर्किये, कतर और इंडोनेशिया द्वारा किया गया बद्र समझौता है जिसके तहत ये देश मिलकर हथियार और सैन्य तकनीक का साझा उत्पादन करेंगे। इसका उद्देश्य हथियारों के लिए पश्चिमी देशों पर निर्भरता घटाना, आपसी रक्षा उद्योग को बढ़ावा देना और सैन्य तकनीक का आदान-प्रदान करना है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बद्र समझौते से ये  आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर एक नया रक्षा समीकरण बन सकता है।  विचारणीय बात ये है कि क्या ये केवल ईरान से बचाव के लिए बना या इजरायल के विरुद्ध भी इसका उपयोग होगा। इससे भी बड़ी बात ये है कि तुर्किये और पाकिस्तान के कारण इससे भारत को भी सतर्क रहना पड़ेगा। दूसरी बात ये है कि अमेरिका इसे लेकर क्या रवैया अपनाता है क्योंकि वह नहीं चाहेगा कि सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान सैन्य आत्मनिर्भरता हासिल करें अन्यथा उसका अपना धंधा चौपट हो जायेगा। भारत को भी इस नये समझौते के जवाब में कुछ न कुछ करना होगा क्योंकि वह खुद हथियारों के निर्यातक के रूप में उभर रहा है। देखने वाली बात ये भी होगी कि इसके बाद इस्लामिक देशों के संगठन का क्या होगा क्योंकि ईरान ने उसकी जड़ें हिला दी हैं। कुल मिलाकर दुनिया का शक्ति संतुलन जिस तरह बदल रहा है उसमें बद्र समझौता एक नये अध्याय की शुरुआत कहा जा सकता है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी




Thursday, 22 October 2026

कॉकरोच जनता पार्टी का खोखलापन सामने आ गया



कॉकरोच जनता पार्टी के बारे में अवधारणा थी कि इसका सबसे बड़ा नेता अभिजीत दिपके है जिसने देश के मुख्य न्यायाधीश  द्वारा युवकों को लेकर कॉकरोच शब्द का उपयोग किये जाने की प्रतिक्रिया स्वरूप अमेरिका में बैठे - बैठे इस पार्टी का सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर गठन किया। देखते - देखते आभासी माध्यम पर  करोड़ों लोग उससे जुड़ गए जिनमें अधिकतर युवा ही थे। जून में अभिजीत  भारत लौटे। उस समय नीट परीक्षा के पेपर लीक हो जाने से दुखी होकर कुछ छात्रों द्वारा आत्महत्या किये जाने से छात्र और युवाओं में गुस्सा था। यद्यपि कांग्रेस  उस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन करते हुए उस समय के  शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग कर रही थी। लेकिन सरकार ने उसे नजरंदाज कर दिया। यदि उसी समय उनको मंत्रीपद से हटा दिया जाता तब  शायद कॉकरोच जनता पार्टी को मौका नहीं मिलता। लेकिन अभिजीत जब अमेरिका से आये तब सरकार ने  उन्हें जरूरत से ज्यादा महत्व देते हुए जंतर मंतर पर सभा की अनुमति दे दी। उनके साथ अचानक सौरव दास और आशुतोष रांका नामक दो और युवक सामने आए जिनके बारे में लोगों को कुछ पता नहीं था। उसी सभा में श्री प्रधान के त्यागपत्र के लिए लिए  अंतिम तिथि तय करते हुए आंदोलन की चेतावनी भी दी गई। त्यागपत्र न होने पर जंतर मंतर में धरना शुरू हुआ। जिसमें जेएनयू की टुकड़े - टुकड़े गैंग और आम आदमी पार्टी खुलकर सामने आ गईं। धीरे - धीरे स्पष्ट हो गया कि अभिजीत , सौरव और आशुतोष आम आदमी पार्टी के लिए काम करते  रहे हैं। बहरहाल शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र सहित कुछ और मांगों पर केंद्र से समझौता होने पर आंदोलन समाप्त हो गया और  कॉकरोच जनता पार्टी ने राजनीति से दूर रहकर दबाव समूह के तौर पर शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त समस्याओं और विसंगतियों को दूर करने हेतु काम करने का ऐलान किया। उसके नेता विद्यालयों के निरीक्षण जैसे कामों में जुट गये। हालांकि सरकार को धमकाना उनकी आदत सी बन गई। इसी समय एक अखबारी रिपोर्ट के आधार पर विपक्षी पार्टियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के त्यागपत्र के लिए आंदोलन छेड़ दिया। अभी तक शिक्षा जगत तक खुद को सीमित रखने वाली कॉकरोच जनता पार्टी  भी बहती गंगा में हाथ धोने दिल्ली में सक्रिय हो गई। उसे लगा कि श्री प्रधान के त्यागपत्र की तर्ज पर वह ज्ञानेश कुमार का त्यागपत्र भी करवा लेगी। लेकिन इस बार उसका आकलन गलत हो गया। दूध से जली सरकार ने छाछ फूंककर पीने की कहावत चरितार्थ करते हुए जो मोर्चेबंदी की उसमें कॉकरोच जनता पार्टी उलझ गई। निषेधाज्ञा तोड़ने पर हिरासत में लिए जाने के बाद शांति भंग न करने का लिखित वचन पत्र देकर उसके तीनों नेता बाहर तो आ गए किंतु जंतर मंतर को प्रतिबंधित किये जाने के बावजूद भी वहाँ तिरंगा यात्रा निकालने का दुस्साहस कर बैठे। अभिजीत को तो पहले ही   गिरफ्तार कर छोड़ भी दिया गया किंतु सौरव और आशुतोष  बैरिकेड लाँघकर प्रतिबंधित क्षेत्र में तिरंगा लेकर पहुंचे तो गिरफ्तार करने के बाद जेल भेज दिये गए। सप्ताह पर बाद गत दिवस दोनों जमानत पर रिहा तो हो गए किंतु मामला क्राइम ब्रांच को दिये जाने से जाँच के शिकंजे में फंस गए। आज ही उन्हें क्राइम ब्रांच ने बुलावा भेज दिया। पूरे देश को जंतर मंतर बना देने की डींग हांकने वाले कॉकरोच नेता अब अपने बचाव में लग गए हैं। अभिजीत सफाई देते फिर रहे हैं कि पार्टी का उद्देश्य ज्ञानेश कुमार का त्यागपत्र ही है। सरकार बदलने और बांग्लादेश तथा नेपाल में हुए आंदोलनों से उसे कुछ लेना देना नहीं है। और तो और वे यहाँ तक बोल गए कि पार्टी के बड़े नेता सौरव दास और आशुतोष रांका  हैं , वे तो उनके आदेशानुसार काम करते हैं। उनका ये बयान रहस्यमय है। श्री प्रधान के त्यागपत्र के मामले में सरकार को झुकाने में सफलता मिलने से सातवें आसमान पर उड़ने लगे सौरव और आशुतोष की सारी अकड़ उच्च न्यायालय ने निकालते हुए उन्हें जेन जी मानने से ही इंकार करते हुए जो फटकार लगाई उसके बाद इस पार्टी का खोखलापन उजागर हो गया। असल में उसके तीनों नेता खुद को कानून से ऊपर समझने की गलती कर गए। उनके जेल जाने का विरोध करती  युवाओं की फौज कहीं नजर नहीं आई जिसका संकेत साफ है। आम आदमी पार्टी छोड़कर बाकी के राजनीतिक दल  इस नई नवेली पार्टी के कानूनी पचड़ों में फंस जाने से मन ही मन खुश हैं क्योंकि ये  एकला चलो की नीति पर चल रही थी। अब इज्जत बचाने के लिए अभिजीत, सौरव और आशुतोष अपने  गॉड फादर अरविंद केजरीवाल की शरण में जाएंगे किंतु जिस तरह काठ की हांडी दोबारा नहीं चढ़ती ठीक वैसे ही कॉकरोच जनता पार्टी भी जुलाई जैसा आंदोलन दोबारा खड़ा नहीं कर पाएगी क्योंकि उसके पास न तो कोई सैद्धांतिक आधार है और न ही संगठनात्मक ढांचा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 21 October 2026

नेहा और भूषण के बयानों से आंदोलन की धार कमजोर हो गई



अचानक सब शांत हो गया। दो नेताओं के जेल जाने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी के प्रमुख अभिजीत दिपके अपने कार्यकर्ताओं को परिवार के लिए समय निकालने की समझाइश देते सुने जा रहे हैं। दूसरी तरफ वोट चोरी आंदोलन को जिंदा रखने वाले राहुल गाँधी गोवा में गरजने के बाद निजी काम से वियतनाम चले गए ।  वैसे भी त्यौहारों  के समय किसी जनांदोलन को जीवंत रखना मुश्किल होता है। शायद यही सोचकर कॉकरोच और काँग्रेस दोनों ने आंदोलन को विराम दे दिया । हालाँकि काँग्रेस द्वारा 1 नवम्बर को दिल्ली के रामलीला मैदान में मुख्य चुनाव आयुक्त विरोधी महारैली आयोजित  करने की घोषणा की जा चुकी है क्योंकि  उसके बाद फिर दीपावली की तैयारियां शुरू होने से बड़े आंदोलन की  गुंजाइश नहीं रहेगी। दरअसल श्री गाँधी सहित अन्य विपक्षी नेताओं के सर्वोच्च न्यायालय परिसर में जुलूस लेकर पहुँचने पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा नाराजगी व्यक्त करने और तमाम नेताओं को नोटिस भेजे जाने के बाद विपक्षी नेताओं की अकड़ में कमी आ गई। उन्हें ये महसूस होने लगा कि  न्यायपालिका विशेष रूप से सर्वोच्च न्यायालय से टकराव भारी पड़ सकता है। विपक्ष के तेवर ठंडे पड़ने का सबसे बड़ा कारण बना आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा द्वारा ज्ञानेश कुमार विरोधी आंदोलन को बांग्लादेश में हुए युवा आंदोलन से प्रेरित बताये जाने से जिसके कारण शेख हसीना को जान बचाकर भारत आना पड़ा। रही सही कसर पूरी कर दी वरिष्ट अधिवक्ता प्रशांत भूषण द्वारा  इस आंदोलन के जरिये सरकार बदलने की शेखी बघारे जाने से। इन दोनों के बड़बोलेपन की वजह से विपक्ष की आक्रामकता को जबर्दस्त धक्का लगा। इसका प्रमाण तब मिला जब कॉकरोच जनता पार्टी प्रमुख अभिजीत ने  ये सफाई दी की कि इस आंदोलन को बांग्लादेश या नेपाल में हुए युवा आंदोलन से जोड़ना गलत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य सरकार को नहीं अपितु ज्ञानेश कुमार को हटाने तक ही सीमित है। काँग्रेस की तरफ से शशि थरूर ने  भी नेहा बोरा तथा प्रशांत भूषण के बयानों से असहमति व्यक्त करते हुए आंदोलन के जरिये सरकार को हटाने जैसी किसी भी कोशिश का खंडन किया। अन्य विपक्षी नेताओं के अलावा जो गैर राजनीतिक तबका ज्ञानेश कुमार के विरोध में चल रहे विपक्षी आंदोलन को भावनात्मक समर्थन दे रहा था वह भी बांग्लादेश जैसी अराजकता से प्रेरणा लेने और सरकार हटाने के लिए खूनखराबा हो जाने की बात कहे जाने से बिदक गया। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि नेहा बोरा और प्रशांत भूषण द्वारा जोश में होश खो बैठने और बेहद गैर जिम्मेदाराना बयान दिये जाने से विपक्षी आंदोलन के सामने छवि का संकट खड़ा हो गया। भाजपा ने भी बिना देर लगाए नेहा और श्री भूषण के उल्लिखित बयानों के आधार पर ये आरोप लगाना शुरू कर दिया कि विपक्ष भारत में बांग्लादेश जैसा हिंसात्मक वातावरण बनाकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से  चुनी हुई सरकार को अपदस्थ करना चाह रहा है जिसकी वजह से देश अराजकता के मकड़जाल में फंसकर रह जाएगा। नरेंद्र मोदी को पानी पी - पीकर गालियाँ देने वाले कतिपय यू - ट्यूबर पत्रकारों ने भी माना कि इस आंदोलन को बांग्लादेश से प्रेरित और सरकार हटाने से जोड़ना आत्मघाती कदम है। इन्हीं सब वजहों से आंदोलन का पैनापन कम हो गया और बीते कुछ महीनों के बाद विपक्ष को रक्षात्मक होना पड़ा। परिणाम ये हुआ कि आंदोलन से जुड़े संगठन      नेहा बोरा और प्रशांत भूषण से दूरी बनाने लगे। उन सबकी समझ में ये बात आ गई है कि भारत की जनता किसी भी स्थिति में हिंसा की राजनीति को स्वीकार नहीं करेगी। देखना ये है अब ये आंदोलन  किस तरह आगे बढ़ेगा क्योंकि अपनी ढपली, अपनी राग के चलते उसमें बिखराव खुलकर सामने आ चुका है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी