दूसरे विश्व युद्ध के बाद अस्तित्व में आए सं.रा.संघ का मुख्य कार्य दुनिया भर में शांति सहअस्तित्व और आपसी सहयोग की भावना विकसित करना है। उपनिवेशों का दौर धीरे - धीरे कमजोर पड़ने से छोटे - छोटे अनेक सर्वप्रभुता संपन्न देशों का उदय हुआ जिन्हें सं.रा.संघ की सदस्यता प्रदान कर बड़े देशों के साथ बराबरी से बैठने का अधिकार मिला। हालांकि सं.रा.संघ की सुरक्षा परिषद में पाँच स्थायी सदस्यों को मिले वीटो अधिकार की वजह से सामंती व्यवस्था के अवशेष कायम हैं किंतु दुनिया भर में मानवीयता की सेवा और साधनहीन देशों को संरक्षण प्रदान करने में इस विश्व संस्था ने प्रभावी भूमिका का निर्वहन भी किया। वहीं तनाव के अनेक अवसरों पर मध्यस्थ बनकर दुनिया को जंग से बचाया। उसके द्वारा पोषण , स्वास्थ्य, शिक्षा और सेवा के अनेक प्रकल्प भी संचालित हो रहे हैं। यूनीसेफ और यूनेस्को जैसे नाम पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। सं.रा.संघ की महासभा के महासचिव का चुनाव सभी सदस्यों के मतदान से होता है। सुरक्षा परिषद में भी बारी - बारी से सामान्य सदस्य निर्वाचित होते हैं लेकिन पांच स्थायी सदस्यों को प्राप्त वीटो नामक अधिकार के कारण उनका होना न होना बराबर है क्योंकि इनमें से एक भी किसी फैसले को रोक सकता है। यही कारण है कि यह विश्व संस्था इन पांच सदस्य देशों के हाथ की कठपुतली बनकर रह गई है। ताजा उदाहरण इज़राइल - हमास, रूस - यूक्रेन और अमेरिका - इसराइल की ईरान के साथ चल रही जंग में सं.रा.संघ की उदासीन भूमिका है। युद्ध में विस्थापित हुए लोगों की सहायता करने में जरूर उसकी सक्रियता दिखाई दी लेकिन युद्धरत देशों के बीच सुलह करवाकर शांति स्थापना के अपने दायित्व के निर्वहन में वह पूरी तरह असफल रहा है। सबसे बड़ी विडंबना ये है कि उसने इस दिशा में समुचित प्रयास किए हों ऐसा भी नहीं लगता। इसके पीछे जाहिर तौर पर सुरक्षा परिषद के वीटो शक्ति सम्पन्न देशों का ही दबाव है जो अपने स्वार्थ के लिए पूरी दुनिया को आग में झोंकने में संकोच नहीं करते। इसराइल और हमास के बीच छिड़ी जंग में अमेरिका और उसके साथी पश्चिमी देश जहां इसराइल के साथ खड़े रहे वहीं रूस और चीन ने भले ही प्रत्यक्ष रूप से हमास का समर्थन न किया हो किंतु उनके द्वारा इजराइल का विरोध भी एक तरह से हमास के प्रति उनका झुकाव दर्शाता है। रूस और यूक्रेन की लड़ाई में अमेरिका , ब्रिटेन और फ्रांस मिलकर भी रूस को झुका नहीं सके क्योंकि सुरक्षा परिषद में वीटो नामक हथियार होने से वह अकेला ही सब पर भारी है। हालांकि चीन भी उसके पीछे ही खड़ा हुआ है। वर्तमान में ईरान की अमेरिका और इसराइल के साथ हो रही जंग ने पूरी दुनिया को हलाकान कर रखा है। तेल उत्पादक देशों के इसमें शामिल हो जाने के कारण पूरे विश्व में पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और उर्वरक का संकट उत्पन्न हो गया है। कोरोना संकट से किसी तरह उबरी दुनिया उक्त तीन युद्धों के कारण अभूतपूर्व मुसीबत में फंसी हुई है। शांति के प्रस्ताव फटे हुए कागज के टुकड़ों की तरह उड़ते देखे जा सकते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प मोहल्ले के गुंडे की तरह व्यवहार करने पर आमादा हैं। लेकिन कोई उन्हें रोकने - टोकने वाला नहीं है। वे एक पल युद्ध समाप्त होने की बात करते और दूसरे ही पल ज़ोरदार हमले की धमकी देते हैं। कहने को ये लड़ाई कुछ देशों तक सीमित है लेकिन इसके कारण पैदा हुए ऊर्जा संकट ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है। इसीलिए ये अपेक्षा की जाती है कि सं.रा.संघ आगे आकर इसे रुकवाने और स्थायी शांति के लिए अपने प्रभाव का उपयोग करेगा किंतु शांति के लिए जो प्रयास चल रहे हैं उनमें उसकी कोई भूमिका नहीं होने से युद्ध की आग बुझने का नाम नहीं ले रही। उल्लेखनीय है ट्रम्प ने सत्ता में लौटते ही सं.रा.संघ की उपयोगिता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। केवल वे ही नहीं रूस के राष्ट्रपति पुतिन और चीन के जिनपिंग भी अपनी स्वेच्छाचारिता के लिए कुख्यात हैं किंतु सं.रा.संघ में उन्हें रोकने तो क्या उनसे बात करने तक साहस नहीं बचा। एक समय था जब इस विश्व संस्था के महासचिव को पूरी दुनिया जानती थी किंतु अब तो वे खबरों से ही गायब होते जा रहे हैं। सं.रा.संघ के इसी निकम्मेपन के कारण दुनिया विनाश के कगार पर आ खड़ी हुई है। ऐसे में ट्रम्प की देखा सीखी अन्य देशों के नेता भी इसकी निरर्थकता का रोना रोने लग जाएं तो आश्चर्य होगा। कभी - कभी तो लगता है कि सं.रा.संघ जीते जी ही इतिहास बनने के कगार पर है।
- रवीन्द्र वाजपेयी