मेरिका और ईरान के बीच लड़ाई रुकवाने के लिए पाकिस्तान की कूटनीतिक पहल पर जब विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर से पूछा गया कि भारत इस मामले में क्यों पीछे रहा तब उन्होंने उत्तर दिया था कि हम दलाली नहीं करते। उसके बाद मोदी सरकार के पेशेवर विरोधियों ने पाकिस्तान की शान में कसीदे पढ़ते हुए भारतीय विदेश नीति की आलोचना का अभियान छेड़ दिया। विदेश मंत्री की दलाली वाली टिप्पणी का मखौल उड़ाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी गई। इसके लिए भी सरकार को कठघरे में खड़ा किया गया कि उसने खामेनेई की हत्या की निंदा करने में विलंब किया और बजाय शीर्ष स्तर पर बयान जारी करने के विदेश सचिव को ईरानी दूतावास भेजकर शोक संदेश सौंपा। जब अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि बातचीत हेतु पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में जमा हुए और अंतरिम युद्धविराम पर सहमति बनी तब भी भारतीय विदेश नीति पर निशाने साधे गए और पाकिस्तान की अमेरिका और ईरान से नजदीकी बढ़ने को भारत के लिए खतरा बताया जाने लगा। हालांकि जब अंतिम रूप से युद्धविराम हुआ तब भले ही उस पर हस्ताक्षर पाकिस्तान में नहीं हुए किंतु जब उसे इस्लामाबाद समझौता कहा गया तब सरकार विरोधी प्रचारतंत्र को एक मौका और मिल गया। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री श्री जयशंकर तमाम आलोचनाओं का उत्तर देने के बजाय संयमित बयानों तक ही सीमित रहे और पूरा ध्यान कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति जारी रहने पर केंद्रित रखा। उसका लाभ ये हुआ कि युद्ध रुकते ही भारत ने ईरान सहित अन्य तेल उत्पादक देशों से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदकर देश को ऊर्जा संकट से बचाये रखा। यह भी संज्ञान योग्य है कि युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद पाकिस्तान को किनारे कर दिया गया। वहीं फ्रांस में हुए जी - 7 सम्मेलन में राष्ट्रपति ट्रम्प ने श्री मोदी की प्रशंसा करते हुए भारत के महत्व को स्वीकार किया। युद्धविराम के बाद भी अमेरिका, ईरान और इजरायल तीनों के बीच धमकियों के आदान - प्रदान के अलावा बीच - बीच में आक्रमण और प्रत्याक्रमण का दौर भी चलता रहा। होर्मुज पर कब्जे को लेकर ईरान की हेकड़ी और ट्रम्प की धमकियां भी नहीं रुकीं। बीते कुछ दिनों में खामेनेई के अंतिम संस्कार के लिए दुनिया भर से कूटनीतिक हस्तियां ईरान में जमा थीं। उसी दौरान ईरान ने होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर मिसाइलें छोड़ कर भड़काऊ कारवाई कर दी जिसके बाद ट्रम्प ने युद्धविराम खत्म कर ईरान में दर्जनों ठिकानों पर बमबारी करवा डाली। जिसने शांति की संभावना पर पानी फेर दिया। आश्चर्य ये है कि खुद को कूटनीति का उस्ताद समझ बैठे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उनके फील्ड मार्शल आसिफ मुनीर युद्धविराम के टूटने पर असहाय बैठे हैं । ये देखने के बाद इस विवाद में भारत द्वारा अपने को निर्लिप्त रखने की नीति का औचित्य स्वतः ही सिद्ध हो गया। सही बात ये है कि अमेरिका ने पाकिस्तान को ईरान से संवाद स्थपित करने के लिए बतौर औजार उपयोग किया। यदि वाकई उसकी वजनदारी इतनी होती तब दोनों पक्षों के बीच संवाद सेतु की भूमिका निभाते हुए दोबारा तनाव पैदा होने ही नहीं देता। वैश्विक राजनीति के मौजूदा समीकरणों को देखते हुए इस युद्धविराम की सफलता शुरू से ही संदिग्ध रही। डोनाल्ड ट्रम्प तो अविश्वसनीयता के जीते - जागते प्रतीक हैं ही किंतु ईरान के नेताओं में भी वह गंभीरता नहीं है जो ऐसे अवसरों पर अपेक्षित होती है। इसीलिए ये कहना गलत नहीं है कि भारत ने इन दोनों के बीच सुलह कराने की कोशिश से खुद को दूर रखकर बुद्धिमत्ता दिखाई। जहाँ तक पाकिस्तान का सवाल है तो जो देश अपने पड़ोसी अफ़ग़ानिस्तान के साथ लड़ाई नहीं रोक पा रहा वह अमेरिका और ईरान जैसे बड़े देशों की जंग रुकवा देगा ये सोचना भी बेकार है।
- रवीन्द्र वाजपेयी