Saturday, 11 April 2026

शांति वार्ता नई अशांति का कारण बन सकती है



मध्यपूर्व में उत्पन्न संकट का समाधान ढूंढने अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे.डी वेंस और ईरान की संसद के अध्यक्ष सहित विदेश मंत्री पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में जमा  हैं। अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हमले के बाद ईरान ने जो पलटवार किया उसमें उन दोनों के अलावा  पड़ोसी देशों को भी लपेट लिया जिनमें अमेरिकी सैन्य अड्डे थे। एक माह से अधिक चली जंग के कारण पूरे विश्व में पेट्रोल - डीजल और गैस की किल्लत हो गई। मिसाइलों के जरिए तेल उत्पादक देशों में रिफाइनरीज को हुए नुकसान के कारण जहां उत्पादन घट गया वहीं ईरान द्वारा होर्मुज नामक समुद्री मार्ग को अपना हथियार बनाते हुए वहां से तेल लाने वाले मालवाहक जहाजों का आवागमन रोक दिया गया। इसकी वजह से खाड़ी देशों में सैकड़ों जहाज फंसकर रह गए। अमेरिका और इज़राइल सोच रहे थे कि ईरान ज्यादा से ज्यादा एक सप्ताह तक टिक सकेगा किंतु उनका आकलन गलत निकला। ईरान ने अपनी सैन्य क्षमता के बल पर अकेले ही अमेरिका और इज़राइल ही नहीं बल्कि सऊदी अरब , बहरीन , ओमान , कतर और यू.ए.ई आदि पर हमले कर डाले। हालांकि इस युद्ध में उसके राजनीतिक और सैन्य क्षेत्र के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े दर्जनों लोग मारे गए। साथ ही हजारों नागरिकों की मौत के अलावा पूरे देश का मूलभूत ढांचा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ। वहीं रक्षा उत्पादन इकाइयां और बिजली संयंत्र  भी नष्ट हुए। इसमें दो राय नहीं कि धीरे - धीरे उसकी लड़ने की क्षमता जवाब देती जा रही थी किंतु होर्मुज बंद होने के कारण विश्व जनमत का दबाव युद्ध रोकने के लिए बढ़ने लगा और अंततः दोनों पक्ष एक पखवाड़े के लिए युद्धविराम हेतु सहमत हो गए। प्रचारित किया गया कि ये सब पाकिस्तान की पहल पर हुआ किंतु जल्द ही स्पष्ट हो गया कि ये सब अमेरिका के इशारे पर हुआ जिसमें पर्दे के पीछे चीन की भी भूमिका रही। खैर, युद्धविराम तो हो गया किंतु उसकी शर्तों को लेकर दोनों पक्षों की ओर से किए जा रहे दावे विरोधाभासी हैं। इसका पहला उदाहरण इज़राइल द्वारा लेबनान पर हमले जारी रखने से मिला। जब ईरान ने इसे युद्धविराम का उल्लंघन बताया तब इजराइल और अमेरिका ने साफ कहा कि लेबनान इस युद्धविराम के दायरे से बाहर है। इस पर ईरान ने पाकिस्तान पर झूठ बोलने का आरोप लगाते हुए धमकी दे डाली कि वह इस्लामाबाद में प्रस्तावित शांति वार्ता में भाग नहीं लेगा। इसके साथ ही उसने होर्मुज को दोबारा बंद कर दिया। हालांकि आखिरकार उसका प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद पहुंच तो गया किंतु इजराइल द्वारा लेबनान पर आज भी हमले किए जाने से शांति वार्ता में व्यवधान की आशंका बनी हुई है। इसके अलावा अपने परमाणु कार्यक्रम को बंद करने जैसी शर्त भी उसे शायद ही मान्य होगी। होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क वसूलने की उसकी योजना भी गतिरोध की वजह बन सकती है । इस वार्ता के पहले पाकिस्तान के रक्षा मंत्री द्वारा इजराइल को लेकर की गई टिप्पणी से विवाद उत्पन्न हो गया था। इस्लामाबाद आने के पहले ही अमेरिका और ईरान के बीच जिस तरह से धमकियों का आदान - प्रदान होता रहा उसे देखते हुए बातचीत के दौरान वातावरण तनावपूर्ण रहने की पूरी - पूरी संभावना है। दोनों पक्ष युद्धविराम टूटते ही पहले से ज्यादा तेजी से हमले की धमकी दे रहे हैं। इस लड़ाई का मुख्य पक्ष सही मायनों में इजराइल है। उसको शांति वार्ता से दूर रखे जाने से युद्धविराम का भविष्य खतरे में है। मध्यपूर्व की असली समस्या इजराइल के अस्तित्व को मान्यता देने से जुड़ी हुई है। ईरान तो उसको नष्ट करने की बात खुलकर कहता है । और इसके लिए उसने हमास , हिजबुल्ला और हूती जैसे इस्लामी आतंकवादी संगठनों को पाल - पोस कर खड़ा कर दिया। हालांकि अरबी देशों में ज्यादातर ने इज़राइल से रिश्ते सुधार लिए हैं परन्तु ईरान , लेबनान और यमन आज भी उसके अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते। यदि किसी मजबूरी में अमेरिका और ईरान युद्धविराम को स्थायी रूप प्रदान करते हुए शांति स्थापित करने पर सहमत हो भी जाएं तब क्या इज़राइल अपनी सुरक्षा की गारंटी के बिना शान्त बैठेगा? ईरान लगातार कहता आया है कि उसे युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा चाहिए। लेकिन सवाल ये है कि नुकसान तो उन सभी का हुआ जो युद्ध में शामिल थे। और भी मुद्दे हैं जिन पर कोई सकारात्मक निर्णय होना संभव नहीं है। सबसे बड़ी बात ये है कि अमेरिका और ईरान दोनों को एक दूसरे पर विश्वास नहीं है। इसी तरह पाकिस्तान की अपनी विश्वसनीयता भी दो कौड़ी की है। इस बातचीत की पृष्ठभूमि तैयार करने वाले चीन के भी निहित स्वार्थ हैं। ये सब देखते हुए इस बातचीत से ज्यादा उम्मीदें करना बेकार है। बड़ी बात नहीं शांति वार्ता का अंत नए सिरे से अशांति उत्पन्न करने के तौर पर सामने आए।

Friday, 10 April 2026

भारी मतदान लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत


गत  दिवस असम , केरलम और पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव  में भारी मतदान  लोकतंत्र की जड़ों के गहरे होने का ज्वलंत प्रमाण है। असम में  परिसीमन के  कारण अनेक सीटों का नक्शा बदल गया था। घुसपैठियों के मुद्दे को भाजपा ने जोरदारी से उठाया जिसका असर हिन्दू मतदाताओं पर स्पष्ट दिखाई दिया। वहीं मुस्लिम समुदाय ने भी बड़े पैमाने पर मतदान कर  राजनीतिक जागरूकता दिखाई । यहां आदिवासी आबादी भी काफी है और अलगाववादी ताकतें भी सक्रिय रही हैं।  बीते कुछ दशकों में बांग्लादेशी घुसपैठियों के कारण जनसंख्या संतुलन बिगड़ने के  साथ ही जमीन पर अवैध कब्जों के कारण संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो रही थी। हालांकि हिमंता बिस्व सर्मा सरकार की सख्ती से हालात नियंत्रण में रहे।  अभी तक जितने भी चुनाव पूर्व सर्वेक्षण हुए सभी ने हिमंता सरकार की वापसी का अनुमान लगाया है। यद्यपि मुस्लिम मतदाताओं ने गोलबंद होकर कांग्रेस को समर्थन दिया हो तब भाजपा का खेल बिगड़ सकता है। हालांकि इसकी आशंका बहुत कम है किंतु आज का मतदाता बहुत चतुर है इसीलिए  अप्रत्याशित परिणाम भी देखने मिलते हैं। दूसरा राज्य केरलम है जिसे देश  के सर्वाधिक शिक्षित प्रदेश होने का सम्मान प्राप्त है। वहां भी जबरदस्त मतदान ने चुनाव को रोचक बना दिया। एल.डी.एफ नामक वामपंथी मोर्चे की सरकार बीते 10 साल से चली आ रही है। 2021 में हर चुनाव में सत्ता बदलने की परंपरा टूट गई थी किंतु इस बार कांग्रेस की अगुआई वाला यू.डी.एफ काफी आशान्वित है। वामपंथी मुख्यमंत्री विजयन की अधिक उम्र के कारण युवा मतदाता भावनात्मक तौर पर सरकार से जुड़ नहीं पा रहा। हालांकि महिलाओं में उनकी लाभार्थी योजनाओं का प्रभाव है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी यहां की वायनाड सीट से  सांसद चुने गए थे लेकिन रायबरेली से भी जीतने के बाद उन्होंने वायनाड छोड़ दिया।  और उनके स्थान पर प्रियंका वाड्रा लोकसभा सदस्य निर्वाचित हो गईं। हालांकि इस बार वे असम में कांग्रेस का चुनाव संचालित करती रहीं किंतु श्री गांधी ने केरलम में काफी समय दिया। इसके अलावा कांग्रेस ने प.बंगाल में वामपंथियों से अलग होकर चुनाव लड़ने का फैसला करते हुए केरलम की जनता को ये एहसास कराने का प्रयास किया कि वह वामपंथियों के साथ नहीं है। केरल अपनी राजनीतिक जागरूकता के लिए प्रसिद्ध है । यहां की आबादी में मुस्लिम और ईसाई समुदाय की हिस्सेदारी भी प्रभावशाली है। अभी तक माना जाता रहा कि हिन्दू समाज का बड़ा हिस्सा एल.डी.एफ के साथ  था जबकि  अल्पसंख्यक समुदाय कांग्रेस का समर्थन करते आए हैं। लेकिन भाजपा के उदय के बाद से समीकरण बदलते लग रहे हैं। हिन्दू मतदाताओं में भाजपा ने भी अपनी पैठ बना ली है जिससे वामपंथी मोर्चे को खतरा महसूस हो रहा है। लेकिन लव जिहाद से पीड़ित ईसाई समुदाय द्वारा कांग्रेस से छिटककर भाजपा के करीब आने के संकेत दिए जाने से स्थिति जटिल हो गई है। कांग्रेस को सर्वेक्षणों में मिली बढ़त 10 सीटों से अधिक नहीं है। इसीलिए मतदान का भारी प्रतिशत देखकर उसे भी चिंता सताने लगी हैं।  विश्लेषक भी केरल में नजदीकी मुकाबला मानकर चल रहे हैं वहीं भाजपा को मिलने वाली सीटें  अंदाजन अधिकतम 5 ही हैं। लेकिन इस चुनाव में जो भी उलटफेर होगा उसमें भाजपा की निर्णायक भूमिका रहेगी। तीसरा राज्य जहां कल मतदान हुआ वह केंद्र शासित पुडुचेरी है। इसका आकार किसी महानगर से भी छोटा है लेकिन वहां के मतदाताओं ने भी अभूतपूर्व उत्साह दिखाकर लोकतंत्र में अपनी आस्था प्रदर्शित की। सबसे संतोषजनक बात ये रही कि इक्का - दुक्का मामूली घटनाओं को छोड़कर मतदान सभी जगह शांतिपूर्ण रहा। बीते कुछ समय से विपक्ष के आरोप झेल रहे चुनाव आयोग ने एक ही दिन में तीन राज्यों के चुनाव सुव्यवस्थित ढंग से सम्पन्न करवाकर अपनी क्षमता साबित कर दी । यद्यपि उसकी असली परीक्षा प. बंगाल और तमिलनाडु में होगी जो अपेक्षाकृत बड़े  भी हैं। विशेष रूप से प. बंगाल में जहां मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण के  विरोध में मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने आसमान सिर पर उठा रखा है। लगभग 91 लाख मतदाता कम होने से वहां के परिणामों को लेकर उत्सुकता बढ़ गई है। तीन चुनाव जीत चुकी ममता चौका मारती हैं या नहीं ये भाजपा के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा जो इस बार उत्साह से भरी हुई है। तमिलनाडु में मुकाबला द्रविड़ संस्कृति वाली द्रमुक और अन्ना द्रमुक के बीच है। कांग्रेस पहले और भाजपा दूसरे के साथ हैं। यहां भी इस बार काफी कशमकश है। कल तीन राज्यों में हुए मतदान के बाद ये उम्मीद बढ़ गई है कि प. बंगाल और तमिलनाडु के मतदाता भी लोकतंत्र के महोत्सव में उत्साहपूर्वक भाग लेंगे। पूरी दुनिया जहां युद्ध की विभीषिका से अशांत है वहीं भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रिया शान्ति से संचालित होना ठंडी हवा के झोंके जैसा है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 9 April 2026

लागू होते ही टूटने भी लगा युद्धविराम



कल सुबह के अखबारों में पहले पन्ने पर डोनाल्ड ट्रम्प की वह धमकी छाई हुई थी जिसमें उन्होंने एक सभ्यता को खत्म करने की बात कही थी। ईरान को पाषाण युग में भेजने की धमकी वे पहले ही दे चुके थे। लेकिन ये सच होने के पहले ही खबर आ गई कि अमेरिका और ईरान के बीच 15 दिन के लिए युद्धविराम पर सहमति बन गई। इसके लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिफ मुनीर को श्रेय देते हुए ट्रम्प ने कहा कि उन्हीं के आग्रह पर जंग रोकी जा रही है। आगे की वार्ता 10 अप्रैल से इस्लामाबाद में होना सुनिश्चित हुआ। युद्धविराम के फैसले को ईरान अपनी जीत मानकर उछलने लगा वहीं अमेरिका के रक्षा मंत्री का दावा है कि ईरान इसके लिए गिड़गिड़ाया था। युद्ध रोकने के अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने पर सहमति की बात भी सामने आई। जिससे पूरी दुनिया ने राहत महसूस की। लेकिन हमारे देश में एक वर्ग विशेष सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए पाकिस्तान के प्रशस्तिगान में जुट गया। मोदी सरकार की विदेश नीति को विफल बताने के साथ ही पाकिस्तान को कूटनीतिक तौर पर मिले महत्व की प्रशंसा की जाने लगी। ईरान को विजेता के तौर पर इस तरह पेश किया जाने लगा मानो उसने अमेरिका और इजराइल से आत्मसमर्पण करवा लिया हो। लेकिन शाम होते तक युद्धविराम की धज्जियां उड़ने लगीं। इजराइल ने लेबनान में हिजबुल्ला के ठिकानों पर जबरदस्त हमले किए जिनमें 250 से ज्यादा लोग मारे गए। इधर ईरान और खाड़ी देशों में मिसाइलों का आदान - प्रदान होने लगा। वैसे भी सऊदी अरब , बहरीन और यू.ए.ई आदि युद्धविराम के पक्षधर नहीं थे। उनका अमेरिका से कहना था कि ईरान को घुटनाटेक करवाकर ही छोड़ें जिससे वह दोबारा क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बिगाड़ने का दुस्साहस न कर सके। इधर ईरान ने लेबनान में इजराइली हमलों पर ऐतराज जताया तो इजराइल और अमेरिका दोनों ने दो टूक जवाब दिया कि लेबनान में हिजबुल्ला के अड्डे होने से वहां युद्धविराम नहीं है। इससे नाराज ईरान ने होर्मुज से आवाजाही रोकने का ऐलान कर तेल और गैस संकट में राहत मिलने की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। जिस पर ट्रम्प दोबारा बमबारी शुरू करने की धमकी दे रहे हैं।ईरान ने ये आरोप भी लगाया कि उसके परमाणु कार्यक्रम संबंधी जो आश्वासन दिया गया उससे भी अमेरिका मुकर रहा है। ऐसे में युद्धविराम संबंधी बातचीत निरर्थक है। ताजा समाचारों के लेबनान पर हमले को लेकर अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे .डी वेंस और शहबाज शरीफ के बीच भी मतभेद सामने आने लगे हैं। शरीफ के अनुसार लेबनान को भी युद्धविराम में शामिल किया गया था जबकि वेंस का दावा है कि ऐसा नहीं था। उल्लेखनीय है वेंस इस्लामाबाद की बातचीत में अमेरिका का प्रतिनिधित्व करेंगे। आज तेहरान में एक वरिष्ट नेता ने स्पष्ट कहा कि जंग और युद्धविराम एक साथ नहीं चल सकते। साथ ही अमेरिका पर आरोप लगाया कि उसने युद्धविराम की तीन शर्तों का उल्लंघन किया है। इस बातचीत में चूंकि इज़राइल के अलावा युद्ध में शामिल अन्य देशों की उपस्थिति नहीं होगी लिहाजा उसके किसी निष्कर्ष पर पहुंचने पर संदेह के बादल मंडराने लगे हैं। इसीलिए कल दिन में अपनी कूटनीतिक सफलता पर इतराने वाला पाकिस्तान शाम से तनाव में नजर आने लगा। ईरान और अमेरिका दोनों एक दूसरे पर युद्धविराम की शर्तों से मुकरने का आरोप लगा रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान की स्थिति नमाज पढ़ने गए थे किंतु रोजे गले पड़ गए वाली होती जा रही है। ये कहना गलत नहीं होगा कि अमेरिका भले ही युद्ध से पिंड छुड़ाना चाह रहा हो किंतु इजराइल को उसे अंजाम तक पहुंचाए बिना रोक देना शायद ही गवारा होगा। लेबनान पर उसके हमले इसका प्रमाण हैं। इसके अलावा सऊदी अरब सहितखाड़ी के अन्य देश भी ईरान को अधमरा छोड़ने सहमत नहीं हैं। ऐसे में कल होने वाली बातचीत में इस समस्या का हल निकलने की उम्मीद बेहद क्षीण है। और यदि युद्धविराम विफल हुआ तब सबसे ज्यादा फ़जीहत होगी पाकिस्तान की जो अमेरिका और ईरान दोनों से गालियां खाएगा। ईरान द्वारा होर्मुज़ से गुजरने वाले जहाजों से एक डॉलर प्रति बैरल वसूलने के साथ ही उसका भुगतान चीनी मुद्रा युआन में लिए जाने की खबर ने भी डोनाल्ड ट्रम्प को सशंकित कर दिया है। निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि भारत ने दो साड़ों की लड़ाई से खुद को दूर रखने का निर्णय लेकर जो परिपक्वता दिखाई उसके दूरगामी फायदे होंगे। अमेरिका को छोड़ दें तो ईरान , इजराइल , यू.ए.ई, सऊदी अरब, ओमान , बहरीन और कतर से हमारा संवाद लगातार कायम बना रहा। इसी का परिणाम है कि ईरान ने होर्मुज जिन देशों के लिए खोला उनमें भारत भी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 8 April 2026

फिल्म के मध्यांतर जैसा है ये युद्धविराम


पूरी दुनिया ने ये जानकर राहत की सांस ली कि ईरान और अमेरिका 15 दिनों के लिए युद्धविराम हेतु राजी हो गए।  डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ईरान को मिटाने की जो धमकी दी गई थी उसके कारण बड़े अनिष्ट की आशंका  थी। यदि वह  सच हो जाती तो  ईरान और मध्यपूर्व सहित समूची दुनिया के लिए एक दर्दनाक अनुभव होता।  इस जंग में विजेता होकर निकलने के डोनाल्ड ट्रम्प के पास एक ही विकल्प  था कि वे  परमाणु बम जैसा कोई कदम उठा लें। हालांकि युद्ध  ने जो नया रूप ले लिया है उसे देखते हुए अमेरिका परमाणु हथियारों के अलावा भी ऐसा कुछ कर सकता था जिससे ईरान संपूर्ण विनाश का शिकार हो जाए। पुलों और बिजली संयंत्रों को नष्ट करने की जो धमकी ट्रम्प ने दी उसके बाद उसके सामने भी अन्य कोई रास्ता नहीं बचा। कल तक वह किसी भी स्थिति में होर्मुज  खोलने सहमत नहीं हो रहा था लेकिन अचानक रजामंद होना साधारण नहीं है। इसके पीछे महाशक्तियों के निजी स्वार्थ हैं।  कल ही सं.रा.संघ सुरक्षा परिषद में होर्मुज संबंधी प्रस्ताव पर चीन और रूस ने वीटो लगाकर ईरान की जबरदस्त सहायता की थी। लेकिन ट्रम्प द्वारा दी गई समय सीमा के पहले ही एक पखवाड़े तक युद्ध रोकने की घोषणा ईरान और अमेरिका ने कर दी। इसका श्रेय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिफ मुनीर को दिया जा रहा है। स्मरणीय है कुछ दिन पूर्व पाकिस्तान , टर्की और मिस्र के नेताओं की बैठक इस्लामाबाद में हुई थी जिसमें युद्ध रोकने पर विचार हुआ। लेकिन ईरान ने उसे कोई महत्व नहीं दिया और इतनी कड़ी शर्तें रख दीं जिन्हें मानना  दूसरे पक्ष के लिए संभव नहीं था। ऐसे में इस युद्धविराम और उसमें पाकिस्तान की भूमिका पर आश्चर्य  स्वाभाविक है। दरअसल इस पूरे खेल में चीन की भूमिका है जिसने पर्दे के पीछे रहते हुए ईरान को राजी किया। अब सवाल ये है कि जो ईरान जिद  करता था कि युद्धविराम तभी स्वीकार करेगा जब उस पर दोबारा हमले न होने की गारंटी दी जाए, युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई के साथ ही होर्मुज से निकलने वाले जहाजों से टोल टैक्स वसूलने का अधिकार मिले। इसके अलावा वह अपने परमाणु कार्यक्रम को बेरोकटोक जारी रखने का आश्वासन चाहता था। आज हुए युद्धविराम में उसे ऐसा कोई वायदा नहीं किया गया जिससे ये साफ है कि  कहीं न कहीं उसकी नस दबी थी जिसके कारण वह लड़ाई रोकने तैयार हो गया। चौंकाने वाली बात ये है कि आगे की वार्ता इस्लामाबाद में होना तय किया गया है। लेकिन  इज़राइल इसके लिए सहमत नहीं होगा । और उसकी गैर मौजूदगी में हुए किसी भी समझौते को नेतन्याहू स्वीकार करेंगे इसमें संदेह है । उल्लेखनीय है ईरान , इजराइल के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता।  इसलिए ये युद्धविराम फिल्म के मध्यांतर से ज्यादा कुछ भी नहीं । असल में वेनेजुएला पर अमेरिकी आधिपत्य के बाद से चीन की तेल आपूर्ति अवरुद्ध हो चली थी। ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमलों ने उसके सामने दूबरे में दो आषाढ़ वाली स्थिति बना दी। इसलिए उसने पहले सुरक्षा परिषद में ईरान का समर्थन किया वहीं अगली सुबह उसे मजबूर कर दिया कि वह होर्मुज को खोल दे। भारत में एक वर्ग इसे मोदी सरकार की विदेश नीति की असफलता बता रहा है क्योंकि युद्धविराम का श्रेय पाकिस्तान लूट ले गया किंतु उनकी सोच गलत है क्योंकि  ईरान और अमेरिका के बीच में मध्यस्थता करना भारत के दूरगामी हितों के लिए नुकसानदेह होता। इस समय भारत के इजराइल के अलावा सऊदी अरब, यू.ए.ई, बहरीन , कतर और ओमान जैसे देशों के साथ अच्छे रिश्ते हैं। तटस्थ रहकर हमने ईरान का भरोसा भी जीता जिसका प्रमाण होर्मुज से भारतीय टैंकरों के सुरक्षित निकलने से मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री जयशंकर भी युद्ध में शामिल सभी पक्षों से संपर्क में रहे। वैसे भी इस युद्धविराम से खास उम्मीद लगाना बेकार है क्योंकि न तो ईरान हमास , हिजबुल्ला और हूती जैसे आतंकवादी संगठनों को पालना बंद कर इजराइल के अस्तित्व को स्वीकार करेगा और न ही अपने परमाणु कार्यक्रम को बंद करेगा। सऊदी अरब , यू.ए.ई और बहरीन भी ईरान की कमर तोड़ने का दबाव अमेरिका पर डाल रहे हैं। ये  सोचना भी गलत है कि अमेरिका इस जंग से निकलना चाह रहा है। दरअसल वह नए सिरे से तैयारी करने के लिए मोहलत चाहता था जो युद्धविराम ने उसे दे दी। वैसे भी इजराइल द्वारा लेबनान में हमले जारी रखने की घोषणा से युद्धविराम की सफलता संदिग्ध हो गई है। सही बात ये है कि ईरान की लड़ने की क्षमता रोज घट रही थी। युद्धविराम के दौरान तेल बेचकर धन बटोरने के साथ ही वह रूस और चीन से अस्त्र - शस्त्र खरीदकर अगले चरण की लड़ाई के लिए खुद को सक्षम बनाना चाह रहा है।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 7 April 2026

तमिलनाडु में राष्ट्रवादी भावना चुनाव पर असर डाल रही


तमिलनाडु से आ रहे रुझान सत्ता परिवर्तन का संकेत दे रहे हैं। सत्तारूढ़ द्रमुक का कांग्रेस के साथ गठबंधन है। वहीं उसकी प्रमुख प्रतिद्वंदी अन्ना द्रमुक ने  भाजपा को अपने साथ जोड़कर मुकाबले को नजदीकी बना दिया है। लेकिन अभिनेता विजय की नवोदित पार्टी तमिझगा वेत्री कझगम के तीसरी ताकत के तौर पर कूदने से त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति भी बन रही है।  शुरुआती आकलन था कि विजय सत्ता विरोधी मतों में सेंध लगाकर अन्ना द्रमुक गठबंधन अर्थात एन.डी.ए का नुकसान करेंगे किंतु ज्यों - ज्यों मतदान की तारीख करीब आ रही है त्यों - त्यों ये लगने लगा है कि तमिल फिल्मों का ये लोकप्रिय अभिनेता सत्ता पक्ष को भी बराबरी से नुकसान पहुंचा रहा है। स्मरणीय है तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी दुनिया का जबरदस्त प्रभाव रहा है। यद्यपि जयललिता और करुणानिधि के निधन के बाद से इसमें कमी आई। लेकिन विजय ने नई पार्टी के  जरिए हाथ आजमाकर उस दौर को पुनर्जीवित कर दिया। वैसे तो आज की तमिल फिल्मों में विजय बड़ा नाम है किंतु उनके साथ वह वैचारिक ताकत नहीं है जिसके बल पर अन्ना दोरई, एम. जी. रामचंद्रन , करुणानिधि और जयललिता ने लंबे समय तक  दबदबा बनाए रखा। लोकप्रिय अभिनेता कमल हासन ने भी राजनीति में हाथ आजमाया लेकिन फिल्मी सफलता को वे सियासत में नहीं दोहरा सके। कुछ लोगों का मानना है कि युवा पीढ़ी द्रविड़ पार्टियों की संकुचित सोच वाली राजनीति से अलग हटकर व्यापक  दृष्टिकोण से प्रेरित हो रही है। और इसी पर अभिनेता विजय की उम्मीदें टिकी हैं। यद्यपि उनको लेकर  चुनावी पंडित बहुत ज्यादा आश्वस्त नहीं हैं किंतु  अनेक सीटें हैं जिनमें उनके उम्मीदवार दोनों बड़े गठबंधनों में से किसी एक का खेल जरूर बिगाड़ेंगे। यही सोचकर भाजपा ने उन्हें अपने पाले में खींचना चाहा किंतु सफलता नहीं मिली। इसके बाद आए सर्वेक्षणों में अन्ना द्रमुक - भाजपा गठबंधन को सत्ताधारी द्रमुक - कांग्रेस गठजोड़ पर निर्णायक बढ़त दिखाए जाने से  लगने लगा है कि सत्ता विरोधी रुझान मुख्यमंत्री स्टालिन को नुकसान पहुंचा रहा है वहीं अभिनेता विजय की  मौजूदगी भी द्रमुक के जनाधार को  कमजोर करने में कामयाब हो रही है। यदि स्टालिन सत्ता से हाथ धो बैठते हैं तो उसका एक कारण तमिलनाडु की राजनीति में आ रहे हिंदुत्व का उभार भी होगा। उनके मंत्री पुत्र उदयनिधि ने सनातन धर्म की तुलना कोरोना और डेंगू से करते हुए उसे खत्म करने वाला जो बयान दिया था उसकी सवर्ण वर्ग में रोष पूर्ण प्रतिक्रिया हुई थी। हालांकि भाजपा  बड़ी सफलता हासिल कर पाएगी ये कहना कठिन है किंतु मुख्यमंत्री के बेटे के सनातन विरोधी बयान से हिंदुत्व की जो भावना जोर पकड़ने लगी उसका लाभ भाजपा के साथ ही अन्ना द्रमुक को भी मिलता लग रहा है। यदि ये आकलन धरातल पर उतरा और स्टालिन को सत्ता से हाथ धोना पड़ा तब तमिलनाडु की राजनीति में क्रांतिकारी परिवर्तन की शुरुआत होना तय है। हालांकि अन्ना द्रमुक भी निकली तो द्रविड़ राजनीति की कोख से ही है किंतु जयललिता के दौर से ही उसमें हिंदुत्व का पुट आने लगा था। संघीय ढांचे का हिस्सा होने के बावजूद हिन्दी  और उत्तर भारत के विरोध का राग अलापकर तमिलनाडु को मुख्य धारा से अलग रखने वाली सियासत के समानांतर अब राष्ट्रवादी भावना का असर इस चुनाव में नजर आ रहा है। यदि मतदान के दिन तक ये जारी रहा तब सत्ता परिवर्तन की संभावना वास्तविकता में बदलना तय है। स्टालिन इस बात को समझ गए हैं इसीलिए इन दिनों उनके बयानों में वैसा तीखापन नहीं है जैसा प. बंगाल में ममता बैनर्जी की टिप्पणियों में दिखाई देता है। कुल मिलाकर तमिलनाडु का ये चुनाव कई अर्थों में असाधारण है क्योंकि पहली बार है जब भाजपा को विश्लेषक गंभीरता से ले रहे हैं। तमिलनाडु की राजनीति के जानकार ये कहने में भी संकोच नहीं कर रहे कि यदि जनादेश मौजूदा  राज्य सरकार के विरुद्ध आया तब   स्व.करुणानिधि के विशाल परिवार में  उत्तराधिकार की लड़ाई नए सिरे से शुरू होगी जिसके कारण स्टालिन का भविष्य अंधकारमय हो सकता है। गौरतलब है अन्ना द्रमुक के पास भी जयललिता जैसा कोई नेता नहीं होने से भाजपा इस शून्य को भरने में कामयाब हो सकती है क्योंकि उसके उत्तर भारत की पार्टी होने की अवधारणा धीरे - धीरे कमजोर पड़ने लगी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 6 April 2026

केरलम में कांग्रेस की प्रतिष्ठा और वामपंथियों का अस्तित्व दांव पर


जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं उनमें केरलम ( केरल ) में कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों का भविष्य दांव पर लग गया है। दरअसल यही वह राज्य है जिसमें कांग्रेस को उम्मीद दिखाई दे रही है। हालांकि दावा तो वह असम जीतने का भी कर रही है किंतु तमाम सर्वेक्षणों में वहां भाजपा की  वापसी संभावित होने से केरलम में ही कांग्रेस के लिए गुंजाइश है। वहीं दस वर्षों से सत्ता पर विराजमान वामपंथी मोर्चे के सामने अपना इकलौता किला बचाने की चुनौती है। यद्यपि  पार्टी कैडर के अलावा विजयन सरकार की कल्याणकारी नीतियों का जनमानस पर सकारात्मक प्रभाव उसके पक्ष में हैं  लेकिन सत्ता विरोधी भावना भी  दिखाई दे रही है। ऐसा लगता है सरकार समर्थकों में वह उत्साह नहीं है जो जीत का आधार बनता है। अब  तक हिन्दू समुदाय जहां वामपंथियों का परंपरागत वोट बैंक रहा वहीं मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन के चलते कांग्रेस को मुसलमान मत  मिलते रहे। ऐसा ही ईसाई समुदाय के साथ देखा गया जिसे गांधी परिवार के रूप में अपना हितचिंतक महसूस होता है।  2011 की जनगणना के अनुसार, केरल में हिंदू आबादी लगभग 54.73%, मुस्लिम 26.56% और ईसाई 18.38% है। यहां हर पांच साल में सरकार बदलती थी किंतु 2021 में वामपंथी मोर्चे ने लगातार दूसरा चुनाव जीतकर चौंकाया जबकि उसके  बाद लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने बाजी मारी। हाल ही हुए स्थानीय निकाय चुनाव में भी सत्तारूढ़ मोर्चे का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। राजधानी तिरुवनंतपुरम में भाजपा का महापौर बनना उसके लिए खतरे की घंटी बन गया। हालांकि जो संकेत हैं उनके अनुसार एल डी.एफ नामक वामपंथी मोर्चे ने हिम्मत नहीं हारी है । चूंकि प. बंगाल में इस  बार भी  संभावना शून्य है ऐसे में केरलम की सत्ता वामपंथी पार्टियों के लिए जीवन मरण का प्रश्न बन गई है।  इस चुनाव में पराजित होने  पर केरलम में भी उनका हश्र प. बंगाल जैसा होना तय है क्योंकि उनके परम्परागत हिन्दू जनाधार अर्थात शहरी मध्यमवर्ग के अलावा महिलाओं में भाजपा तेजी से अपना प्रभाव कायम करती जा रही है। हालांकि इस बार भाजपा के कितने विधायक जीतेंगे ये कहना  कठिन है किंतु उसका मत प्रतिशत  जिस प्रकार बढ़ता जा रहा है उससे ये माना जा रहा है कि  यू. डी एफ और  एल. डी. एफ की जीत - हार में उसके द्वारा हासिल मतों की बड़ी भूमिका रहेगी। बीते कुछ चुनावों से भाजपा  तिरुवनंतपुरम सीट पर लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करती आई है किंतु इस चुनाव में उसकी उपस्थिति कमोबेश पूरे राज्य में होने से वह बड़ा उलटफेर करने की स्थिति में है। लव जिहाद के विरोध में उसके अभियान ने हिन्दू जनमानस के अलावा ईसाइयों को भी आकर्षित किया है। ये चर्चा भी सुनाई देने लगी है कि अनेक  सीटों पर मुस्लिमों के विरोध में हिंदुओं और ईसाइयों का ध्रुवीकरण एल.डी.एफ और यू.डी.एफ दोनों का खेल बिगाड़ेगा जिसका लाभ भाजपा को मिल सकता है।  अनेक विश्लेषकों का आकलन है कि केरलम में त्रिशंकु विधानसभा की भी स्थिति भी बन सकती है और तब संतुलन भाजपा के नियंत्रण में होगा किंतु उसके लिए दोनों गठबंधनों में से एक नाग नाथ तो दूसरा सांप नाथ है। वहीं कांग्रेस और वामपंथियों के लिए भाजपा से गठजोड़ असम्भव है। हालांकि अंतिम फैसला तो मतदाता ही करेंगे किंतु केरलम में वामपंथी जहां अस्तित्व बचाने लड़ रहे  हैं वहीं कांग्रेस के लिए ये प्रतिष्ठा का प्रश्न है क्योंकि लोकसभा चुनाव  के बाद हुए विधानसभा चुनावों में उसका प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। जम्मू - कश्मीर, हरियाणा, महाराष्ट्र,  झारखंड,दिल्ली और बिहार में उसकी स्थिति पहले से और कमजोर हो गई। इसके कारण जहां राहुल गांधी की क्षमता पर सवाल उठे वहीं इंडिया गठबंधन में निष्क्रिय होकर रह गया। यदि केरलम में इस बार भी सत्ता कांग्रेस के हाथ नहीं लगी तब राहुल के विरुद्ध पार्टी के भीतर भी बड़ा विद्रोह होना तय है। इसी तरह यदि सरकार गंवा बैठे तब बंगाल की खाड़ी के बाद अरब सागर में भी वामपंथी राजनीति का डूबना सुनिश्चित है। भाजपा के लिए केरलम एक अवसर साबित हो सकता है क्योंकि दोनों बड़े मोर्चे में जो भी हारेगा उसकी जगह भविष्य में वही लेगी ये साफ नजर आ रहा है। देश के सबसे सुशिक्षित इस राज्य के मतदाता सदैव सोच -  समझकर ही मतदान करते आए हैं। हालांकि इस बार उनके सामने भी जबरदस्त असमंजस है। साथ ही मध्यपूर्व में चल रहे युद्ध से भी चुनाव के समीकरण प्रभावित हो रहे हैं क्योंकि खाड़ी देशों में कार्यरत केरलम के लाखों लोग वहीं फंसे हुए हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 4 April 2026

आम आदमी पार्टी में बिखराव रुकने का नाम नहीं ले रहा


   हालांकि ये आम आदमी पार्टी का अधिकार है कि वह संसद में किसे अपना नेता , उपनेता या सचेतक बनाए। उस लिहाज से राज्यसभा में  राघव चड्ढा को उपनेता पद से अलग किया जाना उसका आंतरिक मामला है। लेकिन राज्यसभा सचिवालय को ये लिखकर देने से कि उनको बोलने की अनुमति न दी जाए, ये प्रकरण सुर्खियों में आ गया। पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट राघव पार्टी के सौम्य और शालीन चेहरे  हैं। अन्ना आंदोलन के समय ही वे अरविंद केजरीवाल के साथ जुड़ गए।  प्रवक्ता के तौर पर उनका प्रदर्शन  प्रभावशाली रहा।  केजरीवाल सरकार के अनेक मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और कुछ तो जेल भी गए, वहीं राघव अपनी स्वच्छ छवि और सुसंस्कृत व्यवहार के कारण लोकप्रिय होते गए। लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स से शिक्षित इस नेता को पार्टी ने पंजाब  की जिम्मेदारी सौंपी  जहां उसे दिल्ली की तरह से ही धमाकेदार जीत मिली । पुरस्कार स्वरूप उन्हें राज्यसभा में भेजा गया। सदन में लीक से हटकर मुद्दे उठाने के कारण  राघव  प्रभाव छोड़ने में सफल हो गए।  लेकिन अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा से विवाह के बाद उनकी चर्चा राजनेता से ज़्यादा ग्लैमर बॉय के रूप में होने लगी।  टीवी कार्यक्रमों में उनसे पार्टी और राजनीति से जुड़े सवालों की बजाय निजी जीवन पर पर सवाल पूछे जाते। यद्यपि राज्यसभा में  आम जनता से जुड़े मुद्दे  उठाने से  उन्हें सराहना भी मिली । निर्वाचित जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने ( रिकॉल )  का उनका सुझाव लोगों को पसंद आया। हवाई अड्डों पर महंगी खाद्य सामग्री के अलावा गिग वर्कर्स (ओला/उबर ड्राइवर, स्विगी/ज़ोमैटो डिलीवरी पार्टनर,  या कूरियर बॉय)  के शोषण का मुद्दा उठाकर भी वे सुर्खियों में आए।  ऐसे में उनको राज्यसभा में  उपनेता पद से हटाने के निर्णय पर सभी को आश्चर्य हुआ क्योंकि उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच किसी भी मतभेद की खबर उजागर नहीं हुई थी। लेकिन अब जो बातें सुनने में आईं उनसे  स्पष्ट है कि विवाद की शुरुआत काफी पहले हो चुकी थी।  दरअसल जब शराब घोटाले में श्री केजरीवाल और मनीष सिसौदिया की गिरफ्तारी के विरुद्ध पार्टी आंदोलन कर रही थी तब न श्री चड्ढा  नजर आए और न ही कोई बयान आया। बाद में पता लगा कि वे आँखों का इलाज करवाने के लंदन गए हुए थे।  लंबे समय तक वहां रुके रहने पर भी उंगलियां उठीं। लौटने के बाद भी उनकी  सक्रियता राज्यसभा की बैठकों में दिए भाषणों तक सीमित रह गई। गत वर्ष दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी वे अग्रिम मोर्चे पर नहीं दिखे। ज़ाहिर है उनके और  पार्टी के बीच  खाई चौड़ी होती गई । राज्यसभा में उपनेता पद से हटाने के बाद भी हालांकि पार्टी की तरफ़ से इस बारे में  अधिकृत बयान नहीं आया किंतु  सोशल मीडिया पर राघव की प्रतिक्रिया से लगता है कि वे भी शांति भूषण, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और कुमार विश्वास की तरह श्री केजरीवाल के लिए असहनीय हो चले हैं। इसका कारण  पार्टी लाइन के समानान्तर ऐसे मुद्दे उठाना बताया जा रहा है जिनसे उनकी व्यक्तिगत छवि तो चमक रही थी लेकिन पार्टी को कोई लाभ नहीं मिल रहा।  एक वजह ये भी है कि सदन में उनके द्वारा सरकार का विरोध सौम्य शैली में किया जाता रहा वहीं पार्टी के नेता संजय सिंह की शैली बेहद आक्रामक है। आम चर्चा ये है कि राघव धीरे - धीरे भाजपा के करीब जा रहे थे। सदन में बजट के कुछ प्रावधानों की प्रशंसा और सुझाव वाला उनका भाषण पार्टी को नागवार गुजरा। लेकिन अब तक  बाहर नहीं किए जाने से वे पार्टी के व्हिप से बंधे हुए हैं। कार्यकाल के दो वर्ष शेष रहने से राघव इस्तीफा देने की गलती भी शायद ही करें। लेकिन इस घटनाक्रम से ये स्पष्ट हो गया कि आम आदमी पार्टी में बिखराव की प्रक्रिया थमने का नाम नहीं ले रही। श्री केजरीवाल और श्री सिसौदिया को छोड़कर तकरीबन सभी संस्थापक सदस्य या तो खुद छोड़ गए या अपमानित कर बाहर कर दिए गए। राज्यसभा में संजय सिंह और राघव को छोड़कर बाकी जितने भी लोगों को भेजा गया वे पार्टी की छवि और सिद्धांतों के सर्वथा विपरीत है। दिल्ली का  किला ढह जाने के बाद पार्टी की चमक और धमक दोनों में कमी आ चुकी है। श्री केजरीवाल और श्री सिसौदिया भले ही अदालत में निर्दोष हो गए किंतु पुराना दबदबा लौटना संभव नहीं दिखता। ऐसे में राघव जैसे साफ - सुथरे और सुयोग्य नेता को किनारे करना पार्टी के लिए नुकसानदेह हो सकता है। भले ही वे जननेता न हों लेकिन पंजाब चुनाव की रणनीति बनाने में उनका अभाव खलेगा। और यदि वे भाजपा के साथ जुड़ गए तब ज्यादा नुकसान पहुंचा सकते हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी