Thursday, 13 August 2026

संसद के नहीं चलने से विपक्ष नुकसान में रहा



संसद अनिश्चित्काल के लिए स्थगित हो गई। दो - तीन विधेयक जरूर पारित हो गए किंतु जिन मुख्य विधेयकों को सरकार पारित करवाने के लिए प्रयासरत थी , वे लटक गए। विदेशी अनुदान  विधेयक तो सरकार ने जेपीसी को भेजने को फैसला कर लिया। रही बात परिसीमन विधेयक की तो अंदरूनी बात ये है कि विधेयक पारित करवाने के लिये कुछ सांसदों की कमी पड़ रही थी। इसके साथ ही द्रमुक का रवैया भी पूरी तरह आश्वस्त करने वाला नहीं था। एनडीए को समर्थन दे रही पार्टियों के भी कुछ सांसदों ने विदेशी अनुदान विधेयक को लेकर ऐतराज जताकर सत्ता पक्ष के कान खड़े कर दिये। इसीलिये सरकार ने चतुराई दिखाते हुए विधेयक को जेपीसी के हवाले कर सुरक्षित रास्ता चुना। जहाँ तक इस सत्र से राजनीतिक नफे - नुकसान की बात है तो इसमें दो राय नहीं हैं कि पहले दिन से ही सरकार दबाव में आ गई। कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले संसद भवन घेरने जा रहे आंदोलनकारियों पर पुलिस द्वारा किये गए बल प्रयोग को लेकर बनी परिस्थितियों में धर्मेंद्र प्रधान के  त्यागपत्र के अलावा आंदोलनकारियों की बाकी मांगें भी सरकार को माननी पडीं। इसका संदेश ये गया कि 12 सालों में पहली बार प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी को झुकना पड़ा। हालांकि भूमि अधिगृहण और कृषि कानून जैसे मुद्दों पर भी श्री मोदी ने अपने कदम पीछे खींचे थे। लेकिन जंतर मंतर के आंदोलन को जेन जी से जोड़कर भविष्य की राजनीति का प्रतीक चिन्ह  बताये जाने से समूचा राजनीतिक विमर्श नया रूप ले बैठा। लेकिन सरकार ने इसमें भी एक चाल ये चली कि उसने विपक्ष द्वारा नीट परीक्षा पेपर लीक के बाद से उठाई जा रही मांगों को मानने के बजाय कॉकरोच जनता पार्टी के साथ समझौता किया। राहुल गाँधी की खीझ का कारण भी यही था क्योंकि वे पहले से ही इस मुद्दे पर सरकार को घेर रहे थे ।  लेकिन अपनी आदतानुसार लम्बी विदेश यात्रा पर चले गए और उसी दौरान कॉकरोच जनता पार्टी मैदान में कूदकर पूरा श्रेय बटोर ले गई। उसी के बाद संसद को न चलने देने का दाँव चला गया। और छात्रों पर हुए बल प्रयोग को बहाना बनाकर गृह मंत्री अमित शाह को निशाना बनाया जाने लगा। लेकिन श्री शाह भी इस खेल को भांप गए जिसके कारण श्री गाँधी हवा में लट्ठ चलाते रहे। लोकसभा में छात्रों पर हुए बल प्रयोग को लेकर चर्चा यदि होती तब श्री शाह को नेता प्रतिपक्ष सहित बाकी विपक्षी नेता घेर सकते थे किंतु श्री गाँधी ने पैलेट गन के उपयोग का आदेश किसने दिया जैसे सवाल के नाम पर सदन नहीं चलने दिया। श्री शाह की सदन में अनुपस्थिति को उनके डर का प्रतीक बताकर उनका उपहास भी किया गया। लेकिन  सत्ता पक्ष ने विपक्ष के सामने शर्त रख दी कि गृह मंत्री सभी सवालों का जवाब सदन में देंगे बशर्ते उन्हें सुना जाए। श्री शाह ने तो अध्यक्ष को पत्र लिखकर चर्चा का समय तय करने का आग्रह तक कर डाला किंतु श्री गाँधी ने सत्ता पक्ष के प्रस्ताव को ये कहकर ठुकरा दिया कि उन्हें श्री शाह का भाषण नहीं सुनना। लंबे समय से लोकसभा में रहने के बाद भी श्री गाँधी इतनी सी बात नहीं समझ सके कि संसद का सत्र चलते समय किसी मंत्री से पूछे गए प्रश्न का उत्तर सदन में ही दिया जाता है। यदि लोकसभा में चर्चा होती तब बतौर नेता प्रतिपक्ष श्री गाँधी के पास श्री शाह को घेरने का समुचित अवसर होता। पूरा देश उस चर्चा को देखता और सुनता। लेकिन हमेशा की तरह अपनी बचकानी जिद के चलते उन्होंने खुद तो मौका गंवाया ही अन्य विपक्षी दलों को भी अपनी बात रखने से वंचित कर दिया। उदाहरण के लिए समाजवादी पार्टी राम मन्दिर चंदे की चोरी पर चर्चा चाह रही थी किंतु राहुल ने सदन चलने नहीं दिया। अब चूंकि सत्रावसान हो चुका है तब ये विश्लेषण करें कि क्या खोया क्या पाया तो सत्ता पक्ष निश्चित रूप से दबाव में रहा लेकिन संसद के मंच का फ़ायदा उठाना तो विपक्ष की प्राथमिकता होनी चाहिए। सही बात ये है कि कांग्रेस लगभग हर सत्र में कोई न कोई नया मुद्दा पकड़कर सत्र का समय तो बर्बाद करती ही है, अपने विचार रखने का मौका भी गँवा देती है। आज यदि श्री गाँधी से पूछा जाए कि इस सत्र के दौरान सदन में उनकी क्या गतिविधि रही तब उनके पास बताने के लिए क्या है ? उनके इस रवैये से उनकी पार्टी को भी नुकसान हो रहा है क्योंकि सदन बाधित रहने से उसके सांसद भी अपने मुद्दे नहीं उठा पाए। उधर सरकार को ये कहने का अवसर मिल गया कि विदेशी अनुदान संशोधन विधेयक से घबराकर काँग्रेस ने सदन नहीं चलने दिया और बाकी विपक्षी पार्टियाँ उसके चक्कर में फंसी रह गईं। दिल्ली में छात्रों पर हुए पुलिसिया बल प्रयोग पर हाय -  तौबा मचाने वाले नेता प्रतिपक्ष रांची के छात्रों की पुलिस द्वारा की गई पिटाई के बाद उनके आँसू पोंछने क्यों नहीं गए इसका  जवाब भी उन्हें देना चाहिए। वैसे अब वे किसी नये मुद्दे की तलाश करेंगे जैसा अब तक करते आये हैं। और बड़ी बात नहीं इसके लिए उन्हें फिर गोपनीय विदेश यात्रा पर जाना पड़े ? 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 12 August 2026

जनता संसद में दिए अच्छे भाषण ही याद रखती है, हंगामे नहीं



संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को समाप्त हो जाएगा। सरकार इसमें एफ.सी.आर ए और परिसीमन  विधेयक पारित करवाना चाहती थी किंतु विपक्ष द्वारा उत्पन्न गतिरोध  के कारण  दोनों सदनों में कामकाज नहीं हो पाने से  लग रहा है कि  उनका पारित होना तभी संभव है जब सरकार हंगामे के बीच ही उन्हें पेश करे और फिर बिना बहस के संसद की मुहर लगवा ले। ये चर्चा भी है कि इस सत्र में उक्त विधेयक पारित नहीं हो सके तो संसद का विशेष सत्र   बुलाकर सरकार इन्हें पारित करवाने का प्रयास करेगी। लेकिन इस सबसे अलग हटकर चिंता का सबसे बड़ा कारण संसद में कामकाज का न होना है जिसकी वजह से लोकतंत्र के इस मन्दिर के प्रति जनमानस की श्रृद्धा लगातार कम हो रही है। इस सत्र की शुरुआत वाले दिन ही  संसद भवन घेरने निकले छात्रों पर पुलिस के बल प्रयोग को मुद्दा बनाकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने सरकार पर हमला शुरू कर दिया। हालांकि धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र के बाद जंतर मंतर आंदोलन  तो खत्म हो गया किंतु राहुल गृह मंत्री अमित शाह की घेराबंदी में जुट गए। उनके वक्तव्य की मांग को लेकर सरकार और विपक्ष में जो रस्साकशी शुरू हुई वह लगातार जारी है। रोजाना सदन की बैठक शुरू होते ही विपक्ष द्वारा  हंगामा किये जाने पर सदन दोपहर तक स्थगित हो जाता है और दोपहर बाद फिर वही कहानी दोहरा दी जाती है। उल्लेखनीय है अनेक सांसद सदन के भीतर होहल्ला कर कार्यवाही बाधित करने के बाद बाहर भी नारेबाजी करते हैं जिससे समाचार माध्यमों में उनके नाम और तस्वीर आ जाए। गौरतलब है कि सदन के संचालन पर प्रति मिनिट ढाई लाख रुपये खर्च होते हैं। उस लिहाज से इस सत्र  पर अब तक 110 करोड़ रु. खर्च हो चुके हैं। किसी सांसद के सदन में प्रवेश करते ही उसका दैनिक भत्ता पक्का हो जाता है , चाहे वह तुरंत बाहर आ जाए। ऐसे दर्जनों सांसद हैं जो इसी सुविधा का लाभ लेते हैं। हालांकि सरकार ने शोर - शराबे के बावजूद दो - तीन विधेयक पारित करवा लिए लेकिन एफ.सी.आर ए और परिसीमन जैसे बेहद महत्वपूर्ण विधेयक लंबित ही हैं। अब सवाल ये है कि संसद को ठप रखने के लिए कौन जिम्मेदार है? विपक्ष लगभग हर सत्र में किसी एक मुद्दे को पकड़कर सदन  की कार्यवाही नहीं चलने देता। दूसरी तरफ सरकार भी उसके आगे झुकने को अपनी शान के विरुद्ध मानती है। इस खींचातानी में छोटी पार्टियों की आवाज तो अनसुनी रहती ही है, बड़ी पार्टियों के सांसद भी अपने क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर बोलने से वंचित रह जाते हैं। सांसदों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर तैयार करने पर भी काफी समय एवं धन खर्च होता है। सदन नहीं चलने पर उनके जो जवाब तैयार किये जाते हैं वे दस्तावेजों तक ही सीमित रह जाते हैं। यदि प्रश्नकाल ठीक से चले तब प्रश्नकर्ता सदस्य  पूरक प्रश्न भी पूछ सकता है। संसद में होने वाली चर्चा का सीधा प्रसारण होने से देश -  विदेश  में उसे देखा सुना जाता है। लेकिन सदन नहीं चलने से सांसदों के जरिये संसद और जनता के बीच का  सम्वाद अवरुद्ध हो जाता है। हालांकि ये समस्या हमारी संसदीय प्रणाली का स्थायी हिस्सा बन चुकी है। विपक्ष कहता है कि सदन चलाना सरकार की जिम्मेदारी है किंतु उसे भी इस प्रश्न का जवाब देना चाहिये कि किसी एक मुद्दे पर अड़कर पूरे सत्र को बर्बाद करने में कौन सी बुद्धिमत्ता और बहादुरी है ? ऐसा लगता है नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी के सलाहकार उन्हें अच्छी सलाह से वंचित रखते हैं। वरना उन्हें बताया जाता कि जनता विपक्ष के नेता द्वारा सदन में दिये गए भाषण याद रखती है न कि सदन में हुए हँगामों को । भाजपा और कांग्रेस के अलावा अन्य  नेताओं द्वारा दशकों पूर्व संसद में दिये कुछ भाषण यू ट्यूब आज भी इसलिए सुने जाते हैं क्योंकि उनमें उनका दृष्टिकोण और  लोकतंत्र के प्रति  दायित्व बोध प्रकट होता है। इसी तरह सत्ता पक्ष की भी ये जिम्मेदारी है कि वह विवाद को एक सीमा के आगे न बढ़ने दे। जिस तरह धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र होते ही जंतर मंतर आंदोलन की हवा निकल गई वैसे ही थोड़ा सा लचीलापन गतिरोध को दूर कर सकता है। सत्ता और विपक्ष में मतभेद कोई अनोखी बात नहीं है। संसदीय लोकतंत्र इससे मजबूत ही होता है। लेकिन वर्तमान माहौल देखकर लगता है कि मतभेद दुश्मनी में बदल चुके हैं। हो सकता है इसके चलते कुछ नेताओं का अहं संतुष्ट होता हो किंतु जनता और देश का नुकसान हो रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 11 August 2026

वरना आंदोलन का अर्थ संसद और विधानसभा में घुसना ही हो जाएगा




कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा दिल्ली के जंतर मंतर पर  तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग को लेकर किये गए आंदोलन ने उस समय गंभीर मोड़ ले लिया जब 20 जुलाई को आंदोलनकारियों ने संसद भवन को घेरने की कोशिश की। जब भीड़ अनियंत्रित होकर पुलिस पर  हमला करने के साथ ही सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ पर उतारू हो गई तब  लाठी चार्ज, पानी की बौछारें और अश्रु गैस का उपयोग कर उन्हें रोका गया।  अंततः श्री प्रधान के त्यागपत्र के साथ ही , आत्महत्या किये छात्रों के परिजनों को मुआवजा तथा आंदोलनकारियों पर दर्ज सभी अपराधिक प्रकरण वापस लेने का समझौता सरकार और कॉकरोच जनता पार्टी के बीच हुआ। उसके बाद आंदोलन तो समाप्त हो गया किंतु पहली बार किसी आंदोलन में गंदी गालियाँ और अश्लील  नारेबाजी सुनाई दी। जो पोस्टर लहराए गए उन्हें देखकर पूरा देश शर्मिंदा हुआ सिवाय उनके जिन्हें उनमें युवा आक्रोश दिखा। कुछ लेखकों और पत्रकारों को उन अश्लील गालियों, नारेबाजी और पोस्टरों में क्रांति के दर्शन भी होने लगे। लेकिन इसी बीच पंजाब और कर्नाटक से पेपर लीक होने की खबरें आने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी नेताओं से वहाँ जाकर आंदोलन करने के बारे में पूछा गया तो वे कन्नी काट गए। इसी तरह जंतर मंतर आंदोलन की अघोषित प्रायोजक आम आदमी पार्टी ने पंजाब पर चुप्पी साधे रखी तो दिल्ली में छात्रों पर हुए बल प्रयोग को मुद्दा बनाकर संसद को नहीं चलने दे रहे राहुल गाँधी ने कर्नाटक के पेपर लीक को सिरे से उपेक्षित कर दिया। लेकिन तभी झारखंड की राजधानी रांची में छात्रों का आंदोलन शुरू हो गया। उसके पीछे भी शिक्षा से जुड़े अनेक मुद्दे थे। लेकिन वह आंदोलन पूरी तरह शांत और व्यवस्थित चल रहा था। न कोई अश्लील नारेबाजी और न गाली -  गलौच। आंदोलन स्थल पर अनुशासन और शालीनता बनाये रखी गई। दिल्ली से भेजे गए जे.एन.यू के ढपली बाजों ने माहौल में गंदगी फैलाने का षडयंत्र रचा तो उन्हें उल्टे पाँव लौटा दिया गया। लेकिन जंतर मंतर आंदोलन के समर्थन में आगे आकर कूदने वालों को रांची के छात्रों में जेन जी नहीं दिखे । जब झारखंड की कांग्रेस समर्थित सरकार ने छात्रों की मांगों को पूरा नहीं किया तब गत दिवस उन्होंने विधानसभा घेरने का ऐलान किया। जिसके बाद विधानसभा का बचाव करने लाठीचार्ज, पानी की बौछार, अश्रु गैस आदि का सहारा पुलिस ने लिया।  दर्जनों आंदोलनकारी  घायल होकर अस्पताल पहुँच गए। तोड़फोड़ और पत्थरबाजी छात्रों की तरफ से भी हुई। संक्षेप में कहें तो दिल्ली के घटनाक्रम की पुनरावृत्ति ही हुई। जैसे ही ये खबर फैली राजनीतिक बिरादरी के उस हिस्से में सन्नाटा छा गया जो दिल्ली की घटना पर आसमान सिर पर उठाये घूम रहा था। राहुल गाँधी ने सोशल मीडिया पर  बल प्रयोग की निंदा करते हुए छात्रों से बात करने की समझाईश तो दे डाली किंतु झारखंड सरकार के विरुद्ध एक शब्द नहीं कहा। उल्लेखनीय है वहाँ शिक्षा विभाग का जिम्मा खुद मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन के पास है और उनकी सरकार कांग्रेस के समर्थन पर टिकी हुई है। कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को युवा क्रांति का सूत्रपात मानने वाले बुद्धिजीवी, चरण चुंबन करने वाले यू ट्यूबर् और ढपली बाज जे.एन.यू वाले भी दाएं - बाएं हो रहे हैं क्योंकि रांची में पिटने वाले हालांकि  जेन जी ही थे किंतु पीटने वाली सरकार  कांग्रेसी बैसाखी पर टिकी है ।  लिहाजा उससे इस्तीफा मांगने की औपचारिकता तक नहीं निभाई गई। यही दोमुँहापन तमाम समस्याओं की जड़ है। धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र पर दुनिया झुकती है झुकाने वाला चाहिए जैसी डींग हांकने वाले काक्रोचियों के नेता कहां दुबके हैं किसी को नहीं पता। लेकिन इससे हटकर देखें तो जंतर मंतर पर एकत्र युवाओं की बेहूदा हरकतों और आपत्तिजनक आचरण को युवा आक्रोश के नाम पर औचित्य पूर्ण ठहराया जाना गलत परिपाटी को जन्म दे गया। गत रात्रि पुण्य प्रसून वाजपेयी बड़े खुश होकर कह रहे थे कि जेन जी का डर खत्म हो गया है। यदि वे संसद और विधानसभा में घुस गए तब सरकारों का क्या होगा? योगेंद्र यादव तो मुद्दों का हल संसद की बजाय सड़कों पर होने जैसी शेखी बघारते सुने जा चुके हैं। सवाल ये है कि जंतर मंतर के जेन जी सही थे तब रांची वालों को गलत नहीं ठहराया जा सकता। और जब दोनों को सही मानना राजनेताओं की मजबूरी है तब देश में आंदोलन का अर्थ संसद और विधानसभा में घुसकर उत्पात मचाना ही रह जाएगा और इस तथाकथित निडरता का शिकार सभी पार्टियाँ और उनके नेता होंगे क्योंकि विभिन्न राज्यों में अन्य दलों की सत्ता है। ऐसे में जेन जी की आड़ में अराजकता को प्रोत्साहित करने का गंदा खेल बन्द होना चाहिए वरना जो होगा उसकी कल्पना ही डरा देती है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 10 August 2026

पूरे जेन जी को गोलबंद करना संभव नहीं



हाल ही में हुए जंतर मंतर आंदोलन के बाद ये अवधारणा तेजी से प्रचारित करवाई जा रही है कि निकट भविष्य में होने वाले चुनावों में जेन जी मतदाता नतीजों को प्रभावित करेंगे। अनेक विश्लेषकों के अनुसार युवा मतदाताओं का थोड़ा सा झुकाव भी उलटफेर करने वाला होगा। इसके साथ ही ये बात भी फैलाई जा रही है कि जेन जी धर्म और जाति जैसे मुद्दों से प्रभावित हुए बिना अपना निर्णय करेंगे। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि  युवाओं का एक वर्ग अब राजनीति के स्थापित तौर - तरीकों से प्रभावित नहीं होता। इसीलिये परिवार के वरिष्ट सदस्यों और युवाओं की  सोच में भिन्नता बढ़ रही है। किसी दल के प्रति लगाव  रखने वाले युवा भी पार्टी की रीति - नीति पसंद न आने पर आलोचनात्मक टिप्पणी करने में भी  नहीं हिचकते। ये बात भी सही है कि 2014 के लोकसभा चुनाव से ही युवा वर्ग नरेंद्र मोदी के प्रति आकर्षित रहा है। आयु में 20 वर्ष छोटे होने पर भी राहुल गाँधी युवाओं के बीच उतनी पैठ नहीं बना सके जो उन्हें सत्ता तक  पहुंचा सके। इसीलिये वे इस वर्ग को लुभाने के लिए भरसक प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। बीते सप्ताह प्रयागराज में भी उन्होंने सार्वजनिक रूप से युवाओं से संवाद किया। उसके पहले भी वे अन्य शहरों में ऐसे आयोजन कर चुके थे। लेकिन जंतर मंतर पर जेन जी आंदोलन का नेतृत्व पूरी तरह नये चेहरों के पास होने से दिल्ली में होते हुए भी वे उससे अलग - थलग पड़ गए। और प्रधानमंत्री निवास पर नाटकीय तरीके से धरना देकर सुर्खियों में आये। गौर करने वाली बात ये है कि उस आंदोलन की संयोजक कॉकरोच जनता पार्टी ने भी श्री गाँधी को कोई महत्व नहीं दिया। उस आंदोलन पर जेएनयू के वामपंथी छात्र संगठनों ने अतिक्रमण कर लिया जिससे उसकी कोई  दिशा तय नहीं हो सकी। कॉकरोच जनता पार्टी के कर्ता धर्ता भी इस घालमेल को समझ गए और राजनीतिक पार्टी बनाने के बजाय दबाव समूह के तौर पर काम करने का ऐलान कर दिया। लेकिन उनके द्वारा रास्वसंघ और भाजपा के विरुद्ध ज़हर उगलने से ये साबित हो गया कि वे पूर्वाग्रहों से ग्रसित है जिसके इरादे अभी भी गोपनीय हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो अभिजित दिपके दिल्ली से उठकर रांची  में झारखंड सरकार के विरुद्ध आंदोलन कर रहे छात्रों के साथ खड़े होते किंतु दूर से ही जुबानी समर्थन के बाद घर बैठ गए। युवाओं के सबसे बड़े हितैषी बने राहुल ने भी रांची जाने से परहेज किया क्योंकि झारखंड सरकार को इंडिया गठबंधन का समर्थन है। वामपंथी छात्र संगठनों के कुछ नेता जरूर पहुंचे किंतु रांची आंदोलन से जुड़े छात्रों ने उनकी देश विरोधी नारेबाजी के कारण उनको उल्टे पाँव लौटा दिया। इससे एक बात स्पष्ट हो गई कि जेन जी को एक सांचे में ढालने वाले मुगालते में हैं। इसका दूसरा उदाहरण मिला प्रयागराज में जहाँ का मंच चूंकि श्री गाँधी ने सजाया इसलिए उ.प्र. के सत्ता संघर्ष में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही समाजवादी पार्टी ने उससे दूरी बनाई। इन सबसे एक बात सिद्ध हो रही है कि जेन जी को किसी एक खूंटे से बांधने के प्रयास सफल नहीं होंगे और विविधता भरे इस देश में उनकी पसंद - नापसंद का अंदाज तात्कालिक मुद्दों के आधार पर नहीं लगाया जा सकता। कल को अखिलेश यादव भी लखनऊ या अन्य किसी शहर में युवाओं का जमावड़ा करें तब क्या ये मान लिया जाएगा कि सारे जेन जी उनके पक्ष में जुड़ गए। कुल मिलाकर युवा असन्तोष को कोई एक स्वरूप देना बेहद कठिन है । एक दो आंदोलनों से पूरे देश की युवाशक्ति का मिजाज भांपकर निष्कर्ष निकालना भी जंतर मंतर और प्रयागराज आंदोलन की तरह प्रायोजित ही कहा जाएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि जंतर मंतर पर मनुवाद और ब्राह्मणवाद विरोधी जो नारेबाजी हुई उससे युवाओं के एक वर्ग में नाराजगी  है। कोई कुछ भी कहे किंतु हमारे देश में चुनावी रणनीति जातीय समीकरणों से ही प्रभावित होती है। अखिलेश यादव  पीडीए  (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक ) का दामन नहीं छोड़ सकते तो अन्य जातीय जेन जी उनका समर्थन क्यों करेंगे? इसी तरह श्री गाँधी भी जातीय मुद्दे में उलझने के कारण सभी युवाओं को एकजुट नहीं कर पा रहे। जिस तरह हिन्दू हित की बात करने वाली भाजपा  को पूरे हिन्दू समाज का समर्थन नहीं मिलता वैसे ही पूरे जेन जी को राजनीतिक रूप से गोलबंद करने की बात सोचना युवाओं की वैचारिक स्वतंत्रता पर संदेह करने जैसा है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 8 August 2026

दलित सिखों में बढ़ते ईसाईकरण से पंजाब की राजनीति में नये समीकरण बनेंगे



पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। इसके दो संकेत बीते दिनों दिल्ली में देखने मिले। पहला किसानों द्वारा पाँच साल पहले दिल्ली में दिये धरने की पुनरावृत्ति और दूसरा जंतर मंतर पर हुआ आंदोलन। पहली मुहिम को तो सरकार ने समझा - बुझाकर ठण्डा कर दिया लेकिन जंतर मंतर आंदोलन लम्बा खिंचा जिसकी राष्ट्रव्यापी चर्चा भी हुई। ये सवाल उठना लाजमी है कि उक्त दोनों का पंजाब चुनाव से क्या संबंध है तो इसका जवाब है किसानों के दिल्ली में जमावड़े के पीछे भी पंजाब लॉबी थी और इसी तरह जंतर मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी के धरने में आम आदमी पार्टी द्वारा सामने आकर सक्रियता दिखाने के पीछे भी पंजाब चुनाव ही है । असल में दिल्ली की सत्ता गँवाने के बाद अरविंद केजरीवाल भी एक बार सुर्खियों में आने के लिए प्रयासरत थे। शुरू में कॉकरोच जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी की जुगलबंदी लोगों को अटपटी लगी परंतु जल्दी ही ये सच्चाई  उजागर हो गई कि दोनों का डी. एन.एक ही है। कॉकरोच जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं द्वारा आम आदमी पार्टी से पुराने जुड़ाव को भी स्वीकार किया गया । जिस तरह से केजरीवाल, मनीष सिसौदिया, संजय सिंह और आतिशी ने जंतर मंतर पर नियमित उपस्थिति दर्ज करवाई उसके बाद रहा - सहा संदेह भी मिट गया। और जब आंदोलन समाप्त होने पर कॉकरोच जनता पार्टी के एक प्रमुख नेता से पूछा गया कि पेपर तो पंजाब में भी लीक हुआ तो क्या जंतर मंतर जैसा आंदोलन भगवंत सिंह मान सरकार के विरुद्ध भी किया जाएगा, तब वे उसका जबाब देने से बचे जिससे जाहिर हो गया कि इस पार्टी और आम आदमी पार्टी के बीच रणनीतिक भागीदारी है। इसी ने  राहुल गाँधी को जंतर मंतर पर आने से रोका और जिससे हुए राजनीतिक नुकसान की भरपाई के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री निवास पर धरने का आयोजन किया। गत दिवस कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी ये स्वीकार किया कि  छात्रों की समस्या को कांग्रेस और राहुल ने पहले ही उठाया था किंतु उसे अपेक्षित जनसमर्थन क्यों नहीं मिला इसके लिए पार्टी को जनता की नब्ज समझने की जरूरत है। कांग्रेस भी पंजाब के आगामी चुनाव के लिए कमर कस रही है लेकिन कुछ साल पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू की लड़ाई ने जिस प्रकार उसका भट्टा बिठाया वही इस बार पूर्व मुख्यमंत्री  चरणजीत सिंह चन्नी द्वारा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग के नेतृत्व को अस्वीकार करने की घोषणा से दोहराई जा रही है। आम आदमी पार्टी की प्रदेश सरकार वैसे तो काफी अलोकप्रिय हो चुकी है लेकिन सक्षम विकल्प सामने नहीं आने से उसे मैदान खाली नजर आने लगा। कांग्रेस की दुविधा ये है कि पंजाब में उसके भीतरी संग्राम के कारण बचा -  खुचा जनाधार भी खिसकने का खतरा है। और फिर वह किसी अन्य पार्टी से गठजोड़ करने की स्थिति में भी नहीं है। संयोग से यही विडंबना भाजपा के साथ भी है। सिखों के बीच वह आज भी समुचित पैठ नहीं बना सकी। हालांकि राज्य में 39 फीसदी हिंदू भी हैं किंतु वे मुख्य रूप से शहरों में ही हैं और उनका एक हिस्सा कांग्रेस के साथ भी है। भाजपा ने पहले कोशिश की कि अन्य राज्यों जैसे ही पंजाब में भी हिंदुओं का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में कर ले। खालिस्तानी आंतक में वृद्धि से इसकी संभावना बढ़ी भी लेकिन पार्टी के पास ऐसा कोई दमदार नेता नहीं है जो हिंदुओं को गोलबंद कर सके। हालांकि आम आदमी पार्टी से आये आधा दर्जन सांसद  उसके  मददगार हैं किंतु वे प. बंगाल जैसा उलटफेर करने का माद्दा नहीं रखते। इसीलिये पार्टी ने अपने पुराने साथी शिरोमणि अकाली दल की तरफ हाथ बढ़ा दिया जिसका प्रमाण सुखबीर सिंह बादल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात से मिल गया। इन दोनों का गठबंधन  अतीत में राज्य की सत्ता भी चला चुका है किंतु 3 कृषि कानूनों को लेकर दोनों दूर हुए और 2022 में अलग - अलग लड़कर नुकसान उठाया। शायद दोनों समझ चुके  हैं कि एक बार फिर एक साथ आने से वे पंजाब की राजनीतिक मुख्यधारा में लौट सकेंगे। हालांकि प्रकाश सिंह बादल की मृत्यु के बाद अकाली दल की वह ताकत नहीं रही और सिख नेतृत्व भी खेमों में बंट चुका है। बढ़ती नशाखोरी और   सीमावर्ती ग्रामीण जिलों में दलित सिखों के तेजी से हो रहा ईसाईकरण भी नये समीकरणों को जन्म दे रहा है। ऐसे में अकाली - भाजपा गठजोड यदि मजबूती से उतरा और दोनों के बीच पुराना भरोसा कायम हुआ तब वे आम आदमी पार्टी के लिए चुनौती बन सकते हैं। फ़िलहाल तो पंजाब के बारे में सियासी भविष्यवाणी  करना जल्दबाजी होगी। 


Friday, 7 August 2026

आरक्षण सामाजिक उत्थान का आधार बने न कि जातिगत विद्वेष का



रास्वसंघ के सरसंघचालक डाॅ. मोहन भागवत अपने पूर्ववर्ती संघ प्रमुखों की तुलना में ज्यादा मुखर हैं। इसका एक कारण ये भी है कि एक सदी की सफल यात्रा कर चुका संघ सामाजिक  जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करवा चुका है। इसीलिये उसका आकर्षण और असर दोनों में वृद्धि हो रही है। देश के प्रत्येक भाग में संघ कार्य  संचालित है। कुछ लोग इसका कारण  देश के बड़े हिस्से में भाजपा का शासन होना भी मानते हैं किंतु इसका दूसरा पहलू ये भी है कि जहाँ संघ कार्य का विस्तार हुआ वहीं भाजपा भी मजबूत हुई। खैर, ये अलग विषय है। ताजा प्रसंग है डाॅ. भागवत द्वारा गत दिवस जेन जी से किया गया संवाद। उस दौरान उन्होंने विभिन्न समकालीन विषयों पर खुलकर अपने विचार प्रस्तुत किये । जेन जी की प्रशंसा करने के साथ ही उनके गुस्से को जायज मानते हुए उन्होंने एक बार फिर दोहराया कि हम इस उम्र में बड़ों की बात बिना विरोध किये मान लेते थे किंतु आज का युवा सवाल पूछता है और हमें उसका जवाब देना चाहिए। संघ  , चूंकि समाज के बीच कार्य करता है लिहाजा पीढी़गत परिवर्तनों पर उसकी नजर रहती है। इसीलिये संघ प्रमुख समय - समय पर उनके बारे में सार्वजनिक तौर पर अपनी बात रखते हैं जिसे संघ का अधिकृत दृष्टिकोण माना जाता है। उनके अनेक बयान विवादास्पद भी हुए। मसलन 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान आरक्षण की समीक्षा संबंधी उनकी टिप्पणी को लालू प्रसाद यादव ने चुनावी मुद्दा बना दिया जिसका असर भाजपा की पराजय के रूप में सामने आया। उसके बाद डाॅ.भागवत इस संवेदनशील विषय पर बोलते हुए सावधानी बरतने लगे । गत दिवस भी उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि जब तक भेदभाव है आरक्षण जारी रहेगा। लेकिन उसी के साथ ये भी जोड़ दिया कि जो लोग आरक्षण से लाभान्वित हो चुके हों उन्हें खुद होकर इस सुविधा को छोड़ देना चाहिये। दूसरे शब्दों में कहें तो उनका संकेत उसी क्रीमी लेयर की ओर था जिसके विरोध में आरक्षित वर्ग के भीतर से ही आवाज उठने लगी है। हालांकि ओबीसी श्रेणी में संपन्न वर्ग आरक्षण की परिधि से बाहर है किंतु अनु. जाति और जनजाति पर क्रीमी लेयर जैसी कोई बंदिश नहीं होने से उनमें आरक्षण का लाभ पीढी़ दर पीढी़ चला आ रहा है। संयोग से गत दिवस ही सर्वोच्च न्यायालय में क्रीमी लेयर को आरक्षण से वंचित करने संबंधी याचिका पर अपने जवाब में  केंद्र सरकार ने दो टूक कह दिया कि अनु. जाति और जनजाति पर क्रीमी लेयर की व्यवस्था लागू नहीं की जा सकती क्योंकि उसका अधिकार केवल संसद को ही है। स्मरणीय है कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय के कुछ न्यायाधीशों ने ही ये सवाल उठाया था कि पति - पत्नी दोनों आई.ए.एस हों तो  उनके बच्चों को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए ? उनका ये भी कहना था कि शिक्षा और आर्थिक प्रगति से सामाजिक स्थिति बेहतर होने के बाद अगली पीढी़ को आरक्षण देने की आवश्यकता पर विचार हो। लेकिन शायद ही कोई होगा जिसने स्वप्रेरित होकर ये कहते हुए आरक्षण छोड़ा हो कि उसके बच्चों को इसकी जरूरत नहीं। रही बात संघ प्रमुख द्वारा की गई अपेक्षा की तो ये तभी संभव है जब संघ परिवार से ही इसकी शुरुवात हो। आरक्षण का प्रावधान संविधान में रखते हुए डाॅ. अंबेडकर ने भी जाति विहीन समाज की बात की थी। उनका कहना था कि  जब तक समाज में छुआछूत और असमानता खत्म नहीं होती, तब तक पिछड़ों और शोषितों को सुरक्षा और प्रतिनिधित्व  मिलना चाहिए। संघ प्रमुख ने भी विषमता रहने तक इसकी आवश्यकता जताई। ऐसे में  क्रीमी लेयर अर्थात आरक्षण की मदद से शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से ऊपर उठ चुके लोगों द्वारा स्वेच्छा से आरक्षण छोड़ने जैसी मुहिम यदि संघ परिवार से जुड़े संगठनों के सदस्यों से शुरू हो तो वह भी किसी सामाजिक क्रांति से कम नहीं होगी। डाॅ. अंबेडकर ने भी आरक्षण को बैसाखी मानने से बचने की बात कहते हुए शिक्षित होने की बात कही थी। दलित  विमर्श में भी ये बात सुनने मिलती है कि आरक्षण दर्द की दवा मात्र है, बीमारी का इलाज नहीं। ये बात इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि जो दलित बच्चा विद्यालय ही नहीं जायेगा उसे भविष्य में आरक्षण का लाभ कहाँ से मिलेगा? ये देखते हुए भागवत जी ने बात छेड़ ही दी है तो  अब इसे आगे भी बढ़ाना चाहिए जिससे आरक्षण सामाजिक उत्थान का आधार बने न कि जातिगत विद्वेष का। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 6 August 2026

कॉकरोच जनता पार्टी लंबी रेस का घोड़ा नहीं



कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने गत दिवस कहा कि वे राजनीतिक दल नहीं बनाएंगे    क्योंकि राजनीतिक दल से अधिक जरूरत दबाव समूह की है जो जनहित के मुद्दों को उठा सके। महाराष्ट्र के संभाजीनगर में  पार्टी के कोर ग्रुप की बैठक के अवसर पर उन्होंने उक्त ऐलान किया।  इसके पीछे की सोच उजागर करते हुए उन्होंने कहा कि कॉकरोच जनता पार्टी चूंकि भावी आंदोलनों में अन्य दलों तथा संगठनों का सहयोग चाहती है लिहाजा उसने खुद राजनीतिक दल बनने से परहेज किया। उल्लेखनीय है जंतर - मंतर पर किये गए आंदोलन में कॉकरोच जनता पार्टी  को आम आदमी पार्टी ने खुलकर समर्थन दिया वहीं जेएनयू  के अनेक वामपंथी संगठनों ने भी सक्रिय हिस्सा लिया। इसके बाद अभिजीत और उनके प्रमुख सहयोगियों के आम आदमी पार्टी से पुराने संबंध होने की बात सामने आने लगी। कहा तो यहाँ तक गया कि ये पार्टी दरअसल अरविंद केजरीवाल ने ही बनवाई है जिसके जरिये  सरकार के विरुद्ध माहौल बनाया जा सके। केजरीवाल का सोचना ये था कि उनके बैनर तले बाकी पार्टियां आने में संकोच करेंगी। उनकी योजना उस लिहाज से सफल कही जाएगी क्योंकि जंतर मंतर पर हुए आंदोलन में राजनीतिक दलों के अलावा गैर राजनीतिक तबका भी शामिल हुआ। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी को राजनीतिक दल में नहीं बदलने के फैसले के पीछे केवल यही कारण नहीं है। सही बात तो ये है कि जंतर मंतर वाला आंदोलन जितना विख्यात हुआ उतना ही कुख्यात भी।  आखिरी दौर में तो अभिजीत और उनकी कोर टीम के हाथ से उसका नियंत्रण निकल चुका था जिससे वह गम्भीरता खोने लगा। उनकी समझ में एक बात और आ गई कि केजरीवाल के पीछे अन्ना हजारे के आंदोलन की पुण्याई थी जबकि कॉकरोच जनता पार्टी इस मामले में खाली हाथ है। और ये भी कि केजरीवाल आम आदमी पार्टी बनाने के पहले से ही अपने एन .जी.ओ के कारण दिल्ली में समाज के निचले स्तर में पैठ बना चुके थे। उनके साथ सिविल सोसाइटी की अनेक विख्यात हस्तियां जुड़ी होने से  पहिचान का संकट नहीं था। इसके विपरीत अभिजीत और उनके दाएं - बाएं हाथ कहे जाने वाले कतिपय लोगों की आम जनता में न कोई छवि है और न ही साख। उल्टे जंतर मंतर पर हुई गाली - गलौच के कारण उनका दामन दागदार हो गया। ऊपर से आंदोलन की समाप्ति पर आलीशान होटल में जश्न मनाते हुए पार्टी  नेताओं के वीडियो सार्वजनिक होने के बाद बजाय शर्मिंदगी महसूस करने के जेन जी के नाम पर उसका बचाव करने से भी समाज के बड़े वर्ग में उनके बारे में नकारात्मक अवधारणा स्थापित हो गई। धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र होते ही जिस जल्दबाजी में अभिजीत एंड कंपनी ने अपना बोरिया - बिस्तर समेटा उससे उनकी ईमानदारी और लंबी लड़ाई लड़ने की क्षमता पर भी संदेह पैदा होने लगा। सरकार द्वारा  जो लिखित आश्वासन दिये जाने थे वे न मिलने पर देशव्यापी आंदोलन की धमकी भी फुस्स साबित हुई। जो जानकारी आ रही है उसके मुताबिक दिल्ली पुलिस ने अनेक ऐसे लोगों पर शिकंजा कस दिया है जिन्होंने  आंदोलन के दौरान पुलिस पर घातक हमले किये और सरकारी वाहनों को नुकसान पहुंचाया। अनेक के पास हथियार होने का मामला भी जाँच में है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपराधिक तत्वों पर कार्रवाई की छूट दे दी। आंदोलन के बाद कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं से जब पंजाब और कर्नाटक में हुए पेपर लीक पर वहाँ के शिक्षा मंत्री को हटाये जाने की मांग करने और आंदोलन करने के बारे में पूछा गया तो वे बगलें झांकने लगे। झारखंड में चल रहे छात्रों के आंदोलन को जुबानी समर्थन देने से आगे पार्टी नहीं बढ़ पा रही है।  ये देखते हुए उन आशंकाओं को बल मिल रहा है कि सोशल मीडिया पर पैदा हुई कॉकरोच जनता पार्टी लंबी रेस का घोड़ा नहीं है। हालांकि राजनीति में न जाने की बात अन्ना आंदोलन के बाद अरविंद केजरीवाल ने भी कही थी किंतु वह दौर अलग था। इसीलिये कॉकरोच जनता पार्टी को किसी भी पार्टी ने भाव नहीं दिया। जंतर मंतर आंदोलन की आधी - अधूरी सफलता के बाद अब उसके सामने कोई स्पष्ट लक्ष्य नजर नहीं आ रहा। सही बात ये है कि खुद केजरीवाल ही अभिजीत की महत्वाकांक्षाओं के मार्ग में सबसे बड़े रोड़ा हैं। रही बात दबाव समूह बनने की तो अभिजीत और उनके साथी ये भूल रहे हैं कि काठ की हांडी बार - बार आग पर नहीं चढ़ती। 


- रवीन्द्र वाजपेयी