देश के सीमावर्ती इलाकों सहित कुछ अन्य क्षेत्रों में डेमोग्राफिक चेंज ( आबादी में असंतुलित बदलाव) लम्बे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिंता का विषय रहा है। प. बंगाल के हालिया विधानसभा चुनाव में डेमोग्राफिक चेंज और बांग्लादेशियों की घुसपैठ ममता सरकार के विरुद्ध बड़ा मुद्दा था । भाजपा को सत्ता तक लाने में इसका प्रमुख योगदान रहा। नए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने घुसपैठियों को उनके देश वापस भेजने की घोषणा कर इसे जीवित रखने का संकेत दे दिया था। इसकी पुष्टि गत दिवस हो गयी जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने डेमोग्राफिक चेंज पर एक उच्चस्तरीय समिति के गठन की घोषणा करते हुए कहा कि घुसपैठ और अन्य कारणों से अप्राकृतिक डेमोग्राफिक चेंज किसी भी देश के वर्तमान व भविष्य के लिए गंभीर चुनौती है। जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता में बनाई गई इस समिति में जनगणना आयुक्त के साथ दुर्गा शंकर मिश्रा (से . नि.आईएएस), बालाजी श्रीवास्तव (से.नि .आईपीएस) और डॉ. शमिका रवि समिति के सदस्य रहेंगे वहीं संयुक्त सचिव (फॉरेनर्स-I), गृह मंत्रालय सदस्य सचिव बनाए गए हैं। वैसे तो घुसपैठियों की समस्या 1947 के बाद से ही चली आ रही है। जम्मू कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर राज्यों में पड़ोसी देशों से आकर बसे घुसपैठियों ने सामाजिक वातावरण को बिगाड़ने के साथ ही जमीन कब्जाने जैसे कारनामे किए जिससे उनका मूल निवासियों से टकराव भी हुआ। 1971 में बांग्लादेश बनने के पहले जो 1 करोड़ से ज्यादा शरणार्थी भारत में घुसे उनको वापस भेजना तो दूर उल्टे वह सिलसिला बेरोकटोक जारी रहा। धीरे - धीरे ये घुसपैठिये देश के भीतरी हिस्सों तक फैलते गए और मुस्लिम वोट बैंक के सौदागरों ने इन्हें नागरिकता दिलवाने में भरपूर सहायता और संरक्षण प्रदान किया। इसके बाद म्यांमार से खदेड़े गए रोहिंग्या मुस्लिमों ने भी पूर्वोत्तर राज्यों में अपने ठिकाने बना लिए। उ.प्र और बिहार के जो क्षेत्र नेपाल की तराई में हैं वहां अचानक मदरसों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि भी चौंकाने वाली रही। बिहार में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के विधायक इसी इलाके से जीते भी। असम भी जनसंख्या संतुलन बिगड़ने की समस्या से जूझता आ रहा है। इसीलिए मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने पिछले कार्यकाल में ही मदरसे बंद करवा दिए थे । देवभूमि कहलाने वाले हिन्दू बहुल उत्तराखंड राज्य में भी मुस्लिम आबादी रहस्यमय तरीके से बढ़ी जिससे सुरक्षा एजेंसियां चिंता में पड़ गईं। ये बात पूरे देश में अनुभव की जा रही है कि डेमोग्राफिक चेंज हमारी संप्रभुता के साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून व्यवस्था, सामाजिक संरचना में गंभीर बदलाव और जनजातीय समाज के संरक्षण से जुड़ी गंभीर समस्या है। गत दिवस गठित समिति अवैध प्रवास और अन्य असामान्य कारणों से पूरे देश में हो रहे जनसांख्यिकी बदलाव का व्यापक मूल्यांकन करते हुए धार्मिक एवं सामाजिक समुदायों के स्तर पर इसके पैटर्न का विश्लेषण कर सुनियोजित और समयबद्ध समाधान प्रस्तुत करेगी। बड़ी बात नहीं इस समिति का विरोध भी वे राजनीतिक दल करने लगें जो आबादी के असंतुलन में अपनी चुनावी संभावनाएं देखते हैं। प. बंगाल में जब भी बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालने की बात उठी ममता बैनर्जी उनके बचाव में खुलकर सामने आईं। सीएए और मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का विरोध करने में भी उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके घुसपैठिया प्रेम का सबसे बड़ा उदाहरण ये था कि उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा कई बार लिखित अनुरोध किए जाने पर भी बांग्लादेश सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने के लिए जमीन देने में कोई रुचि नहीं दिखाई। वहीं सत्ता बदलते ही मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी ने केंद्र सरकार द्वारा मांगी गई भूमि सौंप दी। गौरतलब है घुसपैठिये केवल आबादी ही नहीं बढ़ाते अपितु हमारे संसाधनों का उपयोग करते हुए जिंदगी बसर करते हैं। चूंकि इनमें बड़ी संख्या मुस्लिमों की होती है लिहाज़ा ये जिस क्षेत्र में बसते हैं वह मुख्य धारा से कट जाने के कारण राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का केंद्र बने नहीं रहता। उ.प्र, बिहार, असम और प. बंगाल में अनेक ऐसे निर्वाचन क्षेत्र हैं जिनमें केवल मुसलमान ही जीत सकता है। यहां घुसपैठियों के कारण भारत विरोधी माहौल खुले आम देखा जा सकता है। इस समिति की आवश्यकता काफी पहले से महसूस की जा रही थी। केंद्र सरकार ने इसका गठन कर बहुत ही सामयिक और साहसिक कदम उठाया है। ये घुसपैठिए आस्तीन में छिपे साँप से कम नहीं हैं जिनका फ़न कुचलना देश की अखंडता और सुरक्षित भविष्य के लिए अत्यावश्यक है।
- रवीन्द्र वाजपेयी