Wednesday, 16 September 2026

सऊदी अरब के इसराइल की शरण में जाने से मुस्लिम देशों की एकता खतरे में



प. एशिया में दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त की कहावत चरितार्थ हो रही है। यू.ए.ई, कतर, जार्डन, मिस्र जैसे मुस्लिम देशों ने तो पहले से ही इसराइल से रिश्ते सुधारकर उसकी पिटाई से बचने का इंतजाम कर लिया किंतु  इस्लामिक देशों के मुखिया सऊदी अरब और इसराइल में राजनयिक रिश्ते कायम नहीं हो सके। सऊदी अरब में इस्लाम का सबसे पवित्र स्थल मक्का होने से दुनिया भर के मुस्लिम  हज करने  आते हैं। अमेरिका ने सऊदी अरब और इसराइल को नजदीक लाने का प्रयास किया भी  किंतु हमास द्वारा इसराइल में की गई हिंसक कार्रवाई से बात आगे नहीं बढ़ सकी। और फिर इसराइल की जो लड़ाई हमास तथा ईरान से चल रही थी उसमें अमेरिका भी कूद पड़ा। शुरुआत में  लग रहा था कि ईरान कुछ दिनों में ही घुटने टेक देगा परंतु उसने युद्ध के दायरे को बढ़ाते हुए यू.ए.ई , कतर, ओमान जैसे पड़ोसी देशों पर तो हमले किये ही सऊदी अरब और जॉर्डन तक को लपेटे में ले लिया। सबसे ज्यादा नुकसान सऊदी अरब को हुआ जिसकी कई रिफ़ायनरी ईरान के हमलों में तबाह हो गईं। इसका असर उसके तेल निर्यात पर पड़ने से अर्थव्यवस्था खतरे में आ गई । ईरान द्वारा होर्मुज समुद्री जलमार्ग अवरुद्ध किये जाने से तेल उत्पादक अन्य देशों के सामने भी मुसीबत खड़ी हो गई । यद्यपि लड़ाई लंबी खिंचने से अमेरिका की मारक क्षमता में कमी आई है वहीं ईरान भी कुछ ठंडा पड़ा है।  लेकिन एक नया मोर्चा यमन में सक्रिय इस्लामिक उग्रवादी संगठन हूती ने सऊदी अरब में खोल दिया। हमास को तो इसराइल ने काफी कमजोर कर दिया वहीं हिजबुल्ला  की कमर भी तोड़कर रख दी परंतु हूती के लड़ाके अब समुद्री जहाजों का अपहरण करने से आगे बढ़कर सऊदी अरब पर हमलावर हैं। हमास और हिजबुल्ला की तरह ही हूती भी ईरान पालित आतंकवादी संगठन ही है जिसके पास ड्रोन और मिसाइल जैसे अत्याधुनिक अस्त्र - शस्त्र हैं। सऊदी अरब  उसके हमलों से घबराहट में है। मक्का सुरक्षा संधि के अंतर्गत हाल ही में सऊदी अरब और पाकिस्तान इस बात पर रजामंद हुए थे कि दोनों पर किसी अन्य देश द्वारा किये गए हमले की स्थिति में दूसरा  उसको सैन्य सहायता प्रदान करेगा। सऊदी अरब को उम्मीद थी हूती के हमलों का मुकाबला करने में पाकिस्तान उसकी मदद के लिए दौड़ा आयेगा। लेकिन उसने  साफ इंकार कर दिया। सऊदी अरब ने मदद की गुहार अमेरिका से भी लगाई किंतु डोनाल्ड ट्रम्प ने भी ठेंगा दिखा दिया। उसके बाद मरता क्या न करता की तर्ज पर उसने हूती विद्रोहियों के बढ़ते खतरों से निपटने के लिए अमेरिकी सेंट्रल कमांड  के माध्यम से इज़राइल से अप्रत्यक्ष रूप से खुफिया मदद मांगी है। असल में लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के पास हूती लड़ाकों की बढ़ती आक्रामकता से सऊदी अरब के तेल और नागरिक बुनियादी ढांचे को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। स्मरणीय है सऊदी अरब के इसराइल से औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं और उसने  इज़राइल को मान्यता भी नहीं दी । बावजूद इसके अमेरिकी मध्यस्थता से  सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने हूतियों की सैन्य गतिविधियों और भावी योजनाओं का पता लगाने के लिए इज़राइल से खुफिया जानकारी देने का अनुरोध किया है। प.एशिया के  समीकरणों में ये बहुत बड़ा बदलाव है। सऊदी अरब द्वारा पाकिस्तान रूपी इस्लामिक देश से धोख़ा खा जाने के बाद मुस्लिमों  के ऐलानिया दुश्मन  इजरायल पर भरोसा जताने से ये स्पष्ट हो गया है कि इस्लामिक देशों के मन में इसराइल विरोधी कट्टरता ढलान पर आने लगी है। दरअसल बीते कुछ दिनों में हूतियों द्वारा  तेल  और पंपिंग सुविधाओं को निशाना बनाये जाने से सऊदी अरब को अपनी मुख्य तेल पाइपलाइन का काम बंद करना पड़ा था। इसके अलावा हूती विद्रोहियों ने लाल सागर के किनारे द्वीपों पर कब्जा करना शुरू कर दिया और सऊदी  जहाजों को  रोककर उसकी आर्थिक नाकेबंदी कर दी है। सुना है  कुछ अन्य मुस्लिम देश भी ईरान के हमलों से बचने के लिए इसराइल से गुप्त  रूप से मदद मांगने की तैयारी में हैं क्योंकि उन्हें लग गया है कि पाकिस्तान  का कोई भरोसा नहीं और अमेरिका हर सहायता की कीमत वसूलता है। यदि ऐसा हो गया तब इस्लामिक सहयोग संगठन (ओ. आई. सी) का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा जिसमें 57 मुस्लिम देश शामिल हैं। वैसे भी सऊदी अरब और इसराइल में यदि नजदीकी बढ़ी तब मुस्लिम जगत का कई टुकड़ों में विभाजित होना तय जो इसराइल के विरोध में एकजुट रहा है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 15 September 2026

राजस्थान : सवर्णों की नाराजगी और युवाओं के गुस्से का लाभ नहीं उठा सकी कांग्रेस



राजस्थान के 309 नगरीय निकायों के जो चुनाव परिणाम गत दिवस घोषित हुए उनसे भाजपा को काफी राहत मिली होगी। वरना यूजीसी अधिनियम के बाद सवर्ण जातियों में पनपे गुस्से और उसके बाद  नीट पेपर लीक से युवाओं में बह रही असंतोष की लहर के कारण न सिर्फ विरोधी ही ये मान बैठे थे कि भाजपा का सूपड़ा साफ होना तय है अपितु भाजपा के भीतरखानों में भी निराशाजनक नतीजों की सुगबुगाहट साफ  महसूस हो रही थी। दरअसल 2023 में जब वसुंधरा राजे सहित पार्टी के अन्य दिग्गजों को किनारे धकेलते हुए भजनलाल शर्मा नामक पहली बार के विधायक को मुख्यमंत्री बनाया गया तभी से भाजपा के इस पुराने गढ़ में उसकी पकड़ कमजोर होने की आशंका व्यक्त की जाने लगी थी। श्री शर्मा की पार्टी संगठन में जरूर भूमिका रही किंतु सत्ता के समीकरणों में वे कहीं भी फिट नहीं हुए। पार्टी की गुटबाजी में भी उनका कोई स्थान नहीं रहा। ढाई साल के भीतर बतौर मुख्यमंत्री वे ऐसा कोई करिश्मा नहीं कर सके जिससे उनकी छवि एक लोकप्रिय या प्रभावशाली शासक के तौर पर स्थापित हो पाती। इस राज्य में ब्राह्मण आबादी काफी है और उसका बड़ा हिस्सा भाजपा का परंपरागत समर्थक भी रहा है। इसी जाति का मुख्यमंत्री बनवाकर पार्टी ने राष्ट्रीय स्तर पर सवर्णों को खुश करने का दाँव चला। मुख्यमंत्री के अलावा दो उपमुख्यमंत्री रखना भाजपा की घोषित रणनीति बन गई है जो राजस्थान के साथ ही छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में भी अपनाई गई। लेकिन इन तीनों में श्री शर्मा ही सबसे अनुभवहीन माने गए। इसीलिए नगरीय निकाय चुनावों को उनके राजनीतिक चातुर्य और प्रशासनिक दक्षता की परीक्षा माना जा रहा था। चूंकि 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली जोरदार सफलता महज कुछ महीनों बाद हुए लोकसभा चुनाव में दोहराई नहीं जा सकी इसलिए ये कयास लगने शुरू हो गए कि शर्मा जी शायद ही अपना कार्यकाल पूर्ण कर पाएंगे। और 2028 का विधानसभा चुनाव किसी और के चेहरे पर लड़ा जाएगा। राज्य में भाजपा के जो नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नजर गड़ाये बैठे हैं वे भी नगरीय निकाय चुनावों में भाजपा के लचर प्रदर्शन का इंतजार कर रहे थे ।  लेकिन उनको निराशा हाथ लगी क्योंकि जो परिणाम आये उनको बहुत संतोषजनक तो नहीं कहा जा सकता परंतु वर्तमान राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों में किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी के लिए ये संतोष प्रदान करने वाले हैं। विशेष रूप से इसलिए कि भाजपा के जो प्रतिबद्ध मतदाता उससे रुष्ट चल रहे थे उन्होंने कांग्रेस को समर्थन देने के बजाय निर्दलीयों के कंधे पर हाथ रख दिया। बड़ी संख्या में उनका जीतकर आना इसका संकेत है। अनेक निकायों में तो उनके हाथ ही सत्ता की कुंजी है । ये कहा जा रहा है कि ज्यादातर निर्दलीय भाजपा के असंतुष्ट होने से वे अंततः उसी के पाले में आ जाएंगे। वैसे जयपुर, भीलवाड़ा, कोटा और उदयपुर में भाजपा का महापौर बनना तय है। बीकानेर नगर निगम में कांग्रेस को स्पष्ट जीत मिली है। वहीं जोधपुर, भरतपुर, अजमेर और पाली का महापौर निर्दलीय तय करेंगे। अजमेर और पाली में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। चुनाव आयोग के अनुसार भाजपा राज्य में 4178 वार्डों में  तो कांग्रेस पार्टी ने 3612 वार्डों जीती। जबकि कुल 2273 निर्दलीय प्रत्याशी जीतने में सफल रहे। हालांकि कुछ नतीजों को भाजपा के लिए झटका भी कहा जा सकता है क्योंकि बीकानेर में वह पूरी तरह पिट गई वहीं जोधपुर, अजमेर जैसे महत्वपूर्ण शहरों में बहुमत से दूर रह गई। लेकिन उसके लिए खुशी मनाने वाली बात ये है कि कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर उत्पन्न करने में नाकामयाब साबित हुई। सवर्णों की नाराजगी और युवाओं के गुस्से को अपने पक्ष में मोड़ने में कांग्रेस नेतृत्व असफल रहा जिसके कारण भाजपा से नाराज उसके परंपरागत मतदाताओं ने निर्दलीयों की लॉटरी खोल दी। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को राजस्थान के इन नतीजों ने चैन की सांस लेने का अवसर दे दिया जो म.प्र और बिहार के दो विधानसभा उपचुनाव परिणाम के बाद चिंता में डूबा था।  दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के कारण भी भाजपा दबाव में थी जिसके नेता राजस्थान में भी दौरा करते रहे। रही बात कांग्रेस की तो अशोक गहलोत और सचिन पायलट की लड़ाई उसकी स्थायी मुसीबत बन गई है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 14 September 2026

हिन्दी को सबसे अधिक खतरा हिन्दी भाषियों से ही है



आज एक तरह से हिन्दी का सरकारी जन्मदिवस है। 14 सितम्बर 1953 को राजभाषा दिवस की घोषणा हुई। समय बीतने के साथ  सप्ताह , पखवाड़ा और मास भी मनाए जाने लगे । वैसे तो ये गौरव की बात है कि अनेकानेक प्रांतीय भाषाओं के बावजूद ऐसे आयोजनों में  हिन्दी का गुणगान करते हुए उसकी सहजता और सरलता की प्रशंसा के साथ ही उसे अपनाने का वचन लिया जाता है। इस दौरान विभिन्न प्रतियोगिताएँ , पुरस्कार  , सम्मान  , गोष्ठियां , कवि सम्मलेन, पोस्टर - बैनर , जैसी अनेक गतिविधियां भी होती हैं।  केंद्र  सरकार के सभी विभागों तथा उपक्रमों में राजभाषा अधिकारी नियुक्त हैं जिनका दायित्व गैर हिन्दी भाषियों कर्मियों को हिन्दी के अधिकतम उपयोग  के लिये प्रेरित और  प्रशिक्षित करना है। उनके प्रयासों से निःसंदेह शासकीय  प्रतिष्ठानों में हिन्दी का उपयोग काफी बढ़ा है। यद्यपि भाषावार प्रान्तों के गठन से उत्पन्न क्षेत्रीयता की भावना हिन्दी के विरोध का कारण बनती रही है। इसके चलते  चुनावी राजनीति ने भाषा को भी वोट बैंक का जरिया बना दिया। उदाहरण के लिए  पूर्व केंद्रीय मंत्री डी. राजा  हिन्दी थोपने का आरोप लगाते हुए केन्द्र सरकार को अलग तमिल देश की धमकी तक दे चुके हैं। महाराष्ट्र में भी उद्धव ठाकरे की शिवसेना और राज ठाकरे की मनसे मराठी भाषा के नाम पर लोगों को भड़काने का काम करती रही हैं। हाल ही में वहाँ भाजपा और शिवसेना ( शिंदे) सरकार ने सभी गैर मराठी भाषी ऑटो और टैक्सी चालकों को निश्चित समय सीमा में कामचलाऊ मराठी सीखने जैसा बेतुका फरमान जारी कर दिया।  अन्य राज्यों में भी इसी प्रकार क्षेत्रीय भाषा के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेकने का प्रयास होता रहता है। हालांकि संतोष का विषय है कि उत्तर भारतीय राज्यों में अदालतों के अलावा राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर की  प्रतियोगी परीक्षाओं में भी हिन्दी को मान्यता मिल गयी है। देश के सबसे बड़े अलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा हाल ही के वर्षों में 20 हजार से अधिक  फैसले हिन्दी में लिखे जाने संबंधी जानकारी से हिन्दी प्रेमियों को सुखद अनुभूति हुई । लेकिन इसका विरोधाभासी पहलू  ये है कि हिन्दी जिस वर्ग की मातृभाषा है उसमें ऐसे लोगों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है जो हिन्दी के प्रति उपेक्षाभाव ही नहीं रखते अपितु उसका मजाक उड़ाने तक से बाज नहीं आते । पहले संपन्न वर्ग ही अंग्रेजी को सभ्यता और आधुनिकता का प्रतीक मानकर उसके प्रति आकर्षित दिखता  था परंतु अब तो मध्यम आय वर्ग में भी जिस तरह उसके प्रति अनुराग बढ़ा उससे सांस्कृतिक प्रदूषण बढ़ रहा है। अँग्रेजी माध्यम को उज्ज्वल भविष्य की गारंटी मान लेने की सोच के चलते विद्यालायीन स्तर पर पढ़ाई का स्वरूप ही पूरी तरह से बदल गया।  गली -  गली नजर आने वाले  कान्वेंट स्कूल के बोर्ड  इसका प्रमाण हैं । यदि इनमें  पढ़ने वाले निम्न आय वर्ग परिवारों के बच्चे काम चलाऊ अंग्रेजी ही सीख जाएँ तो भी संतोष है परंतु अंग्रेजी की चकाचौंध में वे हिन्दी में ही कमजोर हो जाते हैं। इस अधकचरेपन  के लिये  वे अभिभावक भी जिम्मेदार हैं जो अंग्रेजी की मृगमरीचिका में अपनी संतानों को उनकी  मातृभाषा से ही दूर कर बैठते हैं । यद्यपि भारत में हिन्दी को समाप्त करना असंभव  है क्योंकि वही  राष्ट्रीय स्तर की संपर्क भाषा है। इसीलिए  तमिलनाडु सहित अन्य दक्षिणी राज्यों के लोग उत्तर  भारत में नौकरी अथवा व्यवसाय करने में लेशमात्र भी  संकोच नहीं करते। इसी तरह उप्र - बिहार के श्रमिक  बड़ी संख्या में दक्षिणी राज्यों में भी कार्यरत हैं। कोरोना काल में महानगरों से मजदूरों की  घर वापसी के समय ये बात उजागर हुई कि गैर हिन्दी भाषी राज्यों में भी इन श्रमिकों का कोई विरोध नहीं है। ये देखते हुए हिन्दी भाषी लोगों को अपनी भाषा के प्रति उपेक्षाभाव त्यागना चाहिए । भाषा के रूप में अंग्रेजी  सीखना कतई बुरा नहीं है । लेकिन उसके जरिए आ रहे संस्कार समाज के लिए घातक हैं। विचारणीय है कि अंग्रेजी साहित्य और संस्कृति का प्रभाव आजादी के 80 वर्ष  बाद भी यथावत है। इतिहास साक्षी है कि विदेशी भाषा के आधिपत्य ने अनेक देशों की सांस्कृतिक पहिचान को नष्ट कर दिया। ये देखते हुए कुछ दिनों तक चलने वाले सरकारी और गैर सरकारी  आयोजन  प्रचार - प्रसार की दृष्टि से तो अच्छे हैं लेकिन जब तक अपनी मातृभाषा के उपयोग के लिए  हिन्दी भाषी ही आकर्षित नहीं होते तब तक सरकारी संरक्षण चाहे कितना मिल जाए परंतु वह उपेक्षित ही रहेगी। तामिलनाडु  के नेताओं का  हिन्दी विरोध तो राजनीतिक स्वार्थ पर आधारित है किंतु हिन्दी भाषी राज्यों में हिन्दी की उपेक्षा समझ से परे है। मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा हेतु बनी नई शिक्षा नीति इस दिशा में अच्छा कदम है किंतु उसे ईमानदारी से अपनाना जरूरी है क्योंकि हिन्दी को सबसे ज्यादा खतरा हिन्दी भाषियों से ही है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 12 September 2026

जी 7 का मजाक उड़ाकर पुतिन ने खोला नया मोर्चा



रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन वर्तमान विश्व के सबसे वरिष्ट राष्ट्राध्यक्ष हैं। वर्ष 2000 से लगातार वे रूस जैसी विश्व शक्ति का नेतृत्व करते आ रहे हैं। सोवियत संघ के बिखराव के बाद रूस आर्थिक बदहाली के साथ ही राजनीतिक अस्थिरता में फंस चुका था। उद्योग ठप पड़ने से विश्व व्यापार में उसकी हिस्सेदारी नगण्य थी। दरअसल सोवियत संघ के दौर में पूर्वी यूरोप के साम्यवादी देश उसके आर्थिक उपनिवेश थे किंतु अचानक सब उलट - पुलट हो गया। सोवियत संघ तो टुकड़ों में बँटा ही उसके प्रभावक वाले साम्यवादी देश भी मुक्त अर्थव्यवस्था के प्रति आकर्षित होकर अमेरिका की तरफ झुकने लगे।  कभी - कभी तो लगा रूस भी अमेरिका का पिट्ठू बनकर रह जाएगा।  चीन ने भी  उसके साथ सटी सीमा में अपनी चिर  - परिचित हरकतें शुरू कर दीं। ऐसे में रूस की खुफिया एजेंसी के.जी.बी के पूर्व प्रमुख पुतिन ने जब सत्ता संभाली तब किसी को उम्मीद नहीं थी कि वे देश को संकट से उबारकर विश्व शक्ति की हैसियत वापस दिलवा सकेंगे। लेकिन अपने दृढ इरादों का परिचय देते हुए उन्होंने  रूस को आर्थिक और सैन्य क्षेत्र में एक बार अग्रणी देशों के बीच  ला खड़ा किया । साथ ही कूटनीति रूपी शतरंज में भी अपनी चालों से सभी को चकित कर दिया। यही कारण है कि पूरा विश्व उनके फैसलों को गंभीरता से लेता है। शुरुआत में ऐसा लग रहा था कि यूक्रेन के साथ लड़ाई करके उन्होंने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली । हालांकि 3 साल बाद भी वे भले ही यूक्रेन को घुटने नहीं टिकवा सके किंतु उसके बड़े भूभाग पर रूसी सेनाएं काबिज हैं । अमेरिका और उसके समर्थक देशों द्वारा थोपे गए आर्थिक प्रतिबंधों ने रूस की जबरदस्त घेराबंदी की किंतु पुतिन ने भारत और चीन के साथ व्यापार बढ़ाकर उस चक्रव्यूह को भेदने में सफलता हासिल कर ली। और जब अमेरिका ने ईरान पर हमला  किया तब उन्होंने चीन के साथ मिलकर ईरान को सैन्य सहायता के अलावा कूटनीतिक समर्थन देकर अमेरिका को उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया जहाँ से वह न आगे बढ़ने की हिम्मत कर पा रहा है और न ही पीछे ही हटने की स्थिति में है। पुतिन के बढ़े हुए आत्मविश्वास का ताजा उदाहरण  गत दिवस ब्रिक्स सम्मेलन में मिला जब जी - 7 नामक समूह पर तंज कसने में उन्होंने कोई संकोच नहीं किया। इस समूह में अमेरिका, कैनेडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और ग्रेट ब्रिटेन शामिल हैं। यूरोपियन यूनियन भी इसमें आमन्त्रित रहता है। ब्रिक्स बिजिनेस समिट में बोलते हुए पुतिन ने उक्त समूह को तथाकथित जी 7  कहते हुए सवाल उठाया कि वे खुद को  महान क्यों कहते हैं, जबकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में उनका योगदान  काफी घट चुका है। उन्होंने कहा कि गत पांच वर्षों में दुनिया की जीडीपी में ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी 40% से अधिक रही  जबकि जी-7 देशों की केवल 29% ।  पुतिन के अनुसार, वैश्विक आर्थिक वृद्धि का अशिकांश हिस्सा ब्रिक्स देशों से आया जिससे साफ  है कि अब नए विकास केंद्र उभर रहे हैं। इसी के साथ उन्होंने पश्चिमी देशों पर निशाना साधते हुए कहा कि यूरोप और दुनिया भर में चल रही उथल-पुथल पश्चिमी नेतृत्व की नीतिगत गलतियों का दुष्परिणाम है। उल्लेखनीय है पुतिन ने उक्त बात तब कही जब चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग दिल्ली नहीं पहुंचे थे। ऐसे में ब्रिक्स के मंच से जी 7 जैसे आर्थिक दिग्गज की वजनदारी को चुनौती देकर उन्होंने जो नया मोर्चा खोला वह उनकी कूटनीतिक पहल का प्रमाण है। भारत चूंकि इस सम्मेलन का मेजबान है इसलिए वह ऐसी कोई भी बात कहने से बचेगा जो विवाद उत्पन्न करे किंतु अमेरिका विरोधी लामबंदी की बागडोर पुतिन को सौंपकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  चतुराई का ही परिचय दिया।  ब्रिक्स सम्मेलन में सबसे पहले पहुंचकर रूसी राष्ट्रपति ने श्री मोदी से बातचीत के दौरान कुछ बड़े रक्षा सौदों को अंतिम रूप देने का जो प्रयास किया वह भी अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी देशों को चुनौती है। भारत और चीन के बीच चले आ रहे सीमा विवाद के बावजूद वे पुतिन ही हैं जो श्री मोदी और जिनपिंग के बीच पुल की भूमिका में हैं। ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी, पुतिन और जिनपिंग की जुगलबंदी का जो नया रूप सामने आ रहा है उसके चलते वैश्विक राजनीतिक संतुलन में बड़ा बदलाव आने की सम्भावना मजबूत हो रही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 10 September 2026

कश्मीरी पंडितों को मिल रही धमकियों को गंभीरता से लेना जरूरी



जम्मू कश्मीर में अलगाववाद को जन्म देने वाली धारा 370 को हटे सात वर्ष बीत गए। इन दौरान झेलम और चिनाब में न जाने कितना पानी बह चुका है। शुरुआत  में वहाँ  केंद्र सरकार के उस कदम को लेकर गुस्से से अधिक ये डर था कि धारा 370  हटने पर  जम्मू कश्मीर को प्राप्त विशेष हैसियत खत्म होने से  केंद्र सरकार की दखलंदाजी बढ़ जाएगी ।इससे भी बड़ा कारण था  पूर्ण राज्य की हैसियत खत्म कर उसे केंद्र शासित राज्य बनाने के साथ ही कारगिल और लद्दाख़ को  उससे अलग कर  देना। हालांकि जम्मू कश्मीर में विधानसभा कायम रखी गई किंतु पूर्ण राज्य के दर्जे के अभाव में केंद्र का नियंत्रण शासन - प्रशासन पर बढ़ गया। केंद्र सरकार ने इतने योजनाबद्ध  तरीके से सब किया कि अलगाववादी नेताओं के अलावा राजनीतिक पार्टियां भी  दंग रह गईं। विधानसभा भंग रहने से राज्य का प्रशासन चूंकि राज्यपाल के अधीन था  लिहाजा  संभावित प्रतिरोध से निपटने के सभी इंतजाम इतनी कुशलता से किये गए कि  अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार की धमकियाँ धरी रह गईं। पाकिस्तान के टुकड़ों पर पलने वाले हुर्रियत काँफ्रेस के अलगाववादी नेता भी चूं - चपाट नहीं कर सके। आम जनता शुरुआत में तो  सहमी - सहमी रही किंतु जल्द ही सब सामान्य होने लगा। उसके बाद केंद्र सरकार ने नये सिरे से परिसीमन करवाया । इसके कारण जम्मू और घाटी के बीच जो राजनीतिक असंतुलन बना हुआ था वह दूर किया जा सका। इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में भारी मतदान से साबित हो गया कि अलगाववादियों की धमकियों को ठेंगा दिखाते हुए जनता ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को महत्व दिया। राज्य में इतने निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव पहले कभी नहीं हुए। उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने और पूर्ण राज्य के दर्जे की वापसी के मुद्दे के अलावा केंद्र के साथ रिश्ते भी बेहतर रहे।  कई मसलों पर मेहबूबा मुफ्ती भले ही केंद्र से टकराव के मूड में नजर आईं किंतु उमर और उनके पिता फारुख अब्दुल्ला ने बेहद सकारात्मक रुख दिखाया। राज्य में पर्यटन उद्योग के पुराने दिन लौटने से अर्थव्यवस्था में जबरदस्त सुधार हुआ। यद्यपि पहलगाम में हुई आतंकवादी घटना से माहौल खराब करने की कोशिश पाकिस्तान की तरफ से हुई जिसके जवाब में ऑपरेशन सिंदूर हुआ। उसके बाद घाटी में एक बार फिर सामान्य स्थितियाँ लौटीं जिसका प्रमाण पर्यटकों की रिकार्ड संख्या है। शिक्षण संस्थान भी नियमित चल रहे हैं। खेल प्रतियोगिताएं आयोजित होने लगीं। सिनेमा घरों में दर्शक बेखौफ आने लगे। कुल मिलाकर शांति - व्यवस्था बहाल होने से  खुशनुमा माहौल नज़र आने लगा । लेकिन अचानक कश्मीर घाटी में प्रधानमंत्री पैकेज के तहत कार्यरत कश्मीरी हिंदू (पंडित) कर्मचारियों को आतंकवादी संगठनों द्वारा लगातार नौकरी छोड़ने या मौत का सामना करने की धमकियां मिलने की खबरों से चिंता के बादल मंडराने लगे। लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े छद्म संगठन यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल द्वारा घाटी में काम कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों के नाम, फोन नंबर, पते और गाड़ियों के नंबर तक सार्वजनिक कर दिए जाने से  लगभग 7,000 कश्मीरी हिंदू कर्मचारी चिंता और दशहत में हैं।  सुरक्षा एजेंसियां कर्मचारियों की सुरक्षा पुख्ता करने के लिए प्रयासरत हैं किंतु अचानक उत्पन्न इस स्थिति ने घाटी में पंडितों के पुनर्वास की योजना को खतरे में डाल दिया क्योंकि अपनी और परिवार की सुरक्षा के प्रति उनकी चिंता सर्वोपरि है। हालांकि उमर सरकार ने इन धमकियों का विरोध किया है और अन्य किसी संगठन ने भी कश्मीरी पंडितों के विरोध में आवाज नहीं उठाई किंतु केंद्र सरकार को इस पर पैनी नज़र रखनी चाहिए। ऐसा लगता है जिस आतंकवाद को उसने बड़ी ही हिम्मत के साथ खत्म किया उसके कुछ बीज मिट्टी में दबे रह गए जो समय - समय पर अंकुरित होते रहते हैं। यद्यपि सुरक्षा बलों की मुस्तैदी के चलते वे कामयाब नहीं हो पा रहे। इसके अलावा स्थानीय लोगों का भी पहले जैसा सहयोग उनको नहीं मिल रहा। बावजूद इसके इन धमकियों को गंभीरता से लेना चाहिए। राज्य सरकार की गतिविधियों की भी चौकसी जरूरी है क्योंकि अब्दुल्ला परिवार के मन में अभी भी 370 हटने की कसक बाकी है। पाक अधिकृत कश्मीर में चल रहे सरकार विरोधी आंदोलन से भन्नाया पाकिस्तान नये सिरे से घाटी में आतंकवाद फैलाने का षडयंत्र रच सकता है। कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को दी जा धमकियाँ दरअसल भारत सरकार को चुनौती है। इसलिए इसके पहले कि आतंकवाद रूपी सांप फिर फन उठाये उसे कुचल देना जरूरी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 9 September 2026

मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति का विरोध कर अकेले पड़े भगवंत मान



विधानसभा चुनाव के कुछ महीनों पहले पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार और केंद्र  के बीच पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के नए मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति को लेकर टकराव बढ़ गया। भगवंत मान  सरकार द्वारा  केंद्र पर संवैधानिक प्रक्रिया की अनदेखी का आरोप लगाते हुए कैबिनेट बैठक में उक्त नियुक्ति के खिलाफ  प्रस्ताव पारित किया गया। श्री मान  ने आरोप लगाया कि केंद्र ने राज्य सरकार की सहमति लिए बिना नए मुख्य न्यायाधीश  की नियुक्ति का आदेश जारी कर दिया जो कि स्थापित प्रक्रिया के सर्वथा विरुद्ध है । लेकिन इसके विपरीत विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने न्यायमूर्ति  मिश्रा को  मुख्य न्यायाधीश बनने पर बधाई देते हुए न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक भूमिका की सराहना करते हुए पंजाब सरकार पर निशाना साधा। साथ ही  मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति का विरोध करने और शपथ ग्रहण समारोह से दूर रहने के भगवंत मान सरकार के फैसले की निंदा करते  हुए कहा कि सरकारों को न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए। श्री बाजवा का बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कांग्रेस केन्द्र  की नरेंद्र मोदी सरकार की ऐलानिया विरोधी है । इस विवाद में नया मोड़ तब आया जब वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि राज्य सरकार पंजाब के राज्यपाल को भी पत्र लिखकर आग्रह करेगी कि नव नियुक्त चीफ जस्टिस को पद की शपथ न दिलाई जाए क्योंकि यह नियुक्ति पंजाब को अनदेखा करके की गई है। लेकिन पंजाब सरकार की आपत्ति के जबाब में  भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्य पाल जैन  ने मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति श्री मिश्रा की नियुक्ति पर पंजाब सरकार के विरोध को दुर्भाग्यपूर्ण और अनावश्यक बताया। उन्होंने कहा कि नियुक्ति राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 217(1) के तहत की है और न्यायाधीशों की नियुक्ति की तय प्रक्रिया का पूरी तरह पालन हुआ है। अधिकृत जानकारी के मुताबिक बीते  6 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम ने उक्त  नियुक्ति की सिफारिश की थी जिस पर 10 अगस्त को पंजाब व हरियाणा सरकारों से राय मांगी गई। हरियाणा ने तो समय पर राय दे दी, परंतु  पंजाब ने अपनी राय नहीं भेजी। श्री जैन ने कहा कि राज्य की राय जरूरी है, लेकिन बाध्यकारी नहीं और  न ही उसके पास वीटो का अधिकार ही है। इस सबके बीच पंजाब और हरियाणा बार एसोसियेशन भी मुख्यमंत्री के विरोध में कूद पड़ा। एसोसियेशन के ऑनरेरी सेक्रेटरी परमप्रीत सिंह बाजवा द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा की नियुक्ति का पंजाब सरकार द्वारा विरोध किए जाने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा  कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है और कार्यपालिका को न्यायिक नियुक्तियों पर राजनीतिक दबाव नहीं बनाना चाहिए। एसोसिएशन की आपात बैठक में कार्यकारिणी ने पंजाब सरकार से नियुक्ति प्रक्रिया का सम्मान करने और हाईकोर्ट की गरिमा बनाए रखने की अपील की। एसोसिएशन ने न्यायपालिका के साथ मजबूती से खड़े रहने का संकल्प भी लिया। इस प्रकार मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान और आम आदमी पार्टी इस मामले में अकेले पड़ गए। उन्हें  उम्मीद थी कि कांग्रेस मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में पंजाब सरकार की  उपेक्षा किये जाने के लिए केन्द्र सरकार पर हमला करेगी। लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी। और तो और बार एसोसियेशन ने भी राज्य सरकार के विरोध को गलत ठहराकर मुख्यमंत्री को कटघरे में खड़ा कर दिया। सवाल ये है कि मान सरकार ने  मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति पर क्या सोचकर ऐतराज किया ? संभवतः वे विधानसभा चुनाव के पहले ये प्रचारित करना चाह रहे थे कि केन्द्र पंजाब से दुर्भावना रखता है। लेकिन कांग्रेस और बार एसोसियेशन ने उनके विरोध में बयान देकर राज्य सरकार को ही कटघरे में ला खड़ा किया। वैसे भी ये ऐसा मुद्दा नहीं था जिस पर इस नाजुक मौके पर केन्द्र से पंगा लिया जाए। ये देखते हुए लगता है मुख्यमंत्री मान अपने राजनीतिक संरक्षक दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नक्शे कदम पर चल रहे हैं जिनका 10  वर्षीय कार्यकाल केन्द्र की मोदी सरकार से लड़ते - भिड़ते बीता और अंततः वे सत्ता और प्रतिष्ठा दोनों गँवा बैठे। पंजाब से आ रहे संकेत वहाँ भी दिल्ली जैसा तख्ता पलट होने की संभावना जता रहे हैं जिन्हें मुख्यमंत्री मान की हरकतें  सुनिश्चित बना रही हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 8 September 2026

राष्ट्रीय राजधानी में दम तोड़ती व्यवस्था



दिल्ली के एक निजी हॉस्टल में चल रही मरम्मत के दौरान अचानक वह इमारत धराशायी होने से उसमें रह रहे 7 छात्र मौत का शिकार हो गए। भवन स्वामी को पत्नी और पुत्र सहित गिरफ्तार कर लिया गया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने नगर निगम को भी इसके लिए दोषी माना है। घटना के बाद परंपरानुसार शासन -  प्रशासन , मंत्री, जनप्रतिनिधि मोर्चे पर नजर आने लगे। लापरवाही की पहली गाज गिरी कुछ अधिकारियों पर  निलंबन के रूप में। दिल्ली का मामला है तो सर्वोच्च न्यायालय की चौखट तक भी पहुंच गया। न्यायालय की फटकार के बाद अब दिल्ली में चल रहे सभी हॉस्टलों की जांच के निर्देश दे दिये गए हैं। हाल ही में एक निजी गेस्ट हाउस में आग  लग जाने के कारण कुछ लोगों की मौत होने के बाद भी अवैध निर्माणों की जाँच का अभियान छेड़ा गया और  उस इलाके में पदस्थ नगरीय निकाय के अमले पर भी दंडात्मक कार्रवाई की गई। उसके कुछ समय पहले एक तलघर में चल रहे कोचिंग संस्थान में बाढ़ का पानी भर जाने के कारण कई छात्र जान से हाथ धो बैठे। उस घटना के बाद राजधानी में कुकुरमुत्तों की तरह उग आये कोचिंग संस्थानों में व्याप्त अनियमितताओं की जाँच एवं नियम विरुद्ध किये गए अवैध निर्माणों पर कार्रवाई का ऐलान किया गया। कुछ दिनों तक नेता और नौकरशाह मुस्तैद नजर भी आये और न्यायपालिका ने भी रुचि दिखाई किंतु जल्द ही सारी सक्रियता फुस्स होकर रह गई। सही बात ये है कि हमारे देश में अवैध कार्यों का पर्दाफ़ाश तभी होता है जब कोई दुर्घटना हो जाए। दिल्ली देश की राजधानी होने से अंतर्राष्ट्रीय शहर माना जाता है। इसमें होने वाली किसी भी घटना का प्रचार दुनिया भर में होता है। वैसे भी यह एक ऐतिहासिक महानगर है। लेकिन दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में इसकी गणना होना शर्मिंदा भी करता है। चार दिन बाद दिल्ली में ब्रिक्स नामक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन होने जा रहा है जिसमें पुतिन और जिनपिंग जैसे वैश्विक दिग्गजों के अलावा द. अफ्रीका और ब्राजील आदि देशों के राष्ट्राध्यक्ष आने की संभावना है। ऐसे समय  राजधानी में हुआ  उक्त हादसा देश की छवि खराब करने का कारण भी बन सकता है। उल्लेखनीय बात ये है कि एक तरफ तो दिल्ली के अनेक इलाके अत्यंत विकसित हैं जहाँ ये लगता ही नहीं कि हम भारत में हैं । वहीं इसी महानगर के अन्य क्षेत्रों में व्यवस्था पूरी तरह दम तोड़ चुकी है। होना तो ये चाहिए कि देश की राजधानी न सिर्फ हमारे अन्य शहरों अपितु दुनिया भर में अपनी खूबसूरती और व्यवस्था के लिए प्रसिद्ध हो। लेकिन धीरे - धीरे उसकी घनी बसाहट वाले क्षेत्र अव्यवस्था के बोझ तले दबे जा रहे हैं। इस विसंगति को दूर करने की जिम्मेदारी जिन सरकारी विभागों की है वे गले तक भ्रष्टाचार में डूबे होने से विकास एवं नगरीय नियोजन की सारी नीतियां मिट्टी में मिल जाती हैं। राजधानी में बैठी केन्द्र सरकार देश भर के शहरों में स्वच्छता के साथ शुद्ध हवा का सर्वेक्षण करवाकर उन्हें पुरस्कृत करती है। लेकिन उसकी नाक के नीचे राष्ट्रीय राजधानी न स्वच्छता में कोई स्थान रखती है और न ही प्रदूषण रहित हवा में। इसका कारण वहाँ के नगरीय निकायों का निकम्मापन ही है।  केन्द्र शासित होने की बावजूद दिल्ली में विधानसभा और प्रदेश सरकार है। उसमें बैठे लोगों को चाहिए वे इस महानगर को बदहाली से निकालने ईमानदारी से प्रयास करें। केवल मुफ्त बिजली, पेय जल और बस यात्रा जैसी खैरात बांटने से वोट तो हासिल किये जा सकते हैं किंतु दिल्ली की दुर्दशा दूर नहीं हो सकती। राजधानी में बाहर के लाखों छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए आते हैं। कम बजट के चलते उन्हें होस्टल में रहना होता है जिनके मालिक किराया तो वसूलते हैं किंतु सुविधा और सुरक्षा की उपेक्षा की जाती है। नगरीय निकाय के साथ ही पुलिस और प्रशासन का भी दायित्व है कि ऐसे स्थानों की जाँच कर देखे कि वे नियमानुसार संचालित हैं या नहीं? लेकिन जब तक कोई दुर्घटना नहीं होती तब तक समूचा तंत्र कुंभकर्ण की तरह सोता रहता है। ऐसे में ये सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब राष्ट्रीय राजधानी में व्यवस्था इतनी लचर है तब देश के छोटे और मध्यम श्रेणी शहरों का क्या हाल होगा? 


- रवीन्द्र वाजपेयी