ऐसा लगता है कि संसद के बजट सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव बढ़ता ही जाएगा । परिणामस्वरुप सार्थक चर्चा के बजाय आरोप - प्रत्यारोप होते रहेंगे और इसी दौरान बजट पारित भी हो जाएगा। वैसे भी राहुल गांधी के आक्रामक भाषण और वित्तमंत्री के तीखे जवाब के बाद बहस में कोई आकर्षण नहीं रहा। सौभाग्य से राज्यसभा अपेक्षाकृत शांत है जहां चर्चा कुछ बेहतर तरीके से हो रही है। अब तक दोनों सदनों में जितने भी सांसदों ने बजट पर विचार रखे उनमें सबसे सुलझा हुआ भाषण राज्यसभा में आम पार्टी के सदस्य राघव चड्ढा ने दिया जो पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट भी हैं। उन्होंने बजट के कुछ प्रावधानों की प्रशंसा की तो कुछ की आलोचना भी। लेकिन एक जिम्मेदार सांसद की तरह वित्तमंत्री को अनेक उपयोगी सुझाव भी दिए। उस दौरान निर्मला सीतारमण बड़े ध्यान से उन्हें सुनती रहीं। बेहतर हो जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में वित्तमंत्री द्वारा बजट पर हुई बहस के जवाब में दिए भाषण की प्रशंसा की ठीक वैसे ही उन्हें श्री राघव की तारीफ भी करनी चाहिए जिन्होंने विपक्ष में रहते हुए भी उत्तेजना फैलाने की बजाय उच्च सदन का सदस्य होने की पात्रता प्रमाणित की। बहरहाल लोकसभा में जो टकराव है उससे अप्रिय स्थितियां उत्पन्न होने की आशंका बढ़ रही है। कांग्रेस द्वारा लोकसभाध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव तो रखवा दिया गया किंतु तृणमूल कांग्रेस के साथ न आने से उसकी वजनदारी कम हो गई। कांग्रेस की चिंता ये है कि प्रस्ताव धराशायी होने के बाद वह अध्यक्ष को लेकर क्या करेगी? दूसरी तरफ नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार गलतियां करते जा रहे हैं। बजट पर बोलते हुए भारत माँ को बेचने जैसी हल्की बात बोलकर उन्होंने मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को गद्दार बोलने वाली गलती दोहरा दी। इसके अलावा अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में एपस्टीन फाइल का जो जिक्र किया वह भी अवांछित और अप्रासंगिक था। व्यापार समझौते का जितना भी विवरण सार्वजानिक हुआ उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे भारत के झुकने का संकेत हो। उल्टे अमेरिका ने कुछ बातों पर स्पष्टीकरण देकर विपक्ष द्वारा उठाई जा रही शंकाओं का समाधान कर दिया। सदन के बाहर संसद के परिसर में प्रदर्शित वह बैनर भी संसदीय मर्यादा के विरुद्ध है जिसमें प्रधानमंत्री मोदी को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सामने घुटना टेककर बैठा दिखाया गया है। श्री गांधी के भाषण के कुछ अंशों पर सत्ता पक्ष ने विशेषाधिकार हनन कार्रवाई की जो घोषणा की है वह निश्चित तौर पर पलटवार ही है । इसी तरह पूर्व थल सेनाध्यक्ष नरवणे की कथित अप्रकाशित पुस्तक की प्रति का प्रदर्शन करने के कारण कानून का शिकंजा नेता प्रतिपक्ष के इर्द -गिर्द कसता जा रहा है। इस मुकाबले में कौन विजेता होकर निकलेगा वह उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना ये कि संसदीय प्रणाली की गरिमा बचेगी या नहीं? सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव नई बात नहीं। संसद के भीतर गर्मागर्मी भी होती रही है । लेकिन मौजूदा माहौल वैचारिक विरोध से आगे बढ़कर शत्रुता का एहसास करवा रहा है। प्रधानमंत्री के प्रति राहुल जिस तरह की टिप्पणियां करते हैं वह उनकी अपरिपक्वता का परिचायक है। वहीं सत्ता पक्ष भी श्री गांधी की जरूरत से ज्यादा घेराबंदी करता है। बेहतर हो उनको भी अन्य विपक्षी नेताओं जितना ही महत्व दिया जाए । यद्यपि संसदीय प्रणाली में नेता प्रतिपक्ष का पद बेहद महत्वपूर्ण होता है और उसे भविष्य का संभावित प्रधानमंत्री माना जाता है। साठ के दशक में पहली बार सांसद बने अटलबिहारी वाजपेयी के भाषण सुनकर पं.जवाहर लाल नेहरू ने उनमें भविष्य का प्रधानमंत्री देख लिया था। 1977 तक संसद में कांग्रेस का इकतरफा दबदबा हुआ करता था। लेकिन तब विपक्ष की कम संख्या के बाद भी अनेक ऐसे सदस्य होते थे जो अपनी प्रतिभा और संसदीय ज्ञान के बल पर सरकार को झुका देते थे। लेकिन उनके और सत्ता पक्ष के बीच वैसी कटुता नजर नहीं आती थी जो आज स्थायी रूप ले चुकी है। दुर्भाग्य से सैकड़ों सांसदों के बीच ऐसे नेताओं का अभाव हो गया है जो इस तरह के विवाद में दोनों पक्षों के बीच सुलह करवा सकें। और जो हैं भी वे अपना सम्मान बचाए फिरते हैं। कुल मिलाकर संसद की छवि जनमानस में लगातार गिरती जा रही है जो लोकतंत्र के लिए अशुभ संकेत है। राहुल गांधी सहित विपक्ष के अन्य नेताओं को ये ध्यान रखना चाहिए कि संसद के न चलने से सरकार को तो खास फर्क नहीं पड़ता परन्तु विपक्ष में बैठे सांसद अपनी बात रखने से वंचित हो जाते हैं। और ये भी कि श्री गांधी के नेता प्रतिपक्ष बन जाने के बाद कांग्रेस हरियाणा, महाराष्ट्र , दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनाव में चारों खाने चित्त हो चुकी है।
- रवीन्द्र वाजपेयी