Saturday, 17 October 2026

ट्रम्प ने फिर पलटी मारी : 100℅ टैरिफ रुका



फैसले लेना और फिर उसे ठंडे बस्ते में डाल देने वाले व्यक्ति की विश्वसनीयता खत्म हो जाती है। इसी तरह धमकी देकर कदम पीछे खींच लेने वाला अपना रुतबा गँवा बैठता है। उक्त दोनों बातें अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पर सटीक बैठती हैं। जबसे वे दोबारा राष्ट्रपति बने तबसे पूरी दुनिया को बेवजह परेशानी में डालते रहते हैं। ऊलजलूल निर्णय लेकर वे पहले तो किसी भी देश पर बिना वजह रौब दिखाने लगते हैं । लेकिन वह दबाव में नहीं आया तब अपने फैसले को रोकने का बचकाना रवैया दिखाने में भी पीछे नहीं रहते। अमेरिका का व्यापार घाटा कम करने के लिए उन्होंने तमाम देशों पर टैरिफ (आयात शुल्क) की दरें बढ़ा दीं। इनमें भारत और चीन प्रमुख है। इनसे ट्रम्प की नाराजगी का कारण रूस से कच्चा तेल खरीदना है। ट्रम्प का कहना है इसकी वजह से रूस को यूक्रेन के साथ लड़ाई लम्बी खींचने में सहायता मिलती है। टैरिफ की दरें 10 से बढ़ाकर 25 फीसदी तक की गईं। हालांकि चीन के प्रति ट्रम्प वैसी सख्ती नहीं दिखा सके क्योंकि उसके पास उन खनिजों का भंडार है जिनकी आपूर्ति रुक जाने से अमेरिका की अर्थव्यवस्था का भट्टा बैठ जाएगा। इसीलिए ज्योंही चीन ने उनका निर्यात रोकने की धमकी दी त्योंही ट्रम्प के तेवर ठंडे पड़ गए। गत माह उन्होंने भारत और चीन पर रूस से कच्चा तेल खरीदी जारी रखने के कारण 100 फीसदी टैरिफ लगाने सम्बन्धी निर्णय अमेरिकी संसद से पारित करवाकर दबाव बढ़ाने की चाल चली। इसके लिए 18 अक्टूबर तक की मोहलत भी दी। लेकिन न चीन झुका और न ही भारत। उल्टे अमेरिका में डीजल - पेट्रोल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आने से जनता की नाराज़गी बढ़ने से ट्रम्प की चिंता बढ़ गई। उल्लेखनीय है 3 नवंबर को अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं। अमेरिकी कांग्रेस( संसद) के निचले सदन की सभी 435 सीटों और ऊपरी सदन सीनेट की 100 में से 35 सीटों पर चुनाव होना है। इसके अलावा, 36 राज्यों में गवर्नर पद के चुनाव और कई स्थानीय चुनाव भी निर्धारित हैं। इसे मध्यावधि चुनाव इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के बीच में होता है। अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव चार साल में होता है, जबकि प्रतिनिधि सभा के सदस्यों का कार्यकाल दो साल का होता है। सीनेटर छह साल के लिए निर्वाचित होते हैं, इसलिए हर दो वर्ष में सीनेट की करीब एक-तिहाई सीटों पर चुनाव होता है। यद्यपि इन चुनाव परिणामों से ट्रम्प की गद्दी पर असर नहीं पड़ेगा किंतु  संसद में उनकी पार्टी को बहुमत न मिला तब उनके लिए अपनी नीतियों और निर्णयों को मंजूर करवाना कठिन होगा। इसीलिए वे डीजल - पेट्रोल की उछलती कीमतों से परेशान थे। ईरान से युद्ध के लिए अमेरिकी जनता ट्रम्प की  नीतियों को जिम्मेदार मान रही है। जनमत सर्वेक्षणों में उनकी लोकप्रियता भी लगातार घटती जा रही थी।  घरेलू मोर्चे पर हालत खराब होते देख ट्रम्प ने  बहुत बड़ी पलटी मारी जिससे रूसी तेल खरीदने को लेकर भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ का खतरा फिलहाल टल गया है। उन्होंने रूस से होने वाले ऊर्जा निर्यात से जुड़े प्रतिबंधों, पाबंदियों और शुल्कों को लागू करने से छूट दे दी है। यह कदम तब उठाया गया है जब ट्रम्प ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ एक समझौता किया जिसके अनुसार  रूस शुरुआत में 300,000 टन से ज्यादा डीजल अमेरिका को बेचेगा और इसके बाद नवंबर और आने वाले महीनों में और खेप भेजी जाएंगी। ट्रम्प ने हालांकि 100 टैरिफ लगाने का अधिकार सुरक्षित रखा है लेकिन अमेरिका जिस प्रकार आर्थिक संकट में घिरता जा रहा है उसे देखते हुए ट्रम्प दोबारा इस दिशा में आगे बढ़ेंगे इसकी संभावना कम ही है। और यदि 3 नवम्बर को होने जा रहे चुनाव के नतीजे  विरुद्ध गए तब उनकी अकड़ में भी निश्चित तौर पर कमी आयेगी। सबसे बड़ी बात ये हुई कि उनके दबाव के आगे भारत ने जिस तरह झुकने से इंकार किया उसने उनके गणित को बिगाड़ दिया। जब भी रूस से कच्चे तेल खरीदने पर टैरिफ बढ़ाने की धमकी अमेरिका ने दी , भारत ने साफ कह दिया कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए किसी भी देश से खरीदी करता रहेगा। प. एशिया में संकट के कारण नये स्रोत तलाशने के बावजूद रूस से कच्चे तेल का आयात कम होने की बजाय बढ़ाकर भारत ने ट्रम्प की हेकड़ी निकाल दी। इसके अलावा ट्रेड डील के मामले में भी झुकने से मना कर दिया। ट्रम्प द्वारा 100 फीसदी टैरिफ का फैसला वापिस लेना भारतीय विदेश नीति की बड़ी सफलता है। इससे स्पष्ट हो गया कि दुनिया झुकती है झुकाने वाला चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 16 October 2026

अराजकता फैलाकर हिंसा के जरिये सत्ता पर कब्जा करने का षडयंत्र



धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग को लेकर हुए धरने में  अनशन करने वाली नेहा बोरा राजनीतिक मंचों पर भी दिखाई देने लगीं। आईसा नामक वामपंथी छात्र संगठन की अध्यक्ष नेहा जेएनयू में डॉक्टरेट कर रही हैं। यदि नीट पेपर लीक न होते तब शायद जंतर मंतर का आंदोलन भी न होता और नेहा भी सुर्खियों में नहीं आतीं। अतीत में जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष  कन्हैया कुमार देश विरोधी नारों के सिलसिले में जेल गए। वहाँ से छूटने के बाद राहुल गाँधी सहित तमाम विपक्षी नेता उनको समर्थन देने पहुंचे। वामपंथी पत्रकारों सहित  सिविल सोसाइटी से वामपंथी रुझान वालों में भी कन्हैया की पीठ थपथपाने की होड़ मच गई। वे इस कारण चर्चा में आये क्योंकि उनके नेतृत्व में जेएनयू में भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारे आम हो गए। साथ ही हिन्दू देवी - देवताओं का खुलकर  अपमान होने लगा। उनको इसलिए भी हाथों - हाथ उठाया गया क्योंकि वे भाजपा - संघ और नरेंद्र मोदी के विरुद्ध तीखी भाषा का उपयोग कर रहे थे। वह सब देखकर कन्हैया को राजनीति का कीड़ा काटने लगा और डाक्टरेट करने के उपरांत वे सी.पी.आई में शामिल होकर दलीय राजनीति में कूदकर 2019 में बिहार की बेगूसराय सीट से लोकसभा चुनाव लड़े। लेकिन जेएनयू वाले तेवर काम नहीं आये और बुरी तरह हारे । उस हार ने उनके सिर से वामपंथ का भूत उतार दिया और वे कांग्रेस में आ गए। राहुल गाँधी को भी उनमें संभावनाएं दिखीं तो उन्होंने अपने निकटस्थ लोगों में कन्हैया को जगह दे दी और भारत जोड़ो यात्रा का सह संयोजक बना दिया। टीवी चैनलों पर भी कन्हैया कांग्रेस का पक्ष आक्रामक तरीके से रखने लगे। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव ने उनकी उम्मीदवारी में टाँग अड़ा दी क्योंकि उन्हें कन्हैया में अपने बेटे तेजस्वी का प्रतिद्वंदी नजर आने लगा। और तब कांग्रेस ने उनको बाहरी दिल्ली से उतारा जिसमें लाखों बिहारी मतदाता हैं लेकिन वहाँ भी कन्हैया की नाव डूब गई। और उसके बाद वे श्री गाँधी के पिछलग्गू की हैसियत तक सिमटकर रह गए। बची - खुची भद्द पिट गई दिल्ली विवि छात्रसंघ के हालिया चुनाव में कांग्रेस के छात्र संगठन एन.एस.यू.आई की चारों पदों पर हार से। जंतर - मंतर आंदोलन के बाद हुए उस चुनाव में भाजपा समर्थित अभाविप ने बाजी मारकर जेन जी नामक हौए की हवा निकाल दी। उस चुनाव में एन.एस.यू.आई के उम्मीदवार चूंकि कन्हैया ने तय किये इसलिए ठीकरा उन पर फूटा और तभी से वे हाशिये पर धकेल दिये गए। इसी बीच उनका एक वीडियो आ गया जिसमें वे कहते सुने गए कि वे चाहते तो किसी वि.वि में अध्यापक हो सकते थे किंतु उनका कैरियर बर्बाद हो गया। शायद उनकी पीड़ा का कारण नेहा बोरा को श्री गाँधी द्वारा दिया जा रहा महत्व ही ही है। पिछले दिनों विपक्ष के प्रदर्शन एवं सर्वोच्च न्यायालय तक निकाले गए मार्च में नेहा राहुल के निकट ही दिखाई दीं। इसे लेकर कांग्रेस के भीतर भी उथलपुथल है। खास तौर पर युवा नेताओं को नेहा को राहुल द्वारा दी जा रही तवज्जो रास नहीं आ रही। पार्टी के भीतर ये चर्चा है कि नेहा की बदजुबानी नुकसानदायक हो सकती है। कुछ दिनों पहले उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बारे में उनके गृहनगर गोरखपुर में नेहा ने जिस तरह की निम्नस्तरीय शब्दावली प्रयोग की उसे किसी ने पसंद नहीं किया। अब उन्होंने बांग्लादेश के जेन जी की तारीफ करते हुए कहा  कि भारत में जो  जेन जी आंदोलन दिखाई दे रहा है, उसकी शुरुआत सबसे पहले बांग्लादेश में हुई थी। उन्होंने बांग्लादेश के युवाओं को क्रांति का रास्ता दिखाने के लिए बधाई देते हुए कहा कि बांग्लादेश ने उन्हें सिखाया कि सत्ता कैसे बदली जाती है। उनके इस बयान की भाजपा ने तो आलोचना की ही अन्य विपक्षी पार्टियां भी सकते में हैं। कांग्रेस भी असमंजस में पड़ गई। भाजपा को ये कहने का मौका मिल गया कि सरकार विरोधी आंदोलन की जड़ें विदेशों में हैं। नेहा के इस बयान से वामपंथियों का देशविरोधी चरित्र एक बार फिर उजागर हो गया है। नेहा के साथ ही वरिष्ट अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने भी सत्ता बदलने की बात कहते  हुए खूनखराबे की आशंका जताकर ये दर्शा दिया कि  भारत को बांग्लादेश और  नेपाल की तरह से ही अराजकता की आग में झोंकने का षडयंत्र रचा जा रहा है जिसकी बानगी कॉकरोच जनता पार्टी के क्रिया कलापों से मिल रही है। राहुल गाँधी द्वारा सर्वोच्च न्यायालय परिसर में घुसने का दुस्साहस उस अराजकता का पहला चरण है। ये सब देखते हुए लगता है मुख्य चुनाव आयुक्त के त्यागपत्र के लिए किया गया आंदोलन तो दिखावा है। इसका असली मकसद देश में अराजकता फैलाकर हिंसा के जरिये सत्ता पर कब्जा करना है जिसका खुलासा बीते एक - दो दिनों में विपक्षी खेमे से आये बयानों से हुआ। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 15 October 2026

एस आई.आर पर विपक्ष में ही विरोधाभास



एक ओर तो मुख्य चुनाव आयुक्त  ज्ञानेश कुमार और एस .आई.आर ( मतदाता सूचियों के विशेष सघन परीक्षण ) प्रक्रिया के विरुद्ध दिल्ली में कांग्रेस की अगुआई में इंडिया ब्लॉक के सदस्यों के अलावा, आम आदमी पार्टी और कॉकरोच जनता पार्टी सड़कों पर उतरकर वोट चोरी के आरोप लगा रही है। संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक हो रहे प्रदर्शनों में ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांगा जा रहा है । दूसरी तरफ पंजाब में सभी प्रमुख पार्टियों का रुख चुनाव आयोग के प्रति एकदम उलट है। मतलब दिल्ली में चुनाव आयेगा और ज्ञानेश कुमार को गरियाने और एस.आई.आर की समूची प्रक्रिया को रद्द करने जैसी जिद पकड़े बैठे विपक्षी दलों का सुर पंजाब में पूरी तरह बदला हुआ है। पंजाब में एसआईआर प्रक्रिया संपन्न होने के बाद जब मतदाता सूचियों  से 13.60 लाख फर्जी नाम हटाए गए, तो अन्य राज्यों में आसमान सिर पर उठाने वाले गैर भाजपा दलों विशेष रूप से कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने  कोई बखेड़ा खड़ा नहीं किया। पंजाब की राजनीति में सिखों की प्रतिनिधि मानी जाने वाली बादल परिवार के नेतृत्व वाले अकाली दल ने भी मतदाता सूचियों से लाखों नाम हटाये जाने पर किसी प्रकार की आपत्ति नहीं जताई। इतना ही नहीं सत्ता में बैठी आम आदमी पार्टी के साथ ही विपक्ष में बैठे तमाम दलों  ने चुनाव आयोग की तारीफ के पुल बांधे हैं। पंजाब की राजनीतिक पार्टियों द्वारा चुनाव आयोग की प्रशंसा से उनका शीर्ष नेतृत्व भौचक है क्योंकि दिल्ली में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, अखिलेश यादव , अरविंद केजरीवाल और ममता बैनर्जी अपनी पार्टी के सांसदों एवं अन्य नेताओं को एकत्र कर  एस.आई.आर प्रक्रिया के अंतर्गत देश भर में 13 करोड़ से ज्यादा वोटरों के नाम मतदाता सूचियों से काट दिये जाने को वोट चोरी बताकर लोकतंत्र के लिए खतरा बताते हुए  गिरफ्तारियां दे रहे हैं। लेकिन इसके विपरीत भाजपा की घोर विरोधी आम आदमी पार्टी शासित पंजाब में सभी राजनीतिक पार्टियां एस.आई.आर पर संतोष व्यक्त करते हुए उसका स्वागत कर रही हैं। स्मरणीय है पंंजाब विधानसभा के आगामी चुनाव के लिए चुनाव आयोग द्वारा राज्य की अंतिम मतदाता सूची जारी करते हुए बताया गया कि एस.आई.आर अभियान के दौरान  13.60 लाख (6.34%) अयोग्य नामों की छंटनी की गई है। लेकिन पंजाब चुनाव आयोग द्वारा किये गए इस सफाई अभियान के बाद राज्य के राजनीतिक दलों द्वारा जिस प्रकार एक स्वर में आयोग की प्रशंसा करते हुए  समूची  प्रक्रिया पर संतोष व्यक्त किया वह दिल्ली में चल रहे सियासी माहौल को देखते हुए पूरी तरह विरोधाभासी है। गौरतलब है दिल्ली में चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध खोले गए मोर्चे में एसआईआर की समूची प्रक्रिया को रद्द कर पुरानी मतदाता सूची को ही लागू मान लेने की मांग प्रमुख है। इसके अलावा बिहार और प. बंगाल के विधानसभा चुनाव भी दोबारा करवाने की आवाज उठ रही है। हालांकि विपक्ष के भीतर ही इस मुद्दे पर एकजुटता का अभाव है। उदाहरण के तौर पर ममता बैनर्जी और  तेजस्वी यादव जहाँ एसआईआर को अपनी पराजय का कारण मानते हैं वहीं केरलम में जहाँ कांग्रेस सरकार बनी वहाँ के गृहमंत्री रमेश चेन्नीथला और कुछ अन्य कांग्रेस नेता सार्वजनिक रूप से ये कह चुके हैं केरल में  चुनाव आयोग द्वारा करवाई गई एस.आई.आर के कारण चुनाव पूरी तरह सही हुए तथा वाम मोर्चा की सरकार द्वारा बनवाए गए फर्जी मतदाताओं के नाम कट जाने से चुनाव पूरी तरह पारदर्शी हो सके। आश्चर्य की बात है राहुल गाँधी ने अपनी पार्टी के वरिष्ट नेता के उक्त बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। इसी प्रकार तमिलनाडु में सत्ता से बाहर हुई द्रमुक को तो एस.आई.आर से शिकायत है लेकिन अभिनेता से नेता बने मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने इस बारे में कुछ नहीं कहा। पंजाब और केरल के दोनों दृष्टांत ये साबित करते हैं कि एसआईआर और चुनाव आयोग के प्रति विपक्ष में भी एकरूपता नहीं है। जहाँ जो जीत जाता है उसके लिए चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह पाक साफ है लेकिन पराजित पक्ष को उसमें दुनिया की सारी खराबियां नजर आती हैं। यही वजह है कि लाख कोशिशों के बाद भी वोट चोरी केवल राजनीतिक दलों का मुद्दा बनकर रह गया और आम जनता को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 14 October 2026

50 फीसदी से अधिक आरक्षण देना लोगों की आँखों में धूल झोंकने जैसा



हाल ही में म.प्र उच्च न्यायालय ने 2019 में कमलनाथ सरकार द्वारा ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण दिये जाने वाले अध्यादेश को असंवैधानिक मानते हुए रद्द कर दिया था क्योंकि उसकी वजह से कुल आरक्षण 50 फीसदी के सीमा रेखा को पार कर गया था। उस फैसले के विरुद्ध प्रदेश की मौजूदा भाजपा सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील का ऐलान कर दिया है। उसके अलावा ओबीसी महासंघ सहित कांग्रेस भी  उसको चुनौती देने की बात कह रही है। आज खबर आई कि सरकार की बजाय भाजपा अपील करेगी। दरअसल कांग्रेस शुरु से ही ये कहती आई है कि उसकी सरकार द्वारा ओबीसी के हित में लिए गए  उक्त निर्णय के विरुद्ध उच्च न्यायालय में प्रस्तुत याचिकाओं पर प्रदेश की भाजपा सरकार ठीक से पक्ष नहीं रख सकी। दूसरी तरफ भाजपा जवाब में कहती है कि कमलनाथ सरकार ने जल्दबाजी में ओबीसी आरक्षण 27 प्रतिशत करने का अध्यादेश तो जारी कर दिया किंतु उसकी वैधानिकता का ध्यान नहीं रखा। आरोप - प्रत्यारोप के इस अंतहीन सिलसिले से अलग हटकर देखें तो राजनीतिक दल कानूनी स्थिति जानते हुए भी  ऐसे फैसले लेकर जनता के हितैषी बनने का नाटक रचते हैं। और जब अदालत उन्हें रद्द कर देती है तब एक दूसरे को दोषी ठहराने की होड़ मचती है। म.प्र. में कांग्रेस सरकार द्वारा ओबीसी को निर्धारित सीमा से अधिक आरक्षण दिये जाने संबंधी अध्यादेश चूंकि भाजपा की वर्तमान सरकार के कार्यकाल में रद्द हुआ इसलिए कांग्रेस हमलावर होकर उसे ओबीसी विरोधी साबित करने में जुटी है। लेकिन गत दिवस कर्नाटक उच्च न्यायालय ने भी उसी तरह का फैसला सुनाते हुए तत्कालीन बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार द्वारा अनु. जाति और जनजाति को अधिक आरक्षण दिये जाने संबंधी कानून को संविधान विरोधी मानते हुए रद्द कर दिया जिसके कारण राज्य में कुल आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा हो गया। 2022 में लाए गए कानून के तहत अनु. जाति  का आरक्षण 15% से बढ़ाकर 17% और अनु.जनजाति  का आरक्षण 3% से बढ़ाकर 7% किया गया था, जिससे कुल आरक्षण 50% से बढ़कर 56% हो गया। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने इस कानून को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है, क्योंकि यह 50% की अधिकतम सीमा का उल्लंघन करता है। इसके बाद कर्नाटक की मौजूदा सरकार और विभिन्न संगठन म.प्र की तर्ज पर ही सर्वोच्च न्यायालय जाने की बात कह रहे हैं। फर्क केवल ये है कि म.प्र में 50 प्रतिशत आरक्षण की लक्ष्मण रेखा कांग्रेस सरकार ने लांघी जिसे उच्च न्यायालय ने भाजपा के राज में नियम विरुद्ध माना। इसके उलट कर्नाटक में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय  अधिकतम आरक्षण की सीमा का उल्लंघन भाजपा सरकार ने किया किंतु जब उच्च न्यायालय ने उस फैसले पर पानी फेर दिया तब वहाँ कांग्रेस की सत्ता है। जाहिर है वहाँ विपक्ष में बैठी भाजपा राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए उसे आरक्षण विरोधी ठहरायेगी। लेकिन बिना पक्षपात के  देखें तो ये कहना गलत नहीं होगा कि लगभग सभी राजनीतिक दलों के लिए आरक्षण चुनावी नफे - नुक्सान से जुड़ा विषय मात्र है। ये जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी तय कर दी है , जिसका उल्लंघन करने के लिए संसद में संविधान संशोधन के जरिये विशेष अनुमति लेनी होती है जैसी तमिलनाडु के पास है। गौर तलब है हर राज्य में एक विधि विभाग होता है। इसमें मंत्री, सचिव आदि होते हैं। सरकार को कानूनी सलाह देने एक महाधिवक्ता भी नियुक्त होता है जिसके मातहत दर्जनों अधिवक्ताओं की फौज रहती है। ऐसे में जब सरकार किसी कानून का प्रारूप तैयार करती है तब विधि विभाग की जिम्मेदारी है कि देखे कि वह संविधान के अनुरूप है या नहीं ? और फिर आरक्षण की अधिकतम सीमा किसी से छिपी नहीं है। विशेष रूप से राजनेताओं को तो इसके बारे में सब कुछ पता होता है। बावजूद इसके वे आरक्षित तबके  के मसीहा बनने के लिए ऐसे कानून बना देते हैं जिससे उन्हें तात्कालिक लाभ तो हो जाता है किंतु कालांतर में वे कानून की चौखठ पर दम तोड़ देते हैं। उक्त दोनों प्रकरण इसके ताजा उदाहरण हैं। लेकिन राजनीतिक नेताओं में बढ़ती जा रही सत्ता की भूख के चलते वे कानून को ठेंगे पर रखने का दुस्साहस करते हैं। बेहतर हो सर्वोच्च न्यायालय ऐसे कानूनों के बनते ही स्वतः संज्ञान लेकर इनको तत्काल रद्द करे जिससे राजनीतिक जमात द्वारा जनता को दिये जाने वाले धोखे के इस कारोबार को रोका जा सके। आरक्षित तबके को भी ये समझ लेना चाहिए कि राजनेता कानून के दायरे से बाहर उन्हें कुछ नहीं दे सकते। 


- रवीन्द्र वाजपेयी





Tuesday, 13 October 2026

सर्वोच्च न्यायालय में हुआ तांडव का पूर्वाभ्यास



सोमवार की शाम दिल्ली में जो राजनीतिक ड्रामेबाजी हुए उससे स्पष्ट है कि विपक्ष द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध छेड़ा गया अभियान अपनी गंभीरता खो बैठा है। राष्ट्रपति ने उनसे मिलने आए विपक्षी नेताओं से वोट चोरी के प्रमाण मांगे किंतु उन्हें देने के बजाय सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात का समय माँगा गया। जबकि विपक्ष के साथ जुड़े तमाम दिग्गज अधिवक्ता ये बात अच्छी तरह जानते थे कि न्यायाधीश कभी राजनीतिक प्रतिनिधिमंडल से नहीं मिलते। इसीलिए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने वह अनुरोध ठुकराते हुए याचिका के जरिये अपना पक्ष रखने की सलाह दी। कल विपक्ष का मार्च सर्वोच्च न्यायालय तक ले जाने का जो ऐलान किया गया था उसका निहित उद्देश्य भी खतरनाक है क्योंकि 11 विपक्षी नेताओं द्वारा  चुनाव आयोग के विरुद्ध याचिकाएं पेश किये जाने के बाद सर्वोच्च न्यायालय के सामने प्रदर्शन अर्थहीन हो चला था । परंतु स्टंटबाजी को ही राजनीति समझने वाले राहुल गाँधी अन्य विपक्षी नेताओं के साथ देर शाम छापामार शैली में उसके  परिसर में घुस गए। बहाना था याचिका संबंधी औपचरिकताओं को पूरा करना। लेकिन उनके पीछे हजारों लोग भी आ गये । अप्रत्याशित रूप से आई  बड़ी भीड़ की वजह से सर्वोच्च न्यायालय की सुरक्षा खतरे में पड़ गई। धक्का - मुक्की में अनेक लोग घायल भी हुए। कुछ देर की तमाशेबाजी के बाद हालांकि हुजूम लौट गया किंतु जाते - जाते ये संकेत दे गया कि  अब  विपक्ष न्यायपालिका को भी बलि का बकरा बनाने की योजना बना चुका है। दरअसल राष्ट्रपति पर दबाव बनाने का  कोई अवसर तो विपक्ष को मिला नहीं। इसीलिए उसने श्री सूर्यकांत से मिलकर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना चाहा कि यदि  विपक्ष की बात नहीं मानी गई तब  ज्ञानेश कुमार जैसी घेराबंदी उनकी भी होगी । लेकिन वे इस चाल को भाँप गए और  उन्होंने विपक्ष द्वारा भेजे गए मुलाकात के आवेदन का विधिवत जवाब देते हुए वैधानिक रास्ते पर चलने की नसीहत दे डाली। ये निश्चित तौर पर राहुल गाँधी के लिये बड़ा झटका था। इसीलिए याचिकाएं प्रस्तुत होने के बाद  शाम के समय जब सर्वोच्च न्यायालय बन्द हो चुका था तब बड़े जुलूस के साथ उसके परिसर में किये गये शक्ति प्रदर्शन के पीछे न्यायपालिका को ये संदेश देने का उद्देश्य था कि भारत में भी बांग्लादेश और नेपाल जैसी अराजकता की जमीन तैयार है। यद्यपि  अभी तक सर्वोच्च न्यायालय के विरुद्ध कोई टीका - टिप्पणी करने से परहेज किया जाता रहा किंतु हजारों की भीड़ के साथ सर्वोच्च न्यायालय के प्रांगण में बेवजह या यूँ कहें कि बलात प्रवेश में वे तमाम धमकियाँ छिपी हुई हैं जिन्हें बोल या लिखकर देना संभव नहीं था। उसके पहले दोपहर में श्री गाँधी तांडव और शिव जी की बारात जैसी बातों के जरिये  भावी कार्यप्रणाली का स्वरूप संवाददाता सम्मेलन में जाहिर कर चुके थे। सर्वोच्च न्यायालय के भीतर हजारों की भीड़ शिव जी की बारात जैसी ही थी  जिसके जरिये न्यायपालिका को तांडव का पूर्वाभ्यास करा दिया गया। प्रख्यात अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने तो क्रांति के जरिये तख्ता पलटने  और खूनखराबे जैसी डरावनी टिप्पणियां तक कर डालीं । जिस प्रकार वामपंथी छात्र संगठन इंडिया गठबंधन और कॉकरोच जनता पार्टी दोनों के आंदोलनों में खुलकर शामिल हो रहे वह भी आँखें खोल देने वाला है क्योंकि जंगलों से नक्सलियों का सफाया हो जाने के बाद से शहरों में छिपे दिमागी नक्सली अराजकता फैलाने के रास्ते  तलाश रहे हैं। चूंकि अब विपक्ष खुद सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएँ लगा चुका है इसलिए उसकी रणनीति  चुनाव आयोग से आगे बढ़कर सर्वोच्च न्यायालय और विशेष रूप से मुख्य न्यायाधीश श्री सूर्यकांत को लक्ष्य बनाने की होगी। एक वर्तमान न्यायाधीश ने हाल ही में जिस प्रकार चुनाव आयोग के विरुद्ध सार्वजनिक मंच पर टिप्पणियाँ कीं उनसे विपक्ष को ये आभास हो गया कि न्यायपालिका में भी उसके शुभचिंतक हैं। ऐसे में मनमाफिक राहत न मिलने पर श्री सूर्यकांत को भी ज्ञानेश कुमार की तरह घेरने का प्रयास किया जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। 

Monday, 12 October 2026

आंदोलन दिशा और औचित्य खोने लगा



मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के त्यागपत्र को लेकर दिल्ली में चलाया जा रहा आंदोलन दिशाहीन होते हुए औचित्य खोने लगा है। पहले कुछ दिन इंडिया गठबंधन ने मोर्चा संभाला जिसमें कांग्रेस सहित तृणमूल, सपा, माकपा शिवसेना (उद्धव) सहित कुछ पार्टियों ने शिरकत की लेकिन द्रमुक और आम आदमी पार्टी के साथ ही कॉकरोच जनता पार्टी दूर रहीं। लेकिन  जब पूरा श्रेय राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा लूटने लगे तब गठबंधन के घटकों में  निराशा आने लगी। पंजाब के आगामी चुनाव को ध्यान में रखते हुए आम आदमी पार्टी ने भी कांग्रेस के साथ आने से परहेज किया। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा 10 तारीख को दिल्ली में जो आंदोलन  किया उसमें  अरविंद केजरीवाल ने गिरफ्तारी देकर ये बता दिया कि  राहुल का नेतृत्व उन्हें मंजूर नहीं। इसी तरह इस आंदोलन में ममता बैनर्जी  और केरलम के पूर्व मुख्यमंत्री विजयन द्वारा गिरफ्तारी देना दर्शाता है कि तृणमूल और वामपंथियों को श्री गाँधी की क्षमता पर विश्वास नहीं है। वैसे  उन्होंने राहुल  के साथ धरना - प्रदर्शन और गिरफ्तारी में भी शिरकत की थी। बावजूद उसके वे कॉकरोच जनता पार्टी के बुलावे पर पहुंचे।  इससे भी बड़ी बात ये हुई कि 10 अक्टूबर को राहुल दिल्ली से हजारों कि.मी दूर चेन्नई जा पहुंचे। जहाँ उन्होंने छात्रों की गूँज कार्यक्रम आयोजित कर रखा था। वहाँ भी विपक्ष की फूट देखने मिली जब वे पुराने साथी पूर्व मुख्यमंत्री स्टालिन की नाराजगी दूर करने की बजाय मुख्यमंत्री जोसेफ विजय से मिलने जा पहुंचे। राहुल का उस दिन दिल्ली में न होना उस श्रेष्ठता भाव का प्रमाण है जिसके कारण इंडिया गठबंधन आज तक  एकजुट न हो सका। सरकार को ये बात अच्छी तरह समझ में आ गई और इसीलिए उसने कॉकरोच के आंदोलन को जमने ही नहीं दिया। ये भी देखने मिला कि शुरुआती रस्म अदायगी के बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी दिल्ली में समय खराब करने के बजाय उ.प्र  चुनाव की तैयारियों में समय लगाना बेहतर समझा। आज होने वाले मार्च में भी उनका शामिल होना अनिश्चित है। एक बात ये भी कि इंडिया गठबंधन के आंदोलन में जहाँ सांसदों और बड़े चेहरों का बाहुल्य  है वहीं कॉकरोच जनता पार्टी के बुलाने पर नई पीढ़ी आती है। ये बात अलग है कि वह आंदोलन आकार नहीं ले सका। इसी तरह नेहा बोरा नामक वामपंथी छात्र नेता ने भी कांग्रेस की बजाय कॉकरोच के साथ खड़े होना बेहतर समझा। धीरे - धीरे ये अवधारणा विपक्ष के भीतर  स्थापित होती जा रही है कि इस आंदोलन को वैसी सफलता नहीं मिलेगी जैसी अपेक्षा थी। इसका सबसे बड़ा कारण ज्ञानेश कुमार का संवैधानिक पद पर होना है। इसीलिए उन पर बनाये जा रहे दबाव का असर नहीं दिख रहा। इसका प्रमाण विपक्ष के 200 सांसदों को मिलने का समय नहीं दिया जाना है। हालांकि राहुल गाँधी सहित अनेक विपक्षी नेताओं ने राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू से मुलाकात कर मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध आरोप पत्र सौंपा। लेकिन उन्होंने भी प्रमाण दिये जाने की शर्त पर कार्रवाई का दिलासा देकर उनको विदा कर दिया। उसके बाद विपक्ष की ओर से  सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से मिलने का समय मांगा गया। लेकिन उन्होंने भी ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग  संबंधी याचिकाओं के विचाराधीन  होने के आधार पर मिलने  से मना कर दिया। ऐसे में अब विपक्ष , विशेष रूप से कांग्रेस के अवसर सिमट रहे हैं। उसे मालूम है संसद में महाभियोग लाकर ज्ञानेश कुमार को हटाना नामुमकिन है। राष्ट्रपति ने हालांकि विपक्षी प्रतिनिधिमंडल से सौजन्य भेंट तो की किंतु साथ ही सबूत भी मांग लिया। मुख्य न्यायाधीश द्वारा मिलने से इंकार कर देने के बाद अब  आंदोलन को लंबा खींचना मुश्किल होता जायेगा।  नवरात्रि शुरू होने से आंदोलन का माहौल नहीं है। और दशहरा -  दीपावली सीजन के कारण बाजारों में भीड़भाड़ बढ़ेगी। नवंबर के बाद विवाह के मुहूर्त हैं और दिसम्बर आते - आते उ.प्र , पंजाब और उत्तराखंड चुनाव की तैयारियां जोर पकड़ लेंगी। इन सब परिस्थितियों को भांपकर ही सरकार भी झुकने को तैयार नहीं दिख रही। कुल मिलाकर इस मुद्दे पर विपक्ष के हाथ खाली रहने की संभावना ही अधिक है। रही बात कॉकरोच जनता पार्टी की तो ये बात साबित हो चुकी है कि वह आम आदमी पार्टी की मानस पुत्री ही है जिसे पैदा ही अशांति फैलाने किया गया है। ऐसे में न्यायपालिका ही कोई धमाका कर दे  तो बात अलग वरना कुछ होता नहीं दिखता। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 10 October 2026

अदालती फैसले के बाद भी म.प्र में उलझा रहेगा ओबीसी आरक्षण मुद्दा



लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार म.प्र उच्च न्यायालय ने  उस अध्यादेश को असंवैधानिक मानते हुए रद्द कर दिया जिसके जरिये वर्ष 2019 में प्रदेश में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने ओबीसी के लिए सरकारी नौकरियों के साथ ही उच्च शिक्षा में 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया था। उस फैसले के विरुद्ध उच्च न्यायालय में दर्जनों याचिकाएं दायर की गईं। वहीं ओबीसी समाज का संगठन उसके पक्ष में खड़ा हो गया। सात वर्ष तक ये मामला अदालत में उलझा रहा। कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक आरोप -  प्रत्यारोप का अंतहीन सिलसिला भी चला। कांग्रेस का कहना था कि उसने ओबीसी के हित में निर्णय लिया था किंतु 2020 में कमलनाथ सरकार गिर जाने के बाद सत्ता में लौटी शिवराज सिंह चौहान की सरकार अदालत में उस फैसले के पक्ष में समुचित तथ्य पेश नहीं कर पाई। सही बात तो ये है कि कमलनाथ सरकार ने भी संवैधानिक बंदिशों का ध्यान रखे बिना राजनीतिक लाभ उठाने के लिए ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने के लिए अध्यादेश जारी किया। कांग्रेस के पास कानूनी दिग्गजों की लंबी फौज होने के बाद भी पता नहीं कमलनाथ जैसे होशियार व्यक्ति ने इस बात को क्यों नजरंदाज किया कि  सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक इंद्रा साहनी वाद (1992) के फैसले के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी ही रहेगी। कमलनाथ सरकार के उस अध्यादेश का सवर्ण जातियों के अलावा अन्य आरक्षित समुदायों द्वारा भी विरोध किया गया। चूंकि उच्च न्यायालय इस पर स्थगन जारी कर चुका था इस कारण सरकारी चयन परीक्षाओं में चयनित अभ्यर्थियों के नियुक्ति पत्र  के अलावा विभागीय पदोन्नतियां रुकी पड़ी थीं। प्रकरण  सर्वोच्च न्यायालय भी गया जिसने उच्च न्यायालय को निश्चित समय सीमा में निपटारे का निर्देश दिया। अन्यथा ये मामला अभी भी विचाराधीन ही रहता। गत माह  इंदौर में आयोजित छात्रों की गूँज कार्यक्रम में एक युवती ने नियुक्ति पत्र न मिलने की शिकायत कांग्रेस नेता राहुल गाँधी से की जिस पर उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र लिखकर  कहा कि  चयनित प्रत्याशियों को नौकरी प्रदान की जाए। लेकिन उच्च न्यायालय ने उक्त अध्यादेश रद्द करते हुए नई नियुक्तियों में ओबीसी को पूर्ववत आरक्षण जारी रखने की व्यवस्था के बावजूद  ओबीसी वर्ग के उन लोगों की नौकरी सुरक्षित रखने का निर्देश दिया जिन्हें इस दौरान 27 फीसदी आरक्षण के अंतर्गत नियुक्ति मिली थी। गत दिवस आये फैसले के बाद कांग्रेस और भाजपा के बीच बयानों के बाण फिर चलने लगे हैं। सरकार के साथ ही कांग्रेस और ओबीसी महासंघ भी सर्वोच्च न्यायालय जाने की बात कह रहा है। हालांकि सभी जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय अपने पूर्व फैसले को पलटने जैसा कदम शायद ही उठायेगा किंतु राजनीतिक मजबूरियों के चलते ऐसे मामलों में सच्चाई को अनदेखा करने का चलन बन चुका है। जनसंख्या के आधार  पर आरक्षण का प्रतिशत तय करने की बात भी इसलिए अव्यवहारिक है क्योंकि तब तो उसका आंकड़ा 80 फीसदी या उससे भी ज्यादा हो सकता है। लेकिन वोट बैंक की राजनीति के बढ़ते प्रभाव के कारण राजनीतिक दलों के अलावा जो जातीय संगठन हैं वे भी दबाव समूह के तौर पर मैदान में कूद पड़ते हैं। म.प्र में 2003 से अब तक जितने भी मुख्यमंत्री बने उनमें 15 माह  सत्ता में रहे कमलनाथ को छोड़कर उमाश्री भारती, बाबूलाल गौर, शिवराज सिंह चौहान और वर्तमान में डॉ. मोहन यादव सभी ओबीसी समुदाय के हैं। इस वर्ग में अच्छी पैठ के कारण भाजपा नहीं चाहेगी कि उस पर ओबीसी विरोधी होने का आरोप लगे। इसी तरह कांग्रेस के लिए भी इस मुद्दे को जीवित रखना मजबूरी है। जातीय संगठनों को भी अपना प्रभाव जताने के लिए ऐसे मामलों में कूदना पड़ता है। चूंकि इन सबका असर चुनावों पर पड़ता है इसलिए न किसी को संविधान के सम्मान की चिंता है और न ही न्यायपालिका का लिहाज। ये देखते हुए कहना गलत न होगा कि म.प्र में ओबीसी आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाकर 27 प्रतिशत किये जाने संबंधी उक्त विवाद सर्वोच्च न्यायालय के अलावा राजनीति के मैदान में भी नजर आता रहेगा। हालांकि इससे पिछड़ी जातियों का कितना हित संवर्धन होगा इसकी चिंता किसी को नहीं रहती क्योंकि इन जातियों के नेता और उनके परिवारजनों का पिछड़ापन तो कब का दूर हो चुका है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी