Thursday, 30 July 2026

कोचिंग माफिया पर भी शिकंजा कसा जाए



लोक परीक्षा संशोधन विधेयक गत दिवस लोकसभा में पारित होने के बाद आज राज्यसभा में विचारार्थ रखा जा रहा है। सत्ता पक्ष के संख्या बल को देखते हुए वहाँ भी इसके स्वीकृत होने की पूरी संभावना है जिसके बाद राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षरित होकर इसे कानून की शक्ल मिल जायेगी। नीट परीक्षा के प्रश्न पत्र लीक हो जाने के बाद देश भर में सरकार द्वारा ली जाने वाली परीक्षाओं के प्रश्न पत्रों की गोपनीयता भंग होने को लेकर छात्रों के साथ ही उनके अभिभावकों के मन में भी व्यवस्था को लेकर जबरदस्त गुस्सा देखने मिला। कुछ परीक्षार्थियों द्वारा आत्महत्या करने के कारण शिक्षा मंत्रालय की अक्षमता का मुद्दा उठ खड़ा हुआ। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के अध्यक्ष से लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान निशाने में आने लगे। इस चिंगारी को नई -  नवेली कॉकरोच जनता पार्टी ने हवा देकर दिल्ली के जंतर मंतर पर आंदोलन खड़ा कर दिया जिसकी परिणिति श्री प्रधान के त्यागपत्र से हुई। हालांकि शिक्षा मंत्रालय से जुड़े अनेक अधिकारियों पर भी गाज गिरी किंतु परीक्षा संचालित करवाने वाली नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के शीर्ष पदाधिकारी को आश्चर्यजनक ढंग से अभय दान दे दिया गया। चौतरफा दबाव के बाद सरकार ने प्रश्न पत्र लीक होने से रोकने के लिए विशेषज्ञों की एक उच्च स्तरीय समिति भी गठित कर दी और उसी के साथ प्रश्न पत्र लीक करने वालों को कड़ा दंड देने वाला कानून बनाने की पहल संदर्भित विधेयक के माध्यम से कर दी।  नीट परीक्षा के प्रश्न पत्र लीक होने के मामले में कई लोग गिरफ़्त में आ चुके हैं। मामले के त्वरित निपटारे हेतु फास्ट ट्रैक कोर्ट भी गठित किया गया है। सीबीआई इस प्रकरण में जाँच एजेंसी है। इस बारे में  जिन लोगों पर अपराधिक मामले दर्ज हुए उनमें कुछ कोचिंग संचालकों के अलावा प्रश्न पत्र तैयार करने वाले शिक्षक, और दलाल किस्म के लोग हैं। देर - सवेर कुछ और लोगों का पर्दाफ़ाश होना तय है। लेकिन सबसे बड़ी जरूरत है शिक्षा जैसे पवित्र पेशे में आई इस बुराई की जड़ों में मठा डालने की। और इसके लिए शिक्षा का व्यवसायीकरण रोकना पहली आवश्यकता है। आजकल अखबारी पन्नों के अलावा होर्डिंग्स और डिजिटल मीडिया पर कोचिंग संस्थानों के बड़े - बड़े विज्ञापन इस बात का प्रमाण हैं कि शिक्षा अब पूरी तरह एक उद्योग बन चुकी है जिसमें पूँजी का खेल होने से मुनाफाखोरी चरम पर है। कोचिंग व्यवसाय को माफिया कहा जाना बेशक अटपटा लगता है ।  लेकिन बिहार की राजधानी पटना में दो कोचिंग संचालकों के  विवाद में गोली चलने तक की नौबत आ आ गई जिसके चलते एक संचालक को जेल जाना पड़ा। राजस्थान का कोटा शहर तो कोचिंग की राजधानी कहलाता है। ये बात भी धीरे - धीरे सामने आती जा रही है कि प्रश्न पत्र लीक होने में कोचिंग संचालकों की भी भूमिका रहती है। इनकी अनाप - शनाप कमाई का अंदाज इनके द्वारा प्रचार पर किया जाने वाला खर्च है। अखबार के प्रथम पृष्ठ कोचिंग संस्थानों के विज्ञापनों से भरे रहते हैं। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि बिल्डर और ऑटोमोबाइल उद्योग की  टक्कर के विज्ञापनदाता इन दिनों कोचिंग संस्थान हैं।  चूंकि इनका व्यवसाय इनके संस्थान से सफल होकर निकलने वाले छात्रों पर ही टिका होता है इसीलिये ये परीक्षा परिणाम आते ही करोड़ों के विज्ञापनों की झड़ी लगा देते हैं। यही सब देखते हुए प्रश्न पत्र लीक मामले में कतिपय कोचिंग संचालक शक के दायरे में है। जैसी कि चर्चा है उसके अनुसार इस बार की नीट परीक्षा के अलावा अतीत में संघ लोकसेवा आयोग सहित राज्यों की प्रवेश और चयन परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक होने में शिक्षा माफिया की सक्रिय हिस्सेदारी है। इसीलिये सरकार को चाहिए कोचिंग संस्थानों पर शिकंजा कसने के लिए सख्त इंतजाम करे क्योंकि इनके कारण हमारे देश में शाला स्तर की शिक्षा की गुणवत्ता का सत्यानाश हो रहा है। हाल ही में एक सर्वे ने ध्यान खींचा जिसके अनुसार आई.आई.टी जैसे विश्वस्तरीय संस्थान के प्राध्यापक से अधिक वेतन और भत्ते कोटा के कुछ कोचिंग संस्थान देते हैं। भले ही इसकी पुष्टि न की जा सके किंतु प्रश्न पत्र लीक होने के मामलों में कोचिंग माफिया की गर्दन में फँदा डालना बेहद जरूरी है। वरना कितने भी कानून बना लिए बजाएं पैसे की ताकत के आगे व्यवस्था लाचार नजर आयेगी। इसके साथ ही नेशनल टेस्टिंग एजेंसी और संघ लोक सेवा आयोग में होने वाली नियुक्तियों में राजनीतिक प्रतिबद्धता को परे रखते हुए योग्यता और प्रामणिकता का ध्यान रखा जाए। वरना आगे पाट पीछे सपाट की स्थिति बनी रहेगी। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 29 July 2026

पाक अधिकृत कश्मीर में हो रही बगावत से भारत को सतर्क रहना होगा



पाक अधिकृत कश्मीर के हालात भी बलूचिस्तान की तरह ही बेहद तनावपूर्ण हैं।  पाकिस्तान के हुक्मरानों के अलावा सेना के जनरल चाहे जब जम्मू - कश्मीर को भारत से छीनने की डींगें हाँकते रहते हैं। आजादी के फौरन बाद उसने कबायलियों की शक्ल में बाकायदा सेना भेजकर  कश्मीर के एक हिस्से पर कब्जा जमा लिया। भारतीय सेना ने जब हमलावरों को पीछे धकेलना शुरू किया तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लॉर्ड माउंटबेटन और शेख अब्दुल्ला के बहकावे में आकर सं.रा संघ में शिकायत कर दी। उसके बाद युद्ध तो रुक गया किंतु पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर का हिस्सा आज तक उसके अधीन ही बना हुआ है। दूसरी समस्या नेहरू जी पैदा कर गए जम्मू - कश्मीर को धारा 370 के अंतर्गत विशेष दर्जा देकर। इसके चलते मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी में अलगाववाद बढ़ते - बढ़ते आतंकवाद का रूप ले बैठा जिसके पीछे पाकिस्तान का खुला हाथ था। इसी के तहत घाटी से हिंदुओं को पलायन करने बाध्य किया गया। वहाँ पाकिस्तान का झंडा लहराना और भारत विरोधी नारेबाजी आम बात थी। सेना की टुकड़ियों पर पत्थरबाजी व्यवसाय बन गई थी । इस स्थिति को समाप्त करने के लिए वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार ने धारा 370 समाप्त करने जैसा साहसिक कदम उठाते हुए जम्मू - कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा विलोपित कर दिया। इसके बाद घाटी में अलगाववाद पूरी तरह समाप्त हो गया हो ये मान लेना तो गलत होगा लेकिन वह लगातार कमजोर होता जा रहा है। आतंकवादियों की गतिविधियां भी पहले से काफी घट गई हैं। हालांकि अपना घर छोड़ने मजबूर किये कश्मीरी हिंदुओं की वापसी अब तक संभव नहीं हो सकी किंतु पहलगाम हत्याकांड के बाद उत्पन्न चिंता और भय अब नहीं दिखाई देता। जिसका प्रमाण वहाँ पर्यटकों की रिकार्ड संख्या है। धारा 370 हटने के बाद राज्य में चुनाव भी सफलतापूर्वक संपन्न हो सके। लेकिन इसे संयोग कहें या कुछ और कि इधर जम्मू - कश्मीर में शांति स्थापित हो रही है उधर पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान के प्रति असंतोष बढ़ते - बढ़ते बगावत की सीमा तक आ पहुंचा है। पाकिस्तानी सेना वहाँ वैसा ही दमन कर रही है जैसा 1971में उसने बांग्लादेश में  किया था। गत दिवस ही सेना की गोली से 30 आंदोलनकारियों के मारे जाने की खबर वहाँ की गंभीर स्थिति का प्रमाण है। जो खबरें आ रही हैं उनके मुताबिक पाकिस्तान इस समय उसी समस्या में फंसा हुआ है जो उसने जम्मू - काश्मीर सहित भारत के अनेक हिस्सों में पैदा करने का कुचक्र रचा था। पाक अधिकृत कश्मीर उससे अलग होकर भारत से जुड़ने के संकेत दे रहा है। बलूचिस्तान अपने को अलग देश घोषित कर चुका है। पश्चिमी सीमांत पर खैबर पख्तून और तालिबानी इस्लामाबाद की नींद उड़ाए हुए हैं। सिंध में भी अलगाववाद की दबी हुई चिंगारी फिर भड़कती दिख रही है। कुल मिलाकर मुल्क के अंदरूनी हालात बेहद संगीन हैं। भारत का विभाजन कर अस्तित्व में आया ये देश आज खुद खंडित होने के कगार पर है। भारत के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर है क्योंकि उसका गिलगित वाला हिस्सा पाकिस्तान ने चीन को सौंप दिया। स्मरणीय है चीन इस क्षेत्र से वन बेल्ट वन रोड जैसे प्रकल्प पर तेजी से काम कर रहा है जिससे उसे प. एशिया और यूरोप तक अपना व्यापार विस्तारित करने में मदद मिलेगी । लेकिन बलूचिस्तान के अलावा पाक अधिकृत कश्मीर में चीन का बढ़ता विरोध पाकिस्तान के दुर्भाग्य की पटकथा लिख रहा है। पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर भारत में शामिल होने जा रहा है इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि पाकिस्तान के साथ ही चीन भी आसानी से ऐसा नहीं होने देगा। लेकिन उस पार के कश्मीर में पाकिस्तान का नियंत्रण  लगातार कमजोर होता जा रहा है जो भारत के हित  में है क्योंकि अपनी आंतरिक अशांति से जूझने के कारण  आतँकवाद का निर्यात करने की उसकी क्षमता कमजोर होगी। लेकिन  एक  बात गौरतलब है कि भारत का वह वर्ग जो जम्मू -  कश्मीर में अलगाववादियों के प्रति सहानुभूति दर्शाते हुए भारतीय सेना को अत्याचारी ठहराने में तनिक भी शर्म नहीं करता था वह पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तानी सेना द्वारा चलाये जा रहे दमन चक्र पर मुँह में दही जमाये बैठा है। धारा 370 के हटाये जाने पर छाती पीटने वाली रुदालियों की टोली पाक अधिकृत कश्मीर में मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ती देखकर भी शांत है। दरअसल उसे इस बात की चिंता सताये जा रही है कि कश्मीर के उस हिस्से पर पाकिस्तान की पकड़ कमजोर पड़ने से कहीं वह जम्मू कश्मीर के साथ वापस न जुड़ जाए। भारत को इस स्थिति पर पैनी नजर रखनी होगी क्योंकि पाकिस्तान और चीन मिलकर भारत के लिए कोई परेशानी खड़ी कर सकते हैं। और फिर हमारे यहाँ आस्तीन के सांप भी कम नहीं हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 28 July 2026

छात्रों की मौत पर हुए आंदोलन के बाद जश्न का क्या औचित्य



काॅकरोच जनता पार्टी ने आज से अपना आंदोलन फिर शुरू करने की धमकी दी है। उसका आरोप है कि जंतर मंतर आंदोलन समाप्त करने के लिए सरकार के साथ जो बातचीत हुई उसमें धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र और नीट पेपर लीक पर आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवार को एक करोड़ रु. की क्षतिपूर्ति के साथ ही इस आंदोलन के सिलसिले में दिल्ली के अलावा देश के किसी भी हिस्से में छात्रों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने के बात तय थी। श्री प्रधान ने तो त्यागपत्र दे दिया और पीड़ित परिवारों को आर्थिक क्षतिपूर्ति की प्रक्रिया भी प्रारंभ हो रही है किंतु छात्रों पर अपराधिक प्रकरण दर्ज होने और गिरफ्तारी की खबरें समझौते का उल्लंघन है। इसके बाद बिहार सरकार ने 26 तारीख तक छात्रों के विरुद्ध दायर सभी प्रकरण वापस लेने का फैसला कर लिया। लेकिन पार्टी के जन्मदाता अभिजीत दिपके का आरोप है कि दिल्ली और मुंबई में आंदोलन में शामिल  अनेक छात्रों को  पूछताछ के नाम पर जबरन थाने में बिठाकर रखा गया है जिससे उनके मन में भय व्याप्त है। उन्होंने एक वीडियो संदेश में स्पष्ट तौर पर कहा कि यदि उक्त कारवाई जारी रही तो पार्टी दोबारा आंदोलन शुरू कर देगी। इस सबके बीच आंदोलन के नेताओं ने वरिष्ट अधिवक्ता कपिल सिब्बल से संपर्क साधा जिन्होंने ऐसे मामलों में कानूनी सहायता का आश्वासन भी दे दिया। इस बारे विचारणीय बात  ये  है कि  आंदोलन खत्म करते समय जो समझौता हुआ था उसमें छात्रों का उल्लेख था। लेकिन जो कारवाई हो रही है वह उन आपराधिक तत्वों के विरुद्ध है जिन्होंने पुलिस पर हमला किया, सरकारी वाहन तोड़े और पत्थरबाजी की। उल्लेखनीय है कि काॅकरोच जनता पार्टी पर जब ये आरोप लगा कि उसके आंदोलन में हिंसक तत्व घुस आये जिन्होंने पुलिस कर्मियों पर हमले किये तब उनका जबाब था कि भाजपा और रास्वसंघ ने अपने गुंडे आंदोलन में भेजकर हिंसा फैलाई। अब जब पुलिस वीडियो और सी.सी कैमरों की रिकार्डिंग के जरिये आंदोलन को हिंसक रूप देने वालों की  धरपकड़ कर रही है तब काॅकरोच जनता पार्टी को  अपनी असलियत सामने आने का डर सता रहा है। जिस समझौते के उल्लंघन का रोना पार्टी नेता रो रहे हैं उसमें भी अपराधी तत्वों को अभयदान का कोई जिक्र नहीं था।  सर्वोच्च न्यायालय ने भी आंदोलन को लोकतांत्रिक अधिकार मानते हुए पुलिस की बर्बरता पर जहाँ ऐतराज जताया वहीं उस पर होने वाले हमलों पर भी चिंता जताई। काॅकरोच जनता पार्टी की मांग है कि दिल्ली पुलिस अपनी कारवाई के लिए माफी मांगे लेकिन दूसरी तरफ वह उपद्रवी तत्वों द्वारा पुलिस पर हमले और सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ के जिम्मेदार लोगों को बचाने में लगी है। इस दोहरे रवैये के कारण वह आलोचनाओं का शिकार हो रही है। आंदोलन के प्रति गंभीरता पर सवालिया निशान भी उसने स्वयं खड़े कर दिये जब सोशल मीडिया पर काॅकरोच जनता पार्टी के नेताओं के वे वीडियो जारी हुए जिसमें वे लड़के - लड़कियों के साथ किसी आलीशान होटल में नाचते हुए जश्न मनाते दिखे। जब इसे लेकर उनकी फजीहत शुरू हुई तब बजाय शर्मिंदगी व्यक्त करने के कहा गया कि जेन जी का यही तरीका है। यदि ये नाच - गाना आंदोलन खत्म करने वाली रात जंतर मंतर पर हुआ होता तब ये नेता वहाँ मौजूद भीड़ पर उसकी जिम्मेदारी डालकर बच निकलते ।  लेकिन अपना घर छोड़कर  आंदोलन स्थल पर दिन - रात मौजूद रहे कथित जेन जी  को घर वापसी का रास्ता पकड़ने का निर्देश देकर गिने - चुने दरबारियों के साथ नाच - गाने की महफ़िल सजाना उन हजारों युवक - युवतियों के साथ छलावा है जिनके बल पर तीन - चार पेशेवर लोगों ने पूरे देश को अशांत करने की कोशिश की।  बहरहाल , आंदोलन की समाप्ति के बाद  होटल में जश्न मनाते हुए इस पार्टी के नेताओं के वीडियो उन जेन जी लड़के - लड़कियों  के लिए आँखें खोल देने वाले हैं जो उनके बहकावे में आकर कई हफ्ते धूप में पसीना बहाते रहे। और अब तो कपिल सिब्बल ने इस पार्टी को 1 करोड़ रु.देने की घोषणा भी कर दी। इसके बाद  बड़ी बात नहीं यदि बड़ी बात नहीं अगला आंदोलन भी किसी  होटल या रिसार्ट में आयोजित हो क्योंकि हर बात पर ये सफाई दी जाती है कि जेन जी कुछ अलग  हटकर सोचने और करने में यकीन रखते हैं। आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारजन इन नाचते हुए जेन जी नेताओं को देखकर क्या सोच रहे होंगे इसकी कल्पना भी विचलित कर देती है। आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारजन इन नाचते हुए जेन जी नेताओं को देखकर क्या सोच रहे होंगे इसकी कल्पना भी विचलित कर देती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 27 July 2026

दूसरा जंतर मंतर तैयार : आरक्षण हटाओ आंदोलन से जुड़ गए 35 लाख



जंतर मंतर आंदोलन धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र से समाप्त हो गया। उसकी आयोजक  काॅकरोच जनता पार्टी ने स्पष्ट नहीं किया कि वह राजनीतिक दल बनेगी या दबाव समूह के रूप में समय - समय पर उभरती रहेगी। इस पार्टी ने जंतर मंतर का आंदोलन जिस तरह संचालित किया उससे स्पष्ट हो गया कि यदि प्रधान न्यायाधीश काॅकरोच वाली टिप्पणी नहीं करते तब भी किसी और नाम से ये प्रयोग होता ।  इस पार्टी ने उस वर्ग को आकर्षित किया जिसकी चिंता न अतीत है और न ही वर्तमान। उसके लिए उसका भविष्य ही एकमात्र लक्ष्य है। पहले यूजीसी और फिर नीट पेपर लीक ने इस वर्ग को चिंता में डाल दिया जिसे इसने लपक लिया। कोशिश तो देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी ने भी की थी लेकिन उसके नेता मुद्दे को बीच में छोड़कर विदेश यात्रा पर चले गए। आम आदमी पार्टी ने भी प्रयास किया परंतु युवाओं में उसकी विश्वसनीयता नहीं बची। इसीलिए उसने अपने पुराने साथियों को इस पार्टी के रूप में आगे कर युवा असंतोष की चिंगारी को भड़काने का तानाबना बुना। लेकिन अपने तमाम प्रयासों के बाद भी आंदोलन की सफलता का सेहरा अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, आतिशी और संजय सिंह अपने सिर पर नहीं बांध सके। दूसरी बात ये हुई कि आंदोलन के सबसे बड़े चेहरे अभिजीत दिपसे ने खुद को दलित बताकर अपनी पहचान स्पष्ट कर दी। इसीलिए भीम आर्मी के चंद्रशेखर रावण ने भी आंदोलन में घुसपैठ बढ़ाई।जंतर मंतर पर ब्राह्मण वाद विरोधी नारे भी इसीलिए लगे। जेएनयू की टुकड़े - टुकड़े गैंग  ने भी जंतर मंतर पर अपनी ढपली पीटकर अश्लीलता का हरसंभव परिचय दिया। सरकार द्वारा मांगे मान लेने के बाद आंदोलन तो खत्म हो गया किंतु नये आंदोलन के बीज बिखेर गया। युवा शक्ति की जीत का ढिंढोरा पीटते हुए डाॅ. अंबेडकर का चित्र  लहराने वाले अभिजीत दिपके और उनके सिपहसालारों ने जिस डिजिटल क्रांति का आगाज किया वह अब उन्हीं के गले पड़ने जा रही है। कॉकरोच जनता पार्टी की तर्ज पर आरक्षण के विरोध में एक पेज इंस्टाग्राम पर बनाये जाते ही उसके साथ 35 लाख लोग जुड़ गए। स्मरण रहे यूजीसी विवाद के समय भी सवर्ण जातियों के युवाओं का गुस्सा सामने आया था। नीट पेपर लीक के चलते वह ठण्डा होता दिखा किंतु काॅकरोच जनता पार्टी ने राख के नीचे दबी चिंगारी को हवा दे दी। इसीलिए जंतर मंतर  से उसका डेरा उठते ही इंस्टाग्राम परआरक्षण हटाओ आंदोलन का शोला भड़क उठा। इसका नारा है सभी जातियाँ एक समान,मेरा बस ये देश महान। सामान्य और कुछ ओबीसी श्रेणी के युवाओं ने इस  डिजिटल अभियान को हवा दी है। इसके एडमिन की मांग है कि जाति के आधार पर मिलने वाले आरक्षण को पूरी तरह खत्म कर सरकारी नौकरियों और कॉलेज में प्रवेश प्रतिभा, अंक और योग्यता के आधार पर हों।आर्थिक आधार पर मदद की जाए जिससे  कमजोर आर्थिक और सामाजिक हैसियत  वाले युवाओं के सपने साकार हो सकें। इस पेज पर आरक्षण भेदभाव है जैसे नारे लगाए गए हैं। पेज के एडमिन और समर्थकों ने घोषणा की है कि वे इसे काॅकरोच जनता पार्टी  की तरह ही एक बड़े आंदोलन में बदलेंगे। इसी तरह  E20 जनता पार्टी नामक डिजिटल अभियान भी शुरू हो गया जो एक तरह का डिजिटल कैंपेन  उन लोगों द्वारा शुरू किया गया है, जो मानते हैं कि देशभर में E20 पेट्रोल को बढ़ावा देने के साथ-साथ ग्राहकों के पास 100% शुद्ध पेट्रोल खरीदने का विकल्प भी होना चाहिए। उनका कहना है कि सरकार  बिना एथेनॉल वाला पेट्रोल भी पंपों पर मिलना चाहिए ताकि फैसला ग्राहक खुद कर सकें। इस कैंपेन से भी लोग तेजी से जुड़ रहे हैं। हालांकि ये अभियान उतना सड़क पर नहीं उतर सकता किंतु आरक्षण हटाओ आंदोलन से कुछ ही दिनों में करोड़ों लोग जुड़ गए तब और एक नया जंतर मंतर खड़ा होकर सरकार को चुनौती देने मैदान में उतर आया तब क्या दिपके, केजरीवाल, राहुल, और सोनम वांगचुक इस जेन जी के पक्ष में भी खड़े होने का साहस दिखाएंगे? काॅकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में ब्राह्मणवाद को गालियाँ दी गईं तो जेन जी के प्रशंसक इसे अभिव्यक्ति की आजादी का नया दौर बताते हुए इतरा रहे थे किंतु अब सवाल ये है कि आरक्षण हटाओ आंदोलन में शामिल जेन जी आंबेडकरवाद के विरुद्ध नारेबाजी करे तब क्या दिपके और चंद्रशेखर रावण उसका समर्थन करेंगे? जंतर मंतर आंदोलन की सफलता से आत्ममुग्ध तबके को ये जा लेना चाहिए कि नीट परीक्षा में सफल हुए लाखों छात्र  ऐसे भी हैं जिन्हें ज्यादा अंक मिलने के बाद भी उन्हें इसलिए प्रवेश नहीं मिल सका क्योंकि आरक्षण  प्राप्त कम अंकों वाले छात्र को उपकृत किया गया। डिजिटल आंदोलन का ये सिलसिला कहाँ जाकर रुकेगा ये कहना कठिन है क्योंकि जेन जी नामक जो जिन्न बोतल से बाहर आ गया है उसे दोबारा बंद करना बहुत बड़ी समस्या है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 25 July 2026

सरकार का जवाब तय करेगा आगे की राजनीति



दिल्ली में चल रहे आंदोलन की जड़ में नीट परीक्षा के प्रश्न पत्र लीक होने से छात्रों में उपजा गुस्सा था। हालांकि दोबारा परीक्षा होने के बाद परिणाम भी आ गए लेकिन शिक्षा प्रणाली में व्याप्त वि संगतियों के लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग उठ खड़ी हुई। इसकी शुरुआत कांग्रेस द्वारा की गई और उसकी छात्र इकाई द्वारा अनेक शहरों में धरना - प्रदर्शन भी किये गए किंतु तभी राहुल गाँधी अपनी निजी यात्रा पर विदेश चले गए। वे कहाँ और क्यों गए इसे हमेशा की तरह गोपनीय रखा गया।लेकिन इसी बीच देश के प्रधान न्यायाधीश द्वारा अपनी एक टिप्पणी में कॉकरोच शब्द का उपयोग किया गया जिसका संदर्भ कुछ और था किंतु अमेरिका में बैठे एक युवक अभिजीत दिपके ने उससे नाराज होकर जब काॅकरोच जनता पार्टी का गठन सोशल मीडिया पर किया तब रातों - रात उससे करोड़ों लोग जुड़ गए। इससे उत्साहित होकर उसने भारत आने का ऐलान कर दिया। विपक्षी दलों से निराश सरकार विरोधी तबके को अभिजीत में क्रांतिदूत नजर आया । दिल्ली आकर उसने एक औपचारिक आयोजन में श्री प्रधान के इस्तीफे की मांग हेतु सरकार के सामने समय सीमा रखी और पूरी न होने पर संसद का सत्र शुरू होने वाले दिन जंतर मंतर से चलो संसद का आह्वान किया। उसके चलते हजारों लोग संसद भवन की ओर बढ़ने लगे जिन्हें रोकने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया और अश्रुगैस छोड़ी। उस दौरान क्या - क्या हुआ उसे दोहराने की जरूरत नहीं है। इधर जंतर मंतर पर अनशन कर रहे सोनम वांगचुक को पुलिस ने उठाकर सरकारी  अस्पताल में भर्ती कर दिया किंतु उनका अनशन जारी रहा । बाद में उन्हें मेदांता अस्पताल पहुंचा दिया गया और दो दिन पहले उन्होंने केंद्रीय मंत्रियों के हाथ से जूस पीकर भूख हड़ताल तोड़ दी। साथ ही शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र की मांग से भी पीछे हट गए। गुरुवार की आधी रात जब वांगचुक जूस ग्रहण कर रहे थे उसी समय प्रधानमंत्री का वीडियो संदेश प्रसारित हुआ जिसमें पेपर लीक  के दोषियों को कड़ा दंड देने हेतु कानून बनाने की घोषणा की गई। इसके बाद काॅकरोच जनता पार्टी और सरकार के बीच संवाद कायम हुआ और गत दिवस एक बैठक भी हुई। केंद्रीय मंत्री द्वय जगत प्रकाश नड्डा और डॉ. जितेंद्र सिंह के साथ बातचीत में शामिल पार्टी प्रवक्ताओं ने बाद में बताया कि सरकार पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवार को 1 करोड़ रु देने के अलावा 20 जुलाई के संसद मार्च में हुए उपद्रव के आरोपियों पर दर्ज आपराधिक प्रकरण वापस लेने सहमत है किंतु श्री प्रधान के त्यागपत्र की मांग पर 24 घंटे बाद अर्थात आज 2 बजे तक जवाब। देगी। पार्टी ने इस माँग से पीछे न हटने की बात दोहराते हुए धमकी भी दी कि आंदोलन को पूरे देश में फैला दिया जाएगा। उसके बाद गत रात्रि प्रधानमंत्री नये वीडियो संदेश के साथ आये और युवाओं की मिजाजपुर्सी का भरपूर प्रयास किया। आज सुबह से ही इस बात को लेकर उत्सुकता है कि सरकार शिक्षा मंत्री को हटाने के लिए राजी होती है या नहीं ? हालांकि श्री प्रधान को मंत्री पद से हटाया जाना कोई बड़ी समस्या नहीं है। प्रधानमंत्री चाहें तो शिक्षा मंत्री क्या किसी अन्य मंत्री को भी एक क्षण में हटा सकते हैं। लेकिन इतने दबाव और आलोचना के बाद भी उनको मंत्री बनाये रखने के बाद एक नई नवेली पार्टी की जिद पर यदि ऐसा किया जाता है तब उससे प्रधानमंत्री की वजनदारी पर सवाल उठेंगे। उल्लेखनीय है जंतर मंतर से इतर संसद में भी विपक्ष , शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर अड़ा रहकर कार्यवाही नहीं चलने दे रहा। सोमवार को सरकार पेपर लीक रोकने एक कड़े कानून का प्रस्ताव लेकर भी आ रही है। लेकिन उसकी सबसे बड़ी  चिंता परिसीमन और विदेशी अनुदान संबंधी  विधेयक को लेकर  है जिन पर भाजपा की भावी व्यूहरचना निर्भर है। प्रधानमंत्री अतीत में भी भूमि अधिगृहण और कृषि सुधार जैसे कानून वापस ले चुके हैं जिसके बाद उनके 56 इंची सीने के दावे का मखौल भी उड़ा किंतु उसके उपरांत मिली चुनावी सफलताओं ने उनकी नेतृत्व क्षमता का दबदबा बनाये रखा। लेकिन यहाँ सवाल ये है कि स्थापित दलों के सामने अड़े रहने के बाद यदि वे एक नवोदित पार्टी के सामने जिसका कोई विधिवत ढांचा नहीं है, झुक जाते हैं तब क्या उनकी मजबूत छवि पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा? लेकिन राजनीति की समझ रखने वाले जानते हैं कि बड़ी लड़ाई जीतने के लिए कभी - कभी रणनीति के तहत कदम पीछे भी खींचना पड़ते हैं। आज दोपहर के बाद स्पष्ट हो जाएगा कि सरकार का अगला कदम क्या होगा और  आंदोलन की दिशा भी। 

नोट:- उक्त आलेख शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के पहले प्रकाशित हुआ था। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 24 July 2026

संसदीय गरिमा का पुनर्स्थापन सरकार और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी



म.प्र विधानसभा का मानसून सत्र समय से पहले ही समाप्त होने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। सरकार द्वारा प्रस्तुत तमाम विधेयक होहल्ले के बीच पारित हो गए जिनमें समान नागरिक संहिता जैसा महत्वपूर्ण विधेयक भी था। बीते कुछ सालों से देखने मिल रहा है कि विधानसभा और संसद के सत्रों का ज्यादातर समय हंगामे की बलि चढ़ जाता है। विपक्ष अपनी कुछ मांगों को लेकर अड़ता है जिन्हें सत्ता पक्ष द्वारा नहीं माने जाने पर गतिरोध बना रहता है। अक्सर विपक्ष और आसंदी के बीच कहासुनी होने पर भी सदन स्थगित करने की नौबत आ जाती है। आम तौर पर सत्ता और मुख्य विपक्ष में टकराव से सदन की कारवाई बाधित होती है जिससे छोटे - छोटे दलों के सांसदों को अपने क्षेत्र के मुद्दे उठाने का अवसर नहीं मिल पाता। म.प्र विधानसभा को ही लें तो पिछली बार कोई भी सत्र पूरी अवधि तक कब चला, ये शायद ही कोई बता पायेगा। संसद के भी अनेक सत्र  बिना कोई विधायी कामकाज किये ही पूरे हो गये और मौजूदा सत्र भी उसी ओर बढ़ता दिख रहा है। इस स्थिति के लिए दोनों पक्ष एक दूसरे को कसूरवार ठहराते हैं लेकिन सही बात ये है कि संसदीय प्रणाली के महत्व को कम करने में दोनों पक्षों का बराबर दोष है। सत्ता पक्ष को लगता है सदन जितना कम चले उतना उसके लिए हितकर है क्योंकि  सदन स्थगित रहने से वह संवेदनशील मुद्दों पर जवाबदेही से बचने में सफल हो जाता है। हंगामे के माहौल में प्रश्नकाल तक स्थगित होता है जबकि इसके जरिये बहुत सी ऐसी जानकारियां उजागर होती हैं जो अन्यथा लोगों तक नहीं पहुँच पातीं। प्रश्नकाल में मंत्री द्वारा दिये उत्तर पर प्रश्नकर्ता सांसद पूरक प्रश्न भी पूछ सकता है। इस अवसर के छिन जाने से सांसदों के अधिकारों का हनन होने के साथ ही प्रश्नों के उत्तर तैयार करने में लगने वाले समय और  संसाधन व्यर्थ चले जाते हैं। ये देखते हुए विपक्ष को ये सावधानी रखनी चाहिए कि प्रश्नकाल को स्थगित होने से बचाये। हालांकि  वह ये कहकर बचना चाहता है कि सदन चलाना सरकार की जिम्मेदारी है किंतु ऐसा कहने मात्र से वह अपनी भूमिका के निर्वहन से नहीं भाग  नहीं सकता। मसलन सत्र शुरू होते ही किसी   मुद्दे पर तत्काल चर्चा की जिद सत्ता पक्ष द्वारा स्वीकार नहीं किये जाने पर सदन को नहीं चलने देने की गलती विपक्ष के लिए नुकसान दायक होती है। संसद के वर्तमान सत्र में भी यही देखने मिल रहा है। सत्र शुरू होने के पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सर्वदलीय बैठक बुलाकर सत्र के सुचारु रूप से संचालन पर आम सहमति बनाते हैं। लेकिन सत्र शुरू होने पर ऐसा लगता ही नहीं कि ये लोग दो दिन पहले बैठकर सदन चलाने के लिए मीठी - मीठी बातें कर रहे थे। सदन की कार्य सूची पहले से तैयार होती है। आकस्मिक घटनाओं और मुद्दों पर ध्यानाकर्षण और स्थगन प्रस्ताव लाये जा सकते हैं। लेकिन सब काम छोड़कर तुरंत चर्चा कराये जाने की मांग पूरी नहीं होने पर सदन को न चलने देने पर सरकार से ज्यादा हानि विपक्ष की होती है क्योंकि सत्ता पक्ष के पास तो अपनी बात रखने  के तमाम साधन हैं जबकि विपक्ष के लिए संसद और विधानसभा ही  हैं जहाँ से वे अपनी बात  जनता तक पहुंचा सकते हैं। ये देखते हुए रणनीतिक तौर पर बेहतर होगा कि विपक्ष सदन को बाधित करने की गलती से बचे। वैसे भी व्यवधान के दौरान  सरकार अपनी जरूरत के विधेयकों को पारित करवा ही लेती है किंतु विपक्ष उन पर अपनी राय रखने से वंचित रह जाता है। संसदीय प्रणाली की खूबसूरती सदन में होने वाली बहस में से ही उभरकर सामने आती है। देश की छवि भी इस बात से बनती है कि देश और जनता से जुड़े मुद्दों पर सत्ता और विपक्ष की सोच क्या है?  वर्तमान परिदृश्य इस लिहाज से निराश करने वाला है क्योंकि संसद और विधानसभाओं में ऐसे प्रभावशाली सदस्य कम ही हैं जिनका भाषण उनके विरोधी भी ध्यान से सुना करते थे। आज देश में  विश्वास का जो संकट है उसके लिए संसदीय प्रणाली की गिरती छवि भी बड़ा कारण है। भारत में भी बांग्लादेश और नेपाल जैसी अराजकता की आशंका के पीछे संसद के भीतर होने वाले हंगामे भी हैं। जनता के मन में ये बात बैठती जा रही है कि  जनप्रतिनिधि केवल अपना और अपनों का ही भला सोचते हैं। इस अवधारणा को और प्रबल होने से रोकने के लिए संसदीय प्रणाली की पुरानी गरिमा की पुनर्स्थापना जरूरी है जिसका दायित्व किसी एक दल या नेता का न होकर सभी का है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 23 July 2026

जंतर मंतर आंदोलन पूरी तरह पेशेवर आंदोलनजीवियों के कब्जे में


 
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन का अब छात्रों से कोई लेना - देना नहीं रहा। इसे शांतिपूर्ण कहना भी हास्यास्पद है। जिस तरह शालीन बाग में धरने के पीछे अलगाववादी ताकतें सक्रिय रहीं उसी तरह किसानों के साल भर चले धरने में धीरे - धीरे खालिस्तानी अलगाववादी घुस आये जिसकी परिणिति लाल किले पर खालिस्तानी झंडा फहराने के तौर पर हुई।  यही स्थिति इस आंदोलन की है जिसमें असली छात्र कितने हैं ये जाँच का विषय है। ये बात इसलिए उठी क्योंकि प्रश्न पत्र लीक होने पर दोबारा हुई नीट परीक्षा के परिणाम घोषित होने के बाद  सफल हुए छात्र भविष्य की तैयारी में लग गए । नया शैक्षणिक सत्र प्रारंभ होने से भी अन्य छात्र प्रवेश आदि में व्यस्त  हैं। किसी राजनीतिक दल के छात्र संगठन ने भी जंतर मंतर आंदोलन से जुड़ने में रुचि नहीं दिखाई। आम आदमी पार्टी को छोड़ अन्य कोई राजनीतिक दल भी सक्रिय रूप से सामने नहीं आया। धरना स्थल पर आकर अपनी मौजूदगी की औपचारिकता जरूर अनेक नेताओं ने दिखाई किंतु 20 जुलाई को संसद भवन की तरफ बढ़ती भीड़ पूरी तरह नेतृत्वविहीन होने से अराजक हो उठी। इस तरह के आंदोलन जब भी हुए उनका नेतृत्व करने वाले आगे - आगे रहते थे। लेकिन 20 जुलाई को जंतर मंतर पर मंच लूटने वाले कथित छात्र हितैषी छू मंतर हो गए। भीड़ को संसद भवन में घुसने के लिए उकसाकर कॉकरोच जनता पार्टी के नामचीन चेहरे कहाँ रहे इसका जवाब उन्हें देना चाहिए। एक को तो बर्गर खाने के अपराध में प्रवक्ता पद से हटा दिया किंतु कुछ युवाओं ने ही पकड़कर उसके वीडियो बना लिए वरना उसे भी न हटाया जाता। कहा जा रहा है दो नेताओं को जगत प्रकाश नड्डा ने अपने निवास पर रोके रखा लेकिन पार्टी के सबसे बड़े चेहरे अभिजीत संसद जाने वाले जत्थों के अग्रिम भाग में क्यों नहीं दिखे  ? हर आंदोलन में बेगानी शादी में अब्दुल्ला बनकर कूदने वाले योगेंद्र यादव एक कोने में खड़े अपना वीडियो बनवाते रहे। मुंबई से अभिनेता नसीरुद्दीन शाह भी अपने दो बेटों को जंतर मंतर लेकर आये किंतु जब लाठीचार्ज हुआ तब वे कहां थे कोई नहीं जानता। नीले झंडों के साथ जय भीम का नारा लगाने वाली भीड़ भीम आर्मी के नेता सांसद चंद्रशेखर रावण लेकर आये थे किंतु पुलिस की कारवाई से बचने वे भी भीड़ से दूर रहे। अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसौदिया, आतिशी भी आग में पेट्रोल डालकर दूर बैठ गए। कुल मिलाकर आंदोलन को अराजक तत्वों के हाथ सौंपकर तमाम नेता पीछे रह गए। यही वजह है कि वे पिटने से भी बचे और उनके विरुद्ध कोई प्रकरण भी दर्ज नहीं हुआ।  उस घटनाक्रम के बाद जो राजनीति हो रही है उसमें न तो शिक्षा प्रणाली में सुधार की चिंता है और न ही छात्रों के हित की क्योंकि आंदोलन की कमान  पेशेवर आंदोलनजीवियों के हाथ में है जिन्हें छात्र राजनीति का धेले भर अनुभव नहीं है। कॉकरोच जनता पार्टी अभी तक आम आदमी पार्टी को छोड़कर अधिकांश दलों के लिए अछूत बनी हुई है। राहुल गाँधी द्वारा प्रधानमंत्री आवास पर दिये धरने को आप सांसद संजय सिंह और आतिशी ने जिस तरह कांग्रेस और सरकार की जुगलबंदी करार दिया उससे स्पष्ट हो गया कि विपक्ष की राजनीति आपदा में अवसर तलाशने पर केंद्रित है। गत दिवस लोकसभा में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस सांसदों के बीच हुई कहा सुनी के पीछे भी श्रेय लूटने की प्रतिस्पर्धा ही थी। यद्यपि सरकार के सामने भी संकट कम नहीं हैं। विपक्ष की रणनीति उन महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित नहीं होने देने की है जिन पर भाजपा की आगामी व्यूह रचना निर्भर है। बीते काफी समय से अन्य पार्टियों में तोड़फोड़ मचाकर भाजपा दो तिहाई बहुमत का प्रबंध करने में जुटी थी। हालांकि धर्मेंद्र प्रधान को अभी तक नहीं हटाया जाना  इस बात का संकेत है कि मोदी - शाह का आत्मविश्वास कायम है। लेकिन अंदरखाने की राजनीति का अंदाजा लगाना मुश्किल है। बात इतनी आगे बढ़ चुकी है कि किसी भी पक्ष के लिए पीछे लौटना आत्मघाती होगा। रही बात आंदोलनकारियों  की तो वे खुद भ्रमित हैं। शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र की मांग तो पूरी हुई नहीं और वे प्रधानमंत्री को हटाने की मांग कर बैठे। सोनम वांगचुक भी अनिर्णय में फंसे हुए हैं। चूंकि सरकार के विरोध में खड़ी ताकतों में समन्वय और आपसी विश्वास नहीं है इसीलिए आंदोलन गैर जिम्मेदाराना तरीके से संचालित है। रोज शाम को जंतर मंतर पर दिखाई देने वाली अराजकता इसका प्रमाण है। चीन के साम्यवादी नेता माओ त्से तुंग ने कहा था क्रांति कोई चाय पार्टी नहीं है। लेकिन जंतर मंतर पर सुबह से रात तक पार्टियां देखी जा सकती हैं। वहाँ से जो वीडियो लगातार आ रहे हैं उनसे अनेक चेहरों के नकाब उतर चुके हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी