अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प चीन यात्रा से खाली हाथ लौट आए। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई बातचीत के कोई ठोस परिणाम नहीं निकले। खाड़ी युद्ध से उत्पन्न परिस्थितियों में चीन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि ईरान की पीठ पर उसी का हाथ है। यद्यपि रूस भी ईरान के साथ खड़ा है किंतु यूक्रेन के साथ लंबी लड़ाई में उलझने की वजह से वह चाहकर भी समुचित सहायता ईरान को नहीं दे पा रहा। दूसरी तरफ चीन ने इस बात को समझ लिया है कि वेनेजुएला के बाद यदि ईरान का तेल व्यापार भी अमेरिका के नियंत्रण में आ गया तो वह ऊर्जा संकट में फंस जाएगा क्योंकि अमेरिका समर्थक तेल उत्पादक देश चीन को पेट्रोल - डीजल देने से इंकार कर सकते हैं। जिनपिंग ने इसीलिए ईरान को हरसंभव सहायता दी जिसके बलबूते वह अमेरिका के सामने झुकने भी तैयार नहीं हो रहा। ट्रम्प को उम्मीद थी कि व्यापार समझौतों का लॉलीपॉप दिखाकर वे चीन को इस बात के लिए मना लेंगे कि वह होर्मुज से जहाजों की आवाजाही खोलने के लिए ईरान पर दबाव डाले। लेकिन जिनपिंग ने ईरान संबंधी कोई आश्वासन तो दिया नहीं उल्टे ये धमकी दे डाली कि अमेरिका ताईवान के मामले में टांग अड़ाने से बाज आए। उल्लेखनीय है जिनपिंग वन चाइना नीति के अंतर्गत ताईवान को चीन में मिलाने के लिए प्रयासरत हैं । लेकिन अमेरिका के खुले संरक्षण के अलावा जापान , ऑस्ट्रेलिया सहित दक्षिण एशिया के अनेक देश इसके विरोध में हैं। इसीलिए चीन सैन्य कार्रवाई से तो परहेज करता आ रहा है परन्तु रूस द्वारा यूक्रेन और अमेरिका द्वारा वेनेजुएला हड़पने के साथ ही ग्रीनलैंड पर दावा ठोकने के बाद ईरान पर हमला कर देने से उसका हौसला मजबूत हुआ है। इसमें दो राय नहीं कि ताईवान है तो चीन का ही हिस्सा। 1949 में साम्यवादी क्रान्ति के बाद वहां के शासक चांग काई शेक भागकर फ़ार्मोसा नामक द्वीप पर चले गए। यही ताईवान कहलाया जिसे संरासंघ में चीन के तौर पर मान्यता मिलने के साथ ही वीटो का अधिकार भी मिला। कालांतर में अमेरिका ने साम्यवादी चीन से ताल्लुकात बढ़ाकर उसे चीन के तौर पर मान्यता देते हुए संरासंघ की सदस्यता के साथ ही सुरक्षा परिषद में वीटो भी दिलवा दिया। यद्यपि ताईवान के स्वतंत्र अस्तित्व को बनाए रखने के लिए उसने उसे आर्थिक और सैन्य संरक्षण देने की नीति जारी रखी। लेकिन चीन की यात्रा से लौटकर ट्रम्प का ये बयान अमेरिका के यूटर्न का प्रमाण है कि ताईवान की आजादी के लिए अमेरिका 15 हजार कि.मी लड़ने नहीं आयेगा। समझने वाली बात ये है कि क्या ट्रम्प ने जिनपिंग को खुश करने ऐसा बयान दिया या फिर ईरान युद्ध के कड़वे अनुभवों ने उनको ऐसा कहने मजबूर किया? कूटनीतिक मामलों में असलियत पर पर्दे पड़े होने से सच्चाई का पता चलना कठिन होता है किंतु उसी के साथ एक तरफ ट्रम्प ने ईरान द्वारा होर्मुज समुद्री मार्ग नहीं खोलने पर दोबारा हमले की धमकी दे डाली। लेकिन सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात है ट्रम्प द्वारा क्यूबा पर भी वेनेजुएला जैसी कार्रवाई करने की धमकी। उल्लेखनीय है दक्षिण अमेरिका में केवल क्यूबा ही वह देश है जिस पर अमेरिका अपनी मर्जी का शासक नहीं बिठा सका। फ़िडेल कास्ट्रो को हटाने या मारने की उसकी कोशिशें बेकार गईं। एक बार तो क्यूबा को लेकर अमेरिका और रूस आमने - सामने आ गए थे। कास्ट्रो के न रहने के बाद अमेरिका अपनी चिर संचित इच्छा पूरी करना चाह रहा है। वेनेजुएला में बिना रोक - टोक सफल होने के बाद उसे लग रहा है क्यूबा में भी वैसी ही कार्रवाई कर वह अपना रुतबा बढ़ा लेगा। रूस अपनी झंझटों और चीन दूरी के चलते शायद इसमें हस्तक्षेप न करे किंतु ईरान युद्ध के समाप्त होने के पहले यदि ट्रम्प क्यूबा का मोर्चा भी खोलते हैं तब ये लघु विश्व युद्ध का रूप ले सकता है क्योंकि युद्ध क्षेत्र का विस्तार कई महाद्वीपों में हो जाएगा।ऐसे में सवाल ये है कि क्या विश्व जनमत ट्रम्प को क्यूबा हड़पने की छूट देगा? ये भी हो सकता है अमेरिका ने ताईवान पर चीन की संभावित कार्रवाई के विरुद्ध मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए ये पैंतरा चला हो। हकीकत जो भी हो किंतु ट्रम्प की चीन यात्रा बेनतीजा खत्म होने से प. एशिया के साथ ही दुनिया भर में चल रहे संघर्षों के खत्म होने की उम्मीद धूमिल हो चली है। ट्रम्प के बाद रूसी राष्ट्रपति पुतिन भी चीन जा रहे हैं। जाहिर है अमेरिका विरोधी दोनों दिग्गजों के बीच होर्मुज में यातायात शुरू करवाने के अलावा क्यूबा संबंधी बात भी हो। फिलहाल तो भारी अनिश्चितता है। हालांकि एक बात जरूर स्पष्ट है कि ट्रम्प अब खिसियाहट की स्थिति में आ चुके हैं और ऐसे में वे कोई ऐसी मूर्खता कर बैठें तो आश्चर्य नहीं होगा जिसके कारण पूरे विश्व में युद्ध की आग फैल जाए।
- रवीन्द्र वाजपेयी