गत दिवस गुजरात में स्थानीय निकायों के जो चुनाव परिणाम घोषित हुए उनमें सत्तारूढ़ भाजपा ने जबरदस्त सफलता हासिल करते हुए सभी नगर निगमों पर अपना आधिपत्य बनाए रखा, वहीं नगर पालिकाओं और जिला‑तालुका पंचायतों में भी उसे भारी बहुमत मिला। पार्टी ने 84 में से 78 नगर पालिकाएं जीत लीं जबकि कांग्रेस को 6 में ही सफलता मिली। जिला पंचायत स्तर पर भी भाजपा ने दमदार प्रदर्शन करते हुए 34 में से 33 जिला पंचायतें कब्जा लीं। साथ ही तालुका पंचायतों में उसे कुल 260 में से 253 पर विजय मिली जबकि शेष सीटें कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के खाते में गईं। एकमात्र जिला पंचायत नर्मदा ही भाजपा के हाथ से फिसली जहां आम आदमी पार्टी ने 22 में से 15 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया। आम तौर पर किसी राज्य में विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद होने वाले स्थानीय निकायों के चुनाव परिणाम सत्ताधारी दल के पक्ष में ही जाते हैं। लेकिन गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव ऐसे समय हुए जब भाजपा की राज्य सरकार का लगभग तीन चौथाई कार्यकाल पूर्ण हो चुका है और सभी पार्टियां 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव की रणनीति बनाने में जुटी हुई हैं। बावजूद इसके भाजपा ने अपना दबदबा बरकरार रखा जिससे सरकार के साथ ही पार्टी संगठन की भी मजबूत पकड़ साबित होती है। स्मरणीय है 2022 में संपन्न विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 182 सीटों में 156 जीतकर कीर्तिमान स्थापित किया वहीं कांग्रेस अपने सबसे खराब प्रदर्शन के चलते मात्र 17 सीटों पर ही सिमट गई जबकि तीसरी ताकत बनकर मैदान में उतरी अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के मुफ्त बिजली जैसे वायदे भी भाजपा की सुनामी के सामने टिक नहीं सके। हालांकि 5 सीटें जीतकर उसने अपना खाता जरूर खोल दिया। कांग्रेस के दयनीय प्रदर्शन का एक कारण आम आदमी की मौजूदगी भी थी जिसने भाजपा विरोधी मतों में बंटवारा करते हुए कांग्रेस की लुटिया डुबो दी। उस प्रदर्शन से उत्साहित आम आदमी पार्टी ने अपनी सक्रियता काफी बढ़ाई। खुद श्री केजरीवाल भी गुजरात पर काफी ध्यान देते रहे। पार्टी का मानना है कि कांग्रेस के कमजोर होते जाने से गुजरात में जो शून्य उत्पन्न हो गया है उसे भरकर वह बतौर विकल्प स्थापित हो सकती है। इसीलिए आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर इन स्थानीय निकाय चुनावों को सेमी फाइनल मुकाबला माना जा रहा था। विपक्षी दल चाहते तो भाजपा के समक्ष कड़ी चुनौती पेश कर सकते थे किंतु चुनाव परिणामों ने भाजपा को अजेय सिद्ध कर दिया । जहां तक बात कांग्रेस की है तो स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक पार्टी की दिशा और दशा दोनों ही चिंताजनक हैं। लेकिन राष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर धूमकेतु की तरह से उभरी आम आदमी पार्टी ने गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव में जैसा लचर प्रदर्शन किया उससे लगता है दिल्ली विधानसभा चुनाव में पराजित होने के बाद पार्टी का हौसला टूटने लगा है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि मतदान के पहले ही पार्टी के 7 राज्यसभा सदस्यों के भाजपा में चले जाने से गुजरात का कैडर तो निराश हुआ ही , आम जनता को भी लगा कि वह डूबता जहाज है, लिहाजा उसे समर्थन देना अपना मत बेकार करना है। इन चुनाव परिणामों से भाजपा के उत्साह में वृद्धि स्वाभाविक है। ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह अपने गृह राज्य की बजाय प. बंगाल के महासमर में व्यस्त रहे तब भाजपा ने स्थानीय नेतृत्व के बलबूते जो सफलता हासिल की वह प्रशंसनीय है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने स्थानीय निकाय चुनावों में अपने प्रदर्शन से अपने समर्थकों को तो निराश किया ही गुजरात में वैकल्पिक राजनीति की संभावनाओं पर भी विराम लगा दिया। आम आदमी पार्टी के लिए जमीनी स्तर पर अपना कैडर स्थापित करने के लिए ये स्थानीय चुनाव सुनहरा मौका था जिसमें वह चूक गई। रही बात कांग्रेस की तो ऐसा लगता है वह हारने की आदी हो चली है। इन चुनावों की चौंकाने वाली बात है भुज में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के कुछ पार्षदों का जीतना जो इस बात का संकेत है कि मुस्लिम मतदाताओं का मन भी कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों से उचटने लगा है। गुजरात में आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा जहां दोगुने उत्साह से उतरेगी वहीं कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के सामने अपने अस्तित्व को बचाए रखने की चुनौती होगी।
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- रवीन्द्र वाजपेयी