मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस : संपादकीय
- रवीन्द्र वाजपेयी
शांति समझौते का भविष्य इसराइल के रुख पर निर्भर
अब ये मानकर चला जा सकता है कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता हस्ताक्षरित होने जा रहा है। उसके प्रारूप पर दोनों देशों की ओर से हस्ताक्षर किये जाने के बाद रविवार को स्विटजरलैंड के जिनेवा शहर में उसे अंतिम रूप दिया जाएगा। रोचक बात है कि इस समझौते के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ के साथ ही चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ आसिफ मुनीर ने काफी दौड़ भाग की। इस्लामाबाद में दोनों पक्षों के बीच वार्ताएं भी हुईं किंतु जब समझौते को अंतिम रूप देने का अवसर आया तब पाकिस्तान की राजधानी को ठेंगा दिखाते हुए अमेरिका और ईरान ने जिनेवा पसंद किया। इससे लगता है कि पाकिस्तान की भूमिका संदेश वाहक तक ही सीमित रही। बहरहाल अब समझौते को अंतिम रूप दिया जा चुका है तब इस बात का विश्लेषण होने लगा है कि किसने क्या खोया क्या पाया? जो विवरण आया है उसके मुताबिक जो मुख्य बातें हैं उनमें ईरान द्वारा होर्मुज जलमार्ग को खोलना और अमेरिका द्वारा ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी खत्म करना है। इसके अलावा ईरान के पुनर्निर्माण हेतु अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान को 300 अरब डॉलर देंगे। ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगने के बारे अन्तिम फैसले हेतु 60 दिन की समय सीमा निर्धारित किये जाने से लगता है अमेरिका और ईरान दोनों इस बेनतीजा जंग से ऊब चुके हैं और किसी तरह से अपना पिंड छुड़ाना चाहते हैं। लेकिन इस युद्ध के लिए अमेरिका को मनाने वाले इसराइल का रुख दूध में नींबू निचोड़ने वाला है। उसने साफ - साफ कह दिया है कि वह इस समझौते से पूरी तरह दूर रहेगा और लेबनान पर उसके हमले नहीं रुकेंगे। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की धौंस भी बेअसर साबित हुई। पहले तो ईरान भी इस बात पर अड़ा हुआ था कि लेबनान पर इसराइल की सैन्य कारवाई रुके बिना समझौते की गाड़ी आगे नहीं बढ़ेगी। लेकिन ऐसा लगता है तीन महीने से चली आ रही जंग ने उसके हौसले भी कमजोर कर दिये। हालांकि ऊपरी तौर पर वह अपने को बेहद मजबूत दिखाता है लेकिन अमेरिका और इसराइल की मिसाइलों से समूचा देश खंडहर में तब्दील हो चुका है। जनता भी बेतहाशा महंगाई और दैनिक उपयोग की वस्तुओं के अभाव से आक्रोशित है। मूलभूत ढांचा बुरी तरह चरमरा जाने से सर्वत्र अव्यवस्था है। ऐसे में ईरान के नेतृत्व को ये डर लगने लगा कि अवसर का लाभ उठाकर अमेरिका कहीं सत्ता परिवर्तन न करवा दे जो इस युद्ध के सबसे प्रमुख उद्देश्यों में था। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि अमेरिका और ईरान पर उनके समर्थक देशों का दबाव भी युद्धविराम के लिए बढ़ता जा रहा था। तेल उत्पादक देशों की बिक्री रुक जाने से उनकी अर्थव्यवस्था का भी कचूमर निकलने लगा था। ये देश अमेरिका पर जंग रुकवाकर हालात सामान्य करने का आग्रह कर रहे थे वहीं चीन जैसे ईरान के संरक्षक भी उसे सलाह दे रहे थे कि जैसे भी हो युद्ध रोकने का रास्ता निकाला जाए क्योंकि उनको भी तेल संकट की चिंता सताने लगी थी। इस प्रकार एक दूसरे को बर्बाद करने पर आमादा अमेरिका और ईरान ने न चाहते हुए भी ऐसे समझौते को स्वीकार करने का मन बना लिया जिसकी सफलता को लेकर वे खुद भी आश्वस्त नहीं हैं। इसराइल द्वारा अमेरिका की बात न मानना निश्चित रूप से चौंकाता है किंतु एक संभावना ये भी है कि ऐसा करने के लिए उसे डोनाल्ड ट्रम्प ने ही उकसाया हो 2। प. एशिया में इसराइल और अमेरिका की जुगलबंदी से इस तरह के कूटनीतिक दाँव - पेच नये नहीं हैं। इस प्रकार इस समझौते की सफलता इसराइल के रुख पर निर्भर करेगी क्योंकि उसने लेबनान पर हमले नहीं रोके तब ईरान भी उसके बचाव में कूदे बिना नहीं रहेगा। और ऐसा होने पर युद्ध ईरान विरुद्ध इसराइल की शक्ल ले लेगा जिसमें अमेरिका किसके साथ रहेगा ये बताने की जरूरत नहीं है। पूरी दुनिया इस समझौते के बाद तेल संकट के हल होने की जो उम्मीद लगा रही है वह आसानी से पूरी होने में संदेह ही है क्योंकि ईरान इतनी आसानी से चीजें अपने हाथ से निकलने नहीं देगा। यही बात इसराइल पर भी लागू होती है क्योंकि वह उस ईरान को कभी भी चैन से नहीं रहने देना चाहेगा जो उसे मिटाने पर आमादा हो।
- रवीन्द्र वाजपेयी