Friday, 10 July 2026

एथेनॉल मिले पेट्रोल के दाम भी कम होना चाहिए



इन दिनों पेट्रोल में एथेनॉल मिलाए जाने का मामला सुर्खियों में है। पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल (E20) के मिश्रण की योजना सरकार द्वारा पर्यावरण संरक्षण और विदेशी मुद्रा बचाने के लिए लागू की गई  है । इसके अंतर्गत अधिकांश पेट्रोल पंपों पर अब 20 फीसदी एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल ही उपलब्ध है। पर्यावरण संरक्षण और आयात खर्च घटाने के अलावा पेट्रोल में एथेनॉल के मिश्रण को किसानों की आय बढ़ाने का साधन भी बताया जा रहा है। सतही तौर पर तो ये देशहित में  प्रतीत होता है किंतु इसके साथ ही कुछ विवाद भी उठ खड़े हुए हैं । केंद्र सरकार के परिवहन मंत्री नितिन गडकरी  पर आरोप  है कि उन्होंने अपने बेटे को आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिए पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिलाने का फैसला करवाया जिसकी फैक्टरी  में इसका उत्पादन होता है। ये भी कहा जा रहा है कि एथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में ऊर्जा थोड़ी कम होती है, जिसके कारण वाहनों की माइलेज में लगभग 2 से 6 प्रतिशत तक की कमी आ जाती है। साथ ही यदि वाहन एथेनॉल  के अनुकूल नहीं है (विशेषकर पुरानी गाड़ियां), तो इंजन के  फ्यूल पाइप या पंप में जंग लगने की शिकायत आ सकती है। दूसरी तरफ ये दावा भी किया जा रहा है कि बीते कुछ वर्षों में बनी अधिकांश गाड़ियां पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिश्रण के लिए पूरी तरह सक्षम हैं।। साथ ही जो वाहन चालक एथेनॉल रहित पेट्रोल उपयोग करना चाहते हैं वे प्रीमियम पेट्रोल का विकल्प चुन सकते हैं, जिनमें एथेनॉल की मात्रा न के बराबर या बहुत कम होती है। दुनिया के अनेक देशों में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का चलन बढ़ रहा है। लेकिन  उन्होंने उसके अनुकूल वाहनों का उत्पादन करने के बाद ही इस दिशा में कदम बढ़ाये। लेकिन भारत में निर्धारित समय  से पहले ही उसे लागू करने के कारण सवाल उठ खड़े हुए। इसे लेकर केंद्र सरकार पर नीतिगत हमलों से ज्यादा श्री गडकरी पर व्यक्तिगत निशाने साधे जा रहे हैं। इसका कारण उनके परिवार का एथेनॉल उत्पादन से जुड़ा होना है ।  उनकी चुप्पी पर भी सवाल उठने लगे। इसे भाजपा के भीतर चल रही खेमेबाजी से भी जोड़कर देखा जाने लगा। ये अटकलें भी लगने लगीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा निकट भविष्य में अपने मंत्रीमंडल में किये जाने वाले फेरबदल में श्री गडकरी को बाहर का रास्ता भी दिखाया जा सकता है। यद्यपि ऐसा होना काफी कठिन है क्योंकि एक तो उन्हें रास्वसंघ की पसंद माना  जाता है और दूसरा ये कि मोदी सरकार की विकास मूलक छवि के निर्माण में परिवहन मंत्रालय का प्रमुख योगदान है। आज देश में सड़कों विशेष रूप से राजमार्गों और एक्सप्रेस हाइवे का जो जाल बिछा है उसका श्रेय श्री गडकरी के खाते में ही दर्ज होता है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि उनकी लोकप्रियता दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर है। ऐसे में उनकी घेराबंदी से सरकार भी दबाव में आ रही थी। संभवतः यही देखकर वे सामने  आये और  पेट्रोल में एथेनॉल के मिश्रण से निजी लाभ के आरोप का खंडन करते हुए स्पष्ट किया कि उसके उत्पादन में उनके बेटे की इकाई की हिस्सेदारी महज 0.07 प्रतिशत तक ही सीमित है। इसके साथ ही उन्होंने एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से वाहनों के इंजिन को होने वाले नुकसान के प्रचार को निराधार बताते हुए चुनौती दी कि जिस किसी के वाहन को क्षति पहुंची हो वह आकर बताये। अब, कितने लोग अपनी शिकायतें लेकर मंत्री जी तक पहुँचेगे ये तो भविष्य ही बताएगा किंतु कांग्रेस के प्रवक्ता तहसीन पूनावाला ने श्री गडकरी द्वारा निजी फायदा न होने के दावे  पर पलटवार करते हुए कहा कि 0.07 प्रतिशत हिस्सेदारी से भी 50 से 100 करोड़ आय हो सकती है। खैर, राजनीति अपनी जगह है लेकिन एथेनॉल को लेकर जो संदेह आम उपभोक्ता के मन में है उसे दूर करना जरूरी है। विदेशी  मुद्रा की बचत के अलावा पर्यावरण को होने वाले नुकसान को रोकने में जनता पूर्णतः सरकार के साथ है किंतु अपने वाहन को नुकसान हो ये किसी को स्वीकार नहीं होगा। इसके अलावा चूंकि एथेनॉल अपेक्षाकृत सस्ता है लिहाजा उसको मिलाने के बाद पेट्रोल के दाम भी उसी अनुपात में कम किये जाने जरूरी हैं। बेहतर हो केन्द्र सरकार पूरे प्रकरण पर विस्तारपूर्वक आलोचनाओं का बिंदुवार जवाब दे जिससे कि भ्रांति दूर की जा सके। ये बात भी स्पष्ट होनी चाहिए कि  एथेनॉल का उपयोग निर्धारित समय सीमा से पहले करने का कारण क्या है ? हालांकि इस बारे में डॉ. मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में पेट्रोलियम मंत्री रहे मणिशंकर अय्यर द्वारा संसद में दिये जा रहे वक्तव्य का वीडियो भी काफी प्रसारित हो रहा है जिसमें वे पेट्रोल में एथेनॉल मिलाये जाने की तरफदारी करते सुने जा सकते हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 9 July 2026

अच्छा हुआ भारत ने अमेरिका - ईरान के झगड़े से खुद को दूर रखा

मेरिका और ईरान के बीच लड़ाई रुकवाने के लिए पाकिस्तान  की कूटनीतिक पहल पर जब  विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर से पूछा गया कि भारत इस मामले में क्यों पीछे रहा तब उन्होंने उत्तर दिया था कि हम दलाली नहीं करते। उसके बाद मोदी सरकार के पेशेवर  विरोधियों ने पाकिस्तान की शान में कसीदे पढ़ते हुए भारतीय विदेश नीति की  आलोचना का अभियान छेड़ दिया। विदेश मंत्री की दलाली वाली टिप्पणी का मखौल उड़ाने में भी  कोई कसर नहीं छोड़ी गई। इसके लिए भी सरकार को कठघरे में खड़ा किया गया कि उसने खामेनेई की हत्या की  निंदा करने में विलंब किया और बजाय  शीर्ष स्तर पर बयान जारी करने के विदेश सचिव को ईरानी दूतावास भेजकर शोक संदेश सौंपा। जब अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि बातचीत हेतु पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में जमा हुए और अंतरिम युद्धविराम पर सहमति बनी तब भी भारतीय विदेश नीति पर  निशाने साधे गए और  पाकिस्तान की अमेरिका और ईरान से नजदीकी बढ़ने को भारत के लिए खतरा बताया जाने लगा। हालांकि जब अंतिम रूप से युद्धविराम हुआ तब भले ही उस पर हस्ताक्षर पाकिस्तान में नहीं हुए किंतु जब उसे इस्लामाबाद समझौता कहा गया तब सरकार विरोधी प्रचारतंत्र को एक मौका और मिल गया। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री श्री जयशंकर  तमाम आलोचनाओं का उत्तर देने के बजाय संयमित बयानों तक ही सीमित रहे और पूरा ध्यान कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति जारी रहने पर केंद्रित रखा। उसका लाभ ये हुआ कि युद्ध रुकते ही भारत ने ईरान सहित  अन्य तेल उत्पादक देशों से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदकर देश को ऊर्जा संकट से बचाये रखा। यह भी  संज्ञान योग्य है कि युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद पाकिस्तान को किनारे कर दिया गया। वहीं फ्रांस में हुए जी - 7 सम्मेलन में  राष्ट्रपति ट्रम्प ने  श्री मोदी की प्रशंसा करते हुए भारत के महत्व को स्वीकार किया।   युद्धविराम के बाद भी अमेरिका, ईरान और इजरायल तीनों के बीच  धमकियों के आदान -  प्रदान के अलावा बीच - बीच में आक्रमण और प्रत्याक्रमण का दौर भी चलता  रहा। होर्मुज पर कब्जे को लेकर ईरान की हेकड़ी और ट्रम्प की धमकियां भी नहीं रुकीं। बीते कुछ दिनों में खामेनेई के अंतिम संस्कार के लिए दुनिया भर से कूटनीतिक हस्तियां ईरान में जमा थीं। उसी दौरान ईरान ने होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर मिसाइलें छोड़ कर भड़काऊ कारवाई कर दी जिसके बाद ट्रम्प ने युद्धविराम खत्म कर ईरान में दर्जनों ठिकानों पर बमबारी करवा डाली।  जिसने शांति की संभावना पर  पानी फेर दिया। आश्चर्य ये है कि खुद को कूटनीति का उस्ताद समझ बैठे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उनके फील्ड मार्शल आसिफ मुनीर  युद्धविराम के टूटने पर असहाय  बैठे हैं । ये देखने के बाद इस विवाद में भारत द्वारा अपने को निर्लिप्त रखने की नीति का औचित्य स्वतः ही सिद्ध हो गया। सही बात ये है कि अमेरिका ने पाकिस्तान को ईरान से संवाद स्थपित करने के लिए बतौर औजार उपयोग किया। यदि वाकई  उसकी वजनदारी इतनी होती तब दोनों पक्षों के बीच संवाद सेतु की भूमिका निभाते हुए दोबारा तनाव पैदा होने ही नहीं देता।   वैश्विक राजनीति के मौजूदा समीकरणों को देखते हुए इस युद्धविराम की सफलता शुरू से ही संदिग्ध रही। डोनाल्ड ट्रम्प तो अविश्वसनीयता के जीते - जागते प्रतीक हैं ही किंतु ईरान के नेताओं में भी वह गंभीरता नहीं है जो ऐसे अवसरों पर अपेक्षित होती है। इसीलिए ये कहना गलत नहीं है कि भारत ने इन दोनों के बीच सुलह कराने की कोशिश से खुद को दूर रखकर बुद्धिमत्ता दिखाई। जहाँ तक पाकिस्तान का सवाल है तो जो देश अपने पड़ोसी अफ़ग़ानिस्तान के साथ लड़ाई नहीं रोक पा रहा वह अमेरिका और ईरान जैसे बड़े देशों की जंग रुकवा देगा ये सोचना भी बेकार है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 8 July 2026

सैन्य महाशक्ति बनने की दिशा में एक और कदम




भारत केवल सोने और कच्चे तेल का ही सबसे बड़ा आयातक नहीं बल्कि विदेशी हथियारों के सबसे बड़े खरीददारों में से भी है। अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन  स्वीडन और इजराइल आदि देशों से हम अस्त्र - शस्त्र, खरीदते रहे हैं।  तोप, लड़ाकू विमान, पनडुब्बी आदि का निर्माण भारत में होने के बावजूद उनमें लगने वाले कल - पुर्जों के लिए विदेशों पर निर्भरता खत्म नहीं हो सकी ।  इस वजह से इनके उत्पादन में विलंब होता आया है। मोदी सरकार ने इसीलिए टेक्नालाजी ट्रांसफर पर जोर देना शुरू किया जिसके अनुकूल परिणाम भी मिलने लगे हैं। इसके साथ ही रक्षा उत्पादन के क्षेत्र को सरकारी एकाधिकार से निकालकर  निजी क्षेत्र को उसमें हिस्सेदारी देने जैसा बहुप्रतीक्षित और साहसिक कदम भी उठाया गया है । यद्यपि निजीकरण के विरोध के नाम पर इस फैसले पर भी उंगलियाँ उठीं। विशेष रूप से ये आपत्ति की गई कि निजी उद्योगों को रक्षा उत्पादन का समुचित तजुर्बा नहीं है। लेकिन बीते कुछ सालों में जो अनुभव आया उसने सरकार के निर्णय के औचित्य पर मुहर लगाते हुए आलोचकों के मुँह बंद कर दिये। सबसे बड़ी बात ये हुई कि भारत ने अपने रक्षा सौदों को एक - दो देशों तक सीमित न रखते हुए राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी और बिना दबाव के उन्हें अंतिम रूप दिया। विपक्ष खास तौर पर कांग्रेस ने इन सौदों पर प्रधानमंत्री को घेरने का हरसंभव प्रयास किया । 2019 के लोकसभा चुनाव में राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री को घेरने के लिए चौकीदार चोर है जैसा नारा बुलंद किया किंतु जनता ने उसे अनसुना करते हुए उनको पहले से अधिक सीटें देकर उनकी नीतियों का अनुमोदन कर दिया। जिसके बाद केंद्र सरकार का उत्साह और बढ़ा जिसके चलते उसने रक्षा सौदों के मामले में तेजी से निर्णय लेते हुए सेनाओं को अस्त्र - शस्त्रों से सुसज्जित करने का अभियान छेड़ा। 2014 में जब ये सरकार सत्ता में आई तब हमारी सेनाएं उनकी कमी से जूझ रही थीं जिसकी जानकारी सार्वजनिक होने से जनता का मनोबल गिरने लगा । लेकिन अब स्थितियाँ बदल गईं हैं। सर्जिकल स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमारी सैन्य शक्ति की क्षमता और श्रेष्ठता पूरी दुनिया के सामने प्रमाणित हो गई। विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की महत्वाकांक्षा पूरी होने के लिए जरूरी है हम सैन्य शक्ति के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर बनें। और उससे भी बढ़कर ये कि रक्षा उत्पादन में विदेशों पर हमारी निर्भरता घटने के बाद हम अपने अस्त्र - शस्त्रों का निर्यात कर सही मायनों में महाशक्ति बनें। गौरव का विषय है कि भारत ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिये हैं। वियतनाम के बाद अब इंडिनेशिया ने भी भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने का सौदा किया जिस पर उसकी राजधानी  जकार्ता में गत दिवस प्रधानमंत्री श्री मोदी ने  वहाँ के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के साथ हस्ताक्षर किये। इसके अलावा अन्य क्षेत्रों में व्यापारिक भागीदारी को लेकर भी अनेक समझौते किये गए जिनमें धरती से अंतरिक्ष तक चलने वाली अनेकानेक गतिविधियाँ शामिल हैं। लेकिन प्रधानमंत्री ने इंडोनेशिया के सबाँग बंदरगाह को विकसित करने का जो समझौता किया वह मलक्का जल डमरूमध्य में भारत की उपस्थिति को मजबूती प्रदान करने वाला है जिससे इस क्षेत्र के समुद्र में चीन के बढ़ते दबदबे को चुनौती दी जा सकेगी। उल्लेखनीय है दक्षिण एशिया के तमाम छोटे - छोटे देश चीन की विस्तारवादी नीतियों से भयभीत होकर भारत के साथ जुड़ना चाह रहे हैं। वियतनाम के बाद इंडिनेशिया के साथ हुए समझौते इसके प्रमाण हैं। जाहिर है भारत अब एक क्षेत्रीय महाशक्ति के तौर पर खुद को स्थापित करने में सफल हो रहा है। प्रधानमंत्री की ये यात्रा इस दिशा में बढ़ाया गया बड़ा कदम है। सबाँग बंदरगाह के विकास का अनुबंध चीन की उस चाल का सटीक जवाब है जो उसने हाल ही में बांग्लादेश के एक बंदरगाह को हथियाकर चली थी। पहले ये सौदा भारत के साथ होना था। इस प्रकार इंडोनेशिया की इस यात्रा से श्री मोदी ने एक साथ कई लक्ष्य साधे। मौजूदा वैश्विक हालातों में भारत की ये उल्लेखनीय सफलता है जिसका असर  निकट भविष्य में महसूस होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 7 July 2026

बर्फ़ानी बाबा के लिए खतरा बना आस्था का अतिरेक


जम्मू कश्मीर स्थित अमरनाथ की पवित्र गुफा में स्वनिर्मित बर्फ के शिवलिंग का दर्शन करने लाखों श्रृद्धालु प्रतिवर्ष आते हैं। दुर्गम रास्तों से होते हुए वहाँ पहुँचने का सफर मुश्किल  होने के बाद भी आस्था के वशीभूत देश - विदेश से सनातनी परंपरा के अनुगामी शिव भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है। पहले पहलगाम से चंदनबाड़ी होते हुए अमरनाथ पहुंचा जाता था, जिसमें तीन दिन लगते थे। लेकिन अब बालटाल से  दूसरा मार्ग  खुल जाने से यात्रा की अवधि कम हो गई है। यात्रियों के लिए पूरे रास्ते में निःशुल्क भोजन का प्रबंध भंडारों के रूप में होता है। यह यात्रा कश्मीर घाटी के मुस्लिम वॅाशिंदों के लिए आय का बड़ा साधन है क्योंकि अमरनाथ आने वाले यात्रियों का बड़ा वर्ग कश्मीर में अन्य स्थानों का भ्रमण भी करता है जिसके कारण वहाँ पर्यटन उद्योग भी फलता - फूलता है। यद्यपि आतंकवाद के दौर  में घाटी का पर्यटन बहुत कम हो गया था किंतु अमरनाथ यात्रा का उत्साह लगातार बढ़ता रहा जो आतंकवाद की प्रतिक्रिया थी। धारा 370 हटने के बाद घाटी के हालात सुधरे तब इस यात्रा का आकर्षण और बढ़ा। पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद श्रृद्धालुओं में नये सिरे से जोश दिखाई देने लगा। इस साल गर्मियों में जम्मू कश्मीर में पर्यटकों की संख्या ने भी पुराने कीर्तिमान तोड़ दिये। इसीलिए उम्मीद की जा रही है कि इस वर्ष अमरनाथ यात्रा में श्रृद्धालुओं की बाढ़ आ जायेगी। यद्यपि कश्मीर घाटी से आतंकवाद की विदाई हो चुकी है किंतु उसके कुछ बीज अभी भी अंकुरित हो जाते हैं। यही कारण है कि यात्रा मार्ग पर सुरक्षा व्यवस्था का दायित्व  सेना को सौंपा जाता है। लेकिन इस सबसे अलग हटकर जिस पहलू पर लोगों का ध्यान नहीं जाता वह है इस यात्रा से अमरनाथ के पर्यणवरण पर पड़ने वाला प्रभाव। 3 जुलाई से  अमरनाथ यात्रा शुरू होते ही मात्र चार दिनों में लगभग 60 हजार यात्री अमरनाथ की यात्रा कर चुके हैं। 57 दिनों तक चलने वाली इस यात्रा हेतु 4 लाख लोगों का पंजीयन हो चुका है। लेकिन श्रृद्धालुओं को निराश करने वाली खबर ये है कि पवित्र गुफा में बनने वाला पवित्र हिम शिवलिंग तेजी से पिघलकर  करीब एक फीट का रह गया है । जबकि मई माह में इसकी ऊंचाई लगभग 7 फीट और  पहली पूजा के समय  5 फीट से अधिक थी। यदि यही स्थिति रही और पर्यटकों की भीड़ निरंतर बढ़ती गई तब आने वाले दिनों में गुफा के भीतर शिवलिंग आकार ही नहीं लेगा। उल्लेखनीय है अमरनाथ में बढ़ती भीड़ के कारण प्राकृतिक विपदाएं भी आने लगी हैं। इस साल वहाँ हेलीकाप्टर सेवा रोकने का कारण भी पर्यावरण को होने वाले नुकसान को रोकना ही है। सोचने वाली बात ये है कि श्रृद्धालु जिस प्रकृति निर्मित पवित्र शिवलिंग के दर्शन हेतु तरह - तरह के कष्ट सहने के साथ ही समय और पैसा खर्च करते हुए आता है, वही उसे न दिखे तो निराशा और दुःख होना स्वाभाविक है। हालांकि अमरनाथ के इस अद्भुत शिवलिंग का पिघलना नई बात नहीं है। प्रतिवर्ष यात्रा शुरू होने के बाद से ऐसा होता है। इसका सीधा कारण इस निर्जन स्थान पर अचानक भीड़ की मौजूदगी है जो दो महीनों तक बनी रहती है। जैसे - जैसे सनातन के प्रति श्रृद्धा और प्रतिबद्धता में वृद्धि हो रही है वैसे - वैसे धर्मस्थलों में जन सैलाब उमड़ने लगा है। लेकिन जो धर्मस्थल पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित हैं उनमें अपेक्षा से अधिक मानवीय उपस्थिति उनके नैसर्गिक स्वरूप के लिए हानिकारक बनती है । भूस्खलन की बढ़ती घटनाएं इसका प्रमाण हैं। कुछ साल पहले अमरनाथ में  गुफा के पीछे से अचानक आया जनसैलाब प्रलय का एहसास करवा गया था। केदारनाथ त्रासदी की स्मृति भी रोंगटे खड़े कर देती है। ये कहना गलत नहीं है कि  अमरनाथ में शिवलिंग के पिघलने  का सबसे बड़ा कारण वहाँ श्रृद्धालुओं की बढ़ती भीड़ ही है। हमारा आशय किसी की आस्था को ठेस पहुँचाना कदापि नहीं है किंतु तीर्थ यात्रा और पर्यटन में जो भावनात्मक अंतर है उसका निहितार्थ समझने की जरूरत है। और जिस बर्फ़ानी बाबा को देखने जाएं , वही लुप्त रहें तो यात्रा का स्वाभाविक आनंद और उससे जुड़ी आत्मिक शांति प्राप्त नहीं होती। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 6 July 2026

मुंबई की बदहाली शर्मनाक



इस साल मानसून देर से आया। उसके कारण देश के बड़े भूभाग में जल संकट के साथ ही खरीफ फसल के लिए धान के रोपे लगाने में विलंब होने से किसान परेशान है। नदियों, तालाबों और कुओं आदि का जल स्तर खतरे के निशान से भी नीचे चला गया। भूजल स्तर गिरने से जलापूर्ति पर भी बुरा असर पड़ा है। हालांकि अब मानसून सक्रिय होकर आगे बढ़ रहा है। लेकिन जिस तरह उसके विलंबित होने से स्थिति चिंताजनक हो उठी वही दशा उसके आने के बाद देखने मिल रही है। जिसकी बानगी देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई है। बीते दो - तीन दिनों से वहाँ भारी बारिश होने से जनजीवन अस्त - व्यस्त हो गया है। मुंबई - पुणे के रास्ते में अनेक स्थानों पर भूस्खलन के कारण यातायात अवरुद्ध  है। मुंबई महानगर और उसके उपनगरीय क्षेत्रों में भी अति वृष्टि से सभी व्यवस्थाएं चरमरा गई हैं। निचले इलाकों में जल भराव की समस्या तो सभी शहरों में कमोबेश एक जैसी है। लेकिन मुंबई कोई साधारण शहर न होकर वैश्विक पहचान रखता है। इसीलिए यहाँ होने वाली किसी भी छोटी - बड़ी घटना की चर्चा दूर - दूर तक होती है। आज मिल रही खबरों के  मुताबिक मुंबई से जाने और आने वाली उड़ानें बड़ी संख्या में रद्द की जा चुकी हैं या विलम्बित हैं। इस महानगर की जीवन रेखा कही जाने लोकल ट्रेन सेवा पर भी बुरा असर पड़ा है। दर्जनों गाड़ियां रद्द करने से सप्ताह के पहले दिन ही लाखों लोग अपने गन्तव्य तक नहीं जा सके। कुल मिलाकर हालात चिंताजनक होने के साथ ही शर्मनाक भी हैं। हालांकि अप्रत्याशित रूप से होने वाली भारी बरसात के कारण किसी भी शहर में व्यवस्थाएं   गड़बड़ा जाना स्वाभाविक  हैं किंतु मुंबई में ऐसा होना इसलिए शर्मिंदा करता है क्योंकि यह एक अंतर्राष्ट्रीय महानगर होने से देश की छवि को पूरी दुनिया के समक्ष प्रस्तुत करता है।  देश का मुख्य व्यवसायिक केंद्र होने से यहाँ गतिविधियां ठप होने से प्रतिदिन करोड़ों - अरबों का नुकसान होता है। एक ही दिन में जरूरत से ज्यादा बरसात होने पर स्थितियाँ खराब होना स्वाभाविक है लेकिन मुंबई में चूंकि प्रति वर्ष ऐसा होता है इसलिए ये विचारणीय प्रश्न है कि महाराष्ट्र सरकार और मुंबई महानगर पालिका हर साल पैदा होने वाले इस संकट से लोगों को बचाने के लिए क्या करते हैं ? हालांकि देश के सभी महानगरों के अलावा अन्य प्रमुख शहरों की स्थिति भी भारी बरसात होने पर चिंताजनक हो जाती है जिससे ये साबित होता है कि हमारे देश में शहरों की बसाहट और उनका नियोजन दोषपूर्ण है।  अनियोजित विस्तार  और आबादी के बढ़ते बोझ के कारण शहरों की कमर टूटती जा रही है। यद्यपि चर्चा बड़े शहरों की ज्यादा होती है लेकिन बढ़ते शहरीकरण का दुष्प्रभाव अब पूरे देश में अनुभव किया जा सकता है। मुंबई में आई मौजूदा आपदा के परिप्रेक्ष्य में इस दिशा में राष्ट्रीय स्तर पर कदम उठाये जाने चाहिए। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी की स्मार्ट सिटी योजना के तहत अरबों रुपये खर्च करने के बाद जिन शहरों की सूरत सुधारने का दावा सरकारी दस्तावेजों में दर्ज है उनमें भी बरसात बुरे हाल कर देती है। इन सबसे साबित होता है कि  सिर्फ महानगर ही नहीं अपितु छोटे और मध्यम आकार के शहरों में आपदा प्रबन्धन की स्थिति चिंताजनक है। हर साल इससे होने वाले नुकसान को रोकने की व्यवस्था हो सके तो देश की अर्थव्यवस्था को बड़े नुकसान से बचाने के अलावा जनता को होने वाली तकलीफों से निजात मिल सकती है।

- रवीन्द्र वाजपेयी





Saturday, 20 June 2026

राम मंदिर घोटाले से दुनिया भर के हिंदुओं के उत्साह को धक्का पहुंचा


अयोध्या का राम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं अपितु दुनिया भर में फैले करोड़ों सनातन धर्म के अनुयायियों की आस्था का सर्वोच्च केंद्र है। सैकड़ों वर्षों के संघर्ष एवं अनेकानेक बलिदानों के बाद इस मंदिर का निर्माण संभव हो सका। इसके लिए बड़े - बड़े धनकुबेरों से लेकर साधारण आर्थिक स्थिति वाले हिंदुओं ने भी यथाशक्ति सहयोग प्रदान किया। मंदिर निर्माण के साथ ही अयोध्या नगरी को उसकी प्राचीन भव्यता के अनुरूप विकसित कर वहाँ समस्त आधुनिक  सुविधाएं उपलब्ध करवाई गईं। इसके कारण श्रद्धालुओं का तांता लगने लगा। देखते ही देखते अयोध्या ने वेटिकन सिटी तक का रिकार्ड तोड़ दिया। हिंदुओं के मंदिरों में दान चढ़ावे की परंपरा का निर्वहन करते हुए श्रद्धालुओं ने न सिर्फ नगद राशि बल्कि सोना - चांदी जैसी बहुमूल्य धातुओं का भी दान किया। तिरुपति बालाजी की तरह ही अयोध्या का राम मंदिर भी दानदाताओं के सहयोग से काफी समृद्ध होने लगा। जो भी यहाँ के दर्शनों हेतु आया मंदिर में उपलब्ध सुविधाओं और व्यवस्थाओं  की प्रशंसा किये बिना नहीं रह सका। लेकिन हाल ही में मंदिर की व्यवस्था से जुड़े कुछ कर्मचारियों और पदाधिकारियों पर ये आरोप लगा कि उन्होंने चढ़ावे और दान की राशि में हेराफेरी की। जाँच और छापेमारी में कुछ लोगों के यहाँ से करोड़ों रुपये और सोना - चांदी वगै़रह मिले। जाँच हेतु गठित एस. आई. टी पूछताछ करने के उपरांत एक - दो दिन में अपनी रिपोर्ट उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंप देगी। उल्लेखनीय है गत दिवस अयोध्या पहुंचकर राम मंदिर के दर्शन करने के बाद योगी जी ने दूध का दूध, पानी का पानी करने के साथ ही दोषियों को कठोरतम दंड देने का आश्वासन दिया। लेकिन इस कांड में  दान और चढ़ावे के गबन के साथ जिन ट्रस्टियों का नाम जुड़ा हुआ है वे सब प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर रास्वसंघ और भाजपा से जुड़े हैं। नृपेन मिश्र जैसे पूर्व नौकरशाह भी केंद्र सरकार के विश्वासपात्र हैं जिन्हें मंदिर निर्माण समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। गत दिवस उनका एक साक्षात्कार टीवी पर प्रसारित हुआ जिसमें उन्होंने ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को निर्दोष बताने के साथ ही स्वीकार किया कि विश्वासपात्र लोगों को दायित्व देने के बाद निगरानी में कमी से ये घोटाला संभव हुआ। जिन लोगों पर संदेह है वे किसी न किसी ट्रस्टी से जुड़े होने से संदेह की सुई उन पर भी जाकर टिक रही है। दान में प्राप्त बहुत सी बहुमूल्य वस्तुओं का रिकार्ड न मिलना जाँच में सामने आया है। अनेक दान दाताओं ने इस आशय की शिकायत भी की है। बहरहाल जाँच पूरी हो जाने पर ही घोटाले का आकार और घोटालेबाजों के चेहरे सामने आएंगे। हो सकता है सीबीआई को भी जाँच की जिम्मेदारी दी जाए। लेकिन इस कांड से राम मंदिर के निर्माण से जुड़े तमाम लोगों की पुण्यायी मिट्टी में मिल गई फिर चाहे वे संघ, भाजपा या विहिप के हों या अन्य किसी क्षेत्र के ।  धार्मिक स्थलों की दान पेटियों में होने वाले घपले नई बात नहीं हैं। धार्मिक ट्रस्टों   की संपत्ति पर अवैध कब्जे भी  आम है। ये बुराई केवल हिंदुओं तक ही सीमित नहीं है। वक़्फ़ और ईसाई समुदाय की संपतियों पर भी उसी के प्रभावशाली लोगों ने कब्जे कर रखे हैं। लेकिन राम मंदिर को सामान्य धार्मिक स्थल नहीं माना जा सकता। भगवान राम के मंदिर तो पूरी दुनिया में है किंतु अयोध्या में बना ये मंदिर हर दृष्टि से विशेष है। इसके साथ आस्था भी जुड़ी है और राष्ट्रीयता की भावना भी। ये कहने में भी कोई गलती नहीं है कि इसके निर्माण से राष्ट्रीय स्वाभिमान और गौरव की वैसी ही पुनर्स्थापना हुई जैसी सोमनाथ के मंदिर के पुनरुद्धार से हुई थी। इसके निर्माण के बाद पूरी दुनिया में जो उत्साह उत्पन्न हुआ उसे इस घोटाले से धक्का पहुंचा है। मुख्यमंत्री योगी को चाहिए वे  अपने आश्वासन के अनुरूप दोषियों को इतना कठोर दंड दिलवाएं जिससे आइंदा किसी में ऐसा करने का दुस्साहस न हो। इसी के साथ संघ और विहिप को भी अपने लोगों की प्रमाणिकता के प्रति सतर्क रहना होगा क्योंकि   इन संगठनों के बारे में हिन्दू समाज के बड़े हिस्से में विश्वास का भाव है। 



- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 19 June 2026

ईरान के बंधन मुक्त हो जाने से प. एशिया के समीकरण बदले

 

अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते  की खबर से दुनिया ने राहत की सांस ली है। 19 जून को यह समझौता विधिवत लागू होगा। हालांकि  होर्मुज से तेल और गैस टैंकरों वाले जहाजों का निकलना शुरू हो जाने से लगभग चार माह से चले आ रहे तेल और गैस संकट में कुछ कमी आयेगी । लेकिन हालात पूरे तौर पर सामान्य होने में कई महीने लग सकते हैं क्योंकि ईरान ने इस समुद्री क्षेत्र में जो बारूदी सुरंगें बिछा रखी हैं उन्हें हटाने में समय लगेगा। दूसरा पेच ये भी है कि 6 माह बाद ईरान द्वारा ओमान के साथ मिलकर इस जल मार्ग का उपयोग करने वाले जहाजों से टोल वसूलने की तैयारी की जा रही है जो  विवाद का नया कारण बन सकती है।  इसी तरह ईरान को दी जाने वाली क्षति पूर्ति की राशि को लेकर अमेरिका द्वारा हाथ खींच लिए जाने के बाद सऊदी अरब, दुबई  , ओमान, कतर आदि परेशान हैं क्योंकि अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस इन देशों पर दबाव बना रहे है कि वे ईरान को हुए नुकसान की भरपाई करें जबकि ईरान की मिसाइलों ने इन तेल उत्पादक देशों की इकाइयों को जो नुकसान पहुंचाया उससे उबरने में उन्हें कम से कम एक साल लगेगा। इससे अलग हटकर देखें तो प. एशिया में स्थायी शांति तब तक नहीं आ सकती जब तक इजराइल के अस्तित्व को ईरान सहित अरब जगत के सभी मुस्लिम देश मान्य नहीं करते। यद्यपि जोर्डन, मिस्र, ओमान, सं. अरब अमीरात आदि इजराइल से रिश्ते कायम कर चुके हैं किंतु ईरान के अलावा , तुर्किये और पाकिस्तान जैसे कुछ मुस्लिम देश इजराइल के  अस्तित्व को मंजूर नहीं करते। और फिर जिस समझौते को लेकर पूरा विश्व प्रसन्न है उससे दूरी बनाकर  इजराइल ने लेबनान पर हमले जारी रखते हुए संकेत दे दिया कि वह अपने रास्ते खुद तय करेगा। यद्यपि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस ने इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू और समझौते का विरोध कर रहे उनके मंत्रियों को काफी भला - बुरा कहा किंतु इजराइल ने अपनी सैन्य कारवाई को रोकने से इंकार कर दिया जिसके कारण समझौते के पहले आज होने वाली बैठक रद्द हो गई। ईरान लगातार दोहरा रहा है कि लेबनान पर हमले नहीं रुके तब वह शांत नहीं बैठेगा। इस सबसे लगता है कि अमेरिका तो अपना पिंड छुड़ाकर निकला जा रहा है किंतु प. एशिया में अशांति के बीज अभी भी मिट्टी में दबे हैं जो जरा सी नमी मिलते ही पनप सकते हैं। एक बात और जो दुनिया भर की चिंता का कारण बन गई वह है ईरान का छुट्टा हो जाना। अमेरिका ने उसे तेल बेचने की छूट के अलावा उसकी जप्त दौलत मुक्त करने की अनुमति देकर प.एशिया में एक ताकतवर शक्ति केंद्र की जड़ें जमा दीं। ईरान ने इस यद्ध में अपनी मारक क्षमता से अमेरिका जैसी महाशक्ति तक का मुकाबला किया। इजराइल के अभेद्य समझे जाने वाले आयरन डोम भी उसकी मिसाइलों को न रोक सके। शुरुआत में  लड़ाई में एक पक्ष अमेरिका और इजराइल थे वहीं मुकाबले में था ईरान। अपने सर्वोच्च शासक खामेनेई की हत्या के बाद उसका हौसला थोड़ा तो हिला किंतु उसने चतुराई पूर्वक अन्य खाड़ी देशों को निशाना बनाकर युद्ध क्षेत्र का विस्तार कर दिया जिससे अमेरिका पर दबाव बढ़ने लगा। कुल मिलाकर डोनाल्ड ट्रंप की मूर्खता से प्रतिबंधों से जकड़े ईरान को नई आजादी मिल गई और वह भी ताकत के बल पर। इसीलिए जो लोग सोचते हैं कि इस समझौते से युद्ध बंद हो जाएगा और प. एशिया में सामान्य स्थितियां लौटेंगी वे ज्यादा दूर तक देखने में सक्षम नहीं हैं। सच्चाई ये है कि अमेरिका ने अपने आप को भले इस युद्ध से अलग कर लिया किंतु इजराइल, होर्मुज और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर प. एशिया में तलवारें म्यान से बाहर आती रहेंगी। अमेरिका की मजबूरी ये भी है कि इस क्षेत्र में उसके आर्थिक और सामरिक हित भी हैं। यदि उसने पूरी तरह दूरी बनाई तब चीन और रूस बिना देर गंवाये ईरान के जरिये अपना वर्चस्व इस तेल संपन्न इलाके में बढ़ाएंगे । भारत को इस घटनाक्रम पर पैनी नजर रखनी चाहिए क्योंकि चीन की उपस्थिति पाकिस्तान के लिए हितकारी होगी। ऐसे में हमें नये सिरे से कूटनीतिक बिसात बिछानी पड़ेगी। वैसे सं. अरब अमीरात, ओमान, कतर, जोर्डन, सऊदी अरब आदि से हमारे रिश्ते मजबूत हैं। और इजराइल समर्थक होने पर भी ईरान से हमारे संबंध यथावत हैं। लेकिन कूटनीति में कब कौन बदल जाए कहना मुश्किल है। यदि अमेरिका ने अपने दत्तक पुत्र इजराइल को ठेंगा दिया तब कुछ भी संभव है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी