मोदी विरोधी यू ट्यूबर डाॅ. पुण्य प्रसून वाजपेयी ने अपने ताजा वीडियो में खुलासा किया कि भारत में अब तक जितने भी प्रधानमंत्री हुए उनमें नरेंद्र मोदी द्वारा की गईं विदेश यात्राओं की संख्या बाकी सभी की मिलाकर भी अधिक हैं। विपक्षी पार्टियां भी अमूमन प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर छींटाकशी करते हुए उनके महंगे विमान का जिक्र करना नहीं भूलतीं। ये बात पूरी तरह सही है कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। भारत जैसे देश में इस पर उंगलियाँ उठना स्वाभाविक है जहाँ करोड़ों लोग गरीबी रेखा से नीचे ज़िंदगी बसर करने मजबूर हैं। लेकिन इसी के साथ ये देखना भी जरूरी है कि श्री मोदी की विदेश यात्राएं किस उद्देश्य से की जाती हैं ? यदि वे महज सैर - सपाटे के लिए होती हों तब उनकी आलोचना स्वाभाविक है। लेकिन अब तक जो कुछ भी देखने मिला उससे ये साफ है कि उनकी विदेश यात्राएं पूरी तरह देश के दूरगामी हितों पर केंद्रित होती हैं। ऐसा नहीं है कि पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों के विदेशी दौरे निरुद्देश्य हुआ करते थे किंतु उस दौर में भारत की वैश्विक भूमिका आज जैसी विस्तृत नहीं होने से उन यात्राओं का दायरा रिश्ते मजबूत करने तक सीमित रहता था, लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। भारत एक परमाणु शक्ति संपन्न देश होने के साथ ही सॉफ्टवेयर, अंतरिक्ष, चिकित्सा, रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में बड़ी ताकत के तौर पर पहचान बनाता जा रहा है। दुनिया भर में फैले भारतवंशी देश की प्रतिष्ठा में वृद्धि कर रहे हैं। उदारीकरण के बाद उत्पन्न स्थितियों में विश्व एक बाजार बन गया है जिसके कारण केवल निर्यातक बनकर कोई नहीं रह सकता। उत्पादन के लिये कच्चा माल और तकनीक का आयात जरूरी है वहीं विकसित देशों को अपने उत्पादों के लिए बाजार की जरूरत पड़ती है। दुनिया में जारी मौजूदा उठापटक के पीछे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष तौर पर बाजारवाद की छाया है। विदेश नीति भी घूम - फिरकर आर्थिक हितों से प्रभावित होती है। इसीलिए राष्ट्राध्यक्ष अपने विदेशी दौरों में देश के बड़े उद्योगपतियों को ले जाते हैं। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने इस बात को पूरी तरह समझते हुए विदेश दौरों में व्यापारिक समझौतों को प्राथमिकता दी और बड़ी आर्थिक शक्तियों के विकल्प के तौर पर विभिन्न देशों के साथ तार जोड़ते हुए देश के आर्थिक, कूटनीतिक और सामरिक हितों की सुरक्षा का प्रबंध किया। अमेरिका द्वारा प्रतिकूलता दिखाये जाने के कारण भारत के लिए अपने संबंधों का विकेंद्रीकरण आवश्यक होता जा रहा था। उस लिहाज से भारत ने चतुराई दिखाई और विभिन्न देशों से समझौते रूपी दूरदर्शिता दिखाकर उसके दबाव को कम करने में सफलता हासिल की। यूरोपीय यूनियन और ब्रिटेन से मुक्त व्यापार समझौता इसका उदाहरण है जो अमेरिका के टैरिफ रूपी आतंक का माकूल जवाब है। गत सप्ताह श्री मोदी ने इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे में जिस प्रकार के व्यापारिक, रणनीतिक और सांस्कृतिक समझौते किये वे मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में भारत की जरूरतों को निर्बाध पूरा करने के साथ ही कूटनीतिक स्थिति को मजबूत बनाने में मददगार होंगे। दक्षिण एशिया और प्रशांत क्षेत्र में चीन की कुटिल नीतियों का मुकाबला करने के लिये तमाम देश भारत की ओर आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं। ब्रिक्स का प्रमुख सदस्य होने के बाद भी भारत क्वाड नामक संगठन का सदस्य भी है जो चीन के विरुद्ध मोर्चेबंदी के लिए कार्यरत है। इंडोनेशिया के साथ सबांग बंदरगाह को विकसित करने के अलावा ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम और क्रिटिकल मिनरल्स की आपूर्ति और न्यूजीलैंड के साथ महत्वपूर्ण रणनीतिक समझौते क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में भारत की प्रभावशाली भूमिका का प्रमाण है। अमेरिका - ईरान और रूस - यूक्रेन के बीच युद्ध के लंबे खिंचने के कारण दुनिया के सामने जो संकट आते जा रहे हैं उनसे होने वाले नुकसान से बचने के लिए समय रहते वैकल्पिक व्यवस्था करना ही बुद्धिमत्ता है। प्रधानमंत्री का ताजा विदेश दौरा उसी दिशा में बढ़ाया गया कदम है।
- रवीन्द्र वाजपेयी