Wednesday, 15 July 2026

ट्रम्प के टैरिफ आतंक का जवाब हैं मुक्त व्यापार समझौते



अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा शुरू किये टैरिफ युद्ध ने एक नई तरह की  उथल - पुथल को जन्म दिया जिसके कारण अंतराष्ट्रीय व्यापार की समूची स्थापित व्यवस्था के मानदंड टूट - फूट गए। दरअसल ट्रम्प का घोषित उद्देश्य  कम आयात शुल्क के कारण अमेरिका को होने वाले व्यापार घाटे में कमी लाना था जिसमें वे काफी हद तक सफल भी हुए। लेकिन जोश में होश खो बैठने वाली उक्ति को चरितार्थ करते हुए उन्होंने टैरिफ रूपी अस्त्र से दुनिया भर  को एक साथ आतंकित करने की जो मूर्खता की उसके कारण सभी प्रमुख देशों ने अपने आर्थिक हितों के संरक्षण के लिए अमेरिका पर निर्भरता घटाने की मुहिम छेड़ दी। परिणामस्वरूप नये - नये  व्यापार समझौते होने लगे। उसी का एक उदाहरण भारत और ब्रिटेन के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता है जो आज से लागू हो गया। उल्लेखनीय है  ट्रम्प के टैरिफ दबाव के जवाब में नरेंद्र मोदी सरकार  का ये छटवाँ मुक्त व्यापार समझौता है। इसके पूर्व भारत  मॉरीशस, यूएई, ऑस्ट्रेलिया, ईएफटीए (यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ) और ओमान के साथ ऐसे ही समझौते हस्ताक्षरित कर चुका है। यही वजह है कि अमेरिका के साथ विचाराधीन  नया व्यापार समझौता करने में भारत ने जल्दबाजी नहीं दिखाई और ट्रम्प द्वारा थोपी गई इकतरफा शर्तों को मंजूर नहीं किया।  ब्रिटेन के साथ जो ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता आज, 15 जुलाई 2026 से लागू हुआ उसके अंतर्गत भारत द्वारा निर्यात किये जाने वाले लगभग  99% उत्पादों पर ब्रिटेन ने आयात शुल्क शून्य  कर दिया है। समझौते की मुख्य बातों पर नज़र डालें तो इससे विशेष तौर पर भारतीय  कपड़ा, चमड़े से बनी चीजें , सोने - चांदी के जेवरात, , समुद्री खाद्य (मछली आदि) और इंजीनियरिंग सामग्री के अलावा कृषि उत्पादों को ब्रिटिश बाजार में बड़े पैमाने पर आयात  शुल्क-मुक्त बाजार उपलब्ध होगा। दूसरी तरफ भारत सरकार ब्रिटेन से आयातित वस्तुओं  पर आयात शुल्क में चरणबद्ध कटौती करेगी। इनमें  स्कॉच व्हिस्की का टैरिफ 150% से घटाकर 40% करने के अलावा ब्रिटेन में बनी पूरी तरह तैयार कारों (सहित इलेक्ट्रिक वाहनों) पर आयात शुल्क धीरे - धीरे  110% से घटाकर 10% तक लाया जाएगा। इसके साथ ही ब्रिटेन में कार्यरत भारतीय पेशेवरों के लिए कार्य शर्तों का सरलीकरण भी इस समझौते का हिस्सा हैं। भारत ने सेब, अखरोट, सहित कुछ बीज, सोने की ईंटों व स्मार्टफोन जैसे संवेदनशील उत्पादों पर कोई शुल्क रियायत नहीं दी है। वहीं ब्रिटेन ने भी चावल, चीनी व कुछ मांस उत्पादों को समझौते के दायरे से बाहर रखा । समझौते में प्रावधान है कि भारत से ब्रिटेन जाने वाले कर्मचारियों और उनके नियोक्ताओं को पांच वर्ष तक ब्रिटेन में सोशल सिक्योरिटी योगदान नहीं देना होगा जो आईटी कंपनियों को राहत प्रदान करने वाला है। इनके अलावा भी  ऐसे अनेक बिंदु हैं जिनमें दोनों, पक्षों के हितों को संवर्धन होगा। यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ से भी चूंकि ऐसा ही समझौता किया जा चुका है इसलिए अब समूचे यूरोप के साथ भारत के व्यापारिक रिश्ते तो मज़बूत होंगे ही कूटनीतिक संबंधों में भी मिठास आयेगी। कुल मिलाकर ये मुक्त व्यापार समझौते अमेरिका के टैरिफ आतंक के विरुद्ध की गई मोर्चेबंदी है जिसमें भारत के साथ उन देशों ने भी समझौते करने में कोई झिझक नहीं दिखाई जो अमेरिकी शिविर के माने जाते हैं। इनसे एक बात स्पष्ट हो गई कि भारत केवल एक उपभोक्ता बाजार नहीं अपितु उत्पादक के तौर पर भी अपनी जगह बनाता जा रहा है। सबसे खुशनुमा पहलू ये है कि अब तक जिन - जिन देशों से मुक्त व्यापार समझौते किये गए उन सभी में अप्रवासी मूल के भारतवंशियों की बड़ी संख्या है। उनमें से कुछ वहाँ स्थायी तौर पर बस जाने के बाद भी भारतीय जीवन शैली से जुड़े होने से भारतीय वस्तुओं के उपभोक्ता हैं। उनके अलावा पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल के भी जो नागरिक उक्त देशों में रहते हैं वे भी भारतीय उत्पादों के मुरीद होने से उनकी मांग रहती है। इसीलिए  मुक्त व्यापार समझौता लागू होने से हमारे निर्यात को मजबूती मिलने के साथ ही अमेरिका के टैरिफ से होने वाले नुकसान की भरपाई हो सकेगी। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 14 July 2026

बदलते वैश्विक समीकरणों में भारत और चीन का महत्व बढ़ रहा



रूस - यूक्रेन और अमेरिका - ईरान की जंग रुकने का नाम नहीं ले रही। पूरी दुनिया इन युद्धों से हलाकान है। वैश्विक अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है। कच्चे तेल और गैस आदि की आपूर्ति बाधित होने से अभूतपूर्व ऊर्जा संकट पैदा हो गया है। ईरान द्वारा होर्मुज नामक समुद्री मार्ग बंद किये जाने से प. एशिया के तेल उत्पादक देशों का व्यापार ठप होकर रह गया है। दोनों तरफ से बरसाई जा रही बारूद ने तेल रिफ़ाइनरियों को या तो तबाह कर दिया या जबरदस्त नुकसान पहुंचाया जिसके कारण उनकी उत्पादन क्षमता प्रभावित हो गई। अमेरिका होर्मुज  खोलने का साहस दिखाता भी है तो ईरान तेल वाहक जहाजों पर मिसाइलें दागकर दहशत फैलाने से बाज नहीं आता। उसका दावा है वह इस समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलेगा जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी ऐसी ही धमकी दे रहे हैं। दूसरी तरफ यूक्रेन पर रूसी हमले को शुरू हुए बरसों बीत गए। प्रारंभ में लगता था दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य महाशक्तियों में शामिल रूस  के सामने यूक्रेन दो - चार दिनों में ही घुटने टेक देगा । रूस द्वारा उसके सीमावर्ती भूभाग पर कब्जा जमा लेने से उक्त सम्भावना और मजबूत हो गई । लेकिन जो ताजा जानकारी आ रही है उसके अनुसार यूक्रेन धीरे - धीरे ही  सही रूस के कब्जे से अपनी खोई हुई जमीन वापस लेता जा रहा है। लेकिन इससे भी बड़ी बात ये है कि उसने रूस जैसे कच्चे तेल और गैस संपन्न देश में तेल संकट उत्पन्न कर दिया। बजाय बड़े लड़ाकू विमानों के छोटे - छोटे ड्रोन के जरिये इस विश्व शक्ति के बड़े - बड़े तेल शोधन संयंत्रों को नष्ट कर डाला। परिणामस्वरूप राजधानी मॉस्को तक में पेट्रोल पंप खाली पड़े हैं। ये उस देश की हालत है जो कल तक बड़े पैमाने पर तेल और गैस निर्यात किया करता था। यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की की स्थिति रूस के राष्ट्रपति पुतिन की तुलना में अत्यंत दयनीय बताई जाती थी। लेकिन खैरात के हथियारों से लड़ने वाले यूक्रेन ने रूस की अपार सैन्य क्षमता की पोल खोलकर रख दी। इस युद्ध के कारण रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों का दुष्प्रभाव भी अब असर दिखाने लगा है। कमोबेश ऐसी ही हालत प. एशिया में चल रहे युद्ध में खुद को दुनिया का खलीफा समझने वाले अमेरिका की देखने मिल रही है जो हजारों मिसाइलें दागने और पूरे देश को मलबे के ढेर में बदल देने के बाद भी ईरान को घुटनाटेक करवाने में नाकामयाब साबित हुआ है। यूक्रेन की तरह ईरान को भी इस लड़ाई में  अकल्पनीय क्षति पहुंची है। उसकी तेल उत्पादन क्षमता पर तो विपरीत असर पड़ा ही अन्य क्षेत्रों में भी  भारी तबाही झेलनी पड़ी। सरकार और सेना में पदस्थ अनेक शीर्ष हस्तियां मारी गईं। सड़क, पुल, कारखाने तबाह हो गए। हजारों नागरिक जान गँवा बैठे। लड़ाई शुरू होते ही उसके सर्वोच्च नेता खामेनेई की जिस तरह ह्त्या हुई उसके बाद ही ये उम्मीद लगाई जाने लगी थी कि वह अमेरिका के सामने झुक जाएगा। लेकिन उसने उन सभी अरब देशों को निशाना बनाने जैसा दुस्साहस कर डाला जिनमें अमेरिका के सैन्य अड्डे थे । इन देशों को ये गुमान था कि अमेरिका उनका अभेद्य रक्षा कवच है। और इसीलिए वे ईरान  विरोधी शिविर में जाकर बैठे हुए थे। लेकिन ईरान ने उनकी खुशफहमी को तो धक्का पहुंचाया ही अमेरिका के सर्वशक्तिमान होने के अहंकार को भी जबरदस्त चोट पहुंचा दी। युद्धविराम करते समय भी उसने डोनाल्ड ट्रम्प की कड़ी शर्तों पर रजामंदी न देकर बता दिया कि भारी नुकसान के बाद भी वह आत्म समर्पण नहीं करेगा। बीते कुछ दिनों में युद्धविराम की जिस प्रकार धज्जियां उड़ रही हैं उन्हें देखते हुए ये कहा जा सकता है कि अमेरिका की अब तक की पूरी रणनीति नाकामयाब रही है। यहाँ तक कि इजराइल की रक्षा प्रणाली तक ईरान के हमलों को रोक पाने में विफल साबित हुई। उक्त दोनों लड़ाइयों ने दुनिया की दो महाशक्तियों की दादागिरी को जबरदस्त चोट पहुंचाई है। रूस की विशाल सैन्य शक्ति जहाँ यूक्रेन को झुकाने में  नाकामयाब रही वहीं अमेरिका के बेहद आक्रामक रवैये के बावजूद ईरान झुकने के लिए तैयार नहीं है। कुछ महीनों पहले जब डोनाल्ड ट्रम्प ने ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी दी तब यूरोप के वे छोटे - छोटे देश तक उनके विरुद्ध मोर्चा खोलकर बैठ गए जो दूसरे महायुद्ध के बाद से अमेरिका के संरक्षण में रह रहे थे। इस प्रकार मौजूदा परिदृश्य में विश्व का शक्ति संतुलन बदलता प्रतीत हो रहा है। रूस और अमेरिका जहाँ अपने ही बनाये जाल में फंसने के बाद उससे निकल नहीं पा रहे वहीं चीन बिना उलझे चुपचाप अपनी स्थिति मज़बूत करता जा रहा है। आने वाले समय में विश्व की महाशक्तियों को लेकर कुछ और भ्रम भी टूटना तय है। दुनिया को अपनी मुठ्ठी में बन्द करने का दम्भ भरने वाले चन्द देश अपने अंतर्विरोधों के चलते प्रभाव  खोते जा रहे हैं। इसके चलते वैश्विक शक्ति केंद्र पश्चिम से खिसक कर पूरब अर्थात एशिया की तरफ बढ़ रहा है। और इसीलिए भारत और चीन के महत्व तथा प्रभुत्व में उत्तरोत्तर वृद्धि दिखाई देने लगी है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 13 July 2026

मोदी द्वारा तीन देशों की यात्रा में किये समझौतों से देश को दूरगामी लाभ


मोदी विरोधी यू ट्यूबर डाॅ. पुण्य प्रसून वाजपेयी ने अपने ताजा वीडियो में खुलासा किया कि भारत में अब तक जितने भी प्रधानमंत्री हुए उनमें नरेंद्र मोदी द्वारा की गईं विदेश यात्राओं की संख्या बाकी सभी की मिलाकर भी अधिक हैं। विपक्षी पार्टियां भी अमूमन प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर छींटाकशी करते हुए उनके महंगे विमान का जिक्र करना नहीं भूलतीं। ये बात पूरी तरह सही है कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। भारत जैसे देश में इस पर उंगलियाँ उठना स्वाभाविक है जहाँ करोड़ों लोग गरीबी रेखा से नीचे ज़िंदगी बसर करने मजबूर हैं। लेकिन इसी के साथ ये देखना भी जरूरी है कि श्री मोदी की विदेश यात्राएं किस उद्देश्य से की जाती हैं ? यदि वे महज सैर - सपाटे के लिए होती हों तब उनकी आलोचना स्वाभाविक है। लेकिन अब तक जो कुछ भी देखने मिला उससे ये साफ है कि उनकी  विदेश यात्राएं पूरी तरह देश के दूरगामी हितों पर केंद्रित होती हैं। ऐसा नहीं है कि पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों के विदेशी दौरे निरुद्देश्य हुआ करते थे किंतु उस दौर में भारत की वैश्विक भूमिका आज जैसी विस्तृत नहीं होने से उन यात्राओं का दायरा रिश्ते मजबूत करने तक सीमित रहता था, लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। भारत एक परमाणु शक्ति संपन्न देश होने के साथ ही सॉफ्टवेयर, अंतरिक्ष, चिकित्सा, रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में बड़ी ताकत के तौर पर पहचान बनाता जा रहा है। दुनिया भर में फैले भारतवंशी देश की प्रतिष्ठा में वृद्धि कर रहे हैं। उदारीकरण के बाद उत्पन्न स्थितियों में विश्व एक बाजार बन गया है जिसके कारण केवल निर्यातक बनकर कोई नहीं रह सकता। उत्पादन के लिये कच्चा माल और तकनीक का आयात जरूरी है वहीं  विकसित देशों को अपने उत्पादों के लिए बाजार की जरूरत पड़ती है। दुनिया  में जारी मौजूदा उठापटक के पीछे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष तौर पर बाजारवाद की छाया है। विदेश नीति भी घूम - फिरकर आर्थिक हितों से प्रभावित होती है। इसीलिए राष्ट्राध्यक्ष अपने विदेशी दौरों में देश के बड़े उद्योगपतियों को ले जाते हैं। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने इस बात को पूरी तरह समझते हुए विदेश दौरों में व्यापारिक समझौतों को प्राथमिकता दी और बड़ी आर्थिक शक्तियों के विकल्प के तौर पर विभिन्न देशों के साथ तार जोड़ते हुए देश के आर्थिक, कूटनीतिक और सामरिक हितों की सुरक्षा का प्रबंध किया। अमेरिका द्वारा प्रतिकूलता दिखाये जाने के कारण भारत के लिए अपने संबंधों का विकेंद्रीकरण आवश्यक होता जा रहा था। उस लिहाज से भारत  ने  चतुराई दिखाई और विभिन्न देशों से समझौते रूपी  दूरदर्शिता दिखाकर उसके दबाव को कम करने में सफलता हासिल की। यूरोपीय यूनियन और ब्रिटेन से मुक्त व्यापार समझौता इसका उदाहरण है जो अमेरिका के टैरिफ रूपी  आतंक का माकूल जवाब है। गत सप्ताह श्री मोदी ने इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे में जिस प्रकार के व्यापारिक, रणनीतिक और सांस्कृतिक समझौते किये वे मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में भारत की जरूरतों को निर्बाध पूरा करने के साथ ही  कूटनीतिक स्थिति को मजबूत बनाने में मददगार होंगे। दक्षिण एशिया और प्रशांत क्षेत्र में चीन की कुटिल नीतियों का मुकाबला करने के लिये तमाम देश भारत की ओर आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं। ब्रिक्स का प्रमुख सदस्य होने के बाद  भी भारत क्वाड नामक संगठन का सदस्य भी है जो चीन के विरुद्ध मोर्चेबंदी के लिए कार्यरत है। इंडोनेशिया के साथ सबांग बंदरगाह को विकसित करने के  अलावा ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम और क्रिटिकल मिनरल्स की आपूर्ति और न्यूजीलैंड के साथ महत्वपूर्ण रणनीतिक  समझौते क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में भारत की प्रभावशाली भूमिका का प्रमाण है। अमेरिका - ईरान और रूस - यूक्रेन के बीच युद्ध के लंबे खिंचने के कारण दुनिया के सामने जो संकट आते जा रहे हैं उनसे होने वाले नुकसान से बचने के लिए समय रहते वैकल्पिक व्यवस्था करना ही बुद्धिमत्ता है। प्रधानमंत्री का ताजा विदेश दौरा उसी दिशा में बढ़ाया गया कदम है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 11 July 2026

बढ़ती आबादी को मानव संसाधन में बदलना समय की मांग


आज विश्व जनसंख्या दिवस है। पूरी दुनिया  चिंतित है कि आबादी इसी तरह बढ़ती रही तो धरती पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन  घटते चले जायेंगे और तब उनके लिए वैसी ही लड़ाई होगी जैसी कई सालों से रूस और यूक्रेन के बीच चली आ रही है। वहीं प. एशिया में  चल रहे युद्ध के पीछे भी कच्चा तेल नामक काला सोना ही है। चीन की विस्तारवादी नीतियाँ भी प्राकृतिक संसाधनों को हथियाने पर आधारित हैं। भविष्य में पेय जल की समस्या भी विकराल होने जा रही है।और तब उसके लिए भी संघर्ष होगा। उल्लेखनीय है भारत अब चीन को पीछे छोड़ सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गया है। दूसरी तरफ चीन और जापान सरीखे देश जन्म दर में गिरावट से चिंतित हैं क्योंकि  उनके उद्योगों को श्रमिक मिलने की किल्लत होने लगी है। उधर परिवार नामक संस्था के टूटने से भी अनेक विकसित देशों में आबादी  ठहर गई है। यूरोप के कुछ छोटे देशों की आबादी तो लाखों में है किंतु अपने प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों के कारण वे विकसित और संपन्न राष्ट्रों में शुमार होते हैं।  लेकिन बेहतर जिंदगी के चलते अन्य देशों के नागरिक जिस तेजी से यहां बसते जा रहे हैं उससे माहौल बिगड़ने लगा है ।  विशेष रूप से अरब देशों से आए शरणार्थी समस्या बन गए हैं । दुनिया में बढ़ती आबादी से  जमीन और पानी की कमी के साथ ही वाहनों की बढ़ती संख्या  पर्यावरण के लिए खतरा बन गई  है। समुद्र में चल रहे हजारों जहाज और आकाश में विचरते वायुयानों से जो प्रदूषण होता है उसका दुष्प्रभाव धरती पर रहने वालों पर भी पड़ रहा है। विशेषज्ञों का निष्कर्ष  है कि  पृथ्वी पर मौजूद संसाधन  जनसंख्या के अनुपात में  घटते जा रहे हैं। विलासिता पूर्ण जीवनशैली  के कारण भी प्रकृति से खिलवाड़ होने से प्राकृतिक आपदाएं जल्दी - जल्दी आने लगी हैं।  जानलेवा कोरोना  वायरस ने   साबित कर दिया कि मनुष्य की अनगिनत कथित उपलब्धियां किसी न किसी बिंदु पर आकर शक्तिहीन हो जाती हैं । अमेरिका जैसा विकसित और ताकतवर देश भी चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय कुछ न करने की स्थिति में आ जाता है। विश्व भर में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर चिंता व्यक्त की जाती है किंतु जितना दिखावा होता है उसका आधा भी काम नहीं होने से स्थिति एक कदम आगे दो कदम पीछे की बन चुकी है। विकासशील देशों को कार्बन उत्सर्जन के लिए उपदेश देने वाले बड़े राष्ट्र पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं । चीन ने अपनी आबादी में वृद्धि को तो  थाम लिया लेकिन कार्बन उत्सर्जन के मामले में वह बेहद लापरवाह है।  भारत की ही बात करें तो आर्थिक विकास के मामले में चीन से हमारा मुकाबला है । लेकिन उसने  जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण के साथ ही विशाल आबादी को उत्पादकता से जोड़ा जिसके बाद अफीमचियों के लिए कुख्यात चीन ने अमेरिका को टक्कर दे डाली। साम्यवादी व्यवस्था  के बाद भी उसने उदारीकरण की पश्चिमी अवधारणा को अपने अनुरूप बनाया जिसके कारण  लगभग सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने वहाँ अपनी उत्पादन इकाईयां लगाई। दूसरी तरफ भारत में साठ और सत्तर के दशक तक परिवार नियोजन का जो अभियान जोर - शोर से चलाया जाता था वह उपेक्षा का शिकार होकर रह गया। चुनावी राजनीति ने जिस मुफ्त संस्कृति का विकास किया उसकी वजह से करोड़ों लोग बिना हाथ - पैर चलाए सरकारी सहायता पर अपना पेट भर रहे हैं। विरोधाभास ये है कि  बेरोजगारी के आंकड़े  उच्च स्तर पर हैं लेकिन खेती , उद्योग और छोटे कारोबारी तक  कामगारों की कमी से त्रस्त हैं। चीन ने जिस आबादी को संसाधन बनाया वही हमारे देश में बोझ बनकर रह गई। इसके लिए निश्चित रूप से  राजनीति उत्तरदायी है जिसने  कामचोरी को बढ़ावा  दिया। किसी को हजार -  दो हजार बेरोजगारी भत्ता देने के बजाय यदि उससे रोजाना घंटे - दो घंटे भी काम करवाया जाए तो उसे श्रम का महत्व समझ आएगा । इसी तरह महिलाओं के खातों में  पांच सौ - हजार जमा करने से उनका सशक्तीकरण हो जायेगा , ये सोचना मूर्खों के  स्वर्ग में रहने जैसा है। ये सच है कि चीन में चुनाव महज दिखावा है इसलिए वहां रेवड़ियां नहीं बांटी जाती और काम करने में सक्षम प्रत्येक व्यक्ति को उत्पादकता से जोड़ा गया है। वहीं हमारे देश में तो चुनाव कभी न खत्म होने वाला महोत्सव है जिसके दौरान जो मांगोगे वहीं मिलेगा वाली दरियादिली दिखाई जाती है। और तो और जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने  में भी धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप जैसी बातें आड़े आने लगती है। दुनिया का उत्पादन केंद्र बनने की उम्मीद और सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने की  महत्वाकांक्षा में जनसंख्या का बोझ बड़ी बाधा बन रहा है। हालांकि वर्तमान राष्ट्रीय जनसंख्या नीति  2000 का मुख्य उद्देश्य प्रजनन दर को कम करके 2045 तक जनसंख्या को स्थिर करना है। लेकिन इसका हश्र भी परिवार नियोजन अभियान जैसा ही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 10 July 2026

एथेनॉल मिले पेट्रोल के दाम भी कम होना चाहिए



इन दिनों पेट्रोल में एथेनॉल मिलाए जाने का मामला सुर्खियों में है। पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल (E20) के मिश्रण की योजना सरकार द्वारा पर्यावरण संरक्षण और विदेशी मुद्रा बचाने के लिए लागू की गई  है । इसके अंतर्गत अधिकांश पेट्रोल पंपों पर अब 20 फीसदी एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल ही उपलब्ध है। पर्यावरण संरक्षण और आयात खर्च घटाने के अलावा पेट्रोल में एथेनॉल के मिश्रण को किसानों की आय बढ़ाने का साधन भी बताया जा रहा है। सतही तौर पर तो ये देशहित में  प्रतीत होता है किंतु इसके साथ ही कुछ विवाद भी उठ खड़े हुए हैं । केंद्र सरकार के परिवहन मंत्री नितिन गडकरी  पर आरोप  है कि उन्होंने अपने बेटे को आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिए पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिलाने का फैसला करवाया जिसकी फैक्टरी  में इसका उत्पादन होता है। ये भी कहा जा रहा है कि एथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में ऊर्जा थोड़ी कम होती है, जिसके कारण वाहनों की माइलेज में लगभग 2 से 6 प्रतिशत तक की कमी आ जाती है। साथ ही यदि वाहन एथेनॉल  के अनुकूल नहीं है (विशेषकर पुरानी गाड़ियां), तो इंजन के  फ्यूल पाइप या पंप में जंग लगने की शिकायत आ सकती है। दूसरी तरफ ये दावा भी किया जा रहा है कि बीते कुछ वर्षों में बनी अधिकांश गाड़ियां पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिश्रण के लिए पूरी तरह सक्षम हैं।। साथ ही जो वाहन चालक एथेनॉल रहित पेट्रोल उपयोग करना चाहते हैं वे प्रीमियम पेट्रोल का विकल्प चुन सकते हैं, जिनमें एथेनॉल की मात्रा न के बराबर या बहुत कम होती है। दुनिया के अनेक देशों में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का चलन बढ़ रहा है। लेकिन  उन्होंने उसके अनुकूल वाहनों का उत्पादन करने के बाद ही इस दिशा में कदम बढ़ाये। लेकिन भारत में निर्धारित समय  से पहले ही उसे लागू करने के कारण सवाल उठ खड़े हुए। इसे लेकर केंद्र सरकार पर नीतिगत हमलों से ज्यादा श्री गडकरी पर व्यक्तिगत निशाने साधे जा रहे हैं। इसका कारण उनके परिवार का एथेनॉल उत्पादन से जुड़ा होना है ।  उनकी चुप्पी पर भी सवाल उठने लगे। इसे भाजपा के भीतर चल रही खेमेबाजी से भी जोड़कर देखा जाने लगा। ये अटकलें भी लगने लगीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा निकट भविष्य में अपने मंत्रीमंडल में किये जाने वाले फेरबदल में श्री गडकरी को बाहर का रास्ता भी दिखाया जा सकता है। यद्यपि ऐसा होना काफी कठिन है क्योंकि एक तो उन्हें रास्वसंघ की पसंद माना  जाता है और दूसरा ये कि मोदी सरकार की विकास मूलक छवि के निर्माण में परिवहन मंत्रालय का प्रमुख योगदान है। आज देश में सड़कों विशेष रूप से राजमार्गों और एक्सप्रेस हाइवे का जो जाल बिछा है उसका श्रेय श्री गडकरी के खाते में ही दर्ज होता है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि उनकी लोकप्रियता दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर है। ऐसे में उनकी घेराबंदी से सरकार भी दबाव में आ रही थी। संभवतः यही देखकर वे सामने  आये और  पेट्रोल में एथेनॉल के मिश्रण से निजी लाभ के आरोप का खंडन करते हुए स्पष्ट किया कि उसके उत्पादन में उनके बेटे की इकाई की हिस्सेदारी महज 0.07 प्रतिशत तक ही सीमित है। इसके साथ ही उन्होंने एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से वाहनों के इंजिन को होने वाले नुकसान के प्रचार को निराधार बताते हुए चुनौती दी कि जिस किसी के वाहन को क्षति पहुंची हो वह आकर बताये। अब, कितने लोग अपनी शिकायतें लेकर मंत्री जी तक पहुँचेगे ये तो भविष्य ही बताएगा किंतु कांग्रेस के प्रवक्ता तहसीन पूनावाला ने श्री गडकरी द्वारा निजी फायदा न होने के दावे  पर पलटवार करते हुए कहा कि 0.07 प्रतिशत हिस्सेदारी से भी 50 से 100 करोड़ आय हो सकती है। खैर, राजनीति अपनी जगह है लेकिन एथेनॉल को लेकर जो संदेह आम उपभोक्ता के मन में है उसे दूर करना जरूरी है। विदेशी  मुद्रा की बचत के अलावा पर्यावरण को होने वाले नुकसान को रोकने में जनता पूर्णतः सरकार के साथ है किंतु अपने वाहन को नुकसान हो ये किसी को स्वीकार नहीं होगा। इसके अलावा चूंकि एथेनॉल अपेक्षाकृत सस्ता है लिहाजा उसको मिलाने के बाद पेट्रोल के दाम भी उसी अनुपात में कम किये जाने जरूरी हैं। बेहतर हो केन्द्र सरकार पूरे प्रकरण पर विस्तारपूर्वक आलोचनाओं का बिंदुवार जवाब दे जिससे कि भ्रांति दूर की जा सके। ये बात भी स्पष्ट होनी चाहिए कि  एथेनॉल का उपयोग निर्धारित समय सीमा से पहले करने का कारण क्या है ? हालांकि इस बारे में डॉ. मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में पेट्रोलियम मंत्री रहे मणिशंकर अय्यर द्वारा संसद में दिये जा रहे वक्तव्य का वीडियो भी काफी प्रसारित हो रहा है जिसमें वे पेट्रोल में एथेनॉल मिलाये जाने की तरफदारी करते सुने जा सकते हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 9 July 2026

अच्छा हुआ भारत ने अमेरिका - ईरान के झगड़े से खुद को दूर रखा

मेरिका और ईरान के बीच लड़ाई रुकवाने के लिए पाकिस्तान  की कूटनीतिक पहल पर जब  विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर से पूछा गया कि भारत इस मामले में क्यों पीछे रहा तब उन्होंने उत्तर दिया था कि हम दलाली नहीं करते। उसके बाद मोदी सरकार के पेशेवर  विरोधियों ने पाकिस्तान की शान में कसीदे पढ़ते हुए भारतीय विदेश नीति की  आलोचना का अभियान छेड़ दिया। विदेश मंत्री की दलाली वाली टिप्पणी का मखौल उड़ाने में भी  कोई कसर नहीं छोड़ी गई। इसके लिए भी सरकार को कठघरे में खड़ा किया गया कि उसने खामेनेई की हत्या की  निंदा करने में विलंब किया और बजाय  शीर्ष स्तर पर बयान जारी करने के विदेश सचिव को ईरानी दूतावास भेजकर शोक संदेश सौंपा। जब अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि बातचीत हेतु पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में जमा हुए और अंतरिम युद्धविराम पर सहमति बनी तब भी भारतीय विदेश नीति पर  निशाने साधे गए और  पाकिस्तान की अमेरिका और ईरान से नजदीकी बढ़ने को भारत के लिए खतरा बताया जाने लगा। हालांकि जब अंतिम रूप से युद्धविराम हुआ तब भले ही उस पर हस्ताक्षर पाकिस्तान में नहीं हुए किंतु जब उसे इस्लामाबाद समझौता कहा गया तब सरकार विरोधी प्रचारतंत्र को एक मौका और मिल गया। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री श्री जयशंकर  तमाम आलोचनाओं का उत्तर देने के बजाय संयमित बयानों तक ही सीमित रहे और पूरा ध्यान कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति जारी रहने पर केंद्रित रखा। उसका लाभ ये हुआ कि युद्ध रुकते ही भारत ने ईरान सहित  अन्य तेल उत्पादक देशों से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदकर देश को ऊर्जा संकट से बचाये रखा। यह भी  संज्ञान योग्य है कि युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद पाकिस्तान को किनारे कर दिया गया। वहीं फ्रांस में हुए जी - 7 सम्मेलन में  राष्ट्रपति ट्रम्प ने  श्री मोदी की प्रशंसा करते हुए भारत के महत्व को स्वीकार किया।   युद्धविराम के बाद भी अमेरिका, ईरान और इजरायल तीनों के बीच  धमकियों के आदान -  प्रदान के अलावा बीच - बीच में आक्रमण और प्रत्याक्रमण का दौर भी चलता  रहा। होर्मुज पर कब्जे को लेकर ईरान की हेकड़ी और ट्रम्प की धमकियां भी नहीं रुकीं। बीते कुछ दिनों में खामेनेई के अंतिम संस्कार के लिए दुनिया भर से कूटनीतिक हस्तियां ईरान में जमा थीं। उसी दौरान ईरान ने होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर मिसाइलें छोड़ कर भड़काऊ कारवाई कर दी जिसके बाद ट्रम्प ने युद्धविराम खत्म कर ईरान में दर्जनों ठिकानों पर बमबारी करवा डाली।  जिसने शांति की संभावना पर  पानी फेर दिया। आश्चर्य ये है कि खुद को कूटनीति का उस्ताद समझ बैठे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उनके फील्ड मार्शल आसिफ मुनीर  युद्धविराम के टूटने पर असहाय  बैठे हैं । ये देखने के बाद इस विवाद में भारत द्वारा अपने को निर्लिप्त रखने की नीति का औचित्य स्वतः ही सिद्ध हो गया। सही बात ये है कि अमेरिका ने पाकिस्तान को ईरान से संवाद स्थपित करने के लिए बतौर औजार उपयोग किया। यदि वाकई  उसकी वजनदारी इतनी होती तब दोनों पक्षों के बीच संवाद सेतु की भूमिका निभाते हुए दोबारा तनाव पैदा होने ही नहीं देता।   वैश्विक राजनीति के मौजूदा समीकरणों को देखते हुए इस युद्धविराम की सफलता शुरू से ही संदिग्ध रही। डोनाल्ड ट्रम्प तो अविश्वसनीयता के जीते - जागते प्रतीक हैं ही किंतु ईरान के नेताओं में भी वह गंभीरता नहीं है जो ऐसे अवसरों पर अपेक्षित होती है। इसीलिए ये कहना गलत नहीं है कि भारत ने इन दोनों के बीच सुलह कराने की कोशिश से खुद को दूर रखकर बुद्धिमत्ता दिखाई। जहाँ तक पाकिस्तान का सवाल है तो जो देश अपने पड़ोसी अफ़ग़ानिस्तान के साथ लड़ाई नहीं रोक पा रहा वह अमेरिका और ईरान जैसे बड़े देशों की जंग रुकवा देगा ये सोचना भी बेकार है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 8 July 2026

सैन्य महाशक्ति बनने की दिशा में एक और कदम




भारत केवल सोने और कच्चे तेल का ही सबसे बड़ा आयातक नहीं बल्कि विदेशी हथियारों के सबसे बड़े खरीददारों में से भी है। अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन  स्वीडन और इजराइल आदि देशों से हम अस्त्र - शस्त्र, खरीदते रहे हैं।  तोप, लड़ाकू विमान, पनडुब्बी आदि का निर्माण भारत में होने के बावजूद उनमें लगने वाले कल - पुर्जों के लिए विदेशों पर निर्भरता खत्म नहीं हो सकी ।  इस वजह से इनके उत्पादन में विलंब होता आया है। मोदी सरकार ने इसीलिए टेक्नालाजी ट्रांसफर पर जोर देना शुरू किया जिसके अनुकूल परिणाम भी मिलने लगे हैं। इसके साथ ही रक्षा उत्पादन के क्षेत्र को सरकारी एकाधिकार से निकालकर  निजी क्षेत्र को उसमें हिस्सेदारी देने जैसा बहुप्रतीक्षित और साहसिक कदम भी उठाया गया है । यद्यपि निजीकरण के विरोध के नाम पर इस फैसले पर भी उंगलियाँ उठीं। विशेष रूप से ये आपत्ति की गई कि निजी उद्योगों को रक्षा उत्पादन का समुचित तजुर्बा नहीं है। लेकिन बीते कुछ सालों में जो अनुभव आया उसने सरकार के निर्णय के औचित्य पर मुहर लगाते हुए आलोचकों के मुँह बंद कर दिये। सबसे बड़ी बात ये हुई कि भारत ने अपने रक्षा सौदों को एक - दो देशों तक सीमित न रखते हुए राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी और बिना दबाव के उन्हें अंतिम रूप दिया। विपक्ष खास तौर पर कांग्रेस ने इन सौदों पर प्रधानमंत्री को घेरने का हरसंभव प्रयास किया । 2019 के लोकसभा चुनाव में राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री को घेरने के लिए चौकीदार चोर है जैसा नारा बुलंद किया किंतु जनता ने उसे अनसुना करते हुए उनको पहले से अधिक सीटें देकर उनकी नीतियों का अनुमोदन कर दिया। जिसके बाद केंद्र सरकार का उत्साह और बढ़ा जिसके चलते उसने रक्षा सौदों के मामले में तेजी से निर्णय लेते हुए सेनाओं को अस्त्र - शस्त्रों से सुसज्जित करने का अभियान छेड़ा। 2014 में जब ये सरकार सत्ता में आई तब हमारी सेनाएं उनकी कमी से जूझ रही थीं जिसकी जानकारी सार्वजनिक होने से जनता का मनोबल गिरने लगा । लेकिन अब स्थितियाँ बदल गईं हैं। सर्जिकल स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमारी सैन्य शक्ति की क्षमता और श्रेष्ठता पूरी दुनिया के सामने प्रमाणित हो गई। विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की महत्वाकांक्षा पूरी होने के लिए जरूरी है हम सैन्य शक्ति के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर बनें। और उससे भी बढ़कर ये कि रक्षा उत्पादन में विदेशों पर हमारी निर्भरता घटने के बाद हम अपने अस्त्र - शस्त्रों का निर्यात कर सही मायनों में महाशक्ति बनें। गौरव का विषय है कि भारत ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिये हैं। वियतनाम के बाद अब इंडिनेशिया ने भी भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने का सौदा किया जिस पर उसकी राजधानी  जकार्ता में गत दिवस प्रधानमंत्री श्री मोदी ने  वहाँ के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के साथ हस्ताक्षर किये। इसके अलावा अन्य क्षेत्रों में व्यापारिक भागीदारी को लेकर भी अनेक समझौते किये गए जिनमें धरती से अंतरिक्ष तक चलने वाली अनेकानेक गतिविधियाँ शामिल हैं। लेकिन प्रधानमंत्री ने इंडोनेशिया के सबाँग बंदरगाह को विकसित करने का जो समझौता किया वह मलक्का जल डमरूमध्य में भारत की उपस्थिति को मजबूती प्रदान करने वाला है जिससे इस क्षेत्र के समुद्र में चीन के बढ़ते दबदबे को चुनौती दी जा सकेगी। उल्लेखनीय है दक्षिण एशिया के तमाम छोटे - छोटे देश चीन की विस्तारवादी नीतियों से भयभीत होकर भारत के साथ जुड़ना चाह रहे हैं। वियतनाम के बाद इंडिनेशिया के साथ हुए समझौते इसके प्रमाण हैं। जाहिर है भारत अब एक क्षेत्रीय महाशक्ति के तौर पर खुद को स्थापित करने में सफल हो रहा है। प्रधानमंत्री की ये यात्रा इस दिशा में बढ़ाया गया बड़ा कदम है। सबाँग बंदरगाह के विकास का अनुबंध चीन की उस चाल का सटीक जवाब है जो उसने हाल ही में बांग्लादेश के एक बंदरगाह को हथियाकर चली थी। पहले ये सौदा भारत के साथ होना था। इस प्रकार इंडोनेशिया की इस यात्रा से श्री मोदी ने एक साथ कई लक्ष्य साधे। मौजूदा वैश्विक हालातों में भारत की ये उल्लेखनीय सफलता है जिसका असर  निकट भविष्य में महसूस होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी