हाल ही में हुए जंतर मंतर आंदोलन के बाद ये अवधारणा तेजी से प्रचारित करवाई जा रही है कि निकट भविष्य में होने वाले चुनावों में जेन जी मतदाता नतीजों को प्रभावित करेंगे। अनेक विश्लेषकों के अनुसार युवा मतदाताओं का थोड़ा सा झुकाव भी उलटफेर करने वाला होगा। इसके साथ ही ये बात भी फैलाई जा रही है कि जेन जी धर्म और जाति जैसे मुद्दों से प्रभावित हुए बिना अपना निर्णय करेंगे। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि युवाओं का एक वर्ग अब राजनीति के स्थापित तौर - तरीकों से प्रभावित नहीं होता। इसीलिये परिवार के वरिष्ट सदस्यों और युवाओं की सोच में भिन्नता बढ़ रही है। किसी दल के प्रति लगाव रखने वाले युवा भी पार्टी की रीति - नीति पसंद न आने पर आलोचनात्मक टिप्पणी करने में भी नहीं हिचकते। ये बात भी सही है कि 2014 के लोकसभा चुनाव से ही युवा वर्ग नरेंद्र मोदी के प्रति आकर्षित रहा है। आयु में 20 वर्ष छोटे होने पर भी राहुल गाँधी युवाओं के बीच उतनी पैठ नहीं बना सके जो उन्हें सत्ता तक पहुंचा सके। इसीलिये वे इस वर्ग को लुभाने के लिए भरसक प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। बीते सप्ताह प्रयागराज में भी उन्होंने सार्वजनिक रूप से युवाओं से संवाद किया। उसके पहले भी वे अन्य शहरों में ऐसे आयोजन कर चुके थे। लेकिन जंतर मंतर पर जेन जी आंदोलन का नेतृत्व पूरी तरह नये चेहरों के पास होने से दिल्ली में होते हुए भी वे उससे अलग - थलग पड़ गए। और प्रधानमंत्री निवास पर नाटकीय तरीके से धरना देकर सुर्खियों में आये। गौर करने वाली बात ये है कि उस आंदोलन की संयोजक कॉकरोच जनता पार्टी ने भी श्री गाँधी को कोई महत्व नहीं दिया। उस आंदोलन पर जेएनयू के वामपंथी छात्र संगठनों ने अतिक्रमण कर लिया जिससे उसकी कोई दिशा तय नहीं हो सकी। कॉकरोच जनता पार्टी के कर्ता धर्ता भी इस घालमेल को समझ गए और राजनीतिक पार्टी बनाने के बजाय दबाव समूह के तौर पर काम करने का ऐलान कर दिया। लेकिन उनके द्वारा रास्वसंघ और भाजपा के विरुद्ध ज़हर उगलने से ये साबित हो गया कि वे पूर्वाग्रहों से ग्रसित है जिसके इरादे अभी भी गोपनीय हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो अभिजित दिपके दिल्ली से उठकर रांची में झारखंड सरकार के विरुद्ध आंदोलन कर रहे छात्रों के साथ खड़े होते किंतु दूर से ही जुबानी समर्थन के बाद घर बैठ गए। युवाओं के सबसे बड़े हितैषी बने राहुल ने भी रांची जाने से परहेज किया क्योंकि झारखंड सरकार को इंडिया गठबंधन का समर्थन है। वामपंथी छात्र संगठनों के कुछ नेता जरूर पहुंचे किंतु रांची आंदोलन से जुड़े छात्रों ने उनकी देश विरोधी नारेबाजी के कारण उनको उल्टे पाँव लौटा दिया। इससे एक बात स्पष्ट हो गई कि जेन जी को एक सांचे में ढालने वाले मुगालते में हैं। इसका दूसरा उदाहरण मिला प्रयागराज में जहाँ का मंच चूंकि श्री गाँधी ने सजाया इसलिए उ.प्र. के सत्ता संघर्ष में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही समाजवादी पार्टी ने उससे दूरी बनाई। इन सबसे एक बात सिद्ध हो रही है कि जेन जी को किसी एक खूंटे से बांधने के प्रयास सफल नहीं होंगे और विविधता भरे इस देश में उनकी पसंद - नापसंद का अंदाज तात्कालिक मुद्दों के आधार पर नहीं लगाया जा सकता। कल को अखिलेश यादव भी लखनऊ या अन्य किसी शहर में युवाओं का जमावड़ा करें तब क्या ये मान लिया जाएगा कि सारे जेन जी उनके पक्ष में जुड़ गए। कुल मिलाकर युवा असन्तोष को कोई एक स्वरूप देना बेहद कठिन है । एक दो आंदोलनों से पूरे देश की युवाशक्ति का मिजाज भांपकर निष्कर्ष निकालना भी जंतर मंतर और प्रयागराज आंदोलन की तरह प्रायोजित ही कहा जाएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि जंतर मंतर पर मनुवाद और ब्राह्मणवाद विरोधी जो नारेबाजी हुई उससे युवाओं के एक वर्ग में नाराजगी है। कोई कुछ भी कहे किंतु हमारे देश में चुनावी रणनीति जातीय समीकरणों से ही प्रभावित होती है। अखिलेश यादव पीडीए (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक ) का दामन नहीं छोड़ सकते तो अन्य जातीय जेन जी उनका समर्थन क्यों करेंगे? इसी तरह श्री गाँधी भी जातीय मुद्दे में उलझने के कारण सभी युवाओं को एकजुट नहीं कर पा रहे। जिस तरह हिन्दू हित की बात करने वाली भाजपा को पूरे हिन्दू समाज का समर्थन नहीं मिलता वैसे ही पूरे जेन जी को राजनीतिक रूप से गोलबंद करने की बात सोचना युवाओं की वैचारिक स्वतंत्रता पर संदेह करने जैसा है।
- रवीन्द्र वाजपेयी