रास्वसंघ के सरसंघचालक डाॅ. मोहन भागवत अपने पूर्ववर्ती संघ प्रमुखों की तुलना में ज्यादा मुखर हैं। इसका एक कारण ये भी है कि एक सदी की सफल यात्रा कर चुका संघ सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करवा चुका है। इसीलिये उसका आकर्षण और असर दोनों में वृद्धि हो रही है। देश के प्रत्येक भाग में संघ कार्य संचालित है। कुछ लोग इसका कारण देश के बड़े हिस्से में भाजपा का शासन होना भी मानते हैं किंतु इसका दूसरा पहलू ये भी है कि जहाँ संघ कार्य का विस्तार हुआ वहीं भाजपा भी मजबूत हुई। खैर, ये अलग विषय है। ताजा प्रसंग है डाॅ. भागवत द्वारा गत दिवस जेन जी से किया गया संवाद। उस दौरान उन्होंने विभिन्न समकालीन विषयों पर खुलकर अपने विचार प्रस्तुत किये । जेन जी की प्रशंसा करने के साथ ही उनके गुस्से को जायज मानते हुए उन्होंने एक बार फिर दोहराया कि हम इस उम्र में बड़ों की बात बिना विरोध किये मान लेते थे किंतु आज का युवा सवाल पूछता है और हमें उसका जवाब देना चाहिए। संघ , चूंकि समाज के बीच कार्य करता है लिहाजा पीढी़गत परिवर्तनों पर उसकी नजर रहती है। इसीलिये संघ प्रमुख समय - समय पर उनके बारे में सार्वजनिक तौर पर अपनी बात रखते हैं जिसे संघ का अधिकृत दृष्टिकोण माना जाता है। उनके अनेक बयान विवादास्पद भी हुए। मसलन 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान आरक्षण की समीक्षा संबंधी उनकी टिप्पणी को लालू प्रसाद यादव ने चुनावी मुद्दा बना दिया जिसका असर भाजपा की पराजय के रूप में सामने आया। उसके बाद डाॅ.भागवत इस संवेदनशील विषय पर बोलते हुए सावधानी बरतने लगे । गत दिवस भी उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि जब तक भेदभाव है आरक्षण जारी रहेगा। लेकिन उसी के साथ ये भी जोड़ दिया कि जो लोग आरक्षण से लाभान्वित हो चुके हों उन्हें खुद होकर इस सुविधा को छोड़ देना चाहिये। दूसरे शब्दों में कहें तो उनका संकेत उसी क्रीमी लेयर की ओर था जिसके विरोध में आरक्षित वर्ग के भीतर से ही आवाज उठने लगी है। हालांकि ओबीसी श्रेणी में संपन्न वर्ग आरक्षण की परिधि से बाहर है किंतु अनु. जाति और जनजाति पर क्रीमी लेयर जैसी कोई बंदिश नहीं होने से उनमें आरक्षण का लाभ पीढी़ दर पीढी़ चला आ रहा है। संयोग से गत दिवस ही सर्वोच्च न्यायालय में क्रीमी लेयर को आरक्षण से वंचित करने संबंधी याचिका पर अपने जवाब में केंद्र सरकार ने दो टूक कह दिया कि अनु. जाति और जनजाति पर क्रीमी लेयर की व्यवस्था लागू नहीं की जा सकती क्योंकि उसका अधिकार केवल संसद को ही है। स्मरणीय है कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय के कुछ न्यायाधीशों ने ही ये सवाल उठाया था कि पति - पत्नी दोनों आई.ए.एस हों तो उनके बच्चों को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए ? उनका ये भी कहना था कि शिक्षा और आर्थिक प्रगति से सामाजिक स्थिति बेहतर होने के बाद अगली पीढी़ को आरक्षण देने की आवश्यकता पर विचार हो। लेकिन शायद ही कोई होगा जिसने स्वप्रेरित होकर ये कहते हुए आरक्षण छोड़ा हो कि उसके बच्चों को इसकी जरूरत नहीं। रही बात संघ प्रमुख द्वारा की गई अपेक्षा की तो ये तभी संभव है जब संघ परिवार से ही इसकी शुरुवात हो। आरक्षण का प्रावधान संविधान में रखते हुए डाॅ. अंबेडकर ने भी जाति विहीन समाज की बात की थी। उनका कहना था कि जब तक समाज में छुआछूत और असमानता खत्म नहीं होती, तब तक पिछड़ों और शोषितों को सुरक्षा और प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। संघ प्रमुख ने भी विषमता रहने तक इसकी आवश्यकता जताई। ऐसे में क्रीमी लेयर अर्थात आरक्षण की मदद से शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से ऊपर उठ चुके लोगों द्वारा स्वेच्छा से आरक्षण छोड़ने जैसी मुहिम यदि संघ परिवार से जुड़े संगठनों के सदस्यों से शुरू हो तो वह भी किसी सामाजिक क्रांति से कम नहीं होगी। डाॅ. अंबेडकर ने भी आरक्षण को बैसाखी मानने से बचने की बात कहते हुए शिक्षित होने की बात कही थी। दलित विमर्श में भी ये बात सुनने मिलती है कि आरक्षण दर्द की दवा मात्र है, बीमारी का इलाज नहीं। ये बात इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि जो दलित बच्चा विद्यालय ही नहीं जायेगा उसे भविष्य में आरक्षण का लाभ कहाँ से मिलेगा? ये देखते हुए भागवत जी ने बात छेड़ ही दी है तो अब इसे आगे भी बढ़ाना चाहिए जिससे आरक्षण सामाजिक उत्थान का आधार बने न कि जातिगत विद्वेष का।
- रवीन्द्र वाजपेयी