Saturday, 19 September 2026

100 फीसदी टैरिफ : ब्रिक्स सम्मेलन की सफलता से बौखलाए ट्रम्प



नई दिल्ली में संपन्न ब्रिक्स सम्मेलन में भारत द्वारा चीन और रूस के साथ जुगलबंदी से भन्नाये अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की खिसियाहट भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने के रूप में सामने आई है। हालांकि ट्रम्प ने भारत पर अभी 100 फीसदी टैरिफ लागू तो नहीं किया किंतु उन्हें एक नए कानून के तहत रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर यह टैरिफ लगाने का अधिकार मिल गया है जिस पर उन्होंने गत दिवस हस्ताक्षर भी कर दिये। सैंक्शनिंग रशिया एक्ट 2026 नामक इस कानून से ट्रम्प को इसे लागू करने की  शक्ति मिल गई है। यद्यपि इसका ये अर्थ निकालना जल्दबाजी होगी कि भारत पर  तुरंत 100% आयात शुल्क  लग गया है। लेकिन राष्ट्रपति ट्रम्प को उक्त कानून बनने से तत्संबंधी अधिकार मिल गया है। दूसरी तरफ भारत ने इस कानून के पारित होने के बाद एक बार फिर साफ कर दिया है कि उसकी प्राथमिकता देश की ऊर्जा सुरक्षा है और वह अपनी जरूरत के हिसाब से जहाँ से चाहे  तेल खरीदता रहेगा। यदि ट्रम्प इस कानून से मिले अधिकार के अंतर्गत  भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने की धमकी को हकीकत में बदल देते हैं तब  हमारे देश से अमेरिका को टैक्सटाइल और ज्वैलरी के निर्यात  पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। लेकिन इनके अतिरिक्त वहाँ बसे भारतीय समुदाय के अलावा दक्षिण एशियाई देशों के अप्रवासी भी दैनिक उपयोग एवं खाने - पीने की जिन भारतीय चीजों का उपयोग करते हैं वे महंगी होने से उनकी मांग पर भी असर पड़ेगा जिससे भारत का व्यापार घाटा बढ़ने का खतरा है।  डोनाल्ड ट्रंप को मिला 100% टैरिफ वाला ब्रह्मास्त्र, भारत पर कितना असर डालेगा ये तो भविष्य ही बताएगा । लेकिन यह भी सच है कि  भारत भी चुप नहीं बैठेगा जिसका संकेत पहले ही विदेश मंत्रालय दे चुका है। ट्रम्प ने टैरिफ नामक आर्थिक हथियार का उपयोग दोबारा सत्ता हासिल करते ही शुरू कर दिया था। उनकी मुख्य खुन्नस भारत से है क्योंकि उसने अमेरिकी प्रतिबंधों की परवाह न करते हुए रूस से न सिर्फ कच्चे तेल की खरीद बड़ी मात्रा में जारी रखी बल्कि भारतीय रिफाइनरियों ने उस कच्चे तेल का शोधन कर उन यूरोपीय देशों को बेचकर  भरपूर धन अर्जित किया जिन्होंने अमेरिकी दबाव में रूस पर व्यापारिक प्रतिबंध लगा दिये थे। भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल को पेट्रोल और डीजल का रूप देकर निर्यात किये जाने से अमेरिका द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों की हवा निकल गई। डोनाल्ड ट्रम्प कई मर्तबा ये आरोप लगा चुके हैं कि भारत के इस कृत्य के चलते ही रूस को जमकर कमाई हुई और वह यूक्रेन युद्ध को इतना लम्बा खींचने में सक्षम हो सका। हालांकि ट्रम्प की नाराजगी चीन से भी है किंतु  उसने रेयर मिनरल की आपूर्ति रोकने की धमकी देकर उनके हौसले ठंडे कर दिये। भारत से ट्रम्प की चिढ़ वैसे तो ऑपरेशन सिंदूर के दौरान बढ़ी जब भारतीय मिसाइलों ने पाकिस्तान के उन महत्वपूर्ण सैनिक ठिकानों के साथ आयुध भंडारों पर कहर बरपाया जिनके बारे में ये आशंका व्यक्त की गई कि अमेरिका ने अपने परमाणु हथियार इन भंडारों में छिपा रखे हैं। और जब युद्ध विराम करवाने के ट्रम्प के दावों को भी भारत ने झुठला दिया तब उनकी त्यौरियाँ और चढ़ गईं। अपना दबदबा दिखाने के लिए उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अनेक मर्तबा अमेरिका आने का संदेश भेजा जिसे प्रधानमंत्री ने महत्व नहीं दिया। लेकिन हालिया ब्रिक्स सम्मेलन में भारत की कूटनीतिक सक्रियता अमेरिका को रास नहीं आ रही। रूस और चीन के राष्ट्रपति क्रमशः पुतिन और जिनपिंग के साथ श्री मोदी की नजदीकी ने ट्रम्प को चिंता में डाल दिया। जिनपिंग ने उक्त सम्मेलन में जिस मज़बूती से पश्चिम के आर्थिक प्रभुत्व को नकारा उसने ट्रम्प का गुस्सा और बढ़ा दिया। इस आग में घी डाला ब्रिक्स देशों द्वारा डॉलर की बादशाहत कम करने के लिए एक - दूसरे की मुद्रा में ज्यादा से ज्यादा लेनदेन करने संबंधी संकल्प पारित कर। ट्रम्प को लगता है इस मुहिम के शिल्पकार नरेंद्र मोदी ही हैं। इसीलिए  ट्रम्प ने ब्रिक्स सम्मेलन खत्म होते ही 100 टैरिफ नामक दबाव का उपयोग किया। लेकिन वे भूल रहे हैं अब तक उनका ये दाँव कारगर नहीं हुआ। भारत, रूस और चीन के अलावा ब्राजील और द. अफ्रीका जैसी बड़ी  अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों ने भी ट्रम्प के टैरिफ आतंक के सामने झुकने से इंकार कर दिया। ईरान के साथ लड़ाई में बुरी तरह फंसे ट्रम्प बदहवासी में और भी ऊटपटांग फैसले ले सकते हैं। लेकिन वे भूल रहे हैं कि उनके ऐसे फैसले अमेरिका की साख और धाक दोनों का सत्यानाश कर रहे हैं और इस निर्णय का भी वही हश्र होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी
 

Friday, 18 September 2026

हम तो डूबे हैं , तुम को भी ले डूबेंगे की नीति पर चल रहा ईरान



इजराइल और हमास के बीच चली जंग का विस्तार अब पूरे अरब जगत  में हो चुका है। इसका प्रथम दृष्ट्या दोषी ईरान को ही माना जाएगा क्योंकि जब उसके ऊपर अमेरिका और इसराइल का हमला हुआ तब पलटवार करते हुए उसने उन खाड़ी देशों पर भी मिसाइलें दागने में लेशमात्र संकोच नहीं किया जिनमें अमेरिकी  सैन्य अड्डे हैं। वहाँ तक भी बात ठीक थी । लेकिन ईरान ने इससे आगे बढ़कर उन देशों के तेल शोधन संयंत्रों पर हमले शुरू कर  दिये। दुबई में तो दुनिया की सबसे ऊँची इमारत सहित होटलों को भी निशाना बनाकर वहाँ आने वाले पर्यटकों के साथ ही उन निवेशकों को भी भयभीत कर दिया जिन्होंने यहाँ अपना काफी पैसा रखा था। इसके अलावा कतर और ओमान जैसे देश भी ईरान के हमलों का शिकार हुए तो दूसरी तरफ से भी जवाबी कारवाई होने लगी। ईरान ने इसराइल  के हवाई सुरक्षा चक्र को तोड़कर अपनी आक्रामक क्षमता का लोहा मनवाया ही किंतु उसके गुस्से का सबसे बड़ा शिकार हुआ सऊदी अरब जो अपनी अपार तेल संपदा के बल पर प. एशिया का सबसे संपन्न और शक्तिशाली मुस्लिम देश माना जाता है। मुसलमानों का सबसे पवित्र स्थल मक्का भी चूंकि सऊदी अरब में स्थित है लिहाजा पूरे विश्व से मुस्लिम तीर्थयात्री हज  करने सऊदी अरब आते हैं। और फिर सऊदी अरब मुस्लिम जगत में अमेरिका का सबसे निकटस्थ देश है। कहा जाता है यहाँ के शाही परिवार ने खरबों डॉलर का निवेश वहाँ कर रखा है। इसीलिए कट्टर मुस्लिम देश होने के बावजूद शाही परिवार और अमेरिका के बीच काफी मजबूत रिश्ते रहे हैं । विशाल तेल भंडारों के साथ ही  तेल शोधन संयंत्रों के चलते सऊदी अरब, तेल  व्यापार में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। दुनिया भर में इस्लाम के प्रचार - प्रसार हेतु इसका शाही परिवार काफी धन उपलब्ध करवाता है। लेकिन ईरान चूंकि इस्लाम के शिया संप्रदाय का पालन करता है इसलिए उसकी सऊदी शाही खानदान से पटती नहीं है। उसे ये भी लग रहा था कि इस लड़ाई में अमेरिका के कूदने में सऊदी अरब का भी हाथ है । इसका खुलासा तब हो गया जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने तमाम खाड़ी देशों से अमेरिकी संरक्षण के एवज में धन की मांग की तब सबसे पहले सऊदी अरब ने ही हाथ बढ़ाया। इसीलिए ईरान उससे बुरी तरह चिढ़ गया और उसके तेल शोधन संयत्रों को चुन - चुनकर निशाना बनाया। इसके बाद उसने होर्मुज नामक जल मार्ग में रोड़ा अटकाकर तेल उत्पादक सभी देशों की आर्थिक  हालत खराब कर दी। इससे बचने के लिए जब सऊदी अरब ने वैकल्पिक समुद्री मार्ग से तेल निर्यात की तैयारी की तो ईरान ने हूती नामक कट्टरपंथी इस्लामिक लड़ाकों को सऊदी अरब पर हमले के लिए उकसा दिया। स्मरणीय है हमास की तरह से हूती भी ईरान पालित इस्लामिक उग्रवादी हथियारबंद संगठन है। बीते कुछ दिनों से हूती लड़ाकों ने सऊदी अरब की जिस तरह घेराबंदी कर रखी है उससे वहाँ दहशत का माहौल है। वहाँ के शाही परिवार ने पाकिस्तान और अमेरिका से मदद की गुहार लगाई किंतु वह भी काम नहीं आई। इसके कारण ईरान का हौसला और बुलंद हो गया। हूती का बढ़ता दबाव इसका प्रमाण है। अमेरिका और इसराइल के साथ जंग में ईराक भी खंडहर हो चुका है। उसकी तेल उत्पादन क्षमता भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसराइल और अमेरिका भले ही ईरान में सत्ता परिवर्तन करवाने में विफल रहे किंतु उन्होंने  उसके अर्थतंत्र को इतना तबाह तो कर ही दिया कि आने वाले कई दशकों तक वह पहले जैसे खड़ा नहीं हो सकेगा। इसीलिए ईरान के मौजूदा हुक्मरान इस पर आमादा हो गए हैं कि तेल उत्पादक बाकी देशों को भी आर्थिक तौर पर कमजोर कर दिया जाए। सऊदी अरब चूंकि सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति है इसलिए ईरान ने हूती लड़ाकों को उसके विरुद्ध उतार दिया। परिणाम स्वरूप दुनिया भर में कच्चा तेल महंगा होने लगा।  ईरान द्वारा हम तो डूबेंगे, तुम को भी ले डूबेंगे वाली रणनीति पर चलने से समूचा अरब जगत तबाही के रास्ते पर बढ़ता लग रहा है। दुनिया में कच्चे तेल और गैस के जो दूसरे उत्पादक देश हैं उनका व्यापार जिस तरह से चमक उठा उससे वैश्विक आर्थिक व्यवहार बदलने की राह पर है। अमेरिका और इसराइल ने जिस तरह ईरान को बर्बादी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया उसी तरह ईरान भी बदले की भावना से बाकी तेल उत्पादक देशों को तबाही की खाई में धकेलने ओर आमादा है। यदि यही चला तो इस आपसी लड़ाई में प. एशिया का कच्चे तेल  रूपी ये हथियार बेअसर होकर रह जाएगा। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 17 September 2026

भारत का बढ़ता सम्मान मोदी की सबसे बड़ी सफलता



राजनीति के अपने रंग - ढंग हैं जिनमें चुनावी जीत ही सब कुछ मानी जाती है। सिद्धांतों के नाम पर ढोंग नेताओं की पहचान और अपना हित साधना आदर्श बन गया है। लोकतंत्र के कंधों पर नये सामंत सवार  हैं। विचारधारा के पोषक  मजाक का पात्र बन रहे हैं। स्वाधीनता के बाद का एक दशक छोड़ दें तो उसके बाद सियासत प्रदूषित होती चली गई । ऐसे में एक शख्स ने  सबका साथ, सबका विकास , सबका विश्वास जैसे संकल्प के साथ बागडोर संभाली और 12 वर्षों में भारत को एक मजबूत आर्थिक और सैन्य शक्ति के तौर पर स्थापित कर दिया। इस व्यक्ति का नाम है नरेंद्र मोदी जिनका आज 76 वां जन्मदिन है। गुजरात के  मुख्यमंत्री के रूप में विकास का पर्याय बनकर प्रभावित करने वाले श्री मोदी को जब भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के चेहरे के तौर पर प्रस्तुत किया तब आम भारतीय के मन में भी उत्साह नजर आया जिसके फलस्वरूप भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला। 12 वर्षों में एक भी छुट्टी नहीं लेने वाले प्रधानमंत्री ने जनता की उम्मीदों  को पूरा करने का अभियान पदभार ग्रहण करते ही प्रारंभ कर दिया था। हालांकि जन कल्याण की योजनाओं में घुसे बिचौलियों और दलालों को हटाने के लिए  जनधन खाते खुलवाये जाने पर  खूब सवाल उठे।  स्वच्छता अभियान और शौचालय जैसे अभियान का भी मजाक उड़ाया गया। उज्ज्वला सहित प्रधानमंत्री आवास योजना की सफलता पर भी संदेह व्यक्त किये गए। लेकिन इनकी वजह से  लोगों के जीवन स्तर में जो  सुधार  आया वह एक तरह की  सामाजिक क्रांति ही है। इसीलिये अगले  लोकसभा चुनाव में श्री मोदी को पहले से अधिक जन समर्थन मिला। यद्यपि उसके बाद के साल बेहद कठिनाइयों से भरे रहे। कोरोना नामक महामारी ने पूरे विश्व को चपेट में ले लिया। लेकिन जब विकसित कहे जाने वाले देश अपने नागरिकों की रक्षा करने में असमर्थ नजर आ रहे थे तब भारत में कोरोना का टीकाकरण अभियान जिस तरह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ उसने देश की आपदा प्रबंधन क्षमता से विश्व को परिचित करवाया। मुसीबत के उस दौर में करोड़ों लोगों को निःशुल्क अनाज  के साथ ही गरीबों के खातों में नगदी राशि ट्रांसफर जैसी व्यवस्थाओं ने देश को अराजकता से बचा लिया। वरना भूख के वशीभूत लोग श्रीलंका और नेपाल जैसे हालात उत्पन्न कर  सकते थे। लॉक डाउन के  दौरान अधो संरचना के बड़े - बड़े काम संचालित कर विकास के पहियों को चलायमान रखने की सोच श्री मोदी की दूरदर्शिता का जीवंत प्रमाण है। विश्व के अनेक छोटे  देशों को भी उपहार में वैक्सीन देने के निर्णय ने उनकी छवि वैश्विक नेता की बना दी। वहीं आपदा में अवसर खोजने की सोच ने देश को दवा उत्पादन में अग्रणी बना दिया। सैन्य सामग्री के मामले में आत्मनिर्भर बनने उठाये गए कदमों का ही सुपरिणाम है कि भारत इस क्षेत्र में निर्यातक के तौर पर उभर सका। 2024 में भले ही उन्हें स्पष्ट बहुमत न मिला हो किंतु जन भावनाओं के अनुरूप वे तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। उनकी विशेषता ये है कि सत्ता में आने के बाद भी वे सैद्धांतिक प्रतिबद्धता नहीं भूले । राम मंदिर, तीन तलाक़, धारा 370 , वक्फ संशोधन , और शिक्षा नीति के बारे में लिए  फैसले उनकी दृढ़ता का प्रमाण हैं। एक देश एक चुनाव और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों पर भी सरकार आगे बढ़ रही है। उत्तर पूर्वी राज्यों में विकास की गंगा बहाने से वे मुख्य धारा से जुड़ने लगे हैं। कश्मीर घाटी में श्रीनगर तक भी रेल पहुँच गई है। सुरक्षा व्यवस्था की मजबूती बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पूरी दुनिया ने देखी। नक्सली आतंक की समाप्ति और कश्मीर सहित देश के अनेक हिस्सों में देश विरोधी तत्वों की कमर तोड़ना मोदी सरकार की बड़ी कामयाबी है। आज का भारत विश्व की बड़ी अर्थव्यस्थाओं को टक्कर देने में समर्थ है। अमेरिका द्वारा थोपे गए टैरिफ का जिस मजबूती से जवाब दिया गया वह प्रधानमंत्री के कूटनीतिक कौशल को दर्शाता है। उनके कार्यकाल में देश ने जो अर्जित किया उसकी सूची बहुत लंबी है। कुछ विफलताएं भी इस दौरान देखने मिलीं किंतु ये कहना गलत नहीं है कि श्री मोदी ने हर भारतीय में अभूतपूर्व आत्मविश्वास भर दिया। दुनिया में आज भारत की जो धाक है उसमें उनके योगदान को नकारना असंभव है। हाल ही में संपन्न ब्रिक्स सम्मेलन इसका जीवंत प्रमाण है। हालांकि आज भी गरीबी और बेरोजगारी जैसी समस्याएं हैं और देश के अनेक इलाके पिछड़ेपन का शिकार हैं। लेकिन प्रधानमंत्री  जिस ईमानदारी और समर्पण भाव से जुटे हुए हैं उससे लगता है सबका विकास रूपी  नारा हकीकत में बदलकर रहेगा। 76 साल की उम्र में उनमें किसी युवक से ज्यादा ऊर्जा है । उनके नेतृत्व में भाजपा का जो विस्तार हुआ वह बड़ी उपलब्धि है। बिहार और प.बंगाल इसके उदाहरण हैं। वे दीर्घायु हों और देश को विकास के उच्चतम शिखर तक ले जाएं यही मंगलकामना है।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 16 September 2026

सऊदी अरब के इसराइल की शरण में जाने से मुस्लिम देशों की एकता खतरे में



प. एशिया में दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त की कहावत चरितार्थ हो रही है। यू.ए.ई, कतर, जार्डन, मिस्र जैसे मुस्लिम देशों ने तो पहले से ही इसराइल से रिश्ते सुधारकर उसकी पिटाई से बचने का इंतजाम कर लिया किंतु  इस्लामिक देशों के मुखिया सऊदी अरब और इसराइल में राजनयिक रिश्ते कायम नहीं हो सके। सऊदी अरब में इस्लाम का सबसे पवित्र स्थल मक्का होने से दुनिया भर के मुस्लिम  हज करने  आते हैं। अमेरिका ने सऊदी अरब और इसराइल को नजदीक लाने का प्रयास किया भी  किंतु हमास द्वारा इसराइल में की गई हिंसक कार्रवाई से बात आगे नहीं बढ़ सकी। और फिर इसराइल की जो लड़ाई हमास तथा ईरान से चल रही थी उसमें अमेरिका भी कूद पड़ा। शुरुआत में  लग रहा था कि ईरान कुछ दिनों में ही घुटने टेक देगा परंतु उसने युद्ध के दायरे को बढ़ाते हुए यू.ए.ई , कतर, ओमान जैसे पड़ोसी देशों पर तो हमले किये ही सऊदी अरब और जॉर्डन तक को लपेटे में ले लिया। सबसे ज्यादा नुकसान सऊदी अरब को हुआ जिसकी कई रिफ़ायनरी ईरान के हमलों में तबाह हो गईं। इसका असर उसके तेल निर्यात पर पड़ने से अर्थव्यवस्था खतरे में आ गई । ईरान द्वारा होर्मुज समुद्री जलमार्ग अवरुद्ध किये जाने से तेल उत्पादक अन्य देशों के सामने भी मुसीबत खड़ी हो गई । यद्यपि लड़ाई लंबी खिंचने से अमेरिका की मारक क्षमता में कमी आई है वहीं ईरान भी कुछ ठंडा पड़ा है।  लेकिन एक नया मोर्चा यमन में सक्रिय इस्लामिक उग्रवादी संगठन हूती ने सऊदी अरब में खोल दिया। हमास को तो इसराइल ने काफी कमजोर कर दिया वहीं हिजबुल्ला  की कमर भी तोड़कर रख दी परंतु हूती के लड़ाके अब समुद्री जहाजों का अपहरण करने से आगे बढ़कर सऊदी अरब पर हमलावर हैं। हमास और हिजबुल्ला की तरह ही हूती भी ईरान पालित आतंकवादी संगठन ही है जिसके पास ड्रोन और मिसाइल जैसे अत्याधुनिक अस्त्र - शस्त्र हैं। सऊदी अरब  उसके हमलों से घबराहट में है। मक्का सुरक्षा संधि के अंतर्गत हाल ही में सऊदी अरब और पाकिस्तान इस बात पर रजामंद हुए थे कि दोनों पर किसी अन्य देश द्वारा किये गए हमले की स्थिति में दूसरा  उसको सैन्य सहायता प्रदान करेगा। सऊदी अरब को उम्मीद थी हूती के हमलों का मुकाबला करने में पाकिस्तान उसकी मदद के लिए दौड़ा आयेगा। लेकिन उसने  साफ इंकार कर दिया। सऊदी अरब ने मदद की गुहार अमेरिका से भी लगाई किंतु डोनाल्ड ट्रम्प ने भी ठेंगा दिखा दिया। उसके बाद मरता क्या न करता की तर्ज पर उसने हूती विद्रोहियों के बढ़ते खतरों से निपटने के लिए अमेरिकी सेंट्रल कमांड  के माध्यम से इज़राइल से अप्रत्यक्ष रूप से खुफिया मदद मांगी है। असल में लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के पास हूती लड़ाकों की बढ़ती आक्रामकता से सऊदी अरब के तेल और नागरिक बुनियादी ढांचे को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। स्मरणीय है सऊदी अरब के इसराइल से औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं और उसने  इज़राइल को मान्यता भी नहीं दी । बावजूद इसके अमेरिकी मध्यस्थता से  सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने हूतियों की सैन्य गतिविधियों और भावी योजनाओं का पता लगाने के लिए इज़राइल से खुफिया जानकारी देने का अनुरोध किया है। प.एशिया के  समीकरणों में ये बहुत बड़ा बदलाव है। सऊदी अरब द्वारा पाकिस्तान रूपी इस्लामिक देश से धोख़ा खा जाने के बाद मुस्लिमों  के ऐलानिया दुश्मन  इजरायल पर भरोसा जताने से ये स्पष्ट हो गया है कि इस्लामिक देशों के मन में इसराइल विरोधी कट्टरता ढलान पर आने लगी है। दरअसल बीते कुछ दिनों में हूतियों द्वारा  तेल  और पंपिंग सुविधाओं को निशाना बनाये जाने से सऊदी अरब को अपनी मुख्य तेल पाइपलाइन का काम बंद करना पड़ा था। इसके अलावा हूती विद्रोहियों ने लाल सागर के किनारे द्वीपों पर कब्जा करना शुरू कर दिया और सऊदी  जहाजों को  रोककर उसकी आर्थिक नाकेबंदी कर दी है। सुना है  कुछ अन्य मुस्लिम देश भी ईरान के हमलों से बचने के लिए इसराइल से गुप्त  रूप से मदद मांगने की तैयारी में हैं क्योंकि उन्हें लग गया है कि पाकिस्तान  का कोई भरोसा नहीं और अमेरिका हर सहायता की कीमत वसूलता है। यदि ऐसा हो गया तब इस्लामिक सहयोग संगठन (ओ. आई. सी) का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा जिसमें 57 मुस्लिम देश शामिल हैं। वैसे भी सऊदी अरब और इसराइल में यदि नजदीकी बढ़ी तब मुस्लिम जगत का कई टुकड़ों में विभाजित होना तय जो इसराइल के विरोध में एकजुट रहा है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 15 September 2026

राजस्थान : सवर्णों की नाराजगी और युवाओं के गुस्से का लाभ नहीं उठा सकी कांग्रेस



राजस्थान के 309 नगरीय निकायों के जो चुनाव परिणाम गत दिवस घोषित हुए उनसे भाजपा को काफी राहत मिली होगी। वरना यूजीसी अधिनियम के बाद सवर्ण जातियों में पनपे गुस्से और उसके बाद  नीट पेपर लीक से युवाओं में बह रही असंतोष की लहर के कारण न सिर्फ विरोधी ही ये मान बैठे थे कि भाजपा का सूपड़ा साफ होना तय है अपितु भाजपा के भीतरखानों में भी निराशाजनक नतीजों की सुगबुगाहट साफ  महसूस हो रही थी। दरअसल 2023 में जब वसुंधरा राजे सहित पार्टी के अन्य दिग्गजों को किनारे धकेलते हुए भजनलाल शर्मा नामक पहली बार के विधायक को मुख्यमंत्री बनाया गया तभी से भाजपा के इस पुराने गढ़ में उसकी पकड़ कमजोर होने की आशंका व्यक्त की जाने लगी थी। श्री शर्मा की पार्टी संगठन में जरूर भूमिका रही किंतु सत्ता के समीकरणों में वे कहीं भी फिट नहीं हुए। पार्टी की गुटबाजी में भी उनका कोई स्थान नहीं रहा। ढाई साल के भीतर बतौर मुख्यमंत्री वे ऐसा कोई करिश्मा नहीं कर सके जिससे उनकी छवि एक लोकप्रिय या प्रभावशाली शासक के तौर पर स्थापित हो पाती। इस राज्य में ब्राह्मण आबादी काफी है और उसका बड़ा हिस्सा भाजपा का परंपरागत समर्थक भी रहा है। इसी जाति का मुख्यमंत्री बनवाकर पार्टी ने राष्ट्रीय स्तर पर सवर्णों को खुश करने का दाँव चला। मुख्यमंत्री के अलावा दो उपमुख्यमंत्री रखना भाजपा की घोषित रणनीति बन गई है जो राजस्थान के साथ ही छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में भी अपनाई गई। लेकिन इन तीनों में श्री शर्मा ही सबसे अनुभवहीन माने गए। इसीलिए नगरीय निकाय चुनावों को उनके राजनीतिक चातुर्य और प्रशासनिक दक्षता की परीक्षा माना जा रहा था। चूंकि 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली जोरदार सफलता महज कुछ महीनों बाद हुए लोकसभा चुनाव में दोहराई नहीं जा सकी इसलिए ये कयास लगने शुरू हो गए कि शर्मा जी शायद ही अपना कार्यकाल पूर्ण कर पाएंगे। और 2028 का विधानसभा चुनाव किसी और के चेहरे पर लड़ा जाएगा। राज्य में भाजपा के जो नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नजर गड़ाये बैठे हैं वे भी नगरीय निकाय चुनावों में भाजपा के लचर प्रदर्शन का इंतजार कर रहे थे ।  लेकिन उनको निराशा हाथ लगी क्योंकि जो परिणाम आये उनको बहुत संतोषजनक तो नहीं कहा जा सकता परंतु वर्तमान राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों में किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी के लिए ये संतोष प्रदान करने वाले हैं। विशेष रूप से इसलिए कि भाजपा के जो प्रतिबद्ध मतदाता उससे रुष्ट चल रहे थे उन्होंने कांग्रेस को समर्थन देने के बजाय निर्दलीयों के कंधे पर हाथ रख दिया। बड़ी संख्या में उनका जीतकर आना इसका संकेत है। अनेक निकायों में तो उनके हाथ ही सत्ता की कुंजी है । ये कहा जा रहा है कि ज्यादातर निर्दलीय भाजपा के असंतुष्ट होने से वे अंततः उसी के पाले में आ जाएंगे। वैसे जयपुर, भीलवाड़ा, कोटा और उदयपुर में भाजपा का महापौर बनना तय है। बीकानेर नगर निगम में कांग्रेस को स्पष्ट जीत मिली है। वहीं जोधपुर, भरतपुर, अजमेर और पाली का महापौर निर्दलीय तय करेंगे। अजमेर और पाली में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। चुनाव आयोग के अनुसार भाजपा राज्य में 4178 वार्डों में  तो कांग्रेस पार्टी ने 3612 वार्डों जीती। जबकि कुल 2273 निर्दलीय प्रत्याशी जीतने में सफल रहे। हालांकि कुछ नतीजों को भाजपा के लिए झटका भी कहा जा सकता है क्योंकि बीकानेर में वह पूरी तरह पिट गई वहीं जोधपुर, अजमेर जैसे महत्वपूर्ण शहरों में बहुमत से दूर रह गई। लेकिन उसके लिए खुशी मनाने वाली बात ये है कि कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर उत्पन्न करने में नाकामयाब साबित हुई। सवर्णों की नाराजगी और युवाओं के गुस्से को अपने पक्ष में मोड़ने में कांग्रेस नेतृत्व असफल रहा जिसके कारण भाजपा से नाराज उसके परंपरागत मतदाताओं ने निर्दलीयों की लॉटरी खोल दी। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को राजस्थान के इन नतीजों ने चैन की सांस लेने का अवसर दे दिया जो म.प्र और बिहार के दो विधानसभा उपचुनाव परिणाम के बाद चिंता में डूबा था।  दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के कारण भी भाजपा दबाव में थी जिसके नेता राजस्थान में भी दौरा करते रहे। रही बात कांग्रेस की तो अशोक गहलोत और सचिन पायलट की लड़ाई उसकी स्थायी मुसीबत बन गई है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 14 September 2026

हिन्दी को सबसे अधिक खतरा हिन्दी भाषियों से ही है



आज एक तरह से हिन्दी का सरकारी जन्मदिवस है। 14 सितम्बर 1953 को राजभाषा दिवस की घोषणा हुई। समय बीतने के साथ  सप्ताह , पखवाड़ा और मास भी मनाए जाने लगे । वैसे तो ये गौरव की बात है कि अनेकानेक प्रांतीय भाषाओं के बावजूद ऐसे आयोजनों में  हिन्दी का गुणगान करते हुए उसकी सहजता और सरलता की प्रशंसा के साथ ही उसे अपनाने का वचन लिया जाता है। इस दौरान विभिन्न प्रतियोगिताएँ , पुरस्कार  , सम्मान  , गोष्ठियां , कवि सम्मलेन, पोस्टर - बैनर , जैसी अनेक गतिविधियां भी होती हैं।  केंद्र  सरकार के सभी विभागों तथा उपक्रमों में राजभाषा अधिकारी नियुक्त हैं जिनका दायित्व गैर हिन्दी भाषियों कर्मियों को हिन्दी के अधिकतम उपयोग  के लिये प्रेरित और  प्रशिक्षित करना है। उनके प्रयासों से निःसंदेह शासकीय  प्रतिष्ठानों में हिन्दी का उपयोग काफी बढ़ा है। यद्यपि भाषावार प्रान्तों के गठन से उत्पन्न क्षेत्रीयता की भावना हिन्दी के विरोध का कारण बनती रही है। इसके चलते  चुनावी राजनीति ने भाषा को भी वोट बैंक का जरिया बना दिया। उदाहरण के लिए  पूर्व केंद्रीय मंत्री डी. राजा  हिन्दी थोपने का आरोप लगाते हुए केन्द्र सरकार को अलग तमिल देश की धमकी तक दे चुके हैं। महाराष्ट्र में भी उद्धव ठाकरे की शिवसेना और राज ठाकरे की मनसे मराठी भाषा के नाम पर लोगों को भड़काने का काम करती रही हैं। हाल ही में वहाँ भाजपा और शिवसेना ( शिंदे) सरकार ने सभी गैर मराठी भाषी ऑटो और टैक्सी चालकों को निश्चित समय सीमा में कामचलाऊ मराठी सीखने जैसा बेतुका फरमान जारी कर दिया।  अन्य राज्यों में भी इसी प्रकार क्षेत्रीय भाषा के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेकने का प्रयास होता रहता है। हालांकि संतोष का विषय है कि उत्तर भारतीय राज्यों में अदालतों के अलावा राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर की  प्रतियोगी परीक्षाओं में भी हिन्दी को मान्यता मिल गयी है। देश के सबसे बड़े अलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा हाल ही के वर्षों में 20 हजार से अधिक  फैसले हिन्दी में लिखे जाने संबंधी जानकारी से हिन्दी प्रेमियों को सुखद अनुभूति हुई । लेकिन इसका विरोधाभासी पहलू  ये है कि हिन्दी जिस वर्ग की मातृभाषा है उसमें ऐसे लोगों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है जो हिन्दी के प्रति उपेक्षाभाव ही नहीं रखते अपितु उसका मजाक उड़ाने तक से बाज नहीं आते । पहले संपन्न वर्ग ही अंग्रेजी को सभ्यता और आधुनिकता का प्रतीक मानकर उसके प्रति आकर्षित दिखता  था परंतु अब तो मध्यम आय वर्ग में भी जिस तरह उसके प्रति अनुराग बढ़ा उससे सांस्कृतिक प्रदूषण बढ़ रहा है। अँग्रेजी माध्यम को उज्ज्वल भविष्य की गारंटी मान लेने की सोच के चलते विद्यालायीन स्तर पर पढ़ाई का स्वरूप ही पूरी तरह से बदल गया।  गली -  गली नजर आने वाले  कान्वेंट स्कूल के बोर्ड  इसका प्रमाण हैं । यदि इनमें  पढ़ने वाले निम्न आय वर्ग परिवारों के बच्चे काम चलाऊ अंग्रेजी ही सीख जाएँ तो भी संतोष है परंतु अंग्रेजी की चकाचौंध में वे हिन्दी में ही कमजोर हो जाते हैं। इस अधकचरेपन  के लिये  वे अभिभावक भी जिम्मेदार हैं जो अंग्रेजी की मृगमरीचिका में अपनी संतानों को उनकी  मातृभाषा से ही दूर कर बैठते हैं । यद्यपि भारत में हिन्दी को समाप्त करना असंभव  है क्योंकि वही  राष्ट्रीय स्तर की संपर्क भाषा है। इसीलिए  तमिलनाडु सहित अन्य दक्षिणी राज्यों के लोग उत्तर  भारत में नौकरी अथवा व्यवसाय करने में लेशमात्र भी  संकोच नहीं करते। इसी तरह उप्र - बिहार के श्रमिक  बड़ी संख्या में दक्षिणी राज्यों में भी कार्यरत हैं। कोरोना काल में महानगरों से मजदूरों की  घर वापसी के समय ये बात उजागर हुई कि गैर हिन्दी भाषी राज्यों में भी इन श्रमिकों का कोई विरोध नहीं है। ये देखते हुए हिन्दी भाषी लोगों को अपनी भाषा के प्रति उपेक्षाभाव त्यागना चाहिए । भाषा के रूप में अंग्रेजी  सीखना कतई बुरा नहीं है । लेकिन उसके जरिए आ रहे संस्कार समाज के लिए घातक हैं। विचारणीय है कि अंग्रेजी साहित्य और संस्कृति का प्रभाव आजादी के 80 वर्ष  बाद भी यथावत है। इतिहास साक्षी है कि विदेशी भाषा के आधिपत्य ने अनेक देशों की सांस्कृतिक पहिचान को नष्ट कर दिया। ये देखते हुए कुछ दिनों तक चलने वाले सरकारी और गैर सरकारी  आयोजन  प्रचार - प्रसार की दृष्टि से तो अच्छे हैं लेकिन जब तक अपनी मातृभाषा के उपयोग के लिए  हिन्दी भाषी ही आकर्षित नहीं होते तब तक सरकारी संरक्षण चाहे कितना मिल जाए परंतु वह उपेक्षित ही रहेगी। तामिलनाडु  के नेताओं का  हिन्दी विरोध तो राजनीतिक स्वार्थ पर आधारित है किंतु हिन्दी भाषी राज्यों में हिन्दी की उपेक्षा समझ से परे है। मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा हेतु बनी नई शिक्षा नीति इस दिशा में अच्छा कदम है किंतु उसे ईमानदारी से अपनाना जरूरी है क्योंकि हिन्दी को सबसे ज्यादा खतरा हिन्दी भाषियों से ही है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 12 September 2026

जी 7 का मजाक उड़ाकर पुतिन ने खोला नया मोर्चा



रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन वर्तमान विश्व के सबसे वरिष्ट राष्ट्राध्यक्ष हैं। वर्ष 2000 से लगातार वे रूस जैसी विश्व शक्ति का नेतृत्व करते आ रहे हैं। सोवियत संघ के बिखराव के बाद रूस आर्थिक बदहाली के साथ ही राजनीतिक अस्थिरता में फंस चुका था। उद्योग ठप पड़ने से विश्व व्यापार में उसकी हिस्सेदारी नगण्य थी। दरअसल सोवियत संघ के दौर में पूर्वी यूरोप के साम्यवादी देश उसके आर्थिक उपनिवेश थे किंतु अचानक सब उलट - पुलट हो गया। सोवियत संघ तो टुकड़ों में बँटा ही उसके प्रभावक वाले साम्यवादी देश भी मुक्त अर्थव्यवस्था के प्रति आकर्षित होकर अमेरिका की तरफ झुकने लगे।  कभी - कभी तो लगा रूस भी अमेरिका का पिट्ठू बनकर रह जाएगा।  चीन ने भी  उसके साथ सटी सीमा में अपनी चिर  - परिचित हरकतें शुरू कर दीं। ऐसे में रूस की खुफिया एजेंसी के.जी.बी के पूर्व प्रमुख पुतिन ने जब सत्ता संभाली तब किसी को उम्मीद नहीं थी कि वे देश को संकट से उबारकर विश्व शक्ति की हैसियत वापस दिलवा सकेंगे। लेकिन अपने दृढ इरादों का परिचय देते हुए उन्होंने  रूस को आर्थिक और सैन्य क्षेत्र में एक बार अग्रणी देशों के बीच  ला खड़ा किया । साथ ही कूटनीति रूपी शतरंज में भी अपनी चालों से सभी को चकित कर दिया। यही कारण है कि पूरा विश्व उनके फैसलों को गंभीरता से लेता है। शुरुआत में ऐसा लग रहा था कि यूक्रेन के साथ लड़ाई करके उन्होंने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली । हालांकि 3 साल बाद भी वे भले ही यूक्रेन को घुटने नहीं टिकवा सके किंतु उसके बड़े भूभाग पर रूसी सेनाएं काबिज हैं । अमेरिका और उसके समर्थक देशों द्वारा थोपे गए आर्थिक प्रतिबंधों ने रूस की जबरदस्त घेराबंदी की किंतु पुतिन ने भारत और चीन के साथ व्यापार बढ़ाकर उस चक्रव्यूह को भेदने में सफलता हासिल कर ली। और जब अमेरिका ने ईरान पर हमला  किया तब उन्होंने चीन के साथ मिलकर ईरान को सैन्य सहायता के अलावा कूटनीतिक समर्थन देकर अमेरिका को उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया जहाँ से वह न आगे बढ़ने की हिम्मत कर पा रहा है और न ही पीछे ही हटने की स्थिति में है। पुतिन के बढ़े हुए आत्मविश्वास का ताजा उदाहरण  गत दिवस ब्रिक्स सम्मेलन में मिला जब जी - 7 नामक समूह पर तंज कसने में उन्होंने कोई संकोच नहीं किया। इस समूह में अमेरिका, कैनेडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और ग्रेट ब्रिटेन शामिल हैं। यूरोपियन यूनियन भी इसमें आमन्त्रित रहता है। ब्रिक्स बिजिनेस समिट में बोलते हुए पुतिन ने उक्त समूह को तथाकथित जी 7  कहते हुए सवाल उठाया कि वे खुद को  महान क्यों कहते हैं, जबकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में उनका योगदान  काफी घट चुका है। उन्होंने कहा कि गत पांच वर्षों में दुनिया की जीडीपी में ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी 40% से अधिक रही  जबकि जी-7 देशों की केवल 29% ।  पुतिन के अनुसार, वैश्विक आर्थिक वृद्धि का अशिकांश हिस्सा ब्रिक्स देशों से आया जिससे साफ  है कि अब नए विकास केंद्र उभर रहे हैं। इसी के साथ उन्होंने पश्चिमी देशों पर निशाना साधते हुए कहा कि यूरोप और दुनिया भर में चल रही उथल-पुथल पश्चिमी नेतृत्व की नीतिगत गलतियों का दुष्परिणाम है। उल्लेखनीय है पुतिन ने उक्त बात तब कही जब चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग दिल्ली नहीं पहुंचे थे। ऐसे में ब्रिक्स के मंच से जी 7 जैसे आर्थिक दिग्गज की वजनदारी को चुनौती देकर उन्होंने जो नया मोर्चा खोला वह उनकी कूटनीतिक पहल का प्रमाण है। भारत चूंकि इस सम्मेलन का मेजबान है इसलिए वह ऐसी कोई भी बात कहने से बचेगा जो विवाद उत्पन्न करे किंतु अमेरिका विरोधी लामबंदी की बागडोर पुतिन को सौंपकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  चतुराई का ही परिचय दिया।  ब्रिक्स सम्मेलन में सबसे पहले पहुंचकर रूसी राष्ट्रपति ने श्री मोदी से बातचीत के दौरान कुछ बड़े रक्षा सौदों को अंतिम रूप देने का जो प्रयास किया वह भी अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी देशों को चुनौती है। भारत और चीन के बीच चले आ रहे सीमा विवाद के बावजूद वे पुतिन ही हैं जो श्री मोदी और जिनपिंग के बीच पुल की भूमिका में हैं। ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी, पुतिन और जिनपिंग की जुगलबंदी का जो नया रूप सामने आ रहा है उसके चलते वैश्विक राजनीतिक संतुलन में बड़ा बदलाव आने की सम्भावना मजबूत हो रही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी