अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की खबर से दुनिया ने राहत की सांस ली है। 19 जून को यह समझौता विधिवत लागू होगा। हालांकि होर्मुज से तेल और गैस टैंकरों वाले जहाजों का निकलना शुरू हो जाने से लगभग चार माह से चले आ रहे तेल और गैस संकट में कुछ कमी आयेगी । लेकिन हालात पूरे तौर पर सामान्य होने में कई महीने लग सकते हैं क्योंकि ईरान ने इस समुद्री क्षेत्र में जो बारूदी सुरंगें बिछा रखी हैं उन्हें हटाने में समय लगेगा। दूसरा पेच ये भी है कि 6 माह बाद ईरान द्वारा ओमान के साथ मिलकर इस जल मार्ग का उपयोग करने वाले जहाजों से टोल वसूलने की तैयारी की जा रही है जो विवाद का नया कारण बन सकती है। इसी तरह ईरान को दी जाने वाली क्षति पूर्ति की राशि को लेकर अमेरिका द्वारा हाथ खींच लिए जाने के बाद सऊदी अरब, दुबई , ओमान, कतर आदि परेशान हैं क्योंकि अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस इन देशों पर दबाव बना रहे है कि वे ईरान को हुए नुकसान की भरपाई करें जबकि ईरान की मिसाइलों ने इन तेल उत्पादक देशों की इकाइयों को जो नुकसान पहुंचाया उससे उबरने में उन्हें कम से कम एक साल लगेगा। इससे अलग हटकर देखें तो प. एशिया में स्थायी शांति तब तक नहीं आ सकती जब तक इजराइल के अस्तित्व को ईरान सहित अरब जगत के सभी मुस्लिम देश मान्य नहीं करते। यद्यपि जोर्डन, मिस्र, ओमान, सं. अरब अमीरात आदि इजराइल से रिश्ते कायम कर चुके हैं किंतु ईरान के अलावा , तुर्किये और पाकिस्तान जैसे कुछ मुस्लिम देश इजराइल के अस्तित्व को मंजूर नहीं करते। और फिर जिस समझौते को लेकर पूरा विश्व प्रसन्न है उससे दूरी बनाकर इजराइल ने लेबनान पर हमले जारी रखते हुए संकेत दे दिया कि वह अपने रास्ते खुद तय करेगा। यद्यपि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस ने इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू और समझौते का विरोध कर रहे उनके मंत्रियों को काफी भला - बुरा कहा किंतु इजराइल ने अपनी सैन्य कारवाई को रोकने से इंकार कर दिया जिसके कारण समझौते के पहले आज होने वाली बैठक रद्द हो गई। ईरान लगातार दोहरा रहा है कि लेबनान पर हमले नहीं रुके तब वह शांत नहीं बैठेगा। इस सबसे लगता है कि अमेरिका तो अपना पिंड छुड़ाकर निकला जा रहा है किंतु प. एशिया में अशांति के बीज अभी भी मिट्टी में दबे हैं जो जरा सी नमी मिलते ही पनप सकते हैं। एक बात और जो दुनिया भर की चिंता का कारण बन गई वह है ईरान का छुट्टा हो जाना। अमेरिका ने उसे तेल बेचने की छूट के अलावा उसकी जप्त दौलत मुक्त करने की अनुमति देकर प.एशिया में एक ताकतवर शक्ति केंद्र की जड़ें जमा दीं। ईरान ने इस यद्ध में अपनी मारक क्षमता से अमेरिका जैसी महाशक्ति तक का मुकाबला किया। इजराइल के अभेद्य समझे जाने वाले आयरन डोम भी उसकी मिसाइलों को न रोक सके। शुरुआत में लड़ाई में एक पक्ष अमेरिका और इजराइल थे वहीं मुकाबले में था ईरान। अपने सर्वोच्च शासक खामेनेई की हत्या के बाद उसका हौसला थोड़ा तो हिला किंतु उसने चतुराई पूर्वक अन्य खाड़ी देशों को निशाना बनाकर युद्ध क्षेत्र का विस्तार कर दिया जिससे अमेरिका पर दबाव बढ़ने लगा। कुल मिलाकर डोनाल्ड ट्रंप की मूर्खता से प्रतिबंधों से जकड़े ईरान को नई आजादी मिल गई और वह भी ताकत के बल पर। इसीलिए जो लोग सोचते हैं कि इस समझौते से युद्ध बंद हो जाएगा और प. एशिया में सामान्य स्थितियां लौटेंगी वे ज्यादा दूर तक देखने में सक्षम नहीं हैं। सच्चाई ये है कि अमेरिका ने अपने आप को भले इस युद्ध से अलग कर लिया किंतु इजराइल, होर्मुज और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर प. एशिया में तलवारें म्यान से बाहर आती रहेंगी। अमेरिका की मजबूरी ये भी है कि इस क्षेत्र में उसके आर्थिक और सामरिक हित भी हैं। यदि उसने पूरी तरह दूरी बनाई तब चीन और रूस बिना देर गंवाये ईरान के जरिये अपना वर्चस्व इस तेल संपन्न इलाके में बढ़ाएंगे । भारत को इस घटनाक्रम पर पैनी नजर रखनी चाहिए क्योंकि चीन की उपस्थिति पाकिस्तान के लिए हितकारी होगी। ऐसे में हमें नये सिरे से कूटनीतिक बिसात बिछानी पड़ेगी। वैसे सं. अरब अमीरात, ओमान, कतर, जोर्डन, सऊदी अरब आदि से हमारे रिश्ते मजबूत हैं। और इजराइल समर्थक होने पर भी ईरान से हमारे संबंध यथावत हैं। लेकिन कूटनीति में कब कौन बदल जाए कहना मुश्किल है। यदि अमेरिका ने अपने दत्तक पुत्र इजराइल को ठेंगा दिया तब कुछ भी संभव है।
- रवीन्द्र वाजपेयी