जिस दिन आम आदमी पार्टी ने राघव चड्ढा को राज्यसभा में उपनेता पद से हटाया उसी दिन से उनके भाजपा में जाने की अटकलें लगाई जा रही थीं। लेकिन वैसा होने पर वे राज्यसभा सदस्यता से हाथ धो बैठते वहीं त्यागपत्र देने पर उनकी राजनीतिक वजन दारी खत्म हो सकती थी। इसीलिए राघव ने न सिर्फ अपनी सदस्यता बचाते हुए भाजपा का दामन थामा बल्कि अपने साथ 6 अन्य सांसदों को भी बटोरकर पार्टी के 10 सदस्यीय संसदीय दल में विभाजन करवा दिया। दो तिहाई सांसदों की बगावत होने से सभी दलबदल कानून के डंडे से बच गए। जहां तक बात श्री चड्ढा के भाजपा की गोद में बैठने की ही है तो इससे किसी को आश्चर्य नहीं हुआ किंतु वे 6 और सांसदों को तोड़कर ले आयेंगे इसकी भनक किसी को भी नहीं थी। जैसी कि परम्परा है उन्होंने पार्टी पर अपने उद्देश्यों से भटकने का आरोप लगा दिया। हालांकि जिस भाजपा को वे हमेशा गरियाते रहे वह उन्हें अचानक क्यों प्रिय लगने लगी ये उन्होंने नहीं बताया। जिन अशोक मित्तल को उनकी जगह राज्यसभा में पार्टी का उपनेता नियुक्त किया गया उनके यहां हाल ही में ई.डी ने छापा मारा था। इसलिए जब वे भी श्री चड्ढा के साथ भाजपा में आए तब ये सवाल उठ खड़ा हुआ कि क्या वे छापे से भयभीत होकर भाजपाई बने? हालांकि अन्य जिन पांच सांसदों ने पार्टी छोड़ी उन पर ऐसा कोई आरोप नहीं है और शैक्षणिक और पेशेवर दृष्टि से भी वे काफी योग्य हैं ,सिवाय सुप्रसिद्ध क्रिकेटर हरभजन सिंह के। सब कुछ इतना अचानक हुआ कि बड़े - बड़े खबरखोजी भी हतप्रभ रह गए। वैसे राघव का विद्रोह तो समझ में आने लायक था और श्री मित्तल के पाला बदलने की वजह भी स्पष्ट है किंतु बाकी 5 सांसद किस वजह से भाजपा में आए ये रहस्यों के घेरे में है। बहरहाल इस सबके पीछे पंजाब विधानसभा का अगला चुनाव है। हालांकि इन सांसदों में कोई भी ऐसा नहीं है जो पंजाब में बड़ा दखल रखता हो। लेकिन 7 सांसदों के पार्टी छोड़ने से आम आदमी पार्टी को आघात तो लगा ही है। पंजाब में सरकार बनाने में राघव की भी भूमिका रही थी। इसीलिए वे वहां से राज्यसभा भेजे गए। लेकिन बाद में उनसे पंजाब का प्रभार छीन लिया गया। शराब घोटाले से दिल्ली विधानसभा चुनाव तक राघव पार्टी से दूर बने रहे। राज्यसभा में भी वे पार्टी लाइन से अलग हटकर मुद्दे उठाते रहे । लेकिन गत दिवस जो धमाका उन्होंने किया उसके बाद ये चर्चा जोरों पर है कि पंजाब में आम आदमी पार्टी के 50 विधायक भी पाला बदलने वाले हैं। इसके पीछे आलाकमान के साथ ही मुख्यमंत्री भगवंत मान का रूखा व्यवहार बताया जाता है। 7 सांसदों के दलबदल से बौखलाई आम आदमी पार्टी अपना गुस्सा भाजपा पर उतार रही है लेकिन श्री केजरीवाल ये भूल जाते हैं कि आज जिसे वे गद्दारी कह रहे हैं ये तो उन्हीं के द्वारा शुरू की गई थी जब उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु अन्ना हजारे को अपमानित कर हाशिए पर धकेल दिया। उसके बाद पार्टी के संस्थापकों में से प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, डॉ . धर्मवीर, कुमार विश्वास , कपिल मिश्र, शाजिया इल्मी, आशुतोष आदि भी पार्टी छोड़ने मजबूर हुए। कुछ को तो धक्के मारकर बाहर किया गया। इस प्रकार आंदोलन की कोख से निकली यह पार्टी जितनी जल्दी ऊपर उठी उतनी ही जल्दी उसका ग्राफ भी नीचे जा रहा है। समाज के विभिन्न क्षेत्रों की जो प्रतिभाएं अपना काम,- धंधा छोड़कर नई राजनीति के इस अभियान से जुड़ीं उनमें से ज्यादातर हताश होकर लौट गए। राज्यसभा की सीटों की जो बंदरबांट की उसने भी पार्टी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया। हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि पार्टी इस बगावत से खत्म हो जाएगी। लेकिन श्री केजरीवाल की राष्ट्रीय स्तर पर बतौर विकल्प उभरने की महत्वाकांक्षा पर जरूर तुषारापात हो गया। रही बात भाजपा की तो उसके पास आम आदमी पार्टी सांसदों को शामिल करना पंजाब में अपने पैर जमाने की योजना से जुड़ा है। यद्यपि इससे उसे किसी बड़े लाभ की उम्मीद तो नहीं रखनी चाहिए। वैसे भी भाजपा के नेता ही नहीं आम कार्यकर्ता भी अन्य पार्टियों से आने वाली भीड़ से चिढ़ने लगे हैं क्योंकि इसके आने से उनके अवसर छिन जाते हैं। ऐसे में राघव भले ही भाजपा में अपनी जगह बनाने में कामयाब हो जाएं लेकिन बाकी 6 सांसदों को विशेष महत्व नहीं मिल पाएगा। इस झटके के बाद श्री केजरीवाल और उनकी चौकड़ी अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करती है या नहीं ये फिलहाल कहना कठिन है। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि अपनी अलग पहचान बनाने वाली आम आदमी पार्टी चुनावी राजनीति के चक्रव्यूह में फंसकर एक आम पार्टी बनकर रह गई है। ऐसा लगता है अन्ना हजारे का श्राप केजरीवाल एंड कंपनी का पीछा नहीं छोड़ रहा।
- रवीन्द्र वाजपेयी