Saturday, 3 October 2026

नशे से देश को मुक्ति दिलवाना समय की मांग



हमारे देश में राजनीति का जो स्वरूप है उसमें सही उपलब्धियां तो पीछे रह जाती हैं जबकि छोटी - छोटी बातों का ढिंढोरा पीटा जाता है। इसका ताजा उदाहरण है देश से नक्सली आतंक की समाप्ति । ये इतना बड़ा कारनामा है जिसकी राष्ट्रीय स्तर पर उसी तरह चर्चा होनी चाहिए थी जैसी जम्मू - कश्मीर से धारा 370 हटाने की हुई थी जिसने देश का बहुत नुकसान किया। इसके कारण ही इस सीमावर्ती राज्य  में आतंकवाद की जड़ें जमने से  राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हर पल मंडराता रहा। ये बात भी बिल्कुल सही है कि कश्मीर घाटी को पाकिस्तान समर्थक अलगाववादियों से बचाने के लिए सुरक्षा बलों के हजारों जवानों ने अपना बलिदान दिया। इसके अलावा हजारों बेगुनाह नागरिकों को आतंकवादियों ने मौत के घाट उतारकर दहशत फैलाई। 1990 की जनवरी में कश्मीरी पंडितों सहित लाखों अन्य गैर मुस्लिमों को रातों - रात अपना घर और कारोबार छोड़कर घाटी से जिस तरह  भागना पड़ा वह स्वाधीन भारत की एक अत्यंत  दर्दनाक घटना थी। इसीलिए जब धारा 370 हटी तब उन सभी लोगों के पेट में दर्द हुआ जो कश्मीर घाटी में अलगाववाद को हवा देकर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकते थे। बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उस महत्वपूर्ण निर्णय को अंजाम तक पहुंचाने वाले गृहमंत्री अमित शाह की प्रशंसा करने के धारा 370 हटाये जाने के तरीके पर ऐतराज जताया गया। कुछ बड़बोले नेताओं ने तो सत्ता में आने पर उसकी बहाली तक का वायदा कर डाला। सर्वोच्च न्यायालय तक में अपीलें की गईं। हालांकि देश का जनमत सरकार के साथ खड़ा होने से इन तत्वों को निराशा हाथ लगी। उसके बाद जब श्री शाह ने नक्सलवाद के सफ़ाये का संकल्प लिया तब उसके विरोध में भी एक वर्ग मुखर हो उठा। जिन शहरी नक्सलियों की धरपकड़ हुई उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर महिमामंडित करने का प्रयास भी हुआ। लेकिन गृहमंत्री ने बिना विचलित हुए अपना अभियान जारी रखा। बिहार, झारखंड, उड़ीसा, आंध्र, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ , उ.प्र और मध्यप्रदेश के  बड़े भूभाग में नक्सलियों  का आतंक देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन गया था।  इसके पीछे चीन का हाथ जगजाहिर है।   नक्सलियों ने नृशंस हत्याओं के जरिये दहशत फैलाने का जो जाल रचा उसके कारण जन सामान्य भी उन्हें आश्रय देने मजबूर हो गया। शासन - प्रशासन को आतंकित करने के लिए  पुलिस कर्मियों और सुरक्षा बलों की हत्या करने में नक्सलियों ने कभी संकोच नहीँ किया। जिस किसी पर उनको संदेह हुआ कि वह उनकी सूचना पुलिस को देता है उसकी जान अत्यन्त निर्दयता से उन्होंने ली। छतीसगढ़ में एक साथ सुरक्षा बलों के 70 से भी  अधिक जवानों और अधिकारियों को विस्फोटक के जरिये उड़ा देने का उनका कृत्य राक्षसी मानसिकता का वीभत्स प्रदर्शन था। इसी तरह  वहाँ के दर्जन भर कांग्रेस नेताओं की सामूहिक हत्या ने भी समूचे तंत्र को आतंकित कर दिया। शोषण के विरुद्ध हथियार उठाकर माओवादी क्रांति करने का मंसूबा पालने वाले नक्सलियों ने अपने संगठनों के विभिन्न नाम ररखकर भ्रम फैलाने का दाँव चला।  वहीं  आर्थिक संसाधन जुटाने के लिए  खनिज व्यवसायियों से गुंडा टैक्स की तरह वसूली प्रारंभ की। इसके अलावा साथी महिला नक्सलियों के यौन शोषण के आरोप भी लगने लगे। लेकिन अमित शाह ने लाइलाज माने जाने वाले नक्सली आतंक के खात्मे के लिए समयबद्ध कार्य योजना बनाकर 31 मार्च 2026 की तारीख तय की। शुरुआत में लगा ये असम्भव है किंतु उनका वह संकल्प अब हकीकत में बदल चुका है। इस अभूतपूर्व सफलता के बाद श्री शाह ने देश को नशा मुक्त करने का जो संकल्प लिया वह समय की मांग है। देश में ड्रग्स का कारोबार जिस तेजी से फैल रहा है वह भविष्य की बड़ी चिंताओं में से है क्योंकि इसके शिकंजे में फंसकर लाखों युवा अपना जीवन नष्ट कर चुके हैं। इसके अलावा ये अपराधों को भी जन्म दे रहा है। पंजाब और जम्मू कश्मीर  जैसे सीमावर्ती राज्यों में ड्रग्स का फैलाव होने से यह विदेशी जासूसों के लिए सहायक हो रहा है। देश के भीतरी हिस्सों में भी ड्रग्स की आदत बड़ी सामाजिक समस्या बन चुकी है। ये देखते हुए गृहमंत्री द्वारा नशे रूपी जहर से देश को मुक्त करवाने की जो सोच दिखाई वह पूरी तरह जनहित के साथ ही युवा पीढ़ी को बर्बादी से रोकने का प्रयास है। इसका राजनीति से ऊपर उठकर समर्थन होना चाहिए। श्री शाह की कार्य शैली और संकल्प शक्ति देखते हुए ये विश्वास किया जा सकता है कि जिस तरह उन्होंने नक्सली आतंक से देश को बचाया उसी तरह वे ड्रग्स रूपी जहर से भी देश को मुक्ति दिलाएंगे। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 1 October 2026

छत पर वर्षा जल संचयन को राष्ट्रीय अभियान बनाया जाए



तमाम प्रयासों के बाद भी भारत में खेती मानसून पर ही आश्रित है। हमारे देश की अर्थव्यवस्था आज भी कृषि प्रधान है। अच्छी फसल आने पर बाजार में रौनक आ जाती है। रोजगार प्रदाता के रूप में भी कृषि क्षेत्र का योगदान बेहद महत्वपूर्ण है। इसीलिये सरकार चाहे केंद्र की हो या राज्य की वह ग्रामीण विकास के लिए बड़ा बजट आवंटित करती है। स्व. अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा ग्रामीण इलाकों को भी पक्की सड़कों से जोड़ने की जो योजना शुरू की गई उसने वहाँ विकास की रोशनी पहुंचाने में काफी मदद की। पहले गाँव के लोगों को अपनी जरूरतों के लिए शहर आकर बाजार के चक्कर लगाना होते थे किंतु अब बाजार खुद गाँव के चक्कर लगाने लगा है। सड़क और बिजली के आगमन से ग्रामीण भारत में जीवन स्तर भी उठा है। सुख - सुविधा के साधनों की माँग बढ़ी है। महंगी करें अब केवल शहरों में ही नहीं दिखतीं बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी उनकी मौजूदगी देखी जा सकती है। इन्हीं सबका प्रभाव है कि अब टीवी, फ्रिज, एयर कंडीशनर के साथ ही औटोमोबाइल के शो रूम छोटे कस्बों और शहरों में खुलने लगे हैं। दैनिक उपयोग की लगभग सभी चीजें ग्रामीण बाजार में भी आसानी से मिलने लगी हैं। अब तो अच्छे स्कूल और अस्पताल भी ग्रामीण क्षेत्रों के निकट खुल रहे हैं। लेकिन इन सब व्यापारिक गतिविधियों की सफलता का आधार खेती से होने वाली कमाई ही है। हालांकि सिंचाई के आधुनिक साधन और तौर तरीके कृषि उत्पादन बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुए हैं किंतु जब तक पर्याप्त मानसूनी वर्षा न हो तब तक अच्छी फसल की उम्मीद करना बेकार है। इसीलिए इस वर्ष मानसून के विदा होते ही जो स्थिति सामने आई उसकी वजह से चिंता व्याप्त है। अधिकृत आंकड़ों के अनुसार  वर्ष 2026 में सामान्य से तकरीबन 13 फीसदी वर्षा कम होने से देश का काफी बड़ा हिस्सा सूखे जैसे हालात का सामना कर रहा है। 43 प्रतिशत से अधिक जिलों में 20  से 72 फीसदी तक पानी की कमी दिखाई दे रही है। पंजाब, हरियाणा, बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के पांचों राज्यों में मानसूनी बरसात कम रही। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार जुलाई से सितंबर के बीच कई राज्यों में लगातार हफ़्तों  तक बरसात न होने के कारण खेतों में नमी का अभाव होने से रबी फसल के प्रभावित होने का खतरा हो गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों में कमजोर मानसून से आगामी फसल खराब होने की चिंता व्याप्त है। कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश और उत्तरी बिहार में मिट्टी की नमी दस साल के औसत से नीचे होना खतरे की घंटी है। केंद्रीय जल आयोग की  रिपोर्ट के आधार पर पश्चिमी और दक्षिणी भारत के कई जलाशयों में भंडारण की कमी दर्ज की गई है। इस स्थिति में इस वर्ष कृषि उत्पादन के साथ ही पानी की कमी भी समस्या उत्पन्न करेगी ।  विशेष रूप से अगला ग्रीष्मकाल जनजीवन पर बुरा असर डालने वाला होगा। खरीफ फसल के गड़बड़ होने का असर दीपावली पर होने वाली खरीद पर ही नजर आने लगेगा। जाहिर है इसकी वजह से  जीडीपी में आ रहा उछाल भी रुक जाएगा। उपभोक्ता बाजार ठंडे रहे तो जीएसटी वसूली भी घटेगी। कुल मिलाकर मानसून की मेहरबानी न होना समूचे आर्थिक ढांचे को प्रभावित करने वाला है। भूजल का अविवेकपूर्ण दोहन भी बड़ा खतरा बनता जा रहा है।  दुर्भाग्य से बरसाती पानी को व्यर्थ बह जाने के बजाय जमीन के अंदर संचयित करने के लिए बनाई गई छत पर वर्षा जल संचयन ( रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग) की योजना के प्रति  गंभीरता न बरती जाने से कमजोर मानसून के बाद की चिंता बढ़ गई है। इस पद्धति के उपयोग से हैंड पम्प आदि के भूजल स्तर को बरकरार रखने में मदद मिलती है। घरों में जो नलकूप हैं उनको यदि छतों पर वर्षा जल संचयन से जोड़ दिया जाए तो कम बरसात के बाद भी वे सूखते नहीं। शहरों में कच्ची जमीन लगातार कम होने से बड़ी मात्रा में बरसाती पानी नाले में बह जाता है। सरकार ने सौर ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने के लिए जो अनुदान योजना शुरू की उसके परिणामस्वरूप देश में सौर ऊर्जा उत्पादन में खासी वृद्धि देखी जा रही है किंतु छत पर वर्षा जल संचयन पर उतना जोर नहीं दिये जाने से जल संकट साल दर साल बढ़ता जा रहा है। स्थानीय निकाय भी नये निर्माण में इसको अनिवार्य बताते हैं किंतु निर्माण पूरा होने के बाद कोई देखने नहीं आता कि उसका पालन हुआ या नहीं? इस वर्ष उत्पन्न संकट के मद्देनज़र आवश्यक है प्रधानमंत्री इसे राष्ट्रीय अभियान बनाएं जिससे आगामी कुछ वर्षों में देश का भूजल स्तर बढ़ सके। मानसून कितना बरसेगा ये अनिश्चित होता है किंतु जो हमारे हाथ में है उसे तो किया ही जा सकता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 30 September 2026

भाजपा में पीढ़ी परिवर्तन उसकी सेहत के लिए अच्छा



नितिन नबीन जब भाजपा के  अध्यक्ष बने तब पार्टी के कार्यकर्ता और नेता तक भौचक रह गए। हालांकि वे  भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय महासचिव रह चुके थे किंतु उस दौरान भी उनका नाम बिहार के अलावा अन्य राज्यों के भाजपाईयों ने भी नहीं सुना होगा। यद्यपि वे अपने पिता की सीट बांकीपुर से चार बार विधायक रहे और  प्रदेश सरकार में मंत्री भी। उनके राजनीतिक कौशल ने पार्टी नेतृत्व को तब प्रभावित किया जब छत्तीसगढ़ के पिछले विधानसभा चुनाव में उनके चुनाव प्रभारी रहते पार्टी को बड़ी विजय मिली। उनको राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाये जाने पर ये चर्चा भी चली कि  प. बंगाल के विधानसभा चुनाव में कायस्थ मतदाताओं को लुभाने के लिए भाजपा ने उनकी ताजपोशी की। वैसे उनके गृहराज्य बिहार में भी कायस्थों की बड़ी संख्या तथा राजनीतिक  प्रभाव रहा है।  नितिन के चयन का आधार बनी उनकी 46 वर्ष की आयु भी बनी।  हालांकि राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद खाली की गई उनकी बांकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव में जनसुराज पार्टी के प्रशांत किशोर की बड़ी जीत से उनकी किरकिरी भी हुई। लेकिन उसके बाद से वे लगातार  दौरा करते हुए पार्टी कैडर में अपनी पहिचान बनाने में जुटे हुए हैं। दिल्ली वि.वि छात्रसंघ चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को मिली सफलता से ये संकेत मिला कि युवाओं के बीच बढ़ते असंतोष के बावजूद भाजपा का वैचारिक आधार  बरकरार है। दरअसल पिछले कुछ महीनों के घटनाक्रम से भाजपा के माथे पर पसीना छलकने लगा था । दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले हुए आंदोलन के जरिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की युवा विरोधी छवि बनाने का जो प्रयास हुआ उससे भाजपा के साथ ही रा. स्व. संघ भी चिंतित हो उठा। इसीलिए प्रधानमंत्री और संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत के युवाओं से प्रत्यक्ष संवाद के कार्यक्रम आयोजित हुए। निकट भविष्य में होने वाले चुनावों में युवाओं  को अपने पाले में खींचने सभी दल प्रयासरत हैं। भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने और बनाये रखने में युवाओं का बड़ा योगदान है। लेकिन पार्टी और संघ दोनों को ये एहसास हो चला है कि जो नया मतदाता पहली बार मतदान करेगा उसके साथ सामंजस्य बिठाने में बुजुर्ग या अधेड़ नेता  कामयाब नहीं हो सकेंगे। इसीलिए पार्टी  अब संगठन और सत्ता में अपेक्षाकृत युवा चेहरों को आगे लाने की तैयारी में है। विभिन्न राज्यों में कम आयु वर्ग के मुख्यमंत्री बनाये जाने से इसके संकेत मिलने लगे थे। नितिन नबीन को पार्टी अध्यक्ष बनाकर उस प्रक्रिया को और आगे बढ़ाया गया। उनकी कार्यकारिणी में भी युवा चेहरों को काफी महत्व मिला ।  यदि यूजीसी और नीट पेपर लीक जैसी समस्याएं न आई होतीं तब शायद श्री मोदी अपने मंत्रीमंडल में भी फेरबदल करते हुए ऐसे युवा सांसदों को शामिल कर चुके होते जो छवि और क्षमता दोनों कसौटियों पर खरे उतरे हैं। ताजा खबर के अनुसार पार्टी संगठन में सबसे ताकतवर माने जाने वाले संसदीय बोर्ड से भी अति बुजुर्गों की जगह नये सदस्यों को शामिल किये जाने साथ ही केंद्रीय मंत्रीमंडल का भी पुनर्गठन भी जल्द होगा। हालांकि कुछ वरिष्ट मंत्रियों को तो नहीं छेड़ा जा सकता अन्यथा उंगलियां प्रधानमंत्री पर भी उठेंगी । लेकिन उन मंत्रियों की छुट्टी की जाएगी जिनका प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा। उल्लेखनीय है प्रधानमंत्री ने हाल ही में मंत्रियों के कार्यों की समीक्षा की थी। सही बात ये है कि किसी भी पार्टी को अपना जनाधार बनाये रखना है तो उसे नये नेतृत्व का सृजन करते रहना चाहिए क्योंकि  जो नये मतदाता पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं वे नई सोच रखते हैं। जिस तरह टीम का कप्तान वरिष्ट होने पर भी तभी सफल हो पाता है जब उसके पास कुछ युवा खिलाड़ी भी हों जिनमें जीत के प्रति जुनून हो। इसी तरह प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की लोकप्रियता के बाद भी सरकार की छवि मंत्रियों के किया - कलापों पर निर्भर होती है। धर्मेंद्र प्रधान इसके सबसे ताजा उदाहरण हैं। शिक्षा मंत्री रहते हुए वे अपने विभाग को ठीक से संभाल नहीं सके जिसकी वजह से पार्टी और प्रधानमंत्री दोनों के सामने, छवि का संकट उत्पन्न हो गया। इसीलिए श्री प्रधान को कुर्सी छोड़ना पड़ी । भाजपा के लिए ये अच्छा है कि वह छोटे - छोटे झटकों से संभल गई जबकि बाकी पार्टियां इसकी हिम्मत नहीं जुटा पाने के कारण कमजोर होती जा रही हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 29 September 2026

वोट चोरी तो बहाना है असली मकसद परिसीमन रुकवाना है




नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने 12 वर्ष से ज्यादा हो गए। ऐसा नहीं है कि इस दौरान वे कभी दबाव में न आये हों। भूमि अधिगृहण और कृषि कानून उन्हें वापिस लेने पड़े। शिवसेना और अकाली दल जैसे  पुराने साथियों से अलगाव हुआ। देश  ही नहीं विदेश में हुए घोटालों को लेकर उनकी घेराबंदी करने की हरसंभव कोशिश हुई किंतु  उनके दबदबे और लोकप्रियता में कमी नहीं आई। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में बहुमत से दूर रह जाने की वजह ने उन्हें चंद्रबाबू नायडू व नीतीश कुमार का सहारा लेना पड़ गया। उसके बाद ये आशंका व्यक्त की जाने लगी कि ये सरकार इस बार कार्यकाल पूरा नहीं कर सकेगी। यद्यपि प्रधानमंत्री ने सरकार को अस्थिरता से बचाये रखा है और आगे भी उसकी कोई संभावना नज़र नहीं आ रही। लेकिन ये बात स्वीकार करनी होगी कि बीते दो वर्षों  में विपक्ष ने संसद और उसके बाहर आक्रामक अंदाज दिखाते हुए सरकार विशेष तौर पर श्री मोदी  को घेरने के लिए काफी व्यूह रचना की। भले ही वह पूरी तरह से सफल नहीं हो सका किंतु पहली बार ऐसा लगा  कि सरकार और प्रधानमंत्री रक्षात्मक हैं। हालांकि इसके लिए केवल विपक्ष को श्रेय नहीं दिया जा सकता क्योंकि सरकार को परेशानी में डालने के उसके प्रयासों से ज्यादा प्रभावशाली तो युवाओं और छात्रों से जुड़े मुद्दे रहे। सरकार के लिए चौंकाने वाली बात ये रही कि विपक्ष के धारधार हमलों को तो वह झेल गई किंतु पिछले कुछ महीनों में कुछ ऐसे मुद्दे उठे जिनके पीछे राजनीतिक दल तो उतने नहीं खड़े हुए लेकिन युवाओं और छात्रों के गुस्से ने सरकार को पिछले पाँवों पर धकेल दिया। सबसे पहले  यूजीसी अधिसूचना को लेकर युवाओं के एक बड़े वर्ग में गुस्सा फूटा। सवर्ण समुदाय में इसे लेकर जबरदस्त आक्रोश देखा गया । हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने उस अधिसूचना पर रोक लगा रखी है किंतु  उस मूर्खतापूर्ण कदम से समाज का  वह वर्ग भी अपनी नाराजगी जाहिर करने में पीछे नहीं रहा जो श्री मोदी का परंपरागत समर्थक रहा है ।  चूंकि ये विवाद आरक्षित जातियों से जुड़ा था लिहाजा विपक्षी दल तटस्थ रहते हुए दूर से तमाशा देखते रहे। लेकिन इसके बाद नीट परीक्षा पेपर लीक हो जाने के कारण सरकार के ऊपर जो संकट आया उसने ज्यादा परेशानी खड़ी कर दी।  शुरुआत में भले ही विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोला हो किंतु काॅकरोच जनता पार्टी बीच में कूदकर युवाओं और छात्रों की रहनुमा बन गई। वैसे तो जंतर मंतर पर हुआ धरना, प्रदर्शन, अनशन, संसद मार्च, अश्लील नारेबाजी पूरी तरह वामपंथियों का प्रायोजित कार्यक्रम था किंतु पेपर लीक के बाद कुछ छात्रों द्वारा आत्महत्या किये जाने से ज्यादातर  छात्रों के मन में शिक्षा मंत्रालय के विरुद्ध आक्रोश था। यदि तब के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पेपर लीक होते ही नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए कुर्सी छोड़ दी होती तब सरकार को इतनी शर्मिंदगी नहीं  उठानी पड़ती किंतु एक बात  उसे राहत देने वाली रही कि मुख्य विपक्ष चाहकर भी उसका श्रेय न ले सका। जंतर मंतर आंदोलन के खाते में तो एक मंत्री की कुर्सी छीन लेने जैसी उपलब्धि दर्ज हो गई किंतु लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी आंदोलनकारियों की पिटाई को लेकर गृहमंत्री अमित शाह के त्यागपत्र के लिए पूरी ताकत लगाने के बाद भी नाकामयाब रहे। इस बीच राम मंदिर चंदा घोटला जैसा बड़ा मुद्दा भी सरकार के लिए सिरदर्द बना परंतु जंतर मंतर आंदोलन के शोर में वह  दबकर रह गया। फिलहाल राहुल एक बार फिर वोट चोरी के नाम पर मुख्य चुनाव आयुक्त  ज्ञानेश कुमार  के बहाने सरकार की घेराबंदी करना चाह रहे हैं । संसद के अगले सत्र में उनके विरुद्ध महाभियोग लाने की बात भी कही जा रही है किंतु जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार वोट चोरी और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग महज दिखावा है। विपक्ष जानता है कि एस.आई.आर की प्रक्रिया रुकने से रही। लेकिन इस होहल्ले के जरिये वह सरकार द्वारा लाये जाने वाले परिसीमन विधेयक को किसी भी कीमत पर रोकना चाहता है। संसद के मानसून सत्र में हुए हंगामे के पीछे भी यही रणनीति थी। चूंकि सरकार इसके लिए विशेष सत्र बुलाने की तैयारी में है इसलिए श्री गाँधी बाकी सब मुद्दों को भुलाकर वोट चोरी का राग फिर अलापने लगे। देखना ये है कि वे कितने सफल होते हैं क्योंकि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री भी ये चाहेंगे कि बजाय दूसरे मामलों में ताकत खर्च करने के परिसीमन विधेयक पारित करवा लें जिसे वे 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए ब्रह्मास्त्र मानकर चल रहे हैं। 



- रवीन्द्र वाजपेयी




Monday, 28 September 2026

इंडिया ब्लॉक की बैठक में विपक्षी एकता का खुलासा हो जाएगा



आगामी 30 सितंबर को नई दिल्ली में होने जा रही  इंडिया ब्लॉक की  बैठक पर विश्लेषकों की नजर है। इसका उद्देश्य वैसे तो मुख्य चुनाव आयुक्त  ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों की संयुक्त रणनीति बनाकर उन पर त्यागपत्र देने का दबाव बनाना है।साथ ही संसद के अगले सत्र में उनके विरुद्ध महाभियोग लाने  पर भी विचार  होगा। हालांकि इसके पहले भी उनके विरोध में  मोर्चा खोला जा चुका है किंतु कामयाबी नहीं मिली। स्मरणीय है मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण  की प्रक्रिया जब बिहार विधानसभा चुनाव के पहले शुरू हुई तब  सर्वोच्च न्यायालय तक विवाद पहुंचा किंतु उसने कुछ शर्तों के साथ उसे जारी रखने की अनुमति दे दी। जिससे उत्साहित होकर चुनाव आयोग ने अनेक राज्यों में उसको शुरू कर दिया।  धीरे- धीरे इस की चर्चा अदालती कार्यवाही की खबरों तक सिमटकर रह गई। लेकिन हाल ही में एक अखबार द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त के अन्य  दो आयुक्तों के साथ मतभेद की  खबर प्रकाशित किये जाने से ये मुद्दा गरमा गया जिसे लपकते हुए विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त से त्यागपत्र देने की मांग कर डाली। राहुल गाँधी ने तो दिल्ली की पत्रकार वार्ता में ज्ञानेश कुमार को देशद्रोही तक कह डाला। साथ ही 2024 में चुनी गई लोकसभा की वैधता पर सवाल उठाते हुए यहाँ तक कह दिया कि उसके द्वारा बनाये गए कानून भी रद्द करने योग्य हैं। कांग्रेस ने उक्त खबर प्रकाशित होने के बाद देश भर में प्रदर्शन भी किये किंतु अन्य विपक्षी पार्टियों द्वारा किया गया विरोध  जुबानी ज्यादा रहा इसलिए  इंडिया ब्लॉक की बैठक बुलाने का फैसला हुआ ताकि  ये लगे कि ये मुख्य चुनाव आयुक्त का विरोध समूचे विपक्ष की आवाज है।  इस बैठक में कौन - कौन से दल शामिल होंगे इस पर सभी की निगाह लगी हैं।  ये भी  महत्वपूर्ण होगा कि शीर्ष नेता इसमें उपस्थित होंगे या अपना प्रतिनिधि भेजकर औपचारिकता का निर्वहन करेंगे। सच ये है कि लोकसभा चुनाव के बाद से इस गठबंधन में बिखराव आने से कोई संगठनात्मक स्वरूप ही सामने नहीं आ सका । बीते दो -  ढाई सालों में जितने भी विधानसभा चुनाव हुए उनमें कई राज्यों में  इंडिया ब्लॉक से जुड़े दल ही आपस में भिड़ गए। हरियाणा, दिल्ली, बिहार, प. बंगाल और केरल इसके उदाहरण हैं। उ.प्र , पंजाब और हिमाचल प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव की तैयारियां होने लगी हैं। लेकिन अभी तक विपक्षी एकता की कोई संभावना नजर नहीं आ रही। उ.प्र में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ गठजोड़ का इंतजार किये बिना रथयात्रा शुरू कर दी। और तो और वे श्री गाँधी के निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली तक जा पहुंचे जिस पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने तीखी प्रतिक्रिया दी। इसी तरह पंजाब में भी आम आदमी पार्टी का कांग्रेस से टकराव है। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण का विरोध तो कमोबेश सभी विपक्षी दल कर रहे हैं किंतु राहुल गाँधी के इंडिया ब्लॉक की  बैठक में  छाए रहने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता। और यही सबसे बड़ा पेच है क्योंकि अखिलेश यादव श्री गाँधी को महत्व देकर अपनी चमक कम नहीं करना चाहेंगे। स्मरणीय है उ.प्र में कांग्रेस विधानसभा की 200 सीटें मांग रही है परंतु अखिलेश 100 के लिए भी राजी नहीं हैं। ऐसी ही स्थिति श्री केजरीवाल की है जो पंजाब में कांग्रेस को किसी भी प्रकार की रियायत देने राजी नहीं हैं। अखिलेश को ये भी लग रहा है कि ज्ञानेश कुमार के विरोध में उनका समय बर्बाद होगा जिसका असर  चुनावी तैयारियों पर पड़ सकता है। दरअसल वे बिहार चुनाव में  वोट चोरी के विरोध में  निकाली गई यात्रा के दुष्परिणाम को भूले नहीं हैं जिसमें श्री गाँधी ने तेजस्वी यादव को भी साथ रखा। वह यात्रा पूरी तरह बेअसर रही। नतीजों के बाद ये बात काफी उछली कि यदि तेजस्वी उस यात्रा से दूर रहते तब शायद वे बेहतर तरीके से चुनाव प्रचार कर पाते। ये सब देखते हुए 30 सितंबर की बैठक में  इंडिया ब्लॉक की एकता का खुलासा हो जाएगा। रही बात मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध मोर्चा खोलने की तो भले ही राहुल इस पर कितना भी हल्ला मचा लें किंतु अब तक के अनुभव बताते हैं कि आम जनता को इसमें कोई रुचि नहीं है बजाय उन लोगों को छोड़कर जिनके नाम मतदाता सूची से कट गए हों। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 26 September 2026

लद्दाख़ में अलगाववाद की जड़ें जमाने का षडयंत्र रच रहे वांगचुक



लद्दाख़ के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने एक बार फिर विवादित बयान देकर अपनी अलगाववादी मानसिकता का परिचय दे दिया। लेह में गत वर्ष हुई हिंसा के बाद उन्हें कई महीनों तक जेल में रखा गया था। लेकिन जब उन्हें रिहा किया गया तब ये चर्चा चली थी कि शायद उनका केंद्र सरकार से समझौता हो गया है। स्मरणीय है 2019 में लद्दाख़ को जम्मू कश्मीर से अलग करने के बाद केंद्र शासित क्षेत्र बना दिया गया किंतु जम्मू कश्मीर  की तरह उसे विधानसभा नहीं दी गई जिसकी मांग को लेकर लेह में हुए आंदोलन ने उपद्रव का रूप ले लिया था। उस घटना के एक साल पूरा होने पर  केंद्र सरकार के खिलाफ तेवर दिखाते हुए वांगचुक ने आरोप लगा दिया कि  लद्दाख में भय व दमन का ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जो चीन, तिब्बत में नहीं कर रहा है। इसी के साथ वे यहाँ तक बोल गए कि जब लद्दाख के सामने भारत व चीन के विकल्प थे, तब भारत को इसलिए चुना गया था क्योंकि यहां लोकतांत्रिक व्यवस्था व नागरिकों को गरिमा के साथ रहने का अधिकार मिलने की उम्मीद थी। आज लद्दाख का माहौल चिंता का विषय है। इस बयान के जरिये उन्होंने  ये एहसान जताने की कोशिश की मानो लद्दाख यदि भारत में है तो इसका श्रेय उन्हें या वहाँ के कथित नेताओं को है। जबकि हकीकत ये है कि लद्दाख़ सदैव से भारत का हिस्सा रहा । और 1962 में चीन के हमले के समय भारतीय सेनाओं ने अपना बलिदान देकर उसकी रक्षा की, वरना तिब्बत की तरह लद्दाख़ भी चीन के शिकंजे में आ जाता और वांगचुक जैसे लोग जुबान खोलने लायक भी नहीं बचते। इसीलिए उनका ये कहना कि लद्दाख़ में स्थिति तिब्बत से ज्यादा खराब हैं और भारत सरकार चीन से अधिक दमन कर रही है , न केवल सच्चाई से कोसों दूर अपितु घोर आपत्तिजनक भी है। उनके इस बयान पर ऐतराज जताते हुए तिब्बत से पलायन कर भारत  में बसे तिब्बतियों के धर्मशाला स्थित तिब्बत सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेशन प्रवक्ता तेंजिन लेक्शे ने गत दिवस जारी बयान में वांगचुक को गलत ठहराते हुए कहा कि तिब्बत में चीन आज भी जोर जबरदस्ती कर रहा है। वहां पर लोगों को मौलिक शिक्षा, धर्म के अधिकार नहीं है। जो लोग लद्दाख़ गए हैं उन्हें कहीं से ये नहीं लगता कि वहाँ के नागरिकों पर किसी बात की पाबंदी है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सीमावर्ती इलाकों में अधो संरंचना के जो काम हुए उनकी वजह से सीमा पार से आने वाले खतरों से निपटने में जहाँ सेना को मजबूती मिली वहीं लद्दाख़ के निवासियों को भी मानसिक सुरक्षा का एहसास हुआ। सेना केवल सीमाओं पर ही चौकसी नहीं रखती बल्कि लद्दाख़ की जनता के स्वास्थ्य और शिक्षा की व्यवस्था भी करती है। ऐसे में वांगचुक द्वारा लद्दाख़ में तिब्बत से भी ज्यादा दमन चक्र चलने जैसी बात कहना कश्मीर घाटी के उन पाक समर्थक अलगाववादियों का समर्थन है जो भारत में रहते हुए भी पाकिस्तान के प्रति वफादारी दिखाने से बाज़ नहीं आते थे। इसीलिए ये कहना गलत नहीं होगा कि वांगचुक भी चीनी एजेंट की तरह  बोल रहे हैं। वरना उन जैसे शिक्षित व्यक्ति को ये तो पता ही होगा कि तिब्बत पर जबरन कब्जा करने के बाद चीन की साम्यवादी सरकार ने तिब्बतियों के धर्म और संस्कृति को नष्ट करने के लिए योजनाबद्ध प्रयास किये। तिब्बती लड़कियों की चीनी नस्ल के युवकों से बलात शादियाँ करवाने का अभियान चलाया। हजारों बौद्ध भिक्षुक रहस्यमय तरीके से लापता हो गए। बौद्ध मठों में रखा प्राचीन साहित्य नष्ट कर दिया गया। चीन की मुख्य भूमि से लाये लोगों को बसाकर वहाँ का जनसंख्या संतुलन बिगाड़ने का प्रयास भी हुआ। तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा का नाम तक कोई नहीं ले सकता। चीन ने तिब्बत के चारों तरफ लौह आवरण जैसा बना रखा है। वहाँ विदेशी सैलानी और मीडिया तक को आने नहीं दिया जाता। मानव अधिकार संगठन जैसी संस्थाओं को भी तिब्बती जनता की दयनीय स्थिति देखने नहीं दी जाती। अब इस स्थिति को वांगचुक लद्दाख़ से बेहतर मानते हैं तब ये मान लेना सही होगा कि वे आस्तीन के सांप हैं । उनके भारत विरोधी ताकतों से रिश्तों का संदेह इस बयानबाजी से और पुख्ता हो गया है। दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में वांगचुक द्वारा अनशन पर बैठने की काफी चर्चा हुई। उन्होंने इस पार्टी के विदेशों से सम्बन्धों का जिस प्रकार खंडन किया उससे भी उनके इर्द - गिर्द मंडरा रहा रहस्य और गहरा गया। जब उन्होंने मेदांता अस्पताल में केन्द्रीय मंत्रियों की मौजूदगी में अनशन खत्म किया तब लगा था कि उनके रवैये में कुछ सुधार हुआ किंतु उनके ताजा बयान से उनका असली देश विरोधी चेहरा एक बार फिर उजागर हो गया है। इसके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए वरना लद्दाख़ में भी अलगाववाद की हवा बहने लगेगी जिसका फ़ायदा उठाकर चीन इस इलाके को हड़पने की कोशिश कर सकता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी



Friday, 25 September 2026

चुनाव आयोग : आरोपों को साबित भी करे विपक्ष



एक अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयोग के दो आयुक्तों ने कुछ मामलों में अपनी असहमति दिखाई जिसे नजरंदाज कर दिया गया। साथ ही कुछ फैसले उनकी जानकारी के बिना ले लिए गए जिसके बारे में  उन्होंने भारत सरकार के कैबिनेट सचिव को पत्र भी लिखा था। अखबार के मुताबिक उक्त आपत्तियां एस. आई. आर से जुड़ी हुई थीं। रिपोर्ट प्रकाशित होते ही राजनीतिक तूफान आ गया। राहुल गाँधी, ममता बैनर्जी और अरविंद केजरीवाल का बोलना तो समझ में भी आता है लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी  भी बहती गंगा में हाथ धोने लगी। इन सबका निशाना बने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार। कोई उन्हें देशद्रोही कह रहा है तो कोई गिरफ्तारी और त्यागपत्र की मांग कर रहा है। आयोग ने स्पष्टीकरण दिया कि आयुक्तों के बीच विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा और विमर्श के दौरान असहमति होने के बाद भी अंतिम निर्णय एक राय से होते हैं। लेकिन विपक्ष ने जिस तरह से ताबड़तोड़ हमले मुख्य चुनाव आयुक्त पर किये उससे लगता है मानो उसे इस बारे में पहले से ही जानकारी थी। नीट परीक्षा को लेकर आया उबाल ठंडा पड़ चुका है। पंजाब और दिल्ली वि.वि छात्र संघ चुनाव में अभाविप की जीत से जंतर मंतर आंदोलन की हवा निकल चुकी है। अंबानी और अडानी के विरुद्ध उठाये गए मुद्दे भी फुस्स साबित हुए। रक्षा सौदों पर किया शोर- शराबा भी जनता को प्रभावित नहीं कर सका।  ब्रिक्स सम्मेलन  से प्रधानमंत्री की छवि और चमकी है। अभी तक जितने भी चुनाव सर्वे आये उनमें उ.प्र, और उत्तराखंड में भाजपा की वापसी तय मानी जा रही है। वहीं पंजाब में आम आदमी पार्टी और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के हाथ से सत्ता खिसकती दिख रही है। विपक्ष में कोई एकजुटता नहीं हो पा रही। जंतर मंतर आंदोलन पर आम आदमी पार्टी और वामपंथियों के कब्जे ने कांग्रेस को तनाव में डाल दिया । उसके साथ कोई गठबंधन को तैयार नहीँ है। केजरीवाल को भी चिंता है कि दिल्ली से पैर उखड़ने के बाद पंजाब में भी हार सिर पर मंडरा रही है। ममता बैनर्जी ने इंडिया गठबंधन में सांस फूंकने की असफल कोशिश की । शरद पवार ,  सोनिया गाँधी और लालू प्रसाद यादव का स्वास्थ्य आड़े आ रहा है। राहुल गाँधी और अखिलेश यादव के बीच  अघोषित प्रतिस्पर्धा चल रही है। आरक्षण  पर भाजपा से नाराज सवर्ण जातियाँ इस असमंजस में हैं कि किसके साथ जाएं क्योंकि राहुल गाँधी का बस चले तो 100 प्रतिशत आरक्षण कर दें। वहीं सपा, राजद और बसपा का तो आधार ही आरक्षण टिका हुआ  है। शिवसेना, तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी  का जनाधार भी कम हुआ है। कुल मिलाकर विपक्ष को कुछ सूझ नहीं रहा था। ऐसे में चुनाव आयोग के बारे में प्रकाशित एक खबर पर होहल्ला शुरू कर दिया गया। आयोग की कार्यप्रणाली में यदि कमी है तो उसकी जाँच होनी चाहिए। लेकिन लंबे समय से वोट चोरी का ढोल पीटने वाले राहुल उसका एक भी प्रमाण नहीं दे सके। ईवीएम पर लगाए गए आरोप भी हवा हवाई होकर रह गए । गत दिवस  श्री गाँधी ने अपनी खीझ ये कहते हुए निकाली कि 1971 का चुनाव जीतने के दो वर्ष बाद ही स्व. इंदिरा गाँधी के विरुद्ध सत्ता विरोधी लहर  पैदा हो गई थी किंतु भाजपा सरकार के विरुद्ध नहीं होती। इसके साथ ही उन्होंने बचकानेपन का परिचय देते हुए पहले तो ज्ञानेश कुमार को देशद्रोही बताया और फिर उन्हें सरकार के विरुद्ध गवाह बनने का सुझाव देने लगे। इस बारे में जब तक संदर्भित दोनों चुनाव आयुक्त सामने आकर कुछ नहीं बोलते तब तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचना बेमानी है। ये सवाल भी उठता है कि यदि ज्ञानेश कुमार अपनी मर्जी थोप रहे थे तब दोनों चुनाव आयुक्तों को  राष्ट्रपति से शिकायत करनी थी अथवा त्यागपत्र देकर  अपनी बात रखनी चाहिए थी।  चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। उसके सर्वोच्च पदाधिकारी को देशद्रोही कहना किसी को भी शोभा नहीं देता। इसी तरह 2024 में वोट चोरी से बनी संसद द्वारा बनाये सभी कानूनों को अवैध बता देना भी समझ से परे है। यदि श्री गाँधी को लगता है वर्तमान लोकसभा गलत तरीके से चुनी गई तब उन्हें उसकी सदस्यता से त्यागपत्र देकर एक उदाहरण पेश करना चाहिए। लेकिन उनका रवैया केवल शोर मचाना रह गया है। फ्रांस से रक्षा सौदे , हिंडनबर्ग रिपोर्ट और  पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे की किताब को लेकर श्री गाँधी द्वारा मचाया गया हल्ला व्यर्थ साबित हुआ। संसद के कई सत्र बर्बाद होने के बाद भी विपक्ष कुछ साबित नहीं कर सका। जब भी कोई चुनाव आता है श्री गाँधी एक नया मुद्दा पकड़कर बैठ जाते हैं। लेकिन जनता उनकी बात को अनसुना करती आई है और आगे भी करती रहेगी क्योंकि वे किसी भी लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने में सफल नहीं हुए । चुनाव आयोग संबंधी जितने भी विवाद हैं उन पर सर्वोच्च न्यायालय में बहस जारी है। बेहतर होगा उसके फैसले का इंतजार किया जाए। 


-रवीन्द्र वाजपेयी