Saturday, 5 September 2026

प्रधानमंत्री हेतु विजय का नाम उछलने से कांग्रेस में बेचैनी



अभिनेता से नेता बने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय का राजनीति में उतरना और फिर विधानसभा चुनाव में उनकी नवगठित पार्टी का बहुमत के करीब पहुंचना नाटकीयता से भरी किसी तमिल फिल्म का एहसास करा गया। बीते छह दशकों से तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज होते रहे द्रमुक और अन्ना द्रमुक जैसे मजबूत स्तंभों को विजय की पार्टी टीवीके ने  एक झटके में धराशायी कर दिया। यहाँ तक कि पिछली सरकार के मुख्यमंत्री  स्टालिन तक चुनाव हार गए। ये परिणाम इसलिए और चौंकाने वाला रहा क्योंकि जो काम कांग्रेस और भाजपा  नहीं कर पाईं वह विजय ने चंद महीनों के भीतर कर दिखाया। हालांकि वे बहुमत से थोड़ा पीछे रहे किंतु कांग्रेस , द्रमुक से गठबंधन तोड़ विजय को टेका लगाते हुए सरकार में हिस्सेदार भी बन बैठी। अन्ना द्रमुक के भी कुछ विधायक समर्थन में आ गए। मुख्यमंत्री बनते ही विजय ने फिल्मी अंदाज में लोक -लुभावन फैसलों की बौछार लगाते हुए  सरकार का खजाना खोल दिया।  विधायकों का वेतन बढ़ाने के अलावा उन्हें नई कारें देकर वे अपनी सरकार को स्थायित्व देने में भी जुट गए। यहाँ तक तो सब ठीक था किंतु विजय के अचानक उभार से पार्टी में  मांग उठने लगी कि उनको आगामी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर पेश किया जाए। खुद मुख्यमंत्री इस मांग से सहमत हैं  या नहीं, ये फिलहाल स्पष्ट नहीं हो सका किंतु इससे उनके सहयोगी दल  कांग्रेस की बेचैनी बढ़ गई जो राहुल गाँधी के अलावा और किसी को प्रधानमंत्री बनाये जाने के बारे  में सुनना भी पसंद नहीं करती। इसीलिए  राज्य के पर्यटन मंत्री और कांग्रेस नेता राजेश कुमार ने एक  बयान में  स्पष्ट कर दिया है कि यदि गठबंधन 2029 में प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गांधी का समर्थन नहीं करता है, तो विजय कैबिनेट में शामिल कांग्रेस के दोनों मंत्री अपने पद से इस्तीफा दे देंगे। उल्लेखनीय है टीवीके के नेता आधव अर्जुन और सरथकुमार ने खुले तौर पर शीर्ष पद के लिए विजय का समर्थन किया है, जबकि तूतीकोरिन में पीएम के लिए विजय का समर्थन करने वाले पोस्टर भी सामने आए हैं, जिससे यह विवाद और गहरा गया है। तमिलनाडु में अभिनेता रहते हुए ही विजय के सैकड़ों प्रशंसक क्लब और हजारों व्हाट्स एप ग्रुप बन गए थे। उंन्होंने पार्टी तो चुनाव से कुछ पहले ही बनाई थी परंतु उक्त क्लबों और व्हाट्स एप के जरिये अपना जनाधार स्थापित करने का काम  काफी पहले से शुरू कर रखा था और इसके लिए महंगी पेशेवर एजेंसियों की सेवाएं ली गई । मतदान  उपरांत जब एक्सिस माय इंडिया नामक सर्वेक्षण एजेंसी  ने टीवीके के सबसे बडी पार्टी बनने की भविष्यवाणी की तो समूचा राजनीतिक जगत चौंक गया।  बहरहाल धमाकेदार जीत और फिर बिना मांगे कांग्रेस सहित वामपंथी और अन्ना द्रमुक के एक खेमे का समर्थन मिलने से विजय का उत्साह बढ़ गया। इसीलिए उन्होंने मुफ्त उपहारों और सुविधाओं के जरिये अपना जनाधार पुख्ता करने के साथ ही तमिल भावनाओं को उभारने  का अभियान शुरू कर दिया। केन्द्र से टकराने में भी वे संकोच नही कर रहे। लेकिन अचानक प्रधानमंत्री के लिए उनका नाम पार्टी के भीतर से उछाला जाना इस बात का संकेत है कि उनकी महत्वाकांक्षा हिलोरें मारने लगी हैं। शायद उन्हें ये लग रहा है कि यदि वे प्रधानमंत्री पद के लिए दावा ठोककर 2029 के लोकसभा चुनाव में उतरते हैं तब वे  दक्षिण भारत का चेहरा बनकर उत्तर और दक्षिण भारत के बीच विभाजन करवाने में सफल हो जाएंगे। हालांकि अतीत में पी.वी नरसिम्हा राव और एच. डी देवगौड़ा के रूप में दक्षिणी भारत से दो प्रधानमंत्री बन चुके हैं किंतु वे समूचे दक्षिण भारत का चेहरा नहीं बन सके। विजय को लगता है युवा होने से वे नई पीढी़ के मतदाताओं को अपने पक्ष में गोलबंद कर सके तब प्रधानमंत्री पद के लिए जनता के सामने तीन विकल्प होंगे जिनमें दो उत्तर भारत से होने की वजह से दक्षिण की राजनीतिक उपेक्षा का मुद्दा गरमाया जा सकेगा। इसीलिए काँग्रेस में घबराहट फैल गई। मंत्रियों के अलावा पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम के सांसद पुत्र कार्ति ने भी टीवीके की उक्त मांग के विरुद्ध बयान दे दिया। खबर है काँग्रेस का शीर्ष नेतृत्व विजय से बात करने वाला है। अभी तक टीवीके द्वारा कोई स्पष्टीकरण न दिये जाने से काँग्रेस चिंता में है क्योंकि उसके दूर हो जाने पर भी राज्य सरकार को खतरा नहीं है। क्या होगा ये अभी पक्का नहीं है किंतु तमिलनाडु की राजनीति में फॉर्मूला फिल्म जैसे उतार - चढ़ाव शुरू हो जाने से उसके अंत के प्रति उत्सुकता बढ़ रही है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 4 September 2026

मोदी का बढ़ता प्रभाव ट्रम्प को बर्दाश्त नहीं हो रहा



दिल्ली में होने जा रहे ब्रिक्स सम्मेलन के एक हफ्ते पहले अमेरिका ने धमकी दी है कि ईरान से व्यापारिक गतिविधियां बढ़ाने पर वह भारत पर भी वैसे ही आर्थिक प्रतिबंध लगा देगा जैसे उसने ईरान और रूस पर लगा रखे हैं। इस धमकी का कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बीच 31 अगस्त 2026 को किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन के दौरान हुई द्विपक्षीय बैठक है। जिसमें दोनों नेताओं ने भारत और ईरान के बीच पुरानी दोस्ती को और मजबूत करने का संकल्प लिया। प्रधानमंत्री मोदी ने आने वाले समय में तेहरान के साथ व्यापार के दायरे को बढ़ाने और उसमें विविधता लाने की इच्छा व्यक्त की। प. एशिया में तनाव और संघर्ष की शुरुआत के बाद दोनों नेताओं की यह पहली आमने-सामने की मुलाकात थी। इसके बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि कोई भी देश ईरान को प्रतिबंधों से बचने में मदद नहीं कर सकता।अगर कोई देश ईरान के लिए ऐसी व्यवस्था बनाने में मदद करता है, जिससे वह पैसा कमा सके और उस धन का इस्तेमाल आतंकवाद को समर्थन देने या परमाणु हथियार बनाने में हो, तो अमेरिका ऐसे देशों पर भी प्रतिबंध लगाएगा। भारत सरकार ने इस पर तो कोई प्रतिक्रिया नहीं दी लेकिन वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का अमेरिका के साथ प्रस्तावित ट्रेड डील को लेकर ये कहना कि जब तक राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा भारत पर लगाए जा रहे अनाप - शनाप टैरिफ की दरें सामान्य नहीं जातीं तब तक यह डील अटकी रहेगी। इसे एक तरह से अमेरिकी विदेश मंत्री की धौंस का जवाब कहा जा रहा है। अमेरिका के दबाव के चलते ही भारत ने ईरान से कच्चा तेल खरीदना बंद किया जबकि ये खरीदी बजाय डॉलर के  भारतीय रुपये में होने से विदेशी मुद्रा भंडार पर बोझ नहीं पड़ता था। लेकिन उसके बाद रूस के साथ वैसी ही व्यवस्था होने से भारत में ऊर्जा संकट उत्पन्न नहीं हो सका। अमेरिका ने इस पर भी आपत्ति जताते हुए आरोप लगाया कि भारत द्वारा कच्चे तेल की खरीद से रूस को यूक्रेन के साथ लड़ाई लंबी खींचने की ताकत मिल रही है। राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा उसी कारण टैरिफ का भार बढ़ाया जाता रहा । उनका दबाव ये है कि भारत अमेरिका से तेल और गैस खरीदने के साथ ही वेनेजुएला से भी आयात करे जहाँ के तेल भंडारों पर अमेरिका ने जबरन कब्जा कर रखा है। हालांकि चीन भी भारत की तरह ही रूस के कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक है ।  लेकिन भू - राजनीति के मद्देनजर ट्रम्प उसके प्रति उतने कठोर नहीं हो सके। बहरहाल अमेरिका की ताजा धमकी के पीछे का छिपा हुआ कारण ये भी है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी ट्रम्प से मिलने वॅाशिंगटन नहीं गए। ऑपरेशन सिंदूर के बाद उन्होंने जिस प्रकार पाकिस्तान की तरफदारी करते हुए भारत को नीचा दिखाने का खेल खेला वह भारत को नागवार गुजरा। इसीलिए जब जी - 8 सम्मेलन में शामिल होने श्री मोदी कैनेडा गए तब उनके पहुँचने से पहले ही जरूरी कार्य के बहाने ट्रम्प वापस लौट गए। और फिर फोन पर प्रधानमंत्री को वाॅशिंगटन आमंत्रित कर  व्हाइट हाउस में दोपहर भोज पर बातचीत का प्रस्ताव दिया। लेकिन जब श्री मोदी को पता चला कि उसी भोज में पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष आसिफ मुनीर भी रहेंगे तब उन्होंने ट्रम्प को फिर कभी मिलने का वायदा कर टरका दिया जो कि एक तरह से नाराजगी की अभिव्यक्ति ही थी। जाहिर है उससे ट्रम्प के अहं को चोट पहुंची और टैरिफ वृद्धि की उनकी धमकियाँ और तेज हो गईं।   उसके बाद गत जून माह में फ्रांस की राजधानी पेरिस में जी 7 सम्मेलन में जब दोनों का सामना हुआ तब ट्रम्प ने श्री मोदी से अकेले में बात करते हुए उन्हें अपना दोस्त बताकर खुश करना चाहा किंतु भारत ने अपने तौर - तरीके नहीं बदले। अमेरिका के ऐलानिया धमकियों के बावजूद रूस से तेल सहित सैन्य सौदे लगातार हो रहे हैं। किर्गिस्तान के हालिया शिखर सम्मेलन में मोदी, पुतिन और जिनपिंग की नजदीकी देखने के अलावा ईरानी राष्ट्रपति से प्रधानमंत्री की निजी बातचीत ने अमेरिका का गुस्सा बढ़ा दिया है। उसे डर है ब्रिक्स के दिल्ली सम्मेलन में भारत, रूस, चीन, द. अफ्रीका और ब्राजील मिलकर किसी नये वैश्विक समीकरण को जन्म दे सकते हैं जो अमेरिकी चौधराहट के लिए खतरा बनेगा। इसीलिये उसने पहले से ही धमकी देना शुरू कर दिया लेकिन ट्रम्प के मूर्खतापूर्ण फैसलों से उनके साथ ही अमेरिका की धाक भी मिट्टी में मिल चुकी है। ईरान युद्ध में उसका दम फूलने लगा है। दूसरी तरफ भारत ने वैश्विक मंचों पर अपनी वजनदारी बढ़ाई है। ब्रिक्स सम्मेलन के बाद वैश्विक राजनीति में बड़े बदलाव होने की संभावना है जिसमें भारत महत्वपूर्ण भूमिका में होगा। और यही ट्रम्प की खिसियाहट का कारण है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 3 September 2026

मनुस्मृति जलाने से कांग्रेस को नुकसान ही होगा



हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद कुछ सिरफिरे लोगों द्वारा मंच का शुद्धिकरण किये जाने की कांग्रेस ने कड़े शब्दों में निंदा करते हुए उस कृत्य के दोषी भाजपा कार्यकर्ताओं पर प्रकरण दर्ज करने की मांग की थी। पार्टी का आरोप है कि  दलित नेता के अपमान के दोषियों को  कटघरे में खड़ा करने के बजाय उल्टे कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के विरुद्ध मामला दायर कर दिया गया। इसके विरोध में देश भर में कांग्रेस ने विरोध प्रदर्शन करते हुए भाजपा को दलित विरोधी मानसिकता से ग्रसित बताया। यहाँ तक तो ठीक था  लेकिन इसके आगे जो हुआ और जो होने की चर्चा चल रही है उसके कारण श्री खरगे को जो सहानुभूति और कांग्रेस को राजनीतिक बढ़त हासिल हुई उस पर पानी फिरना तय है । जो खबरें आईं उनके अनुसार श्री गाँधी ने युवा कांग्रेस को निर्देश दिये हैं कि रा. स्व. संघ और भाजपा के दफ्तरों के सामने मनुस्मृति की प्रतियां जलाई जाएं। उसके बाद युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदयभानु चिब के नेतृत्व में दिल्ली में संघ और भाजपा  मुख्यालय के बाहर मनुस्मृति की प्रतियां और पन्ने जलाकर विरोध प्रदर्शन किया गया । साथ ही पूरे देश में ऐसा ही प्रतीकात्मक विरोध करने की घोषणा भी की गई । दरअसल आजकल श्री गाँधी पर दलितों का हितचिंतक बनने का भूत सवार है। लेकिन न तो उनके पास कोई वैचारिक पृष्ठभूमि है और न ही व्यक्तित्व। दलितों के बीच जाकर काम करने का  अनुभव भी इतना नहीं है जिसके आधार पर उनके दलित प्रेम को निश्छल और स्वाभाविक माना जाए। कभी - कभार किसी दलित के घर जाकर भोजन करने का नाटक तो प्रायः सभी नेता करते हैं ।  इसीलिए इन नौटंकियों का कोई असर नही होता। दरअसल श्री गाँधी आज तक यही नहीँ समझ सके कि जनता के दिलों में जगह कैसे बनाई जाती है। कांग्रेस अध्यक्ष का उनका कार्यकाल विफलता और दिशाहीनता का पर्याय बन कर रह गया। एक समय था जब उच्च जातियों के साथ ही दलित समुदाय में भी कांग्रेस का एकछत्र राज हुआ करता था। उ.प्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है। लेकिन कालांतर में पार्टी के हाथ से दोनों खिसकते गए। सवर्णों का बहुमत भाजपा के साथ जा मिला वहीं दलितों को बसपा ने खींच लिया। यादव और मुसलमान सपा के पाले में चले आये। परिणामस्वरूप कांग्रेस घुटनों के बल आ गई। उ.प्र जैसी हवा अन्य राज्यों में भी बहने से कांग्रेस अर्श से फर्श पर आ गई। बदहवासी में राहुल ब्राह्मण होने का स्वांग रचते देखे गये। उन्हें लगा इससे कांग्रेस का सवर्ण वोट बैंक वापस आ जाएगा। लेकिन राज्य दर राज्य पराजय का मुँह देखने के बाद उन पर जाति आधारित जनगणना की धुन सवार हुई। लेकिन वह भी काम नहीं आई तब वे जाति के अनुपात में प्रतिनिधित्व का ढोल पीटने लगे। हालांकि उनके राजनीतिक व्यवहार में कृत्रिमता और अक्खड़पन होने से हर दाँव उल्टा पड़ता गया। निराश होकर वे समाज में जातीय संघर्ष पैदा करने में जुट गए और बतौर औजार उस मनुस्मृति का इस्तेमाल करने लगे जो सामाजिक, वैधानिक और यहाँ तक कि आध्यात्मिक तौर पर भी पूर्णतः अप्रासंगिक हो चली थी। सामान्यतः हिंदुओं के घरों में रामायण, श्रीमद् भागवत और गीता होती है। गिने - चुने लोग वेद - पुराण भी संग्रहित करते हैं। अन्य धार्मिक पुस्तकें एवं पत्रिकाओं को पढ़ने वाले पाठक भी हैं किंतु मनुस्मृति पूरी तरह विस्मृत हो चुकी थी। किसी भी प्रवचन या धार्मिक अनुष्ठान में उसका उल्लेख अपवादस्वरूप ही सुनाई देगा। ऐसे में न जाने किसने श्री गाँधी को समझाइश दे दी कि  मनुस्मृति का सहारा लें तो शायद उनकी नैया पार लग जाए। इसीलिए संविधान की किताब लेकर घूमने वाले राहुल , मनुस्मृति लिए घूम रहे हैं। उनको लगता था कि पूरा दलित समुदाय उनके पीछे चल पड़ेगा किंतु एक बार फिर वे गलत साबित होने जा रहे हैं। उनकी मुहिम का असर ये हुआ कि मनुस्मृति देखते ही देखते राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन गई। इस ग्रंथ को महिला विरोधी प्रचारित करने की उनकी चाल उल्टी पड़ी और सोशल मीडिया पर मनुस्मृति में महिलाओं के सम्मान में कही गई बातों के उद्धरण देकर लोगों ने श्री गाँधी का मजाक उड़ाने के साथ ही ये चुनौती दे डाली कि हिम्मत है तो मुस्लिम समाज में महिलाओं की दशा पर कुछ बोलकर बताएं । अब मनुस्मृति को जलाने जैसी मूर्खता के कारण वे उस सवर्ण मतदाता को वापस भाजपा की ओर जाने मजबूर कर रहे हैं जो यूजीसी जैसे विवादों के चलते उससे छिटकने का मन बना रहा था। राहुल भूल गए कि उ.प्र में दलितों के मसीहा बनने के फेर में रामचरित मानस जलाने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य राजनीतिक परिदृश्य से ओझल हो चुके  हैं। ऐसा लगता है श्री गाँधी के सलाहकारों को भारत के लोगों की मानसिकता का लेश मात्र भी पता नहीं है । इसीलिए वे बजाय पिछली गलतियों से सबक लेने के उन्हें नई गलतियां करने के लिए उकसाते हैं। 

मनुस्मृति जलाने से कांग्रेस को नुकसान ही होगा

हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद कुछ सिरफिरे लोगों द्वारा मंच का शुद्धिकरण किये जाने की कांग्रेस ने कड़े शब्दों में निंदा करते हुए उस कृत्य के दोषी भाजपा कार्यकर्ताओं पर प्रकरण दर्ज करने की मांग की थी। पार्टी का आरोप है कि  दलित नेता के अपमान के दोषियों को  कटघरे में खड़ा करने के बजाय उल्टे कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के विरुद्ध मामला दायर कर दिया गया। इसके विरोध में देश भर में कांग्रेस ने विरोध प्रदर्शन करते हुए भाजपा को दलित विरोधी मानसिकता से ग्रसित बताया। यहाँ तक तो ठीक था  लेकिन इसके आगे जो हुआ और जो होने की चर्चा चल रही है उसके कारण श्री खरगे को जो सहानुभूति और कांग्रेस को राजनीतिक बढ़त हासिल हुई उस पर पानी फिरना तय है । जो खबरें आईं उनके अनुसार श्री गाँधी ने युवा कांग्रेस को निर्देश दिये हैं कि रा. स्व. संघ और भाजपा के दफ्तरों के सामने मनुस्मृति की प्रतियां जलाई जाएं। उसके बाद युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदयभानु चिब के नेतृत्व में दिल्ली में संघ और भाजपा  मुख्यालय के बाहर मनुस्मृति की प्रतियां और पन्ने जलाकर विरोध प्रदर्शन किया गया । साथ ही पूरे देश में ऐसा ही प्रतीकात्मक विरोध करने की घोषणा भी की गई । दरअसल आजकल श्री गाँधी पर दलितों का हितचिंतक बनने का भूत सवार है। लेकिन न तो उनके पास कोई वैचारिक पृष्ठभूमि है और न ही व्यक्तित्व। दलितों के बीच जाकर काम करने का  अनुभव भी इतना नहीं है जिसके आधार पर उनके दलित प्रेम को निश्छल और स्वाभाविक माना जाए। कभी - कभार किसी दलित के घर जाकर भोजन करने का नाटक तो प्रायः सभी नेता करते हैं ।  इसीलिए इन नौटंकियों का कोई असर नही होता। दरअसल श्री गाँधी आज तक यही नहीँ समझ सके कि जनता के दिलों में जगह कैसे बनाई जाती है। कांग्रेस अध्यक्ष का उनका कार्यकाल विफलता और दिशाहीनता का पर्याय बन कर रह गया। एक समय था जब उच्च जातियों के साथ ही दलित समुदाय में भी कांग्रेस का एकछत्र राज हुआ करता था। उ.प्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है। लेकिन कालांतर में पार्टी के हाथ से दोनों खिसकते गए। सवर्णों का बहुमत भाजपा के साथ जा मिला वहीं दलितों को बसपा ने खींच लिया। यादव और मुसलमान सपा के पाले में चले आये। परिणामस्वरूप कांग्रेस घुटनों के बल आ गई। उ.प्र जैसी हवा अन्य राज्यों में भी बहने से कांग्रेस अर्श से फर्श पर आ गई। बदहवासी में राहुल ब्राह्मण होने का स्वांग रचते देखे गये। उन्हें लगा इससे कांग्रेस का सवर्ण वोट बैंक वापस आ जाएगा। लेकिन राज्य दर राज्य पराजय का मुँह देखने के बाद उन पर जाति आधारित जनगणना की धुन सवार हुई। लेकिन वह भी काम नहीं आई तब वे जाति के अनुपात में प्रतिनिधित्व का ढोल पीटने लगे। हालांकि उनके राजनीतिक व्यवहार में कृत्रिमता और अक्खड़पन होने से हर दाँव उल्टा पड़ता गया। निराश होकर वे समाज में जातीय संघर्ष पैदा करने में जुट गए और बतौर औजार उस मनुस्मृति का इस्तेमाल करने लगे जो सामाजिक, वैधानिक और यहाँ तक कि आध्यात्मिक तौर पर भी पूर्णतः अप्रासंगिक हो चली थी। सामान्यतः हिंदुओं के घरों में रामायण, श्रीमद् भागवत और गीता होती है। गिने - चुने लोग वेद - पुराण भी संग्रहित करते हैं। अन्य धार्मिक पुस्तकें एवं पत्रिकाओं को पढ़ने वाले पाठक भी हैं किंतु मनुस्मृति पूरी तरह विस्मृत हो चुकी थी। किसी भी प्रवचन या धार्मिक अनुष्ठान में उसका उल्लेख अपवादस्वरूप ही सुनाई देगा। ऐसे में न जाने किसने श्री गाँधी को समझाइश दे दी कि  मनुस्मृति का सहारा लें तो शायद उनकी नैया पार लग जाए। इसीलिए संविधान की किताब लेकर घूमने वाले राहुल , मनुस्मृति लिए घूम रहे हैं। उनको लगता था कि पूरा दलित समुदाय उनके पीछे चल पड़ेगा किंतु एक बार फिर वे गलत साबित होने जा रहे हैं। उनकी मुहिम का असर ये हुआ कि मनुस्मृति देखते ही देखते राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन गई। इस ग्रंथ को महिला विरोधी प्रचारित करने की उनकी चाल उल्टी पड़ी और सोशल मीडिया पर मनुस्मृति में महिलाओं के सम्मान में कही गई बातों के उद्धरण देकर लोगों ने श्री गाँधी का मजाक उड़ाने के साथ ही ये चुनौती दे डाली कि हिम्मत है तो मुस्लिम समाज में महिलाओं की दशा पर कुछ बोलकर बताएं । अब मनुस्मृति को जलाने जैसी मूर्खता के कारण वे उस सवर्ण मतदाता को वापस भाजपा की ओर जाने मजबूर कर रहे हैं जो यूजीसी जैसे विवादों के चलते उससे छिटकने का मन बना रहा था। राहुल भूल गए कि उ.प्र में दलितों के मसीहा बनने के फेर में रामचरित मानस जलाने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य राजनीतिक परिदृश्य से ओझल हो चुके  हैं। ऐसा लगता है श्री गाँधी के सलाहकारों को भारत के लोगों की मानसिकता का लेश मात्र भी पता नहीं है । इसीलिए वे बजाय पिछली गलतियों से सबक लेने के उन्हें नई गलतियां करने के लिए उकसाते हैं। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 2 September 2026

काॅकरोच जनता पार्टी को झटका : अपराधी तत्वों पर मुकदमा चलेगा



कॉकरोच जनता पार्टी को अपनी घटती ताकत का एहसास गया। 5 सितंबर को दिल्ली में मार्च निकालने की धमकी उसने वापस ले ली। उसका आरोप था कि केन्द्र सरकार ने उस समझौते का पालन नहीं किया जिसके आधार पर जंतर मंतर आंदोलन समाप्त हुआ था। स्मरणीय है  20 जुलाई को संसद भवन के लिए निकाले गए मार्च के दौरान पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच हुए संघर्ष के बाद अपराधिक  प्रकरण दर्ज किये गए थे। पार्टी की प्रमुख मांग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की थी किंतु उसी के साथ आंदोलनकारियों पर दर्ज प्रकरण रद्द किये जाने और नीट पेपर लीक के कारण आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवार को एक करोड़ रु. बतौर मुआवजा दिये जाने की बात भी जोड़ दी गई। केन्द्र सरकार ने उक्त तीनों मांगों पर सहमति दे दी जिसके बाद  कॉकरोच जनता पार्टी ने  अपना आंदोलन समाप्त कर दिया। लेकिन प्रधान के त्यागपत्र के अलावा शेष दोनों मांगें लम्बित रहने के कारण वह दोबारा आंदोलन की चेतावनी दे रही थी। यद्यपि 1 करोड़ के मुआवजे के लिए सरकारी कवायद शुरू हो चुकी है लेकिन  अपराधिक प्रकरण रद्द नहीं होने से पार्टी की चिंता बढ़ती जा रही थी। ऐसे में दबाव बनाने के लिए 5 सितंबर को जंतर मंतर से मार्च निकालने की घोषणा की गई। चूंकि उसके अगले सप्ताह  दिल्ली में होने जा रहे ब्रिक्स सम्मेलन में रूस, चीन, ईरान, ब्राज़ील और द. अफ्रीका जैसे देशों के राष्ट्राध्यक्ष आने वाले हैं इसलिए सरकार को चिंता थी कि  20 जुलाई जैसी परिस्थिति उत्पन्न हुई तो  विदेशी हस्तियों का आगमन रुक सकता है जो देश की छवि के लिए नुकसानदायक होता। इसीलिए सरकार ने छात्रों पर दर्ज प्रकरण वापस लेने की अर्जी  सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल कर दी जिसके बाद पार्टी ने 5 सितम्बर को मार्च निकालने की धमकी वापस ले ली। लेकिन जिस बात पर वह दबाव नहीं बना सकी वह है 2800 से अधिक लोगों पर दर्ज प्रकरण जिनके बारे में दिल्ली पुलिस का कहना है कि उनकी अपराधिक पृष्ठभूमि  है और 20 जुलाई को हुए उपद्रव में उनका हाथ था। शुरू में तो पार्टी इस बात पर अड़ी थी कि सभी मामले वापस लिए जाएं । लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में दिल्ली पुलिस की कार्रवाई को सही ठहराते हुए पुलिस पर हमला करने वाले अपराधी तत्वों पर मुकदमा दायर करने को जायज बता कर उसको झटका दे दिया। इसीलिए उसने भी अपने कदम पीछे खींचने में बेहतरी समझी। हालांकि उसने ऐसा मजबूरी में ही किया क्योंकि जंतर मंतर के साथ ही रांची में भी चले छात्र आंदोलन ने जहाँ शालीनता और अनुशासन का बेहतरीन  उदाहरण प्रस्तुत किया वहीं जंतर मंतर में अश्लीलता और अभद्रता का जो बेशर्म प्रदर्शन हुआ उसकी पूरे देश में जबरदस्त निंदा हुई। उसके बाद पार्टी नेताओं पर कई शहरों में हमले भी हुए। 20 जुलाई को संसद के लिए निकाले मार्च को रोकने पुलिस द्वारा किये गए बल प्रयोग को राष्ट्रव्यापी मुद्दा बनाकर केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा करने के लिए  समूचा विपक्ष जुट गया और संसद तक नहीं चलने दी गई। लेकिन अब जबकि ये बात साफ होती जा रही है कि उस आंदोलन को हिंसक मोड़ देने वाले छात्र नहीं अपितु अपराधी तत्व थे तब वह आरोप भी सत्य प्रतीत होने लगा है कि जंतर मंतर पर जो कुछ भी हुआ वह  देश में अराजकता फैलाने का एक सुनियोजित षडयंत्र था। केन्द्र सरकार ने स्थिति को बिगड़ने से रोकने के लिये बुद्धिमत्ता दिखाते हुए आंदोलनकारियों की मांगें मान लीं। हालांकि इसके लिए उसे अपने समर्थकों का गुस्सा भी झेलना पड़ा । लेकिन गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस ने धैर्य के साथ आंदोलन में घुसे अपराधी तत्वों की घेराबन्दी करते हुए कॉकरोच जनता पार्टी के साथ ही शेष विपक्ष के आरोपों को गलत साबित कर दिया। ये देखते हुए  पार्टी ने 5 सितंबर का मार्च रद्द कर  अपनी कमजोरी पर पर्दा डाला है। बीते कुछ दिनों में उसे ये एहसास हो गया था कि काठ की हांडी बार - बार नहीं चढ़ती।  जंतर मंतर आंदोलन के बाद उसके नेताओं ने दौरे तो खूब किये किंतु उन्हें अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने के साथ ही जो जानकारियां प्रकाश में आईं उनसे उनकी छवि खराब होने लगी। केन्द्र सरकार ने अपराधी तत्वों पर प्रकरण दर्ज करने की जो दृढ़ता दिखाई वह बेहद जरूरी है जिससे भविष्य में युवाओं की आड़ में पेशेवर अपराधी अपनी कारस्तानी न दिखा पाएं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 1 September 2026

खबर अच्छी किंतु आंकड़े पेट नहीं भरते



प. एशिया में चल रहे संकट से उत्पन्न विषम परिस्थितियों के बावजूद मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही ( अप्रैल से जून) में भारत की जीडीपी ( सकल घरेलू उत्पाद) दर का 7.8 प्रतिशत का आंकड़ा छूना निश्चित रूप से उत्साहित करने वाला लो nnv   । ईरान और अमेरिका में चल रहे युद्ध के परिणामस्वरूप कच्चे तेल , गैस और उर्वरकों की आपूर्ति बाधित होने से वैश्विक स्तर पर आर्थिक उथलपुथल मची है। भारत में भी पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस महंगी हुई वहीं उर्वरक की कमी से किसान परेशान है। इनके अलावा अमेरिका द्वारा टैरिफ बढ़ाये जाने से हमारे निर्यात पर विपरीत असर तो पड़ा ही कच्चे तेल के महंगे होने से रुपये की विनिमय दर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले चिंताजनक स्थिति तक नीचे आती चली गई। इसके कारण फैली घबराहट में विदेशी निवेशकों द्वारा भारत में लगाई गई पूंजी तेजी से वापस निकाली जिसका असर शेयर बाजार में आई अस्थिरता के अलावा विदेशी मुद्रा भंडार में आई कमी के रूप में सामने आने लगा।  लेकिन इस सबके बाद भी पहली तिमाही में जीडीपी का भारतीय रिजर्व बैंक के अनुमान से अधिक रहना इस बात को प्रमाणित करता है कि हमारा आर्थिक प्रबंधन सही रहा और वैश्विक स्तर पर व्याप्त  घबराहट से प्रभावित हुए बिना सरकार ने वित्तीय अनुशासन बनाये रखा । इससे भारतीय अर्थव्यवस्था में दुनिया भर का विश्वास न सिर्फ कायम रहा अपितु उसमें वृद्धि भी परिलक्षित हुई। अधिकृत जानकारी के अनुसार पहली तिमाही में जीडीपी  ₹81.36 लाख करोड़ रही, जो पिछले वर्ष इसी अवधि में ₹75.46 लाख करोड़ थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 7.8 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि दर पर कहा  कि वैश्विक अनिश्चितताओं और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद यह एक असाधारण उपलब्धि है। वहीं विपक्षी दल कांग्रेस ने इस आंकड़े को भ्रामक बताया और सवाल उठाया कि यह उच्च वृद्धि रोजगार और आम नागरिकों की समृद्धि में क्यों नहीं बदल रही है? ये दोनों ही  प्रतिक्रियाएं अपनी - अपनी जगह ठीक हैं । चौतरफा हमलों के बीच सरकार के लिए ये राहत की खबर है जबकि विपक्ष द्वारा उठाया गया सवाल भी वाजिब है क्योंकि जीडीपी में वृद्धि की दर पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा होने का लाभ यदि देश के आम नागरिक को न मिल सके तब आंकड़े कितने भी आकर्षक क्यों न हों लोगों के चेहरों पर मुस्कुराहट नहीं ला सकते। उस दृष्टि से देखें तो इस समय जो तिमाही चल रही है इसके आंकड़े आने के बाद ही देश की आर्थिक मजबूती का जमीनी आकलन हो सकेगा क्योंकि  मानसून की कमजोर शुरुआत  और  फिर बाढ़ आदि के चलते खरीफ फसल को जो नुकसान पहुँचा उसने चिंता उत्पन्न कर दी है। बरसात में सब्जियां महंगी होना तो आम बात है किंतु बीते कुछ दिनों में शक्कर के दाम जिस तरह उछले उसने सरकार के प्रबंधन पर सवालिया निशान लगा दिये। इसी तरह 20 फीसदी एथनॉल मिलाये जाने के बाद भी पेट्रोल के दाम नहीं घटाए जाने पर सरकार की आलोचना हो रही है। ये आरोप भी लग रहे हैं कि एथनॉल बनाने में गन्ने के उपयोग से एक तरफ जहाँ शक्कर उत्पादन घट गया वहीं कुछ और खाद्यान्न भी उपभोक्ताओं से दूर हो गए। हालांकि कल समाप्त हुए अगस्त माह में 2 लाख करोड़ रु.जीएसटी वसूली का आंकड़ा  सरकार का हौसला बढ़ाने वाला है जो गत वर्ष इसी माह की तुलना में 14 फीसदी अधिक है किंतु देखने वाली बात ये है कि डॉलर महंगा होने से आयात की लागत बढ़ी जिसका असर जीएसटी संग्रह में वृद्धि पर  स्वाभाविक तौर पर पड़ा  ।  हालांकि आयात बढ़ना अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता। बावजूद इसके जीडीपी यदि 8 प्रतिशत को छू रही है तब उसे इस आधार पर संतोषजनक माना जा सकता है क्योंकि वैश्विक हालात पूरी तरह अनिश्चित और विपरीत हैं। यद्यपि आम जनता के लिए ये आंकड़ा तब तक कोई मायने नहीं रखता जब तक उसे सीधी राहत न मिले। उदाहरण के लिए एथनॉल मिलाने के बाद भी यदि पेट्रोल तो सस्ता हो नहीं उल्टे शक्कर सहित खाने - पीने की अन्य चीजें महंगी हो जाएं तब उसकी नाराजगी औचित्यपूर्ण ही कही जाएगी। भले ही विपरीत परिस्थितियों में भी भारत के हालात चिंताजनक नहीं हैं किंतु जनता को इसका भरोसा तभी होगा जब उसे सीधी राहत मिले क्योंकि आंकड़े पेट नहीं भरते। 

- रवीन्द्र वाजपेयी



Monday, 31 August 2026

सवर्ण जेन जी भी चुनाव में बाजी पलट सकते हैं



देश में इन दिनों जो उथलपुथल है उसका कारण युवाओं से जुड़े मुद्दे हैं। यूजीसी अधिसूचना से शुरू विवाद नीट पेपर लीक होने के बाद और गहरा गया। इसी दौरान 12 वीं परीक्षा के मूल्यांकन की विसंगतियाँ भी सामने आ गईं। इनके कारण केंद्र सरकार और भाजपा को कटघरे में खड़ा होना पड़ गया। इस परिस्थिति का लाभ वैसे तो विपक्षी दलों को मिलना चाहिए था किंतु अचानक उभरी कॉकरोच जनता पार्टी ने नीट पेपर लीक के मुद्दे पर दिल्ली के जंतर मंतर पर आंदोलन करते हुए युवाओं को अपने पाले में खींचने में तात्कालिक तौर तो सफलता हासिल कर ही ली। यद्यपि युवाओं में केन्द्र सरकार के विरुद्ध गुस्से की शुरुआत यूजीसी की उस नियमावली से हुई थी जिसमें दलित और ओबीसी छात्रों के उत्पीड़न पर कड़े दण्ड का प्रावधान किया गया था। पहले उसमें केवल दलित वर्ग था किंतु नये नियमों में ओबीसी भी जुड़ने से सवर्ण छात्रों में गुस्से की लहर दौड़ गई। हालांकि उस नियमावली पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगा दी किंतु इसी बीच नीट  पेपर लीक होने से असंतोष का दायरा व्यापक हो गया। 22 छात्रों द्वारा आत्महत्या के कारण नीट मुद्दा यूजीसी विवाद पर भारी पड़ने लगा। कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन तो नीट पेपर लीक और धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र पर ही केंद्रित रहा। लेकिन उसके फ़ौरन बाद आरक्षण विरोधी आंदोलनकारियों ने भी जंतर मंतर पर शक्ति प्रदर्शन किया। हालांकि मुख्य धारा के मीडिया ने उसे खास महत्व नहीं दिया वहीं सरकार ने भी उसके प्रति उपेक्षा दिखाई। हालांकि इस आंदोलन के कारण सोशल मीडिया पर आरक्षण  विरोधी आवाजें तेज हो गईं। इसे यूजीसी विवाद का ही अगला चरण कहना गलत नहीं होगा। इस आंदोलन ने भी नीट परीक्षा में आरक्षण श्रेणी के छात्रों को कम अंकों के बावजूद मेडीकल कॉलेजों में प्रवेश मिलने  का मुद्दा उठाया। उल्लेखनीय है विभिन्न दलों ने जंतर मंतर  आंदोलन के प्रति तो समर्थन जताया परंतु आरक्षण विरोधी आंदोलन के प्रति   सहानुभूति दिखाने तक से परहेज किया। इन युवाओं में भाजपा के प्रति ज्यादा नाराजगी है क्योंकि सवर्ण जातियाँ उसकी परंपरागत समर्थक रही हैं। लेकिन चुनाव जीतने के लिए भाजपा भी दलित और पिछड़ी जातियों के बीच पैठ बढ़ाने में जुटी हुई है। उ.प्र और बिहार जैसे  राज्यों में भाजपा को मिली सफलता इसका प्रमाण है। इससे प्रभावित होकर काँग्रेस भी दलित और पिछड़ी जातियों को लुभाने में लग गई। राहुल गाँधी पूरे देश में घूम - घूमकर मनु स्मृति विरोधी अभियान चला रहे हैं। देश की दोनों प्रमुख पार्टियों द्वारा सवर्णों को भगवान भरोसे छोड़ दिये जाने से अब उनके मन में ये धारणा बैठती जा रही है कि उनका कोई हितचिंतक नहीं है। आरक्षण विरोधी आंदोलन के प्रति सभी राजनीतिक दलों का उपेक्षभाव इसका प्रमाण है। सर्वोच्च न्यायालय तक ने आरक्षण की सुविधा प्राप्त परिवारों को उसके दायरे से बाहर करने जैसी टिप्पणियां समय - समय पर कीं किंतु किसी राजनेता में उनका समर्थन नहीं किया। सभी पार्टियां आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था को जारी रखने की पक्षधर हैं। राहुल गाँधी तो एक कदम आगे बढ़कर मनु स्मृति के बहाने सवर्ण समाज को खलनायक साबित करने में जुटे हुए हैं। लेकिन इस खींचातानी में एक नया वर्ग संघर्ष ओबीसी और अनु. जातियों/ जनजातियों के  बीच दिखने लगा है। इसी के चलते ओबीसी आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाये जाने का दलित और आदिवासी वर्ग विरोध कर रहा है। बड़ी बात नहीं आने वाले समय में ओबीसी जातियों और दलित - आदिवासियों के बीच टकराव की स्थिति बनने लगे। इसी के साथ ये खतरा भी है कि ओबीसी में नये - नये जाति समूह उभरने से आरक्षण के बंटवारे को लेकर उनके बीच ही खींचातानी शुरू न हो जाए। कुल मिलाकर आरक्षण अब भारतीय राजनीति की मजबूरी बन गई है। किसी भी पार्टी या नेता में उसके विरोध में बोलने का साहस नहीं है। लेकिन इसके चलते सवर्ण जातियों के बीच जो नाराजगी बढ़ रही है उसकी चिंता भी की जानी चाहिए। सवर्ण छात्रों का ये कहना सही है कि उनकी समस्याओं को राजनेता जिस तरह उपेक्षित कर देते हैं उसके कारण उनके मन में समूची व्यवस्था के प्रति वितृष्णा बढ़ती जा रही है। देश से प्रतिभाओं के पलायन के पीछे आरक्षण भी बड़ा कारण है।  आजकल सभी पार्टियां जेन जी को खुश करने में लगी हैं। लेकिन उन्हें ये ध्यान रखना होगा कि चुनाव के दिन अशिकांश मतदाता सब भूलकर जाति को ही याद रखते हैं। ऐसे में सवर्ण जातियों के जेन जी की  नाराजगी भी जीत - हार में निर्णायक हो सकती है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 29 August 2026

अमेरिका में संघ विरोधी मुहिम के पीछे बड़ा षडयंत्र



रा.स्व.संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत इन दिनों अमेरिका की यात्रा पर हैं। संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर  समाज के विभिन्न वर्गों से सम्पर्क की योजना के सिलसिले में देश भर में संघ प्रमुख ने लोगों से प्रत्यक्ष संवाद किया। इनमें संघ की विचारधारा के विरोधियों के घर पर जाकर मिलने जैसा अभिनव कार्यक्रम भी था। इसके पीछे का उद्देश्य संघ की विचारधारा और कार्यक्रमों के बारे में उस तबके को अवगत करवाना है जिनके मन में संघ को लेकर अनेकानेक भ्रांतियां हैं। संघ इसमें कितना सफल हुआ ये तो भविष्य बताएगा किंतु इस प्रयास कहें या प्रयोग किंतु लोकतंत्र में इस तरह का संवाद एक स्वस्थ वातावरण का निर्माण करता है। उल्लेखनीय है संघ प्रमुख डॉ. भागवत पूर्व में भी मुस्लिम और ईसाई धर्मगुरुओं से भेंट करते रहे जिसे लेकर तरह - तरह की चर्चाएं भी चलीं। बीते दिनों जब दिल्ली में जंतर मंतर पर युवाओं का आंदोलन हुआ और देश में जेन जी नामक नये आयु वर्ग समूह के मन में व्यवस्था के विरुद्ध व्याप्त असंतोष राष्ट्रीय विमर्श बन गया तब भी डॉ. भागवत ने मुंबई में युवाओं से प्रत्यक्ष संवाद कर उनकी भावनाओं को समझकर उनके असंतोष को दूर करने के लिए उनके प्रति स्थापित अवधारणा और व्यवहार के तौर - तरीकों में समयानुकूल बदलाव का सुझाव दिया। इसी क्रम में वे अमेरिका प्रवास पर गए हैं जहाँ संघ के हजारों स्वयंसेवकों के अलावा हिन्दू समाज रहता है। अपने वैचारिक पक्ष को उसके सामने रखने के उद्देश्य से हो रही इस यात्रा का वहाँ कतिपय तत्व विरोध कर रहे हैं। सबसे पहले चर्चा में आया न्यूयॉर्क के महापौर  ममदानी का विरोध जो ऐलनिया भारत विरोधी हैं। उसके बाद अमेरिका के सरकारी आयोग ने  संघ पर प्रतिबंध लगाने और इसके नेताओं के अमेरिकी वीजा पर रोक की मांग की है। यह मांग अमेरिकी संस्था यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम  ने की है।आयोग ने संघ पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमलों में शामिल होने और भारत में धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित करने का आरोप लगाते हुए संघ नेताओं को राजनयिक सम्मान न देने, उच्चस्तरीय बैठकें न करने और डॉ.भागवत का वीजा रद्द करने की सिफारिश की गई है। हालांकि ये एक सलाहकार संस्था है, इसलिए इसकी सिफारिशें मानने के लिए अमेरिकी सरकार बाध्य नहीं है।भारत सरकार ने इस आयोग को पक्षपाती और तथ्यात्मक रूप से भ्रामक बताते हुए इसकी रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया है। लेकिन  जिस अमेरिका में खालिस्तान समर्थक आतंकवादियों को पनाह मिलती हो और जिसने दुनिया में इस्लामिक आतंकवाद को पाल पोसकर बड़ा किया वहाँ संघ का विरोध अनाधिकार चेष्टा लगता है। और फिर जिस आयोग ने इसकी मांग  की उसका अध्यक्ष ही पाकिस्तानी मूल का है। ये अच्छा है कि अमेरिका के भीतर ही संघ  विरोधी मुहिम की निंदा हो रही है। यद्यपि अमेरिकी प्रशासन ने उक्त माँग पर कोई निर्णय नहीं किया किंतु इससे ये बात स्पष्ट हो गई कि अमेरिका में भी हिंदुत्व विरोधी लाॅबी काफी तेजी से सक्रिय है। इस बारे में ध्यान देने योग्य बात ये है कि हाल ही में जन्मी काकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके भी कुछ माह पहले अमेरिका से लौटे थे और उन्होंने भी यहाँ आकर संघ विरोधी बयानबाजी की। इससे ये आशंका और मजबूत हो गई कि अमेरिका से ही भारत में अस्थिरता फैलाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। संघ प्रमुख की इस यात्रा के विरोध की शुरुआत जिस ममदानी ने की उसकी जीत पर भारत में भी उसी वर्ग विशेष ने खुशियाँ मनाई थीं जो संघ का घोर विरोधी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी