वर्ष 2024 के अगस्त माह में युवाओं के जबरदस्त आंदोलन के परिणामस्वरूप हालात इतने बिगड़े कि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को जान बचाकर भारत आना पड़ा। तब से वे दिल्ली के निकट कड़ी सुरक्षा के बीच रह रही हैं। हालांकि भारत सरकार ने उन्हें आज तक औपचारिक तौर शरण नहीं दी। लेकिन बांग्लादेश के अनुरोध के बावजूद वापस भी नहीं भेजा। उनकी पार्टी अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया गया लिहाजा वह चुनाव में भाग नहीं ले सकी। गत दिवस आए परिणामों के बाद उनकी परम्परागत विरोधी बीएनपी प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में लौटी जिसके कारण हसीना की घर वापसी के आसार धूमिल हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अवामी लीग समर्थक मतदाता विशेष तौर पर हिन्दू समुदाय ने कट्टरपंथी जमात - ए - इस्लामी के आतंक से बचने के लिए तारिक रहमान की बीएनपी को समर्थन देना बेहतर समझा। सबसे चौंकाने वाली बात रही हसीना को सत्ता से हटाने के लिए हुए आंदोलन का नेतृत्व करने वाले छात्र नेताओं को मतदाताओं द्वारा तिरस्कृत किया जाना। उल्लेखनीय हैं श्रीलंका में हुए सत्ता परिवर्तन में युवाओं की प्रमुख भूमिका के बाद बांग्लादेश और नेपाल में भी उसी शैली में सरकार बलपूर्वक पलटी गई और गुस्साई जनता ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री आवास में घुसकर लूटपाट की। उन दृश्यों को पूरी दुनिया में देखा गया। कुछ अन्य देशों में भी इसी तरह सत्ताधीश हटाए हटाए गए जिसके बाद जेन - जी नामक एक नया संबोधन चल पड़ा। लोकतांत्रिक देशों के युवाओं में सत्ता के प्रति बढ़ते असंतोष की परिणिति हिंसक जनांदोलन के रूप में होने से भारत में भी ऐसा ही होने की आशंका व्यक्त की गई। इसके पीछे वही ताकतें हैं जो लगातार देश को अस्थिर करने के लिए प्रयासरत हैं। सी.ए.ए , एन. आर.सी और कृषि कानूनों आदि के बहाने जो आन्दोलन खड़े किए गए उनमें अलगाववादी ताकतों की भूमिका स्पष्ट तौर पर दिखाई दी। जेएनयू, अलीगढ़ मुस्लिम , जादवपुर और उस्मानिया विवि में हुए छात्र आंदोलनों में भी वही झलक दिखाई दी। दिल्ली के शाहीन बाग धरने को नया प्रयोग नाम दिया गया। साल भर से ज्यादा दिल्ली में रास्ता रोककर किए गए किसान आंदोलन से किसानों का तो राई - रत्ती भला नहीं हुआ लेकिन पंजाब में खालिस्तानी आतंक का पुनर्जन्म अवधि हो गया। इसलिए बांग्लादेश और नेपाल में जब अराजक तरीके से सत्ता बदली गई तब भारत में भी कुछ लोगों को वैसे ही युवा आंदोलन की उम्मीद नजर आने लगी। वोट चोरी के नाम पर जनता को भड़काकर अव्यवस्था फैलाने का ताना - बाना बुना गया। उस मुहिम से भी वही तबका जुड़ गया जो उसके पहले के सभी आंदोलनों में सक्रिय रहा। बिहार के मतदाताओं ने वोट चोरी का ढोल पीटने वालों के दुष्प्रचार पर जिस तरह पानी फेरा उसके बाद भारत में जेन - जी के नाम पर राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा करने की कोशिश विफल हो गई। उसके बाद एस.आई.आर ( मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण) का विरोध कर जनता को भड़काने की चाल चली गई किंतु उसे भी जन समर्थन नहीं मिला। दरअसल इसका कारण ये है युवा शक्ति आंदोलन तो खड़ा कर देती है किंतु जनता उसे सत्ता संचालन के लायक नहीं समझती। श्रीलंका और नेपाल में हुए सत्ता परिवर्तन में युवाओं की निर्णायक भूमिका के बाद भी नई सरकार में ले देकर फिर पेशेवर राजनेता ही लौट आए। और यही बांग्लादेश के चुनाव परिणाम दर्शा रहे हैं। जनता ने बीएनपी को सरकार और जमात - ए - इस्लामी को तो विपक्ष में बिठा दिया। लेकिन जिन युवाओं के कारण बंगलादेश में बड़ी जनक्रांति हुई उनको पूरी तरह नकार दिया । इसी तरह नेपाल में भी जिन युवा नेताओं ने कुछ दिनों के भीतर सत्ता के महारथियों को उखाड़ फेंका उन्हें सत्ता प्रतिष्ठान की देहलीज पर ही रोक दिया गया। उक्त उदाहरणों से ये निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जेन - जी का उपयोग एक औजार के रूप में किया जाता है। इसके पीछे विदेशी शक्तियों का हाथ होता है। बांग्लादेश और नेपाल की घटनाओं में इसका प्रमाण खुलकर सामने आया। संयोगवश भारत में युवा शक्ति को भड़काकर अराजकता के रास्ते पर ले जाने का षडयंत्र लगातार विफल हो रहा है। इसका कारण हमारे समाज का अहिंसक स्वाभाव है। इसलिए भारत में सत्ता परिवर्तन मतदान से होता है रक्तपात से नहीं। दुर्भाग्य से हमारे सभी पड़ोसी देशों पाकिस्तान , नेपाल , श्रीलंका , बंगलादेश, म्यांमार में लोकतंत्र कभी सेना तो कभी भीड़ के कदमों तले रौंदा जा चुका है किंतु देश विरोधी शक्तियों की तमाम कोशिशें भारत में नाकामयाब होती रही हैं। नक्सलवाद की जड़ें उखड़ जाना इस बात का ताजा प्रमाण है कि भारत की युवा शक्ति की लोकतांत्रिक व्यवस्था में गहरी आस्था है।
- रवीन्द्र वाजपेयी