Sunday, 8 November 2026

लक्ष्मी माता की पूजा करते समय भारत माता को न भूलें




       दीपावली भारतीय पर्व परंपरा का चरमोत्कर्ष है। धन - धान्य की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी की आराधना का यह अवसर वस्तुतः सुख - समृद्धि की कामना के लिए किये जाने पुरुषार्थ को समर्पित है। अमावस्या की अंधियारी रात को मिट्टी के दियों से प्रकाशित करने का सांकेतिक महत्व यही है कि विपरीत परिस्थितियों में भी आशाओं के दीप जलाते रहना चाहिए। यद्यपि इस पर्व को अनेक पौराणिक और ऐतिहासिक घटनाओं से जोड़ा जाता है किंतु आधुनिक संदर्भों में देखें तो दीपावली विकासवादी सोच का प्रतीक है। समाज का प्रत्येक वर्ग आज के दिन समृद्धि की कामना के साथ ही उसका संकल्प भी लेता है। दीपावली पर परिवार और व्यापार सभी में श्री वृद्धि की जो परंपरा है वही हमारी प्रगति का प्रेरणास्रोत है। इसीलिए यह पर्व  निर्धन और संपन्न सभी वर्गों  को उत्साह से भर देता है। और इसी कारण  हमारा देश अनगिनत प्रतिकूलताओं के बावजूद आगे बढ़ता जा रहा है। ज्ञान, विज्ञान, कृषि, उद्योग, व्यवसाय, अंतरिक्ष, पर्यटन, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और तकनीक आदि सभी क्षेत्रों में आज हम विश्व के प्रमुख देशों की कतार में अग्रणी स्थान पर खड़ा होने की पात्रता और क्षमता अर्जित कर सके।  विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था होना निश्चित रूप से गौरवान्वित करता है। दुनिया में भारत और भारतीयों की प्रतिष्ठा में जो वृद्धि हुई वह हमारी आर्थिक और सैन्य उपलब्धियों का परिणाम है । इसका श्रेय हमारे किसानों, श्रमिकों, वैज्ञानिकों, शिक्षकों और उद्यमियों को जाता है जिन्होंने अपनी मेहनत और कार्य कुशलता का परिचय देते हुए भारत को समृद्धि और सफलता के मार्ग पर ला खड़ा किया। हालांकि, हर हाथ को काम और हर खेत को पानी देने का लक्ष्य अभी दूर है किन्तु प्रयासों की पराकाष्ठा और बुलंद हौसलों के बल पर उस तक पहुंचना असंभव भी नहीं है। देश जिस सर्वतोमुखी प्रगति के मार्ग पर बढ़ चला है उससे उज्ज्वल भविष्य की उम्मीदें निश्चित तौर पर मजबूत हुई हैं। लेकिन एक वर्ग ऐसा है जो अपनी नकारात्मक मानसिकता के वशीभूत होकर निराशाजनक वातावरण बनाने में जुटा है। निजी स्वार्थों की पूर्ति हेतु राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करना इसकी आदत सी बन गई है। करोड़ों देशवासियों द्वारा अर्जित उपलब्धियों पर अविश्वास कर लोगों का मनोबल गिराने का सुनियोजित अभियान चल पड़ा है। हालिया घटनाक्रम पर दृष्टिपात करें तो ये अनुभव होगा कि विदेशी साजिश के समानांतर देश को अस्थिर करने का षडयंत्र घरेलू स्तर पर भी जारी है जिसमें नौजवानों का उपयोग बतौर औजार किया जा रहा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था को अराजकता से नष्ट करने का कुचक्र वही ताकतें रच रही हैं जो जनता का विश्वास अर्जित करने में असफल साबित हुई हैं। लोकतंत्र को भीड़तंत्र में बदलकर बांग्लादेश व नेपाल जैसे हालात उत्पन्न कर देश को गृहयुद्ध की आग में झोंकने की कोशिशें  विकास की गति को रोकने का कारण बन सकती है। 

      आज दीपावली के  पर्व पर हम सबका दायित्व है, अपने साथ ही देश के बारे में भी सोचें क्योंकि उसकी समृद्धि और सुरक्षा से ही हमारा और हमारी भावी पीढ़ी का भविष्य जुड़ा है। निजी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए विदेशी ताकतों के हाथों की कठपुतली बनकर देश को अस्त - व्यस्त करने का दुष्परिणाम हम अपने पड़ोस में देख चुके हैं। ऐसे में जरूरी है हम उन ताकतों के मंसूबों को ध्वस्त करने में सहयोगी बनें जो उम्मीदों के दियों को बुझाने का कुचक्र रच रहे हैं। अतः आज लक्ष्मी माता का पूजन करते समय भारत माता को न भूलें जिसकी गोद में हम जन्मे और पले - बढ़े। 

     दीपावली का यह पर्व आप सबको सुख, समृद्धि और शांति प्रदान करे यही मंगल कामना है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 7 November 2026

दिल्ली का वायु प्रदूषण : सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपनी लाचारी बता दी



दिल्ली में सर्दियाँ शुरू होने के साथ ही वायु प्रदूषण खतरे के निशान से ऊपर आ चुका है। ज्यों - ज्यों तापमान गिरेगा राजधानी में रहने वालों को साँस लेने में परेशानी बढ़ती जाएगी। दिल्ली से सटे नोएडा और गुरूग्राम जैसे एनसीआर के इलाकों में भी वही स्थिति है। घरों में एयर प्योरीफायर उपकरण अनिवार्यता सी हो गई है लेकिन उन लोगों का क्या होता होगा जिनके पास रहने को घर ही नहीं है? एनसीआर में गंभीर होते वायु प्रदूषण (एयर क्वालिटी इंडेक्स 400 के पार) को लेकर गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय की तीन जजों की पीठ ने बेहद सख्त टिप्पणियां कीं , जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जय माल्या बागची और जस्टिस वी मोहना शामिल थे। एनसीआर में वायु प्रदूषण की खतरनाक स्थिति के बारे में एक याचिका पर सुनवाई के दौरान अनेक ऐसे तथ्य सामने आये जिनसे राष्ट्रीय राजधानी की हवा में घुले ज़हर का पता चलता है। न्याय मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता  अपराजिता सिंह ने न्यायालय  को बताया कि दिल्ली का प्रदूषण जिस खतरनाक स्तर पर आ पहुँचा है उस वजह से यहाँ रहने वाला हर व्यक्ति प्रति दिन बिना सिगरेट पिए भी  रोजाना 30 सिगरेट के बराबर पी रहा है। इसका सर्वाधिक नुकसान झेल रहे हैं बच्चे जिनके फेफड़ों के कम आयु में ही खराब होने का खतरा बढ़ रहा है जो भावी पीढी़ के स्वास्थ्य के लिए चिंता जनक है। इस जानकारी पर तंज कसते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने यहाँ तक कह दिया कि हमें उम्मीद है कि आप सभी दिल्ली के मौसम का आनंद ले रहे होंगे। दरअसल मुख्य न्यायाधीश का कटाक्ष न्यायालय में उपस्थित उन प्रशासनिक अधिकारियों पर था जिनकी जिम्मेदारी वायु प्रदूषण दूर करना है। कुछ समय पूर्व तक ये अवधारणा काफी मजबूत थी कि एनसीआर की हवा में प्रदूषण का कारण पंजाब के किसानों द्वारा  खेतों में जलाई जाने वाली पराली है। पराली जलाने वाले किसानों पर कार्रवाई करने संबंधी व्यवस्था भी की गई किंतु वह भी सरकारी ढर्रे का शिकार होकर रह गई। राजनीति भी इसका कारण बनी। उदाहरण के लिए जब अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने तब वे अपना बचाव करने के लिए पंजाब के किसानों द्वारा पराली जलाये जाने को राजधानी के वायु  प्रदूषण के लिए जिम्मेदार बताकर पल्ला झाड़ लेते थे। लेकिन जब पंजाब में भी आम आदमी पार्टी  सत्ता में आ गई तब उनके सुर बदल गए। दिल्ली में उनकी सरकार ने एक दिन सम और एक दिन विषम नम्बर के वाहन चलने की जो व्यवस्था की वह भी ज्यादा जारी नहीं रह सकी। गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर टिप्पणी करते हुए  कहा कि दिल्ली, नोएडा और गुरुग्राम की सड़कों पर भारी ट्रैफिक और गाड़ियों से निकलने वाला धुआं प्रदूषण का एक बड़ा कारण है। लेकिन  चौंकाने वाली बात ये रही कि न्यायालय ने किसी भी प्रकार का आदेश देने या पाबंदी लगाने से साफ मना कर दिया। इतना ही नहीं ये टिप्पणी भी कर डाली कि केवल पाबंदियां लगाने से समस्या हल नहीं होगी क्योंकि उसकी वजह से कानून तोड़ने की घटनाओं में वृद्धि होती है। सर्वोच्च न्यायालय का ऐसा कहना उसकी दयनीयता या निराशा को दर्शाता है। लेकिन इसका कारण ये है बीते सालों में  दिल्ली में दीपावली पर फटाके फोड़ने पर उसने जो पाबंदियां लगाईं उनका धेले भर असर नहीं हुआ। इसीलिए उसने इस वर्ष ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया। इसके साथ ही न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वायु प्रदूषण के लिए गरीब लोगों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि वही लोग इसके सबसे बड़े शिकार हैं। पराली प्रबंधन के लिए किसानों को मशीनों के साथ-साथ यह भी समझाने की जरूरत बताई गई कि वे पराली बेचकर कैसे कमाई कर सकते हैं। साथ ही कहा गया कि पटाखा-मुक्त दिवाली को एक जन आंदोलन बनना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश सहित उक्त पीठ में शामिल अन्य न्यायाधीशों ने स्पष्ट तौर पर कहा कि जनता में प्रदूषण रोकने के प्रति दायित्वबोध उत्पन्न करना बेहद जरूरी है क्योंकि कानून और अदालती आदेश बेअसर साबित हुए हैं। इस प्रकार पहली बार देश की सर्वोच्च अदालत ने भी ये मान लिया कि जनता के सहयोग के बिना कोई कानून या अदालती फरमान प्रदूषण दूर नहीं कर सकता। लेकिन सवाल ये है कि जब न्यायपालिका भी अपनी मजबूरी बताते हुए पल्ला झाड़ लेगी तब प्रदूषण को रोकने के लिए सख्त कदम कौन उठायेगा? जहाँ तक सवाल सरकार का है तो वह जनता की नाराजगी से बचने सब कुछ सहन करती जाती है। बची जनता तो अधिकांश लोगों के लिए पर्यावरण और प्रदूषण जैसे विषय बेमानी हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 6 November 2026

धनतेरस भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए शुभ संदेश लेकर आई



लगातार गोते लगाने के कारण भारतीय शेयर बाजार में निराशा के साथ ही चिंता का माहौल था। विदेशी निवेशकों ने जिस बड़ी मात्रा में भारतीय बाजारों से अपनी पूंजी निकाली उसकी वजह से वैश्विक स्तर पर भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति जो विश्वास बना हुआ था वह डगमगाने लगा। 7 प्रतिशत की विकास दर के अनुमान पर भी सवालिया निशान लगने लगे। प. एशिया संकट के चलते कच्चे तेल की कीमतों में हुई वृद्धि के अलावा अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये के विनिमय मूल्य में आती जा रही गिरावट ने चिंता और बढ़ा दी क्योंकि इसका असर आयात खर्च बढ़ने के रूप में दिखाई देने लगा। महंगाई बढ़ने से आम जनता का घरेलू बजट भी गड़बड़ाने लगा। अमेरिका के टैरिफ रूपी हमलों के अलावा ट्रेड डील में हो रहे विलम्ब से निर्यातकों के सामने भी  परेशानियाँ खड़ी होने लगीं। विदेशी निवेशकों द्वारा की गई बिकवाली के पीछे अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने के अलावा भारत में बीते कुछ महीनों से केन्द्र सरकार के विरुद्ध चल रहे आंदोलन भी कारण थे । कुछ विदेशी ताकतें ये प्रचारित करने में लगी रहीं कि मोदी सरकार खतरे में है। पहले कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के लिए हुआ आंदोलन और उसके बाद फिर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए समूचे विपक्ष के सड़कों पर उतरने से सरकार रक्षात्मक नजर आने लगी थी। लेकिन 1 नवंबर की रामलीला मैदान रैली में विपक्षी एकता में दरार सामने आने के बाद सरकार का आत्मविश्वास वापस आ गया। उसके अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे के बादल छटने लगे। रामलीला मैदान की रैली में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाषण तो जोरदार दिया परंतु उ.प्र विधानसभा के आगामी चुनाव में कांग्रेस के साथ  सीटों के तालमेल को लेकर एक शब्द नहीं कहा । इसके अलावा द्रमुक ने भी उस आयोजन से दूरी बना ली। इंडिया गठबंधन द्वारा रैली में10 लाख लोगों के आने का जो अनुमान लगाया था वह भी गलत साबित हो गया। उक्त आयोजन में केन्द्र सरकार के विरुद्ध विपक्ष द्वारा  संयुक्त मोर्चा बनाने की कोई कोशिश भी नहीं दिखी। इसीलिए 1 नवंबर के बाद सत्ता पक्ष भी आक्रामक हो उठा। इसी बीच जम्मू कश्मीर में सत्तारूढ़ नेशनल काँफ्रेंस में बगावत की खबरें आने लगीं ।  वहीं पंजाब विधानसभा चुनाव को लेकर राहुल गाँधी और अरविंद केजरीवाल के बीच बयानबाजी का मुकाबला तेज हो गया। इन सबकी वजह से केन्द्र सरकार के विरुद्ध हो रही मोर्चेबन्दी कमजोर पड़ने लगी। लेकिन तस्वीर तब पूरी तरह बदली जब अमेरिका में हुए मध्यावधि चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी की जबरदस्त पराजय हुई जिसकी वजह से कांग्रेस ( संसद ) के दोनों सदनों में विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिल गया। इसका तात्कालिक असर भारतीय शेयर बाजार में आई उछाल के रूप में देखने मिला। इसकी मुख्य वजह ट्रम्प द्वारा भारत के विरुद्ध   उठाये गए सख्त कदम थे। जैसे ही चुनाव नतीजे आने शुरू हुए और ट्रम्प की पार्टी के सफाये की खबरें आईं त्योंही अमेरिकी और एशियाई  शेयर बाजारों में भारी बिकवाली के कारण उथलपुथल मच गई। उसके चलते  दुनिया भर के बाजारों का जहां कचूमर निकल गया वहीं भारतीय शेयर बाजार में दिवाली के पहले ही धन वर्षा शुरू हो गई। बीते दो दिनों की बढ़त से पूंजी बाजार में रौनक लौट आई। निवेशकों को लगातार हुए घाटे की भरपाई भी होने लगी। पूरी दुनिया के शेयर बाजारों में  जहाँ हाहाकार मचा है वहीं भारत के पूंजी बाजार में जश्न का माहौल है। सबसे बड़ी बात विदेशी निवेशकों की जोरदार वापसी है ।  डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में सुधार के अलावा ट्रम्प के कमजोर होने से ट्रेड डील में अमेरिकी दबाव की आशंका घटने का असर भी अर्थव्यवस्था के लिए शुभ संदेश लेकर आया है। अक्टूबर में जीएसटी वसूली का आंकड़ा भी आर्थिक मजबूती का प्रमाण है। ट्रम्प की हार से भारत को अस्थिर करने वाली ताकतों का मनोबल भी टूटा है। कुल मिलाकर निराशा के बादल छट रहे है। धनतेरस पर बना यह माहौल हर दृष्टि से शुभ संकेत है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी





      



       


















Thursday, 5 November 2026

पराजय के बाद भी ट्रम्प का पागलपन जारी रह सकता है



हालांकि अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प की पराजय के संकेत स्पष्ट तौर पर मिल रहे थे लेकिन उसके बाद भी वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बनी रही। ये माना जा रहा था कि अमेरिकी जनता की नाराजगी दूर करने के लिए शायद वे ईरान युद्ध को रोककर शांति स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाकर अपनी छवि में सुधार करने का दाँव चलेंगे। लेकिन मतदान के ठीक पहले ट्रम्प ने ईरान पर जबरदस्त हवाई हमलों की कारवाई कर डाली। उनका वह निर्णय वाकई चौंकाने वाला था क्योंकि तमाम सर्वेक्षण ये बता रहे थे कि ईरान के साथ चल रही जंग से अमेरिकी जनता बेहद नाराज है क्योंकि उसके कारण उनके देश को हासिल तो कुछ हुआ नहीं उल्टे महंगाई की मार पड़ गई। सबसे बड़ा नुकसान अमेरिका के दबदबे में कमी होने के रूप में सामने आया। ट्रम्प को लगता था कि ईरान कुछ दिनों में घुटने टेक देगा लेकिन उसने जो पलटवार किया उसकी वजह से पूरा प. एशिया युद्ध की लपटों में घिर गया। अमेरिका की सैन्य शक्ति की पोल खुलना उसका सबसे बड़ा नुकसान है।  गैर जिम्मेदाराना धमकियों की वजह से भी उनकी जगहंसाई हुई। कल चुनाव परिणाम आने के बाद ट्रम्प के साथ ही उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने स्वीकार किया कि उनकी पार्टी की जबरदस्त पराजय का कारण ईरान के साथ युध्द ही है। इससे ऐसा लगा कि इस हार के बाद ट्रम्प  लड़ाई रोकने का फैसला करेंगे। इसी उम्मीद में अमेरिका सहित पूरी दुनिया के शेयर बाजार गुलजार हो उठे। भारत में भी निवेशकों की बल्ले - बल्ले हो गई। कच्चे तेल के दाम भी तेजी से नीचे आये। लेकिन इसके बाद उन्होंने एक बार फिर वही सब कहना शुरू कर दिया जिसकी वजह से उनकी फजीहत हुई। इसलिए ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि प. एशिया में शांति स्थापित होगी और कच्चे तेल की आपूर्ति में आये व्यवधान के कारण वैश्विक स्तर पर जो उथलपुथल मची वह भी रुक जाएगी। इसका कारण ट्रम्प का यह बयान है कि अगर उन्हें दोबारा मौका मिले, तो भी वह ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का ही फैसला लेंगे ताकि तेहरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोका जा सके। उन्होंने ये डींग भी हाँकी कि जंग को कब रोकना है, यह पूरी तरह उनके विवेक पर निर्भर करेगा। यद्यपि  रक्षा विशेषज्ञों का सोचना है कि घरेलू  राजनीतिक परिस्थितियों में आये बदलाव के बाद अब उन पर ईरान के साथ कूटनीतिक समझौता  कर लड़ाई रोकने का दबाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है। भले ही ट्रम्प ये दावा कर रहे हैं कि वे राष्ट्रपति को प्राप्त वीटो के अधिकार का उपयोग कर कांग्रेस ( संसद )के निर्णयों को लागू होने से रोकेंगे किंतु दोनों सदनों कब्जा कर चुके डेमोक्रेट्स  ट्रम्प प्रशासन की युद्ध नीतियों पर नियंत्रण करने की तैयारी कर रहे हैं। इसके अंतर्गत युद्ध के खर्चों और सैन्य बजट की कड़ी समीक्षा के अलावा राष्ट्रपति को प्राप्त बिना कांग्रेस की मंजूरी के युद्ध जारी रखने की सैन्य शक्तियों को सीमित करने के लिए कानून लाने के संकेत भी मिल रहे हैं। कूटनीतिक चैनलों से आ रही खबरों के अनुसार मध्यावधि चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की ऐतिहासिक शिकस्त से  ट्रम्प बैकफुट पर आ गए हैं। और कतर व ओमान जैसे बिचौलियों के जरिए पर्दे के पीछे  शांति वार्ता फिर से तेज हो गई है। लेकिन जब तक ईरान के साथ  होर्मुज जलडमरूमध्य  में जारी सैन्य गतिरोध खत्म नहीं होता और दोनों देश किसी ठोस समझौते तक नहीं पहुँचते  तब तक युद्ध के पूरी तरह रुकने की उम्मीद व्यर्थ है। इतना जरूर है कि कांग्रेस में बहुमत खो देने के बाद ट्रम्प अपने देश में तो कमजोर हुए ही हैं साथ ही विदेश नीति के मोर्चे पर भी उनकी हैसियत में कमी आई है। देखना ये है कि वे इस बदलाव के मुताबिक खुद में सुधार लाते हैं या कुत्ते की पूँछ की तरह टेढ़े ही बने रहते हैं। वैसे मूलतः ट्रम्प एक व्यवसायी हैं। युद्ध के बीच भी  कूटनीतिक बैठकों में अपने बेटे और दामाद को भेजकर वे आर्थिक लाभ की कोशिश करते रहे जो किसी भी दृष्टि से शोभनीय नहीं था । लेकिन उनके लिए गरिमा जैसे शब्द बेमानी हैं। इसलिए अमेरिकी जनता द्वारा दिये गए इस जोरदार झटके के बावजूद यदि वे पहले जैसे पागलपन का प्रदर्शन करते रहें तो आश्चर्य नहीं होगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 4 November 2026

मूर्खतापूर्ण फैसले ले डूबे ट्रम्प को : भारत का विरोध महंगा पड़ा



अमेरिका में हुए मध्यावधि चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की जबरदस्त झटका लगा है। विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने उच्च सदन सीनेट में स्पष्ट बहुमत के साथ ही संसद के निम्न सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भी  बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है। ज्यादातर राज्यों के गवर्नर भी डेमोक्रेटिक पार्टी के चुने गए हैं। यद्यपि अमेरिका का इतिहास बताता है कि पिछले  21 मध्यावधि चुनावों में 19 में राष्ट्रपति की पार्टी हारी।  दूसरी बार राष्ट्रपति  बनते समय ट्रम्प लोकप्रियता के शिखर पर थे। उन्हें युवाओं सहित सभी वर्गों का समर्थन प्राप्त हुआ था। अमेरिका को फिर से महान बनाने का जो नारा उन्होंने उछाला उसका जबरदस्त प्रभाव हुआ।  अमेरिकी युवाओं को रोजगार के ज्यादा अवसर प्रदान करने के लिए अवैध प्रवासियों को बाहर करने  का वायदा भी कारगर रहा ।अर्थव्यवस्था में आ रही गिरावट को रोकने संबंधी  चुनावी वायदे के बल पर ट्रम्प ने  दोबारा व्हाइट हाऊस पर कब्जा किया। उनकी जीत में भारतवंशी प्रवासियों का महत्वपूर्ण योगदान था। उन्होंने जिन जे.डी वेंस को उपराष्ट्रपति हेतु चुना उनकी पत्नी भी भारतीय मूल की हिंदू हैं। चुनाव जीतने के बाद उन्होंने अपने सचिवालय में जब बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोगों को नियुक्त किया तब ये अवधारणा और मजबूत हुई कि वे भारत के प्रति उस दोस्ताने को जारी रखेंगे जो  पहले कार्यकाल में देखने मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनके निजी रिश्तों को देखते हुए भारत को उनसे काफी उम्मीदें थीं किन्तु पदभार ग्रहण करते ही उन्होंने उन पर पानी फेर दिया। सबसे पहले तो भारत  से होने वाले आयात पर  मनमर्जी का टैरिफ थोपने की  हरकत की। उसके बाद ऑपरेशन सिंदूर के समय युद्धविराम का झूठा श्रेय लूटने की जबरिया कोशिश की। लेकिन हद तब हो गई जब उन्होंने पाकिस्तान की पीठ पर हाथ रखते हुए भारत के हितों के विरुद्ध तमाम फैसले लिए। वहाँ के सेनाध्यक्ष आसिफ मुनीर को व्हाइट हाउस बुलाकर भोज देने के पीछे उनका मकसद भारत को चिढ़ाना ही था। भारतीय प्रवासियों को हथकड़ी लाकार वापस भेजने जैसे उनके फैसले निश्चित तौर पर दोस्ती के सर्वथा विपरीत थे। रूसी तेल न खरीदने का दबाव बनाकर वे भारत को घुटनाटेक करवाने के लिए टैरिफ की दरें बढ़ाते चले गए। उनका सोचना था कि प्रधानमंत्री मोदी उनसे मिलने वॅाशिंगटन आयें किंतु ऐसा नहीं होने पर वे और खुर्रा गए। हालांकि केवल भारत के प्रति उनका व्यवहार दुर्भावनापूर्ण नहीं रहा। यूरोपीय देशों से अमेरिका के मैत्रीपूर्ण रिश्तों को भी ट्रम्प ने बिगाड़ दिया। ग्रीनलैंड पर कब्जे की उनकी धमकी से तो अमेरिका और यूरोप के बीच युद्ध का खतरा तक पैदा हो गया। कैनेडा पर कब्जे की मंशा जताने से भी वे बाज नहीं आए। और वेनेजुएला के राष्ट्रपति को सपत्नीक उठवाकर अमेरिका के जेल में डालकर तो उन्होंने सारे कूटनीतिक नियम तोड़ दिये। नोबल पुरस्कार के लिए भीख मांगने जैसे  अंदाज से जहाँ उनकी खिल्ली उड़ी वहीं न मिलने पर ऊटपटांग बयान देकर वे अपनी भद्द पिटवाते रहे। लेकिन ईरान के साथ जारी युद्ध में  उनकी मूर्खता का चर्मोत्कर्ष सामने आया । पूरी ताकत लगाने के बाद भी वे ईरान को झुकाने में कामयाब नहीं हो सके । उल्टे प. एशिया में अमेरिका के मित्र राष्ट्रों की ईरान ने जमकर ठुकाई कर दी। इसकी वजह से समूचा विश्व तो ऊर्जा संकट का सामना कर ही रहा है खुद अमेरिका भी उसकी चपेट में आ गया। ट्रम्प के सनकीपन की वजह से अमेरिका की आर्थिक स्थिति बजाय सुधरने के और बिगड़ चुकी है। कुल मिलाकर अपने दूसरे कार्यकाल में डोनाल्ड ट्रम्प आर्थिक, सैनिक और कूटनीतिक सभी मोर्चों पर बुरी तरह असफल साबित हुए। इसी वजह से जनता में उनके प्रति नाराजगी बढ़ती चली गई जिसका प्रमाण ये परिणाम हैं। ऐसे में  कहना गलत नहीं होगा कि जिस प्रकार उनकी जीत में भारतीय समुदाय का समर्थन बड़ा कारण रहा उसी तरह उनकी इस हार में भी वहाँ बसे भारतीय मूल के मतदाताओं का हाथ है। संसद के दोनों सदनों में बहुमत गँवा देने के बाद ट्रम्प की अकड़ में कमी आयेगी या खिसियाहट में वे  और ज्यादा मूर्खताएं करेंगे ये तो आने वाला समय बताएगा किंतु अमेरिकी मतदाताओं ने उनकी नाक में जो नकेल डाल दी उसके बाद वे पहले जैसी दादागिरी कर सकेंगे इसमें संदेह है। भारत की दृष्टि से ये परिणाम शुभ संकेत हैं । अमेरिका के साथ ट्रेड डील, टैरिफ और वीजा जैसे लंबित मुद्दे जल्द सुलझ सकते हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि ट्रम्प को भारत की अहमियत समझ में आ गई।   


- रवीन्द्र वाजपेयी 




 

Tuesday, 3 November 2026

अब्दुल्ला परिवार की चौधराहट के खात्मे की शुरुआत



जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अपनी दूसरी शादी का जश्न पूरी तरह मना पाते उसके पहले ही उनकी सरकार पर खतरे के बादल मंडराने लगे। लगभग 25 विधायक और कुछ सांसदों सहित पार्टी के अनेक नेता बगावत पर उतारू  हैं। मंत्रीमंडल में ताजा फेरबदल के बाद सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस  के भीतर गंभीर राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है। बगावत पर उतारू विधायकों ने पार्टी नेतृत्व को दो सप्ताह का समय  देते हुए मांग रखी है कि पूरे मंत्रिमंडल का फिर पुनर्गठन किये जाने के अलावा मुख्यमंत्री  के नजदीक माने जाने वाले सलाहकार नासिर असलम वानी के अलावा  बाकी सलाहकारों को पदमुक्त किया जाए। सरकार द्वारा लिए जाने वाले महत्वपूर्ण  फैसलों में विधायकों के साथ समुचित विचार - विमर्श किये जाने का भी दबाव बनाया जा रहा है। विद्रोह पर आमादा विधायकों का आरोप है कि सत्ता में आने के बाद उमर अब्दुल्ला धारा 370 और जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे से जुड़े चुनावी वादों पर केंद्र सरकार के सामने राज्य का पक्ष मजबूती से नहीं रख सके। राजधानी श्रीनगर से पार्टी  सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेंहदी ने भी मुख्यमंत्री उमर और उनके पिता डॉ. फारूक अब्दुल्ला पर धारा 370 को बहाल करवाने के वायदे से मुकरने का आरोप लगाते हुए नेशनल कॉन्फ्रेंस छोड़ने के अलावा  लोकसभा सदस्यता से इस्तीफे का ऐलान करते हुए  सनसनी मचा दी। हालांकि पार्टी के अंतरिम अध्यक्ष शौकत मीर सहित कुछ और नेताओं का दावा है कि असन्तुष्टों से बातचीत के जरिये मामला सुलझा लिया जाएगा और पार्टी एकजुट बनी रहेगी। वैसे तो ऊपरी तौर पर  इस  नाराजगी की वजह मंत्रीमंडल में स्थान नहीं मिलना माना जा रहा है। लेकिन असली कारण मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की लचर कार्यशैली के अलावा उनका सामंतवादी  व्यवहार भी है। सत्ता में वापसी के समय तो वे बड़ी ऊँची - ऊंची बातें किया करते थे। जिनमें धारा 370 और राज्य को विशेष दर्जे की बहाली के अलावा केंद्र शासित राज्य की स्थिति समाप्त कर पूर्ण राज्य का दर्जा दोबारा हासिल करना था। समय - समय पर उमर और उनके पिता पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला केंद्र से टकराव का इरादा व्यक्त करते रहते हैं , लेकिन उसकी हिम्मत नहीं बटोर सके। इसका कारण केंद्र का सख्त रवैया है।  अब्दुल्ला परिवार का ये दोगलापन नई बात नहीं है। फारुख के पिता शेख अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर में अलगाववाद के बीज बोये थे। दुर्भाग्य से पं. जवाहर लाल नेहरू उन पर आँख मूँदकर भरोसा करते रहे । उनके शेख अब्दुल्ला प्रेम ने इस सीमावर्ती राज्य को ऐसा नासूर बना दिया जो आजादी के आठ दशक बाद भी समस्या बना हुआ है। अब्दुल्ला परिवार के सामंतवादी  व्यवहार की वजह से ही नेशनल काँफ्रेंस से कई नेता निकले जिनमें मुफ्ती मो. सईद प्रमुख थे जिन्होंने पीडीपी नामक पार्टी बनाई।। लेकिन वह भी नेशनल काँफ्रेंस के नक्शे कदम पर चलते हुए परिवारवाद के शिकन्जे में फंस गई।  मुफ्ती की बेटी मेहबूबा मुफ्ती भी मुख्यमंत्री बनीं । इन दोनों परिवारों ने बारी - बारी से मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी के लोगों को भारत के विरुद्ध भड़काकर अपना राजनीतिक प्रभुत्व बनाये रखा । वहीं जम्मू क्षेत्र की जमकर उपेक्षा की क्योंकि वह हिन्दू बहुल है। मोदी सरकार ने धारा 370 हटाने के साथ ही परिसीमन के जरिये इस संतुलन को समाप्त किया जिसके कारण भाजपा मजबूत विपक्ष के तौर पर उभरी। नेशनल काँफ्रेंस के भीतर  बगावत की लहरें और ऊँची उठेंगी या शांत कर दी जाएंगी ये कहना कठिन है लेकिन इसे अब्दुल्ला परिवार की चौधराहट के खात्मे की शुरुआत माना जा सकता है। मुफ्ती खानदान पहले ही ढलान पर है। फारुख जब तक जीवित हैं तब तक भले ही उमर की सियासत कायम रहे किंतु मौजूदा संकट से अब्दुल्ला परिवार का भविष्य भी खतरे में आ गया है। जम्मू कश्मीर में हुए बड़े बदलावों के बाद नये शक्ति केंद्रों के उभरने की संभावना बढ़ रही है किंतु घाटी में होने वाली किसी भी हलचल पर केंद्र को नजर रखनी होगी क्योंकि वहाँ अलगाववाद के बीज सर्वत्र बिखरे पड़े हैं जो समय - समय पर अंकुरित हो जाते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 2 November 2026

रामलीला मैदान की रैली से सपा फायदे में कांग्रेस खाली हाथ



मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाये जाने की मांग को लेकर गत दिवस दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन की महारैली में कितने लोग आये इसे लेकर परस्पर विरोधी दावे हो रहे हैं। विपक्षी खेमा इस बात को लेकर उत्साहित है कि जनमत उसकी तरफ झुक रहा है। दूसरी तरफ भाजपा का प्रचार तंत्र रामलीला मैदान के खाली पड़े रहे  हिस्सों के साथ उन कुर्सियों के चित्र प्रसारित करने में जुटा रहा जिन पर कोई भी बैठा नहीं था। ड्रोन से लिए गए चित्रों  में दर्शाई गई भीड़ के बारे में ये भी कहा जा रहा है कि ए. आई तकनीक का इस्तेमाल कर मैदान को भरा दिखाया गया जबकि हकीकत में रैली में शामिल विपक्षी दल दावों के मुताबिक लोग नहीं ला सके। खैर, भीड़ कितनी आई ये उतना मायने नहीं रखता जितना ये कि विपक्ष विशेष रूप से कांग्रेस ने लंबे समय बाद अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की। अन्य विपक्षी पार्टियों की बात करें तो आम आदमी पार्टी का रैली में शामिल नहीं होना पहले से तय था क्योंकि पंजाब विधानसभा के आगामी चुनाव में उसका कांग्रेस से मुख्य मुकाबला होने वाला है।  गठबंधन के अन्य सदस्यों में द्रमुक भी कांग्रेस के तमिलनाडु में जोसेफ विजय की सरकार का हिस्सा बनने से नाराज  होने से रैली से दूर रही। बीजू जनता दल और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने भी कांग्रेस का न्यौता स्वीकार नहीं किया। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी की गैर मौजूदगी चौंकाने वाली रही। उसके मुखिया अभिजीत दिपके ने इसका कारण ये बताया कि वे अपनी पार्टी का स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखेंगे। इंडिया गठबंधन में शामिल अन्य पार्टियों के नेता तो मंच पर नजर आये किंतु रैली में मौजूद  संवाददाताओं और विश्लेषकों की मानें तो इसके सबसे बड़े लाभार्थी अखिलेश यादव रहे । कहा जा रहा है रामलीला मैदान में आये 60 से 70 फीसदी लोग उ.प्र के थे जिन्हें या तो समाजवादी पार्टी लेकर आई या फिर दिल्ली से सटे प. उतर प्रदेश के वे किसान जो किसान आंदोलन के समय से भाजपा विरोधी हैं।  आयोजन की सूत्रधार कांग्रेस थी इसलिए मुख्य आकर्षण राहुल गाँधी रहे।  आने वाले कुछ महीनों में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं उनमें सर्वाधिक चर्चा उ.प्र की है जहाँ 80 लोकसभा सीटें हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा से ज्यादा सीटें जीत जाने के बाद समाजवादी पार्टी का हौसला बुलंद  है। वहीं भाजपा  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर चुनाव जीतने के प्रति आश्वस्त है । मायावती और ओवैसी भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए हाथ पाँव मार रहे हैं। लेकिन कांग्रेस सबसे दयनीय स्थिति में है। प्रदेश संगठन में बदलाव के बावजूद वह मुकाबले में नजर नहीं आ रही। उम्मीद थी कि रामलीला मैदान में अखिलेश यादव विधानसभा चुनाव में विपक्षी एकता की रूपरेखा स्पष्ट करेंगे । उन्होंने मंच का उपयोग अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए तो किया किंतु  कांग्रेस की मांग अनुसार सीटें छोड़ने का कोई संकेत नहीं दिया। ये बात पूरी तरह सही है कि कल के जलसे का सबसे ज्यादा फ़ायदा समाजवादी पार्टी को  ही हो सकता है क्योंकि उ.प्र का काफी हिस्सा दिल्ली से सटा हुआ जो है। एक और बात जो इस रैली में देखने मिली वह थी विपक्ष द्वारा किसी भावी कार्ययोजना का ऐलान न करना। दीपावली बाद चुनाव वाले राज्यों के नेता उसमें व्यस्त हो जाएंगे। आज की स्थिति में कांग्रेस के लिए केवल पंजाब में उम्मीद की हल्की सी किरण है। उ.प्र में वह पूरी तरह अखिलेश यादव के रहमो - करम पर निर्भर है वहीं उत्तराखंड में भी उसकी संभावनाएं बहुत अच्छी नहीं हैं। आगामी वर्ष के अंत में हिमाचल और गुजरात में होने वाले चुनाव में भी भाजपा की जीत तय है। आम आदमी पार्टी भी यहाँ कांग्रेस की जड़ें खोदने में लगी है। ये सब देखते हुए आपसी खींचतान छोड़कर  भाजपा के विरोध में ठोस  गठबंधन बनाकर विपक्षी मतों में बंटवारे को रोकने जैसा फैसला होता तब इस रैली की  सफलता स्वप्रमाणित हो जाती। लेकिन पूरा जमावड़ा वोट चोरी और ज्ञानेश कुमार जैसे मुद्दे पर सिमट गया जिसके प्रति  जनता में कोई रुचि नहीं है। बेहतर होता संघर्ष की भावी रूपरेखा ही पेश कर दी जाती। लेकिन बजाय कोई ठोस बात करने के श्री गाँधी सहित मंच पर बैठे सभी नेता उन्हीं बातों और आरोपों को दोहराते रहे जो बीते कई महीनों से सुनाई दे रहे हैं। चूंकि रैली में आये ज्यादातर नेता सत्ता गँवा चुके हैं। इसलिए वे अपनी खीझ निकालते रहे लेकिन  सही बात ये है कि उन सबने एक दूसरे को हरवाया है। प. बंगाल और केरल इसके जीवंत प्रतीक हैं। जहाँ तक बात कांग्रेस की है तो जब तक वह उ.प्र और बिहार में दोबारा खड़ी नहीं होती तब तक राष्ट्रीय स्तर पर उसकी वापसी असम्भव है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी