Tuesday, 3 November 2026

अब्दुल्ला परिवार की चौधराहट के खात्मे की शुरुआत



जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अपनी दूसरी शादी का जश्न पूरी तरह मना पाते उसके पहले ही उनकी सरकार पर खतरे के बादल मंडराने लगे। लगभग 25 विधायक और कुछ सांसदों सहित पार्टी के अनेक नेता बगावत पर उतारू  हैं। मंत्रीमंडल में ताजा फेरबदल के बाद सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस  के भीतर गंभीर राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है। बगावत पर उतारू विधायकों ने पार्टी नेतृत्व को दो सप्ताह का समय  देते हुए मांग रखी है कि पूरे मंत्रिमंडल का फिर पुनर्गठन किये जाने के अलावा मुख्यमंत्री  के नजदीक माने जाने वाले सलाहकार नासिर असलम वानी के अलावा  बाकी सलाहकारों को पदमुक्त किया जाए। सरकार द्वारा लिए जाने वाले महत्वपूर्ण  फैसलों में विधायकों के साथ समुचित विचार - विमर्श किये जाने का भी दबाव बनाया जा रहा है। विद्रोह पर आमादा विधायकों का आरोप है कि सत्ता में आने के बाद उमर अब्दुल्ला धारा 370 और जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे से जुड़े चुनावी वादों पर केंद्र सरकार के सामने राज्य का पक्ष मजबूती से नहीं रख सके। राजधानी श्रीनगर से पार्टी  सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेंहदी ने भी मुख्यमंत्री उमर और उनके पिता डॉ. फारूक अब्दुल्ला पर धारा 370 को बहाल करवाने के वायदे से मुकरने का आरोप लगाते हुए नेशनल कॉन्फ्रेंस छोड़ने के अलावा  लोकसभा सदस्यता से इस्तीफे का ऐलान करते हुए  सनसनी मचा दी। हालांकि पार्टी के अंतरिम अध्यक्ष शौकत मीर सहित कुछ और नेताओं का दावा है कि असन्तुष्टों से बातचीत के जरिये मामला सुलझा लिया जाएगा और पार्टी एकजुट बनी रहेगी। वैसे तो ऊपरी तौर पर  इस  नाराजगी की वजह मंत्रीमंडल में स्थान नहीं मिलना माना जा रहा है। लेकिन असली कारण मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की लचर कार्यशैली के अलावा उनका सामंतवादी  व्यवहार भी है। सत्ता में वापसी के समय तो वे बड़ी ऊँची - ऊंची बातें किया करते थे। जिनमें धारा 370 और राज्य को विशेष दर्जे की बहाली के अलावा केंद्र शासित राज्य की स्थिति समाप्त कर पूर्ण राज्य का दर्जा दोबारा हासिल करना था। समय - समय पर उमर और उनके पिता पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला केंद्र से टकराव का इरादा व्यक्त करते रहते हैं , लेकिन उसकी हिम्मत नहीं बटोर सके। इसका कारण केंद्र का सख्त रवैया है।  अब्दुल्ला परिवार का ये दोगलापन नई बात नहीं है। फारुख के पिता शेख अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर में अलगाववाद के बीज बोये थे। दुर्भाग्य से पं. जवाहर लाल नेहरू उन पर आँख मूँदकर भरोसा करते रहे । उनके शेख अब्दुल्ला प्रेम ने इस सीमावर्ती राज्य को ऐसा नासूर बना दिया जो आजादी के आठ दशक बाद भी समस्या बना हुआ है। अब्दुल्ला परिवार के सामंतवादी  व्यवहार की वजह से ही नेशनल काँफ्रेंस से कई नेता निकले जिनमें मुफ्ती मो. सईद प्रमुख थे जिन्होंने पीडीपी नामक पार्टी बनाई।। लेकिन वह भी नेशनल काँफ्रेंस के नक्शे कदम पर चलते हुए परिवारवाद के शिकन्जे में फंस गई।  मुफ्ती की बेटी मेहबूबा मुफ्ती भी मुख्यमंत्री बनीं । इन दोनों परिवारों ने बारी - बारी से मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी के लोगों को भारत के विरुद्ध भड़काकर अपना राजनीतिक प्रभुत्व बनाये रखा । वहीं जम्मू क्षेत्र की जमकर उपेक्षा की क्योंकि वह हिन्दू बहुल है। मोदी सरकार ने धारा 370 हटाने के साथ ही परिसीमन के जरिये इस संतुलन को समाप्त किया जिसके कारण भाजपा मजबूत विपक्ष के तौर पर उभरी। नेशनल काँफ्रेंस के भीतर  बगावत की लहरें और ऊँची उठेंगी या शांत कर दी जाएंगी ये कहना कठिन है लेकिन इसे अब्दुल्ला परिवार की चौधराहट के खात्मे की शुरुआत माना जा सकता है। मुफ्ती खानदान पहले ही ढलान पर है। फारुख जब तक जीवित हैं तब तक भले ही उमर की सियासत कायम रहे किंतु मौजूदा संकट से अब्दुल्ला परिवार का भविष्य भी खतरे में आ गया है। जम्मू कश्मीर में हुए बड़े बदलावों के बाद नये शक्ति केंद्रों के उभरने की संभावना बढ़ रही है किंतु घाटी में होने वाली किसी भी हलचल पर केंद्र को नजर रखनी होगी क्योंकि वहाँ अलगाववाद के बीज सर्वत्र बिखरे पड़े हैं जो समय - समय पर अंकुरित हो जाते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 2 November 2026

रामलीला मैदान की रैली से सपा फायदे में कांग्रेस खाली हाथ



मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाये जाने की मांग को लेकर गत दिवस दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन की महारैली में कितने लोग आये इसे लेकर परस्पर विरोधी दावे हो रहे हैं। विपक्षी खेमा इस बात को लेकर उत्साहित है कि जनमत उसकी तरफ झुक रहा है। दूसरी तरफ भाजपा का प्रचार तंत्र रामलीला मैदान के खाली पड़े रहे  हिस्सों के साथ उन कुर्सियों के चित्र प्रसारित करने में जुटा रहा जिन पर कोई भी बैठा नहीं था। ड्रोन से लिए गए चित्रों  में दर्शाई गई भीड़ के बारे में ये भी कहा जा रहा है कि ए. आई तकनीक का इस्तेमाल कर मैदान को भरा दिखाया गया जबकि हकीकत में रैली में शामिल विपक्षी दल दावों के मुताबिक लोग नहीं ला सके। खैर, भीड़ कितनी आई ये उतना मायने नहीं रखता जितना ये कि विपक्ष विशेष रूप से कांग्रेस ने लंबे समय बाद अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की। अन्य विपक्षी पार्टियों की बात करें तो आम आदमी पार्टी का रैली में शामिल नहीं होना पहले से तय था क्योंकि पंजाब विधानसभा के आगामी चुनाव में उसका कांग्रेस से मुख्य मुकाबला होने वाला है।  गठबंधन के अन्य सदस्यों में द्रमुक भी कांग्रेस के तमिलनाडु में जोसेफ विजय की सरकार का हिस्सा बनने से नाराज  होने से रैली से दूर रही। बीजू जनता दल और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने भी कांग्रेस का न्यौता स्वीकार नहीं किया। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी की गैर मौजूदगी चौंकाने वाली रही। उसके मुखिया अभिजीत दिपके ने इसका कारण ये बताया कि वे अपनी पार्टी का स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखेंगे। इंडिया गठबंधन में शामिल अन्य पार्टियों के नेता तो मंच पर नजर आये किंतु रैली में मौजूद  संवाददाताओं और विश्लेषकों की मानें तो इसके सबसे बड़े लाभार्थी अखिलेश यादव रहे । कहा जा रहा है रामलीला मैदान में आये 60 से 70 फीसदी लोग उ.प्र के थे जिन्हें या तो समाजवादी पार्टी लेकर आई या फिर दिल्ली से सटे प. उतर प्रदेश के वे किसान जो किसान आंदोलन के समय से भाजपा विरोधी हैं।  आयोजन की सूत्रधार कांग्रेस थी इसलिए मुख्य आकर्षण राहुल गाँधी रहे।  आने वाले कुछ महीनों में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं उनमें सर्वाधिक चर्चा उ.प्र की है जहाँ 80 लोकसभा सीटें हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा से ज्यादा सीटें जीत जाने के बाद समाजवादी पार्टी का हौसला बुलंद  है। वहीं भाजपा  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर चुनाव जीतने के प्रति आश्वस्त है । मायावती और ओवैसी भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए हाथ पाँव मार रहे हैं। लेकिन कांग्रेस सबसे दयनीय स्थिति में है। प्रदेश संगठन में बदलाव के बावजूद वह मुकाबले में नजर नहीं आ रही। उम्मीद थी कि रामलीला मैदान में अखिलेश यादव विधानसभा चुनाव में विपक्षी एकता की रूपरेखा स्पष्ट करेंगे । उन्होंने मंच का उपयोग अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए तो किया किंतु  कांग्रेस की मांग अनुसार सीटें छोड़ने का कोई संकेत नहीं दिया। ये बात पूरी तरह सही है कि कल के जलसे का सबसे ज्यादा फ़ायदा समाजवादी पार्टी को  ही हो सकता है क्योंकि उ.प्र का काफी हिस्सा दिल्ली से सटा हुआ जो है। एक और बात जो इस रैली में देखने मिली वह थी विपक्ष द्वारा किसी भावी कार्ययोजना का ऐलान न करना। दीपावली बाद चुनाव वाले राज्यों के नेता उसमें व्यस्त हो जाएंगे। आज की स्थिति में कांग्रेस के लिए केवल पंजाब में उम्मीद की हल्की सी किरण है। उ.प्र में वह पूरी तरह अखिलेश यादव के रहमो - करम पर निर्भर है वहीं उत्तराखंड में भी उसकी संभावनाएं बहुत अच्छी नहीं हैं। आगामी वर्ष के अंत में हिमाचल और गुजरात में होने वाले चुनाव में भी भाजपा की जीत तय है। आम आदमी पार्टी भी यहाँ कांग्रेस की जड़ें खोदने में लगी है। ये सब देखते हुए आपसी खींचतान छोड़कर  भाजपा के विरोध में ठोस  गठबंधन बनाकर विपक्षी मतों में बंटवारे को रोकने जैसा फैसला होता तब इस रैली की  सफलता स्वप्रमाणित हो जाती। लेकिन पूरा जमावड़ा वोट चोरी और ज्ञानेश कुमार जैसे मुद्दे पर सिमट गया जिसके प्रति  जनता में कोई रुचि नहीं है। बेहतर होता संघर्ष की भावी रूपरेखा ही पेश कर दी जाती। लेकिन बजाय कोई ठोस बात करने के श्री गाँधी सहित मंच पर बैठे सभी नेता उन्हीं बातों और आरोपों को दोहराते रहे जो बीते कई महीनों से सुनाई दे रहे हैं। चूंकि रैली में आये ज्यादातर नेता सत्ता गँवा चुके हैं। इसलिए वे अपनी खीझ निकालते रहे लेकिन  सही बात ये है कि उन सबने एक दूसरे को हरवाया है। प. बंगाल और केरल इसके जीवंत प्रतीक हैं। जहाँ तक बात कांग्रेस की है तो जब तक वह उ.प्र और बिहार में दोबारा खड़ी नहीं होती तब तक राष्ट्रीय स्तर पर उसकी वापसी असम्भव है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 31 October 2026

इसराइल के चुनाव भारत के बहुसंख्यक समाज के लिए सबक



इसराइल में किसी को बहुमत नहीं मिलने में अनोखा कुछ भी नहीं है क्योंकि पहले भी ऐसा कई बार हो चुका है। इस बार भी प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके प्रतिद्वंद्वी  पूर्व सेनाध्यक्ष गादी आइसेनकोट दोनों बहुमत से पीछे रह गए हैं। उन्हें क्रमशः 53 और 48 सीटें मिलीं। लेकिन पेच ये फंस गया कि कुल 120 में से 19 सीटें अरब पार्टी ले गई जिसे इसराइल में रहने वाले मुस्लिम मतदाताओं का एकमुश्त समर्थन मिला। चूंकि यहूदियों और मुसलमानों में जन्मजात बैर है , लिहाजा नेतन्याहू और गादी दोनों अरब पार्टी से दूरी बनाये रखने का दावा तो कर रहे हैं लेकिन तब तक नई सरकार नहीं बन पायेगी जब तक इन दोनों में कोई टूटन न हो।  अब सबकी नजर राष्ट्रपति इजाक हर्ज़ोग पर टिकी हैं। यदि सरकार बनाने लायक बहुमत कोई नहीं जुटा सका तब नये चुनाव की नौबत आ सकती है। लेकिन ये चुनाव इसलिए चौंकाने वाले बन गए क्योंकि पहली बार मुस्लिम मतदाता धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत होकर तीसरी शक्ति बनकर  उभरे। त्रिशंकु संसद होने की वजह से सत्ता की चाबी उनके हाथ में आने से इसराइल की अंदरूनी राजनीति का संतुलन गड़बड़ा गया। यहूदी समुदाय बहुमत में होने के बावजूद जहाँ दो नेताओं के बीच विभाजित हो गया वहीं अल्पसंख्यक मुसलमान रणनीतिक मतदान करते हुए गोलबंद हो  गए जिसके कारण अरब पार्टी ने 19 सीटों पर काबिज होकर नेतन्याहू और गादी दोनों का खेल बिगाड़ दिया। पूरे नतीजे  आने के पहले ही रुझानों के आधार पर नेतन्याहू ने चुनाव में विदेशी हस्तक्षेप का आरोप लगाकर सनसनी फैला दी। उनके आरोप के बाद शक की सुई ईरान की ओर घूम गई क्योंकि वह किसी भी कीमत पर नेतन्याहू की वापसी नहीं चाहता था। इधर इसराइल में भी यहूदियों का एक तबका नेतन्याहू से इसलिए नाराज है कि हमास द्वारा किये गए हमले ने इसराइल की अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी ।  हालांकि किरकिरी से बचने उन्होंने गाज़ा पर ताबड़तोड़ हमले करते हुए उसे मलबे के ढेर में बदलते हुए हमास की कमर तोड़ दी। लेकिन उसी कारण ईरान के साथ भी लड़ाई का बीजारोपण हुआ जिसने बाद में बड़ा रूप ले लिया। इसके चलते इसराइल को कुछ हासिल तो हुआ नहीं उल्टे युद्ध पर हुए अनाप शनाप खर्च ने अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया। ईरानी मिसाइलें जिस बड़ी संख्या में इसराइल में गिरीं उससे आम नागरिक भी असुरक्षित अनुभव करने लगे। इसके अलावा नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के आरोप भी जमकर लगे। बावजूद उसके वे सबसे ज्यादा सीटें जिताकर लाये और उस नाते सत्ता के प्रमुख दावेदार तो हैं किंतु मुसलमानों की अरब पार्टी से मदद लेना उनके और गादी दोनों के लिए आत्मघाती होगा। इस चुनाव परिणाम ने केवल  इसराइल की आंतरिक राजनीति को ही नहीं हिलाया अपितु उन समस्त देशों को चिंता में डाल दिया जहाँ मुस्लिम अल्पसंख्यकों  की आबादी बीते कुछ वर्षों में बढ़ी और वे मतदाता बनकर चुनाव को प्रभावित करने के साथ - साथ सामाजिक जीवन और कानून व्यवस्था के लिए भी मुसीबत बनते जा रहे हैं। यूरोप के अनेक देश मुस्लिम आबादी को बसाकर खून के आँसू रो रहे हैं जो शरणार्थी बनकर आने के बाद अब शरिया लागू करने का दबाव बनाने लगे हैं। अमेरिका की व्यवसायिक राजधानी न्यूयॉर्क में मुस्लिम महापौर निर्वाचित होते ही उपद्रव शुरू होने लगे। ब्रिटेन में तो लगभग सभी बड़े शहरों का स्थानीय निकाय मुस्लिमों के कब्जे में है। विचारणीय बात ये है कि जब इजराइल जैसे सख्त देश में रहने मुसलमान राजनीतिक तौर पर गोलबंद होकर राजनीतिक समीकरणों को उलझा सकते हैं तब भारत जैसी उदार और खुली प्रजातांत्रिक व्यवस्था में यदि देश की जनसंख्या के कुल 15 से 20 ( अनुमानित) फीसदी मुसलमान एकजुट हो जाएं तो लोकसभा में इतनी संख्या में उनके सांसद चुने जा सकते हैं जो त्रिशंकु की स्थिति में रिंग मास्टर बन जाएं। चुनाव बाद इसराइल में यहूदियों के बीच फूट पर सामाजिक विमर्श शुरू हो गया है।  भारत के बहुसंख्यक समाज को भी इसराइल में उत्पन्न राजनीतिक गतिरोध से सबक लेना चाहिए। वरना बड़ी बात नहीं निकट भविष्य में हमारे देश में भी इसराइल जैसी परिस्थिति पैदा हो जाए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

इसराइल के चुनाव भारत के बहुसंख्यक समाज के लिए सबक



इसराइल में किसी को बहुमत नहीं मिलने में अनोखा कुछ भी नहीं है क्योंकि पहले भी ऐसा कई बार हो चुका है। इस बार भी प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके प्रतिद्वंद्वी  पूर्व सेनाध्यक्ष गादी आइसेनकोट दोनों बहुमत से पीछे रह गए हैं। उन्हें क्रमशः 53 और 48 सीटें मिलीं। लेकिन पेच ये फंस गया कि कुल 120 में से 19 सीटें अरब पार्टी ले गई जिसे इसराइल में रहने वाले मुस्लिम मतदाताओं का एकमुश्त समर्थन मिला। चूंकि यहूदियों और मुसलमानों में जन्मजात बैर है , लिहाजा नेतन्याहू और गादी दोनों अरब पार्टी से दूरी बनाये रखने का दावा तो कर रहे हैं लेकिन तब तक नई सरकार नहीं बन पायेगी जब तक इन दोनों में कोई टूटन न हो।  अब सबकी नजर राष्ट्रपति इजाक हर्ज़ोग पर टिकी हैं। यदि सरकार बनाने लायक बहुमत कोई नहीं जुटा सका तब नये चुनाव की नौबत आ सकती है। लेकिन ये चुनाव इसलिए चौंकाने वाले बन गए क्योंकि पहली बार मुस्लिम मतदाता धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत होकर तीसरी शक्ति बनकर  उभरे। त्रिशंकु संसद होने की वजह से सत्ता की चाबी उनके हाथ में आने से इसराइल की अंदरूनी राजनीति का संतुलन गड़बड़ा गया। यहूदी समुदाय बहुमत में होने के बावजूद जहाँ दो नेताओं के बीच विभाजित हो गया वहीं अल्पसंख्यक मुसलमान रणनीतिक मतदान करते हुए गोलबंद हो  गए जिसके कारण अरब पार्टी ने 19 सीटों पर काबिज होकर नेतन्याहू और गादी दोनों का खेल बिगाड़ दिया। पूरे नतीजे  आने के पहले ही रुझानों के आधार पर नेतन्याहू ने चुनाव में विदेशी हस्तक्षेप का आरोप लगाकर सनसनी फैला दी। उनके आरोप के बाद शक की सुई ईरान की ओर घूम गई क्योंकि वह किसी भी कीमत पर नेतन्याहू की वापसी नहीं चाहता था। इधर इसराइल में भी यहूदियों का एक तबका नेतन्याहू से इसलिए नाराज है कि हमास द्वारा किये गए हमले ने इसराइल की अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी ।  हालांकि किरकिरी से बचने उन्होंने गाज़ा पर ताबड़तोड़ हमले करते हुए उसे मलबे के ढेर में बदलते हुए हमास की कमर तोड़ दी। लेकिन उसी कारण ईरान के साथ भी लड़ाई का बीजारोपण हुआ जिसने बाद में बड़ा रूप ले लिया। इसके चलते इसराइल को कुछ हासिल तो हुआ नहीं उल्टे युद्ध पर हुए अनाप शनाप खर्च ने अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया। ईरानी मिसाइलें जिस बड़ी संख्या में इसराइल में गिरीं उससे आम नागरिक भी असुरक्षित अनुभव करने लगे। इसके अलावा नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के आरोप भी जमकर लगे। बावजूद उसके वे सबसे ज्यादा सीटें जिताकर लाये और उस नाते सत्ता के प्रमुख दावेदार तो हैं किंतु मुसलमानों की अरब पार्टी से मदद लेना उनके और गादी दोनों के लिए आत्मघाती होगा। इस चुनाव परिणाम ने केवल  इसराइल की आंतरिक राजनीति को ही नहीं हिलाया अपितु उन समस्त देशों को चिंता में डाल दिया जहाँ मुस्लिम अल्पसंख्यकों  की आबादी बीते कुछ वर्षों में बढ़ी और वे मतदाता बनकर चुनाव को प्रभावित करने के साथ - साथ सामाजिक जीवन और कानून व्यवस्था के लिए भी मुसीबत बनते जा रहे हैं। यूरोप के अनेक देश मुस्लिम आबादी को बसाकर खून के आँसू रो रहे हैं जो शरणार्थी बनकर आने के बाद अब शरिया लागू करने का दबाव बनाने लगे हैं। अमेरिका की व्यवसायिक राजधानी न्यूयॉर्क में मुस्लिम महापौर निर्वाचित होते ही उपद्रव शुरू होने लगे। ब्रिटेन में तो लगभग सभी बड़े शहरों का स्थानीय निकाय मुस्लिमों के कब्जे में है। विचारणीय बात ये है कि जब इजराइल जैसे सख्त देश में रहने मुसलमान राजनीतिक तौर पर गोलबंद होकर राजनीतिक समीकरणों को उलझा सकते हैं तब भारत जैसी उदार और खुली प्रजातांत्रिक व्यवस्था में यदि देश की जनसंख्या के कुल 15 से 20 ( अनुमानित) फीसदी मुसलमान एकजुट हो जाएं तो लोकसभा में इतनी संख्या में उनके सांसद चुने जा सकते हैं जो त्रिशंकु की स्थिति में रिंग मास्टर बन जाएं। चुनाव बाद इसराइल में यहूदियों के बीच फूट पर सामाजिक विमर्श शुरू हो गया है।  भारत के बहुसंख्यक समाज को भी इसराइल में उत्पन्न राजनीतिक गतिरोध से सबक लेना चाहिए। वरना बड़ी बात नहीं निकट भविष्य में हमारे देश में भी इसराइल जैसी परिस्थिति पैदा हो जाए। 

इसराइल के चुनाव  भारत के बहुसंख्यक समाज के लिए सबक

इसराइल में किसी को बहुमत नहीं मिलने में अनोखा कुछ भी नहीं है क्योंकि पहले भी ऐसा कई बार हो चुका है। इस बार भी प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके प्रतिद्वंद्वी  पूर्व सेनाध्यक्ष गादी आइसेनकोट दोनों बहुमत से पीछे रह गए हैं। उन्हें क्रमशः 53 और 48 सीटें मिलीं। लेकिन पेच ये फंस गया कि कुल 120 में से 19 सीटें अरब पार्टी ले गई जिसे इसराइल में रहने वाले मुस्लिम मतदाताओं का एकमुश्त समर्थन मिला। चूंकि यहूदियों और मुसलमानों में जन्मजात बैर है , लिहाजा नेतन्याहू और गादी दोनों अरब पार्टी से दूरी बनाये रखने का दावा तो कर रहे हैं लेकिन तब तक नई सरकार नहीं बन पायेगी जब तक इन दोनों में कोई टूटन न हो।  अब सबकी नजर राष्ट्रपति इजाक हर्ज़ोग पर टिकी हैं। यदि सरकार बनाने लायक बहुमत कोई नहीं जुटा सका तब नये चुनाव की नौबत आ सकती है। लेकिन ये चुनाव इसलिए चौंकाने वाले बन गए क्योंकि पहली बार मुस्लिम मतदाता धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत होकर तीसरी शक्ति बनकर  उभरे। त्रिशंकु संसद होने की वजह से सत्ता की चाबी उनके हाथ में आने से इसराइल की अंदरूनी राजनीति का संतुलन गड़बड़ा गया। यहूदी समुदाय बहुमत में होने के बावजूद जहाँ दो नेताओं के बीच विभाजित हो गया वहीं अल्पसंख्यक मुसलमान रणनीतिक मतदान करते हुए गोलबंद हो  गए जिसके कारण अरब पार्टी ने 19 सीटों पर काबिज होकर नेतन्याहू और गादी दोनों का खेल बिगाड़ दिया। पूरे नतीजे  आने के पहले ही रुझानों के आधार पर नेतन्याहू ने चुनाव में विदेशी हस्तक्षेप का आरोप लगाकर सनसनी फैला दी। उनके आरोप के बाद शक की सुई ईरान की ओर घूम गई क्योंकि वह किसी भी कीमत पर नेतन्याहू की वापसी नहीं चाहता था। इधर इसराइल में भी यहूदियों का एक तबका नेतन्याहू से इसलिए नाराज है कि हमास द्वारा किये गए हमले ने इसराइल की अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी ।  हालांकि किरकिरी से बचने उन्होंने गाज़ा पर ताबड़तोड़ हमले करते हुए उसे मलबे के ढेर में बदलते हुए हमास की कमर तोड़ दी। लेकिन उसी कारण ईरान के साथ भी लड़ाई का बीजारोपण हुआ जिसने बाद में बड़ा रूप ले लिया। इसके चलते इसराइल को कुछ हासिल तो हुआ नहीं उल्टे युद्ध पर हुए अनाप शनाप खर्च ने अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया। ईरानी मिसाइलें जिस बड़ी संख्या में इसराइल में गिरीं उससे आम नागरिक भी असुरक्षित अनुभव करने लगे। इसके अलावा नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के आरोप भी जमकर लगे। बावजूद उसके वे सबसे ज्यादा सीटें जिताकर लाये और उस नाते सत्ता के प्रमुख दावेदार तो हैं किंतु मुसलमानों की अरब पार्टी से मदद लेना उनके और गादी दोनों के लिए आत्मघाती होगा। इस चुनाव परिणाम ने केवल  इसराइल की आंतरिक राजनीति को ही नहीं हिलाया अपितु उन समस्त देशों को चिंता में डाल दिया जहाँ मुस्लिम अल्पसंख्यकों  की आबादी बीते कुछ वर्षों में बढ़ी और वे मतदाता बनकर चुनाव को प्रभावित करने के साथ - साथ सामाजिक जीवन और कानून व्यवस्था के लिए भी मुसीबत बनते जा रहे हैं। यूरोप के अनेक देश मुस्लिम आबादी को बसाकर खून के आँसू रो रहे हैं जो शरणार्थी बनकर आने के बाद अब शरिया लागू करने का दबाव बनाने लगे हैं। अमेरिका की व्यवसायिक राजधानी न्यूयॉर्क में मुस्लिम महापौर निर्वाचित होते ही उपद्रव शुरू होने लगे। ब्रिटेन में तो लगभग सभी बड़े शहरों का स्थानीय निकाय मुस्लिमों के कब्जे में है। विचारणीय बात ये है कि जब इजराइल जैसे सख्त देश में रहने मुसलमान राजनीतिक तौर पर गोलबंद होकर राजनीतिक समीकरणों को उलझा सकते हैं तब भारत जैसी उदार और खुली प्रजातांत्रिक व्यवस्था में यदि देश की जनसंख्या के कुल 15 से 20 ( अनुमानित) फीसदी मुसलमान एकजुट हो जाएं तो लोकसभा में इतनी संख्या में उनके सांसद चुने जा सकते हैं जो त्रिशंकु की स्थिति में रिंग मास्टर बन जाएं। चुनाव बाद इसराइल में यहूदियों के बीच फूट पर सामाजिक विमर्श शुरू हो गया है।  भारत के बहुसंख्यक समाज को भी इसराइल में उत्पन्न राजनीतिक गतिरोध से सबक लेना चाहिए। वरना बड़ी बात नहीं निकट भविष्य में हमारे देश में भी इसराइल जैसी परिस्थिति पैदा हो जाए। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 29 October 2026

भाजपा के लिए चिंता और कांग्रेस को चिंतन जरूरी



हालांकि कुछ राज्यों में हुए स्नातक और शिक्षक श्रेणी के विधान परिषद चुनाव परिणामों के आधार पर कोई बड़ी भविष्यवाणी करना तो जल्दबाजी होगी परंतु राष्ट्रीय पार्टी होने से कांग्रेस और भाजपा के लिए देश के किसी भी हिस्से में मिली जीत या हार मायने रखती है। उस दृष्टि से उ.प्र, बिहार और महाराष्ट्र में भाजपा को जैसी सफलता मिलनी चाहिए थी वैसी नहीं मिलना उसके लिए चिंता का विषय है। उ.प्र में भले ही उसने पिछला प्रदर्शन दोहराया किंतु प्रधानमंत्री  के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी और रक्षा मंत्री  के गढ़  लखनऊ में समाजवादी पार्टी से मिली हार उसके लिए शोचनीय है। यद्यपि 11 में से 6 सीटें  जीतकर भाजपा ने यथास्थिति बनाये रखी परंतु सपा का 3 से 5 पर आ जाना अखिलेश यादव के लिए उत्साहवर्धक है।  इस चुनाव में शिक्षक और स्नातक वर्ग के मतदाता होने से इसे सुशिक्षित लोगों का चुनाव कहा जाता है। उस लिहाज से भाजपा के लिए ये  एक चेतावनी  हैं जो योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में तीसरी बार सरकार बनाने के प्रति आश्वस्त नजर आ रही है। यद्यपि अभी तक जितने भी चुनाव पूर्व सर्वेक्षण हुए वे योगी सरकार की वापसी के संकेत दे रहे हैं। लेकिन गत लोकसभा चुनाव में उ.प्र ने ही भाजपा को स्पष्ट बहुमत से वंचित कर दिया था। इसलिए विधान परिषद चुनाव में सपा का प्रदर्शन विधानसभा चुनाव में कड़े मुकाबले का संकेत कहा जा सकता है। पड़ोसी राज्य बिहार में यद्यपि भाजपा और जनता दल (यू) ने 8 में से 4 सीटों पर जीत हासिल की वहीं एक लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद और एक प्रशांत किशोर की जनसुराज के खाते में गई जबकि शेष दो पर निर्दलीय जीते।  राजद का एक सीट पर सिमटना भाजपा के लिए संतोषजनक हो सकता है किंतु जनसुराज का एक सीट जीतना बिहार में नये विकल्प की संभावना को बल देता है। 2 निर्दलीयों की जीत भी सत्तारूढ़ भाजपा - जनता दल (यू)  के लिए चेतावनी है। तीसरे राज्य महाराष्ट्र से भी भाजपा के लिए अच्छी खबर नहीं आई जहाँ 1 सीट उसे और 1 सहयोगी शिवसेना ( शिंदे) के हाथ लगी किंतु शेष 3 सीटों में से 2  एनसीपी (शरद पवार ) को मिलीं। वहीं पूरे देश में कांग्रेस  को केवल नागपुर में सफलता मिली जो भाजपा के लिए बड़ा झटका है क्योंकि वह केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस का गृहनगर है । यद्यपि कर्नाटक में भाजपा ने 4 में से 3  और उसके सहयोगी जनता दल ( सेकुलर )  ने 1 सीट जीतकर सत्तारूढ़ कांग्रेस को चारों खाने चित्त कर दिया। इस प्रकार उम्मीद से कम प्रदर्शन करने के बाद भी भाजपा ने खुद 13 और उसके सहयोगियों ने 3 सीटें जीतकर 16 का आंकड़ा  छू लिया वहीं कांग्रेस 1 पर सिमटी रही जबकि उसके सहयोगी 3 सीटें जीते। संसद के दोनों सदनों में मुख्य विपक्षी दल होने के बाद भी कांग्रेस का इन चुनावों में बुरी तरह हारना उसके लिए निरशाजनक है। उ.प्र, बिहार और महाराष्ट्र में भले ही भाजपा और उसके सहयोगी दलों के पास सत्ता है लेकिन कर्नाटक में सरकार होने के बावजूद काँग्रेस का दयनीय प्रदर्शन उसकी जमीनी कमजोरी का प्रमाण है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के लिए तो ये बेहद शर्मनाक है क्योंकि कर्नाटक उनका गृहराज्य है। राहुल गाँधी जितने जोरशोर से केंद्र सरकार के विरुद्ध आवाज उठा रहे हैं उसके बाद भी पार्टी शासित राज्य में खाली हाथ रहना निश्चित तौर पर उसके लिए चिंतन का विषय है। विशेष रूप से इसलिए क्योंकि मोदी सरकार के विरोध में विपक्ष इतना आक्रामक पहली बार हुआ और जंतर मंतर पर हुए आंदोलन से भाजपा पहली बार रक्षात्मक नजर आई। उक्त परिणामों के बाद भाजपा ने कांग्रेस पर  तंज कसते हुए सवाल किया कि विधान परिषद के चुनाव तो ईवीएम से नहीं हुए ,अपितु उनमें मतपत्रों का उपयोग हुआ। बावजूद उसके वह क्यों बुरी तरह हारी? स्मरणीय है  कांग्रेस आये दिन भाजपा को ईवीएम की बजाय मतपत्रों से चुनाव करवाने की चुनौती दिया करती है। क्षेत्रीय पार्टियों का दायरा तो सीमित होता है किंतु भाजपा - कांग्रेस के लिए छोटा - बड़ा हर मुकाबला महत्वपूर्ण है। उस दृष्टि से भाजपा के लिए उक्त चुनाव परिणाम जहाँ खुशफहमी से बाहर आने का संकेत हैं वहीं कांग्रेस के लिये मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखने के बजाय जनता से जुड़ाव बढ़ाने का जनादेश। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 28 October 2026

इजरायल में नये राजनीतिक समीकरण उभरने की संभावना



इजरायल के आम चुनाव संपन्न होने के बाद जो एग्जिट पोल आ रहे हैं उनमें से ज्यादातर का मानना है की प्रधानमंत्री नेतन्याऊ सत्ता से बाहर होने जा रहे हैं। उनके मुकाबले पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइज़ेनकोट मजबूत स्थिति में नज़र आ रहे हैं।गत दिवस संपन्न मतदान के बाद अनेक चुनाव सर्वेक्षण एजेंसियों सहित स्वतंत्र राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मुकाबला बेहद कड़ा है और किसी को भी स्पष्ट बहुमत की संभावना नहीं दिख रही है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के गठबंधन में शामिल दक्षिणपंथी और अति-रूढ़िवादी दलों के गुट को लगभग 52 सीटें मिलने का अनुमान है जिसमें उनकी अपनी लिकुड पार्टी को 27 सीटें मिल सकती हैं। वहीं दूसरी तरफ  पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइज़ेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गुट को लगभग 49 सीटें मिलने का अनुमान है। इस चुनाव में अरब अल्पसंख्यक पार्टियों  के प्रदर्शन पर सबकी निगाहें लगी हैं जिन्हें करीब 19 सीटें मिलने की संभावना है। इजरायल की संसद में कुल 120 सदस्य होते है। ऐसे में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की आवश्यकता होती है।यद्यपि परिणाम 4 नवम्बर तक आयेंगे किंतु प्रारंभिक संकेतों के आधार आंकड़ों के आधार पर न तो नेतन्याहू का गुट और न ही विपक्ष अकेले दम पर बहुमत का आंकड़ा छू पा रहा है।  जो स्थितियाँ बनती दिख रही हैं उनमें सत्ता हासिल करने के लिए  दोनों नेताओं को छोटी पार्टियों के समर्थन की आवश्यकता होगी। इजरायल की राजनीति पर बीते चार साल से चले आ रहे युद्ध की छाया साफ नजर आ रही है। वहाँ की जनता युद्ध से घबराती नहीं है लेकिन एक वर्ग का मानना है कि चुनाव के बाद नई सरकार के गठन में अनेक समीकरण देखने मिल सकते हैं। पहली संभावना यह है कि आइज़ेनकोट उन अन्य पार्टियों के साथ हाथ मिला लें जो किसी भी कीमत पर नेतन्याहू को सत्ता से हटाने पर आमादा हैं। इन पार्टियों में वामपंथी और दक्षिणपंथी नेता शामिल हैं। हालांकि इनके बीच कई मुद्दों पर मतभेद हैं, लेकिन नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के नाम पर वे साथ आने राजी हैं। बावजूद इसके ऐसा गठजोड़ आसान नहीं हो सकता क्योंकि इन पार्टियों को यह तय करना होगा कि प्रधानमंत्री किसे बनाएं और नई सरकार की नीतियाँ कौन सी होंगी।  एक संभावित समीकरण ये भी है कि नेतन्याहू और उनके सहयोगी विपक्षी दलों पर निर्भर हुए बिना सरकार बनाने के लिए पर्याप्त सीटें जीत लें जबकि इससे इतर बनने वाली स्थिति राजनीतिक गतिरोध की है, जिसमें  नेतन्याहू के गठबंधन और  विपक्ष दोनों को सरकार बनाने के लिए आवश्यक 61 सीटें नहीं मिलेंगी। ऐसे में विपक्ष को अधिक सीटें मिलने पर भी, उसके दल सरकार बनाने में सहयोग करने से पीछे हट सकते हैं। इसी तरह कुछ दक्षिणपंथी दल , अरब दलों के साथ सहयोग करने से मना कर सकते हैं। प्रधानमंत्री के नाम पर भी उनमें मतभेद उभर सकते हैं। स्मरणीय है 2019 से 2022 के बीच इजरायल को  पांच चुनाव देखने पड़े  क्योंकि विभिन्न दलों में सरकार बनाने के लिए एक राय नहीं बन पाती थी। कुछ विश्लेषक एक और विकल्प की बात कर रहे हैं जो अल्पमत सरकार का है। ऐसी स्थिति में, आइज़ेनकोट या कोई अन्य विपक्षी नेता अरब पार्टियों को  गठबंधन से बाहर रखकर उनके समर्थन से सरकार बनाने की कोशिश कर सकता है।पूरे परिणाम घोषित होने के बाद  राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग विभिन्न दलों के नेताओं से मुलाकात करेंगे और उनसे पूछेंगे कि वे अगली सरकार का नेतृत्व करने के लिए किसका समर्थन करते हैं। इसके बाद वे उस उम्मीदवार का चयन करेंगे जिसके बारे में उन्हें लगता है कि गठबंधन सरकार बनाने की सबसे अच्छी संभावना है। उस उम्मीदवार को अन्य दलों से बातचीत करनी होगी और सरकार बनाने के लिए पर्याप्त समर्थन जुटाना होगा। इन चर्चाओं में कई सप्ताह या महीने भी लग सकते हैं। इस बार रिकार्ड तोड़ मतदान के कारण भी परिणामों का अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है। इस चुनाव को लेकर इजरायल में जितनी उत्सुकता है उतनी ही भारत में भी है क्योंकि वर्तमान प्रधानमंत्री नेतन्याहू और नरेंद्र मोदी के बीच काफी नजदीकी रिश्ते हैं। इसके कारण दोनों देशों की दोस्ती मजबूत हुई। भारत के प्रमुख रक्षा सहयोगी के रूप में इजरायल की गिनती होती है। ऐसे में नेतन्याहू यदि हटते हैं तब सवाल खड़ा होगा कि क्या उनके उत्तराधिकारी के साथ भी भारत की जुगलबन्दी इसी तरह जारी रहेगी या उसमें अंतर आयेगा। लेकिन इजरायल के लिए भारत से बेहतर रणनीतिक तालमेल रखना उतना ही जरूरी है जितना हमारे लिए। भारत उसके रक्षा उपकरणों सहित अन्य तकनीकी उत्पादों का बड़ा खरीददार है। साथ ही इजरायल के प्रति आम भारतीय के मन में हमदर्दी है। प. एशिया की मौजूदा स्थिति में इजरायल को भारत के समर्थन की बेहद जरूरत है। हालांकि किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए नई सरकार के बनने की प्रतीक्षा करनी होगी। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 27 October 2026

पुस्तक प्रकाशित होने से पहले विवाद पैदा करना अनुचित



सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश संजय किशन कौल द्वारा लिखी गई पुस्तक विदाउट फ़ियर ऑर फ़ेवर , प्रकाशित होने के पहले ही चर्चा में आ गई। एक पत्रिका को दिये साक्षात्कार में उन्होंने उक्त पुस्तक में वर्णित एक घटना का उल्लेख करते हुए दावा किया कि सर्वोच्च न्यायालय के पिछले मुख्य न्यायाधीश डी. वाई चंद्रचूड़ सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए प्रस्तावित नामों पर औपचारिक चर्चा से पूर्व ही सरकार के साथ उन पर विचार-विमर्श करते थे। श्री कौल के मुताबिक उन्हें यह तरीक़ा पसंद नहीं था क्योंकि  उसका मतलब न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए  सरकार से पूर्व स्वीकृति लेने जैसा था।  जस्टिस कौल की तक उक्त पुस्तक अभी बिक्री हेतु उपलब्ध नहीं हुई है। ऐसे में उसके इस अंश को सार्वजनिक करने का सीधा - सीधा उद्देश्य पुस्तक के बाजार में आने से पहले ही उसे विवादित बना देना है ताकि उसकी बिक्री बढ़े। पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक के कुछ अंशों को लेकर तो संसद तक में हंगामा हुआ जिससे सदन की कार्यवाही तक बाधित हुई। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने तो जनरल नरवणे की पुस्तक तक दिखाई जबकि वह छपकर ही नहीं आई थी। जनरल की चुप्पी ने भी पुस्तक को लेकर चले विवाद में रहस्य भी उत्पन्न कर दिया। हालांकि कुछ समय बाद उन्होंने श्री गाँधी द्वारा कही जा रही बातों को निराधार बताते हुए स्पष्ट किया कि उन्हें गलवान घाटी में चीनी सेना के मुकाबले के लिए केन्द्र सरकार की ओर से पूरी छूट मिली हुई थी। उसके बाद वह विवाद ठंडा पड़ गया। राहुल ने भी उसको भुला दिया।लेकिन जस्टिस कौल ने खुद ही साक्षात्कार देकर विवाद की शुरुआत कर दी। जब उनके द्वारा कालेजियम की बैठक से पहले सरकार से विमर्श किये जाने संबंधी खुलासे पर जस्टिस  चंद्रचूड़ से प्रतिक्रिया मांगी गई तब उन्होंने दो टूक कहा कि उन्होंने चूंकि उक्त पुस्तक अभी तक पढ़ी ही नहीं इसलिए जस्टिस संजय कौल ने उक्त बात किस संदर्भ में कही है, उस पर अभी टिप्पणी करना मुश्किल है । इसके बावजूद मैं यह ज़रूर कहना चाहूंगा कि मुख्य न्यायाधीश  के तौर पर मेरा कॉलेजियम की बैठकों का अनुभव बेहद अच्छा रहा और जस्टिस कौल के साथ भी कॉलेजियम के सदस्य के रूप में मेरा रिश्ता हमेशा बेहद सम्मानजनक रहा है।हमारे बीच सार्थक बातचीत हुई है, तर्कपूर्ण संवाद हुए हैं और कॉलेजियम की बैठकों में हम सौहार्दपूर्ण माहौल में साथ रहे हैं। जस्टिस कौल द्वारा एक पत्रिका को दिये साक्षात्कार में पुस्तक के उक्त अंश का उल्लेख किये जाने के बाद  कांग्रेस ने भी सरकार पर हमलावर होते हुए कहा है कि  मोदी सरकार के कार्यकाल में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने आरोप लगाए कि केंद्र सरकार न्यायपालिका पर 'दबाव डाल रही है और उसे कमज़ोर कर रही है। लेकिन इस सबसे हटकर दो बातें हैं जो महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान लोगों द्वारा  सेवा निवृत होने के उपरांत लिखी गई पुस्तकों के संदर्भ में विचारणीय हैं। पहली ये कि पुस्तक प्रकाशित होने के पहले उसके कुछ अंशों को सार्वजनिक कर सनसनी फैलाना कहाँ तक उचित है क्योंकि उसमें जिन लोगों के बारे में लिखा गया वे अपनी प्रतिक्रिया बिना पुस्तक देखे नहीं दे पाते और उसके बाजार में आते - आते तक विवाद शांत पड़ चुका होता है । जनरल नरवणे की पुस्तक रक्षा मंत्रालय में अनापत्ति की प्रतीक्षा कर रही थी तब उसके कुछ हिस्से सार्वजनिक कैसे हुए ये जांच का विषय है। लेकिन सरकार को घेरने में विपक्ष ने आसमान सिर पर उठा लिया। जहाँ तक जस्टिस कौल की उक्त पुस्तक का सवाल है तो पद पर रहते हुए उन्होंने मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ के उन कार्यों का विधिवत विरोध क्यों नहीं किया जिनका पुस्तक में उल्लेख है। और यदि मौखिक विरोध किया भी तब उसका कोई प्रमाण उनके पास नहीं होने से उसका उल्लेख पुस्तक में किया जाना निरर्थक है। कालेजियम के भीतर की सारी प्रक्रिया लिपिबद्ध होती है जिस पर सभी उपस्थित न्यायाधीशों की सहमति होती है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा भी है कि जो प्रस्ताव तैयार होता है उस पर किसी ने असहमति दी हो ऐसा उन्हें याद नहीं। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कालेजियम की बैठक का किसी सदस्य ने बायकाट किया हो ऐसा भी नहीं हुआ। ऐसे में लगता है जस्टिस कौल अपनी असहमति अनौपचारिक तौर पर व्यक्त करते रहे। और यदि ऐसा था तब फिर उसका पुस्तक में उल्लेख अनावश्यक ही माना जायेगा। यदि वे जस्टिस चंद्रचूड़ की कार्यप्रणाली से अपनी असहमति राष्ट्रपति को सूचित कर देते तब उनकी बात में वजनदारी होती। 


- रवीन्द्र वाजपेयी