कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा दिल्ली के जंतर मंतर पर तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग को लेकर किये गए आंदोलन ने उस समय गंभीर मोड़ ले लिया जब 20 जुलाई को आंदोलनकारियों ने संसद भवन को घेरने की कोशिश की। जब भीड़ अनियंत्रित होकर पुलिस पर हमला करने के साथ ही सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ पर उतारू हो गई तब लाठी चार्ज, पानी की बौछारें और अश्रु गैस का उपयोग कर उन्हें रोका गया। अंततः श्री प्रधान के त्यागपत्र के साथ ही , आत्महत्या किये छात्रों के परिजनों को मुआवजा तथा आंदोलनकारियों पर दर्ज सभी अपराधिक प्रकरण वापस लेने का समझौता सरकार और कॉकरोच जनता पार्टी के बीच हुआ। उसके बाद आंदोलन तो समाप्त हो गया किंतु पहली बार किसी आंदोलन में गंदी गालियाँ और अश्लील नारेबाजी सुनाई दी। जो पोस्टर लहराए गए उन्हें देखकर पूरा देश शर्मिंदा हुआ सिवाय उनके जिन्हें उनमें युवा आक्रोश दिखा। कुछ लेखकों और पत्रकारों को उन अश्लील गालियों, नारेबाजी और पोस्टरों में क्रांति के दर्शन भी होने लगे। लेकिन इसी बीच पंजाब और कर्नाटक से पेपर लीक होने की खबरें आने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी नेताओं से वहाँ जाकर आंदोलन करने के बारे में पूछा गया तो वे कन्नी काट गए। इसी तरह जंतर मंतर आंदोलन की अघोषित प्रायोजक आम आदमी पार्टी ने पंजाब पर चुप्पी साधे रखी तो दिल्ली में छात्रों पर हुए बल प्रयोग को मुद्दा बनाकर संसद को नहीं चलने दे रहे राहुल गाँधी ने कर्नाटक के पेपर लीक को सिरे से उपेक्षित कर दिया। लेकिन तभी झारखंड की राजधानी रांची में छात्रों का आंदोलन शुरू हो गया। उसके पीछे भी शिक्षा से जुड़े अनेक मुद्दे थे। लेकिन वह आंदोलन पूरी तरह शांत और व्यवस्थित चल रहा था। न कोई अश्लील नारेबाजी और न गाली - गलौच। आंदोलन स्थल पर अनुशासन और शालीनता बनाये रखी गई। दिल्ली से भेजे गए जे.एन.यू के ढपली बाजों ने माहौल में गंदगी फैलाने का षडयंत्र रचा तो उन्हें उल्टे पाँव लौटा दिया गया। लेकिन जंतर मंतर आंदोलन के समर्थन में आगे आकर कूदने वालों को रांची के छात्रों में जेन जी नहीं दिखे । जब झारखंड की कांग्रेस समर्थित सरकार ने छात्रों की मांगों को पूरा नहीं किया तब गत दिवस उन्होंने विधानसभा घेरने का ऐलान किया। जिसके बाद विधानसभा का बचाव करने लाठीचार्ज, पानी की बौछार, अश्रु गैस आदि का सहारा पुलिस ने लिया। दर्जनों आंदोलनकारी घायल होकर अस्पताल पहुँच गए। तोड़फोड़ और पत्थरबाजी छात्रों की तरफ से भी हुई। संक्षेप में कहें तो दिल्ली के घटनाक्रम की पुनरावृत्ति ही हुई। जैसे ही ये खबर फैली राजनीतिक बिरादरी के उस हिस्से में सन्नाटा छा गया जो दिल्ली की घटना पर आसमान सिर पर उठाये घूम रहा था। राहुल गाँधी ने सोशल मीडिया पर बल प्रयोग की निंदा करते हुए छात्रों से बात करने की समझाईश तो दे डाली किंतु झारखंड सरकार के विरुद्ध एक शब्द नहीं कहा। उल्लेखनीय है वहाँ शिक्षा विभाग का जिम्मा खुद मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन के पास है और उनकी सरकार कांग्रेस के समर्थन पर टिकी हुई है। कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को युवा क्रांति का सूत्रपात मानने वाले बुद्धिजीवी, चरण चुंबन करने वाले यू ट्यूबर् और ढपली बाज जे.एन.यू वाले भी दाएं - बाएं हो रहे हैं क्योंकि रांची में पिटने वाले हालांकि जेन जी ही थे किंतु पीटने वाली सरकार कांग्रेसी बैसाखी पर टिकी है । लिहाजा उससे इस्तीफा मांगने की औपचारिकता तक नहीं निभाई गई। यही दोमुँहापन तमाम समस्याओं की जड़ है। धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र पर दुनिया झुकती है झुकाने वाला चाहिए जैसी डींग हांकने वाले काक्रोचियों के नेता कहां दुबके हैं किसी को नहीं पता। लेकिन इससे हटकर देखें तो जंतर मंतर पर एकत्र युवाओं की बेहूदा हरकतों और आपत्तिजनक आचरण को युवा आक्रोश के नाम पर औचित्य पूर्ण ठहराया जाना गलत परिपाटी को जन्म दे गया। गत रात्रि पुण्य प्रसून वाजपेयी बड़े खुश होकर कह रहे थे कि जेन जी का डर खत्म हो गया है। यदि वे संसद और विधानसभा में घुस गए तब सरकारों का क्या होगा? योगेंद्र यादव तो मुद्दों का हल संसद की बजाय सड़कों पर होने जैसी शेखी बघारते सुने जा चुके हैं। सवाल ये है कि जंतर मंतर के जेन जी सही थे तब रांची वालों को गलत नहीं ठहराया जा सकता। और जब दोनों को सही मानना राजनेताओं की मजबूरी है तब देश में आंदोलन का अर्थ संसद और विधानसभा में घुसकर उत्पात मचाना ही रह जाएगा और इस तथाकथित निडरता का शिकार सभी पार्टियाँ और उनके नेता होंगे क्योंकि विभिन्न राज्यों में अन्य दलों की सत्ता है। ऐसे में जेन जी की आड़ में अराजकता को प्रोत्साहित करने का गंदा खेल बन्द होना चाहिए वरना जो होगा उसकी कल्पना ही डरा देती है।
- रवीन्द्र वाजपेयी