हालांकि ये आम आदमी पार्टी का अधिकार है कि वह संसद में किसे अपना नेता , उपनेता या सचेतक बनाए। उस लिहाज से राज्यसभा में राघव चड्ढा को उपनेता पद से अलग किया जाना उसका आंतरिक मामला है। लेकिन राज्यसभा सचिवालय को ये लिखकर देने से कि उनको बोलने की अनुमति न दी जाए, ये प्रकरण सुर्खियों में आ गया। पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट राघव पार्टी के सौम्य और शालीन चेहरे हैं। अन्ना आंदोलन के समय ही वे अरविंद केजरीवाल के साथ जुड़ गए। प्रवक्ता के तौर पर उनका प्रदर्शन प्रभावशाली रहा। केजरीवाल सरकार के अनेक मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और कुछ तो जेल भी गए, वहीं राघव अपनी स्वच्छ छवि और सुसंस्कृत व्यवहार के कारण लोकप्रिय होते गए। लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स से शिक्षित इस नेता को पार्टी ने पंजाब की जिम्मेदारी सौंपी जहां उसे दिल्ली की तरह से ही धमाकेदार जीत मिली । पुरस्कार स्वरूप उन्हें राज्यसभा में भेजा गया। सदन में लीक से हटकर मुद्दे उठाने के कारण राघव प्रभाव छोड़ने में सफल हो गए। लेकिन अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा से विवाह के बाद उनकी चर्चा राजनेता से ज़्यादा ग्लैमर बॉय के रूप में होने लगी। टीवी कार्यक्रमों में उनसे पार्टी और राजनीति से जुड़े सवालों की बजाय निजी जीवन पर पर सवाल पूछे जाते। यद्यपि राज्यसभा में आम जनता से जुड़े मुद्दे उठाने से उन्हें सराहना भी मिली । निर्वाचित जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने ( रिकॉल ) का उनका सुझाव लोगों को पसंद आया। हवाई अड्डों पर महंगी खाद्य सामग्री के अलावा गिग वर्कर्स (ओला/उबर ड्राइवर, स्विगी/ज़ोमैटो डिलीवरी पार्टनर, या कूरियर बॉय) के शोषण का मुद्दा उठाकर भी वे सुर्खियों में आए। ऐसे में उनको राज्यसभा में उपनेता पद से हटाने के निर्णय पर सभी को आश्चर्य हुआ क्योंकि उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच किसी भी मतभेद की खबर उजागर नहीं हुई थी। लेकिन अब जो बातें सुनने में आईं उनसे स्पष्ट है कि विवाद की शुरुआत काफी पहले हो चुकी थी। दरअसल जब शराब घोटाले में श्री केजरीवाल और मनीष सिसौदिया की गिरफ्तारी के विरुद्ध पार्टी आंदोलन कर रही थी तब न श्री चड्ढा नजर आए और न ही कोई बयान आया। बाद में पता लगा कि वे आँखों का इलाज करवाने के लंदन गए हुए थे। लंबे समय तक वहां रुके रहने पर भी उंगलियां उठीं। लौटने के बाद भी उनकी सक्रियता राज्यसभा की बैठकों में दिए भाषणों तक सीमित रह गई। गत वर्ष दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी वे अग्रिम मोर्चे पर नहीं दिखे। ज़ाहिर है उनके और पार्टी के बीच खाई चौड़ी होती गई । राज्यसभा में उपनेता पद से हटाने के बाद भी हालांकि पार्टी की तरफ़ से इस बारे में अधिकृत बयान नहीं आया किंतु सोशल मीडिया पर राघव की प्रतिक्रिया से लगता है कि वे भी शांति भूषण, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और कुमार विश्वास की तरह श्री केजरीवाल के लिए असहनीय हो चले हैं। इसका कारण पार्टी लाइन के समानान्तर ऐसे मुद्दे उठाना बताया जा रहा है जिनसे उनकी व्यक्तिगत छवि तो चमक रही थी लेकिन पार्टी को कोई लाभ नहीं मिल रहा। एक वजह ये भी है कि सदन में उनके द्वारा सरकार का विरोध सौम्य शैली में किया जाता रहा वहीं पार्टी के नेता संजय सिंह की शैली बेहद आक्रामक है। आम चर्चा ये है कि राघव धीरे - धीरे भाजपा के करीब जा रहे थे। सदन में बजट के कुछ प्रावधानों की प्रशंसा और सुझाव वाला उनका भाषण पार्टी को नागवार गुजरा। लेकिन अब तक बाहर नहीं किए जाने से वे पार्टी के व्हिप से बंधे हुए हैं। कार्यकाल के दो वर्ष शेष रहने से राघव इस्तीफा देने की गलती भी शायद ही करें। लेकिन इस घटनाक्रम से ये स्पष्ट हो गया कि आम आदमी पार्टी में बिखराव की प्रक्रिया थमने का नाम नहीं ले रही। श्री केजरीवाल और श्री सिसौदिया को छोड़कर तकरीबन सभी संस्थापक सदस्य या तो खुद छोड़ गए या अपमानित कर बाहर कर दिए गए। राज्यसभा में संजय सिंह और राघव को छोड़कर बाकी जितने भी लोगों को भेजा गया वे पार्टी की छवि और सिद्धांतों के सर्वथा विपरीत है। दिल्ली का किला ढह जाने के बाद पार्टी की चमक और धमक दोनों में कमी आ चुकी है। श्री केजरीवाल और श्री सिसौदिया भले ही अदालत में निर्दोष हो गए किंतु पुराना दबदबा लौटना संभव नहीं दिखता। ऐसे में राघव जैसे साफ - सुथरे और सुयोग्य नेता को किनारे करना पार्टी के लिए नुकसानदेह हो सकता है। भले ही वे जननेता न हों लेकिन पंजाब चुनाव की रणनीति बनाने में उनका अभाव खलेगा। और यदि वे भाजपा के साथ जुड़ गए तब ज्यादा नुकसान पहुंचा सकते हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी