Saturday, 14 March 2026

लेकिन कांग्रेस में कमियों के लिए जिम्मेदार कौन


आजादी के बाद दलित राजनीति के सबसे बड़े चेहरे और बसपा के संस्थापक स्व. कांशीराम की जयंती के दो दिन पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा उनकी प्रशंसा के पीछे  उनके प्रति  श्रद्धा नहीं अपितु आगामी वर्ष  उ.प्र विधानसभा के चुनाव में दलित वोट बैंक को दोबारा हासिल करना है जो कभी कांग्रेस की ताकत था। हालांकि कांशीराम थे पंजाब के लेकिन उन्होंने भांप लिया था कि  उ.प्र में जड़ें जमाये बिना बसपा राष्ट्रीय राजनीति में जगह नहीं बना सकेगी और इसीलिए उन्होंने  जाटव समाज की एक युवती मायावती को चुना। उ.प्र की होने से दलित वर्ग में उनकी स्वीकार्यता बढ़ती गई और बैसाखियों के सहारे मुख्यमंत्री बनने वाली मायावती ने 2007 में स्पष्ट बहुमत हासिल कर सबको चौंका दिया। हालांकि वह दौर पांच साल में ढलान पर आ गया। आज उनकी पार्टी का एक भी सांसद नहीं है वहीं उ.प्र में मात्र एक विधायक। वे खुद भी सांसद या विधायक नहीं हैं। बीते कुछ चुनावों में पूरे दलित समुदाय की नेता होने के बजाय मायावती अपने सजातीय वर्ग तक ही सिमट गईं ।  हाल ही में उन्होंने लखनऊ में एक विशाल रैली का आयोजन कर अपना प्रभाव पुनर्स्थापित करने का प्रयास भी किया था। लेकिन उ.प्र में उनकी वापसी की संभावना न के बराबर है । अब सवाल ये है कि राहुल गांधी के मन में कांशीराम के प्रति प्यार क्यों उमड़ पड़ा और उन्हें भारत रत्न देने की मांग कांग्रेस की ओर से उछलने लगी। राजनेताओं की  हर बात के पीछे कहीं न  कहीं चुनाव होता है। राहुल ने भी कांशीराम की वंदना इसीलिए की। लेकिन वे यह भी बोल गए कि कांग्रेस में कमियां थीं, इसलिए कांशीराम सफल हुए। अगर कांग्रेस अपना काम करती तो कांशीराम सफल नहीं हो पाते। एक और चौंकाने वाली बात उन्होंने ये कही कि अगर भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू जीवित रहे होते तो कांशीराम कांग्रेस की तरफ से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री होते। स्मरणीय हैं नेहरू जी 1964 में ही चल बसे थे जबकि कांशीराम 1978 में बामसेफ की स्थापना के साथ उभरे।  1984 में उन्होंने बसपा बनाई। श्री  गांधी के मुताबिक भारत का संविधान महात्मा गांधी, डॉ.अंबेडकर और कांशीराम के विचारों पर आधारित था। उनकी ये बात इसलिए हास्यास्पद है क्योंकि जब देश आजाद हुआ उस समय कांशीराम महज 13 साल और संविधान लागू होते समय 16 वर्ष के थे।  राहुल के कांशीराम प्रेम में भी विरोधाभास नजर आया। एक तरफ तो उन्होंने कहा कि कांग्रेस की कमियों के कारण वे सफल हुए । इसका मतलब यदि कांग्रेस में कमियां न होतीं तब वह कांशीराम को सफल नहीं होने देती। वहीं दूसरी तरफ  ये शिगूफा छोड़ दिया कि नेहरू जी जीवित रहते तो वे कांशीराम को उ.प्र का मुख्यमंत्री बना देते।  इस बात से ये सवाल उठ खड़ा होता है कि यदि कांग्रेस को बसपा नेता के प्रति यदि इतना लगाव था तब इंदिरा गांधी ने उन्हें उ.प्र का मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया? इस संदर्भ में याद रखने वाली बात ये है कि 1977 के चुनाव में जब अपने दौर के सबसे बड़े दलित नेता बाबू जगजीवन राम ने कांग्रेस छोड़ दी तब दलित राजनीति में एक खालीपन पैदा होने लगा। दरअसल  उनके मन में प्रधानमंत्री न बन पाने की कसक थी जो जनता पार्टी में आने पर भी पूरी नहीं हो सकी। जब ये तय हो गया कि उनका राजनीतिक सफर समाप्त होने को है तभी 1978 में कांशीराम द्वारा बसपा का गठन कर दलित राजनीति को उसका अपना मंच दिया। सवाल ये है कि कांग्रेस ने युवा कांशीराम को अपने साथ क्यों नहीं जोड़ा ?कल लखनऊ में श्री गांधी ने कांशीराम को महात्मा गांधी और डॉ. अंबेडकर के समकक्ष रखते हुए कहा कि दोनों ने कभी समझौता नहीं किया। लेकिन इतिहास गवाह है कि अंबेडकर जी की राजनीतिक दुर्गति करने में कांग्रेस कभी पीछे नहीं रही। पहले उन्हें नेहरू मंत्रिमंडल से निकलने मजबूर किया गया और फिर लोकसभा के चुनाव में हरवा दिया। यहां तक कि उन्हें भारत रत्न देने से भी परहेज किया गया। 1990 में गैर कांग्रेसी सरकार ने ये काम किया। ऐसे में श्री गांधी का ये कहना गले नहीं उतरता कि नेहरू जी जीवित रहते तो कांशीराम को उ.प्र का मुख्यमंत्री बना देते। कांग्रेस द्वारा उन्हें भारत रत्न दिये जाने की मांग उठाना भी अटपटा है क्योंकि उनके जीवनकाल में पार्टी ने उनको कभी महत्व नहीं दिया।  बहरहाल , श्री गांधी की ये स्वीकृति सच्चाई के काफी करीब है कि कांग्रेस की कमियों के कारण ही कांशीराम आगे बढ़ सके। लेकिन उन्हें ये भी बताना भी चाहिए कि कांग्रेस में कमियों के लिए कौन जिम्मेदार है क्योंकि पार्टी पर नेहरू -  गांधी परिवार का एकछत्र आधिपत्य आज तक बना हुआ है। सही बात तो ये है कि कांग्रेस की कमियों के चलते ही न सिर्फ दलित बल्कि पिछड़े भी उससे दूर हो गए। और ऐसा कहीं से भी नहीं लग रहा कि पार्टी अपनी कमियों को दूर कर गलतियों से सीखने को तैयार है।


- रवीन्द्र वाजपेयी





Friday, 13 March 2026

अविश्वास प्रस्ताव पर खाली हाथ रहा विपक्ष


विपक्ष द्वारा प्रस्तुत अविश्वास प्रस्ताव धराशायी होने के बाद लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला ने  साफ - साफ कह दिया कि सदन कानून से ही चलेगा।  उल्लेखनीय है  अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस मिलते ही उन्होंने सदन में आना बंद कर दिया था। दोबारा सदन में आने पर उनके तेवर पूर्ववत ही दिखाई दिए जबकि विपक्ष अपराधबोध से ग्रसित था क्योंकि जिस व्यक्ति पर उसने तमाम आरोपों की झड़ी लगा दी थी उसी को माननीय कहकर संबोधित करना पड़ रहा है। वैसे भी प्रस्ताव पर बहस में विपक्ष अपेक्षित पैनापन नहीं दिखा सका । कई मर्तबा तो ऐसा लगा जैसे वह प्रस्ताव रूपी बोझ  को जल्द - से जल्द उतारना चाहता था। प्रस्ताव गिरना तो था ही लेकिन विपक्ष चाहता तो आए दिन उत्पन्न होने वाले गतिरोध को दूर करने का रास्ता निकालकर अपने लिए सुखद स्थिति बना सकता था किंतु वह एक बार फिर चूक गया। संसदीय प्रणाली  में अध्यक्ष /सभापति सदन का मुखिया होता है। विषय सूची ,  विभिन्न दलों को बोलने का समय निर्धारण के वेसाथ ही विवाद की स्थिति में व्यवस्था देने जैसे निर्णय उसके अधिकार क्षेत्र में होते हैं। उसकी अध्यक्षता में एक कार्य मंत्रणा समिति  भी होती है जिसमें विभिन्न दलों का सदस्य संख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व होता है। विपक्ष के समझदार नेता अध्यक्ष या सभापति से सौजन्यतापूर्ण संबंध बनाकर अपने लिए बेहतर स्थितियां निर्मित कर  लेते हैं। डॉ.राममनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर, मधु लिमये,जॉर्ज फर्नांडीज, लालकृष्ण आडवाणी, सोमनाथ चटर्जी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली जैसे  विपक्षी नेताओं को हर पीठासीन अधिकारी बोलने के लिए पर्याप्त समय ही नहीं देते थे बल्कि उनके भाषण के बीच में टोकाटाकी करने वाले सत्ता पक्ष के सांसदों को फटकार भी लगाते थे। आज वैसे विपक्षी नेता संसद में  इक्का - दुक्का ही हैं । ऐसा ही आपसी सद्भाव प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष में हुआ करता था। पंडित नेहरू के दौर में विपक्ष की संख्या कम होने के बाद भी उसके कुछ सांसद सरकार को घेरने में कामयाब हो जाते थे। इंदिरा जी के समय में कटुता बढ़ी किंतु उसके बावजूद अटल जी और चन्द्रशेखर जैसे नेताओं के साथ उनका संवाद बना रहा। पी.वी नरसिम्हा राव और अटल जी के निजी रिश्ते भी जगजाहिर थे। हालांकि संसद में दोनों एक दूसरे की तीखी आलोचना में परहेज नहीं करते थे। लोकसभाध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति सामान्यतः सत्ता पक्ष से जुड़े होते हैं किंतु विपक्ष सम्मान का भाव रखते हुए शालीन व्यवहार करे तो वे भी उसे संरक्षण देने में पीछे नहीं रहते। विपक्ष को सरकार और आसंदी के विरुद्ध बोलने का पूरा अधिकार है किंतु उसमें मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। यदि श्री गांधी समय - समय पर प्रधानमंत्री और श्री बिरला से मेल - मुलाकात करते रहें तो इससे आपसी संबंध सुधरने के अलावा संसद का वातावरण भी खुशनुमा रहेगा। उनको  शरद पवार से सीखना चाहिए जो राजनीतिक मतभेद भुलाकर गाहे - बगाहे प्रधानमंत्री से मिलकर अपने क्षेत्र की समस्याओं को समाधान करवा लेते हैं। कुछ समय पहले प्रियंका वाड्रा ने सदन में विनम्रता पूर्वक परिवहन मंत्री नितिन गडकरी से अपने क्षेत्र के विकास कार्यों के लिए चर्चा हेतु समय मांगा जिसे मंत्री ने तत्काल स्वीकार कर कहा कभी भी आइए। बाद में प्रियंका उनसे मिलीं। इसी कारण सत्तापक्ष के एक सांसद ने कहा भी प्रियंका को नेता प्रतिपक्ष होना चाहिए। स्मरणीय  है उक्त अविश्वास प्रस्ताव पर श्री गांधी ने हस्ताक्षर नहीं किए तब  कहा गया कि ऐसा संसदीय लोकतंत्र की परंपराओं का पालन करने के लिए लिया गया है, जिसमें विपक्ष के नेता  द्वारा सीधे स्पीकर के खिलाफ याचिका पर हस्ताक्षर करना उचित नहीं माना जाता। यदि यही सौजन्यता वे श्री बिरला से मिलकर व्यक्त कर आते तब बात इतनी नहीं बढ़ती। अब जबकि अविश्वास प्रस्ताव गिर चुका है तब विपक्ष को चाहिये वह सदन के वातावरण में घुल चुकी कटुता दूर करने अपने व्यवहार में लचीलापन लाए।  हर समय तैश में बोलना अथवा सत्ता पक्ष और प्रधानमंत्री पर व्यर्थ के कटाक्ष करने से श्री गांधी को कुछ लाभ नहीं होने वाला। बेहतर हो वे उन पूर्व विपक्षी नेताओं के व्यक्तित्व और कृतित्व का का अनुसरण करें जिनका सम्मान सत्ता पक्ष भी करता था।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 12 March 2026

रूस और चीन के दूर रहने से ईरान फंस गया


ईरान पर अमेरिका और इजराइल के आक्रमण को दो हफ्ते बीतने जा रहे हैं। अब तक दोनों पक्ष एक - दूसरे को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाने के दावे कर रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रम्प आदतानुसार रोज नया शिगूफा छोड़ते हुए दावा करते हैं कि ईरान तबाह हो चुका है और उसकी सैन्य क्षमता लड़ाई लंबी खींचने लायक नहीं बची। दूसरी तरफ ईरान भी बुलंद हौसलों के साथ कभी इजराइल तो कभी बहरीन और ओमान के तेल भण्डारों पर ड्रोन से बम वर्षा कर नुकसान पहुंचा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही रोककर ईरान ने तेल आपूर्ति रोक दी है। तेल से लदे दर्जनों टैंकर फंसे हुए हैं। एक - दो ने निकलने की कोशिश की तो ईरान ने उन पर हमला कर दिया। थाईलैण्ड का एक जलपोत कल ही ईरानी मिसाइल का शिकार हो गया जिसमें सवार लोगों को ओमान के सुरक्षा दल ने बचाया किंतु कुछ नाविक लापता होने से उनके मारे जाने की आशंका है। गत सप्ताह ईरान ने पड़ोसी मुस्लिम देशों पर किए गए हमलों के लिए माफ़ी मांगकर ये संकेत दिया था कि इजराइल और अमेरिका को छोड़ बाकी सब पर वह हमले नहीं करेगा। लेकिन उसने ये शर्त भी रख दी थी कि जिन मुस्लिम देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं उनसे यदि हमले हुए तब उनके जवाब में ईरान भी पलटवार करेगा। हालांकि बहरीन और ओमान में उसके ताजा हमलों का कारण सामने नहीं आया। इस बीच लड़ाई रोकने के लिए किसी ठोस कूटनीतिक प्रयास की जानकारी नहीं मिली। यद्यपि ट्रम्प ने रूस के राष्ट्रपति पुतिन से घंटे भर फोन पर बात की परंतु उसका कोई सार्थक परिणाम देखने नहीं मिला। अब तक इस लड़ाई में किसका पलड़ा भारी है ये आकलन अच्छे - अच्छे सैन्य विशेषज्ञ नहीं कर पा रहे। कुछ का कहना है कि अमेरिका और इजराइल ने हमले करने में जल्दबाजी कर दी। उनके द्वारा ईरान की सैन्य क्षमता को कम आंका गया। इसके अलावा ये अंदाजा भी गलत निकला कि खामेनेई को मारते ही ईरान का मनोबल टूट जाएगा। आंतरिक विद्रोह की उम्मीद भी ग़लत साबित हुई। इसमें दो राय नहीं हैं कि अमेरिका और इजराइल ने ईरान को बर्बादी के कगार पर खड़ा कर दिया जिससे उबरने में उसे दशकों लग जाएंगे। इस बारे में उसकी तुलना यूक्रेन से करना सही होगा जो रूस के हमलों के कारण मलबे के ढेर में तब्दील हो चुका है। ऐसी ही स्थिति इजराइल ने गाजा की बना दी। बावजूद इसके ईरान यदि मुकाबले में है तब ये मानना पड़ेगा कि अमेरिका और इजराइल से मिलने वाली धमकियों के चलते उसने अपने रक्षा तंत्र के साथ ही आक्रमण क्षमता को काफ़ी विकसित कर लिया था। ऐसा लगता है ईरान लड़ाई को लंबा खींचकर अमेरिका और इजराइल को थका देना चाहता है। वहीं ट्रम्प और इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू की रणनीति ईरान को इतना नुकसान पहुंचाने की है जिससे वह मजबूर होकर घुटने टेके। हालांकि नुकसान इजराइल में भी कम नहीं हुआ लेकिन इस लड़ाई में ज्यादातर मुस्लिम देश उसके साथ होने से वह इस संकट से उबर जाएगा। अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी देश भी उसके नुकसान की भरपाई कर देंगे लेकिन ईरान जिन रूस और चीन के भरोसे अमेरिका जैसी महाशक्ति से टकराने का दुस्साहस कर बैठा वे अब तक मदद हेतु नहीं आए। रूस तो खैर यूक्रेन संकट में फंसा हुआ है किंतु चीन परदे के पीछे रहकर ईरान की कितनी भी मदद करता रहा हो लेकिन सामने आने से बचकर उसने परोक्ष रूप से अमेरिका और इजराइल को ही सहायता दी। इसके पीछे की वजह ये है कि अनेक अरब देशों में इजराइल ने विभिन्न परियोजनाओं में भारी निवेश कर रखा है। यद्यपि ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीददार चीन ही है किंतु वह अपने आर्थिक हितों के प्रति भी सतर्क है। रूस और चीन द्वारा दूर से बैठकर धुआं देखने से ईरान मुसीबत में फंस गया है। इस जंग का परिणाम क्या होगा ये फिलहाल कोई नहीं बता सकता लेकिन इसके जारी रहते पूरी दुनिया ऊर्जा संकट में उलझकर रह गई है और यही वह ब्रह्मास्त्र है जिसका उपयोग कर ईरान  अपनी पराजय को टालना चाह रहा है। कुछ लोगों का मानना है कि अंततः ईरान के मौजूदा नेतृत्व में फूट पड़ जाएगी। फिलहाल  अनिश्चितता की स्थिति है जिसमें दोनों पक्ष एक दूसरे के थकने का इंतजार कर रहे हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 11 March 2026

समान नागरिक संहिता को सर्वोच्च न्यायालय की हरी झंडी


हमारे संविधान में विधायिका (संसद और विधानसभा ) को नया कानून बनाने के साथ ही  प्रचलित कानूनों को संशोधित या समाप्त करने का अधिकार है। लेकिन न्यायपालिका उसे रद्द भी कर सकती है बशर्ते वह संविधान विरुद्ध हो। अतीत में कई बार अधिकार क्षेत्र पर विधायिका और न्यायपालिका में टकराव के चलते एक दूसरे के निर्णयों को रद्द करने का प्रयास भी हुआ किंतु उस  दौरान भी एक दूसरे के सम्मान का ध्यान रखते हुए संयम बरता गया। इसके दो चर्चित उदाहरणों में पहला था जब स्व.राजीव गांधी की सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शाहबानो मामले में तलाकशुदा मुस्लिम महिला को गुजारा भत्ता दिलाये जाने  वाले फैसले को संसद में पलटवा दिया।। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने किसी प्रकार की नाराजगी नहीं जताई। दूसरा प्रकरण है नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति हेतु बनाए न्यायिक नियुक्ति आयोग को  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रद्द कर देना। उक्त प्रस्ताव को लोकसभा ने सर्वसम्मति से पारित किया वहीं राज्यसभा में मात्र राम जेठमलानी अकेले विरोध में रहे। लेकिन सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से टकराने की बजाय उक्त निर्णय को मान्य कर लिया। अक्सर सार्वजनिक मंचों पर सरकार और न्यायपालिका के प्रतिनिधि एक दूसरे की आलोचना करते हैं। लेकिन अब तक दोनों पक्षों ने किसी विवाद को प्रतिष्ठा का विषय बनाकर एक - दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास नहीं किया। बावजूद इसके कि  न्यायाधीशों की नियुक्ति में राजनीति की भूमिका रहने से अनेक ऐसे व्यक्ति भी न्याय की आसंदी पर बैठ जाते हैं जिनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता किसी से छिपी नहीं होती। इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय के अनेक फैसलों को  राजनीति से प्रभावित माना जाता है। ये बात भी सही है कि जिस प्रकार सरकार  जनता की नाराजगी से बचना चाहती है ठीक उसी तरह सर्वोच्च न्यायालय भी  विवादित होने से बचते  हुए गेंद विधायिका के पाले में खिसका देता है। ताजा उदाहरण समान नागरिक संहिता संबंधी उसकी टिप्पणी है।  गत  दिवस मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत महिलाओं के अधिकारों के कथित उल्लंघन सम्बन्धी याचिका पर सुनवाई करते हुए देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की वकालत करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और  आर. महादेवन की पीठ ने विधायिका से पर्सनल लॉ की वजह से पैदा होने वाली जटिलताओं से बचने के लिए काम करने का आह्वान किया। श्री बागची ने कहा कि पर्सनल लॉ को अमान्य घोषित कर एक शून्य की स्थिति पैदा करने से बेहतर  होगा , इसे विधायी विवेक पर छोड़ दिया जाए ताकि वह समान नागरिक संहिता पर कानून बना सके।  मुख्य न्यायाधीश ने भी उनसे  सहमति जताई। न्यायालय ने माना कि समान नागरिक संहिता लागू करने का समय आ गया है, क्योंकि यह लैंगिक समानता और व्यक्तिगत कानूनों की विसंगतियों को दूर करने के लिए सबसे प्रभावी समाधान है। हालांकि, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि शरीयत जैसे संवेदनशील व्यक्तिगत कानूनों में बदलाव करना संसद  का कार्यक्षेत्र है, न कि सीधे अदालत का। इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने संसद को आगे बढ़ने का संकेत दे दिया।  इस समय उत्तराखंड और गोवा में समान नागरिक संहिता है। पूरे देश में इसे लागू करने  पर केवल मुस्लिम समाज ही प्रभावित नहीं होगा अपितु  अनेक जनजातीय समुदायों में प्रचलित व्यवस्थाएं भी बदलेंगी । हालांकि आजादी के बाद से  विभिन्न  समुदायों द्वारा अपनी परम्पराओं और रीति रिवाजों में  समयानुकूल परिवर्तन किए गए हैं। ये बात भी सही है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के कारण ये अल्पसंख्यक समुदाय मुख्य धारा से कटा हुआ है। भारतीय संविधान में सभी  को अपनी धार्मिक आस्थाओं से जुड़ने का अधिकार है। लेकिन कानून की नजर में सभी बराबर हैं। ऐसे में जब कानून से ऊपर शरीयत को मानने जैसी बातें सार्वजनिक रूप से सुनाई देती हैं तब धर्म निरपेक्षता का खोखलापन उजागर हो जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस जो भी कहा उसके बाद अब पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की  पहल केंद्र सरकार को करनी चाहिए। ज़ाहिर है मुस्लिम समुदाय के अलावा मुस्लिम वोट बैंक के सौदागर भी इसका विरोध करेंगे। लेकिन देश की एकता और अखंडता के लिए जरूरी है कि जिस प्रकार दंड विधान संहिता सभी धर्मों के लिए एक समान है वैसे ही एक समान नागरिक कानून भी  होना चाहिए। सभी धर्मों का सम्मान और उनमें आस्था रखने वालों के अधिकार की सुरक्षा जितनी जरूरी है उतना ही महत्वपूर्ण है समाज की एकजुटता जो समान नागरिक संहिता से ही मजबूत होगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 10 March 2026

संकुचित सोच के कारण एक नहीं हो पा रहा विपक्ष


बजट सत्र के पहले चरण में कांग्रेस के नेतृत्व में अनेक विपक्षी दलों ने लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया किंतु तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने उस पर हस्ताक्षर नहीं किए। अब बजट सत्र का दूसरा चरण शुरू होने पर तृणमूल कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध संसद में महाभियोग लाने की घोषणा के साथ ही शर्त रख दी कि वह उक्त अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन तभी करेगी जब बाकी विपक्ष श्री कुमार के विरुद्ध लाए जा रहे महाभियोग पर तृणमूल कांग्रेस का साथ दे। इसके बाद दोनों एक दूसरे का समर्थन करने राजी हो गए। उल्लेखनीय है प.बंगाल में मतदाता सूचियों के एस.आई.आर (विशेष गहन पुनरीक्षण ) के विरोध में ममता बैनर्जी ने आसमान सिर पर उठा रखा है। श्री कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग का दल राज्य के दौरे पर आया तो सुश्री बैनर्जी धरना देकर बैठ गईं। आयोग के लोगों को काले झंडे तक दिखाए गए। हद तो तब हो गई जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के प. बंगाल आगमन पर उनकी अगवानी हेतु न तो ममता खुद उपस्थित रहीं और न ही अपने किसी मंत्री को ही भेजा। जबकि देश के संवैधानिक प्रमुख के स्वागत - सत्कार की बाकायदा नियमावली है। वैसे भी यह पद राजनीति से ऊपर होता है। लेकिन लंबे समय से मुख्यमंत्री पद पर आसीन सुश्री बैनर्जी को चुनाव आयोग द्वारा प. बंगाल में एस. आई.आर की प्रक्रिया में लाखों मतदाताओं के नाम काटने के कारण नींद नहीं आ रही। हालांकि जिन पाँच राज्यों में आगामी कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं उनमें केवल प. बंगाल की मुख्यमंत्री ही मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण पर आंदोलन कर रही हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध महाभियोग लाने जैसी बात केरल और तमिलनाडु के मुख्यमंत्रियों के दिमाग में नहीं आई जबकि वे भी चुनाव आयोग के प्रति अपना विरोध व्यक्त करते रहे हैं । एस. आई.आर के अंतर्गत उक्त राज्यों में भी लाखों नाम मतदाता सूचियों में जोड़े और काटे गए उस पर आपत्तियां भी लगाई गईं किंतु मुख्यमंत्री या कोई मंत्री न तो धरने पर बैठा और न ही सुश्री बैनर्जी की तरह उत्तेजित दिखा। इससे तो यही लगता है प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को अपनी सत्ता खतरे में पड़ती प्रतीत हो रही है। लेकिन ममता ये भूल गईं कि मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण को लेकर बिहार विधानसभा चुनाव के पहले राहुल गांधी ने तेजस्वी यादव के साथ पूरे राज्य में यात्रा निकाली और चुनाव आयोग के विरुद्ध खूब प्रचार भी किया लेकिन जनता ने  उस मुद्दे को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। उल्लेखनीय है बिहार में तो कांग्रेस और राजद द्वारा बनाए गए महागठबंधन में ज्यादातर विपक्षी दल शामिल थे, लेकिन प.बंगाल में ममता बैनर्जी एकला चलो की नीति पर चलते हुए अन्य विपक्षी दलों के साथ सीटों का बंटवारा करने तैयार नहीं होतीं। दिल्ली के  पिछले विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने बजाय कांग्रेस के आम आदमी पार्टी का समर्थन कर इंडिया गठबंधन की एकता को पलीता लगा दिया था। प. बंगाल विधानसभा के आगामी चुनाव में इस बार कांग्रेस भी वाम मोर्चे का साथ छोड़ अकेले लड़ने का निर्णय कर चुकी है। ये सब देखते हुए संसद में लोकसभाध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव  और मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध महाभियोग पर विपक्ष की एकता भी मजबूरी का सौदा बन गई है । हालांकि संसद के दोनों सदनों में एनडीए के पास पर्याप्त बहुमत होने से न तो अविश्वास प्रस्ताव पारित होगा और न ही महाभियोग को मंजूरी मिलेगी। विपक्ष भी ये बात जानता है । दरअसल तृणमूल कांग्रेस द्वारा अविश्वास प्रस्ताव का सशर्त समर्थन करने का दाँव चलने से विपक्षी एकता की पोल खुल गई है। प. बंगाल में तृणमूल, कांग्रेस और वामपंथी जहां अलग - अलग ताल ठोकेंगे वहीं केरल में भी कांग्रेस और वामपंथी एक दूसरे के विरुद्ध तलवार भांजते नजर आएंगे। इन्हीं सब कारणों से विपक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध वैसी मोर्चेबंदी नहीं कर पा रहा जैसी अपेक्षित है। 2024 में लोकसभा चुनाव के पहले बना इंडिया गठबंधन भी लगभग मृतप्राय है। ऐसा नहीं हैं कि भाजपा और केंद्र सरकार के विरुद्ध मुद्दों का अभाव है किंतु संकुचित सोच के चलते विपक्ष में लगातार बिखराव आता जा रहा है जिसका लाभ भाजपा को मिल रहा है।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 9 March 2026

इस जीत ने पूरे देश का हौसला बढ़ाया


कल रात भारत ने लगातार  दूसरी बार टी - 20 क्रिकेट का विश्व कप जीतकर इतिहास रच दिया। तीन बार टी -20 विश्व कप जीतने का कीर्तिमान स्थापित करने वाला भी भारत पहला देश है। विराट कोहली और रोहित शर्मा द्वारा टी - 20 से संन्यास लिए जाने के बाद जब कुछ मैचों में टीम का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा तब आलोचकों ने  चयनकर्ताओं पर निशाने साधते हुए उन दोनों की वापसी का दबाव बनाया। इस विश्व कप में भी भारतीय टीम ने अनेक उतार चढ़ाव देखे। सेमी फाइनल में इंग्लैंड के साथ हुआ मुकाबला श्वास रोधक रहा।  254 रनों का पहाड़ खड़ा करने के बाद लगा भारत आसानी फाइनल में पहुंच जाएगा। लेकिन इंग्लैंड जीत के बिलकुल करीब पहुंचकर महज 7 रन से ही हारा। इसीलिए जब भारत ने 255 रन बनाकर न्यूजीलैंड को 256 रन बनाकर विश्व कप जीतने की चुनौती दी तब  सेमी फाइनल की यादें ताजा हो उठीं। वैसे भी न्यूजीलैंड ने फाइनल का सफ़र अत्यंत कुशलता से पूरा किया था।  इसीलिये मुकाबला रोचक होने की उम्मीद थी। लेकिन सूर्यकुमार यादव की कप्तानी में युवा खिलाड़ियों से भरी  टीम ने पहले बल्लेबाजी और फिर गेंदबाजी में धमाकेदार प्रदर्शन करते हुए अपने घर में टी - 20 विश्व कप जीतने का कीर्तिमान भी बना दिया । भारत की महिला क्रिकेट टीम भी कुछ माह पहले ही विश्व कप जीत चुकी है।  इस प्रकार अब भारत क्रिकेट की दुनिया में उस  बुलंदी पर  है जहां कभी वेस्ट इंडीज और ऑस्ट्रेलिया हुआ करते थे। 1983 में पहला एक दिवसीय क्रिकेट  विश्व कप जीतने के बाद भारतीय क्रिकेट का दबदबा बढ़ना शुरू हुआ। बीच - बीच में उतार चढ़ाव आते रहे किंतु नए खिलाड़ियों का आगमन , बेहतर प्रशिक्षण, अच्छा भुगतान और सुविधाएं मिलने से भी खेल का स्तर ऊंचा होता गया। और जबसे आईपीएल शुरू हुआ तबसे भारत  क्रिकेट की नर्सरी बन गया।न्यूजीलैंड के कप्तान ने ठीक ही कहा कि भारत के पास इतनी युवा प्रतिभाएं हैं कि वह चाहे तो तीन ऐसी ही टीमें बना सकता है। आईपीएल के साथ तमाम विसंगतियां जुड़ी होने के बाद भी  मानना  पड़ेगा कि इसकी वजह से देश में सैकड़ों युवा खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा साबित करने का मौका मिलने लगा वरना वे बिना तराशे हीरे की तरह रह जाते।  इस जीत के बाद भारत  विश्व क्रिकेट का सिरमौर बन गया है। हमारी टीम अब खेलने के लिए ही नहीं बल्कि जीतने के लिए खेलती है। भारत के बिना क्रिकेट के किसी भी बड़े आयोजन का सफल होना असम्भव है। भारत का क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड विश्व का सबसे सम्पन्न खेल संगठन है। आईपीएल ने उसकी संपन्नता और बढ़ा दी। आईसीसी में भी भारत का दबदबा बढ़ा जिसकी अध्यक्षता भी  हमारे पास है।  भारतीय जनता में क्रिकेट के प्रति रुचि जुनून की हद तक  है।  सुखद बात ये भी है कि अन्य खेलों में भी हम धीरे - धीरे आगे आ रहे हैं । ओलंपिक में भले ही पदक तालिका में भारत का स्थान काफी नीचे रहता है लेकिन विभिन्न खेलों में हमारे खिलाड़ी मुकाबले में नजर आने लगे हैं। भारत द्वारा भविष्य में ओलंपिक की मेजबानी करने का दावा प्रस्तुत करने से ये लगता है कि विश्व स्तरीय खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन करने का आत्मविश्वास हमारे यहां उत्पन्न हो चुका है। वैसे अब ये अपेक्षा की जा सकती है कि क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड अपनी तिजोरी से अन्य खेलों के विकास में भी योगदान दे क्योंकि आज की दुनिया में विकास का पैमाना केवल आर्थिक संपन्नता ही नहीं बल्कि खेल भी हो गए हैं। इसका उदाहरण चीन है जिसने बीते दो दशकों में अमेरिका से प्रतिस्पर्धा करने के साथ ही खेलों में भी अपना दबदबा बढ़ाया और ओलंपिक पदक तालिका में दूसरा स्थान हासिल कर दिखाया। उस लिहाज से भारत काफी पीछे है किंतु संतोष की बात है कि ओलंपिक दर ओलंपिक हमारा प्रदर्शन सुधर रहा है । इसका कारण मोदी सरकार का खेलो इंडिया कार्यक्रम भी है। अन्य खेलों के खिलाड़ियों को विश्व स्तरीय प्रशिक्षण और अन्य सुविधाएं दिए जाने से नई पीढ़ी भी खेलों में अपना भविष्य तलाशने लगी है। मध्यम श्रेणी शहरों में भी पेशेवर प्रशिक्षकों के कारण खेलों के प्रति रुचि बढ़ी है। सबसे बड़ी बात ये है कि खेल समाज में स्वस्थ और सकारात्मक वातावरण निर्मित करने का सबसे अच्छा माध्यम है। इससे व्यक्ति में अनुशासन की भावना और संघर्ष की क्षमता  विकसित होती है।  गत दिवस अहमदाबाद में मिली जीत भविष्य में और बड़ी सफलताओं के प्रति खिलाड़ियों में उत्साह का संचार करेगी ये विश्वास और मजबूत हुआ है। 140 करोड़ देशवासियों को गौरव की अनुभूति कराने वाली क्रिकेट टीम का हार्दिक अभिनन्दन।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 7 March 2026

भारत विरोधी होने पर बालेन शाह का हश्र भी माओवादियों जैसा होगा


गत वर्ष नेपाल में युवाओं के अराजक आंदोलन के कारण  चीन समर्थक के. पी. शर्मा ओली सरकार को सत्ता छोड़नी पड़ी। यद्यपि उनको शेख हसीना की तरह देश छोड़कर नहीं जाना पड़ा किंतु अनेक मंत्रियों सहित  पर हुए हमलों से  साबित हो गया कि  सत्ता के प्रति जनता का गुस्सा बेकाबू हो चला था। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के खिलाफ हुए उस आंदोलन का नेतृत्व किसी राजनीतिक दल या नेता के हाथ में न होकर राजधानी काठमांडू के युवा महापौर बालेन शाह के हाथ में था जो निर्दलीय जीतकर आए थे। पेशे से रैपर ( गायक ) इस युवा ने नेपाल के युवाओं को सरकार के विरुद्ध सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित किया। इस काम में सोशल मीडिया उसका प्रमुख अस्त्र था जिस पर प्रतिबंध के बाद वैसे ही हालात बन गए जब 2006 में महाराजा ज्ञानेंद्र को राजगद्दी माओवादियों को सौंपना पड़ गई। उसके बाद से देश राजनीतिक अस्थिरता के भँवर में फंस कर रह गया। माओवादियों में बिखराव से प्रधानमंत्री बदलते रहे लेकिन जनता ने जिन  उम्मीदों के चलते राजतंत्र को हटाया वे पूरी नहीं हुईं । चीन के दबाव  में माओवादी सरकारों ने भारत से रिश्ते बिगाड़ने का क्रम जारी रखा जिसका चरमोत्कर्ष नेपाल द्वारा प्रारंभ सीमा विवाद के  बाद भारत द्वारा आर्थिक नाकेबंदी के रूप में देखने मिला। दुनिया के एकमात्र हिंदू राष्ट्र को माओवादियों ने भले ही धर्मनिरपेक्ष बना दिया किंतु नेपाल में हिंदू धर्म और संस्कृति की जड़ें काफी गहरी हैं। लाखों नेपाली भारत में रोजगार से जुड़े हैं। आर्थिक दृष्टि से भी वह काफी कुछ भारत पर निर्भर है। इसलिये माओवादी चाहकर भी हिंदू धर्म  और संस्कृति को खत्म नहीं कर सके। गत वर्ष हुए युवाओं के आंदोलन के  बाद बालेन शाह महानायक के तौर पर उभरे किंतु  अंतरिम सरकार में  उन्हें महत्व नहीं मिला। दो दिन पहले हुए आम चुनाव में बालेन की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने एक नई राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरकर दशकों पुराने दलों के आधिपत्य को खत्म कर दिया। चीन समर्थक पूर्व प्रधानमंत्री के.पी शर्मा ओली  तक बालेन शाह से चुनाव  हार गए। गगन थापा और माओवादी क्रांति के चेहरे रहे पुष्पदहल कमल को भी  कम सीटें मिलने से सत्ता  बालेन शाह के हाथ जाना तय है। नेपाल में यह एक नए युग की शुरुआत है जहां युवा अपनी राजनीतिक भागीदारी के जरिए शासन में बदलाव लाने में कामयाब हो गए। हाल ही में बांग्लादेश में भी सत्ता तारिक रहमान नामक युवा के हाथ आ गई। लेकिन  फर्क ये है कि तारिक के पिता राष्ट्रपति और माँ प्रधानमंत्री रहीं जबकि बालेन की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं है। वे भारत में इंजीनियरिंग पढने के बाद गायक के रूप में युवाओं में लोकप्रिय हुए। लेकिन चर्चा में तब आए जब काठमांडू के महापौर चुनाव  निर्दलीय लड़कर जीते। उसी के बाद उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा परवान चढ़ीं और देखते ही देखते उन्होंने पहले सत्ता को उखाड़ फेंकने वाले आंदोलन को हवा दी और अब सत्ता के शीर्ष पर विराजमान होने जा रहे हैं। उनके प्रधानमंत्री बनने को लेकर सबसे ज्यादा उत्सुकता भारत में है। उल्लेखनीय है बांग्लादेश के बाद जब नेपाल में युवाओं ने सत्ता को उखाड़ फेंका तब भारत में भी वैसी ही उथल - पुथल की आशंका व्यक्त की जाने लगी किन्तु वह निर्मूल सिद्ध हुई । दरअसल उक्त दोनों सत्ता परिवर्तनों के पीछे अमेरिका की भूमिका मानी जाती है। बांग्लादेश के कार्यकारी शासक बने मो. यूनुस तो  अमेरिका के घोषित पिट्ठू थे। ऐसा ही संदेह बालेन शाह को लेकर भी है।  उन्होंने महापौर बनते ही भारत विरोधी बयान देने शुरू कर दिए और हिन्दी फिल्मों पर भी रोक लगाई ।  साथ ही चीन विरोधी बयान भी दिए। वैसे भी उनका आंदोलन ही चीन समर्थित सरकार के विरुद्ध था। इस सबसे लगता है बालेन की अपनी कोई सोच नहीं है।  अब सवाल ये है कि क्या वे नेपाल को गरीबी , बेरोजगारी , भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं से राहत दिलवा सकेंगे या फिर माओवादियों की तरह से ही सत्ता की चकाचौंध में अपना उद्देश्य और वायदे भूल जाएंगे। बालेन नेपाल को यदि विकास के रास्ते पर ले जाना चाहते हैं तो वह भारत के संरक्षण और सहयोग से ही संभव होगा क्योंकि चीन की रूचि नेपाल की बेहतरी से ज्यादा तिब्बत की तरह उसे हड़पने में है। ऐसे  में उन्होंने भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया अपनाया तब वे भी जल्द ही जनता की नजरों से उतर जाएंगे और उन माओवादी नेताओं की कतार में खड़े दिखेंगे जो भारत का विरोध करते - करते हाशिए पर चले गए।


- रवीन्द्र वाजपेयी