लद्दाख़ के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने एक बार फिर विवादित बयान देकर अपनी अलगाववादी मानसिकता का परिचय दे दिया। लेह में गत वर्ष हुई हिंसा के बाद उन्हें कई महीनों तक जेल में रखा गया था। लेकिन जब उन्हें रिहा किया गया तब ये चर्चा चली थी कि शायद उनका केंद्र सरकार से समझौता हो गया है। स्मरणीय है 2019 में लद्दाख़ को जम्मू कश्मीर से अलग करने के बाद केंद्र शासित क्षेत्र बना दिया गया किंतु जम्मू कश्मीर की तरह उसे विधानसभा नहीं दी गई जिसकी मांग को लेकर लेह में हुए आंदोलन ने उपद्रव का रूप ले लिया था। उस घटना के एक साल पूरा होने पर केंद्र सरकार के खिलाफ तेवर दिखाते हुए वांगचुक ने आरोप लगा दिया कि लद्दाख में भय व दमन का ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जो चीन, तिब्बत में नहीं कर रहा है। इसी के साथ वे यहाँ तक बोल गए कि जब लद्दाख के सामने भारत व चीन के विकल्प थे, तब भारत को इसलिए चुना गया था क्योंकि यहां लोकतांत्रिक व्यवस्था व नागरिकों को गरिमा के साथ रहने का अधिकार मिलने की उम्मीद थी। आज लद्दाख का माहौल चिंता का विषय है। इस बयान के जरिये उन्होंने ये एहसान जताने की कोशिश की मानो लद्दाख यदि भारत में है तो इसका श्रेय उन्हें या वहाँ के कथित नेताओं को है। जबकि हकीकत ये है कि लद्दाख़ सदैव से भारत का हिस्सा रहा । और 1962 में चीन के हमले के समय भारतीय सेनाओं ने अपना बलिदान देकर उसकी रक्षा की, वरना तिब्बत की तरह लद्दाख़ भी चीन के शिकंजे में आ जाता और वांगचुक जैसे लोग जुबान खोलने लायक भी नहीं बचते। इसीलिए उनका ये कहना कि लद्दाख़ में स्थिति तिब्बत से ज्यादा खराब हैं और भारत सरकार चीन से अधिक दमन कर रही है , न केवल सच्चाई से कोसों दूर अपितु घोर आपत्तिजनक भी है। उनके इस बयान पर ऐतराज जताते हुए तिब्बत से पलायन कर भारत में बसे तिब्बतियों के धर्मशाला स्थित तिब्बत सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेशन प्रवक्ता तेंजिन लेक्शे ने गत दिवस जारी बयान में वांगचुक को गलत ठहराते हुए कहा कि तिब्बत में चीन आज भी जोर जबरदस्ती कर रहा है। वहां पर लोगों को मौलिक शिक्षा, धर्म के अधिकार नहीं है। जो लोग लद्दाख़ गए हैं उन्हें कहीं से ये नहीं लगता कि वहाँ के नागरिकों पर किसी बात की पाबंदी है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सीमावर्ती इलाकों में अधो संरंचना के जो काम हुए उनकी वजह से सीमा पार से आने वाले खतरों से निपटने में जहाँ सेना को मजबूती मिली वहीं लद्दाख़ के निवासियों को भी मानसिक सुरक्षा का एहसास हुआ। सेना केवल सीमाओं पर ही चौकसी नहीं रखती बल्कि लद्दाख़ की जनता के स्वास्थ्य और शिक्षा की व्यवस्था भी करती है। ऐसे में वांगचुक द्वारा लद्दाख़ में तिब्बत से भी ज्यादा दमन चक्र चलने जैसी बात कहना कश्मीर घाटी के उन पाक समर्थक अलगाववादियों का समर्थन है जो भारत में रहते हुए भी पाकिस्तान के प्रति वफादारी दिखाने से बाज़ नहीं आते थे। इसीलिए ये कहना गलत नहीं होगा कि वांगचुक भी चीनी एजेंट की तरह बोल रहे हैं। वरना उन जैसे शिक्षित व्यक्ति को ये तो पता ही होगा कि तिब्बत पर जबरन कब्जा करने के बाद चीन की साम्यवादी सरकार ने तिब्बतियों के धर्म और संस्कृति को नष्ट करने के लिए योजनाबद्ध प्रयास किये। तिब्बती लड़कियों की चीनी नस्ल के युवकों से बलात शादियाँ करवाने का अभियान चलाया। हजारों बौद्ध भिक्षुक रहस्यमय तरीके से लापता हो गए। बौद्ध मठों में रखा प्राचीन साहित्य नष्ट कर दिया गया। चीन की मुख्य भूमि से लाये लोगों को बसाकर वहाँ का जनसंख्या संतुलन बिगाड़ने का प्रयास भी हुआ। तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा का नाम तक कोई नहीं ले सकता। चीन ने तिब्बत के चारों तरफ लौह आवरण जैसा बना रखा है। वहाँ विदेशी सैलानी और मीडिया तक को आने नहीं दिया जाता। मानव अधिकार संगठन जैसी संस्थाओं को भी तिब्बती जनता की दयनीय स्थिति देखने नहीं दी जाती। अब इस स्थिति को वांगचुक लद्दाख़ से बेहतर मानते हैं तब ये मान लेना सही होगा कि वे आस्तीन के सांप हैं । उनके भारत विरोधी ताकतों से रिश्तों का संदेह इस बयानबाजी से और पुख्ता हो गया है। दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में वांगचुक द्वारा अनशन पर बैठने की काफी चर्चा हुई। उन्होंने इस पार्टी के विदेशों से सम्बन्धों का जिस प्रकार खंडन किया उससे भी उनके इर्द - गिर्द मंडरा रहा रहस्य और गहरा गया। जब उन्होंने मेदांता अस्पताल में केन्द्रीय मंत्रियों की मौजूदगी में अनशन खत्म किया तब लगा था कि उनके रवैये में कुछ सुधार हुआ किंतु उनके ताजा बयान से उनका असली देश विरोधी चेहरा एक बार फिर उजागर हो गया है। इसके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए वरना लद्दाख़ में भी अलगाववाद की हवा बहने लगेगी जिसका फ़ायदा उठाकर चीन इस इलाके को हड़पने की कोशिश कर सकता है।
- रवीन्द्र वाजपेयी