Thursday, 24 September 2026

ओबीसी को खुश करने के फेर में बाकी जाति समूह नाराज हो सकते हैं राहुल से



म.प्र में ओबीसी आरक्षण का मामला बीते अनेक वर्षों से विवादों में फंसा हुआ है। वर्ष 2019 में तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने ओबीसी जातियों का आरक्षण बढ़ाकर 14 से 27 फीसदी कर दिया था । इसकी वजह से प्रदेश में सभी आरक्षण मिलकर 50 फीसदी की संवैधानिक सीमा से अधिक हो गए। इसके विरुद्ध दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने उस पर रोक लगा दी। 2020 में वह सरकार गिर गई और शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा प्रदेश की सत्ता पर काबिज हो गई। कानूनी रोक के कारण राज्य में  87:13 के  फॉर्मूले के तहत चयन परीक्षाओं के 87% पदों पर परिणाम जारी किए जा रहे हैं और 13% पद रोके (होल्ड) गए हैं। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा जिसने उच्च न्यायालय को नियमित सुनवाई कर इस विवाद का निपटारा करने का निर्देश दिया। लेकिन अभी तक बात कानूनी बहस में ही उलझी हुई है। दरअसल उच्च न्यायालय  में अनु. जनजाति वर्ग की ओर से ये ऐतराज जताया गया कि ओबीसी आरक्षण 14% से बढ़ाकर 27% करने से कुल आरक्षण 73% हो जाएगा। इससे अनारक्षित श्रेणी के साथ-साथ उन अनु. जनजाति उम्मीदवारों के लिए मौके घट जाएंगे जो अपनी योग्यता के आधार पर सामान्य  श्रेणी में चुने जाते हैं। इसके अलावा ये आपत्ति भी है कि बिना पर्याप्त सामाजिक और संख्यात्मक आंकड़ों  के आरक्षण की सीमा में वृद्धि अनुचित  है। स्मरणीय है प्रदेश में अनु. जाति के लिए 16, जनजाति के लिए 20, ओबीसी के लिए 14 और EWS के लिए 10 फीसदी आरक्षण लागू है। ऐसे में ओबीसी आरक्षण 14 से 27 प्रतिशत  होने पर यह सीमा करीब 73 फीसदी हो जाएगी, जिस पर कानूनी और संवैधानिक चुनौतियां चल रही हैं। म. प्र उच्च न्यायालय में इस पूरे मामले पर नियमित सुनवाई में आरक्षित और अनारक्षित दोनों पक्ष अपने तर्क रख रहे हैं। लेकिन इस मामले में अदालत से बाहर भी राजनीतिक दांव - पेच चले जा रहे हैं। कांग्रेस का आरोप है कि उसने ओबीसी को न्याय देते हुए उनके आरक्षण का प्रतिशत 14 से बढ़ाकर 27 किया था किंतु भाजपा ने सत्ता में लौटते ही उसमें रोड़े अटकाते हुए अदालत में फंसा दिया और सुनवाई के दौरान भी जवाब देने में विलंब करते हुए मामले को जबरन खींच रही है। लेकिन प्रदेश सरकार के सामने भी ये समस्या है कि ओबीसी को खुश करने के फेर में अन्य जाति समूह मुँह फुलाकर बैठ जाएंगे। अदालत में तो जो होगा सो होगा किंतु लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र भेजकर  ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के साथ ही जिन 13 फीसदी उम्मीदवारों की नियुक्तियाँ रुकी पड़ी हैं उन्हें तत्काल नियुक्ति पत्र देने की मांग की है। श्री गाँधी को ऐसा करने की सुध शायद न आती यदि इंदौर में छात्रों की गूँज कार्यक्रम के दौरान एक युवती ने ये मुद्दा न छेड़ा होता। इस पत्र के जरिये श्री गाँधी ने प्रदेश के ओबीसी वोट बैंक को अपने पाले में खींचने का पांसा फेंका है जो कि भाजपा का प्रतिबद्ध मतदाता रहा है। भाजपा ने भी इस वर्ग को लुभाने के लिए 2003 से अब तक जिन उमा भारती, बाबूलाल गौर, शिवराज सिंह चौहान और डॉ. मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया, वे सभी ओबीसी हैं। और ये भी कि ओबीसी आरक्षण के विवाद के बावजूद भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में धमाकेदार जीत हासिल करने के बाद लोकसभा की सभी 29 सीटें कब्जा लीं। सवाल ये है कि क्या कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त संवैधानिक पद  पर आसीन श्री गाँधी अदालत में विचाराधीन किसी मामले के बारे में ऐसा पत्र लिख सकते हैं? छात्रों और बेरोजगारों के पक्ष में आवाज उठाना नेता प्रतिपक्ष का कर्तव्य है लेकिन श्री गाँधी चूंकि एक राष्ट्रीय पार्टी के नेता हैं इसलिए उन्हें आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर सोच - समझकर अपनी राय रखनी चाहिए। इस समय देश का जो वातावरण है उसे देखते हुए राजनेताओं को गंभीरता के साथ जिम्मेदारी का भी प्रदर्शन करना चाहिए क्योंकि सूचना क्रांति और सोशल मीडिया के इस दौर में  छोटी सी बात का बतंगड़ बनते देर नहीं लगती। म.प्र के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर श्री गाँधी ओबीसी वर्ग की सहानुभूति भले बटोर लें किंतु अनु. जाति / जनजाति और सवर्ण जातियाँ उनसे नाराज हो जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। दुर्भाग्य से सत्ता की  अंधी दौड़ में सभी राजनीतिक दल कमोबेश देश को जातीय संघर्ष में धकेलने में जुटे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी























 
  
 



    


    




    






Wednesday, 23 September 2026

आई. आई. टी से उठा विवाद खतरनाक मोड़ ले सकता है



दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले हुए आंदोलन के कारण शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को त्यागपत्र देना पड़ा था। केन्द्र सरकार ने शिक्षा क्षेत्र में व्याप्त विसंगतियों को दूर करने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति भी बना दी। उसके बाद वह आंदोलन तो समाप्त हो गया किंतु उसमें मनुवाद को लेकर जो गालीबाजी हुई उसकी प्रतिक्रियास्वरूप जिस आरक्षण विरोधी आंदोलन का सूत्रपात हुआ उसकी चर्चा पूरे देश में है। शिक्षा संस्थानों में कम अंकों के बाद भी आरक्षित श्रेणी के छात्र को प्रवेश दिया जाना और अधिक अंक प्राप्त करने वाले सवर्ण को वंचित किये जाने से छात्र के साथ ही उनके माता - पिता ही नहीं बल्कि समूचे सवर्ण समाज में भारी नाराजगी है। यूजीसी अधिसूचना से भड़का गुस्सा नीट पेपर लीक के बाद और बढ़ गया। आजकल सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफॉर्म पर केन्द्र सरकार के विरोध में जो हवा बह रही है उसके पीछे आरक्षण और अनु. जाति/ जनजाति कानून भी है। कहा जा रहा है कि राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा को अनेक शहरों में मिली कड़ी टक्कर का कारण उसके परंपरागत सवर्ण मतदाताओं का छिटकना रहा जिसके कारण बड़ी संख्या में निर्दलीय जीतने में सफल रहे। हालांकि एक को छोड़कर सभी बड़े शहरों में भाजपा के महापौर बन गए किंतु बहुमत जुटाने के लिए उसे जोड़ - तोड़ का सहारा लेना पड़ा। इसी तरह दिल्ली वि.वि छात्र संघ चुनाव में भाजपा समर्थित अभाविप को तीन पदों पर जीत तो हासिल हो गई किंतु अंतर कम होने के पीछे भी सवर्णों की नाराजगी बताई जा रही है। इसीलिए उ.प्र विधानसभा के आगामी चुनाव भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण माने जा रहे हैं जहाँ ब्राह्मण मतदाताओं की भूमिका निर्णायक हो सकती है। यदि उनमें थोड़े से भी खिसके तब पार्टी के लिए संकट खड़ा हो सकता है। इस बारे में विचारणीय बात ये है कि अनु. जाति/ जनजाति कानून को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सवर्ण विरोधी छवि बनाने की सुनियोजित कोशिश वह वर्ग कर रहा है जो दलित और पिछड़ी जातियों को सवर्णों के विरुद्ध भड़काने में आगे - आगे रहता है। राजनीतिक नेताओं द्वारा फैलाये जा रहे ज़हर के चलते जातिगत भेदभाव विद्वेष से बढ़कर दुश्मनी का रूप ले चुका है। ताजा उदाहरण बॉम्बे आई.आई.टी का है जहाँ एक दलित छात्र द्वारा आत्महत्या किये जाने के बाद पूरा माहौल तनावपूर्ण है। जो जानकारी आई उसके अनुसार एक अध्यापक ने उक्त दलित छात्र को नकल करते पकड़ लिया। उसके बाद उसने छात्रावास के कमरे में जाकर आत्महत्या कर ली। निश्चित रूप से ये अत्यंत दुखद घटना है। छात्र किसी भी जाति का हो उसका इस तरह चला जाना न केवल परिवार अपितु समाज के लिए भी आघात है। हालांकि ये बात भी चिंता के साथ चिंतन योग्य है कि आई. आई. टी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में प्रतिवर्ष दर्जनों छात्र आत्महत्या करते हैं जहाँ कड़ी मेहनत के बाद प्रवेश मिलता है। बॉम्बे आई. आई.टीके जिस छात्र की आत्महत्या का मामला सुर्खियों में है उसके माता - पिता ने उस अध्यापक पर अनु. जाति/जनजाति के तहत प्राथमिकी दर्ज करवाते हुए उसकी गिरफ्तारी की मांग कर डाली। आरोप है कि अध्यापक संस्थान के निदेशक के दबाव में उक्त छात्र को पहले से प्रताड़ित करते आ रहे थे। आत्महत्या करने वाला छात्र चूंकि दलित था इसलिए  राजनीतिक दल रोटी सेंकने सक्रिय हो गए। अध्यापक को फांसी देने तक की मांग उठने लगी। चंद्रशेखर आजाद जैसे दलित सांसद ने भी भड़काऊ बयान दे डाला। इस बीच उक्त अध्यापक को डीन के दायित्व से मुक्त कर दिया जिसके बाद देश भर के आई.आई.टी संस्थानों के ज्यादातर अध्यापक उनके समर्थन में मैदान में आ गए। इस प्रकार पूरे मामले की दिशा ही बदल गई। आत्महत्या प्रकरण की जांच शुरू हो चुकी है। उसके निष्कर्षों के लिए प्रतीक्षा करने के बजाय जिस प्रकार का शक्ति प्रदर्शन चल पड़ा है उसके बाद शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए आरक्षण की व्यवस्था के साथ ही अनु. जाति/जनजाति कानून के औचित्य पर भी सामाजिक स्तर पर बहस होने लगी है। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य शोषित और वंचित वर्ग को मुख्यधारा में लाने के साथ ही उन पर होने वाले अत्याचारों को रोकना है। लेकिन इस बात की समीक्षा नहीं की जाती कि वह उद्देश्य किस हद तक पूरा हुआ ? ये सवाल भी है कि दलितों को  जो कानूनी संरक्षण दिया गया उसके दुरूपयोग को रोकने के लिए क्या कदम उठाये जा रहे हैं ? बॉम्बे आई. आई. टी से उठा विवाद एक छात्र की आत्महत्या और अध्यापक की भूमिका तक सीमित न रहकर राष्ट्रीय स्तर पर समाज को टुकड़ों में बाँटने और आपस में लड़ाने की स्थिति उत्पन्न न कर दे इस बात की चिंता सभी को करना होगी। आरक्षित वर्ग को संरक्षण और सहयोग मिलना ही चाहिए किंतु इसके चलते यदि सामाजिक ढांचा चरमराने लगे तो ये देश के लिए ख़तरनाक होगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 22 September 2026

फूहड़पन का शिकार होकर रह गया इंदौर का आयोजन



गत सप्ताह  इंदौर में कांग्रेस नेता राहुल गाँधी द्वारा आयोजित छात्रों की गूँज में जमा हजारों की भीड़ में वास्तविक छात्र कितने थे इसे लेकर संशय है। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं को छात्र बनाकर भीड़  बटोरी गई। वहीं कांग्रेस का दावा है कि  राहुल के बढ़ते आकर्षण के कारण अपेक्षा से अधिक छात्रों ने  आयोजन  के लिए अपना पंजीयन करवाया था। हालाँकि उक्त आयोजन में छात्रों और युवाओं की संख्या काफी थी। श्री गाँधी उनसे जुड़े मुद्दे उठा भी रहे थे किंतु इसी दौरान एक स्टैंड अप कामेडियन धड़धड़ाते हुए मंच पर आया और  राहुल से लिपटकर अजीब सी हरकतें करने लगा । पहले - पहल तो किसी को कुछ समझ नहीं आया किंतु जब श्री गाँधी ने उसे मोदी जी कहकर संबोधित किया तब  स्पष्ट हुआ कि वह नौटंकी दरअसल प्रधानमंत्री के विदेशी नेताओं से मिलने का मजाक बनाने के लिए की गई। उसी दौरान कामेडियन बार - बार श्री गाँधी से लिपटता रहा और वे भी उसे गले लगाते रहे ।  फिर कामेडियन ने भद्दे अंदाज में माँ को कुर्सी दो जैसी बात दोहराई। स्मरणीय है कुछ समय पहले एक सभा में किसी वृद्ध महिला को खड़ा देख श्री मोदी ने उन्हें कुर्सी देने की बात मंच से कही थी।कामेडियन ने उसी की नकल का भौंड़ा प्रयास किया। और फिर कुछ बड़बड़ाते हुए वह कामेडियन लौट गया। उस फूहड़पन के वीडियो सोशल मीडिया पर आ जाने से छात्रों की गूँज कार्यक्रम की चर्चा तो ठंडी पड़ गई और उस स्तरहीन कामेडी  की गूँज सर्वत्र सुनाई दे रही है। दिल्ली में कांग्रेस के एक बड़े आयोजन में पूर्व सांसद  संदीप दीक्षित ने भी इसी तरह  राहुल से गले मिलकर प्रधानमंत्री की नकल करने का नाटक रचा था जिसकी काफी निंदा हुई। इंदौर में तो उसकी और भी बेहूदे तरीके से पुनरावृत्ति हुई। जिस कामेडियन को छात्रों की गूँज नामक आयोजन में प्रधानमंत्री की नकल करने बुलाया गया वह पूरे समय हें... हें... हें करता रहा। माँ को कुर्सी दो जैसे वाक्य का भी कोई अर्थ उपस्थित श्रोता नहीं समझ सके। वो तो जब राहुल ने उसे मोदी जी कहकर संबोधित किया तब लगा कि पूरी नौटंकी का मकसद क्या था? चूंकि श्री गाँधी भी उस कामेडियन के साथ सह अभिनेता बने रहे इसलिए उस सस्तेपन के लिए वे भी जिम्मेदार माने जा रहे हैं। यदि वे उस व्यक्ति को माँ को कुर्सी दो कहने पर भी रोक देते तब भी नुकसान की कुछ भरपाई हो जाती किंतु ऐसा नहीं हुआ। परिणामस्वरूप जिस उद्देश्य से उतना बड़ा जलसा हुआ वह तो गौण होकर रह गया लेकिन उस  नौटंकी की गूँज सर्वत्र सुनाई दे रही है। कांग्रेस समर्थक लाॅबी ये कहते हुए इसका बचाव कर रही है कि प्रधानमंत्री और भाजपा का प्रचारतंत्र भी तो कांग्रेस नेताओं का मजाक बनाने में नहीं चूकता। लेकिन श्री गाँधी जिस मुद्दे को लेकर इंदौर में छात्रों के बीच गए वह गंभीर और सामयिक था। वे उसके जरिये छात्रों की भावनाओं को समझने और अपनी बात उनसे कहने तक सीमित रहते तब वह आयोजन सार्थक हो जाता। लेकिन ये बात स्पष्ट हो गई कि श्री गाँधी में दो दशक के संसदीय अनुभव के बाद भी अपेक्षित परिपक्वता का अभाव है। इसीलिए उनकी समूची उठापटक का नतीजा निराशाजनक ही रहता है। कांग्रेस इन दिनों  उन्हें प्रधानमंत्री का चेहरा बनाने के लिए पूरे पेशेवर अंदाज में प्रयासरत है। लेकिन श्री गाँधी खुद अपनी छवि खराब कर लेते हैं। कांग्रेस में इमरान प्रतापगढ़ी जैसे युवा शायर हैं जो ऐसे आयोजनों में छात्रों को प्रभावशाली तरीके से आकर्षित कर सकते हैं। लेकिन लगता है श्री गाँधी इस बात से भयभीत रहते हैं कि दूसरा कोई उन पर भारी न पड़ जाए। इसीलिए वे फूहड़पन फैला रहे स्टैंड अप कामेडियन की सेवाएं लेने मजबूर हुए। ऐसा लगता है उनको सही राह दिखाने वाला कोई नेता पार्टी में नहीं है। जो दो - चार वरिष्ट हैं भी तो उनमें इतना साहस नहीं कि वे उनकी गलतियों पर टोक सकें। यह भी संयोग ही रहा कि जब इंदौर के आयोजन में श्री गाँधी की सहभागिता से प्रधानमंत्री का उपहास हो रहा था , उसी समय दिल्ली वि.वि छात्र संघ चुनाव में कांग्रेस के छात्र संगठन एन.एस.यू.आई का सूपड़ा साफ हो रहा था। किसी ने कहा है - आजकल रंगमंच पर अच्छे अभिनेता इसलिए नहीं मिलते क्योंकि राजनीति फूहड़पन को भी श्रेष्ठ अभिनय का पुरस्कार दे देती है। लगता है कांग्रेस में भी आजकल यही हो रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी



Monday, 21 September 2026

दिल्ली वि.वि में विद्यार्थी परिषद की जीत से जेन जी का गुब्बारा फूटा



बीते सप्ताह के अंत में दिल्ली वि.वि छात्र संघ के चुनाव बड़ी राजनीतिक खबर बने। इसलिए नहीं क्योंकि भाजपा समर्थित अ. भा. विद्यार्थी परिषद ने अध्यक्ष, सचिव और सह सचिव पद पर जीत हासिल कर ली बल्कि इसलिए क्योंकि इस बार छात्रों के बीच यूजीसी और नीट परीक्षा पेपर लीक से उत्पन्न नाराजगी के चलते केन्द्र सरकार के विरुद्ध जबरदस्त गुस्सा महसूस किया जा रहा था। दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में जेन जी कहे जाने वाले युवा वर्ग ने जिस प्रकार का रोष व्यक्त किया उसे राजनीतिक पंडितों ने  देश में सत्ता परिवर्तन की शुरुआत मानकर जरूरत से ज्यादा महत्व प्रदान किया। इसी के साथ ही आरक्षण विरोधी मुहिम से सवर्ण जातियों में मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान के प्रति बेरुखी का भाव सतह पर तैरता दिखाई  देने लगा जो कि भाजपा का परंपरागत समर्थक रहा है । ऐसे में ज्यादातर लोग मानकर चल रहे थे कि केन्द्र सरकार के प्रति युवाओं के मन में बढ़ रहे असंतोष का नुकसान दिल्ली वि. वि  चुनाव में विद्यार्थी परिषद को भुगतना पड़ेगा। हालांकि इस बार परिषद ने जिन तीन पदों पर सफलता हासिल की उनमें जीत का अंतर पिछले वर्षों की अपेक्षा काफी कम रहा। उपाध्यक्ष पद पर तो एक निर्दलीय लंबे अंतर से विजयी हुआ । लेकिन इस चुनाव से  विद्यार्थी परिषद की मजबूत पकड़ एक बार फिर साबित हो गई । दूसरी ओर  कांग्रेस की छात्र इकाई एन. एस. यू. आई  अपनी मातृ संस्था की तरह जोश तो खूब दिखाती है लेकिन जीत का हुनर भूल चुकी है। जिसने कमजोर प्रत्याशी उतारकर अपनी हार का रास्ता खोल दिया। उपाध्यक्ष पद पर विजयी छात्र दीपांश शौकीन एन. एस. यू. आई से जुड़ा था और उसका अच्छा खासा प्रभाव भी था किंतु उसे किनारे कर दिया गया।  यदि दीपांश पर एन. एस. यू. आई ने भरोसा जताया होता तब पूरा चुनाव पलट सकता था। कांग्रेस नेतृत्व की अधकचरी सोच का एक प्रमाण ये भी है कि  प्रत्याशी चयन का काम राहुल गाँधी के खासमखास जे.एन.यू के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को सौंपा गया जो कम्युनिस्ट पार्टी छोड़कर कांग्रेस में आये और आते ही श्री गाँधी ने उन्हें अपनी कोर टीम का हिस्सा बना लिया। उन्हें बेशक जे. एन .यू की छात्र राजनीति का जमीनी अनुभव है जहाँ आज भी वामपंथियों का वर्चस्व बना हुआ है लेकिन दिल्ली वि.वि का माहौल अलग हटकर है जहाँ लंबे समय से विद्यार्थी परिषद ने छात्र संघ पर अपना आधिपत्य कायम रखा है। इस चुनाव में समाजवादी विचारधारा के अलावा वामपंथी छात्र संगठनों के उम्मीदवारों ने भी किस्मत आजमाई । सह सचिव पद पर तो समाजवादी उम्मीदवार ने विद्यार्थी परिषद को टक्कर दी जबकि एन. एस. यू. आई तीसरे स्थान पर खिसक गई।  इस चुनाव में वामपंथी संगठनों ने भी कुछ पदों पर हाथ आजमाया किंतु वे भी वोट कटवा की भूमिका से आगे न बढ़ सके। कन्हैया कुमार पूर्व कामरेड होने के नाते यदि वामपंथी उम्मीदवार को एन. एस. यू. आई के पक्ष में बिठा देते तब हो सकता है उसे एक पद तो हासिल हो जाता। लेकिन उन्होंने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया। कांग्रेस का भी पूरा ध्यान म.प्र के इंदौर शहर में राहुल गाँधी के गूँज नामक आयोजन पर लगा रहा। कुल मिलाकर एक अच्छा मौका एन. एस. यू. आई के हाथ से निकल गया। स्मरणीय है हाल ही में चंडीगढ़  स्थित पंजाब वि.वि छात्रसंघ चुनाव में भी विद्यार्थी परिषद ने जीत हासिल की थी। इस आधार पर जेन जी का जो गुब्बारा फुलाया गया था वह पहली ही परीक्षा में फूट गया। हालांकि एक वि.वि के चुनाव से राष्ट्रीय राजनीति की भविष्यवाणी करने पर सवाल उठाये जा  सकते हैं किंतु दिल्ली वि.वि में विभिन्न राज्यों से आये छात्र अध्ययन करते हैं इसलिए यहाँ की राजनीति पर भी राष्ट्रीय सोच का असर दिखता है। कांग्रेस के लिए बुरी खबर इसके पहले राजस्थान से भी आ चुकी थी जहाँ स्थानीय निकाय चुनाव में तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद भाजपा ने ज्यादातर नगर निगमों पर कब्जा कर लिया जबकि प्रदेश की सवर्ण जातियों में आरक्षण को लेकर भाजपा के विरुद्ध नाराजगी खुलकर सामने आ रही थी। लेकिन इसका लाभ निर्दलीयों को मिला । इससे जाहिर हो गया कि भाजपा से नाराज उसका समर्थक वर्ग अभी भी कांग्रेस पर भरोसा नहीं कर पा रहा। दिल्ली वि.वि छात्र संघ के चुनाव परिणाम राहुल गाँधी के लिए भी विचारणीय हैं जो सब काम छोड़कर युवाओं को आकर्षित करने में जुटे हैं। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 19 September 2026

100 फीसदी टैरिफ : ब्रिक्स सम्मेलन की सफलता से बौखलाए ट्रम्प



नई दिल्ली में संपन्न ब्रिक्स सम्मेलन में भारत द्वारा चीन और रूस के साथ जुगलबंदी से भन्नाये अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की खिसियाहट भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने के रूप में सामने आई है। हालांकि ट्रम्प ने भारत पर अभी 100 फीसदी टैरिफ लागू तो नहीं किया किंतु उन्हें एक नए कानून के तहत रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर यह टैरिफ लगाने का अधिकार मिल गया है जिस पर उन्होंने गत दिवस हस्ताक्षर भी कर दिये। सैंक्शनिंग रशिया एक्ट 2026 नामक इस कानून से ट्रम्प को इसे लागू करने की  शक्ति मिल गई है। यद्यपि इसका ये अर्थ निकालना जल्दबाजी होगी कि भारत पर  तुरंत 100% आयात शुल्क  लग गया है। लेकिन राष्ट्रपति ट्रम्प को उक्त कानून बनने से तत्संबंधी अधिकार मिल गया है। दूसरी तरफ भारत ने इस कानून के पारित होने के बाद एक बार फिर साफ कर दिया है कि उसकी प्राथमिकता देश की ऊर्जा सुरक्षा है और वह अपनी जरूरत के हिसाब से जहाँ से चाहे  तेल खरीदता रहेगा। यदि ट्रम्प इस कानून से मिले अधिकार के अंतर्गत  भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने की धमकी को हकीकत में बदल देते हैं तब  हमारे देश से अमेरिका को टैक्सटाइल और ज्वैलरी के निर्यात  पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। लेकिन इनके अतिरिक्त वहाँ बसे भारतीय समुदाय के अलावा दक्षिण एशियाई देशों के अप्रवासी भी दैनिक उपयोग एवं खाने - पीने की जिन भारतीय चीजों का उपयोग करते हैं वे महंगी होने से उनकी मांग पर भी असर पड़ेगा जिससे भारत का व्यापार घाटा बढ़ने का खतरा है।  डोनाल्ड ट्रंप को मिला 100% टैरिफ वाला ब्रह्मास्त्र, भारत पर कितना असर डालेगा ये तो भविष्य ही बताएगा । लेकिन यह भी सच है कि  भारत भी चुप नहीं बैठेगा जिसका संकेत पहले ही विदेश मंत्रालय दे चुका है। ट्रम्प ने टैरिफ नामक आर्थिक हथियार का उपयोग दोबारा सत्ता हासिल करते ही शुरू कर दिया था। उनकी मुख्य खुन्नस भारत से है क्योंकि उसने अमेरिकी प्रतिबंधों की परवाह न करते हुए रूस से न सिर्फ कच्चे तेल की खरीद बड़ी मात्रा में जारी रखी बल्कि भारतीय रिफाइनरियों ने उस कच्चे तेल का शोधन कर उन यूरोपीय देशों को बेचकर  भरपूर धन अर्जित किया जिन्होंने अमेरिकी दबाव में रूस पर व्यापारिक प्रतिबंध लगा दिये थे। भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल को पेट्रोल और डीजल का रूप देकर निर्यात किये जाने से अमेरिका द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों की हवा निकल गई। डोनाल्ड ट्रम्प कई मर्तबा ये आरोप लगा चुके हैं कि भारत के इस कृत्य के चलते ही रूस को जमकर कमाई हुई और वह यूक्रेन युद्ध को इतना लम्बा खींचने में सक्षम हो सका। हालांकि ट्रम्प की नाराजगी चीन से भी है किंतु  उसने रेयर मिनरल की आपूर्ति रोकने की धमकी देकर उनके हौसले ठंडे कर दिये। भारत से ट्रम्प की चिढ़ वैसे तो ऑपरेशन सिंदूर के दौरान बढ़ी जब भारतीय मिसाइलों ने पाकिस्तान के उन महत्वपूर्ण सैनिक ठिकानों के साथ आयुध भंडारों पर कहर बरपाया जिनके बारे में ये आशंका व्यक्त की गई कि अमेरिका ने अपने परमाणु हथियार इन भंडारों में छिपा रखे हैं। और जब युद्ध विराम करवाने के ट्रम्प के दावों को भी भारत ने झुठला दिया तब उनकी त्यौरियाँ और चढ़ गईं। अपना दबदबा दिखाने के लिए उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अनेक मर्तबा अमेरिका आने का संदेश भेजा जिसे प्रधानमंत्री ने महत्व नहीं दिया। लेकिन हालिया ब्रिक्स सम्मेलन में भारत की कूटनीतिक सक्रियता अमेरिका को रास नहीं आ रही। रूस और चीन के राष्ट्रपति क्रमशः पुतिन और जिनपिंग के साथ श्री मोदी की नजदीकी ने ट्रम्प को चिंता में डाल दिया। जिनपिंग ने उक्त सम्मेलन में जिस मज़बूती से पश्चिम के आर्थिक प्रभुत्व को नकारा उसने ट्रम्प का गुस्सा और बढ़ा दिया। इस आग में घी डाला ब्रिक्स देशों द्वारा डॉलर की बादशाहत कम करने के लिए एक - दूसरे की मुद्रा में ज्यादा से ज्यादा लेनदेन करने संबंधी संकल्प पारित कर। ट्रम्प को लगता है इस मुहिम के शिल्पकार नरेंद्र मोदी ही हैं। इसीलिए  ट्रम्प ने ब्रिक्स सम्मेलन खत्म होते ही 100 टैरिफ नामक दबाव का उपयोग किया। लेकिन वे भूल रहे हैं अब तक उनका ये दाँव कारगर नहीं हुआ। भारत, रूस और चीन के अलावा ब्राजील और द. अफ्रीका जैसी बड़ी  अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों ने भी ट्रम्प के टैरिफ आतंक के सामने झुकने से इंकार कर दिया। ईरान के साथ लड़ाई में बुरी तरह फंसे ट्रम्प बदहवासी में और भी ऊटपटांग फैसले ले सकते हैं। लेकिन वे भूल रहे हैं कि उनके ऐसे फैसले अमेरिका की साख और धाक दोनों का सत्यानाश कर रहे हैं और इस निर्णय का भी वही हश्र होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी
 

Friday, 18 September 2026

हम तो डूबे हैं , तुम को भी ले डूबेंगे की नीति पर चल रहा ईरान



इजराइल और हमास के बीच चली जंग का विस्तार अब पूरे अरब जगत  में हो चुका है। इसका प्रथम दृष्ट्या दोषी ईरान को ही माना जाएगा क्योंकि जब उसके ऊपर अमेरिका और इसराइल का हमला हुआ तब पलटवार करते हुए उसने उन खाड़ी देशों पर भी मिसाइलें दागने में लेशमात्र संकोच नहीं किया जिनमें अमेरिकी  सैन्य अड्डे हैं। वहाँ तक भी बात ठीक थी । लेकिन ईरान ने इससे आगे बढ़कर उन देशों के तेल शोधन संयंत्रों पर हमले शुरू कर  दिये। दुबई में तो दुनिया की सबसे ऊँची इमारत सहित होटलों को भी निशाना बनाकर वहाँ आने वाले पर्यटकों के साथ ही उन निवेशकों को भी भयभीत कर दिया जिन्होंने यहाँ अपना काफी पैसा रखा था। इसके अलावा कतर और ओमान जैसे देश भी ईरान के हमलों का शिकार हुए तो दूसरी तरफ से भी जवाबी कारवाई होने लगी। ईरान ने इसराइल  के हवाई सुरक्षा चक्र को तोड़कर अपनी आक्रामक क्षमता का लोहा मनवाया ही किंतु उसके गुस्से का सबसे बड़ा शिकार हुआ सऊदी अरब जो अपनी अपार तेल संपदा के बल पर प. एशिया का सबसे संपन्न और शक्तिशाली मुस्लिम देश माना जाता है। मुसलमानों का सबसे पवित्र स्थल मक्का भी चूंकि सऊदी अरब में स्थित है लिहाजा पूरे विश्व से मुस्लिम तीर्थयात्री हज  करने सऊदी अरब आते हैं। और फिर सऊदी अरब मुस्लिम जगत में अमेरिका का सबसे निकटस्थ देश है। कहा जाता है यहाँ के शाही परिवार ने खरबों डॉलर का निवेश वहाँ कर रखा है। इसीलिए कट्टर मुस्लिम देश होने के बावजूद शाही परिवार और अमेरिका के बीच काफी मजबूत रिश्ते रहे हैं । विशाल तेल भंडारों के साथ ही  तेल शोधन संयंत्रों के चलते सऊदी अरब, तेल  व्यापार में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। दुनिया भर में इस्लाम के प्रचार - प्रसार हेतु इसका शाही परिवार काफी धन उपलब्ध करवाता है। लेकिन ईरान चूंकि इस्लाम के शिया संप्रदाय का पालन करता है इसलिए उसकी सऊदी शाही खानदान से पटती नहीं है। उसे ये भी लग रहा था कि इस लड़ाई में अमेरिका के कूदने में सऊदी अरब का भी हाथ है । इसका खुलासा तब हो गया जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने तमाम खाड़ी देशों से अमेरिकी संरक्षण के एवज में धन की मांग की तब सबसे पहले सऊदी अरब ने ही हाथ बढ़ाया। इसीलिए ईरान उससे बुरी तरह चिढ़ गया और उसके तेल शोधन संयत्रों को चुन - चुनकर निशाना बनाया। इसके बाद उसने होर्मुज नामक जल मार्ग में रोड़ा अटकाकर तेल उत्पादक सभी देशों की आर्थिक  हालत खराब कर दी। इससे बचने के लिए जब सऊदी अरब ने वैकल्पिक समुद्री मार्ग से तेल निर्यात की तैयारी की तो ईरान ने हूती नामक कट्टरपंथी इस्लामिक लड़ाकों को सऊदी अरब पर हमले के लिए उकसा दिया। स्मरणीय है हमास की तरह से हूती भी ईरान पालित इस्लामिक उग्रवादी हथियारबंद संगठन है। बीते कुछ दिनों से हूती लड़ाकों ने सऊदी अरब की जिस तरह घेराबंदी कर रखी है उससे वहाँ दहशत का माहौल है। वहाँ के शाही परिवार ने पाकिस्तान और अमेरिका से मदद की गुहार लगाई किंतु वह भी काम नहीं आई। इसके कारण ईरान का हौसला और बुलंद हो गया। हूती का बढ़ता दबाव इसका प्रमाण है। अमेरिका और इसराइल के साथ जंग में ईराक भी खंडहर हो चुका है। उसकी तेल उत्पादन क्षमता भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसराइल और अमेरिका भले ही ईरान में सत्ता परिवर्तन करवाने में विफल रहे किंतु उन्होंने  उसके अर्थतंत्र को इतना तबाह तो कर ही दिया कि आने वाले कई दशकों तक वह पहले जैसे खड़ा नहीं हो सकेगा। इसीलिए ईरान के मौजूदा हुक्मरान इस पर आमादा हो गए हैं कि तेल उत्पादक बाकी देशों को भी आर्थिक तौर पर कमजोर कर दिया जाए। सऊदी अरब चूंकि सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति है इसलिए ईरान ने हूती लड़ाकों को उसके विरुद्ध उतार दिया। परिणाम स्वरूप दुनिया भर में कच्चा तेल महंगा होने लगा।  ईरान द्वारा हम तो डूबेंगे, तुम को भी ले डूबेंगे वाली रणनीति पर चलने से समूचा अरब जगत तबाही के रास्ते पर बढ़ता लग रहा है। दुनिया में कच्चे तेल और गैस के जो दूसरे उत्पादक देश हैं उनका व्यापार जिस तरह से चमक उठा उससे वैश्विक आर्थिक व्यवहार बदलने की राह पर है। अमेरिका और इसराइल ने जिस तरह ईरान को बर्बादी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया उसी तरह ईरान भी बदले की भावना से बाकी तेल उत्पादक देशों को तबाही की खाई में धकेलने ओर आमादा है। यदि यही चला तो इस आपसी लड़ाई में प. एशिया का कच्चे तेल  रूपी ये हथियार बेअसर होकर रह जाएगा। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 17 September 2026

भारत का बढ़ता सम्मान मोदी की सबसे बड़ी सफलता



राजनीति के अपने रंग - ढंग हैं जिनमें चुनावी जीत ही सब कुछ मानी जाती है। सिद्धांतों के नाम पर ढोंग नेताओं की पहचान और अपना हित साधना आदर्श बन गया है। लोकतंत्र के कंधों पर नये सामंत सवार  हैं। विचारधारा के पोषक  मजाक का पात्र बन रहे हैं। स्वाधीनता के बाद का एक दशक छोड़ दें तो उसके बाद सियासत प्रदूषित होती चली गई । ऐसे में एक शख्स ने  सबका साथ, सबका विकास , सबका विश्वास जैसे संकल्प के साथ बागडोर संभाली और 12 वर्षों में भारत को एक मजबूत आर्थिक और सैन्य शक्ति के तौर पर स्थापित कर दिया। इस व्यक्ति का नाम है नरेंद्र मोदी जिनका आज 76 वां जन्मदिन है। गुजरात के  मुख्यमंत्री के रूप में विकास का पर्याय बनकर प्रभावित करने वाले श्री मोदी को जब भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के चेहरे के तौर पर प्रस्तुत किया तब आम भारतीय के मन में भी उत्साह नजर आया जिसके फलस्वरूप भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला। 12 वर्षों में एक भी छुट्टी नहीं लेने वाले प्रधानमंत्री ने जनता की उम्मीदों  को पूरा करने का अभियान पदभार ग्रहण करते ही प्रारंभ कर दिया था। हालांकि जन कल्याण की योजनाओं में घुसे बिचौलियों और दलालों को हटाने के लिए  जनधन खाते खुलवाये जाने पर  खूब सवाल उठे।  स्वच्छता अभियान और शौचालय जैसे अभियान का भी मजाक उड़ाया गया। उज्ज्वला सहित प्रधानमंत्री आवास योजना की सफलता पर भी संदेह व्यक्त किये गए। लेकिन इनकी वजह से  लोगों के जीवन स्तर में जो  सुधार  आया वह एक तरह की  सामाजिक क्रांति ही है। इसीलिये अगले  लोकसभा चुनाव में श्री मोदी को पहले से अधिक जन समर्थन मिला। यद्यपि उसके बाद के साल बेहद कठिनाइयों से भरे रहे। कोरोना नामक महामारी ने पूरे विश्व को चपेट में ले लिया। लेकिन जब विकसित कहे जाने वाले देश अपने नागरिकों की रक्षा करने में असमर्थ नजर आ रहे थे तब भारत में कोरोना का टीकाकरण अभियान जिस तरह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ उसने देश की आपदा प्रबंधन क्षमता से विश्व को परिचित करवाया। मुसीबत के उस दौर में करोड़ों लोगों को निःशुल्क अनाज  के साथ ही गरीबों के खातों में नगदी राशि ट्रांसफर जैसी व्यवस्थाओं ने देश को अराजकता से बचा लिया। वरना भूख के वशीभूत लोग श्रीलंका और नेपाल जैसे हालात उत्पन्न कर  सकते थे। लॉक डाउन के  दौरान अधो संरचना के बड़े - बड़े काम संचालित कर विकास के पहियों को चलायमान रखने की सोच श्री मोदी की दूरदर्शिता का जीवंत प्रमाण है। विश्व के अनेक छोटे  देशों को भी उपहार में वैक्सीन देने के निर्णय ने उनकी छवि वैश्विक नेता की बना दी। वहीं आपदा में अवसर खोजने की सोच ने देश को दवा उत्पादन में अग्रणी बना दिया। सैन्य सामग्री के मामले में आत्मनिर्भर बनने उठाये गए कदमों का ही सुपरिणाम है कि भारत इस क्षेत्र में निर्यातक के तौर पर उभर सका। 2024 में भले ही उन्हें स्पष्ट बहुमत न मिला हो किंतु जन भावनाओं के अनुरूप वे तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। उनकी विशेषता ये है कि सत्ता में आने के बाद भी वे सैद्धांतिक प्रतिबद्धता नहीं भूले । राम मंदिर, तीन तलाक़, धारा 370 , वक्फ संशोधन , और शिक्षा नीति के बारे में लिए  फैसले उनकी दृढ़ता का प्रमाण हैं। एक देश एक चुनाव और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों पर भी सरकार आगे बढ़ रही है। उत्तर पूर्वी राज्यों में विकास की गंगा बहाने से वे मुख्य धारा से जुड़ने लगे हैं। कश्मीर घाटी में श्रीनगर तक भी रेल पहुँच गई है। सुरक्षा व्यवस्था की मजबूती बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पूरी दुनिया ने देखी। नक्सली आतंक की समाप्ति और कश्मीर सहित देश के अनेक हिस्सों में देश विरोधी तत्वों की कमर तोड़ना मोदी सरकार की बड़ी कामयाबी है। आज का भारत विश्व की बड़ी अर्थव्यस्थाओं को टक्कर देने में समर्थ है। अमेरिका द्वारा थोपे गए टैरिफ का जिस मजबूती से जवाब दिया गया वह प्रधानमंत्री के कूटनीतिक कौशल को दर्शाता है। उनके कार्यकाल में देश ने जो अर्जित किया उसकी सूची बहुत लंबी है। कुछ विफलताएं भी इस दौरान देखने मिलीं किंतु ये कहना गलत नहीं है कि श्री मोदी ने हर भारतीय में अभूतपूर्व आत्मविश्वास भर दिया। दुनिया में आज भारत की जो धाक है उसमें उनके योगदान को नकारना असंभव है। हाल ही में संपन्न ब्रिक्स सम्मेलन इसका जीवंत प्रमाण है। हालांकि आज भी गरीबी और बेरोजगारी जैसी समस्याएं हैं और देश के अनेक इलाके पिछड़ेपन का शिकार हैं। लेकिन प्रधानमंत्री  जिस ईमानदारी और समर्पण भाव से जुटे हुए हैं उससे लगता है सबका विकास रूपी  नारा हकीकत में बदलकर रहेगा। 76 साल की उम्र में उनमें किसी युवक से ज्यादा ऊर्जा है । उनके नेतृत्व में भाजपा का जो विस्तार हुआ वह बड़ी उपलब्धि है। बिहार और प.बंगाल इसके उदाहरण हैं। वे दीर्घायु हों और देश को विकास के उच्चतम शिखर तक ले जाएं यही मंगलकामना है।

- रवीन्द्र वाजपेयी