पूरी दुनिया ने ये जानकर राहत की सांस ली कि ईरान और अमेरिका 15 दिनों के लिए युद्धविराम हेतु राजी हो गए। डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ईरान को मिटाने की जो धमकी दी गई थी उसके कारण बड़े अनिष्ट की आशंका थी। यदि वह सच हो जाती तो ईरान और मध्यपूर्व सहित समूची दुनिया के लिए एक दर्दनाक अनुभव होता। इस जंग में विजेता होकर निकलने के डोनाल्ड ट्रम्प के पास एक ही विकल्प था कि वे परमाणु बम जैसा कोई कदम उठा लें। हालांकि युद्ध ने जो नया रूप ले लिया है उसे देखते हुए अमेरिका परमाणु हथियारों के अलावा भी ऐसा कुछ कर सकता था जिससे ईरान संपूर्ण विनाश का शिकार हो जाए। पुलों और बिजली संयंत्रों को नष्ट करने की जो धमकी ट्रम्प ने दी उसके बाद उसके सामने भी अन्य कोई रास्ता नहीं बचा। कल तक वह किसी भी स्थिति में होर्मुज खोलने सहमत नहीं हो रहा था लेकिन अचानक रजामंद होना साधारण नहीं है। इसके पीछे महाशक्तियों के निजी स्वार्थ हैं। कल ही सं.रा.संघ सुरक्षा परिषद में होर्मुज संबंधी प्रस्ताव पर चीन और रूस ने वीटो लगाकर ईरान की जबरदस्त सहायता की थी। लेकिन ट्रम्प द्वारा दी गई समय सीमा के पहले ही एक पखवाड़े तक युद्ध रोकने की घोषणा ईरान और अमेरिका ने कर दी। इसका श्रेय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिफ मुनीर को दिया जा रहा है। स्मरणीय है कुछ दिन पूर्व पाकिस्तान , टर्की और मिस्र के नेताओं की बैठक इस्लामाबाद में हुई थी जिसमें युद्ध रोकने पर विचार हुआ। लेकिन ईरान ने उसे कोई महत्व नहीं दिया और इतनी कड़ी शर्तें रख दीं जिन्हें मानना दूसरे पक्ष के लिए संभव नहीं था। ऐसे में इस युद्धविराम और उसमें पाकिस्तान की भूमिका पर आश्चर्य स्वाभाविक है। दरअसल इस पूरे खेल में चीन की भूमिका है जिसने पर्दे के पीछे रहते हुए ईरान को राजी किया। अब सवाल ये है कि जो ईरान जिद करता था कि युद्धविराम तभी स्वीकार करेगा जब उस पर दोबारा हमले न होने की गारंटी दी जाए, युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई के साथ ही होर्मुज से निकलने वाले जहाजों से टोल टैक्स वसूलने का अधिकार मिले। इसके अलावा वह अपने परमाणु कार्यक्रम को बेरोकटोक जारी रखने का आश्वासन चाहता था। आज हुए युद्धविराम में उसे ऐसा कोई वायदा नहीं किया गया जिससे ये साफ है कि कहीं न कहीं उसकी नस दबी थी जिसके कारण वह लड़ाई रोकने तैयार हो गया। चौंकाने वाली बात ये है कि आगे की वार्ता इस्लामाबाद में होना तय किया गया है। लेकिन इज़राइल इसके लिए सहमत नहीं होगा । और उसकी गैर मौजूदगी में हुए किसी भी समझौते को नेतन्याहू स्वीकार करेंगे इसमें संदेह है । उल्लेखनीय है ईरान , इजराइल के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता। इसलिए ये युद्धविराम फिल्म के मध्यांतर से ज्यादा कुछ भी नहीं । असल में वेनेजुएला पर अमेरिकी आधिपत्य के बाद से चीन की तेल आपूर्ति अवरुद्ध हो चली थी। ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमलों ने उसके सामने दूबरे में दो आषाढ़ वाली स्थिति बना दी। इसलिए उसने पहले सुरक्षा परिषद में ईरान का समर्थन किया वहीं अगली सुबह उसे मजबूर कर दिया कि वह होर्मुज को खोल दे। भारत में एक वर्ग इसे मोदी सरकार की विदेश नीति की असफलता बता रहा है क्योंकि युद्धविराम का श्रेय पाकिस्तान लूट ले गया किंतु उनकी सोच गलत है क्योंकि ईरान और अमेरिका के बीच में मध्यस्थता करना भारत के दूरगामी हितों के लिए नुकसानदेह होता। इस समय भारत के इजराइल के अलावा सऊदी अरब, यू.ए.ई, बहरीन , कतर और ओमान जैसे देशों के साथ अच्छे रिश्ते हैं। तटस्थ रहकर हमने ईरान का भरोसा भी जीता जिसका प्रमाण होर्मुज से भारतीय टैंकरों के सुरक्षित निकलने से मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री जयशंकर भी युद्ध में शामिल सभी पक्षों से संपर्क में रहे। वैसे भी इस युद्धविराम से खास उम्मीद लगाना बेकार है क्योंकि न तो ईरान हमास , हिजबुल्ला और हूती जैसे आतंकवादी संगठनों को पालना बंद कर इजराइल के अस्तित्व को स्वीकार करेगा और न ही अपने परमाणु कार्यक्रम को बंद करेगा। सऊदी अरब , यू.ए.ई और बहरीन भी ईरान की कमर तोड़ने का दबाव अमेरिका पर डाल रहे हैं। ये सोचना भी गलत है कि अमेरिका इस जंग से निकलना चाह रहा है। दरअसल वह नए सिरे से तैयारी करने के लिए मोहलत चाहता था जो युद्धविराम ने उसे दे दी। वैसे भी इजराइल द्वारा लेबनान में हमले जारी रखने की घोषणा से युद्धविराम की सफलता संदिग्ध हो गई है। सही बात ये है कि ईरान की लड़ने की क्षमता रोज घट रही थी। युद्धविराम के दौरान तेल बेचकर धन बटोरने के साथ ही वह रूस और चीन से अस्त्र - शस्त्र खरीदकर अगले चरण की लड़ाई के लिए खुद को सक्षम बनाना चाह रहा है।
- रवीन्द्र वाजपेयी