Wednesday, 30 September 2026

भाजपा में पीढ़ी परिवर्तन उसकी सेहत के लिए अच्छा



नितिन नबीन जब भाजपा के  अध्यक्ष बने तब पार्टी के कार्यकर्ता और नेता तक भौचक रह गए। हालांकि वे  भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय महासचिव रह चुके थे किंतु उस दौरान भी उनका नाम बिहार के अलावा अन्य राज्यों के भाजपाईयों ने भी नहीं सुना होगा। यद्यपि वे अपने पिता की सीट बांकीपुर से चार बार विधायक रहे और  प्रदेश सरकार में मंत्री भी। उनके राजनीतिक कौशल ने पार्टी नेतृत्व को तब प्रभावित किया जब छत्तीसगढ़ के पिछले विधानसभा चुनाव में उनके चुनाव प्रभारी रहते पार्टी को बड़ी विजय मिली। उनको राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाये जाने पर ये चर्चा भी चली कि  प. बंगाल के विधानसभा चुनाव में कायस्थ मतदाताओं को लुभाने के लिए भाजपा ने उनकी ताजपोशी की। वैसे उनके गृहराज्य बिहार में भी कायस्थों की बड़ी संख्या तथा राजनीतिक  प्रभाव रहा है।  नितिन के चयन का आधार बनी उनकी 46 वर्ष की आयु भी बनी।  हालांकि राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद खाली की गई उनकी बांकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव में जनसुराज पार्टी के प्रशांत किशोर की बड़ी जीत से उनकी किरकिरी भी हुई। लेकिन उसके बाद से वे लगातार  दौरा करते हुए पार्टी कैडर में अपनी पहिचान बनाने में जुटे हुए हैं। दिल्ली वि.वि छात्रसंघ चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को मिली सफलता से ये संकेत मिला कि युवाओं के बीच बढ़ते असंतोष के बावजूद भाजपा का वैचारिक आधार  बरकरार है। दरअसल पिछले कुछ महीनों के घटनाक्रम से भाजपा के माथे पर पसीना छलकने लगा था । दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले हुए आंदोलन के जरिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की युवा विरोधी छवि बनाने का जो प्रयास हुआ उससे भाजपा के साथ ही रा. स्व. संघ भी चिंतित हो उठा। इसीलिए प्रधानमंत्री और संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत के युवाओं से प्रत्यक्ष संवाद के कार्यक्रम आयोजित हुए। निकट भविष्य में होने वाले चुनावों में युवाओं  को अपने पाले में खींचने सभी दल प्रयासरत हैं। भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने और बनाये रखने में युवाओं का बड़ा योगदान है। लेकिन पार्टी और संघ दोनों को ये एहसास हो चला है कि जो नया मतदाता पहली बार मतदान करेगा उसके साथ सामंजस्य बिठाने में बुजुर्ग या अधेड़ नेता  कामयाब नहीं हो सकेंगे। इसीलिए पार्टी  अब संगठन और सत्ता में अपेक्षाकृत युवा चेहरों को आगे लाने की तैयारी में है। विभिन्न राज्यों में कम आयु वर्ग के मुख्यमंत्री बनाये जाने से इसके संकेत मिलने लगे थे। नितिन नबीन को पार्टी अध्यक्ष बनाकर उस प्रक्रिया को और आगे बढ़ाया गया। उनकी कार्यकारिणी में भी युवा चेहरों को काफी महत्व मिला ।  यदि यूजीसी और नीट पेपर लीक जैसी समस्याएं न आई होतीं तब शायद श्री मोदी अपने मंत्रीमंडल में भी फेरबदल करते हुए ऐसे युवा सांसदों को शामिल कर चुके होते जो छवि और क्षमता दोनों कसौटियों पर खरे उतरे हैं। ताजा खबर के अनुसार पार्टी संगठन में सबसे ताकतवर माने जाने वाले संसदीय बोर्ड से भी अति बुजुर्गों की जगह नये सदस्यों को शामिल किये जाने साथ ही केंद्रीय मंत्रीमंडल का भी पुनर्गठन भी जल्द होगा। हालांकि कुछ वरिष्ट मंत्रियों को तो नहीं छेड़ा जा सकता अन्यथा उंगलियां प्रधानमंत्री पर भी उठेंगी । लेकिन उन मंत्रियों की छुट्टी की जाएगी जिनका प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा। उल्लेखनीय है प्रधानमंत्री ने हाल ही में मंत्रियों के कार्यों की समीक्षा की थी। सही बात ये है कि किसी भी पार्टी को अपना जनाधार बनाये रखना है तो उसे नये नेतृत्व का सृजन करते रहना चाहिए क्योंकि  जो नये मतदाता पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं वे नई सोच रखते हैं। जिस तरह टीम का कप्तान वरिष्ट होने पर भी तभी सफल हो पाता है जब उसके पास कुछ युवा खिलाड़ी भी हों जिनमें जीत के प्रति जुनून हो। इसी तरह प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की लोकप्रियता के बाद भी सरकार की छवि मंत्रियों के किया - कलापों पर निर्भर होती है। धर्मेंद्र प्रधान इसके सबसे ताजा उदाहरण हैं। शिक्षा मंत्री रहते हुए वे अपने विभाग को ठीक से संभाल नहीं सके जिसकी वजह से पार्टी और प्रधानमंत्री दोनों के सामने, छवि का संकट उत्पन्न हो गया। इसीलिए श्री प्रधान को कुर्सी छोड़ना पड़ी । भाजपा के लिए ये अच्छा है कि वह छोटे - छोटे झटकों से संभल गई जबकि बाकी पार्टियां इसकी हिम्मत नहीं जुटा पाने के कारण कमजोर होती जा रही हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 29 September 2026

वोट चोरी तो बहाना है असली मकसद परिसीमन रुकवाना है




नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने 12 वर्ष से ज्यादा हो गए। ऐसा नहीं है कि इस दौरान वे कभी दबाव में न आये हों। भूमि अधिगृहण और कृषि कानून उन्हें वापिस लेने पड़े। शिवसेना और अकाली दल जैसे  पुराने साथियों से अलगाव हुआ। देश  ही नहीं विदेश में हुए घोटालों को लेकर उनकी घेराबंदी करने की हरसंभव कोशिश हुई किंतु  उनके दबदबे और लोकप्रियता में कमी नहीं आई। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में बहुमत से दूर रह जाने की वजह ने उन्हें चंद्रबाबू नायडू व नीतीश कुमार का सहारा लेना पड़ गया। उसके बाद ये आशंका व्यक्त की जाने लगी कि ये सरकार इस बार कार्यकाल पूरा नहीं कर सकेगी। यद्यपि प्रधानमंत्री ने सरकार को अस्थिरता से बचाये रखा है और आगे भी उसकी कोई संभावना नज़र नहीं आ रही। लेकिन ये बात स्वीकार करनी होगी कि बीते दो वर्षों  में विपक्ष ने संसद और उसके बाहर आक्रामक अंदाज दिखाते हुए सरकार विशेष तौर पर श्री मोदी  को घेरने के लिए काफी व्यूह रचना की। भले ही वह पूरी तरह से सफल नहीं हो सका किंतु पहली बार ऐसा लगा  कि सरकार और प्रधानमंत्री रक्षात्मक हैं। हालांकि इसके लिए केवल विपक्ष को श्रेय नहीं दिया जा सकता क्योंकि सरकार को परेशानी में डालने के उसके प्रयासों से ज्यादा प्रभावशाली तो युवाओं और छात्रों से जुड़े मुद्दे रहे। सरकार के लिए चौंकाने वाली बात ये रही कि विपक्ष के धारधार हमलों को तो वह झेल गई किंतु पिछले कुछ महीनों में कुछ ऐसे मुद्दे उठे जिनके पीछे राजनीतिक दल तो उतने नहीं खड़े हुए लेकिन युवाओं और छात्रों के गुस्से ने सरकार को पिछले पाँवों पर धकेल दिया। सबसे पहले  यूजीसी अधिसूचना को लेकर युवाओं के एक बड़े वर्ग में गुस्सा फूटा। सवर्ण समुदाय में इसे लेकर जबरदस्त आक्रोश देखा गया । हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने उस अधिसूचना पर रोक लगा रखी है किंतु  उस मूर्खतापूर्ण कदम से समाज का  वह वर्ग भी अपनी नाराजगी जाहिर करने में पीछे नहीं रहा जो श्री मोदी का परंपरागत समर्थक रहा है ।  चूंकि ये विवाद आरक्षित जातियों से जुड़ा था लिहाजा विपक्षी दल तटस्थ रहते हुए दूर से तमाशा देखते रहे। लेकिन इसके बाद नीट परीक्षा पेपर लीक हो जाने के कारण सरकार के ऊपर जो संकट आया उसने ज्यादा परेशानी खड़ी कर दी।  शुरुआत में भले ही विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोला हो किंतु काॅकरोच जनता पार्टी बीच में कूदकर युवाओं और छात्रों की रहनुमा बन गई। वैसे तो जंतर मंतर पर हुआ धरना, प्रदर्शन, अनशन, संसद मार्च, अश्लील नारेबाजी पूरी तरह वामपंथियों का प्रायोजित कार्यक्रम था किंतु पेपर लीक के बाद कुछ छात्रों द्वारा आत्महत्या किये जाने से ज्यादातर  छात्रों के मन में शिक्षा मंत्रालय के विरुद्ध आक्रोश था। यदि तब के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पेपर लीक होते ही नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए कुर्सी छोड़ दी होती तब सरकार को इतनी शर्मिंदगी नहीं  उठानी पड़ती किंतु एक बात  उसे राहत देने वाली रही कि मुख्य विपक्ष चाहकर भी उसका श्रेय न ले सका। जंतर मंतर आंदोलन के खाते में तो एक मंत्री की कुर्सी छीन लेने जैसी उपलब्धि दर्ज हो गई किंतु लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी आंदोलनकारियों की पिटाई को लेकर गृहमंत्री अमित शाह के त्यागपत्र के लिए पूरी ताकत लगाने के बाद भी नाकामयाब रहे। इस बीच राम मंदिर चंदा घोटला जैसा बड़ा मुद्दा भी सरकार के लिए सिरदर्द बना परंतु जंतर मंतर आंदोलन के शोर में वह  दबकर रह गया। फिलहाल राहुल एक बार फिर वोट चोरी के नाम पर मुख्य चुनाव आयुक्त  ज्ञानेश कुमार  के बहाने सरकार की घेराबंदी करना चाह रहे हैं । संसद के अगले सत्र में उनके विरुद्ध महाभियोग लाने की बात भी कही जा रही है किंतु जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार वोट चोरी और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग महज दिखावा है। विपक्ष जानता है कि एस.आई.आर की प्रक्रिया रुकने से रही। लेकिन इस होहल्ले के जरिये वह सरकार द्वारा लाये जाने वाले परिसीमन विधेयक को किसी भी कीमत पर रोकना चाहता है। संसद के मानसून सत्र में हुए हंगामे के पीछे भी यही रणनीति थी। चूंकि सरकार इसके लिए विशेष सत्र बुलाने की तैयारी में है इसलिए श्री गाँधी बाकी सब मुद्दों को भुलाकर वोट चोरी का राग फिर अलापने लगे। देखना ये है कि वे कितने सफल होते हैं क्योंकि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री भी ये चाहेंगे कि बजाय दूसरे मामलों में ताकत खर्च करने के परिसीमन विधेयक पारित करवा लें जिसे वे 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए ब्रह्मास्त्र मानकर चल रहे हैं। 



- रवीन्द्र वाजपेयी




Monday, 28 September 2026

इंडिया ब्लॉक की बैठक में विपक्षी एकता का खुलासा हो जाएगा



आगामी 30 सितंबर को नई दिल्ली में होने जा रही  इंडिया ब्लॉक की  बैठक पर विश्लेषकों की नजर है। इसका उद्देश्य वैसे तो मुख्य चुनाव आयुक्त  ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों की संयुक्त रणनीति बनाकर उन पर त्यागपत्र देने का दबाव बनाना है।साथ ही संसद के अगले सत्र में उनके विरुद्ध महाभियोग लाने  पर भी विचार  होगा। हालांकि इसके पहले भी उनके विरोध में  मोर्चा खोला जा चुका है किंतु कामयाबी नहीं मिली। स्मरणीय है मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण  की प्रक्रिया जब बिहार विधानसभा चुनाव के पहले शुरू हुई तब  सर्वोच्च न्यायालय तक विवाद पहुंचा किंतु उसने कुछ शर्तों के साथ उसे जारी रखने की अनुमति दे दी। जिससे उत्साहित होकर चुनाव आयोग ने अनेक राज्यों में उसको शुरू कर दिया।  धीरे- धीरे इस की चर्चा अदालती कार्यवाही की खबरों तक सिमटकर रह गई। लेकिन हाल ही में एक अखबार द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त के अन्य  दो आयुक्तों के साथ मतभेद की  खबर प्रकाशित किये जाने से ये मुद्दा गरमा गया जिसे लपकते हुए विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त से त्यागपत्र देने की मांग कर डाली। राहुल गाँधी ने तो दिल्ली की पत्रकार वार्ता में ज्ञानेश कुमार को देशद्रोही तक कह डाला। साथ ही 2024 में चुनी गई लोकसभा की वैधता पर सवाल उठाते हुए यहाँ तक कह दिया कि उसके द्वारा बनाये गए कानून भी रद्द करने योग्य हैं। कांग्रेस ने उक्त खबर प्रकाशित होने के बाद देश भर में प्रदर्शन भी किये किंतु अन्य विपक्षी पार्टियों द्वारा किया गया विरोध  जुबानी ज्यादा रहा इसलिए  इंडिया ब्लॉक की बैठक बुलाने का फैसला हुआ ताकि  ये लगे कि ये मुख्य चुनाव आयुक्त का विरोध समूचे विपक्ष की आवाज है।  इस बैठक में कौन - कौन से दल शामिल होंगे इस पर सभी की निगाह लगी हैं।  ये भी  महत्वपूर्ण होगा कि शीर्ष नेता इसमें उपस्थित होंगे या अपना प्रतिनिधि भेजकर औपचारिकता का निर्वहन करेंगे। सच ये है कि लोकसभा चुनाव के बाद से इस गठबंधन में बिखराव आने से कोई संगठनात्मक स्वरूप ही सामने नहीं आ सका । बीते दो -  ढाई सालों में जितने भी विधानसभा चुनाव हुए उनमें कई राज्यों में  इंडिया ब्लॉक से जुड़े दल ही आपस में भिड़ गए। हरियाणा, दिल्ली, बिहार, प. बंगाल और केरल इसके उदाहरण हैं। उ.प्र , पंजाब और हिमाचल प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव की तैयारियां होने लगी हैं। लेकिन अभी तक विपक्षी एकता की कोई संभावना नजर नहीं आ रही। उ.प्र में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ गठजोड़ का इंतजार किये बिना रथयात्रा शुरू कर दी। और तो और वे श्री गाँधी के निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली तक जा पहुंचे जिस पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने तीखी प्रतिक्रिया दी। इसी तरह पंजाब में भी आम आदमी पार्टी का कांग्रेस से टकराव है। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण का विरोध तो कमोबेश सभी विपक्षी दल कर रहे हैं किंतु राहुल गाँधी के इंडिया ब्लॉक की  बैठक में  छाए रहने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता। और यही सबसे बड़ा पेच है क्योंकि अखिलेश यादव श्री गाँधी को महत्व देकर अपनी चमक कम नहीं करना चाहेंगे। स्मरणीय है उ.प्र में कांग्रेस विधानसभा की 200 सीटें मांग रही है परंतु अखिलेश 100 के लिए भी राजी नहीं हैं। ऐसी ही स्थिति श्री केजरीवाल की है जो पंजाब में कांग्रेस को किसी भी प्रकार की रियायत देने राजी नहीं हैं। अखिलेश को ये भी लग रहा है कि ज्ञानेश कुमार के विरोध में उनका समय बर्बाद होगा जिसका असर  चुनावी तैयारियों पर पड़ सकता है। दरअसल वे बिहार चुनाव में  वोट चोरी के विरोध में  निकाली गई यात्रा के दुष्परिणाम को भूले नहीं हैं जिसमें श्री गाँधी ने तेजस्वी यादव को भी साथ रखा। वह यात्रा पूरी तरह बेअसर रही। नतीजों के बाद ये बात काफी उछली कि यदि तेजस्वी उस यात्रा से दूर रहते तब शायद वे बेहतर तरीके से चुनाव प्रचार कर पाते। ये सब देखते हुए 30 सितंबर की बैठक में  इंडिया ब्लॉक की एकता का खुलासा हो जाएगा। रही बात मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध मोर्चा खोलने की तो भले ही राहुल इस पर कितना भी हल्ला मचा लें किंतु अब तक के अनुभव बताते हैं कि आम जनता को इसमें कोई रुचि नहीं है बजाय उन लोगों को छोड़कर जिनके नाम मतदाता सूची से कट गए हों। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 26 September 2026

लद्दाख़ में अलगाववाद की जड़ें जमाने का षडयंत्र रच रहे वांगचुक



लद्दाख़ के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने एक बार फिर विवादित बयान देकर अपनी अलगाववादी मानसिकता का परिचय दे दिया। लेह में गत वर्ष हुई हिंसा के बाद उन्हें कई महीनों तक जेल में रखा गया था। लेकिन जब उन्हें रिहा किया गया तब ये चर्चा चली थी कि शायद उनका केंद्र सरकार से समझौता हो गया है। स्मरणीय है 2019 में लद्दाख़ को जम्मू कश्मीर से अलग करने के बाद केंद्र शासित क्षेत्र बना दिया गया किंतु जम्मू कश्मीर  की तरह उसे विधानसभा नहीं दी गई जिसकी मांग को लेकर लेह में हुए आंदोलन ने उपद्रव का रूप ले लिया था। उस घटना के एक साल पूरा होने पर  केंद्र सरकार के खिलाफ तेवर दिखाते हुए वांगचुक ने आरोप लगा दिया कि  लद्दाख में भय व दमन का ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जो चीन, तिब्बत में नहीं कर रहा है। इसी के साथ वे यहाँ तक बोल गए कि जब लद्दाख के सामने भारत व चीन के विकल्प थे, तब भारत को इसलिए चुना गया था क्योंकि यहां लोकतांत्रिक व्यवस्था व नागरिकों को गरिमा के साथ रहने का अधिकार मिलने की उम्मीद थी। आज लद्दाख का माहौल चिंता का विषय है। इस बयान के जरिये उन्होंने  ये एहसान जताने की कोशिश की मानो लद्दाख यदि भारत में है तो इसका श्रेय उन्हें या वहाँ के कथित नेताओं को है। जबकि हकीकत ये है कि लद्दाख़ सदैव से भारत का हिस्सा रहा । और 1962 में चीन के हमले के समय भारतीय सेनाओं ने अपना बलिदान देकर उसकी रक्षा की, वरना तिब्बत की तरह लद्दाख़ भी चीन के शिकंजे में आ जाता और वांगचुक जैसे लोग जुबान खोलने लायक भी नहीं बचते। इसीलिए उनका ये कहना कि लद्दाख़ में स्थिति तिब्बत से ज्यादा खराब हैं और भारत सरकार चीन से अधिक दमन कर रही है , न केवल सच्चाई से कोसों दूर अपितु घोर आपत्तिजनक भी है। उनके इस बयान पर ऐतराज जताते हुए तिब्बत से पलायन कर भारत  में बसे तिब्बतियों के धर्मशाला स्थित तिब्बत सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेशन प्रवक्ता तेंजिन लेक्शे ने गत दिवस जारी बयान में वांगचुक को गलत ठहराते हुए कहा कि तिब्बत में चीन आज भी जोर जबरदस्ती कर रहा है। वहां पर लोगों को मौलिक शिक्षा, धर्म के अधिकार नहीं है। जो लोग लद्दाख़ गए हैं उन्हें कहीं से ये नहीं लगता कि वहाँ के नागरिकों पर किसी बात की पाबंदी है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सीमावर्ती इलाकों में अधो संरंचना के जो काम हुए उनकी वजह से सीमा पार से आने वाले खतरों से निपटने में जहाँ सेना को मजबूती मिली वहीं लद्दाख़ के निवासियों को भी मानसिक सुरक्षा का एहसास हुआ। सेना केवल सीमाओं पर ही चौकसी नहीं रखती बल्कि लद्दाख़ की जनता के स्वास्थ्य और शिक्षा की व्यवस्था भी करती है। ऐसे में वांगचुक द्वारा लद्दाख़ में तिब्बत से भी ज्यादा दमन चक्र चलने जैसी बात कहना कश्मीर घाटी के उन पाक समर्थक अलगाववादियों का समर्थन है जो भारत में रहते हुए भी पाकिस्तान के प्रति वफादारी दिखाने से बाज़ नहीं आते थे। इसीलिए ये कहना गलत नहीं होगा कि वांगचुक भी चीनी एजेंट की तरह  बोल रहे हैं। वरना उन जैसे शिक्षित व्यक्ति को ये तो पता ही होगा कि तिब्बत पर जबरन कब्जा करने के बाद चीन की साम्यवादी सरकार ने तिब्बतियों के धर्म और संस्कृति को नष्ट करने के लिए योजनाबद्ध प्रयास किये। तिब्बती लड़कियों की चीनी नस्ल के युवकों से बलात शादियाँ करवाने का अभियान चलाया। हजारों बौद्ध भिक्षुक रहस्यमय तरीके से लापता हो गए। बौद्ध मठों में रखा प्राचीन साहित्य नष्ट कर दिया गया। चीन की मुख्य भूमि से लाये लोगों को बसाकर वहाँ का जनसंख्या संतुलन बिगाड़ने का प्रयास भी हुआ। तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा का नाम तक कोई नहीं ले सकता। चीन ने तिब्बत के चारों तरफ लौह आवरण जैसा बना रखा है। वहाँ विदेशी सैलानी और मीडिया तक को आने नहीं दिया जाता। मानव अधिकार संगठन जैसी संस्थाओं को भी तिब्बती जनता की दयनीय स्थिति देखने नहीं दी जाती। अब इस स्थिति को वांगचुक लद्दाख़ से बेहतर मानते हैं तब ये मान लेना सही होगा कि वे आस्तीन के सांप हैं । उनके भारत विरोधी ताकतों से रिश्तों का संदेह इस बयानबाजी से और पुख्ता हो गया है। दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में वांगचुक द्वारा अनशन पर बैठने की काफी चर्चा हुई। उन्होंने इस पार्टी के विदेशों से सम्बन्धों का जिस प्रकार खंडन किया उससे भी उनके इर्द - गिर्द मंडरा रहा रहस्य और गहरा गया। जब उन्होंने मेदांता अस्पताल में केन्द्रीय मंत्रियों की मौजूदगी में अनशन खत्म किया तब लगा था कि उनके रवैये में कुछ सुधार हुआ किंतु उनके ताजा बयान से उनका असली देश विरोधी चेहरा एक बार फिर उजागर हो गया है। इसके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए वरना लद्दाख़ में भी अलगाववाद की हवा बहने लगेगी जिसका फ़ायदा उठाकर चीन इस इलाके को हड़पने की कोशिश कर सकता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी



Friday, 25 September 2026

चुनाव आयोग : आरोपों को साबित भी करे विपक्ष



एक अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयोग के दो आयुक्तों ने कुछ मामलों में अपनी असहमति दिखाई जिसे नजरंदाज कर दिया गया। साथ ही कुछ फैसले उनकी जानकारी के बिना ले लिए गए जिसके बारे में  उन्होंने भारत सरकार के कैबिनेट सचिव को पत्र भी लिखा था। अखबार के मुताबिक उक्त आपत्तियां एस. आई. आर से जुड़ी हुई थीं। रिपोर्ट प्रकाशित होते ही राजनीतिक तूफान आ गया। राहुल गाँधी, ममता बैनर्जी और अरविंद केजरीवाल का बोलना तो समझ में भी आता है लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी  भी बहती गंगा में हाथ धोने लगी। इन सबका निशाना बने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार। कोई उन्हें देशद्रोही कह रहा है तो कोई गिरफ्तारी और त्यागपत्र की मांग कर रहा है। आयोग ने स्पष्टीकरण दिया कि आयुक्तों के बीच विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा और विमर्श के दौरान असहमति होने के बाद भी अंतिम निर्णय एक राय से होते हैं। लेकिन विपक्ष ने जिस तरह से ताबड़तोड़ हमले मुख्य चुनाव आयुक्त पर किये उससे लगता है मानो उसे इस बारे में पहले से ही जानकारी थी। नीट परीक्षा को लेकर आया उबाल ठंडा पड़ चुका है। पंजाब और दिल्ली वि.वि छात्र संघ चुनाव में अभाविप की जीत से जंतर मंतर आंदोलन की हवा निकल चुकी है। अंबानी और अडानी के विरुद्ध उठाये गए मुद्दे भी फुस्स साबित हुए। रक्षा सौदों पर किया शोर- शराबा भी जनता को प्रभावित नहीं कर सका।  ब्रिक्स सम्मेलन  से प्रधानमंत्री की छवि और चमकी है। अभी तक जितने भी चुनाव सर्वे आये उनमें उ.प्र, और उत्तराखंड में भाजपा की वापसी तय मानी जा रही है। वहीं पंजाब में आम आदमी पार्टी और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के हाथ से सत्ता खिसकती दिख रही है। विपक्ष में कोई एकजुटता नहीं हो पा रही। जंतर मंतर आंदोलन पर आम आदमी पार्टी और वामपंथियों के कब्जे ने कांग्रेस को तनाव में डाल दिया । उसके साथ कोई गठबंधन को तैयार नहीँ है। केजरीवाल को भी चिंता है कि दिल्ली से पैर उखड़ने के बाद पंजाब में भी हार सिर पर मंडरा रही है। ममता बैनर्जी ने इंडिया गठबंधन में सांस फूंकने की असफल कोशिश की । शरद पवार ,  सोनिया गाँधी और लालू प्रसाद यादव का स्वास्थ्य आड़े आ रहा है। राहुल गाँधी और अखिलेश यादव के बीच  अघोषित प्रतिस्पर्धा चल रही है। आरक्षण  पर भाजपा से नाराज सवर्ण जातियाँ इस असमंजस में हैं कि किसके साथ जाएं क्योंकि राहुल गाँधी का बस चले तो 100 प्रतिशत आरक्षण कर दें। वहीं सपा, राजद और बसपा का तो आधार ही आरक्षण टिका हुआ  है। शिवसेना, तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी  का जनाधार भी कम हुआ है। कुल मिलाकर विपक्ष को कुछ सूझ नहीं रहा था। ऐसे में चुनाव आयोग के बारे में प्रकाशित एक खबर पर होहल्ला शुरू कर दिया गया। आयोग की कार्यप्रणाली में यदि कमी है तो उसकी जाँच होनी चाहिए। लेकिन लंबे समय से वोट चोरी का ढोल पीटने वाले राहुल उसका एक भी प्रमाण नहीं दे सके। ईवीएम पर लगाए गए आरोप भी हवा हवाई होकर रह गए । गत दिवस  श्री गाँधी ने अपनी खीझ ये कहते हुए निकाली कि 1971 का चुनाव जीतने के दो वर्ष बाद ही स्व. इंदिरा गाँधी के विरुद्ध सत्ता विरोधी लहर  पैदा हो गई थी किंतु भाजपा सरकार के विरुद्ध नहीं होती। इसके साथ ही उन्होंने बचकानेपन का परिचय देते हुए पहले तो ज्ञानेश कुमार को देशद्रोही बताया और फिर उन्हें सरकार के विरुद्ध गवाह बनने का सुझाव देने लगे। इस बारे में जब तक संदर्भित दोनों चुनाव आयुक्त सामने आकर कुछ नहीं बोलते तब तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचना बेमानी है। ये सवाल भी उठता है कि यदि ज्ञानेश कुमार अपनी मर्जी थोप रहे थे तब दोनों चुनाव आयुक्तों को  राष्ट्रपति से शिकायत करनी थी अथवा त्यागपत्र देकर  अपनी बात रखनी चाहिए थी।  चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। उसके सर्वोच्च पदाधिकारी को देशद्रोही कहना किसी को भी शोभा नहीं देता। इसी तरह 2024 में वोट चोरी से बनी संसद द्वारा बनाये सभी कानूनों को अवैध बता देना भी समझ से परे है। यदि श्री गाँधी को लगता है वर्तमान लोकसभा गलत तरीके से चुनी गई तब उन्हें उसकी सदस्यता से त्यागपत्र देकर एक उदाहरण पेश करना चाहिए। लेकिन उनका रवैया केवल शोर मचाना रह गया है। फ्रांस से रक्षा सौदे , हिंडनबर्ग रिपोर्ट और  पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे की किताब को लेकर श्री गाँधी द्वारा मचाया गया हल्ला व्यर्थ साबित हुआ। संसद के कई सत्र बर्बाद होने के बाद भी विपक्ष कुछ साबित नहीं कर सका। जब भी कोई चुनाव आता है श्री गाँधी एक नया मुद्दा पकड़कर बैठ जाते हैं। लेकिन जनता उनकी बात को अनसुना करती आई है और आगे भी करती रहेगी क्योंकि वे किसी भी लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने में सफल नहीं हुए । चुनाव आयोग संबंधी जितने भी विवाद हैं उन पर सर्वोच्च न्यायालय में बहस जारी है। बेहतर होगा उसके फैसले का इंतजार किया जाए। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 24 September 2026

ओबीसी को खुश करने के फेर में बाकी जाति समूह नाराज हो सकते हैं राहुल से



म.प्र में ओबीसी आरक्षण का मामला बीते अनेक वर्षों से विवादों में फंसा हुआ है। वर्ष 2019 में तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने ओबीसी जातियों का आरक्षण बढ़ाकर 14 से 27 फीसदी कर दिया था । इसकी वजह से प्रदेश में सभी आरक्षण मिलकर 50 फीसदी की संवैधानिक सीमा से अधिक हो गए। इसके विरुद्ध दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने उस पर रोक लगा दी। 2020 में वह सरकार गिर गई और शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा प्रदेश की सत्ता पर काबिज हो गई। कानूनी रोक के कारण राज्य में  87:13 के  फॉर्मूले के तहत चयन परीक्षाओं के 87% पदों पर परिणाम जारी किए जा रहे हैं और 13% पद रोके (होल्ड) गए हैं। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा जिसने उच्च न्यायालय को नियमित सुनवाई कर इस विवाद का निपटारा करने का निर्देश दिया। लेकिन अभी तक बात कानूनी बहस में ही उलझी हुई है। दरअसल उच्च न्यायालय  में अनु. जनजाति वर्ग की ओर से ये ऐतराज जताया गया कि ओबीसी आरक्षण 14% से बढ़ाकर 27% करने से कुल आरक्षण 73% हो जाएगा। इससे अनारक्षित श्रेणी के साथ-साथ उन अनु. जनजाति उम्मीदवारों के लिए मौके घट जाएंगे जो अपनी योग्यता के आधार पर सामान्य  श्रेणी में चुने जाते हैं। इसके अलावा ये आपत्ति भी है कि बिना पर्याप्त सामाजिक और संख्यात्मक आंकड़ों  के आरक्षण की सीमा में वृद्धि अनुचित  है। स्मरणीय है प्रदेश में अनु. जाति के लिए 16, जनजाति के लिए 20, ओबीसी के लिए 14 और EWS के लिए 10 फीसदी आरक्षण लागू है। ऐसे में ओबीसी आरक्षण 14 से 27 प्रतिशत  होने पर यह सीमा करीब 73 फीसदी हो जाएगी, जिस पर कानूनी और संवैधानिक चुनौतियां चल रही हैं। म. प्र उच्च न्यायालय में इस पूरे मामले पर नियमित सुनवाई में आरक्षित और अनारक्षित दोनों पक्ष अपने तर्क रख रहे हैं। लेकिन इस मामले में अदालत से बाहर भी राजनीतिक दांव - पेच चले जा रहे हैं। कांग्रेस का आरोप है कि उसने ओबीसी को न्याय देते हुए उनके आरक्षण का प्रतिशत 14 से बढ़ाकर 27 किया था किंतु भाजपा ने सत्ता में लौटते ही उसमें रोड़े अटकाते हुए अदालत में फंसा दिया और सुनवाई के दौरान भी जवाब देने में विलंब करते हुए मामले को जबरन खींच रही है। लेकिन प्रदेश सरकार के सामने भी ये समस्या है कि ओबीसी को खुश करने के फेर में अन्य जाति समूह मुँह फुलाकर बैठ जाएंगे। अदालत में तो जो होगा सो होगा किंतु लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र भेजकर  ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के साथ ही जिन 13 फीसदी उम्मीदवारों की नियुक्तियाँ रुकी पड़ी हैं उन्हें तत्काल नियुक्ति पत्र देने की मांग की है। श्री गाँधी को ऐसा करने की सुध शायद न आती यदि इंदौर में छात्रों की गूँज कार्यक्रम के दौरान एक युवती ने ये मुद्दा न छेड़ा होता। इस पत्र के जरिये श्री गाँधी ने प्रदेश के ओबीसी वोट बैंक को अपने पाले में खींचने का पांसा फेंका है जो कि भाजपा का प्रतिबद्ध मतदाता रहा है। भाजपा ने भी इस वर्ग को लुभाने के लिए 2003 से अब तक जिन उमा भारती, बाबूलाल गौर, शिवराज सिंह चौहान और डॉ. मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया, वे सभी ओबीसी हैं। और ये भी कि ओबीसी आरक्षण के विवाद के बावजूद भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में धमाकेदार जीत हासिल करने के बाद लोकसभा की सभी 29 सीटें कब्जा लीं। सवाल ये है कि क्या कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त संवैधानिक पद  पर आसीन श्री गाँधी अदालत में विचाराधीन किसी मामले के बारे में ऐसा पत्र लिख सकते हैं? छात्रों और बेरोजगारों के पक्ष में आवाज उठाना नेता प्रतिपक्ष का कर्तव्य है लेकिन श्री गाँधी चूंकि एक राष्ट्रीय पार्टी के नेता हैं इसलिए उन्हें आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर सोच - समझकर अपनी राय रखनी चाहिए। इस समय देश का जो वातावरण है उसे देखते हुए राजनेताओं को गंभीरता के साथ जिम्मेदारी का भी प्रदर्शन करना चाहिए क्योंकि सूचना क्रांति और सोशल मीडिया के इस दौर में  छोटी सी बात का बतंगड़ बनते देर नहीं लगती। म.प्र के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर श्री गाँधी ओबीसी वर्ग की सहानुभूति भले बटोर लें किंतु अनु. जाति / जनजाति और सवर्ण जातियाँ उनसे नाराज हो जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। दुर्भाग्य से सत्ता की  अंधी दौड़ में सभी राजनीतिक दल कमोबेश देश को जातीय संघर्ष में धकेलने में जुटे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी























 
  
 



    


    




    






Wednesday, 23 September 2026

आई. आई. टी से उठा विवाद खतरनाक मोड़ ले सकता है



दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले हुए आंदोलन के कारण शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को त्यागपत्र देना पड़ा था। केन्द्र सरकार ने शिक्षा क्षेत्र में व्याप्त विसंगतियों को दूर करने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति भी बना दी। उसके बाद वह आंदोलन तो समाप्त हो गया किंतु उसमें मनुवाद को लेकर जो गालीबाजी हुई उसकी प्रतिक्रियास्वरूप जिस आरक्षण विरोधी आंदोलन का सूत्रपात हुआ उसकी चर्चा पूरे देश में है। शिक्षा संस्थानों में कम अंकों के बाद भी आरक्षित श्रेणी के छात्र को प्रवेश दिया जाना और अधिक अंक प्राप्त करने वाले सवर्ण को वंचित किये जाने से छात्र के साथ ही उनके माता - पिता ही नहीं बल्कि समूचे सवर्ण समाज में भारी नाराजगी है। यूजीसी अधिसूचना से भड़का गुस्सा नीट पेपर लीक के बाद और बढ़ गया। आजकल सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफॉर्म पर केन्द्र सरकार के विरोध में जो हवा बह रही है उसके पीछे आरक्षण और अनु. जाति/ जनजाति कानून भी है। कहा जा रहा है कि राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा को अनेक शहरों में मिली कड़ी टक्कर का कारण उसके परंपरागत सवर्ण मतदाताओं का छिटकना रहा जिसके कारण बड़ी संख्या में निर्दलीय जीतने में सफल रहे। हालांकि एक को छोड़कर सभी बड़े शहरों में भाजपा के महापौर बन गए किंतु बहुमत जुटाने के लिए उसे जोड़ - तोड़ का सहारा लेना पड़ा। इसी तरह दिल्ली वि.वि छात्र संघ चुनाव में भाजपा समर्थित अभाविप को तीन पदों पर जीत तो हासिल हो गई किंतु अंतर कम होने के पीछे भी सवर्णों की नाराजगी बताई जा रही है। इसीलिए उ.प्र विधानसभा के आगामी चुनाव भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण माने जा रहे हैं जहाँ ब्राह्मण मतदाताओं की भूमिका निर्णायक हो सकती है। यदि उनमें थोड़े से भी खिसके तब पार्टी के लिए संकट खड़ा हो सकता है। इस बारे में विचारणीय बात ये है कि अनु. जाति/ जनजाति कानून को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सवर्ण विरोधी छवि बनाने की सुनियोजित कोशिश वह वर्ग कर रहा है जो दलित और पिछड़ी जातियों को सवर्णों के विरुद्ध भड़काने में आगे - आगे रहता है। राजनीतिक नेताओं द्वारा फैलाये जा रहे ज़हर के चलते जातिगत भेदभाव विद्वेष से बढ़कर दुश्मनी का रूप ले चुका है। ताजा उदाहरण बॉम्बे आई.आई.टी का है जहाँ एक दलित छात्र द्वारा आत्महत्या किये जाने के बाद पूरा माहौल तनावपूर्ण है। जो जानकारी आई उसके अनुसार एक अध्यापक ने उक्त दलित छात्र को नकल करते पकड़ लिया। उसके बाद उसने छात्रावास के कमरे में जाकर आत्महत्या कर ली। निश्चित रूप से ये अत्यंत दुखद घटना है। छात्र किसी भी जाति का हो उसका इस तरह चला जाना न केवल परिवार अपितु समाज के लिए भी आघात है। हालांकि ये बात भी चिंता के साथ चिंतन योग्य है कि आई. आई. टी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में प्रतिवर्ष दर्जनों छात्र आत्महत्या करते हैं जहाँ कड़ी मेहनत के बाद प्रवेश मिलता है। बॉम्बे आई. आई.टीके जिस छात्र की आत्महत्या का मामला सुर्खियों में है उसके माता - पिता ने उस अध्यापक पर अनु. जाति/जनजाति के तहत प्राथमिकी दर्ज करवाते हुए उसकी गिरफ्तारी की मांग कर डाली। आरोप है कि अध्यापक संस्थान के निदेशक के दबाव में उक्त छात्र को पहले से प्रताड़ित करते आ रहे थे। आत्महत्या करने वाला छात्र चूंकि दलित था इसलिए  राजनीतिक दल रोटी सेंकने सक्रिय हो गए। अध्यापक को फांसी देने तक की मांग उठने लगी। चंद्रशेखर आजाद जैसे दलित सांसद ने भी भड़काऊ बयान दे डाला। इस बीच उक्त अध्यापक को डीन के दायित्व से मुक्त कर दिया जिसके बाद देश भर के आई.आई.टी संस्थानों के ज्यादातर अध्यापक उनके समर्थन में मैदान में आ गए। इस प्रकार पूरे मामले की दिशा ही बदल गई। आत्महत्या प्रकरण की जांच शुरू हो चुकी है। उसके निष्कर्षों के लिए प्रतीक्षा करने के बजाय जिस प्रकार का शक्ति प्रदर्शन चल पड़ा है उसके बाद शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए आरक्षण की व्यवस्था के साथ ही अनु. जाति/जनजाति कानून के औचित्य पर भी सामाजिक स्तर पर बहस होने लगी है। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य शोषित और वंचित वर्ग को मुख्यधारा में लाने के साथ ही उन पर होने वाले अत्याचारों को रोकना है। लेकिन इस बात की समीक्षा नहीं की जाती कि वह उद्देश्य किस हद तक पूरा हुआ ? ये सवाल भी है कि दलितों को  जो कानूनी संरक्षण दिया गया उसके दुरूपयोग को रोकने के लिए क्या कदम उठाये जा रहे हैं ? बॉम्बे आई. आई. टी से उठा विवाद एक छात्र की आत्महत्या और अध्यापक की भूमिका तक सीमित न रहकर राष्ट्रीय स्तर पर समाज को टुकड़ों में बाँटने और आपस में लड़ाने की स्थिति उत्पन्न न कर दे इस बात की चिंता सभी को करना होगी। आरक्षित वर्ग को संरक्षण और सहयोग मिलना ही चाहिए किंतु इसके चलते यदि सामाजिक ढांचा चरमराने लगे तो ये देश के लिए ख़तरनाक होगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी