आज विश्व जनसंख्या दिवस है। पूरी दुनिया चिंतित है कि आबादी इसी तरह बढ़ती रही तो धरती पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन घटते चले जायेंगे और तब उनके लिए वैसी ही लड़ाई होगी जैसी कई सालों से रूस और यूक्रेन के बीच चली आ रही है। वहीं प. एशिया में चल रहे युद्ध के पीछे भी कच्चा तेल नामक काला सोना ही है। चीन की विस्तारवादी नीतियाँ भी प्राकृतिक संसाधनों को हथियाने पर आधारित हैं। भविष्य में पेय जल की समस्या भी विकराल होने जा रही है।और तब उसके लिए भी संघर्ष होगा। उल्लेखनीय है भारत अब चीन को पीछे छोड़ सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गया है। दूसरी तरफ चीन और जापान सरीखे देश जन्म दर में गिरावट से चिंतित हैं क्योंकि उनके उद्योगों को श्रमिक मिलने की किल्लत होने लगी है। उधर परिवार नामक संस्था के टूटने से भी अनेक विकसित देशों में आबादी ठहर गई है। यूरोप के कुछ छोटे देशों की आबादी तो लाखों में है किंतु अपने प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों के कारण वे विकसित और संपन्न राष्ट्रों में शुमार होते हैं। लेकिन बेहतर जिंदगी के चलते अन्य देशों के नागरिक जिस तेजी से यहां बसते जा रहे हैं उससे माहौल बिगड़ने लगा है । विशेष रूप से अरब देशों से आए शरणार्थी समस्या बन गए हैं । दुनिया में बढ़ती आबादी से जमीन और पानी की कमी के साथ ही वाहनों की बढ़ती संख्या पर्यावरण के लिए खतरा बन गई है। समुद्र में चल रहे हजारों जहाज और आकाश में विचरते वायुयानों से जो प्रदूषण होता है उसका दुष्प्रभाव धरती पर रहने वालों पर भी पड़ रहा है। विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि पृथ्वी पर मौजूद संसाधन जनसंख्या के अनुपात में घटते जा रहे हैं। विलासिता पूर्ण जीवनशैली के कारण भी प्रकृति से खिलवाड़ होने से प्राकृतिक आपदाएं जल्दी - जल्दी आने लगी हैं। जानलेवा कोरोना वायरस ने साबित कर दिया कि मनुष्य की अनगिनत कथित उपलब्धियां किसी न किसी बिंदु पर आकर शक्तिहीन हो जाती हैं । अमेरिका जैसा विकसित और ताकतवर देश भी चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय कुछ न करने की स्थिति में आ जाता है। विश्व भर में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर चिंता व्यक्त की जाती है किंतु जितना दिखावा होता है उसका आधा भी काम नहीं होने से स्थिति एक कदम आगे दो कदम पीछे की बन चुकी है। विकासशील देशों को कार्बन उत्सर्जन के लिए उपदेश देने वाले बड़े राष्ट्र पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं । चीन ने अपनी आबादी में वृद्धि को तो थाम लिया लेकिन कार्बन उत्सर्जन के मामले में वह बेहद लापरवाह है। भारत की ही बात करें तो आर्थिक विकास के मामले में चीन से हमारा मुकाबला है । लेकिन उसने जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण के साथ ही विशाल आबादी को उत्पादकता से जोड़ा जिसके बाद अफीमचियों के लिए कुख्यात चीन ने अमेरिका को टक्कर दे डाली। साम्यवादी व्यवस्था के बाद भी उसने उदारीकरण की पश्चिमी अवधारणा को अपने अनुरूप बनाया जिसके कारण लगभग सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने वहाँ अपनी उत्पादन इकाईयां लगाई। दूसरी तरफ भारत में साठ और सत्तर के दशक तक परिवार नियोजन का जो अभियान जोर - शोर से चलाया जाता था वह उपेक्षा का शिकार होकर रह गया। चुनावी राजनीति ने जिस मुफ्त संस्कृति का विकास किया उसकी वजह से करोड़ों लोग बिना हाथ - पैर चलाए सरकारी सहायता पर अपना पेट भर रहे हैं। विरोधाभास ये है कि बेरोजगारी के आंकड़े उच्च स्तर पर हैं लेकिन खेती , उद्योग और छोटे कारोबारी तक कामगारों की कमी से त्रस्त हैं। चीन ने जिस आबादी को संसाधन बनाया वही हमारे देश में बोझ बनकर रह गई। इसके लिए निश्चित रूप से राजनीति उत्तरदायी है जिसने कामचोरी को बढ़ावा दिया। किसी को हजार - दो हजार बेरोजगारी भत्ता देने के बजाय यदि उससे रोजाना घंटे - दो घंटे भी काम करवाया जाए तो उसे श्रम का महत्व समझ आएगा । इसी तरह महिलाओं के खातों में पांच सौ - हजार जमा करने से उनका सशक्तीकरण हो जायेगा , ये सोचना मूर्खों के स्वर्ग में रहने जैसा है। ये सच है कि चीन में चुनाव महज दिखावा है इसलिए वहां रेवड़ियां नहीं बांटी जाती और काम करने में सक्षम प्रत्येक व्यक्ति को उत्पादकता से जोड़ा गया है। वहीं हमारे देश में तो चुनाव कभी न खत्म होने वाला महोत्सव है जिसके दौरान जो मांगोगे वहीं मिलेगा वाली दरियादिली दिखाई जाती है। और तो और जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने में भी धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप जैसी बातें आड़े आने लगती है। दुनिया का उत्पादन केंद्र बनने की उम्मीद और सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने की महत्वाकांक्षा में जनसंख्या का बोझ बड़ी बाधा बन रहा है। हालांकि वर्तमान राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 का मुख्य उद्देश्य प्रजनन दर को कम करके 2045 तक जनसंख्या को स्थिर करना है। लेकिन इसका हश्र भी परिवार नियोजन अभियान जैसा ही है।
- रवीन्द्र वाजपेयी