संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को समाप्त हो जाएगा। सरकार इसमें एफ.सी.आर ए और परिसीमन विधेयक पारित करवाना चाहती थी किंतु विपक्ष द्वारा उत्पन्न गतिरोध के कारण दोनों सदनों में कामकाज नहीं हो पाने से लग रहा है कि उनका पारित होना तभी संभव है जब सरकार हंगामे के बीच ही उन्हें पेश करे और फिर बिना बहस के संसद की मुहर लगवा ले। ये चर्चा भी है कि इस सत्र में उक्त विधेयक पारित नहीं हो सके तो संसद का विशेष सत्र बुलाकर सरकार इन्हें पारित करवाने का प्रयास करेगी। लेकिन इस सबसे अलग हटकर चिंता का सबसे बड़ा कारण संसद में कामकाज का न होना है जिसकी वजह से लोकतंत्र के इस मन्दिर के प्रति जनमानस की श्रृद्धा लगातार कम हो रही है। इस सत्र की शुरुआत वाले दिन ही संसद भवन घेरने निकले छात्रों पर पुलिस के बल प्रयोग को मुद्दा बनाकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने सरकार पर हमला शुरू कर दिया। हालांकि धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र के बाद जंतर मंतर आंदोलन तो खत्म हो गया किंतु राहुल गृह मंत्री अमित शाह की घेराबंदी में जुट गए। उनके वक्तव्य की मांग को लेकर सरकार और विपक्ष में जो रस्साकशी शुरू हुई वह लगातार जारी है। रोजाना सदन की बैठक शुरू होते ही विपक्ष द्वारा हंगामा किये जाने पर सदन दोपहर तक स्थगित हो जाता है और दोपहर बाद फिर वही कहानी दोहरा दी जाती है। उल्लेखनीय है अनेक सांसद सदन के भीतर होहल्ला कर कार्यवाही बाधित करने के बाद बाहर भी नारेबाजी करते हैं जिससे समाचार माध्यमों में उनके नाम और तस्वीर आ जाए। गौरतलब है कि सदन के संचालन पर प्रति मिनिट ढाई लाख रुपये खर्च होते हैं। उस लिहाज से इस सत्र पर अब तक 110 करोड़ रु. खर्च हो चुके हैं। किसी सांसद के सदन में प्रवेश करते ही उसका दैनिक भत्ता पक्का हो जाता है , चाहे वह तुरंत बाहर आ जाए। ऐसे दर्जनों सांसद हैं जो इसी सुविधा का लाभ लेते हैं। हालांकि सरकार ने शोर - शराबे के बावजूद दो - तीन विधेयक पारित करवा लिए लेकिन एफ.सी.आर ए और परिसीमन जैसे बेहद महत्वपूर्ण विधेयक लंबित ही हैं। अब सवाल ये है कि संसद को ठप रखने के लिए कौन जिम्मेदार है? विपक्ष लगभग हर सत्र में किसी एक मुद्दे को पकड़कर सदन की कार्यवाही नहीं चलने देता। दूसरी तरफ सरकार भी उसके आगे झुकने को अपनी शान के विरुद्ध मानती है। इस खींचातानी में छोटी पार्टियों की आवाज तो अनसुनी रहती ही है, बड़ी पार्टियों के सांसद भी अपने क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर बोलने से वंचित रह जाते हैं। सांसदों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर तैयार करने पर भी काफी समय एवं धन खर्च होता है। सदन नहीं चलने पर उनके जो जवाब तैयार किये जाते हैं वे दस्तावेजों तक ही सीमित रह जाते हैं। यदि प्रश्नकाल ठीक से चले तब प्रश्नकर्ता सदस्य पूरक प्रश्न भी पूछ सकता है। संसद में होने वाली चर्चा का सीधा प्रसारण होने से देश - विदेश में उसे देखा सुना जाता है। लेकिन सदन नहीं चलने से सांसदों के जरिये संसद और जनता के बीच का सम्वाद अवरुद्ध हो जाता है। हालांकि ये समस्या हमारी संसदीय प्रणाली का स्थायी हिस्सा बन चुकी है। विपक्ष कहता है कि सदन चलाना सरकार की जिम्मेदारी है किंतु उसे भी इस प्रश्न का जवाब देना चाहिये कि किसी एक मुद्दे पर अड़कर पूरे सत्र को बर्बाद करने में कौन सी बुद्धिमत्ता और बहादुरी है ? ऐसा लगता है नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी के सलाहकार उन्हें अच्छी सलाह से वंचित रखते हैं। वरना उन्हें बताया जाता कि जनता विपक्ष के नेता द्वारा सदन में दिये गए भाषण याद रखती है न कि सदन में हुए हँगामों को । भाजपा और कांग्रेस के अलावा अन्य नेताओं द्वारा दशकों पूर्व संसद में दिये कुछ भाषण यू ट्यूब आज भी इसलिए सुने जाते हैं क्योंकि उनमें उनका दृष्टिकोण और लोकतंत्र के प्रति दायित्व बोध प्रकट होता है। इसी तरह सत्ता पक्ष की भी ये जिम्मेदारी है कि वह विवाद को एक सीमा के आगे न बढ़ने दे। जिस तरह धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र होते ही जंतर मंतर आंदोलन की हवा निकल गई वैसे ही थोड़ा सा लचीलापन गतिरोध को दूर कर सकता है। सत्ता और विपक्ष में मतभेद कोई अनोखी बात नहीं है। संसदीय लोकतंत्र इससे मजबूत ही होता है। लेकिन वर्तमान माहौल देखकर लगता है कि मतभेद दुश्मनी में बदल चुके हैं। हो सकता है इसके चलते कुछ नेताओं का अहं संतुष्ट होता हो किंतु जनता और देश का नुकसान हो रहा है।
- रवीन्द्र वाजपेयी