Tuesday, 16 June 2026

शांति समझौते का भविष्य इसराइल के रुख पर निर्भर

मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस : संपादकीय
- रवीन्द्र वाजपेयी

शांति समझौते का भविष्य इसराइल के रुख पर निर्भर

अब ये मानकर चला जा सकता है कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता हस्ताक्षरित होने जा रहा है। उसके प्रारूप पर दोनों देशों की ओर से हस्ताक्षर किये जाने के बाद  रविवार को स्विटजरलैंड के जिनेवा शहर में उसे अंतिम रूप दिया जाएगा।  रोचक बात है कि  इस समझौते के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ के साथ ही चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ आसिफ मुनीर ने  काफी दौड़ भाग की। इस्लामाबाद में दोनों पक्षों के बीच वार्ताएं भी हुईं किंतु जब समझौते को अंतिम रूप देने का अवसर आया तब  पाकिस्तान की राजधानी को ठेंगा दिखाते हुए अमेरिका और ईरान ने जिनेवा  पसंद किया। इससे लगता है कि पाकिस्तान की भूमिका संदेश वाहक तक ही सीमित रही। बहरहाल अब समझौते को अंतिम रूप दिया जा चुका है तब इस बात का विश्लेषण होने लगा है कि किसने क्या खोया क्या पाया? जो विवरण  आया है उसके मुताबिक जो मुख्य बातें हैं उनमें ईरान द्वारा होर्मुज जलमार्ग को खोलना और अमेरिका द्वारा ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी खत्म करना है। इसके अलावा ईरान के पुनर्निर्माण हेतु अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान को 300 अरब डॉलर देंगे।  ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगने के बारे अन्तिम फैसले हेतु 60 दिन की समय सीमा निर्धारित किये जाने से लगता है अमेरिका और ईरान दोनों इस बेनतीजा जंग से ऊब चुके हैं और किसी तरह से अपना पिंड छुड़ाना चाहते हैं। लेकिन इस युद्ध के लिए अमेरिका को मनाने वाले इसराइल का रुख दूध में नींबू निचोड़ने वाला है। उसने साफ - साफ कह दिया है कि वह इस समझौते से पूरी तरह दूर रहेगा और लेबनान पर उसके हमले नहीं रुकेंगे। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की धौंस भी बेअसर साबित हुई। पहले तो ईरान भी इस बात पर अड़ा हुआ था कि लेबनान पर इसराइल की सैन्य कारवाई रुके बिना समझौते की गाड़ी आगे नहीं बढ़ेगी। लेकिन ऐसा लगता है तीन महीने से चली आ रही जंग ने उसके हौसले भी कमजोर कर दिये। हालांकि ऊपरी तौर पर वह अपने को बेहद मजबूत दिखाता है लेकिन अमेरिका और इसराइल की मिसाइलों से समूचा देश खंडहर में तब्दील हो चुका है। जनता भी बेतहाशा महंगाई और दैनिक उपयोग की वस्तुओं के अभाव से आक्रोशित है। मूलभूत ढांचा बुरी तरह चरमरा जाने से सर्वत्र अव्यवस्था है। ऐसे में ईरान के नेतृत्व को ये डर लगने लगा कि अवसर का लाभ उठाकर अमेरिका कहीं सत्ता परिवर्तन न करवा दे जो इस युद्ध के सबसे प्रमुख उद्देश्यों में था। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि अमेरिका और ईरान  पर उनके समर्थक देशों का दबाव भी युद्धविराम के लिए बढ़ता जा रहा था। तेल उत्पादक देशों की बिक्री रुक जाने से उनकी अर्थव्यवस्था का भी कचूमर निकलने लगा था। ये देश अमेरिका पर जंग रुकवाकर हालात सामान्य करने का आग्रह कर रहे थे वहीं चीन जैसे ईरान के संरक्षक भी उसे सलाह दे रहे थे कि जैसे भी हो युद्ध रोकने का रास्ता निकाला जाए क्योंकि उनको भी तेल संकट की चिंता सताने लगी थी। इस प्रकार एक दूसरे को बर्बाद करने पर आमादा अमेरिका और ईरान ने न चाहते हुए भी ऐसे समझौते को स्वीकार करने का मन बना लिया जिसकी सफलता को लेकर वे खुद भी आश्वस्त नहीं हैं। इसराइल द्वारा अमेरिका की बात न मानना निश्चित रूप से चौंकाता है किंतु एक संभावना ये भी है कि ऐसा करने के लिए उसे डोनाल्ड ट्रम्प ने ही उकसाया हो 2। प. एशिया में इसराइल और अमेरिका की जुगलबंदी से इस तरह के कूटनीतिक दाँव - पेच नये नहीं हैं।  इस  प्रकार इस समझौते की सफलता इसराइल के रुख पर निर्भर करेगी क्योंकि उसने लेबनान पर हमले नहीं रोके तब ईरान भी उसके बचाव में कूदे बिना नहीं रहेगा। और ऐसा होने पर युद्ध ईरान विरुद्ध इसराइल की शक्ल ले लेगा जिसमें अमेरिका किसके साथ रहेगा ये बताने की जरूरत नहीं है। पूरी दुनिया इस समझौते के बाद तेल संकट के हल होने की जो उम्मीद लगा रही है वह आसानी से पूरी होने में संदेह ही है क्योंकि ईरान इतनी आसानी से चीजें अपने हाथ से निकलने नहीं देगा। यही बात इसराइल पर भी लागू होती है क्योंकि वह उस ईरान को कभी भी चैन से नहीं रहने देना चाहेगा जो उसे मिटाने पर आमादा हो। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 15 June 2026

अमेरिका और ईरान में समझौते के बाद भी शांति की गारंटी नहीं


अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते को लेकर  दावा किया जा रहा है कि आगामी 19 जून को दोनों उस पर हस्ताक्षर कर देंगे। हालांकि  इस तरह की घोषणाएं कई मर्तबा  सुनने में आईं लेकिन कभी अमेरिका को ईरान की शर्तें मंजूर नहीं हुईं तो कभी ईरान ने अमेरिकी प्रस्तावों पर  असहमति जाहिर करते हुए टांग अड़ा दी। इस विलंब के लिये इसराइल भी कम जिम्मेदार नहीं है जो ईरान के जबरदस्त विरोध के बावजूद लेबनान पर हमले रोकने तैयार नहीं है। हद तो तब हो गई जब उसके प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा की गई डाँट - डपट की परवाह तक नहीं की। अब जबकि ऐसा लग रहा है कि समझौता अंतिम चरण में पहुँच चुका है तब इसराइल ने ये कहकर सनसनी फैला दी कि वह इसका हिस्सा नहीं है। उल्लेखनीय है नेतन्याहू ही नहीं सऊदी अरब सहित अनेक अरब देश भी ट्रम्प से अनुरोध कर चुके हैं कि ईरान को पूरी तरह घुटनाटेक करवाये बिना लड़ाई रोकना भारी भूल होगी क्योंकि आगे भी वह पड़ोसी देशों के विरुद्ध आक्रामक रवैया अख्तियार करने से बाज नहीं आयेगा। दरअसल अमेरिका किसी भी तरह इस युद्ध से निकलना चाह रहा है क्योंकि उसे ये समझ में आ गया है कि बिना थल सेना उतारे ईरान को परास्त करना असंभव होगा। हालांकि वह ऐसा करने में सक्षम है किंतु वियतनाम और अफगानिस्तान के कड़वे अनुभवों को याद करने पर ट्रम्प उस दिशा में आगे बढ़ने से रुक गये। ईरान के विरुद्ध इस कारवाई का घोषित मकसद तो उसे परमाणु हथियार बनाने से रोकना था लेकिन असली बात है तेल का खेल।   रूस और ईरान द्वारा सस्ता तेल बेचे जाने से अमेरिका परेशान था क्योंकि उसका भरपूर लाभ भारत और चीन जैसे देश उठा रहे थे जिससे अमेरिका के पेट में मरोड़ होता आया है। और फ़िर ब्रिक्स नामक जिस संगठन ने डॉलर के दबदबे को समाप्त करने की पहल की उसमें भारत, चीन और ब्राज़ील के साथ ही ईरान भी शामिल हो गया। जहाँ तक प्रश्न  इसराइल का है तो उसकी और ईरान की दुश्मनी का कारण हमास , हिजबुल्ला और हूती जैसे इस्लामिक आतंकवादी संगठन हैं जिनकी पीठ पर ईरान का खुला हाथ है। इस जंग की जड़ में भी हमास द्वारा इसराइल पर किया गया हमला था जिसके बाद प. एशिया में युद्ध की आग भड़क उठी। इसराइल और ईरान के बीच सीधी लड़ाई भी उसी दौरान शुरू हुई थी जिसमें अमेरिका ने भी हिस्सा लिया और ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया। हालांकि  युद्धविराम तो हो गया लेकिन ईरान का आक्रामक रुक जारी रहने से इसराइल ने अमेरिका को इस बात के लिए राजी  कर लिया कि  उसकी कमर पूरी तरह तोड़ दी जाए। चूंकि ऐसा करने में अमेरिका के भी दूरगामी  स्वार्थ सिद्ध होते थे लिहाजा ट्रम्प भी तैयार हो गए। लेकिन वे ईरान द्वारा किये गए पलटवार का पूर्वानुमान लगाने में चूक गए। यही वजह रही कि जंग लंबी खिंचने के साथ ही अनेक देशों में फैल गई। बहरहाल समझौते के करीब पहुँचने के बाद भी ये आशंका बनी हुई है कि अंतिम क्षणों में भी ऐसा कुछ होगा जिससे कि शांति की उम्मीदें धरी रह जाएं। ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को अमेरिका की इच्छानुसार स्थगित कर देगा क्योंकि उसके पास यही तो सौदेबाजी का सबसे बड़ा हथियार है। उसने यूक्रेन के हश्र को भी देखा जो परमाणु शक्ति विहीन होने के दुष्परिणाम भोग रहा है। इसी तरह होर्मुज पर पूरी तरह नियंत्रण खत्म करने पर भी ईरान राजी हो जाएगा ये भी मुश्किल है।  एक बात और भी काबिले गौर है कि ईरान के भीतर भी इस संभावित समझौते के विरोध में सत्ता से जुड़ा एक तबका आवाज उठा  रहा है। उसका कहना है कि युद्ध रोकने की ज्यादा जरूरत ट्रम्प को है ऐसे में ईरान को अपनी शर्तों पर अड़े रहना चाहिए। अमेरिका द्वारा समझौते के जिन बिंदुओं की जानकारी दी जा रही है उसके अनुसार तो ईरान दबाव में आ गया लगता है। यद्यपि  जप्त संपत्ति लौटाने और युद्ध में हुई क्षति के मुआवजे जैसे प्रावधान उसे राहत देने वाले हैं किंतु बाकी सब अमेरिका की जीत का इशारा कर रहे हैं। ऐसे में फिलहाल ये विश्वास कर लेना जल्दबाजी होगी कि 19 तारीख पूरी दुनिया के लिए राहत लेकर आयेगी। बड़ी बात नहीं जिस तरह अमेरिका और इसराइल के बीच शांति समझौते को लेकर मतभेद उभरे वैसा ही कुछ ईरान में भी हो जाए जिसके चलते वहाँ  नेतृत्व के दोफ़ाड़ होने से आखिरी क्षणों में गतिरोध उत्पन्न हो।  उस दृष्टि से अगले कुछ दिन बेहद उत्सुकता और उत्तेजना से भरे रहेंगे। देखने वाली बात ये भी है कि ट्रम्प की विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म होने के कारण समझौते के बावजूद प. एशिया में शांति कायम होने पर  संदेह बना रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 13 June 2026

कब , कहां और कितना बोलना है इस कला में पारंगत हैं जयशंकर


विदेश मंत्री एस. जयशंकर द्वारा हाल ही में की गई टिप्पणियां हमारी विदेश नीति की दृढ़ता का प्रमाण हैं। कुछ दिन पहले उन्होंने यूरोपीय देशों को लताड़ते हुए कहा था कि उन्हें इस मानसिकता से निकलना चाहिए कि यूरोप की समस्याएं दुनिया की समस्याएं हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं यूरोप की समस्याएं नहीं हैं। इसी तरह जब पश्चिमी देशों ने रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और रूस से कच्चे तेल की खरीद पर सवाल उठाए तो उन्होंने ने उन्हें कड़ा जवाब देते हुए याद दिलाया कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और आम जनता के हितों को ध्यान में रखकर निर्णय लेता है। सुरक्षा और नैतिकता के  सवाल पर यूरोप द्वारा भारत को उपदेश देने पर पलटवार करते हुए उन्होंने कहा था कि कोई भी यूरोपीय देश भारतीय हथियारों से कभी खतरे में नहीं पड़ा, लेकिन यूरोपीय हथियारों ने दशकों तक भारत के खिलाफ काम किया है। उनका इशारा पाकिस्तान को दिए जाने वाले हथियारों की ओर था। दरअसल श्री जयशंकर की उक्त स्पष्टोक्तियां यूरोपीय देशों के उस उलाहने के बाद आईं जिसमें ये कहा गया था कि भारत ने रूस के साथ निकटता के चलते यूरोपीय हितों को नजरंदाज किया। रूस से तेल खरीदने के प्रश्न पर उन्होंने दो टूक कहा कि यूक्रेन युद्ध के शुरू होने के बाद जब यूरोपीय देशों ने अरब के तेल उत्पादक देशों से तेल की खरीदी बढ़ाई तब अमेरिका ने ही भारत से अनुरोध किया था कि रूस से कच्चा तेल खरीदे जिससे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतें स्थिर रहें। उन्होंने ये कहने में भी संकोच नहीं किया कि उसके बाद अमेरिका ने भारत पर टैरिफ बढ़ाने जैसी हरकत की। हालांकि इसके पूर्व भी भारत सरकार कई मर्तबा ये कह चुकी है कि वह अपने व्यावसायिक हितों के अनुरूप निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है और जहां से सस्ता मिलेगा वहां से वह खरीदी करने में संकोच नहीं करेगी। दरअसल अमेरिका और यूरोपीय देश आज भी गोरी चमड़ी वाले श्रेष्ठता के भाव से ग्रसित हैं। भले ही उपनिवेशों का दौर इतिहास बन चुका हो किंतु यूरोप अभी तक यही मानकर चलता है कि उनके अधीन रहे एशियाई और अफ्रीकी देश उनको पूर्ववत सम्मान देते रहें और जैसा वे चाहें वैसा ही करें। चूंकि पाकिस्तान जैसे देश आज भी इन देशों के सामने दुम हिलाते घूमते रहते हैं इसलिए भारत से भी वे वैसी ही अपेक्षा करते हैं और पूरी नहीं होने पर अनुचित दबाव बनाने से नहीं चूकते। कूटनीति में चूंकि प्रतिवाद भी सही समय पर और नपे - तुले शब्दों में किया जाता है इसीलिये अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प हों या कोई और , भारत की ओर से उनकी कटाक्षपूर्ण टिप्पणियों का जल्दबाजी में जवाब नहीं दिया जाता। विपक्ष इसे लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने में जुटा रहता है लेकिन विदेश नीति के अनुभवी लोग जानते हैं कि इस क्षेत्र में जल्दबाजी नुकसानदेह होती है। इसराइल - हमास, रूस - यूक्रेन और अब अमेरिका - ईरान जंग के बारे में भारत सरकार की प्रतिक्रियाओं में जो संयम और संतुलन दिखा वह हमारी विदेश नीति की परिपक्वता का प्रमाण है। ये बात सही है कि स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की तरह श्री मोदी के पास विदेश नीति का समुचित अनुभव भले न हो किंतु उनमें योग्य व्यक्ति का चयन करने की जबर्दस्त क्षमता है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में अजीत डोभाल और विदेश मंत्री के लिये श्री जयशंकर का चयन प्रधानमंत्री की पैनी नजर का सबूत है। यद्यपि स्व. सुषमा स्वराज ने भी विदेश मंत्री रहते हुए मोदी सरकार के दबदबे को वैश्विक मंचों पर बखूबी स्थापित किया था जिसे उनके उत्तराधिकारी श्री जयशंकर ने और भी ऊंचाई प्रदान कर दी। हालांकि जिस तरह श्री डोभाल के पास गुप्तचर सेवा का व्यापक अनुभव था ठीक वैसे ही श्री जयशंकर को भी विदेश सेवा में रहते हुए चीन और अमेरिका में राजदूत रहने के बाद विदेश सचिव बनने से कूटनीतिक क्षेत्र का व्यापक तजुर्बा है। इसीलिए वे दुनिया के बड़े से बड़े नेता से मिलते समय या किसी भी वैश्विक मंच पर  आत्मविश्वास से भरे नजर आते हैं। कब , कहां और कितना बोलना है इस कला में पारंगत विदेश मंत्री ने हाल ही में एक विदेशी पत्रकार द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान युद्धविराम करवाने में अमेरिका की भूमिका पर जो जवाब दिया वह उन लोगों के लिए आँखें खोलने वाला है जो अभी भी ये राग अलापते रहते हैं कि भारत ने अमेरिका के दबाव में युद्ध रोक दिया। प. एशिया में चल रहे वर्तमान तनाव के दौरान भी हमारी विदेश नीति ने संजीदगी का परिचय देते हुए युद्ध में शामिल सभी पक्षों से संवाद कायम रखकर जिस तरह राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा की वह प्रशंसनीय है। प्रधानमंत्री श्री मोदी द्वारा हाल ही में की गई 5 देशों की यात्रा भी उसी दिशा में बढ़ाया गया कदम था। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 12 June 2026

सं.रा.संघ का होना न होना बराबर


दूसरे विश्व युद्ध के बाद अस्तित्व में आए सं.रा.संघ का मुख्य कार्य दुनिया भर में शांति सहअस्तित्व और आपसी सहयोग की भावना विकसित करना है। उपनिवेशों का दौर धीरे - धीरे कमजोर पड़ने से छोटे - छोटे अनेक सर्वप्रभुता संपन्न देशों का उदय हुआ जिन्हें सं.रा.संघ की सदस्यता प्रदान कर बड़े देशों के साथ बराबरी से बैठने का अधिकार मिला। हालांकि सं.रा.संघ की सुरक्षा परिषद में पाँच स्थायी सदस्यों को मिले वीटो अधिकार की वजह से सामंती व्यवस्था के अवशेष कायम हैं किंतु दुनिया भर में मानवीयता की सेवा और साधनहीन देशों को संरक्षण प्रदान करने में इस विश्व संस्था ने प्रभावी भूमिका का निर्वहन भी किया। वहीं तनाव के अनेक अवसरों पर   मध्यस्थ बनकर दुनिया को जंग से बचाया। उसके द्वारा पोषण , स्वास्थ्य, शिक्षा और सेवा के अनेक प्रकल्प भी संचालित हो रहे हैं। यूनीसेफ और यूनेस्को जैसे नाम पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। सं.रा.संघ की महासभा के महासचिव का चुनाव सभी सदस्यों के मतदान से होता है। सुरक्षा परिषद में भी बारी - बारी से सामान्य सदस्य निर्वाचित होते हैं लेकिन पांच स्थायी सदस्यों को प्राप्त वीटो नामक अधिकार के कारण उनका होना न होना बराबर है क्योंकि इनमें से एक भी किसी फैसले को रोक सकता है। यही कारण है कि यह विश्व संस्था इन पांच सदस्य देशों के हाथ की कठपुतली बनकर रह गई है। ताजा उदाहरण इज़राइल - हमास, रूस - यूक्रेन और अमेरिका - इसराइल की ईरान के साथ चल रही जंग में सं.रा.संघ की उदासीन भूमिका है। युद्ध में विस्थापित हुए लोगों की सहायता करने में जरूर उसकी सक्रियता दिखाई दी लेकिन युद्धरत देशों के बीच सुलह करवाकर शांति स्थापना के अपने दायित्व के निर्वहन में वह पूरी तरह असफल रहा है। सबसे बड़ी विडंबना ये है कि उसने इस दिशा में समुचित प्रयास किए हों ऐसा भी नहीं लगता। इसके पीछे जाहिर तौर पर सुरक्षा परिषद के वीटो शक्ति सम्पन्न देशों का ही दबाव है जो अपने स्वार्थ के लिए पूरी दुनिया को आग में झोंकने में संकोच नहीं करते। इसराइल और हमास के बीच छिड़ी जंग में अमेरिका और उसके साथी पश्चिमी देश जहां इसराइल के साथ खड़े रहे वहीं रूस और चीन ने भले ही प्रत्यक्ष रूप से हमास का समर्थन न किया हो किंतु उनके द्वारा इजराइल का विरोध भी एक तरह से हमास के प्रति उनका झुकाव दर्शाता है। रूस और यूक्रेन की लड़ाई में अमेरिका , ब्रिटेन और फ्रांस मिलकर भी रूस को झुका नहीं सके क्योंकि सुरक्षा परिषद में वीटो नामक हथियार होने से वह अकेला ही सब पर भारी है। हालांकि चीन भी उसके पीछे ही खड़ा हुआ है। वर्तमान  में ईरान की अमेरिका और इसराइल के साथ हो रही जंग ने पूरी दुनिया को हलाकान कर रखा है। तेल उत्पादक देशों के इसमें शामिल हो जाने के कारण पूरे विश्व में पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और उर्वरक का संकट उत्पन्न हो गया है। कोरोना संकट से किसी तरह उबरी दुनिया उक्त तीन युद्धों के कारण अभूतपूर्व मुसीबत में फंसी हुई है। शांति के प्रस्ताव फटे हुए कागज के टुकड़ों की तरह उड़ते देखे जा सकते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प मोहल्ले के गुंडे की तरह व्यवहार करने पर आमादा हैं। लेकिन कोई उन्हें रोकने - टोकने वाला नहीं है। वे एक पल युद्ध समाप्त होने की बात करते और दूसरे ही पल ज़ोरदार हमले की धमकी देते हैं। कहने को ये लड़ाई कुछ देशों तक सीमित है लेकिन इसके कारण पैदा हुए ऊर्जा संकट ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है। इसीलिए ये अपेक्षा की जाती है कि सं.रा.संघ आगे आकर इसे रुकवाने और स्थायी शांति के लिए अपने प्रभाव का उपयोग करेगा किंतु शांति के लिए जो प्रयास चल रहे हैं उनमें उसकी कोई भूमिका नहीं होने से युद्ध की आग बुझने का नाम नहीं ले रही। उल्लेखनीय है ट्रम्प ने सत्ता में लौटते ही सं.रा.संघ की उपयोगिता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। केवल वे ही नहीं रूस के राष्ट्रपति पुतिन और चीन के  जिनपिंग भी अपनी स्वेच्छाचारिता के लिए कुख्यात हैं किंतु सं.रा.संघ में उन्हें रोकने तो क्या उनसे बात करने तक साहस नहीं बचा। एक समय था जब इस विश्व संस्था के महासचिव को पूरी दुनिया जानती थी किंतु अब तो वे खबरों से ही गायब होते जा रहे हैं। सं.रा.संघ के इसी निकम्मेपन के कारण दुनिया विनाश के कगार पर आ खड़ी हुई है। ऐसे में ट्रम्प की देखा सीखी अन्य देशों के नेता भी इसकी निरर्थकता का रोना रोने लग जाएं तो आश्चर्य होगा। कभी - कभी तो लगता है कि सं.रा.संघ जीते जी ही इतिहास बनने के कगार पर है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 11 June 2026

कांग्रेस को चाहिए ममता को उन्हीं के हाल पर छोड़ दे



 चुनाव में जीत - हार  चलती रहती है। कभी कोई पार्टी बड़ी जीत हासिल करती है तो कभी मतदाता उसे चारों खाने चित्त कर देते हैं। जीत के जश्न में तो वे भी शामिल हो जाते हैं जिनका उसमें कोई योगदान नहीं रहा । लेकिन हार के समय वे भी साथ छोड़ देते हैं जो कल तक आगे - पीछे मंडराया करते थे। प. बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी की  पार्टी तृणमूल कांग्रेस में विधानसभा चुनाव हारने के बाद जिस तेजी से टूटन हो रही है उससे एक बात स्पष्ट हो गई कि बिना किसी सैद्धांतिक और वैचारिक आधार वाली पार्टियों का ढांचा विपरीत परिस्थितियों में इसी प्रकार ढह जाता है। 1984 में भाजपा को मात्र  2 लोकसभा सीटें मिलीं। अटल बिहारी वाजपेयी तक हार गए किन्तु अपनी नीतिगत दृढ़ता और मजबूत सैद्धांतिक आधार के कारण मात्र 5 साल बाद ही उसने शानदार वापसी की और आज केंद्र के साथ देश के बड़े हिस्से पर उसका शासन है । कांग्रेस भी 2014 एवं 2019 के लोकसभा चुनाव में मान्यता प्राप्त विपक्ष तक नहीं बन सकी। लेकिन उसमें भी ऐसी भगदड़ नहीं हुई जैसी तृणमूल कांग्रेस में देखने मिल रही है। अन्य दलों को भी समय - समय पर ऐसी ही विपरीत परिस्थितियों से गुजरना पड़ा । ममता बैनर्जी के अलावा तमिलनाडु में स्टालिन और केरलम में विजयन को भी सरकार गँवाना पड़ी किंतु उनकी पार्टी में ऐसी स्थिति देखने नहीं मिली। अन्ना द्रमुक के कुछ विधायकों ने जरूर मुख्यमंत्री विजय को समर्थन देकर उनके बहुमत की समस्या दूर कर दी किन्तु जयललिता के न रहने के बाद वह पार्टी बिना राजा की फौज होकर रह गई इसलिए उसके विधायकों द्वारा पाला बदलने से ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ। लेकिन 15 वर्षों से प. बंगाल की एकछत्र नेत्री बनी रहीं सुश्री बैनर्जी का प्रभुत्व एक ही चुनावी हार के बाद जिस तेजी से बिखरता जा रहा है उसे देखते हुए  कहा जा सकता है कि दो दशक बाद भी तृणमूल कांग्रेस अपना सैद्धांतिक या वैचारिक आधार तैयार नहीं कर सकी। ममता बैनर्जी ने सबसे पहले कांग्रेस की रीढ़ तोड़ी और फिर वामपंथी गुंडों को शामिल कर अपने पैर जमाए। लेकिन सत्ता की चाहत में उन्होंने तुष्टीकरण का जो रास्ता चुना उसके कारण उन्हें सत्ता का सुख तो मिलता रहा लेकिन पार्टी का कोई वैचारिक आधार नहीं बन सका। इसीलिये वे भीड़ की नेता बनकर रह गईं। लगातार तीन चुनाव जीतने के कारण वे खुद को अपराजेय समझ बैठीं और यही गलती उनके लिए आत्मघाती साबित हुई। मात्र एक महीने के भीतर ही तृणमूल तिनके की तरह बिखरने लगी तो उसका मुख्य कारण यही है कि ममता के इर्द - गिर्द जिन लोगों का जमावड़ा रहा उनके निहित स्वार्थ थे। वरना जिन लोगों को उन्होंने सड़क से उठाकर संसद पहुंचा दिया वे इस तरह छोड़ - छोड़कर नहीं भागते। तृणमूल का आरोप है कि सीबीआई और ईडी का डर दिखाकर भाजपा ये सब करवा रही है। लेकिन 60 विधायकों के साथ 20 सांसदों के बागी हो जाने के बाद उक्त आरोप बेमानी लगता है। सही बात ये है कि ये सभी घोर अवसरवादी और सत्ता लोलुप लोग हैं। ऐसे ही तमाम लोग 2021 के चुनाव के बाद भाजपा छोड़ तृणमूल में शामिल हुए थे। इस सामूहिक विद्रोह के बाद ममता का सारा घमंड मिट्टी में मिल गया। जिस कांग्रेस की जड़ें खोदकर उन्होंने प. बंगाल में अपने पाँव जमाये आज उसी के आगे वे नतमस्तक नजर आ रही हैं। कल तक राहुल उन्हें फूटी आँखों नहीं सुहाते थे किंतु आज उनके साथ काम करने वे गांधी परिवार के चक्कर काट रही हैं। खबर तो तृणमूल के कांग्रेस में विलय की भी उड़ रही है। कुल मिलाकर  वर्तमान स्थिति के लिए वे स्वयं जिम्मेदार हैं जिन्होंने चुनावी जीत के लिए राजनीतिक रिश्ते तो खराब किए ही सारे सिद्धांत ताक पर रख दिए। बांग्लादेशी घुसपैठियों को जिस प्रकार वहां बसाया गया वह देश हित के सर्वथा विरुद्ध था। इसीलिये प. बंगाल की जनता ने तृणमूल की जड़ें खोद डालीं। आने वाले दिनों में ममता का क्या भविष्य होगा इस पर सभी की निगाहें लगी रहेंगी किन्तु तृणमूल कांग्रेस का इतिहास बनना सुनिश्चित हैं। वैसे कांग्रेस के लिये यही बेहतर रहेगा कि वह ममता को उनके हाल पर छोड़ दे क्योंकि उन्होंने प. बंगाल की सत्ता हासिल करने की लालच में कांग्रेस के लिए जो गड्ढा खोदा उसकी सजा उन्हें मिलना ही चाहिए वरना वे कांग्रेस का वही हाल करेंगी जो बांग्लादेशी घुसपैठियों ने प. बंगाल का किया था।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 10 June 2026

देश के आत्मविश्वास में वृद्धि मोदी की सबसे बड़ी सफलता


भाजपा इस बात का जश्न मना रही है कि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद पर सर्वाधिक समय तक रहने का स्व.पं. जवाहरलाल नेहरू का कीर्तिमान तोड़ दिया। हालांकि वे  स्व. इंदिरा गांधी के  मुकाबले काफी पीछे हैं। लेकिन किसी गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री का 12 वर्ष से पद पर बने रहना कल्पनातीत था। यद्यपि स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने उस भ्रांति को ध्वस्त किया था कि विपक्ष में सरकार चलाने की योग्यता नहीं है। उन्होंने 1999 से 2004 तक लगातार गठबंधन सरकार चलाकर  राजनीतिक कौशल का परिचय तो दिया ही ये बात भी साबित कर दी कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा ही कांग्रेस का विकल्प है। इसीलिये दस साल बाद जब डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के विरुद्ध सत्ता विरोधी लहर उत्पन्न हुई तब जनता ने नरेंद्र मोदी को स्पष्ट बहुमत प्रदान किया । उल्लेखनीय है श्री वाजपेयी  और श्री मोदी  कभी कांग्रेस में नहीं रहे।  भाजपा को मुख्यधारा की पार्टी बनाने में अटल जी और लालकृष्ण आडवाणी की जोड़ी का योगदान अविस्मरणीय है। लेकिन  उसका विस्तार राष्ट्रीय स्तर पर करने का श्रेय श्री मोदी को ही दिया जाना चाहिए। हालांकि इसमें गृहमंत्री अमित शाह की भूमिका को स्वीकार नहीं करना उनके साथ अन्याय होगा परंतु आज भाजपा जिस शिखर पर है उसके मुख्य शिल्पकार तो प्रधानमंत्री मोदी ही हैं। आज बीते 12 वर्षों की उनकी उपलब्धियों  के साथ गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होंने जो  कर दिखाया उसका भी उल्लेख होना चाहिए जिससे प्रभावित हो जनता ने उन्हें  देश की बागडोर सौंप दी। अपने पहले कार्यकाल में ही उन्होंने अपनी क्षमता का प्रमाण दे दिया था। इसीलिए 2019 में और बड़ी सफलता के साथ सत्ता में लौटे। हालांकि 2024 के परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे किन्तु उनकी स्वीकार्यता कायम रही और बीते दो सालों में कभी भी ऐसा नहीं लगा कि उनकी सरकार बैसाखियों पर टिकी होने से अस्थिर है। हालांकि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी  दावे करते रहे कि ये सरकार गिरने वाली है। लेकिन हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली , बिहार, असम, प. बंगाल और पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव जीतकर श्री मोदी ने उन दावों की हवा निकाल दी। ऐसा नहीं है कि उनके कार्यकाल में रामराज आ गया है और देश एक आदर्श स्थिति में पहुंच गया। लेकिन सबसे बड़ी उपलब्धि  ये है कि उन्होंने देश के आत्मविश्वास को उस ऊंचाई तक पहुंच गया जहां से वह लंबी छलांग लगाने का साहस कर सकता है। आज की दुनिया में भारत की जो मजबूत और सम्मानजनक स्थिति है उसमें प्रधानमंत्री की कूटनीतिक सक्रियता और ठोस निर्णय लेने की क्षमता का योगदान उल्लेखनीय है। आंकड़ों और सरकारी दावों से पूरी तरह अलग वास्तविकता के धरातल पर उतरकर देखें तो  जनसामान्य में ये भरोसा तो उत्पन्न हुआ ही है कि श्री मोदी विपरीत हालातों के बाद भी देश को आगे ले जाने में सफल होंगे। उनकी सरकार द्वारा संचालित जनहित के कार्यों एवं योजनाओं का प्रचार तो सरकार एवं भाजपा करती रहती है इसलिए उनका बखान करने की जरूरत नहीं है। लेकिन  ये कहना सही होगा कि डॉ. मनमोहन सिंह की तुलना में मोदी सरकार का प्रदर्शन इसलिए बेहतर है क्योंकि इसने लोगों में ये विश्वास जगाया है कि देश आर्थिक और सैन्य क्षेत्र में एक बड़ी ताकत है जिसकी उपेक्षा करना किसी के लिए भी संभव नहीं रहा।  पं. नेहरू ने जब सत्ता संभाली तब उनके सामने देश के पुनर्निर्माण की चुनौती तो थी किंतु राजनीतिक दृष्टि से वे चुनौती विहीन रहे। उनके विपरीत सत्ता में आते ही चाहे गांधीनगर हो या नई दिल्ली,श्री मोदी को हर कदम पर चुनौतियों से जूझना पड़ा। और इसीलिए उनके कार्यकाल के 12 वर्ष हर दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। इस दौरान देश हर मोर्चे पर आगे बढ़ा है। दुनिया में श्री मोदी के प्रति आदर और आकर्षण दोनों बढ़े जिसका लाभ भारत की छवि को भी मिल रहा है। चुनौतियों और श्री मोदी का पिछले जन्म का साथ लगता है। लेकिन बजाय डरने के वे उन पर विजय प्राप्त करने के लिए कमर कसकर तैयार रहते हैं। उनका उत्साह और परिश्रम वृति युवाओं के लिए भी प्रेरणा स्रोत है। ये कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि वे  राष्ट्रीय राजनीति में सबसे लोकप्रिय व्यक्तित्व हैं और यही उनकी शक्ति है। हालांकि उनके विरोधी भी कम नहीं हैं किंतु लाख कोशिशों के बावजूद वे उन्हें घेरने में कामयाब नहीं हो पा रहे । राजनीति में उतार - चढ़ाव आते रहते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति या पार्टी के भविष्य के बारे में स्थायी अवधारणा बना लेना सही नहीं होता। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में उनके कद और काबलियत के बराबर कोई शख्सियत नजर नहीं आ रही। रही बात उनके शत्रुओं में वृद्धि की तो चाणक्य नीति का ये उद्धरण इसका जवाब है कि जिसकी शक्ति बढ़ती है, उसी के शत्रु भी बढ़ते हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 9 June 2026

इंडिया गठबंधन की बैठक उत्साह पैदा करने में सफल नहीं रही


दो साल बाद हुई इंडिया गठबंधन की बैठक से ज्यादा उत्सुकता तो  दिल्ली में हुए कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के बारे में देखी गई । वहीं इंडिया गठबंधन को लेकर घटक दलों में ही निराशा व्याप्त रही। 2023 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहल पर यह  बना था। इसका नाम राहुल गांधी ने सुझाया था जो दरअसल इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस है। हिंदी में इसे भारतीय राष्ट्रीय विकासशील समावेशी गठबंधन कहा जाता है। इसका उद्देश्य नरेंद्र मोदी को रोकना था। लेकिन शुरू में ही अपशकुन हो गया जब नीतीश कुमार  भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में वापस आ गए। चन्द्रबाबू नायडू ने भी  भाजपा से हाथ मिला लिया। हालांकि  भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला किंतु नीतीश और नायडू के समर्थन से मोदी प्रधानमंत्री बन ही गए। उस चुनाव में कांग्रेस 99 सीटों के साथ  मुख्य विपक्षी दल बन गई ओर राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष। लेकिन इसके बाद उसमें घमंड आ गया। गठबंधन के अन्य नेताओं के साथ श्री गांधी के व्यवहार में भी रूखापन आया। जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव में उनकी  कार्यशैली पर तो उमर अब्दुल्ला ने भी सार्वजनिक  टिप्पणी कर डाली। हरियाणा में गठबंधन में खुलकर टूटन दिखाई आई और अरविंद केजरीवाल ने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारकर कांग्रेस के लिए गड्ढा खोद दिया। महाराष्ट्र  में यद्यपि गठजोड़ कायम रहा लेकिन भाजपा नीत महायुति ने ऐतिहासिक बहुमत हासिल कर लोकसभा की हार का बदला ले लिया। दिल्ली में कांग्रेस  हरियाणा का बदला लेते हुए सभी सीटों पर लड़ी ।  लेकिन सपा और तृणमूल ने  कांग्रेस को धता बताते हुए आम आदमी पार्टी का साथ दिया। उधर गठबंधन के भीतर से ही  आवाजें उठने लगीं कि वह केवल लोकसभा चुनाव तक ही था।  प. बंगाल ताजा उदाहरण है जहाँ तृणमूल , वामपंथी और कांग्रेस अलग - अलग लड़े। केरल में कांग्रेस और वामपंथी एक दूसरे के दुश्मन बने रहे। तमिलनाडु में कांग्रेस ने द्रमुक के साथ ही चुनाव लड़ा लेकिन जब सत्ता स्टालिन के हाथ से खिसक गई तब पाला बदलकर अभिनेता विजय की सरकार में हिस्सेदारी हासिल कर ली। इससे नाराज द्रमुक ने इंडिया गठबंधन को छोड़ने की घोषणा कर दी। आम आदमी पार्टी ने भी दूरी बना ली क्योंकि पंजाब में कांग्रेस के साथ उसका मुकाबला है और गुजरात में भी वह उसको नुकसान पहुंचाने में जुटी है। इन सब कारणों से इंडिया गठबंधन लोकसभा चुनाव के बाद  निष्क्रिय हो चला था। कांग्रेस अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटी रही तो क्षेत्रीय पार्टियां अपना गढ़ सुरक्षित रखने में व्यस्त रहीं। लेकिन लगातार हारने के बाद सबके होश ठिकाने आ गए । इसीलिए किसी अन्य दल को सुई की नोंक के बराबर जमीन न देने  वाली सुश्री बैनर्जी सत्ता गंवाने के बाद उस इंडिया गठबंधन को मजबूत करने के लिए उछलने लगीं जिसका कबाड़ा करने में उनका योगदान भी कम नहीं है। लेकिन गठबंधन की बैठक के पहले फिर अपशकुन हो गया । तृणमूल के 58 विधायक टूटने  के बाद  पार्टी के 20 सांसद भी एनडीए के साथ चले गए। आम आदमी पार्टी और द्रमुक के खुले बहिष्कार के अलावा उद्धव ठाकरे तथा झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी केवल आभासी माध्यम से हाजिरी दर्ज की । खबर है हेमंत भी भाजपा के संपर्क में हैं। कुल मिलाकर बैठक तो हो गई लेकिन वह उत्साह नजर नहीं आया जो अपेक्षित भी था और आवश्यक भी। एस.आई.आर के विरोध में देश के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखने जैसा निर्णय निहायत बचकाना है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय उसे पूरी तरह सही ठहरा चुका है। बाकी बातें वही हैं जो रोज  सुनाई देती हैं। इसीलिये भाजपा विरोधी राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार भी कल की बैठक के बाद निराश नजर आए। होना तो चाहिए था कि गठबंधन अपने नेता और साझा कार्यक्रम के बारे में फैसला करता क्योंकि नेतृत्व और नीतिगत अस्पष्टता इसकी सबसे बड़ी कमी है। वहीं एनडीए में श्री मोदी को एकमुश्त समर्थन है। उल्लेखनीय है गठबंधन के संयोजक पद को लेकर ममता के विरोध के कारण ही नीतीश ने एनडीए का दामन थामा था। लगता है गठबंधन में शामिल नेता पिछली गलतियों से सबक लेने को तैयार नहीं हैं। द्रमुक और आम आदमी पार्टी के गठबंधन छोड़ने और तृणमूल में खुले विद्रोह से वैसे ही यह जमावड़ा  कमजोर हो  गया है। 2024 के बाद केरल को छोड़ कांग्रेस के कंधों पर भी पराजय का बोझ बढ़ता गया। और फिर आपसी विश्वास की भी कमी है। शरद पवार शारीरिक तौर पर अशक्त हो चले हैं और सोनिया गांधी भी मैदानी राजनीति से दूर हैं। ममता राजनीतिक तौर पर निरीह अवस्था में आ चुकी हैं। बचे अखिलेश तो उ.प्र से आ रहे संकेत योगी बाबा की वापसी पुख्ता कर रहे हैं। इसीलिये भाजपा विरोधी समीक्षकों को भी 2029 में विपक्ष के लिए कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही।


- रवीन्द्र वाजपेयी