Friday, 9 October 2026

मेडिकल माफिया पर लगाम कसे बिना स्वस्थ भारत का सपना अधूरा



सर्वोच्च न्यायालय की कड़ाई  के बाद अब सरकार  भी कैंसर की दवाइयों पर हो रही मुनाफाखोरी के विरुद्ध कदम उठाने जा रही है। इसके अंतर्गत 110 दवाओं के दाम घटाए जाएंगे। इसके प्रभावस्वरूप इन दवाओं पर मुनाफा अंकित अधिकतम मूल्य के 30 फीसदी से ज्यादा नहीं होंगे। अब तक ये दवाएं सरकारी नियंत्रण की सूची से बाहर रही हैं।  इस फैसले से मरीजों के सालाना 2500 करोड़ बचेंगे क्योंकि ब्रांडेड और जेनेरिक दोनों प्रकार की दवाइयाँ सस्ती होंगी। ये फैसला निश्चित रूप से जनहित में है किंतु ये सवाल भी स्वाभाविक रूप से उठता है कि सर्वोच्च न्यायालय की फटकार के बाद ही सरकार की नींद क्यों खुली? हालांकि वर्तमान केंद्र सरकार ने इसके पहले भी कैंसर सहित उच्च रक्त चाप और मधुमेह की दवाओं को सस्ता किया किंतु दवा कंपनियों और चिकित्सकों की मिलीभगत के चलते मरीजों से लूटपाट बेरोकटोक जारी रही। केन्द्र सरकार की आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के अंतर्गत गरीबों और वरिष्ट नागरिकों को सरकारी और निजी अस्पतालों में 5 लाख तक के निःशुल्क इलाज की जो सुविधा दी गई उसमें भी घपलेबाजीे की शिकायतें लगातार मिल रहीं हैं। निजी अस्पताल वाले ऐसी सेवाएं और जांचों का बिल बना देते हैं जो न तो सरकार की योजनाओं में स्वीकृत होता है और न ही स्वास्थ्य बीमा कंपनियों द्वारा मान्य किया जाता है। लेकिन इन योजनाओं के अलावा जो मरीज निजी अस्पतालों में भर्ती होते हैं उनसे दवाओं और उपकरणों आदि के पाँच - दस गुना दाम तक वसूले जाते हैं। अस्पताल परिसर में संचालित दवा दुकानों से ही खरीदने की मजबूरी के चलते मरीज और उसके परिजनों के समक्ष अपना शोषण होते देखकर भी चुप रहने की मजबूरी रहती है। ऐसा नहीं है कि सरकार इससे अनभिज्ञ हो किंतु जिस शासकीय अमले पर इसे रोकने का दायित्व है वही इसका संरक्षक बना रहता है। दवा कंपनियों द्वारा दिये जाने वाले कमीशन और सुविधाओं को रोकने की लाख कोशिशों के बाद भी वह बदस्तूर जारी है।  निजी चिकित्सक द्वारा लिखी दवा उसके अपने क्लीनिक या फिर बगल वाली दुकान पर ही उपलब्ध होना अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है। संक्षेप में कहें तो पूरे देश में मेडिकल माफिया का बोलबाला है जिसने समूचे चिकित्सा जगत को अपने शिकंजे में फंसा रखा है। अपवादस्वरूप कुछ चिकित्सकों को छोड़ दें तो ज्यादातर अंधाधुंध कमाई के फेर में वह शपथ भुला बैठे हैं जो चिकित्सक बनते समय उन्होंने ली। डॉक्टर को भगवान मानने जैसी भावना इसीलिए लुप्त हो चली है। निजी अस्पताल जहाँ अनाप - शनाप कमाई के अड्डे बन चुके हैं वहीं सरकारी चिकित्सा व्यवस्था ज्यादातर जगहों पर खुद ही बीमार है। वहाँ डॉक्टरों के अलावा नर्सिंग स्टाफ, जाँच के साधन और दवाइयों का टोटा आम बात है। समाचार माध्यमों द्वारा लगातार इस ओर ध्यान आकर्षित किया जाता है। लेकिन सरकारी तंत्र कान में रुई ठूंसे बैठा रहता है। कभी - कभार कोई कार्रवाई करने का दिखावा भी होता है किंतु ले देकर वही ढाक के तीन पात वाली स्थिति बनी रहती है। सर्वोच्च न्यायालय की पहल पर केंद्र सरकार ने कैंसर की दवाएं सस्ती करने का रास्ता तो निकाल दिया किंतु ऐसी ही व्यवस्था अन्य दवाओं के अलावा इलाज में उपयोग आने वाली छोटी - छोटी चीजों के बारे में भी की जानी चाहिये। इसके अलावा निजी अस्पतालों के कमरों विशेष रूप से आईसीयू के किरायों पर भी लगाम लगानी चाहिए। इन अस्पतालों में आने वाले डॉक्टर पूरे वार्ड के मरीजों को देखते हैं लेकिन हर मरीज के बिल में  मोटी फीस जोड़ दी जाती है। और भी ऐसी विसंगतियाँ हैं जिनकी सूची बहुत लंबी है। इतने बड़े देश में व्याप्त  अव्यवस्था को एक झटके से सुधारना तो संभव नहीं । लेकिन सरकार  चरणबद्ध योजना बनाये तो ये असंभव भी नहीं, बशर्ते नीति और नीयत दोनों सही हों। फिलहाल तो कैंसर की दवाओं को सस्ता करने की पहल स्वागत योग्य है। इसके साथ ही डॉक्टरों को जेनरिक दवाएं लिखने के लिए बाध्य किया जाना भी जरूरी है जो स्पष्ट निर्देश के बावजूद भी ब्रांडेड दवा लिखने से बाज नहीं आते।  सरकार को ये बात समझ लेनी चाहिये कि मेडिकल माफिया पर लगाम कसे बिना बिना स्वस्थ भारत का सपना साकार नहीं हो सकेगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 8 October 2026

विपक्ष में एकजुटता नहीं होने से आंदोलन धड़ों में बंट रहा



मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध विपक्ष द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन में एकजुटता का अभाव है। अब तक दिल्ली में जो विरोध प्रदर्शन, धरना और गिरफ़्तारियाँ हुईं उनमें कांग्रेस ही आगे - आगे रही जिससे  सभी कैमरे राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा पर ही केंद्रित रहे। उन्होंने भी हर वह तरीका आजमाया जिससे सुर्खियों में रहें। आज की राजनीति में वह  दौर नहीं रहा जब सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष में वैचारिक मतभेदों के बावजूद परस्पर सम्मान का भाव था। विरोध भी सांकेतिक ज्यादा होता था। बड़े - बड़े आंदोलन दिल्ली में हुए , लाखों की रैलियां निकलीं किंतु कुछ अपवाद छोड़कर पुलिस एवं प्रशासन को वह सब नहीं झेलना पड़ा जो अब दिखाई दे रहा है। 6 मार्च 1975 को दिल्ली में लाल किले से बोट क्लब तक विशाल रैली निकाली गई जिसमें सी.पी.आई को छोड़कर समूचा विपक्ष शामिल हुआ और देश भर से लाखों लोग आये।  हालांकि उसमें चौ. चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडीज और चंद्रशेखर जैसे दिग्गज शामिल थे किंतु  नेतृत्व जयप्रकाश नारायण और आचार्य कृपालानी को दिया गया। बोट क्लब पर हुई सभा को भी उन दोनों ने ही संबोधित किया। लोकसभा भंग करने की मांग वाला ज्ञापन लोकसभा अध्यक्ष गुरदयाल सिंह ढिल्लों को वे दोनों दे आये और आयोजन खत्म हो गया। उस दिन यदि मंच से संसद भवन में घुसने का आह्वान किया जाता तो वही सब होना तय था जो कई दशकों बाद श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में देखने मिला। लेकिन लाखों के जनसमूह में किसी का भी पुलिस  से विवाद नहीं हुआ। आज वैसे आंदोलन की कल्पना नहीं की जा सकती। राहुल गाँधी बैरिकेटिंग पर चढ़ गए तो उसे बड़ी घटना बताया जा रहा है। प्रियंका सड़क पर लेटकर खुद को क्रांतिकारी साबित करने के प्रयास में हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलने का समय मांगे बिना चुनाव आयोग में घुसने से रोकने पर आकाशवाणी परिसर में जबरन घुसकर घंटों बैठे रहना ये दर्शाता है कि मुद्दे के प्रति गंभीरता की बजाय अपनी छवि चमकाने का अभियान चलाया जा रहा है। किसी भी बड़े आंदोलन का कोई चेहरा या नेता होता है। लेकिन अभी तक वोट चोरी के विरोध में चल रहे इस विरोध का नेता कौन है और  विपक्षी दलों एवं संगठनों के बीच समन्वय कायम करने की जिम्मेदारी किसके पास है, ये कोई नहीं जानता। यही वजह है कि समाजवादी पार्टी एक दिन पहले आंदोलन में नजर आई किंतु दूसरे दिन नदारत हो गई। और जो सबसे बड़ी कमी  नजर आ रही है वह है कुछ विपक्षी दलों द्वारा  अलग खिचड़ी पकाना। इनमें आम आदमी पार्टी प्रमुख है जो पंजाब और गुजरात में कांग्रेस की प्रतिद्वंदी है।  तमिलनाडु की द्रमुक भी आंदोलन से दूर है। उसकी वजह राहुल गाँधी द्वारा उसके साथ  गठबंधन को तोड़कर मुख्यमंत्री जोसेफ विजय की पार्टी को समर्थन देना है। इसी तरह जंतर मंतर पर धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र  की मांग को लेकर आंदोलन कर सुर्खियों में आई कॉकरोच जनता पार्टी भी समानांतर आंदोलन चला रही है। उसके द्वारा 10 तारीख को जंतर मंतर पर बड़ा प्रदर्शन करने की घोषणा से  आंदोलन के कई धड़ों में बंट जाने की आशंका है। ये भी स्पष्ट है कि आम आदमी पार्टी और कॉकरोच जनता पार्टी में संगामित्ती है। अनेक वामपंथी संगठन भी उनके  साथ हैं। दूसरी तरफ अखिलेश यादव बजाय दिल्ली में मौजूद रहने के अयोध्या में प्रचार कर रहे हैं। कांग्रेस की परेशानी ये है कि विपक्ष में बड़े चेहरों का अभाव है। ममता बैनर्जी और उद्धव ठाकरे की चमक खत्म हो चुकी है। लालू प्रसाद यादव की साख और स्वास्थ्य दोनों खराब हैं । ऐसे में आंदोलन का न तो कोई स्वरूप बन पा रहा है न ही विपक्षी एकजुटता नजर आ रही है। इसलिए इसकी आयु ज्यादा नहीं लगती। देखने वाली बात ये होगी कि क्या 10 तारीख को कॉकरोच जनता पार्टी अपने पिछले प्रदर्शन को दोहरा सकेगी ? यदि वह ऐसा कर सकी तब इस आंदोलन की बागडोर कॉकरोच जनता पार्टी के पास जाने की पूरी - संभावना है जो श्री गाँधी को स्वीकार्य नहीं होगा। ये देखते हुए आने वाले कुछ दिनों में इस आंदोलन की दिशा और दशा दोनों तय होंगी। यदि समूचा विपक्ष एक मंच पर नहीं आया तो फिर इस मुहिम का अंजाम तक पहुंचना मुश्किल है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 7 October 2026

मोदी के 25 साल : सत्ता विरोधी लहर को सत्ता समर्थक लहर में बदलने का कारनामा



राहुल गाँधी के उस बयान में आश्चर्य से अधिक  हताशा थी जिसमें उन्होंने कहा था कि भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी (सत्ता-विरोधी लहर) गायब हो गई है। कुछ समय पहले पत्रकार वार्ता में अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए वे बोले कि दुनिया के लोकतंत्रों और भारत के ऐतिहासिक चुनावी दौर में सरकारों के खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी एक आम बात रही है। हरियाणा, महाराष्ट्र और उ.प्र जैसे राज्यों का जिक्र करते हुए श्री गाँधी ने कहा कि जहां पहले सत्ता बदलती रहती थी, वहां अब भाजपा के मामले में यह लहर क्यों नजर नहीं आती। दरअसल उक्त बातों के जरिये उन्होंने चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर अपनी भड़ास निकाली। वहीं भाजपा ने जवाब में कहा कि राहुल को राजनीतिक इतिहास और एंटी इनकम्बेंसी की समझ नहीं है। पार्टी ने तमिलनाडु, प. बंगाल और पूर्वोत्तर  राज्यों का उदाहरण देते हुए कहा कि कई दल दशकों तक  जनता के मजबूत समर्थन (प्रो-इनकम्बेंसी) के कारण सत्ता में बने रहे हैं। हालांकि इस तरह की बयानबाजी  राजनीतिक दलों के लिए रोजमर्रे का काम है। लेकिन भाजपा और प्रधानमंत्री के विरुद्ध सत्ता विरोधी लहर नहीं चलने के लिए श्री गाँधी चुनाव आयोग को जिस तरह कटघरे में खड़ा करने पर आमादा हैं वह  असफलताओं से उत्पन्न खीझ का प्रमाण है। ऐसा कहने से पहले उन्हें भारतीय राजनीति का गहराई से अध्ययन करना चाहिए था। असल में उन्हें ये लगता था कि प्रधानमंत्री के प्रपौत्र, पौत्र और पुत्र होने मात्र से जनता उनकी ताजपोशी कर देगी ।  दो दशक से ज्यादा के संसदीय जीवन के बावजूद उन्हें ये  समझ  नहीं आया कि  जिन नेताओं ने सत्ता में लम्बी पारी खेली उन्होंने अपना जनाधार बनाया। उदाहरण के लिए उड़ीसा में बीजू पटनायक के पुत्र नवीन पटनायक राजनीति से कोसों दूर थे किंतु सत्ता मिलने के बाद सुशासन के कारण 25 साल मुख्यमंत्री रहे। इसी तरह प. बंगाल में 1977 से 2000 तक ज्योति बसु और 2011 से ममता बैनर्जी ने 15 साल तक एकछत्र राज किया। वहीं तमिलनाडु में 1967 से 6 दशकों तक द्रविड़ आंदोलन से निकली द्रमुक और अन्ना द्रमुक का वर्चस्व  रहा। उक्त दोनों राज्यों में कांग्रेस क्रमशः 50 और 60 वर्षों से सत्ता से बाहर है और निकट भविष्य में भी उसकी संभावना शून्य है। वहीं उत्तर प्रदेश, बिहार, और गुजरात में भी श्री गाँधी की पार्टी जनता  का भरोसा जीतने में उस समय भी नाकामयाब रही जब केन्द्र में कांग्रेस या उसकी समर्थित सरकारें थीं और चुनाव आयोग में भी ऐसे आयुक्त थे जो सेवा निवृति के बाद कांग्रेस टिकिट पर चुनाव लड़े और मंत्री भी बने। श्री गाँधी ये भी  भूल गए कि बिहार में लालू प्रसाद यादव की पत्नी तक गद्दी पर बैठीं जो विशुद्ध गृहिणी थीं। लेकिन आज तक श्री गाँधी ने ने ज्योति बसु, नवीन पटनायक ,  करुणानिधि, ममता बैनर्जी और लालू प्रसाद यादव के लंबे समय तक सत्ता में रहने  पर न आश्चर्य जताया और न ही चुनाव आयोग को दोषारोपित ही किया। ऐसे में  नरेंद्र मोदी के विरुद्ध सत्ता विरोधी लहर पैदा न होने पर चीख - पुकार करना ये दर्शाता है कि विपक्ष में रहते हुए वे कितने बेचैन हैं? आज श्री मोदी ने  सत्ता में रहते हुए 25 वर्ष पूर्ण कर लिए । 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमन्त्री के बनने के बाद 2014 में वे प्रधानमंत्री बने। 25 साल तक सरकार के मुखिया पद पर बने रहने के उनके इस कारनामे में चुनाव आयोग का योगदान होने की बात कहना निरी मूर्खता है। रा.स्व.संघ के प्रचारक से प्रधानमंत्री तक की उनकी यात्रा शून्य से शिखर तक पहुँचने का शानदार उदाहरण है। अति साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि के बाद भी यदि उन्होंने देश का सर्वोच्च राजनीतिक पद हासिल किया तो इसका श्रेय उनके व्यक्तित्व और उससे भी बढ़कर कृतित्व को जाता है। बजाय दिन - रात उनकी आलोचना करने के श्री गाँधी को उनसे ये सीखना चाहिए कि जनता के मन में जगह कैसे बनाई जाती है? चुनाव आयोग के विरुद्ध व्यर्थ की लड़ाई लड़ने के बजाय यदि श्री वे उ.प्र , पंजाब और उत्तराखंड के आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर ध्यान दें तो बेहतर होगा, जहाँ कांग्रेस की हालत बेहद खराब है। कभी - कभी तो लगता है  सुनिश्चित पराजय का आभास होने के कारण ही वे चुनाव आयोग पर अभी से ठीकरा फोड़ने में जुट गए हैं। श्री मोदी का 25 वर्ष से लगातार सत्ता प्रमुख बने रहना इस बात का प्रमाण है कि यदि शासन चलाने वाले में जनता की नब्ज जानने की योग्यता हो तो सत्ता विरोधी लहर की बजाय सत्ता समर्थक लहर चलती है ।  वरना लोकसभा की 400 सीटें जीतने के बाद भी राजीव गाँधी महज 5 साल बाद ही गद्दी से उतार दिये गए। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 6 October 2026

ज्ञानेश का भविष्य सर्वोच्च न्यायालय में ही तय होगा सड़कों पर नहीं



मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की  मांग खारिज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जो टिप्पणियाँ कीं उनके बाद विपक्ष द्वारा उनके त्यागपत्र को लेकर किया जा रहा आंदोलन समय और शक्ति की बर्बादी ही है। हालांकि उसका ये अधिकार है कि लोकतंत्रिक तरीकों से आवाज उठाए क्योंकि इससे जनता को उनकी सक्रियता का पता चलता है। कांग्रेस पर ये आरोप लंबे समय से लगता आ रहा है कि वह विपक्ष की भूमिका का समुचित निर्वहन नहीं कर पा रही। राहुल गाँधी के बारे में ये अवधारणा जनमानस में घर कर चुकी थी कि वे सोशल मीडिया पर ही राजनीति करते हैं । महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम के दौरान उनकी गुप्त विदेश यात्राएं भी आलोचना और उपहास का कारण बनती रहीं। उस लिहाज से बीते कुछ समय से उनका सक्रिय रहते हुए  सरकार के विरोध में मुद्दे उठाना और समाज के विभिन्न वर्गों के बीच जाकर प्रत्यक्ष संवाद करना उनके और कांग्रेस दोनों के लिए लाभप्रद है ।  इन दिनों ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के विरुद्ध  जो आंदोलन चल रहा है वह श्री गाँधी के लगातार किये जा रहे प्रयासों का परिणाम है। लेकिन इसी के साथ ही ये बात भी काबिले गौर है कि कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों के अलावा कॉकरोच जनता पार्टी सहित  वामपंथी छात्र संगठनों द्वारा किये जा रहे इस आंदोलन को हवा एक अखबारी रिपोर्ट से मिली। जिसमें ये दावा किया गया था कि चुनाव आयोग में  कुछ ऐसे फैसले हुए जिनसे मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा शेष दो अन्य चुनाव आयुक्त सहमत नहीं थे। और ये भी कि दर्जन भर से ज्यादा निर्णयों में दोनों आयुक्तों ने अपनी सहमति नहीं दी जिसका सीधा मतलब है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने बहुमत की उपेक्षा करते हुए उन्हें लागू किया। यद्यपि विपक्ष के पास इस आरोप की पुष्टि हेतु अब तक कोई दस्तावेजी  प्रमाण नहीं है और उसका आंदोलन भी संबंधित अखबारी समाचार पर आधारित है। फिर भी राहुल सहित कुछ और विपक्षी नेताओं ने ज्ञानेश कुमार के निलंबन और गिरफ्तारी की मांग तक कर डाली। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने  साफ कह दिया कि वह समाचार पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर ज्ञानेश कुमार को काम करने से नहीं रोकेगा। हालांकि न्यायालय द्वारा कही गई ये बातें विपक्ष को अच्छी लगी होंगी कि उसने फॉर्म - 6 में बदलाव की अनुमति नहीं दी और चुनाव आयोग में बिना बहुमत या सर्वसम्मति से कोई फैसला हुआ तब उसे रद्द कर दिया जाएगा। इस प्रकार चुनाव आयोग द्वारा लिए गए विवादित फैसलों के साथ ही ज्ञानेश कुमार का भविष्य अब सर्वोच्च न्यायालय के हाथ में हैं जिसने आयोग को नोटिस देकर जवाब मांगा है। उसके जवाब से सर्वोच्च न्यायालय कितना संतुष्ट होगा ये फिलहाल कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि आयोग पहले भी कह चुका था कि फॉर्म - 6 में किये परिवर्तन पर सर्वोच्च न्यायालय की सहमति थी। हालांकि बाद में इसे वापस ले लिया गया। इसके अलावा ये बात भी कही गई कि चुनाव आयोग में आयुक्तों के बीच चर्चा के दौरान असहमति तो होती है किंतु निर्णय सर्वसम्मति से होते हैं।  आयोग जो जवाब देगा यदि उससे अदालत संतुष्ट नहीं हुई  तब जरूर ज्ञानेश कुमार के अलावा केंद्र सरकार के लिए भी परेशानी पैदा होगी जिस पर श्री गाँधी सहित अन्य विपक्षी नेता वोट चोरी का आरोप लगाते आये हैं। ऐसे में अब सवाल ये उठता है कि जब मामला सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन है तब क्या विपक्ष को उसके फैसले का इंतजार नहीं करना चाहिए क्योंकि  ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते तब इस आंदोलन को कितने दिन खींचा जा सकेगा?  अभी तक जो संकेत मिले उनके अनुसार सरकार और ज्ञानेश कुमार दोनों  झुकने को राजी नहीं दिखते। धर्मेंद्र प्रधान के  बाद मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा भी विपक्ष की मांग पर त्यागपत्र देने से ये एहसास प्रबल होगा कि सरकार विपक्षी दबाव का सामना  करने में असमर्थ है। इसी तरह ज्ञानेश कुमार को भी लग रहा होगा कि वे इस समय पद छोड़ते हैं तो वह एक तरह से विपक्ष के आरोपों की पुष्टि होगी। इन हालातों में इस विवाद का हल विपक्ष द्वारा  किये जा रहे आंदोलन से नहीं अपितु सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से ही होगा। अब ये विपक्ष पर निर्भर है कि वह तब तक प्रतीक्षा करना चाहेगा या मुद्दे को गर्म बनाये रखने के लिए सड़कों पर अपना अभियान जारी रखेगा? 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 3 October 2026

नशे से देश को मुक्ति दिलवाना समय की मांग



हमारे देश में राजनीति का जो स्वरूप है उसमें सही उपलब्धियां तो पीछे रह जाती हैं जबकि छोटी - छोटी बातों का ढिंढोरा पीटा जाता है। इसका ताजा उदाहरण है देश से नक्सली आतंक की समाप्ति । ये इतना बड़ा कारनामा है जिसकी राष्ट्रीय स्तर पर उसी तरह चर्चा होनी चाहिए थी जैसी जम्मू - कश्मीर से धारा 370 हटाने की हुई थी जिसने देश का बहुत नुकसान किया। इसके कारण ही इस सीमावर्ती राज्य  में आतंकवाद की जड़ें जमने से  राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हर पल मंडराता रहा। ये बात भी बिल्कुल सही है कि कश्मीर घाटी को पाकिस्तान समर्थक अलगाववादियों से बचाने के लिए सुरक्षा बलों के हजारों जवानों ने अपना बलिदान दिया। इसके अलावा हजारों बेगुनाह नागरिकों को आतंकवादियों ने मौत के घाट उतारकर दहशत फैलाई। 1990 की जनवरी में कश्मीरी पंडितों सहित लाखों अन्य गैर मुस्लिमों को रातों - रात अपना घर और कारोबार छोड़कर घाटी से जिस तरह  भागना पड़ा वह स्वाधीन भारत की एक अत्यंत  दर्दनाक घटना थी। इसीलिए जब धारा 370 हटी तब उन सभी लोगों के पेट में दर्द हुआ जो कश्मीर घाटी में अलगाववाद को हवा देकर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकते थे। बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उस महत्वपूर्ण निर्णय को अंजाम तक पहुंचाने वाले गृहमंत्री अमित शाह की प्रशंसा करने के धारा 370 हटाये जाने के तरीके पर ऐतराज जताया गया। कुछ बड़बोले नेताओं ने तो सत्ता में आने पर उसकी बहाली तक का वायदा कर डाला। सर्वोच्च न्यायालय तक में अपीलें की गईं। हालांकि देश का जनमत सरकार के साथ खड़ा होने से इन तत्वों को निराशा हाथ लगी। उसके बाद जब श्री शाह ने नक्सलवाद के सफ़ाये का संकल्प लिया तब उसके विरोध में भी एक वर्ग मुखर हो उठा। जिन शहरी नक्सलियों की धरपकड़ हुई उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर महिमामंडित करने का प्रयास भी हुआ। लेकिन गृहमंत्री ने बिना विचलित हुए अपना अभियान जारी रखा। बिहार, झारखंड, उड़ीसा, आंध्र, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ , उ.प्र और मध्यप्रदेश के  बड़े भूभाग में नक्सलियों  का आतंक देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन गया था।  इसके पीछे चीन का हाथ जगजाहिर है।   नक्सलियों ने नृशंस हत्याओं के जरिये दहशत फैलाने का जो जाल रचा उसके कारण जन सामान्य भी उन्हें आश्रय देने मजबूर हो गया। शासन - प्रशासन को आतंकित करने के लिए  पुलिस कर्मियों और सुरक्षा बलों की हत्या करने में नक्सलियों ने कभी संकोच नहीँ किया। जिस किसी पर उनको संदेह हुआ कि वह उनकी सूचना पुलिस को देता है उसकी जान अत्यन्त निर्दयता से उन्होंने ली। छतीसगढ़ में एक साथ सुरक्षा बलों के 70 से भी  अधिक जवानों और अधिकारियों को विस्फोटक के जरिये उड़ा देने का उनका कृत्य राक्षसी मानसिकता का वीभत्स प्रदर्शन था। इसी तरह  वहाँ के दर्जन भर कांग्रेस नेताओं की सामूहिक हत्या ने भी समूचे तंत्र को आतंकित कर दिया। शोषण के विरुद्ध हथियार उठाकर माओवादी क्रांति करने का मंसूबा पालने वाले नक्सलियों ने अपने संगठनों के विभिन्न नाम ररखकर भ्रम फैलाने का दाँव चला।  वहीं  आर्थिक संसाधन जुटाने के लिए  खनिज व्यवसायियों से गुंडा टैक्स की तरह वसूली प्रारंभ की। इसके अलावा साथी महिला नक्सलियों के यौन शोषण के आरोप भी लगने लगे। लेकिन अमित शाह ने लाइलाज माने जाने वाले नक्सली आतंक के खात्मे के लिए समयबद्ध कार्य योजना बनाकर 31 मार्च 2026 की तारीख तय की। शुरुआत में लगा ये असम्भव है किंतु उनका वह संकल्प अब हकीकत में बदल चुका है। इस अभूतपूर्व सफलता के बाद श्री शाह ने देश को नशा मुक्त करने का जो संकल्प लिया वह समय की मांग है। देश में ड्रग्स का कारोबार जिस तेजी से फैल रहा है वह भविष्य की बड़ी चिंताओं में से है क्योंकि इसके शिकंजे में फंसकर लाखों युवा अपना जीवन नष्ट कर चुके हैं। इसके अलावा ये अपराधों को भी जन्म दे रहा है। पंजाब और जम्मू कश्मीर  जैसे सीमावर्ती राज्यों में ड्रग्स का फैलाव होने से यह विदेशी जासूसों के लिए सहायक हो रहा है। देश के भीतरी हिस्सों में भी ड्रग्स की आदत बड़ी सामाजिक समस्या बन चुकी है। ये देखते हुए गृहमंत्री द्वारा नशे रूपी जहर से देश को मुक्त करवाने की जो सोच दिखाई वह पूरी तरह जनहित के साथ ही युवा पीढ़ी को बर्बादी से रोकने का प्रयास है। इसका राजनीति से ऊपर उठकर समर्थन होना चाहिए। श्री शाह की कार्य शैली और संकल्प शक्ति देखते हुए ये विश्वास किया जा सकता है कि जिस तरह उन्होंने नक्सली आतंक से देश को बचाया उसी तरह वे ड्रग्स रूपी जहर से भी देश को मुक्ति दिलाएंगे। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 1 October 2026

छत पर वर्षा जल संचयन को राष्ट्रीय अभियान बनाया जाए



तमाम प्रयासों के बाद भी भारत में खेती मानसून पर ही आश्रित है। हमारे देश की अर्थव्यवस्था आज भी कृषि प्रधान है। अच्छी फसल आने पर बाजार में रौनक आ जाती है। रोजगार प्रदाता के रूप में भी कृषि क्षेत्र का योगदान बेहद महत्वपूर्ण है। इसीलिये सरकार चाहे केंद्र की हो या राज्य की वह ग्रामीण विकास के लिए बड़ा बजट आवंटित करती है। स्व. अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा ग्रामीण इलाकों को भी पक्की सड़कों से जोड़ने की जो योजना शुरू की गई उसने वहाँ विकास की रोशनी पहुंचाने में काफी मदद की। पहले गाँव के लोगों को अपनी जरूरतों के लिए शहर आकर बाजार के चक्कर लगाना होते थे किंतु अब बाजार खुद गाँव के चक्कर लगाने लगा है। सड़क और बिजली के आगमन से ग्रामीण भारत में जीवन स्तर भी उठा है। सुख - सुविधा के साधनों की माँग बढ़ी है। महंगी करें अब केवल शहरों में ही नहीं दिखतीं बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी उनकी मौजूदगी देखी जा सकती है। इन्हीं सबका प्रभाव है कि अब टीवी, फ्रिज, एयर कंडीशनर के साथ ही औटोमोबाइल के शो रूम छोटे कस्बों और शहरों में खुलने लगे हैं। दैनिक उपयोग की लगभग सभी चीजें ग्रामीण बाजार में भी आसानी से मिलने लगी हैं। अब तो अच्छे स्कूल और अस्पताल भी ग्रामीण क्षेत्रों के निकट खुल रहे हैं। लेकिन इन सब व्यापारिक गतिविधियों की सफलता का आधार खेती से होने वाली कमाई ही है। हालांकि सिंचाई के आधुनिक साधन और तौर तरीके कृषि उत्पादन बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुए हैं किंतु जब तक पर्याप्त मानसूनी वर्षा न हो तब तक अच्छी फसल की उम्मीद करना बेकार है। इसीलिए इस वर्ष मानसून के विदा होते ही जो स्थिति सामने आई उसकी वजह से चिंता व्याप्त है। अधिकृत आंकड़ों के अनुसार  वर्ष 2026 में सामान्य से तकरीबन 13 फीसदी वर्षा कम होने से देश का काफी बड़ा हिस्सा सूखे जैसे हालात का सामना कर रहा है। 43 प्रतिशत से अधिक जिलों में 20  से 72 फीसदी तक पानी की कमी दिखाई दे रही है। पंजाब, हरियाणा, बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के पांचों राज्यों में मानसूनी बरसात कम रही। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार जुलाई से सितंबर के बीच कई राज्यों में लगातार हफ़्तों  तक बरसात न होने के कारण खेतों में नमी का अभाव होने से रबी फसल के प्रभावित होने का खतरा हो गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों में कमजोर मानसून से आगामी फसल खराब होने की चिंता व्याप्त है। कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश और उत्तरी बिहार में मिट्टी की नमी दस साल के औसत से नीचे होना खतरे की घंटी है। केंद्रीय जल आयोग की  रिपोर्ट के आधार पर पश्चिमी और दक्षिणी भारत के कई जलाशयों में भंडारण की कमी दर्ज की गई है। इस स्थिति में इस वर्ष कृषि उत्पादन के साथ ही पानी की कमी भी समस्या उत्पन्न करेगी ।  विशेष रूप से अगला ग्रीष्मकाल जनजीवन पर बुरा असर डालने वाला होगा। खरीफ फसल के गड़बड़ होने का असर दीपावली पर होने वाली खरीद पर ही नजर आने लगेगा। जाहिर है इसकी वजह से  जीडीपी में आ रहा उछाल भी रुक जाएगा। उपभोक्ता बाजार ठंडे रहे तो जीएसटी वसूली भी घटेगी। कुल मिलाकर मानसून की मेहरबानी न होना समूचे आर्थिक ढांचे को प्रभावित करने वाला है। भूजल का अविवेकपूर्ण दोहन भी बड़ा खतरा बनता जा रहा है।  दुर्भाग्य से बरसाती पानी को व्यर्थ बह जाने के बजाय जमीन के अंदर संचयित करने के लिए बनाई गई छत पर वर्षा जल संचयन ( रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग) की योजना के प्रति  गंभीरता न बरती जाने से कमजोर मानसून के बाद की चिंता बढ़ गई है। इस पद्धति के उपयोग से हैंड पम्प आदि के भूजल स्तर को बरकरार रखने में मदद मिलती है। घरों में जो नलकूप हैं उनको यदि छतों पर वर्षा जल संचयन से जोड़ दिया जाए तो कम बरसात के बाद भी वे सूखते नहीं। शहरों में कच्ची जमीन लगातार कम होने से बड़ी मात्रा में बरसाती पानी नाले में बह जाता है। सरकार ने सौर ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने के लिए जो अनुदान योजना शुरू की उसके परिणामस्वरूप देश में सौर ऊर्जा उत्पादन में खासी वृद्धि देखी जा रही है किंतु छत पर वर्षा जल संचयन पर उतना जोर नहीं दिये जाने से जल संकट साल दर साल बढ़ता जा रहा है। स्थानीय निकाय भी नये निर्माण में इसको अनिवार्य बताते हैं किंतु निर्माण पूरा होने के बाद कोई देखने नहीं आता कि उसका पालन हुआ या नहीं? इस वर्ष उत्पन्न संकट के मद्देनज़र आवश्यक है प्रधानमंत्री इसे राष्ट्रीय अभियान बनाएं जिससे आगामी कुछ वर्षों में देश का भूजल स्तर बढ़ सके। मानसून कितना बरसेगा ये अनिश्चित होता है किंतु जो हमारे हाथ में है उसे तो किया ही जा सकता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 30 September 2026

भाजपा में पीढ़ी परिवर्तन उसकी सेहत के लिए अच्छा



नितिन नबीन जब भाजपा के  अध्यक्ष बने तब पार्टी के कार्यकर्ता और नेता तक भौचक रह गए। हालांकि वे  भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय महासचिव रह चुके थे किंतु उस दौरान भी उनका नाम बिहार के अलावा अन्य राज्यों के भाजपाईयों ने भी नहीं सुना होगा। यद्यपि वे अपने पिता की सीट बांकीपुर से चार बार विधायक रहे और  प्रदेश सरकार में मंत्री भी। उनके राजनीतिक कौशल ने पार्टी नेतृत्व को तब प्रभावित किया जब छत्तीसगढ़ के पिछले विधानसभा चुनाव में उनके चुनाव प्रभारी रहते पार्टी को बड़ी विजय मिली। उनको राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाये जाने पर ये चर्चा भी चली कि  प. बंगाल के विधानसभा चुनाव में कायस्थ मतदाताओं को लुभाने के लिए भाजपा ने उनकी ताजपोशी की। वैसे उनके गृहराज्य बिहार में भी कायस्थों की बड़ी संख्या तथा राजनीतिक  प्रभाव रहा है।  नितिन के चयन का आधार बनी उनकी 46 वर्ष की आयु भी बनी।  हालांकि राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद खाली की गई उनकी बांकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव में जनसुराज पार्टी के प्रशांत किशोर की बड़ी जीत से उनकी किरकिरी भी हुई। लेकिन उसके बाद से वे लगातार  दौरा करते हुए पार्टी कैडर में अपनी पहिचान बनाने में जुटे हुए हैं। दिल्ली वि.वि छात्रसंघ चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को मिली सफलता से ये संकेत मिला कि युवाओं के बीच बढ़ते असंतोष के बावजूद भाजपा का वैचारिक आधार  बरकरार है। दरअसल पिछले कुछ महीनों के घटनाक्रम से भाजपा के माथे पर पसीना छलकने लगा था । दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले हुए आंदोलन के जरिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की युवा विरोधी छवि बनाने का जो प्रयास हुआ उससे भाजपा के साथ ही रा. स्व. संघ भी चिंतित हो उठा। इसीलिए प्रधानमंत्री और संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत के युवाओं से प्रत्यक्ष संवाद के कार्यक्रम आयोजित हुए। निकट भविष्य में होने वाले चुनावों में युवाओं  को अपने पाले में खींचने सभी दल प्रयासरत हैं। भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने और बनाये रखने में युवाओं का बड़ा योगदान है। लेकिन पार्टी और संघ दोनों को ये एहसास हो चला है कि जो नया मतदाता पहली बार मतदान करेगा उसके साथ सामंजस्य बिठाने में बुजुर्ग या अधेड़ नेता  कामयाब नहीं हो सकेंगे। इसीलिए पार्टी  अब संगठन और सत्ता में अपेक्षाकृत युवा चेहरों को आगे लाने की तैयारी में है। विभिन्न राज्यों में कम आयु वर्ग के मुख्यमंत्री बनाये जाने से इसके संकेत मिलने लगे थे। नितिन नबीन को पार्टी अध्यक्ष बनाकर उस प्रक्रिया को और आगे बढ़ाया गया। उनकी कार्यकारिणी में भी युवा चेहरों को काफी महत्व मिला ।  यदि यूजीसी और नीट पेपर लीक जैसी समस्याएं न आई होतीं तब शायद श्री मोदी अपने मंत्रीमंडल में भी फेरबदल करते हुए ऐसे युवा सांसदों को शामिल कर चुके होते जो छवि और क्षमता दोनों कसौटियों पर खरे उतरे हैं। ताजा खबर के अनुसार पार्टी संगठन में सबसे ताकतवर माने जाने वाले संसदीय बोर्ड से भी अति बुजुर्गों की जगह नये सदस्यों को शामिल किये जाने साथ ही केंद्रीय मंत्रीमंडल का भी पुनर्गठन भी जल्द होगा। हालांकि कुछ वरिष्ट मंत्रियों को तो नहीं छेड़ा जा सकता अन्यथा उंगलियां प्रधानमंत्री पर भी उठेंगी । लेकिन उन मंत्रियों की छुट्टी की जाएगी जिनका प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा। उल्लेखनीय है प्रधानमंत्री ने हाल ही में मंत्रियों के कार्यों की समीक्षा की थी। सही बात ये है कि किसी भी पार्टी को अपना जनाधार बनाये रखना है तो उसे नये नेतृत्व का सृजन करते रहना चाहिए क्योंकि  जो नये मतदाता पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं वे नई सोच रखते हैं। जिस तरह टीम का कप्तान वरिष्ट होने पर भी तभी सफल हो पाता है जब उसके पास कुछ युवा खिलाड़ी भी हों जिनमें जीत के प्रति जुनून हो। इसी तरह प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की लोकप्रियता के बाद भी सरकार की छवि मंत्रियों के किया - कलापों पर निर्भर होती है। धर्मेंद्र प्रधान इसके सबसे ताजा उदाहरण हैं। शिक्षा मंत्री रहते हुए वे अपने विभाग को ठीक से संभाल नहीं सके जिसकी वजह से पार्टी और प्रधानमंत्री दोनों के सामने, छवि का संकट उत्पन्न हो गया। इसीलिए श्री प्रधान को कुर्सी छोड़ना पड़ी । भाजपा के लिए ये अच्छा है कि वह छोटे - छोटे झटकों से संभल गई जबकि बाकी पार्टियां इसकी हिम्मत नहीं जुटा पाने के कारण कमजोर होती जा रही हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी