Wednesday, 18 March 2026

तेल संपन्न इस्लामिक देश भी अब हथियारों की होड़ में शामिल होंगे


ईरान का अमेरिका और इजराइल के साथ युद्ध तीसरे सप्ताह में प्रविष्ट हो चुका है। लेकिन ये कहना कठिन है कि किसका पलड़ा भारी है? हालांकि  जो मोटे तौर पर नजर आ रहा है उसमें पहला ये कि ईरान की आक्रामक क्षमता दिन ब दिन घटती जा रही है । वहीं दूसरा यह कि अमेरिका और इजराइल ने ईरान की क्षमता का कम आकलन किया।  डोनाल्ड ट्रम्प और नेतन्याहू को उम्मीद रही कि  खामेनेई के कुनबे सहित मारे जाने के बाद ईरान  में गृहयुद्ध के हालात बन जाएंगे। इसके पीछे कुछ महीनों पहले महिलाओं द्वारा हिजाब सहित अन्य पाबंदियों के विरोध में किया गया आंदोलन रहा। खामेनेई की मौत के बाद ईरान के कुछ स्थानों पर जनता द्वारा  खुशी मनाये जाने की खबरों से  इस्लामिक सत्ता के पलटने की उम्मीदें भी आसमान छूने लगीं। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और लड़ाई उम्मीद से कहीं ज्यादा लंबी खिंचती दिखाई दे रही है। दरअसल अभी तक दोनों पक्ष ड्रोन और मिसाइलों के जरिए ही लड़ रहे हैं । खबर है अमेरिका अपने मैरीन कमांडरों को  ईरान के खार्ग द्वीप पर उतारकर लड़ाई को जमीन पर लाना चाहता है। ये द्वीप ईरान के तेल निर्यात की श्वास नलिका है। यदि यह मिशन  सफल रहा तब ईरान की कमर टूटना तय है। अन्य विकल्प फिलहाल अमेरिका और इजराइल के पास नहीं है क्योंकि ईरान की मुख्य भूमि पर सैनिक उतारने के खतरों से वे भली- भांति वाकिफ हैं। इसके अलावा  सबसे बड़ी बात इस जंग से निकलकर सामने आई वह है मध्य पूर्व के मुस्लिम देशों में एक - दो को  छोड़कर बाकी की ईरान से दुश्मनी हो जाना। इसका कारण ईरान द्वारा उनमें स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों  के अलावा हवाई अड्डों , होटलों और  तेल भंडारों पर मिसाइलों से किए गए हमले हैं। दुनिया भर के मुसलमानों की आस्था का केंद्र मक्का जिस सऊदी अरब में स्थित है वहां विश्व की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी पर किए हमले के बाद ईरान पूरी तरह अलग - थलग पड़ गया। यद्यपि जिन पड़ोसी मुस्लिम देशों को ईरान ने निशाना बनाया उनमें से एक ने भी उस पर पलटवार नहीं किया । वे केवल ईरानी ड्रोन और मिसाइलों से बचाव तक ही सीमित रहे। हालांकि अपनी गलती को भांपने के बाद ईरान ने उन सबसे माफी भी मांगी किन्तु उसके बाद किए नए हमलों ने हालात और खराब कर दिए। उल्लेखनीय है काफी समय से इस्लामिक नाटो के गठन की चर्चाएं सुनाई दे रही थीं। टर्की और पाकिस्तान इसमें काफी रुचि ले रहे थे। गत वर्ष भारत द्वारा पाकिस्तान के विरुद्ध ऑपरेशन सिंदूर नामक सैन्य कार्रवाई किए जाने के बाद पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच  समझौता हुआ कि किसी एक पर हुआ हमला दूसरे पर माना जाएगा।  लेकिन ईरान द्वारा सऊदी अरब पर हमले के बाद पाकिस्तान उसकी मदद के लिए आगे नहीं आया।  मौजूदा हालात में मुस्लिम देशों को ये बात समझ में आ चुकी है कि धर्म के नाम पर  एकता संभव नहीं रही। ईरान के साथ लेबनान और यमन जैसे देश भी हैं जिनकी इजराइल से सीधी लड़ाई है। बाकी के देश इस्लामिक कट्टरता से ऊपर उठकर आर्थिक विकास की राह पर चल पड़े हैं। इस जंग ने ईरान के साथ उनके रिश्तों में जो कड़वाहट घोल दी उसके बाद अब मध्य पूर्व के तेल संपदा सम्पन्न देशों को भी सुरक्षा संबंधी आत्मनिर्भरता का महत्व समझ आ गया है क्योंकि अमेरिकी अड्डों के बावजूद वे ईरान के  हमलों से नहीं बच सके। इसके अलावा ये संभावना भी है कि यदि अमेरिका और इजराइल मिलकर भी ईरान को पूरी तरह घुटनाटेक नहीं करा सके और कट्टर इस्लामिक सत्ता कायम रही तब मध्य पूर्व में हथियारों की होड़ और बढ़ेगी जिसके परिणामस्वरूप संघर्ष का नया स्वरूप देखने मिल सकता है। लेकिन ट्रम्प और नेतन्याहू ईरान  में सत्ता पलटवाकर शाह युग की वापसी में सफल हो गए तब यह देश अमेरिका का उपनिवेश बन जाएगा। यद्यपि आज की स्थिति में जो दिखाई दे रहा है उसमें भले ही ईरान संपूर्ण पराजय से बच जाए किंतु लड़ाई रुकने के बाद वह  पहले जैसा शक्तिशाली नहीं रहेगा। लड़ाई का अंतिम परिणाम जो भी हो लेकिन मध्य पूर्व के समूचे मुस्लिम देश अब सैन्य सुरक्षा पर खर्च करने बाध्य होंगे और अमेरिका भी उनको तेल के बदले अस्त्र - शस्त्र बेचकर इस लड़ाई के नुकसान की भरपाई करेगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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