मध्यपूर्व में युद्ध के कारण उत्पन्न तेल और गैस संकट के लिए भारत की विदेश नीति पर उंगलियां उठाने वालों के लिए ये खबर निराशा उत्पन्न करने वाली होगी कि ईरान ने होर्मुज़ समुद्री मार्ग से पांच देशों के जल पोतों को आने - जाने की सुविधा प्रधान कर दी है। ईरान के विदेश मंत्री के अनुसार भारत, रूस , चीन , पाकिस्तान और ईराक चूंकि मित्र देश हैं इसलिए इनके लिए होर्मुज खुला रहेगा। इसके पहले भी भारत के अनेक जल पोत तेल और गैस लेकर उक्त समुद्री मार्ग से सुरक्षित स्वदेश लौट चुके हैं। युद्ध की शुरुआत में विपक्ष के अलावा सरकार विरोधी लॉबी आरोप लगाती रही थी कि युद्ध के ऐन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजराइल यात्रा के दौरान उन्हें इसकी जानकारी मिल गई थी। ईरानी नेता खामेनेई के मारे जाने पर राष्ट्रीय शोक नहीं मनाने के फैसले पर भी सवाल उठे। हालांकि विदेश सचिव ने ईरान के दूतावास जाकर शोक पुस्तिका में श्रद्धांजलि देकर कूटनीतिक संतुलन बनाए रखा। कुछ दिनों बाद भारत में नौसैनिक अभ्यास से लौट रहे ईरानी युद्धपोत को श्रीलंका के पास अमेरिकी पनडुब्बी ने डुबो दिया तब भी केंद्र सरकार की आलोचना हुई। लेकिन कुछ दिनों बाद ही एक अन्य ईरानी जल पोत द्वारा तकनीकी खराबी के कारण सहायता मांगे जाने पर उसे कोच्चि बंदरगाह पर रुकने की अनुमति देकर भारत सरकार ने ईरान की सहानुभूति अर्जित कर ली। साथ ही उसे दवाइयां एवं अन्य जरूरी सामग्री भेजकर मानवीय दृष्टिकोण का परिचय दिया। इससे नाराज कतर नामक देश ने भारत को गैस न देने की धमकी दे डाली , जो हमारा सबसे बड़ा गैस आपूर्तिकर्ता है। लेकिन सरकार ने उसे दो टूक समझा दिया कि भारत अपने मानवीय कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सजग है। प्रधानमंत्री मोदी और इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू की निकटता जगजाहिर है। भारत और इजराइल के बीच अस्त्र - शस्त्र के अलावा युद्ध तकनीक के सौदे भी सर्वविदित हैं। लेकिन इस युद्ध के दौरान भारत सरकार ने सावधानी भरी चतुराई का परिचय देते हुए संतुलन बनाए रखा। वहीं ईरान के स्कूली बच्चों को मारे जाने की आलोचना करते हुए शांति से विवाद हल करने की अपील भी की। सबसे बड़ी बात ये रही कि युद्ध प्रभावित देशों में रहने वाले भारतीयों को सुरक्षित निकाल लाने के अभियान सफलतापूर्वक संचालित हुए। ईरान में फंसे भारतीय नागरिकों की वापसी बड़ी समस्या थी जिसे कूटनीतिक पहल से हल किया गया। युद्ध के आगे बढ़ते ही पेट्रोल , डीजल और गैस की कमी होने लगी। ईरान द्वारा तेल उत्पादक देशों पर किए हमलों से वहां या तो उत्पादन बंद करना पड़ा या उसमें काफी कमी आ गई। लेकिन उससे बड़ी समस्या ईरान द्वारा हार्मुज समुद्री मार्ग अवरुद्ध किए जाने से उत्पन्न हुई। ऐसे में एक तरफ तो केंद्र सरकार ने वैकल्पिक स्रोतों से खरीदी शुरू की वहीं ईरान को भी इस बात के लिए राजी किया कि वह हार्मुज़ से उसके टैंकर निकलने की अनुमति दे। सौभाग्य से दोनों प्रयास सफल रहे। उल्लेखनीय डोनाल्ड ट्रम्प ने जब भारत पर रूस से तेल न खरीदने का दबाव बनाया तब श्री मोदी ने अनेक अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों का दौरा कर तेल और गैस के सौदे कर लिए थे। वह बुद्धिमत्ता आज काम आ रही है और भारत अमेरिका, अर्जेंटीना, नाइजीरिया और ऑस्ट्रेलिया के अलावा अनेक छोटे देशों से तेल और गैस की खरीदी कर उनकी कमी रोकने में काफी हद तक कामयाब हुआ जबकि पड़ोसी देशों में स्थिति गंभीर बनी हुई है। तेल कंपनियों द्वारा कीमतें बढ़ाए जाने की आशंका के बीच आज केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज घटाकर जो बुद्धिमत्ता दिखाई वह समय की मांग है। हालांकि अनेक शहरों से पेट्रोल और गैस के अभाव की खबरें आ रही हैं लेकिन स्थिति में सुधार भी दिख रहा है। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने ईरान सहित युद्ध में शामिल अन्य देशों के राष्ट्रप्रमुखों से बातचीत कर बेहतर संबंध बनाए रखे। दूसरी तरफ विदेश मंत्री जयशंकर भी सक्रिय रहकर वैश्विक स्तर पर भारत के प्रभाव को बनाए रखने में जुटे हैं। आज प्रधानमंत्री द्वारा राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बात कर संकट की इस घड़ी में केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय बनाए रखने की पहल भी समझदारी भरा कदम है। एक महीने से चल रहे इस युद्ध से खुद को दूर रखते हुए संबंधित पक्षों के साथ रिश्ते बनाए रखना आसान नहीं था। लेकिन भारत ने ये कर दिखाया क्योंकि बीते कुछ सालों में हमारी विदेश नीति काफी व्यापक हुई है। प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं का मखौल उड़ाने वाले भले न मानें किंतु उनका फायदा अब दिखाई दे रहा है। भारत को इसी नीति पर आगे भी चलते रहना चाहिए जिसमें बजाय भावनाओं में बहने के विशुद्ध राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी जाती है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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