प. एशिया में चल रहा युद्ध जिस मोड़ पर आ पहुंचा है उसमें दोनों पक्ष हताश नजर आ रहे हैं। इजराइल और अमेरिका एक माह में ईरान से घुटने नहीं टिकवा सके। उल्टे ईरान ने उनका ये दंभ तोड़ दिया कि वे अजेय हैं। इसीलिए अमेरिका ईरान की जमीन पर फ़ौजी उतारने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। पहली बार देखने मिल रहा है कि इज़राइल ,ईरान और उसके पालित हिजबुल्ला और हूती की मिसाइलों का सामना करने मजबूर है। अपने जन्म के बाद से ही इजराइल अपने पड़ोसी मुस्लिम देशों के साथ लड़ता आ रहा है। अभेद्य समझी जाने वाली रक्षा प्रणाली के कारण शत्रुओं के विमान और मिसाइलें उसको नुकसान पहुंचाने में सफल नहीं होती थीं। लेकिन गाजा के पिछले युद्ध में ईरानी मिसाइलों ने इजराइल में धमाके कर ये जता दिया कि उसकी सुरक्षा प्रणाली अभेद्य नहीं रही। बीते एक माह में ईरान ने न सिर्फ इजराइल बल्कि खाड़ी के उन तमाम देशों को सफलतापूर्वक निशाना बनाया जहां अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं। हालांकि इसकी कीमत भी उसे चुकाना पड़ रही है। अमेरिका और इजराइल ने उसके समूचे ढांचे को तहस - नहस कर दिया है। पूरा देश मलबे में तब्दील होता जा रहा है। दशकों में उसने जो सैन्य क्षमता विकसित की वह कमजोर पड़ने लगी है। भले ही उसके बचे हुए नेता बढ़ - चढ़कर बयानबाजी कर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में सफल दिखते हों किन्तु बाजी धीरे - धीरे ही सही ईरान के हाथ से निकल रही है। उसके बुनियादी ढांचे को बर्बाद करने की अमेरिका और इजराइल ने जो कार्ययोजना बनाई है उसका उद्देश्य ईरान में पूरी तरह अव्यवस्था फैलाकर उसका मनोबल तोड़ना है। जो हालात बनते जा रहे हैं उन्हें देखते हुए अमेरिका और इजराइल ईरान को पूरी तरह तबाह करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। जवाब में ईरान भी वैसा ही करने पर आमादा है। हालांकि दोनों तरफ से एक दूसरे के सैन्य प्रतिष्ठानों को नष्ट करने का सिलसिला जारी है किंतु अब उसके आगे बढ़कर शैक्षणिक और शोध संस्थानों, जनसुविधा केंद्रों, जल शोधन संयंत्रों आदि पर किए जा रहे हमलों से लगने लगा है कि लड़ाई दिशाहीन हो रही है। ईरान भले ही एक महीने से अमेरिका और इजराइल के अलावा अनेक देशों को निशाना बनाए हुए है किंतु वह भीतर से खोखला होने के कगार पर है। इसीलिए वह अमेरिका को जमीनी लड़ाई के लिए उकसा रहा है। वैसे तो अमेरिका के समुद्री बेड़े ईराक को घेरे हुए हैं जिनमें कमांडो प्रशिक्षण प्राप्त हजारों सैनिक हैं किंतु डोनाल्ड ट्रम्प और उनके सैन्य सलाहकार ये जानते हैं कि भौगोलिक दृष्टि से ईरान जैसे बड़े देश को फौजें उतारकर पराजित करना आत्मघाती होगा। इसका कारण ये है कि अभी तक ईरान को अपनी थलसेना का उपयोग करने का अवसर ही नहीं मिला। अमेरिका के लिए हजारों किलोमीटर से अपनी बड़ी सेना लाना संभव नहीं है। उसके यूरोपीय सहयोगी देश पहले ही ठेंगा दिखा चुके हैं। इजराइल पहले से ही सैनिकों की कमी से जूझ रहा है। वहीं सऊदी अरब सहित ईरान विरोधी अन्य देशों के पास उतनी सक्षम और पेशेवर सेना नहीं है । यही वजह है कि अमेरिका ईरान को इतना तोड़ देना चाहता है जिससे उसकी प्रतिरोधक क्षमता इतनी कम हो जाए जिससे कि अमेरिकी फौजों को कम से कम नुकसान हो। इसीलिए ट्रम्प की रणनीति होर्मुज की नाकाबंदी खुलवाने के साथ - साथ ईरान के सबसे बड़े तेल व्यापार केंद्र खार्ग द्वीप पर कैसे भी कब्जा जमाना है। बीच - बीच में लड़ाई रोकने के लिए कूटनीतिक प्रयासों की खबरें भी आ रही हैं। लेकिन ईरान जिस प्रकार ऐंठा हुआ है उसकी वजह से शांति प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही। पाकिस्तान में तीन मुस्लिम देशों की बैठक भी इसलिए निरर्थक है क्योंकि उसमें अमेरिका , इज़राइल और ईरान की उपस्थिति ही नहीं हैं। ये सब देखते हुए यह जंग उस खतरनाक स्तर को छू रही है जिसमें दोनों पक्ष युद्ध के प्रचलित तौर - तरीकों से हटकर बदहवासी में जो दिख रहा है उसी को बर्बाद करने पर आमादा है। लेकिन इस होड़ में ईरान के पूरी तरह तबाह हो जाने का खतरा बढ़ गया है। उसका नीति - निर्धारक राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व रोज घट रहा है। रक्षा उत्पादन ठप्प हो चला है। तेल की बिक्री से होने वाली आय भी रुकी पड़ी है। मुद्रा की विनिमय शक्ति दम तोड़ बैठी है। महंगाई चरम पर है। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा चुकी हैं। अमेरिका और इज़राइल के बमवर्षक विमान बिना प्रतिरोध के ईरान में आग बरसाकर चले जाते हैं। विद्युत और पेय जल की आपूर्ति बाधित होने से जनजीवन अस्त - व्यस्त हो गया है। नुकसान इजराइल और अन्य खाड़ी देशों का भी हुआ है किंतु ईरान की तुलना में काफी कम होने से वहां उतनी अव्यवस्था नहीं है। ऐसे में ईरान यदि संपूर्ण विनाश से बचना चाहता है तब उसके सामने युद्धविराम करना ही एकमात्र विकल्प है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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