Friday, 6 March 2026

नीतीश का दिल्ली आना किसी बड़े घटनाक्रम की शुरुआत



बिहार में साधारण व्यक्ति भी राजनीति पर पैनी नजर रखता है। सामाजिक न्याय की जिस राजनीति ने बीते लगभग चार दशक से देश को प्रभावित किया उसकी जड़ें यहां गहराई तक  हैं। समाजवादी चिंतकों ने यहां जाति व्यवस्था को मिटाने के लिए जो काम किया उसका ये लाभ तो हुआ कि आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से दबे वर्ग को राजनीतिक नेतृत्व में हिस्सेदारी ही नहीं मिली बल्कि पूरा नेतृत्व ही उसके हाथ चला गया। इसका सिलसिला कर्पूरी ठाकुर से होते हुए नीतीश कुमार निर्बाध चला आ रहा है। ऐसा नहीं है कि  उच्च जातियों का वर्चस्व समाप्त हो गया किंतु धीरे - धीरे उनकी पकड़ कमजोर हो चली है।  यही वजह है कि लालू प्रसाद यादव  से पीड़ित जनता ने उच्च जाति की बजाय पिछड़ी जाति के नीतीश कुमार को ही अपना भाग्य विधाता बनाया। 2005 से जीतन राम मांझी के के 10 माह छोड़कर नीतीश मुख्यमंत्री बने  रहे। जीतन राम को भी उन्हीं ने गद्दी पर बिठाया था। लगभग 20 साल तक मुख्यमंत्री रहने के बाद नीतीश ने गत दिवस राज्यसभा के लिए नामांकन भरकर एक बार फिर राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया ।  गत  विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीतने के बाद भी भाजपा ने उन्हीं को मुख्यमंत्री बनाया जैसा वह उसके पहले वाले चुनाव में भी कर चुकी थी। चुनाव के दौरान विरोधियों ने उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति का खूब मजाक बनाया किंतु जनता ने सुशासन बाबू की उनकी  छवि पर  विश्वास जताते हुए रिकॉर्ड दसवीं बार उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर पसंद किया। हालांकि निजी ईमानदारी और विकास के मुद्दे पर उनका रिकॉर्ड अपने पूर्ववर्ती सभी मुख्यमंत्रियों से काफी बेहतर रहा किंतु राजनीतिक प्रतिबद्धता के मामले में नीतीश ने अनेक अवसरों पर  अपनी साख भी गिराई। नरेंद्र मोदी के प्रति नफरत का खुला प्रदर्शन करने के बाद वे उनके नेतृत्व को स्वीकार करते हुए भाजपा के साथ आये और फ़िर बिना कोई कारण बताए उन्हीं लालू प्रसाद की गोद में  बैठ गए जिनको भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भिजवाने में उनकी भूमिका रही।  उल्लेखनीय है नीतीश की सौम्य और सुलझे हुए राजनेता की छवि बनाने में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में बतौर मंत्री उनका कार्य सहायक बना । उस समय वे लालू और शरद यादव से अलग होकर जॉर्ज फर्नांडीज के साथ समता पार्टी बना चुके थे।  बाद में वे जनता दल (यू) के सर्वेसर्वा बनकर बिहार की राजनीति की सबसे ताकतवर शख्सियत बन गए। पिछड़ी जाति का होने के बावजूद वे कभी भी किसी जाति विशेष का चेहरा नहीं बने और यही गुण उनकी सफलता का आधार बना। अचानक बिहार छोड़कर दिल्ली का रुख करने के पीछे राजनीतिक मजबूरी है या कोई रणनीति इसका खुलासा फिलहाल नहीं हुआ। और हो सकता है कभी न हो। स्मरणीय है 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले इंडिया नामक विपक्षी गठबंधन के सूत्रधार वही थे किंतु अचानक एनडीए में लौटकर नरेंद्र मोदी के झंडे तले खड़े हो गए। उनके उस कदम से उनके साथ पलटू राम जैसा विशेषण जुड़  गया किंतु मोदी सरकार की वापसी से उनकी ताकत बढ़ गई। बाद में हुए विधानसभा चुनाव में नीतीश और भाजपा ने लालू परिवार की राजनीति को लगभग समाप्त कर दिया।  बढ़ती आयु से नीतीश की क्षमता भी कम होती जा रही थी। साथ ही मुख्यमंत्री बने रहकर रिटायर होने के बजाय राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका निभाकर  और ऊंचाई हासिल करने की महत्वाकांक्षा भी पटना की बजाय नई दिल्ली में रहकर ही पूरी हो सकती है। फिलहाल वे क्या बनेंगे इसका पता आने वाले कुछ दिनों में पता चल जाएगा। रही बात उनके उत्तराधिकारी की तो उन्होंने कोई बड़ा दांव नहीं चला तो भाजपा बिहार में पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनवाने में सफल हो जाएगी।   दरअसल नीतीश की पार्टी में ऐसा कोई नहीं है जो उनकी जगह ले सके। दूसरी तरफ भाजपा का संगठन पूरे बिहार में होने से वह सरकार ज्यादा बेहतर तरीके से चला सकेगी। हालांकि नीतीश के बेटे निशांत का नाम पार्टी के नेता के साथ ही उपमुख्यमंत्री पद के लिये उछला है। लेकिन ऐसा होने पर नीतीश और भाजपा दोनों को सवालों के घेरे में खड़ा करेगा। हालांकि भाजपा के तो अनेक नेता परिवार के नाम पर आगे आए जिनमें उसके नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन भी हैं किंतु नीतीश ने अपने परिवार को अभी तक  दूर रखा। ऐसे में बेटे की ताजपोशी  उनके आलोचकों खास तौर पर तेजस्वी यादव को अवसर प्रदान करेगी किंतु लालू और उनकी संतानों के विपरीत नीतीश और उनके परिवार की छवि कहीं बेहतर है। नीतीश का बिहार छोड़ दिल्ली का रुख करना राष्ट्रीय राजनीति में किसी नए धमाके की शुरुआत हो सकती है। वैसे भी नरेंद्र मोदी और अमित शाह के दौर में चौंकाने वाले फैसले नई बात नहीं हैं। प. बंगाल के चुनाव के पहले नितिन नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना और नीतीश को दिल्ली बुलाना किसी बड़े घटनाक्रम की शुरुआत है।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

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