Saturday, 7 March 2026

भारत विरोधी होने पर बालेन शाह का हश्र भी माओवादियों जैसा होगा


गत वर्ष नेपाल में युवाओं के अराजक आंदोलन के कारण  चीन समर्थक के. पी. शर्मा ओली सरकार को सत्ता छोड़नी पड़ी। यद्यपि उनको शेख हसीना की तरह देश छोड़कर नहीं जाना पड़ा किंतु अनेक मंत्रियों सहित  पर हुए हमलों से  साबित हो गया कि  सत्ता के प्रति जनता का गुस्सा बेकाबू हो चला था। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के खिलाफ हुए उस आंदोलन का नेतृत्व किसी राजनीतिक दल या नेता के हाथ में न होकर राजधानी काठमांडू के युवा महापौर बालेन शाह के हाथ में था जो निर्दलीय जीतकर आए थे। पेशे से रैपर ( गायक ) इस युवा ने नेपाल के युवाओं को सरकार के विरुद्ध सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित किया। इस काम में सोशल मीडिया उसका प्रमुख अस्त्र था जिस पर प्रतिबंध के बाद वैसे ही हालात बन गए जब 2006 में महाराजा ज्ञानेंद्र को राजगद्दी माओवादियों को सौंपना पड़ गई। उसके बाद से देश राजनीतिक अस्थिरता के भँवर में फंस कर रह गया। माओवादियों में बिखराव से प्रधानमंत्री बदलते रहे लेकिन जनता ने जिन  उम्मीदों के चलते राजतंत्र को हटाया वे पूरी नहीं हुईं । चीन के दबाव  में माओवादी सरकारों ने भारत से रिश्ते बिगाड़ने का क्रम जारी रखा जिसका चरमोत्कर्ष नेपाल द्वारा प्रारंभ सीमा विवाद के  बाद भारत द्वारा आर्थिक नाकेबंदी के रूप में देखने मिला। दुनिया के एकमात्र हिंदू राष्ट्र को माओवादियों ने भले ही धर्मनिरपेक्ष बना दिया किंतु नेपाल में हिंदू धर्म और संस्कृति की जड़ें काफी गहरी हैं। लाखों नेपाली भारत में रोजगार से जुड़े हैं। आर्थिक दृष्टि से भी वह काफी कुछ भारत पर निर्भर है। इसलिये माओवादी चाहकर भी हिंदू धर्म  और संस्कृति को खत्म नहीं कर सके। गत वर्ष हुए युवाओं के आंदोलन के  बाद बालेन शाह महानायक के तौर पर उभरे किंतु  अंतरिम सरकार में  उन्हें महत्व नहीं मिला। दो दिन पहले हुए आम चुनाव में बालेन की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने एक नई राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरकर दशकों पुराने दलों के आधिपत्य को खत्म कर दिया। चीन समर्थक पूर्व प्रधानमंत्री के.पी शर्मा ओली  तक बालेन शाह से चुनाव  हार गए। गगन थापा और माओवादी क्रांति के चेहरे रहे पुष्पदहल कमल को भी  कम सीटें मिलने से सत्ता  बालेन शाह के हाथ जाना तय है। नेपाल में यह एक नए युग की शुरुआत है जहां युवा अपनी राजनीतिक भागीदारी के जरिए शासन में बदलाव लाने में कामयाब हो गए। हाल ही में बांग्लादेश में भी सत्ता तारिक रहमान नामक युवा के हाथ आ गई। लेकिन  फर्क ये है कि तारिक के पिता राष्ट्रपति और माँ प्रधानमंत्री रहीं जबकि बालेन की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं है। वे भारत में इंजीनियरिंग पढने के बाद गायक के रूप में युवाओं में लोकप्रिय हुए। लेकिन चर्चा में तब आए जब काठमांडू के महापौर चुनाव  निर्दलीय लड़कर जीते। उसी के बाद उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा परवान चढ़ीं और देखते ही देखते उन्होंने पहले सत्ता को उखाड़ फेंकने वाले आंदोलन को हवा दी और अब सत्ता के शीर्ष पर विराजमान होने जा रहे हैं। उनके प्रधानमंत्री बनने को लेकर सबसे ज्यादा उत्सुकता भारत में है। उल्लेखनीय है बांग्लादेश के बाद जब नेपाल में युवाओं ने सत्ता को उखाड़ फेंका तब भारत में भी वैसी ही उथल - पुथल की आशंका व्यक्त की जाने लगी किन्तु वह निर्मूल सिद्ध हुई । दरअसल उक्त दोनों सत्ता परिवर्तनों के पीछे अमेरिका की भूमिका मानी जाती है। बांग्लादेश के कार्यकारी शासक बने मो. यूनुस तो  अमेरिका के घोषित पिट्ठू थे। ऐसा ही संदेह बालेन शाह को लेकर भी है।  उन्होंने महापौर बनते ही भारत विरोधी बयान देने शुरू कर दिए और हिन्दी फिल्मों पर भी रोक लगाई ।  साथ ही चीन विरोधी बयान भी दिए। वैसे भी उनका आंदोलन ही चीन समर्थित सरकार के विरुद्ध था। इस सबसे लगता है बालेन की अपनी कोई सोच नहीं है।  अब सवाल ये है कि क्या वे नेपाल को गरीबी , बेरोजगारी , भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं से राहत दिलवा सकेंगे या फिर माओवादियों की तरह से ही सत्ता की चकाचौंध में अपना उद्देश्य और वायदे भूल जाएंगे। बालेन नेपाल को यदि विकास के रास्ते पर ले जाना चाहते हैं तो वह भारत के संरक्षण और सहयोग से ही संभव होगा क्योंकि चीन की रूचि नेपाल की बेहतरी से ज्यादा तिब्बत की तरह उसे हड़पने में है। ऐसे  में उन्होंने भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया अपनाया तब वे भी जल्द ही जनता की नजरों से उतर जाएंगे और उन माओवादी नेताओं की कतार में खड़े दिखेंगे जो भारत का विरोध करते - करते हाशिए पर चले गए।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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