प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के निकट नोएडा स्थित जेवर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के पहले चरण का लोकार्पण कर दिया। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के प्रारंभ होने से दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का भार कम होगा। जेवर एशिया का सबसे बड़ा हवाई अड्डा है जहां से हर 2 मिनिट में एक उड़ान निकलेगी। बुनियादी ढांचे का विकास जिन चीजों से आंका जाता है उनमें हवाई अड्डे भी प्रमुख हैं। महानगरों में जहां से बड़ी मात्रा में अंतर्राष्ट्रीय हवाई यातायात संचालित होता है , एक हवाई अड्डा होने से विमानों की आवाजाही में परेशानी होती है। यात्रियों की भीड़ बढ़ने से सुविधाओं का भी टोटा पड़ जाता है। ये कहना गलत नहीं होगा कि 2014 के बाद देश में राजमार्ग, पुल , फ्लाईओवर, रेलवे स्टेशन आदि के साथ ही हवाई अड्डों के निर्माण और उन्नयन की दिशा में सराहनीय कार्य हुआ। कोरोना के समय लॉक डाउन का लाभ लेकर नई रेल पटरियां बिछाने का काम भी बड़े पैमाने पर किया गया। दुनिया में भारत की जो अच्छी छवि निर्मित हो सकी उसमें बुनियादी ढांचे का योगदान महत्वपूर्ण है। हाल ही में मुंबई में भी दूसरे अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का शुभारम्भ हो चुका है। जेवर का हवाई अड्डा जिस नोएडा में स्थित है वह उ.प्र का हिस्सा होने के बावजूद एन.सी.आर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र ) में शामिल है। इसीलिए इसके प्रारंभ होने से दिल्ली स्थित अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे की भीड़ कम होगी तथा ज्यादा उड़ानों का संचालन हो सकेगा। लेकिन हवाई अड्डों का विकास होने मात्र से है हवाई यात्रा के स्तर को सुधारना संभव नहीं है। देश के अनेक माध्यम श्रेणी शहरों में हवाई सेवा प्रारंभ की जा चुकी है। पुराने हवाई अड्डों का विकास किए जाने से उनमें बड़े विमानों की आवाजाही भी संभव हो सकी है परन्तु इसका दूसरा पहलू निराशा उत्पन्न करने वाला है । उड्डयन व्यवसाय में निजी क्षेत्र के पदार्पण के बाद उम्मीद थी कि सेवाओं में सुधार होगा तथा प्रतिस्पर्धा के चलते किराए वाजिब होंगे। सरकार के नियंत्रण वाली एयर लाइंस की दयनीय स्थिति से त्रस्त यात्रियों को लगता था निजी एयर लाइंस तुलनात्मक रूप से बेहतर सुविधाएं प्रदान करेंगी। शुरुआत में ऐसा लगा भी लेकिन धीरे - धीरे निजी एयर लाइंस की बदहाली भी सामने आने लगी। ज्यादा कमाई के फेर में सीटें तो बढ़ा दी गईं किंतु उनके आरामदेह नहीं होने से लंबी दूरी की यात्रा तकलीफदेह हो गई। एक ही परिवार के सदस्यों को एक साथ बैठने के लिए अतिरिक्त पैसे की मांग की जाने लगी। विमान के भीतर दी जाने वाली सुविधाएं भी नाममात्र की किए जाने से हवाई यात्रा से जुड़ा सुखद एहसास घटता गया। कुछ एयर लाइंस तो पानी भी मांगने पर देती हैं। हवाई जहाजों का रखरखाव ठीक ढंग नहीं होने से आए दिन आपातकालीन लैंडिंग के समाचार आते हैं। विमान खराब होने की स्थिति में उड़ान में विलंब या उसके रद्द होने पर हवाई अड्डे पर मौजूद एयर लाइंस का स्टाफ यात्रियों के साथ जिस गैर जिम्मेदाराना ढंग से पेश आता है वह किसी से छिपा नहीं है। किसी त्यौहार या अन्य विशिष्ट अवसर पर अनाप - शनाप किराया वसूलना आम हो गया है। गत वर्ष एक एयर लाइन पर रोक लग जाने के बाद बाकी एयर लाइंस ने जिस बेरहमी से लूटपाट की उसे नहीं रोक पाना सरकार की बड़ी विफलता थी। चौतरफा आलोचना के बाद भी किरायों में मनमानी लूटमार एक जमाने में होने वाली सिनेमा टिकटों की कालाबाजारी की याद दिला देती है। हवाई अड्डों पर उपलब्ध सेवाएं भी मध्यमवर्गीय यात्रियों की क्षमता से बाहर हैं। सरकार को इस दिशा में ध्यान देना चाहिए। हमारा आशय उड्डयन क्षेत्र में हो रहे विकास को निरर्थक साबित करना कदापि नहीं है। दरअसल होना ये चाहिए कि बुनियादी ढांचे में सुधार के साथ ही सेवाओं का स्तर , वायुयानों का रखरखाव, हवाई जहाज के भीतर और हवाई अड्डे पर तैनात एयर लाइंस के स्टाफ के व्यवहार में भी सुधार हो। सही बात ये है कि गुणवत्ता के बिना विकास अधूरा होता है। अर्थव्यवस्था में आई मजबूती के कारण देश में मध्यम आय वर्गीय यात्री भी हवाई यात्रा के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। लेकिन उस तुलना में सेवाओं और सुविधाओं का स्तर नहीं सुधरा जिससे लोगों में असंतोष बढ़ रहा है। ये देखते हुए सरकार को चाहिए कि केवल हवाई अड्डे बनाकर ही संतुष्ट न हो बल्कि उसी के साथ ही ये भी देखे कि हवाई यात्रा सुरक्षित होने के अलावा सस्ती और सुविधा संपन्न भी हो।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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