चुनाव आयोग ने गत दिवस प. बंगाल, असम, तमिलनाडु , केरल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव की तिथियां घोषित कर दीं। इस बार प. बंगाल में दो चरणों में जबकि बाकी चार राज्यों में एक ही दिन मतदान होगा। चुनाव की तारीखों की घोषणा के पहले उक्त सभी राज्यों की सरकारों ने मतदाताओं को लुभाने वाली योजनाओं की घोषणा करने के साथ ही उन्हें लागू करते हुए खजाना खोल दिया। इनके अंतर्गत मतदाताओं के खाते में सीधे राशि जमा की गई। इस प्रकार ये बात साबित हो चुकी है कि चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दल मुफ़्त रेवड़ियों पर ही निर्भर होकर रह गए हैं। स्मरणीय है असम और केरल में क्रमशः भाजपा और वामपंथियों की सरकारें हैं। ये दोनों अपनी विचारधारा और सिद्धांतों के लिए जाने जाते हैं। कैडर आधारित संगठन इनकी असली ताकत है। प. बंगाल में ज्योति बसु ने तीन दशक से ज्यादा अपनी सरकार विचारधारा और कैडर के बलबूते चलाई। भाजपा भी गुजरात और मध्यप्रदेश जैसे प्रदेशों में लंबे समय से काबिज है तो इसके पीछे उसके सिद्धांतों और संगठन का योगदान कहा जाता है। लेकिन पिछले कुछ चुनावों में विचारधारा और संगठन के बजाय रेवड़ियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। इसीलिये असम की भाजपा सरकार और केरल की साम्यवादी सत्ता को मतदाताओं की जेब जनहित के नाम पर नगदी से भरनी पड़ रही है। बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव के पहले नीतीश सरकार ने लाखों महिलाओं के खाते में 10 हजार जमा करवाकर जबर्दस्त सफलता हासिल की। उसके पहले ऐसा ही प्रयोग अनेक राज्यों में हुआ जिसका लाभ सत्तारूढ़ पार्टी को मिला क्योंकि उसने चुनाव से पहले ही सरकारी खर्च से मतदाताओं की जेब गर्म कर दी। प.बंगाल , असम और केरल में लगातार एक ही पार्टी का शासन चला आ रहा है। उसके बावजूद सत्तारूढ़ पार्टी को चुनावी वर्ष में नई - नई योजनाओं के जरिए खैरात बांटने की मजबूरी झेलनी पड़े तो फिर ये मानना गलत नहीं होगा कि उनकी नीतियों और कार्यप्रणाली जनता को संतुष्ट नहीं रख सकी। तमिलनाडु तो इस मुफ्तखोरी का जनक ही है। चुनाव जीतने के लिए सरकारी खजाना खाली करने के इस तरीके पर चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय अनेक अवसरों पर ऐतराज व्यक्त कर चुके हैं। लेकिन वे भी इस पर रोक लगाने का साहस नहीं दिखा सके। ये बात भी खुलकर सामने आ चुकी है कि इनके कारण राज्यों पर कर्ज का बोझ बढ़ता चला जा रहा है। यहां तक कि उसका ब्याज चुकाने तक के लिए नया कर्ज लेने की स्थिति बन रही है। इस प्रकार ये मुफ्त योजनाएं राजनीतिक दलों के गले की फांस बनती जा रही हैं। एक बार उन्हें शुरू करने के बाद बंद करने का जोखिम उठाने की हिम्मत किसी में नहीं है। ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि मतदाता को भी उपभोक्ता मानकर ज्यादा से ज्यादा छूट जैसे आकर्षण देकर अपनी तरफ खींचना ही चुनावी सफलता का मंत्र बन गया है। चूंकि देश में हर साल कुछ राज्यों में चुनाव होते हैं इसलिए केंद्र सरकार भी मतदाताओं की नाराजगी से अपनी पार्टी को बचाने के लिए आर्थिक स्तर पर कड़े फैसले नहीं ले पाती। लोक कल्याणकारी राज्य में जनता को खुश रखना सरकार का कर्तव्य है लेकिन घर फूँक तमाशा देखने की इस प्रवृत्ति को नहीं रोका गया तो वह दिन दूर नहीं जब कर्ज का बोझ असहनीय हो जाएगा और तब जो होगा उसकी कल्पना भी भयभीत कर देती है। अनेक देश मुफ्त रेवड़ियां बांटने के बाद कंगाल होकर अराजकता का शिकार हो चुके हैं। ये सब जानते हुए भी हमारे राजनीतिक दल अपने निहित स्वार्थों के लिए जिस प्रकार सरकारी खजाना लुटाने पर आमादा हैं वह मजबूत अर्थव्यवस्था के तमाम दावों को मिट्टी में मिला देगा। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इन मुफ्त योजनाओं की आलोचना कर चुके हैं किंतु केंद्र सरकार के साथ ही भाजपा शासित राज्य भी मुफ्त रेवड़ियां बांटने में सबसे आगे हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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