ईरान पर इजराइल और अमेरिका द्वारा किए गए हमले से प. एशिया में एक बार फिर युद्ध की आग भड़क उठी है। ईरान के सर्वोच्च शासक अली खामेनेई के साथ ही सेनाध्यक्ष और रक्षा मंत्री इजराइली मिसाइल की मार से मौत के शिकार हो गए। उनके अलावा भी उच्च पदों पर बैठी अनेक हस्तियां भी जान गंवा बैठीं। ईरान के सैन्य ठिकानों विशेष रूप से मिसाइलों के भंडार और परमाणु संस्थान इजराइल और अमेरिका के निशाने पर हैं। जैसी कि ईरान धमकी दे चुका था उसने भी पलटवार करते हुए इजराइल पर एक साथ सैकड़ों मिसाइलें दाग दीं। लेकिन इस जंग में सबसे बड़ा मोड़ ये आ गया कि इस्लामिक देशों की कथित एकता के परखच्चे उड़ गए। इस्लामिक देशों के संगठन के अलावा इस्लामिक नाटो नामक नई सैन्य संधि जैसी बातें अप्रासंगिक होकर रह गईं। इसका कारण ईरान के नेताओं की मूर्खता ही है जिन्होंने इजरायल पर हमले के साथ-साथ सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, बहरीन, ओमान को भी निशाना बना दिया। इस कदम से मुस्लिम जगत दो फाड़ हो गया । उक्त देश अमेरिका के सहयोगी देश हैं। जिनके बारे में ईरान को आशंका है कि उनमें स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों का इस्तेमाल उस पर हमले के लिए हो सकता है। यद्यपि शुरुआत में मुस्लिम देशों ने ईरान पर इजराइली हमले की आलोचना की थी। लेकिन ईरान द्वारा उन पर ही मिसाइलें छोड़ दीं तब मजबूरन वे उसके विरुद्ध खड़े दिखने लगे। उक्त देशों में से कुछ ने इस युद्ध को रोकने हेतु अमेरिका से संपर्क भी किया था किंतु उसी दौरान ईरान ने उन्हीं के यहाँ धमाके कर दिए । ईरान के पक्ष में केवल लेबनान में जमे हिजबुल्ला नामक इस्लामिक आतंकवादी संगठन ने ही इजराइल पर हमले किए हैं। गाजा युद्ध में पिटने के बाद हमास की कमर पहले ही टूटी है जबकि ईरान की तरफदारी करने वाले तीसरे आतंकवादी संगठन हूती में भी इतना दम नहीं है जो इज़राइल को झुका सके। ऐसे में अच्छी छवि वाला एक भी इस्लामिक देश या संगठन ईरान के बचाव में नजर नहीं आ रहा। परमाणु शक्ति संपन्न एकमात्र मुस्लिम देश पाकिस्तान ईरान का निकटस्थ पड़ोसी होने के बावजूद अमेरिका के गुलाम जैसा है। यही वजह है कि ईरान को न तो बाहरी सैन्य सहायता मिल रही है और न ही कूटनीतिक संरक्षण। रूस जहां यूक्रेन युद्ध रूपी समस्या में फंसा है वहीं जिन चीनी मिसाइलों और रक्षा प्रणाली के बल पर ईरान अमेरिका से भिड़ने का दुस्साहस कर बैठा वे एक बार फिर धोखा दे गईं। स्मरणीय है ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी पाकिस्तान की चीन निर्मित रक्षा प्रणाली बुरी तरह विफल रही । दूसरी तरफ पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइलों को भारत ने हवा में ही नष्ट कर दिया था। लगातार दो युद्धों में चीन निर्मित युद्ध सामग्री के घटिया साबित होने से विश्व शक्ति के रूप में उसके रुतबे में जबरदस्त गिरावट आई है। कुल मिलाकर ये स्पष्ट हो गया है कि ईरान गीदड़ भभकी कितनी भी देता रहे लेकिन उसके पास उस स्तर की आक्रमण या रक्षा क्षमता नहीं है जो इजराइल जैसे छोटे देश ने विकसित कर ली। इसके विपरीत ईरानी हुक्मरान अमेरिका को धमकाकर ही खुश रहे। उन्हें डोनाल्ड ट्रम्प की रणनीति को समझकर समय रहते कूटनीतिक मोर्चा खोलना चाहिए था। सऊदी अरब , कतर और सं. अरब अमीरात को भरोसे में लेकर अमेरिका को हमलावर होने से रोका जा सकता था किंतु ख़ामेनेई अपने बनाए संसार में ही सिमटे रहे। युद्ध का अंतिम परिणाम क्या होगा ये कहना मुश्किल है लेकिन अमेरिका ने खामेनेई को मारकर एक लक्ष्य तो हासिल कर ही लिया। अब वह इजराइल के साथ मिलकर उसकी बची - खुची सैन्य क्षमता को नष्ट कर उसे झुकने मजबूर करेगा। ईरान की असली ताकत उसके तेल भंडार हैं लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते वह उनका समुचित उपयोग नहीं कर पा रहा। इस लड़ाई के बाद उसकी परमाणु बम बनाने की योजना भी अधर में फंसकर रह जाएगी। ईरान के नए शासकों के सामने सबसे बड़ी समस्या ये है कि अभी तक तो प. एशिया में इजराइल ही घोषित तौर पर उसका शत्रु था लेकिन अब वे मुस्लिम देश भी उसके दुश्मन बन गए जिन पर उसने मिसाइलों और ड्रोन से हमला करने की बेवकूफी कर दी।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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