Saturday, 28 February 2026

न्यायपालिका में रचनात्मक आलोचना सुनने का साहस होना चाहिए


बीते दो दिनों में न्यायपालिका से जुड़ी दो खबरों से एक बार फिर न्याय प्रक्रिया को लेकर चर्चाएं चल पड़ी हैं। एन.सी.ई.आर.टी द्वारा कक्षा आठवीं की एक पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक अध्याय शामिल किए जाने पर देश के मुख्य न्यायाधीश भड़क उठे और तत्काल उसे हटाने का आदेश देते हुए कहा कि जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाए। एन.सी.ई.आर.टी द्वारा माफी के बावजूद कड़ा रुख दिखाते हुए उन्होंने मामले को जारी रखने की बात कही।  पुस्तक  से विवादित अध्याय भले हटा दिया गया किंतु इससे न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार नहीं  हट सकेगा जिसे अनेक पूर्व न्यायाधीश भी खुले आम स्वीकार कर चुके हैं। एन.सी.ई.आर.टी सरकारी विभाग है लिहाजा उस पर तो धौंस काम कर गई  लेकिन न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार पर न जाने कितने लेख प्रकाशित होने के अलावा गोष्ठियां होती हैं। ऐसे में मुख्य न्यायाधीश कहां - कहां रोक लगाएंगे ये बड़ा सवाल है। दिल्ली उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के सरकारी निवास में रुपयों के बंडल मिलने के बाद भी अब तक उन्हें पद से नहीं हटाया जा सका। यदि उनकी जगह कोई अन्य सरकारी अधिकारी होता तब कम से कम उसका निलंबन तो हो ही जाता। दरअसल  न्यायाधीश कानून के रखवाले होते हुए भी कुछ मामलों में उससे ऊपर हैं जिन्हें कदाचरण के बावजूद हटाने के लिए संसद में महाभियोग पारित होना जरूरी है। सामान्य तौर पर देखें तो ये कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत का खुला उल्लंघन है। न्यायाधीशों को विशेष अधिकार और संरक्षण पूर्णरूपेण उचित है किंतु नैतिकता भी कोई चीज होती है। गत दिवस दिल्ली की एक निचली अदालत ने बहुचर्चित शराब घोटाले में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सहित 27 आरोपियों को पूरी तरह निर्दोष मानकर सीबीआई के आरोप पत्र को खारिज करते हुए जांचकर्ता सीबीआई अधिकारी की विभागीय जांच का आदेश दे दिया। अब श्री केजरीवाल  आरोप लगा रहे हैं कि उन्हें झूठा फंसाकर जेल में डाल दिया गया। राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के  इतर देखें तो जिस तरह अदालत ने  जांच अधिकारी की जांच  का आदेश दिया क्या उसी तरह उन न्यायाधीशों की जांच नहीं होनी चाहिए जिन्होंने आरोप पत्र को प्रथम दृष्टया विचार योग्य मानते हुए मुकदमे की अनुमति तो दी ही, साथ ही गिरफ्तार होने वालों की जमानत याचिका लम्बे समय तक निरस्त की जाती रही। निचली अदालत ने अपने फैसले में संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति के विरुद्ध  प्रकरण दर्ज़ करने में सावधानी बरतने की नसीहत भी जांच एजेंसी को दे डाली । लेकिन जिस आरोपपत्र की एक भी बात अदालत ने सही नहीं मानी उसे प्राथमिक तौर विचार योग्य मानने वाले न्यायाधीश भी तो सवालों के घेरे में हैं । जिस तरह श्री केजरीवाल और उनकी पार्टी के अन्य नेता सीबीआई  और सरकार पर आरोप लगा रहे हैं, कल को वैसी ही बातें उन्हें बरी करने वाले न्यायाधीश के बारे में भी कही जाएंगी। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि इस तरह के फैसलों की समीक्षा भी विभागीय स्तर पर हो जिसमें एक तरफ अदालत  आरोपियों की  जमानत अर्जी  टालती रही वहीं दूसरी तरफ पूरा आरोपपत्र रद्दी की टोकरी में फेंकने लायक समझा गया। अब यदि सीबीआई की अपील पर उच्च न्यायालय निचली अदालत के फैसले को उलट दे तब क्या निचली अदालत के न्यायाधीश शक के दायरे में नहीं आएंगे? ऐसे ही सवाल और भी हैं। देश के मुख्य न्यायाधीश ने एन.सी.ई.आर.टी की किताब से न्यायपालिका में भ्रष्टाचार वाला पाठ हटवाकर न्यायपालिका की प्रतिष्ठा कितनी बचाई ये तो विश्लेषण का विषय है। लेकिन उनके रवैए से ये जरूर साफ हो गया कि न्यायपालिका में भी असहिष्णुता बढ़ रही है। संसद द्वारा न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन का जो प्रस्ताव सर्व सम्मति से पारित किया गया उसे सर्वोच्च न्यायालय ने इसलिए खारिज कर दिया था क्योंकि उसके लागू होने से न्यायाधीशों की नियुक्ति में उसकी दखलंदाजी खत्म हो जाती। सही बात ये है कि विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने में संकोच नहीं करने वाली न्यायपालिका को अपने कार्यक्षेत्र में किसी की प्रकार की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं होने से लोकतंत्र के उक्त तीन स्तंभों के बीच संतुलन और परस्पर सम्मान का भाव गड़बड़ा रहा है। इस स्थिति में सुधार तभी संभव है जब न्यायपालिका में अपनी रचनात्मक आलोचना सुनने का साहस हो।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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