हाल ही में दो और हिन्दू धर्माचार्य यौन शोषण के आरोप में घिर गए। उत्तम स्वामी नामक आध्यात्मिक हस्ती के विरुद्ध राजस्थान की एक युवती ने शोषण की शिकायत कर सनसनी फैला दी। आरोप लगते ही स्वामी जबलपुर के निकट अपने आश्रम में हो रही कथा छोड़कर कहीं चले गए। ये महाशय कुछ समय पहले म.प्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से इस कारण नाराज हो गए थे क्योंकि वे उनके आयोजन में समय देकर भी नहीं पहुंच सके। सौजन्यतावश श्री यादव ने आभासी माध्यम से उनसे क्षमा भी मांगी किंतु बजाय क्षमा याचना स्वीकार करने के स्वामी ने उन्हें खूब फटकारा। जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार भाजपा के बड़े - बड़े नेता इनके अनुयायी हैं। दूसरी घटना बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य होने का दावा करने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़ी है जिनके विरुद्ध पास्को कानून में प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश न्यायालय ने जारी किया है। इसका आधार वह शिकायत है जिसके अनुसार उनके किसी आश्रम में कुछ बालकों का भी यौन शोषण हुआ। उल्लेखनीय है दो पीठों के शंकराचार्य रहे स्वामी स्वरूपानंद की मृत्यु उपरांत स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बद्रीनाथ पीठ के शंकराचार्य बने किंतु उनकी नियुक्ति शुरुआत से ही विवादों में घिरी रही। जगन्नाथ पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सहित अनेक धर्मगुरु और अखाड़ा परिषद तक उन्हें विधिवत नियुक्त शंकराचार्य नहीं मानती। ये विवाद भी न्यायालय में विचाराधीन है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को चर्चा में रहने का शौक भी है। हाल ही में प्रयागराज के माघ मेले में भी इन्होंने बखेड़ा खड़ा कर दिया जिसके बाद बिना स्नान किए ही इन्हें वापस जाना पड़ा। उसके बाद से ये उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पीछे पड़ गए। वैसे तो वे प्रधानमंत्री से भी चिढ़ते हैं। यद्यपि इनके गुरु स्वामी स्वरूपानंद जी भी ऐलानिया तौर पर कांग्रेस समर्थक माने जाते थे किंतु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जिस तरह की कड़वाहट दिखाते हैं उससे उनकी छवि एक आदतन असंतुष्ट व्यक्ति की बन गई। उनके विरुद्ध जो प्रकरण दर्ज हुआ उसमें यदि वे गिरफ्तार हुए तब उनकी स्थिति भी आशाराम बापू जैसी होकर रह जाएगी। लेकिन यहां सवाल किसी उत्तम स्वामी या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद नामक व्यक्ति का नहीं बल्कि सनातन धर्म की परंपरा के ध्वजावाहक आध्यात्मिक विभूतियों के चरित्र पर लगे लांछन का है। इन जैसे अन्य किसी भी धर्मगुरु पर जब इस तरह का आरोप लगता है तब उससे केवल उनकी प्रतिष्ठा ही तार - तार नहीं होती अपितु सनातन धर्म में आस्था रखने वाले असंख्य लोगों की भावनाएं आहत होती हैं। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि अनेक साधु - संन्यासी पद , प्रतिष्ठा, विलासितापूर्ण जीवनशैली के मोहपाश में बंधते जा रहे हैं। उनके पास नेता , अधिकारी , बिल्डर और अन्य ऐसे तत्व भी मंडराते दिखते हैं जो उनकी आड़ में अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं और बदले में वे उनके सुख - सुविधा का प्रबंध करते हैं। जैन मुनियों के विपरीत सनातन धर्म से जुड़ी अध्यात्मिक विभूतियों में सांसारिकता के प्रति जो लगाव बढ़ता जा रहा है उससे सनातन धर्म के आलोचकों को मुंह चलाने का अवसर बिन मांगे मिल जाता है। उत्तम स्वामी और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर लगे आरोपों की सत्यता तो जांच के बाद ही सामने आएगी किन्तु सनातन धर्म के संचालन की जो वर्तमान व्यवस्था है उससे जुड़े महानुभावों को अपने आभामंडल की चिंता छोड़कर ऐसी आचार संहिता बनानी चाहिए जिससे साधु - संन्यासी का चोला ओढ़कर धर्म विरोधी आचरण करने वालों पर लगाम कसी जा सके। उत्तम स्वामी और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर लगे आरोप की जांच करना और दोषी पाए जाने पर दंडित करना तो अदालत के अधिकार में आता है लेकिन धर्म से जुड़ी विभूतियों के आचार - व्यवहार का निर्देशन - नियंत्रण करने के लिए धार्मिक क्षेत्र की ही कोई नियामक संस्था होनी चाहिए। अखाड़ा परिषद, विद्वत परिषद और चारों शंकराचार्यों को मिलकर धर्म संस्थान से जुड़े प्रमुख लोगों के आचार - व्यवहार पर नजर रखने के साथ ही समय - समय पर उसकी समीक्षा भी करनी चाहिए। साधु के आवरण में शैतानी के उदाहरण पौराणिक काल से मिलते रहे हैं किंतु तब की दंड प्रक्रिया भी प्रभावशाली थी। बड़े - बड़े धर्माचार्य बात - बात में ये दुहाई तो देते हैं कि वे कानून से ऊपर हैं तब ये प्रश्न भी उठता ही है कि फिर उनके धर्मविरुद्ध आचरण पर दंड देने का अधिकार किसे है?
- रवीन्द्र वाजपेयी
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