प. बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एस. आई. आर) को रोकने के आखिरी प्रयास में भी राज्य की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी विफल रहीं। सर्वोच्च न्यायालय में दिग्गज वकीलों के साथ ही वे खुद भी पैरवी करने उतरीं और उक्त प्रक्रिया को रुकवाना चाहा किंतु उनकी दलीलें काम नहीं आईं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पुनरीक्षण रोकने से इंकार के बाद अब सुश्री बैनर्जी के पास एस आई.आर में रोड़ा अटकाने के अवसर खत्म हो चुके हैं। गत दिवस न्यायालय ने साफ शब्दों में कहा कि एस.आई.आर जारी रहेगी और इस संवैधानिक काम में किसी की भी दखलअंदाजी बर्दाश्त नहीं होगी। राज्य सरकार को ये आदेश भी दिया कि वह आयोग की मदद के लिए 8 हजार से अधिक अधिकारी तुरंत मुहैया कराए। इसके अलावा अदालत ने नामों में गलती वाले मतदाताओं को राहत देते हुए कहा वे 14 फरवरी के एक हफ्ते बाद तक अपने कागजात दिखा सकेंगे। आयोग की इस शिकायत पर कि बंगाल में उनके अधिकारियों को काम करने से रोका जा रहा है और कुछ जगहों पर तो नोटिस तक जला दिया गया, सर्वोच्च ने नाराज होकर कहा कि संविधान पूरे देश के लिए एक है और किसी को भी सरकारी काम में बाधा डालने की अनुमति नहीं है। इस प्रकार जैसे बिहार में विपक्षी दलों द्वारा ऐड़ी - चोटी का जोर लगाए जाने के बाद भी मतदाता सूचियों पुनरीक्षण नहीं रुका वही स्थिति बंगाल में भी बन गई । ममता ने तो बिहार में एस. आई. आर शुरू होते ही अपने राज्य में उसे रोकने की घोषणा जोर - शोर से की थी। राज्य के जिन शासकीय कर्मचारियों को चुनाव आयोग ने पुनरीक्षण का काम दिया उनको भी असहयोग हेतु भड़काया गया। काम के बोझ से बी. एल. ओ की मौत का भी खूब प्रचार किया गया। छोटी - छोटी बातों को लेकर उच्च और सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे खटखटाए गए। लेकिन सारी कोशिशें व्यर्थ साबित हुईं। उल्लेखनीय है बिहार के बाद पुनरीक्षण का काम अनेक राज्यों में शुरू हुआ लेकिन वहां प. बंगाल जैसी हाय - तौबा देखने नहीं मिली । ममता को इस बात का डर सता रहा है कि उनकी सबसे बड़ी बैसाखी कहलाने वाले जिन मुसलमानों के नाम बड़ी संख्या में काटे गए उनमें बांग्लादेशी घुसपैठियों की भी अधिकता है जो इस प्रक्रिया के शुरू होते ही गायब हो गए। ऐसे लाखों मतदाताओं ने आयोग के नोटिसों का जवाब भी नहीं दिया। ममता के डर का एक कारण ये भी है कि 30 फीसदी से भी अधिक मुस्लिम मतदाताओं के एकमुश्त समर्थन की गारंटी नहीं रही। कांग्रेस और वाममोर्चा इस बार अलग - अलग लड़ेंगे । जाहिर है वे भी मुस्लिम मतों में सेंध लगाएंगे। लेकिन उनकी चिंता का सबसे बड़ा कारण असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एमआईएम के अलावा मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रखने वाले तृणमूल के बागी विधायक हुमायूं कबीर का मैदान में उतरना है। बिहार में ओवैसी की सफलता से ममता घबराहट में हैं। ऊपर से बाबरी मस्जिद के लिए मुस्लिम समुदाय जिस उत्साह के साथ हुमायूं कबीर के साथ जुड़ा उसने मुस्लिम मतों में बंटवारे की आशंका उत्पन्न कर दी। दूसरी तरफ घुसपैठियों को संरक्षण और मुसलमानों के जरूरत से ज्यादा संरक्षण के कारण हिन्दुओं में पहली बार ममता के विरुद्ध गोलबंद होने की संभावना बढ़ रही है। बांग्लादेश में बीते एक - डेढ़ साल से हिंदुओं पर मुस्लिम कट्टरपंथियों के अत्याचार की जो खबरें आ रही हैं उनके कारण भी हिंदुओं के बीच ये भावना तेजी से फैल रही है कि उन्हें अपने हितों का संरक्षण करने वाली सरकार चाहिए जिसकी गुंजाइश भाजपा में ही नजर आती है। हालांकि ममता की सत्ता को उखाड़ फेंकना भाजपा के लिए भी इतना आसान नहीं है क्योंकि जब तक उसे हिंदुओं के 70 - 75 फीसदी मत नहीं मिलते तब तक राइटर्स बिल्डिंग पर कब्जा नामुमकिन है। बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खाली हाथ लौटा दिए जाने के बाद ममता पर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ा है। भाजपा इसका कितना फायदा उठा सकेगी ये कहना फिलहाल मुश्किल है क्योंकि ममता चुनाव की अधिकृत घोषणा के पहले ऐसी कोई चाल चल सकती हैं जैसी बिहार में नीतीश सरकार ने महिलाओं के खाते में 10 हजार जमा करने के रूप में चली थी। हालांकि एस. आई. आर की प्रक्रिया को रोकने के लिए उन्होंने जिस तरह से हाथ - पांव मारे वह उन पर पराजयबोध के हावी होने का संकेत है। वरना विधानसभा में इतने विशाल बहुमत और 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा से काफी बेहतर प्रदर्शन के बाद भी वे मतदाता सूचियों से नाम काटे जाने से इतनी विचलित नहीं होतीं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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