Wednesday, 4 February 2026

सड़क और सदन का अंतर समझने में विफल हैं राहुल


लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लंबे समय से सांसद हैं। कांग्रेस  के महामंत्री और अध्यक्ष जैसे पदों का दायित्व भी निर्वहन कर चुके हैं। सोनिया गांधी की अस्वस्थता  के कारण अब वही पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं। इसीलिए अपेक्षा रहती है कि वे जनता से जुड़े मुद्दे उठाकर सत्ता पक्ष को घेरें। लेकिन वे अप्रासंगिक बातें उछालकर सनसनी फैलाने को ही राजनीति समझ बैठे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर नीतिगत मामलों में निशाना साधना पूरी तरह उचित है। सरकार की गलतियों पर उसे कठघरे में खड़ा करना भी नेता प्रतिपक्ष से अपेक्षित होता है। लेकिन वे अपनी शक्ति ऐसे मुद्दों पर खर्च कर देते हैं जिनका समुचित आधार नहीं होने  से वे आम जनता को प्रभावित नहीं करते। हर बात में अडानी को घसीटने से उनकी खीझ ही जाहिर होती है। इसी तरह प्रधानमंत्री पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से दबने जैसी उनकी टिप्पणियां भी असर नहीं छोड़तीं। यदि ये सब उनके अपने दिमाग की उपज है तब तो कुछ कहने को बचता ही नहीं और यदि  सलाहकार ये सब बोलने के लिए प्रेरित करते हैं तब फिर ये मान लेना पड़ेगा कि वे उनके शुभचिंतक नहीं हैं । इन दिनों राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस के दौरान उनके द्वारा पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल नरवणे  की अप्रकाशित पुस्तक के अंश पढ़ने को लेकर उठा विवाद चर्चा में है। किसी पत्रिका में प्रकाशित उक्त  अंशों को श्री गांधी ने सदन में पढ़ने का प्रयास किया जिस पर सत्ता पक्ष ने ऐतराज किया । दरअसल संदर्भित पुस्तक की पांडुलिपि प्रकाशक द्वारा नियमानुसार रक्षा मंत्रालय के पास स्वीकृति हेतु भेज दी गई।  जिससे सुरक्षा संबंधी कोई संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक न हो। श्री गांधी ने जो अंश पढ़ा उसके जरिए वे ये साबित करना चाहते थे कि 2020 में  चीन जब हमारी भूमि की तरफ बढ़ रहा था तब सरकार ने सेना को समय पर निर्देश देने में विलम्ब किया । और सेनाध्यक्ष द्वारा कई बार निर्देश मांगने पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उन्हें प्रधानमंत्री का ये निर्देश दिया कि जो उचित लगे करो। सरकार की आपत्ति के बाद लोकसभा अध्यक्ष ने श्री गांधी को वे  अंश पढ़ने से रोक दिया। इस पर  हंगामा होने से लोकसभा की कार्यवाही बाधित हो रही है।  जहां तक बात जनरल नरवणे की पुस्तक की है तो  प्रकाशन के पूर्व उसके किसी हिस्से को उद्धृत करना इसलिए गलत है क्योंकि रक्षा मंत्रालय की अनुमति के बाद ही उसे प्रामाणिक माना जाएगा। और यदि ये मान भी लिया जाए कि प्रधानमंत्री ने थलसेनाध्यक्ष को जो उचित लगे करो जैसा निर्देश  दिया तब तो यह प्रशंसा योग्य है। ऑपरेशन सिंदूर शुरू होने के पूर्व भी तीनों सेनाध्यक्षों को श्री मोदी ने ऐसे ही निर्देश दिए थे। वैसे  भी 2014 में इस सरकार के आने के बाद सेना को मोर्चे पर जवाबी कार्रवाई के लिए रोज - रोज ऊपर से आदेश नहीं लेना पड़ते। श्री गांधी द्वारा लोकसभा में  श्री नरवणे की पुस्तक का मामला छेड़ने के बाद दर्जनों ऐसे साक्षात्कारों की रीलें प्रसारित होने लगीं जिनमें पूर्व सेनाध्यक्ष ये कहते सुने जा सकते हैं कि 2020 के संघर्ष में भारत ने चीन की जो पिटाई की उसे वह लंबे समय तक नहीं भूलेगा। उन्होंने ये बात भी जोर देकर दोहराई कि चीन एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सका। हालांकि श्री गांधी हमेशा आरोप लगाते रहे हैं कि चीन ने हमारी काफी जमीन उस संघर्ष में दबा ली। अमेरिका के साथ ट्रेड डील पर भी उनकी प्रतिक्रिया उनके पद की गरिमा के अनुरूप नहीं थी। सबसे बड़ी बात ये रही कि बतौर नेता प्रतिपक्ष श्री गांधी को राष्ट्रपति के जिस अभिभाषण पर बोलना था उस पर वे बोले ही नहीं। जबकि इस अवसर का लाभ उठाकर सत्ता पक्ष को अच्छे से घेर सकते थे। अब तक के उनके प्रदर्शन को देखते हुए कहा जा सकता है कि वे सांसद की भूमिका में समुचित प्रभाव छोड़ने में असफल रहे हैं। जनरल  नरवणे की पुस्तक और अमेरिका से ट्रेड डील पर उनकी टिप्पणियां उनकी अपरिपक्वता को ही दर्शाती हैं। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर प्रतिवर्ष सरकार की ओर से जवाब देते हुए विपक्ष को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं। और आज भी यही होगा। बजट जैसे महत्वपूर्ण सत्र में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। लेकिन उसके निर्वहन के लिए समुचित अध्ययन और प्रभावी संबोधन जरूरी है। लेकिन श्री गांधी आज तक नहीं समझ पाए कि सड़क और सदन दोनों जगहों पर विरोध के तरीके अलग होते हैं। इसीलिये वे जनता को प्रभावित नहीं कर पाते। वोट चोरी का मुद्दा इसका प्रमाण है। निकट भविष्य में कांग्रेस को अनेक राजनीतिक चुनौतियों से जूझना है। लेकिन यदि श्री गांधी इसी तरह की सतही राजनीति करते रहे तब उसे महाराष्ट्र और बिहार जैसे नतीजे झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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