संसद में हंगामा जारी है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव संबंधी अपने भाषण में पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक के अंश पढ़े जाने पर उत्पन्न विवाद बढ़ता चला गया। आसंदी पर कागज फेंकने वाले कुछ विपक्षी सांसद पूरे सत्र के लिए निलंबित भी किए गए। इसके विरोध में विपक्ष की कतिपय महिला सांसदों द्वारा प्रधानमंत्री के आसन को घेरने के बाद किसी अप्रिय घटना की आशंका के चलते अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अभिभाषण पर हुई बहस का उत्तर देने से रोक दिया। और फिर लोकसभा ने बिना उनका जवाब सुने ही धन्यवाद प्रस्ताव का अनुमोदन कर दिया। हालांकि प्रधानमंत्री ने गत दिवस राज्यसभा में 95 मिनिट के लंबे भाषण में विपक्ष पर तीखे हमले करते हुए अपनी सरकार की उपलब्धियों का बखान किया परंतु लोकसभा में अन्य विपक्षी दलों के नेता भी इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने से वंचित रह गए क्योंकि कांग्रेस ने सदन को बाधित करने की अपनी रणनीति जारी रखी। हालांकि बाकी विपक्ष भी ऊपरी तौर पर तो श्री गांधी की हां में हां मिलाता रहा किंतु निजी चर्चा में अनेक सांसदों ने इस बाद पर नाराजगी जताई कि राहुल लगभग प्रत्येक सत्र में कोई न कोई विवाद उत्पन्न कर सदन चलने नहीं देते जिसके कारण दूसरे विपक्षी दलों के सांसदों को अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिल पाता। राहुल की बहिन प्रियंका वाड्रा का कहना है कि सदन चलाना सरकार की ज़िम्मेदारी है । अर्थात विपक्ष जो भी करे उसकी छूट उसे दी जाती रहे। लेकिन आजाद समाज पार्टी सांसद चंद्रशेखर आजाद ने विपक्ष को भी उसका दायित्व याद दिलाते हुए कहा कि हंगामे से अन्य दलों के सांसद अपने क्षेत्र के मुद्दे नहीं उठा पाते। हालांकि ये न तो पहला सत्र है जो हंगामे के कारण बाधित है और न ही आखिरी क्योंकि आजकल संसद और विधानसभाओं के सत्र केवल संवैधानिक बाध्यताओं के कारण ही होते हैं। उनमें गंभीर बहस होने के बजाय आपसी आरोप - प्रत्यारोप में समय खराब किया जाता है। बजट जैसे अति महत्वपूर्ण विषय पर भी कई बार चर्चा नहीं होती । राष्ट्रपति के अभिभाषण पर कांग्रेस के अलावा अन्य दलों के सांसद भी बोलना चाहते होंगे लेकिन हंगामे के कारण सदन स्थगित होता रहा। आज भी यही हुआ जिसके बाद लोकसभा सोमवार तक स्थगित कर दी गई जबकि विषय सूची के अनुसार अनेक सांसदों द्वारा पेश किए गैर सरकारी विधेयकों पर चर्चा होना थी। यदि यही हाल रहा तो बड़ी बात नहीं बजट भी इसी तरह स्वीकृत हो जाएगा। अब सवाल ये है कि क्या संसद केवल भाजपा और कांग्रेस की है? ये बात इसलिए उठ खड़ी हुई क्योंकि जबसे राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष बने तभी से वे खुद को चर्चा में रखने के लिए हर सत्र में ऐसा कुछ कर बैठते हैं जिससे सत्ता पक्ष उत्तेजित होता है और सदन चल नहीं पाता। ऐसे में श्री गांधी तो खबरों में आ जाते हैं लेकिन बाकी दलों के ही नहीं बल्कि उनकी अपनी पार्टी के सांसदों का समय बर्बाद होता है। जहां तक सत्तारूढ़ भाजपा का प्रश्न है तो उसे भी ये स्थिति रास आती है क्योंकि सरकार जिस विधेयक या प्रस्ताव को पारित करवाना चाहती है वह बिना बहस के ही स्वीकृत हो जाता है। आने वाले कुछ महीनों में देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। उनमें से चुनकर आए लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य इस सत्र में वहां के मुद्दे उठाकर राजनीतिक लाभ लेना चाहते होंगे किंतु यदि आगे भी सदन नहीं चला तब उनके पास सिवाय हाजरी लगाकर दैनिक भत्ता पकाने के और कोई रास्ता नहीं बचेगा। राहुल गांधी और सत्ता पक्ष के टकराव में सपा , द्रमुक और तृणमूल कांग्रेस जैसे बड़े दलों के सांसदों की सदन में उपस्थिति भी चेहरा दिखाने तक सीमित है। बेहतर होता इनके जो नेता हैं वे कांग्रेस और भाजपा दोनों पर दबाव बनाते हुए कहते कि उनकी खींचतान में बाकी दलों के सांसदों से बोलने का अवसर छीन लिया जाता है। सरकार और मुख्य विपक्षी दल जाहिर तौर पर सदन में प्रभावी और विशेषाधिकार सम्पन्न हैं किंतु उनकी रस्सा कशी में छोटे - छोटे दलों के सांसद सदन में बैठकर भी दर्शक बने रहते हैं। भारत की संसदीय प्रणाली बहुदलीय है। यहां तक कि निर्दलीय सांसद तक जीतकर आते हैं। ऐसे में सदन की कार्रवाई में सभी को भाग लेने का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन मौजूदा स्थिति में ऐसा होता प्रतीत नहीं होता। लोकसभा के अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को चाहिए कि वे ऐसी व्यवस्था करें जिससे सदन बड़ी पार्टियों के शिकंजे से बाहर निकले और कुछ नामचीन चेहरे लोकतंत्र के मंदिर के मठाधीश न बन सकें।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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