सर्वोच्च न्यायालय ने व्हाट्स एप को लोगों की निजता का उल्लंघन करने के लिए डांट पिलाई है। सोशल मीडिया के इस मंच से करोड़ों भारतीय भी जुड़े हैं । निःशुल्क सेवा देने वाले व्हाट्स एप की कमाई उसका उपयोग करने वालों के डेटा ( निजी विवरण) के व्यावसायिक उपयोग से होता है। हालांकि केवल व्हाट्स एप ही नहीं बल्कि सोशल मीडिया के किसी भी प्लेटफार्म अथवा इंटरनेट का उपयोग करने वाले की व्यक्तिगत जानकारी मार्केटिंग कंपनियों को बेचकर ये सब अनाप - शनाप धन कमाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय सहित अन्य नियामक एजेंसियां इस बारे में काफी सख्ती दिखाती रही हैं । मोटे जुर्माने भी लगाए गए किंतु डेटा बेचने का गोरखधंधा बेरोकटोक जारी है। दावा तो यहां तक होता है कि मोबाइल फोन पर की जाने वाली कोई बातचीत गोपनीय नहीं रहती। मोबाइल धारक किस समय किस स्थान पर है इसकी जानकारी भी आसानी से लग जाती है। इसी की मदद से अपराधी भी पकड़े जाते हैं। मोबाइल फोन पर बातचीत रिकॉर्ड करने की सुविधा के कारण ही अनेक व्यक्ति व्हाट्स एप पर बातचीत करते हैं। लेकिन ये बात बिना संकोच कही जा सकती है कि मोबाइल और इंटरनेट का उपयोग करने वाले की निजता में खुलेआम डाका डाला जा रहा है जिसको रोकना न तो सरकार के बस में है और न ही न्यायपालिका के। यही वजह है कि अतीत में उठाए गए सख्त कदम बेअसर होकर रह गए। सही बात तो ये है कि जब से दुनिया एक बाजार बन गई है तब से उसमें रहने वाले हर व्यक्ति को उपभोक्ता मान लिया गया है। व्यापार करने वालों का जाल इतना घना है कि कितना भी सतर्क रहें उसमें फंसने से नहीं बचा जा सकता। मसलन एक व्यक्ति जैसे ही कहीं जाने के लिए रेल या हवाई जहाज की टिकिट आरक्षित करता है त्योंही उसके गंतव्य वाली जगह के होटल और टैक्सी वालों के संदेश मोबाइल पर आने लग जाते हैं। इसी तरह जैसे ही कोई व्यक्ति पर्यटन की योजना बनाने हेतु गूगल पर सर्च करता है त्योंही उसके पास तत्संबंधी संदेश आने लगते हैं । लगभग हर व्यक्ति के मोबाइल पर दिन पर प्रॉपर्टी बेचने वालों के फोन के अलावा निवेश योजनाओं के बारे में अनजान नंबरों से संपर्क किया जाना आम बात है। इसके अलावा कर्ज देने वाली संस्थाओं के अवांछित फोन भी परेशान करते हैं। यदि आप आरक्षित टिकिट पर रेल यात्रा कर रहे हैं तब गाड़ी चलते ही आपको रास्ते में भोजन सेवा उपलब्ध करवाने वालों के संदेश आने लगते हैं। एक कार के बारे में गूगल पर जानकारी एकत्र करने पर दूसरी कंपनियां भी आपको अपनी कार खरीदने के लिए संपर्क करने लगती हैं। गला काट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में बाजार का उपभोक्ता तक पहुंचना अटपटा नहीं है । लेकिन इसके अतिरेक से होने वाली परेशानी भी कम नहीं है। सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले व्यक्ति की निजी रुचि के अलावा उसकी राजनीतिक विचारधारा तक का आकलन फेसबुक और एक्स पर उसकी गतिविधियों से कर लिया जाता है। इस डेटा का उपयोग चुनाव के समय प्रत्याशी और राजनीतिक पार्टियां भी करती हैं। इस सबसे स्पष्ट है कि डेटा विश्वव्यापी कारोबार बन चुका है जिसके चलते हर खास और आम के बारे में समूची जानकारी की खरीद - बिक्री होती है। हालांकि उसका उपयोग केवल व्यापारिक उद्देश्यों तक सीमित न होकर सरकारी योजनाओं के सर्वेक्षण हेतु भी होता है। लेकिन चिंता का विषय ये है कि जिस तरह आधार कार्ड और पैन कार्ड से किसी भी व्यक्ति के बारे में सारी जानकारी सरकारी एजेंसियां पता कर सकती हैं ठीक वैसे ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के उपयोगकर्ताओं की समूची जानकारी उसके संचालकों की अनुमति के बिना सहज रूप से बिना कुछ किए मिल जाती है जिसको बेचकर अकूत दौलत कमाई जाती है। इसीलिए किसी देश या व्यावसायिक प्रतिष्ठान की मजबूती उसके पास उपलब्ध डेटा से तय होती है। सर्वोच्च न्यायालय ने व्हाट्स एप पर जो चाबुक चलाया उसका कितना असर होगा ये कहना कठिन है किंतु किसी व्यक्ति की निजता का सौदा उसकी जानकारी और मर्जी के बिना होना अनैतिक भी है और खतरनाक भी। सबसे ज़्यादा चिंता इस बात की है कि सोशल मीडिया और इंटरनेट का पूरा नियंत्रण अमेरिका के चंद धनकुबेरों के हाथ में है। जिसके कारण ये डर बना रहता है कि कहीं उनकी कमान भी डोनाल्ड ट्रम्प जैसे सनकी के हाथ आ गई तब जो होगा उसकी कल्पना भी डराती है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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