लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर तृणमूल कांग्रेस ने हस्ताक्षर नहीं किए। पार्टी के अनुसार वह पहले विपक्ष की सभी मांगों को देखने के बाद ही इसकी समर्थन पर फैसला करेगी। लेकिन पार्टी का ये कहना उसके रुख का संकेत है कि अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव अंतिम हथियार होता है । इससे लगता है तृणमूल मतदान के समय अनुपस्थित रह सकती है। हालांकि राहुल गांधी को सदन में बोलने नहीं देने के विरोध में विपक्ष द्वारा उठाए गए कदमों में पार्टी साथ रही। जिन 8 सदस्यों को निलंबित किया गया उनमें तृणमूल के कल्याण बैनर्जी भी हैं। सदन के बाहर धरने में भी तृणमूल सांसद नजर आए। सदन के भीतर अध्यक्ष और सरकार के विरोध में पार्टी सांसद मुखर रहे हैं। बावजूद उसके अविश्वास प्रस्ताव पर उसका पीछे हटना इंडिया गठबंधन में बढ़ रही दरार का प्रमाण है। स्मरणीय है प. बंगाल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अकेले लड़ने का जो फैसला लिया उससे ममता बैनर्जी नाराज हैं। पिछले दो चुनावों में कांग्रेस का वामपंथी मोर्चे से गठबंधन था। लेकिन इससे उसका अपना जनाधार खिसककर भाजपा में चला गया। 2021 के चुनाव में तो वह शून्य पर अटक गई। गत लोकसभा चुनाव में भी ममता ने कांग्रेस को घास नहीं डाली जिससे लोकसभा में कांग्रेस दल के नेता अधीर रंजन चौधरी तक चुनाव हार गए। उसके बाद कांग्रेस को लगा कि वामपंथियों के साथ लड़ने से उसका परम्परागत मतदाता नाराज है क्योंकि वामपंथी सत्ता की डरावनी यादें आज भी ताजा हैं। कांग्रेस द्वारा वाम मोर्चे का दामन थामने से हिन्दू समाज विशेष तौर पर सवर्णों का वोट बैंक खिसककर भाजपा की झोली में जा गिरा। इसके अलावा मुस्लिम मतदाता भी कांग्रेस की कमजोर स्थिति देख तृणमूल की शरण में चले गए। ऐसे में जब कांग्रेस एकला चलो की नीति पर लौटी तो तृणमूल के कान खड़े हुए। हालांकि प.बंगाल में इंडिया गठबंधन में दरार के लिए ममता ही जिम्मेवार हैं जो अपना एकाधिकार बनाए रखने के लिए किसी अन्य पार्टी को आगे नहीं बढ़ने देना चाहतीं। राष्ट्रीय स्तर पर भले ही वे भाजपा के विरुद्ध कांग्रेस के साथ हों किंतु प. बंगाल में कांग्रेस को उभरने का अवसर नहीं देना चाहतीं। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर भी वे पसंद नहीं करतीं। ऐसे में श्री बिरला के विरुद्ध कांग्रेस की पहल पर लाए गए अविश्वास प्रस्ताव से दूरी बनाकर ममता ने आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को किनारे लगाने का इरादा स्पष्ट कर दिया । वैसे भी बीते वर्षों में अनेक अवसर आए जब संसद में तृणमूल ने एन वक्त पर कांग्रेस द्वारा सरकार के विरुद्ध शुरू की गई मुहिम को पलीता लगा दिया। अडानी समूह संबंधी विवाद को लेकर जेपीसी के गठन की मांग का भी तृणमूल कांग्रेस ने विरोध किया था। दरअसल ममता बैनर्जी को ये लगता है कि कांग्रेस के मजबूत होने से राहुल गांधी की संभावनाएं प्रबल होंगी जो उनकी महत्वाकांक्षाओं की राह में बाधा बनेगी। इसीलिए वे समय - समय पर कांग्रेस को झटका देती रही हैं। गोवा विधानसभा के पिछले चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारकर उन्होंने कांग्रेस के लिए खाई खोद दी। इसी तरह दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को समर्थन देकर कांग्रेस को शून्य से आगे नहीं बढ़ने दिया। वैसे भी लोकसभा चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन की एकजुटता बनी नहीं रह सकी। संसद के भीतर भी विपक्ष की साझा रणनीति नहीं दिखाई देती। बिहार विधानसभा के चुनाव में करारी हार के बाद राहुल की राजनीतिक समझ पर कांग्रेस के भीतर से ही सवाल उठने लगे हैं। बिहार के जमीनी मुद्दों से इतर वे वोट चोरी की रट ही लगाए रहे। संसद के सत्रों में भी वे कोई न कोई विवाद खड़ा कर देते हैं जिससे वे तो चर्चा में आ जाते हैं किंतु शेष विपक्ष को अपनी बात रखने का अवसर ही नहीं मिलता। समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव भी राहुल की इस आदत से नाराज बताए जाते हैं। अंदरखाने की खबर तो ये भी है कि तमिलनाडु में द्रमुक भी आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को झटका देने की सोच रही है। उधर केरल में कांग्रेस की चुनौती के चलते वामपंथी पार्टियां भी उससे दूरी बना रही हैं। याद रहे वायनाड में पहले भी राहुल और प्रियंका वाड्रा के लड़ने का वामपंथियों ने काफी विरोध किया था। इस प्रकार ये स्पष्ट है कि राहुल गांधी की कार्यशैली के कारण इंडिया गठबंधन में पहले जैसी कसावट नहीं रही। लोकसभाध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर तृणमूल द्वारा हस्ताक्षर नहीं करना साधारण बात नहीं है। इसके जरिए दरअसल ममता बैनर्जी ने कांग्रेस को ये संदेश दे दिया कि उनके भाजपा विरोध को कांग्रेस का समर्थन समझने की भूल न करे।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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