Friday, 20 February 2026

मुफ्त योजनाओं को रोकने सर्वोच्च न्यायालय को ही आगे आना होगा


कुछ साल पहले भी सर्वोच्च न्यायालय यही बात कह चुका है। गत दिवस एक बार मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत सहित दो अन्य न्यायाधीशों की संयुक्त पीठ ने सरकार द्वारा चलाई जा रही मुफ्त  योजनाओं पर तंज़ कसते हुए कहा कि यदि सबको मुफ्त खाद्यान्न और नगद राशि दी जाएगी तो लोग काम क्यों करेंगे ? न्यायालय ने जरूरतमंदों को  लाभान्वित किए जाने के औचित्य को तो स्वीकार किया किन्तु जो साधन संपन्न हैं उन्हें ही सरकारी सहायता दिए जाने पर ऐतराज जताया। उसने इस बात का उल्लेख किया कि मुफ्त योजनाएं चुनाव जीतने का औजार बनती जा रही हैं और धीरे - धीरे केंद्र के अलावा राज्यों ने भी इस तरीके को अपना लिया। न्यायालय ने राज्यों द्वारा कर्ज में डूबे होने के बाद भी  सरकारी खजाना लुटाए जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए समझाइश दी कि बजाय मुफ्त में खिलाकर निठल्ला बनाने के सरकार लोगों को रोजगार दे और अपना धन विकास कार्यों में खर्च करे । पीठ ने निर्धन और साधनहीन विद्यार्थियों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए आर्थिक सहायता देने की पैरवी करते हुए कहा कि सरकारी सहायता उन्हीं को मिले जो इसके सुपात्र हैं। उल्लेखनीय है इसकी शुरुआत दशकों पहले तमिलनाडु से हुई जब के. कामराज ने शालाओं में बच्चों के निःशुल्क आहार की योजना लागू की।  बाद में जितने मुख्यमंत्री आए उन सबने मुफ्त योजनाओं में नया कुछ जोड़ा और जयललिता के आते तक तक मिक्सी , मंगलसूत्र और टी.वी बांटकर चुनाव जीतने का प्रबंध होने लगा। इससे प्रेरित होकर अन्य राज्यों में भी  सत्ता हासिल करने और फिर उसमें बने रहने के लिए सरकारी खजाने को लुटाने का जो सिलसिला प्रारंभ हुआ वह शेर की सवारी का रूप ले चुका है  जिस पर रोक लगाना राजनीतिक आत्महत्या करना होगा। गत  वर्ष दिल्ली विधानसभा के चुनाव में प्रधानमंत्री ने जब आदमी पार्टी सरकार  की मुफ्त योजनाओं को रेवड़ी कहकर उनकी आलोचना की तब जवाब में अरविंद केजरीवाल ने  ये प्रचार शुरू कर दिया कि भाजपा सत्ता में आई तो वह मुफ्त बिजली, पानी और महिलाओं की बस यात्रा पर रोक लगा देगी । इस प्रचार से घबराई भाजपा ने  आश्वासन दिया कि सभी मुफ्त सुविधाएं जारी रहेंगी और झुग्गी वासियों को पक्के मकान दिये जाएंगे। भाजपा ने आम आदमी पार्टी द्वारा महिलाओं को प्रति माह 2100 रु. के वायदे से आगे बढ़कर 2500 रु. देने का वायदा कर दिया। विडंबना ये है कि सभी दल एक  - दूसरे पर खैरात बाँटकर चुनाव जीत लेने का आरोप लगाते हैं किंतु खुद  उससे परहेज नहीं करते। आशय ये है कि खेल सभी एक जैसे  रहे हैं किंतु हारने वाला विजेता पर बेईमानी  का आरोप लगाने से बाज नहीं आता। पूर्व में सर्वोच्च न्यायालय ये पूछ चुका है कि सरकार मुफ्त अनाज कब तक बांटेगी? कांग्रेस भी मोदी सरकार के आर्थिक प्रगति के दावे का मजाक उड़ाते हुए कहती है कि ऐसा है तो 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज क्यों देना पड़ रहा है ? लेकिन  मुफ्त अनाज वितरण जिस राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत किया जा रहा है वह सोनिया गाँधी की पहल पर मनमोहन सिंह सरकार द्वारा ही  पारित करवाया गया था। कुछ साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने ही सरकारी गोदामों में अनाज के सड़ने की शिकायतों पर कहा था कि इससे बेहतर है वह गरीबों में बाँट दिया जाए। मोदी सरकार ने कोरोना काल में जब निःशुल्क अनाज वितरण शुरू किया तब वह समय की मांग थी जिसे अब वह चाहकर भी  बंद नहीं कर पायेगी । चुनाव आयोग भी कह चुका है कि ऐसा करना उसके लिए तभी संभव होगा जब संसद उसके लिए कोई कानून बनाए जिसके कोई आसार नजर नहीं आते। सवाल ये है कि सर्वोच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान लेकर चुनाव के समय मुफ्त योजनाओं के वायदे किये जाने पर रोक क्यों नहीं लगाता? अनेक मामलों में वह ऐसा कर भी चुका है। ये मुद्दा भी विचारणीय है कि आर्थिक संसाधनों की कमी के बाद भी इस तरह के वायदे करने का क्या औचित्य है जिनके कारण विकास सहित अन्य महत्वपूर्ण कार्य प्रभावित होते हैं।  लोकतंत्र में कमजोर वर्ग का संरक्षण सरकार का दायित्व होता है। भारत के अलावा अन्य देशों में भी अनुदान के जरिये लोगों की मदद की जाती है। लेकिन संपन्न देश तो सक्षम हैं जबकि विशाल आबादी वाले भारत जैसे देश में  मुफ्त योजनाओं को स्थायी बना देना व्यवहारिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से अनुचित है। चूंकि राजनीतिक नेताओं को मुफ्त योजनाओं के भरोसे चुनाव जीतना आसान लगता है इसलिए उनसे कोई उम्मीद करना बेकार है। चुनाव आयोग में पदस्थ नौकरशाहों में भी बिल्ली के गले में घंटी बांधने का साहस नहीं है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय को ही आगे आकर स्वतः संज्ञान लेते हुए ठोस कदम उठाना चाहिए जिससे सत्ता हासिल करने के लिए सरकारी धन का अनुचित उपयोग रोका जा सके।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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