Tuesday, 24 February 2026

भ्रष्टाचार के बोझ से ढह रहे विकास रूपी पुल


म.प्र में जबलपुर - भोपाल हाइवे पर शहपुरा के निकट बना पुल गत दिवस ढह गया। इसका एक हिस्सा कुछ माह पहले क्षतिग्रस्त होने के कारण उसकी मरम्मत चल रही थी । लेकिन दो दिन पहले दूसरे हिस्से का भी वही हश्र हुआ। उस पुल के नीचे से रेल की पटरी गुजरती है। जिस समय पुल टूटा तब कोई रेलगाड़ी वहां से नहीं गुजरी अन्यथा बड़ी अनहोनी घट जाती। पुल ढहने की खबर फैलते ही शासन - प्रशासन हरकत में आया और ठेकेदार सहित निर्माण कार्य की देखरेख करने वाली  कंपनी को ब्लैक लिस्ट करने के अलावा अपराधिक प्रकरण दर्ज करवा दिया गया। लोक निर्माण मंत्री ने पुल निर्माण की प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों की पेंशन रोकने जैसी घोषणा भी कर डाली। इस मार्ग के यातायात को वैकल्पिक रास्तों पर मोड़ दिया गया। पुल को दोबारा उपयोग लायक बनाने में कितना समय लगेगा ये कहना कठिन है और तब तक जबलपुर से सड़क मार्ग जाने वाले वाहनों को अपेक्षाकृत कम बेहतर रास्तों से आवागमन करना होगा जिससे ज्यादा समय लगने के अलावा जाम की स्थिति भी बनना तय है जो पहले दिन से ही दिखाई देने लगी। जनता की मांग है कि इस हिस्से का टोल टैक्स तब तक न वसूला जाए जब तक पुल पर दोबारा यातायात शुरू न हो।  जाहिर है विपक्ष  प्रदेश सरकार को घेरेगा जो उसका अधिकार भी है और दायित्व भी। लोकनिर्माण मंत्री ने इसीलिए बिना देर लगाए हादसे के जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कड़े कदम उठाने की पहल कर दी। सवाल ये है कि ऐसे  निर्माणों में इस तरह की लापरवाही और भ्रष्टाचार कब तक होता रहेगा? देश भर में आए दिन सड़क , पुल - पुलिया में घटिया निर्माण की बात सामने आती है। और फिर वैसा ही कर्मकांड होता है जैसा संदर्भित घटना के बाद देखने मिल रहा है। भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की तरफ बढ़ रहा है। हाइवे और एक्सप्रेस हाइवे के कारण सड़क मार्ग की यात्रा आरामदेह हो गई। परिणामस्वरूप देश के ऑटोमोबाइल उद्योग को भी पंख लग गए। फ्लाय ओवर और एलीवेटेड सड़कें बदलते भारत की तस्वीर पेश करते हैं। दो दिन पूर्व ही दिल्ली से मेरठ के बीच वंदे भारत प्रारंभ होने से ढाई - तीन घंटे की यात्रा एक घंटे में संभव हो गई। बुलेट ट्रेन शुरू होने का समय भी नजदीक आ रहा है। आधारभूत संरचना ( इंफ्रास्ट्रक्चर) पर विशेष ध्यान दिए जाने से देश का आत्मविश्वास बढ़ा है। लेकिन जिस एक बात की कमी खलती है वह है गुणवत्ता का अभाव। इसके पीछे केवल लापरवाही हो तो समझ में आता है किन्तु असली समस्या है भ्रष्टाचार । बिहार में तो एक पुल ऐसा भी है जो निर्माण के दौरान जितनी बार ढहा वह एक रिकॉर्ड है। गुजरात में भी एक नदी पर बने पुल का नवीनीकरण होने के बाद वह ढह गया जिससे दर्जनों लोग डूबकर मर गए। ऐसे जाने कितने हादसे यदा - कदा सुनने में आते हैं जिनमें जनहानि होने के बाद सरकार मुआवजा बांटकर दाएं - बाएं हो जाती है। जांच के दिखावे के बाद कुछ बलि के बकरे हलाल किए जाते हैं और फिर भ्रष्ट व्यवस्था अपनी गति से चल पड़ती है। यही वजह है कि विकास के ज्यादातर काम गुणवत्ता की कसौटी पर फिसड्डी साबित हो जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि ठेकेदार , इंजीनियर , अधिकारी और नेताओं के इस अपवित्र गठबंधन से देश को आज़ादी कब मिलेगी ? जब हम विकसित देशों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का हौसला दिखा रहे हैं तब हमें ये भी देखना होगा कि वहां भ्रष्टाचार करने वाले को किस प्रकार का दंड दिया जाता है ? सबसे ज्यादा जीडीपी पर  अपनी पीठ ठोकने के साथ ही ये सोचने की भी जरूरत है कि कहीं वह भ्रष्टाचार  के बोझ तले दबकर न रह जाए। देश में सैकड़ों वर्ष पुराने  मंदिरों , किलों और महलों के अलावा पुल भी हैं । आजादी के पहले बने अनेक छोटे - छोटे बांध आज भी खड़े हैं। चूंकि निर्माण में ईमानदारी बरती गई थी इसलिए इनकी मजबूती आज  भी यथावत है। लेकिन स्वाधीन भारत में जो सरकारी निर्माण हुए उनमें कुछ अपवाद छोड़कर बाकी की स्थिति किसी से छिपी नहीं है।  ये कहना किसी भी दृष्टि से गलत नहीं है कि  देश में भ्रष्टाचार और बेईमानी में वृद्धि की दर जीडीपी से कहीं ज्यादा है। जबलपुर के निकट ढहा पुल कहने को तो छोटा सा हादसा है क्योंकि उसमें कोई हताहत नहीं हुआ। लेकिन देखने वाली बात ये है कि वह पुल बहुत पुराना नहीं है। इस घटना के बाद पूरे प्रदेश से अनेक ऐसे पुलों की जानकारी आ रही है जो घटिया निर्माण के कारण कभी भी गिर सकते हैं। राज्य सरकार और संबंधित विभागों का ये दायित्व है कि उन सबकी फौरन जांच करवाकर जो भी उचित हो किया जावे जिससे आने वाले खतरे को समय रहते टाला जा सके। और ये भी कि इन सबके लिए जो भी दोषी हों उन्हें इतना कड़ा दंड मिले जिससे भ्रष्टाचार करने वालों का कलेजा कांपे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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