Friday, 13 February 2026

विशाल बहुमत के बाद भी तारिक की राह आसान नहीं होगी




आखिरकार बांग्लादेश में चुनाव हो ही गए जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया की पार्टी बीएनपी को प्रचंड बहुमत मिला। अब इसके नेता तारिक रहमान का प्रधानमंत्री बनना से सुनिश्चित है जो खालिदा जिया के बेटे हैं और गत 25 जनवरी को ही देश लौटे थे जिसके पाँच दिन बाद ही बेगम चल बसीं। तारिक के पिता जिया उर रहमान भी  राष्ट्रपति रहे थे । देश की राजनीति  50 सालों से मुजीबुर्रहमान और जिया उर रहमान के परिवार के बीच ही झूलती रही। जिया के बाद उनकी पत्नी सत्ता में आईं वहीं मुजीब की बेटी शेख हसीना भी लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहीं। और अगस्त 2024 में तख्ता पलट होने के बाद  भारत। आकर यहीं रह रही हैं जो दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट का बड़ा कारण है। बांग्लादेश की अदालत ने हसीना को मृत्युदंड सुना दिया जिसके बाद वह लगातार उन्हें वापस भेजने की मांग कर रहा है। कहा जाता है कि हिंदुओं पर अत्याचार के पीछे हसीना का भारत में रहना भी कारण है। हालांकि  बांग्लादेश बनने के कुछ सालों बाद  मुजीब की हत्या होने के उपरांत  सत्ता ज्यादातर भारत विरोधियों के हाथ रही जिससे हिंदुओं की हत्या , महिलाओं के साथ दुराचार , मंदिरों आदि को नष्ट करने जैसे अपराध सरकारी संरक्षण में होते रहे। शेख हसीना के 15 वर्षीय काल में जरूर कुछ कमी आई लेकिन हिन्दू आबादी और  धर्मस्थलों की पूरी तरह सुरक्षा नहीं हो सकी। हसीना को अपदस्थ करने के बाद मुस्लिम कट्टरपंथियों ने हिंदुओं के साथ जो व्यवहार किया उसने 1947 की कड़वी यादें ताजा कर दीं। बावजूद इसके खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर शामिल हुए और उनके बेटे तारिक रहमान से निजी मुलाकात कर चर्चा की। संभवतः इसीलिए चुनाव घोषणापत्र में बीएनपी ने हिंदुओं की सुरक्षा का वायदा शामिल किया। प्रचार के दौरान भी तारिक भारत के साथ बेहतर रिश्तों की बात कहते रहे। इसीलिए हिन्दू मतदाताओं ने बीएनपी का समर्थन भी किया। मुख्य विपक्षी दल के तौर पर जमात - ए - इस्लामी उभरी जिसके नेता अजहरुल इस्‍लाम को मो. यूनुस की अंतरिम सरकार के बनने के बाद 1971 के मुक्ति संग्राम का विरोध करने के आरोप में युद्ध अपराधी मानकर मृत्युदंड सुनाने के साथ ही जमात को भी प्रतिबंधित कर दिया गया। लेकिन बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी सजा रद्द कर  पार्टी का पंजीयन भी बहाल कर दिया। कहा जाता है जमात पर यूनुस का वरद हस्त था और वे उसे सत्ता में देखना चाह रहे थे। लेकिन खालिदा की आकस्मिक मौत के बाद बीएनपी के पक्ष में सहानुभूति पैदा हुई। जिस छात्र संगठन की हसीना की सत्ता उखाड़ फेंकने में प्रमुख भूमिका रही उसे भी मतदाताओं ने नकार दिया। तारिक  ने चुनाव के दौरान खुद को एक सुलझे हुए नेता के तौर पर पेश किया और भारत के साथ बेहतर संबंध रखने की उम्मीद भी जताई।  दूसरी तरफ जमात घोषित तौर पर इस्लामिक कट्टरपंथी व्यवस्था की वकालत कर रही थी।बहरहाल तारिक  को दो तिहाई बहुमत देकर मतदाताओं ने राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित की । देखना ये है कि क्या हिंदुओं का थोक समर्थन मिलने से तारिक उनके प्रति संवेदनशील रहने के साथ ही भारत के साथ संबंध सुधारने की दिशा में आगे बढ़ेंगे जो मो. यूनुस के आने के बाद बुरी तरह बिगड़ गए थे। ये सवाल भी है कि तारिक क्या यूनुस के प्रभाव से बाहर निकलकर फैसले ले पाएंगे क्योंकि कट्टरपंथी जमात नई सरकार को परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। बांग्लादेश के  कट्टरपंथियों पर पाकिस्तान जिस तरह डोरे डाल रहा है उसकी वजह से  भारत विरोधी भावनाओं को भड़काने के प्रयास होते रहेंगे जिसका दुष्परिणाम हिंदुओं पर अत्याचार के तौर पर सामने आ सकता है। और ये भी कि क्या शेख हसीना के भारत में रहते तक तारिक उसके साथ नज़दीक आने का साहस बटोर सकेंगे?  सीमा और नदियों के पानी के अलावा घुसपैठियों की वापसी जैसे तमाम विवादित मुद्दे लंबित हैं। वहीं बांग्लादेश पर प्रभाव जमाने के लिए पाकिस्तान, अमेरिका और चीन प्रयासरत हैं। यूनुस ने वहां चीन की जड़ें जमाने में काफी सहायता दी। डोनाल्ड ट्रम्प भी एक द्वीप पर नजर गड़ाए हैं। ऐसे में तारिक के लिए अंतर्राष्ट्रीय दबाव बड़ी समस्या बनेंगे। हालांकि उनका और बांग्लादेश दोनों का हित तो भारत के साथ दोस्ती बढ़ाने में ही है किंतु उसमें शेख हसीना को पनाह देना बाधा बन सकता है जिनके राज में ही खालिदा जिया जेल गईं और तारिक को देश छोड़ना पड़ा। ये सब देखते हुए इस देश और नई सरकार के बारे में कोई भी भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी क्योंकि इस देश की सियासत शुरू से ही कड़वाहट से भरी रही। सबसे बड़ी बात यहां इस्लामिक धर्मांधता का बोलबाला है जिसके कारण इसकी आजादी के लिए खून बहाने वाले भारत को छोड़ ये देश पाकिस्तान के करीब जा पहुंचा जिसके हुक्मरानों और फौजियों ने बांग्लादेशी जनता और महिलाओं पर अमानुषिक अत्याचार किए थे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी 

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