Thursday, 19 February 2026

कर्ज का बोझ बजट में दिखाए सपनों पर भारी पड़ सकता है


म.प्र सरकार द्वारा आगामी वित्तीय वर्ष का बजट गत दिवस विधान सभा में प्रस्तुत किया गया। जहां तक प्रतिक्रियाओं का सवाल है तो सरकार समर्थक जहां वित्तमंत्री जगदीश देवड़ा द्वारा पेश इस बजट  को क्रांतिकारी मानते हुए प्रदेश के सर्वांगीण विकास में सहायक बताते नहीं थक रहे वहीं विपक्ष की नजर में यह आंकड़ों की बाजीगरी के सिवाय और कुछ भी नहीं। इसी तरह व्यापार और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों की राय भी  भिन्न - भिन्न है। जिस उद्योग या व्यवसाय को वित्तमंत्री ने कोई सौगात अथवा राहत प्रदान की वह  इसकी प्रशंसा में जुटा है किंतु जिनके हाथ कुछ नहीं लगा वे जाहिर तौर पर नाखुश हैं। क्षेत्रीय स्तर पर भी ऐसा ही अनुभव किया जा सकता है।  जिस इलाके की विकास योजनाओं के लिए धन का प्रावधान किया गया , उनके लिए यह बजट स्वागत योग्य है और जो क्षेत्र वंचित रह गए उनमें बिना लाग लपेट के इसे विकास विरोधी माना जा रहा है। शासकीय कर्मचारियों, बेरोजगार नौजवानों और गृहिणियों के बीच भी बजट को लेकर प्रतिक्रियाएं तात्कालिक लाभ या नुकसान पर आधारित है। वित्तमंत्री ने लाभार्थियों के लिए जी भरकर खजाना खोला है। शिक्षा , स्वास्थ्य और  आधारभूत संरचना के लिए भी आकर्षक प्रावधान किए गए हैं। विकास के कुछ बड़े प्रकल्पों का संकल्प भी उन्होंने दर्शाया है। लेकिन सबसे बड़ी बात है श्री देवड़ा ने  किसी भी प्रकार का नया कर नहीं लगाया । हालांकि ये एक तरह का  फैशन सा बन गया है जिसके जरिए बजट को लोक - लुभावन बनाने का प्रयास किया जाता है। वैसे भी आम जनता को बजट का तकनीकी  पक्ष उतना पल्ले नहीं पड़ता जितना ये कि उस पर कितना बोझ  बढ़ेगा या कितनी राहत मिलेगी? दरअसल नया कर लगाने से परहेज कर ज्यादातर वित्तमंत्री खुद को जनता का शुभचिंतक साबित करने का प्रयास करते हैं और वही श्री देवड़ा ने बड़ी ही खूबसूरती से किया। म.प्र में 2003 से अब तक मात्र 15 माह की कमलनाथ सरकार छोड़कर भाजपा ही सत्ता पर काबिज है। इसमें दो मत नहीं हैं कि इस अवधि में प्रदेश उस दयनीय अवस्था से  काफी हद तक बाहर आया है जो 10 साल कांग्रेस  की सरकार चलाने वाले दिग्विजय सिंह छोड़ गए थे। उनके शासनकाल में बिजली, सड़क और पानी की जो शर्मनाक स्थिति थी उसमें जबरदस्त सुधार हुआ है और यही कारण रहा कि कभी बीमारू राज्य के तौर पर बदनाम यह प्रदेश कृषि और उद्योगों के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति कर सका। सड़कों और बिजली की भरपूर उपलब्धता ने बड़े औद्योगिक घरानों को यहां निवेश हेतु आकर्षित किया वहीं पर्यटन भी बढ़ा। लेकिन यह उपलब्धि कुछ क्षेत्र विशेष तक सीमित रहने से जो क्षेत्रीय असंतुलन उत्पन्न हो गया है उसे दूर करना बेहद जरूरी हैं । प्रदेश में जनकल्याण की जो योजनाएं प्रारंभ की गईं उनकी वजह से जहां भाजपा का जनाधार मजबूत हुआ वहीं समाज के पिछड़े वर्ग की स्थिति में भी सुधार हुआ। इन योजनाओं की सफलता का असर पूरे देश में देखने मिल रहा है। 2023 में शिवराज सिंह चौहान द्वारा लागू की गई लाड़ली बहना योजना तो तकरीबन प्रत्येक राज्य में अलग - अलग नामों से लागू की जा रही है। लेकिन इस सबसे अलग हटकर देखें तो डॉ. मोहन यादव की सरकार के इस महत्वाकांक्षी बजट के आकर्षक प्रावधानों को प्रदेश पर बढ़ते जा रहे कर्ज का बोझ झटका दे सकता है। ऐसे में ये प्रश्न सहज रूप से उठता है कि कर्ज पर आधारित  अर्थव्यवस्था उन लक्ष्यों को पूरा करने में कहां तक कामयाब हो सकेगी जो बजट में निर्धारित किए गए। यदि वित्तमंत्री के इस स्पष्टीकरण पर विश्वास कर भी लिया जाए कि जितना भी कर्ज लिया गया उसका उपयोग आधारभूत संरचना एवं अन्य विकास कार्यों में ही किया गया तो भी ये प्रश्न तो उठेगा ही कि बिना नया कर लगाए जनकल्याण योजनाओं और नई विकास परियोजनाओं के लिए राशि कहां से आएगी? जब तक प्रदेश में तमिलनाडु , गुजरात और महाराष्ट्र जैसा सघन औद्योगिकीकरण नहीं हो जाता तब तक करों की आय के अलावा बेरोजगारी की स्थिति में भी सुधार होना मुश्किल है। बजट में हजारों नई सरकारी नौकरियों का प्रावधान स्वागतयोग्य है किंतु प्रदेश सरकार का स्थापना व्यय और बढ़ने से नई परेशानियां सामने आए बिना नहीं रहेंगी। बजट में किसानों , महिलाओं , युवाओं सहित हर वर्ग को लुभाने के प्रावधान हैं किंतु ले देकर वही बात आ जाती है कि बिना आय बढ़ाए ये सपने पूरे कैसे होंगे?  विकासशील अर्थव्यवस्था में कर्ज लेना बुरा नहीं बशर्ते उसकी अदायगी के लिए दूरदर्शी नियोजन किया जाए। उधार लेकर घी पीने की महर्षि चार्वाक की सलाह तात्कालिक सुख तो दे सकती है किंतु कालांतर में कष्टकारक होती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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