Wednesday, 18 February 2026

ए. आई के क्षेत्र में भारत ने सही समय पर कदम बढ़ाया


दिल्ली में चल रहे ए. आई ( आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस) सम्मेलन में कई देशों के दिग्गज उद्यमियों के साथ ही  इस विधा में हाथ आजमाने के इच्छुक नए खिलाड़ी हिस्सा ले रहे हैं। सूचना क्रांति के दौर से निकलकर अब दुनिया ए. आई नामक चमत्कारिक खोज के पीछे चल पड़ी है जो मानव मस्तिष्क का कृत्रिम रूप है। रोबोट नामक मशीनी मानव से शुरू यह यात्रा जिस तेजी से बढ़ रही है उसे देखते हुए  माना जाने लगा है कि जो उसके साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चलेगा वह विकास की दौड़ में  पिछड़ जाएगा। जब कम्यूटर आए थे तब उन्हें स्वीकार करने में पूरी दुनिया ने थोड़ा समय लिया था किंतु ए. आई चूंकि उसी में से विकसित होकर निकला लिहाजा उसके प्रति काफी उत्साह नजर आने लगा। शुरुआत में इस कृत्रिम बौद्धिकता के प्रयोग की सफलता पर संदेह के बादल मंडराते रहे। नैतिकतावादियों ने भी  अपनी आपत्तियां दर्ज करवाईं। समाजशास्त्रियों के बीच भी ए. आई को लेकर बहस चल रही है। पौराणिक कथाओं में ऐसे अनेक पात्रों का वर्णन है जो किसी वरदान के परिणामस्वरूप अत्यधिक शक्ति संपन्न बन गए। साथ ही उनमें असाधारण कार्य करने की क्षमता उत्पन्न हो गई जिसके चलते वे समाज के लिए खतरा बन गए। स्थिति बेकाबू होते देख वरदान देने वाले ने ही उन्हें नष्ट किया। ए. आई से होने वाली समस्याओं और खतरों को लेकर दुनिया भर में अनेक फिल्में भी बनीं किंतु इस सबका कोई असर देखने नहीं मिला और तकनीक के विकास में लगे वैज्ञानिकों ने ए. आई की उपयोगिता को इतने प्रभावशाली ढंग से पेश किया कि चाहे न चाहे पूरे विश्व को ये मान लेना पड़ा कि इसको अपनाने के सिवाय उसके पास और कोई विकल्प नहीं है। लेकिन बात यहां खत्म नहीं हो जाती। मनुष्य की खोजी बुद्धि ने एक ऐसा तंत्र और यंत्र खोज निकाला जो मानव मस्तिष्क के सोचने की शक्ति और बुद्धि कौशल में उससे भी कई गुना आगे है। कैलकुलेटर जैसी छोटी सी चीज शुरुआत में आश्चर्यचकित कर देती थी। फिर सूचना तकनीक ने और छलांगे लगाईं। कंप्यूटर से सुपर कंप्यूटर तक की यात्रा ने पूरे विश्व की तकदीर और तस्वीर दोनों बदलकर रख दी। डिजिटल तकनीक और फिर इंटरनेट के उपयोग करने में सक्षम एंड्रॉयड मोबाइल फोन ने विकास के नए झंडे गाड़ते हुए पूरी दुनिया को जोड़ दिया। आज यदि एक क्षण के लिए भी मोबाइल बंद कर दिया जाए तो लोग परेशान हो उठते हैं। कंप्यूटर और इंटरनेट की जुगलबंदी ने पूरी दुनिया को ऐसे शिकंजे में कस दिया है जिससे मुक्त होना असम्भव है। शुरू में ये आशंका व्यक्त की जाती थी कि कम्प्यूटर परंपरागत रोजगार छीन लेगा। कुछ समय तक ये हुआ भी लेकिन जल्द ही स्पष्ट हो गया कि बिना उसके इंसानी जिंदगी में ठहराव आ जाएगा। कंप्यूटर का ज्ञान शिक्षित होने का पैमाना बन गया। अब तो छोटे बच्चे तक उसमें पारंगत हो गए हैं। ये कहना भी गलत न होगा कि कम्प्यूटर , इंटरनेट और मोबाइल ने जिंदगी सरल बनाई है और सुविधाएं बढ़ीं हैं। सूचना प्रेषण और संपर्क को इसने जो आसानी दी उसने विकास की नई परिभाषा गढ़ दी। लेकिन ए. आई के बारे में जो कुछ भी सामने आया है उसके आधार पर कहा जा सकता है कि यह मानवीय मस्तिष्क का मशीनी रूपांतरण है जिसे खुद मनुष्य ने ही बनाया है। इसकी क्षमता, कार्यक्षेत्र और सटीक कार्यशैली कल्पनातीत होते हुए भी वास्तविकता है। आज ए. आई तकनीक सर्वत्र चर्चा का विषय बन चुकी है। इससे मिलने वाले लाभों को लेकर सर्वत्र उत्सुकता भी है। लेकिन इसके साथ ही भय भी है क्योंकि जिस मशीनी मानव का विकास ए. आई के रूप में किया गया उसमें इंसान से सैकड़ों गुना क्षमता और प्रतिभा तो है किंतु वह भावना शून्य होने से हमारे सुख - दुख को कितना बांट सकेगा इसमें संदेह है। इसके अलावा ये सवाल भी उठ  रहा है कि क्या मनुष्य ए. आई का विकास कर अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी तो नहीं मार रहा क्योंकि एक  रोबोट जितना काम कर सकता है उतना कई मनुष्य नहीं कर सकते। लेकिन महज इस आधार पर उसे स्वीकार करने में हिचक नहीं होनी चाहिए क्योंकि इसके जरिए मानवीय चिकित्सा और शिक्षा जैसे क्षेत्र में  चमत्कारिक सुधार संभव हैं। साथ ही इसकी मदद से विज्ञान के विकास को पंख लगने के कारण नए रोजगार उत्पन्न होंगे। ये संतोष का विषय है कि भारत ने समय रहते ए. आई के रास्ते पर अपना कदम बढ़ा दिए हैं। वैश्विक सम्मेलन में देश के उद्योगपतियों सहित अन्य लोगों ने जो भी रुचि और उत्साह दिखाया वह विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के हमारे प्रयास को सफल बनाने में सहायक होगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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