पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान अस्पताल में भर्ती हैं। खालिस्तान समर्थक एक संगठन द्वारा भेजे गए ईमेल में उस अस्पताल को उड़ाने की धमकी के साथ ही उन्हें पोलोनियम नामक विषैले पदार्थ से संक्रमित किए जाने का खुलासा किया गया है। खालिस्तान नेशनल आर्मी के नाम से आए ईमेल में पंजाब को खालिस्तानियों का बताते हुए श्री मान का हाल भी पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह जैसा किए जाने की धमकी दी गई है जिन्हें खालिस्तानियों ने मानव बम से उड़ा दिया था। मुख्यमंत्री को विषैली चीज से संक्रमित करने और बेअंत सिंह जैसा हाल करने जैसी धमकी के बाद सुरक्षा बल चिंता में है। राज्य में कानून व्यवस्था की निरंतर बिगड़ती स्थिति के बाद खालिस्तानी आतंक के सिर उठाने से राज्य में अस्सी - नब्बे के दशक का वह दौर वापस आने की आशंका बढ़ती जा रही है जब वहां देश विरोधी ताकतों ने दहशत फैला रखी थी। अनेक नेता और पत्रकार मारे गए। अमृतसर के ऐतिहासिक स्वर्ण मंदिर के अकाल तख्त पर ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसी सैन्य कार्रवाई हुई जिसमें खालिस्तानी सरगना जरनैल सिंह भिंडरावाला मारा गया। बाद में उसी के प्रतिशोधस्वरूप प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उन्हीं के दो सिख अंगरक्षकों ने गोलियों से भून दिया। जिन जनरल वैद्य के नेतृत्व में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ उनकी भी सेवा निवृत्ति के बाद पुणे में खालिस्तानियों द्वारा हत्या कर दी गई। जैसे - तैसे वह आतंक खत्म हुआ और पंजाब में शांति लौट आई। जो सिख समुदाय कांग्रेस से नाराज था उसने भी पुरानी बातें भूलकर उसे राज्य की सत्ता सौंपने की दरियादिली दिखाई। लेकिन बीते कुछ सालों में पंजाब की धरती में दबे खालिस्तानी आतंक के बीज फिर अंकुरित होने लगे। इसका संकेत नवंबर 2020 से एक साल तक दिल्ली में चले किसानों के उस धरने में मिला जो था तो केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए तीन कृषि कानूनों के विरोध में किन्तु धीरे - धीरे उसमें खालिस्तानी तत्व घुस आए। चूंकि उसमें पंजाब से आए सिखों की बड़ी संख्या थी इसलिए शुरुआत में किसी को समझ में नहीं आया किंतु जब कुछ सिख नौजवान भिंडरावाले के चित्र अंकित टी शर्ट में नजर आए तब ये बात सामने आई कि किसानों की आड़ में खालिस्तानी तत्व सक्रिय हो गए। धीरे - धीरे विदेशी आर्थिक सहायता के संकेत भी मिले। विशेष रूप से कैनेडा और ब्रिटेन में किसान आंदोलन के समर्थन में जिस तरह से भारत विरोधी उपद्रव देखने मिले उनके बाद ये संदेह पुख्ता होने लगा कि खालिस्तानी आतंक का पुनर्जन्म हो रहा है। उसी दौरान गणतंत्र दिवस के दिन दिल्ली के लाल किले में की गई तोड़फोड़ के बाद एक निहंग सिख द्वारा लालकिले पर निशान साहब फहराने की हिमाकत भी दुनिया ने देखी। हालांकि केंद्र सरकार द्वारा तीनों कृषि कानूनों को वापस लिए जाने के बाद धरना तो बेनतीजा समाप्त हो गया किंतु पंजाब में खालिस्तानी आतंक का बीजारोपण हो गया। उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को भारी सफलता मिलने के पीछे खालिस्तान समर्थक ताकतों का समर्थन भी चर्चा में रहा। आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे डॉ. कुमार विश्वास तो शुरू से ही आरोप लगाते रहे हैं कि पार्टी के सर्वोच्च नेता अरविंद केजरीवाल की खालिस्तानी अलगाववादियों से संगामित्ती है। और जब श्री केजरीवाल ने श्री मान को मुख्यमंत्री बनवाया तब ये बात स्पष्ट हो गई कि इस सीमावर्ती संवेदनशील राज्य में बजाय किसी सक्षम राजनीतिक शख्सियत के उन्होंने ऐसे व्यक्ति को गद्दी पर बिठा दिया जिसे वे कठपुतली की तरह नचा सकें। इस संबंध में एक बात और उल्लेखनीय है कि श्री मान द्वारा पंजाब की गद्दी संभालने के बाद खाली की गई संगरूर लोकसभा सीट से अकाली दल ( अमृतसर) के सिमरनजीत सिंह मान जीते जो कट्टरपंथी सिख राजनीति से जुड़े थे। उसी के बाद से पंजाब में हत्याओं और हिंदुओं के धर्मस्थलों पर खालिस्तानियों के हमलों का सिलसिला शुरू हो गया। ये बात पूरी तरह सही है कि खालिस्तानी संगठनों को पाकिस्तान और कैनेडा से भरपूर सहायता मिलती है किंतु पंजाब में कमजोर सरकार और अपरिपक्व मुख्यमंत्री के होने से भी देश विरोधी ताकतों का हौसला बुलंद है। जब भगवंत सिंह मान को धमकियां मिलने लगीं और खालिस्तानी पंजाब को एक बार फ़िर आतंक की आग में झोंकने आमादा हो गए तब राज्य सरकार को होश आया किंतु सच्चाई ये है कि इस स्थिति के लिए मुख्यमंत्री मान के साथ ही आम आदमी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी बराबरी का कसूरवार है जिसने सत्ता हासिल करने के लिए पंजाब में खालिस्तानी आतंक को दोबारा पनपने का अवसर दिया।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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