राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक विरोध की अभिव्यक्ति लोकतांत्रिक समाज की पहचान है। विपक्ष में बैठे दल और उनके नेता सरकार को घेरने का कोई अवसर अवसर नहीं छोड़ते। लेकिन जहां देश का हित और प्रतिष्ठा जुड़ी हो वहां दलीय मतभेद किनारे रखते हुए एकजुटता का प्रदर्शन जरूरी होता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब देश पर उत्पन्न संकट के समय और राष्ट्रीय गौरव से जुड़े किसी भी प्रसंग के अवसर पर सर्वदलीय एकता देखने मिली। लेकिन अब दलीय स्वार्थ को प्राथमिकता देते हुए देश के सम्मान से खिलवाड़ किया जाने लगा है। उदाहरणार्थ गलवान घाटी और ऑपरेशन सिंदूर में सेना द्वारा प्रदर्शित पराक्रम पर सवाल उठाए गए। बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक की सफलता पर भी संदेह जताया गया। ताजा प्रकरण है दिल्ली में चल रही ए. आई समिट में कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा कपड़े उतारकर प्रदर्शन और नारेबाजी करना। कांग्रेस पार्टी के अनुसार उसके कार्यकर्ता भारत - अमेरिका ट्रेड डील का विरोध करने गए थे। इस डील का विरोध करने का कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों को पूरा अधिकार है। यदि उसमें कहीं भी देश के हितों के साथ समझौता हुआ हो तो उसके विरुद्ध आवाज उठाने में कोई बुराई नहीं है। संसद में भी विपक्ष उसके कुछ प्रावधानों पर अपनी आपत्तियां दर्ज करवा चुका है जिसके उत्तर में सरकार के मंत्रियों ने स्पष्ट किया कि भारत के किसानों सहित अन्य वर्गों के हितों की सुरक्षा का ध्यान रखा गया है। अमेरिकी सरकार ने भी कुछ स्पष्टीकरण दिए। ऐसे में बेहतर होगा विपक्ष और उक्त डील पर ऐतराज जता रहे अन्य संगठन अंतिम फैसला होने तक प्रतीक्षा करते। यदि उन्हें अपनी सक्रियता ही दिखानी है तो विरोध के और भी तौर - तरीकों और मंचों का उपयोग किया जा सकता था। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ए. आई समिट जिसमें अनेक राष्ट्रप्रमुखों के अतिरिक्त दुनिया की दिग्गज बहुराष्ट्रीय आई. टी कंपनियों के शीर्ष अधिकारी , देशी - विदेशी उद्योगपति एकत्र हुए हों, उसके आयोजन स्थल में घुसकर जिस तरह का प्रदर्शन कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया उससे पार्टी की विवेक शून्यता एक बार फिर उजागर हो गई। ए. आई समिट भाजपा का आयोजन नहीं है। अपितु उसकी मेजबानी भारत सरकार द्वारा की गई। दुनिया भर की हस्तियों की उपस्थिति से ये साबित हो गया कि भारत के तकनीकी कौशल और प्रबंधन क्षमता के प्रति विश्वास बढ़ा है। गूगल सहित अन्य विदेशी कंपनियों द्वारा ए. आई के क्षेत्र में अरबों - खरबों के निवेश की घोषणा इस आयोजन की सफलता का जीता - जागता प्रमाण है। कांग्रेस को यदि ये इसलिए अच्छा नहीं लग रहा कि समिट में आए राष्ट्रप्रमुखों और कार्पोरेट जगत की शीर्ष वैश्विक हस्तियों ने प्रधानमंत्री श्री मोदी की प्रशंसा की तो ये उसकी खीझ दर्शाता है । उसे ये नहीं भूलना चाहिए कि इस समिट ने भारत की प्रतिष्ठा में वृद्धि की है और ए. आई के क्षेत्र में वह विश्व का नेतृत्व करने की हैसियत में आ गया। ये बात भी सही है कि इसका श्रेय श्री मोदी को मिल रहा है और मिलना भी चाहिए। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस समिट की आलोचना की थी किंतु उन्हीं की पार्टी के वरिष्ट नेता शशि थरूर ने खुलकर उसकी प्रशंसा की। बावजूद इसके कांग्रेस को इस आयोजन में रही कमियों पर उंगली उठाने का पूरा अधिकार है किंतु भारत - अमेरिकी ट्रेड डील के बहाने आयोजन स्थल में घुसकर उत्पात करने का औचित्य समझ से परे है। राहुल गांधी प्रधानमंत्री और भाजपा का उग्र विरोध कर अपना राजनीतिक भविष्य उज्ज्वल करना चाह रहे हैं । लेकिन उसका जनमानस पर प्रभाव क्यों नहीं पड़ता इसका विश्लेषण उन्हें करना चाहिए। लोकसभा चुनाव में सीटें बढ़ जाने से उन्हें ये लगने लगा था कि श्री मोदी की चमक कम हो गई किंतु उसके बाद जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए उनमें कांग्रेस का दयनीय प्रदर्शन श्री गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े करने पर्याप्त है। ए. आई समिट में कांग्रेस कार्यकर्ताओं का अशोभनीय प्रर्दशन इस बात का प्रमाण है कि पार्टी में अपनी गलतियों से सीख लेने की प्रवृत्ति समाप्त हो चुकी है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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