Thursday, 30 April 2026

पूर्वानुमानों से काफी मिलते - जुलते हैं एग्जिट पोल



गत दिवस प. बंगाल में दूसरे चरण का मतदान संपन्न होते ही पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो गई। उसके बाद से ही एग्जिट पोल आने लगे जो कि काफी कुछ अपेक्षित ही हैं। मसलन प. बंगाल में ज्यादातर एजेंसियों ने भाजपा सरकार बनने की संभावना जताई है। इक्का - दुक्का अभी भी ममता बैनर्जी द्वारा चौका लगाए जाने की भविष्यवाणी कर रहे हैं। एक्सिस माय इंडिया ने पहले चरण वाली 152 सीटों का जो एग्जिट पोल जारी किया उसके अनुसार 2021 की स्थिति उलट रही है। अर्थात भाजपा 100 के करीब और तृणमूल कांग्रेस 50 के इर्द - गिर्द रहेगी। कल हुए 142 सीटों के मतदान का एग्जिट पोल सम्भवतः आज जारी होगा। लोकसभा चुनाव में एग्जिट पोल  गलत निकलने के कारण उक्त एजेंसी के संचालक प्रवीण गुप्ता को काफी आलोचना झेलनी पड़ी। उसके बाद के सभी चुनावों में उन्होंने  पर्याप्त समय लिया। बिहार में भी उनका एग्जिट पोल एक दिन बाद ही जारी हुआ था। आज एक्सिस माय इंडिया का बचा हुआ एग्जिट पोल भी यदि भाजपा को बहुमत मिलने की बात कहता है तब फिर सुश्री बैनर्जी के लिए ये बहुत बड़ा धक्का होगा। असम के बारे में तो किसी को संदेह था ही नहीं कि  हिमंता बिस्वा सर्मा की सरकार बड़े बहुमत के साथ लौटेगी। सभी एग्जिट पोल एक स्वर से उसकी पुष्टि कर रहे हैं। केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में भाजपा के गठबंधन वाली एनडीए की सरकार  दोबारा बनने की संभावना भी आश्चर्यचकित नहीं कर रही। इसी तरह केरल में वाम मोर्चे की सरकार को हटाकर 10 साल बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ की वापसी भी सुनिश्चित मानी जा रही थी। लेकिन पड़ोसी राज्य तमिलनाडु में तमिल फिल्मों के लोकप्रिय अभिनेता विजय द्वारा बनाई गई पार्टी ने मैदान में उतरकर अनिश्चितता पैदा कर दी। हालांकि ज्यादातर एग्जिट पोल सत्तारूढ़ द्रमुक के नेतृत्व वाली स्टालिन सरकार के लौटने की भविष्यवाणी कर रहे हैं लेकिन एक्सिस माय इंडिया ने विजय की पार्टी के सबसे बड़े दल के तौर पर उभरने की भविष्यवाणी कर सनसनी मचा दी है । इस पोल के अनुसार तमिलनाडु में त्रिशंकु विधानसभा बनने जा रही है। यदि वाकई ऐसा हुआ तब विजय , द्रमुक को साथ लेंगे या अन्ना द्रमुक - भाजपा गठबंधन के साथ गठजोड़ करेंगे,  ये सवाल राजनीतिक विश्लेषकों को परेशान कर रहा है। विजय की नई - नवेली पार्टी यदि सत्ता में आ गई तब 6 दशक बाद तमिलनाडु में उस द्रविड़ राजनीति का वर्चस्व समाप्त होगा जो पेरियार रामास्वामी से अन्ना दौरई, करुणानिधि, एम. जी रामचंद्रन और जयललिता से होते हुए स्टालिन तक निर्बाध चली आ रही है। द्रमुक के विभाजन के बाद  अन्ना द्रमुक बनी किंतु प्रदेश की राजनीति पर इन दोनों का ही कब्जा बना रहा। यदि विजय ने इसे तोड़ा तो वह इस राज्य की राजनीति की दिशा बदल सकता है क्योंकि वैसा होने पर भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां अपना जनाधार बढ़ाने में सक्षम होंगी जो उक्त दोनों दलों की पिछलग्गू बनने के लिए मजबूर हैं। हालांकि विजय के हाथ में सत्ता जाने की बात गले नहीं उतर रही किंतु तमिलनाडु की जनता द्रमुक और अन्ना द्रमुक से ऊबकर किसी नए विकल्प का चयन कर ले तो ये इस राज्य के लिए शुभ संकेत होगा। लौटकर प. बंगाल की चर्चा करें तो ये बात तो हर कोई मान रहा है कि पहले तो भाजपा ने ममता बैनर्जी को बुरी तरह घेरकर मुकाबले के इकतरफा होने की आशंका को नष्ट किया और फिर  आक्रामक रणनीति के सहारे तृणमूल के चुनाव प्रबंधन की जड़ों को कमजोर  किया।  सुश्री बैनर्जी ने मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण को मुद्दा बनाकर लड़ाई कोलकाता बनाम केंद्र करने की भरसक कोशिश की किंतु जिस तरह बिहार में लालू प्रसाद यादव के जंगल राज की खौफनाक यादें ताजा कर  भाजपा ने तेजस्वी यादव को पटकनी दे दी ठीक वही रणनीति अपनाकर  प.बंगाल में महिला सुरक्षा और तृणमूल की गुंडागर्दी के मुद्दे को गर्माकर बदलाव की भावना को लोगों के दिल में बिठाया। रही - सही कसर पूरी हो गई केंद्रीय बलों की तैनाती से जिसके कारण मतदाताओं को आतंकित कर मतदान करने से रोकने जैसी हरकतों पर नियंत्रण लग सका। बहरहाल अब तो मतदान हो चुका और 4 मई की सुबह तक अनुमानों के घोड़े दौड़ते रहेंगे किंतु जैसा कि ज्यादातर एग्जिट पोल बता रहे हैं यदि प. बंगाल में ममता सरकार को हटाकर भाजपा अपना झंडा फहराने में कामयाब हुई तब राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी और उनके मुख्य रणनीतिकार अमित शाह का कद और ऊंचा हो जाएगा। जिसका प्रभाव अगले वर्ष होने वाले उ.प्र, पंजाब और गुजरात विधानसभा के चुनाव पर पड़ना तय है। तृणमूल के हाथ से सत्ता खिसकने से अखिलेश यादव का हौसला भी पस्त होगा। वहीं कांग्रेस के हाथ केरल की सत्ता आने से वह इंडिया गठबंधन से बाहर निकलकर एकला चलो की नीति अपनाएगी। वैसे भी अब इस गठबंधन में कोई दम नहीं बची है। एक लिहाज से अच्छा ही होगा यदि क्षेत्रीय पार्टियों के चंगुल से कांग्रेस मुक्त हो क्योंकि उन्हीं के चलते उसकी दुर्दशा हुई है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 29 April 2026

गुजरात भाजपा का अभेद्य दुर्ग बन चुका है


गत दिवस गुजरात में स्थानीय निकायों के जो चुनाव परिणाम घोषित हुए उनमें सत्तारूढ़ भाजपा ने जबरदस्त सफलता हासिल करते हुए सभी नगर निगमों पर अपना आधिपत्य बनाए रखा, वहीं नगर पालिकाओं और जिला‑तालुका पंचायतों में भी उसे भारी बहुमत मिला। पार्टी ने 84 में से 78 नगर पालिकाएं जीत लीं जबकि कांग्रेस को 6 में ही सफलता मिली। जिला पंचायत स्तर पर भी भाजपा ने दमदार प्रदर्शन करते  हुए 34 में से 33 जिला पंचायतें कब्जा लीं। साथ ही तालुका पंचायतों में उसे कुल 260 में से 253 पर विजय मिली जबकि शेष सीटें कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के खाते में गईं। एकमात्र जिला पंचायत नर्मदा ही भाजपा के हाथ से फिसली जहां आम आदमी पार्टी ने 22 में से 15 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया। आम तौर  पर किसी राज्य में विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद होने वाले स्थानीय निकायों के चुनाव परिणाम सत्ताधारी दल के पक्ष में ही जाते हैं। लेकिन गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव ऐसे समय हुए जब भाजपा की राज्य सरकार का लगभग तीन चौथाई कार्यकाल पूर्ण हो चुका है और सभी पार्टियां 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव की रणनीति बनाने में जुटी हुई हैं।  बावजूद  इसके भाजपा ने अपना दबदबा  बरकरार रखा जिससे सरकार के साथ ही पार्टी संगठन की भी मजबूत पकड़ साबित होती है। स्मरणीय है 2022 में संपन्न विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 182 सीटों में 156 जीतकर कीर्तिमान स्थापित किया  वहीं कांग्रेस अपने सबसे खराब प्रदर्शन के चलते मात्र 17 सीटों पर ही सिमट गई जबकि तीसरी ताकत बनकर मैदान में उतरी अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के मुफ्त बिजली जैसे वायदे भी भाजपा की सुनामी के सामने टिक नहीं सके। हालांकि 5 सीटें जीतकर उसने अपना खाता जरूर खोल दिया।  कांग्रेस के दयनीय प्रदर्शन का एक कारण आम आदमी की मौजूदगी भी थी जिसने भाजपा विरोधी मतों में बंटवारा करते हुए कांग्रेस की लुटिया डुबो दी। उस प्रदर्शन से उत्साहित आम आदमी पार्टी ने  अपनी सक्रियता काफी बढ़ाई। खुद श्री केजरीवाल भी गुजरात पर काफी ध्यान देते रहे। पार्टी का मानना है कि कांग्रेस के कमजोर होते जाने से गुजरात में जो शून्य उत्पन्न हो गया है उसे भरकर वह बतौर विकल्प स्थापित हो सकती है।  इसीलिए आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर इन स्थानीय निकाय चुनावों को सेमी फाइनल मुकाबला माना जा रहा था।  विपक्षी दल चाहते तो भाजपा के समक्ष कड़ी चुनौती पेश कर सकते थे किंतु चुनाव परिणामों ने भाजपा को अजेय सिद्ध कर दिया । जहां तक बात कांग्रेस की है तो स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक पार्टी की दिशा और दशा दोनों ही चिंताजनक हैं। लेकिन राष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर धूमकेतु की तरह से उभरी आम आदमी पार्टी ने गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव में जैसा लचर प्रदर्शन किया उससे लगता है दिल्ली विधानसभा चुनाव में पराजित होने के बाद पार्टी का हौसला टूटने लगा है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि मतदान के पहले ही पार्टी के 7 राज्यसभा सदस्यों के भाजपा में चले जाने से गुजरात का कैडर तो निराश हुआ ही ,  आम जनता को भी लगा कि वह डूबता जहाज है, लिहाजा उसे समर्थन देना अपना मत बेकार करना है। इन चुनाव परिणामों से भाजपा के उत्साह में वृद्धि स्वाभाविक है। ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह अपने गृह राज्य की बजाय प. बंगाल के महासमर में व्यस्त रहे तब भाजपा ने स्थानीय नेतृत्व के बलबूते जो सफलता हासिल की वह प्रशंसनीय है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने स्थानीय निकाय चुनावों में अपने प्रदर्शन से अपने समर्थकों को तो निराश किया ही गुजरात में वैकल्पिक राजनीति की संभावनाओं पर भी विराम लगा दिया। आम आदमी पार्टी के लिए जमीनी स्तर पर अपना कैडर स्थापित करने के लिए ये स्थानीय चुनाव सुनहरा मौका था जिसमें वह चूक गई। रही बात कांग्रेस की तो ऐसा लगता है वह हारने की आदी हो चली है। इन चुनावों की चौंकाने वाली बात है भुज में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के  कुछ पार्षदों का जीतना जो इस बात का संकेत है कि मुस्लिम मतदाताओं का मन भी कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों से उचटने लगा है। गुजरात में आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा जहां दोगुने उत्साह से उतरेगी वहीं कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के सामने अपने अस्तित्व को बचाए रखने की चुनौती होगी।

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- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 28 April 2026

ईरान के पास होर्मुज खोलने के अलावा और कोई रास्ता नहीं


ऐसा लगता है ईरान अपने बनाए चक्रव्यूह में खुद ही उलझ गया है।  होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर वह सोच रहा था कि पूरी दुनिया उसके सामने नतमस्तक हो जाएगी किंतु अमेरिका ने जवाबी नाकेबंदी करते हुए उसकी अकड़ निकाल दी। इसकी वजह से दूसरे देशों के जहाजों की आवाजाही तो रुकी ही किंतु ईरान के अपने तेल की बिक्री भी ठप हो गई। इसके कारण उसकी भंडारण क्षमता जवाब देने लगी। यदि वह उत्पादन रोकता है तो तेल के कुओं में समुद्री जल भरने का खतरा है वहीं उत्पादन जारी रखने के बाद भी चूंकि  उस तेल का विक्रय नहीं हो पा रहा इसलिए उसे सुरक्षित रखना मुश्किल है।  होर्मुज के रास्ते से निकलने वाले जहाजों से टोल वसूलने की उसकी योजना भी अमेरिका द्वारा की गई नाकेबंदी से टांय - टांय फुस्स होकर रह गई।  डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा युद्धविराम को आगे बढ़ाए जाने पर ईरान को लगा कि अमेरिका लड़ाई जारी रखने से डर रहा है। लेकिन ट्रम्प ने इधर ईरान को बातचीत में उलझाकर रखा और उधर होर्मुज को घेरकर ईरान की आर्थिक रीढ़ पर प्रहार कर दिया। इस्लामाबाद में पहले दौर की बातचीत बेनतीजा खत्म होने के बाद ऐसा लगा था कि जंग दोबारा शुरू हो जाएगी किंतु अमेरिका ने बजाय सीधे लड़ने के दूसरे तरह का मोर्चा खोलकर ईरान को फंसा दिया। अगले दौर की शांति वार्ता में जिस तरह से रुकावटें आईं उनसे ईरान का राष्ट्रीय नेतृत्व भी परेशान है। उसके द्वारा रखी जाने वाली शर्तें अमेरिका द्वारा सिरे से खारिज की जा रही हैं। इस लड़ाई में बाकी अरब देशों पर हमले कर ईरान ने पड़ोस में रिश्ते इस कदर खराब कर लिए कि कोई उसकी मदद को सामने नहीं आ रहा। गत दिवस उसके विदेश मंत्री भागे - भागे रूस जाकर राष्ट्रपति पुतिन से मिले  और लौटकर बयान दे दिया कि अमेरिका उसे परमाणु कार्यक्रम जारी रखने की अनुमति दे तो वह होर्मुज खोलने राजी है। लेकिन ट्रम्प समझ गए कि ईरान की नस दबी हुई है इसीलिए उन्होंने न सिर्फ उसके प्रस्ताव को ठुकरा दिया बल्कि जल्द ही उसकी तेल लाइनों पर हमले की धमकी दे डाली। इस सबसे एक बात तो स्पष्ट है कि ईरान के पास अब सौदेबाजी के लिए केवल होर्मुज बच रहा है। यदि अमेरिका ने उसकी अन्य शर्तों को नहीं माना तब उसके पास इस समुद्री मार्ग को खोलने के सिवाय दूसरा कोई रास्ता नहीं बचेगा । दरअसल अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के बाद चीन ही ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीददार रहा है। उसके बदले वह ईरान को हथियारों की  आपूर्ति करता रहा है। इसमें दो राय नहीं है कि अमेरिका और इजराइल ने जिस इरादे से ईरान पर हमले किए थे वे इस हद तक ही पूरे हुए कि वह लंबी लड़ाई लड़ने लायक नहीं बचा। पूरे देश में जो बर्बादी हुई उससे उबरने में भी बहुत लंबा समय और संसाधन लगेंगे। लेकिन तेहरान में सत्ता पलट की जो उम्मीद ट्रम्प और इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने लगा रखी थी उसके पूरे होने के आसार भी नजर नहीं आ रहे। वहीं ये भी सच है कि ईरान ने चीन और रूस के बहकावे में आकर पलटवार करने का दुस्साहस तो कर दिया किन्तु वे दोनों दूर से तमाशा देखते रहे और ईरान पिटता रहा। आज की स्थिति में यदि अमेरिका और इजराइल  दोबारा जंग शुरू करने से बचना चाह रहे हैं तो ईरान भी आगे लड़ पाने में सक्षम नहीं है। इसीलिए वह रोजाना नए  - नए शांति प्रस्ताव देकर बचाव का रास्ता खोज रहा है। गत दिवस ईरानी विदेश मंत्री और पुतिन की मुलाकात के बाद ईरान ने परमाणु कार्यक्रम जारी रखे जाने के एवज में होर्मुज खोलने का प्रस्ताव रखा जिसे अमेरिका ने ठुकरा दिया। शांति वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर ईरान भी अब सतर्क हो गया है। उसके एक नेता ने पाकिस्तान की ईमानदारी पर संदेह भी जताया है। आज की स्थिति में ईरान के लिए यही श्रेयस्कर होगा कि वह मामूली शर्तों के साथ होर्मुज खोल दे। इससे उसकी अर्थव्यवस्था को भी सहारा मिलेगा वहीं उसे अन्य देशों की सहानुभूति भी प्राप्त हो सकेगी। उसे ये समझ लेना चाहिए कि वह न तो आर्थिक तौर पर पहले जैसा संपन्न है और न ही उसकी सैन्य क्षमता बड़ा मुकाबला करने लायक बची है। परिस्थितियों का तकाजा है कि वह इस संकट को किसी तरह टल जाने दे। उसे किसी रणनीतिकार की ये सलाह स्मरण रखनी चाहिए कि बहादुरी का सबसे बेहतर तरीका होशियारी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 27 April 2026

दिन ब दिन हिंसक हो रहा अमेरिकी समाज



अमेरिका में गत दिवस राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा वाशिंगटन के एक सुप्रसिद्ध होटल में पत्रकारों के लिए आयोजित रात्रि भोज में उस समय अफरातफरी मच गई जब आयोजन आयोजन कक्ष के बाहर हथियारबंद एक व्यक्ति ने कई गोलियां चलाकर दहशत फैला दी। सुरक्षा कर्मियों ने तत्काल सभी विशिष्टजनों को सुरक्षित निकाला और उस व्यक्ति को दबोच लिया। उसकी गोली एक सुरक्षा कर्मी को भी लगी किन्तु वह लाइफ जैकेट पहने हुए था इसलिए बच गया। हालांकि कोई बड़ी अनहोनी नहीं हुई। अब तक जो कुछ भी सामने आया उसके अनुसार पेशे से इंजीनियर हमलावर ट्रम्प सरकार से असंतुष्ट था। इस घटना के पीछे किसी बड़े षड़यंत्र की आशंका का पता नहीं चल सका।  ट्रम्प ने स्वयं भी कहा कि ईरान युद्ध से इसका कोई संबंध नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार से नाराज कोई व्यक्ति इस तरह का कदम क्यों उठाएगा जिसमें अव्वल तो खुद उसकी जान जाने का खतरा था और बच जाने पर पूरी जिंदगी जेल में सड़ना तय है। इसके साथ ही ये बात भी विचारणीय है कि एक साधारण  नागरिक महंगे स्वचालित हथियार आखिर क्यों रखेगा? लेकिन इस प्रश्न का उत्तर अमेरिका में इसलिए अप्रासंगिक है क्योंकि अपने लोकतंत्र पर इतराने और दुनिया के सबसे सम्पन्न और शक्तिशाली राष्ट्र होने के घमंड में चूर इस देश में आम आदमी  किसी भी तरह की पिस्तौल , रिवाल्वर, रायफल यहां तक कि ए.के 47 जैसी स्वचालित गन भी बिना लायसेंस के खरीदकर रख सकता है। इसका एक आशय ये भी है कि वहां प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सुरक्षा का प्रबंध खुद करना पड़ता है। साथ ही सरकार अपने नागरिकों को इतना समझदार समझती है कि वे इन हथियारों का उपयोग गलत उद्देश्य से नहीं करेंगे। लेकिन इसी अमेरिका के दो राष्ट्रपति अब्राहम  लिंकन और जॉन एफ.कैनेडी के  अलावा रॉबर्ट कैनेडी और मार्टिन लूथर किंग जैसे अनेक दिग्गज नेता इसी हथियार स्वतंत्रता के शिकार हो चुके हैं। इसके बाद वहां इस व्यवस्था को नियंत्रित करने पर काफी बहस चली। कुछ राज्यों ने प्रतिबंधात्मक नियम भी बनाए। लाइसेंस प्राप्त विक्रेता से ही शस्त्र खरीदने के साथ ही खरीददार की पृष्ठभूमि जांचने जैसी अनिवार्यता भी रखी गई और न्यूनतम आयु का निर्धारण भी किया गया। बावजूद इसके अमेरिका में गन कल्चर का बोलबाला रोका नहीं जा सका। दुनिया भर को उपदेश देने वाले अमेरिका की कानून व्यवस्था में भी तमाम विसंगतियां हैं। अनेक महानगर तो अपराधिक गतिविधियों के लिए कुख्यात हैं। इनमें रात्रि  के समय किसी सुनसान इलाके में जाना जान जोखिम में डालने जैसा है। लूटमार करने वाले  मांग पूरी नहीं होने पर बेरहमी से गोली मारकर भाग जाते हैं।  ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि अमेरिका में पिस्तौल और बंदूक जैसी खतरनाक चीज आसानी से उपलब्ध होने से उसके उपयोग के प्रति भी गंभीरता का नितान्त अभाव है। बीते कुछ सालों में सभ्यता के ठेकदार इस देश में किशोरावस्था के अनेक बच्चों ने बंदूक चलाकर अपने विद्यालय के सहपाठियों की हत्या कर डाली जिसका कारण मामूली आपसी विवाद निकला। समाजशास्त्रियों ने  ऐसी घटनाओं के बारे में निष्कर्ष निकाला कि माता - पिता के झगड़े संतानों को भी तनावग्रस्त बना रहे हैं। परिवार नामक संस्था के टूटते जाने का जो मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभाव बच्चों पर पड़ता है उसके कारण सामाजिक विघटन की स्थिति उत्पन्न हो चुकी है। आर्थिक समृद्धि और सामाजिक सुरक्षा के बावजूद आम अमेरिकी तनाव में जी रहा है। यद्यपि इस सबका गत दिवस वॉशिंगटन के होटल में हुए गोलीकांड से सीधा संबंध नहीं है जहां राष्ट्रपति ट्रम्प की पार्टी चल रही थी। लेकिन इस घटना से अमेरिका में हथियारों की आसान उपलब्धता के औचित्य पर तो प्रश्नचिन्ह लगा ही। इतने सम्पन्न देश में तो कानून व्यवस्था इतनी अच्छी होनी चाहिए कि आम नागरिक को पिस्तौल और बंदूक जैसी चीज़ें खरीदने की जरूरत ही न पड़े। मनोवैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं कि उत्तेजना की स्थिति में किसी व्यक्ति के पास हथियार होना उसके लिए आत्मघाती होने के साथ ही किसी अन्य की जान के लिए भी खतरा बन सकता है। हमारे देश में भी अपने खुद के हथियार से आत्महत्या करने के प्रकरण आए दिन सामने आते हैं। ऐसे में अमेरिका जैसे देश में जहां परिवार टूटने के साथ ही सामाजिक ढांचे की दरार चौड़ी होती जा  रही हो, हथियार रखने की आजादी खून की होली खेलने का अवसर प्रदान करती है। यद्यपि ये उसका आंतरिक मामला है किंतु भारतीय मूल के लाखों लोग अमेरिका में बसे होने से वहां खेल - खेल में गोलियां चल जाने की हर खबर उनकी कुशलता के प्रति चिंता उत्पन्न कर देती है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 25 April 2026

अन्ना हजारे का श्राप केजरीवाल का पीछा नहीं छोड़ रहा


जिस दिन आम आदमी पार्टी ने राघव चड्ढा को राज्यसभा में उपनेता पद से हटाया उसी दिन से उनके भाजपा में जाने की अटकलें लगाई जा रही थीं। लेकिन वैसा होने पर वे राज्यसभा सदस्यता से हाथ धो बैठते वहीं त्यागपत्र देने पर उनकी राजनीतिक वजन दारी खत्म हो सकती थी। इसीलिए राघव ने न सिर्फ अपनी सदस्यता बचाते हुए भाजपा का दामन थामा बल्कि अपने साथ 6 अन्य  सांसदों को भी बटोरकर  पार्टी के 10 सदस्यीय संसदीय दल में विभाजन करवा दिया। दो तिहाई सांसदों की बगावत होने से सभी दलबदल कानून के डंडे से बच गए। जहां तक बात श्री चड्ढा के भाजपा की गोद में बैठने की ही है तो इससे किसी को आश्चर्य नहीं हुआ किंतु वे 6 और सांसदों को तोड़कर  ले आयेंगे इसकी भनक किसी को भी नहीं थी। जैसी कि परम्परा है उन्होंने पार्टी पर अपने उद्देश्यों से भटकने का आरोप लगा दिया। हालांकि जिस भाजपा को वे हमेशा गरियाते रहे वह उन्हें अचानक  क्यों प्रिय लगने लगी ये उन्होंने नहीं बताया।  जिन अशोक मित्तल को उनकी जगह राज्यसभा में पार्टी का उपनेता नियुक्त किया गया उनके यहां हाल  ही में ई.डी ने छापा मारा था। इसलिए जब वे भी श्री चड्ढा के साथ भाजपा में आए तब ये सवाल  उठ खड़ा हुआ कि क्या वे छापे से  भयभीत होकर भाजपाई बने? हालांकि अन्य जिन पांच सांसदों ने पार्टी छोड़ी उन पर ऐसा कोई आरोप नहीं है और शैक्षणिक और पेशेवर दृष्टि से भी वे काफी योग्य हैं ,सिवाय सुप्रसिद्ध क्रिकेटर हरभजन सिंह के। सब कुछ इतना अचानक हुआ कि बड़े - बड़े खबरखोजी भी हतप्रभ रह गए। वैसे राघव का विद्रोह तो समझ में आने लायक था और श्री मित्तल के पाला बदलने की वजह भी स्पष्ट है किंतु बाकी 5 सांसद किस वजह से भाजपा में आए ये रहस्यों के घेरे में है। बहरहाल इस सबके  पीछे पंजाब विधानसभा का  अगला चुनाव है। हालांकि इन सांसदों में कोई भी ऐसा नहीं है जो पंजाब में बड़ा दखल रखता हो। लेकिन 7 सांसदों के पार्टी छोड़ने से आम आदमी पार्टी को  आघात तो लगा ही है। पंजाब में सरकार बनाने में राघव की भी भूमिका रही थी। इसीलिए वे वहां  से राज्यसभा भेजे गए। लेकिन बाद में  उनसे पंजाब का प्रभार छीन लिया गया। शराब घोटाले से दिल्ली विधानसभा चुनाव तक राघव पार्टी से दूर बने रहे। राज्यसभा में भी वे पार्टी लाइन से अलग हटकर मुद्दे उठाते रहे । लेकिन गत दिवस जो धमाका उन्होंने किया उसके बाद ये चर्चा जोरों पर है कि पंजाब में  आम आदमी पार्टी के 50 विधायक भी पाला बदलने वाले हैं। इसके पीछे आलाकमान के साथ ही मुख्यमंत्री भगवंत मान का रूखा व्यवहार बताया जाता है।  7 सांसदों के दलबदल से बौखलाई आम आदमी पार्टी अपना गुस्सा भाजपा पर उतार रही है लेकिन श्री केजरीवाल ये भूल जाते हैं कि आज जिसे वे गद्दारी कह रहे हैं ये तो उन्हीं के द्वारा शुरू की गई थी जब उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु अन्ना हजारे को  अपमानित कर हाशिए पर धकेल दिया। उसके बाद पार्टी के संस्थापकों में से प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, डॉ . धर्मवीर, कुमार विश्वास , कपिल मिश्र, शाजिया इल्मी, आशुतोष आदि भी पार्टी छोड़ने मजबूर हुए। कुछ को तो धक्के मारकर बाहर किया गया। इस प्रकार आंदोलन की कोख से निकली यह पार्टी जितनी जल्दी ऊपर उठी उतनी ही जल्दी उसका ग्राफ भी नीचे जा रहा है। समाज के विभिन्न क्षेत्रों की जो प्रतिभाएं अपना काम,- धंधा छोड़कर नई राजनीति के इस अभियान से जुड़ीं उनमें से ज्यादातर हताश होकर लौट गए।  राज्यसभा की सीटों की जो बंदरबांट की उसने भी पार्टी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया। हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि पार्टी इस बगावत से खत्म हो जाएगी। लेकिन श्री केजरीवाल की राष्ट्रीय स्तर पर बतौर विकल्प उभरने की महत्वाकांक्षा पर जरूर तुषारापात हो गया। रही बात भाजपा की तो उसके पास आम आदमी पार्टी सांसदों को शामिल करना पंजाब में अपने पैर जमाने की योजना से जुड़ा है। यद्यपि इससे उसे किसी बड़े लाभ की उम्मीद तो नहीं रखनी चाहिए। वैसे भी भाजपा के नेता ही नहीं आम कार्यकर्ता भी अन्य पार्टियों से आने वाली भीड़ से चिढ़ने लगे हैं क्योंकि इसके आने से उनके अवसर छिन जाते हैं। ऐसे में राघव भले ही भाजपा में अपनी जगह बनाने में कामयाब हो जाएं लेकिन बाकी 6 सांसदों को विशेष महत्व नहीं मिल पाएगा। इस झटके के बाद श्री केजरीवाल और उनकी चौकड़ी अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करती है या नहीं ये फिलहाल कहना कठिन है। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि अपनी अलग पहचान बनाने वाली आम आदमी पार्टी चुनावी राजनीति के चक्रव्यूह में फंसकर  एक आम पार्टी बनकर रह गई है। ऐसा लगता है अन्ना हजारे का श्राप केजरीवाल एंड कंपनी का पीछा नहीं छोड़ रहा।



- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 24 April 2026

प. बंगाल में कांग्रेस ने बिना लड़े ही हथियार डाल दिए



गत दिवस प. बंगाल में पहले चरण और तमिलनाडु में सभी सीटों पर मतदान संपन्न हो गया। दोनों राज्यों में भारी मतदान से चुनाव विश्लेषक हैरानी में हैं। वैसे उक्त दोनों ही राज्य राजनीतिक दृष्टि से बेहद जागरूक माने जाते हैं। दोनों में एक साम्यता ये भी है कि तमिलनाडु में जहां कांग्रेस 1967 में सत्ता से बाहर होने के बाद वापिस नहीं आई वहीं प. बंगाल में 1977 में वामपंथियों ने कांग्रेस से राज्य की सत्ता छीनी। उनके बाद 2011 से वहां ममता बैनर्जी मुख्यमंत्री हैं। इस प्रकार तमिलनाडु में 60 और प. बंगाल में 50 वर्षों से कांग्रेस सरकार नहीं बना सकी। तमिलनाडु में तो वह कभी द्रमुक तो कभी अन्ना द्रमुक के साथ गठबंधन करने से सत्ता के साथ जुड़े रहने में सफल रही । वहीं प. बंगाल में वह वामपंथियों के शासन में तो मुख्य विपक्षी दल रही लेकिन ममता बैनर्जी द्वारा तृणमूल कांग्रेस स्थापित करने के बाद कांग्रेस की दशा दिन ब दिन दयनीय होती गई। 2021 में तो उसे विधानसभा में एक भी सीट नहीं मिली। यही हाल एक जमाने में सबसे बड़ी ताकत रही वामपंथी पार्टियों की भी हो गई। इस खालीपन को आश्चर्यजनक तौर पर भरा भाजपा ने जो 2016 में 3 सीटें जीतने के बाद 2021 में सीधे 77 पर पहुंचकर प्रमुख विपक्षी पार्टी बन गई। इसलिए इस चुनाव में उसे ही सुश्री बैनर्जी के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। ये आश्चर्य का विषय है कि इतने दशकों के बाद भी कांग्रेस ने न तो तमिलनाडु में द्रमुक और अन्ना द्रमुक की चौधराहट खत्म करने की हिम्मत दिखाई और न ही प. बंगाल में सत्ता हासिल करने के लिए किसी भी प्रकार का उत्साह दिखाया। उस दृष्टि से भाजपा इन राज्यों में शून्य से अपना सफर शुरू कर मुख्यधारा में आने में सफल होती दिखाई दे रही है। तमिलनाडु में वह अकेले लड़ने का दुस्साहस करने के बाद इस बार अन्ना द्रमुक के साथ गठबंधन में भागीदार है। हालांकि उसकी रुचि अपना मत प्रतिशत बढ़ाने में ज्यादा है किंतु जिस तरह केरल में उसने उत्तर भारतीय पार्टी की छवि से हटकर अपनी पहिचान बना ली ठीक वैसे ही तमिलनाडु में भी अपनी जड़ें मजबूत करने की दीर्घकालीन योजना पर तेजी से काम कर रही है जबकि कांग्रेस यहां अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने के प्रति पूरी तरह उदासीन है। वर्तमान में वह उस द्रमुक की सहयोगी है जिसके दामन पर पर कभी राजीव गांधी की हत्या के छींटे पड़े थे। मुख्यमंत्री स्टालिन के बेटे ने तो सनातन धर्म की तुलना डेंगू और कोरोना से करते हुए उसी नष्ट करने जैसी डींग हांक दी। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे ने भी सनातन धर्म विरोधी उस बयान का समर्थन कर दिया। यही हाल प. बंगाल में भी है। स्मरणीय है ममता बैनर्जी ने कांग्रेस को वामपंथियों की बी टीम बताते हुए तृणमूल कांग्रेस बनाई थी। उनका आरोप सही साबित हुआ जब पिछले चुनावों में कांग्रेस ने ममता सरकार के विरोध में वामपंथियों से गठबंधन किया। हालांकि उससे हुए नुकसान के बाद इस चुनाव में वह अकेले मैदान में उतरी तो है लेकिन प्रथम चरण के मतदान तक कोई ये कहने वाला नहीं है कि वह कहीं भी मुकाबले में है। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर बने इंडिया नामक विपक्षी गठबंधन में तृणमूल भी शामिल है किंतु ममता चूंकि राहुल गांधी के नेतृत्व में काम नहीं करना चाहतीं इसलिए वे प. बंगाल में कांग्रेस को जरा भी भाव नहीं देतीं। वर्तमान चुनाव में जब श्री गांधी की पहल पर कांग्रेस ने वामपंथियों से अलग होकर एकला चलो रे का फैसला किया तब ये लगा था कि शायद पार्टी खुद को पुनर्स्थापित करने का प्रयास करेगी। पड़ोसी राज्य असम में उसने ऐसा किया भी। शुरुआत में श्री गांधी ने भी ममता सरकार को सिंडीकेट द्वारा संचालित बताकर ये संकेत दिया कि पार्टी इस बार आक्रामक होकर लड़ेगी। लेकिन असम का चुनाव संपन्न होने के बाद न तो राहुल और न ही प्रियंका ने प. बंगाल में वैसा डेरा जमाया जैसा अमित शाह ने कर दिखाया । जबकि केरल में भी मतदान हो चुका था और तमिलनाडु में कांग्रेस सीमित सीटों पर लड़ रही है और वह भी द्रमुक के भरोसे। प. बंगाल में गत दिवस हुए भारी मतदान के बाद चुनाव विशेषज्ञ भी पशोपेश में हैं किंतु एक बात पर सभी एकमत हैं कि या तो तृणमूल की सरकार बनेगी या भाजपा की। लेकिन कोई भी ये नहीं बता पा रहा कि कांग्रेस का क्या होगा? यहां तक कि उसके सबसे बड़े नेता अधीर रंजन चौधरी की जीत भी संदेह के घेरे में है। प. बंगाल पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार है । भाजपा ने त्रिपुरा , अरुणाचल और असम में पांव जमाने के बाद अब प. बंगाल में भी खुद को बतौर विकल्प स्थापित कर लिया है। यदि 4 मई को उसकी सरकार बन गई तब उसके लिए भविष्य की चुनौतियां आसान हो जाएंगी लेकिन कांग्रेस के लिए स्थितियां और चिंताजनक होने से उसमें बिखराव आ सकता है।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 23 April 2026

भारी मतदान लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत



जीत - हार का फैसला तो 4 मई की दोपहर तक ही हो सकेगा किंतु प. बंगाल की 152 और तमिलनाडु की सभी विधानसभा सीटों के लिए दोपहर 12 बजे तक मतदान का प्रतिशत लगभग 50 फीसदी तक पहुंचना लोकतन्त्र और चुनाव आयोग के प्रति जनता के विश्वास का  प्रमाण है। इसके पहले असम और केरलम में हुए मतदान ने भी पिछले कीर्तिमान ध्वस्त कर उन आलोचकों का मुंह बंद कर दिया था जो चुनाव आयोग पर आरोपों की बौछार करते आ रहे थे। विशेष रूप से प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण  के काम में जैसे अड़ंगे लगाए उसके बाद  कई बार ऐसा लगा कि वहां राष्ट्रपति शासन न लगाना पड़ जाए किंतु अंततः मतदाता सूचियों से 91 लाख नाम कट जाने के बाद भी स्थिति नियंत्रण में रही। ममता बैनर्जी ने अपना पूरा प्रचार मतदाता सूचियों में किए गए सुधारों पर ही लगा दिया। उनका आरोप यह था कि केंद्र सरकार के इशारे पर चुनाव आयोग तृणमूल  समर्थक मतदाताओं का नाम हटा रहा है। और बांग्लादेशी घुसपैठियों की आड़ में मुस्लिम समुदाय को विशेष निशाना बनाया गया। हालांकि जनता के बीच ये मुद्दा ज्यादा नहीं गर्माया क्योंकि चुनाव आयोग ने सभी मतदाताओं को नाम जुड़वाने का समुचित अवसर दिया और वह भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त न्यायाधीशों की उपस्थिति में। प. बंगाल  का चुनावी इतिहास  आतंक और हिंसा से भरा रहा है । इस चुनाव में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती से मतदाताओं के मन में व्याप्त डर को काफी हद तक दूर करने में सहायता मिली है। दोपहर तक कुछ घटनाओं को छोड़कर जिस प्रकार मतदाताओं में उत्साह दिखा उसके अनुसार शाम तक मतदान का आंकड़ा 80- 90 को छू जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। इसका अर्थ ये भी लगाया जा सकता है कि तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में मुस्लिम गोलबंदी की प्रतिक्रियास्वरूप हिन्दू मतदाता भी ध्रुवीकृत हुआ है।  तमाम सियासी विशेषज्ञ भी मान रहे हैं कि 30 फीसदी मुस्लिम बैंक की एकजुटता के जवाब में यदि 70 प्रतिशत हिन्दू मतदाताओं ने एकता दिखा दी तब सुश्री बैनर्जी का किला धसक सकता है। स्मरणीय है 2021 में तृणमूल का चुनाव प्रबंधन देख रहे प्रशांत किशोर ने दावा किया था कि भाजपा 100 सीटों से ज्यादा नहीं जीतेगी। उनकी भविष्यवाणी सही साबित हुई और भाजपा 77 पर अटक गई। हालांकि तृणमूल के प्रवक्ता इस बार भी इसी तरह के दावे कर रहे हैं किंतु चुनावी पंडित खुलकर स्वीकार कर रहे हैं कि भाजपा ने बहुत जबर्दस्त मोर्चेबंदी की है जिसके अंतर्गत यदि वह अपने मतदाताओं को मतदान केंद्र तक लाने में सफल हो गई तब प. बंगाल में बदलाव की संभावना बढ़ जाएगी। दूसरे जिस राज्य में आज मतदान हो रहा है वह है तमिलनाडु जहां एक ही चरण में चुनाव हो जाएगा। मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण यहां भी हुआ लेकिन स्टालिन सरकार ने उसे मुद्दा बनाने के बजाय अपने परम्परागत प्रतिद्वंद्वी अन्ना द्रमुक के साथ भाजपा के गठबंधन के मद्देनजर केंद्र सरकार , उत्तर भारत और हिन्दी के विरोध पर अपने प्रचार को केंद्रित रखा । वहीं विपक्षी गठबंधन ने  भ्रष्टाचार ओर विकास में कमी के लिए स्टालिन सरकार को घेरा।  भाजपा इस राज्य में अभी भी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए प्रयासरत है। शुरुआत में ऐसा लग रहा था कि अन्ना द्रमुक और भाजपा का गठबंधन सत्तारूढ़ द्रमुक और कांग्रेस के गठजोड़ पर भारी पड़ेगा। जो चुनाव पूर्व सर्वेक्षण आए उनमें भी मिलते - जुलते संकेत दिए गए परंतु संसद में लाए गए परिसीमन विधेयकों के बाद स्टालिन ने राज्य की लोकसभा सीटें घटने की आशंका को तूल देकर तमिल भावना को उभारने का जो दांव चला उसके कारण राज्य में बदलाव की संभावना संदिग्ध हो चली है। हालांकि तमिलनाडु में भी प. बंगाल जैसा भारी मतदान होने से नतीजों को लेकर कुछ कहना जल्दबाजी होगी लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि चुनाव किसी के भी पक्ष में इकतरफा नहीं रहेगा। ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि राज्य में दोनों प्रमुख प्रतिद्वंदी दलों का संगठन जमीनी स्तर पर है। उनकी विचारधारा भी मूलतः एक जैसी ही है। इसलिए मुकाबला चेहरों पर होता है। कुछ लोगों का मानना है कि इस लिहाज से स्टालिन भारी हैं। लेकिन लोकप्रिय तमिल अभिनेता जे. विजय की नवगठित पार्टी के कूदने से चुनाव में अनिश्चितता बढ़ गई है क्योंकि अभी तक ये आकलन कोई नहीं कर पाया कि विजय के उम्मीदवारों को मिलने वाले मत किस गठबंधन को नुकसान पहुंचाएंगे? बहरहाल भारी मतदान झटका है उन लोगों के लिए जो चुनाव प्रक्रिया को बेवजह कठघरे में खड़ा करते रहते हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 22 April 2026

होर्मुज अमेरिका और ईरान के गले की फांस बन गया


जैसी कि उम्मीद थी वही हुआ। अमेरिका और ईरान के बीच आज होने वाली दूसरे दौर की शांति वार्ता की टेबिल खाली पड़ी रह गई। इस्लामाबाद में अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस और उनकी टीम के आगमन का इंतजार होता रहा। उधर ईरान ने ये शर्त रख दी कि जब तक होर्मुज से अमेरिकी नाकेबंदी नहीं हटेगी वह बातचीत नहीं करेगा। इस पर डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने चिर - परिचित अंदाज में धमकी दी कि बातचीत नहीं होने पर युद्धविराम की अवधि खत्म होते ही ईरान पर जबरदस्त हमला करते हुए उसके बिजली संयंत्र और पुल वगैरह तबाह कर दिए जाएंगे। हालांकि ताजा जानकारी के अनुसार उन्होंने युद्धविराम बढ़ाने की घोषणा भी कर दी किन्तु  इस बार उसकी कोई अवधि नहीं बताई। अपितु ये कह दिया कि ईरान की ओर से ठोस प्रस्ताव आने तक उसे जारी रखा जाएगा। साथ ही वे बातचीत पूरी होने तक प्रतीक्षा करेंगे चाहे उसका अंजाम कुछ भी हो। ट्रम्प के इस ऐलान से ये तो स्पष्ट हो गया कि ईरान की तरह से ही अमेरिका भी होर्मुज़ को हथियार बनाकर अपना हाथ ऊपर रखना चाह रहा है। ये बात सही है कि इस समुद्री रास्ते के अवरुद्ध रहने से ईरान को भारी नुकसान हो रहा है। तेल उत्पादक अन्य खाड़ी देशों के लिए भी होर्मुज का बंद रहना समस्या पैदा करने वाला है। वहीं यूरोप सहित दुनिया के तमाम देश इस  जलडमरूमध्य को तत्काल खोलने का दबाव बना रहे हैं क्योंकि नाकेबंदी से उनको मिलने वाली कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति रुकी हुई है। शुरू  में ईरान ने होर्मुज़ बंद करने का दांव चलकर पूरी दुनिया को परेशान किया और अब अमेरिकी नौसेना द्वारा रास्ता रोके जाने से विश्व भर में ऊर्जा संकट बढ़ता जा रहा है। हालांकि इसके लिए ज्यादा दोषी ईरान को ही कहा जाएगा जिसने पहले होर्मुज से तेल टैंकरों की आवाजाही रोकी और फिर टोल वसूली के जरिए पैसा कमाने की तरकीब सोची। लेकिन उसका मंसूबा पूरा नहीं हो सका क्योंकि ट्रम्प इस बात को भांप गए कि होर्मुज से आवागमन जारी रहने से ईरान की अर्थव्यवस्था को संबल मिल जाएगा। इसीलिए 15 दिन के युद्धविराम की घोषणा होते ही अमेरिका ने अपना जहाजी बेड़ा अड़ाकर ईरान की मुसीबत बढ़ा दी। ईरान ने इसीलिए बातचीत जारी रखने के लिए नाकेबंदी हटाए जाने की शर्त तो रख दी परंतु अमेरिका द्वारा परमाणु ईंधन सौंपे जाने जैसे प्रस्ताव पर चुप्पी साधे हुए है। दरअसल जब दोनों पक्ष एक दूसरे पर ऐसी शर्तें थोप रहे हों जिन्हें मान लेने का आशय झुक जाना होगा तब बातचीत कैसे आगे बढ़ेगी ये बड़ा सवाल है। जहां तक बात पाकिस्तान की है तो ये स्पष्ट हो गया है कि इस बातचीत में वह केवल अमेरिका का संदेशवाहक है। पहले दौर की बातचीत से ही स्पष्ट हो गया कि न तो वह अमेरिका को कुछ समझाने की हैसियत रखता है और न ही ईरान उसकी बात मानने राजी है। इसलिए होर्मुज को लेकर उसने एक शब्द न ईरान से कहा और न ही अमेरिका से। दरअसल ट्रम्प ने शांति वार्ता के लिए इस्लामाबाद का चयन इसलिए किया क्योंकि ईरान का प्रतिनिधिमंडल दूर किसी देश में जाने के लिए सम्भवतः राजी नहीं होता। आज की वार्ता को ग्रहण लग जाने के बाद ट्रम्प द्वारा युद्धविराम को बढ़ाया जाना उनकी मजबूरी है। वहीं ईरान द्वारा बातचीत से कन्नी काटने के पीछे का कारण ये है कि वह आमने - सामने बैठकर अपनी शर्त मनवाने की स्थिति में नहीं रह गया है। इससे अलग हटकर देखें तो दोनों पक्ष एक दूसरे की कमजोरी जान गए हैं। ईरान समझ गया है कि अमेरिका ले - देकर इस जंग से निकलना चाह रहा है। वहीं ट्रम्प भी भांप चुके हैं कि युद्ध जारी रखने पर भी कुछ हासिल होने वाला नहीं है। दुनिया के तमाम बड़े देश भी उनके गैर जिम्मेदाराना रवैए से नाराज हैं जिनमें अमेरिका के पुराने दोस्त भी हैं। यही वजह है कि दोनों पक्ष धमकियां तो बढ़ - चढ़कर दे रहे हैं किंतु लड़ाई से बचना भी चाह रहे हैं। ये स्थिति कब तक जारी रहेगी ये कहना मुश्किल है क्योंकि जहां डोनाल्ड ट्रम्प पूरी तरह से अविश्वसनीय हैं वहीं ईरान का नेतृत्व भी पुख्ता निर्णय लेने में असमर्थ दिख रहा है। ये देखते हुए किसी अप्रत्याशित घटनाक्रम की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि होर्मुज दोनों पक्षों के लिए प्रतिष्ठा के प्रश्न से अधिक गले की फांस बन गया है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 21 April 2026

सीमावर्ती इलाके की रिफाइनरी में आग लगना चिंताजनक


देश में प्रधानमंत्री सबसे अधिक सुरक्षा प्राप्त व्यक्ति हैं। उनके दौरे के पहले संबंधित स्थान के बारे में सुरक्षा एजेंसियां सघन जाँच करती हैं। किसी भी आकस्मिक दुर्घटना के होने पर उन्हें सुरक्षित रखने के पुख्ता प्रबंध भी किए जाते हैं। 1984 में श्रीमती इंदिरा गांधी की उनके निवास पर ही अंगरक्षकों द्वारा की गई हत्या के बाद वीआईपी सुरक्षा के प्रति काफी ध्यान दिया जाने लगा। उस दृष्टि से गत दिवस राजस्थान के  बाड़मेर जिले स्थित पचपदरा रिफाइनरी में अचानक आग लगना बेहद गंभीर एवं चिंताजनक घटना है। करीब 9 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष क्षमता वाली यह परियोजना देश के सबसे बड़े ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स में से एक है। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसका उद्घाटन करने वाले थे। उद्घाटन से ठीक एक दिन पहले उसमें  आग  लगने से सुरक्षा एजेंसियों के चेहरों की हवाइयां उड़ी हुई हैं क्योंकि रिफाइनरी उस स्थान से एक किलोमीटर से  भी कम की दूरी पर स्थित है जहां उद्घाटन समारोह होने वाला था। और फिर यह घटना उस समय हुई, जब प्रदेश के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा उद्घाटन की तैयारियों का जायजा लेने के लिए वहां पहुंचने वाले थे। हालांकि किसी बड़े नुकसान  की जानकारी नहीं है, लेकिन आग लगने के सही कारणों का अभी पता नहीं चल सका। इस रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स को भारत की ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक विकास के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा था।  हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड और राज्य सरकार के संयुक्त उद्यम के रूप में विकसित की गई इस परियोजना में 79,450 करोड़ रुपए से अधिक का निवेश किया गया है। साथ ही ये देश के सबसे बड़े ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स में से एक है। यद्यपि आग समय रहते बुझा ली गई परंतु इतने संवेदनशील संयंत्र में हुए अग्निकांड को साधारण मानकर भुलाना खतरनाक होगा। यदि प्रधानमंत्री इसका उद्घाटन न कर रहे होते तब भी यह अग्निकांड औद्योगिक संयंत्रों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाने के साथ ही निर्माण कार्य में हुई तकनीकी गलती की ओर इशारा करता है। यदि उद्घाटन समारोह की तैयारियां देखने  मुख्यमंत्री आग लगने वाले समय संयंत्र के भीतर रहे होते तब उनके साथ न जाने कितने लोग दुर्घटना का शिकार होते। और कहीं आज प्रधानमंत्री के वहां होते हुए आग भड़क उठती तब जो होता उसकी कल्पना भी दहला देती है । उक्त घटना के बाद आज होने वाला उदघाटन समारोह स्थगित कर दिया गया है। आग लगने के कारणों की सूक्ष्म जांच के बाद सही स्थिति सामने आएगी किन्तु बाड़मेर की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए यह अग्निकांड अनेक आशंकाओं को जन्म दे रहा है। उल्लेखनीय है बाड़मेर जिले की लगभग 250 कि.मी सीमा पाकिस्तान से सटी होने से विदेशी षड़यंत्र  की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। हालांकि तत्काल किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी किंतु रिफाइनरी जैसे संयंत्र में उद्घाटन के एक दिन पहले हुई अग्नि दुर्घटना के पीछे देश विरोधी ताकतों की साज़िश होने को पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता। विशेष रूप से तब जब प्रधानमंत्री इसका शुभारम्भ करने आज वहां उपस्थित रहने वाले थे। जांच एजेंसियों के साथ ही रिफाइनरी के निर्माण से जुड़े तकनीकी विशेषज्ञ भी घटना की तह में जाएंगे । लेकिन सीमावर्ती जिले में स्थित इस महत्वाकांक्षी परियोजना के शुभारम्भ के एक दिन पूर्व हुए अग्निकांड की जांच में सेना से जुड़ी जांच एजेंसियों को भी शामिल किया जाना उचित होगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 20 April 2026

अंततः ईरान को समर्पण करना ही पड़ेगा


मध्यपूर्व का मसला उलझता ही जा रहा है। ज्यादातर लोगों का मानना है कि ईरान के जबरदस्त प्रतिरोध के कारण अमेरिका बुरी तरह फंस गया है और किसी तरह इज्जत बचाकर निकलने का रास्ता तलाश रहा है । इसीलिए जब 15 दिन का युद्धविराम हुआ तब यही प्रचारित हुआ कि अमेरिका और इजराइल दोनों ईरान को घुटनाटेक करवाने में नाकामयाब रहने के कारण ही लड़ाई रोकने बाध्य हुए। अयातुल्ला ख़ामेनेई सहित अनेक बड़े नेताओं और सैन्य अधिकारियों की हत्या के बाद ईरान में सत्ता परिवर्तन और शाह पहलवी वंश के उत्तराधिकारी को तेहरान बुलवाकर उसकी ताजपोशी की जो योजना डोनाल्ड ट्रम्प ने बनाई थी उसके मूर्तरूप लेने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही। जिन नेताओं के हाथ फिलहाल ईरान की कमान है वे भी अमेरिकी दबाव के सामने झुकने से इंकार कर रहे हैं। इसी कारण से इस्लामाबाद में हुई पहले दौर की शांति वार्ता बेनतीजा खत्म हो गई। और कल होने वाला दूसरा दौर भी खटाई में पड़ता दिख रहा है क्योंकि ईरान ने अपने प्रतिनिधिमंडल को नहीं भेजने का ऐलान कर दिया है। युद्धविराम के शुरू होते ही इजराइल द्वारा लेबनान पर किए गए ताबड़तोड़ हमलों से भी ईरान नाराज हो उठा। लेकिन सबसे बड़ा पेच है होर्मुज जलडमरूमध्य जो न सिर्फ ईरान बल्कि तेल उत्पादक खाड़ी देशों की जीवन रेखा बन गया है। दुनिया में 20 प्रतिशत  कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति चूंकि ईरान के कब्जे वाले इसी समुद्री रास्ते से होती है इसीलिए उसने इसे भी हथियार के रूप में इस्तेमाल कर अभूतपूर्व वैश्विक ऊर्जा संकट उत्पन्न कर दिया। इसके अलावा वहां से गुजरने वाले जहाजों पर टोल टैक्स के तौर पर भारी - भरकम राशि चुकाने की बंदिश लगा दी। हालांकि भारत, ईराक , चीन, पाकिस्तान और रूस के जहाजों को होर्मुज से बेरोकटोक आने - जाने की छूट  दी गई किंतु ज्यों ही अमेरिका को लगा कि ईरान इस जलडमरूमध्य में आवागमन पर नियंत्रण लगाकर अपने आर्थिक और सामरिक उद्देश्य पूरे कर रहा है त्यों ही उसने भी जवाबी नाकेबंदी करते हुए उन जहाजों को रोकना शुरू  कर दिया जो ईरान को टोल चुकाकर होर्मुज़ से बाहर निकले।  ईरान का रवैया भी होर्मुज़ को लेकर बेहद अनिश्चित या यूं कहें कि गैर जिम्मेदाराना है। युद्धविराम के बाद से वह अनेक बार इस रास्ते को खोलने के बाद बंद कर चुका है। कई बार तो एक दिन में ही सुबह उसने होर्मुज खोला और शाम को पुनः बंद कर दिया। इस ऊहापोह से उसकी विश्वसनीयता पर तो आंच आई ही साथ ही ये भी साफ हो गया कि  अमेरिका को शिकस्त देने के उसके दावे हवा - हवाई ही हैं। ट्रम्प  द्वारा लगातार ये दबाव बनाया जा रहा है कि ईरान होर्मुज को अंतर्राष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र मानकर मुक्त आवागमन के लिए उपलब्ध करवाए। साथ ही परमाणु बम बनाने के लिए जो परिष्कृत ईंधन है उसे भी अमेरिका को सौंपने के अलावा अपनी सैन्य शक्ति विशेष रूप से मिसाइलों के उत्पादन में कमी लाए। इसके अलावा भी अनेक ऐसी शर्तें हैं जो ईरान के नेतृत्व को नागवार गुजर रही हैं। इससे नाराज ट्रम्प  ईरान के तमाम बिजली घर और पुलों को नष्ट करने की धमकी दे रहे हैं। कल होने वाली शांति वार्ता यदि हुई भी तो उसके सफल होने की आशा करना व्यर्थ है। अब तक की स्थिति में अमेरिका और इजराइल भले ही लड़ाई को परिणाम तक पहुंचाने में असफल रहे हों किंतु रूस और चीन जैसी महाशक्तियों के प्रत्यक्ष समर्थन के बाद भी ईरान अपनी बर्बादी को नहीं रोक सका। जल्द ही कोई रास्ता नहीं निकला तब उसके शीर्ष नेतृत्व में मतभेद  उभरना तय है। सबसे बड़ी चिंता खामेनेई द्वारा  बनाए गए आईआरजीसी (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर) द्वारा समानांतर सत्ता चलाने की है। गत दिवस होर्मुज से गुजर रहे भारत के जहाजों पर हुई गोलीबारी इसका प्रमाण है। खबर है आईआरजीसी होर्मुज को अपनी मिल्कियत बनाकर आय का स्रोत बनाना चाह रहा है। ईरान सरकार के कुछ नेता भी इस योजना के पीछे हैं। कुल मिलाकर ईरान अब नेतृत्व शून्यता की स्थिति में आ गया है। अमेरिका भी इसी का इंतजार कर रहा है। बड़ी बात नहीं युद्धविराम की अवधि पूरी होते ही ये इलाका एक बार फिर से जंग की आग में जल उठे। लेकिन इस बार अमेरिका भारी पड़ेगा क्योंकि उसने पहले चरण की गलतियों से सीख लेने के बाद ईरान की पुख्ता घेराबंदी करते हुए उसकी कमजोरियों को भांप लिया है। बावजूद इसके तेहरान में बैठे नेता आसानी से समर्पण नहीं करेंगे किंतु देर - सवेर उन्हें ऐसा करना ही पड़ेगा क्योंकि उनके पास लंबी लड़ाई लड़ने की शक्ति बची नहीं है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 18 April 2026

परिसीमन विधेयक गिरने के बाद भी महिला आरक्षण राष्ट्रीय एजेंडा बना


1999 में कर्नाटक की वेल्लारी लोकसभा सीट पर कांग्रेस  नेत्री सोनिया गांधी और भाजपा उम्मीदवार स्व. सुषमा स्वराज के बीच हुआ मुकाबला देश के चुनावी इतिहास में प्रमुखता से दर्ज है। हालांकि कड़ी टक्कर  के बावजूद सुषमा जी 50 हजार मतों से परास्त हो गईं थीं। लेकिन हारने के बाद अपनी प्रतिक्रिया में उन्होंने कहा था कि कुछ हार , जीत से भी ज्यादा गौरवशाली होती हैं।  दरअसल वे जानती थीं कि कर्नाटक में जो उस समय तक कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था, श्रीमती गांधी को पराजित करना असंभव था। लेकिन पार्टी की सुनियोजित रणनीति के अंतर्गत उन्होंने वह चुनौती  न सिर्फ स्वीकार की अपितु कुछ ही दिनों में कन्नड़ में भाषण देना सीखकर मतदाताओं पर गहरी छाप भी छोड़ी। गत दिवस लोकसभा में महिला आरक्षण लागू करने के लिए सरकार द्वारा प्रस्तुत परिसीमन  संबंधी संविधान संशोधन विधेयक दो तिहाई बहुमत के अभाव में गिर गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की अपील और आश्वासन विपक्ष को प्रभावित नहीं कर सके। विधेयक के पारित नहीं होने को विपक्ष अपनी बड़ी जीत मानकर उत्साहित भी है और आनंदित भी। कहा जा रहा है कि विपक्ष में सेंध लगाने में भाजपा विफल रही। लेकिन किसी भी कोण से ये लगा ही नहीं कि सरकार की तरफ से विपक्ष में तोड़फोड़ का प्रयास हुआ हो। सत्र के पहले दिन ही कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे सहित लगभग सभी विपक्षी दलों ने  विधेयकों का विरोध करने की घोषणा कर दी थी। ऐसे  में आवश्यक संख्याबल नहीं होने पर सत्ता पक्ष में जो चिंता  दिखाई देनी थी  उसका कोई लक्षण नजर नहीं आया। उल्टे प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और सरकार की ओर से मोर्चा संभालने वाले सभी वक्ता पूरे आत्मविश्वास में दिखे । सही बात ये है कि सरकार विधेयकों का हश्र जानती थी , फिर भी विशेष सत्र बुलाकर उसने महिला आरक्षण को देश का मुख्य राजनीतिक एजेंडा बनाने का जो दांव चला वह कारगर साबित हुआ। विपक्ष से बार - बार ये आवाजें आती रहीं कि वह महिला आरक्षण के नहीं बल्कि परिसीमन के विरोध में है। इसीलिए जब संशोधन विधेयक गिर गया तब भाजपा ने बिना देर किए विपक्ष को महिला विरोधी बताते हुए कठघरे में खड़ा करने का अभियान छेड़ दिया। यद्यपि विपक्ष ने 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं के लिए बढ़ाई जा रही सीटों के प्रस्ताव को तो रुकवा दिया किंतु आम महिला मतदाता को परिसीमन जैसा तकनीकी शब्द समझ नहीं आएगा। उसके दिमाग में यदि ये बात बैठ गई कि मोदी सरकार महिलाओं के लिए लोकसभा में सीटें बढ़ाना चाहती थी किंतु विपक्ष ने अड़ंगा लगा दिया तो भाजपा इसका लाभ उठा सकती है। मसलन प. बंगाल और तमिलनाडु में सुशिक्षित महिलाओं को भाजपा अपनी बात समझाने में सफल हो गई और 5 फीसदी मत उसने अतिरिक्त खींच लिए तो  बड़ा उलटफेर हो सकता है। विपक्ष का ये कहना शत - प्रतिशत सही है कि सरकार द्वारा संसद का विशेष सत्र उक्त दोनों राज्यों में मतदान के कुछ दिन पहले बुलाने का कारण विशुद्ध राजनीतिक था। लेकिन सभी राजनीतिक दल अवसर का लाभ उठाने के लिए ऐसी कोशिश करते रहे हैं। अब ये तो चुनाव परिणाम ही बताएंगे कि सरकार अपनी रणनीति में सफल रही या विपक्ष की मोर्चेबंदी कामयाब क्योंकि  कुछ दिनों के भीतर किसी भी दल के लिए भी मतदाताओं को परिसीमन के समर्थन या विरोध में गोलबंद करना आसान नहीं है। इसीलिए कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का ये सोचना सही है कि दरअसल भाजपा ने उ.प्र, पंजाब और गुजरात विधानसभा के आगामी चुनाव के  मद्देनजर महिला आरक्षण को लागू करने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाकर खुद। को महिला हितैषी साबित करने का प्रयास किया। विपक्ष की दिक्कत ये है कि संसद में प्रदर्शित एकता के बावजूद मैदानी स्तर पर वह विभाजित है। केरल में कांग्रेस और वामपंथियों के बीच सांप और नेवले जैसी दुश्मनी है। इसी तरह प. बंगाल में ममता बैनर्जी के विरुद्ध कांग्रेस , वामपंथी और ओवैसी सभी ताल ठोक रहे हैं। ये देखते हुए पांच राज्यों के चुनावों के बाद भाजपा बड़े पैमाने पर महिला आरक्षण का मुद्दा उठाएगी और तब विपक्ष के लिए उ.प्र, गुजरात और पंजाब के मतदाताओं को ये समझाना मुश्किल होगा कि उनमें लोकसभा की सीटें बढ़ाने के प्रस्ताव को  क्यों रोका गया। अखिलेश यादव ने तो मुस्लिम महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग उठाकर अपने ही गोल में गेंद डाल दी। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री ने उन्हें अपना मित्र बता दिया जिसका खंडन करने के बजाय श्री यादव मुस्कुराते रहे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 17 April 2026

महिला आरक्षण को लेकर कोई भी दल ईमानदार नहीं


संसद में विपक्ष का रवैया देखकर सरकार ने 2023 में पारित महिला आरक्षण अधिनियम को कल की तारीख से ही लागू कर दिया।  हालांकि इसे लेकर अभी भी भ्रम है कि ये आरक्षण 2029 के लोकसभा चुनाव से प्रभावशील होगा या जनगणना के उपरांत नये सिरे से परिसीमन के उपरांत 2034 से? विपक्ष ने इस अधिनियम को तत्काल लागू करने के औचित्य पर सवाल उठाए। सरकार की मंशा इसके पीछे स्पष्ट नजर आ रही है। दरअसल वह विपक्ष को महिला आरक्षण का विरोधी साबित करने का प्रयास कर रही है। हालांकि उसकी कोशिश कितनी कामयाब होती है ये फिलहाल कहना मुश्किल है । लेकिन कल कांग्रेस सांसद प्रियंका वाड्रा ने सुझाव दिया था कि लोकसभा की वर्तमान सदस्य संख्या पर ही एक तिहाई महिला आरक्षण लागू किया जाए। लगता है सरकार ने भी ऐसा ही कुछ करने का मन बनाया होगा। अन्यथा संसद के विशेष अधिवेशन के बीच अचानक  महिला आरक्षण विधेयक को कानून की शक्ल देने का और कोई कारण समझ नहीं आता। बेहतर हो भाजपा संसद में एक तिहाई टिकिटें महिलाओं को देने की घोषणा करते हुए विपक्ष पर दबाव बना दे।  इस बारे में ये कहना गलत नहीं होगा कि कांग्रेस संगठन की वर्तमान स्थिति देखते हुए वह स्वयं श्रीमती वाड्रा के सुझाव को लागू करने का साहस नहीं दिखा सकेगी। क्षेत्रीय  पार्टियों की स्थिति तो और भी खराब है क्योंकि उनके यहां मुख्य रूप से पुरुषों का ही वर्चस्व है। कल सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लोकसभा में जब मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण देने की मांग की तब गृहमंत्री अमित शाह ने पलटवार करते हुए कहा था कि समाजवादी पार्टी अपनी सभी टिकटें मुस्लिम महिलाओं को दे दे तो उन्हें कोई ऐतराज नहीं होगा। इस पर श्री यादव चुप होकर बैठे रह गए। लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाकर महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने के विचार पर समाज के भीतर भी तरह - तरह की चर्चाएं चल रही हैं जिनमें ये भी कहा जा रहा है कि सांसदों की संख्या बढ़ाने से जो आर्थिक बोझ बढ़ेगा वह अंततः जनता को ही वहन करना पड़ेगा। सबसे बड़ी बात ये है कि महिला आरक्षण का विधेयक 2023 में पारित होने के बाद किसी भी पार्टी ने उसे लागू करने की मांग नहीं की जो उनकी ईमानदारी पर संदेह उत्पन्न करती है। जहां तक प्रश्न जनगणना और उसमें भी जातीय जनगणना का है तो गृहमंत्री ने स्पष्ट कर दिया कि उसकी प्रक्रिया शुरू  हो चुकी है। लेकिन जिसकी जितनी भागीदारी उसकी उतनी हिस्सेदारी का नारा लगाने वाले राहुल गांधी क्या ये वायदा सार्वजनिक तौर पर कर सकते हैं कि कांग्रेस टिकिट वितरण करते समय उक्त नारे पर अमल करेगी? इसी तरह पिछड़ों की राजनीति करने वाली सपा और राजद जैसी पार्टियां पूरी तरह ओबीसी अन्य आरक्षित जातियों के लोगों को ही उम्मीदवार बनाएंगी? स्मरणीय है दलितों की मसीहा होने का दावा करने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती ने ब्राह्मण जाति के सतीश चंद्र मिश्र को पार्टी का महासचिव बनाने के साथ ही राज्यसभा में भी भेजा। सही  बात ये है कि महिला आरक्षण का सैद्धांतिक आधार पर समर्थन करने में तो सभी पार्टियां आगे - आगे नजर आती हैं किंतु उसे व्यवहार में उतारने के बारे में आगे - पीछे हो जाती हैं। कांग्रेस में सोनिया गांधी लंबे समय तक अध्यक्ष रहीं किंतु उन्होंने  उत्तराधिकारी के तौर पर अपने पुत्र को आगे बढ़ाया और साथ ही बेटी को महामंत्री बनाकर स्थापित कर दिया। आज पार्टी में और किसी महिला नेत्री का नाम सुनाई नहीं देता। यही हाल सपा का है जो अखिलेश के परिवार की निजी कंपनी है। तृणमूल कांग्रेस में अनेक महिला सांसद होने के बाद भी ममता बैनर्जी का राजनीतिक वारिस उनका भतीजा अभिषेक ही है। भाजपा भी पुरुष प्रधान पार्टी ही है। संसद में उसकी अनेक महिला सांसद होने के बाद भी स्व. सुषमा स्वराज जैसी प्रथम पंक्ति की नेत्री एक भी नहीं बची। दिखाने को दिल्ली की मुख्यमंत्री का चेहरा बतौर महिला मुख्यमंत्री आगे किया जा सकता है लेकिन निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी कितनी है ये सभी जानते हैं। इसमें दो मत नहीं हैं कि महिलाओं की शासन और प्रशासन में भागीदारी बढ़नी चाहिए। लेकिन इसके पहले उन्हें हर दृष्टि से सक्षम और आत्मनिर्भर बनाने पर भी ध्यान दिया जाना जरूरी है। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक संसद और विधानसभाओं में उनकी संख्या बढ़ने से उनकी सामाजिक स्थिति में सुधार होना असंभव है। पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं को मिले आरक्षण के बाद की स्थितियां किसी से छिपी नहीं हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 16 April 2026

मुस्लिम महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग देश के दूसरे विभाजन का षड़यंत्र


लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित किए जाने के लिए सदन  की मौजूदा सदस्य संख्या बढ़ाने एवं उसके लिए परिसीमन करने के उद्देश्य से आज लोकसभा में सरकार की ओर से तीन संशोधन विधेयक प्रस्तुत कर दिए गए। जैसा कि अपेक्षित था विपक्ष ने इसका जोरदार विरोध शुरू कर दिया जिसका उद्देश्य भाजपा को इसका राजनीतिक लाभ लेने से रोकने के साथ ही आरक्षण के भीतर आरक्षण रूपी पुराना पेच फंसाकर पूरी प्रक्रिया को बाधित करना  है। बरसों  पहले महिलाओं को आरक्षण के प्रस्ताव  का संसद में स्व. शरद यादव , स्व. मुलायम सिंह यादव के अलावा भाजपा नेत्री उमाश्री भारती ने भी ये कहते हुए विरोध किया था कि इसमें ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से कोटा रखा जाए। । आज बहस के दौरान ये संकेत मिल जाएगा कि विपक्ष का अंतिम फैसला क्या होगा क्योंकि प. बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होना शेष है। इसीलिए सभी राजनीतिक दल  अपना दृष्टिकोण सोच - समझकर ही तय करेंगे। ये तो स्पष्ट है कि यदि ये विधेयक संसद में पारित हो गए तो प. बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव में भाजपा महिला मतदाताओं के बीच खुद को उनका हितचिंतक साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। और कहीं विपक्ष इन विधेयकों पर फैसला टलवाने में कामयाब हो गया तब भाजपा का प्रचारतंत्र उसे महिला विरोधी ठहराकर कठघरे में खड़ा करने में जुट जाएगा। लेकिन इससे अलग हटकर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने  मुस्लिम महिलाओं के लिए भी आरक्षण जैसी खतरनाक मांग उठाते हुए पूछा कि आखिर मुस्लिम महिलाएं कहां जाएंगी? इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने तंज कसा कि आप अपनी पार्टी की सभी टिकटें मुस्लिम महिलाओं को ही दे देना। बहस में अन्य दलों के विचार भी सुनने मिलेंगे। लेकिन अखिलेश द्वारा मुस्लिम महिलाओं के लिए भी आरक्षण की मांग उठाकर जो दांव चला उससे वे अगले वर्ष होने वाले उ.प्र विधानसभा के चुनाव में  मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने में भले सफल हो जाएं किंतु उनकी यह मांग देश हित के सर्वथा विरुद्ध है। मुसलमानों को सेना में आरक्षण देने का मुद्दा उनके स्वर्गीय पिता मुलायम सिंह ने भी छेड़ा था। उनकी मुस्लिम परस्ती के कारण ही उन्हें मुल्ला मुलायम सिंह कहा जाने लगा था। हालांकि उस मांग को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल सका किंतु आज उनके पुत्र अखिलेश ने  मुस्लिम महिलाओं  के लिए अलग से आरक्षण जैसी मांग छेड़कर मुस्लिम तुष्टीकरण वाली  पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ाने का काम कर दिया। हालांकि अखिलेश सहित पूरी समाजवादी पार्टी उ.प्र में मुस्लिम समुदाय का चरण चुंबन करने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करती किंतु इस मांग से उस दौर की याद ताजा हो उठी जब मुस्लिमों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र बनाकर अंग्रेजी सत्ता ने भारत के दो टुकड़े करने की शुरुआत कर दी थी। मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण यदि कर दिया जाए तो  कल को मुस्लिम पुरुषों के लिए भी अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग जोर पकड़ेगी जो देश की अखंडता के लिए बड़ा खतरा होगी। अखिलेश यादव विदेश में पढ़कर आए हैं। ऐसे में उनसे ये अपेक्षा करना गलत नहीं होता कि वे  आधुनिक सोच का परिचय दें। लेकिन ऐसा लगता है वोट बैंक की वासना में  समाज को जातियों में बांटने के बाद वे और उनकी पार्टी अब देश का नया बंटवारा करने की जमीन तैयार कर रहे हैं। महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें बढ़ाए जाने का उद्देश्य आधी आबादी को राष्ट्रनिर्माण में भागीदार बनाना है। लेकिन इसमें धर्म के नाम पर आरक्षण जैसी खतरनाक मांग उठाकर अखिलेश ने एक बार दिखा दिया कि उन्हें देश की एकता और अखंडता की कोई चिंता नहीं है। महिला आरक्षण के लिए आज प्रस्तुत विधेयक पारित हों या न हों किंतु संसद में अखिलेश ने मुस्लिम महिलाओं के लिए आरक्षण की जो बात छेड़ी उसके लिए उनके विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए। क्योंकि ये मांग उस शपथ का उल्लंघन करती है जिसमें उन्होंने बतौर सांसद देश की अखंडता को अक्षुण्ण रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त की थी। ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि  इस देश विरोधी मांग पर मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस चुप रही। गृह मंत्री श्री शाह ने तो अखिलेश की मांग को असंवैधानिक बताकर सही किया परन्तु अब इस बात का इंतजार रहेगा कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी बहस में भाग लेते हुए अखिलेश द्वारा मुस्लिम महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण संबंधी मांग का विरोध करते हैं या नहीं? 


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 15 April 2026

सांसद - विधायक बनने वाली महिलाओं में निर्णय क्षमता जरूरी



लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण प्रदान करने का प्रस्ताव संसद द्वारा 2023 में ही पारित किया जा चुका है। लेकिन इसे लागू करते हुए एक तिहाई सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए संसद का दो दिवसीय अधिवेशन आमंत्रित किया गया है । इसमें परिसीमन सम्बन्धी विधेयक पारित किया जाना है जिसके बाद लोकसभा में 850 सीटें हो जाएंगी। परिसीमन का आधार 2011 की जनगणना को बनाया जाएगा। दक्षिण के राज्यों को चिंता है कि उ.प्र और बिहार की जनसंख्या ज़्यादा होने से महिला आरक्षण में सबसे ज्यादा लाभ उन्हें मिल जाएगा। हालांकि सरकार की ओर से ये आश्वासन दिया जा रहा है कि किसी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा ।  विपक्षी दलों की ओर से जो संकेत आ रहे हैं उन्हें देखते हुए इस अधिवेशन में सरकार द्वारा लाए जाने वाले प्रस्ताव का पारित होना आसान नहीं है क्योंकि सत्ता पक्ष के पास दोनों सदनों में संविधान संशोधन लायक दो तिहाई बहुमत का अभाव है। हालांकि महिलाओं  को लोकसभा और विधानसभा में एक तिहाई आरक्षण प्रदान करने के लिए सीटों की संख्या में वृद्धि के  लिए सैद्धांतिक रूप से सभी दल सहमत हैं किंतु असली विवाद श्रेय लूटने का है। कांग्रेस नेत्री सोनिया गांधी ने संसद के अधिवेशन की तारीखों को लेकर जो सवाल उठाया उसका कारण भी राजनीतिक ही है। दरअसल  विपक्ष को  शक है कि प. बंगाल और तमिलनाडु  विधानसभा चुनाव  के मतदान के हफ्ते भर पहले महिलाओं की एक तिहाई सीटें बढ़ाने जैसे बेहद महत्वपूर्ण प्रस्ताव को पारित करवाने का पूरा श्रेय लूटकर भाजपा उक्त दोनों राज्यों में महिला मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए इसका उपयोग करेगी ।  लेकिन सरकार का कहना है कि यदि 2029 के लोकसभा चुनाव में सीटें बढ़ाना है तब इस बारे में संसद को जल्द फैसला करना चाहिए। अन्यथा फिर बात 2034 तक टल जाएगी। उस दृष्टि से सरकार की तत्परता औचित्यपूर्ण है। रही बात उसके राजनीतिक लाभ की तो यदि इस तरह के प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित होते हैं तब कोई एक दल  उसका श्रेय नहीं लूट पाता। इसीलिए प्रधानमंत्री ने सभी दलों से अपील की है कि वे इस प्रस्ताव को समर्थन देकर  महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने को संवैधानिक रूप देने में सहायक बनें। ये प्रस्ताव संसद में पारित हो पाता है या नहीं ये तो दो दिन बाद ही पता चलेगा किंतु नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर जिस प्रकार केंद्र सरकार  प्रचार कर रही है उसे देखते हुए विपक्ष का भयभीत होना स्वाभाविक है। राजनीति के जानकार इस बात से भली - भांति अवगत हैं कि प्रधानमंत्री किसी भी फैसले के पहले गहन मंथन करते हुए उसके दूरगामी फायदे और नुकसान का आकलन करते हैं। 2029 से  लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं की सीटें बढ़ाने का निर्णय भी उन्होंने काफी सोच - समझकर लिया होगा। यदि विपक्षी दल इस प्रस्ताव का विरोध करते हैं तब  भाजपा इसे मुद्दा बनाकर उनको महिला विरोधी साबित करने में जुट जाएगी। विपक्ष भी इस दांव को समझ रहा है। लेकिन इस सबसे हटकर जो बात जनसामान्य के मन में उठ रही है वह है सांसद - विधायक बनने वाली महिलाओं का शैक्षणिक स्तर और उससे भी बढ़कर सार्वजनिक जीवन में कार्य करने का अनुभव। ये इसलिए जरूरी है क्योंकि देश भर में पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए किए गए आरक्षण के परिणामस्वरुप उनका प्रतिनिधित्व तो बेशक बढ़ा किंतु गुणवत्ता नहीं होने से महिला सशक्तीकरण का जो उद्देश्य इसके पीछे था वह पूरा नहीं हो सका। इसलिए संसद और विधानसभाओं में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित करने के साथ ही राजनीतिक दलों को ये देखना होगा कि जिन महिलाओं को वे चुनाव मैदान में उतारें उनमें बतौर जनप्रतिनिधि अपने दायित्व के प्रति जागरूकता हो । साथ ही निर्णय लेने के लिए पुरुषों पर पूर्णतः निर्भरता से भी वे मुक्त हों। हालांकि आरक्षित सीटों से ऐसे अनेक पुरुष सांसद और विधायक भी चुनकर आते हैं जिन्हें मिट्टी के माधो कहा जा सकता है। लेकिन आजादी के आठ दशक बाद महिलाओं को जब देश चलाने में हिस्सेदारी मिल रही है तब इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि शुरुआत में ही ऐसे मापदण्ड बना दिए जाएं जिससे इस ऐतिहासिक फैसले के औचित्य पर सवाल न उठ सकें। आज जब महिलाएं सभी क्षेत्रों में अपनी क्षमता को सफलता पूर्वक प्रमाणित कर रही हैं तब संसद और विधानसभाओं में भी उनकी एक तिहाई भागीदारी समय की मांग और देशहित में है। ऐसे में इस विधेयक के पारित होने के बाद  राजनीतिक दलों को इस दिशा में भी सोचना चाहिए कि सदन में आने वाली नारी अबला नहीं अपितु सबला हो।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 14 April 2026

होर्मुज़ रोककर पूरी दुनिया से दुश्मनी ले बैठा ईरान


मध्यपूर्व में भले ही युद्धविराम हो गया हो किंतु ईरान और अमेरिका के  बीच शांति वार्ता के बेनतीजा खत्म होने के बाद दोनों पक्षों से जिस प्रकार की बयानबाजी सुनाई दे रही है वह इस बात का संकेत है कि जंग की चिंगारी कभी भी भड़क सकती है । इसका पहला कारण तो इजराइल और लेबनान के बीच लड़ाई का जारी रहना और दूसरा है ईरान द्वारा होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर कब्जा जताकर आवाजाही पर रोक लगाना। इसके जवाब में अमेरिका ने भी होर्मुज की नाकाबंदी का ऐलान करते हुए धमकी दे डाली कि यदि कोई जहाज ईरान को टोल चुकाकर होर्मुज से निकलेगा तो उसे रोका जाएगा। हालांकि इसके बाद भारत और चीन के जलपोत उक्त समुद्री मार्ग से सुरक्षित निकलकर आ गए। भारत ने भी अपने जहाजों की हिफाजत के लिए नौसेना का बेड़ा तैनात कर रखा है। ईरान द्वारा होर्मुज़ पर अपना पूर्ण अधिकार होने का दावा करने से पूरी दुनिया परेशान है क्योंकि इस युद्ध के पहले तक ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी तथा सभी देशों के जहाज बेरोकटोक इस समुद्री मार्ग का उपयोग किया करते थे। स्मरणीय है सऊदी अरब , बहरीन, कतर ,यू.ए.ई और ओमान आदि से गैस और कच्चे तेल का निर्यात होर्मुज से ही होता है। इस युद्ध के पहले इस समुद्री मार्ग का नाम शायद ही कभी इतना चर्चा में आया हो। लेकिन ईरान ने जिस तरह से इसे अपना हथियार बनाया उसकी वजह से पूरी दुनिया के सामने नया संकट उत्पन्न हो गया है। ऊपर से अमेरिका के बड़बोले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा नित नई धमकियां दिए जाने से शांति की संभावनाएं शून्य होती जा रही हैं। सवाल ये है कि ईरान होर्मुज़ को कितने दिनों तक बंद रख सकेगा? और ये भी कि अमेरिका किस अधिकार से उसे खुलवाने के लिए चौधरी बनकर खड़ा है। ऐसा लगता है ईरान और अमेरिका दोनों महीने भर की लड़ाई से थक कर चूर हैं। ईरान को तो विनाशलीला का प्रत्यक्ष दर्शन करने के अलावा सैन्य क्षमता का भी भारी नुकसान झेलना पड़ा। तेल से होने वाली कमाई भी अवरुद्ध है। उधर अमेरिका भी लड़ाई के उम्मीद से ज़्यादा खिंच जाने से परेशान है। सैन्य साजो - सामान के अलावा उस पर आर्थिक बोझ भी बढ़ गया है। सबसे बड़ी बात उसके सर्वशक्तिमान होने का दंभ चकनाचूर हो गया। खाड़ी देशों में स्थित उसके सैनिक अड्डों पर ईरान ने जिस तरह खुलकर हमले किए उससे अमेरिका की धाक मिट्टी में मिल गई। ये कहना गलत नहीं होगा कि सऊदी अरब , कतर , बहरीन, ओमान और यू.ए.ई को अपने यहां अमेरिकी सैन्य अड्डे रखने की सजा भुगतनी पड़ी। ईरान ने इज़राइल की तरह से ही इन देशों पर  भी ताबड़तोड़ हमले किए। विशेष तौर पर तेल उत्पादक इकाइयों को निशाना बनाकर उनकी अर्थव्यवस्था चौपट करने में लेश मात्र भी संकोच नहीं किया। इजराइल की अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था भी सवालिया निशानों के घेरे में आ गई। सवाल उठ रहा है कि इस्लामाबाद वार्ता असफल हो जाने के बाद ईरान , अमेरिका और इजराइल का अगला कदम क्या होगा क्योंकि एक महीने से ज़्यादा तक लड़ने के बाद भी दोनों पक्षों के हाथ खाली हैं। मसलन न तो ईरान अमेरिका और इजराइल को घुटने टेकने बाध्य कर सका और न ही डोनाल्ड ट्रम्प का ईरान में सत्ता पलट का मंसूबा पूरा हो सका। बर्बादी के मुहाने पर होने के बावजूद ईरान  परमाणु कार्यक्रम बंद करने राजी नहीं है ओर न ही होर्मुज पर  किसी भी प्रकार की रियायत देने तैयार हुआ। ऐसे में इस बात की आशंका  है कि अमेरिका खिसियाहट में ऐसा कुछ करेगा जिससे ईरान हार मान ले। वहीं जवाब में ईरान भी कोई ऐसा कदम उठा सकता है जिसके कारण तेल उत्पादक देशों में तबाही आ जाए। इजराइल भी जिस प्रकार लेबनान की जमीन पर कब्जा करने में जुटा है वह भी इस जंग के जारी रहने का संकेत है। ऐसा लगता है ईरान , अमेरिका और इज़राइल युद्धविराम के बहाने मिले समय का उपयोग अपनी अगली रणनीति बनाने के लिए कर रहे हैं। इस्लामाबाद में इसीलिए न ईरान झुकने तैयार हुआ और न अमेरिका ने लचीलापन दिखाया। उधर इज़राइल ने युद्धविराम को ठेंगा दिखाते हुए जिस प्रकार लेबनान पर आग बरसाना जारी रखा उससे स्पष्ट हो गया कि वह  लड़ने पर उतारू है। अमेरिका का असली निशाना दरअसल चीन है। इसीलिए ट्रम्प ने  धमकी दे डाली कि ईरान को हथियार दिए तो  चीन पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया जाएगा। इस लिहाज से आने वाले कुछ दिन उत्सुकता भरे होंगे। देखना ये है कि ईरान होर्मुज को बंद रखने में कब तक सफल होता है क्योंकि उसके पास अब यही ब्रह्मास्त्र बचा है। लेकिन उससे आवागमन रोककर वह पूरी दुनिया से दुश्मनी लेने की गलती कर बैठा है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 13 April 2026

आशा भोसले के साथ एक युग विदा हो गया



कलाकार किसी समाज के सांस्कृतिक स्तर के प्रतीक होते हैं। हमारे देश में कला की सभी विधाओं को समुचित सम्मान मिलता रहा और कलाकार भी लोकप्रियता हासिल करते आए हैं। लेकिन उनमें से कुछ विरले होते हैं जिन्हें कला की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की विशेष कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है। ऐसी ही एक विलक्षण कला साधिका सुप्रसिद्ध पार्श्व गायिका आशा भोसले का गत दिवस 92 वर्ष की आयु में देहावसान हो गया। उनकी प्रारंभिक पहचान भारत कोकिला स्व. लता मंगेशकर की छोटी बहिन के तौर पर बनी किंतु जल्द ही उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर दीदी से अलग अपनी छवि बना ली।  कहा जाता है  दोनों के बीच अघोषित प्रतिस्पर्धा  थी किंतु लता जी की दिव्यता के बावजूद आशा जी ने अपनी विशिष्ट शैली से अपने लिए अलग जगह बनाई। जिस युग में फिल्म उद्योग के सभी दिग्गज संगीतकार और निर्माता लता मंगेशकर को अपरिहार्य मान बैठे थे और  प्रसिद्ध अभिनेत्रियां लता जी की आवाज के लिए ही आग्रह करती थीं तब ओ. पी. नैयर जैसे संगीतकार ने केवल आशा भोसले की आवाज का इस्तेमाल करने का दुस्साहस किया। नैयर साहब ने लता जी से मतभेद को लेकर  स्पष्ट किया था कि उनकी धुनों पर उनकी आवाज फिट नहीं बैठती। लता मंगेशकर के दबदबे वाले उस दौर  में किसी संगीतकार का वह बयान मामूली बात नहीं थी। लेकिन नैयर और आशा की जोड़ी ने  दर्जनों ऐसे गीत दिए जो दशकों बाद भी संगीत प्रेमियों को गुदगुदाते  हैं। उनके अलावा सचिनदेव बर्मन और जयदेव जैसे प्रयोग धर्मी  संगीत निर्देशकों ने भी आशा जी की आवाज में अनेक ऐसे गीतों का सृजन किया जो उनकी गायकी के उच्च स्तर का जीवंत प्रमाण बन गए। पेशेवर जिंदगी में दोनों बहिनों को स्थापित होने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। अनेक  संगीतकारों ने लता जी की आवाज को  बारीक बताकर उपेक्षित किया । वहीं स्व. दिलीप कुमार ने उनकी गायकी में मराठी लहजा होने की टिप्पणी की। इसी तरह आशा भोसले को रेकॉर्डिंग शुरू होने के बाद बीच में रोककर कह दिया गया कि वे पार्श्व गायन के लायक नहीं हैं। लेकिन कालान्तर में दोनों ने  आलोचकों को राय बदलने मजबूर करते हुए इतिहास रच दिया। लता जी ने तो घर नहीं बसाया किंतु आशा जी ने विवाह किया जो कि कड़वा अनुभव रहा। अपने तीन बच्चों के साथ पति से अलग होकर उन्होंने अपने परिवार और पेशे दोनों को संभाला और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। चढ़ती उम्र में उन्होंने राहुल देव बर्मन से भी विवाह रचाया किंतु उनकी भी जल्दी ही मृत्यु हो गई। बावजूद उसके उन्होंने आशा नहीं छोड़ी और नए - नए कीर्तिमान रच डाले। 12 हजार गीत गाने वाली आशा भोसले को पद्म भूषण के अलावा अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए किंतु लगभग सात दशकों तक संगीत प्रेमी श्रोताओं से उन्हें जो लोकप्रियता मिलती रही वह सबसे बड़ा सम्मान है। किसी कलाकार के लिए जीते जी किंवदंती बन जाना  असाधारणता का प्रमाण होता है। संयोग से लता और आशा नामक स्व. दीनानाथ मंगेशकर की दोनों बेटियों ने अपने जीवनकाल में ही भूतो न भविष्यति की उक्ति को सही साबित कर दिया। लता जी के बारे में तो ये बात हर कोई मान चुका था कि उन जैसा दूसरा पैदा नहीं होगा किंतु अब जबकि आशा भोसले स्मृतियों का हिस्सा बन चुकी हैं, ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि लता और आशा अपने आप में एक युग थीं जिसकी पुनरावृत्ति असंभव है। अपनी चुलबुली और खनकती आवाज के लिए विशिष्ट शैली के गीतों में एकाधिकार रखने वाली आशा जी के लिए उनकी दीदी ने भी माना था कि वैसे गीत गाना आशा के लिए ही संभव था। लेकिन उमराव जान फिल्म में संगीतकार खैयाम के निर्देशन में विशुद्ध शास्त्रीय संगीत में ढली ग़ज़लें गाकर आशा जी ने दिखा दिया कि उनकी कला को किसी सीमा में बांधा नहीं जा सकता । उसी के बाद ये कहा जाने लगा कि संगीतकारों ने लता जी के आकर्षण के चलते आशा जी का सही मूल्यांकन नहीं किया । नैयर साहब ने उनकी आवाज की खनक को गीतों में ढाला वहीं सचिन दा, जयदेव,राहुल देव और खैयाम ने आशा जी की छिपी प्रतिभा का लोकार्पण किया जो अन्यथा अछूती रह जाती। लता जी के अवसान के उपरांत आशा जी की उपस्थिति मंगेशकर युग का एहसास कराती थी किंतु अब वह भी नहीं रहा। लता जी की आवाज में जहां सागर जैसी अनंत गहराई थी वहीं आशा जी उसकी लहरों की चंचलता का प्रतीक थीं।
    उनका भौतिक शरीर भले ही भस्मीभूत हो गया किंतु जब तक गीत - संगीत रहेंगे तब तक आशा जी की दिव्य आवाज जीवंत रहेगी।
विनम्र श्रद्धांजलि।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 11 April 2026

शांति वार्ता नई अशांति का कारण बन सकती है



मध्यपूर्व में उत्पन्न संकट का समाधान ढूंढने अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे.डी वेंस और ईरान की संसद के अध्यक्ष सहित विदेश मंत्री पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में जमा  हैं। अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हमले के बाद ईरान ने जो पलटवार किया उसमें उन दोनों के अलावा  पड़ोसी देशों को भी लपेट लिया जिनमें अमेरिकी सैन्य अड्डे थे। एक माह से अधिक चली जंग के कारण पूरे विश्व में पेट्रोल - डीजल और गैस की किल्लत हो गई। मिसाइलों के जरिए तेल उत्पादक देशों में रिफाइनरीज को हुए नुकसान के कारण जहां उत्पादन घट गया वहीं ईरान द्वारा होर्मुज नामक समुद्री मार्ग को अपना हथियार बनाते हुए वहां से तेल लाने वाले मालवाहक जहाजों का आवागमन रोक दिया गया। इसकी वजह से खाड़ी देशों में सैकड़ों जहाज फंसकर रह गए। अमेरिका और इज़राइल सोच रहे थे कि ईरान ज्यादा से ज्यादा एक सप्ताह तक टिक सकेगा किंतु उनका आकलन गलत निकला। ईरान ने अपनी सैन्य क्षमता के बल पर अकेले ही अमेरिका और इज़राइल ही नहीं बल्कि सऊदी अरब , बहरीन , ओमान , कतर और यू.ए.ई आदि पर हमले कर डाले। हालांकि इस युद्ध में उसके राजनीतिक और सैन्य क्षेत्र के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े दर्जनों लोग मारे गए। साथ ही हजारों नागरिकों की मौत के अलावा पूरे देश का मूलभूत ढांचा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ। वहीं रक्षा उत्पादन इकाइयां और बिजली संयंत्र  भी नष्ट हुए। इसमें दो राय नहीं कि धीरे - धीरे उसकी लड़ने की क्षमता जवाब देती जा रही थी किंतु होर्मुज बंद होने के कारण विश्व जनमत का दबाव युद्ध रोकने के लिए बढ़ने लगा और अंततः दोनों पक्ष एक पखवाड़े के लिए युद्धविराम हेतु सहमत हो गए। प्रचारित किया गया कि ये सब पाकिस्तान की पहल पर हुआ किंतु जल्द ही स्पष्ट हो गया कि ये सब अमेरिका के इशारे पर हुआ जिसमें पर्दे के पीछे चीन की भी भूमिका रही। खैर, युद्धविराम तो हो गया किंतु उसकी शर्तों को लेकर दोनों पक्षों की ओर से किए जा रहे दावे विरोधाभासी हैं। इसका पहला उदाहरण इज़राइल द्वारा लेबनान पर हमले जारी रखने से मिला। जब ईरान ने इसे युद्धविराम का उल्लंघन बताया तब इजराइल और अमेरिका ने साफ कहा कि लेबनान इस युद्धविराम के दायरे से बाहर है। इस पर ईरान ने पाकिस्तान पर झूठ बोलने का आरोप लगाते हुए धमकी दे डाली कि वह इस्लामाबाद में प्रस्तावित शांति वार्ता में भाग नहीं लेगा। इसके साथ ही उसने होर्मुज को दोबारा बंद कर दिया। हालांकि आखिरकार उसका प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद पहुंच तो गया किंतु इजराइल द्वारा लेबनान पर आज भी हमले किए जाने से शांति वार्ता में व्यवधान की आशंका बनी हुई है। इसके अलावा अपने परमाणु कार्यक्रम को बंद करने जैसी शर्त भी उसे शायद ही मान्य होगी। होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क वसूलने की उसकी योजना भी गतिरोध की वजह बन सकती है । इस वार्ता के पहले पाकिस्तान के रक्षा मंत्री द्वारा इजराइल को लेकर की गई टिप्पणी से विवाद उत्पन्न हो गया था। इस्लामाबाद आने के पहले ही अमेरिका और ईरान के बीच जिस तरह से धमकियों का आदान - प्रदान होता रहा उसे देखते हुए बातचीत के दौरान वातावरण तनावपूर्ण रहने की पूरी - पूरी संभावना है। दोनों पक्ष युद्धविराम टूटते ही पहले से ज्यादा तेजी से हमले की धमकी दे रहे हैं। इस लड़ाई का मुख्य पक्ष सही मायनों में इजराइल है। उसको शांति वार्ता से दूर रखे जाने से युद्धविराम का भविष्य खतरे में है। मध्यपूर्व की असली समस्या इजराइल के अस्तित्व को मान्यता देने से जुड़ी हुई है। ईरान तो उसको नष्ट करने की बात खुलकर कहता है । और इसके लिए उसने हमास , हिजबुल्ला और हूती जैसे इस्लामी आतंकवादी संगठनों को पाल - पोस कर खड़ा कर दिया। हालांकि अरबी देशों में ज्यादातर ने इज़राइल से रिश्ते सुधार लिए हैं परन्तु ईरान , लेबनान और यमन आज भी उसके अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते। यदि किसी मजबूरी में अमेरिका और ईरान युद्धविराम को स्थायी रूप प्रदान करते हुए शांति स्थापित करने पर सहमत हो भी जाएं तब क्या इज़राइल अपनी सुरक्षा की गारंटी के बिना शान्त बैठेगा? ईरान लगातार कहता आया है कि उसे युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा चाहिए। लेकिन सवाल ये है कि नुकसान तो उन सभी का हुआ जो युद्ध में शामिल थे। और भी मुद्दे हैं जिन पर कोई सकारात्मक निर्णय होना संभव नहीं है। सबसे बड़ी बात ये है कि अमेरिका और ईरान दोनों को एक दूसरे पर विश्वास नहीं है। इसी तरह पाकिस्तान की अपनी विश्वसनीयता भी दो कौड़ी की है। इस बातचीत की पृष्ठभूमि तैयार करने वाले चीन के भी निहित स्वार्थ हैं। ये सब देखते हुए इस बातचीत से ज्यादा उम्मीदें करना बेकार है। बड़ी बात नहीं शांति वार्ता का अंत नए सिरे से अशांति उत्पन्न करने के तौर पर सामने आए।

Friday, 10 April 2026

भारी मतदान लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत


गत  दिवस असम , केरलम और पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव  में भारी मतदान  लोकतंत्र की जड़ों के गहरे होने का ज्वलंत प्रमाण है। असम में  परिसीमन के  कारण अनेक सीटों का नक्शा बदल गया था। घुसपैठियों के मुद्दे को भाजपा ने जोरदारी से उठाया जिसका असर हिन्दू मतदाताओं पर स्पष्ट दिखाई दिया। वहीं मुस्लिम समुदाय ने भी बड़े पैमाने पर मतदान कर  राजनीतिक जागरूकता दिखाई । यहां आदिवासी आबादी भी काफी है और अलगाववादी ताकतें भी सक्रिय रही हैं।  बीते कुछ दशकों में बांग्लादेशी घुसपैठियों के कारण जनसंख्या संतुलन बिगड़ने के  साथ ही जमीन पर अवैध कब्जों के कारण संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो रही थी। हालांकि हिमंता बिस्व सर्मा सरकार की सख्ती से हालात नियंत्रण में रहे।  अभी तक जितने भी चुनाव पूर्व सर्वेक्षण हुए सभी ने हिमंता सरकार की वापसी का अनुमान लगाया है। यद्यपि मुस्लिम मतदाताओं ने गोलबंद होकर कांग्रेस को समर्थन दिया हो तब भाजपा का खेल बिगड़ सकता है। हालांकि इसकी आशंका बहुत कम है किंतु आज का मतदाता बहुत चतुर है इसीलिए  अप्रत्याशित परिणाम भी देखने मिलते हैं। दूसरा राज्य केरलम है जिसे देश  के सर्वाधिक शिक्षित प्रदेश होने का सम्मान प्राप्त है। वहां भी जबरदस्त मतदान ने चुनाव को रोचक बना दिया। एल.डी.एफ नामक वामपंथी मोर्चे की सरकार बीते 10 साल से चली आ रही है। 2021 में हर चुनाव में सत्ता बदलने की परंपरा टूट गई थी किंतु इस बार कांग्रेस की अगुआई वाला यू.डी.एफ काफी आशान्वित है। वामपंथी मुख्यमंत्री विजयन की अधिक उम्र के कारण युवा मतदाता भावनात्मक तौर पर सरकार से जुड़ नहीं पा रहा। हालांकि महिलाओं में उनकी लाभार्थी योजनाओं का प्रभाव है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी यहां की वायनाड सीट से  सांसद चुने गए थे लेकिन रायबरेली से भी जीतने के बाद उन्होंने वायनाड छोड़ दिया।  और उनके स्थान पर प्रियंका वाड्रा लोकसभा सदस्य निर्वाचित हो गईं। हालांकि इस बार वे असम में कांग्रेस का चुनाव संचालित करती रहीं किंतु श्री गांधी ने केरलम में काफी समय दिया। इसके अलावा कांग्रेस ने प.बंगाल में वामपंथियों से अलग होकर चुनाव लड़ने का फैसला करते हुए केरलम की जनता को ये एहसास कराने का प्रयास किया कि वह वामपंथियों के साथ नहीं है। केरल अपनी राजनीतिक जागरूकता के लिए प्रसिद्ध है । यहां की आबादी में मुस्लिम और ईसाई समुदाय की हिस्सेदारी भी प्रभावशाली है। अभी तक माना जाता रहा कि हिन्दू समाज का बड़ा हिस्सा एल.डी.एफ के साथ  था जबकि  अल्पसंख्यक समुदाय कांग्रेस का समर्थन करते आए हैं। लेकिन भाजपा के उदय के बाद से समीकरण बदलते लग रहे हैं। हिन्दू मतदाताओं में भाजपा ने भी अपनी पैठ बना ली है जिससे वामपंथी मोर्चे को खतरा महसूस हो रहा है। लेकिन लव जिहाद से पीड़ित ईसाई समुदाय द्वारा कांग्रेस से छिटककर भाजपा के करीब आने के संकेत दिए जाने से स्थिति जटिल हो गई है। कांग्रेस को सर्वेक्षणों में मिली बढ़त 10 सीटों से अधिक नहीं है। इसीलिए मतदान का भारी प्रतिशत देखकर उसे भी चिंता सताने लगी हैं।  विश्लेषक भी केरल में नजदीकी मुकाबला मानकर चल रहे हैं वहीं भाजपा को मिलने वाली सीटें  अंदाजन अधिकतम 5 ही हैं। लेकिन इस चुनाव में जो भी उलटफेर होगा उसमें भाजपा की निर्णायक भूमिका रहेगी। तीसरा राज्य जहां कल मतदान हुआ वह केंद्र शासित पुडुचेरी है। इसका आकार किसी महानगर से भी छोटा है लेकिन वहां के मतदाताओं ने भी अभूतपूर्व उत्साह दिखाकर लोकतंत्र में अपनी आस्था प्रदर्शित की। सबसे संतोषजनक बात ये रही कि इक्का - दुक्का मामूली घटनाओं को छोड़कर मतदान सभी जगह शांतिपूर्ण रहा। बीते कुछ समय से विपक्ष के आरोप झेल रहे चुनाव आयोग ने एक ही दिन में तीन राज्यों के चुनाव सुव्यवस्थित ढंग से सम्पन्न करवाकर अपनी क्षमता साबित कर दी । यद्यपि उसकी असली परीक्षा प. बंगाल और तमिलनाडु में होगी जो अपेक्षाकृत बड़े  भी हैं। विशेष रूप से प. बंगाल में जहां मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण के  विरोध में मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने आसमान सिर पर उठा रखा है। लगभग 91 लाख मतदाता कम होने से वहां के परिणामों को लेकर उत्सुकता बढ़ गई है। तीन चुनाव जीत चुकी ममता चौका मारती हैं या नहीं ये भाजपा के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा जो इस बार उत्साह से भरी हुई है। तमिलनाडु में मुकाबला द्रविड़ संस्कृति वाली द्रमुक और अन्ना द्रमुक के बीच है। कांग्रेस पहले और भाजपा दूसरे के साथ हैं। यहां भी इस बार काफी कशमकश है। कल तीन राज्यों में हुए मतदान के बाद ये उम्मीद बढ़ गई है कि प. बंगाल और तमिलनाडु के मतदाता भी लोकतंत्र के महोत्सव में उत्साहपूर्वक भाग लेंगे। पूरी दुनिया जहां युद्ध की विभीषिका से अशांत है वहीं भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रिया शान्ति से संचालित होना ठंडी हवा के झोंके जैसा है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 9 April 2026

लागू होते ही टूटने भी लगा युद्धविराम



कल सुबह के अखबारों में पहले पन्ने पर डोनाल्ड ट्रम्प की वह धमकी छाई हुई थी जिसमें उन्होंने एक सभ्यता को खत्म करने की बात कही थी। ईरान को पाषाण युग में भेजने की धमकी वे पहले ही दे चुके थे। लेकिन ये सच होने के पहले ही खबर आ गई कि अमेरिका और ईरान के बीच 15 दिन के लिए युद्धविराम पर सहमति बन गई। इसके लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिफ मुनीर को श्रेय देते हुए ट्रम्प ने कहा कि उन्हीं के आग्रह पर जंग रोकी जा रही है। आगे की वार्ता 10 अप्रैल से इस्लामाबाद में होना सुनिश्चित हुआ। युद्धविराम के फैसले को ईरान अपनी जीत मानकर उछलने लगा वहीं अमेरिका के रक्षा मंत्री का दावा है कि ईरान इसके लिए गिड़गिड़ाया था। युद्ध रोकने के अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने पर सहमति की बात भी सामने आई। जिससे पूरी दुनिया ने राहत महसूस की। लेकिन हमारे देश में एक वर्ग विशेष सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए पाकिस्तान के प्रशस्तिगान में जुट गया। मोदी सरकार की विदेश नीति को विफल बताने के साथ ही पाकिस्तान को कूटनीतिक तौर पर मिले महत्व की प्रशंसा की जाने लगी। ईरान को विजेता के तौर पर इस तरह पेश किया जाने लगा मानो उसने अमेरिका और इजराइल से आत्मसमर्पण करवा लिया हो। लेकिन शाम होते तक युद्धविराम की धज्जियां उड़ने लगीं। इजराइल ने लेबनान में हिजबुल्ला के ठिकानों पर जबरदस्त हमले किए जिनमें 250 से ज्यादा लोग मारे गए। इधर ईरान और खाड़ी देशों में मिसाइलों का आदान - प्रदान होने लगा। वैसे भी सऊदी अरब , बहरीन और यू.ए.ई आदि युद्धविराम के पक्षधर नहीं थे। उनका अमेरिका से कहना था कि ईरान को घुटनाटेक करवाकर ही छोड़ें जिससे वह दोबारा क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बिगाड़ने का दुस्साहस न कर सके। इधर ईरान ने लेबनान में इजराइली हमलों पर ऐतराज जताया तो इजराइल और अमेरिका दोनों ने दो टूक जवाब दिया कि लेबनान में हिजबुल्ला के अड्डे होने से वहां युद्धविराम नहीं है। इससे नाराज ईरान ने होर्मुज से आवाजाही रोकने का ऐलान कर तेल और गैस संकट में राहत मिलने की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। जिस पर ट्रम्प दोबारा बमबारी शुरू करने की धमकी दे रहे हैं।ईरान ने ये आरोप भी लगाया कि उसके परमाणु कार्यक्रम संबंधी जो आश्वासन दिया गया उससे भी अमेरिका मुकर रहा है। ऐसे में युद्धविराम संबंधी बातचीत निरर्थक है। ताजा समाचारों के लेबनान पर हमले को लेकर अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे .डी वेंस और शहबाज शरीफ के बीच भी मतभेद सामने आने लगे हैं। शरीफ के अनुसार लेबनान को भी युद्धविराम में शामिल किया गया था जबकि वेंस का दावा है कि ऐसा नहीं था। उल्लेखनीय है वेंस इस्लामाबाद की बातचीत में अमेरिका का प्रतिनिधित्व करेंगे। आज तेहरान में एक वरिष्ट नेता ने स्पष्ट कहा कि जंग और युद्धविराम एक साथ नहीं चल सकते। साथ ही अमेरिका पर आरोप लगाया कि उसने युद्धविराम की तीन शर्तों का उल्लंघन किया है। इस बातचीत में चूंकि इज़राइल के अलावा युद्ध में शामिल अन्य देशों की उपस्थिति नहीं होगी लिहाजा उसके किसी निष्कर्ष पर पहुंचने पर संदेह के बादल मंडराने लगे हैं। इसीलिए कल दिन में अपनी कूटनीतिक सफलता पर इतराने वाला पाकिस्तान शाम से तनाव में नजर आने लगा। ईरान और अमेरिका दोनों एक दूसरे पर युद्धविराम की शर्तों से मुकरने का आरोप लगा रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान की स्थिति नमाज पढ़ने गए थे किंतु रोजे गले पड़ गए वाली होती जा रही है। ये कहना गलत नहीं होगा कि अमेरिका भले ही युद्ध से पिंड छुड़ाना चाह रहा हो किंतु इजराइल को उसे अंजाम तक पहुंचाए बिना रोक देना शायद ही गवारा होगा। लेबनान पर उसके हमले इसका प्रमाण हैं। इसके अलावा सऊदी अरब सहितखाड़ी के अन्य देश भी ईरान को अधमरा छोड़ने सहमत नहीं हैं। ऐसे में कल होने वाली बातचीत में इस समस्या का हल निकलने की उम्मीद बेहद क्षीण है। और यदि युद्धविराम विफल हुआ तब सबसे ज्यादा फ़जीहत होगी पाकिस्तान की जो अमेरिका और ईरान दोनों से गालियां खाएगा। ईरान द्वारा होर्मुज़ से गुजरने वाले जहाजों से एक डॉलर प्रति बैरल वसूलने के साथ ही उसका भुगतान चीनी मुद्रा युआन में लिए जाने की खबर ने भी डोनाल्ड ट्रम्प को सशंकित कर दिया है। निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि भारत ने दो साड़ों की लड़ाई से खुद को दूर रखने का निर्णय लेकर जो परिपक्वता दिखाई उसके दूरगामी फायदे होंगे। अमेरिका को छोड़ दें तो ईरान , इजराइल , यू.ए.ई, सऊदी अरब, ओमान , बहरीन और कतर से हमारा संवाद लगातार कायम बना रहा। इसी का परिणाम है कि ईरान ने होर्मुज जिन देशों के लिए खोला उनमें भारत भी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 8 April 2026

फिल्म के मध्यांतर जैसा है ये युद्धविराम


पूरी दुनिया ने ये जानकर राहत की सांस ली कि ईरान और अमेरिका 15 दिनों के लिए युद्धविराम हेतु राजी हो गए।  डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ईरान को मिटाने की जो धमकी दी गई थी उसके कारण बड़े अनिष्ट की आशंका  थी। यदि वह  सच हो जाती तो  ईरान और मध्यपूर्व सहित समूची दुनिया के लिए एक दर्दनाक अनुभव होता।  इस जंग में विजेता होकर निकलने के डोनाल्ड ट्रम्प के पास एक ही विकल्प  था कि वे  परमाणु बम जैसा कोई कदम उठा लें। हालांकि युद्ध  ने जो नया रूप ले लिया है उसे देखते हुए अमेरिका परमाणु हथियारों के अलावा भी ऐसा कुछ कर सकता था जिससे ईरान संपूर्ण विनाश का शिकार हो जाए। पुलों और बिजली संयंत्रों को नष्ट करने की जो धमकी ट्रम्प ने दी उसके बाद उसके सामने भी अन्य कोई रास्ता नहीं बचा। कल तक वह किसी भी स्थिति में होर्मुज  खोलने सहमत नहीं हो रहा था लेकिन अचानक रजामंद होना साधारण नहीं है। इसके पीछे महाशक्तियों के निजी स्वार्थ हैं।  कल ही सं.रा.संघ सुरक्षा परिषद में होर्मुज संबंधी प्रस्ताव पर चीन और रूस ने वीटो लगाकर ईरान की जबरदस्त सहायता की थी। लेकिन ट्रम्प द्वारा दी गई समय सीमा के पहले ही एक पखवाड़े तक युद्ध रोकने की घोषणा ईरान और अमेरिका ने कर दी। इसका श्रेय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिफ मुनीर को दिया जा रहा है। स्मरणीय है कुछ दिन पूर्व पाकिस्तान , टर्की और मिस्र के नेताओं की बैठक इस्लामाबाद में हुई थी जिसमें युद्ध रोकने पर विचार हुआ। लेकिन ईरान ने उसे कोई महत्व नहीं दिया और इतनी कड़ी शर्तें रख दीं जिन्हें मानना  दूसरे पक्ष के लिए संभव नहीं था। ऐसे में इस युद्धविराम और उसमें पाकिस्तान की भूमिका पर आश्चर्य  स्वाभाविक है। दरअसल इस पूरे खेल में चीन की भूमिका है जिसने पर्दे के पीछे रहते हुए ईरान को राजी किया। अब सवाल ये है कि जो ईरान जिद  करता था कि युद्धविराम तभी स्वीकार करेगा जब उस पर दोबारा हमले न होने की गारंटी दी जाए, युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई के साथ ही होर्मुज से निकलने वाले जहाजों से टोल टैक्स वसूलने का अधिकार मिले। इसके अलावा वह अपने परमाणु कार्यक्रम को बेरोकटोक जारी रखने का आश्वासन चाहता था। आज हुए युद्धविराम में उसे ऐसा कोई वायदा नहीं किया गया जिससे ये साफ है कि  कहीं न कहीं उसकी नस दबी थी जिसके कारण वह लड़ाई रोकने तैयार हो गया। चौंकाने वाली बात ये है कि आगे की वार्ता इस्लामाबाद में होना तय किया गया है। लेकिन  इज़राइल इसके लिए सहमत नहीं होगा । और उसकी गैर मौजूदगी में हुए किसी भी समझौते को नेतन्याहू स्वीकार करेंगे इसमें संदेह है । उल्लेखनीय है ईरान , इजराइल के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता।  इसलिए ये युद्धविराम फिल्म के मध्यांतर से ज्यादा कुछ भी नहीं । असल में वेनेजुएला पर अमेरिकी आधिपत्य के बाद से चीन की तेल आपूर्ति अवरुद्ध हो चली थी। ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमलों ने उसके सामने दूबरे में दो आषाढ़ वाली स्थिति बना दी। इसलिए उसने पहले सुरक्षा परिषद में ईरान का समर्थन किया वहीं अगली सुबह उसे मजबूर कर दिया कि वह होर्मुज को खोल दे। भारत में एक वर्ग इसे मोदी सरकार की विदेश नीति की असफलता बता रहा है क्योंकि युद्धविराम का श्रेय पाकिस्तान लूट ले गया किंतु उनकी सोच गलत है क्योंकि  ईरान और अमेरिका के बीच में मध्यस्थता करना भारत के दूरगामी हितों के लिए नुकसानदेह होता। इस समय भारत के इजराइल के अलावा सऊदी अरब, यू.ए.ई, बहरीन , कतर और ओमान जैसे देशों के साथ अच्छे रिश्ते हैं। तटस्थ रहकर हमने ईरान का भरोसा भी जीता जिसका प्रमाण होर्मुज से भारतीय टैंकरों के सुरक्षित निकलने से मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री जयशंकर भी युद्ध में शामिल सभी पक्षों से संपर्क में रहे। वैसे भी इस युद्धविराम से खास उम्मीद लगाना बेकार है क्योंकि न तो ईरान हमास , हिजबुल्ला और हूती जैसे आतंकवादी संगठनों को पालना बंद कर इजराइल के अस्तित्व को स्वीकार करेगा और न ही अपने परमाणु कार्यक्रम को बंद करेगा। सऊदी अरब , यू.ए.ई और बहरीन भी ईरान की कमर तोड़ने का दबाव अमेरिका पर डाल रहे हैं। ये  सोचना भी गलत है कि अमेरिका इस जंग से निकलना चाह रहा है। दरअसल वह नए सिरे से तैयारी करने के लिए मोहलत चाहता था जो युद्धविराम ने उसे दे दी। वैसे भी इजराइल द्वारा लेबनान में हमले जारी रखने की घोषणा से युद्धविराम की सफलता संदिग्ध हो गई है। सही बात ये है कि ईरान की लड़ने की क्षमता रोज घट रही थी। युद्धविराम के दौरान तेल बेचकर धन बटोरने के साथ ही वह रूस और चीन से अस्त्र - शस्त्र खरीदकर अगले चरण की लड़ाई के लिए खुद को सक्षम बनाना चाह रहा है।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 7 April 2026

तमिलनाडु में राष्ट्रवादी भावना चुनाव पर असर डाल रही


तमिलनाडु से आ रहे रुझान सत्ता परिवर्तन का संकेत दे रहे हैं। सत्तारूढ़ द्रमुक का कांग्रेस के साथ गठबंधन है। वहीं उसकी प्रमुख प्रतिद्वंदी अन्ना द्रमुक ने  भाजपा को अपने साथ जोड़कर मुकाबले को नजदीकी बना दिया है। लेकिन अभिनेता विजय की नवोदित पार्टी तमिझगा वेत्री कझगम के तीसरी ताकत के तौर पर कूदने से त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति भी बन रही है।  शुरुआती आकलन था कि विजय सत्ता विरोधी मतों में सेंध लगाकर अन्ना द्रमुक गठबंधन अर्थात एन.डी.ए का नुकसान करेंगे किंतु ज्यों - ज्यों मतदान की तारीख करीब आ रही है त्यों - त्यों ये लगने लगा है कि तमिल फिल्मों का ये लोकप्रिय अभिनेता सत्ता पक्ष को भी बराबरी से नुकसान पहुंचा रहा है। स्मरणीय है तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी दुनिया का जबरदस्त प्रभाव रहा है। यद्यपि जयललिता और करुणानिधि के निधन के बाद से इसमें कमी आई। लेकिन विजय ने नई पार्टी के  जरिए हाथ आजमाकर उस दौर को पुनर्जीवित कर दिया। वैसे तो आज की तमिल फिल्मों में विजय बड़ा नाम है किंतु उनके साथ वह वैचारिक ताकत नहीं है जिसके बल पर अन्ना दोरई, एम. जी. रामचंद्रन , करुणानिधि और जयललिता ने लंबे समय तक  दबदबा बनाए रखा। लोकप्रिय अभिनेता कमल हासन ने भी राजनीति में हाथ आजमाया लेकिन फिल्मी सफलता को वे सियासत में नहीं दोहरा सके। कुछ लोगों का मानना है कि युवा पीढ़ी द्रविड़ पार्टियों की संकुचित सोच वाली राजनीति से अलग हटकर व्यापक  दृष्टिकोण से प्रेरित हो रही है। और इसी पर अभिनेता विजय की उम्मीदें टिकी हैं। यद्यपि उनको लेकर  चुनावी पंडित बहुत ज्यादा आश्वस्त नहीं हैं किंतु  अनेक सीटें हैं जिनमें उनके उम्मीदवार दोनों बड़े गठबंधनों में से किसी एक का खेल जरूर बिगाड़ेंगे। यही सोचकर भाजपा ने उन्हें अपने पाले में खींचना चाहा किंतु सफलता नहीं मिली। इसके बाद आए सर्वेक्षणों में अन्ना द्रमुक - भाजपा गठबंधन को सत्ताधारी द्रमुक - कांग्रेस गठजोड़ पर निर्णायक बढ़त दिखाए जाने से  लगने लगा है कि सत्ता विरोधी रुझान मुख्यमंत्री स्टालिन को नुकसान पहुंचा रहा है वहीं अभिनेता विजय की  मौजूदगी भी द्रमुक के जनाधार को  कमजोर करने में कामयाब हो रही है। यदि स्टालिन सत्ता से हाथ धो बैठते हैं तो उसका एक कारण तमिलनाडु की राजनीति में आ रहे हिंदुत्व का उभार भी होगा। उनके मंत्री पुत्र उदयनिधि ने सनातन धर्म की तुलना कोरोना और डेंगू से करते हुए उसे खत्म करने वाला जो बयान दिया था उसकी सवर्ण वर्ग में रोष पूर्ण प्रतिक्रिया हुई थी। हालांकि भाजपा  बड़ी सफलता हासिल कर पाएगी ये कहना कठिन है किंतु मुख्यमंत्री के बेटे के सनातन विरोधी बयान से हिंदुत्व की जो भावना जोर पकड़ने लगी उसका लाभ भाजपा के साथ ही अन्ना द्रमुक को भी मिलता लग रहा है। यदि ये आकलन धरातल पर उतरा और स्टालिन को सत्ता से हाथ धोना पड़ा तब तमिलनाडु की राजनीति में क्रांतिकारी परिवर्तन की शुरुआत होना तय है। हालांकि अन्ना द्रमुक भी निकली तो द्रविड़ राजनीति की कोख से ही है किंतु जयललिता के दौर से ही उसमें हिंदुत्व का पुट आने लगा था। संघीय ढांचे का हिस्सा होने के बावजूद हिन्दी  और उत्तर भारत के विरोध का राग अलापकर तमिलनाडु को मुख्य धारा से अलग रखने वाली सियासत के समानांतर अब राष्ट्रवादी भावना का असर इस चुनाव में नजर आ रहा है। यदि मतदान के दिन तक ये जारी रहा तब सत्ता परिवर्तन की संभावना वास्तविकता में बदलना तय है। स्टालिन इस बात को समझ गए हैं इसीलिए इन दिनों उनके बयानों में वैसा तीखापन नहीं है जैसा प. बंगाल में ममता बैनर्जी की टिप्पणियों में दिखाई देता है। कुल मिलाकर तमिलनाडु का ये चुनाव कई अर्थों में असाधारण है क्योंकि पहली बार है जब भाजपा को विश्लेषक गंभीरता से ले रहे हैं। तमिलनाडु की राजनीति के जानकार ये कहने में भी संकोच नहीं कर रहे कि यदि जनादेश मौजूदा  राज्य सरकार के विरुद्ध आया तब   स्व.करुणानिधि के विशाल परिवार में  उत्तराधिकार की लड़ाई नए सिरे से शुरू होगी जिसके कारण स्टालिन का भविष्य अंधकारमय हो सकता है। गौरतलब है अन्ना द्रमुक के पास भी जयललिता जैसा कोई नेता नहीं होने से भाजपा इस शून्य को भरने में कामयाब हो सकती है क्योंकि उसके उत्तर भारत की पार्टी होने की अवधारणा धीरे - धीरे कमजोर पड़ने लगी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 6 April 2026

केरलम में कांग्रेस की प्रतिष्ठा और वामपंथियों का अस्तित्व दांव पर


जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं उनमें केरलम ( केरल ) में कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों का भविष्य दांव पर लग गया है। दरअसल यही वह राज्य है जिसमें कांग्रेस को उम्मीद दिखाई दे रही है। हालांकि दावा तो वह असम जीतने का भी कर रही है किंतु तमाम सर्वेक्षणों में वहां भाजपा की  वापसी संभावित होने से केरलम में ही कांग्रेस के लिए गुंजाइश है। वहीं दस वर्षों से सत्ता पर विराजमान वामपंथी मोर्चे के सामने अपना इकलौता किला बचाने की चुनौती है। यद्यपि  पार्टी कैडर के अलावा विजयन सरकार की कल्याणकारी नीतियों का जनमानस पर सकारात्मक प्रभाव उसके पक्ष में हैं  लेकिन सत्ता विरोधी भावना भी  दिखाई दे रही है। ऐसा लगता है सरकार समर्थकों में वह उत्साह नहीं है जो जीत का आधार बनता है। अब  तक हिन्दू समुदाय जहां वामपंथियों का परंपरागत वोट बैंक रहा वहीं मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन के चलते कांग्रेस को मुसलमान मत  मिलते रहे। ऐसा ही ईसाई समुदाय के साथ देखा गया जिसे गांधी परिवार के रूप में अपना हितचिंतक महसूस होता है।  2011 की जनगणना के अनुसार, केरल में हिंदू आबादी लगभग 54.73%, मुस्लिम 26.56% और ईसाई 18.38% है। यहां हर पांच साल में सरकार बदलती थी किंतु 2021 में वामपंथी मोर्चे ने लगातार दूसरा चुनाव जीतकर चौंकाया जबकि उसके  बाद लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने बाजी मारी। हाल ही हुए स्थानीय निकाय चुनाव में भी सत्तारूढ़ मोर्चे का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। राजधानी तिरुवनंतपुरम में भाजपा का महापौर बनना उसके लिए खतरे की घंटी बन गया। हालांकि जो संकेत हैं उनके अनुसार एल डी.एफ नामक वामपंथी मोर्चे ने हिम्मत नहीं हारी है । चूंकि प. बंगाल में इस  बार भी  संभावना शून्य है ऐसे में केरलम की सत्ता वामपंथी पार्टियों के लिए जीवन मरण का प्रश्न बन गई है।  इस चुनाव में पराजित होने  पर केरलम में भी उनका हश्र प. बंगाल जैसा होना तय है क्योंकि उनके परम्परागत हिन्दू जनाधार अर्थात शहरी मध्यमवर्ग के अलावा महिलाओं में भाजपा तेजी से अपना प्रभाव कायम करती जा रही है। हालांकि इस बार भाजपा के कितने विधायक जीतेंगे ये कहना  कठिन है किंतु उसका मत प्रतिशत  जिस प्रकार बढ़ता जा रहा है उससे ये माना जा रहा है कि  यू. डी एफ और  एल. डी. एफ की जीत - हार में उसके द्वारा हासिल मतों की बड़ी भूमिका रहेगी। बीते कुछ चुनावों से भाजपा  तिरुवनंतपुरम सीट पर लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करती आई है किंतु इस चुनाव में उसकी उपस्थिति कमोबेश पूरे राज्य में होने से वह बड़ा उलटफेर करने की स्थिति में है। लव जिहाद के विरोध में उसके अभियान ने हिन्दू जनमानस के अलावा ईसाइयों को भी आकर्षित किया है। ये चर्चा भी सुनाई देने लगी है कि अनेक  सीटों पर मुस्लिमों के विरोध में हिंदुओं और ईसाइयों का ध्रुवीकरण एल.डी.एफ और यू.डी.एफ दोनों का खेल बिगाड़ेगा जिसका लाभ भाजपा को मिल सकता है।  अनेक विश्लेषकों का आकलन है कि केरलम में त्रिशंकु विधानसभा की भी स्थिति भी बन सकती है और तब संतुलन भाजपा के नियंत्रण में होगा किंतु उसके लिए दोनों गठबंधनों में से एक नाग नाथ तो दूसरा सांप नाथ है। वहीं कांग्रेस और वामपंथियों के लिए भाजपा से गठजोड़ असम्भव है। हालांकि अंतिम फैसला तो मतदाता ही करेंगे किंतु केरलम में वामपंथी जहां अस्तित्व बचाने लड़ रहे  हैं वहीं कांग्रेस के लिए ये प्रतिष्ठा का प्रश्न है क्योंकि लोकसभा चुनाव  के बाद हुए विधानसभा चुनावों में उसका प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। जम्मू - कश्मीर, हरियाणा, महाराष्ट्र,  झारखंड,दिल्ली और बिहार में उसकी स्थिति पहले से और कमजोर हो गई। इसके कारण जहां राहुल गांधी की क्षमता पर सवाल उठे वहीं इंडिया गठबंधन में निष्क्रिय होकर रह गया। यदि केरलम में इस बार भी सत्ता कांग्रेस के हाथ नहीं लगी तब राहुल के विरुद्ध पार्टी के भीतर भी बड़ा विद्रोह होना तय है। इसी तरह यदि सरकार गंवा बैठे तब बंगाल की खाड़ी के बाद अरब सागर में भी वामपंथी राजनीति का डूबना सुनिश्चित है। भाजपा के लिए केरलम एक अवसर साबित हो सकता है क्योंकि दोनों बड़े मोर्चे में जो भी हारेगा उसकी जगह भविष्य में वही लेगी ये साफ नजर आ रहा है। देश के सबसे सुशिक्षित इस राज्य के मतदाता सदैव सोच -  समझकर ही मतदान करते आए हैं। हालांकि इस बार उनके सामने भी जबरदस्त असमंजस है। साथ ही मध्यपूर्व में चल रहे युद्ध से भी चुनाव के समीकरण प्रभावित हो रहे हैं क्योंकि खाड़ी देशों में कार्यरत केरलम के लाखों लोग वहीं फंसे हुए हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 4 April 2026

आम आदमी पार्टी में बिखराव रुकने का नाम नहीं ले रहा


   हालांकि ये आम आदमी पार्टी का अधिकार है कि वह संसद में किसे अपना नेता , उपनेता या सचेतक बनाए। उस लिहाज से राज्यसभा में  राघव चड्ढा को उपनेता पद से अलग किया जाना उसका आंतरिक मामला है। लेकिन राज्यसभा सचिवालय को ये लिखकर देने से कि उनको बोलने की अनुमति न दी जाए, ये प्रकरण सुर्खियों में आ गया। पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट राघव पार्टी के सौम्य और शालीन चेहरे  हैं। अन्ना आंदोलन के समय ही वे अरविंद केजरीवाल के साथ जुड़ गए।  प्रवक्ता के तौर पर उनका प्रदर्शन  प्रभावशाली रहा।  केजरीवाल सरकार के अनेक मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और कुछ तो जेल भी गए, वहीं राघव अपनी स्वच्छ छवि और सुसंस्कृत व्यवहार के कारण लोकप्रिय होते गए। लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स से शिक्षित इस नेता को पार्टी ने पंजाब  की जिम्मेदारी सौंपी  जहां उसे दिल्ली की तरह से ही धमाकेदार जीत मिली । पुरस्कार स्वरूप उन्हें राज्यसभा में भेजा गया। सदन में लीक से हटकर मुद्दे उठाने के कारण  राघव  प्रभाव छोड़ने में सफल हो गए।  लेकिन अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा से विवाह के बाद उनकी चर्चा राजनेता से ज़्यादा ग्लैमर बॉय के रूप में होने लगी।  टीवी कार्यक्रमों में उनसे पार्टी और राजनीति से जुड़े सवालों की बजाय निजी जीवन पर पर सवाल पूछे जाते। यद्यपि राज्यसभा में  आम जनता से जुड़े मुद्दे  उठाने से  उन्हें सराहना भी मिली । निर्वाचित जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने ( रिकॉल )  का उनका सुझाव लोगों को पसंद आया। हवाई अड्डों पर महंगी खाद्य सामग्री के अलावा गिग वर्कर्स (ओला/उबर ड्राइवर, स्विगी/ज़ोमैटो डिलीवरी पार्टनर,  या कूरियर बॉय)  के शोषण का मुद्दा उठाकर भी वे सुर्खियों में आए।  ऐसे में उनको राज्यसभा में  उपनेता पद से हटाने के निर्णय पर सभी को आश्चर्य हुआ क्योंकि उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच किसी भी मतभेद की खबर उजागर नहीं हुई थी। लेकिन अब जो बातें सुनने में आईं उनसे  स्पष्ट है कि विवाद की शुरुआत काफी पहले हो चुकी थी।  दरअसल जब शराब घोटाले में श्री केजरीवाल और मनीष सिसौदिया की गिरफ्तारी के विरुद्ध पार्टी आंदोलन कर रही थी तब न श्री चड्ढा  नजर आए और न ही कोई बयान आया। बाद में पता लगा कि वे आँखों का इलाज करवाने के लंदन गए हुए थे।  लंबे समय तक वहां रुके रहने पर भी उंगलियां उठीं। लौटने के बाद भी उनकी  सक्रियता राज्यसभा की बैठकों में दिए भाषणों तक सीमित रह गई। गत वर्ष दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी वे अग्रिम मोर्चे पर नहीं दिखे। ज़ाहिर है उनके और  पार्टी के बीच  खाई चौड़ी होती गई । राज्यसभा में उपनेता पद से हटाने के बाद भी हालांकि पार्टी की तरफ़ से इस बारे में  अधिकृत बयान नहीं आया किंतु  सोशल मीडिया पर राघव की प्रतिक्रिया से लगता है कि वे भी शांति भूषण, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और कुमार विश्वास की तरह श्री केजरीवाल के लिए असहनीय हो चले हैं। इसका कारण  पार्टी लाइन के समानान्तर ऐसे मुद्दे उठाना बताया जा रहा है जिनसे उनकी व्यक्तिगत छवि तो चमक रही थी लेकिन पार्टी को कोई लाभ नहीं मिल रहा।  एक वजह ये भी है कि सदन में उनके द्वारा सरकार का विरोध सौम्य शैली में किया जाता रहा वहीं पार्टी के नेता संजय सिंह की शैली बेहद आक्रामक है। आम चर्चा ये है कि राघव धीरे - धीरे भाजपा के करीब जा रहे थे। सदन में बजट के कुछ प्रावधानों की प्रशंसा और सुझाव वाला उनका भाषण पार्टी को नागवार गुजरा। लेकिन अब तक  बाहर नहीं किए जाने से वे पार्टी के व्हिप से बंधे हुए हैं। कार्यकाल के दो वर्ष शेष रहने से राघव इस्तीफा देने की गलती भी शायद ही करें। लेकिन इस घटनाक्रम से ये स्पष्ट हो गया कि आम आदमी पार्टी में बिखराव की प्रक्रिया थमने का नाम नहीं ले रही। श्री केजरीवाल और श्री सिसौदिया को छोड़कर तकरीबन सभी संस्थापक सदस्य या तो खुद छोड़ गए या अपमानित कर बाहर कर दिए गए। राज्यसभा में संजय सिंह और राघव को छोड़कर बाकी जितने भी लोगों को भेजा गया वे पार्टी की छवि और सिद्धांतों के सर्वथा विपरीत है। दिल्ली का  किला ढह जाने के बाद पार्टी की चमक और धमक दोनों में कमी आ चुकी है। श्री केजरीवाल और श्री सिसौदिया भले ही अदालत में निर्दोष हो गए किंतु पुराना दबदबा लौटना संभव नहीं दिखता। ऐसे में राघव जैसे साफ - सुथरे और सुयोग्य नेता को किनारे करना पार्टी के लिए नुकसानदेह हो सकता है। भले ही वे जननेता न हों लेकिन पंजाब चुनाव की रणनीति बनाने में उनका अभाव खलेगा। और यदि वे भाजपा के साथ जुड़ गए तब ज्यादा नुकसान पहुंचा सकते हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 3 April 2026

मुस्लिमों के नाम कटने से ममता का आत्मविश्वास डगमगाया


प. बंगाल के बारे में चुनाव आयोग ने ऐसी टिप्पणी की होती तब ममता बैनर्जी उस पर चढ़ बैठतीं। लेकिन गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण  में लगे न्यायिक अधिकारियों को धमकाए जाने पर  ममता सरकार को कड़ी फटकार लगाई। शीर्ष अदालत के गुस्से का कारण दरअसल मालदा जिले की घटना है जिसमें मतदाता सूची से नाम कटने का विरोध कर रहे लोगों ने तीन महिला न्यायाधीशों सहित सात न्यायिक अधिकारियों को  घंटों बंधक बनाकर रखा। इस मामले पर स्वतः आपातकालीन सुनवाई के दौरान  मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपिन पंचोली की पीठ ने न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा में राज्य प्रशासन की विफलता पर गुस्सा जताते हुए घटना की जांच सीबीआई या एनआईए को सौंपने का निर्देश दिया। प्राप्त जानकारी के अनुसार जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक सहित वरिष्ठ राज्य अधिकारी  घटनास्थल पर अनुपस्थित थे जिसके कारण आधी रात के बाद अधिकारियों की रिहाई सुनिश्चित करने के लिए उच्च स्तर पर हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ी। पीठ ने न्यायिक अधिकारियों पर  पथराव सहित हिंसा के आरोप भी दर्ज किए । साथ ही चुनाव आयोग को उनकी सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों की तैनाती और उनके परिवारों को सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया। ये पहला अवसर नहीं है जब ममता राज में इस तरह की प्रायोजित अराजकता देखने मिली हो। सीबीआई और ईडी के बाद चुनाव आयोग को लेकर उनका रवैया ऐसा रहा मानो वे किसी शत्रु देश से आए हों। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण के काम में सहयोग करना तो दूर रहा उल्टे हरसंभव व्यवधान उत्पन्न करने का प्रयास मुख्यमंत्री के इशारे पर हुआ ये बात किसी से छिपी नहीं है। प. बंगाल के अलावा जिन चार राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं वहां भी मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की प्रक्रिया संचालित हुई । ऐसा नहीं है कि वहां उ विरोध न हुआ हो किंतु प. बंगाल में जिस तरह से उत्पात हुआ उससे लगता है ममता का आत्मविश्वास डगमगा रहा है। उनकी सरकार ने इसके विरोध में सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा तक खटखटाया। यहां तक कि खुद ही पैरवी करने खड़ी हो गईं परन्तु  दाल नहीं गली। सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाता सूचियों पर आपत्तियों का निराकरण न्यायिक अधिकारियों के निरीक्षण में करवाने का निर्णय सुनाकर ये संकेत दे दिया कि उसे राज्य सरकार पर भरोसा नहीं है। मालदा जिले में हुई उक्त घटना से साबित हो गया कि तृणमूल पार्टी मतदाता सूचियों के  पुनरीक्षण से कितनी घबराई हुई है।  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केंद्रीय एजेंसियों की तैनाती का निर्देश दिए जाने से इस  आशंका की पुष्टि हो गई कि राज्य सरकार स्थानीय पुलिस के जरिए चुनाव अपने पक्ष में करने में लगी हुई थी। हालांकि प्रत्येक प्रदेश में सत्तारूढ़ दल ऐसा करने में संकोच नहीं करता किंतु सुश्री बैनर्जी का अंदाज ऐसा है मानो प. बंगाल कोई अलग देश हो। संघीय ढांचे के अंतर्गत उनके राज्य को  भी संविधान प्रदत्त व्यवस्थाओं के अंतर्गत केंद्र सरकार के साथ तालमेल बनाकर चलना होता है। कुछ मामलों में राज्यों को स्वायत्तता है किंतु वे केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र को चुनौती नहीं दे सकते। ममता का राजनीतिक उदय वामपंथी सरकार के राज में व्याप्त अराजकता के विकल्प के रूप में हुआ था किंतु सत्ता संभालते ही तृणमूल कांग्रेस में भी वही असामाजिक तत्व घुस आए जो कभी सीपीएम में रहकर पूरे समाज को आतंकित किया करते थे। बीते 15 सालों में प. बंगाल में जिस तरह की अराजकता देखने मिली उसने वामपंथी राज को भी पीछे छोड़ दिया। मुसलमानों के तुष्टीकरण में भी ममता ने नए कीर्तिमान स्थापित करते हुए बांग्लादेशी घुसपैठियों को स्थायी रूप से बसने में मदद की । ये चुनाव उनके लिए जीवन - मरण का सवाल है क्योंकि सत्ता हाथ से निकलते ही तृणमूल कांग्रेस तिनके की तरह बिखर जाएगी। पार्टी का कोई वैचारिक आधार नहीं है। वे सत्ता से बाहर हो ही जाएंगी ये कहना जल्दबाजी होगी किंतु बात - बात पर आग बबूला हो जाने से उनकी हताशा परिलक्षित हो रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस जिस प्रकार प. बंगाल की अराजक स्थिति का संज्ञान लिया उसके कारण ममता की मुसीबतें और बढ़ गई हैं। दरअसल उनकी झल्लाहट का असली कारण मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं का नाम कट जाना है। चुनाव आयोग के विरुद्ध तो वे सड़कों पर मोर्चा खोलकर बैठ गईं थीं किंतु सवाल ये  है कि सर्वोच्च न्यायालय का विरोध वे किस मुंह से करेंगी?

- रवीन्द्र वाजपेयी



Thursday, 2 April 2026

नेताओं और नौकरशाहों के बच्चे भी सरकारी शालाओं में पढ़ें


म.प्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का ये दावा सुनकर सुखद एहसास हुआ कि प्रदेश में सरकारी शालाओं के प्रति आकर्षण बढ़ रहा हैं। उन्होंने गत दिवस नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत पर कहा कि निजी विद्यालयों की चकाचौंध को छोड़कर अभिभावक अपने नौनिहालों को सरकारी विद्यालय में दाखिला दिलवाने में रुचि ले रहे हैं जहां बेहतर परीक्षा परिणाम आने लगे। मुख्यमंत्री ने इस बात पर भी संतोष जताया कि पढ़ाई बीच में छोड़कर जाने (ड्रॉप आउट) विद्यार्थियों की संख्या में भी उल्लेखनीय कमी आई है। मुख्यमंत्री स्वयं सुशिक्षित हैं एवं पूर्ववर्ती शिवराज सिंह चौहान सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री रह चुके हैं। उनकी गिनती जमीन से जुड़े नेता के तौर पर होने से ये माना जा सकता है कि उन्हें जनसाधारण से जुड़ी बातों के बारे में समुचित जानकारी होगी। उन्होंने सरकारी शालाओं की छवि और स्तर में सुधार की बात छेड़कर उम्मीद की किरण जगा दी है। आज से चार - पांच दशक पहले के परिदृश्य की कल्पना करें तो समाज का बड़ा वर्ग अपने बच्चों को सरकारी शालाओं में पढ़ाता था। उन्हीं विद्यालयों से पढ़कर निकले छात्रों में से न जाने कितने आज देश - विदेश में अपनी प्रतिभा के बल पर महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान हैं। नेताओं की  जमात में भी सरकारी शालाओं में शिक्षित तमाम लोग हैं। लेकिन धीरे - धीरे हालात बदलते गए और जिस प्रकार से चिकित्सा के क्षेत्र में निजी अस्पतालों का दबदबा बढ़ा वैसा ही शिक्षा जगत में भी दिखने लगा। जहां तक बात उच्च शिक्षा की है  तो एक बार निजी संस्थानों की उपयोगिता समझ में भी आती है किंतु निजी क्षेत्र ने विद्यालय स्तर पर जिस प्रकार अपना फैलाव किया उससे सरकारी शालाओं की दशा  दयनीय होने लगी। ये स्थिति क्यों पैदा हुई इस पर लंबी बहस हो सकती है। वैसे  भी शिक्षा के क्षेत्र में सरकारों ने जितने प्रयोग आजादी के बाद किए वे किसी कीर्तिमान से कम नहीं हैं। शिक्षा नीति में भी समय - समय पर बदलाव किए जाते रहे किंतु कुछ अपवाद छोड़कर ज्यादातर सरकारी शालाएं दुर्दशा का शिकार होती चली गईं।  इसीलिए डॉ. यादव ने सरकारी विद्यालयों की तारीफ करते हुए जो चित्र प्रस्तुत किया यदि वह सही है तो ये बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इतने मात्र से संतुष्ट हो जाना ठीक नहीं होगा। मुख्यमंत्री यदि चाहते हैं कि शासकीय शालाओं की दशा सुधरे ताकि ज्यादा से ज्यादा अभिभावक निजी शालाओं के मोहजाल से मुक्त होकर अपने बच्चों को उनमें दाखिल करवाएं तब उनको अपने विधायकों , मंत्रियों और पार्टी के नेताओं के अलावा शासकीय अधिकारियों से ये अनुरोध करना चाहिए कि वे भी अपने बच्चों को निजी विद्यालयों के बजाय शासकीय शालाओं में पढ़ाएं। यदि उनमें से आधे भी इसके लिए राजी हो जाएं तब सरकारी विद्यालयों की  प्रतिष्ठा अपने आप बढ़ जाएगी। कुछ वर्ष पूर्व अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस आशय का आदेश भी पारित किया था कि सरकारी अधिकारियों की संतानें सरकारी शालाओं में पढ़ें। देश में अनेक प्रशासनिक अधिकारियों ने स्वेच्छा से ऐसा किया भी किंतु उनकी संख्या ऊँट के मुंह में जीरे समान ही है। ये देखते हुए यदि डॉ. यादव  नौकरशाहों , जनप्रतिनिधियों और पार्टी नेताओं को  इस बात के लिए प्रेरित करें कि वे शासकीय शाला में ही बच्चों को शिक्षा दिलवाएं तो इसका जबरदस्त असर पड़ेगा और  सरकारी शालाओं की तस्वीर और तकदीर दोनों में अकल्पनीय सुधार हो सकेगा। जाहिर है जिस संस्थान में विधायक, मंत्री और कलेक्टर - एस. पी के बच्चे पढ़ेंगे वहां की व्यवस्था और स्तर का अंदाज सहज रूप से लगाया जा सकता है। मुद्दे की बात ये है कि जब तक नेताओं और नौकरशाहों के बच्चे  सरकारी शालाओं में नहीं पढ़ेंगे तब तक वे निजी क्षेत्र की शिक्षा संस्थानों की तुलना में पिछड़े रहेंगे। सही  बात है कि जब शासन और प्रशासन में उच्च पदों पर बैठे महानुभावों को ही सरकारी शालाओं और  अस्पतालों पर भरोसा नहीं है तब जनता से अपेक्षा किस मुंह से की जाती है। बेहतर होगा जिस तरह मंत्री और अधिकारी अपनी संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करते हैं उसी तरह ये जानकारी भी सामने आनी  चाहिए कि उनके बच्चे किस संस्थान में पढ़ रहे हैं?


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 1 April 2026

कठिन चुनौतियों के बीच शुरू हो रहा वित्तीय वर्ष


आज से भारत में नया वित्तीय वर्ष प्रारंभ हो रहा है। बीते साल की तीन तिमाही में अच्छे प्रदर्शन से वार्षिक विकास दर 7 प्रतिशत रहने की उम्मीद व्यक्त  की गई थी। वहीं अगले वर्ष में उसके और उछलने का अनुमान था। हालांकि  डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा थोपे गए टैरिफ के कारण निर्यात पर बुरा असर पड़ा किंतु सरकार  वैकल्पिक बाजारों की तलाश कर उस दबाव को कम करने में कामयाब रही। इसीलिए जहां अनेक देशों के कदम लड़खड़ाने लगे वहीं भारत ने  मजबूती से  खड़े रहकर ब्रिटेन , यूरोपीय यूनियन , न्यूजीलैंड आदि से मुक्त व्यापार संधि कर अपने निर्यात को बहुमुखी बना दिया। सबसे बड़ी चतुराई ये रही कि ट्रम्प की बेसिरपैर की बातों में उलझने से बचते हुए उसकी काट निकालकर देशहित को सुरक्षित रखा गया। हालांकि  अनुमानित विकास दर का आंकड़ा थोड़ा नीचे आया किंतु  वैश्विक परिस्थितियों में उसे काफी अच्छा माना गया। लेकिन बीती 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल ने संयुक्त रूप से ईरान पर हमला बोल दिया। अमेरिका मान रहा था कि ईरान जल्द ही घुटने टेक देगा। पहले ही हमले में उसके सर्वोच्च शासक खामेनेई के अलावा कुछ दिग्गज सैन्य अधिकारियों के मारे जाने से ये लगा कि वहां सत्ता परिवर्तन करवाने की  उसकी योजना सफल हो जाएगी । लेकिन  पांसे उल्टे पड़ गए। ईरान ने आक्रमण ही सर्वोत्तम सुरक्षा है के सिद्धांत पर चलते हुए इजराइल पर तो मिसाइलें बरसाई हीं  उन तमाम पड़ोसी देशों पर भी हमले किए जहां अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं। यही नहीं अमेरिका के बेहद अत्यधिक शक्तिशाली कहे जाने वाले युद्धपोतों को निशाना बनाने से भी बाज नहीं आया। इसकी वजह से तेल उत्पादक देशों में उत्पादन थम गया।  उससे भी बड़ी समस्या तब उठ खड़ी हुई जब ईरान ने अपने कब्जे वाले होर्मुज़  नामक समुद्री रास्ते से आवाजाही रोक दी। जिससे सऊदी अरब , कतर , बहरीन , ओमान आदि से आने वाले  तेल और गैस के टैंकर फंस गए। नतीजा पूरी दुनिया में इन चीजों के संकट के रूप में सामने आया। इसका विपरीत प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा और बीते कारोबारी साल का उत्साहजनक वातावरण साल खत्म होते तक चिंताओं में बदल गया। पेट्रोल , डीजल और गैस के संकट ने न सिर्फ आम नागरिक के जनजीवन को झकझोर दिया बल्कि उद्योग  - व्यवसाय के सामने मुसीबतों के पहाड़ खड़े कर दिए।  हजारों कारखाने बंद हो गए। गैस की किल्लत से बड़े होटल, रेस्टोरेंट , ढाबे ही नहीं ठेले और खोमचे पर चाय सहित अन्य खाद्य सामग्री बेचने वालों तक का कारोबार ठप पड़ गया। शहरों से श्रमिकों के पलायन की खबरें आने लगीं। विदेशी पूंजी बड़ी मात्रा में वापस जाने से विदेशी मुद्रा  भंडार घटने लगा। ईरान  युद्ध के थमने की फिलहाल कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कल कह दिया कि ईरान की परमाणु क्षमता को नष्ट करने के साथ ही उसके तेल और गैस उत्पादन इकाइयों को नुकसान पहुंचाकर उसने तो अपना मकसद पूरा कर लिया। अब जिसे होर्मुज का उपयोग करना हो वह अपने स्तर पर प्रयास करे। दरअसल ट्रम्प इस बात पर उखड़ गए कि नाटो से जुड़े ज्यादातर यूरोपीय देशों ने अमेरिकी युद्धक विमानों को अपने आकाश से उड़ने की अनुमति नहीं दी। आज यू.ए.ई ने जरूर होर्मुज़ खुलवाने के लिए लड़ाई में शामिल होने की इच्छा जताई। सऊदी अरब भी अमेरिका से अनुरोध कर चुका है कि वह ईरान को घायल करके न छोड़े। इसके जवाब में ट्रम्प ने युद्ध का खर्च खाड़ी देशों से वसूलने का ऐलान कर दिया। कुल मिलाकर जंग अभी कुछ हफ्ते और जारी रहने की उम्मीद है। जिसके परिणाम लंबे समय तक दुनिया को भुगतने होंगे। भारत भी इससे अछूता नहीं रह सकता। विश्व व्यापार में उसकी जो मजबूत स्थिति बनती जा रही थी उस पर बुरा असर पड़ने से इंकार नहीं किया जा सकता। हालांकि युद्ध जल्दी रुक जाता है तब भारत को मध्यपूर्व में निर्माण गतिविधियों के जरिए अच्छा व्यवसाय मिलने की उम्मीद बढ़ जाएगी जैसा अफगानिस्तान में देखने मिला किंतु ईरान अपने यदि होर्मुज़  को लेकर अड़ियलपन दिखाता रहा तब तेल और गैस की कीमतों में उछाल को रोकना मुश्किल हो जाएगा जिसका असर  अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है। ये देखते हुए केंद्र सरकार को चाहिए वह अभी से संभावित संकट का सामना करने की रणनीति बनाकर ऐसे उपाय करे जिससे उद्योग - व्यापार में रुकावट न आए। साथ ही आम जनता को भी तकलीफ न हो। विश्वव्यापी संकट से भारत का बचे रहना तो नामुमकिन है किंतु समय रहते तैयारी कर ली जाए तो नुकसान को कम तो किया ही जा सकता है। नेतृत्व की परीक्षा भी ऐसे ही समय होती है। मोदी सरकार ने कोरोना संकट के समय जो कार्यकुशलता दिखाई वैसा ही कुछ करते हुए इस आपदा में भी अवसर तलाशने का कारनामा दिखाना चाहिए।


- रवीन्द्र वाजपेयी