Monday, 6 April 2026

केरलम में कांग्रेस की प्रतिष्ठा और वामपंथियों का अस्तित्व दांव पर


जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं उनमें केरलम ( केरल ) में कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों का भविष्य दांव पर लग गया है। दरअसल यही वह राज्य है जिसमें कांग्रेस को उम्मीद दिखाई दे रही है। हालांकि दावा तो वह असम जीतने का भी कर रही है किंतु तमाम सर्वेक्षणों में वहां भाजपा की  वापसी संभावित होने से केरलम में ही कांग्रेस के लिए गुंजाइश है। वहीं दस वर्षों से सत्ता पर विराजमान वामपंथी मोर्चे के सामने अपना इकलौता किला बचाने की चुनौती है। यद्यपि  पार्टी कैडर के अलावा विजयन सरकार की कल्याणकारी नीतियों का जनमानस पर सकारात्मक प्रभाव उसके पक्ष में हैं  लेकिन सत्ता विरोधी भावना भी  दिखाई दे रही है। ऐसा लगता है सरकार समर्थकों में वह उत्साह नहीं है जो जीत का आधार बनता है। अब  तक हिन्दू समुदाय जहां वामपंथियों का परंपरागत वोट बैंक रहा वहीं मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन के चलते कांग्रेस को मुसलमान मत  मिलते रहे। ऐसा ही ईसाई समुदाय के साथ देखा गया जिसे गांधी परिवार के रूप में अपना हितचिंतक महसूस होता है।  2011 की जनगणना के अनुसार, केरल में हिंदू आबादी लगभग 54.73%, मुस्लिम 26.56% और ईसाई 18.38% है। यहां हर पांच साल में सरकार बदलती थी किंतु 2021 में वामपंथी मोर्चे ने लगातार दूसरा चुनाव जीतकर चौंकाया जबकि उसके  बाद लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने बाजी मारी। हाल ही हुए स्थानीय निकाय चुनाव में भी सत्तारूढ़ मोर्चे का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। राजधानी तिरुवनंतपुरम में भाजपा का महापौर बनना उसके लिए खतरे की घंटी बन गया। हालांकि जो संकेत हैं उनके अनुसार एल डी.एफ नामक वामपंथी मोर्चे ने हिम्मत नहीं हारी है । चूंकि प. बंगाल में इस  बार भी  संभावना शून्य है ऐसे में केरलम की सत्ता वामपंथी पार्टियों के लिए जीवन मरण का प्रश्न बन गई है।  इस चुनाव में पराजित होने  पर केरलम में भी उनका हश्र प. बंगाल जैसा होना तय है क्योंकि उनके परम्परागत हिन्दू जनाधार अर्थात शहरी मध्यमवर्ग के अलावा महिलाओं में भाजपा तेजी से अपना प्रभाव कायम करती जा रही है। हालांकि इस बार भाजपा के कितने विधायक जीतेंगे ये कहना  कठिन है किंतु उसका मत प्रतिशत  जिस प्रकार बढ़ता जा रहा है उससे ये माना जा रहा है कि  यू. डी एफ और  एल. डी. एफ की जीत - हार में उसके द्वारा हासिल मतों की बड़ी भूमिका रहेगी। बीते कुछ चुनावों से भाजपा  तिरुवनंतपुरम सीट पर लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करती आई है किंतु इस चुनाव में उसकी उपस्थिति कमोबेश पूरे राज्य में होने से वह बड़ा उलटफेर करने की स्थिति में है। लव जिहाद के विरोध में उसके अभियान ने हिन्दू जनमानस के अलावा ईसाइयों को भी आकर्षित किया है। ये चर्चा भी सुनाई देने लगी है कि अनेक  सीटों पर मुस्लिमों के विरोध में हिंदुओं और ईसाइयों का ध्रुवीकरण एल.डी.एफ और यू.डी.एफ दोनों का खेल बिगाड़ेगा जिसका लाभ भाजपा को मिल सकता है।  अनेक विश्लेषकों का आकलन है कि केरलम में त्रिशंकु विधानसभा की भी स्थिति भी बन सकती है और तब संतुलन भाजपा के नियंत्रण में होगा किंतु उसके लिए दोनों गठबंधनों में से एक नाग नाथ तो दूसरा सांप नाथ है। वहीं कांग्रेस और वामपंथियों के लिए भाजपा से गठजोड़ असम्भव है। हालांकि अंतिम फैसला तो मतदाता ही करेंगे किंतु केरलम में वामपंथी जहां अस्तित्व बचाने लड़ रहे  हैं वहीं कांग्रेस के लिए ये प्रतिष्ठा का प्रश्न है क्योंकि लोकसभा चुनाव  के बाद हुए विधानसभा चुनावों में उसका प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। जम्मू - कश्मीर, हरियाणा, महाराष्ट्र,  झारखंड,दिल्ली और बिहार में उसकी स्थिति पहले से और कमजोर हो गई। इसके कारण जहां राहुल गांधी की क्षमता पर सवाल उठे वहीं इंडिया गठबंधन में निष्क्रिय होकर रह गया। यदि केरलम में इस बार भी सत्ता कांग्रेस के हाथ नहीं लगी तब राहुल के विरुद्ध पार्टी के भीतर भी बड़ा विद्रोह होना तय है। इसी तरह यदि सरकार गंवा बैठे तब बंगाल की खाड़ी के बाद अरब सागर में भी वामपंथी राजनीति का डूबना सुनिश्चित है। भाजपा के लिए केरलम एक अवसर साबित हो सकता है क्योंकि दोनों बड़े मोर्चे में जो भी हारेगा उसकी जगह भविष्य में वही लेगी ये साफ नजर आ रहा है। देश के सबसे सुशिक्षित इस राज्य के मतदाता सदैव सोच -  समझकर ही मतदान करते आए हैं। हालांकि इस बार उनके सामने भी जबरदस्त असमंजस है। साथ ही मध्यपूर्व में चल रहे युद्ध से भी चुनाव के समीकरण प्रभावित हो रहे हैं क्योंकि खाड़ी देशों में कार्यरत केरलम के लाखों लोग वहीं फंसे हुए हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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