प. बंगाल के बारे में चुनाव आयोग ने ऐसी टिप्पणी की होती तब ममता बैनर्जी उस पर चढ़ बैठतीं। लेकिन गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण में लगे न्यायिक अधिकारियों को धमकाए जाने पर ममता सरकार को कड़ी फटकार लगाई। शीर्ष अदालत के गुस्से का कारण दरअसल मालदा जिले की घटना है जिसमें मतदाता सूची से नाम कटने का विरोध कर रहे लोगों ने तीन महिला न्यायाधीशों सहित सात न्यायिक अधिकारियों को घंटों बंधक बनाकर रखा। इस मामले पर स्वतः आपातकालीन सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपिन पंचोली की पीठ ने न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा में राज्य प्रशासन की विफलता पर गुस्सा जताते हुए घटना की जांच सीबीआई या एनआईए को सौंपने का निर्देश दिया। प्राप्त जानकारी के अनुसार जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक सहित वरिष्ठ राज्य अधिकारी घटनास्थल पर अनुपस्थित थे जिसके कारण आधी रात के बाद अधिकारियों की रिहाई सुनिश्चित करने के लिए उच्च स्तर पर हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ी। पीठ ने न्यायिक अधिकारियों पर पथराव सहित हिंसा के आरोप भी दर्ज किए । साथ ही चुनाव आयोग को उनकी सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों की तैनाती और उनके परिवारों को सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया। ये पहला अवसर नहीं है जब ममता राज में इस तरह की प्रायोजित अराजकता देखने मिली हो। सीबीआई और ईडी के बाद चुनाव आयोग को लेकर उनका रवैया ऐसा रहा मानो वे किसी शत्रु देश से आए हों। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण के काम में सहयोग करना तो दूर रहा उल्टे हरसंभव व्यवधान उत्पन्न करने का प्रयास मुख्यमंत्री के इशारे पर हुआ ये बात किसी से छिपी नहीं है। प. बंगाल के अलावा जिन चार राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं वहां भी मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की प्रक्रिया संचालित हुई । ऐसा नहीं है कि वहां उ विरोध न हुआ हो किंतु प. बंगाल में जिस तरह से उत्पात हुआ उससे लगता है ममता का आत्मविश्वास डगमगा रहा है। उनकी सरकार ने इसके विरोध में सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा तक खटखटाया। यहां तक कि खुद ही पैरवी करने खड़ी हो गईं परन्तु दाल नहीं गली। सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाता सूचियों पर आपत्तियों का निराकरण न्यायिक अधिकारियों के निरीक्षण में करवाने का निर्णय सुनाकर ये संकेत दे दिया कि उसे राज्य सरकार पर भरोसा नहीं है। मालदा जिले में हुई उक्त घटना से साबित हो गया कि तृणमूल पार्टी मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण से कितनी घबराई हुई है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केंद्रीय एजेंसियों की तैनाती का निर्देश दिए जाने से इस आशंका की पुष्टि हो गई कि राज्य सरकार स्थानीय पुलिस के जरिए चुनाव अपने पक्ष में करने में लगी हुई थी। हालांकि प्रत्येक प्रदेश में सत्तारूढ़ दल ऐसा करने में संकोच नहीं करता किंतु सुश्री बैनर्जी का अंदाज ऐसा है मानो प. बंगाल कोई अलग देश हो। संघीय ढांचे के अंतर्गत उनके राज्य को भी संविधान प्रदत्त व्यवस्थाओं के अंतर्गत केंद्र सरकार के साथ तालमेल बनाकर चलना होता है। कुछ मामलों में राज्यों को स्वायत्तता है किंतु वे केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र को चुनौती नहीं दे सकते। ममता का राजनीतिक उदय वामपंथी सरकार के राज में व्याप्त अराजकता के विकल्प के रूप में हुआ था किंतु सत्ता संभालते ही तृणमूल कांग्रेस में भी वही असामाजिक तत्व घुस आए जो कभी सीपीएम में रहकर पूरे समाज को आतंकित किया करते थे। बीते 15 सालों में प. बंगाल में जिस तरह की अराजकता देखने मिली उसने वामपंथी राज को भी पीछे छोड़ दिया। मुसलमानों के तुष्टीकरण में भी ममता ने नए कीर्तिमान स्थापित करते हुए बांग्लादेशी घुसपैठियों को स्थायी रूप से बसने में मदद की । ये चुनाव उनके लिए जीवन - मरण का सवाल है क्योंकि सत्ता हाथ से निकलते ही तृणमूल कांग्रेस तिनके की तरह बिखर जाएगी। पार्टी का कोई वैचारिक आधार नहीं है। वे सत्ता से बाहर हो ही जाएंगी ये कहना जल्दबाजी होगी किंतु बात - बात पर आग बबूला हो जाने से उनकी हताशा परिलक्षित हो रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस जिस प्रकार प. बंगाल की अराजक स्थिति का संज्ञान लिया उसके कारण ममता की मुसीबतें और बढ़ गई हैं। दरअसल उनकी झल्लाहट का असली कारण मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं का नाम कट जाना है। चुनाव आयोग के विरुद्ध तो वे सड़कों पर मोर्चा खोलकर बैठ गईं थीं किंतु सवाल ये है कि सर्वोच्च न्यायालय का विरोध वे किस मुंह से करेंगी?
- रवीन्द्र वाजपेयी
Friday, 3 April 2026
मुस्लिमों के नाम कटने से ममता का आत्मविश्वास डगमगाया
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