म.प्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का ये दावा सुनकर सुखद एहसास हुआ कि प्रदेश में सरकारी शालाओं के प्रति आकर्षण बढ़ रहा हैं। उन्होंने गत दिवस नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत पर कहा कि निजी विद्यालयों की चकाचौंध को छोड़कर अभिभावक अपने नौनिहालों को सरकारी विद्यालय में दाखिला दिलवाने में रुचि ले रहे हैं जहां बेहतर परीक्षा परिणाम आने लगे। मुख्यमंत्री ने इस बात पर भी संतोष जताया कि पढ़ाई बीच में छोड़कर जाने (ड्रॉप आउट) विद्यार्थियों की संख्या में भी उल्लेखनीय कमी आई है। मुख्यमंत्री स्वयं सुशिक्षित हैं एवं पूर्ववर्ती शिवराज सिंह चौहान सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री रह चुके हैं। उनकी गिनती जमीन से जुड़े नेता के तौर पर होने से ये माना जा सकता है कि उन्हें जनसाधारण से जुड़ी बातों के बारे में समुचित जानकारी होगी। उन्होंने सरकारी शालाओं की छवि और स्तर में सुधार की बात छेड़कर उम्मीद की किरण जगा दी है। आज से चार - पांच दशक पहले के परिदृश्य की कल्पना करें तो समाज का बड़ा वर्ग अपने बच्चों को सरकारी शालाओं में पढ़ाता था। उन्हीं विद्यालयों से पढ़कर निकले छात्रों में से न जाने कितने आज देश - विदेश में अपनी प्रतिभा के बल पर महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान हैं। नेताओं की जमात में भी सरकारी शालाओं में शिक्षित तमाम लोग हैं। लेकिन धीरे - धीरे हालात बदलते गए और जिस प्रकार से चिकित्सा के क्षेत्र में निजी अस्पतालों का दबदबा बढ़ा वैसा ही शिक्षा जगत में भी दिखने लगा। जहां तक बात उच्च शिक्षा की है तो एक बार निजी संस्थानों की उपयोगिता समझ में भी आती है किंतु निजी क्षेत्र ने विद्यालय स्तर पर जिस प्रकार अपना फैलाव किया उससे सरकारी शालाओं की दशा दयनीय होने लगी। ये स्थिति क्यों पैदा हुई इस पर लंबी बहस हो सकती है। वैसे भी शिक्षा के क्षेत्र में सरकारों ने जितने प्रयोग आजादी के बाद किए वे किसी कीर्तिमान से कम नहीं हैं। शिक्षा नीति में भी समय - समय पर बदलाव किए जाते रहे किंतु कुछ अपवाद छोड़कर ज्यादातर सरकारी शालाएं दुर्दशा का शिकार होती चली गईं। इसीलिए डॉ. यादव ने सरकारी विद्यालयों की तारीफ करते हुए जो चित्र प्रस्तुत किया यदि वह सही है तो ये बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इतने मात्र से संतुष्ट हो जाना ठीक नहीं होगा। मुख्यमंत्री यदि चाहते हैं कि शासकीय शालाओं की दशा सुधरे ताकि ज्यादा से ज्यादा अभिभावक निजी शालाओं के मोहजाल से मुक्त होकर अपने बच्चों को उनमें दाखिल करवाएं तब उनको अपने विधायकों , मंत्रियों और पार्टी के नेताओं के अलावा शासकीय अधिकारियों से ये अनुरोध करना चाहिए कि वे भी अपने बच्चों को निजी विद्यालयों के बजाय शासकीय शालाओं में पढ़ाएं। यदि उनमें से आधे भी इसके लिए राजी हो जाएं तब सरकारी विद्यालयों की प्रतिष्ठा अपने आप बढ़ जाएगी। कुछ वर्ष पूर्व अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस आशय का आदेश भी पारित किया था कि सरकारी अधिकारियों की संतानें सरकारी शालाओं में पढ़ें। देश में अनेक प्रशासनिक अधिकारियों ने स्वेच्छा से ऐसा किया भी किंतु उनकी संख्या ऊँट के मुंह में जीरे समान ही है। ये देखते हुए यदि डॉ. यादव नौकरशाहों , जनप्रतिनिधियों और पार्टी नेताओं को इस बात के लिए प्रेरित करें कि वे शासकीय शाला में ही बच्चों को शिक्षा दिलवाएं तो इसका जबरदस्त असर पड़ेगा और सरकारी शालाओं की तस्वीर और तकदीर दोनों में अकल्पनीय सुधार हो सकेगा। जाहिर है जिस संस्थान में विधायक, मंत्री और कलेक्टर - एस. पी के बच्चे पढ़ेंगे वहां की व्यवस्था और स्तर का अंदाज सहज रूप से लगाया जा सकता है। मुद्दे की बात ये है कि जब तक नेताओं और नौकरशाहों के बच्चे सरकारी शालाओं में नहीं पढ़ेंगे तब तक वे निजी क्षेत्र की शिक्षा संस्थानों की तुलना में पिछड़े रहेंगे। सही बात है कि जब शासन और प्रशासन में उच्च पदों पर बैठे महानुभावों को ही सरकारी शालाओं और अस्पतालों पर भरोसा नहीं है तब जनता से अपेक्षा किस मुंह से की जाती है। बेहतर होगा जिस तरह मंत्री और अधिकारी अपनी संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करते हैं उसी तरह ये जानकारी भी सामने आनी चाहिए कि उनके बच्चे किस संस्थान में पढ़ रहे हैं?
- रवीन्द्र वाजपेयी
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