Tuesday, 7 April 2026

तमिलनाडु में राष्ट्रवादी भावना चुनाव पर असर डाल रही


तमिलनाडु से आ रहे रुझान सत्ता परिवर्तन का संकेत दे रहे हैं। सत्तारूढ़ द्रमुक का कांग्रेस के साथ गठबंधन है। वहीं उसकी प्रमुख प्रतिद्वंदी अन्ना द्रमुक ने  भाजपा को अपने साथ जोड़कर मुकाबले को नजदीकी बना दिया है। लेकिन अभिनेता विजय की नवोदित पार्टी तमिझगा वेत्री कझगम के तीसरी ताकत के तौर पर कूदने से त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति भी बन रही है।  शुरुआती आकलन था कि विजय सत्ता विरोधी मतों में सेंध लगाकर अन्ना द्रमुक गठबंधन अर्थात एन.डी.ए का नुकसान करेंगे किंतु ज्यों - ज्यों मतदान की तारीख करीब आ रही है त्यों - त्यों ये लगने लगा है कि तमिल फिल्मों का ये लोकप्रिय अभिनेता सत्ता पक्ष को भी बराबरी से नुकसान पहुंचा रहा है। स्मरणीय है तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी दुनिया का जबरदस्त प्रभाव रहा है। यद्यपि जयललिता और करुणानिधि के निधन के बाद से इसमें कमी आई। लेकिन विजय ने नई पार्टी के  जरिए हाथ आजमाकर उस दौर को पुनर्जीवित कर दिया। वैसे तो आज की तमिल फिल्मों में विजय बड़ा नाम है किंतु उनके साथ वह वैचारिक ताकत नहीं है जिसके बल पर अन्ना दोरई, एम. जी. रामचंद्रन , करुणानिधि और जयललिता ने लंबे समय तक  दबदबा बनाए रखा। लोकप्रिय अभिनेता कमल हासन ने भी राजनीति में हाथ आजमाया लेकिन फिल्मी सफलता को वे सियासत में नहीं दोहरा सके। कुछ लोगों का मानना है कि युवा पीढ़ी द्रविड़ पार्टियों की संकुचित सोच वाली राजनीति से अलग हटकर व्यापक  दृष्टिकोण से प्रेरित हो रही है। और इसी पर अभिनेता विजय की उम्मीदें टिकी हैं। यद्यपि उनको लेकर  चुनावी पंडित बहुत ज्यादा आश्वस्त नहीं हैं किंतु  अनेक सीटें हैं जिनमें उनके उम्मीदवार दोनों बड़े गठबंधनों में से किसी एक का खेल जरूर बिगाड़ेंगे। यही सोचकर भाजपा ने उन्हें अपने पाले में खींचना चाहा किंतु सफलता नहीं मिली। इसके बाद आए सर्वेक्षणों में अन्ना द्रमुक - भाजपा गठबंधन को सत्ताधारी द्रमुक - कांग्रेस गठजोड़ पर निर्णायक बढ़त दिखाए जाने से  लगने लगा है कि सत्ता विरोधी रुझान मुख्यमंत्री स्टालिन को नुकसान पहुंचा रहा है वहीं अभिनेता विजय की  मौजूदगी भी द्रमुक के जनाधार को  कमजोर करने में कामयाब हो रही है। यदि स्टालिन सत्ता से हाथ धो बैठते हैं तो उसका एक कारण तमिलनाडु की राजनीति में आ रहे हिंदुत्व का उभार भी होगा। उनके मंत्री पुत्र उदयनिधि ने सनातन धर्म की तुलना कोरोना और डेंगू से करते हुए उसे खत्म करने वाला जो बयान दिया था उसकी सवर्ण वर्ग में रोष पूर्ण प्रतिक्रिया हुई थी। हालांकि भाजपा  बड़ी सफलता हासिल कर पाएगी ये कहना कठिन है किंतु मुख्यमंत्री के बेटे के सनातन विरोधी बयान से हिंदुत्व की जो भावना जोर पकड़ने लगी उसका लाभ भाजपा के साथ ही अन्ना द्रमुक को भी मिलता लग रहा है। यदि ये आकलन धरातल पर उतरा और स्टालिन को सत्ता से हाथ धोना पड़ा तब तमिलनाडु की राजनीति में क्रांतिकारी परिवर्तन की शुरुआत होना तय है। हालांकि अन्ना द्रमुक भी निकली तो द्रविड़ राजनीति की कोख से ही है किंतु जयललिता के दौर से ही उसमें हिंदुत्व का पुट आने लगा था। संघीय ढांचे का हिस्सा होने के बावजूद हिन्दी  और उत्तर भारत के विरोध का राग अलापकर तमिलनाडु को मुख्य धारा से अलग रखने वाली सियासत के समानांतर अब राष्ट्रवादी भावना का असर इस चुनाव में नजर आ रहा है। यदि मतदान के दिन तक ये जारी रहा तब सत्ता परिवर्तन की संभावना वास्तविकता में बदलना तय है। स्टालिन इस बात को समझ गए हैं इसीलिए इन दिनों उनके बयानों में वैसा तीखापन नहीं है जैसा प. बंगाल में ममता बैनर्जी की टिप्पणियों में दिखाई देता है। कुल मिलाकर तमिलनाडु का ये चुनाव कई अर्थों में असाधारण है क्योंकि पहली बार है जब भाजपा को विश्लेषक गंभीरता से ले रहे हैं। तमिलनाडु की राजनीति के जानकार ये कहने में भी संकोच नहीं कर रहे कि यदि जनादेश मौजूदा  राज्य सरकार के विरुद्ध आया तब   स्व.करुणानिधि के विशाल परिवार में  उत्तराधिकार की लड़ाई नए सिरे से शुरू होगी जिसके कारण स्टालिन का भविष्य अंधकारमय हो सकता है। गौरतलब है अन्ना द्रमुक के पास भी जयललिता जैसा कोई नेता नहीं होने से भाजपा इस शून्य को भरने में कामयाब हो सकती है क्योंकि उसके उत्तर भारत की पार्टी होने की अवधारणा धीरे - धीरे कमजोर पड़ने लगी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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