कल सुबह के अखबारों में पहले पन्ने पर डोनाल्ड ट्रम्प की वह धमकी छाई हुई थी जिसमें उन्होंने एक सभ्यता को खत्म करने की बात कही थी। ईरान को पाषाण युग में भेजने की धमकी वे पहले ही दे चुके थे। लेकिन ये सच होने के पहले ही खबर आ गई कि अमेरिका और ईरान के बीच 15 दिन के लिए युद्धविराम पर सहमति बन गई। इसके लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिफ मुनीर को श्रेय देते हुए ट्रम्प ने कहा कि उन्हीं के आग्रह पर जंग रोकी जा रही है। आगे की वार्ता 10 अप्रैल से इस्लामाबाद में होना सुनिश्चित हुआ। युद्धविराम के फैसले को ईरान अपनी जीत मानकर उछलने लगा वहीं अमेरिका के रक्षा मंत्री का दावा है कि ईरान इसके लिए गिड़गिड़ाया था। युद्ध रोकने के अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने पर सहमति की बात भी सामने आई। जिससे पूरी दुनिया ने राहत महसूस की। लेकिन हमारे देश में एक वर्ग विशेष सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए पाकिस्तान के प्रशस्तिगान में जुट गया। मोदी सरकार की विदेश नीति को विफल बताने के साथ ही पाकिस्तान को कूटनीतिक तौर पर मिले महत्व की प्रशंसा की जाने लगी। ईरान को विजेता के तौर पर इस तरह पेश किया जाने लगा मानो उसने अमेरिका और इजराइल से आत्मसमर्पण करवा लिया हो। लेकिन शाम होते तक युद्धविराम की धज्जियां उड़ने लगीं। इजराइल ने लेबनान में हिजबुल्ला के ठिकानों पर जबरदस्त हमले किए जिनमें 250 से ज्यादा लोग मारे गए। इधर ईरान और खाड़ी देशों में मिसाइलों का आदान - प्रदान होने लगा। वैसे भी सऊदी अरब , बहरीन और यू.ए.ई आदि युद्धविराम के पक्षधर नहीं थे। उनका अमेरिका से कहना था कि ईरान को घुटनाटेक करवाकर ही छोड़ें जिससे वह दोबारा क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बिगाड़ने का दुस्साहस न कर सके। इधर ईरान ने लेबनान में इजराइली हमलों पर ऐतराज जताया तो इजराइल और अमेरिका दोनों ने दो टूक जवाब दिया कि लेबनान में हिजबुल्ला के अड्डे होने से वहां युद्धविराम नहीं है। इससे नाराज ईरान ने होर्मुज से आवाजाही रोकने का ऐलान कर तेल और गैस संकट में राहत मिलने की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। जिस पर ट्रम्प दोबारा बमबारी शुरू करने की धमकी दे रहे हैं।ईरान ने ये आरोप भी लगाया कि उसके परमाणु कार्यक्रम संबंधी जो आश्वासन दिया गया उससे भी अमेरिका मुकर रहा है। ऐसे में युद्धविराम संबंधी बातचीत निरर्थक है। ताजा समाचारों के लेबनान पर हमले को लेकर अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे .डी वेंस और शहबाज शरीफ के बीच भी मतभेद सामने आने लगे हैं। शरीफ के अनुसार लेबनान को भी युद्धविराम में शामिल किया गया था जबकि वेंस का दावा है कि ऐसा नहीं था। उल्लेखनीय है वेंस इस्लामाबाद की बातचीत में अमेरिका का प्रतिनिधित्व करेंगे। आज तेहरान में एक वरिष्ट नेता ने स्पष्ट कहा कि जंग और युद्धविराम एक साथ नहीं चल सकते। साथ ही अमेरिका पर आरोप लगाया कि उसने युद्धविराम की तीन शर्तों का उल्लंघन किया है। इस बातचीत में चूंकि इज़राइल के अलावा युद्ध में शामिल अन्य देशों की उपस्थिति नहीं होगी लिहाजा उसके किसी निष्कर्ष पर पहुंचने पर संदेह के बादल मंडराने लगे हैं। इसीलिए कल दिन में अपनी कूटनीतिक सफलता पर इतराने वाला पाकिस्तान शाम से तनाव में नजर आने लगा। ईरान और अमेरिका दोनों एक दूसरे पर युद्धविराम की शर्तों से मुकरने का आरोप लगा रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान की स्थिति नमाज पढ़ने गए थे किंतु रोजे गले पड़ गए वाली होती जा रही है। ये कहना गलत नहीं होगा कि अमेरिका भले ही युद्ध से पिंड छुड़ाना चाह रहा हो किंतु इजराइल को उसे अंजाम तक पहुंचाए बिना रोक देना शायद ही गवारा होगा। लेबनान पर उसके हमले इसका प्रमाण हैं। इसके अलावा सऊदी अरब सहितखाड़ी के अन्य देश भी ईरान को अधमरा छोड़ने सहमत नहीं हैं। ऐसे में कल होने वाली बातचीत में इस समस्या का हल निकलने की उम्मीद बेहद क्षीण है। और यदि युद्धविराम विफल हुआ तब सबसे ज्यादा फ़जीहत होगी पाकिस्तान की जो अमेरिका और ईरान दोनों से गालियां खाएगा। ईरान द्वारा होर्मुज़ से गुजरने वाले जहाजों से एक डॉलर प्रति बैरल वसूलने के साथ ही उसका भुगतान चीनी मुद्रा युआन में लिए जाने की खबर ने भी डोनाल्ड ट्रम्प को सशंकित कर दिया है। निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि भारत ने दो साड़ों की लड़ाई से खुद को दूर रखने का निर्णय लेकर जो परिपक्वता दिखाई उसके दूरगामी फायदे होंगे। अमेरिका को छोड़ दें तो ईरान , इजराइल , यू.ए.ई, सऊदी अरब, ओमान , बहरीन और कतर से हमारा संवाद लगातार कायम बना रहा। इसी का परिणाम है कि ईरान ने होर्मुज जिन देशों के लिए खोला उनमें भारत भी है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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