Friday, 10 April 2026

भारी मतदान लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत


गत  दिवस असम , केरलम और पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव  में भारी मतदान  लोकतंत्र की जड़ों के गहरे होने का ज्वलंत प्रमाण है। असम में  परिसीमन के  कारण अनेक सीटों का नक्शा बदल गया था। घुसपैठियों के मुद्दे को भाजपा ने जोरदारी से उठाया जिसका असर हिन्दू मतदाताओं पर स्पष्ट दिखाई दिया। वहीं मुस्लिम समुदाय ने भी बड़े पैमाने पर मतदान कर  राजनीतिक जागरूकता दिखाई । यहां आदिवासी आबादी भी काफी है और अलगाववादी ताकतें भी सक्रिय रही हैं।  बीते कुछ दशकों में बांग्लादेशी घुसपैठियों के कारण जनसंख्या संतुलन बिगड़ने के  साथ ही जमीन पर अवैध कब्जों के कारण संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो रही थी। हालांकि हिमंता बिस्व सर्मा सरकार की सख्ती से हालात नियंत्रण में रहे।  अभी तक जितने भी चुनाव पूर्व सर्वेक्षण हुए सभी ने हिमंता सरकार की वापसी का अनुमान लगाया है। यद्यपि मुस्लिम मतदाताओं ने गोलबंद होकर कांग्रेस को समर्थन दिया हो तब भाजपा का खेल बिगड़ सकता है। हालांकि इसकी आशंका बहुत कम है किंतु आज का मतदाता बहुत चतुर है इसीलिए  अप्रत्याशित परिणाम भी देखने मिलते हैं। दूसरा राज्य केरलम है जिसे देश  के सर्वाधिक शिक्षित प्रदेश होने का सम्मान प्राप्त है। वहां भी जबरदस्त मतदान ने चुनाव को रोचक बना दिया। एल.डी.एफ नामक वामपंथी मोर्चे की सरकार बीते 10 साल से चली आ रही है। 2021 में हर चुनाव में सत्ता बदलने की परंपरा टूट गई थी किंतु इस बार कांग्रेस की अगुआई वाला यू.डी.एफ काफी आशान्वित है। वामपंथी मुख्यमंत्री विजयन की अधिक उम्र के कारण युवा मतदाता भावनात्मक तौर पर सरकार से जुड़ नहीं पा रहा। हालांकि महिलाओं में उनकी लाभार्थी योजनाओं का प्रभाव है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी यहां की वायनाड सीट से  सांसद चुने गए थे लेकिन रायबरेली से भी जीतने के बाद उन्होंने वायनाड छोड़ दिया।  और उनके स्थान पर प्रियंका वाड्रा लोकसभा सदस्य निर्वाचित हो गईं। हालांकि इस बार वे असम में कांग्रेस का चुनाव संचालित करती रहीं किंतु श्री गांधी ने केरलम में काफी समय दिया। इसके अलावा कांग्रेस ने प.बंगाल में वामपंथियों से अलग होकर चुनाव लड़ने का फैसला करते हुए केरलम की जनता को ये एहसास कराने का प्रयास किया कि वह वामपंथियों के साथ नहीं है। केरल अपनी राजनीतिक जागरूकता के लिए प्रसिद्ध है । यहां की आबादी में मुस्लिम और ईसाई समुदाय की हिस्सेदारी भी प्रभावशाली है। अभी तक माना जाता रहा कि हिन्दू समाज का बड़ा हिस्सा एल.डी.एफ के साथ  था जबकि  अल्पसंख्यक समुदाय कांग्रेस का समर्थन करते आए हैं। लेकिन भाजपा के उदय के बाद से समीकरण बदलते लग रहे हैं। हिन्दू मतदाताओं में भाजपा ने भी अपनी पैठ बना ली है जिससे वामपंथी मोर्चे को खतरा महसूस हो रहा है। लेकिन लव जिहाद से पीड़ित ईसाई समुदाय द्वारा कांग्रेस से छिटककर भाजपा के करीब आने के संकेत दिए जाने से स्थिति जटिल हो गई है। कांग्रेस को सर्वेक्षणों में मिली बढ़त 10 सीटों से अधिक नहीं है। इसीलिए मतदान का भारी प्रतिशत देखकर उसे भी चिंता सताने लगी हैं।  विश्लेषक भी केरल में नजदीकी मुकाबला मानकर चल रहे हैं वहीं भाजपा को मिलने वाली सीटें  अंदाजन अधिकतम 5 ही हैं। लेकिन इस चुनाव में जो भी उलटफेर होगा उसमें भाजपा की निर्णायक भूमिका रहेगी। तीसरा राज्य जहां कल मतदान हुआ वह केंद्र शासित पुडुचेरी है। इसका आकार किसी महानगर से भी छोटा है लेकिन वहां के मतदाताओं ने भी अभूतपूर्व उत्साह दिखाकर लोकतंत्र में अपनी आस्था प्रदर्शित की। सबसे संतोषजनक बात ये रही कि इक्का - दुक्का मामूली घटनाओं को छोड़कर मतदान सभी जगह शांतिपूर्ण रहा। बीते कुछ समय से विपक्ष के आरोप झेल रहे चुनाव आयोग ने एक ही दिन में तीन राज्यों के चुनाव सुव्यवस्थित ढंग से सम्पन्न करवाकर अपनी क्षमता साबित कर दी । यद्यपि उसकी असली परीक्षा प. बंगाल और तमिलनाडु में होगी जो अपेक्षाकृत बड़े  भी हैं। विशेष रूप से प. बंगाल में जहां मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण के  विरोध में मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने आसमान सिर पर उठा रखा है। लगभग 91 लाख मतदाता कम होने से वहां के परिणामों को लेकर उत्सुकता बढ़ गई है। तीन चुनाव जीत चुकी ममता चौका मारती हैं या नहीं ये भाजपा के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा जो इस बार उत्साह से भरी हुई है। तमिलनाडु में मुकाबला द्रविड़ संस्कृति वाली द्रमुक और अन्ना द्रमुक के बीच है। कांग्रेस पहले और भाजपा दूसरे के साथ हैं। यहां भी इस बार काफी कशमकश है। कल तीन राज्यों में हुए मतदान के बाद ये उम्मीद बढ़ गई है कि प. बंगाल और तमिलनाडु के मतदाता भी लोकतंत्र के महोत्सव में उत्साहपूर्वक भाग लेंगे। पूरी दुनिया जहां युद्ध की विभीषिका से अशांत है वहीं भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रिया शान्ति से संचालित होना ठंडी हवा के झोंके जैसा है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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