ऐसा लगता है ईरान अपने बनाए चक्रव्यूह में खुद ही उलझ गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर वह सोच रहा था कि पूरी दुनिया उसके सामने नतमस्तक हो जाएगी किंतु अमेरिका ने जवाबी नाकेबंदी करते हुए उसकी अकड़ निकाल दी। इसकी वजह से दूसरे देशों के जहाजों की आवाजाही तो रुकी ही किंतु ईरान के अपने तेल की बिक्री भी ठप हो गई। इसके कारण उसकी भंडारण क्षमता जवाब देने लगी। यदि वह उत्पादन रोकता है तो तेल के कुओं में समुद्री जल भरने का खतरा है वहीं उत्पादन जारी रखने के बाद भी चूंकि उस तेल का विक्रय नहीं हो पा रहा इसलिए उसे सुरक्षित रखना मुश्किल है। होर्मुज के रास्ते से निकलने वाले जहाजों से टोल वसूलने की उसकी योजना भी अमेरिका द्वारा की गई नाकेबंदी से टांय - टांय फुस्स होकर रह गई। डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा युद्धविराम को आगे बढ़ाए जाने पर ईरान को लगा कि अमेरिका लड़ाई जारी रखने से डर रहा है। लेकिन ट्रम्प ने इधर ईरान को बातचीत में उलझाकर रखा और उधर होर्मुज को घेरकर ईरान की आर्थिक रीढ़ पर प्रहार कर दिया। इस्लामाबाद में पहले दौर की बातचीत बेनतीजा खत्म होने के बाद ऐसा लगा था कि जंग दोबारा शुरू हो जाएगी किंतु अमेरिका ने बजाय सीधे लड़ने के दूसरे तरह का मोर्चा खोलकर ईरान को फंसा दिया। अगले दौर की शांति वार्ता में जिस तरह से रुकावटें आईं उनसे ईरान का राष्ट्रीय नेतृत्व भी परेशान है। उसके द्वारा रखी जाने वाली शर्तें अमेरिका द्वारा सिरे से खारिज की जा रही हैं। इस लड़ाई में बाकी अरब देशों पर हमले कर ईरान ने पड़ोस में रिश्ते इस कदर खराब कर लिए कि कोई उसकी मदद को सामने नहीं आ रहा। गत दिवस उसके विदेश मंत्री भागे - भागे रूस जाकर राष्ट्रपति पुतिन से मिले और लौटकर बयान दे दिया कि अमेरिका उसे परमाणु कार्यक्रम जारी रखने की अनुमति दे तो वह होर्मुज खोलने राजी है। लेकिन ट्रम्प समझ गए कि ईरान की नस दबी हुई है इसीलिए उन्होंने न सिर्फ उसके प्रस्ताव को ठुकरा दिया बल्कि जल्द ही उसकी तेल लाइनों पर हमले की धमकी दे डाली। इस सबसे एक बात तो स्पष्ट है कि ईरान के पास अब सौदेबाजी के लिए केवल होर्मुज बच रहा है। यदि अमेरिका ने उसकी अन्य शर्तों को नहीं माना तब उसके पास इस समुद्री मार्ग को खोलने के सिवाय दूसरा कोई रास्ता नहीं बचेगा । दरअसल अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के बाद चीन ही ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीददार रहा है। उसके बदले वह ईरान को हथियारों की आपूर्ति करता रहा है। इसमें दो राय नहीं है कि अमेरिका और इजराइल ने जिस इरादे से ईरान पर हमले किए थे वे इस हद तक ही पूरे हुए कि वह लंबी लड़ाई लड़ने लायक नहीं बचा। पूरे देश में जो बर्बादी हुई उससे उबरने में भी बहुत लंबा समय और संसाधन लगेंगे। लेकिन तेहरान में सत्ता पलट की जो उम्मीद ट्रम्प और इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने लगा रखी थी उसके पूरे होने के आसार भी नजर नहीं आ रहे। वहीं ये भी सच है कि ईरान ने चीन और रूस के बहकावे में आकर पलटवार करने का दुस्साहस तो कर दिया किन्तु वे दोनों दूर से तमाशा देखते रहे और ईरान पिटता रहा। आज की स्थिति में यदि अमेरिका और इजराइल दोबारा जंग शुरू करने से बचना चाह रहे हैं तो ईरान भी आगे लड़ पाने में सक्षम नहीं है। इसीलिए वह रोजाना नए - नए शांति प्रस्ताव देकर बचाव का रास्ता खोज रहा है। गत दिवस ईरानी विदेश मंत्री और पुतिन की मुलाकात के बाद ईरान ने परमाणु कार्यक्रम जारी रखे जाने के एवज में होर्मुज खोलने का प्रस्ताव रखा जिसे अमेरिका ने ठुकरा दिया। शांति वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर ईरान भी अब सतर्क हो गया है। उसके एक नेता ने पाकिस्तान की ईमानदारी पर संदेह भी जताया है। आज की स्थिति में ईरान के लिए यही श्रेयस्कर होगा कि वह मामूली शर्तों के साथ होर्मुज खोल दे। इससे उसकी अर्थव्यवस्था को भी सहारा मिलेगा वहीं उसे अन्य देशों की सहानुभूति भी प्राप्त हो सकेगी। उसे ये समझ लेना चाहिए कि वह न तो आर्थिक तौर पर पहले जैसा संपन्न है और न ही उसकी सैन्य क्षमता बड़ा मुकाबला करने लायक बची है। परिस्थितियों का तकाजा है कि वह इस संकट को किसी तरह टल जाने दे। उसे किसी रणनीतिकार की ये सलाह स्मरण रखनी चाहिए कि बहादुरी का सबसे बेहतर तरीका होशियारी है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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