प. बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान तृणमूल सांसद और ममता बैनर्जी के भतीजे अभिषेक बैनर्जी ने गृहमंत्री अमित शाह को चुनौती दी थी कि हिम्मत है तो 4 मई को कोलकाता आकर दिखाएं, तब देख लेंगे। कुछ साल पहले भाजपा के पूर्व अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा पर प. बंगाल में हुए हमले पर उन्होंने कहा था कि वह जनता के आक्रोश का परिणाम था। इसी तरह उन्होंने चुनाव बाद एक भाजपा उम्मीदवार को गर्दन पकड़कर मछली बाजार ले जाकर उनसे मछली बिकवाने जैसी धमकी दी थी। अभिषेक को लेकर चर्चा थी कि सुश्री बैनर्जी विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री का चेहरा बनकर केंद्रीय राजनीति में चली जाएंगी और प. बंगाल की सत्ता पर वे आसीन होंगे। यही वजह थी कि तृणमूल के ज्यादातर सांसद और विधायक ही नहीं बल्कि पार्टी कार्यकर्ता भी उनके करीबी बने रहने का प्रयास करते थे।लेकिन चुनाव परिणाम आते ही सब उलट - पुलट हो गया। सुश्री बैनर्जी भवानीपुर नामक अपनी सीट पर खुद ही हार गईं। संयोगवश 2021 में नंदीग्राम और इस बार भवानीपुर से उन्हें हराने वाले सुवेंदु अधिकारी ही रहे जो वर्तमान मुख्यमंत्री हैं। उनके सत्ता संभालते ही राज्य में राजनीतिक माहौल के अलावा सामाजिक वातावरण में भी बड़ा परिवर्तन देखा जा रहा हैं। बांग्लादेशी घुसपैठियों के वापस जाने की खबरों के अलावा सरकारी जमीनों पर बने उनके मकान और दूकानें हटने लगे। रेलवे स्टेशन के बाहर फैले अतिक्रमण भी देखते - देखते समेट लिए गए। अवैध टोल नाकों का कारोबार खत्म हो गया। तृणमूल कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी और अवैध वसूली (कट मनी) पर अपने आप रोक लग गई। तृणमूल सरकार के विरुद्ध जनाक्रोश चुनाव परिणाम में तो प्रकट हुआ ही किन्तु उसके बाद पार्टी के अनेक दफ्तरों में भी तोड़फोड़ की गई। यद्यपि केंद्रीय बलों की मौजूदगी की वजह से इस बार हिंसा और हत्याओं की वारदातें नगण्य हैं। हालांकि इसकी शुरुआत तो शुबेंदु अधिकारी के निजी सचिव की हत्या से हुई परंतु दो दिन पहले अभिषेक बैनर्जी और फिर तृणमूल सांसद कल्याण बैनर्जी के साथ हुई मारपीट को ज्यादा उछाला जा रहा है। तृणमूल इस पर सहानुभूति बटोरने का प्रयास कर रही है। लेकिन पार्टी के भीतर जिस तरह का ठंडापन देखने मिला वह बहुत कुछ कह गया। वैसे इस प्रकार की घटनाएं लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं हैं। लेकिन ममता और अभिषेक दोनों के लिये ये आत्मावलोकन का अवसर है। उन्हें बीते 15 साल में हुईं राजनीतिक हिंसा की याद करनी चाहिए जिनमें मारे गए सैकड़ों लोगों में भाजपा के अलावा वामपंथी और कांग्रेस के लोग भी थे। हजारों नागरिक भी तृणमूल के गुंडों के अत्याचार के शिकार हुए। अनगिनत महिलाओं के साथ बलात्कार की खबरें तो राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आईं जिनका संज्ञान महिला एवं मानवाधिकार आयोग ने भी लिया। आज तृणमूल अपने दफ्तरों और नेताओं पर हमले की चंद घटनाओं पर हायतौबा मचा रही है किंतु ये कहना गलत नहीं होगा कि प. बंगाल में जिस खूनी संस्कृति की शुरुआत वामपंथी शासनकाल में हुई थी उसे तृणमूल कांग्रेस ने और बढ़ावा दिया। लेकिन भाजपा को उन तत्वों की घुसपैठ रोकना होगी जिन्होंने पहले वामपंथी सरकार के रहते आतंक फैलाया और फिर ममता राज में तृणमूल के दफ्तर में डेरा जमाकर बैठ गए। प. बंगाल की राजनीति में विशेष रूप से चुनाव के दौरान हिंसा का इतिहास काफी पुराना है। लेकिन इस बार केंद्रीय बलों की तैनाती के चलते हिंसा की वारदातों में जबरदस्त कमी आई। ऐसा ही चुनाव के बाद भी देखने मिल रहा है। इस संबंध में याद रखना जरूरी है कि जब बांग्लादेश और नेपाल में युवाओं ने सत्ता परिवर्तन किया और सरकार के उच्च पदों पर बैठे नेताओं के साथ मारपीट की है तब हमारे देश के कतिपय विपक्षी नेता और सोशल मीडिया पर मोदी विरोधी अभियान चलाने वाले कुछ पत्रकारों ने युवाओं को भड़काने का कुचक्र रचते हुए भारत में भी जेन जी क्रांति का शिगूफा छोड़ा। अब प. बंगाल में तृणमूल नेताओं के साथ जो हो रहा है वह उसी जेन जी क्रांति का नमूना है। बेहतर हो ममता बैनर्जी और उनके बड़बोले भतीजे अभिषेक अपने पापों का प्रायश्चित करने जनता से माफ़ी माँगें। लोकतंत्र में चुनावी हार एक सामान्य प्रक्रिया है किंतु जो नेता उसे विनम्रता से शिरोधार्य करते हैं उनका सम्मान बचा रहता है। लेकिन ममता ने चुनाव हारने के बाद भी पद से इस्तीफा नहीं देने की हेकड़ी दिखाकर जनादेश का जो अपमान किया उससे तृणमूल के प्रति नफरत और बढ़ गई।
- रवीन्द्र वाजपेयी