प.बंगाल में ममता बैनर्जी की सरकार के धराशायी होते ही तृणमूल कांग्रेस दो फाड़ हो गई। पहले विधायक टूटे और फिर सांसदों ने भी किनारा करते हुए अलग गुट बना लिया। चुनाव में लगे झटके से से वे उबर भी नहीं पाईं थीं कि पार्टी में आये बिखराव ने उनके राजनीतिक भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया। चुनाव परिणाम के बाद इंडिया गठबंधन को मजबूत कर राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का नेतृत्व करने की उनकी महत्वाकांक्षा भी हवा में उड़ गई क्योंकि विधानसभा और संसद दोनों ही में तृणमूल काँग्रेस की सदस्य संख्या अंगुलियों पर गिनने लायक ही बच रही है। बड़ी बात नहीं यदि आने वाले दिनों में ये बचे - खुचे भी ममता का साथ छोड़कर चलते बनें। इसी बीच ये खबरें भी आने लगीं कि उद्धव ठाकरे के पास बची शिवसेना (यूबीटी) के 9 में से 6 सांसद भी एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ जुड़ने जा रहे हैं। इसे लेकर मुंबई से दिल्ली तक राजनीतिक हलचलें तेज हैं। उद्धव को ये समझ आ गया है कि पहले से ही ढह चुके उनके दुर्ग की बची - खुची दीवारें भी गिरने के कगार पर हैं। इसीलिए उन्होंने हताशा भरे स्वर में कहा कि जिसे जाना हो वह चला जाए। हालांकि उनके बड़बोले प्रवक्ता संजय राउत ने आदतानुसार आरोप लगा दिया कि पार्टी छोड़ रहे सांसदों को 50 - 50 करोड़ रु. का लालच दिया गया जिसमें 15 करोड़ दिये जा चुके हैं। हालांकि इसका कोई प्रमाण उन्होंने नहीं दिया। लेकिन इससे अलग हटकर देखें तो ये स्पष्ट हो जाएगा कि उद्धव के पास अपनी पार्टी को सहेजकर रखने का कोई आधार नहीं बचा। उनके स्वर्गीय पिता बाल ठाकरे राजनीति में हिंदुत्व के सबसे बड़े प्रतीक थे जिन्होंने कभी भी मुस्लिम तुष्टीकरण का सहारा नहीं लिया। लेकिन उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी उद्धव ने उस कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिला लिया जो अपनी मुस्लिम परस्ती के लिए कुख्यात हैं। और तो और वे सत्ता के लालच में उस इंडिया गठबंधन में शामिल होने में भी नहीं सकुचाये जिसमें अखिलेश और तेजस्वी यादव के अलावा ममता बैनर्जी जैसे हिंदुत्व नाम से चिढ़ने वाले नेताओं के अलावा वामपंथी और द्रमुक जैसी पार्टियां भी हैं जिन्हें धर्म की अवधारणा से ही चिढ़ है। यही कारण रहा कि स्व. बाल ठाकरे के प्रखर हिंदुत्व से प्रभावित होकर शिवसेना से जुड़े तमाम लोग उद्धव द्वारा सत्ता की खातिर मुस्लिम परस्त पार्टियों के सामने झुकने से नाराज होकर अलग हो गए । चूंकि भाजपा ही मौजूदा दौर में हिंदुत्व की सबसे प्रखर और मुखर प्रवक्ता है लिहाजा एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में विधायकों की बगावत से उद्धव सत्ता से बाहर हुए और फिर पार्टी और चुनाव चिन्ह भी हाथ से निकल गए। 2024 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में इंडिया गठबंधन को जबरदस्त सफलता मिली तो उद्धव सहित कांग्रेस और एनसीपी जोश से भर उठीं। यद्यपि शरद पवार की पार्टी भी उसके पूर्व ही दो फाड़ हो चुकी थी। उनके भतीजे अजीत पवार ने बगावत कर चाचा से पार्टी छीन ली और भाजपा के साथ सत्ता में हिस्सेदारी कर ली। लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजों से मिली वह खुशी कुछ महीनों बाद ही मातम में बदल गई जब विधानसभा चुनाव में भाजपा , एकनाथ शिंदे और अजीत पवार के महायुति नामक गठजोड़ ने प्रचंड जीत हासिल कर कांग्रेस, शरद पवार और उद्धव ठाकरे को चारों खाने चित्त कर दिया। यही कहानी स्थानीय निकाय चुनावों में भी दोहराई गई । लेकिन उद्धव ठाकरे को सबसे बड़ा धक्का लगा मुंबई में जब बीएमसी ( मुंबई महानगर पालिका) पर ठाकरे परिवार का दशकों पुराना कब्जा भी भाजपा ने समाप्त कर दिया। स्मरणीय है बीएमसी अविभाजित शिवसेना का अभेद्य दुर्ग होने के साथ उसके लिए कुबेर का खजाना था। उसका बजट अनेक राज्यों से भी ज्यादा होने से ठाकरे परिवार इसके जरिये फलता - फूलता गया। लेकिन सत्ता और संगठन के साथ सैद्धांतिक पूंजी भी गंवाने के बाद उद्धव पूरी तरह प्रभाव शून्य हो चले हैं। आधा दर्जन सांसद और टूटे तो उनकी राजनीतिक जमीन पूरी तरह खिसक जाएगी। यद्यपि इस स्थिति के लिए ममता बैनर्जी की तरह वे भी भाजपा को दोषी ठहराएँगे। लेकिन वे अपने पिता स्व. बाल ठाकरे के कट्टर अनुयायियों को अपने साथ जोड़कर नहीं रख पा रहे तो यह उनकी कमजोरी है । इसलिए पार्टी के सत्यानाश का कसूरवार भी वही हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
No comments:
Post a Comment