Tuesday, 9 June 2026

इंडिया गठबंधन की बैठक उत्साह पैदा करने में सफल नहीं रही


दो साल बाद हुई इंडिया गठबंधन की बैठक से ज्यादा उत्सुकता तो  दिल्ली में हुए कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के बारे में देखी गई । वहीं इंडिया गठबंधन को लेकर घटक दलों में ही निराशा व्याप्त रही। 2023 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहल पर यह  बना था। इसका नाम राहुल गांधी ने सुझाया था जो दरअसल इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस है। हिंदी में इसे भारतीय राष्ट्रीय विकासशील समावेशी गठबंधन कहा जाता है। इसका उद्देश्य नरेंद्र मोदी को रोकना था। लेकिन शुरू में ही अपशकुन हो गया जब नीतीश कुमार  भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में वापस आ गए। चन्द्रबाबू नायडू ने भी  भाजपा से हाथ मिला लिया। हालांकि  भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला किंतु नीतीश और नायडू के समर्थन से मोदी प्रधानमंत्री बन ही गए। उस चुनाव में कांग्रेस 99 सीटों के साथ  मुख्य विपक्षी दल बन गई ओर राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष। लेकिन इसके बाद उसमें घमंड आ गया। गठबंधन के अन्य नेताओं के साथ श्री गांधी के व्यवहार में भी रूखापन आया। जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव में उनकी  कार्यशैली पर तो उमर अब्दुल्ला ने भी सार्वजनिक  टिप्पणी कर डाली। हरियाणा में गठबंधन में खुलकर टूटन दिखाई आई और अरविंद केजरीवाल ने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारकर कांग्रेस के लिए गड्ढा खोद दिया। महाराष्ट्र  में यद्यपि गठजोड़ कायम रहा लेकिन भाजपा नीत महायुति ने ऐतिहासिक बहुमत हासिल कर लोकसभा की हार का बदला ले लिया। दिल्ली में कांग्रेस  हरियाणा का बदला लेते हुए सभी सीटों पर लड़ी ।  लेकिन सपा और तृणमूल ने  कांग्रेस को धता बताते हुए आम आदमी पार्टी का साथ दिया। उधर गठबंधन के भीतर से ही  आवाजें उठने लगीं कि वह केवल लोकसभा चुनाव तक ही था।  प. बंगाल ताजा उदाहरण है जहाँ तृणमूल , वामपंथी और कांग्रेस अलग - अलग लड़े। केरल में कांग्रेस और वामपंथी एक दूसरे के दुश्मन बने रहे। तमिलनाडु में कांग्रेस ने द्रमुक के साथ ही चुनाव लड़ा लेकिन जब सत्ता स्टालिन के हाथ से खिसक गई तब पाला बदलकर अभिनेता विजय की सरकार में हिस्सेदारी हासिल कर ली। इससे नाराज द्रमुक ने इंडिया गठबंधन को छोड़ने की घोषणा कर दी। आम आदमी पार्टी ने भी दूरी बना ली क्योंकि पंजाब में कांग्रेस के साथ उसका मुकाबला है और गुजरात में भी वह उसको नुकसान पहुंचाने में जुटी है। इन सब कारणों से इंडिया गठबंधन लोकसभा चुनाव के बाद  निष्क्रिय हो चला था। कांग्रेस अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटी रही तो क्षेत्रीय पार्टियां अपना गढ़ सुरक्षित रखने में व्यस्त रहीं। लेकिन लगातार हारने के बाद सबके होश ठिकाने आ गए । इसीलिए किसी अन्य दल को सुई की नोंक के बराबर जमीन न देने  वाली सुश्री बैनर्जी सत्ता गंवाने के बाद उस इंडिया गठबंधन को मजबूत करने के लिए उछलने लगीं जिसका कबाड़ा करने में उनका योगदान भी कम नहीं है। लेकिन गठबंधन की बैठक के पहले फिर अपशकुन हो गया । तृणमूल के 58 विधायक टूटने  के बाद  पार्टी के 20 सांसद भी एनडीए के साथ चले गए। आम आदमी पार्टी और द्रमुक के खुले बहिष्कार के अलावा उद्धव ठाकरे तथा झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी केवल आभासी माध्यम से हाजिरी दर्ज की । खबर है हेमंत भी भाजपा के संपर्क में हैं। कुल मिलाकर बैठक तो हो गई लेकिन वह उत्साह नजर नहीं आया जो अपेक्षित भी था और आवश्यक भी। एस.आई.आर के विरोध में देश के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखने जैसा निर्णय निहायत बचकाना है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय उसे पूरी तरह सही ठहरा चुका है। बाकी बातें वही हैं जो रोज  सुनाई देती हैं। इसीलिये भाजपा विरोधी राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार भी कल की बैठक के बाद निराश नजर आए। होना तो चाहिए था कि गठबंधन अपने नेता और साझा कार्यक्रम के बारे में फैसला करता क्योंकि नेतृत्व और नीतिगत अस्पष्टता इसकी सबसे बड़ी कमी है। वहीं एनडीए में श्री मोदी को एकमुश्त समर्थन है। उल्लेखनीय है गठबंधन के संयोजक पद को लेकर ममता के विरोध के कारण ही नीतीश ने एनडीए का दामन थामा था। लगता है गठबंधन में शामिल नेता पिछली गलतियों से सबक लेने को तैयार नहीं हैं। द्रमुक और आम आदमी पार्टी के गठबंधन छोड़ने और तृणमूल में खुले विद्रोह से वैसे ही यह जमावड़ा  कमजोर हो  गया है। 2024 के बाद केरल को छोड़ कांग्रेस के कंधों पर भी पराजय का बोझ बढ़ता गया। और फिर आपसी विश्वास की भी कमी है। शरद पवार शारीरिक तौर पर अशक्त हो चले हैं और सोनिया गांधी भी मैदानी राजनीति से दूर हैं। ममता राजनीतिक तौर पर निरीह अवस्था में आ चुकी हैं। बचे अखिलेश तो उ.प्र से आ रहे संकेत योगी बाबा की वापसी पुख्ता कर रहे हैं। इसीलिये भाजपा विरोधी समीक्षकों को भी 2029 में विपक्ष के लिए कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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