Wednesday, 3 June 2026

तृणमूल जैसे बनी वैसे ही टूट रही है


विधानसभा चुनाव में करारी पराजय के बाद भी ममता बैनर्जी की मुश्किलें कम होने के बजाय और बढ़ती जा रही हैं। पूरे राज्य में तृणमूल कांग्रेस से इस्तीफों की झड़ी लगी है। हालांकि जब भी किसी भी पार्टी को ऐसी हार का सामना करना पड़ता है उसमें इस तरह की स्थिति बनना नई बात नहीं है। लेकिन तृणमूल कांग्रेस के विधायकों और सांसदों की बगावत के जो संकेत मिल रहे हैं वे ममता के राजनीतिक आधार को बुरी तरह धवस्त कर सकते हैं। इसका पहला संकेत तब मिला जब अभिषेक बैनर्जी के साथ हुई मारपीट के बाद ममता द्वारा बुलाई गई बैठक में केवल 20 विधायक पहुंचे। उसके बाद दो विधायकों को पार्टी से निकाले जाने की खबरें आ गईं और वे खुलकर ममता के विरुद्ध बोलने लगे। उसी के बाद पार्टी में विभाजन की अटकलें लगने लगीं। गत दिवस ममता द्वारा आयोजित धरना - प्रदर्शन में पार्टी के अधिकांश सांसदों और विधायकों के अनुपस्थित रहने से बगावत की आशंका और बलवती हो गई। आज पार्टी से निकाले गए 2 विधायक विधानसभा अध्यक्ष से मिलकर असली तृणमूल कांग्रेस होने के नाते पार्टी चुनाव चिन्ह के साथ ही नेता प्रतिपक्ष पद मांगने के साथ दावा कर रहे हैं कि उनके पास 59 विधायक हैं  जो दो तिहाई से ज्यादा होने से दलबदल कानून से मुक्त हैं। हालांकि अभी इस बात की पुष्टि नहीं हो सकी कि बागी विधायकों के पास पार्टी तोड़ने लायक संख्याबल है या नहीं। और ये भी कि सांसदों में से कितने ममता का साथ छोड़ने का साहस दिखाएंगे?  ये भी साफ नहीं हैं कि बागी विधायक और सांसद भाजपा में शामिल होंगे या फ़िर अलग गुट बनाकर विपक्ष में बैठेंगे । लेकिन इतना तो पक्का है कि पार्टी में टूटन शुरू हो चुकी है। इसके पीछे किसी वैचारिक मतभेद की बात सोचना तो निरर्थक है क्योंकि तृणमूल कांग्रेस केवल ममता बैनर्जी की निजी महत्वाकांक्षाओं के इर्द - गिर्द सिमटी पार्टी थी जिसका न कोई सिद्धांत है और न ही आदर्श। रही - सही कसर पूरी हो गई ममता द्वारा अपने भतीजे अभिषेक को अघोषित उत्तराधिकारी बनाकर जिनके तेवर किसी बिगड़ैल नवाबजादे से कम नहीं थे। ममता मूलतः सड़क से उठी जुझारू नेत्री थीं जिन्होंने वामपंथी सत्ता से लड़ने में कांग्रेस की असमर्थता से असंतुष्ट होकर  तृणमूल कांग्रेस का गठन किया और आखिरकार वामपंथी सत्ता को उखाड़ फेंका।  लेकिन कोई विचारधारा नहीं होने से पार्टी सत्ता से चिपके रहने का साधन बन गई । और इसीलिये उसमें वामपंथी सरकार के दौर में अराजकता फैलाने वाले असामाजिक तत्वों ने आराम से घुसपैठ कर ली। सत्ता की चकाचौंध में  ममता ने इस बुराई से आँखें मूंदते हुए केवल चुनाव जीतने को ही अपना लक्ष्य बनाते हुए मुस्लिम तुष्टीकरण के रिकॉर्ड तोड़ दिए। चूंकि वामपंथी और कांग्रेस धीरे - धीरे कमजोर होते गए इसलिए ममता को लगा वे अपराजेय हो चुकी हैं। और इसीलिये उन्होंने जनता की तकलीफों को जानने के बजाय उनकी उपेक्षा शुरू कर दी।  अभिषेक ने अघोषित युवराज की तरह जिस समानान्तर शासन व्यवस्था को जन्म दिया वह अराजकता का पर्याय होने से जनता की नाराजगी का कारण बनी जो बीती 4 मई को चुनावी परिणाम के रूप में सामने आई। लेकिन ममता की अकड़ कम नहीं हुई और उन्होंने इस्तीफा देने से इंकार कर दिया जो कि संसदीय शिष्टाचार का अभिन्न हिस्सा है। बहरहाल तृणमूल कांग्रेस टूटे या एकजुट रहे ये उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना ये कि निजी जागीर बनी हुई क्षेत्रीय पार्टियों ने  जिस सिद्धांतविहीनता और अवसरवाद को बढ़ावा दिया उसकी वजह से से समूचा राजनीतिक माहौल प्रदूषित होकर रह गया। तृणमूल के जो विधायक, सांसद और अन्य नेता ममता से किनारा कर रहे हैं उसकी एकमात्र वजह है उनके हाथ से सत्ता खिसक जाना। चूंकि वे सब ममता के करिश्मे के आकर्षण में तृणमूल से जुड़े थे इसलिए ज्योंही वह खत्म हुआ त्योंही दीदी असहनीय लगने लगीं। ममता ने वामपंथी सत्ता को हटाकर जो उम्मीदें जगाई थीं उन्हें पूरी करने जनता ने उनको 15 साल दिए जो कम नहीं थे। इससे कम समय में नरेंद्र मोदी ने गुजरात को विकास का प्रतीकचिन्ह बनाकर खुद को प्रधानमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार बना लिया और बीते 12 वर्षों से देश की बागडोर संभाले हुए हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में आशाजनक नतीजे नहीं मिलने के बावजूद वे निराश नहीं हुए और राज्य दर राज्य भाजपा की विजय के आधार बने हुए हैं तो इसका कारण उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि है। ममता की पार्टी सत्ता से हटते ही महज एक महीने के भीतर यदि बिखराव के कगार पर है तो उसकी वजह  विचारशून्यता ही है। दरअसल तृणमूल कांग्रेस सत्ता के लिये एकत्र लोगों का जमावड़ा है जिनके बीच न कोई सैद्धांतिक साम्यता है और न ही जनसेवा की भावना। इसीलिये चुनावी पराजय के बाद ही पार्टी खंडित होने आ गई। महाराष्ट्र में जो हाल उद्धव ठाकरे का हुआ वही प. बंगाल में ममता बैनर्जी का होने जा रहा है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

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