फ्रांस में चल रहे जी 7 सम्मेलन में सभी विषयों पर अमेरिका - ईरान युद्ध हावी रहा क्योंकि बीते कुछ महीनों से उसके चलते पूरी दुनिया का ध्यान बाकी समस्याओं से हट सा गया था। हालांकि रूस और यूक्रेन युद्ध ने भी वैश्विक व्यवस्था पर काफी असर डाला किंतु ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमले के बाद उत्पन्न परिस्थितियों ने पेट्रोल, डीजल और गैस आदि की आपूर्ति बाधित कर दी। परिणाम स्वरूप कीमत बढ़ जाने से सभी देशों की अर्थव्यवस्था पर विपरीत असर पड़ने लगा। तेल संयंत्रों को हुए नुकसान के कारण लंबे समय तक उत्पादन में कमी रहने की आशंका बढ़ती जा रही है। युद्ध रोकने के लिए चल रही शांति प्रक्रिया में आ रही बाधाएं भी विचलित कर रही थीं। हालांकि आज अमेरिका और ईरान दोनों ने युद्ध रुकने की पुष्टि कर समूचे विश्व को राहत प्रदान की। युद्ध विराम कितना कारगर होगा ये तो भविष्य ही बताएगा क्योंकि इजराइल में इस समझौते का जिस तरह विरोध हो रहा है उसे देखते हुए स्थायी शांति की उम्मीद संदेह के घेरे में ही रहेगी। इसी बीच डोनाल्ड ट्रंप द्वारा जी 7 सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ में जो बातें कहीं उनमें कुछ भी नयापन नहीं है। पूर्व में भी वे श्री मोदी को अपना दोस्त बताते हुए ऐसी ही टिप्पणियां करते रहे हैं। लेकिन उसी के साथ ही भारत पर टैरिफ बढ़ाने के अलावा मनमाने प्रतिबंध लगाने से भी बाज नहीं आये। डोनाल्ड ट्रंप के बेसिर पैर वाले दावों की शुरुआत ऑपरेशन सिंदूर के समय से हुई जब उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम करवाने का श्रेय खुद को देकर शांति के नोबल पुरस्कार के लिए दावा कर दिया। हद तो तब हो गई जब पाकिस्तान ने उनके नाम की सिफारिश भी कर दी। ईरान पर हमले के बाद की गई उनकी घोषणाओं को देखें तो साफ हो जाता है कि वे अपनी बात से पलट जाने वाले इंसान हैं जिन्हें पद की गरिमा की रत्ती भर भी परवाह नहीं रहती। इसीलिए अमेरिका जैसी महाशक्ति के राष्ट्राध्यक्ष होने के बाद भी ट्रंप की छवि एक मसखरे की बन चुकी है। गत दिवस उन्होंने श्री मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक में ये कहकर सनसनी फैला दी कि उनके राष्ट्रपति रहते हुए यदि भारत पर कोई हमला होता है, तो अमेरिका बिना किसी औपचारिक लिखित समझौते के भी भारत की मदद करेगा। साथ ही उन्होंने श्री मोदी को सख्त रणनीतिकार बताते हुए माना कि उनके नेतृत्व में भारत दुनिया के लिए बहुत अहम भूमिका निभा रहा है। ट्रंप का यह बदला हुआ रुख श्री मोदी द्वारा होर्मुज में व्यापारिक जहाजों पर हुए अमेरिकी हमलों में भारतीय नाविकों की जान जाने का मुद्दा उठाये जाने के बाद सामने आया। समुद्री सुरक्षा और गैर सैनिक जहाजों को निशाना बनाये जाने पर भारत के विरोध को जी 7 सम्मेलन में अच्छा समर्थन मिलने और अनेक राष्ट्राध्यक्षों द्वारा श्री मोदी को दिये जा रहे सम्मान को देखकर अमेरिकी राष्ट्रपति लचीला रुख अपनाने बाध्य हुए । और फिर द्विपक्षीय बातचीत के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री की तारीफ के पुल बांधते हुए बिना मांगे ही हमले के समय मदद का आश्वासन भी दे डाला। ये वही ट्रंप हैं जो ऑपरेशन सिंदूर के बाद से पाकिस्तान को गोद में बिठाकर भारत को उपेक्षित करते रहे। और तो और उसके सेनाध्यक्ष आसिफ मुनीर को साथ में भोजन करवाने की तस्वीरें प्रचारित करने में भी शर्म नहीं की जबकि कूटनीतिक शिष्टाचार के लिहाज से मुनीर उनकी हैसियत से बहुत नीचे हैं। ईरान युद्ध रूकवाने के लिए मध्यस्थता के लिए भी ट्रंप ने पाकिस्तान को आगे किया। वे सोचते रहे कि भारत इससे डर जायेगा और उनकी खुशामद करेगा। लेकिन न तो टैरिफ विवाद पर भारत झुका और न ही व्यापार डील में अपने हितों की सौदेबाजी की। रूस से कच्चे तेल की खरीदी में भी अमेरिकी दबाव को उपेक्षित करते हुए भारत ने यूरोपीय यूनियन सहित अनेक देशों से मुक्त व्यापार संधि हस्ताक्षरित कर ट्रंप को ठेंगा दिखा दिया । इसीलिए जी 7 सम्मेलन में उनको श्री मोदी और भारत के प्रति अपने झुकाव का प्रदर्शन करना पड़ा। लेकिन दूसरे कार्यकाल में अब तक उनका जो आचरण रहा उसे देखते हुए भारत को उन पर लेश मात्र विश्वास नहीं किया जा सकता। वैसे भी ईरान पर बेतहाशा बारूद बरसाने के बावजूद उसके साथ समझौते के लिए मजबूर ट्रंप के आश्वासन अब भरोसे लायक नहीं बचे।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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