Saturday, 6 June 2026

व्यवसायीकरण के बाद अपराधीकरण की ओर बढ़ रहा कोचिंग उद्योग


बिहार सरकार की भर्ती परीक्षा में 19000 पदों के लिए नतीजे निकले। पटना के दो कोचिंग संस्थानों में से एक ने अपने  12000 और दूसरे ने 10000 छात्रों का चयन होने का दावा किया। लेकिन इस बात का जवाब दोनों के पास नहीं है कि 19000 पदों के लिए 22000 उम्मीदवारों का चयन कैसे हो गया और क्या सभी चयनित उम्मीदवार इन्हीं कोचिंग के छात्र हैं? किसी बात पर दोनों में विवाद बढ़ा और बात गोली चलने तक जा पहुंची। एक कोचिंग संचालक जेल चले गए और दूसरे भी जाने की तैयारी में हैं। हत्या के प्रयास का आरोप लग रहा है । दूसरे पक्ष के विरुद्ध गोली चलाने की झूठी रिपोर्ट कर उसे सीखचों के पीछे भिजवाकर अपने को विजेता समझ बैठे एक नामी गिरामी कोचिंग संचालक भी खुद  उसी आरोप में जेल जाने वाले हैं। शिक्षा जैसे पवित्र विषय में पैसे और प्रतिस्पर्धा का यह घिनौना रूप देखकर दुख होता है। उक्त कोचिंग संस्थानों के छात्रों द्वारा एक दूसरे के विरुद्ध किया जा रहा प्रदर्शन भी चिंता का कारण है। शिक्षक जैसे सम्मानित  व्यक्ति को  बंदूकधारी अंगरक्षक रखने पड़ें तो आश्चर्य होता है। शिक्षा का कोचिंगकरण उसकी पवित्रता के साथ ही गुणवत्ता को भी प्रभावित कर रहा है। ऐसे में जरूरी  है  सरकार कोई नियामक संस्था बनाए जिससे कुकुरमुत्तों की तरह उग आये कोचिंग संस्थानों की असलियत उजागर हो। प्रतिस्पर्धा में सफल हुए अपने विद्यार्थियों  का फोटो बड़े - बड़े विज्ञापनों में छपवाने वाले इन संस्थानों के संचालकों से ये भी पूछा जाना चाहिए कि उनके संस्थान के कितने छात्र परीक्षा में बैठे और उनमें से कितने असफल रहे? पटना के एक कोचिंग संचालक और एक महिला टी.वी एंकर के बीच तीखी टिप्पणियों के आदान - प्रदान से शुरू हुए विवाद ने नया मोड़ ले लिया जब पटना के दो कोचिंग संस्थान संचालकों के बीच व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा गोली चलने की सीमा तक जा पहुंची और पूरे देश में लोकप्रियता और सम्मान अर्जित कर चुके शिक्षक अब पुलिस थाना और जेल के मकड़जाल में उलझ गए। सबसे दुखद पहलू ये है कि उन्होंने अपने संस्थानों के छात्रों को औजार बनाकर सड़कों पर उतार दिया। इस विवाद का अंत  तो अब कानून तय करेगा किंतु इससे कोचिंग संचालकों की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गई। शिक्षा संस्थानों में छात्रों के बीच उग्र विवाद होते रहते हैं। दिल्ली का जे.एन.यू तो वामपंथियों और संघ परिवार से जुड़े छात्र संगठन की युद्धभूमि बना हुआ है। लेकिन कोचिंग संस्थानों के माहौल में अपेक्षाकृत गंभीरता रहती है। इसके पहले उक्त दोनों कोचिंग संस्थानो को लेकर भी कोई आपत्तिजनक बात सुनने में नहीं आई। लेकिन बीते कुछ दिनों में उनके  विवाद के बाद अब समूचा कोचिंग उद्योग निशाने पर आ गया। इसकी उपयोगिता और प्रामाणिकता पर सवाल उठने लगे हैं। आरोप लग रहे हैं कि ये नोट  छापने की मशीन बन गए  हैं। कुछ कोचिंग संस्थान तो विशुद्ध कॉरपोरेट शैली में अन्य शहरों में भी शाखाएं खोल रहे हैं जिनसे किसी उपभोक्ता वस्तु की डीलरशिप का एहसास होता है। लुभावने विज्ञापनों के जरिए मोटी फीस वसूली जाती है। इस कार्य में भी दलाली का धंधा होता है। यद्यपि कुछ कोचिंग संस्थान अभी भी ईमानदारी से छात्रों का मार्गदर्शन कर उनके बेहतर भविष्य के लिए सार्थक प्रयास करते हैं लेकिन ज्यादातर शिक्षा की दुकानें और शो रूम का रूप ग्रहण कर चुके हैं। इसी  वजह से कोचिंग संस्थानों पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठ रही है। ये कितनी व्यावहारिक है ये निःसंदेह विमर्श का विषय है लेकिन नौजवानों का भविष्य संवारने के लिए यदि कोचिंग ही जरूरी है तब  विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों की उपयोगिता पर भी प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है। ये विवाद और बढ़े तथा कोचिंग संचालकों की व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा    आपराधिक स्वरूप ग्रहण करे उसके पूर्व ही इसे रोकने के कदम उठाए जाने चाहिए क्योंकि इनके साथ लाखों छात्रों का भविष्य और  अभिभावकों की उम्मीदें जुड़ी हुई हैं। इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि हाल ही में नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने के मामले में भी कतिपय कोचिंग संस्थानों की भूमिका का पर्दाफाश हुआ था। केंद्र सरकार को चाहिए इस  बारे में ठोस कदम उठाए वरना शिक्षा के पवित्र क्षेत्र का व्यवसायीकरण होने के बाद उसका माफियाकरण होते देर नहीं लगेगी। पटना में हुए विवाद के बाद बड़ी बात नहीं कोचिंग संचालक गुंडों को भी भागीदार बनाने लगें क्योंकि पैसा कमाने की हवस में इंसान  किसी भी हद तक गिर सकता है। और गुरु से सर बन चुके लोग भी इंसान ही हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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