अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते को लेकर दावा किया जा रहा है कि आगामी 19 जून को दोनों उस पर हस्ताक्षर कर देंगे। हालांकि इस तरह की घोषणाएं कई मर्तबा सुनने में आईं लेकिन कभी अमेरिका को ईरान की शर्तें मंजूर नहीं हुईं तो कभी ईरान ने अमेरिकी प्रस्तावों पर असहमति जाहिर करते हुए टांग अड़ा दी। इस विलंब के लिये इसराइल भी कम जिम्मेदार नहीं है जो ईरान के जबरदस्त विरोध के बावजूद लेबनान पर हमले रोकने तैयार नहीं है। हद तो तब हो गई जब उसके प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा की गई डाँट - डपट की परवाह तक नहीं की। अब जबकि ऐसा लग रहा है कि समझौता अंतिम चरण में पहुँच चुका है तब इसराइल ने ये कहकर सनसनी फैला दी कि वह इसका हिस्सा नहीं है। उल्लेखनीय है नेतन्याहू ही नहीं सऊदी अरब सहित अनेक अरब देश भी ट्रम्प से अनुरोध कर चुके हैं कि ईरान को पूरी तरह घुटनाटेक करवाये बिना लड़ाई रोकना भारी भूल होगी क्योंकि आगे भी वह पड़ोसी देशों के विरुद्ध आक्रामक रवैया अख्तियार करने से बाज नहीं आयेगा। दरअसल अमेरिका किसी भी तरह इस युद्ध से निकलना चाह रहा है क्योंकि उसे ये समझ में आ गया है कि बिना थल सेना उतारे ईरान को परास्त करना असंभव होगा। हालांकि वह ऐसा करने में सक्षम है किंतु वियतनाम और अफगानिस्तान के कड़वे अनुभवों को याद करने पर ट्रम्प उस दिशा में आगे बढ़ने से रुक गये। ईरान के विरुद्ध इस कारवाई का घोषित मकसद तो उसे परमाणु हथियार बनाने से रोकना था लेकिन असली बात है तेल का खेल। रूस और ईरान द्वारा सस्ता तेल बेचे जाने से अमेरिका परेशान था क्योंकि उसका भरपूर लाभ भारत और चीन जैसे देश उठा रहे थे जिससे अमेरिका के पेट में मरोड़ होता आया है। और फ़िर ब्रिक्स नामक जिस संगठन ने डॉलर के दबदबे को समाप्त करने की पहल की उसमें भारत, चीन और ब्राज़ील के साथ ही ईरान भी शामिल हो गया। जहाँ तक प्रश्न इसराइल का है तो उसकी और ईरान की दुश्मनी का कारण हमास , हिजबुल्ला और हूती जैसे इस्लामिक आतंकवादी संगठन हैं जिनकी पीठ पर ईरान का खुला हाथ है। इस जंग की जड़ में भी हमास द्वारा इसराइल पर किया गया हमला था जिसके बाद प. एशिया में युद्ध की आग भड़क उठी। इसराइल और ईरान के बीच सीधी लड़ाई भी उसी दौरान शुरू हुई थी जिसमें अमेरिका ने भी हिस्सा लिया और ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया। हालांकि युद्धविराम तो हो गया लेकिन ईरान का आक्रामक रुक जारी रहने से इसराइल ने अमेरिका को इस बात के लिए राजी कर लिया कि उसकी कमर पूरी तरह तोड़ दी जाए। चूंकि ऐसा करने में अमेरिका के भी दूरगामी स्वार्थ सिद्ध होते थे लिहाजा ट्रम्प भी तैयार हो गए। लेकिन वे ईरान द्वारा किये गए पलटवार का पूर्वानुमान लगाने में चूक गए। यही वजह रही कि जंग लंबी खिंचने के साथ ही अनेक देशों में फैल गई। बहरहाल समझौते के करीब पहुँचने के बाद भी ये आशंका बनी हुई है कि अंतिम क्षणों में भी ऐसा कुछ होगा जिससे कि शांति की उम्मीदें धरी रह जाएं। ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को अमेरिका की इच्छानुसार स्थगित कर देगा क्योंकि उसके पास यही तो सौदेबाजी का सबसे बड़ा हथियार है। उसने यूक्रेन के हश्र को भी देखा जो परमाणु शक्ति विहीन होने के दुष्परिणाम भोग रहा है। इसी तरह होर्मुज पर पूरी तरह नियंत्रण खत्म करने पर भी ईरान राजी हो जाएगा ये भी मुश्किल है। एक बात और भी काबिले गौर है कि ईरान के भीतर भी इस संभावित समझौते के विरोध में सत्ता से जुड़ा एक तबका आवाज उठा रहा है। उसका कहना है कि युद्ध रोकने की ज्यादा जरूरत ट्रम्प को है ऐसे में ईरान को अपनी शर्तों पर अड़े रहना चाहिए। अमेरिका द्वारा समझौते के जिन बिंदुओं की जानकारी दी जा रही है उसके अनुसार तो ईरान दबाव में आ गया लगता है। यद्यपि जप्त संपत्ति लौटाने और युद्ध में हुई क्षति के मुआवजे जैसे प्रावधान उसे राहत देने वाले हैं किंतु बाकी सब अमेरिका की जीत का इशारा कर रहे हैं। ऐसे में फिलहाल ये विश्वास कर लेना जल्दबाजी होगी कि 19 तारीख पूरी दुनिया के लिए राहत लेकर आयेगी। बड़ी बात नहीं जिस तरह अमेरिका और इसराइल के बीच शांति समझौते को लेकर मतभेद उभरे वैसा ही कुछ ईरान में भी हो जाए जिसके चलते वहाँ नेतृत्व के दोफ़ाड़ होने से आखिरी क्षणों में गतिरोध उत्पन्न हो। उस दृष्टि से अगले कुछ दिन बेहद उत्सुकता और उत्तेजना से भरे रहेंगे। देखने वाली बात ये भी है कि ट्रम्प की विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म होने के कारण समझौते के बावजूद प. एशिया में शांति कायम होने पर संदेह बना रहेगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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