चुनाव में जीत - हार चलती रहती है। कभी कोई पार्टी बड़ी जीत हासिल करती है तो कभी मतदाता उसे चारों खाने चित्त कर देते हैं। जीत के जश्न में तो वे भी शामिल हो जाते हैं जिनका उसमें कोई योगदान नहीं रहा । लेकिन हार के समय वे भी साथ छोड़ देते हैं जो कल तक आगे - पीछे मंडराया करते थे। प. बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस में विधानसभा चुनाव हारने के बाद जिस तेजी से टूटन हो रही है उससे एक बात स्पष्ट हो गई कि बिना किसी सैद्धांतिक और वैचारिक आधार वाली पार्टियों का ढांचा विपरीत परिस्थितियों में इसी प्रकार ढह जाता है। 1984 में भाजपा को मात्र 2 लोकसभा सीटें मिलीं। अटल बिहारी वाजपेयी तक हार गए किन्तु अपनी नीतिगत दृढ़ता और मजबूत सैद्धांतिक आधार के कारण मात्र 5 साल बाद ही उसने शानदार वापसी की और आज केंद्र के साथ देश के बड़े हिस्से पर उसका शासन है । कांग्रेस भी 2014 एवं 2019 के लोकसभा चुनाव में मान्यता प्राप्त विपक्ष तक नहीं बन सकी। लेकिन उसमें भी ऐसी भगदड़ नहीं हुई जैसी तृणमूल कांग्रेस में देखने मिल रही है। अन्य दलों को भी समय - समय पर ऐसी ही विपरीत परिस्थितियों से गुजरना पड़ा । ममता बैनर्जी के अलावा तमिलनाडु में स्टालिन और केरलम में विजयन को भी सरकार गँवाना पड़ी किंतु उनकी पार्टी में ऐसी स्थिति देखने नहीं मिली। अन्ना द्रमुक के कुछ विधायकों ने जरूर मुख्यमंत्री विजय को समर्थन देकर उनके बहुमत की समस्या दूर कर दी किन्तु जयललिता के न रहने के बाद वह पार्टी बिना राजा की फौज होकर रह गई इसलिए उसके विधायकों द्वारा पाला बदलने से ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ। लेकिन 15 वर्षों से प. बंगाल की एकछत्र नेत्री बनी रहीं सुश्री बैनर्जी का प्रभुत्व एक ही चुनावी हार के बाद जिस तेजी से बिखरता जा रहा है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि दो दशक बाद भी तृणमूल कांग्रेस अपना सैद्धांतिक या वैचारिक आधार तैयार नहीं कर सकी। ममता बैनर्जी ने सबसे पहले कांग्रेस की रीढ़ तोड़ी और फिर वामपंथी गुंडों को शामिल कर अपने पैर जमाए। लेकिन सत्ता की चाहत में उन्होंने तुष्टीकरण का जो रास्ता चुना उसके कारण उन्हें सत्ता का सुख तो मिलता रहा लेकिन पार्टी का कोई वैचारिक आधार नहीं बन सका। इसीलिये वे भीड़ की नेता बनकर रह गईं। लगातार तीन चुनाव जीतने के कारण वे खुद को अपराजेय समझ बैठीं और यही गलती उनके लिए आत्मघाती साबित हुई। मात्र एक महीने के भीतर ही तृणमूल तिनके की तरह बिखरने लगी तो उसका मुख्य कारण यही है कि ममता के इर्द - गिर्द जिन लोगों का जमावड़ा रहा उनके निहित स्वार्थ थे। वरना जिन लोगों को उन्होंने सड़क से उठाकर संसद पहुंचा दिया वे इस तरह छोड़ - छोड़कर नहीं भागते। तृणमूल का आरोप है कि सीबीआई और ईडी का डर दिखाकर भाजपा ये सब करवा रही है। लेकिन 60 विधायकों के साथ 20 सांसदों के बागी हो जाने के बाद उक्त आरोप बेमानी लगता है। सही बात ये है कि ये सभी घोर अवसरवादी और सत्ता लोलुप लोग हैं। ऐसे ही तमाम लोग 2021 के चुनाव के बाद भाजपा छोड़ तृणमूल में शामिल हुए थे। इस सामूहिक विद्रोह के बाद ममता का सारा घमंड मिट्टी में मिल गया। जिस कांग्रेस की जड़ें खोदकर उन्होंने प. बंगाल में अपने पाँव जमाये आज उसी के आगे वे नतमस्तक नजर आ रही हैं। कल तक राहुल उन्हें फूटी आँखों नहीं सुहाते थे किंतु आज उनके साथ काम करने वे गांधी परिवार के चक्कर काट रही हैं। खबर तो तृणमूल के कांग्रेस में विलय की भी उड़ रही है। कुल मिलाकर वर्तमान स्थिति के लिए वे स्वयं जिम्मेदार हैं जिन्होंने चुनावी जीत के लिए राजनीतिक रिश्ते तो खराब किए ही सारे सिद्धांत ताक पर रख दिए। बांग्लादेशी घुसपैठियों को जिस प्रकार वहां बसाया गया वह देश हित के सर्वथा विरुद्ध था। इसीलिये प. बंगाल की जनता ने तृणमूल की जड़ें खोद डालीं। आने वाले दिनों में ममता का क्या भविष्य होगा इस पर सभी की निगाहें लगी रहेंगी किन्तु तृणमूल कांग्रेस का इतिहास बनना सुनिश्चित हैं। वैसे कांग्रेस के लिये यही बेहतर रहेगा कि वह ममता को उनके हाल पर छोड़ दे क्योंकि उन्होंने प. बंगाल की सत्ता हासिल करने की लालच में कांग्रेस के लिए जो गड्ढा खोदा उसकी सजा उन्हें मिलना ही चाहिए वरना वे कांग्रेस का वही हाल करेंगी जो बांग्लादेशी घुसपैठियों ने प. बंगाल का किया था।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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