Monday, 8 June 2026

कॉकरोच जनता पार्टी की नीति और नीयत दोनों अस्पष्ट और रहस्यमय


युवाओं के आक्रोश को अभिव्यक्त करने के लिये राजनीतिक क्षितिज पर धूमकेतु की तरह उभरी कॉकरोच जनता पार्टी के पहले प्रदर्शन को भले ही फ्लॉप शो न कहा जाए किंतु प्रभावशाली भी नहीं कह सकते। सवाल ये नहीं है कि 6 जून को दिल्ली के जंतर मंतर पर कितनी भीड़ जुटी बल्कि ये कि उसमें वे युवा कितने थे जिनकी समस्या के विरोध में सोशल मीडिया पर अवतरित इस नवजात पार्टी के अध्यक्ष अमेरिका से लंबी यात्रा करने के बाद दिल्ली पहुंचे। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग पर केंद्रित उक्त प्रदर्शन के लिये पुलिस की अनुमति मिलने पर असमंजस था । उसके अध्यक्ष अभिजीत दीपके तो अपनी गिरफ्तारी के प्रति भी आशंकित थे। देश में जेन जी आंदोलन को भड़काकर सत्ता परिवर्तन करवाने के मंसूबे पालने वाला तबका भी चाह रहा था कि कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन पर रोक लग जाए और अभिजीत गिरफ्तार हो जाएं। यदि  ऐसा हो जाता तो फिर युवाओं को भड़काने में उन्हें कामयाबी मिल जाती लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और अभिजीत अपने प्रवक्ताओं के साथ जंतर मंतर पहुंच गए। लेकिन वहां शुरुआत में तो प्रदर्शनकारी कम पत्रकार और दर्शक ज्यादा थे। बाद में भी जो जनता जमा हुई उसमें कॉकरोच जनता पार्टी के कैडर जैसा तो कुछ था नहीं। हां, जेएनयू की ढपली गैंग जरूर अपने एजेंडे के साथ मौजूद थी। उमर खालिद के पक्षधर और हमें चाहिए आजादी के नारे लगाने वाले वामपंथी और कश्मीर के अलगाववादियों के समर्थक भी उस आयोजन में घुसपैठ करने में सफल हो गए। और जब मंच से भी रास्वसंघ का विरोध सुनाई दिया तब पूरा मामला साफ हो गया। प्रदर्शन था तो श्री प्रधान के त्यागपत्र के लिए किंतु उसमें समलैंगिकता का प्रचार करने वाले बेहूदे लोग भी अपना राग अलापते दिखे।  वहीं स्त्री वेशभूषा धारण किए वे युवक भी जो अक्सर जेएनयू परिसर में देखे जा सकते हैं। कुल मिलाकर आयोजन पूरी तरह असंगठित और अव्यवस्थित रहा। अमेरिका की ठण्डक से लौटकर दिल्ली की भीषण गर्मी को सहन न करने पर अभिजीत की तबियत बिगड़ गई। उनके मंचीय साथी भी तापमान बर्दाश्त नहीं सके और उनकी हिम्मत जवाब दे गई। हालांकि इसका असर प्रदर्शन की सफलता पर पड़ा ये कहना गलत होगा क्योंकि वह पहले घंटे में ही विफलता का उदाहरण बन चुका था। सोशल मीडिया पर देखते - देखते लाखों फालोवर होने से अभिभूत अभिजीत जंतर मंतर पर 10 हजार ढंग के लोग भी नहीं जमा कर सके जबकि इससे ज्यादा लोग तो उस इलाक़े में चाय की दुकानों पर खड़े दिख जाते हैं। हालांकि दिल्ली के बाहर से भी कुछ लोग प्रदर्शन में शामिल हुए। कॉकरोच का मुखौटा लगाए सैकड़ों लोग यदि न होते तब ये पता ही न चलता कि वह आयोजन है किसका? बहरहाल जोर - शोर से शुरू हुई ये मुहिम पहले ही इम्तिहान में फुस्स साबित हो गई। इस पार्टी के प्रति अन्य स्थापित दलों की प्रतिक्रिया भी उपेक्षापूर्ण रही। दिल्ली में बैठे राजनीतिक पर्यवेक्षक और पत्रकारों ने भी कॉकरोच जनता पार्टी के इस पहले सार्वजनिक आयोजन को पूरी तरह भटका हुआ और असरहीन निरूपित कर ये जता दिया कि इसका प्रारंभ भले ही धूम - धड़ाके के साथ हुआ हो लेकिन इसे लंबी रेस का घोड़ा नहीं माना जा सकता। अभिजीत ने भारत आने से पूर्व जय भीम का उल्लेख अपने संदेश में किया था और यहां आने के बाद भी वे डॉ. आंबेडकर की पुस्तक हाथ में लिए रहे। उनके इस कृत्य ने वहां उपस्थित उन छात्रों को चौकन्ना कर दिया जो यू.पी.एस.सी के परिपत्र को लेकर पहले से ही नाराज थे। इस प्रकार युवाओं के महानायक बनने के उद्देश्य से भारत लौटे अभिजीत दलित नेता बनने की तैयारी करते दिखे। सही बात ये है कि उनकी नीति और नीयत दोनों अस्पष्ट या यूं कहें कि रहस्यमय हैं। ये संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि उनकी पीठ पर उन विदेशी ताकतों का हाथ है जो राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न करने के लिए नौजवानों को भड़काकर देश को अराजकता में धकेलना चाहते हैं। हालांकि फिलहाल कोई पुख्ता आकलन करना उचित नहीं है लेकिन अरविंद केजरीवाल की शैली में जनांदोलन की शक्ल में राजनीतिक महत्वकांक्षाओं को पूरा करने का प्रयास अब दोबारा सफल नहीं होगा क्योंकि काठ की हांडी बार - बार नहीं चढ़ती। अभिजीत दीपके सोशल मीडिया पर मिले समर्थन की खुशी में उछलते हुए अमेरिका से भारत तो आ गए लेकिन आभासी माध्यम से जनता के दिल में उतरना आसान नहीं होता। भारत की तासीर कुछ अलग हटकर है जिसे समझना उतना आसान नहीं जितना कॉकरोच जनता पार्टी के कर्णधार समझ बैठे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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