Monday, 31 August 2026

सवर्ण जेन जी भी चुनाव में बाजी पलट सकते हैं



देश में इन दिनों जो उथलपुथल है उसका कारण युवाओं से जुड़े मुद्दे हैं। यूजीसी अधिसूचना से शुरू विवाद नीट पेपर लीक होने के बाद और गहरा गया। इसी दौरान 12 वीं परीक्षा के मूल्यांकन की विसंगतियाँ भी सामने आ गईं। इनके कारण केंद्र सरकार और भाजपा को कटघरे में खड़ा होना पड़ गया। इस परिस्थिति का लाभ वैसे तो विपक्षी दलों को मिलना चाहिए था किंतु अचानक उभरी कॉकरोच जनता पार्टी ने नीट पेपर लीक के मुद्दे पर दिल्ली के जंतर मंतर पर आंदोलन करते हुए युवाओं को अपने पाले में खींचने में तात्कालिक तौर तो सफलता हासिल कर ही ली। यद्यपि युवाओं में केन्द्र सरकार के विरुद्ध गुस्से की शुरुआत यूजीसी की उस नियमावली से हुई थी जिसमें दलित और ओबीसी छात्रों के उत्पीड़न पर कड़े दण्ड का प्रावधान किया गया था। पहले उसमें केवल दलित वर्ग था किंतु नये नियमों में ओबीसी भी जुड़ने से सवर्ण छात्रों में गुस्से की लहर दौड़ गई। हालांकि उस नियमावली पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगा दी किंतु इसी बीच नीट  पेपर लीक होने से असंतोष का दायरा व्यापक हो गया। 22 छात्रों द्वारा आत्महत्या के कारण नीट मुद्दा यूजीसी विवाद पर भारी पड़ने लगा। कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन तो नीट पेपर लीक और धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र पर ही केंद्रित रहा। लेकिन उसके फ़ौरन बाद आरक्षण विरोधी आंदोलनकारियों ने भी जंतर मंतर पर शक्ति प्रदर्शन किया। हालांकि मुख्य धारा के मीडिया ने उसे खास महत्व नहीं दिया वहीं सरकार ने भी उसके प्रति उपेक्षा दिखाई। हालांकि इस आंदोलन के कारण सोशल मीडिया पर आरक्षण  विरोधी आवाजें तेज हो गईं। इसे यूजीसी विवाद का ही अगला चरण कहना गलत नहीं होगा। इस आंदोलन ने भी नीट परीक्षा में आरक्षण श्रेणी के छात्रों को कम अंकों के बावजूद मेडीकल कॉलेजों में प्रवेश मिलने  का मुद्दा उठाया। उल्लेखनीय है विभिन्न दलों ने जंतर मंतर  आंदोलन के प्रति तो समर्थन जताया परंतु आरक्षण विरोधी आंदोलन के प्रति   सहानुभूति दिखाने तक से परहेज किया। इन युवाओं में भाजपा के प्रति ज्यादा नाराजगी है क्योंकि सवर्ण जातियाँ उसकी परंपरागत समर्थक रही हैं। लेकिन चुनाव जीतने के लिए भाजपा भी दलित और पिछड़ी जातियों के बीच पैठ बढ़ाने में जुटी हुई है। उ.प्र और बिहार जैसे  राज्यों में भाजपा को मिली सफलता इसका प्रमाण है। इससे प्रभावित होकर काँग्रेस भी दलित और पिछड़ी जातियों को लुभाने में लग गई। राहुल गाँधी पूरे देश में घूम - घूमकर मनु स्मृति विरोधी अभियान चला रहे हैं। देश की दोनों प्रमुख पार्टियों द्वारा सवर्णों को भगवान भरोसे छोड़ दिये जाने से अब उनके मन में ये धारणा बैठती जा रही है कि उनका कोई हितचिंतक नहीं है। आरक्षण विरोधी आंदोलन के प्रति सभी राजनीतिक दलों का उपेक्षभाव इसका प्रमाण है। सर्वोच्च न्यायालय तक ने आरक्षण की सुविधा प्राप्त परिवारों को उसके दायरे से बाहर करने जैसी टिप्पणियां समय - समय पर कीं किंतु किसी राजनेता में उनका समर्थन नहीं किया। सभी पार्टियां आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था को जारी रखने की पक्षधर हैं। राहुल गाँधी तो एक कदम आगे बढ़कर मनु स्मृति के बहाने सवर्ण समाज को खलनायक साबित करने में जुटे हुए हैं। लेकिन इस खींचातानी में एक नया वर्ग संघर्ष ओबीसी और अनु. जातियों/ जनजातियों के  बीच दिखने लगा है। इसी के चलते ओबीसी आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाये जाने का दलित और आदिवासी वर्ग विरोध कर रहा है। बड़ी बात नहीं आने वाले समय में ओबीसी जातियों और दलित - आदिवासियों के बीच टकराव की स्थिति बनने लगे। इसी के साथ ये खतरा भी है कि ओबीसी में नये - नये जाति समूह उभरने से आरक्षण के बंटवारे को लेकर उनके बीच ही खींचातानी शुरू न हो जाए। कुल मिलाकर आरक्षण अब भारतीय राजनीति की मजबूरी बन गई है। किसी भी पार्टी या नेता में उसके विरोध में बोलने का साहस नहीं है। लेकिन इसके चलते सवर्ण जातियों के बीच जो नाराजगी बढ़ रही है उसकी चिंता भी की जानी चाहिए। सवर्ण छात्रों का ये कहना सही है कि उनकी समस्याओं को राजनेता जिस तरह उपेक्षित कर देते हैं उसके कारण उनके मन में समूची व्यवस्था के प्रति वितृष्णा बढ़ती जा रही है। देश से प्रतिभाओं के पलायन के पीछे आरक्षण भी बड़ा कारण है।  आजकल सभी पार्टियां जेन जी को खुश करने में लगी हैं। लेकिन उन्हें ये ध्यान रखना होगा कि चुनाव के दिन अशिकांश मतदाता सब भूलकर जाति को ही याद रखते हैं। ऐसे में सवर्ण जातियों के जेन जी की  नाराजगी भी जीत - हार में निर्णायक हो सकती है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 29 August 2026

अमेरिका में संघ विरोधी मुहिम के पीछे बड़ा षडयंत्र



रा.स्व.संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत इन दिनों अमेरिका की यात्रा पर हैं। संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर  समाज के विभिन्न वर्गों से सम्पर्क की योजना के सिलसिले में देश भर में संघ प्रमुख ने लोगों से प्रत्यक्ष संवाद किया। इनमें संघ की विचारधारा के विरोधियों के घर पर जाकर मिलने जैसा अभिनव कार्यक्रम भी था। इसके पीछे का उद्देश्य संघ की विचारधारा और कार्यक्रमों के बारे में उस तबके को अवगत करवाना है जिनके मन में संघ को लेकर अनेकानेक भ्रांतियां हैं। संघ इसमें कितना सफल हुआ ये तो भविष्य बताएगा किंतु इस प्रयास कहें या प्रयोग किंतु लोकतंत्र में इस तरह का संवाद एक स्वस्थ वातावरण का निर्माण करता है। उल्लेखनीय है संघ प्रमुख डॉ. भागवत पूर्व में भी मुस्लिम और ईसाई धर्मगुरुओं से भेंट करते रहे जिसे लेकर तरह - तरह की चर्चाएं भी चलीं। बीते दिनों जब दिल्ली में जंतर मंतर पर युवाओं का आंदोलन हुआ और देश में जेन जी नामक नये आयु वर्ग समूह के मन में व्यवस्था के विरुद्ध व्याप्त असंतोष राष्ट्रीय विमर्श बन गया तब भी डॉ. भागवत ने मुंबई में युवाओं से प्रत्यक्ष संवाद कर उनकी भावनाओं को समझकर उनके असंतोष को दूर करने के लिए उनके प्रति स्थापित अवधारणा और व्यवहार के तौर - तरीकों में समयानुकूल बदलाव का सुझाव दिया। इसी क्रम में वे अमेरिका प्रवास पर गए हैं जहाँ संघ के हजारों स्वयंसेवकों के अलावा हिन्दू समाज रहता है। अपने वैचारिक पक्ष को उसके सामने रखने के उद्देश्य से हो रही इस यात्रा का वहाँ कतिपय तत्व विरोध कर रहे हैं। सबसे पहले चर्चा में आया न्यूयॉर्क के महापौर  ममदानी का विरोध जो ऐलनिया भारत विरोधी हैं। उसके बाद अमेरिका के सरकारी आयोग ने  संघ पर प्रतिबंध लगाने और इसके नेताओं के अमेरिकी वीजा पर रोक की मांग की है। यह मांग अमेरिकी संस्था यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम  ने की है।आयोग ने संघ पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमलों में शामिल होने और भारत में धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित करने का आरोप लगाते हुए संघ नेताओं को राजनयिक सम्मान न देने, उच्चस्तरीय बैठकें न करने और डॉ.भागवत का वीजा रद्द करने की सिफारिश की गई है। हालांकि ये एक सलाहकार संस्था है, इसलिए इसकी सिफारिशें मानने के लिए अमेरिकी सरकार बाध्य नहीं है।भारत सरकार ने इस आयोग को पक्षपाती और तथ्यात्मक रूप से भ्रामक बताते हुए इसकी रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया है। लेकिन  जिस अमेरिका में खालिस्तान समर्थक आतंकवादियों को पनाह मिलती हो और जिसने दुनिया में इस्लामिक आतंकवाद को पाल पोसकर बड़ा किया वहाँ संघ का विरोध अनाधिकार चेष्टा लगता है। और फिर जिस आयोग ने इसकी मांग  की उसका अध्यक्ष ही पाकिस्तानी मूल का है। ये अच्छा है कि अमेरिका के भीतर ही संघ  विरोधी मुहिम की निंदा हो रही है। यद्यपि अमेरिकी प्रशासन ने उक्त माँग पर कोई निर्णय नहीं किया किंतु इससे ये बात स्पष्ट हो गई कि अमेरिका में भी हिंदुत्व विरोधी लाॅबी काफी तेजी से सक्रिय है। इस बारे में ध्यान देने योग्य बात ये है कि हाल ही में जन्मी काकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके भी कुछ माह पहले अमेरिका से लौटे थे और उन्होंने भी यहाँ आकर संघ विरोधी बयानबाजी की। इससे ये आशंका और मजबूत हो गई कि अमेरिका से ही भारत में अस्थिरता फैलाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। संघ प्रमुख की इस यात्रा के विरोध की शुरुआत जिस ममदानी ने की उसकी जीत पर भारत में भी उसी वर्ग विशेष ने खुशियाँ मनाई थीं जो संघ का घोर विरोधी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 27 August 2026

नेपाल हादसे का सबक : पहाड़ों को भी शांति और आराम चाहिए



       नेपाल में आये जलसैलाब ने प्रलय जैसा मंजर उत्पन्न कर दिया। वर्ष 2013 के जून महीने में उत्तराखंड स्थित केदारनाथ धाम में भी इसी तरह के दृश्य देखने मिले थे। उस हादसे में भी सैकड़ों लोग मारे गए थे। केदारनाथ मंदिर से और ऊपर पहाड़ों पर हुई भारी बरसात के कारण हुए हिम स्खलन से बनी बड़ी झील के फूटते ही  असीमित जलधारा ने केदारनाथ धाम सहित गौरीकुंड और उसके आगे तक भयावह दृश्य उत्पन्न कर दिये। जलसैलाब के रास्ते में जो कुछ भी आया वह पलक झपकते नष्ट हो गया।  हिमालय की विशाल पर्वतमाला में प्राकृतिक आपदाओं का आना नई बात नहीं है किंतु केदारनाथ हादसा अकल्पनीय था जिसकी याद तक रोंगटे खड़े कर देती है। गत दिवस नेपाल में जो कुछ भी हुआ उसे उसकी पुनरावृत्ति कहना गलत नहीं होगा। वहाँ भी सैकड़ों लोग मौत का शिकार हुए जिनमें भारत से गए मानसरोवर यात्रियों सहित दर्जनों  देशी - विदेशी  सैलानी भी शामिल हैं । हादसे की विभीषिका समाचार माध्यमों से आये चित्रों और वीडियो से अनुभव की जा सकती है। इस प्राकृतिक आपदा  से भारत को भी सतर्क हो जाना चाहिये क्योंकि हमारे पहाड़ी क्षेत्रों और नेपाल की भौगोलिक संरचना और पर्यावरण की स्थिति कमोबेश एक समान है। बिहार और उ.प्र की नदियों में अचानक आई बाढ़ इसका प्रमाण है। 
       
     पहाड़ों को हौसलों का प्रतीक कहा जाता है। उन तक पहुंचने की इच्छा पर्वतारोहियों के अलावा रोमांच प्रेमी पर्यटकों में भी देखी जाती है। अनेक तीर्थ स्थल पहाड़ों में स्थित हैं। ग्रीष्म काल में हिल स्टेशन भी सैलानियों से भर जाते  हैं। प्रकृति प्रेमियों , साहित्यकारों , कलाकारों और छायाकारों में  भी पहाड़ों के प्रति दीवानगी होती है। पर्वतीय स्थल  मानसिक शांति के साथ - साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक माने जाते हैं। एक समय था जब वहाँ ऋषि - मुनि तपस्या करते थे। जड़ी - बूटियों के खजाने भी पर्वतीय क्षेत्रों में होते थे।  ब्रिटिश राज में   पर्वतीय क्षेत्रों  तक जाने के लिए सड़कें और रेल मार्ग भी बने। शिमला तो अंग्रेजों की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी। हालांकि आजादी के बाद भी पर्यटन केंद्रों के रूप में तीर्थस्थलों के अलावा पर्वतीय स्थानों को विकसित किया गया।  मध्यमवर्गीय पर्यटक बढ़ने से पर्वतीय क्षेत्रों में बेतहाशा भीड़ होने लगी है। विकास के तौर पर  सड़कों और पुलों आदि का निर्माण भी बड़ी मात्रा में हुआ जिनके  लिए वृक्षों की कटाई और पहाड़ों की छटाई भी व्यापक तौर पर की गई । उत्तराखंड में टिहरी बांध जैसी परियोजना भी बनी । पनबिजली संयंत्रों के लिए नदियों के पानी को घुमाने सुरंगें बनाई गईं। इन सबका दुष्परिणाम धीरे - धीरे आने लगा । भूस्खलन , भूकंप , ग्लेशियरों का सिकुड़ना  आदि लक्षणों के जरिए प्रकृति ने चेतावनी देने का क्रम जारी रखा किंतु विवेकहीन विकास के साथ ही आमोद - प्रमोद के उद्देश्य से किए जाने वाले पर्यटन ने उन संकेतों के प्रति उपेक्षाभाव प्रदर्शित किया । यही कारण है कि  उत्तराखंड , हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर के जिन क्षेत्रों में मानवीय आवाजाही ज्यादा होती  हैं वहां पर्यावरण का संतुलन गड़बड़ा गया । पर्वतों  को क्षति पहुंचाए जाने से उनकी आधारभूत संरचना को जो नुकसान हुआ उसकी वजह से  प्राकृतिक आपदाएं जल्दी - जल्दी आने लगी है।
   
    नेपाल की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है जो पर्यटकों के अलावा पर्वतारोहियों की पसंदीदा जगह है। गत दिवस वहाँ जो प्रलय लीला हुई उसे  तात्कालिक संकट मान लेना बड़ी भूल होगी। ये हादसा आगाह करता  है कि पहाड़ों में मानवीय गतिविधियों पर नियंत्रण होना चाहिए।  वहाँ होने वाले निर्माण में  कितनी  भी तकनीकी कुशलता दिखाई जाए किंतु ये सोचना मूर्खता है कि प्रकृति को बांधकर रखा जा सकता है।  हर दुर्घटना के बाद प्रकृति और पर्यावरण सुरक्षा की बातें तो बहुत होती हैं लेकिन जो सुधार होना चाहिए उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया जाता । सही बात तो ये है कि पहाड़ों को भी शांति के साथ आराम चाहिए। इसलिये बेहतर हो पहाड़ों के क्रोध को शांत करने का उपाय तलाश लिया जाए वरना नेपाल जैसी विनाशलीला का सामना हमें भी कब करना पड़ जाए ये कोई नहीं जानता। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 26 August 2026

मिसाइलों के उत्पादन में निजी क्षेत्र की भागीदारी स्वागत योग्य



राजनीतिक उहापोह के बीच इस खबर ने ध्यान आकर्षित किया कि अब मिसाइलें बनाने का लाइसेंस  निजी कंपनियों को भी दिया जाएगा और डी. आर. डी. ओ (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ) उन्हें  तकनीक स्थानांतरित भी करेगा। लेकिन परमाणु अस्त्र ले जाने में सक्षम मिसाइलों के उत्पादन से निजी क्षेत्र को अलग ही रखा जाएगा। रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी हमारे देश में कुछ साल पहले ही शुरू हुई। हालांकि अमेरिका सहित अनेक विकसित देश इस नीति को काफी पहले अपना चुके थे जिसके कारण उन्हें जबर्दस्त लाभ हुआ ।  मसलन उत्पादन बढ़ने के साथ ही अन्य देशों को उनका निर्यात भी बढ़ा। भारत भी जो सैन्य सामग्री आयात करता है उसमें विदेशी निजी कंपनियों के उत्पाद भी काफी होते हैं। हमारे देश में रक्षा उत्पादन पर लंबे समय तक  सरकारी नियंत्रण रहने से तकनीक का विकास अपेक्षित गति से नहीं हो सका। डी. आर. डी. ओ ने अवश्य काफी अनुसंधान किये जिसका लाभ हमारे मिसाइल कार्यक्रम की सफलता के रूप में सामने आया भी। लेकिन सरकारी क्षेत्र होने से उत्पादन हेतु निर्धारित समय सीमा का पालन नहीं हो पाता। कई बार आर्थिक संसाधनों की कमी समस्या बन जाती है। तेजस जैसा छोटा लड़ाकू विमान विकसित करने में दशकों लग गए । हालांकि देश में रक्षा उत्पादन के दर्जनों शासकीय संस्थान हैं जिनमें लाखों लोग काम करते हैं। इनमें बनने वाले बम, तोपें, गन, सहित अन्य सैन्य उपकरणों का आजादी के बाद हुए सभी युद्धों में समुचित उपयोग हुआ। जरूरत के समय इन संस्थानों में दिन - रात काम चलता है। ऐसे में ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि रक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में निजी उद्यमियों को  भला क्यों प्रवेश दिया जा रहा है? लेकिन समय के साथ चलने के लिए जरूरी है कि रक्षा उत्पादन में विश्वस्तरीय आधुनिकतम तकनीक को अपनाया जाए जिससे  हमारी सेनाएं पूरी तरह से सक्षम हो सकें साथ ही रक्षा उत्पादन के वैश्विक बाजार में भारत भी अपना स्थान बना सके। उल्लेखनीय है कि ब्रह्मोस मिसाइल सहित अनेक रक्षा उत्पादनों के निर्यात में भारत को बड़ी सफलता मिलने के बाद से इस दिशा में विचार शुरू हुआ। यद्यपि राजनीतिक खींचतानी और श्रमिक संगठनों के दबाव के कारण समय रहते  इस दिशा में नीतिगत निर्णय लेने का साहस सरकारी स्तर पर प्रदर्शित नहीं किया जा सका किंतु वर्तमान केंद्र सरकार ने एक तरफ जहाँ सेनाओं को सुसज्जित करने के लिए दुनिया भर से रिकार्ड तोड़ खरीदी की वहीं मेक इन इंडिया की नीति को उपभोक्ता वस्तुओं तक सीमित नहीं रखते हुए रक्षा उत्पादन के क्षेत्र तक उसका विस्तार कर दिया। इसके प्रारंभिक परिणाम अच्छे निकलने के कारण उसका उत्साह बढ़ा और धीरे - धीरे इसका दायरा बढ़ाते हुए मिसाइलों सहित अनेक संवेदनशील उपकरणों के उत्पादन लिए निजी क्षेत्र को अनुमति दे दी। डी. आर. डी. ओ द्वारा किये गए अनुसंधान को निजी क्षेत्र को देने का लाभ ये होगा कि इस काम में लगने वाला समय और संसाधन बच जाने से ये कंपनियां शीघ्रता से अपना उत्पादन शुरू कर सकेंगी। इस नीति का दोहरा लाभ ये होगा कि एक तरफ तो हमारे निर्यात में वृद्धि होगी वहीं दूसरी तरफ इन कंपनियों द्वारा उत्पादित जो भी सैन्य सामग्री हमारे लिए आवश्यक होगी उसका आयात नहीं करना पड़ेगा जिससे बेशमीमती विदेशी मुद्रा की बचत होने से व्यापार घाटा कम होगा साथ ही भारतीय रुपये के विनिमय मूल्य में भी सुधार होगा। यद्यपि विपक्ष खास तौर पर राहुल गाँधी जैसे नेता इस नीति पर हाय तौबा मचाये बिना नहीं रहेंगे क्योंकि जिन निजी कंपनियों के नाम सामने आये हैं उनमें अंबानी और अडानी की भी हैं जिनके विरोध में वे रोजाना कुछ न कुछ बोलते रहते हैं। लेकिन सरकार को इन सबसे विचलित हुए बिना आगे बढ़ना चाहिए। अभी तक जिन निजी कंपनियों को रक्षा उत्पादन के लिए लाइसेंस दिये गए उन सबका प्रदर्शन और उपलब्धियां उत्साह बढ़ाने वाली हैं। और फिर जब भारत में निजी क्षेत्र के उद्यमी उपग्रह प्रक्षेपण जैसे कारनामे सफलतापूर्वक कर सकते हैं तब मिसाइल और ऐसे ही अत्याधुनिक रक्षा उपकरण बनाने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होगी। साथ ही इसके चलते भारत की छवि दुनिया के पटल पर  एक विकसित और ताकतवर  देश के रूप में स्थापित होगी जिसके कारण विदेशी निवेशक भी आकर्षित होंगे। बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन में प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता कितनी आवश्यक है ये प. एशिया के वर्तमान संकट ने साबित कर दिया। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 25 August 2026

ब्रिक्स सम्मेलन के पहले कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन खतरे का संकेत



कॉकरोच जनता पार्टी ने धमकी दी है कि वह आगामी 5 सितंबर को दिल्ली के इंडिया गेट से पुलिस मुख्यालय तक मार्च निकालेगी। इसका नेतृत्व नीट पेपर लीक के कारण आत्महत्या करने वाले छात्रों के अलावा उन प्रदर्शनकारियों के परिजन करेंगे जिन पर जंतर मंतर आंदोलन के दौरान अपराधिक मामले दर्ज हुए हैं। पार्टी का कहना है कि  आंदोलन  जिन शर्तों पर समझौता हुआ था उनमें आत्महत्या पीड़ित परिवारों को मुआवजा और संसद भवन मार्च के दौरान  प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध दर्ज अपराधिक प्रकरण वापस लिया जाना भी था। लेकिन उक्त दोनों पूरी नहीं हुईं ।  उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार स्पष्ट कर चुकी है कि वह देख रही है कि मुआवजा किस प्रावधान के अंतर्गत दिया जा सकता है क्योंकि देश में हर साल अनेक छात्र विभिन्न कारणों से आत्महत्या करते हैं। इसलिए ये मुआवजा नजीर न बन जाए इसका ध्यान रखना भी जरूरी है। वैसे भी ऐसे मामलों में नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ता है जिनमें समय लगता है। और फिर आत्महत्या के मामले अलग - अलग राज्यों में होने के कारण स्थानीय प्रशासन की रिपोर्ट भी जरूरी होती है। इसी तरह  अपराधिक प्रकरण रद्द करने संबंधी आश्वासन के समय कॉकरोच जनता पार्टी ने खुद कहा था कि पुलिस पर हुए हमले और  सरकारी वाहनों में  तोड़फ़ोड़ उन अपराधी तत्वों द्वारा की गई जो छात्र बनकर आंदोलन में घुस आये थे। अतः उन पर कार्रवाई की जा सकती है। दिल्ली पुलिस ने भी अपनी प्रारंभिक जाँच रिपोर्ट में कहा कि  हिंसक उपद्रव करने वाले सैकड़ों प्रदर्शनकारियों का अपराधिक रिकार्ड है, जो छात्र नहीं हैं।  सर्वोच्च न्यायालय भी कह चुका है पुलिस पर हमला करने वालों के विरुद्ध प्रकरण दर्ज किये जा सकते  हैं। ऐसा लगता है कॉकरोच जनता पार्टी बहुत जल्दबाजी में है क्योंकि जंतर मंतर आंदोलन में हुए गाली - गलौच और अश्लीलता के प्रदर्शन की वजह से उसकी काफी आलोचना हुई। वहीं  रांची आंदोलन अपने अनुशासन और शालीनता के लिए प्रशंसित हुआ। इसके अलावा कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं को अनेक स्थानों पर विरोध का सामना करना पड़ा। राजस्थान में तो उनकी पिटाई तक हो गई। उनकी उम्मीद के मुताबिक देश भर में युवा आंदोलन भी नहीं खड़ा हो रहा। धर्मेंद्र प्रधान के हटने के बाद छात्रों में पैदा किया गुस्सा भी ठंडा पड़ गया। ये देखते हुए पार्टी ने  5 सितंबर को दिल्ली में मार्च निकालने की जो धमकी दी उसका समय जान बूझकर ऐसा रखा गया जिससेे केंद्र सरकार दबाव में आ जाए। इसका कारण 12 - 13 सितंबर को दिल्ली में होने जा रहा ब्रिक्स सम्मेलन है जिसमें चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति पुतिन सहित 20 देशों के शीर्ष नेताओं का आगमन संभावित है। भारत इसकी मेजबानी कर रहा है। इसलिए सरकार किसी भी सूरत में दिल्ली की शांति - व्यवस्था भंग नहीं होने देना चाहेगी। जंतर मंतर आंदोलन के कड़वे अनुभव के बाद कॉकरोच जनता पार्टी पर भरोसा करना भी भूल होगी। किसी भी अंतर्राष्ट्रीय आयोजन के पहले माहौल तनावपूर्ण होने पर विदेशी मेहमान अपना आगमन टाल सकते हैं । इसीलिए दिल्ली पुलिस सहित अन्य  एजेंसियां भी अभी से सुरक्षा प्रबंधों में जुट चुकी हैं। कॉकरोच जनता पार्टी इस बात से अनभिज्ञ हो ऐसा नहीं है। लेकिन उसके नेताओं का सार्वजनिक व्यवहार बेहद गैर जिम्मेदाराना है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि उनमें वैसा ही अहंकार आ गया है जैसा कुछ साल पहले तक अरविंद केजरीवाल में देखा जाता था जो प्रधानमंत्री  को चुनौती देते हुए कहते थे कि इस जन्म में तो वे आम आदमी पार्टी को नहीं हरा पाएंगे। और फिर अभी तक अभिजीत दिपके और उनकी टीम यही तय नहीं कर सकी कि उनकी दिशा क्या है? यदि वे 5 सितंबर के प्रदर्शन के लिए अड़ते हैं तब ये संदेह और पक्का हो जाएगा कि उनकी पीठ पर उन विदेशी शक्तियों का हाथ है जो भारत में अराजकता फैलाकर आंतरिक सुरक्षा को खतरे में डालना चाहती हैं। वरना ब्रिक्स जैसे बेहद महत्वपूर्ण वैश्विक सम्मेलन के एक सप्ताह पूर्व दिल्ली  में ऐसा कुछ करने की क्या जरूरत आ गई जिससे कि कानून व्यवस्था बनाये रखने की समस्या उत्पन्न हो। ऐसे आयोजनों की सफलता देश की प्रतिष्ठा बढ़ाती है। लेकिन ऐसा लगता है कॉकरोच जनता पार्टी को उसकी लेश मात्र चिंता नहीं है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 24 August 2026

पहले जनेऊधारी कश्मीरी ब्राह्मण होने का दावा और अब मनु स्मृति का विरोध



वर्ष 2017 के नवंबर माह में  राहुल गाँधी सोमनाथ मंदिर में दर्शन हेतु गए तब वहाँ अतिथि पुस्तिका में उनका नाम गैर हिन्दू के तौर पर दर्ज  किया गया। उस समय  गुजरात विधानसभा के चुनाव चल रहे थे। श्री गाँधी का नाम गैर हिन्दू के रूप में दर्ज होने की जानकारी सार्वजनिक होते ही कांग्रेस  में ये भय व्याप्त हो गया कि इसके कारण गुजरात में हिंदुओं के बीच पार्टी का रहा - सहा जनाधार भी खिसक न जाए। इसलिए फ़ौरन बचाव अभियान शुरू हुआ। राहुल खुद तो नहीं बोले किंतु कांग्रेस की ओर से रणदीप सुरजेवाला ने पत्रकार वार्ता में  श्री गाँधी का नाम गैर हिन्दू बताये जाने को भाजपा की साजिश बताते हुए कहा कि वे कश्मीरी ब्राह्मण हैं और उनका गोत्र दत्तात्रेय है ।  उन्होंने राहुल के जनेऊधारी होने का दावा करते हुए  प्रमाण स्वरूप कुछ चित्र भी जारी किये गए जिनमें स्व. राजीव गाँधी की अस्थियाँ संचय करने के दौरान उन्हें जनेऊ धारण किये दिखाया गया है। एक अन्य चित्र में वे अपनी बहिन प्रियंका के विवाह के मौके पर भी जनेऊ में दिखे। उसके बाद श्री गाँधी को न सिर्फ हिन्दू अपितु ब्राह्मण साबित करने के योजनाबद्ध प्रयास भी होने लगे।  पुष्कर में भी श्री गाँधी ने खुद को कश्मीरी ब्राह्मण और  गोत्र दत्तात्रेय लिखवाया। फिर  शिव भक्त बताते हुए मानसरोवर की यात्रा पर गए। हालांकि लौटते समय उन्होंने चीनी सरकार के प्रतिनिधियों से मुलाकात भी की जिसके बारे में कोई खुलासा नहीं हुआ। उसके पहले डोलकाम में चीन के साथ चल रहे टकराव के समय वे नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास भी गए जिसके बारे में न तो उन्होंने कुछ बताया और न ही कांग्रेस पार्टी ने। स्मरणीय है राजीव गाँधी फाउंडेशन को चीन से मिलने वाला अनुदान भी काफी चर्चाओं में रहा। बहरहाल, हिंदुओं विशेषतः भाजपा के पक्के समर्थक माने जाने वाले सवर्ण मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए राहुल को ब्राहमण साबित करने का अभियान आगे भी जारी रहा जिसके अंतर्गत वे हिन्दू मंदिरों और मठों में मत्था टेकने के साथ ही पूजा - अनुष्ठान भी करते देखे गए। लेकिन उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली जिसका कारण उनकी जाति और धर्म को लेकर व्याप्त अनिश्चितता है। स्मरणीय है उनके दादा पारसी थे। उस आधार पर उनका धर्म भी वही माना जाता है । इसलिए जब  श्री गाँधी ने जनेऊधारी कश्मीरी ब्राह्मण होने का दावा किया तब जनमानस में उसे मान्यता नहीं मिली जिसका प्रमाण काँग्रेस की पराजय का सिलसिला जारी रहना है। यहाँ तक कि राहुल को 2019 के लोकसभा चुनाव में अपनी पुश्तैनी सीट अमेठी से भी हार का सामना करना पड़ा जहाँ के ब्राह्मण नेहरू - गाँधी परिवार के स्थायी समर्थक थे। उसी के बाद श्री गाँधी का ब्राह्मण प्रेम ढलान पर आ गया। और वे जातियों के गुणा - भाग में जुट गए। जातिगत जनगणना के अलावा नौकरियों में जातियों की संख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व का मुद्दा उन्होंने उठाया किंतु 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली सीमित सफलता से बढ़ा उनका उत्साह  हरियाणा , महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार और प. बंगाल के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के दयनीय प्रदर्शन से ठण्डा पड़ गया। और तभी से उन्होंने सपा - बसपा और वामपंथियों की नकल करते हुए मनुवाद और ब्राह्मणवाद पर हमले शुरू किये जिसका ताजा प्रमाण बीते पिछले दिनों पुणे में आयोजित छात्राओं के एक जलसे में मिला। जहाँ उन्होंने मनु स्मृति के एक हिस्से में लड़कियों के पिता, पति और बेटों के अधीन रहने की व्यवस्था की आलोचना करते हुए उपस्थित छात्राओं को पितृ सत्तात्मक सोच से मुक्त होने की सलाह दी। वे बिना मनु स्मृति को उद्धृत किये भी लड़कियों को आत्मनिर्भर होने के लिए प्रेरित कर सकते थे किंतु उन्होंने मनु स्मृति को कठघरे में खड़ा किया जिसका उद्देश्य सीधे - सीधे दलित और पिछड़ी जातियों में उच्च जातियों के प्रति विद्वेष का भाव उत्पन्न करना था। लेकिन जिस तरह राहुल का जनेऊधारी कश्मीरी ब्राह्मण होने का स्वांग जनता को रास नहीं आया उसी तरह मनु स्मृति को गाली देकर दलित और पिछड़े वर्ग को आकर्षित करने का ये दाँव भी बेअसर ही रहेगा। इसकी वजह ये है कि जिस तरह उनके ब्राह्मण होने में बनावटीपन था वही मनुवाद के विरोध में भी है। सही बात तो ये है कि श्री गाँधी आगामी उ.प्र और पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को दोबारा खड़ा करने हाथ - पाँव मार रहे हैं। लेकिन उ.प्र में जहाँ भाजपा विरोधी दलित और पिछड़ा वर्ग के अलावा मुस्लिम भी कांग्रेस के बजाय अखिलेश यादव और मायावती के प्रभाव में हैं वहीं पंजाब में कांग्रेस की आपसी लड़ाई उसकी संभावनाओं पर ग्रहण लगा रही है। बेहतर हो श्री गाँधी हिन्दू समाज में फूट डालकर चुनाव जीतने का ख्वाब छोड़ दें। वैसे भी हर चुनावी हार के बाद उनका मुद्दा बदलता रहता है। इसीलिए लंबे समय से किसी ने उनके मुँह से वोट चोरी नहीं सुनी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी



Saturday, 22 August 2026

इस्लामिक नाटो : डर न सही किंतु सतर्कता जरूरी





पाकिस्तान में तुर्किये के लड़ाकू विमानों की खेप उतरने के बाद भारत में चिंता महसूस की जा रही है। हाल ही में सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने  एक समझौता किया जिसके अनुसार इनमें से किसी एक पर हुआ हमला सभी पर माना जाएगा। इस्लामिक नाटो का गठन होने के पहले पाकिस्तान व सऊदी अरब में इस तरह का  समझौता हो चुका था। लेकिन उसकी पोल उस समय खुल गई जब ईरान ने सऊदी अरब पर मिसाइलें दागीं तब पाकिस्तान ने कुछ नहीं किया। उल्टे वह ईरान और अमेरिका के बीच  मध्यस्थता में जुटा रहा। हालांकि उन कोशिशों का कोई लाभ नहीं हुआ और ईरान तथा अमेरिका दोनों ने उसको  हाशिये पर धकेल दिया। दरअसल पाकिस्तान को इस बात का डर सता रहा है कि इजरायल उसे भी निशाना बना सकता है। इसीलिए उसने पहले सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता किया और अब तुर्किये को भी उसमें जोड़कर अपने लिए रक्षा कवच  का इंतजाम कर लिया। स्मरणीय है तुर्किये पिछले काफी समय से भारत विरोधी रुख अपनाते हुए पाकिस्तान को सैन्य सामग्री उपलब्ध करवाने में आगे - आगे है। ये भी खबर है कि उसके लड़ाकू विमानों के अलावा चीन ने भी अपने युद्धक विमान पाकिस्तान में तैनात किये हैं। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इस जमावड़े को सीधे - सीधे भारत विरोधी मोर्चेबंदी न भी मानें किंतु इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि भविष्य में  तनाव उत्पन्न होने पर ये विमान भारत के विरुद्ध इस्तेमाल हो सकते हैं। फिलहाल तो ये लग रहा है कि पाकिस्तान को भारत के साथ ही इसरायल से भी डर लग रहा है। इसके अलावा ईरान भी उसे संदेह की नजर से देखने लगा है क्योंकि इस्लामाबाद में भले ही अमेरिका और उसके बीच मध्यस्थता की बिसात बिछी किंतु पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख आसिफ मुनीर जिस प्रकार से डोनाल्ड ट्रम्प के चरण चुंबन में जुटे रहे उससे ईरानी हुकूमत सशंकित हो उठी है। उधर इसरायल की नाराजगी इस बात से है कि पाकिस्तान ने गाजा लड़ाई के समय हमास का साथ दिया वहीं  अन्य इस्लामिक आतंकवादी संगठनों के प्रति भी उसकी, सहानुभूति सर्वविदित है।   और फिर पाकिस्तान खुद भी आतंकवाद की नर्सरी के तौर पर कुख्यात है। लेकिन इस्लामिक नाटो के गठन में जो जल्दबाजी की गई उसके पीछे का कारण  उसकी आंतरिक उथल - पुथल है। बीएलए (बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी) नामक संगठन द्वारा बलूचिस्तान को अलग देश बनाने के लिए किये जा रहे सशस्त्र संघर्ष ने इस्लामाबाद में बैठे हुक्मरानों की नाक में दम कर रखा है। इसकी, देखा सीखी सिंध प्रांत में जिये सिंध आंदोलन के बीज फिर अंकुरित होने लगे हैं। पश्चिमी सीमांत पर  अफ़ग़ानिस्तान पालित तालिबानी लड़ाके पाकिस्तान की सीमा में घुसकर जमीन कब्जाते जा रहे हैं। और अब पाक अधिकृत कश्मीर में भी  वैसा ही विद्रोह देखने मिल रहा है जैसा 1970 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में हुआ जिसके बाद मुल्क के दो टुकड़े हो गए। पाक अधिकृत कश्मीर और बलूचिस्तान में चीन का बड़ा पूंजी निवेश होने से वहाँ की तनावपूर्ण स्थिति ने बीजिंग की नींद उड़ा दी है। उसके जो प्रकल्प चल रहे हैं उनमें कार्यरत इंजीनियरों सहित अन्य कर्मियों पर जानलेवा हमले हो चुके हैं। स्थानीय जनता के विरोध से कई काम बंद  हैं। पाकिस्तानी सरकार का आरोप है कि मुल्क के भीतर हो रही गड़बड़ियों में   भारत की भूमिका है। उसे ये भय भी है कि पाक आधिकृत कश्मीर और बलूचिस्तान में भारत वैसी ही कार्रवाई कर सकता है जैसी उसने बांग्लादेश में की थी। उसकी चिंता ये भी है कि अफ़ग़ानिस्तान से भारत  के रिश्ते बेहद मधुर चल रहे हैं। वह इस देश को हर संभव सहायता दे रहा है। इस्लामाबाद को इस बात की आशंका है कि भारत , अफगानिस्तान की धरती से बलूचिस्तान के स्वाधीनता संघर्ष को सक्रिय सहायता दे सकता है। चूंकि राजनीतिक अस्थिरता भी पाकिस्तान के लिए सिरदर्द बनी हुई है इसलिए उसे बाहरी संरक्षण की जरूरत पड़ गई। हालांकि इस्लामिक नाटो उसकी हिफाजत कर सकेगा ये संदिग्ध है क्योंकि तुर्किये और सऊदी अरब दोनों अपनी समस्याओं में जिस तरह उलझे हैं उनसे निकलकर पाकिस्तान की मदद करना बेहद कठिन है। हाँ, ईरान पर दबाव बनाने के लिए अवश्य ये गठजोड़ कारगर हो सकता है। भारत को इससे डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि सऊदी अरब , भारत से पंगा लेने की हिमाकत नहीं करेगा। चीन भी घुड़कियाँ कितनी भी दे लेकिन वह सीधी टक्कर से बचता है। लेकिन सतर्कता जरूरी है क्योंकि तुर्किये और पाकिस्तान धूर्तता के पर्याय हैं। हालांकि पाकिस्तान अपनी आंतरिक समस्याओं में उलझा होने से सीमा पर बड़ी हरकत करने से बचेगा क्योंकि बालाकोट और पिछले मिनी युद्ध की पिटाई वह भूला नहीं होगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 21 August 2026

जेन जी आंदोलन को मुख्य धारा की राजनीति का समर्थन नहीं



बीते एक दशक में अनेक युवा चेहरे धूमकेतु की तरह उभरे जिन्होंने  बड़े - बड़े आंदोलन खड़े कर सरकार को चुनौती दी । भले ही वे उसे अंजाम तक नहीं पहुंचा सके किंतु  युवाओं का एक वर्ग उनके प्रति आकृष्ट हुआ। उनके आह्वान पर जमा हजारों की भीड़  जोशीले भाषण सुनकर तोडफ़ोड़ और हिंसा के रास्ते पर चलने में भी नहीं डरती। हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकुर, जिग्नेश मेवाणी,  कन्हैया कुमार , उमर खालिद, शर्जील इमाम और ऐसे ही अनेक नाम युवा क्रांति के अग्रदूत बनकर परिदृश्य पर उभरे किंतु जिस तेजी से उनका सितारा चमका उसी तेजी से वह फीका पड़ गया।इनमें से कुछ जेल में हैं, कुछ मामूली सफलता पाकर संतुष्ट हैं और बाकी ने अपना भविष्य सुरक्षित करने के लिए किसी राजनीतिक पार्टी का दामन थाम लिया। लेकिन उसके बाद भी वे उस शोहरत को बरकरार नहीं रख सके जो उन्हें कुछ समय के लिए मिली। दरअसल उन्होंने जिस जमीन बड़ी इमारत खड़ी करने का दुस्साहस किया वह ठोस नहीं थी। किसी  ज्वलंत मुद्दे को गर्म करके भीड़ एकत्र कर उसे  उकसाने में उन्हें भले ही सफलता मिली किंतु वह टिकाऊ नहीं हो सकी। दरअसल वे इस बात को नजरंदाज कर बैठे कि भीड़ को संगठित शक्ति में बदलना  कठिन होता है। वह क्षणिक तौर पर तो प्रभाव छोड़ती है किंतु जल्द ही उसमें बिखराव आने लगता है। महत्वाकांक्षाओं का टकराव  अंतर्कलह का रूप लेता है जिसके कारण  आंदोलन का मूल स्वरूप नष्ट होकर निजी हित सर्वोपरि हो जाते हैं।  उदाहरण के तौर पर  हार्दिक पटेल और कन्हैयाकुमार जैसे नाम उल्लेखनीय हैं। हार्दिक ने गुजरात की शक्तिशाली पटेल जाति को भाजपा सरकार के विरुद्ध सड़कों पर उतारकर  राजनीतिक समीकरण उलट - पुलट करने की संभावना उत्पन्न कर दी थी। लेकिन अंततः वे भी भाजपा शरणम् गच्छामि होकर विधायक बने बैठे हैं। दलितों की आवाज उठाकर प्रकाश में आये जिग्नेश भी लंबी रेस का घोड़ा नहीं बन पाए। दिल्ली स्थित वामपंथियों की वैचारिक नर्सरी कहे जाने वाले जे. एन. यू के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार अपनी ओजस्वी भाषण शैली के चलते वामपंथ के भविष्य  के तौर पर उभरे। लेकिन जब कोई संभावना नहीं दिखी तब कांग्रेस में आकर राहुल गाँधी के पिछलग्गू बन बैठे। 2019  में बिहार के घरेलू मैदान बेगूसराय और 2024 में बाहरी दिल्ली में उन्हें शर्मनाक पराजय झेलना पड़ी जबकि इस सीट पर लाखों की संख्या में बिहारी मतदाता हैं। इसी तरह का उदाहरण है अन्ना हजारे के आंदोलन से उत्पन्न आम आदमी पार्टी जो भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था का नारा लगाकर सत्ता तक जा पहुंची।  उसके आकर्षण में फंसकर अनेक  प्रतिभाशाली युवा अपना स्वर्णिम भविष्य दांव पर लगाकर साफ - सुथरी राजनीति का झंडा उठाये घूमने लगे। लेकिन जल्द ही उसके अनेक संस्थापक  खुद बाहर आ गये और जिन्होंने अरविंद केजरीवाल को उनके वायदे याद दिलाये उन्हें धकियाकर बाहर कर दिया गया। इसी तरह अनेक युवा भी निराश होकर दूसरे रास्ते पर चले गये। आज पार्टी की दशा और दिशा क्या है ये बताने की जरूरत नहीं है। उपरोक्त उदाहरण देने का उद्देश्य ये बताना मात्र है कि क्षणिक उन्माद के बल पर चमकने वाले आंदोलन और उसका नेतृत्व करने वाले चंद चेहरे समय के प्रवाह में कहाँ ओझल हो जाते हैं,  पता ही नहीं चलता। बीते कुछ समय से हमारे देश में युवाओं को समूहबद्ध कर एक बड़ा आंदोलन खड़ा करने का अभियान चल रहा है। जेन जी नामक एक  आयु वर्ग को सामने लाकर व्यवस्था में व्याप्त विकृतियों के विरुद्ध आंदोलन के जरिये सत्ता को चुनौती देने का प्रयोग शुरू किया गया जिसका पहला प्रदर्शन दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए आंदोलन के रूप में देखा गया।लेकिन तात्कालिक सफलता के बाद वह सैलाब जैसे आया वैसे ही चलता बना। अब उसके कथित नेता अपने लिए किसी भूमिका की तलाश में हैं। लेकिन जो युवा शक्ति उस आंदोलन में नजर आई उसका कोई संगठित ढांचा नहीं होने के कारण उस आंदोलन की उपलब्धियों से ज्यादा उसके साथ जुड़ी नकारात्मक बातों की चर्चा हो रही है। ये कहना भी गलत न होगा कि आंदोलन में शामिल अनेक युवा और छात्र अपराधबोध से ग्रसित हैं। दो दिन पहले लद्दाख़ जा रही एक युवती ने जेन जी के नाम पर वहाँ उपस्थित सेना के अधिकारी और सुरक्षा बल के लोगों से जो बेहूदगी की उसकी पूरे देश में निंदा हो रही है। जेन जी को मोहरा बनाकर देश में अव्यवस्था और  अराजकता फैलाने की जो योजना कुछ लोगों ने तैयार की थी वह शुरुआती दौर में ही दम तोड़ती दिख रही है क्योंकि उसके पीछे अधकचरी सोच और देश को अस्थिर करने में लगीं विदेशी शक्तियों का हाथ है। यही वजह है कि इस खेल को मुख्य धारा की राजनीति का समर्थन हासिल नहीं हो पाया। ऐसे में बड़ी बात नहीं अभिजीत दिपके और उनके कुछ साथी जल्द ही किसी पार्टी की गोद में बैठे दिखें। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 20 August 2026

कांग्रेस के फैसले से अलगाववादी ताकतों का हौसला बुलंद होगा



कांग्रेस कार्यसमिति ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम के केवल दो पद ही गाने का प्रस्ताव गत दिवस पारित कर दिया। उसका कहना है कि 1937 में भी पार्टी द्वारा वंदे मातरम के प्रारंभिक दो पद ही गाने का निर्णय तमाम बड़े नेताओं की उपस्थिति में किया गया था। और उसी के आधार पर आजादी के बाद जब संविधान बना तब गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा रचित जन गण मन को राष्ट्रगान घोषित किया गया। वहीं वंदे मातरम को राष्ट्रगीत की मान्यता देते हुए उसके शुरुआती दोनों पद गाने पर सहमति बनी। तब से अभी तक यही परिपाटी चली आ रही थी । सरकारी आयोजनों में राष्ट्रगीत होने के साथ ही वंदे मातरम का गायन अनिवार्य नहीं था। लेकिन मानसून सत्र में संसद ने इसे भी राष्ट्रगान के समकक्ष मान्यता देते हुए ये कानून पारित कर दिया कि वंदे मातरम का गायन राष्ट्रगान के पहले होगा। इसके सभी छंद गाये जाएंगे और इस दौरान सभी खड़े रहेंगे। नये कानून के अनुसार वंदे मातरम का अपमान दंडनीय अपराध होगा। लेकिन कांग्रेस सांसद  इमरान मसूद ने तो    सार्वजनिक रूप से कहा है कि इस्लाम का अनुयायी होने से उन्होंने वंदे मातरम न कभी गाया , न कभी गाएंगे। ऐसे ही बयान कुछ मुस्लिम संगठनों के नेताओं ने भी दिये। इसका कारण राष्ट्रगीत के दो पदों के बाद के हिस्से में हिन्दू देवियों का महिमामंडन है। निजी तौर पर किसी व्यक्ति का अपनी धार्मिक मान्यताओं के वशीभूत ऐसा करने का औचित्य एक बार स्वीकार कर भी लिया जाए लेकिन  एक राजनीतिक दल जिसकी आजादी की लड़ाई में अग्रणी भूमिका रही हो , वह उस गीत के पूरे हिस्से से दूरी बनाते हुए केवल दो पदों को ही मान्य करे तब वह उस भावना का भी अपमान है जिसमें डूबकर स्वाधीनता सेनानी वंदे मातरम गाते थे। रही बात धार्मिक मान्यताओं  की तो मुस्लिम धर्मावलंबियों के मुताबिक  वे केवल अल्लाह की ही जयकार कर सकते हैं।  उस दृष्टि से तो राष्ट्रध्वज तिरंगे का अभिवादन करने के साथ ही भारत माता की जय बोलना भी इस्लामी मान्यताओं के विरुद्ध है। उल्लेखनीय है मुस्लिम  लीग ने स्वाधीनता के पहले भी वंदे मातरम का विरोध किया था। अब सवाल ये है कि कांग्रेस की देखासीखी अन्य पार्टियां भी कोई कारण बताकर वंदे मातरम के साथ ही राष्ट्रगान जन गण मन को पूरा गाने से इंकार करते हुए उसमें मनमाफिक संशोधन करने का प्रस्ताव पारित करें तब क्या ऐसा करने की छूट उन्हें दी जानी चाहिए? कुछ प्रदेशों ने तो राष्ट्रध्वज के साथ ही अपना अलग झंडा भी बना लिया जिस पर विवाद छिड़ा था। गौरतलब है हमारे संविधान तक में हिंदू देव पुरुषों  और पौराणिक प्रतीक चिन्हों के चित्र हैं। सरकार के अनेक संस्थानों के ध्येय वाक्य वैदिक मंत्रों पर आधारित हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की समाधि पर भी हे राम लिखा गया है। ये देखते हुए कांग्रेस द्वारा वंदे मातरम को लेकर जो प्रस्ताव पारित किया गया वह अनावश्यक भी है और आपत्तिजनक भी। हमारे देश में अनेक ऐसी क्षेत्रीय पार्टियां हैं जो संघीय ढांचे की अवधारणा का विरोध करती हैं। द्रमुक के एक नेता ने तो यहाँ तक धमकी दे डाली थी कि  राष्ट्रभाषा के नाम पर हिन्दी लादे जाने पर तमिलनाडु अलग देश बन जाएगा। पूर्वोत्तर में सक्रिय रहे अनेक अलगाववादी संगठन भी देश से अलग होने की धमकी देते रहे हैं। जम्मू कश्मीर में धारा 370 रहते तक अलगाववाद की भावना चरम पर थी। ऐसे में यदि कांग्रेस जैसी देश की सबसे पुरानी पार्टी राष्ट्रगीत जैसे राष्ट्रीय सम्मान के प्रतीक को आधा - अधूरा स्वीकार करे तो इससे उन ताकतों का हौसला बुलंद होता है जिन्हें भारत को माँ कहने में शर्म आती है। कांग्रेस के इस फैसले के राजनीतिक स्तर पर होने वाले विरोध से परे हटकर देखें तो ये एक खतरनाक सोच को बढ़ावा देने वाला है। जल्द ही पंजाब में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं जहाँ खालिस्तान समर्थक सिर उठा रहे हैं। दिल्ली में हुए किसान आंदोलन के दौरान लालकिले पर राष्ट्रध्वज के स्थान पर एक धार्मिक झंडा लगाए जाने का दुस्साहस तक किया गया। अरुंधती रॉय जैसे लोग आज भी जम्मू कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानते। जेएनयू के वामपंथी छात्र संगठन आजादी - आजादी का जो नारा लगाते हैं वह भी अलगाववाद से प्रेरित ही है। ऐसे में कांग्रेस को वंदे मातरम में कांट- छांट करने जैसा प्रस्ताव पारित करने के पहले उसके संभावित नुकसान के बारे में सोचना चाहिए था। महज इसलिए कि भाजपा सरकार ने उसके बारे में कानून बनाकर उसे सम्मान दिया, उसका विरोध करना बेहद गैर जिम्मेदाराना निर्णय है। यदि किसी को अपने धार्मिक बंदिशों के चलते राष्ट्रगीत गाने में ऐतराज है तो ये उसका निजी मामला हो सकता है लेकिन एक राजनीतिक पार्टी ऐसा सोचे तो ये राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध होगा। कांग्रेस को इससे राजनीतिक नुकसान होगा सो अलग। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 19 August 2026

प. एशिया में परमाणु युद्ध की आशंका बढ़ रही




पूरी दुनिया को हलाकान करने वाला प. एशिया संकट सुलझने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच हुए युद्धविराम के बाद ऐसा लगा था कि शायद शांति कायम हो जाएगी किंतु दोनों ही पक्षों के अड़ियल रवैये के चलते जंग रुक - रुककर चलती ही रही। इसके लिए कुछ सीमा तक इजरायल भी कसूरवार है जिसने युद्धविराम को न मानते हुए लेबनान और उसके यहाँ सक्रिय हिज़्बुल्लाह नामक आतंकवादी संगठन के ठिकानों पर हमले जारी रखे। इससे नाराज ईरान  भी हमलावर रुख अपनाने से बाज नहीं आया। सबसे बडी़ समस्या बना होर्मुज नामक जलडमरूमध्य जहाँ से दुनिया को 20 फीसदी कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति होती है। यद्यपि इस समुद्री मार्ग के एक भाग पर ओमान की हिस्सेदारी भी है किंतु फिलहाल तो ईरान ने यहाँ के यातायात पर अपना नियंत्रण स्थापित कर रखा है और जो भी जहाज गुजरते हैं उनसे भारी - भरकम टोल टैक्स वसूल रहा है। हालांकि उसने ओमान को होर्मुज के नियंत्रण में साझेदार बनाने की पेशकश भी की लेकिन अमेरिका इसके लिए राजी नहीं है । कल ही उसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने होर्मुज को अमेरिका का हिस्सा बताते हुए नया नक्शा जारी कर दिया। प. एशिया के इस तनाव ने पूरी दुनिया को ऊर्जा संकट में डाल दिया है। दाम बढ़ने के साथ ही आपूर्ति प्रभावित होने से लगभग सभी देश परेशान हैं। इस बेवजह की लड़ाई के लिए कौन जिम्मेदार है ये कह पाना मुश्किल है। हालांकि शुरुआत गाजा का शासन संभाल रहे हमास द्वारा इजरायल पर किये अप्रत्याशित  हमले से हुई। इस इस्लामिक आतंकवादी संगठन की पीठ पर ईरान का हाथ सर्वविदित है। लेकिन पहले वार में सफल होने के बाद हमास का वह दुस्साहस गाजा के विनाश का कारण बन गया। हमास को नेस्तनाबूत करने के साथ ही इजरायल ने गाजा पर अपना कब्जा जमा लिया। इसके बाद ही उसके प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने डोनाल्ड ट्रम्प को ईरान पर हमला करने के लिए उकसाया। वैसे भी अमेरिका लंबे समय से ईरान से खार खाये बैठा था और उसके परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए पहले भी वह बमबारी कर चुका था। ट्रम्प को लगा ये अच्छा अवसर है ईरान को घुटनाटेक करवाते हुए वहाँ अपने अनुकूल सत्ता कायम करने का। पहले ही दिन उसके सर्वोच्च शासक खामेनेई की हत्या में सफलता मिलने से अमेरिका और इजरायल दोनों का हौसला आसमान पर जा पहुंचा। अमेरिका में जा बसे ईरान के शाह के बेटे को तेहरान लाकर उनकी ताजपोशी की योजना भी बना ली गई।लेकिन ईरान ने जंग को  बड़े हिस्से में फैलाते हुए अमेरिका और इजरायल दोनों को चौंका दिया।दुबई, ओमान, अबू धाबी, सऊदी अरब, कतर जैसे देशों में बने अमेरिकी सैनिक अड्डों पर मिसाइलें दागकर ट्रम्प की हेकड़ी निकाल दी। ईरान की ये कार्रवाई अभी भी जारी है। ट्रम्प द्वारा ईरान को दी गई धमकियाँ बंदर घुड़की साबित हुई हैं। भले ही अमेरिकी बमबारी ने ईरान को दशकों पीछे धकेल दिया हो किंतु उसे झुकाने का मंसूबा धरा का धरा रह गया। होर्मुज को ईरान के कब्जे से मुक्त करवाने में भी ट्रम्प नाकामयाब साबित हुए। ऐसे में  इस लड़ाई का अंत दिखाई नहीं दे रहा। ईरान ट्रम्प की कोई शर्त मानने राजी नहीं है। दूसरी तरफ इजरायल भी आर - पार के मूड में है। ईरान के पड़ोसी देश शांति की कोई पहल करते भी हैं तो कभी ट्रम्प और नेतन्याहू टांग फंसा देते हैं, कभी ईरान बाधक बन जाता है। संरासंघ इस समूचे घटनाक्रम में मिट्टी का माधो साबित हुआ है। वहीं रूस खुद ही यूक्रेन के साथ अंतहीन जंग में उलझा है जबकि चीन ईरान को पर्दे के पीछे रहकर पूरी मदद करने के बावजूद सामने आने तैयार नहीं है। इस प्रकार  कोई बड़ी ताकत इस लड़ाई को रुकवाने आगे नहीं आ रही। जहाँ तक भारत का प्रश्न है तो ये परिस्थिति बेहद तकलीफदेह है। खाड़ी देशों से कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति पर तो असर पड़ा ही इन देशों को  होने वाले निर्यात पर भी विपरीत असर पड़ा है। ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस से खरीदी करने पर ट्रम्प लगातार बढ़ाते हुए टैरिफ को 100 फीसदी तक ले आये। आज की स्थिति में इस संकट का हल किसी को नहीं पता। हालांकि अमेरिका और ईरान दोनों को बड़ा नुकसान होने के साथ ही उनकी सैन्य क्षमता भी न्यूनतम स्तर पर आ गई है। लेकिन अभी भी अमेरिका, ईरान और इजरायल तीनों युद्ध रोकने के कोई संकेत नहीं दे रहे। ऐसा लगता है कोई भी ये एहसास नहीं होने देना चाह रहा कि उसका दम फूल गया। हालांकि इस अनिश्चितता के बीच इस बात की आशंका उत्पन्न होने लगी है कि इस लड़ाई का अंत परमाणु अस्त्रों से न हो क्योंकि ट्रम्प जैसा सिरफिरा व्यक्ति  पागलपन में किसी भी सीमा तक जा सकता है। और ऐसा हुआ तब इस लड़ाई के विश्वयुद्ध में बदलने का खतरा और बढ़ जाएगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 18 August 2026

भारत का भविष्य रांची आंदोलन के जेन जी हैं जंतर मंतर के गालीबाज नहीं



देश की राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर नीट परीक्षा पेपर लीक के मुद्दे पर नवगठित कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले हुए आंदोलन को जेन जी के आक्रोश का प्रतीक बताकर ये अवधारणा स्थापित करने का सुनियोजित प्रयास किया गया कि  कुछ हजार लोग ही देश के छात्रों और युवाओं के प्रतिनिधि हैं। लेकिन छात्रों की समस्याओं के नाम पर  सरकार पर दबाव बनाने के लिए किये गए उस आंदोलन का असली उद्देश्य जल्द सामने आ गया जब आम आदमी पार्टी के साथ ही वामपंथी गिरोह उस पर काबिज हो गए। देखते - देखते  कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में शुरू हुए आंदोलन पर उन वामपंथी आंदोलनजीवियों ने कब्जा कर लिया जिनमें भारत तेरे टुकड़े होंगे का नारा लगाने और जम्मू कश्मीर को भारत का अविभाज्य अंग नहीं मानने वाले तत्व शामिल थे। इसका खुलासा तभी हो गया जब उमर खालिद और शर्जिल इमाम के पक्ष में नारेबाजी के साथ ही हिंदू राष्ट्र और मनुवाद के विरुद्ध मंच से भी आपत्तिजनक बातें कही गईं। कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं से अपेक्षित था कि वे नक्सली मानसिकता  में डूबे  देश विरोधी तत्वों को जंतर मंतर से बाहर करते किंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि वे खुद भी उसी गैंग के सदस्य हैं। इसका प्रमाण उनके रास्वसंघ विरोधी बयानों से मिल गया। लेकिन इस आंदोलन का सबसे घिनौना रूप तब सामने आया जब  प्रधानमंत्री को अश्लील गालियाँ दी जाने लगीं। लड़के ही नहीं बल्कि कम उम्र की लड़कियों को माँ - बहन की गालियां देते हुए देखकर पूरा देश शर्मसार हो गया। जंतर मंतर पर मौजूद युवकों और युवतियों के एक वर्ग ने जिस स्तर के अश्लील पोस्टर प्रदर्शित किये वह मानसिक विकृति का चर्मोत्कर्ष था। केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र के बाद तो मोदी विरोधी पत्रकारों का समूह इस बात का ढोल पीटने बैठ गया कि जेन जी ने सरकार को झुका दिया और यही 2029 में सत्ता बदलने वाली ताकत बनेगी। लेकिन जंतर मंतर के समानांतर छात्रों और युवाओं का एक और आंदोलन झारखंड की राजधानी रांची में भी चल रहा था। राज्य में हुई परीक्षाओं में धांधली के विरोध में धरना देकर बैठे युवाओं की मांग उनके जरिये हुई नियुक्तियाँ रद्द करने और भ्रष्टाचार की जाँच करवाने की थी। वहाँ भी जंतर मंतर जैसा माहौल था। युवा धरना दे रहे थे, अनशन  जारी था, नारे गूँज रहे थे। विधानसभा का घेराव करने का प्रयास करने वाले जत्थों पर लाठी चार्ज सहित वही सब हुआ जो दिल्ली पुलिस ने किया। लेकिन मोदी विरोधी दरबारी मीडिया को रांची आंदोलन में रुचि नहीं थी क्योंकि वहाँ के जेन जी ने किसी नेता को गाली नहीं दी, अश्लील नारेबाजी या नंगापन दर्शाती प्रचार सामग्री नहीं लहराई गई। और जब जेएनयू के ढपली बाजों ने  वहाँ पहुंचकर माहौल में गंदगी फैलानी चाही तब उन्हें आंदोलन स्थल से बाहर कर दिया गया। इस आंदोलन से जुबानी हमदर्दी तो राहुल गाँधी, प्रियंका वाड्रा, अभिजीत दिपके ने दिखाई और लाठीचार्ज की निंदा भी की। लेकिन झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के विरुद्ध  एक शब्द नहीं कहा। इसके अलावा प्रकाश राज , अरुंधती रॉय, नसीरुद्दीन शाह और शबाना आज़मी ने भी रांची के जेन जी के पास जाने की सौजन्यता नहीं दिखाई। जंतर मंतर के गाली गलौच भरे माहौल में क्रांति की आहट सुनने वाले दिमागी नक्सलियों को रांची आंदोलन से इसलिए एलर्जी थी क्योंकि उसके पीछे राष्ट्रवादी ताकतें थीं। वहाँ के जेन जी किसी जाति के विरोध में नारे नहीं लगा रहे थे और उनका आचरण अनुशासित था। आखिरकार गत दिवस मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को आंदोलन की मुख्य मांगें मानना पड़ी। उसके बाद आंदोलनकारियों ने भी जश्न मनाया किंतु किसी सितारा होटल में नहीं बल्कि सड़कों पर ही। देखना ये है कि पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का जो वर्ग जंतर मंतर आंदोलन में शामिल जेन जी में भारत  का भविष्य और सत्ता परिवर्तन के सपने देखने लगा है वह रांची के जेन जी आंदोलन की सफलता का क्या आकलन करता है? ये प्रश्न इसलिए  उठ खड़ा हुआ है क्योंकि देश के युवाओं ने दो स्थानों पर एक जैसे मुद्दे पर, एक ही शैली का आंदोलन किया किंतु जिसकी सबसे ज्यादा चर्चा हुई उसमें अश्लीलता, बेअदबी, उद्दंडता और विध्वंसक मानसिकता का बोलबाला नजर आया ।  वहीं दूसरे आंदोलन ने जेन जी के संस्कारित, अनुशासित, व्यवस्थित और रचनात्मक होने का उदाहरण  सामने रखा। रांची आंदोलन की सफलता उन लोगों के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा है जो युवा पीढ़ी को जबरन गलत रास्ते पर धकेलने का षडयंत्र रच रहे थे।  ढपली बजाकर आजादी मांगने वाले वामपंथी छात्र संगठनों को भी ये गलतफहमी छोड़ देनी चाहिए कि देश का जेन जी जेएनयू से निकलने वाली मानसिकता से प्रभावित है। भारत का भविष्य सही अर्थों में रांची आंदोलन में शामिल युवा शक्ति है न कि जंतर मंतर के हुड़दंगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 17 August 2026

दिमागी नक्सली: निशाना सही जगह लगा



स्वाधीनता दिवस पर लालकिले से  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनेक मुद्दों पर  सरकार की कार्य योजना देश के सामने रखी। इनमें विद्यार्थियों पर केंद्रित ऑन लाइन कोचिंग और 1 करोड़ युवाओं को ए.आई.(आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस) प्रशिक्षण संबंधी घोषणा के अलावा समुद्र से तेल निकालकर आत्मनिर्भरता हासिल करना और परमाणु ऊर्जा के उत्पादन के लक्ष्य पूरे करना भी है। श्री मोदी ने देश के विकास के लिए शक्ति की सप्तधारा का आह्वान किया, जिसमें मैन्युफैक्चरिंग, गतिशक्ति, और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता जैसे प्रमुख कार्य शामिल हैं।  ऊर्जा सुरक्षा पर जोर देते हुए उन्होंने देश में सेमीकंडक्टर संयंत्र और महत्वपूर्ण खनिजों के उत्पादन को बढ़ाने की जरूरत के साथ ही युवाओं से डिजिटल जनगणना अभियान में सक्रिय रूप से भाग लेने और सटीक डेटा ऑनलाइन अपलोड करने का आह्वान किया। राष्ट्रगीत वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने का विशेष उल्लेख भी उनके भाषण में विशेष रूप से हुआ। और लालकिले से पहली बार राष्ट्रागान जन, गण , मन के अलावा वंदे मातरम के सभी छंदों को प्रस्तुत किया गया। लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा आंतरिक सुरक्षा को सुदृढ़ करने दिमागी नक्सलियों से सतर्क रहने का जो आह्वान किया उसे लेकर विवाद पैदा हो गया। उन्होंने हाल ही में सशस्त्र नक्सलवादियों के सफ़ाये का उल्लेख करते हुए आगाह किया कि उसके बाद भी देश में इस मानसिकता वाले  लोगों को भड़काकर समाज को बांटना चाहते हैं जिनसे बचना चाहिए। हालांकि शहरी नक्सली शब्द का उपयोग पहले भी  किया जाता रहा है। लेकिन दिमागी नक्सली शब्द पहली बार उपयोग में आया। संभवतः उनका अभिप्राय ये था कि  हिंसा फैलाकर देश में साम्यवादी शासन व्यवस्था स्थापित करने के षडयंत्र में जुटे हथियारबंद नक्सलवादियों के खात्मे के उपरांत भी उनके मानस पुत्र दूसरे रूप में सामाजिक जीवन में घुसे हुए हैं और  व्यवस्था के विरुद्ध लोगों को उकसाकर आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। इन दिमागी नक्सलियों के बीच सोशल मीडिया के जरिये संवाद और संपर्क कायम रहने से कुछ विशिष्ट समूह बन गए हैं जिनका एकमात्र काम देश को अराजकता में धकेलना है। प्रधानमंत्री द्वारा इनसे सतर्क रहने की अपील किये जाने के बाद से ही इस तबके की घबराहट सामने आ गई। चूंकि नक्सली हिंसा को कभी भी जनसमर्थन नहीं मिला इसलिए उसके अदृश्य प्रवक्ता  पत्रकार, साहित्यकार , अध्यापक और एनजीओ चलाने वाले कथित सामाजिक कार्यकर्ता अप्रत्यक्ष तौर पर साम्यवादी विचारधारा के प्रसार का प्रयास करते रहते हैं।  इस मुहिम में इन्होंने कांग्रेस सहित हर उस राजनीतिक पार्टी में घुसपैठ की जो रास्वसंघ और भाजपा की विरोधी हो। शिक्षा, साहित्य,कला संस्कृति, इतिहास, समाचार जगत, सिनेमा जैसी विधाओं में इन्होंने अपनी जगह बनाई। लेकिन बीते एक दशक से ये वर्ग परेशान है क्योंकि   इनके षडयंत्र बेनकाब होने लगे। इन दिमागी नक्सलियों में हताशा इसलिए भी बढ़ रही हैं क्योंकि प. बंगाल और त्रिपुरा के बाद केरल की सत्ता भी इनके हाथ से निकल गई। ऐसे में केवल दिमागी नक्सलियों के जरिये ही साम्यवादी अपना अस्तित्व बचाने का ताना - बाना बुन रहे हैं। जब प्रधानमंत्री ने इनके इरादों पर सीधे चोट की तो  सहानुभूति हासिल करने के लिए ये प्रचार करने लगे कि सरकार से सवाल पूछने और व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों का विरोध करने वालों को  नक्सली कहकर भयभीत किया जा रहा है। पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम भी खुद को दिमागी नक्सली बताने लगे। स्मरणीय है इनके कार्यकाल में नक्सलियों द्वारा कई बड़े नरसंहार किये गए थे किंतु इनकी सरकार उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकी । अब जबकि वर्तमान गृहमंत्री अमित शाह ने हथियारबंद नक्सलियों का खात्मा करने में सफलता हासिल कर ली तब नक्सली मानसिकता के पैरोकारों में घबराहट फैलना लाजमी है। प्रधानमंत्री द्वारा इनके विरुद्ध लोगों को सावधान रहने की अपील किये जाने  के बाद ये तबका नक्सली विचारधारा को अभिव्यक्ति की आजादी और सरकार के विरोध से जोड़कर खुद को पाक साफ साबित करने में जुट गया है। लेकिन भारत के युवाओं सहित समाज का बड़ा वर्ग इनके जाल में नहीं फंसने वाला। चंद ढपलीबाजों के झुंड यदि युवाओं को प्रभावित करने में सक्षम होते तो इस देश में माओवादी सत्ता आ चुकी होती। मौजूदा परिदृश्य को देखते हुए प्रधानमंत्री द्वारा दिमागी नक्सलियों पर जो निशाना लगाया वह सही जगह जाकर लगा है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 15 August 2026

विदेशी पैसे से रचा जा रहा देश को कमजोर करने का षडयंत्र



     आजादी का पर्व प्रत्येक भारतीय के लिए गौरव की अनुभूति का अवसर है , चाहे वह देश में रहता हो याp दुनिया के किसी अन्य हिस्से में। इसलिये इसकी रक्षा करना भी हम सभी का परम कर्तव्य है। स्वाधीनता के बाद अनगिनत कठिनाइयों से गुजरकर भारत ने विश्व में अपना सम्मानजनक स्थान बनाया तो उसके पीछे प्रत्येक देशवासी का योगदान है , चाहे वह किसान , श्रमिक, उद्योगपति - व्यवसायी या स्वरोजगार से जुड़ा छोटा उद्यमी ही क्यों न हो। असंगठित क्षेत्र में कार्यरत करोड़ों लोगों ने भी देश की विकास यात्रा को गतिशील बनाने में उल्लेखनीय भूमिका का निर्वहन किया है। आज का भारत आत्मनिर्भरता और आत्म सम्मान का प्रतीक है। 
    वो दिन इतिहास  बन चुके हैं जब हमें  खाद्यान्न आयातित करना पड़ता था। अपनी सैन्य जरूरतों के लिए भी जहाँ हम पूरी तरह बड़ी शक्तियों पर आश्रित थे वहीं आज  हम रक्षा उत्पादनों का निर्यात कर रहे हैं। शिक्षा, चिकित्सा, विज्ञान, तकनीक जैसे क्षेत्रों में भी भारत ने सफलता के नये आकाश छूने का कारनामा कर दिखाया है। धरती से अंतरिक्ष तक हमारी उपलब्धियों से पूरा विश्व प्रभावित है। निश्चित रूप से ये सफलताएं संतोष का विषय हैं। हमारी अर्थव्यवस्था तनावपूर्ण वैश्विक हालातों  के बाद भी  तेजी से  बढ़ रही है । वैश्विक समुदाय के रूप में  भारतवंशियों ने दुनिया भर में अपनी प्रतिभा के झंडे गाड़कर देश का सम्मान बढ़ाया है। लेकिन इन सुखद स्थितियों के बावजूद  एक वर्ग विशेष अपनी नकारात्मक सोच के साथ निराशा फैलाने में जुटा है। किसी भी उपलब्धि पर संदेह व्यक्त करना इनकी कार्यशैली है । यहाँ तक कि सेना के पराक्रम को भी झुठलाने में इन्हें लज्जा नहीं आती।   जनता द्वारा लगातार ठुकराए जाने के बाद हताशा में डूबे ये लोग देश को भीतर से कमजोर कर राजनीतिक अस्थिरता फैलाने का षडयंत्र रच रहे हैं। जाहिर है भारत के उत्थान से परेशान विदेशी ताकतें इन कोशिशों को हवा दे रही हैं। चुनाव प्रणाली, न्यायपालिका और संसद जैसे संवैधानिक संस्थानों के प्रति अविश्वास का भाव उत्पन्न कर अव्यवस्था फैलाने के इस सुनियोजित प्रयास के प्रति प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक को सतर्क होकर उसे विफल करने आगे आना चाहिए। सीमा के पार बैठे शत्रु की पहिचान करना कठिन नहीं है किंतु घर के भीतर के दुश्मनों के चेहरों को अनावृत करना आज के दौर की सबसे बड़ी प्राथमिकता है। 
     भारत की बढ़ती शक्ति से बेचैन वैश्विक शक्तियाँ आर्थिक, कूटनीतिक और सैन्य दबाव बनाकर हमें दबाना चाहती हैं। उनका मुकाबला करने  का जो साहस देश ने दिखाया वह हमारे आत्मविश्वास का प्रतीक है। लेकिन इसे बनाये रखने के लिए सब एक आवाज में बोलें ये जरूरी है। राजनीतिक मतभिन्नता अपनी जगह है किंतु जहाँ बात देश के सम्मान और हितों की हो तब सारे मतभेद भुलाना ही राष्ट्रभक्ति है।   ऑपरेशन सिंदूर के बाद एक ओर जहाँ भारत के सामर्थ्य की सराहना दुनिया भर में हुई वहीं कुछ बड़े देश ईर्ष्या से भर उठे और अनुचित दबाव डालकर हमारे मनोबल को तोड़ना चाहते हैं। दुर्भाग्य से उन्हें अपने देश के ही कुछ तत्व प्रोत्साहित कर रहे हैं जिन्हें सिवाय अपने स्वार्थ के और कुछ नहीं दिखता। हाल ही में छात्रों के आंदोलन की आड़ में अराजकता और अश्लीलता का जो शर्मनाक अनुभव देश ने किया वह भविष्य के खतरों की ओर इशारा करता है।  दरअसल हथियारबंद नक्सलियों के सफ़ाये के बाद भी शहरी नक्सलियों के रूप में विध्वंसक तत्व  सक्रिय हैं। इसीलिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज लाल किले से अपने भाषण में दिमागी नक्सलियों से देश को बचाने की जो बात कही , वह बेहद सामयिक और आवश्यक है। युवा पीढ़ी को विद्रोह के लिए भड़काकर आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न करने का जो षडयंत्र विदेशी पैसे पर पल रहे गद्दारों द्वारा रचा जा रहा है उससे हर देशवासी को सतर्क रहना होगा। साथ ही अपने बच्चों को जिन्हें जेन जी कहा जा रहा है , इन दिमागी नक्सलियों से दूर रखें अन्यथा हमारी एकता और अखंडता छिन्न - भिन्न होते देर नहीं लगेगी। 

    आइये, आज इस राष्ट्रीय पर्व पर थोड़ा समय  देश के भविष्य पर विमर्श हेतु भी निकालें क्योंकि सीमा के उस पार बैठे दुश्मन को सबक सिखाने के लिए तो हमारी सेनाएं  पूरी तरह समर्थ हैं। लेकिन देश को कमजोर करने वाली उन ताकतों के हौसले धवस्त करने का दायित्व हम सबका है जो आस्तीन का सांप बनी बैठी हैं। स्मरण रहे 15 अगस्त  केवल सरकारी आयोजन न होकर आत्मावलोकन एवं दायित्वबोध जागृत करने का अवसर भी है।

स्वाधीनता दिवस की अनंत शुभकामनाएं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 14 August 2026

भ्रष्टाचार के रहते खाद्य वस्तुओं में शुद्धता की उम्मीद करना बेकार


कुछ दिनों से  नकली पनीर और घटिया किस्म का घी पकड़े जाने की खबरें लगातार मिल रही हैं। चिंता तब  और बढ़ जाती है जब डी मार्ट जैसे नामी - गिरामी रिटेल स्टोर्स में गुणवत्ता विहीन खाद्य सामग्री बेची जा रही हो। पनीर के कुछ ब्रांड प्रतिबंधित भी हो रहे हैं। आजकल देश में क्विक डिलीवरी का व्यवसाय भी खूब चल पड़ा है जिसमें ब्लिंकिट नामक कंपनी काफी चर्चा में है जो ग्राहक द्वारा ऑर्डर की गई वस्तु चंद  मिनिटों में  ही उसके ठिकाने पर पहुंचा देती है , और किसी भी समय। इस कंपनी के अनेक भंडारों पर मारे गए छापों के बाद जो चित्र सार्वजनिक हुए वे डराने वाले हैं क्योंकि वहाँ भरपूर गंदगी के साथ कीड़े - मकोड़े घूमते मिले। अनेक खाद्य वस्तुओं की पैकिंग खुली पाई गई। सब्जी और फलों का रख - रखाव भी बेहद खराब तरीके का मिला। गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को सख़्त लहजे में चेतावनी दी कि देश में  खाद्य वस्तुओं के पैकेट पर सामने की तरफ चीनी, नमक और सैचुरेटेड फेट की मात्रा अंकित की जाए जिससे उपभोक्ता अंधेरे में न रहे। हालांकि अभी भी पैकेटबंद खाद्य वस्तुओं में उपयोग की जाने वाली सामग्री के नाम और मात्रा लिखने का नियम है किंतु बेहद बारीक अक्षरों में होने से उसे पढ़ना कठिन होता है। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को 15 दिनों की मोहलत देते हुए कहा है कि उसके बाद वह स्वयं आदेश पारित कर देगा।  इसलिए सरकारी मशीनरी हरकत में आयेगी ।  लेकिन सवाल ये है कि खाद्य वस्तुएँ बनाने वाली कंपनियों द्वारा पैकेट के ऊपर जो जानकारी दी जाएगी उसकी सत्यता की जांच कौन करेगा? ये बात इसलिए उठती है क्योंकि जिस सरकारी विभाग के पास इसका  जिम्मा है यदि वह ईमानदार होता तब खाद्य वस्तुओं में मिलावट और गुणवत्ता का अभाव जैसी समस्या ही उत्पन्न नहीं होती। जिन जांच लैब में खाद्य वस्तुओं के सैम्पल जाँच हेतु भेजे जाते हैं उनकी प्रामाणिकता भी संदेह के घेरे में है। इसीलिये अनेक बड़े नाम वाले ब्रांड की खाद्य वस्तुएँ गुणवत्ता के मानक पर खरी नहीं उतरने के बावजूद भी उनका बाल भी बांका नहीं होता। लेकिन छोटी हैसियत वाले  उत्पादक पर शिकंजा कसने की मुस्तैदी दिखाई देती है। विशेष रूप से त्यौहारों के अवसरों पर खाद्य विभाग का अमला शिकार पर निकलता है । दो - चार दिन छापेमारी होती है, सैंपल जांच हेतु भेजे जाते हैं, जिस स्थान पर खाद्य वस्तुओं का उत्पादन होता है वहाँ की गंदगी के चित्र प्रसारित करवाये जाते हैं , दूषित सामग्री की जप्ती कर उसे नष्ट किया जाता है, जुर्माना भी वसूला जाता है। लेकिन ये तमाशा ज्यादा दिन नहीं चल पाता। बदलती जीवनशैली, आर्थिक स्थिति में सुधार और  हैसियत के दिखावे के लिए आजकल पैकेट बंद खाद्य वस्तुओं का उपभोग बढ़ता जा रहा है। बिस्किट के साथ पैकेट बंद मिठाई, नमकीन का चलन भी जोरों पर । और अब तो  रोटी, पराठे, रेडी टु ईट सब्जियां आदि भी बाजार में उपलब्ध हैं। जूस, सॉस, जैम, जेली, अचार, आइसक्रीम, शेक, सॉफ्ट ड्रिंक्स , बेकरी उत्पाद जैसी दर्जनों चीजें बड़े पैमाने पर बन और बिक रही हैं। खाद्य तेलों का कारोबार भी फैलता जा रहा है। अर्थव्यवस्था की दृष्टि से देखें तो ये बेहद शुभ संकेत है। सरकार को टैक्स के साथ लोगों को रोजगार  भी मिलता है। लेकिन खाने - पीने की चीजों में होने वाली मिलावट और गुणवत्ता की कमी से उपभोक्ता का आर्थिक शोषण होने के साथ ही उसके स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर होता है। इसकी तुलना नकली या घटिया दवा बनाने और बेचने से करना गलत नहीं होगा। ये सवाल भी  उठ खड़ा होता है घटिया खाद्य सामग्री के उत्पादन को प्रारंभिक स्तर पर रोकने का प्रबंध क्यों नहीं होता? खाद्य विभाग मिठाई की गुणवत्ता की जाँच तो करता है किंतु उसमें उपयोग होने वाले वाले मावे या दूध की जाँच प्रारंभिक स्तर पर करने की कोई व्यवस्था नहीं है। ये सब देखते हुए कहा जा सकता है कि छापे मारकर  पनीर, घी , मिठाई आदि की जप्ती भी  कुछ दिन का तमाशा है। रही बात सर्वोच्च अदालत द्वारा दी गई हिदायत की तो वह भी सुनने में तो भले अच्छी लगे किंतु जब तक सरकारी तंत्र ईमानदार और संवेदनशील नहीं होगा तब तक किसी सुधार की उम्मीद करना व्यर्थ है। सही बात तो ये है कि भ्रष्टाचार और पैसे की असीमित भूख ने मानवीय संवेदनाओं को गहराई तक दफना दिया है। जिस देश में दवा के नाम पर ज़हर बिकता हो वहाँ खाद्य वस्तुओं की शुद्धता के दावे शपथपत्र देकर झूठ बोलने जैसा है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 13 August 2026

संसद के नहीं चलने से विपक्ष नुकसान में रहा



संसद अनिश्चित्काल के लिए स्थगित हो गई। दो - तीन विधेयक जरूर पारित हो गए किंतु जिन मुख्य विधेयकों को सरकार पारित करवाने के लिए प्रयासरत थी , वे लटक गए। विदेशी अनुदान  विधेयक तो सरकार ने जेपीसी को भेजने को फैसला कर लिया। रही बात परिसीमन विधेयक की तो अंदरूनी बात ये है कि विधेयक पारित करवाने के लिये कुछ सांसदों की कमी पड़ रही थी। इसके साथ ही द्रमुक का रवैया भी पूरी तरह आश्वस्त करने वाला नहीं था। एनडीए को समर्थन दे रही पार्टियों के भी कुछ सांसदों ने विदेशी अनुदान विधेयक को लेकर ऐतराज जताकर सत्ता पक्ष के कान खड़े कर दिये। इसीलिये सरकार ने चतुराई दिखाते हुए विधेयक को जेपीसी के हवाले कर सुरक्षित रास्ता चुना। जहाँ तक इस सत्र से राजनीतिक नफे - नुकसान की बात है तो इसमें दो राय नहीं हैं कि पहले दिन से ही सरकार दबाव में आ गई। कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले संसद भवन घेरने जा रहे आंदोलनकारियों पर पुलिस द्वारा किये गए बल प्रयोग को लेकर बनी परिस्थितियों में धर्मेंद्र प्रधान के  त्यागपत्र के अलावा आंदोलनकारियों की बाकी मांगें भी सरकार को माननी पडीं। इसका संदेश ये गया कि 12 सालों में पहली बार प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी को झुकना पड़ा। हालांकि भूमि अधिगृहण और कृषि कानून जैसे मुद्दों पर भी श्री मोदी ने अपने कदम पीछे खींचे थे। लेकिन जंतर मंतर के आंदोलन को जेन जी से जोड़कर भविष्य की राजनीति का प्रतीक चिन्ह  बताये जाने से समूचा राजनीतिक विमर्श नया रूप ले बैठा। लेकिन सरकार ने इसमें भी एक चाल ये चली कि उसने विपक्ष द्वारा नीट परीक्षा पेपर लीक के बाद से उठाई जा रही मांगों को मानने के बजाय कॉकरोच जनता पार्टी के साथ समझौता किया। राहुल गाँधी की खीझ का कारण भी यही था क्योंकि वे पहले से ही इस मुद्दे पर सरकार को घेर रहे थे ।  लेकिन अपनी आदतानुसार लम्बी विदेश यात्रा पर चले गए और उसी दौरान कॉकरोच जनता पार्टी मैदान में कूदकर पूरा श्रेय बटोर ले गई। उसी के बाद संसद को न चलने देने का दाँव चला गया। और छात्रों पर हुए बल प्रयोग को बहाना बनाकर गृह मंत्री अमित शाह को निशाना बनाया जाने लगा। लेकिन श्री शाह भी इस खेल को भांप गए जिसके कारण श्री गाँधी हवा में लट्ठ चलाते रहे। लोकसभा में छात्रों पर हुए बल प्रयोग को लेकर चर्चा यदि होती तब श्री शाह को नेता प्रतिपक्ष सहित बाकी विपक्षी नेता घेर सकते थे किंतु श्री गाँधी ने पैलेट गन के उपयोग का आदेश किसने दिया जैसे सवाल के नाम पर सदन नहीं चलने दिया। श्री शाह की सदन में अनुपस्थिति को उनके डर का प्रतीक बताकर उनका उपहास भी किया गया। लेकिन  सत्ता पक्ष ने विपक्ष के सामने शर्त रख दी कि गृह मंत्री सभी सवालों का जवाब सदन में देंगे बशर्ते उन्हें सुना जाए। श्री शाह ने तो अध्यक्ष को पत्र लिखकर चर्चा का समय तय करने का आग्रह तक कर डाला किंतु श्री गाँधी ने सत्ता पक्ष के प्रस्ताव को ये कहकर ठुकरा दिया कि उन्हें श्री शाह का भाषण नहीं सुनना। लंबे समय से लोकसभा में रहने के बाद भी श्री गाँधी इतनी सी बात नहीं समझ सके कि संसद का सत्र चलते समय किसी मंत्री से पूछे गए प्रश्न का उत्तर सदन में ही दिया जाता है। यदि लोकसभा में चर्चा होती तब बतौर नेता प्रतिपक्ष श्री गाँधी के पास श्री शाह को घेरने का समुचित अवसर होता। पूरा देश उस चर्चा को देखता और सुनता। लेकिन हमेशा की तरह अपनी बचकानी जिद के चलते उन्होंने खुद तो मौका गंवाया ही अन्य विपक्षी दलों को भी अपनी बात रखने से वंचित कर दिया। उदाहरण के लिए समाजवादी पार्टी राम मन्दिर चंदे की चोरी पर चर्चा चाह रही थी किंतु राहुल ने सदन चलने नहीं दिया। अब चूंकि सत्रावसान हो चुका है तब ये विश्लेषण करें कि क्या खोया क्या पाया तो सत्ता पक्ष निश्चित रूप से दबाव में रहा लेकिन संसद के मंच का फ़ायदा उठाना तो विपक्ष की प्राथमिकता होनी चाहिए। सही बात ये है कि कांग्रेस लगभग हर सत्र में कोई न कोई नया मुद्दा पकड़कर सत्र का समय तो बर्बाद करती ही है, अपने विचार रखने का मौका भी गँवा देती है। आज यदि श्री गाँधी से पूछा जाए कि इस सत्र के दौरान सदन में उनकी क्या गतिविधि रही तब उनके पास बताने के लिए क्या है ? उनके इस रवैये से उनकी पार्टी को भी नुकसान हो रहा है क्योंकि सदन बाधित रहने से उसके सांसद भी अपने मुद्दे नहीं उठा पाए। उधर सरकार को ये कहने का अवसर मिल गया कि विदेशी अनुदान संशोधन विधेयक से घबराकर काँग्रेस ने सदन नहीं चलने दिया और बाकी विपक्षी पार्टियाँ उसके चक्कर में फंसी रह गईं। दिल्ली में छात्रों पर हुए पुलिसिया बल प्रयोग पर हाय -  तौबा मचाने वाले नेता प्रतिपक्ष रांची के छात्रों की पुलिस द्वारा की गई पिटाई के बाद उनके आँसू पोंछने क्यों नहीं गए इसका  जवाब भी उन्हें देना चाहिए। वैसे अब वे किसी नये मुद्दे की तलाश करेंगे जैसा अब तक करते आये हैं। और बड़ी बात नहीं इसके लिए उन्हें फिर गोपनीय विदेश यात्रा पर जाना पड़े ? 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 12 August 2026

जनता संसद में दिए अच्छे भाषण ही याद रखती है, हंगामे नहीं



संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को समाप्त हो जाएगा। सरकार इसमें एफ.सी.आर ए और परिसीमन  विधेयक पारित करवाना चाहती थी किंतु विपक्ष द्वारा उत्पन्न गतिरोध  के कारण  दोनों सदनों में कामकाज नहीं हो पाने से  लग रहा है कि  उनका पारित होना तभी संभव है जब सरकार हंगामे के बीच ही उन्हें पेश करे और फिर बिना बहस के संसद की मुहर लगवा ले। ये चर्चा भी है कि इस सत्र में उक्त विधेयक पारित नहीं हो सके तो संसद का विशेष सत्र   बुलाकर सरकार इन्हें पारित करवाने का प्रयास करेगी। लेकिन इस सबसे अलग हटकर चिंता का सबसे बड़ा कारण संसद में कामकाज का न होना है जिसकी वजह से लोकतंत्र के इस मन्दिर के प्रति जनमानस की श्रृद्धा लगातार कम हो रही है। इस सत्र की शुरुआत वाले दिन ही  संसद भवन घेरने निकले छात्रों पर पुलिस के बल प्रयोग को मुद्दा बनाकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने सरकार पर हमला शुरू कर दिया। हालांकि धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र के बाद जंतर मंतर आंदोलन  तो खत्म हो गया किंतु राहुल गृह मंत्री अमित शाह की घेराबंदी में जुट गए। उनके वक्तव्य की मांग को लेकर सरकार और विपक्ष में जो रस्साकशी शुरू हुई वह लगातार जारी है। रोजाना सदन की बैठक शुरू होते ही विपक्ष द्वारा  हंगामा किये जाने पर सदन दोपहर तक स्थगित हो जाता है और दोपहर बाद फिर वही कहानी दोहरा दी जाती है। उल्लेखनीय है अनेक सांसद सदन के भीतर होहल्ला कर कार्यवाही बाधित करने के बाद बाहर भी नारेबाजी करते हैं जिससे समाचार माध्यमों में उनके नाम और तस्वीर आ जाए। गौरतलब है कि सदन के संचालन पर प्रति मिनिट ढाई लाख रुपये खर्च होते हैं। उस लिहाज से इस सत्र  पर अब तक 110 करोड़ रु. खर्च हो चुके हैं। किसी सांसद के सदन में प्रवेश करते ही उसका दैनिक भत्ता पक्का हो जाता है , चाहे वह तुरंत बाहर आ जाए। ऐसे दर्जनों सांसद हैं जो इसी सुविधा का लाभ लेते हैं। हालांकि सरकार ने शोर - शराबे के बावजूद दो - तीन विधेयक पारित करवा लिए लेकिन एफ.सी.आर ए और परिसीमन जैसे बेहद महत्वपूर्ण विधेयक लंबित ही हैं। अब सवाल ये है कि संसद को ठप रखने के लिए कौन जिम्मेदार है? विपक्ष लगभग हर सत्र में किसी एक मुद्दे को पकड़कर सदन  की कार्यवाही नहीं चलने देता। दूसरी तरफ सरकार भी उसके आगे झुकने को अपनी शान के विरुद्ध मानती है। इस खींचातानी में छोटी पार्टियों की आवाज तो अनसुनी रहती ही है, बड़ी पार्टियों के सांसद भी अपने क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर बोलने से वंचित रह जाते हैं। सांसदों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर तैयार करने पर भी काफी समय एवं धन खर्च होता है। सदन नहीं चलने पर उनके जो जवाब तैयार किये जाते हैं वे दस्तावेजों तक ही सीमित रह जाते हैं। यदि प्रश्नकाल ठीक से चले तब प्रश्नकर्ता सदस्य  पूरक प्रश्न भी पूछ सकता है। संसद में होने वाली चर्चा का सीधा प्रसारण होने से देश -  विदेश  में उसे देखा सुना जाता है। लेकिन सदन नहीं चलने से सांसदों के जरिये संसद और जनता के बीच का  सम्वाद अवरुद्ध हो जाता है। हालांकि ये समस्या हमारी संसदीय प्रणाली का स्थायी हिस्सा बन चुकी है। विपक्ष कहता है कि सदन चलाना सरकार की जिम्मेदारी है किंतु उसे भी इस प्रश्न का जवाब देना चाहिये कि किसी एक मुद्दे पर अड़कर पूरे सत्र को बर्बाद करने में कौन सी बुद्धिमत्ता और बहादुरी है ? ऐसा लगता है नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी के सलाहकार उन्हें अच्छी सलाह से वंचित रखते हैं। वरना उन्हें बताया जाता कि जनता विपक्ष के नेता द्वारा सदन में दिये गए भाषण याद रखती है न कि सदन में हुए हँगामों को । भाजपा और कांग्रेस के अलावा अन्य  नेताओं द्वारा दशकों पूर्व संसद में दिये कुछ भाषण यू ट्यूब आज भी इसलिए सुने जाते हैं क्योंकि उनमें उनका दृष्टिकोण और  लोकतंत्र के प्रति  दायित्व बोध प्रकट होता है। इसी तरह सत्ता पक्ष की भी ये जिम्मेदारी है कि वह विवाद को एक सीमा के आगे न बढ़ने दे। जिस तरह धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र होते ही जंतर मंतर आंदोलन की हवा निकल गई वैसे ही थोड़ा सा लचीलापन गतिरोध को दूर कर सकता है। सत्ता और विपक्ष में मतभेद कोई अनोखी बात नहीं है। संसदीय लोकतंत्र इससे मजबूत ही होता है। लेकिन वर्तमान माहौल देखकर लगता है कि मतभेद दुश्मनी में बदल चुके हैं। हो सकता है इसके चलते कुछ नेताओं का अहं संतुष्ट होता हो किंतु जनता और देश का नुकसान हो रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 11 August 2026

वरना आंदोलन का अर्थ संसद और विधानसभा में घुसना ही हो जाएगा




कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा दिल्ली के जंतर मंतर पर  तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग को लेकर किये गए आंदोलन ने उस समय गंभीर मोड़ ले लिया जब 20 जुलाई को आंदोलनकारियों ने संसद भवन को घेरने की कोशिश की। जब भीड़ अनियंत्रित होकर पुलिस पर  हमला करने के साथ ही सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ पर उतारू हो गई तब  लाठी चार्ज, पानी की बौछारें और अश्रु गैस का उपयोग कर उन्हें रोका गया।  अंततः श्री प्रधान के त्यागपत्र के साथ ही , आत्महत्या किये छात्रों के परिजनों को मुआवजा तथा आंदोलनकारियों पर दर्ज सभी अपराधिक प्रकरण वापस लेने का समझौता सरकार और कॉकरोच जनता पार्टी के बीच हुआ। उसके बाद आंदोलन तो समाप्त हो गया किंतु पहली बार किसी आंदोलन में गंदी गालियाँ और अश्लील  नारेबाजी सुनाई दी। जो पोस्टर लहराए गए उन्हें देखकर पूरा देश शर्मिंदा हुआ सिवाय उनके जिन्हें उनमें युवा आक्रोश दिखा। कुछ लेखकों और पत्रकारों को उन अश्लील गालियों, नारेबाजी और पोस्टरों में क्रांति के दर्शन भी होने लगे। लेकिन इसी बीच पंजाब और कर्नाटक से पेपर लीक होने की खबरें आने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी नेताओं से वहाँ जाकर आंदोलन करने के बारे में पूछा गया तो वे कन्नी काट गए। इसी तरह जंतर मंतर आंदोलन की अघोषित प्रायोजक आम आदमी पार्टी ने पंजाब पर चुप्पी साधे रखी तो दिल्ली में छात्रों पर हुए बल प्रयोग को मुद्दा बनाकर संसद को नहीं चलने दे रहे राहुल गाँधी ने कर्नाटक के पेपर लीक को सिरे से उपेक्षित कर दिया। लेकिन तभी झारखंड की राजधानी रांची में छात्रों का आंदोलन शुरू हो गया। उसके पीछे भी शिक्षा से जुड़े अनेक मुद्दे थे। लेकिन वह आंदोलन पूरी तरह शांत और व्यवस्थित चल रहा था। न कोई अश्लील नारेबाजी और न गाली -  गलौच। आंदोलन स्थल पर अनुशासन और शालीनता बनाये रखी गई। दिल्ली से भेजे गए जे.एन.यू के ढपली बाजों ने माहौल में गंदगी फैलाने का षडयंत्र रचा तो उन्हें उल्टे पाँव लौटा दिया गया। लेकिन जंतर मंतर आंदोलन के समर्थन में आगे आकर कूदने वालों को रांची के छात्रों में जेन जी नहीं दिखे । जब झारखंड की कांग्रेस समर्थित सरकार ने छात्रों की मांगों को पूरा नहीं किया तब गत दिवस उन्होंने विधानसभा घेरने का ऐलान किया। जिसके बाद विधानसभा का बचाव करने लाठीचार्ज, पानी की बौछार, अश्रु गैस आदि का सहारा पुलिस ने लिया।  दर्जनों आंदोलनकारी  घायल होकर अस्पताल पहुँच गए। तोड़फोड़ और पत्थरबाजी छात्रों की तरफ से भी हुई। संक्षेप में कहें तो दिल्ली के घटनाक्रम की पुनरावृत्ति ही हुई। जैसे ही ये खबर फैली राजनीतिक बिरादरी के उस हिस्से में सन्नाटा छा गया जो दिल्ली की घटना पर आसमान सिर पर उठाये घूम रहा था। राहुल गाँधी ने सोशल मीडिया पर  बल प्रयोग की निंदा करते हुए छात्रों से बात करने की समझाईश तो दे डाली किंतु झारखंड सरकार के विरुद्ध एक शब्द नहीं कहा। उल्लेखनीय है वहाँ शिक्षा विभाग का जिम्मा खुद मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन के पास है और उनकी सरकार कांग्रेस के समर्थन पर टिकी हुई है। कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को युवा क्रांति का सूत्रपात मानने वाले बुद्धिजीवी, चरण चुंबन करने वाले यू ट्यूबर् और ढपली बाज जे.एन.यू वाले भी दाएं - बाएं हो रहे हैं क्योंकि रांची में पिटने वाले हालांकि  जेन जी ही थे किंतु पीटने वाली सरकार  कांग्रेसी बैसाखी पर टिकी है ।  लिहाजा उससे इस्तीफा मांगने की औपचारिकता तक नहीं निभाई गई। यही दोमुँहापन तमाम समस्याओं की जड़ है। धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र पर दुनिया झुकती है झुकाने वाला चाहिए जैसी डींग हांकने वाले काक्रोचियों के नेता कहां दुबके हैं किसी को नहीं पता। लेकिन इससे हटकर देखें तो जंतर मंतर पर एकत्र युवाओं की बेहूदा हरकतों और आपत्तिजनक आचरण को युवा आक्रोश के नाम पर औचित्य पूर्ण ठहराया जाना गलत परिपाटी को जन्म दे गया। गत रात्रि पुण्य प्रसून वाजपेयी बड़े खुश होकर कह रहे थे कि जेन जी का डर खत्म हो गया है। यदि वे संसद और विधानसभा में घुस गए तब सरकारों का क्या होगा? योगेंद्र यादव तो मुद्दों का हल संसद की बजाय सड़कों पर होने जैसी शेखी बघारते सुने जा चुके हैं। सवाल ये है कि जंतर मंतर के जेन जी सही थे तब रांची वालों को गलत नहीं ठहराया जा सकता। और जब दोनों को सही मानना राजनेताओं की मजबूरी है तब देश में आंदोलन का अर्थ संसद और विधानसभा में घुसकर उत्पात मचाना ही रह जाएगा और इस तथाकथित निडरता का शिकार सभी पार्टियाँ और उनके नेता होंगे क्योंकि विभिन्न राज्यों में अन्य दलों की सत्ता है। ऐसे में जेन जी की आड़ में अराजकता को प्रोत्साहित करने का गंदा खेल बन्द होना चाहिए वरना जो होगा उसकी कल्पना ही डरा देती है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 10 August 2026

पूरे जेन जी को गोलबंद करना संभव नहीं



हाल ही में हुए जंतर मंतर आंदोलन के बाद ये अवधारणा तेजी से प्रचारित करवाई जा रही है कि निकट भविष्य में होने वाले चुनावों में जेन जी मतदाता नतीजों को प्रभावित करेंगे। अनेक विश्लेषकों के अनुसार युवा मतदाताओं का थोड़ा सा झुकाव भी उलटफेर करने वाला होगा। इसके साथ ही ये बात भी फैलाई जा रही है कि जेन जी धर्म और जाति जैसे मुद्दों से प्रभावित हुए बिना अपना निर्णय करेंगे। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि  युवाओं का एक वर्ग अब राजनीति के स्थापित तौर - तरीकों से प्रभावित नहीं होता। इसीलिये परिवार के वरिष्ट सदस्यों और युवाओं की  सोच में भिन्नता बढ़ रही है। किसी दल के प्रति लगाव  रखने वाले युवा भी पार्टी की रीति - नीति पसंद न आने पर आलोचनात्मक टिप्पणी करने में भी  नहीं हिचकते। ये बात भी सही है कि 2014 के लोकसभा चुनाव से ही युवा वर्ग नरेंद्र मोदी के प्रति आकर्षित रहा है। आयु में 20 वर्ष छोटे होने पर भी राहुल गाँधी युवाओं के बीच उतनी पैठ नहीं बना सके जो उन्हें सत्ता तक  पहुंचा सके। इसीलिये वे इस वर्ग को लुभाने के लिए भरसक प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। बीते सप्ताह प्रयागराज में भी उन्होंने सार्वजनिक रूप से युवाओं से संवाद किया। उसके पहले भी वे अन्य शहरों में ऐसे आयोजन कर चुके थे। लेकिन जंतर मंतर पर जेन जी आंदोलन का नेतृत्व पूरी तरह नये चेहरों के पास होने से दिल्ली में होते हुए भी वे उससे अलग - थलग पड़ गए। और प्रधानमंत्री निवास पर नाटकीय तरीके से धरना देकर सुर्खियों में आये। गौर करने वाली बात ये है कि उस आंदोलन की संयोजक कॉकरोच जनता पार्टी ने भी श्री गाँधी को कोई महत्व नहीं दिया। उस आंदोलन पर जेएनयू के वामपंथी छात्र संगठनों ने अतिक्रमण कर लिया जिससे उसकी कोई  दिशा तय नहीं हो सकी। कॉकरोच जनता पार्टी के कर्ता धर्ता भी इस घालमेल को समझ गए और राजनीतिक पार्टी बनाने के बजाय दबाव समूह के तौर पर काम करने का ऐलान कर दिया। लेकिन उनके द्वारा रास्वसंघ और भाजपा के विरुद्ध ज़हर उगलने से ये साबित हो गया कि वे पूर्वाग्रहों से ग्रसित है जिसके इरादे अभी भी गोपनीय हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो अभिजित दिपके दिल्ली से उठकर रांची  में झारखंड सरकार के विरुद्ध आंदोलन कर रहे छात्रों के साथ खड़े होते किंतु दूर से ही जुबानी समर्थन के बाद घर बैठ गए। युवाओं के सबसे बड़े हितैषी बने राहुल ने भी रांची जाने से परहेज किया क्योंकि झारखंड सरकार को इंडिया गठबंधन का समर्थन है। वामपंथी छात्र संगठनों के कुछ नेता जरूर पहुंचे किंतु रांची आंदोलन से जुड़े छात्रों ने उनकी देश विरोधी नारेबाजी के कारण उनको उल्टे पाँव लौटा दिया। इससे एक बात स्पष्ट हो गई कि जेन जी को एक सांचे में ढालने वाले मुगालते में हैं। इसका दूसरा उदाहरण मिला प्रयागराज में जहाँ का मंच चूंकि श्री गाँधी ने सजाया इसलिए उ.प्र. के सत्ता संघर्ष में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही समाजवादी पार्टी ने उससे दूरी बनाई। इन सबसे एक बात सिद्ध हो रही है कि जेन जी को किसी एक खूंटे से बांधने के प्रयास सफल नहीं होंगे और विविधता भरे इस देश में उनकी पसंद - नापसंद का अंदाज तात्कालिक मुद्दों के आधार पर नहीं लगाया जा सकता। कल को अखिलेश यादव भी लखनऊ या अन्य किसी शहर में युवाओं का जमावड़ा करें तब क्या ये मान लिया जाएगा कि सारे जेन जी उनके पक्ष में जुड़ गए। कुल मिलाकर युवा असन्तोष को कोई एक स्वरूप देना बेहद कठिन है । एक दो आंदोलनों से पूरे देश की युवाशक्ति का मिजाज भांपकर निष्कर्ष निकालना भी जंतर मंतर और प्रयागराज आंदोलन की तरह प्रायोजित ही कहा जाएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि जंतर मंतर पर मनुवाद और ब्राह्मणवाद विरोधी जो नारेबाजी हुई उससे युवाओं के एक वर्ग में नाराजगी  है। कोई कुछ भी कहे किंतु हमारे देश में चुनावी रणनीति जातीय समीकरणों से ही प्रभावित होती है। अखिलेश यादव  पीडीए  (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक ) का दामन नहीं छोड़ सकते तो अन्य जातीय जेन जी उनका समर्थन क्यों करेंगे? इसी तरह श्री गाँधी भी जातीय मुद्दे में उलझने के कारण सभी युवाओं को एकजुट नहीं कर पा रहे। जिस तरह हिन्दू हित की बात करने वाली भाजपा  को पूरे हिन्दू समाज का समर्थन नहीं मिलता वैसे ही पूरे जेन जी को राजनीतिक रूप से गोलबंद करने की बात सोचना युवाओं की वैचारिक स्वतंत्रता पर संदेह करने जैसा है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 8 August 2026

दलित सिखों में बढ़ते ईसाईकरण से पंजाब की राजनीति में नये समीकरण बनेंगे



पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। इसके दो संकेत बीते दिनों दिल्ली में देखने मिले। पहला किसानों द्वारा पाँच साल पहले दिल्ली में दिये धरने की पुनरावृत्ति और दूसरा जंतर मंतर पर हुआ आंदोलन। पहली मुहिम को तो सरकार ने समझा - बुझाकर ठण्डा कर दिया लेकिन जंतर मंतर आंदोलन लम्बा खिंचा जिसकी राष्ट्रव्यापी चर्चा भी हुई। ये सवाल उठना लाजमी है कि उक्त दोनों का पंजाब चुनाव से क्या संबंध है तो इसका जवाब है किसानों के दिल्ली में जमावड़े के पीछे भी पंजाब लॉबी थी और इसी तरह जंतर मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी के धरने में आम आदमी पार्टी द्वारा सामने आकर सक्रियता दिखाने के पीछे भी पंजाब चुनाव ही है । असल में दिल्ली की सत्ता गँवाने के बाद अरविंद केजरीवाल भी एक बार सुर्खियों में आने के लिए प्रयासरत थे। शुरू में कॉकरोच जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी की जुगलबंदी लोगों को अटपटी लगी परंतु जल्दी ही ये सच्चाई  उजागर हो गई कि दोनों का डी. एन.एक ही है। कॉकरोच जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं द्वारा आम आदमी पार्टी से पुराने जुड़ाव को भी स्वीकार किया गया । जिस तरह से केजरीवाल, मनीष सिसौदिया, संजय सिंह और आतिशी ने जंतर मंतर पर नियमित उपस्थिति दर्ज करवाई उसके बाद रहा - सहा संदेह भी मिट गया। और जब आंदोलन समाप्त होने पर कॉकरोच जनता पार्टी के एक प्रमुख नेता से पूछा गया कि पेपर तो पंजाब में भी लीक हुआ तो क्या जंतर मंतर जैसा आंदोलन भगवंत सिंह मान सरकार के विरुद्ध भी किया जाएगा, तब वे उसका जबाब देने से बचे जिससे जाहिर हो गया कि इस पार्टी और आम आदमी पार्टी के बीच रणनीतिक भागीदारी है। इसी ने  राहुल गाँधी को जंतर मंतर पर आने से रोका और जिससे हुए राजनीतिक नुकसान की भरपाई के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री निवास पर धरने का आयोजन किया। गत दिवस कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी ये स्वीकार किया कि  छात्रों की समस्या को कांग्रेस और राहुल ने पहले ही उठाया था किंतु उसे अपेक्षित जनसमर्थन क्यों नहीं मिला इसके लिए पार्टी को जनता की नब्ज समझने की जरूरत है। कांग्रेस भी पंजाब के आगामी चुनाव के लिए कमर कस रही है लेकिन कुछ साल पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू की लड़ाई ने जिस प्रकार उसका भट्टा बिठाया वही इस बार पूर्व मुख्यमंत्री  चरणजीत सिंह चन्नी द्वारा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग के नेतृत्व को अस्वीकार करने की घोषणा से दोहराई जा रही है। आम आदमी पार्टी की प्रदेश सरकार वैसे तो काफी अलोकप्रिय हो चुकी है लेकिन सक्षम विकल्प सामने नहीं आने से उसे मैदान खाली नजर आने लगा। कांग्रेस की दुविधा ये है कि पंजाब में उसके भीतरी संग्राम के कारण बचा -  खुचा जनाधार भी खिसकने का खतरा है। और फिर वह किसी अन्य पार्टी से गठजोड़ करने की स्थिति में भी नहीं है। संयोग से यही विडंबना भाजपा के साथ भी है। सिखों के बीच वह आज भी समुचित पैठ नहीं बना सकी। हालांकि राज्य में 39 फीसदी हिंदू भी हैं किंतु वे मुख्य रूप से शहरों में ही हैं और उनका एक हिस्सा कांग्रेस के साथ भी है। भाजपा ने पहले कोशिश की कि अन्य राज्यों जैसे ही पंजाब में भी हिंदुओं का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में कर ले। खालिस्तानी आंतक में वृद्धि से इसकी संभावना बढ़ी भी लेकिन पार्टी के पास ऐसा कोई दमदार नेता नहीं है जो हिंदुओं को गोलबंद कर सके। हालांकि आम आदमी पार्टी से आये आधा दर्जन सांसद  उसके  मददगार हैं किंतु वे प. बंगाल जैसा उलटफेर करने का माद्दा नहीं रखते। इसीलिये पार्टी ने अपने पुराने साथी शिरोमणि अकाली दल की तरफ हाथ बढ़ा दिया जिसका प्रमाण सुखबीर सिंह बादल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात से मिल गया। इन दोनों का गठबंधन  अतीत में राज्य की सत्ता भी चला चुका है किंतु 3 कृषि कानूनों को लेकर दोनों दूर हुए और 2022 में अलग - अलग लड़कर नुकसान उठाया। शायद दोनों समझ चुके  हैं कि एक बार फिर एक साथ आने से वे पंजाब की राजनीतिक मुख्यधारा में लौट सकेंगे। हालांकि प्रकाश सिंह बादल की मृत्यु के बाद अकाली दल की वह ताकत नहीं रही और सिख नेतृत्व भी खेमों में बंट चुका है। बढ़ती नशाखोरी और   सीमावर्ती ग्रामीण जिलों में दलित सिखों के तेजी से हो रहा ईसाईकरण भी नये समीकरणों को जन्म दे रहा है। ऐसे में अकाली - भाजपा गठजोड यदि मजबूती से उतरा और दोनों के बीच पुराना भरोसा कायम हुआ तब वे आम आदमी पार्टी के लिए चुनौती बन सकते हैं। फ़िलहाल तो पंजाब के बारे में सियासी भविष्यवाणी  करना जल्दबाजी होगी। 


Friday, 7 August 2026

आरक्षण सामाजिक उत्थान का आधार बने न कि जातिगत विद्वेष का



रास्वसंघ के सरसंघचालक डाॅ. मोहन भागवत अपने पूर्ववर्ती संघ प्रमुखों की तुलना में ज्यादा मुखर हैं। इसका एक कारण ये भी है कि एक सदी की सफल यात्रा कर चुका संघ सामाजिक  जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करवा चुका है। इसीलिये उसका आकर्षण और असर दोनों में वृद्धि हो रही है। देश के प्रत्येक भाग में संघ कार्य  संचालित है। कुछ लोग इसका कारण  देश के बड़े हिस्से में भाजपा का शासन होना भी मानते हैं किंतु इसका दूसरा पहलू ये भी है कि जहाँ संघ कार्य का विस्तार हुआ वहीं भाजपा भी मजबूत हुई। खैर, ये अलग विषय है। ताजा प्रसंग है डाॅ. भागवत द्वारा गत दिवस जेन जी से किया गया संवाद। उस दौरान उन्होंने विभिन्न समकालीन विषयों पर खुलकर अपने विचार प्रस्तुत किये । जेन जी की प्रशंसा करने के साथ ही उनके गुस्से को जायज मानते हुए उन्होंने एक बार फिर दोहराया कि हम इस उम्र में बड़ों की बात बिना विरोध किये मान लेते थे किंतु आज का युवा सवाल पूछता है और हमें उसका जवाब देना चाहिए। संघ  , चूंकि समाज के बीच कार्य करता है लिहाजा पीढी़गत परिवर्तनों पर उसकी नजर रहती है। इसीलिये संघ प्रमुख समय - समय पर उनके बारे में सार्वजनिक तौर पर अपनी बात रखते हैं जिसे संघ का अधिकृत दृष्टिकोण माना जाता है। उनके अनेक बयान विवादास्पद भी हुए। मसलन 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान आरक्षण की समीक्षा संबंधी उनकी टिप्पणी को लालू प्रसाद यादव ने चुनावी मुद्दा बना दिया जिसका असर भाजपा की पराजय के रूप में सामने आया। उसके बाद डाॅ.भागवत इस संवेदनशील विषय पर बोलते हुए सावधानी बरतने लगे । गत दिवस भी उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि जब तक भेदभाव है आरक्षण जारी रहेगा। लेकिन उसी के साथ ये भी जोड़ दिया कि जो लोग आरक्षण से लाभान्वित हो चुके हों उन्हें खुद होकर इस सुविधा को छोड़ देना चाहिये। दूसरे शब्दों में कहें तो उनका संकेत उसी क्रीमी लेयर की ओर था जिसके विरोध में आरक्षित वर्ग के भीतर से ही आवाज उठने लगी है। हालांकि ओबीसी श्रेणी में संपन्न वर्ग आरक्षण की परिधि से बाहर है किंतु अनु. जाति और जनजाति पर क्रीमी लेयर जैसी कोई बंदिश नहीं होने से उनमें आरक्षण का लाभ पीढी़ दर पीढी़ चला आ रहा है। संयोग से गत दिवस ही सर्वोच्च न्यायालय में क्रीमी लेयर को आरक्षण से वंचित करने संबंधी याचिका पर अपने जवाब में  केंद्र सरकार ने दो टूक कह दिया कि अनु. जाति और जनजाति पर क्रीमी लेयर की व्यवस्था लागू नहीं की जा सकती क्योंकि उसका अधिकार केवल संसद को ही है। स्मरणीय है कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय के कुछ न्यायाधीशों ने ही ये सवाल उठाया था कि पति - पत्नी दोनों आई.ए.एस हों तो  उनके बच्चों को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए ? उनका ये भी कहना था कि शिक्षा और आर्थिक प्रगति से सामाजिक स्थिति बेहतर होने के बाद अगली पीढी़ को आरक्षण देने की आवश्यकता पर विचार हो। लेकिन शायद ही कोई होगा जिसने स्वप्रेरित होकर ये कहते हुए आरक्षण छोड़ा हो कि उसके बच्चों को इसकी जरूरत नहीं। रही बात संघ प्रमुख द्वारा की गई अपेक्षा की तो ये तभी संभव है जब संघ परिवार से ही इसकी शुरुवात हो। आरक्षण का प्रावधान संविधान में रखते हुए डाॅ. अंबेडकर ने भी जाति विहीन समाज की बात की थी। उनका कहना था कि  जब तक समाज में छुआछूत और असमानता खत्म नहीं होती, तब तक पिछड़ों और शोषितों को सुरक्षा और प्रतिनिधित्व  मिलना चाहिए। संघ प्रमुख ने भी विषमता रहने तक इसकी आवश्यकता जताई। ऐसे में  क्रीमी लेयर अर्थात आरक्षण की मदद से शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से ऊपर उठ चुके लोगों द्वारा स्वेच्छा से आरक्षण छोड़ने जैसी मुहिम यदि संघ परिवार से जुड़े संगठनों के सदस्यों से शुरू हो तो वह भी किसी सामाजिक क्रांति से कम नहीं होगी। डाॅ. अंबेडकर ने भी आरक्षण को बैसाखी मानने से बचने की बात कहते हुए शिक्षित होने की बात कही थी। दलित  विमर्श में भी ये बात सुनने मिलती है कि आरक्षण दर्द की दवा मात्र है, बीमारी का इलाज नहीं। ये बात इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि जो दलित बच्चा विद्यालय ही नहीं जायेगा उसे भविष्य में आरक्षण का लाभ कहाँ से मिलेगा? ये देखते हुए भागवत जी ने बात छेड़ ही दी है तो  अब इसे आगे भी बढ़ाना चाहिए जिससे आरक्षण सामाजिक उत्थान का आधार बने न कि जातिगत विद्वेष का। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 6 August 2026

कॉकरोच जनता पार्टी लंबी रेस का घोड़ा नहीं



कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने गत दिवस कहा कि वे राजनीतिक दल नहीं बनाएंगे    क्योंकि राजनीतिक दल से अधिक जरूरत दबाव समूह की है जो जनहित के मुद्दों को उठा सके। महाराष्ट्र के संभाजीनगर में  पार्टी के कोर ग्रुप की बैठक के अवसर पर उन्होंने उक्त ऐलान किया।  इसके पीछे की सोच उजागर करते हुए उन्होंने कहा कि कॉकरोच जनता पार्टी चूंकि भावी आंदोलनों में अन्य दलों तथा संगठनों का सहयोग चाहती है लिहाजा उसने खुद राजनीतिक दल बनने से परहेज किया। उल्लेखनीय है जंतर - मंतर पर किये गए आंदोलन में कॉकरोच जनता पार्टी  को आम आदमी पार्टी ने खुलकर समर्थन दिया वहीं जेएनयू  के अनेक वामपंथी संगठनों ने भी सक्रिय हिस्सा लिया। इसके बाद अभिजीत और उनके प्रमुख सहयोगियों के आम आदमी पार्टी से पुराने संबंध होने की बात सामने आने लगी। कहा तो यहाँ तक गया कि ये पार्टी दरअसल अरविंद केजरीवाल ने ही बनवाई है जिसके जरिये  सरकार के विरुद्ध माहौल बनाया जा सके। केजरीवाल का सोचना ये था कि उनके बैनर तले बाकी पार्टियां आने में संकोच करेंगी। उनकी योजना उस लिहाज से सफल कही जाएगी क्योंकि जंतर मंतर पर हुए आंदोलन में राजनीतिक दलों के अलावा गैर राजनीतिक तबका भी शामिल हुआ। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी को राजनीतिक दल में नहीं बदलने के फैसले के पीछे केवल यही कारण नहीं है। सही बात तो ये है कि जंतर मंतर वाला आंदोलन जितना विख्यात हुआ उतना ही कुख्यात भी।  आखिरी दौर में तो अभिजीत और उनकी कोर टीम के हाथ से उसका नियंत्रण निकल चुका था जिससे वह गम्भीरता खोने लगा। उनकी समझ में एक बात और आ गई कि केजरीवाल के पीछे अन्ना हजारे के आंदोलन की पुण्याई थी जबकि कॉकरोच जनता पार्टी इस मामले में खाली हाथ है। और ये भी कि केजरीवाल आम आदमी पार्टी बनाने के पहले से ही अपने एन .जी.ओ के कारण दिल्ली में समाज के निचले स्तर में पैठ बना चुके थे। उनके साथ सिविल सोसाइटी की अनेक विख्यात हस्तियां जुड़ी होने से  पहिचान का संकट नहीं था। इसके विपरीत अभिजीत और उनके दाएं - बाएं हाथ कहे जाने वाले कतिपय लोगों की आम जनता में न कोई छवि है और न ही साख। उल्टे जंतर मंतर पर हुई गाली - गलौच के कारण उनका दामन दागदार हो गया। ऊपर से आंदोलन की समाप्ति पर आलीशान होटल में जश्न मनाते हुए पार्टी  नेताओं के वीडियो सार्वजनिक होने के बाद बजाय शर्मिंदगी महसूस करने के जेन जी के नाम पर उसका बचाव करने से भी समाज के बड़े वर्ग में उनके बारे में नकारात्मक अवधारणा स्थापित हो गई। धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र होते ही जिस जल्दबाजी में अभिजीत एंड कंपनी ने अपना बोरिया - बिस्तर समेटा उससे उनकी ईमानदारी और लंबी लड़ाई लड़ने की क्षमता पर भी संदेह पैदा होने लगा। सरकार द्वारा  जो लिखित आश्वासन दिये जाने थे वे न मिलने पर देशव्यापी आंदोलन की धमकी भी फुस्स साबित हुई। जो जानकारी आ रही है उसके मुताबिक दिल्ली पुलिस ने अनेक ऐसे लोगों पर शिकंजा कस दिया है जिन्होंने  आंदोलन के दौरान पुलिस पर घातक हमले किये और सरकारी वाहनों को नुकसान पहुंचाया। अनेक के पास हथियार होने का मामला भी जाँच में है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपराधिक तत्वों पर कार्रवाई की छूट दे दी। आंदोलन के बाद कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं से जब पंजाब और कर्नाटक में हुए पेपर लीक पर वहाँ के शिक्षा मंत्री को हटाये जाने की मांग करने और आंदोलन करने के बारे में पूछा गया तो वे बगलें झांकने लगे। झारखंड में चल रहे छात्रों के आंदोलन को जुबानी समर्थन देने से आगे पार्टी नहीं बढ़ पा रही है।  ये देखते हुए उन आशंकाओं को बल मिल रहा है कि सोशल मीडिया पर पैदा हुई कॉकरोच जनता पार्टी लंबी रेस का घोड़ा नहीं है। हालांकि राजनीति में न जाने की बात अन्ना आंदोलन के बाद अरविंद केजरीवाल ने भी कही थी किंतु वह दौर अलग था। इसीलिये कॉकरोच जनता पार्टी को किसी भी पार्टी ने भाव नहीं दिया। जंतर मंतर आंदोलन की आधी - अधूरी सफलता के बाद अब उसके सामने कोई स्पष्ट लक्ष्य नजर नहीं आ रहा। सही बात ये है कि खुद केजरीवाल ही अभिजीत की महत्वाकांक्षाओं के मार्ग में सबसे बड़े रोड़ा हैं। रही बात दबाव समूह बनने की तो अभिजीत और उनके साथी ये भूल रहे हैं कि काठ की हांडी बार - बार आग पर नहीं चढ़ती। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 5 August 2026

ताकि दतिया और बाँकीपुर जैसी शर्मिंदगी आगे न झेलना पड़े



म.प्र की दतिया विधानसभा सीट पर भाजपा की पराजय का मुख्य कारण पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्र की टिकिट कटना माना जा रहा है। 2023 में वे यहाँ से पराजित हो गए थे। लेकिन जीते हुए कांग्रेस विधायक का चुनाव निरस्त हो जाने के बाद जब उपचुनाव की स्थिति बनी तब श्री मिश्रा जोर - शोर से   सक्रिय हो गए क्योंकि उन्हें पूरी उम्मीद थी कि पार्टी उन्हीं को उम्मीवारी सौंपेगी । लेकिन सबको चौंकाते हुए पार्टी नेतृत्व ने उनकी जगह किसी अन्य को प्रत्याशी बना दिया। और वह भी ये कहते हुए कि ऐसा आंतरिक सर्वे के आधार पर किया गया। इस फैसले से नाराज नरोत्तम समर्थकों ने दतिया में खूब उपद्रव मचाया। हालाँकि मान - मनौव्वल के बाद ऊपरी तौर पर तो सब शांत हो गया और श्री मिश्रा अपने गुट के साथ चुनाव प्रचार में दिखने लगे लेकिन जो नुकसान होना था वह तो हो ही चुका था। रही - सही कसर पूरी कर दी आजाद समाज पार्टी के दामोदर यादव ने जो 22 हजार वोट ले गए। इनमें यादव समाज के भी हजारों मत माने जा रहे हैं  जिनके बारे में भाजपा आश्वस्त थी कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के प्रभाव के चलते उनके सजातीय मत उसके खाते में ही जाएंगे। चुनाव प्रचार में भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी। सत्ता और संगठन दोनों मोर्चे पर डटे रहे किंतु निराशा हाथ लगी। उसके बाद गत दिवस पार्टी ने अनुशासन का चाबुक चलाया। जिला संगठन की समस्त इकाइयों को भंग कर दिया गया। कैडर आधारित पार्टी में इस तरह की कार्रवाई नई बात नहीं है किंतु भाजपा में इस बात पर मंथन होना चाहिए कि क्या वह पहले जैसी प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं वाली पार्टी ही है जो गुटबाजी से मुक्त थी। कुशाभाऊ ठाकरे, प्यारेलाल खंडेलवाल, नारायण प्रसाद गुप्ता (सभी दिवंगत) और उन जैसे समर्पित अनेक संगठनकर्ता अब नहीं दिखाई देते । एक जमाना था जब संगठन मंत्री की कार्यप्रणाली केवल पार्टी के हित में होती थी। साधारण कार्यकर्ताओं और बड़े नेताओं के बीच संपर्क और संवाद निरंतर बना रहता था। लेकिन आज वह गुजरे जमाने की बात हो चुकी है। जो संगठन मंत्री पार्टी में गुटबाजी दूर करने नियुक्त होते थे वे खुद भी गुटीय राजनीति में लिप्त हैं। उन पर वे सभी आरोप लगने लगे हैं जिनके लिए राजनीतिक नेता बदनाम होते हैं। नब्बे के दशक में लालकृष्ण आडवाणी ने भाजपा को पार्टी विथ डिफरेंस (औरों से  भिन्न)  बताकर एक बड़े वर्ग में उसके लिए आकर्षण उत्पन्न किया था। लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि भले ही भाजपा ने चुनावी सफलता के कीर्तिमान स्थापित करते हुए केंद्र और तमाम राज्यों की सत्ता हासिल कर ली किंतु  इस आपाधापी में उसकी संगठनात्मक कसावट कुछ कमजोर हुई है। यही वजह है कि उसमें ऐसे लोग आते जा रहे हैं जिनका उद्देश्य सत्ता से जुड़े लाभ हासिल करना मात्र है। दतिया ही क्यों बिहार की बाँकीपुर सीट से आ रही जानकारी से भी इसी बात की पुष्टि हो रही है कि पार्टी को हरवाने में उसी के लोग आगे रहे। जब भी ऐसा होता है अनुशासन का डण्डा घूमता है। लेकिन अगला चुनाव आते तक सारे निलम्बन और बर्खास्तगी रद्द हो जाती है। यही वजह है कि अपने अहं की संतुष्टि के लिए पार्टी के विरुद्ध काम करने वालों के मन में कोई खौफ नहीं बचा। जहाँ तक बात पार्टी के ग्राफ की है तो ये निःसंकोच स्वीकार करना पड़ेगा कि आज वह सफलता के उच्चतम शिखर पर है। लगातार तीसरी बार केंद्र में सत्ता पर कब्जा करना साधारण बात नहीं है। देश के अनेक प्रमुख राज्यों में उसकी  सरकारें हैं। किसी जमाने में उत्तर भारत और सवर्णों की पार्टी के तौर पर जानी जाने वाली भाजपा अब हर दृष्टि से राष्ट्रीय पार्टी की हैसियत में है। उसकी मारक क्षमता में हुई वृद्धि आश्चर्यचकित करती है। नीतिगत मोर्चे पर उसने अपने समर्थक वर्ग को काफी हद तक संतुष्ट भी किया है। पूर्वोत्तर जैसे अछूते इलाकों में भी वह मुख्य धारा की पार्टी बन गई है। लेकिन इस विस्तार के लिए जो समझौते और गठबंधन उसे करना पड़े वे उन लोगों को पसंद नहीं आ रहे जो पार्टी की जड़ों से जुड़े हैं। हालांकि ये भी मानना पड़ेगा कि आज की स्थिति में फिलहाल भाजपा का कोई विकल्प राष्ट्रीय स्तर पर नजर नहीं आ रहा। इसलिए ये जरूरी है कि वह अपने भीतर घुस आई  उन बुराइयों को प्राथमिकता के आधार पर दूर करे जिनके चलते समय - समय पर दतिया और बाँकीपुर जैसी शर्मिंदगी उसे झेलनी पड़ जाती है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 4 August 2026

भाजपा के लिए चेतावनी भी और चुनौती भी



कल दोपहर से राजनीति में रुचि रखने वालों  का ध्यान तीन राज्यों में हुए विधानसभा उपचुनावों के परिणामों ओर केंद्रित हो गया। हालांकि गुजरात के  नतीजे को ज्यादा महत्व नहीं मिला जबकि भाजपा ने बड़े अंतर से उस सीट पर कब्जा बनाये रखा। लेकिन बिहार की बाँकीपुर और म.प्र की दतिया सीट के परिणामों ने सुबह से ही राजनीतिक नेताओं  के अलावा समाचार माध्यमों को भी व्यस्त कर दिया। इसका कारण दोनों जगहों पर भाजपा को पराजय मिलना बना। चूंकि  तीनों राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं इसलिये नतीजों का विश्लेषण उसी के इर्द - गिर्द घूम रहा है।  बीते कुछ महीनों से देश में भाजपा विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध में  मुहिम चलाई जा रही है इसीलिये  गुजरात में कांग्रेस की हार को चर्चा योग्य नहीं माना गया जबकि दतिया तथा बाँकीपुर में भाजपा की पराजय  सुर्खियां बटोर ले गई। ये स्वाभाविक भी था क्योंकि भले ही दतिया की सीट 2023 में भी कांग्रेस ने जीती थी किंतु  प्रदेश में बहुमत वाली सरकार और सभी  लोकसभा सीटों पर कब्जे के बाद भी दतिया में बड़ी हार भाजपा के लिए विचारणीय भी है और चिंतनीय भी। हालांकि शिवराज सिंह चौहान की सरकार के समय दमोह के  विधानसभा उपचुनाव में  भाजपा को इससे भी बड़ी हार देखने मिली थी। हुआ यूँ कि कांग्रेस विधायक ने भाजपा में आने पर त्यागपत्र दिया तब उपचुनाव में पार्टी ने उनको मैदान में उतार दिया। इससे दमोह के कद्दावर नेता जयंत मलैया नाराज हो गए और फिर वही सब हुआ जिसकी पुनरावृत्ति दतिया में देखने मिली। यद्यपि उसके बाद  2023 में भाजपा ने शिवराज के नेतृत्व में धमाकेदार जीत अर्जित कर सरकार बनाई और लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया। कहने का आशय ये है कि दतिया में भाजपा की हार को कांग्रेस सत्ता में वापसी मानकर आश्वस्त हो जाए तो वह मुगालते में रहेगी क्योंकि इस नतीजे के पीछे  नरोत्तम मिश्रा को टिकिट नहीं मिलने से उत्पन्न आंतरिक कलह भी कारण बनी और दूसरा भाजपा में हार की समीक्षा कर भविष्य के लिए सावधान रहने की जो क्षमता है वह कांग्रेस की खुशी को स्थायी रहने देगी इसमें संदेह है। हालांकि प्रदेश कांग्रेस  की कमान जिन युवाओं के हाथ है उनके लिए जरूर ये जश्न मनाने का अवसर है क्योंकि  ये साबित हो गया कि पार्टी बिना कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के भी चलाई जा सकती है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और मुख्यमंत्री मोहन यादव के लिए इस हार से संगठन और सरकार को उबारना बड़ी चुनौती होगी क्योंकि नरोत्तम की पीढ़ी के जो नेता अपने भविष्य के प्रति चिन्तित हो उठे थे उन्हें  संजीवनी मिल गई है। लेकिन कल आये तीन परिणामों में बिहार की बाँकीपुर सीट अचानक राष्ट्रीय राजनीति में चर्चित हो उठी क्योंकि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन वहाँ से पाँच बार विधायक रहे।  राज्यसभा के लिए चुने जाने पर उन्होंने उससे इस्तीफा दे दिया। उनके पिता भी वहीं से विधायक बनते रहे। इसलिये भाजपा वहाँ  अति आत्मविश्वास से भरी हुई थी। लेकिन पहले तो उसने जिसे टिकिट दी वह पीछे हट गया और दूसरा प्रत्याशी उतारे जाने पर जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने मैदान में उतरकर सबको चौंका दिया। विधानसभा चुनाव में जनसुराज की दुर्गति  के आधार पर भाजपा और तेजस्वी यादव की आरजेडी प्रशांत को हलके में लेने की गलती कर बैठे। नीतीश कुमार को हटाकर सम्राट चौधरी की ताजपोशी करवाकर भाजपा ने बिहार की गद्दी तो हासिल कर ली किंतु नीतीश समर्थक उस निर्णय को पचा नहीं  सके थे। और फिर एक ब्राह्मण युवक का एनकाउंटर भाजपा के प्रतिबद्ध सवर्ण मतदाताओं की नाराजगी की वजह बन गया। यही वजह रही कि राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट पर भी पार्टी संगठन अपने मतदाताओं को मतदान केंद्र तक नहीं ला सका। लेकिन उसका लाभ बजाय तेजस्वी के प्रत्याशी को मिलने के प्रशांत को मिलने से ये बात उजागर हो गई कि बिहार में लालू की राजनीतिक विरासत खत्म होने को है। हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि प्रशांत किशोर वहाँ वैकल्पिक राजनीति के ध्वजवाहक बन जायेंगे किंतु  उनका उदय लालू ब्रांड राजनीति को हाशिये में धकेलने का कारण तो बन ही सकता है। कुछ लोग इन परिणामों को जेन जी आंदोलन से जोड़ रहे हैं जो निरर्थक है क्योंकि उपचुनाव सदैव स्थानीय मुद्दों से प्रभावित होते हैं। वरना गुजरात में भी भाजपा को हार का सामना करना पड़ता। बावजूद इसके म.प्र  और बिहार में मिली पराजय भाजपा के लिए चेतावनी भी है और चुनौती भी क्योंकि इससे उसके विरोधियों का उत्साहवर्धन तो हुआ ही है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 3 August 2026

मानसून की चेतावनी को गंभीरता से लिया जाए



अगस्त महीने की शुरुआत तक म.प्र में मानसून की आधी बारिश हो जाती थी। लेकिन इस साल एक चौथाई से भी कम बरसात होने से न केवल किसान अपितु व्यापारी और सामान्य जन भी परेशान हैं। सरकार के माथे पर भी पसीना छलछलाने लगा है। कई जिलों में धान की बोनी बरसात के अभाव में बेकार चली गई। भूजल स्तर नीचे जाने से सिंचाई हेतु लगाए गए पंप आदि भी जवाब देने लगे हैं। गर्मियों में पीने के पानी की जो किल्लत हुई वह बरसात के मौसम में भी जारी रहने से आगामी गर्मियों में क्या होगा इसकी चिंता स्थानीय निकायों को सताने लगी है। अच्छे मानसून से हमारे देश में व्यापार भी फलता - फूलता है जिस पर आर्थिक विकास की इमारत  खड़ी होती है। बढ़ते शहरीकरण के बाद भी भारतीय बाजारों में रौनक ग्रामीण भारत के बल पर ही आती है। चिंता का सबसे बड़ा कारण ये है कि वर्षा कम होने से खरीफ फसल तो खराब होगी ही जमीन सूखी होने से अगली रबी फसल पर भी इसका असर पड़े बिना नहीं रहेगा। फसलें खराब होने से खाद्यान्न का अभाव होगा जिसका परिणाम महंगाई के रूप में देखने मिलेगा। हालांकि ज्योतिष शास्त्र के जानकारों का कहना है कि सनातनी मान्यताओं के अनुसार इस वर्ष अधिक मास ( पुरुषोत्तम मास) होने से सावन की शुरुआत भी देर से हुई लिहाजा मानसून का दौर भी देर तक चलेगा। यदि ऐसा होता है तब भी गनीमत है किंतु उस स्थिति में भी धान सहित इस मौसम की फसलें खराब होने से किसानों को भारी नुकसान होना तय है। लेकिन सावन और भादों में भी मानसून रूठा रहा तब पीने के पानी के साथ ही बिजली का संकट भी उत्पन्न हुए बिना नहीं रहेगा क्योंकि प्रदेश के जितने भी बड़े बांध हैं उनमें जलभराव की स्थिति बेहद चिंताजनक है। बांध खाली रहने से पनबिजली उत्पादन तो घटेगा ही, नहरों से होने वाली सिंचाई में भी कमी आयेगी। लंबे अरसे बाद ये हालात उत्पन्न हुए हैं जब म.प्र का बड़ा हिस्सा कमजोर मानसून का शिकार हो रहा है। वरना बरसात का आंकड़ा कुछ जिलों में कम तो कुछ में ज्यादा होने से औसत बराबर हो जाया करता था। लेकिन इस साल अब तक जो स्थिति देखने मिल रही है उसके मुताबिक प्रदेश का बड़ा हिस्सा मानसून की बेरुखी झेलने मजबूर है। नदियों का मायका कहे जाने वाले इस राज्य में अनेक बड़े बांध भी हैं। उनमें होने वाले जल भंडारण से म.प्र ही नहीं बल्कि गुजरात और महाराष्ट्र के हित भी जुड़े हुए  है। इसलिये शासन - प्रशासन को अभी से आपदा प्रबंधन की योजना बना लेनी चाहिए। इस स्थिति में वर्षा जल संचयन ( वाटर हार्वेस्टिंग) अभियान की उपेक्षा भी उभरकर आ रही है। घरों सहित सरकारी भवनों की छतों पर वर्षा जल को बेकार नालियों में बहने देने के बजाय निकटवर्ती नलकूप से जोड़ देने से उसका भूजल स्तर गर्मियों में भी बना रहता है। इसके अलावा छतों से आने वाले बरसाती पानी को एक गड्ढे ( सोक पिट) के जरिये जमीन के नीचे भेज देने से भी आस  - पास का भूजल स्तर बरकरार रहने से अल्प वृष्टि के समय जल संकट से निपटना आसान हो जाता है। वर्षा जल संचयन बेहद महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है जिसे पूरा करने की जिम्मेदारी मूलतः स्थानीय निकायों की है। कम से कम नये बनने वाले भवनों में तो इसे अनिवार्य किया ही जा सकता है। नये भवनों का नक्शा स्वीकृत करने में भी वर्षा जल संचयन की व्यवस्था अनिवार्य रूप से किये जाने के निर्देश होते हैं। लेकिन इस बारे में  ध्यान  नहीं दिये जाने से ये योजना केवल कागजों और आंकड़ों तक ही सीमित है। उम्मीद की जानी चाहिए कि देर से ही सही किंतु अंततोगत्वा इंद्र देव प्रसन्न होकर पर्याप्त वर्षा करवा देंगे जिससे प्रदेश को जल संकट से राहत मिलने के साथ ही किसानों की चिंता दूर हो सकेगी। लेकिन ऐसे अवसरों पर आपदा प्रबंधन के साथ ही आपदा को अवसर बनाने  की सूझबूझ भी दिखानी चाहिए। इसके लिए जरूरी है मानसून के भरोसे हाथ पर हाथ रखकर बैठने के बजाय भविष्य में आने वाले संकट से निपटने के पुख्ता इंतजाम समय रहते किये जाएं। पानी की बरबादी रोकने के अलावा उसके संचयन की प्रणाली को जन अभियान बनाकर लागू किया जाना चाहिए। मानसून ने इस वर्ष जो चेतावनी दी है उससे सावधान होकर भविष्य में आने वाले संकट के लिए प्रदेश को तैयार रहना चाहिए। शासन और प्रशासन के साथ ही जनता को भी ये याद रखना चाहिए कि जल ही जीवन है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 1 August 2026

सनातन धर्म के अपमान का विरोध जरूरी वरना तनाव बढ़ेगा



कांग्रेस सांसद प्रियंका वाड्रा ने लोकसभा में पेपर लीक रोकने सम्बन्धी विधेयक पर चर्चा करते हुए व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि सरकार की बनाई नई कमेटी में एक्स- आई.बी चीफ, आई. टी कंपनी के मालिक और गोमूत्र के विशेषज्ञ हैं। गोमूत्र विशेषज्ञ को शिक्षा के बारे में क्या पता होगा? उनके इतना कहते ही कांग्रेस सांसदों ने ठहाके लगाकर सरकार का उपहास किया। लेकिन प्रियंका का कटाक्ष  उन्हीं के गले पड़ गया। गोमूत्र विशेषज्ञ के रूप में जिस व्यक्ति पर श्रीमती वाड्रा ने तंज कसा उनका नाम वी. कामकोटि है जो वर्तमान में आई.आई.टी ,  मद्रास में निदेशक हैं। दरअसल 2025 में उनके एक वीडियो में  दावा किया गया था कि गोमूत्र के एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुण से अनेक बीमारियां ठीक होती हैं। उनके दावे का आधार विभिन्न साइंस जर्नल में प्रकाशित शोध पत्र थे। उल्लेखनीय है श्री कामकोटि कंप्यूटर साइंस में डॉक्टरेट हैं और इसी विषय के विशेषज्ञ भी। उन पर किये गए कटाक्ष पर देश के 215 शिक्षाविदों ने श्रीमती वाड्रा को पत्र लिखकर कहा कि किसी शिक्षाविद् पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी करते वक्त तथ्य और उस व्यक्ति की गरिमा का ध्यान रखा जाना चाहिए। मतभेद हो सकते हैं, लेकिन किसी का मजाक उड़ाना सही नहीं। हमें उस बयान पर निराशा है, जिसमें आपने प्रोफे. कामकोटि को गोमूत्र विशेषज्ञ कहा। यह टिप्पणी चाहे व्यंग्य के रूप में की हो, राजनीतिक बयानबाजी के तहत, गलत है। विवाद और बढ़े उसके पूर्व ही कांग्रेस के वरिष्ट नेता रहे स्व. ऑस्कर फर्नांडीज द्वारा राज्यसभा में दिये पुराने भाषण का वीडियो प्रसारित होने लगा जिसमें उन्होंने  मेरठ के पास एक आश्रम के ड्राइवर का संस्मरण साझा करते हुए बताया था कि गोमूत्र के सेवन से उसका गंभीर कैंसर ठीक हो गया था। इसके अलावा स्व.फर्नांडीज ने यह भी बताया कि घुटनों के गंभीर दर्द के बावजूद, डॉक्टरों की सर्जरी सलाह को ठुकराकर उन्होंने वज्रासन और योग अपनाए, जिससे उन्हें पूरा लाभ मिला। शिक्षाविदों के पत्र और सोनिया गाँधी के निकटस्थ रहे स्व. फर्नांडीज के उल्लिखित भाषण के बाद अब श्रीमती वाड्रा सवालों के घेरे में आ गईं हैं। उन्होंने प्रोफ़े.कामकोटि को गोमूत्र विशेषज्ञ कहकर उनका मजाक उड़ाते हुए सवाल उठाया कि उन्हें शिक्षा के बारे में क्या पता? उनकी ये टिप्पणी साबित कर गई कि उनमें गंभीरता का अभाव है। हालांकि उनके बारे में ये अवधारणा बनने लगी थी कि अपने भाई राहुल गाँधी की तुलना में वे ज्यादा परिपक्व हैं। लोकसभा में उनके भाषण श्री गाँधी से बेहतर माने गए। उसी कारण  कतिपय विश्लेषक उनमें कांग्रेस का भविष्य देखने लगे थे। लेकिन प्रोफ़े. कामकोटि की  शैक्षणिक पृष्ठभूमि और पेशेवर दक्षता जाने बिना उन्हें  गोमूत्र विशेषज्ञ बताकर उनकी हंसी उड़ाकर उन्होंने उन संभावनाओं को धूमिल कर दिया। अब तक उन्होंने स्व. फर्नांडीज का संदर्भित भाषण पढ़ लिया होगा। तो क्या वे उनके उस भाषण का भी ऐसा ही मजाक उड़ाएंगी? उससे भी बड़ा प्रश्न ये है कि सनातन धर्म से जुड़ी बातों का ही मजाक उड़ाया जाता है। चाहे प्रियंका हों या कोई और वे सभी हिंदुओं की परंपराओं और प्रतीकों के बारे में जिस दबंगी से बोल जाते हैं यदि ऐसा ही वे किसी अन्य धर्म के बारे में बोलने का दुस्साहस करें तब उनकी क्या फजीहत होगी ये बताने की आवश्यकता नहीं है। योग, आयुर्वेद , ज्योतिष आदि को दकियानूसी बताकर उनका मजाक उड़ाना फैशन बन गया है। गोमूत्र और गोबर को लेकर भी स्तरहीन बातें की जाती हैं। आश्चर्य ये है कि ऐसा सब कहने वाले अपने को प्रगतिशील बताते नहीं थकते। लेकिन वे भूल जाते हैं कि इन्हीं सब विषयों पर उन देशों में शोध हो रहे हैं जो विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी माने जाते हैं। हाल ही में राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने मनु स्मृति को लेकर आधारहीन और अनर्गल प्रलाप किया। ऐसा लगता है सनातन धर्म में जो सहनशीलता है उसका बेजा फ़ायदा उठाने का दुस्साहस बढ़ता जा रहा है। महज राजनीतिक स्वार्थ के लिए देश के बहुसंख्यक समाज की भावनाओं का अपमान करने के इस चलन का विरोध होना जरूरी है वरना देश का साम्प्रदायिक सद्भाव खतरे में पड़ जाएगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी