Monday, 3 August 2026

मानसून की चेतावनी को गंभीरता से लिया जाए



अगस्त महीने की शुरुआत तक म.प्र में मानसून की आधी बारिश हो जाती थी। लेकिन इस साल एक चौथाई से भी कम बरसात होने से न केवल किसान अपितु व्यापारी और सामान्य जन भी परेशान हैं। सरकार के माथे पर भी पसीना छलछलाने लगा है। कई जिलों में धान की बोनी बरसात के अभाव में बेकार चली गई। भूजल स्तर नीचे जाने से सिंचाई हेतु लगाए गए पंप आदि भी जवाब देने लगे हैं। गर्मियों में पीने के पानी की जो किल्लत हुई वह बरसात के मौसम में भी जारी रहने से आगामी गर्मियों में क्या होगा इसकी चिंता स्थानीय निकायों को सताने लगी है। अच्छे मानसून से हमारे देश में व्यापार भी फलता - फूलता है जिस पर आर्थिक विकास की इमारत  खड़ी होती है। बढ़ते शहरीकरण के बाद भी भारतीय बाजारों में रौनक ग्रामीण भारत के बल पर ही आती है। चिंता का सबसे बड़ा कारण ये है कि वर्षा कम होने से खरीफ फसल तो खराब होगी ही जमीन सूखी होने से अगली रबी फसल पर भी इसका असर पड़े बिना नहीं रहेगा। फसलें खराब होने से खाद्यान्न का अभाव होगा जिसका परिणाम महंगाई के रूप में देखने मिलेगा। हालांकि ज्योतिष शास्त्र के जानकारों का कहना है कि सनातनी मान्यताओं के अनुसार इस वर्ष अधिक मास ( पुरुषोत्तम मास) होने से सावन की शुरुआत भी देर से हुई लिहाजा मानसून का दौर भी देर तक चलेगा। यदि ऐसा होता है तब भी गनीमत है किंतु उस स्थिति में भी धान सहित इस मौसम की फसलें खराब होने से किसानों को भारी नुकसान होना तय है। लेकिन सावन और भादों में भी मानसून रूठा रहा तब पीने के पानी के साथ ही बिजली का संकट भी उत्पन्न हुए बिना नहीं रहेगा क्योंकि प्रदेश के जितने भी बड़े बांध हैं उनमें जलभराव की स्थिति बेहद चिंताजनक है। बांध खाली रहने से पनबिजली उत्पादन तो घटेगा ही, नहरों से होने वाली सिंचाई में भी कमी आयेगी। लंबे अरसे बाद ये हालात उत्पन्न हुए हैं जब म.प्र का बड़ा हिस्सा कमजोर मानसून का शिकार हो रहा है। वरना बरसात का आंकड़ा कुछ जिलों में कम तो कुछ में ज्यादा होने से औसत बराबर हो जाया करता था। लेकिन इस साल अब तक जो स्थिति देखने मिल रही है उसके मुताबिक प्रदेश का बड़ा हिस्सा मानसून की बेरुखी झेलने मजबूर है। नदियों का मायका कहे जाने वाले इस राज्य में अनेक बड़े बांध भी हैं। उनमें होने वाले जल भंडारण से म.प्र ही नहीं बल्कि गुजरात और महाराष्ट्र के हित भी जुड़े हुए  है। इसलिये शासन - प्रशासन को अभी से आपदा प्रबंधन की योजना बना लेनी चाहिए। इस स्थिति में वर्षा जल संचयन ( वाटर हार्वेस्टिंग) अभियान की उपेक्षा भी उभरकर आ रही है। घरों सहित सरकारी भवनों की छतों पर वर्षा जल को बेकार नालियों में बहने देने के बजाय निकटवर्ती नलकूप से जोड़ देने से उसका भूजल स्तर गर्मियों में भी बना रहता है। इसके अलावा छतों से आने वाले बरसाती पानी को एक गड्ढे ( सोक पिट) के जरिये जमीन के नीचे भेज देने से भी आस  - पास का भूजल स्तर बरकरार रहने से अल्प वृष्टि के समय जल संकट से निपटना आसान हो जाता है। वर्षा जल संचयन बेहद महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है जिसे पूरा करने की जिम्मेदारी मूलतः स्थानीय निकायों की है। कम से कम नये बनने वाले भवनों में तो इसे अनिवार्य किया ही जा सकता है। नये भवनों का नक्शा स्वीकृत करने में भी वर्षा जल संचयन की व्यवस्था अनिवार्य रूप से किये जाने के निर्देश होते हैं। लेकिन इस बारे में  ध्यान  नहीं दिये जाने से ये योजना केवल कागजों और आंकड़ों तक ही सीमित है। उम्मीद की जानी चाहिए कि देर से ही सही किंतु अंततोगत्वा इंद्र देव प्रसन्न होकर पर्याप्त वर्षा करवा देंगे जिससे प्रदेश को जल संकट से राहत मिलने के साथ ही किसानों की चिंता दूर हो सकेगी। लेकिन ऐसे अवसरों पर आपदा प्रबंधन के साथ ही आपदा को अवसर बनाने  की सूझबूझ भी दिखानी चाहिए। इसके लिए जरूरी है मानसून के भरोसे हाथ पर हाथ रखकर बैठने के बजाय भविष्य में आने वाले संकट से निपटने के पुख्ता इंतजाम समय रहते किये जाएं। पानी की बरबादी रोकने के अलावा उसके संचयन की प्रणाली को जन अभियान बनाकर लागू किया जाना चाहिए। मानसून ने इस वर्ष जो चेतावनी दी है उससे सावधान होकर भविष्य में आने वाले संकट के लिए प्रदेश को तैयार रहना चाहिए। शासन और प्रशासन के साथ ही जनता को भी ये याद रखना चाहिए कि जल ही जीवन है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 1 August 2026

सनातन धर्म के अपमान का विरोध जरूरी वरना तनाव बढ़ेगा



कांग्रेस सांसद प्रियंका वाड्रा ने लोकसभा में पेपर लीक रोकने सम्बन्धी विधेयक पर चर्चा करते हुए व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि सरकार की बनाई नई कमेटी में एक्स- आई.बी चीफ, आई. टी कंपनी के मालिक और गोमूत्र के विशेषज्ञ हैं। गोमूत्र विशेषज्ञ को शिक्षा के बारे में क्या पता होगा? उनके इतना कहते ही कांग्रेस सांसदों ने ठहाके लगाकर सरकार का उपहास किया। लेकिन प्रियंका का कटाक्ष  उन्हीं के गले पड़ गया। गोमूत्र विशेषज्ञ के रूप में जिस व्यक्ति पर श्रीमती वाड्रा ने तंज कसा उनका नाम वी. कामकोटि है जो वर्तमान में आई.आई.टी ,  मद्रास में निदेशक हैं। दरअसल 2025 में उनके एक वीडियो में  दावा किया गया था कि गोमूत्र के एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुण से अनेक बीमारियां ठीक होती हैं। उनके दावे का आधार विभिन्न साइंस जर्नल में प्रकाशित शोध पत्र थे। उल्लेखनीय है श्री कामकोटि कंप्यूटर साइंस में डॉक्टरेट हैं और इसी विषय के विशेषज्ञ भी। उन पर किये गए कटाक्ष पर देश के 215 शिक्षाविदों ने श्रीमती वाड्रा को पत्र लिखकर कहा कि किसी शिक्षाविद् पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी करते वक्त तथ्य और उस व्यक्ति की गरिमा का ध्यान रखा जाना चाहिए। मतभेद हो सकते हैं, लेकिन किसी का मजाक उड़ाना सही नहीं। हमें उस बयान पर निराशा है, जिसमें आपने प्रोफे. कामकोटि को गोमूत्र विशेषज्ञ कहा। यह टिप्पणी चाहे व्यंग्य के रूप में की हो, राजनीतिक बयानबाजी के तहत, गलत है। विवाद और बढ़े उसके पूर्व ही कांग्रेस के वरिष्ट नेता रहे स्व. ऑस्कर फर्नांडीज द्वारा राज्यसभा में दिये पुराने भाषण का वीडियो प्रसारित होने लगा जिसमें उन्होंने  मेरठ के पास एक आश्रम के ड्राइवर का संस्मरण साझा करते हुए बताया था कि गोमूत्र के सेवन से उसका गंभीर कैंसर ठीक हो गया था। इसके अलावा स्व.फर्नांडीज ने यह भी बताया कि घुटनों के गंभीर दर्द के बावजूद, डॉक्टरों की सर्जरी सलाह को ठुकराकर उन्होंने वज्रासन और योग अपनाए, जिससे उन्हें पूरा लाभ मिला। शिक्षाविदों के पत्र और सोनिया गाँधी के निकटस्थ रहे स्व. फर्नांडीज के उल्लिखित भाषण के बाद अब श्रीमती वाड्रा सवालों के घेरे में आ गईं हैं। उन्होंने प्रोफ़े.कामकोटि को गोमूत्र विशेषज्ञ कहकर उनका मजाक उड़ाते हुए सवाल उठाया कि उन्हें शिक्षा के बारे में क्या पता? उनकी ये टिप्पणी साबित कर गई कि उनमें गंभीरता का अभाव है। हालांकि उनके बारे में ये अवधारणा बनने लगी थी कि अपने भाई राहुल गाँधी की तुलना में वे ज्यादा परिपक्व हैं। लोकसभा में उनके भाषण श्री गाँधी से बेहतर माने गए। उसी कारण  कतिपय विश्लेषक उनमें कांग्रेस का भविष्य देखने लगे थे। लेकिन प्रोफ़े. कामकोटि की  शैक्षणिक पृष्ठभूमि और पेशेवर दक्षता जाने बिना उन्हें  गोमूत्र विशेषज्ञ बताकर उनकी हंसी उड़ाकर उन्होंने उन संभावनाओं को धूमिल कर दिया। अब तक उन्होंने स्व. फर्नांडीज का संदर्भित भाषण पढ़ लिया होगा। तो क्या वे उनके उस भाषण का भी ऐसा ही मजाक उड़ाएंगी? उससे भी बड़ा प्रश्न ये है कि सनातन धर्म से जुड़ी बातों का ही मजाक उड़ाया जाता है। चाहे प्रियंका हों या कोई और वे सभी हिंदुओं की परंपराओं और प्रतीकों के बारे में जिस दबंगी से बोल जाते हैं यदि ऐसा ही वे किसी अन्य धर्म के बारे में बोलने का दुस्साहस करें तब उनकी क्या फजीहत होगी ये बताने की आवश्यकता नहीं है। योग, आयुर्वेद , ज्योतिष आदि को दकियानूसी बताकर उनका मजाक उड़ाना फैशन बन गया है। गोमूत्र और गोबर को लेकर भी स्तरहीन बातें की जाती हैं। आश्चर्य ये है कि ऐसा सब कहने वाले अपने को प्रगतिशील बताते नहीं थकते। लेकिन वे भूल जाते हैं कि इन्हीं सब विषयों पर उन देशों में शोध हो रहे हैं जो विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी माने जाते हैं। हाल ही में राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने मनु स्मृति को लेकर आधारहीन और अनर्गल प्रलाप किया। ऐसा लगता है सनातन धर्म में जो सहनशीलता है उसका बेजा फ़ायदा उठाने का दुस्साहस बढ़ता जा रहा है। महज राजनीतिक स्वार्थ के लिए देश के बहुसंख्यक समाज की भावनाओं का अपमान करने के इस चलन का विरोध होना जरूरी है वरना देश का साम्प्रदायिक सद्भाव खतरे में पड़ जाएगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी