देश में इन दिनों जो उथलपुथल है उसका कारण युवाओं से जुड़े मुद्दे हैं। यूजीसी अधिसूचना से शुरू विवाद नीट पेपर लीक होने के बाद और गहरा गया। इसी दौरान 12 वीं परीक्षा के मूल्यांकन की विसंगतियाँ भी सामने आ गईं। इनके कारण केंद्र सरकार और भाजपा को कटघरे में खड़ा होना पड़ गया। इस परिस्थिति का लाभ वैसे तो विपक्षी दलों को मिलना चाहिए था किंतु अचानक उभरी कॉकरोच जनता पार्टी ने नीट पेपर लीक के मुद्दे पर दिल्ली के जंतर मंतर पर आंदोलन करते हुए युवाओं को अपने पाले में खींचने में तात्कालिक तौर तो सफलता हासिल कर ही ली। यद्यपि युवाओं में केन्द्र सरकार के विरुद्ध गुस्से की शुरुआत यूजीसी की उस नियमावली से हुई थी जिसमें दलित और ओबीसी छात्रों के उत्पीड़न पर कड़े दण्ड का प्रावधान किया गया था। पहले उसमें केवल दलित वर्ग था किंतु नये नियमों में ओबीसी भी जुड़ने से सवर्ण छात्रों में गुस्से की लहर दौड़ गई। हालांकि उस नियमावली पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगा दी किंतु इसी बीच नीट पेपर लीक होने से असंतोष का दायरा व्यापक हो गया। 22 छात्रों द्वारा आत्महत्या के कारण नीट मुद्दा यूजीसी विवाद पर भारी पड़ने लगा। कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन तो नीट पेपर लीक और धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र पर ही केंद्रित रहा। लेकिन उसके फ़ौरन बाद आरक्षण विरोधी आंदोलनकारियों ने भी जंतर मंतर पर शक्ति प्रदर्शन किया। हालांकि मुख्य धारा के मीडिया ने उसे खास महत्व नहीं दिया वहीं सरकार ने भी उसके प्रति उपेक्षा दिखाई। हालांकि इस आंदोलन के कारण सोशल मीडिया पर आरक्षण विरोधी आवाजें तेज हो गईं। इसे यूजीसी विवाद का ही अगला चरण कहना गलत नहीं होगा। इस आंदोलन ने भी नीट परीक्षा में आरक्षण श्रेणी के छात्रों को कम अंकों के बावजूद मेडीकल कॉलेजों में प्रवेश मिलने का मुद्दा उठाया। उल्लेखनीय है विभिन्न दलों ने जंतर मंतर आंदोलन के प्रति तो समर्थन जताया परंतु आरक्षण विरोधी आंदोलन के प्रति सहानुभूति दिखाने तक से परहेज किया। इन युवाओं में भाजपा के प्रति ज्यादा नाराजगी है क्योंकि सवर्ण जातियाँ उसकी परंपरागत समर्थक रही हैं। लेकिन चुनाव जीतने के लिए भाजपा भी दलित और पिछड़ी जातियों के बीच पैठ बढ़ाने में जुटी हुई है। उ.प्र और बिहार जैसे राज्यों में भाजपा को मिली सफलता इसका प्रमाण है। इससे प्रभावित होकर काँग्रेस भी दलित और पिछड़ी जातियों को लुभाने में लग गई। राहुल गाँधी पूरे देश में घूम - घूमकर मनु स्मृति विरोधी अभियान चला रहे हैं। देश की दोनों प्रमुख पार्टियों द्वारा सवर्णों को भगवान भरोसे छोड़ दिये जाने से अब उनके मन में ये धारणा बैठती जा रही है कि उनका कोई हितचिंतक नहीं है। आरक्षण विरोधी आंदोलन के प्रति सभी राजनीतिक दलों का उपेक्षभाव इसका प्रमाण है। सर्वोच्च न्यायालय तक ने आरक्षण की सुविधा प्राप्त परिवारों को उसके दायरे से बाहर करने जैसी टिप्पणियां समय - समय पर कीं किंतु किसी राजनेता में उनका समर्थन नहीं किया। सभी पार्टियां आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था को जारी रखने की पक्षधर हैं। राहुल गाँधी तो एक कदम आगे बढ़कर मनु स्मृति के बहाने सवर्ण समाज को खलनायक साबित करने में जुटे हुए हैं। लेकिन इस खींचातानी में एक नया वर्ग संघर्ष ओबीसी और अनु. जातियों/ जनजातियों के बीच दिखने लगा है। इसी के चलते ओबीसी आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाये जाने का दलित और आदिवासी वर्ग विरोध कर रहा है। बड़ी बात नहीं आने वाले समय में ओबीसी जातियों और दलित - आदिवासियों के बीच टकराव की स्थिति बनने लगे। इसी के साथ ये खतरा भी है कि ओबीसी में नये - नये जाति समूह उभरने से आरक्षण के बंटवारे को लेकर उनके बीच ही खींचातानी शुरू न हो जाए। कुल मिलाकर आरक्षण अब भारतीय राजनीति की मजबूरी बन गई है। किसी भी पार्टी या नेता में उसके विरोध में बोलने का साहस नहीं है। लेकिन इसके चलते सवर्ण जातियों के बीच जो नाराजगी बढ़ रही है उसकी चिंता भी की जानी चाहिए। सवर्ण छात्रों का ये कहना सही है कि उनकी समस्याओं को राजनेता जिस तरह उपेक्षित कर देते हैं उसके कारण उनके मन में समूची व्यवस्था के प्रति वितृष्णा बढ़ती जा रही है। देश से प्रतिभाओं के पलायन के पीछे आरक्षण भी बड़ा कारण है। आजकल सभी पार्टियां जेन जी को खुश करने में लगी हैं। लेकिन उन्हें ये ध्यान रखना होगा कि चुनाव के दिन अशिकांश मतदाता सब भूलकर जाति को ही याद रखते हैं। ऐसे में सवर्ण जातियों के जेन जी की नाराजगी भी जीत - हार में निर्णायक हो सकती है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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