पूरी दुनिया को हलाकान करने वाला प. एशिया संकट सुलझने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच हुए युद्धविराम के बाद ऐसा लगा था कि शायद शांति कायम हो जाएगी किंतु दोनों ही पक्षों के अड़ियल रवैये के चलते जंग रुक - रुककर चलती ही रही। इसके लिए कुछ सीमा तक इजरायल भी कसूरवार है जिसने युद्धविराम को न मानते हुए लेबनान और उसके यहाँ सक्रिय हिज़्बुल्लाह नामक आतंकवादी संगठन के ठिकानों पर हमले जारी रखे। इससे नाराज ईरान भी हमलावर रुख अपनाने से बाज नहीं आया। सबसे बडी़ समस्या बना होर्मुज नामक जलडमरूमध्य जहाँ से दुनिया को 20 फीसदी कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति होती है। यद्यपि इस समुद्री मार्ग के एक भाग पर ओमान की हिस्सेदारी भी है किंतु फिलहाल तो ईरान ने यहाँ के यातायात पर अपना नियंत्रण स्थापित कर रखा है और जो भी जहाज गुजरते हैं उनसे भारी - भरकम टोल टैक्स वसूल रहा है। हालांकि उसने ओमान को होर्मुज के नियंत्रण में साझेदार बनाने की पेशकश भी की लेकिन अमेरिका इसके लिए राजी नहीं है । कल ही उसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने होर्मुज को अमेरिका का हिस्सा बताते हुए नया नक्शा जारी कर दिया। प. एशिया के इस तनाव ने पूरी दुनिया को ऊर्जा संकट में डाल दिया है। दाम बढ़ने के साथ ही आपूर्ति प्रभावित होने से लगभग सभी देश परेशान हैं। इस बेवजह की लड़ाई के लिए कौन जिम्मेदार है ये कह पाना मुश्किल है। हालांकि शुरुआत गाजा का शासन संभाल रहे हमास द्वारा इजरायल पर किये अप्रत्याशित हमले से हुई। इस इस्लामिक आतंकवादी संगठन की पीठ पर ईरान का हाथ सर्वविदित है। लेकिन पहले वार में सफल होने के बाद हमास का वह दुस्साहस गाजा के विनाश का कारण बन गया। हमास को नेस्तनाबूत करने के साथ ही इजरायल ने गाजा पर अपना कब्जा जमा लिया। इसके बाद ही उसके प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने डोनाल्ड ट्रम्प को ईरान पर हमला करने के लिए उकसाया। वैसे भी अमेरिका लंबे समय से ईरान से खार खाये बैठा था और उसके परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए पहले भी वह बमबारी कर चुका था। ट्रम्प को लगा ये अच्छा अवसर है ईरान को घुटनाटेक करवाते हुए वहाँ अपने अनुकूल सत्ता कायम करने का। पहले ही दिन उसके सर्वोच्च शासक खामेनेई की हत्या में सफलता मिलने से अमेरिका और इजरायल दोनों का हौसला आसमान पर जा पहुंचा। अमेरिका में जा बसे ईरान के शाह के बेटे को तेहरान लाकर उनकी ताजपोशी की योजना भी बना ली गई।लेकिन ईरान ने जंग को बड़े हिस्से में फैलाते हुए अमेरिका और इजरायल दोनों को चौंका दिया।दुबई, ओमान, अबू धाबी, सऊदी अरब, कतर जैसे देशों में बने अमेरिकी सैनिक अड्डों पर मिसाइलें दागकर ट्रम्प की हेकड़ी निकाल दी। ईरान की ये कार्रवाई अभी भी जारी है। ट्रम्प द्वारा ईरान को दी गई धमकियाँ बंदर घुड़की साबित हुई हैं। भले ही अमेरिकी बमबारी ने ईरान को दशकों पीछे धकेल दिया हो किंतु उसे झुकाने का मंसूबा धरा का धरा रह गया। होर्मुज को ईरान के कब्जे से मुक्त करवाने में भी ट्रम्प नाकामयाब साबित हुए। ऐसे में इस लड़ाई का अंत दिखाई नहीं दे रहा। ईरान ट्रम्प की कोई शर्त मानने राजी नहीं है। दूसरी तरफ इजरायल भी आर - पार के मूड में है। ईरान के पड़ोसी देश शांति की कोई पहल करते भी हैं तो कभी ट्रम्प और नेतन्याहू टांग फंसा देते हैं, कभी ईरान बाधक बन जाता है। संरासंघ इस समूचे घटनाक्रम में मिट्टी का माधो साबित हुआ है। वहीं रूस खुद ही यूक्रेन के साथ अंतहीन जंग में उलझा है जबकि चीन ईरान को पर्दे के पीछे रहकर पूरी मदद करने के बावजूद सामने आने तैयार नहीं है। इस प्रकार कोई बड़ी ताकत इस लड़ाई को रुकवाने आगे नहीं आ रही। जहाँ तक भारत का प्रश्न है तो ये परिस्थिति बेहद तकलीफदेह है। खाड़ी देशों से कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति पर तो असर पड़ा ही इन देशों को होने वाले निर्यात पर भी विपरीत असर पड़ा है। ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस से खरीदी करने पर ट्रम्प लगातार बढ़ाते हुए टैरिफ को 100 फीसदी तक ले आये। आज की स्थिति में इस संकट का हल किसी को नहीं पता। हालांकि अमेरिका और ईरान दोनों को बड़ा नुकसान होने के साथ ही उनकी सैन्य क्षमता भी न्यूनतम स्तर पर आ गई है। लेकिन अभी भी अमेरिका, ईरान और इजरायल तीनों युद्ध रोकने के कोई संकेत नहीं दे रहे। ऐसा लगता है कोई भी ये एहसास नहीं होने देना चाह रहा कि उसका दम फूल गया। हालांकि इस अनिश्चितता के बीच इस बात की आशंका उत्पन्न होने लगी है कि इस लड़ाई का अंत परमाणु अस्त्रों से न हो क्योंकि ट्रम्प जैसा सिरफिरा व्यक्ति पागलपन में किसी भी सीमा तक जा सकता है। और ऐसा हुआ तब इस लड़ाई के विश्वयुद्ध में बदलने का खतरा और बढ़ जाएगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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